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तेंदूपत्ता संग्राहकों के लाभांश पर राजनीति

अगले साल यानी 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार प्रदेश के 40 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता और पानी की बोतलें देने की तैयारी में है। इसकी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वन मंत्री विजय शाह को दी है।

प्रदेश सरकार द्वारा मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के माध्यम से जंगल क्षेत्र में तेंदूपत्ता संग्रह करने वाले आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों को इस साल साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता और पानी की बोतल बाँटने को लेकर प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गयी है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा- ‘2017-18 में हमने यह योजना शुरू की थी। बीच में दूसरी सरकार आयी, जिसने यह योजना बन्द कर दी। लेकिन हम इसे फिर से चालू करेंगे।’

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार इस तरह से जहाँ आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष ने आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों के लघु वनोपज के हक़ के पैसे यानी लघु वनोपज के शुद्ध लाभ की राशि लगभग 261 करोड़ रुपये का बंदरबाँट करने का आरोप लगाया है।

मध्य प्रदेश के मनावर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक आदिवासी नेता डॉ. हिरालाल अलावा ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखकर इस सम्बन्ध में अपना विरोध दर्ज कराया है। डॉ. अलावा ने पत्र में लिखा है- ‘लघु वनोपज पर ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत को भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची, पेसा $कानून-1996 एवं वन अधिकार $कानून 2006 में नियंत्रण, प्रबंधन सहित समस्त अधिकार सौंपे गये हैं। इसके सम्बन्ध में मध्य प्रदेश शासन वन विभाग द्वारा 15 मई, 1998 को जारी आदेश के तहत लघु वनोपजों के व्यापार से प्राप्त लाभांश राशि, जो वर्तमान में लगभग 1500 करोड़ से भी ज़्यादा है; को प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से संग्राहकों को नक़द वितरित की जानी थी। लेकिन मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ लघु वनोपज के व्यापार से प्राप्त लाभांश की राशि का सन् 1998 से लगातार दुरुपयोग करते रहा है। अत: लघु वनोपज के लाभांश की राशि से सामग्री क्रय कर वितरित किये जाने की कार्यवाही को तत्काल रोका जाए और 15 मई, 1998 के आदेशानुसार नक़द राशि संग्राहकों को वितरित किया जाए।’

क्या है मामला?

मध्य प्रदेश लघु वनोपज के अंतर्गत आने वाले तेंदूपत्ते का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। बीड़ी बनाने के काम में आने वाले ये पत्ते जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों को सर्वाधिक मौसमी आय उपलब्ध कराते हैं। लघु वनोपज आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों के जीवनयापन का हमेशा से मुख्य आधार रहा है।

संविधान की 11वीं अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 तथा वनाधिकार अधिनियम-2006 के तहत सभी तरह के लघु वनोपज पर समस्त अधिकार, नियंत्रण एवं प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपा गया है एवं वन विभाग को इन नियंत्रणों से मुक्त कर दिया गया है। इसके अनुसार 15 मई, 1998 को वन विभाग मंत्रालय मध्य प्रदेश शासन ने मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ को आदेश दिया कि लघु वनोपज के व्यापार से प्राप्त शुद्ध लाभ की सम्पूर्ण राशि प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को प्रदान की जाएगी।

उक्त सहकारी समितियाँ वनोपज के शुद्ध लाभ की सम्पूर्ण राशि का 50 प्रतिशत संग्राहकों को नक़द वितरित करेंगी, 25 प्रतिशत राशि ग्रामीण विकास कार्यों पर ख़र्च करने और शेष 25 प्रतिशत राशि वन विकास कार्यों पर ख़र्च करने का प्रावधान किया गया। जनवरी, 2006 में इसमें आंशिक संशोधन कर संग्राहकों की राशि 60 प्रतिशत, ग्रामीण विकास और वन विकास मद की राशि 20-20 प्रतिशत राशि तथा फरवरी 2012 में पुन: संशोधन कर संग्राहकों की राशि 70 प्रतिशत, ग्रामीण विकास और वन विकास मद की राशि 15-15 प्रतिशत ख़र्च करने का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ सन् 1998 से ग्रामीण विकास एवं वन विकास मद की 50, 40 और 30 प्रतिशत की राशियों को आज तक प्राथमिक सहकारी समितियों को नहीं दिया और उक्त राशियों को मनमाने ढंग से ख़र्च करता रहा है। अब उसी राशि में से सामग्रियाँ ख़रीदने व वितरित करने के मामले में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी है।

13 जनवरी, 2023 को वन विभाग के अपर मुख्य सचिव जे.एन. कंसोटिया की अध्यक्षता में मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के संचालक मंडल की बैठक में 261 करोड़ रुपये के साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता, पानी की बोतल की क्वालिटी, डिजाइन और ख़रीदी की मंज़ूरी दे दी गयी। बैठक में कहा गया कि 2022 में तेंदूपत्ता जमा करने का काम करने वाले कार्डधारी संग्राहकों को ही ये सामग्री दी जाएगी। संग्राहकों के 15 लाख 24 हज़ार परिवारों को 285 रुपये वाली पानी की बोतल एवं 200 रुपये वाला छाता दिया जाएगा, जबकि परिवार के एक पुरुष को 291 रुपये का जूता एवं एक महिला को 195 रुपये की चप्पल दी जाएगी, जबकि परिवार की सभी 18 लाख 21 हज़ार महिला सदस्यों को 402 रुपये वाली साड़ी वितरित की जाएगी। जीएसी, परिवहन एवं वितरण पर 40 करोड़ 51 लाख रुपये व्यय किये जाएँगे।

उक्त सामग्री लघु उद्योग निगम के माध्यम से हस्त शिल्प व हथकरघा विकास निगम, खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड और पॉवरलूम बुनकर सहकारी संघ बुरहानपुर से ख़रीदी जाएगी। इन संस्थाओं से एनओसी लेने की तैयारी चल रही है। उक्त सामग्रियों की ख़रीदी एवं वितरण हेतु रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी भागवत सिंह को छ: माह के लिए सलाहकार बनाने की स्वीकृति दे दी गयी है। सन् 2018 में भागवत सिंह के माध्यम से ही चरण पादुका योजना का क्रियान्वयन किया गया था।

ज्ञात हो कि वर्ष 2018 में राज्य विधानसभा चुनाव के पूर्व भी चरण पादुका योजना के तहत 261 करोड़ रुपये की सामग्री तेंदूपत्ता संग्राहक आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों को बाँटकर लुभाने का प्रयास किया गया था; लेकिन कांग्रेस ने बाँटे गये जूतों से कैंसर फैलने की बात उठाकर माहौल को गरमा दिया था।

संग्राहकों के पक्ष में उतरे विधायक

डॉ. अलावा का आरोप है कि ग्रामीण विकास मद की लगभग 1,000 करोड़ और वन विकास मद की 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा राशि मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ ने प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को उपलब्ध नहीं करवायी और उस राशि का दुरुपयोग कर अपव्यय करता रहा है। प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों द्वारा ग्रामीण विकास एवं वन विकास मद की राशि से करवाये जाने वाले कार्यों के पारित प्रस्तावों को बुलवाकर उन पर आपत्ति लगाने, निरस्त करने का कार्य भी संघ करता रहा है, जबकि संघ को किसी भी $कानून, नियम या उपविधि में ऐसा कोई अधिकार नहीं है। डॉ. अलावा का कहना है कि मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ के अधिकारियों ने शुद्ध लाभ की राशि का मनमाने ढंग से अपने सुख-सुविधा और अर्दली भत्ता देने पर ख़र्च किया, जबकि यह राशि संग्राहकों की है और उनमें ही वितरित की जानी चाहिए।

मध्य प्रदेश के निवास विधानसभा क्षेत्र से विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले के एक विधानसभा प्रश्न के जवाब में 30 दिसंबर, 2020 को वन मंत्री कुँवर विजय शाह ने स्वीकार किया कि वनोपज के लाभांश को स्थानीय संग्राहकों में वितरित किया जाना चाहिए। विधानसभा में वन मंत्री शाह का उत्तर निम्नानुसार है- ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में राज्य शासन के ज्ञापन दिनांक 15 मई, 1998 द्वारा ग्राम सभाओं को लघु वनोपज का स्वामित्व सम्बन्धी निर्देश जारी किये हैं।

ग्राम स्वराज लागू करने के सम्बन्ध में जारी निर्देश में लघु वनोपज के संरक्षण, संग्रहण एवं विपणन के समस्त अधिकार ग्राम सभा को दिये गये हैं। लघु वनोपज का अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 में समुदाय के अधिकार के रूप में मान्यता देने की विधिक व्याख्या की गयी है, जिसके कारण यह अधिकार स्वत: विभाग के नियंत्रण से मुक्त हो चुके हैं। वर्तमान में राष्ट्रीयकृत लघु वनोपज तेंदूपत्ता का केवल व्यापार मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे प्राप्त लाभांश स्थानीय समुदाय में वितरित किया जाता है।

डॉ. अलावा ने राज्यपाल से माँग की है कि लघु वनोपज संघ भोपाल के द्वारा ग्रामीण विकास मद एवं वन विकास मद की राशि प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को देने के बजाय संघ के स्तर पर अन्य कार्यों में ख़र्च करने, राशि का अपव्यय करने तथा राशि का दुरुपयोग करने वाले संघ के अधिकारियों के विरुद्ध लोकायुक्त से जाँच कराकर आपराधिक प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किये जाए।

पूर्व में भी भोपाल स्थित ग़ैर-लाभकारी संस्था, किसान जागृति संगठन के कार्यकर्ता इरफ़ान जाफ़री की शिकायत पर 26 जून 2019 को मध्य प्रदेश लोकायुक्त ने राज्य में लघु वनोपज के व्यापार और विकास के लिए ज़िम्मेदार मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के खिलाफ़ मामला दर्ज किया था, जिसके कारण कई अधिकारियों के पसीने छूट गये थे। हालाँकि यह मामला अभी भी लोकायुक्त के समक्ष लम्बित है।

बाल विवाह के ख़िलाफ़ क्रूर कार्रवाई

असम के धुवरी ज़िले के बागरीबाड़ी पुलिस स्टेशन के बाहर 17 साल की युवा महिला नगीना (बदला हुआ नाम) पुलिस वैन में बेठे अपने पति को पुलिस से छुड़ाने के लिए वैन के पीछे भागती है और अपने पति को बाहर निकालने के लिए उसे खींचती है; लेकिन वैन की रफ़्तार जीत जाती है। नगीना ने बीते महीने ही अपने पहले बच्चे को जन्म दिया है। असम की ही एक विधवा मुस्लिम महिला ने इसलिए ख़ुदकुशी कर ली, क्योंकि 2012 में जब उसका निकाह हुआ, तब वह नाबालिग़ थी; और उसे डर था कि कहीं असम पुलिस उसके पिता को बाल विवाह कराने के जुर्म में जेल में न डाल दे। इस महिला ने दो साल पहले ही कोरोना के कारण अपने पति को खोया था। इस महिला के भी दो बच्चे हैं।

असम में महिलाएँ सरकार की बाल विवाह रोकने के लिए चलायी गयी मौज़ूदा क्रूर कार्रवाई का विरोध कर रही हैं। उन्होंने 4 और 5 फरवरी को असम के कई पुलिस स्टेशनों का घेराव भी किया था। पीडि़त महिलाओं की माँग है कि उनके पतियों को जेल से बाहर निकाला जाए। उन्होंने कहा कि हमें सरकारी योजनाओं के लाभ नहीं चाहिए। हमें हमारे पति चाहिए।

