त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए जनता ने जबरदस्त मतदान किया है। अंतिम रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में 86.10 फीसदी मतदान हुआ है। हालांकि, यह पिछली बार के चुनाव से करीब तीन फीसदी कम है। राज्य के चुनाव में भाजपा को कांग्रेस-माकपा गठबंधन से कड़ी टक्कर मिल रही थी जबकि टिपरा मोथा पार्टी भी मैदान में है। फिलहाल वहां भाजपा की सरकार है जबकि दशकों तक एक दूसरे के खिलाफ लड़ने वाले कांग्रेस-माकपा इसबार गठबंधन में हैं और भाजपा को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार को हुए मतदान में छिटपुट घटनाओं को छोड़कर यह शांतिपूर्ण रहा। करीब 86.10 फीसदी मतदान हुआ है जिससे नतीजों को लेकर कयास अभी से शुरू हो गए हैं। राज्य में 2 मार्च को वोटों की गिनती होगी।
चुनाव आयोग के मुताबिक राज्य में 86 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ है। कई मतदान केंद्रों के बाहर 4 बजे के बाद भी मतदाताओं की लंबी कतारें थीं जिससे मतदान का फीसद और ज्यादा हो सकता है।
याद रहे 2018 के विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में 89 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले थे। अगरतला और अन्य जगहों पर अधिकतर मतदान केन्द्रों पर मतदाताओं की लंबी कतारें देखने को मिली। मतदान सुबह सात बजे शुरू हुआ था। शुरुआत में कुछ मतदान केन्द्रों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के खराब होने के कारण मतदान धीमा रहा।
राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव में राहुल गाँधी का नया रूप देखने को मिला। लोकसभा में भाजपा से क़रीब छ: गुणा छोटी हो चुकी कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी ताबड़तोड़ हमले कर रहे थे और भाजपा के सांसद टकटकी लगाकर उनके इस परिवर्तित रूप पर विस्मित थे। यह चमत्कार ही है कि मामूली टोका-टाकी के बीच राहुल गाँधी ने लगभग निर्बाध रहते हुए अपना भाषण पूरा किया।
7 फरवरी को पूरा सदन न सिर्फ़ गौतम अडानी की कारगुजारियों से रू-ब-रू हो रहा था, बल्कि नरेंद्र मोदी की अडानी से साँठगाँठ पर भी ख़ामोश था। चमत्कार वास्तव में क्या था- राहुल का भाषण या भाजपा की चुप्पी? अगर भाजपा के सांसद नहीं चाहते, तो क्या राहुल गाँधी अपना भाषण पूरा कर सकते थे? इस सवाल का क्या यह मतलब निकाला जाए कि भाजपा सांसदों ने कांग्रेस नेता का साथ दिया? नहीं, क़तई नहीं। फिर ऐसा क्यों हुआ?
गौतम अडानी पूरी दुनिया के सामने ग़लत करते पकड़े गये हैं और आने वाले समय में वे और भी कुख्यात होते जाएँगे। ऐसे में भाजपा को अपनी छवि की चिन्ता है। वह खुले तौर पर गौतम अडानी का साथ देती हुई दिखना नहीं चाहती। यही वह रणनीति है, जिसके कारण राहुल गाँधी को सदन में खुलकर देश की समस्याएँ और सवाल रखने का मौक़ा मिला। राहुल गाँधी के तीखे सवाल का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा के अपने भाषण में कोई उत्तर दिया। जब प्रधानमंत्री लोकसभा और राज्यसभा में बोल रहे थे, तो ऐसा लग रहा था कि राहुल गाँधी के तीक्ष्ण सवालों ने प्रधानमंत्री की धार कुंद कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी के बचाव में क्यों नहीं उतरे भाजपा सांसद?
ताज्जुब की बात यह है कि सदन में गौतम अडानी के बचाव में भाजपा सांसद नहीं उतरे; लेकिन वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव करते भी नहीं दिखायी पड़े। सदन के बाहर भाजपा नेताओं और प्रवक्ताओं ने जो कुछ कहा, उससे सदन के भीतर चुप्पी के कारण हुई जग हँसाई की भरपाई नहीं हो सकती। क्या इसे भाजपा की रणनीतिक भूल माना जाए? वास्तव में गौतम अडानी मामले पर चर्चा के लिए विपक्ष लगातार ज़ोर दे रहा था; लेकिन मोदी सरकार इसके लिए तैयार नहीं हो रही थी। राहुल गाँधी ने गौतम अडानी पर चर्चा में बदलकर रख दिया। स्पीकर ओम बिड़ला ने अपने पद की गरिमा के विपरीत व्यवहार करते हुए राहुल गाँधी को आगाह भी किया कि राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए भी ऐसी ही स्थिति सदन में बन सकती है; लेकिन राहुल इस धमकी के आगे झुके नहीं।
राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद
राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी से जो सवाल पूछे, वह हमेशा जीवंत रहेंगे। जरा उन सवालों पर ग़ौर करें-1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितनी बार गौतम अडानी के साथ विदेश गये? 2. कितनी बार प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश यात्रा के तुरन्त बाद गौतम अडानी से मुलाक़ात की? 3. कितनी बार विदेश में गौतम अडानी ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की? 4. कितनी बार प्रधानमंत्री मोदी के विदेश यात्रा से लौटने के ठीक बाद उसी देश में अडानी को ठेका मिला है? 5. अडानी ने भाजपा को 20 साल में कितने पैसे दिये?
सदन में चुप रहकर भाजपा ने काम चला लिया; लेकिन ये सवाल सदन से बाहर उसके गले की फाँस बनेंगे, जिनका जवाब भाजपा को कभी-न-कभी देना ही पड़ेगा।
वास्तव में हमला गौतम अडानी पर होता दिख रहा है; लेकिन राहुल गाँधी नरेंद्र मोदी पर हमला कर रहे हैं। राजनीति में सवालों से जितना बचने की कोशिश होती है, वे उतने ही मुखर होते चले जाते हैं। राहुल गाँधी ने सवालों की झड़ी लगाकर यही स्थिति भाजपा के लिए पैदा की है। ऐसा नहीं है कि भारत जोड़ो यात्रा से जीवंत हुए राहुल गाँधी सिर्फ़ सवाल पूछ रहे हैं। वास्तव में इन सवालों का आधार सच्ची घटनाएँ हैं, जिनमें वे सवाल भी शामिल हैं, जो भारत जोड़ो यात्रा के दौरान आमजनों ने राहुल के सामने रखे। लिहाज़ा सदन में पूछे गये सवाल राहुल के नहीं, देश की जनता के हैं।
इन सवालों के आधार बने कुछ बिन्दुओं पर ग़ौर करें- पहले नरेंद्र मोदी अडानी के विमान में सफ़र करते थे। अब अडानी मोदी के विमान में सफ़र करते हैं। (ऐसी एक तस्वीर भी राहुल गाँधी ने सदन में दिखलायी)। यह मामला गुजरात का था; फिर भारत का हो गया और अब अंतरराष्ट्रीय हो गया है। दूसरा, 2022 में श्रीलंका बिजली बोर्ड के अध्यक्ष ने श्रीलंका में संसदीय समिति को सूचित किया कि उन्हें राष्ट्रपति राजपक्षे ने बताया कि उन पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अडानी को पवन ऊर्जा परियोजना देने का दबाव डाला गया था। प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया गये और अचानक एसबीआई ने अडानी को एक बिलियन डॉलर का ऋण दे दिया। फिर वह बांग्लादेश जाते हैं और फिर बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड अडानी के साथ 25 साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है। सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों का उपयोग करके जीवीके से मुंबई एयरपोर्ट का अपहरण कर लिया गया और भारत सरकार ने उसे अडानी को दे दिया।
राहुल गाँधी ने कहा- ‘लोग मुझसे पूछते थे कि अडानी किसी भी बिजनेस में आता है और कभी फेल नहीं होता। अडानी अब 8-10 क्षेत्रों में हैं और 2014 से 2022 तक उसकी कुल सम्पत्ति 8 बिलियन डॉलर से 140 बिलियन डॉलर तक कैसे पहुँच गयी?’
अडानी से दूरी दिखाने को मजबूर हुई भाजपा
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा अडानी की कम्पनी को बिजली के मीटर लगाने का टेंडर रद्द कर देने का फ़ैसला यह बताता है कि राहुल गाँधी ने लोकसभा में ऐसी जगह चोट की है, जिसे भाजपा न छिपा पा रही है, न बता पा रही है। लिहाज़ा गौतम अडानी से न सिर्फ़ दूरी दिखाने को भाजपा मजबूर हुई है, बल्कि योगी सरकार अडानी की कम्पनी की कार्रवाई करती हुई भी दिख रही है। ऐसा जनता के कोपभाजन बनने की आशंका के कारण सम्भव हुआ है। राहुल ने भाजपा के लिए यह मजबूरी पैदा की है। इससे यह भी पता चलता है कि अडानी गेट कांड को लेकर भाजपा के भीतर घमासान मचा हुआ है और आगे भी इस पर घमासान बढऩे वाला है।
गौतम अडानी के साथ खड़ा नहीं दिखने की भरपूर कोशिश करते हुए भाजपा सदन से बाहर राहुल गाँधी पर हमलावर है, जो व्यक्तिगत हमला अधिक है। भाजपा की ओर रविशंकर प्रसाद से लेकर स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी पर व्यक्तिगत आरोप लगाये। पुराने ग़ैर-प्रमाणित आरोप लगाकर राहुल पर हमला बोला। मगर क्या इन हमलों से मोदी और अडानी के अनैतिक सियासी-कारोबारी रिश्ते का बचाव हो सकता है? अगर ऐसा होता, तो लोकसभा के भीतर भाजपा के सांसद तब तमाशबीन नहीं बने रहते, जब राहुल गाँधी बोल रहे थे।
भाजपा यह कभी नहीं बता पाएगी कि 2014 में 8 बिलियन डॉलर की सम्पत्ति 140 बिलियन डॉलर तक कैसे पहुँच गयी? कांग्रेस से पूछा गया कोई भी सवाल इस सवाल का जवाब नहीं हो सकता। महँगाई, बेरोज़गारी जैसे सवाल भी मज़बूत हुए राहुल गाँधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अफ़सोस जताया कि राष्ट्रपति के सम्बोधन में महँगाई और बेरोज़गारी जैसे शब्दों का ज़िक्र तक नहीं था। अग्निवीर जैसी योजना का ज़िक्र करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि देश के लोग और सेना के अफ़सर बोल रहे हैं कि यह योजना थोपी गयी है। आरएसएस और अजित डोभाल जैसे लोगों ने इसे सेना पर थोपा है। सुबह-सवेरे मैदान पर अभ्यास करने वाले युवा निराश हैं कि अब उन्हें 15 साल की नौकरी की जगह चार साल की अग्निवीर योजना से जुडऩा होगा। संसद में राहुल गाँधी ने अहम मुद्दों को छुआ है। ये मुद्दे आने वाले समय में ज़मीन पर मज़बूत होंगे। आन्दोलन के लिए मुद्दों का दस्तावेज़ीकरण हुआ है। संसद में बातें रिकॉर्ड में आयी हैं।
बहरहाल जिन सवालों से भाजपा और मोदी सरकार भाग रही थी, उन सवालों के कटघरे में उन्हें ला खड़ा किया जा सका है। इसी मायने में राहुल का भाषण ऐतिहासिक है और अडानी गेट वास्तव में मोदी गेट बनता दिख रहा है।
अडानी मामला भाजपा के लिए बन सकता है बड़ा राजनीतिक सिरदर्द
क्या न्यूयॉर्क स्थित इन्वेस्टमेंट रिसर्च फर्म हिंडनवर्ग रिसर्च एलएलसी के भारतीय व्यापारी गौतम अडानी को लेकर ख़ुलासे का देश की राजनीति पर बड़ा असर पडऩे जा रहा है और आम चुनाव से महज़ एक साल पहले यह केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के दो दिग्गजों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह के करिश्मे का तिलिस्म तोडऩे की राह खोल देगा? सन् 2014 के आम चुनाव से पहले मनमोहन सिंह सरकार को भाजपा ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही ढेर किया था, और रही सही कसर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की लहर ने पूरी कर दी थी, जिसे लेकर बहुत-से लोग कहते हैं कि हजारे के पीछे वास्तव में भाजपा ही थी।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया, जिस पर उनसे जवाब माँगा गया है। उधर सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने कहा कि शेयर बाज़ार के लिए रेगुलेटरी मैकेनिज्म को मज़बूत करने को विशेषज्ञ समिति गठित करने के प्रस्ताव को लेकर उसे कोई आपत्ति नहीं है। अडानी का मुद्दा राजनीतिक दृष्टि से इसलिए भी बहुत संवेदनशील है, क्योंकि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले तीन-चार साल से प्रधानमंत्री मोदी और अडानी के रिश्तों को लेकर जनता के बीच सवाल उठाते रहे हैं।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आने के बाद जिस तरह अडानी के आर्थिक क़िले की दीवारें हिली हैं और उन्हें दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति बनाने के लिए बैंकों के दरवाज़े खोल देने के गम्भीर आरोप लग रहे हैं, इसकी आँच केंद्र की सत्ता की तरफ़ सरकती दिख रही है। यह मुद्दा भ्रष्टाचार का मुद्दा बना तो निश्चित ही भाजपा की उल्टी गिनती शुरू होने में देर नहीं लगेगी। भाजपा को डर है कि उस पर अमीर परस्त होने का ठप्पा लग सकता है, जो राजनीति की दृष्टि से बहुत महँगा साबित होगा।
हिंडनवर्ग की रिपोर्ट को लेकर अडानी ग्रुप अपनी बात कह चुका है और उसने इसे ‘मज़बूत हो रही भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचाने की साज़िश’ बताया है। देश में ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो यह मानते हैं कि भारत से जलने वाले ऐसी साज़िशें करते रहते हैं। हालाँकि देश में लोगों की एक बड़ी संख्या वह भी है, जिसे लगता है कि गड़बड़ी हुई है और केंद्र में बैठी भाजपा सरकार अपने रिश्तों के कारण गुजरात के व्यापारी के साथ खड़ी है और आउट ऑफ बॉक्स उनकी मदद करती रही है। ख़ुद हिंडनवर्ग रिसर्च ने अडानी के उनके ख़ुलासे को साज़िश बताने पर कहा है कि आप अपने कथित फ्रॉड को देश भक्ति से नहीं जोडक़र नहीं बच सकते। भारत में कांग्रेस और विपक्ष के अन्य दल भी इस मसले पर केंद्र सरकार पर हमले कर रहे हैं।
ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि हिंडनवर्ग के ख़ुलासे के बाद देश की बड़ी आबादी अडानी के अमीर बनने को आशंका की दृष्टि से देखने लगी है। उन्हें बैंकों, एलआईसी आदि में जमा अपने पैसों को लेकर भी चिन्ता हुई है, भले सरकार और बैंकों ने जनता का पैसा सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया है। बातचीत में काफ़ी लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमितशाह के गुजरात में होने के कारण केंद्र सरकार की अडानी पर ख़ास कृपा रही है। अडानी को लेकर केंद्र सरकार कितनी रक्षात्मक है, यह इस बात से ज़ाहिर हो जाता है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के लोकसभा में अडानी और प्रधानमंत्री मोदी के कथित रिश्तों को लेकर लगाये आरोप सदन की कार्यवाही से कुछ ही घंटे के भीतर हटा दिये गये और प्रधानमंत्री मोदी ने अपने जवाब में इन आरोपों पर एक शब्द तक नहीं कहा।
देश ही नहीं विदेशी मीडिया में भी अडानी मुद्दा लगातार छाया हुआ है। कारण यह भी है कि अडानी दुनिया के नंबर एक अमीर व्यक्ति हुए हैं, भले हिंडनवर्ग की रिपोर्ट आने के बाद वह काफ़ी नीचे चले गये। उनके शेयरों ने बड़ा गोता लगाया और भारतीय अर्थव्यवस्था को हिला दिया। संसद में विपक्ष ने लगातार इस मुद्दे को उठाया। वॉकआउट किया। संसद परिसर में धरना दिया। लेकिन सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी और उसकी तरफ़ से कोई सफ़ाई नहीं आयी यह कहा जा सकता है कि अडानी का मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब भाजपा इस साल होने वाले विधानसभा के चुनाव जीतने के सपने देख रही थी। बहस का मुद्दा अब अचानक अडानी मामले में बदल गया है और लोग सरकार की दूसरी कमज़ोरियों को भी गिनाने लगे हैं।
दो बार सत्ता की एंटी इंकम्बेंसी भाजपा को वर्तमान राजनीतिक हालत में संकट की तरफ़ ले जा सकती है और उसका लगातार तीस साल तक सत्ता में रहने का दावा उसकी मुसीबत में बदल सकता है। पहले ही केंद्र की भाजपा सरकार पर अहंकारी होने का आरोप लग रहा है। प्रधानमंत्री मोदी मुद्दों पर नहीं बोलते, यह भी जनता को अखरने लगा है। उन्हें लगता है कि भीतर ही भीतर ही सरकार कुछ चीज़ें छिपाती है और जनता के सामने आने नहीं देती। पिछली दो बार से मोदी के साथ खड़े रहे युवा और महिलाएँ भी आशंकाओं से घिरे हुए हैं और यदि वे विपरीत दिशा में सोचने लगते हैं, तो भाजपा को एक बड़ा वोट बैंक खोना पड़ सकता है। इसका असर इसी साल के विधानसभा चुनावों में दिख सकता है।
कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों में भाजपा के लिए दिक़्क़ते हैं और कांग्रेस उसे विधानसभा चुनावों में मज़बूत टक्कर देने की स्थिति पहुँचती दिख रही है। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा का दक्षिण में व्यापक असर दिख रहा है। अगले आम चुनाव से पहले कांग्रेस एक और ऐसी बड़ी यात्रा की तैयारी कर चुकी है। उत्तर भारत के राज्यों में भी भाजपा की राह उतनी आसान नहीं होगी। हाल के कुछ सर्वे संकेत दे रहे हैं कि धीरे-धीरे ही सही, कांग्रेस देश में वापसी करती दिख रही है। कांग्रेस अडानी मुद्दे को भाजपा और अडानी के बीच भ्रष्टाचार से जोडक़र जनता के बीच ले जा रही है और यदि वह इसमें सफल हुई, तो 2024 के आम चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है।
कारण यह है कि आज की तारीख़ में भाजपा का सारा दारोमदार मोदी-शाह की जोड़ी पर टिका है और यदि इनका तिलिस्म टूटता है, तो भाजपा को सँभलना मुश्किल होगा।
क्या हैं आरोप?