दरअसल असम में इन दिनों सरकार के ख़िलाफ़ हंगामा हो रहा है। इस हंगामे के पीछे असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का राज्य में बाल विवाह रोकथाम के प्रति अपनाया जा रहा कड़ा रुख़ है। इस नयी व्यवस्था में बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को ख़त्म करने के लिए जिस तरह का सरकारी नज़रिया है और सोच झलकती है, उससे लोगों के मन में भय पैदा हो रहा है। जबकि साक्ष्य बोलते हैं कि इस समस्या का समाधान करने में क़ानून का पालन मददगार तो होता है; लेकिन ऐसे धरपकड़ से कोई लाभ नहीं होने वाला। लड़कियों के लिए शिक्षा, रोज़गार, सशक्तिकरण के अन्य उपायों पर फोकस करने से बाल विवाह को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के सिर पर एक सनक सवार हो गयी है। उन्होंने हाल ही में कहा कि बाल विवाह के ख़िलाफ़ अभियान 2026 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा।

ग़ौरतलब है कि बीते माह 23 जनवरी को असम सरकार ने कैबिनेट में बाल विवाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का फ़ैसला सुनाकर सबका सहयोग माँगा था। इसमें यह फ़ैसला लिया गया कि राज्य में 14 साल से कम आयु की लड़कियों से शादी करने वालों के ख़िलाफ़ पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी साफ़ कर दिया गया कि अगर लडक़े की आयु 14 साल से कम है, तो उसे सुधार गृह भेजा जाएगा; क्योंकि क़ानूनन नाबालिग़ौं को अदालत में पेश नहीं किया जाता है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि 14 से लेकर 18 साल से कम आयु की लड़कियों से शादी रचाने वालों के ख़िलाफ़ बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन्हें गिरफ़्तार किया जाएगा और विवाह को अवैध करार दिया जाएगा।

इस अभियान के तहत बाल विवाह कराने वाले पुजारियों और मुस्लिम मौलोवियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होगी। यही नहीं, ऐसा विवाह कराने वाले पिता व परिवार के अन्य पुरुषों को भी नहीं बख़्शा जाएगा। ऐसे फ़ैसलों का असम की पुलिस कड़ाई से पालन कर रही है। पुलिस ने बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लघंन करने वाले 8,000 आरोपियों की सूची बनायी है और इसमें से 4,000 से अधिक के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। लेख लिखे जाने तक 2,500 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया है। आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस कभी उनके घर रात के 2:00 बजे दस्तक देती है, तो कभी सुबह। पुलिस की कहना है कि यह कार्रवाई 2020, 2021 व 2022 में सम्पन्न बाल विवाह के मामलों में की जा रही है; लेकिन लोगों का कहना है कि सात साले पुराने मामलों में भी पुलिस कड़ा रुख़ अपनाये हुए है। अब सवाल यह है कि असम सरकार ऐसा क्यों कर रही है?

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा भाजपा के नेता हैं और असम के एक क़द्दावर नेता हैं। उनकी दलील इस संदर्भ में यह है कि असम देश में बाल विवाह के आँकड़ों को लेकर बदनाम है। यही नहीं, यहाँ पर नवजातों व मातृ मृत्यु दर भी बहुत अधिक है, जो चिन्ता का सबब है। यह हक़ीक़त है। लेकिन इस समस्या के समाधान को लेकर सरकार ने जो तरीक़ा इन दिनों अपनाया है, वह विवादों के घेरे में है। बाल विवाह एक वैश्विक समस्या है; लेकिन विश्व मानचित्र पर भारत की स्थिति बहुत ख़राब है। ऐसा अनुमान है कि यहाँ क़रीब 12 लाख लड़कियाँ हर साल बालिका वधू बनती हैं यानी उनकी शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है, जबकि यह ग़ैर-क़ानूनी है। बाल विवाह रोकथाम अधिनियम-2006 के अनुसार, देश में लडक़ी की शादी की न्यूनतम आयु 18 व लडक़े की 21 वर्ष है। लेकिन क़ानून को दरकिनार कर बाल विवाह होते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019-2021) के अनुसार, देश में 18 साल की आयु से पहले विवाह देने वाली लड़कियों की राष्ट्रीय औसत दर 23.3 प्रतिशत है। लेकिन असम में यह दर 31 प्रतिशत है।

वैसे इस सर्वेक्षण के अनुसार, देश में सबसे अधिक बाल विवाह पश्चिम बंगाल में होते हैं। उसके बाद बिहार व त्रिपुरा राज्य का स्थान आता है, जहाँ बाल विवाह दर 40 प्रतिशत से अधिक है। देश में आठ ऐसे राज्य हैं, जहाँ बाल विवाह की औसत दर राष्ट्रीय औसत दर 23 प्रतिशत से अधिक है। एक तथ्य और है, वह यह कि जिन राज्यों में साक्षरता दर और स्वास्थ्य व सामाजिक सूचकांक बेहतर हैं, वहाँ बाल विवाह की दर कम है। केरल में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के अनुसार, बाल विवाह की दर 6.3 प्रतिशत है, और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) में यह दर 7.6 प्रतिशत थी।

इसी तरह मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु में भी बाल विवाह की दर में कमी आयी है। लेकिन असम में बाल विवाह के मामलों में उछाल आया है। 2015-16 सर्वे के अनुसार, असम में बाल विवाह की दर 30.8 प्रतिशत थी, जो कि 2019-2021 में बढक़र 31.8 प्रतिशत हो गयी। यह सर्वे यह भी बताता है कि असम में कम उम्र में गर्भवती होने वाली लड़कियों की संख्या 11.7 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा 6.8 प्रतिशत है। यहाँ पर प्रसंगवश इस बात का ज़िक्र किया जा रहा है कि बीते दिनों असम के ही मुख्यमंत्री हिमंता ने एक सरकारी कार्यक्रम में महिलाओं को सही उम्र में माँ बनने की सलाह दे डाली।

उन्होंने कहा कि माँ बनने की सही उम्र 22 से 30 साल है। कम उम्र में शादी न करना और सही उम्र में बच्चे पैदा न करना भी माँ और शिशु मृत्यु दर बढऩे का एक कारण है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वेक्षण के अनुसार, असम में मातृ और शिशु मृत्यु दर अत्यधिक है और इसके लिए बाल विवाह मूल कारण है। लेकिन यहाँ अहम सवाल सरकार के उस क्रूर तरीक़े पर उठ रहे हैं, जिसके ज़रिये इसे हल करने की कोशिश की जा रही है। सरकार की इस कार्रवाई को लेकर असम के विपक्षी राजनीतिक दल नाख़ुश हैं और कई अन्य रसूख़दार इसे मज़हबी रंग भी देने का प्रयास कर रहे हैं।

वैसे कोई भी बाल विवाह के पक्ष में नहीं है। लेकिन इसके बावजूद सरकार का बाल विवाह को रोकने का तरीक़ा विरोधियों को इस मामले में एक पाले में खड़ा कर रहा है। असम में बाल विवाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई वाले ज़िलों में धुवरी, होजई, उदलगिरी, मोरीगाँव, गुवाहटी, विश्वनाथ, बोगाईंगाँव और ज़ोरहाट आदि शामिल हैं। पकड़े गये आरोपियों में क़रीब 80 प्रतिशत मुसलमान हैं। असम में 2011 जनसंख्या के अनुसार, 3.10 करोड़ की आबादी में से 34 प्रतिशत मुसलमान हैं। एक पक्ष का आरोप है कि इस कार्रवाई में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि लडक़ों की गिरफ़्तारी के बाद विवाहित लड़कियों का क्या होगा? असम में बीते छ: वर्षों से भाजपा की सरकार है। यह सरकार की विफलता है। सरकार ने मुस्लिम लड़कियों को पढ़ाने के लिए क्या $खास क़दम उठाये? स्कूल खोले नहीं और मदरसे बन्द करवा दिये।

दरअसल यह हक़ीक़त है कि बाल विवाह का सम्बन्ध सामाजिक व आर्थिक स्तर से जुड़ा हुआ है। ग़रीब, अशिक्षित, कम शिक्षित परिवारों में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है। फिर इसका असर ऐसी लड़कियों के स्वास्थ्य, उनकी कार्यक्षमता पर ही नहीं पड़ता, बल्कि बच्चे भी प्रभावित होते हैं। बाल विवाह का देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। हिमंता का संकल्प असम को 2026 तक बाल विवाह मुक्त राज्य के तौर पर देखना है।

हालाँकि संकल्प बाल कल्याण और राष्ट्र के हित में है। लेकिन सरकार अपने मक़सद में ऐसी धरपकड़ और गिरफ़्तारियों से सफल नहीं हो सकती। लड़कियों, महिलाओं को सशक्त बनाने वाले कार्यक्रमों को अमल में लाने पर ज़ोर देने, जहाँ योग्य पात्र तक ऐसी योजनाएँ नहीं पहुँच रही, वहाँ इन फ़ासलों को भरने और अन्य ख़ामियों को दुरुस्त करने में राज्य सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

तालाबों से बदलेगी उत्तर प्रदेश के गाँवों की तस्वीर

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार प्रदेश के विकास के लिए बुनियादी संसाधनों पर ध्यान दे रही है। विकास के इसी क्रम में पुराने तालाबों का पुनरुद्धार किया जा रहा है। नये तालाब भी बनाये जा रहे हैं तथा खेत तालाब योजना-2023 के तहत किसानों को अपने अपने खेत में तालाब खोदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस योजना के तहत सरकार किसानों द्वारा अपने खेत में तालाब खोदने पर सब्सिडी भी दे रही है। उत्तर प्रदेश खेत तालाब योजना-2023 के लिए किसानों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किये जा रहे हैं।

प्रदेश सरकार का मानना है कि खेती तभी हो सकती है, जब सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो। अभी प्रदेश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में हरियाली लाने तथा फ़सलों के अच्छे उत्पादन के लिए तालाब होना अति आवश्यक है।

भौजीपुरा क्षेत्र के बड़े किसान नत्थू लाल कहते हैं कि आज से कोई 30-32 वर्ष पूर्व कई किसानों के पास रहट हुआ करते थे, जिनसे बैलों द्वारा पानी निकालकर खेतों की सिंचाई की जाती थी। कुछ किसानों को नहर से पानी मिलने की सुविधा हुआ करती थी। मगर बिजली का विस्तार होने के बाद सरकार ने कुएँ लगवाने शुरू कर दिये। किसानों ने अपने ही खेतों में बोरिंग करवाकर पंपसेट से पानी निकालकर खेतों को सींचने की प्रक्रिया अपना ली। अब हालात यह हैं कि भूमि के अंदर का पानी भी कम हो चला है। नहरों में भी पानी कभी आता है, तो कभी नहीं आता है। प्रदेश की कई नहरों का अस्तित्व भी नहीं बचा है। रही रहटों की बात, तो उनका तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री योगी इस तरह की योजना पर काम कर रहे हैं, तो यह अच्छी बात है।

कुल मिलाकर अगर निष्पक्ष रूप से तालाब योजना पर चिंतन मनन करें, तो इस योजना के कई लाभ भी स्पष्टट दिखते हैं तथा कई तरह की हानियाँ भी दिखती हैं। इसे लेकर किसानों तथा कृषि विशेषज्ञों में मतभेद भी हो सकते हैं। इसलिए तालाबों से होने वाले लाभों तथा हानियों का आकलन करना उचित होगा।

धन व जल की बचत

कृषि विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापक सोमपाल कहते हैं कि प्रदेश में पुरानी परम्परा की ओर किसानों के लौटने से कई लाभ होंगे। तालाब ख़ुदने से किसानों का सिंचाई पर होने वाला व्यय बचेगा जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। अगर सिंचाई की लागत देखें, तो अपना पंपसेट लगाकर एक एकड़ भूमि को सींचने के लिए प्रति वर्ष अनुमानित लागत पाँच-छ: हज़ार रुपये आती है। सरकारी ट्यूबवेल से यही लागत एक-डेढ़ हज़ार आती है। अपना ट्यूबवेल हो तो यह लागत ढाई-तीन हज़ार आती है। अगर किसान वर्षा का जल संचित कर लेंगे, तो सिंचाई की लागत मामूली ही आएगी। इसके अतिरिक्त तालाबों के ख़ुदने से भूजल का दोहन कम होने लगेगा, जिससे भूजल स्तर में सुधार होगा।

हरियाली तथा आय बढ़ेगी

वर्षा का जल संचित करने से प्रदेश में हरियाली बढ़ेगी। दूसरे जीवों को पीने का पानी आसानी से उपलब्ध होगा। इसके अतिरिक्त तालाबों में मछली पालन तथा मोती पालन करके किसान अपनी आय बढ़ा सकेंगे। मछली पालन तथा मोती पालन के अतिरिक्त तालाब में खेती भी की जा सकती है। तालाब में होने वाली खेतियों में सिंघाड़े और भसीड़े (जल ककड़ी) की खेती आसानी से की जा सकती है। जो लोग मछली नहीं पालना चाहते, वे ये खेती करके लाभ कमा सकते हैं। जिनके पास पर्याप्त भूमि है, वे तालाब का सौंदर्यीकरण करके उसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करके लाभ कमा सकते हैं।

अगर कोई किसान पर्यटन स्थल की तरह तालाब को विकसित करता है, तो उसमें वोटिंग, स्वीमिंग पूल तथा मछली पालन आसानी से किया जा सकता है। मछलियों के होने से पर्यटक भी आकर्षित होंगे। इसके अतिरिक्त पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ढावा, विश्राम स्थल, होटल आदि भी खोले जा सकते हैं। हरियाणा तथा राजस्थान के कुछ किसानों ने शुद्ध तथा देशी भोजन उपलब्ध कराकर अपने खेतों में इस तरह के पर्यटन स्थल विकसित किये हुए हैं, जो पर्यटकों को अनायास अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में लाभ

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में तालाबों के होने से लाभ यह होगा कि वहाँ जल संचय से हरियाली बढ़ेगी। ऐसे क्षेत्रों के किसानों तथा निवासियों को चाहिए कि वे अपने यहाँ अधिक-से-अधिक पौधे लगाएँ। क्योंकि अधिक वृक्ष होने से वर्षा भी अधिक होगी तथा जब वर्षा अधिक होगी, तो जलापूर्ति अच्छी होने से खेती भी अच्छी होगी। इसके लिए पहले तालाब बनाये जाएँ, ताकि जब भी वर्षा हो उनमें जल इकट्ठा हो सके। पौधरोपण तालाब के किनारों पर अधिक करना चाहिए, जिससे वे हरे भरे रह सकें तथा भूमि का कटान होने से रोकें। किसान फल वाले पौधों को लगाएँ, जिससे उन्हें भविष्य में धन लाभ भी हो सके। अगर फल वाले पौधे लगाना सम्भव न हो तो ऐसे पौधे लगाये, जिनकी लकड़ी क़ीमती हो। मगर सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों को कड़े परिश्रम तथा धैर्य की आवश्यकता होगी।

शारीरिक परिश्रम बढ़ेगा

खेतों तथा गाँवों में तालाब खोदने से किसानों को अपने खेतों में सिंचाई के लिए अतिरिक्त परिश्रम की आवश्यकता होगी। यह परिश्रम तालाब खोदने के लिए तो करना ही पड़ेगा, सिंचाई के लिए खेतों तक जल ले जाने के समय भी करना होगा। स्पष्टट है कि तालाबों का पानी भूमि तल से नीचे रहता है, जिसे ऊपर समतल पर लाकर खेतों तक ले जाने के लिए विभिन्न संसाधनों के माध्यम से ऊपर लाना होगा। अगर कोई किसान पुरानी पद्धति अपनाकर इस पानी को सिंचाई के लिए निकालता है, तो उसे अधिक समय तथा अधिक परिश्रम की आवश्यकता पड़ेगी। मगर अगर कोई किसान पंपसेट से इस पानी को खींचकर सिंचाई के उपयोग में लाना चाहेगा, तब उसे डीजल और पंपसेट की आवश्यकता पड़ेगी। अंतर इतना है कि भूमि से जल निकालने के लिए पंपसेट अधिक डीजल खपत करेगा, जबकि तालाब से जल अधिक खिंचेगा; जिससे लागत थोड़ी कम आएगी।

पुरातन परम्परा लौटेगी या नहीं?

पुराने तालाबों के पुनरुद्धार होने तथा नये तालाबों के ख़ुदने से वाद विवाद चर्चा परिचर्चा को हवा मिल रही है। कुछ लोगों का कहना है कि इससे पुरातन परम्परा को बल मिलेगा। लोगों को पहले की तरह ही सिंचाई की परम्परा अपनानी पड़ेगी जिसके लिए पशुपालन करना पड़ेगा। सिंचाई की पूर्व परम्परा में पशुओं का योगदान महत्त्वपूर्ण था। मगर पुरातन परम्परा की ओर लौटना असम्भव लगता है। इसका कारण यह है कि अब किसानों को आधुनिक खेती करने की आदत हो चुकी है।

अधिकतर किसान कम समय तथा कम परिश्रम करके खेती करने की परम्परा पर चलने लगे हैं। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि आधुनिक खेती का दौर है जिसके लिए मशीनरी खेती का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। दूसरा यह कि पहले संयुक्त परिवार होते थे, जिसमें चार-पाँच लोग होना आम बात थी, जो मिलजुलकर खेती सँभाल लेते थे। अधिकतर किसानों के पास खेती ही जीवनयापन का माध्यम होती थी। मगर अब परिवार में सदस्यों की संख्या भी कम है लोगों के पास आय के श्रोत भी बढ़े हैं तथा पशुपालन भी घटा है। इसके अतिरिक्त आज का किसान खेतों में दिन-रात लगे रहना नहीं चाहता।

छोटे किसान असहाय

खेतों में वही लोग तालाब ख़ुदवा सकते हैं, जिनके पास पर्याप्त भूमि है। छोटे किसानों तालाब ख़ुदवा लेंगे, तो खेती कहाँ करेंगे? तालाब ख़ुदवाने के लिए कुछ नहीं तो एक-दो एकड़ तो भूमि होनी ही चाहिए। हालाँकि छोटे किसान, जिनकी आय छोटी खेती से न के बराबर होती है, तालाब खोदकर तालाब को ही आय को स्रोत बना सकते हैं। मान लीजिए किसी किसान के पास एक-दो बीघा भूमि है, तो उसे खाने भर की पैदावार भी करने लिए परिश्रम तथा धन दोनों की आवश्यकता होगी। मगर अगर वही किसान एक-दो बीघा का तालाब ख़ुदवा लेता है, तो उसे इस तालाब से खेती से अधिक लाभ मिलेगा। मगर तालाब को अच्छी आय का स्रोत बनाने के लिए उसे इसका प्रशिक्षण लेना होगा।

गाँवों में भूजल होगा दूषित

पहले के गाँवों तथा आज के गाँवों में बहुत अंतर आ चुका है। पहले लोग सौंच के लिए गाँव से दूर खेतों में जाते थे। इससे उनके मल को कुछ कीड़े मिट्टी तथा खाद में बदल देते थे। इससे खेती की भूमि उपजाऊ होती थी। मगर अब अधिकतर घरों में शौचालय हैं। इससे लोगों का मल भूमि में सड़ता रहता है तथा गंदा पानी मूत्र नालियों के माध्यम से तालाबों में जाता है। इससे भूमि का जल दूषित होता जा रहा है। स्थिति यह है कि कई गाँवों का भूजल इतना दूषित हो चुका है कि पीने योग्य नहीं बचा है।

कई गाँवों का भूजल तो पीला पड़ चुका है। कहने का अर्थ यह है कि तालाबों के ख़ुदने से भूजल अधिक प्रदूषित होगा। अगर इस जल को प्रदूषित होने से बचाना है तो घरों में बने शौचालयों को बन्द करना होगा तथा पहले की ही तरह लोगों को शौच के लिए खेतों तथा जंगलों में जाना होगा जिसके लिए आज की पीढ़ी तैयार नहीं होगी। स्त्रियों के लिए यह अत्यंत दुष्कर होगा।

चुनौतियाँ तथा समस्याएँ

पुराने तालाबों के पुनरुद्धार में कई तरह की चुनौतियाँ तथा समस्याएँ आ रही हैं। इनमें पहली समस्या अतिक्रमण है तथा दूसरी समस्या दलदल बन चुके तालाबों का पुनरुद्धार करना है। जिन लोगों ने सरकारी भूमि तता तालाब की भूमि पर अतिक्रमण कर रखा है, वे अब उसे छोडऩा नहीं चाहते। गाद बन चुके तालाबों को साफ़ करना कठिन भी है तथा ख़तरनाक भी है। ऐसे तालाबों के पुनरुद्धार से सरकारी अमला भी हाथ खड़े कर रहा है।

प्रदेश सरकार ने निर्णय तो ठीक लिया है, मगर इसके लिए उसे तालाबों से होने वाले लाभ तथा हानि दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर कार्य करने की आवश्यकता है। विदित हो कि खेत तालाब योजना उत्तर प्रदेश-2023 के तहत प्रदेश सरकार किसानों को खेत में तालाब खोदने पर कुल लागत मूल्य का 50 प्रतिशत अनुदान देगी। सरकार के अनुसार, एक छोटे तालाब के निर्माण पर लगभग एक लाख रुपये से अधिक तथा बड़े तालाब के निर्माण पर लगभग सवा लाख रुपये व्यय होंगे, जिसमें आधा व्यय सरकार करेगी। योगी सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश के हर गाँव में न्यूनतम दो से तीन तालाब होने ही चाहिए।

प्रदेश में पाँच वर्ष में 37,500 खेत तालाबों के निर्माण का लक्ष्य है। गाँवों में पुराने तालाबों के पुनरुद्धार तथा नये तालाबों के निर्माण पर भी कार्य हो रहा है। खोदे जा रहे तालाबों को अमृत सरोवर नाम दिया गया है। अब तक लगभग 30 प्रतिशत नये पुराने से अधिक तालाब तैयार हो चुके हैं।

पंजाब में स्वास्थ्य सेवाओं पर विवाद

स्वास्थ्य केंद्रों का विकल्प बन रहे आम आदमी क्लीनिक

पंजाब में आम आदमी क्लीनिक अब सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और डिस्पेंसरियों का विकल्प बन गये हैं। सरकार इस प्रयोग को अच्छा बता रही है, वहीं काफ़ी लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं। बठिंडा ज़िले के काहनगढ़ और बख़्शीवाला की डिस्पेंसरियाँ 27 जनवरी से बन्द हैं और इन्हें शुरू कराने के लिए ग्रामीण धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन (उग्राहाँ-एकता) के जोगिंदर सिंह दयालपुरा के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में डिस्पेंसरियाँ ठीक काम कर रही हैं। लोग वहाँ की सेवाएँ से सन्तुष्ट हैं। फिर इन्हें बन्द क्यों रखा जा रहा है? सरकार लोगों की सुविधा के लिए चाहे जितने क्लीनिक खोल ले; लेकिन पहले से चल रहे केंद्रों को बन्द करना ग़लत है। सरकार इन्हें पहले की तरह चालू रखे। गाँव गोविंदपुरा के ग्रामीण भी इसी तर्ज पर बन्द डिस्पेंसरी को फिर से शुरू करने के लिए आन्दोलनरत हैं।

उधर, भगवंत मान सरकार प्रदेश में आम आदमी क्लीनिक खोलने की केजरीवाल गारंटी पूरी करने का दम भर रही है। दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक है, तो पंजाब में आम आदमी क्लीनिक। नाम अलग-अलग लेकिन मक़सद एक ही कि व्यक्ति को घर के आसपास ही छोटी-मोटी तकलीफ़, बीमारी और विभिन्न प्रकार की जाँच (टेस्ट) की सुविधा मिल जाए।