केंद्र सरकार पर आरोप लग रहा है कि उसके प्रभाव के कारण बैंकों ने अडानी के लिए अपने दरवाज़े खोल दिये। अडानी पहले भी अमीर थे; लेकिन उनकी असली ग्रोथ 2014 के बाद हुई, जब मोदी सरकार केंद्र में सत्ता में आयी। आँकड़े देखें, तो अडानी समूह को दिया गया क़र्ज़ भारतीय अर्थव्यवस्था के कम से कम एक फ़ीसदी के बराबर है। निक्केई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी की सूचीबद्ध समूह कम्पनियों में से 10 की देनदारी 3.39 ट्रिलियन रुपये (41.1 बिलियन डॉलर) तक है। कम्पनियों में एसीसी, अंबुजा सीमेंट्स और नई दिल्ली टेलीविजन (एनडीटीवी) शामिल हैं, जो अडानी समूह ने 2022 में ही ख़रीदी थीं। आईएमएफ के मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर के आख़िर तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद 273 ट्रिलियन रुपये था और अडानी का क़र्ज़ अर्थव्यवस्था के क़रीब 1.2 फ़ीसदी है।
अडानी समूह की 10 कम्पनियों की कुल सम्पत्ति 4.8 ट्रिलियन रुपये से अधिक है। हालाँकि निवेशकों की असली चिन्ता क़र्ज़ के बड़े आकार को लेकर है। अडानी समूह की दिक़्क़तें तब शुरू हुईं, जब 24 जनवरी को हिंडनबर्ग रिसर्च ने एक रिपोर्ट जारी कर उन पर कई साल तक लेखांकन धोखाधड़ी और स्टॉक हेरफेर का आरोप लगाया। विभिन्न रिपोट्र्स के मुताबिक, अडानी समूह की 10 कम्पनियों का सामूहिक इक्विटी अनुपात 25 फ़ीसदी था, जिनमें से एक अडानी ग्रीन एनर्जी का मार्च, 2022 तक सिर्फ़ दो फ़ीसदी का इक्विटी अनुपात था। अडानी समूह के इन आरोपों के खंडन के बावजूद रिपोर्ट के बाद समूह की कम्पनियों के शेयरों की क़ीमतों में बड़ी गिरावट आयी।
अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कम्पनी अडानी इंटरप्राइजेज ने पहली फरवरी को अपने 200 अरब रुपये के नये शेयरों की पेशकश को रद्द करने की घोषणा की। एक वीडियो में अरबपति गौतम अडानी ने कहा कि इस क़दम का मक़सद निवेशकों को सम्भावित नुक़सान से बचाना है। अडानी ने कहा- ‘हमारी बैलेंस शीट स्वस्थ और सम्पत्ति मज़बूत है।’ समूह ने यह भी घोषणा की कि गौतम अडानी और उनका परिवार निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने के लिए समूह के शेयरों द्वारा समर्थित ऋणों में 1.1 बिलियन डॉलर का भुगतान कर रहे हैं।
हालाँकि इन सबके बावजूद जनता में अपने पैसे को लेकर चिन्ता है। एक बयान में, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र लचीला और स्थिर बना हुआ है। इसके बाद 10 फरवरी को आरबीआई ने मुद्रास्फीति को देखते हुए बेंचमार्क रेपो दर को 0.25 अंक बढ़ाकर 6.5 फ़ीसदी कर दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने अडानी समूह की उथल-पुथल के प्रभाव को कम करके आँकते हुए कहा कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली की ताक़त, आकार और लचीलापन अब बहुत वृहद और अधिक मज़बूत है। एक व्यक्तिगत घटना या इस तरह के मामले से यह प्रभावित नहीं होती।
इसके बावजूद जनता का भरोसा बहाल होने और उसे अडानी में फिर निवेश करने की हिम्मत जुटाने में समय लगेगा, ज़्यादातर आर्थिक विशेषज्ञों की यही राय है। अडानी का मुद्दा आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक मुद्दा भी है। यही सरकार की सबसे बड़ी परेशानी है, क्योंकि मोदी सरकार पर अडानी को प्रश्रय देने का आरोप है। लिहाज़ा यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय का इसका कितना राजनीतिक असर बनता है और सरकार विपक्ष से कैसे निपटती है? भाजपा जानती है कि जितना यह मुद्दा राजनीतिक रूप लेता है, उसकी मुसीबत बढ़ेगी। इसका सबसे बड़ा कारण अडानी का प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात से होना है। वैसे भी 2014 के बाद बैंकों का लाखों करोड़ डकारकर डेढ़ दर्ज़न से ज़्यादा जो लोग विदेश भाग गये हैं, उनमें 95 फ़ीसदी गुजरात से हैं। इनमें से कई को लेकर विपक्ष का आरोप है कि वे शीर्ष भाजपा नेताओं के क़रीबी रहे हैं।
अडानी ग्रुप के ख़िलाफ़ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत में भी दस्तक दे चुका है। फरवरी के दूसरे हफ़्ते सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की जाँच कराने की माँग वाली याचिका पर अदालत ने केंद्र से जवाब तलब किया। हालाँकि याचिकाकर्ता को भी कड़ी हिदायत दी है। अडानी ग्रुप के ख़िलाफ़ आयी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की जाँच कराने की माँग वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि आप कैसे भारतीय निवेशक के हितों को बचाएँगे। सर्वोच्च न्यायालय ने मौज़ूदा नियामक ढाँचे पर वित्त मंत्रालय और सेबी से भी जानकारी माँगी। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को कड़ी हिदायत देते हुए कहा कि आप जो भी तर्क दे रहे हैं, सोच-समझकर दें; क्योंकि इसका सीधा असर शेयर बाज़ार पर पड़ता है।
किसानों की अनदेखी
अडानी पर आरोपों के बीच ही केंद्रीय बजट आया। इसमें कई मदों में पैसा घटा दिया गया है, जिसमें कृषि और मनरेगा भी शामिल हैं। किसान पहले ही मोदी सरकार से नाराज़ हैं, ऐसे में बजट घटाने ने आग में घी का काम किया है और किसान फिर से आन्दोलन करने की तैयारी करते दिख रहे हैं। यदि 2024 के चुनाव से पहले किसान बड़ा आन्दोलन शुरू करते हैं, तो अडानी मुद्दे से पहले ही त्रस्त भाजपा के लिए नयी मुसीबत पैदा हो जाएगी। फरवरी के दूसरे हफ़्ते मुज़फ़्फ़रनगर के जीआईसी मैदान में भारतीय किसान यूनियन की महापंचायत में बड़ी संख्या में किसान उमड़े जिससे ज़ाहिर होता है कि वो मोदी सरकार से नाराज़ हैं। भाजपा को यह नाराज़गी महँगी पड़ सक्ती है।
‘तहलका’ ने भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि केंद्र और राज्य (योगी) सरकार को आड़े हाथ लिया। उन्होंने गन्ने के भाव को लेकर तीखे तेवर दिखाये। टिकैत ने कहा- ‘नागपुर पॉलिसी चल रही है। बड़ी कम्पनियों को बिजली बेची जा रही है। ग़रीबों का शोषण किया जा रहा है। यह कम्पनियों की सरकार है। अगले साल 26 जनवरी को पूरे देश में ट्रैक्टर परेड होगी। किसानों की ज़मीन छीनने की तैयारी है, ग़लत तरीक़े से भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है। हमारे आन्दोलन का अगला पड़ाव फिर दिल्ली होगा और 20 मार्च से संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में दिल्ली में आन्दोलन किया जाएगा। किसान 20 साल तक की लड़ाई के लिए तैयार हैं।’
प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने भाषणों में खेती और किसानों की बार करते हैं; लेकिन इस बार के बजट में खेती पर आधारित गाँवों की क़रीब 65 फ़ीसदी आबादी को बजट का महज़ 3.20 फ़ीसदी पैसा ही आवंटित गया किया है। हैरानी यह है कि 2022 के बजट के मुक़ाबले यह कम है, क्योंकि तब यह 3.84 फ़ीसदी था। ग्रामीण विकास के लिए बजट 5.81 फ़ीसदी से घटाकर 5.29 फ़ीसदी कर दिया गया है। देखा जाए, तो भारत में एक किसान परिवार की आय 27 रुपये प्रतिदिन है, जो आज की बढ़ती महँगाई में एक परिवार के एक ही समय के भोजन के लिए भी पर्याप्त नहीं है।
केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वादा किया था। इसके लिए किसानों को डीजल, बिजली, खाद, बीज, कीटनाशक के दामों में 50 फ़ीसदी की कमी कर सब्सिडी की व्यवस्था करने या समर्थन मूल्य दोगुना कर बजट में इसके लिए राशि का प्रावधान करने की ज़रूरत थी; लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि देश के अमृत-काल में बिजनेसमैन गौतम अडानी 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन कमाते हैं। लेकिन मनरेगा में मज़दूर की दिहाड़ी 200 रुपये है और प्रधानमंत्री मोदी इसी देश के किसानों को किसान सम्मान निधि के नाम पर साल भर में महज़ 6,000 रुपये देते हैं, जिससे ज़ाहिर होता है कि किसानों की आज क्या स्थिति है?