छोटे और बड़े अस्पतालों में लोड को कम करने के लिए यह योजना ठीक है, पर पहले से चल रहे प्राथमिक केंद्र और डिस्पेंसरियों को बन्द या कमज़ोर करना सही क़दम नहीं है। ये भी तो वही काम कर रहे हैं, जो आम आदमी क्लीनिक में होते हैं, फिर इन्हें नया विकल्प बनाने की ज़रूरत क्यों हुई? इन्हीं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और डिस्पेंसरियों को अतिरिक्त सुविधाओं से लैस किया जा सकता है। अगर वादे के मुताबिक, मोहल्ला या आम आदमी क्लीनिक खोलने ही हैं, तो इन्हें अतिरिक्त के तौर पर लिया जाना चाहिए।

पंजाब में क़रीब 600 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। सरकार के नए प्रयोग से इनकी सेवाएँ प्रभावित होने लगी हैं। कुछ स्थानों पर इन केंद्रों पर उपचार के लिए आने वालों को आम आदमी क्लीनिक जाने की बात कही जाती है। डॉक्टरों और अन्य पैरा मेडिकल स्टाफ को आम आदमी क्लीनिकों में शिफ्ट किया जा रहा है। सिविल अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी होने लगी है। पंजाब सिविल मेडिकल सर्विसेज एसोसिएशन (पीसीएमएस) के मुताबिक, इमरजेंसी मेडिकल अफ़सरों को आम आदमी क्लीनिकों में लगाये जाने से काम प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों को सामान्य ड्यूटी करनी पड़ रही है।

स्वास्थ्य विभाग में पिछले दिनों 271 डॉक्टरों की नियुक्तियाँ हुई हैं। बावजूद इसके बहुत-से पद ख़ाली पड़े हैं। अगर नये वजूद में आये आम आदमी क्लीनिकों को सफल बनाना है, तो नयी भर्तियाँ करनी होगी, वरना सही प्रबंधन न होने से छोटे-बड़े अस्पतालों में कामकाज और भी ज़्यादा प्रभावित होगा। स्वास्थ्य निदेशक सेवाएँ रणजीत सिंह भी मानते हैं कि जल्द ही अस्पतालों में इमरजेंसी डॉक्टरों की तैनाती को विश्वसनीय बनाया जाएगा। मोहल्ला या आम आदमी क्लीनिक का कहीं विरोध नहीं हो रहा, बल्कि पहले से चल रहे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, डिस्पेंसरियों और सिविल अस्पतालों की सेवाएँ कुछ हद तक बाधित होने का है।

सरकार ने बजट में आम आदमी क्लीनिक योजना के लिए 77 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा है। यह राशि बड़ी योजना के लिए पर्याप्त नहीं है। अगर सरकार को योजना के तहत लोगों को घर के पास स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराना ही था, तो इसके लिए ज़्यादा बजट राशि और स्टाफ की व्यवस्था का प्रावधान रखना चाहिए था। सवाल यह है कि क्या प्रदेश में पहले से चल रहे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और डिस्पेंसरियों का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँच पा रहा था? अगर सेवाओं में कुछ कमी थी, तो इसे दूर और इन्हें मज़बूत किया जा सकता था।

दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक योजना की तर्ज पर पंजाब में मोहल्ला या पिंड (गाँव) क्लीनिक खोलने की ज़रूरत क्यों हुई? नये प्रयोग के तहत वजूद में आये क्लीनिकों में कई तरह के टेस्ट और दवाइयाँ मुफ़्त में मिलती है। यह सुविधा तो पहले से चल रहे स्वास्थ्य केंद्रों पर मिल ही रही थी। आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मोहल्ला क्लीनिक योजना को स्वास्थ्य सेवाओं में एक नयी पहल मानते हैं। निश्चित ही योजना से वहाँ लोगों को अस्पताल जाने की बजाय घर के पास स्वास्थ्य सेवाएँ मिल रही है। वह इस प्रयोग को पंजाब में पार्टी की जीत के बाद लागू करना चाहते थे। भगवंत मान भी दिल्ली में ऐसे कई मोहल्ला क्लीनिकों का दौरा कर प्रभावित हो चुके थे।

पंजाब सीएम भगवंत मान

कोई भी योजना चाहे कहीं भी क्यों न हो उसे आम लोगों की सुविधा के लिए लागू करना अच्छी बात है; लेकिन पंजाब में आम आदमी क्लीनिकों की वजह से राज्य की स्वास्थ्य सेवाएँ प्रभावित नहीं होनी चाहिए पर ऐसा हो रहा है। पिछले साल अगस्त से राज्य में 100 आम आदमी क्लीनिक काम कर रहे हैं। पिछले माह 400 नये क्लीनिक खुलने से अस्पतालों के स्टाफ की कमी तो आएगी ही। योजना के तहत क्लीनिकों के लिए अलग से नियुक्तियाँ नहीं हुई है। डॉक्टरों और अन्य पैरामेडिकल स्टाफ को प्रतिनियुक्ति पर भेजा जा रहा है। छोटे-बड़े अस्पतालों में बाधित हो रही स्वास्थ्य सेवाओं के आरोपों के बीच स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिंह ने धूरी के सरकारी अस्पताल का दौरा कर जायज़ा लिया।

उन्होंने दावा किया किया आम आदमी क्लीनिक से लोगों को बहुत फ़ायदा मिल रहा है यही नहीं सरकार प्रदेश के लोगों को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत-सी मुफ़्त मुहैया कराएगी। अगले छ: माह के दौरान राज्य के छोटे बड़े अस्पतालों में दवाइयों की कोई क़िल्लत नहीं रहेगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान घोषणा कर चुके हैं कि कार्यकाल के दौरान राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। आम आदमी क्लीनिक से इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है। अब कोई पैसे की कमी से कोई उपचार से वंचित नहीं रहेगा।

मुख्यमंत्री मान के मुताबिक, राज्य में 100 आम आदमी क्लीनिक की पायलट परियोजना बहुत सफल रही है। इसे देखते हुए एक साथ 400 ऐसे केंद्र खोले गये हैं। जहाँ-जहाँ ऐसे क्लीनिकों की ज़रूरत होगी खोले जाएँगे। सिविल अस्पताल के एक डॉक्टर के अनुसार, सरकार के आम आदमी क्लीनिकों की वजह से स्टाफ की कमी महसूस होने लगी है। संबंधित अधिकारियों को इस बारे में अवगत कराया जा चुका है; लेकिन अभी समस्या जस की तस ही है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से लोगों को वापस भेजना पड़ता है। नौकरी में रहने वालों को सरकारी आदेशों का पालन करना ही होता है; लेकिन इससे आमजन को पीड़ा होती है।

आम आदमी क्लीनिक क्षेत्र के कुछ लोगों की राय में सरकार की यह योजना बहुत अच्छी है। अब अस्पताल की बजाय उनके विभिन्न प्रकार के टेस्ट आसानी से हो रहे हैं। यहाँ ज़्यादा भीड़भाड़ भी ज़्यादा नहीं होती। सब कुछ टोकन सिस्टम से हो रहा है, बैठने की अच्छी व्यवस्था है। अब छोटी मोटी तकलीफ़ के लिए घर से दूर अस्पताल जाने की ज़रूरत ही नहीं है। अस्पताल जाने के लिए न केवल पैसा लगता है, बल्कि समय भी बहुत $खराब होता है। मोहल्ला या आम आदमी क्लीनिकों में 200 से ज़्यादा टेस्ट की मुफ़्त सुविधा है; लेकिन कई जगह ऐसा नहीं हो रहा है। आवश्यक संसाधनों की कमी कई क्लीनिकों में देखने को मिल रही है।

राज्य में आप सरकार के इस नये प्रयोग पर जहाँ लोगों को क़रीब में ही स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल रही हैं, वहीं विपक्षी दल इसे राजनीति फ़ायदा लेने के आरोप लगा रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल कहते हैं कि उनके कार्यकाल में बनाये गये ऐसे 100 से ज़्यादा सूचना सेवा केंद्रों को और सैकड़ों ग्रामीण डिस्पेंसरियों को क्लीनिकों में बदल दिया गया है। राजनीति से इतर मुख्यमंत्री भगवंत मान कहते हैं कि पहले की सरकारों ने स्वास्थ्य सेवाओं की घोर उपक्षा की है। उनकी सरकार न केवल बड़े अस्पतालों की कायाकल्प करेगी वरन् लोगों को घर के असापास ही स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराएगी।

सरकार ने पाँच साल के दौरान 500 मोहल्ला क्लीनिक खोलने का वादा किया था; लेकिन सरकार ने एक साल के भीतर ही इसे पूरा कर दिया है। राज्य के हर क्षेत्र में ज़रूरत के मुताबिक इन्हें खोला गया है; लेकिन जहाँ-जहाँ इनकी ज़रूरत होगी, सरकार आगे बढक़र काम करेगी।

काम के साथ-साथ नाम भी

सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उपकेंद्र, डिस्पेंसरी या अस्पताल आम आदमी के लिए ही विशेष होते हैं। पहुँच वाले लोग तो निजी अस्पतालों में जाते हैं, फिर इसका नामकरण पार्टी विशेष पर क्यों किया गया? दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक है, तो पंजाब में इसे आम आदमी क्लीनिक का नाम दिया गया है। इसे एक तीर से दो निशाने वाला माना जा सकता है। एक, जहाँ लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलेंगी, दूसरा, वहीं इससे पार्टी का नाम भी कहीं-न-कहीं मुँह पर आएगा। सरकार की योजना ठीक है। लेकिन पहले से कार्यरत स्वास्थ्य केंद्र भी बदस्तूर चलते रहे, तो ज़्यादा बेहतर होगा।

झारखण्ड खतियान पर गहमा-गहमी

झारखण्डियों को 1932 खतियान आधारित स्थानीयता से सम्बन्धित विधेयक विधानसभा से पारित करने और केंद्र को 9वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भेजने की ख़ुशी में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पिछले दो महीने से पूरे प्रदेश में खतियानी जोहार यात्रा निकाल रहे हैं। इस बीच राज्यपाल ने इस विधेयक पर आपत्ति लगाते हुए सरकार को वापस भेज दिया है। कुछ विधायक इस यात्रा पर सवाल उठाने लगे। इससे मुख्यमंत्री खुले मंच से राज्यपाल पर निशाना साधने लगे हैं। इस बीच सवाल उठ रहा कि 1932 खतियान आधारित स्थानीयता राजनीतिक चाल है या समस्या के समाधान की कोशिश? इसी का विश्लेषण करती प्रशांत झा की रिपोर्ट :-

देश में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच टकराव कोई नयी बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि आज़ादी के बाद से ही यह चलता रहा है। दरअसल राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। ज़ाहिर है कि नियोक्ता के प्रति लॉयल्टी तो होगी ही। टकराव केंद्र सरकार से इतर राज्य में विपक्षी दल की सरकार होने से ज़्यादा दिखता हैं। इसके ताज़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली आदि कई राज्य हैं। हालाँकि इसके बावजूद कुछ राज्यपाल बीच का रास्ता अख़्तियार कर टकराव से बच जाते हैं। इन दिनों झारखण्ड में राज्यपाल-मुख्यमंत्री के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।

राज्यपाल रमेश बैस और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बीच बीते साल अक्टूबर-नवंबर से शुरू हुई तल्ख़ी अब चरम पर पहुँच रही और टकराव दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। इसकी मुख्य वजह राज्यपाल द्वारा 29 जनवरी को 1932 आधारित स्थानीयता से सम्बन्धित विधेयक (झारखण्ड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐसे स्थानीय व्यक्तियों तक विस्तारित करने के लिए विधेयक 2022) सरकार को वापस करना है। इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुखर हो गये हैं और खुले मंच से राज्यपाल पर निशाना साध रहे हैं। क्योंकि इस विधेयक के वापस होने से मुख्यमंत्री की खतियानी जोहार यात्रा पर भी राजनीतिक गलियारे से सवाल खड़े होने लगे हैं।

लोग कहने लगे हैं कि जो विधेयक क़ानून ही नहीं बना, उसके लिए जोहार यात्रा कैसी? यह वर्षों की समस्या का समाधान निकालने का प्रयास था या राजनीतिक चाल? अब 27 फरवरी से झारखण्ड विधानसभा का बजट सत्र शुरू हो रहा है। पहले दिन राज्यपाल का अभिभाषण होगा। राज्यपाल अभिभाषण में क्या बोलते हैं? किन-किन बातों का ज़िक्र करते यह देखना दिलचस्प होगा। साथ ही विधानसभा का बजट सत्र क्या रूप लेता है, यह भी देखने वाला होगा।

कैसे शुरू हुआ मतभेद?

राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच मतभेद का बीजारोपण ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (टीएसी) के गठन के समय से ही हुआ था। उस वक्त वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राज्य की राज्यपाल थीं। उन्होंने सरकार द्वारा नियम में बदलाव कर टीएसी गठन पर न ही ज़्यादा टिप्पणी की और न ही इसे मंज़ूरी दी। हालाँकि आपत्ति ज़रूर लगायी थी। इस बीच वह राष्ट्रपति बन गयीं और रमेश बैस राज्य के नये राज्यपाल बने। उनकी मुख्यमंत्री के साथ खटास यहीं से शुरू हुई। वह इस मामले को असंवैधानिक क़रार दिया। इसके बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा पद का दुरुपयोग करते हुए अपने नाम माइनिंग लीज लेने से सम्बन्धित शिकायत राज्यपाल से की और सदस्यता रद्द करने की माँग की गयी।

राज्यपाल ने इस पर चुनाव आयोग से गंतव्य लिया। इसके बाद मुख्यमंत्री की सदस्यता जाने की अफ़वाह उड़ी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने विधायकों को एकजुट रखने लिए छत्तीसगढ़ से झारखण्ड तक इधर-उधर घूमते रहे। सरकार ने 15 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के समारोह में राज्यपाल को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था, राज्यपाल कार्यक्रम में नहीं गये। इस बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनरेगा जाँच का दायरा बढ़ाते हुए साहेबगंज में 1000 करोड़ के अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच शुरू कर दी।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा पर शिकंजा कसा, वह अभी भी जेल में हैं। मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार से पूछताछ हुई। मुख्यमंत्री हेमंत को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया। उनके क़रीबी समेत राज्य के कई अधिकारी ईडी की रडार पर हैं। ईडी की पूछताछ और जाँच जारी है। मुख्यमंत्री इन सभी बातों के लिए केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधते रहे, पर राज्यपाल पर खुले मंच से कभी प्रहार नहीं किया। सदस्यता जाने के सम्बन्ध में इतना ही बयान देते रहे कि ‘मैंने अपनी बात रख दी है। अब राज्यपाल को जो निर्णय लेना है वह लें। अगर चुनाव आयोग ने पत्र भेजा है, तो सार्वजनिक करें।’ हालाँकि अभी तक यह मामला राजभवन के पास लंबित है।

राजनीतिक चाल

सदस्यता जाने का डर और ईडी की बढ़ती दबिश के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 11 नवंबर को झारखण्ड विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया। इस सत्र में 1932 आधारित स्थानीयता को पारित कर दिया गया। लोगों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री ने राजनीतिक चाल चली है। इस विधेयक में जोड़ा गया कि जब केंद्र सरकार इसे 9वीं अनुसूची में शामिल कर लेगी, तभी यह राज्य में लागू होगा। दूसरी बात विशेष सत्र से एक महीना पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ख़ुद विधानसभा सत्र के दौरान सदन में कहा था कि ‘1932 आधारित खतियान सम्भव नहीं है।’

तीसरी और सबसे अहम बात यह भी है कि सरकार द्वारा राज्यपाल को विधेयक भेजने से पहले इस पर विधि विभाग से राय ली गयी थी। सरकार के अपने ही मताहत विधि विभाग ने इसमें ख़ामियाँ बतायी थी। इसे नज़रअंदाज़ कर सरकार ने राज्यपाल के पास विधेयक भेजा। यह बात भी उजागर हो चुकी है। ऐसे में राज्यपाल पर दोषारोपण या राजनीतिक आरोप मढऩा लोगों की नज़र में उचित प्रतीत नहीं हो रहा।

चौथी बार लौटाया विधेयक

झारखण्ड में यह पहला मौक़ा नहीं है जब राज्‍यपाल ने किसी विधेयक को वापस किया हो। मॉब लिंचिंग विधेयक, ट्राइबल यूनिवर्सिटी विधेयक, कृषि उपज विधेयक, कोर्ट फीस विधेयक, वित्‍त विधेयक को राज्यपाल अपनी आपत्तियों के साथ वापस कर चुके हैं, जिनमें तीन विधेयकों को विधानसभा से दोबारा पास कराया गया। अभी पिछले सप्ताह राज्यपाल ने वित्त विधेयक को तीसरी बार आपत्तियों के साथ सरकार को वापस भेज दिया। इन सब विधेयकों पर इतना बवाल नहीं हुआ, जितना इससे पहले 1932 खतियान आधारित विधेयक के लौटाने पर अब तक हो रहा। इसके पीछे वोट बैंक और राजनीतिक वजह मानी जा रही है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री की खतियान जोहार यात्रा इसकी दूसरी वजह है।

हेमंत सोरेन वोट बैंक को मज़बूत करने दो चरण में खतियानी जोहार यात्रा निकाल चुके हैं, तीसरे चरण की तैयारी चल रही है। इस पर कटाक्ष हो रहा है। विपक्षी दल भाजपा यात्रा पर तो कटाक्ष कर ही रही, लेकिन 1932 खतियान पर टिप्पणी से बच रही। वहीं, सत्ता पक्ष के कुछ विधायक और पार्टी नेता दबी ज़ुबान में मुख्यमंत्री के क़दम की आलोचना कर रहे, तो कुछ खुलकर सामने आ गये हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अपनी ही पार्टी झामुमो के एक विधायक लोबिन हेंब्रम ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन बुलाकर कहा कि ‘जब विधेयक पास ही नहीं हुआ, तो खतियानी जोहार यात्रा कैसा?

मुख्यमंत्री लोगों को मुर्ख बना रहे हैं।’ उधर, मुख्यमंत्री खुले मंच से बोल रहे हैं कि ‘राज्यपाल जो चाहेंगे, वह नहीं होगा। राज्‍य सरकार जो चाहेगी, वही होगा। यह नयी बात नहीं है, ग़ैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को पिछले दरवाज़े से राज्यपाल के माध्‍यम से परेशान किया जा रहा है। यह दिल्‍ली या अंडमान निकोबार नहीं है। यह झारखण्ड है, यहाँ जो राज्‍य सरकार चाहेगी, वही लागू होगा।

नहीं दिख रहा समस्या का हल

सरकार और राजनीतिक दलों की अपनी समस्या है। उन्हें चुनाव लडऩा है। राजनीति करनी है। राज्यपाल का अपना संवैधानिक दायरा है। राज्यपाल ने 1932 आधारित खतियान संवैधानिक प्रावधानों के तहत आपत्ति के साथ भेजा। आपत्तियों में लिखा कि विधेयक संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ है। इसमें संवैधानिक और क़ानूनी पक्षों के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का भी हवाला दिया गया। राज्यपाल के पास विधेयक भेजने से पहले इन्हीं सब बातों का ज़िक्र करते हुए सरकार के अधीनस्थ विधि विभाग ने आपत्ति दर्ज की थी। राज्य पिछले 22 वर्षों में झारखण्ड में 11 सरकारें बनीं। हमेशा से स्थानीयता का मुद्दा राज्य को कैंसर की तरह जकड़ा रहा।

सरकार के कामकाज के बारे में कहें, तो सभी ने बहुत काम किया। सालाना बजट 7,000 करोड़ से बढ़ाकर 1,10,000 करोड़ पर पहुँचा दिया। फिर भी यह अभागा राज्य आज भी पिछड़ेपन का रोना रोता है। यह हो भी क्यों नहीं। क्योंकि जब तक स्थानीयता, आरक्षण, धर्म, जाति जैसे मुद्दे की राजनीति होती रहेगी, लोग ऐसे ही समस्याओं के मकडज़ाल में फँसे रहेंगे। इसी स्थानीयता के मुद्दे पर बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा, तो अर्जुन मुंडा की सरकार गिर गयी।

सरकार किसी की हो, सभी दल मिल बैठकर कभी समाधान निकालने का सार्थक प्रयास नहीं किया। क्योंकि अगर सभी ने मिल कर समाधान निकल दिया, तो इस पर राजनीति कहाँ से होगी। अगर यही हाल रहा, तो राज्य गठन के 22 साल बाद भी स्थानीयता का मुद्दा है और बना ही रहेगा। विकास में राज्य पिछड़ता रहेगा। जनता पिसती रहेगी। अन्य राज्यों की तुलना में विकास नहीं होने का रोना रोती रहेगी। आरोप-प्रत्यारोप चलता रहेगा। चुनाव के समय हर दल के प्रत्याशी से सुनते रहेंगे कि सारी समस्याओं का समाधान मेरी जीत में है और आप हमें जीत दिलाएँ।

सपनों को पंख लगातीं महिला उद्यमी

रास्थान के टोंक ज़िले के दूनी क़स्बे की 30 महिलाओं के एक सेल्फ हेल्प ग्रुप ने बकरी के दूध से जब साबुन बनाया था, उसकी क़ीमत रखी थी 55 रुपये। महिलाओं ने सोचा नहीं होगा कि उन्हें कोई बड़ा मौक़ा मिलेगा। कुछ समय बाद स्पेन की एक महिला ने उन्हें साबुन की 40,000 टिकियाँ तैयार करने का ऑर्डर दिया। बकरी का दूध कई बीमारियों के लिए उपयोगी है। इस साबुन को त्वचा के लिए उपयोगी बताया गया।

स्टार्टअप की क़ानूनी प्रक्रिया के बारे में अवगत कराया जाए, तो देश की जीडीपी में बड़ा योगदान महिला उद्यमियों का होगा। इंडिया स्किल रिपोर्ट-2023 से पता चलता है कि भारत में पुरुषों के मुक़ाबले कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बेशक 33 फ़ीसदी है। लेकिन महिला प्रतिभा रोज़गार क्षमता 5.6 फ़ीसदी है, जो पुरुषों से ज़्यादा है। इस दिशा में राजस्थान में रोज़गार योग्य महिलाओं का प्रतिशत देश में सबसे ज़्यादा 54 फ़ीसदी है। वहीं उत्तर प्रदेश 46.51 फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर है।

प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि नयी पीढ़ी के युवाओं का कौशल विकास एक राष्ट्रीय ज़रूरत है। आत्मनिर्भर भारत का बहुत बड़ा आधार है। भारत के पास ऐसे युवा हैं जिनमें कौशल, मूल्य, जुनून और कार्य के प्रति ईमानदारी है।

कृष्मन सिंह उन्हीं युवा महिला उद्यमियों में से है, जिन्होंने कुछ साल पहले अपना स्टार्टअप शुरू किया था। कृष्मन ने देश से एमबीए (गोल्ड मेडल) करके उच्च शिक्षा के लिए कनाडा की क्वींस यूनिवर्सिटी में मास्टर ऑफ इंटरनेशनल बिजनेस (एमआईबी) की पढ़ाई की। कुछ समय के लिए फेलोशिप के साथ अमेरिका भी रहीं। कृष्मन प्रोडक्ट की मार्केटिंग, ब्रांडिंग और बिक्री करना सब कुछ जानती थीं; लेकिन जब स्टार्टअप शुरू किया तो उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिसके चलते प्रोजेक्ट रोकना पड़ा।