इस बार पीएम किसान सम्मान निधि के लिए पैसा भी कम कर दिया गया है। पिछले साल यह 68,000 करोड़ था, जिसे अब घटाकर 60,000 करोड़ कर दिया गया है। बजट सत्र में एक सवाल के जवाब में सरकार ने ही बताया है कि 15 करोड़ किसान परिवारों में से सम्मान निधि की सभी क़िस्तें यानी 4 साल के 24,000 रुपये केवल तीन करोड़ किसान परिवारों को ही आवंटित किये गये हैं। यही नहीं, खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी जो 2022 में 2,25,000 करोड़ थी; घटाकर 1,75,000 करोड़ कर दी गयी है।
पिछले तीन साल से सरकार ने एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड की एक लाख करोड़ रुपये की घोषणा की है; लेकिन इसका वास्तव में केवल 10 फ़ीसदी ही ख़र्च किया गया। किसान सभी कृषि उत्पादों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (सी 2 +50 फ़ीसदी) पर ख़रीद की माँग कर रहे है। लेकिन सरकार जिन 23 फ़सलों के समर्थन मूल्य पर ख़रीद की घोषणा करती है, उन फ़सलों की समर्थन मूल्य पर ख़रीद तक के लिए बजट में राशि आवंटित नहीं की गयी है। केंद्र सरकार फ़सल बीमा के लिए 2022 में आवंटित 15, 500 करोड़ को भी इस बार घटाकर 13,625 करोड़ कर दिया गया है।
इसके अलावा पीएम किसान सम्मान निधि के लिए अभी भी 60,000 करोड़ रुपये बजट तय किया गया है, जो पिछले साल के रिवाइज्ड बजट में भी इतना ही था। पीएम ग्राम सडक़ योजना का बजट भी 19,000 करोड़ रुपये ही है। सरकार ने यूरिया सब्सिडी पर बजट कम करके 1,31,100 करोड़ कर दिया है, जो पिछले साल 1,54,098 करोड़ रुपये था। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर बजट को कम करके 1,37,207 करोड़ कर दिया है, जो पिछले साल 2,14,696 करोड़ था।
सरकार का दावा है कि बजट में सरकार का फोकस कृषि के बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने, कृषि में तकनीक को बढ़ावा देने और प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ाने पर रहा है। हालाँकि बजट में न्यूनतम सर्मथन मूल्य (एमएसपी) को लेकर कुछ नहीं कहा गया है, जो किसानों की सबसे बड़ी माँग रही है। सरकार का कहना है कि अगले तीन साल में देश के एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के गुर सिखाये जाएँगे।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि देश में 10,000 बायो इनपुट रिसर्च सेंटर स्थापित होंगे। माइक्रो फर्टिलाइजर की उपलब्धता बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाएगा और रासायनिक खाद के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री-प्रणाम योजना की शुरुआत होगी, जबकि गोबर धन स्कीम के तहत 10,000 करोड़ रुपये ख़र्च किये जाएँगे। सरकार ने किसानों को आर्थिक लाभ की जगह ज़्यादा क़र्ज़ देने की बात कही है, जिससे किसानों में नाराज़गी है। सरकार का दावा है कि कृषि क्षेत्र के लिए क़र्ज़ के लक्ष्य को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा। सरकार ने बजट में कृषि का डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा बनाने की घोषणा की है।
हालाँकि किसान नाराज़ हैं। भाकियू नेता राकेश टिकैत ने आरोप लगाया कि किसान सरकार के एजेंडे में हैं ही नहीं। बजट में किसान की आय पर कोई चर्चा नहीं हुई। सरकार ने छ: साल पहले आय दोगुनी करने की बात कही थी, लेकिन आय घट गयी। सरकार ने 2047 तक का झुनझुना दिया है और विश्व गुरु बनाने की बात कर रहे हैं। सरकार सरकारी सम्पत्तियों को बेच रही हैं और खेती पर निवेश कम कर रही है। सरकार एमएसपी नहीं, क़र्ज़ा देने की बात कर रही है। खेती के लोन अडानी के माध्यम से दिये जाएँगे। उन्होंने कहा- ‘अगर सरकार 85 करोड़ को मु$फ्त राशन दे रही है, तो समझ लो देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। इसी 20 मार्च को पूरे देश का किसान एक साथ दिल्ली कूच करेगा।’
तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ साल भर आन्दोलन करने वाले किसानों ने मोदी सरकार के भरोसे के बाद अपना आन्दोलन स्थगित किया था; लेकिन उनकी माँगों की लम्बी फ़ेहरिस्त अधूरी ही रही। उनकी पीएम किसान योजना के तहत 6,000 रुपये सालाना को बढ़ाकर 8,000 रुपये करने की उम्मीद टूट गयी; उल्टे ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिकी के आधार मनरेगा का बजट ही कम कर दिया गया।
सर्वे और चुनाव
हाल के वर्षों में आमतौर पर देखा गया है कि चुनावों से पहले जो सर्वे आते हैं, उनमें ज़्यादातर में प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा की जीत को ख़ूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। इससे निश्चित ही चुनावों में मतदाता की सोच पर असर पड़ता है। हालाँकि इस साल जनवरी के आख़िर से जो सर्वे आने शुरू हुए हैं, उनमें कुछ अलग तस्वीर सामने आ रही है।
लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर हाल में सी वोटर का एक सर्वे सामने आया, जो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की बेचैनी बढ़ाने वाला लगता है। इसमें मोदी-शाह का जादू फीका होने के संकेत मिलते हैं। भाजपा नेता अगले आम चुनाव में अकेले 350 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं; लेकिन सर्वे बताता है कि भले 52 फ़ीसदी वोटों के साथ प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा चुनाव से एक साल पहले सबसे प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़ा चेहरा बने हुए हैं। भाजपा की सीटें सन् 2019 के मुक़ाबले 303 से कम होकर 284 पर पहुँचती दिख रही हैं।
सहयोगियों की सम्भावित 14 सीटें मिलकर एनडीए का आँकड़ा 298 पर पहुँच रहा है। सन् 2019 में एनडीए ने 353 सीटें जीती थीं। इसके विपरीत कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की जो सीटें 2019 में 91 थीं, वो 153 पर पहुँच रही हैं। सर्वे ने यूपीए को 30 फ़ीसदी वोट मिलते दिखाये हैं, जो निश्चित ही भाजपा के लिए चिन्ता की बात हो सकती है। और भी दिलचस्प बात यह है कि सर्वे में अनुच्छेद-370 और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर जनता से जो सवाल पूछे गये उन पर महज़ 14 और 12 फ़ीसदी लोगों ने ही मोदी सरकार का समर्थन किया।
इसका मतलब यह हुआ कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को पसन्द करने वाले 52 फ़ीसदी लोगों में इन दो मुद्दों, जो हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे हैं, पर इतने कम लोगों का ही समर्थन है। ऐसे में हिंदुत्व को अगले चुनाव में बड़ा एजेंडा बनाने की सोच रही भाजपा की चिन्ता बढ़ेगी। एक और दिलचस्प बात सर्वे में सामने आयी वह यह है कि भाजपा का हार्डकोर वोटर उतना ही है, जितना राहुल गाँधी को पसन्द करने वाला वोटर। इसके मायने यह हुए कि भाजपा के पास स्मार्टन के रूप में मतदाता का ऐसा बड़ा वर्ग है, जो स्थायी रूप से भाजपा के साथ नहीं है। यदि यह मतदाता भाजपा से फिसलता है,तो ज़ाहिर है कांग्रेस या विपक्ष के किसी अन्य दल के साथ जाएगा। यही वह वर्ग है, जिसने पिछले दो का समर्थन किया था। यदि वह सत्ता परिवर्तन का मन बनाता है, तो भाजपा कमज़ोर होगी। ज़ाहिर है विपक्ष मेहनत करता है, तो इस वर्ग का वोट अपनी तरफ़ खींच सकता है। मूड ऑफ द नेशन के नाम से अलग से आये इंडिया टुडे-सी वोटर के जनवरी के सर्वे में बताया गया है कि आज चुनाव हों, तो भाजपा 284 और कांग्रेस 191 सीटें जीत सकती है। इसमें महँगाई और बेरोज़गारी को मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता बताया गया है। सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए बिहार में 47 फ़ीसदी तक वोट हासिल कर सकता है। अगस्त 2022 में यह आँकड़ा यूपीए के लिए सिर्फ़ 5 फ़ीसदी था।
फरवरी में आये इस सर्वे के मुताबिक, यूपीए को कर्नाटक में 43 फ़ीसदी और महाराष्ट्र में 48 फ़ीसदी वोट हासिल करने का अनुमान है। सर्वे के मुताबिक, आज चुनाव होने पर कांग्रेस-यूपीए को कर्नाटक में सीधे 15 सीटों (कुल 17 सीटें) का फ़ायदा हो सकता है, जहाँ कुल लोकसभा सीटें 28 हैं। साल 2019 में उसे वहाँ दो ही सीटें मिली थीं।
महाराष्ट्र में यूपीए गठबंधन को 28 सीटों का फ़ायदा हो सकता है। सर्वे के कांग्रेस गठबंधन को 34 सीटें मिल सकती हैं, जो साल 2019 में सिर्फ़ 6 थीं। बिहार में यूपीए गठबंधन को 25 सीटें दिखायी गयी हैं, जो सन् 2019 में महज़ एक थी। इस लिहाज़ से देखें, तो कर्नाटक में इस साल होने वाले विधानसभा के चुनाव कांग्रेस की लाटरी निकाल सकते हैं। राहुल गाँधी की दिसंबर में जब भारत जोड़ो यात्रा वहाँ से निकली थी, तो बड़ी संख्या में लोग उसमें जुटे थे। सर्वे के मुताबिक, चार साल कर्नाटक के वोटर का मिज़ाज पूरी तरह बदला दिख रहा है।
भाजपा के लिए सर्वे में यह राहत ज़रूर है कि अन्य दलों के वोट शेयर में पिछले 1.5 साल से गिरावट देखी जा रही है। डेढ़ साल के बीच हुए तीन सर्वे में अन्य दलों का आँकड़ा 43 फ़ीसदी से गिरकर 39 फ़ीसदी पहुँच गया है, जबकि भाजपा का वोट शेयर 2 फ़ीसदी बढक़र 37 से 39 पहुँच गया है। हालाँकि कांग्रेस अब फिर भाजपा की सिर दर्द बढ़ाती दिख रही है, जिसके वोट शेयर में तीन सर्वे के बीच दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। जनवरी 2022 में कांग्रेस का वोट शेयर 20 फ़ीसदी था; जो अगस्त, 2022 में 21 और जनवरी, 2023 में 22 फ़ीसदी पहुँच गया है।
याद रहे भाजपा को सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में 18.8 फ़ीसदी, सन् 2014 में 31.34 फ़ीसदी, जबकि सन् 2019 में 37.76 फ़ीसदी वोट हासिल हुए थे। उधर कांग्रेस को सन् 2009 में 28.55 फ़ीसदी, सन् 2014 में 19.52 फ़ीसदी और सन् 2019 में 19.70 फ़ीसदी वोट मिले थे। राजनीति के जानकारों का कहना है कि यदि यह मत फ़ीसदी इसी तरह घटा, तो 2024 तक भाजपा के लिए मुश्किल स्थिति भी आ सकती है।
अडानी पर हिंडनवर्ग के आरोप
अडानी ग्रुप ने शेयरों को क़ीमत मैनिपुलेट कर बढ़ाया।
धनशोधन और अकाउंटिंग फ्रॉड किया और आठ साल में 5 सीएफओ बदले।
ग्रुप की 7 कम्पनियों के शेयर की क़ीमत 85 फ़ीसदी तक ज़्यादा अर्थात् स्काई रॉकेट वैल्यूएशन।
अडानी ग्रुप पर 2.20 लाख करोड़ का क़र्ज़, जो उसकी कम्पनियों की हैसियत से कहीं ज़्यादा है।
मॉरीशस और दूसरे देशों की जिन कम्पनियों में पैसा भेजा गया, उन्होंने अडानी के शेयर ख़रीदे।
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
“जो अहंकार में डूबे रहते हैं, उनको लगता है कि मोदी को गाली देकर और ग़लत आरोप लगाकर ही आगे बढ़ पाएँगे। मोदी पर देश का ये भरोसा अख़बार की सुख़ियों और टीवी पर चमकते चेहरों से नहीं हुआ है। जीवन खपा दिया है, पल-पल खपा दिया है मैंने देश के लिए। मोदी देश के एक-एक परिवार के लिए जी रहा है। वे (राहुल) झूठ से मेरे प्रति देश के 140 करोड़ लोगों के इस कवच को भेद नहीं सकते हैं।’’
राहुल गांधी, कांग्रेस नेता
“मैं संतुष्ट नहीं हूँ। प्रधानमंत्री के बयान से सच्चाई का पता चलता है। अगर (अदानी) मित्र नहीं हैं, तो (प्रधानमंत्री) कहते कि ठीक है। इन्क्वायरी करवा देता हूँ। लेकिन इन्क्वायरी की बात तक नहीं हुई। इससे क्लियर है कि प्रधानमंत्री उनकी (अडानी की) रक्षा कर रहे हैं। उन्हें प्रमोट कर रहे हैं।’’
पिछले दिनों भाजपा कार्यकारिणी द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव द्वारा जे.पी. नड्डा की अध्यक्षता को 2024 तक विस्तारित करने की पुष्टि करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने अगले आम चुनावों में पुन: भाजपा के वापस सत्ता में आने की घोषणा की। इसमें कुछ विशेष नहीं था। क्योंकि तमाम राजनीतिक विश्लेषक चाहें दक्षिणपंथी हो या वामपंथ के समर्थक, यह मानकर चल रहे हैं कि वर्ष 2024 के आम चुनाव में सीटों के मामूली फेरबदल के साथ एनडीए सरकार के पुन: सत्ता में लौटने के आसार हैं।