बाद में किसी बड़ी कम्पनी में नौकरी पाने के बाद उन्हें अपनी टीम का निर्देशन करते हुए तीन राज्यों की सरकारों राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ सेतु की तरह काम करने का अवसर मिला। राजस्थान में आजीविका मिशन और पंचायती राज के तहत राज्य के स्वयं सहायता समूहों के लिए फील्ड वर्क किया। इसमें महिलाओं को सरकारी योजनाओं से जोडऩे के अलावा सामान की प्रेजेंटेशन, पैकिंग, ब्रांडिंग और बिक्री आदि के लिए काम किया गया।

कृष्मन ने कहा कि राजस्थान सरकार ने सोशल प्लेटफाम्र्स के साथ भागीदारी की है। इसके लिए पिछले वर्ष जयपुर में महिला सशक्तिकरण पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें राज्य की हज़ारों महिलाओं ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर स्वयं सहायता समूहों की ग्रामीण महिला उद्यमियों ने अपने अनुभव साझा किये। उत्तर प्रदेश में महिलाएँ काफ़ी जागरूक है; लेकिन सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुँच नहीं है। कृष्मन बताती हैं कि उन्होंने लाइवलीहुड मिशन के तहत राज्य के चार ज़िलों में फील्ड वर्क किया। इसके लिए आपकी दुकान नाम का कॉन्सेप्ट लॉन्च करके ग्रामीण महिला उद्यमियों के स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को एक प्लेटफार्म पर लाया गया। इससे कनाडा और अमेरिका के बाज़ारों में उन्हें काम करने का अवसर मिला।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत बेरोज़गार युवाओं को हर राज्य तथा शहर में क़रीब 40 तकनीकी क्षेत्रों में नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। बजट भाषण 2023-24 में वित्त मंत्री सीतारमण के मुताबिक, युवाओं को ऑन जॉब प्रशिक्षण, उद्योग साझेदारी और ज़रूरतों के साथ आधुनिक पाठ्यक्रम भी शामिल किये जाएँगे। इनमें रोबोटिक्स, मेडट्रॉनिक्स, कोडिंग, एआई आईओटी, प्रिंटिंग, ड्रोन, स्किल्स और 3डी शामिल है। योजना के पहले चरण में 5,000 प्रशिक्षण केंद्र खोले जाएँगे। देश में स्टार्टअप्स की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। अब महिलाओं के स्टार्टअप्स को सपोर्ट करने के लिए गूगल कम्पनी भी आगे आयी है। नैसकॉम के अनुसार, महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स वर्ष 2014 में आठ फ़ीसदी बढ़े हैं, जबकि वर्ष 2019 में इनकी संख्या 13 फ़ीसदी रही।

भारत की शीर्ष आठ महिला उद्यमी : फाल्गुनी नायर (नाईका), वंदना लूथरा (वीएलसीसी), सूची मुखर्जी (लाइम रोड), रिचा कर (जीवेम), वाणी कोला (कलारी कैपिटल), प्रांशु पाटनी (हेलो इंग्लिश), उपासना टाकू (मोबिक्विक) शायरी चहल (शीरोज)।

योजनाएँ : भारतीय महिला बैंक व्यवसाय ऋण, देना शक्ति योजना, उद्योगिनी योजना, महिला उद्यमिता मंच, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना।

पाँच कौशल : ऐसे पाँच कौशल, जो अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहने वाली हर महिला के लिए ज़रूरी हैं। जैसे वित्त कौशल, संचार कौशल, नेतृत्व कौशल, समय प्रबंधन और बिक्री।

अभिव्यक्ति का हनन

बीबीसी के दफ़्तरों में आईटी सर्वे के नाम पर छापेमारी से केंद्र की हो रही आलोचना

क्या सरकार अपनी आलोचना से इतनी बौखला गयी है कि वह कुछ भी करने पर आमादा है? बीबीसी के दिल्ली और मुम्बई दफ़्तरों पर आयकर विभाग (आईटी) के छापे (कथित सर्वे) ज़ाहिर करते हैं कि मोदी सरकार बौखलाहट में है और आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। सरकार में केबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर ने यह कहकर कि भारत में कोई भी क़ानून से ऊपर नहीं है, इन छापों को सही ठहराने की कोशिश की; लेकिन सरकार को देश ही नहीं, विदेशों में भी इस कार्रवाई के लिए निंदा सहनी पड़ी है।

सरकार की बीबीसी पर कार्रवाई इतनी हैरानी भरी थी कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इसके दिल्ली और मुम्बई के दफ़्तरों पर छापों के कुछ ही देर के भीतर इसकी आलोचना की। अमेरिका से लेकर दुनिया के अन्य हिस्सों में इन छापों की $खबर तुरन्त फैल गयी और प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

दरअसल आयकर विभाग की टीम 14 और 15 फरवरी को बीबीसी के दिल्ली और मुंबई के दफ़्तर में सर्वे के लिए पहुँची, जिसके बाद इस मसले पर बड़ा विवाद शुरू हो गया।

इन छापों के बाद अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने घटना पर बिना टिप्पणी करते हुए कहा- ‘हम दुनिया भर में स्वतंत्र प्रेस की महत्ता का समर्थन करते हैं। हम दुनिया भर में लोकतंत्रों को मज़बूत करने में योगदान देने वाले मानवाधिकारों के तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की महत्ता पर ज़ोर देते हैं। इसने भारत के लोकतंत्र को मज़बूत किया है।’

बीबीसी पर यह छापे (आईटी सर्वे) उसकी उस डाक्यूमेंटरी के ठीक एक महीने बाद आये हैं, जिसमें उसने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के तौर पर गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका पर गम्भीर सवाल खड़े किये थे। इसके बाद मोदी सरकार ने इस डाक्यूमेंट्री पर पाबंदी लगा दी थी। विपक्ष ने इसकी आलोचना करते हुए इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। ज़ाहिर है सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थान मोदी सरकार के निशाने पर हैं। इसका दायरा देश के मीडिया संस्थानों से आगे निकलकर अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों तक जा पहुँचा है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इन छापों के बाद एक बयान में कहा- ‘बीबीसी की ओर से गुजरात हिंसा और भारत में अल्पसंख्यकों के वर्तमान हालात को लेकर बनीं दो डॉक्यूमेंट्री रिलीज किये जाने के ठीक बाद हुआ है। इन डॉक्यूमेंट्रीज की रिलीज के बाद इस मसले को राजनीतिक रंग दिया गया है। हम इन छापों की कड़ी आलोचना करते हैं।’

उधर आईटी सर्वे पर भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा- ‘कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने बीबीसी पर प्रतिबंध लगा दिया था। आयकर विभाग ने बीबीसी ऑफिस पर क़ानूनी रूप से कार्रवाई की। बीबीसी दुनिया का सबसे भ्रष्ट, बकवास कॉर्पोरेशन बन गया है।’

आईटी सर्वे के छापे के तुरन्त बाद दिल्ली में कनॉट प्लेस स्थित बीबीसी के दफ़्तर में कर्मचारियों के फोन ज़ब्त और दफ़्तर सील कर दिये गये और दफ़्तरों में उपस्थित लोगों से कम्प्यूटर क़ब्ज़े में लेकर उन उनके पासवर्ड लिखवाये गये। सरकार ने कहा कि मामला वित्तीय अनिमितता से जुड़ा है। हालाँकि सरकार के विरोधियों ने मीडिया की आवाज़ दबाने का आरोप लगाया। मुंबई में बीबीसी के दो दफ़्तरों बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेजे) और खार में भी आईटी छापे पड़े। एक वायरल वीडियो में आईटी अधिकारी और बीबीसी कर्मचारियों के बीच बहस होती दिखी।

यह छापे पडऩे के क़रीब तीन घंटे के बाद बीबीसी ने अपनी प्रतिक्रिया दी। इसमें कहा गया- ‘आयकर अधिकारी हमारे नई दिल्ली और मुंबई कार्यालयों में हैं और हम उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि यह स्थिति जल्द-से-जल्द सुलझ जाएगी। बीबीसी सर्वे की रिपोर्ट पर बारीक़ी से नज़र रखे हुए है।

कांग्रेस ने बीबीसी पर रेड को लेकर अपनी प्रतिक्रिया में कहा- ‘पहले बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री आयी, उसे बैन किया गया। अब बीबीसी पर आईटी का छापा पड़ गया है। ये अघोषित आपातकाल है।’ आलोचना भरी प्रतिक्रियाएँ जेकेपीडीपी, आम आदमी पार्टी सहित पूरे विपक्ष से आयीं। शिवसेना सांसद संजय राऊत ने कहा- ‘छापे की टाइमिंग से ये स्थापित होता है कि भारत धीरे-धीरे अपनी लोकतांत्रिक छवि खो रहा है।’

जानलेवा कार्बन

गुजरात के इंडस्ट्रियल एरिया में ज़मीन पर कार्बन की एक परत दिखना आम बात है। कार्बन के मोटे टुकड़े कितनी ही बार आँखों में पड़ जाते हैं। इंडस्ट्रियल एरिया में रहने वालों की नाक और गले में कार्बन जमना, चेहरे का काला होना और कपड़ों को काला होना आम बात है। इतना ही नहीं, रिहायशी इलाक़ों में भी यह कार्बन लगातार गिरता रहता है।

घर के बाहर, छत से लेकर घर के अंदर तक हर रोज़ कार्बन बिछ जाता है। झाड़ू मारने पर हर रोज़ घर के अंदर से मिट्टी में मिला हुआ कार्बन एक से डेढ़ मुट्ठी निकलता है। सफ़ेद कपड़ा बाहर डाल दो, तो उस पर साफ-साफ कार्बन छाया हुआ दिखता है।

गुजरात में इस कार्बन से निपटने का कोई उपाय न तो सरकार ने आज तक किया है और न व्यवसायी वर्ग के संगठनों को इसकी कोई चिन्ता है। इससे आम लोगों को कई तरह के रोगों ने घेर रखा है।

दरअसल कार्बन फैक्ट्रियों की चिमनियों, कोयले के जलने और वाहनों के चलने से उत्सर्जित होता है। यह कार्बन न सिर्फ़ हमारे जीवन को नुक़सान पहुँचा रहा है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है। ज़मीन पर जमा होता यह कार्बन न सिर्फ़ खेतों की उपजाऊ मिट्टी को बर्बाद कर रहा है, बल्कि जलवायु को भी ख़राब कर रहा है। कार्बन के सबसे बड़ी स्थलीय भंडार बनी मिट्टी ख़राब होने से पानी भी प्रदूषित हो रहा है। हालाँकि मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं, जिनसे पौधों की अच्छी वृद्धि होती है।

फलों और फ़सलों की पैदावार में भी यह कार्बनिक पदार्थ बढ़ोतरी करने वाले होते हैं। यह अच्छा कार्बन होता है, जो पानी को पानी बनाये रखता है और हमारे शरीर को भी फ़ायदा पहुँचाता है। मिट्टी के लिए अनुकूल कार्बन ज़मीन के पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग है, जो इसके लचीलेपन और उत्पादकता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी और सहयोगियों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने अपने एक शोध ने मिट्टी के लिए उपयोगी कार्बन के प्रकारों का पता लगाया था। लेकिन जो कार्बन फैक्ट्रियों, ज्वलनशील पदार्थों से पैदा हो रहा है, वह घातक है। इसलिए इस कार्बन के बढऩे से कई तरह के रोग लोगों को लग रहे हैं और जलवायु प्रदूषित होने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन का कारण भी बन रहा है। पिछली दो शताब्दियों में इस तरह के कार्बन का विकट उत्सर्जन होने के चलते भूमि उपयोग और भूमि आवरण में बदलाव हुए हैं, जिससे मिट्टी में मौज़ूद कार्बन को भारी नुक़सान हुआ है।

वैज्ञानिकों ने क़रीब एक दशक पहले ही कहा था कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का कारण यही कार्बन है, जो हमारे वायुमंडल में लगातार बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि अगर इस ख़तरनाक कार्बन के उत्सर्जन को नहीं रोका गया, तो परिणाम घातक होंगे। प्रो. स्मेटा चेक ने कुछ समय पहले एक बार फिर कहा था कि समय रहते हुए वायुमंडल में बढ़ते इस कार्बन की समस्या का समाधान खोजना होगा। इसका हल बताते हुए उन्होंने कहा था कि सबसे पहले हमें वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करना होगा।

अगर कार्बन डाइऑक्साइड में कमी नहीं की गयी, तो विनाशकारी घटनाएँ बढ़ सकती हैं। प्रो. विक्टर स्मेटा चेक की बात बिलकुल सही साबित हुई। आज कई प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ दुनिया भर में घट रही हैं। इनमें से कुछ घटनाएँ वायुमंडल में बढ़ते कार्बन के कारण बढ़ रही हैं। अगर अब भी वातावरण में बढ़ते कार्बन को नहीं रोका गया, और कार्बन उत्सर्जन पर रोक नहीं लगायी गयी, तो इंसानों के साथ-साथ बा$की प्राणियों को भी साँस लेना मुश्किल हो जाएगा।

फ़िलहाल हमारी जलवायु में तेज़ी से बढ़ रहा कार्बन लगातार मुसीबत का कारण बनता जा रहा है, जिससे किसी एक को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों को ख़तरा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) अपनी एक रिपोर्ट में कह चुका है कि अगर इसी रफ़्तार से कार्बन उत्‍सर्जन होता रहा, तो 2100 के आख़िर तक भारत में वेट बल्ब टेंपरेचर 35 डिग्री सेल्सियस हो जाएगा, जो जानलेवा साबित हो सकता है। विशेषज्ञों ने आईपीसीसी की इस रिपोर्ट बेहद ठोस, तात्कालिक और सार्थक बताया था।

संयुक्त राष्ट्र ने भी इस रिपोर्ट को सही मानते हुए वैश्विक स्‍तर पर बढ़ते कार्बन उत्‍सर्जन और उसकी वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन से इंसानों पर पड़ रहे दुष्प्रभावों पर चिन्ता व्यक्त की है। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि वायुमंडल में बढ़ते कार्बन के दुष्परिणाम साल 2040 तक घातक होने लगेंगे। कार्बन उत्सर्जन के कारण हर साल धरती पर तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, दुनिया भर के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ओजोन परत में छेद हो रहे हैं। इसके बावजूद वनों का कटान तेज़ी से हो रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से फ़सलों की पैदावार घट रही है और खाद्यान्न की गुणवत्ता बिगड़ रही है। इससे इंसानों की औसत आयु घट रही है।

क्या कहते हैं डॉक्टर?

डॉक्टर मनीष, जनरल फिजिशियन

जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कहते हैं कि वायुमंडल में बढ़ते कार्बन के चलते अधिकतर लोगों कई तरह के रोगों से पीडि़त हैं। पेड़-पौधों की संख्या कम होने और इंसानों की आबादी बढऩे से वायुमंडल में वैसे भी ऑक्सीजन की कमी होती जा रही है, ऊपर से वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

इंसानों की आबादी बढऩे से उपयोगी वस्तुओं की माँग भी बढ़ रही है, जिससे उनका उत्पादन भी बढ़ाना पड़ रहा है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि हमारे दैनिक उपयोग में सबसे ज़्यादा उत्पादन जिस चीज़ का हो रहा है, वो है प्लास्टिक। यही प्लास्टिक हमारे लिए सबसे घातक है और इसके उत्पादन से लेकर इसे नष्ट करने तक सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जित होता है। आज अधिकतर लोगों को साँस, फेफड़ों और आँखों से लेकर आँतों तक के रोग लगे हुए हैं। हम जिस हवा में साँस ले रहे हैं, उसमें कार्बन की बढ़ती मात्रा के चलते नज़ला, दमा, खाँसी, जुकाम और चर्म रोग तो अब आम हो चले हैं। कैंसर, टीबी के कई रूप अब हमारे लिए चुनौती बने हुए हैं। इससे बचने के उपाय यही हैं कि इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ाया जाए। प्लास्टिक की चीज़ों पर प्रतिबंध लगे। ज़्यादा-से-ज़्यादा पेड़-पौधे लगाये जाएँ, और बढ़ती जनसंख्या को कम किया जाए।

डॉक्टर अदिति सिंह, बाल रोग विशेषज्ञ

बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अदिति सिंह कहती हैं कि बच्चों की देखभाल आजकल बहुत मुश्किल काम है। इसकी एक वजह नहीं है। आजकल न तो खानपान अच्छा है, न हवा और पानी में शुद्धता है, न खेलने का बच्चों के पास ठीक से मौ$का है, और न ही उन्हें पहले की तरह किताबों से प्रेम है। वे बचपन से ही मोबाइल की ओर आकर्षित हो जाते हैं। कई माताएँ तो अपने बच्चे को अपना दूध तक पिलाना नहीं चाहती हैं। वह जैसे ही कुछ खाने लायक होता, तो टॉफी, चॉकलेट, चिप्स, कुरकुरे, चाऊमीन, बर्गर, पिज्जा, मोमोज और तमाम तरह के नुकसानदायक फास्ट फूड खाने लगता है।

दुखद बात यह है कि माँ-बाप बच्चों को ये चीज़ शौक़ से खिलाते हैं। जिन बच्चों को इन चीज़ों के खाने की लत लग जाती है, वे न तो ठीक से घर का खाना खाते हैं और न कोई पौष्टिक आहार लेते हैं। इसके बाद वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और तमाम तरह की ज़हरीली गैसें बढ़ रही हैं। तो यह माँ-बाप की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों को किस तरह की परवरिश दे रहे हैं। जो दूध और पौष्टिक चीज़ें आजकल बच्चों को मिल रही हैं, उनमें अधिकतर में मिलावट है। आजकल बच्चों को ऐसी-ऐसी बीमारियाँ होने लगी हैं, जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। कई माँ-बाप अपने बच्चे को लेकर आते हैं और उनकी यही शिकायत होती है कि उनका बच्चा ठीक से खाना नहीं खाता। यह गलती तो माँ-बाप की ही है न। अब पेड़ लगाने को भी लोग दूसरों पर एहसान समझते हैं, जबकि यह नहीं सोचते कि वे जिस पेड़ को लगाएंगे, वो उनके और उनके बच्चों के लिए ही फ़ायदेमंद होगा।

टेनिस स्टार सानिया

ग्रैंड स्लैम से सानिया मिर्ज़ा के संन्यास से कोर्ट में खलेगी उनकी कमी

अपने अंतिम ग्रैंड स्लैम में सानिया मिर्ज़ा उपविजेता रहीं और जब उन्होंने अपने प्रोफेशनल करियर से विदाई की बात की, उनकी आँखों में आँसू भरे थे। इस्लामोफोबिया के दौर में एक युवा खिलाड़ी के रूप में उनकी शॉर्ट स्कर्ट और टी-शर्ट को लेकर जैसा हल्ला मुस्लिम कट्टरपंथियों ने किया, उससे बिना डरे उन्होंने लड़ाई लड़ी और अंगरक्षकों के साथ चलकर भी टेनिस खेली।

रुढि़वाद के ख़िलाफ़ हिम्मत दिखाने के वैसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। सानिया मिर्ज़ा देश की लाखों लड़कियों के लिए खेल में आदर्श बनीं और रमेश कृष्णन के बाद पहली भारतीय खिलाड़ी रहीं, जो एकल (सिंगल्स) में दुनिया की 27वीं रैंकिंग तक पहुँचीं। उनके संन्यास से निश्चित ही हम एक बेहतरीन खिलाड़ी को अब मैदान में नहीं देख पाएँगे। सानिया मिर्ज़ा ने करियर की शुरुआत सिंगल्स से की और काफ़ी आगे तक पहुँचीं। लेकिन घुटने और कलाई की चोट ने उन्हें डबल्स की तरफ़ मोड़ दिया। मार्टिना हिंगिस उनकी सबसे सफल साथी रहीं और दोनों ने एक ही साल में तीन ग्रैंड स्लैम जीते। लाजवाब फोरहैंड सानिया के खेल की सबसे बड़ी ताक़त थी। सानिया अपने स्टाइल के लिए जानी गयीं; कोर्ट में भी और कोर्ट से बाहर भी। जब भी सानिया कोर्ट में उतरीं, वह सबके आकर्षण का केंद्र रहीं। विवाद भी उनके जुड़े; लेकिन अपनी टेनिस से उन्होंने दुनिया भर के लोगों का दिल जीता।

तलाक़ की अफ़वाहों के बीच सानिया मिर्ज़ा के संन्यास पर उनके पति पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी शोएब मलिक ने लिखा- ‘सानिया खेलों में सभी महिलाओं के लिए एक उम्मीद हैं। आपने जो करियर में हासिल किया है, उसके लिए आप पर बहुत गर्व है। आप कई लोगों के लिए प्रेरणा हो, मज़बूत बनी रहो। आपके अविश्वसनीय करियर के लिए बहुत-बहुत बधाई!’ सानिया ने को भी ग्रैंड स्लैम जीते, वह डबल्स में ही जीते। डबल्स और मिक्स्ड डबल्स में उनके नाम छ: ग्रैंड स्लैम ख़िताब हैं। वह लिएंडर पेस और महेश भूपति के बाद भारत की तरफ़ से सबसे ज़्यादा ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने वाली खिलाड़ी हैं।

सानिया का जन्म 15 नवंबर, 1986 को मुंबई में हुआ। उनके पिता इमरान मिर्ज़ा खेल पत्रकार थे। साथ ही एक बिल्डर भी। सानिया जब छ: साल की थीं, जब उन्होंने टेनिस स्टार बनने का सपना देखा था। अपने सपने को पूरा करने के लिए सानिया ने किसी भी चीज़ को अपने रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया।

जब उनका परिवार हैदराबाद गया, तो सानिया मिर्ज़ा ने वहाँ प्रैक्टिस आरम्भ की। तब वह छ: साल की थीं और निजाम क्लब उनकी टेनिस का ठिकाना बना। पिता ने महसूस किया कि बेटी में टेनिस में आगे जाने की प्रतिभा है, लिहाज़ा उन्होंने भी उन्हें प्रोत्साहित किया। उनकी स्कूलिंग नासर स्कूल ख़ैरताबाद में हुई। टेनिस में उनके रास्ते का सबसे पहला रोड़ा ख़ुद उनकी उम्र बनी। प्रशिक्षण में उनकी कम उम्र आड़े आयी। लेकिन सानिया ने हार नहीं मानी। महेश भूपति के पिता सी.के. भूपति उनके शुरुआती प्रशिक्षक रहे। यह दिलचस्प ही है कि बाद में सानिया ने इन्हीं महेश भूपति के साथ पार्टनर बनकर ग्रैंड स्लैम जीता। शुरुआती बात करें, तो सानिया ने सन् 1999 से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलना शुरू किया, जब जकार्ता में वल्र्ड जूनियर चैंपियनशिप में वे भारत की कप्तान बनीं और कांस्य पदक जीता। उनका खेल इतना प्रभावशाली था कि जकार्ता के अख़बारों में उनकी जमकर तारीफ़ हुई और उन्हें भविष्य का चैम्पियन लिखा गया।

सीनियर्स में उनका पहला बड़ा टूर्नामेंट सन् 2003 में विम्बलडन में था, जब उन्होंने भारत की तरफ़ से खेलते हुए जीत हासिल की। यही वहीं दौर था, जब उन्हें उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए सन् 2004 में अर्जुन पुरस्कार और अगले ही साल न्यू कमर डब्ल्यूटीए अवार्ड मिला। दो साल बाद सानिया को 2006 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2009 में उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन में मिक्स्ड डबल्स में हिस्सा लिया और ग्रैंड स्लैम जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं। यह वही साल था, जब उन्होंने बचपन के दोस्त सोहराब मिर्ज़ा से सगाई की। हालाँकि बाद में यह रिश्ता टूट गया। सानिया ने 12 अप्रैल, 2010 को पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी की। उनके विवाह पर विरोध हुआ, तो सानिया ने कहा कि वह आख़िरी तक भारत की बेटी रहेंगी।