नौ वर्ष से सत्तारूढ़ दल पुन: आम चुनावों के लेकर आश्वस्त दिख रहा है। उसके आत्मविश्वास की क्या वजह है? क्यों उसे पदस्थता विरोध (एंटी इंकम्बेंसी) का भय नहीं है? असल में इसकी मुख्य वजह मृतप्राय विपक्ष है। यह भारतीय राजनीति का ऐसा दौर है, जब विपक्ष होकर भी नहीं है। अर्थात् विपक्ष रीढ़-विहीन, असहाय-सा है, जिसमें सत्तारूढ़ दल के विरुद्ध संघर्ष का नैतिक बल शेष नहीं रहा है। क्या इस जम्हूरियत में विपक्ष के पास सत्ता के विरोध का कोई आधार ही नहीं बचा हैं? इसकी भी समीक्षा कर लेनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले 14 वर्षों में ग़रीबों की संख्या में बड़ी गिरावट आयी है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में 41.5 करोड़ (415 मिलियन) लोग ग़रीबी के चंगुल से बाहर निकले हैं। संयुक्त राष्ट्र इसे ऐतिहासिक बदलाव कह रहा है। किन्तु तब भी देश में आज 27 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं। दिसंबर, 2022 में ग़रीबों की संख्या बढक़र 8.30 फ़ीसदी पर पहुँच गयी। यह पिछले 16 महीनों में सबसे ज़्यादा रही थी। भारत की ख़ुदरा महँगाई दर अप्रैल, 2022 में पिछले आठ साल के शीर्ष पर पहुँच गयी थी। सन् 2014 की एनडीए सरकार के 66 सदस्यीय मंत्रिमंडल में एक समय क़रीब एक-तिहाई मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें कम-से-कम पाँच मंत्रियों के ख़िलाफ़ रेप और साम्प्रदायिक हिंसा जैसे गम्भीर मामले अदालत में चल रहे थे। तब से स्थिति बहुत नहीं बदली आज भी सबसे ज़्यादा दाग़ी, अपराधी सत्ताधारी दल के संरक्षण में हैं।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2,495 उम्मीदवारों के हलफ़नामों अवलोकन से पता चलता है कि कुल 363 सांसदों और विधायकों ने अपने ख़िलाफ़ आपराधिक मामले घोषित किये हैं। इन 363 में 83 सदस्यों (सांसद और विधायक दोनों) के साथ भाजपा सूची में शीर्ष राजनीतिक दल है, जिनके सदस्य ने उनके ख़िलाफ़ आपराधिक आरोप घोषित किये हैं। भाजपा के चार केंद्रीय मंत्रियों पर अपहरण, डकैती और मौत या गम्भीर चोट पहुँचाने के प्रयास जैसे संगीन मामले दर्ज हैं।
दूसरी ओर, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी कमज़ोर पड़ा है। याद रहे, कश्मीर में धर्म आधारित आतंकवाद एवं कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन का मुद्दा उठाकर भाजपा ने देश भर से समर्थन बटोरा। अब भाजपा ही आतंकवाद एवं कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याओं को धार्मिक नज़रिये से न देखने की सलाह दे रही है। इसके दो ही अर्थ हैं- पहला, या तो आप तब झूठ बोल रहे थे या अब झूठ बोल रहे हैं। दूसरा, आप अनैतिक-सिद्धांतविहीन दल हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी कह और कर सकते हैं। सार्वजनिक जीवन में कांग्रेस नेताओं के जिस अहंकारपूर्ण रवैये एवं उसके शीर्ष नेतृत्व के स्वेच्छाचार की सदैव आलोचना होती रही है। आज यही विकृति भाजपा नेतृत्व में है, बल्कि कहीं अधिक असभ्य रूप में है।
साथ ही आज राज्य से लेकर केंद्र तक भाजपा में ऐसे नेताओं की बहुलता है, जो अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सरकार से लेकर पार्टी पदों पर जमे हुए हैं। ऐसे और भी गम्भीर मसले हैं, जिनके आधार पर विपक्ष सरकार के विरुद्ध गभीर विमर्श और आन्दोलन पैदा कर सकता था। जिन मुद्दों के सहारे आज के विपक्ष और बीते कल के सत्ता पक्ष की कटु आलोचना करके भाजपा ने देश में अपना राजनीतिक रसूख़ पैदा किया, वे सारे दुर्गुण आज ख़ुद उसके अंदर मौज़ूद हैं। फिर भी विपक्ष अगर जनता के समक्ष इसे आन्दोलित रूप में उपस्थित नहीं कर पा रहा है, तो यह उसकी कमज़ोरी है।
वास्तव में विपक्ष की अपनी दुनिया है। उसे सरकार में बढ़ती नौकरशाही की दादागीरी के विरोध से कोई मतलब नहीं। विपक्ष विरोध करेगा, तो हर घर झण्डा अभियान का। वह सेना के अभियानों के दावों पर सवाल उठाएगा। भारतीय संस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत को अपमानित करेगा। उसे यह तक नहीं पता की सरकार का विरोध करते-करते, वह राष्ट्रविरोध की सीमा तक पहुँच जाता है। अगर मदरसों के सर्वे से उनमें व्याप्त अनियमितता दूर की जा सके और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा मिल सके, तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आज बिलकिस बानो मामले में धार्मिक आधार पर पक्ष बन जाने के कारण ही यही है कि विपक्ष को गोधरा के पीडि़तों के परिवारों के दर्द याद नहीं है। ऐसी एक तरफ़ा तक़रीरें समाज में विखंडन पैदा करेंगी और सत्ताधारी दल को लाभ भी पहुँचाएँगी।
विपक्ष जनता से आन्दोलित होने की अपील कर रहा है; लेकिन ख़ुद के स्वार्थानुकूल। जो कांग्रेस गाँधी परिवार के विरुद्ध ईडी की जाँच रुकवाने के लिए सडक़ों पर उतर आया, वह बच्चों द्वारा अग्निपथ योजना के विरोध के समय मात्र ट्वीटर और न्यूज चैनलों पर बयानबाज़ी कर रहा था। असल समस्या ये हैं कि विकास की दौड़ में भारतीय राजनीति विलासी हो गयी है। एक भी दिन विपक्षी ख़ेमे से प्रधानमंत्री पद की महत्त्वकांक्षा पाले बैठा कोई नेता बेरोज़गारी, सरकारी रिक्तियों पर कुंडली मारे बैठी केंद्र एवं राज्य सरकारों, प्रशासनिक अधिकारियों की बेलगाम कार्यशैली, कमीशनख़ोरी जैसे मुद्दों को लेकर सडक़ पर उतरा? कोई धरना-प्रदर्शन या अनशन किया? फिर जनता आपके साथ कैसे खड़ी हो?
बस सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के पास धर्म-जाति का झुनझुना है। दोनों चाहते हैं कि बस इसे बजाएँ और जनता इसमें उलझी रहे। विपक्ष ने लोकतंत्र के संघर्ष को निजी लड़ाई में तब्दील कर दिया है। यही वजह है कि जनता भी विपक्ष के समर्थन में नहीं आ रही। अगर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो विपक्ष को जाँच का निर्भीक होकर सामना करना चाहिए। लेकिन इनकी बेचैनी जनता के अंदर संदेह उत्पन्न करती है। हालाँकि सरकार निरंतर शुचिता स्थापित करने का दावा करती रही है और ऐसा करती हुई दिखना भी चाहती है। इसीलिए ईडी और सीबीआई के छापे तथा धर-पकड़ अभियान जारी हैं। लगातार नेताओं एवं नौकरशाहों के भ्रष्टाचारों की जाँच हो रही है।
एक तरफ़ मोदी-शाह जैसे ज़मीनी राजनीति एवं सांगठनिक अनुभव में तपे-परखे लोग हैं और दूसरी तरफ़ राहुल गाँधी से लेकर अखिलेश यादव तक की वंशवाद-परिवारवाद से उपजे नेताओं की फ़ोज है। चूँकि इन्हें बिना संघर्ष के, बिना ज़मीनी हक़ीक़त के पार्टी की सत्ता मिली है। अपरिपक्वता से भरे, पीडि़त ये नेता कब क्या बोल देंगे? किसके बारे में बयान दे देंगे? ये बता पाना बड़ा मुश्किल है। इससे भाजपा नेताओं को उपहास करने और गम्भीर मुद्दों को हल्के स्तर की परिचर्चा में तब्दील कर देने का अवसर मिल जाता है। और उन्हें यह ग़लतफ़हमी हों जाती है कि इसी से जनता सतही बातों में उलझकर रह जाएगी। परन्तु अब इससे काम चलने वाला नहीं है।
राहुल गाँधी ने भारत जोड़ो यात्रा पूरी कर ली। भाजपा विरोधी राजनीतिक-सामाजिक एवं मीडिया वर्ग ने इसे $खासी तरजीह दी। किन्तु यह यात्रा भी धार्मिक एकता, सद्भावना, भाईचारे के वही पुराने मुद्दे पर आधारित थी। केवल आज़ादी के संघर्ष में कांग्रेस की भागीदारी, नानाजी-दादीजी ने देश को आज़ाद कराया और उसके लिए जान दी। ‘हमारे पिताजी लोहिया के उत्तराधिकारी थे;’ और असली समाजवादी हमारी ही पार्टी है। ‘हमारे पिताजी अगड़ा के ख़िलाफ़ पिछड़ा-दलित का लड़ाई लड़े और सामाजिक न्याय के मसीहा थे।’ इत्यादि रटी हुई बातें; बस। विपक्ष के कर्णधारों को ये समझना ही होगा कि पुराने प्रतीकों-नारों से आधुनिक लोकतंत्र का संघर्ष नहीं किया जा सकता।
ऊपर से विपक्ष में उम्मीदों को पलीता लगाने वाले नेताओं की कमी नहीं है। कभी रामचरित मानस का अपमान, तो कभी जातिवाद के आश्रय से 21वीं सदी के लोकतंत्र के सिरमौर बनने का ख़्वाब मूर्खतापूर्ण है। विपक्ष अपने मनुवाद-सामंतवाद के पुरातन नारे से निकल ही नहीं पा रहा है। और ऐसी तक़रीरें स्वयंभू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उन्नायक सत्तारूढ़ दल के समर्थन में और इज़ाफ़ा करती हैं तथा उसकी चुनावी रणनीति के भी अनुकूल है। सत्ता में टिकने की इच्छुक कोई भी सरकार राष्ट्रवाद या धर्म के आधार पर लामबंदी करने का प्रयास करेगी ही करेगी। विपक्ष को चाहिए कि वह सत्तापक्ष इस लामबंदी को ध्वस्त करने का प्रयास करे। लेकिन विपक्षी ख़ेमों को अपना घर बचाने के लाले पड़े हैं। वे अपने आतंरिक संकट से ही नहीं उबर पा रहे हैं, तो सत्तारूढ़ दल को क्या चुनौती देंगे? अभी सपा में चाचा-भतीजे की लड़ाई थमी नहीं कि उधर जेडीयू में कुशवाहा ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। मायावती ने कांशीराम के दौर के अपने साथियों को निपटाते-निपटाते पार्टी को ही निपटाने के कगार पर पहुँचा दिया है। शिवसेना अपना बड़ा काडर गँवा चुकी है। कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की नाकामी एवं लगातार अपने सिपहसालारों का पलायन के कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
ऊपर से विपक्षी गोलबंदी के नेतृत्व का संकट ही सुलझ नहीं पा रहा। रोज़ एक नया दावेदार सामने आ जाता है। और यह लड़ाई तब तक नहीं रुकने वाली, जब तक ‘किसकी नाक ज़्यादा ऊँची’ और ‘किसकी कॉलर ज़्यादा सफ़ेद’ के विवाद का पूर्ण समाधान नहीं होगा। समझने की आवश्यकता है कि विपक्ष को अगर जीवंत जनतंत्र का प्रतिभागी बनना है, तो उसे सरकार के आगे बड़ी लकीर खीचनी पड़ेगी। वर्तमान सत्तारूढ़ दल का एकछत्र प्रभाव-प्रसार उसकी विजय से अधिक विपक्ष की पराजय है। और उससे बड़ी बात यह है कि ऐसे नैतिकरूप से पतित विपक्ष के कारण सरकार से नाराज मतदाता भी विकल्पहीन हैं। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए भी पुर्नमूल्यांकन का समय है। अब उसे अपने अनुत्पादकता के विषय में गम्भीर विवेचना करनी चाहिए।
नोबेल एवं पुलित्जर पुरस्कार विजेता अमेरिकी लेखिका टोनी मॉरिसन लिखती हैं- ‘अगर तुम सि$र्फ तभी ऊँचे क़द के लगते हो, क्योंकि कोई अपने घुटनों के बल खड़ा है, तो तुम्हारी समस्या गम्भीर है।’ वर्तमान सत्ताधारी दल को अपने वर्तमान एकाधिकार के युग में अपनी श्रेष्ठता का भान है, किन्तु यह उसका अल्पकालिक भ्रम है। जिस दिन भी जनता को अपनी समस्याओं के केंद्र से कोई सशक्त ईमानदार आन्दोलन उभरता दिखेगा और वो साथ खड़ी हो जाएगी, तब सत्तारूढ़ दल का अहंकार भी अतीत का हिस्सा बन जाएगा।
(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)
मनरेगा में बढ़ी आवंटन और व्यय के बेमेल होने की आशंका
ग़रीबी उन्मूलन की प्रमुख योजना महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के केंद्रीय बजट में 2023-24 में इसके परिव्यय (बजट) को काफ़ी ज़्यादा घटाकर 60,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। प्रमुख ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम के लिए यह प्रावधान छ: वर्षों में सबसे कम है। याद रहे मनरेगा के लिए केंद्र ने 2020-21 में 1,11,170 करोड़ रुपये, 2021-22 में 98,468 करोड़ रुपये और 2022-23 में 89,400 करोड़ आवंटित किये थे।
भले ही मोदी सरकार ने अपनी दलीलें दी हैं; लेकिन वो मूल रूप से सामान्य स्थिति लौटने या लौट आने की धारणा पर टिकी हैं। हालाँकि प्रधानमंत्री किसान योजना, जिसके तहत 11 करोड़ से अधिक कृषि परिवारों को 6,000 रुपये वार्षिक आय सहायता प्राप्त होती है, परिव्यय को 2022-23 के 60,000 करोड़ रुपये के स्तर पर बनाये रखा गया है।