एक जूनियर खिलाड़ी के रूप में सानिया मिर्ज़ा ने 10 सिंगल्स और 13 डबल्स ख़िताब जीते। उन्होंने पूरे करियर में कुल जमा 43 डबल टाइटल जीते। सानिया 13 अप्रैल, 2015 को अपने जीवन की सबसे ऊँची रैंक पर पहुँचीं, जब उन्हें डबल्स में नंबर-1 की रैंकिंग मिली। डबल्स में उनका करियर रिकॉर्ड 531 खेले मैचों में 242 जीत का रहा। सिंगल्स में 271 मैचों में से 161 उन्होंने जीते।

क़रीब दो दशक तक सानिया मिर्ज़ा कोर्ट में छायी रहीं। तमाम कट्टरपंथी दबावों के बावजूद। कभी पीछे नहीं हटीं। अंतिम ग्रैंड स्लैम मैच में उन्हें भावभीनी विदाई मिली, जो उनके रुतबे के अनुरूप है। उन्होंने करियर में भारत के लिए नया इतिहास बनाया है। विजय अमृतराज (सबसे ऊँची 18वीं रैंकिंग) और रमेश कृष्णन (सबसे ऊँची 23वीं रैंकिंग) के बाद भारत की शीर्ष खिलाड़ी बनने का कारनामा भी सानिया ने ही दिखाया था। डबल्स में तो वह नंबर-1 भी रहीं। अब सानिया मिर्ज़ा उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर युवा खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देने का ऐलान कर चुकी हैं।

अपने आख़िरी ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन में भले वे ख़िताब नहीं जीत पाएँ और रोहन बोपन्ना के साथ उपविजेता रहीं, उनके पास फरवरी में दुबई ओपन में जीत हासिल कर टेनिस से अपनी विदाई जीत के साथ करने का अवसर रहेगा।

सानिया के उद्गार

सानिया ने रिटायरमेंट के अपने नोट में दिलचस्प बातें लिखीं और अपने जीवन की वो जानकारियाँ दीं, जो लोगों को पता नहीं थीं। सानिया ने लिखा- ‘30 साल पहले हैदराबाद की एक छ: साल की लडक़ी निजाम क्लब के टेनिस कोर्ट पर पहली बार अपनी माँ के साथ गयी और कोच ने बताया कि टेनिस कैसे खेलते हैं। कोच को लगा था कि टेनिस सीखने के लिए मैं बहुत छोटी हूँ। मेरे सपनों की लड़ाई छ: साल की उम्र में ही शुरू हुई। मेरे माता-पिता और बहन, मेरा परिवार, मेरे कोच, फिजियो समेत पूरी टीम के समर्थन के बिना यह सम्भव नहीं था, जो अच्छे और बुरे समय में मेरे साथ खड़े रहे। मैं उनमें से हर एक के साथ अपनी हँसी, आँसू, दर्द और ख़ुशी साझा की है। उसके लिए मैं सभी का धन्यवाद देना चाहती हूँ। आप सभी ने जीवन के सबसे कठिन दौर में मेरी मदद की है। आपने हैदराबाद की इस छोटी-सी लडक़ी को न केवल सपना देखने की हिम्मत दी, बल्कि उन सपनों को हासिल करने में भी मदद की। आप सभी का तह-ए-दिल से शुक्रिया।’

ग्रैंड स्लैम

1. मिक्स्ड डबल्स : ऑस्ट्रेलियाई ओपन (2009) – फाइनल में महेश भूपति के साथ मिलकर नथाली डेच्य-एंडी राम की जोड़ी को 6-3, 6-1 से हराया।

2. मिक्स्ड डबल्स : फ्रेंच ओपन (2012) – फाइनल में महेश भूपति के साथ क्लॉडिया जॉन्स- इग्नासिक गोंजालेज को 7-6, 6-1 से हराया।

3. मिक्स्ड डबल्स : यूएस ओपन (2014) – ब्रूनो सोअरेस के साथ मिलकर अबीगैल स्पीयर्स – सेंटिआगो गोंजालेज को 6-1, 2-6 और 11-9 से हराया।

4. महिला डबल्स : विम्बलडन (2015) – मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर फाइनल में एकातेरिना माकारोवा-एलेना वेस्नीना को 5-7, 7-6 और 7-5 से हराया।

5. महिला डबल्स : यूएस ओपन (2015) – मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर फाइनल में कैसे देलैका- यारोस्लावा श्वेदोवा को 6-3, 6-3 हराया।

6. महिला डबल्स : ऑस्ट्रेलियन ओपन (2016) – मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर फाइनल में एंड्रिया हलवाकोवा-लूसी हरडेका को 7-6, 6-3 से हराया।

“मैं ख़ुद को बहुत धन्य मानती हूँ कि मैंने अपने सपने को जिया है। साथ ही अपने गोल्स को भी हासिल किया। मेरा परिवार हमेशा मेरे साथ रहा। ज़िन्दगी चलती रहनी चाहिए। मुझे नहीं लगता कि यह अन्त है। यह अन्य यादों की शुरुआत है। मेरे बेटे को मेरी काफ़ी ज़रूरत है और मैं उसे अच्छी ज़िन्दगी और ज़्यादा समय देने का और इंतज़ार नहीं कर सकती।’’

सानिया मिर्ज़ा

धर्मों के नक़ली वाहक

अगर किसी के स्वास्थ्य में थोड़ी भी गड़बड़ी हो और वह अपना इलाज न कराये, तो धीरे-धीरे शरीर में और भी कई रोग जाते हैं, जिसके कारण शरीर जर्जर, क्षीण होकर अंतत: उम्र से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। धर्मों की भी यही दशा है। धर्मों में रोग तो उसी दिन लग गया था, जब उनके वाहकों ने उनमें मनगढ़ंत कहानियाँ, कपोल कथाएँ, नयी-नयी रीतियाँ, संस्कारों के नाम पर ढोंग और स्वयं को सिद्ध पुरुष और धर्म का ठेकेदार साबित करने के लिए अपनी विवेचनाएँ जोडऩी शुरू कर दी थीं। धीरे-धीरे धर्म लोप हो गये और ये चीज़ें धर्मों पर हावी हो गयीं। अब धर्म केवल कुछ लोगों के लिए पैसा कमाने के माध्यम बनकर रह गये हैं। और विडम्बना यह है कि लोग ईश्वर की तरह ही इन लोगों को पूजते हैं। इनके एक इशारे पर सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार रहते हैं।

लोगों को सोचना होगा कि क्या पैसा, पद और प्रतिष्ठा की चाहत रखने वाले, अपनी चरण वन्दना के शौक़ीन लोग कभी धर्म के वाहक नहीं हो सकते? इसलिए अगर धर्मगुरु अयोग्य है और धर्म के सही अनुपालन को छोडक़र तमाम लिप्साओं में लिप्त रहता है, तो उन्हें धर्मों से निकालकर फेंक देना चाहिए। किसी भी धर्म में अधर्मी और तथाकथित लोगों को धर्मगुरुओं के पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। एक ही धर्म के मानने वालों को अलग-अलग जातियों में बाँटकर, उनके साथ अलग-अलग व्यवहार करने वालों को धर्म ध्वजा को फहराने का अधिकार नहीं है। एक ही धर्म के विभिन्न लोगों में भेदभाव फैलाने वालों को धर्म का अग्रणी होने का अधिकार नहीं है। धर्मों के नाम पर पाखण्ड, अशान्ति, वैमनस्य, झूठ, अराजकता, भ्रान्ति और कुरीतियाँ फैलाने वालों को किसी धर्म की आख़िरी पंक्ति में भी बैठने का अधिकार नहीं है। लोभी, कामी, क्रोधी लोगों को भी धर्म का परचम लेकर चलकर अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

जिस तरह ईश्वर का विधान सबके लिए एक होता है, उसी प्रकार धर्म का विधान भी सबके लिए एक ही होता है और एक ही होना चाहिए। किसी भी धर्म में उस धर्म को मानने वाला कोई व्यक्ति भेदभाव का पात्र नहीं है। अगर धर्म भेदभाव या अलग-अलग व्यवहार की अनुमति देता है, तो उस धर्म का वहिष्कार करना कोई गुनाह नहीं है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी सही धर्म के विरुद्ध काम करता है, तो उसे दण्डित तो किया जा सकता है; लेकिन उसे मृत्युदण्ड देने का अधिकार किसी धर्माचार्य या धर्म के लोगों को नहीं है। अगर कोई किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है और उस पर आरोप तय होता है, तो उसे न्यायालय क़ानूनी प्रक्रिया के तहत दण्डित कर सकता है। लेकिन यह तभी सम्भव है, जब न्यायालय निष्पक्ष होंगे।

अगर धर्म नैतिक नहीं हैं, निष्पक्ष नहीं हैं, स्पष्टट नहीं हैं, सबके भले के लिए नहीं हैं, सबका सम्मान नहीं करते, उनमें झूठ और पाखण्ड हो, तो उन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता। धर्म धारण करने योग्य, सत्य का मार्ग दिखाने वाला और ईश्वर पर निर्विवाद होना चाहिए। अन्यथा सिवाय लोगों को बहकाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों के उसका किसी को कोई  फ़ायदा नहीं होने वाला।

अपराधियों को न धर्मों की सत्ता में शरण दी जानी चाहिए और न ही अन्य प्रकार की सत्ताओं में। लेकिन देखने में आता है कि अब धर्मों में अनेक अपराधी, पापी शरण लिये हुए हैं। इनमें से कई अपराधी और पापी तो स्वयं को धर्माचार्य घोषित कर चुके हैं। पाखण्डवाद इनका सबसे मज़बूत सुरक्षा कवच बना हुआ है। सदियों से इसी पाखण्डवाद के अँधे कुएँ में पड़ी जनता धर्म के प्रकाश से ईश्वर का दर्शन करना चाहती है। लेकिन उसे यही पाखण्डी, पापी और अपराधी धर्म के नाम पर पाखण्डवाद की ऐसी अफ़ीम खिला रहे हैं, जिसका नशा इतना चढ़ चुका है कि कोई भी दंगा करने, किसी की हत्या करने के लिए पलों में तैयार हो सकता है। दुर्भाग्य से सभी धर्मों के लोग ऐसे पाखण्डियों, पापियों और अपराधियों को सिर पर पैठाकर पूज रहे हैं। और इन पाखण्यिों का दुस्साहस देखिये कि ये किसी की भी गर्दन काटने, ज़ुबान काटने पर खुलेआम एक स्वघोषित इनआम की घोषणा करते हैं। यह इनआम एक प्रकार की सुपारी है, जो किसी की हत्या के लिए दी जाती है। और यह हर हाल में अधर्म है, $गैर-क़ानूनी है। मकड़ी के तरह जाल बुनते जा रहे ये पाखण्डी अपने बुने जाल में भोले-भाले लोगों को फँसाकर उनसे पाप कराने का उपक्रम इस तरह करते हैं कि कोई उसे धार्मिक समझकर विरोध न कर सके। हो भी यही रहा है। अब किसी धर्म का तथाकथित धर्मगुरु कुछ ग़लत भी करे, तो भी लोग उसके चरण धोकर पीने को तैयार रहते हैं। राजनीतिक लोग ऐसे पापियों को बचाने के लिए आगे आ जाते हैं। उनके साथ हर जगह सम्मानजनक तरीक़े से पेश आया जाता है। एक सामान्य आदमी की तरह नहीं। अगर कभी किसी को कोई सज़ा मिल भी जाती है, तो उसमें रियायत और सुविधाएँ शामिल होती हैं।