आश्चर्यजनक रूप से बजट 2023-24 में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के लिए आवंटन में भारी कटौती की गयी है। इसे चालू वित्त वर्ष में कार्यक्रम के संशोधित अनुमान से 32 फ़ीसदी से अधिक कम कर दिया गया। सरकार ने 31 जनवरी, 2023 को ग्रामीण रोज़गार दर 6.5 फ़ीसदी होने के बावजूद मनरेगा के लिए बजटीय आवंटन घटा दिया।
माना जाता है कि प्रति व्यक्ति आय में लाभ होता है; लेकिन बजट आवंटन की तुलना में अधिक व्यय को देखते हुए कम-से-कम 15 राज्यों में वर्तमान में ऋणात्मक शेष है। उच्चतम ऋणात्मक शेष राशि राजस्थान के मामले में 620 करोड़ है, इसके बाद उत्तर प्रदेश में यह 323 करोड़ है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लगभग 2,000 करोड़ रुपये के बक़ाया भुगतान के लिए तत्काल धनराशि जारी करने की माँग की थी। पत्र में मज़दूरी के भुगतान की 848 करोड़ और सामग्री की 1,102 करोड़ रुपये की देनदारी बक़ाया होने का ज़िक्र है।
देखा जाए, तो मनरेगा ने ग्रामीण मज़दूरी और आय को बढ़ाया है और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे का भी निर्माण किया है और देश की ग्रामीण आबादी को बहुत ज़रूरी रोज़गार प्रदान किया है। हालाँकि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन प्रदान करने में असमर्थ रहा है, क्योंकि धन आवंटन का बढ़ती मुद्रास्फीति और बढ़ती माँग के साथ तालमेल नहीं रखा गया है। सही मायने में श्रम प्रवासन (मज़दूरों का बाहर जाना) कम हो गया है, जिसके हिसाब से गारंटीशुदा रोज़गार प्रदान करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता होगी।
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम एक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिनों के मज़दूरी रोज़गार की गारंटी देने के लिए बनाया गया एक माँग-संचालित कार्यक्रम है, जिसमें अकुशल कार्य के लिए तैयार वयस्कों वाले प्रत्येक ग्रामीण परिवार को शामिल किया गया है। यह योजना 2 फरवरी, 2006 को शुरू की गयी थी और इसे अक्सर पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा एक कार्यक्रम के रूप में उजागर किया गया था, जिसने ग्रामीण आबादी को क़ानूनी रूप से न्यूनतम आजीविका सुरक्षा की गारंटी दी, ग्रामीण मज़दूरी बढ़ाने में योगदान दिया, संकटग्रस्त प्रवासन को कम किया और कमज़ोर लोगों को सशक्त बनाया।
वित्तीय वर्ष 2022-23 में अब तक लगभग 6.49 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत काम की माँग की, जबकि 6.48 करोड़ की पेशकश की गयी और उनमें से 5.76 करोड़ ने इसका लाभ उठाया। साल 2019-20 के दौरान मनरेगा को 60,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे। हालाँकि यह उम्मीद की गयी थी कि धन आवंटन में उचित वृद्धि होगी। हालाँकि वास्तव में आवंटन में कमी आयी थी। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान केंद्र सरकार के फ्लैगशिप प्रोग्राम को 61,084 करोड़ (संशोधित अनुमान) मिले थे।
इसके बाद मनरेगा के लिए बजटीय आवंटन 2014-15 में 34,000 करोड़ से बढक़र 2018-19 में 61,084 करोड़ हो गया था। साल 2014-15 को छोडक़र अब तक के सभी वर्षों में वास्तविक व्यय स्वीकृत बजटीय आवंटन से अधिक रहा है। ग़ैर-लाभकारी केंद्र फॉर बजट एंड गवर्नेंस एकाउंटेबिलिटी के अनुसार, मुद्रास्फीति के लिए समायोजित किये जाने पर आवंटन में वास्तव में गिरावट आयी है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनरेगा योजना के लिए केंद्र हमेशा धन की कमी हुई, क्योंकि जनवरी 2020 तक राज्यों द्वारा आवंटित धन का 96 प्रतिशत से अधिक पहले ही समाप्त हो चुका था। महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिए पाँच वर्षों में पहली बार पिछले वर्ष के वास्तविक व्यय से कम बजट आवंटित किया गया था। इस वित्त वर्ष का बजट पिछले वित्त वर्ष 2019-20 के लगभग बराबर ही है। वत्त वर्ष 2019-20 में मनरेगा को 61,084 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे।
इसकी स्थापना के बाद से वास्तविक व्यय सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए इस योजना के लिए स्वीकृत बजटीय आवंटन से अधिक रहा है। उदाहरण के लिए 2011-12 के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए बजट आवंटन 31,000 करोड़ था; लेकिन वास्तविक व्यय 37,072.82 करोड़ था। इसी तरह 2012-13 के लिए आवंटन 30,387 करोड़ रुपये था; लेकिन ख़र्च 39,778.29 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान योजना को 33,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे; लेकिन व्यय 38,511.10 करोड़ था।
वित्त वर्ष 2014-15 के लिए आवंटन 36,025.04 करोड़ रुपये के व्यय के मुक़ाबले 33,000 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा। वित्त वर्ष 2016-17 के लिए इस योजना के लिए बजट बढ़ाकर 48,220.26 करोड़ रुपये कर दिया गया था; लेकिन वास्तविक व्यय 57,946.72 करोड़ रुपये हो गया। एक साल बाद वित्त वर्ष 2017-18 में आवंटन घटकर 48,000 करोड़ हो गया। वित्त वर्ष 2018-19 में बजट आवंटन बढ़ाकर 61,084 करोड़ (संशोधित अनुमान) किया गया था। इन वर्षों के लिए व्यय विवरण अभी तक उपलब्ध नहीं है; लेकिन तथ्य यह है कि अधिकांश धनराशि पहले ही समाप्त हो चुकी है, जो दर्शाता है कि फंड की कमी ने योजना को मुश्किल में डाला है।
वास्तव में मुद्रास्फीति के लिए समायोजित किये जाने पर आवंटन में गिरावट आयी है। तथ्य यह है कि कुल बजट में इसका हिस्सा घट रहा था। कहा जाता है कि कई बार आँकड़े कहानी नहीं बयाँ करते हैं। महात्मा गाँधी नरेगा ग्रामीण भारत को एक अधिक उत्पादक, न्यायसंगत और जुड़े हुए समाज में बदल रहा है। इसने पिछले तीन साल में प्रत्येक वर्ष लगभग 235 करोड़ व्यक्ति दिवस प्रदान किये हैं। इस साल भी यह लगभग समान ही रहेगा, जिससे यह स्थायी आजीविका के लिए टिकाऊ सम्पत्ति के साथ मज़दूरी रोज़गार पर लगातार उच्च प्रदर्शन का चार साल का हो जाएगा।
सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण आवश्यकता अब वेतन भुगतान, सम्पत्ति निर्माण और सामग्री के भुगतान में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। यही कारण है कि सम्पत्तियों की 100 प्रतिशत जियो-टैगिंग, बैंक खातों को आधार से जोडऩे, सभी मज़दूरी के लिए आईटी / डीबीटी हस्तांतरण और भौतिक भुगतान और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) आधारित कार्यों की योजना के लिए प्रयास शुरू किये गये थे। इरादा यह था कि काम सार्वजनिक डोमेन में दिखायी दे और लाभार्थी अपने सत्यापित खातों में भुगतान प्राप्त करें।
टिकाऊ सम्पत्तियों के सृजन का मुद्दा बहुत महत्त्वपूर्ण था। ग्राम पंचायत स्तर पर 60:40 अनुपात को अनिवार्य किया गया था, जिसके कारण अक्सर ग़ैर-उत्पादक सम्पत्तियाँ बनायी जाती थीं, क्योंकि उस ग्राम पंचायत में 60 प्रतिशत अकुशल मज़दूरी श्रम पर ख़र्च किया जाना था। बिना 60:40 सिद्धांत को कमज़ोर किये, पहला बड़ा सुधार ग्राम पंचायत स्तर के बजाय ज़िला स्तर पर 60:40 की अनुमति देना था। इस सुधार के बावजूद अकुशल मज़दूरी श्रम पर कुल व्यय का अनुपात 65 प्रतिशत से अधिक बना हुआ है। इसने आय उत्पन्न करने वाली टिकाऊ सम्पत्तियों पर एक नया प्रयास किया है। यह लचीलेपन को केवल उन सम्पत्तियों को करने की अनुमति देता है, जो उत्पादक हैं। क़रीब 60 फ़ीसदी से अधिक संसाधनों को प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर ख़र्च किया जाता है, जो खेती के तहत क्षेत्र और फ़सलों की उपज दोनों में सुधार करके किसानों को उच्च आय सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। यह भूमि की उत्पादकता में सुधार और पानी की उपलब्धता में वृद्धि करके किया जाता है।
एनआरएम के तहत किये गये प्रमुख कार्यों में चेक डैम, तालाब, पारम्परिक जल निकायों का नवीनीकरण, भूमि विकास, तटबंध, फील्ड बंड, फील्ड चैनल, पौधरोपण, कंटूर ट्रेंच आदि शामिल हैं। पिछले चार साल के दौरान इन हस्तक्षेपों से 143 लाख हेक्टेयर भूमि लाभान्वित हुई है। मनरेगा के तहत बड़े पैमाने पर जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और सिंचाई के काम शुरू किये गये हैं और पूरे किये गये हैं।
महत्त्वाकांक्षी मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की जीवन रेखा हो सकती थी, क्योंकि इसने ग्रामीण मज़दूरी को बढ़ाया है। ग्रामीण बुनियादी ढाँचे का निर्माण किया है और देश की ग्रामीण आबादी को बहुत ज़रूरी रोज़गार प्रदान किया है। हालाँकि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक स्थायी प्रोत्साहन प्रदान करने में असमर्थ रहा है, क्योंकि धन आवंटन बढ़ती मुद्रास्फीति के साथ तालमेल नहीं बैठा पाया है।
सरकार और उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना की शिकायतें आये दिन करते रहते हैं। अब दिल्ली में नगर निगम के मेयर के चुनाव में अड़चन को लेकर बवाल मचा हुआ है। सच तो यही है कि भाजपा किसी भी हाल में अपना मेयर चुनना चाहती है, जिसके चलते वह इसे नगर निगम चुनाव की तरह ही लम्बे समय तक लटकाना चाहती है।
पर दुर्भाग्य यह है कि भाजपा नेता चुनाव न होने देने का आरोप आप पर लगा रहे हैं। वहीं आप नेता इसे लेकर देश की शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाने से लेकर सडक़ पर उतरने तक के लिए ख़ुद को मजबूर बता रहे हैं। दिल्ली की जनता को मेयर चुनाव से जैसे कोई लेना-देना ही नहीं है। जनता चुपचाप यह तमाशा देख रही है। कुछ लोग ज़रूर इस पर चर्चा तथा बहस कर रहे हैं, जिसमें दोनों पक्षों के लोग हैं। भाजपा के पक्ष के भी और आप के पक्ष के भी।
दिल्ली को दिल्ली की जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार ही ठीक से नहीं चला पा रही है। यह सब केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण हो रहा है। उप राज्यपाल की अनुमति के बिना कोई भी निर्णय न ले पाने में असमर्थ दिल्ली सरकार केंद्र सरकार के सौतैले छोटे भाई की तरह अकेली और असहाय दिख रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा दूसरे आप नेता इसका दोष केंद्र दिल्ली नगर निगम को मेयर न मिलने से दिल्ली में नगर निगम के कई महत्त्वपूर्ण फ़ैसले रुके हुए हैं। बजट भी रुका हुआ है। नगर निगम के कई कार्य रुके हुए हैं। कई कार्य धीमी गति से चल रहे हैं। कई कार्यों का बजट ख़त्म हो रहा है। देखने में आया है कि जनता की चिन्ता किये बिना अपनी-अपनी चिन्ता में लगी राजनीतिक पार्टियाँ किसी भी हाल में सत्ता चाहती हैं। भाजपा इस दौड़ में सबसे आगे है।
दिल्ली में नगर निगम के मेयर का चुनाव न हो पाने के चलते डिप्टी मेयर तथा स्थायी समिति के छ: सदस्यों का चुनाव भी रुका हुआ है। तीसरी बार चुनाव न हो पाने से परेशानी उन्हें नहीं है, जो सत्ता में हर दिन मलाई काट रहे हैं, बल्कि उन्हें है, जो हर दिन मेहनत करके आजीविका चलाते हैं। मेयर चुनाव को लेकर सदन की तीसरी बैठक बेनतीजा रहने का अर्थ है- दिल्ली के उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना की बड़ी नाकामी; जो कि दिल्ली को अपने दम पर चलाने का ठेका लेकर बैठे हैं। जब एक पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ अपना मेयर चुनने की स्थिति में हैं, तो उसे क्यों मेयर नहीं चुनने दिया जा रहा है, यह बात गले से नहीं उतरती। पर उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना के गले यह बात कैसे उतर रही है कि उनके कार्यकाल में नैतिकता को ताक में रखकर एक बड़ी पार्टी अपनी ताक़त का फ़ायदा उठाकर दूसरी ऐसी किसी पार्टी को उठने नहीं देना चाहती, जो चुनाव जीतकर सत्ता में आयी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि उप राज्यपाल निष्पक्ष न होकर सबसे ताक़तवर उस सत्ता के साथ ही खड़े हैं, जिसने उन्हें चुना है। फिर यह पद संवैधानिक कैसे हुआ और उसकी संवैधानिक गरिमा कहाँ बची?
पीठासीन अधिकारी को भी पहले चुने हुए एल्डरमैन को वोट डालने का अधिकार देने की क्या ज़रूरत पड़ी है? पीठासीन अधिकारी को भी निष्पक्ष रहकर जनता द्वारा चुने गये पार्षदों को वोट डालने का पहला मौक़ा देना चाहिए। मेयर, डिप्टी मेयर और स्थायी समिति के छ: सदस्यों अर्थात् तीनों ही चुनाव एक साथ कराने के आदेश देने का क्या अर्थ हो सकता है? इसी को लेकर आम आदमी पार्टी के पार्षद मौखिक तथा लिखित विरोध करते रहे हैं, जिसे भाजपा नेता आप द्वारा ही चुनाव न होने देने के रूप में पेश कर रहे हैं। भाजपा नेता आप नेताओं को इसे लेकर अदालत से सज़ा दिलाने की बात भी कर रहे हैं। उन्हें सदन से बाहर करने की माँग भी करते हैं। पर जब भाजपा पार्षद हंगामा करते हैं, तो सदन स्थगित कर दिया जाता है।
समझ से परे है कि तीन-तीन बार मतदान की बारी आयी पर मेयर चुनाव नहीं हो सके। मेयर चुनाव में पहले ही देरी के बाद जब छ: जनवरी को बैठक हुई, तो भी मनोनीत सदस्यों द्वारा पहले वोटिंग करने को लेकर ही हंगामा हुआ और चुनाव नहीं हो सका। आप का कहना है कि मनोनीत सदस्य वोटिंग नहीं कर सकते, जबकि भाजपा का कहना है कि यह उनका संवैधानिक अधिकार है।
भाजपा ने इन सदस्यों के माध्यम से लगभग बहुमत के क़रीब ख़ुद को लाकर खड़ा कर लिया है। पहले मनोनीत सदस्यों को वोटिंग करने का अधिकार नहीं होता था। दिल्ली नगर निगम में मनोनीत पार्षद अर्थात् एल्डरमैन की तैनाती दिल्ली नगर निगम एक्ट-1957 के तहत होती है। दिल्ली उच्च अदालत ने 27 अप्रैल 2015 में एल्डरमैन को वार्ड कमेटी के चुनाव में वोटिंग का अधिकार दिया था। यहीं से विवाद शुरू होता है। दिल्ली नगर निगम एक्ट-1957 किसी भी रूप में राजनीतिक पार्टियों के सदस्यों को मनोनीत पार्षद के तौर पर चुनने से नहीं रोकती। मनोनीत पार्षद पूरे पाँच साल दिल्ली नगर निगम में काम भी करते हैं। पर अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि चुने हुए एल्डरमैन दिल्ली उच्च अदालत ने मेयर के चुनाव में वोटिंग का अधिकार है या नहीं? उन्हें वार्ड कमेटी में वोटिंग का अधिकार तो दिया है।
मेयर चुनाव से पहले दिल्ली के उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना जिन 10 एल्डरमैन को मनोनीत कर चुके हैं, उनके नाम विनोद कुमार, लक्ष्मण आर्य, मुकेश मान, राजकुमार भाटिया, मोहन गोयल, महेश सिंह तोमर, संजय त्यागी, कमल जीत सिंह, रोहताश कुमार और राजपाल राणा हैं। आप नेता कह रहे हैं कि उपराज्यपाल ने मेयर पद के चुनाव से पहले दिल्ली नगर निगम के लिए 10 एल्डरमैन चुनने में नियमों की धज्जियाँ उड़ायी हैं।
आप नेता आतिशी कह रही हैं कि सभी एल्डरमैन भाजपा के कार्यकर्ता हैं, जिनके नाम दिल्ली सरकार को सूचित किये बिना भाजपा द्वारा सीधे उपराज्यपाल को भेज गये थे। अब मेयर चुनाव को लेकर हालात इतने बिगड़ गये हैं कि यह आसान नहीं रह गया है। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि भाजपा हर हाल में अपना मेयर बनाना चाहती है, जिसके लिए वह किसी भी सीमा तक जाने से नहीं चूकने वाली। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना तो यहाँ तक है कि भाजपा किसी भी हाल में नगर निगम नहीं छोड़ेगी, जिसके लिए वह आप पार्षदों को भी तोडऩे के जुगाड़ में लगी है।
इस मामले को लेकर हंगामा भी इस क़दर बढ़ गया है कि मेयर चुनाव को लेकर होने वाली बैठकों में भाजपा और आप पार्षदों में ख़ूब नोक-झोंक होती है। झगड़े के हालात बन जाते हैं। ऐसे में यह ज़िम्मेदारी पीठासीन अधिकारी और दिल्ली के उप राज्यपाल की बनती है कि वे मिलकर मामले को सँभालें और नैतिकता के नाते उचित तरीक़े से मेयर का चुनाव होने दें। यह उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी भी है। दोनों को ही जनादेश की अवहेलना करने और होने देने से बचना चाहिए। प्रश्न यह है कि अगर आप की जगह भाजपा के पाले में बहुमत के लायक सीटें नगर निगम चुनाव में आयी होतीं, तो क्या वह अब तक मेयर चुनने से चूकती? क्या तब भी भाजपा नेता किसी दूसरी पार्टी के हस्तक्षेप को बर्दाश्त कर पाती? नहीं, तो वे अब अनैतिकता पर क्यों उतरे हुए हैं?
यह कम शर्मनाक नहीं है कि मेयर के चुनाव में कोई बलवा खड़ा न हो जाए, इसके लिए का$फी संख्या में पुलिस के साथ अर्धसैनिक बल के जवानों तथा सिविल डिफेंस वालंटियर्स और कमांडो को तैनात करना पड़ रहा है। यह सदन की गरिमा के ख़िलाफ़ तो है ही, उप राज्यपाल की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न है। 26 जनवरी को आप महापौर चुनाव कराने को लेकर शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर चुकी है। भाजपा नेता आप नेता तथा दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को घेरने में लगे हैं। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कह रहे हैं कि संविधान के मुताबिक मनोनीत पार्षदों के पास वोटिंग का अधिकार नहीं है। दिल्ली नगर निगम एक्ट में भी साफ़ लिखा है कि मनोनीत पार्षदों के पास वोटिंग का हक़ नहीं होगा।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भी इस बात को साफ़ कर दिया है मनोनीत पार्षदों को मतदान करने का अधिकार नहीं है। अब देखना होगा कि भाजपा सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को भाजपा मानती है या नहीं।
बिहार में लोकसभा चुनाव से पहले जातिगत जनगणना की शुरुआत करने को बड़ा सियासी दाँव माना जा रहा है, जिससे अन्य राज्यों में भी आगामी लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा फिर गर्मा सकता है। ज़ाहिर है कि नीतीश कुमार और लालू यादव हमेशा इसके पक्ष में रहे हैं। जानने की कोशिश करते हैं कि आख़िर क्या है जातिगत जनगणना? और इसके सियासी मायने क्या हैं? जो बिहार की सियासत और इसके चुनावी समीकरणों को गर्म करने का माहौल बना रहे हैं।
दरअसल भारत में पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की आबादी कितनी है, इसका आज तक कोई ठोस प्रमाण फ़िलहाल नहीं है। भारत में जातिगत जनगणना का अपना इतिहास रहा है। जब अंग्रेज भारत आये, तो उन्होंने जाति आधारित जनगणना शुरू की थी, जो सन् 1931 तक जारी रही। हालाँकि सन् 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा एकत्रित किया तो गया; लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया गया।
केंद्र में कांग्रेस की मनमोहन सरकार के दौरान सन् 2010 में मुख्य विपक्षी दल भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे ने जाति आधारित जनगणना के पक्ष में तर्क देते हुए सदन में सवाल उठाया था कि अगर ओबीसी जातियों की गिनती नहीं हुई, तो उनको न्याय देने में दशकों लग जाएँगे? मज़े की बात तो यह है कि यह तब की बात है, जब कांग्रेस सत्ता में थी और भाजपा विपक्ष में। उस समय गोपीनाथ मुंडे जैसे भाजपा के ओबीसी चेहरों ने ज़ोरशोर से जातीय जनगणना का मुद्दा उठाया था। लेकिन जब भाजपा सत्ता में आयी, तो पार्टी का रुख़ ही बदल गया। जब पिछले महीने संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार से सवाल पूछा गया कि 2021 की जनगणना जातियों के हिसाब से होगी? तो सरकार ने लिखित जवाब दिया, जिसमें कहा गया कि केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी, एसटी) को ही गिना जाएगा। यानी सरकार की ओबीसी जातियों को गिनने की कोई योजना नहीं है। साफ़ है कि केंद्र की सत्ता में जो भी पार्टी आती है, वो जातीय जनगणना को लेकर आनाकानी करने लगती है; और जब विपक्ष में होती है, तो जातिगत जनगणना को मुद्दा बनाती है। हालाँकि लालू यादव जैसे कांग्रेस के सहयोगियों के दबाव में मनमोहन सरकार को जाति जनगणना पर विचार करना पड़ा और सन् 2011 में प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक समिति बनी, जिसने जाति जनगणना के पक्ष में सुझाव दिया। इस जनगणना का नाम ‘सोशियो – इकोनॉमिक एंड कास्ट सेन्सस’ रखा गया। ज़िलेवार पिछड़ी जातियों को गिनने के बाद जातीय जनगणना का डेटा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को दिया गया। उसके बाद भाजपा के सत्ता मे आने कई वर्षों तक इस डेटा की कोई बात नहीं हुई। अब इस डेटा पर फिर सुगबुगाहट शुरू हुई, तो जातीय जनगणना के डेटा वर्गीकरण के लिए एक विशेषज्ञ ग्रुप बनाया गया है। लेकिन इस ग्रुप के रिपोर्ट दिये जाने की जानकारी नहीं मिल पायी है। तो साफ़ है कि कुल मिलाकर भाजपा की मोदी सरकार भी जातिगत आँकड़ों को जारी करना मुनासिब नहीं समझ रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता बिसन ढिंढार नेहवाल कहते हैं कि उसके बाद भी सन् 1951 से सन् 2011 तक की जनगणना तो हुई है; लेकिन उसमें हर बार सिर्फ़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के ही आँकड़े दिये जाते रहे हैं, ओबीसी और दूसरी जातियों को उसमे सम्मिलित नहीं किया जाता है।
हालाँकि सन् 1990 में जब केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) की एक सिफ़ारिश के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 फ़ीसदी आरक्षण देने की सिफ़ारिश की, तो इस फ़ैसले ने भारत, ख़ासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदलकर रख दिया।
ग़ौरतलब है कि मंडल कमीशन ने अपनी सिफ़ारिश में सन् 1931 की जनगणना को ही आधार माना था, जिसके आधार पर भारत में अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की आबादी 52 फ़ीसदी मानी जाती रही है। उसके उपरांत अलग-अलग राजनीतिक पार्टियाँ अपने चुनावी सर्वे और अनुमान के आधार पर इस आँकड़े को अपने चुनावी एजेंडे को पूरा करने के लिए तोड़-मरोडक़र पेश करती रहीं हैं; लेकिन अपने दावे को साबित करने के लिए आज तक कोई भी सियासी दल एक ठोस आधार नहीं बता पाया है। हालाँकि कुछ विश्लेषक इसे बड़ा जोखिम भरा $कदम बताते हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करने से समाज में जातिगत भेदभाव बढ़ जाएगा; लेकिन वो भूल जाते हैं। भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहाँ लोग अलग-अलग जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र, पेशे और व्यवसाय से जुड़े हैं। यह भारत की अनेकता में एकता, संस्कृति एवं राष्ट्रीयता की भावना है, जो समूचे देश को एकसूत्र में बाँधकर रखती है।
भारत का संविधान भी आपको आपका धर्म, व्यवसाय, या क्षेत्र बदलने की आज़ादी देता है; लेकिन सिर्फ़ आपकी जाति है, जिसे आप संवैधानिक रूप से भी नहीं बदल सकते। आज तकनीकी और डिजिटलाइजेशन का दौर है। अर्थव्यवस्था भी डाटा आधरित है। यही डाटा आज कहीं-न-कहीं लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। ऐसे समय में लोगों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए उनकी समाजिक आर्थिक जाति जनगणना (सोशियो इकोनॉमिक ऐंड कास्ट सेंसस) आधारित डेमोग्राफिक सूचनाएँ एकत्रित करना अति आवश्यक हो जाता है। जातिगत जनगणना भी इसी डेमोग्राफिक सूचना का एक हिस्सा है। हालाँकि आज़ादी के बाद से ही जातिगत जनगणना की माँग उठती रही है और पूर्ववर्ती सरकारों, चाहे वो भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई दूसरी पार्टियाँ विपक्ष में रहते हुए, तो सब इस माँग का पुरज़ोर समर्थन करती हैं। लेकिन सत्ता में आते ही इन्हें न जाने क्यों साँप सूँघ जाता है। तमाम नेता और उनके सियासी दल इस मुद्दे पर मौन पड़ जाते हैं। केंद्र सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति को तो इसमें शामिल करती है, परन्तु पिछड़े वर्ग की जातियों को इसमें शामिल नहीं करती, जो उनके साथ एक तरह का सामाजिक अन्याय ही है।
हालाँकि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए राज्य में जातिगत जनगणना प्रारम्भ करायी है। इससे न केवल दलित, पिछड़ों की सही संख्या मालूम चलेगी, बल्कि इससे लोगों के शिक्षा का स्तर, जीवन स्तर, व्यवसाय (निजी, सरकारी, गजटेड, नॉन-गजटेड आदि), कार्य दक्षता, आय के अन्य साधन, परिवार में कितने कमाने वाले सदस्य हैं। एक व्यक्ति पर कितने आश्रित हैं, गाँव में जातियों की संख्या आदि के बारे में भी सटीक जानकारी मिलेगी, जिससे राज्य सरकार को भी अपने राज्यों में सामाजिक आर्थिक समन्वय बैठाकर विकास के नये आयाम स्थापित करने में सहायता मिलेगी। इसके अनुसार, इसे आगे बढ़ाया जा सकेगा। जातीय-सामाजिक-आर्थिक जनसंख्या के अनुसार ही राज्य में योजनाएँ बनायी जाएँगी, समाज के दबे कुचले वंचित पिछड़े वर्गों को भी आगे लाने का मौका मिलेगा। अगर संख्या एक बार पता चल जाए, तो क्या पता ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ को चरितार्थ करते हुए, उस हिसाब से हिस्सेदारी भी दी जाने लगे। जो देश में हुए कितने ही सामाजिक आन्दोलनों का आधार रहा है।
जबसे बिहार में जातिगत जनगणना प्रारम्भ हुई है, इसका असर दूसरे राज्यों में भी दिखने लगा है। विभिन्न विपक्षी दल इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ पार्टियों की सरकारों पर दबाव डालने के लिए रणनीति बनाने लगे हैं, जो कभी भी एक व्यापक आन्दोलन का रूप ले सकता है। इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। परन्तु अन्य राज्यों को भी बिहार जैसे प्रदेश से सबक़ लेते हुए अपने-अपने राज्यों में जातिगत जनगणना प्रारम्भ करवा देनी चाहिए, यह वर्षों से फैली सामाजिक-आर्थिक असमानता दूर करने में एक महत्त्वपूर्ण क़दम होगा।
अमेरिका ने दावा किया है कि चीन कई देशों की जासूसी कर रहा है
हाल में एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि चीन ने भारत और जापान सहित कई देशों में जासूसी ग़ुब्बारों के एक बेड़े को संचालित किया है। चीनी ग़ुब्बारों का यह मामला तब गर्म हुआ, जब अमेरिका और भारत में ये ग़ुब्बारे देखे गये। अमेरिका ने एक हफ़्ते में चार चीनी ग़ुब्बारे को निशाना बनाकर नष्ट कर दिये हैं। चीन का कहना है कि ये ग़ुब्बारे मौसम की जानकारी लेने से जुड़े हैं; लेकिन भारत सहित कई देश मान रहे हैं कि इनका मक़सद जासूसी रहा है।
अमेरिका के अधिकारियों ने बाक़ायदा अपने मित्र देशों और सहयोगियों को चीनी ग़ुब्बारों को लेकर अवगत कराया है। इनमें भारत भी शामिल है। उसने कुल जमा 40 दूतावासों के अधिकारियों को इस बारे में बताया है। इसे मामले की गम्भीरता का अहसास होता है। यह सही है कि अमेरिका और चीन के रिश्ते हाल में काफ़ी ख़राब हुए हैं। लेकिन यह भी सही है कि चीन के इरादों पर गहरी शंका पैदा हो रही है, क्योंकि जिन इलाक़ों में इन चीनी ग़ुब्बारों को देखा गया है, वह संवेदनशील प्रतिष्ठान हैं।
दिलचस्प यह भी है कि ये ग़ुब्बारे साधारण ग़ुब्बारे नहीं हैं। यह ख़ासे बजनी हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में मार गिराये गये चीनी ग़ुब्बारों का वज़न हज़ारों किलो था और पकड़े जाने पर उनमें ख़ुद को नष्ट कर देने के लिए विस्फोटक बँधा था। विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि ये जासूसी ग़ुब्बारे हैं। चीन के संदिग्ध ग़ुब्बारे को फरवरी के पहले हफ़्ते अमेरिका ने अटलांटिक महासागर के ऊपर साउथ कैरोलिना के तट पर एक लड़ाकू विमान द्वारा नष्ट कर दिया था।
अमेरिकी अख़बार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की एक रिपोर्ट, जो अनाम रक्षा और ख़ुफ़िया अधिकारियों से बातचीत पर आधारित है में दावा किया गया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) वायु सेना से संचालित इन जासूसी ग़ुब्बारों (जो वास्तव में निगरानी यान हो सकते हैं) को पाँच महाद्वीपों में देखा गया है। अख़बार ने एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि ये ग़ुब्बारे पीआरसी के निगरानी बेड़े का हिस्सा हैं।
इन्हें निगरानी अभियान चलाने के लिए तैयार किया गया है। इस अधिकारी का कहना है कि चीन ये ग़ुब्बारे भेजकर अन्य देशों की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। हाल के वर्षों में अमेरिका के हवाई, फ्लोरिडा, टेक्सास और गुआम में चार ग़ुब्बारे देखे जाने की बात कही थी। पेंटागन ने तस्वीरें जारी कर दावा किया था कि फरवरी में देखे गये चीनी ग़ुब्बारों के अलावा बा$की तीन चीनी ग़ुब्बारे डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान देखे गये थे। बात सच निकली।
भारत पर भी नज़र
अमेरिका ही नहीं भारत पर भी चीनी जासूसी ग़ुब्बारों की नज़र है। अमेरिका के मोंटाना में जो जासूसी ग़ुब्बारा मार गिराया गया, उसके बाद कुछ हैरान करने वाली जानकारियाँ सामने आयीं। मसलन, यह ग़ुब्बारा अंडमान निकोबार से होकर गुज़रा था। जब यह जानकारी सामने आयी, तो रक्षा विशेषज्ञ परेशान हो गये। अंडमान निकोबार भारत के लिहाज़ से हिंद महासागर में रक्षा के लिए अहम रणनीतिक भूमिका निभाता है। वहाँ भारत की तीनों सेनाओं की मौज़ूदगी है। निश्चित ही यह माना जा रहा है कि चीन भारत की सेना की जासूसी भी कर रहा है।
बहुतों को जानकारी नहीं होगी कि अंडमान निकोबार कमांड इकलौती कमान है, जहाँ भारत की तीनों सेनाएँ मौज़ूद हैं। अंडमान भारत की दृष्टि से बहुत अहम द्वीप और मार्ग है, जहाँ से भारत का ज़्यादातर व्यापार होता है। चीन इस रास्ते को रोकने का षड्यंत्र करता रहा है, इसके बावजूद भारत ने कभी इस रास्ते से व्यापार बन्द नहीं किया।
भारत ने तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान की शुरुआत साल 2001 में की थी। इसका मक़सद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक ज़रूरतों को ताक़त देना था। हाल के महीनों में देखा गया है कि चीन की नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में ख़ुद को काफ़ी सक्रिय। वहाँ कई बार चीनी पनडुब्बियाँ दिखी हैं। जिस तरह चीन हिंद महासागर में अपनी शक्ति बढ़ा रहा है उसे देखते हुए भारत ने इसे काउंटर करने के लिए मैरीटाइम सर्विलांस और क्षमताओं को बढ़ाया है।
अब चूँकि अमेरिका में देखे गये चीन के जासूसी ग़ुब्बारे को पहले अंडमान निकोबार में देखा गया था, यह साफ़ हो गया है कि चीन कुछ शरारत कर रहा है। इस गुबारी का आकर इतना बड़ा था कि पोर्ट ब्लेयर में 6 जनवरी को आम लोगों तक ने इसे ऊँचाई पर उड़ते हुए देखा था। इससे कुछ महीने पहले की बात करें, तो दिसंबर 2021 में अंडमान निकोबार कमांड ने तीनों सेनाओं वाला बड़ा युद्धाभ्यास किया था।
निश्चित ही चीन इस इलाक़े में भारतीय कमांड की गतिविधियों की टोह लेना चाहता होगा। भारतीय सेनाओं की अंडमान में तैनाती से निश्चित ही चीन में बेचैनी रही है। इस युद्धाभ्यास की वीडियो कमांड की तरफ़ से सोशल मीडिया पर शेयर की गयी थीं, जिसमें भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड हथियारों के साथ युद्धाभ्यास कर रही थी।
पोर्ट ब्लेयर में देखे गये ग़ुब्बारे की फोटो वहाँ के लोगों ने सोशल मीडिया पर शेयर की थीं। एक स्थानीय न्यूज पोर्टल की रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो वह ग़ुब्बारा बिलकुल वैसा ही था जैसा अमेरिका में मार गिराया गया। इस ग़ुब्बारे का आकार और अपारदर्शी मटेरियल और सोलर पैनल्स, अंडमान में नज़र आये ग़ुब्बारे जैसा ही बताया गया है। अमेरिकी के एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि चीन का यह जासूसी ग़ुब्बारा, दक्षिण एशिया में भी दिखा है। उनके मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी हाल के वर्षों में ऐसे ग़ुब्बारे भेज चुकी है और यह कई देशों, जिनमें पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और यूरोप के पाँच महाद्वीपों के देश शामिल हैं, में दिखे हैं।
अमेरिका सक्रिय
चीनी ग़ुब्बारों को लेकर अमेरिका काफ़ी सक्रिय है। अमेरिका ने एफ-22 जेट फाइटर उसके पीछे लगाकर न केवल चीनी ग़ुब्बारे को मार गिराया, बल्कि मित्र देशों को इसे लेकर एकजुट किया है। भले अमेरिका की कार्रवाई से चीन ग़ुस्से में हो, अमेरिका को इसकी परवाह नहीं है। अमेरिका ड्रैगन की लगातार पोल खोल रहा है। अमेरिका ने दावा किया है कि चीनी जासूसी ग़ुब्बारा था और 200 फुट ऊँचा था। ज़ाहिर है यह ग़ुब्बारा नाम का ही था और वास्तव में एक बड़े यात्री विमान के बराबर वज़न का पेलोड ले जा रहा था।
इसे लेकर विशेषज्ञों का मत है कि इस ग़ुब्बारे में विस्फोटक भी थे, ताकि पकड़े जाने पर उसे नष्ट किया जा सके। अमेरिका नौसेना इसकी जाँच कर रही है। पहले ग़ुब्बारे के मलबे की जाँच की गयी है और उसमें क्या उपकरण थे, इसे लेकर भी कुछ जानकारियाँ पेंटागन के सामने आयी हैं। पेंटागन पुष्टि कर चुका है कि ग़ुब्बारों में विस्फोटक हो सकता है। अमेरिका अब ग़ुब्बारा काण्ड से चीन के पूरे जासूसी नेटवर्क की जानकारी जुटा रहा है। ज़ाहिर है चीन के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं है।
अमेरिका और चीन के रिश्ते ग़ुब्बारे की घटना के बाद और तल्ख़ हो गये हैं। ग़ुब्बारे के मलबे को दक्षिणी कैरोलिना में समुद्र के अंदर से सोनार का इस्तेमाल कर निकाला गया है। इस घटना का इतना बड़ा असर हुआ कि चीन की यात्रा पर जाने वाले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया। अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और उनके चीनी समकक्ष जनरल वेई फेंघे के बीच टेलीफोन पर बातचीत के अनुरोध को चीन ने ठुकरा दिया।
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की प्रेस सेक्रेटरी का कहना था कि इस जासूसी ग़ुब्बारे के मलबे से यह मौक़ा मिलेगा कि चीन के जासूसी ग़ुब्बारों के बारे में काफ़ी सूचना हासिल की जा सके। इसी वजह से अमेरिका ने उसे समुद्र में गिराया, ताकि चीनी ग़ुब्बारे के मलबे को हासिल किया जा सके।
जो बाइडेन, अमेरिका के राष्ट्रपति
“चीन ने अमेरिकी महाद्वीप में ग़ुब्बारों को उड़ाने का दुस्साहस पूर्ण कृत्य किया, क्योंकि वे चीनी सरकार है। ग़ुब्बारे और अमेरिका पर जासूसी करने का प्रयास कुछ ऐसा है, जिसकी चीन से अपेक्षा की जा सकती है। जब हमने चीन से पूछा, तो उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि यह उनका ग़ुब्बारा नहीं है। उन्होंने सिर्फ इसके पीछे के मक़सद से इनकार किया। बात चीन पर भरोसा करने की नहीं है। यह इस बात का फैसला करने का समय है कि क्या हमें साथ काम करना चाहिए और हमारे पास क्या विकल्प हैं?’’
सन् 2017 के बजट सत्र में केंद्रीय क़ानून मंत्रालय ने जिस गुप्त चंदा (इलेक्टोरल बॉन्ड) को आधिकारिक सहमति दी थी, उसके नुक़सान और दुरुपयोग को लेकर कयास लगते रहे हैं। ऐसे आरोप लग चुके हैं कि भारतीय जनता पार्टी के पास 70 से 80 फ़ीसदी तक गुप्त चंदा आ रहा है और वह इस चंदे का दुरुपयोग कर रही है। मोदी की केंद्र सरकार पर पहले भी आरोप लगता रहा है कि उसने जल्दबाज़ी में विवादास्पद गुप्त चंदा अधिनियम को अन्य क़ानूनों की संसदीय प्रक्रिया के तहत मनमानी करते हुए निर्णय लेते हुए इसे वैध बना दिया, जबकि चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इसके पक्ष में नहीं थे।
जानबूझकर केंद्र सरकार के क़ानून मंत्रालय की तरफ़ से कई गड़बडिय़ों को नज़रअंदाज़ करते हुए लोकसभा में यह बिल पास करके राज्यसभा को बाइपास करके इस बिल को पास किया गया, जो कि असंवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी था। इस बिल को पास करने की चर्चा को अनौपचारिक चर्चा का नाम देकर जिस प्रकार से केंद्र्र सरकार ने इसे पास किया, उसमें अज्ञात लोगों को शामिल किया गया। केंद्र सरकार का यह क़दम न केवल सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवहेलना था, बल्कि ख़ुद केंद्र सरकार के कामकाज की नियमावली का उल्लंघन भी था।
इस बिल को लेकर क़ानून मंत्रालय ने जो दो पन्नों का दस्तावेज़ तैयार किया, उससे पता चलता है कि सरकार ने दबे स्वर में इसे न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की। हालाँकि एक नियम यह भी है कि राजनीतिक दलों को सन् 1976 के बाद मिले विदेशी चंदे की अब जाँच नहीं हो सकेगी।
इस सम्बन्ध में भी सन् 2018 को वित्त विधेयक में 21 संशोधनों के बाद लोकसभा में संशोधित क़ानून बिना किसी चर्चा के ही पारित हो चुका है, जिसमें से एक संशोधित क़ानून विदेशी चंदा नियमन क़ानून 2010 है। जबकि पहले क़ानून के मुताबिक, राजनीतिक दलों पर विदेशी चंदा लेने से रोक थी। लेकिन केंद्र्र की मोदी सरकार ने पहले वित्त विधेयक-2016 के ज़रिये विदेशी चंदा नियमन क़ानून (एफसीआरए) में संशोधन करके विदेशी चंदा लेने को भी आसान कर दिया था, जिसमें कहा गया कि सन् 1976 के बाद से मिले विदेशी चंदे की जाँच नहीं होगी, चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल को मिला हो। इस संशोधन के बाद सभी राजनीतिक दल, ख़ासकर भाजपा और कांग्रेस दोनों बच गये। क्योंकि सन् 2014 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन दोनों बड़े दलों को एफसीआरए क़ानून के उल्लंघन का दोषी पाया ठहराया था।
इसके लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार तत्कालीन वित्तमंत्री (अब स्व.) अरुण जेटली सबसे बड़े ज़िम्मेदार हैं। आरटीआई कार्यकर्ता व एनसीपीआरआई के सदस्य सौरव दास ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत इसकी जानकारी सरकार से हासिल की, जिससे पता चलता है कि किस तरह तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियाँ उड़ाते हुए इस विवादास्पद धन शोधन की प्रक्रिया को धन विधेयक की श्रेणी में डालकर संविधान के आर्टिकल 110 की धज्जियाँ उड़ायीं, जिसे पास कराने की कोई मजबूरी सरकार को नहीं थी। क्योंकि चंदा गुप्त रखने का कोई कारण नहीं था; लेकिन गुप्त चंदा योजना को फिर भी गुप्त रखा गया, ताकि लोगों को इसका अंदाज़ा न हो सके कि पार्टियों के पास इतना पैसा कहाँ से, क्यों और किस काम के लिए आता है। इसी के चलते चंदा लेने की इस प्रक्रिया को इतना गुप्त रखा गया कि केवल सरकार और बैंक को ही चंदा देने और लेने वाले के बारे में पता रहेगा, बाक़ी किसी को नहीं। इससे हुआ यह कि सरकार हर पार्टी को मिल रहे चंदे पर नज़र तो रख सकती है; लेकिन अपनी पार्टी को मिल रहे गुप्त चंदे के बारे में किसी को कानोंकान हवा तक नहीं लगने दे सकती है।
इससे जिस पार्टी की केंद्र में सरकार है, वह तो अपना चंदा आसानी से पचा सकती है और चंदा देने वालों को लाभ भी पहुँचा सकती है; लेकिन अगर विपक्षी को चंदा किसी ने दिया, तो न तो विपक्ष उसका दुरुपयोग कर सकेगा और न ही चंदा देने वालों की ख़ैर होगी। और अब हो भी यही रहा है। जो कम्पनियाँ, फर्में और व्यक्ति सत्तासीन पार्टी को चंदा दे रहे हैं, उनको मुनाफ़ा ही मुनाफ़ा हो रहा है और जो विपक्षी दलों को चंदा दे रहे हैं, उनके यहाँ छापा ही छापा हो रहा है।
अगर वित्त वर्ष 2018-19 की चुनाव आयोग के सामने भारतीय जनता पार्टी द्वारा पेश की गयी रिपोर्ट देखें, तो पता चलता है कि उसने इस वित्तीय वर्ष में क़रीब 1,450 करोड़ रुपये इस गुप्त चंदे से प्राप्त किये। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने ही वित्त वर्ष 2019-20 में चुनाव आयोग को बताया कि इस बड़ी पार्टी ने इस वित्तीय वर्ष में गुप्त चंदे के ज़रिये तक़रीबन 2,555 करोड़ रुपये प्राप्त किये। जबकि वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान 18 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने गुप्त चंदे के ज़रिये कुल 3,441 करोड़ रुपये ही प्राप्त किये। इसमें कांग्रेस ने केवल 318 करोड़ रुपये प्राप्त किये। जबकि तृणमूल कांग्रेस को 100 करोड़ रुपये, डीएमके को 45 करोड़ रुपये, शिवसेना को 41 करोड़ रुपये, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 20 करोड़ रुपये, आम आदमी पार्टी को 17 करोड़ रुपये और राष्ट्रीय जनता दल को केवल 2.5 करोड़ रुपये ही गुप्त चंदे के ज़रिये मिले।
वहीं अकेले भारतीय जनता पार्टी वित्त वर्ष 2017-18 में 68 फ़ीसदी और 2018-19 में 75 फ़ीसदी गुप्त चंदा प्राप्त हुआ। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने वित्त वर्ष 2021-22 में 1,917 करोड़ रुपये से ज़्यादा गुप्त चंदे के रुप में प्राप्त किये। जबकि शुरू में भारतीय जनता पार्टी को केवल 200 करोड़ रुपये ही गुप्त चंदे के ज़रिये मिले थे। लेकिन यह गुप्त चंदा भारतीय जनता पार्टी के खाते में धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते 2,500 करोड़ से ज़्यादा हो गया।
ऐसा नहीं है कि गुप्त रूप से केवल राजनीतिक दलों को ही चंदा मिलता है। नेताओं को भी गुप्त चंदे के रूप में बहुत पैसा मिलता है। लेकिन चुनाव आयोग से लेकर केंद्र सरकार तक किसी ने अभी तक ऐसा नियम नहीं बनाया है कि नेताओं को मिले गुप्त चंदे की जाँच की जाए या उसका हिसाब उनसे लिया जाए। चुने हुए नेता गुप्त चंदे और ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से चंद दिनों में करोड़पति और अरबपति हो जाते हैं।
बता दें कि जब गुप्त चंदे की प्रक्रिया को गोपनीय और आसान बनाया गया, तब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसका विरोध कई आशंकाएँ जताते हुए किया था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कहा था कि गुप्त चंदे से भ्रष्टाचार बढ़ेगा, सरकार को सबसे ज़्यादा चंदा मिलेगा, मोटा चंदा देने वालों को ज़्यादा लाभ पहुँचाया जाएगा और लोग बढ़चढक़र इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदेंगे, ताकि उन्हें सरकार से लाभ मिल सके। गुप्त चंदे को लेकर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग से लेकर कई नेताओं और समाज सुधारकों ने भी आपत्ति जतायी है; लेकिन सरकार ने किसी की नहीं सुनी, जिसके फलस्वरूप राजनीतिक दलों को गुप्त रूप से जमकर चंदा मिल रहा है।
भारतीय जनता पार्टी पर तो यहाँ तक आरोप हैं कि वह इस गुप्त चंदे के पैसों से विधायक ख़रीदने का काम भी करती है। आज व्यापारियों से लेकर, तमाम बड़े उद्योगपति गुप्त रूप से राजनीतिक दलों को गुप्त चंदा देकर मोटा लाभ कमाने में लगे हैं। जबकि चुनावी फंडिंग के नाम पर बना गुप्त चंदा क़ानून लोकतंत्र और देश के आम लोगों के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है। विरोध की अनदेखी करके अपने हित में क़ानून पारित करने में पारंगत भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपना हित इस क़दर साधने में लगी है कि कोई भी क़ानून अपनी मर्ज़ी से पास कर देती है। हालाँकि चुनाव आयोग ने पहले 20,000 से ज़्यादा चंदा मिलने पर पार्टी द्वारा उसकी जानकारी देने की बाध्यता को ख़त्म करके अब 2,000 से ज़्यादा का गुप्त चंदा लेने पर जानकारी देने की बाध्यता तय कर दी है। इतना ही नहीं, चुनाव आयोग ने चुनावी गुप्त चंदे अधिकतम 20 करोड़ रुपये तक लेने की सीमा तय करने का प्रस्ताव भी रखा है।
इसके अलावा चुनाव आचरण नियम-1961 के नियम संख्या-89 में संशोधन लागू किया गया है, जिसके तहत एक उम्मीदवार को चुनाव से सम्बन्धित रसीद और भुगतान के लिए एक खाता अलग खोलकर रखना होगा, जिसमें प्राप्त चंदे के बारे में पार्टी या नेता को चुनाव ख़र्च के लिए उस खाते में प्राप्त रक़म के बारे में चुनाव आयोग को बताना ही होगा।
इतने सख्त नियम होने के बाद भी राजनीतिक दल पारदर्शिता रखते होंगे, इसकी कम ही उम्मीद है। क्योंकि इस तरह से गुप्त चंदा मिलने और उसकी गोपनीयता बनाये रखने के चलते राजनीतिक दल इस चंदे का दुरुपयोग करते ही होंगे। क्योंकि अब इस गुप्त चंदे का हिसाब देना ज़रूरी नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की यह ख़ासियत है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने पूरे पत्ते कभी नहीं खोलती है। केंद्र में सरकार भाजपा की ही है और पीएम केयर फंड का हिसाब न देने से ही केंद्र्र सरकार की नीयत का पता चलता है, जो कि क़ायदे से सरकारी खाता है और उसमें पारदर्शिता बहुत-ही आवश्यक है।
राजनीति में ईमानदारी अब दूर की कौड़ी हो चुकी है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के चलते ही हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरे तक फैल चुकी हैं। अगर देश में भ्रष्टाचार को ख़त्म करना है, तो सबसे पहले राजनीति के क्षेत्र से भ्रष्टाचार को ख़त्म करना होगा।
अगले साल यानी 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार प्रदेश के 40 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता और पानी की बोतलें देने की तैयारी में है। इसकी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वन मंत्री विजय शाह को दी है।
प्रदेश सरकार द्वारा मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के माध्यम से जंगल क्षेत्र में तेंदूपत्ता संग्रह करने वाले आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों को इस साल साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता और पानी की बोतल बाँटने को लेकर प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गयी है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा- ‘2017-18 में हमने यह योजना शुरू की थी। बीच में दूसरी सरकार आयी, जिसने यह योजना बन्द कर दी। लेकिन हम इसे फिर से चालू करेंगे।’
मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार इस तरह से जहाँ आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष ने आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों के लघु वनोपज के हक़ के पैसे यानी लघु वनोपज के शुद्ध लाभ की राशि लगभग 261 करोड़ रुपये का बंदरबाँट करने का आरोप लगाया है।
मध्य प्रदेश के मनावर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक आदिवासी नेता डॉ. हिरालाल अलावा ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखकर इस सम्बन्ध में अपना विरोध दर्ज कराया है। डॉ. अलावा ने पत्र में लिखा है- ‘लघु वनोपज पर ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत को भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची, पेसा $कानून-1996 एवं वन अधिकार $कानून 2006 में नियंत्रण, प्रबंधन सहित समस्त अधिकार सौंपे गये हैं। इसके सम्बन्ध में मध्य प्रदेश शासन वन विभाग द्वारा 15 मई, 1998 को जारी आदेश के तहत लघु वनोपजों के व्यापार से प्राप्त लाभांश राशि, जो वर्तमान में लगभग 1500 करोड़ से भी ज़्यादा है; को प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से संग्राहकों को नक़द वितरित की जानी थी। लेकिन मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ लघु वनोपज के व्यापार से प्राप्त लाभांश की राशि का सन् 1998 से लगातार दुरुपयोग करते रहा है। अत: लघु वनोपज के लाभांश की राशि से सामग्री क्रय कर वितरित किये जाने की कार्यवाही को तत्काल रोका जाए और 15 मई, 1998 के आदेशानुसार नक़द राशि संग्राहकों को वितरित किया जाए।’
क्या है मामला?
मध्य प्रदेश लघु वनोपज के अंतर्गत आने वाले तेंदूपत्ते का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। बीड़ी बनाने के काम में आने वाले ये पत्ते जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों को सर्वाधिक मौसमी आय उपलब्ध कराते हैं। लघु वनोपज आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों के जीवनयापन का हमेशा से मुख्य आधार रहा है।
संविधान की 11वीं अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 तथा वनाधिकार अधिनियम-2006 के तहत सभी तरह के लघु वनोपज पर समस्त अधिकार, नियंत्रण एवं प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपा गया है एवं वन विभाग को इन नियंत्रणों से मुक्त कर दिया गया है। इसके अनुसार 15 मई, 1998 को वन विभाग मंत्रालय मध्य प्रदेश शासन ने मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ को आदेश दिया कि लघु वनोपज के व्यापार से प्राप्त शुद्ध लाभ की सम्पूर्ण राशि प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को प्रदान की जाएगी।
उक्त सहकारी समितियाँ वनोपज के शुद्ध लाभ की सम्पूर्ण राशि का 50 प्रतिशत संग्राहकों को नक़द वितरित करेंगी, 25 प्रतिशत राशि ग्रामीण विकास कार्यों पर ख़र्च करने और शेष 25 प्रतिशत राशि वन विकास कार्यों पर ख़र्च करने का प्रावधान किया गया। जनवरी, 2006 में इसमें आंशिक संशोधन कर संग्राहकों की राशि 60 प्रतिशत, ग्रामीण विकास और वन विकास मद की राशि 20-20 प्रतिशत राशि तथा फरवरी 2012 में पुन: संशोधन कर संग्राहकों की राशि 70 प्रतिशत, ग्रामीण विकास और वन विकास मद की राशि 15-15 प्रतिशत ख़र्च करने का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ सन् 1998 से ग्रामीण विकास एवं वन विकास मद की 50, 40 और 30 प्रतिशत की राशियों को आज तक प्राथमिक सहकारी समितियों को नहीं दिया और उक्त राशियों को मनमाने ढंग से ख़र्च करता रहा है। अब उसी राशि में से सामग्रियाँ ख़रीदने व वितरित करने के मामले में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी है।
13 जनवरी, 2023 को वन विभाग के अपर मुख्य सचिव जे.एन. कंसोटिया की अध्यक्षता में मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के संचालक मंडल की बैठक में 261 करोड़ रुपये के साडिय़ाँ, जूते-चप्पल, छाता, पानी की बोतल की क्वालिटी, डिजाइन और ख़रीदी की मंज़ूरी दे दी गयी। बैठक में कहा गया कि 2022 में तेंदूपत्ता जमा करने का काम करने वाले कार्डधारी संग्राहकों को ही ये सामग्री दी जाएगी। संग्राहकों के 15 लाख 24 हज़ार परिवारों को 285 रुपये वाली पानी की बोतल एवं 200 रुपये वाला छाता दिया जाएगा, जबकि परिवार के एक पुरुष को 291 रुपये का जूता एवं एक महिला को 195 रुपये की चप्पल दी जाएगी, जबकि परिवार की सभी 18 लाख 21 हज़ार महिला सदस्यों को 402 रुपये वाली साड़ी वितरित की जाएगी। जीएसी, परिवहन एवं वितरण पर 40 करोड़ 51 लाख रुपये व्यय किये जाएँगे।
उक्त सामग्री लघु उद्योग निगम के माध्यम से हस्त शिल्प व हथकरघा विकास निगम, खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड और पॉवरलूम बुनकर सहकारी संघ बुरहानपुर से ख़रीदी जाएगी। इन संस्थाओं से एनओसी लेने की तैयारी चल रही है। उक्त सामग्रियों की ख़रीदी एवं वितरण हेतु रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी भागवत सिंह को छ: माह के लिए सलाहकार बनाने की स्वीकृति दे दी गयी है। सन् 2018 में भागवत सिंह के माध्यम से ही चरण पादुका योजना का क्रियान्वयन किया गया था।
ज्ञात हो कि वर्ष 2018 में राज्य विधानसभा चुनाव के पूर्व भी चरण पादुका योजना के तहत 261 करोड़ रुपये की सामग्री तेंदूपत्ता संग्राहक आदिवासियों-परंपरागत वन निवासियों को बाँटकर लुभाने का प्रयास किया गया था; लेकिन कांग्रेस ने बाँटे गये जूतों से कैंसर फैलने की बात उठाकर माहौल को गरमा दिया था।
संग्राहकों के पक्ष में उतरे विधायक
डॉ. अलावा का आरोप है कि ग्रामीण विकास मद की लगभग 1,000 करोड़ और वन विकास मद की 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा राशि मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ ने प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को उपलब्ध नहीं करवायी और उस राशि का दुरुपयोग कर अपव्यय करता रहा है। प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों द्वारा ग्रामीण विकास एवं वन विकास मद की राशि से करवाये जाने वाले कार्यों के पारित प्रस्तावों को बुलवाकर उन पर आपत्ति लगाने, निरस्त करने का कार्य भी संघ करता रहा है, जबकि संघ को किसी भी $कानून, नियम या उपविधि में ऐसा कोई अधिकार नहीं है। डॉ. अलावा का कहना है कि मध्य प्रदेश लघु वनोपज सहकारी संघ के अधिकारियों ने शुद्ध लाभ की राशि का मनमाने ढंग से अपने सुख-सुविधा और अर्दली भत्ता देने पर ख़र्च किया, जबकि यह राशि संग्राहकों की है और उनमें ही वितरित की जानी चाहिए।
मध्य प्रदेश के निवास विधानसभा क्षेत्र से विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले के एक विधानसभा प्रश्न के जवाब में 30 दिसंबर, 2020 को वन मंत्री कुँवर विजय शाह ने स्वीकार किया कि वनोपज के लाभांश को स्थानीय संग्राहकों में वितरित किया जाना चाहिए। विधानसभा में वन मंत्री शाह का उत्तर निम्नानुसार है- ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में राज्य शासन के ज्ञापन दिनांक 15 मई, 1998 द्वारा ग्राम सभाओं को लघु वनोपज का स्वामित्व सम्बन्धी निर्देश जारी किये हैं।
ग्राम स्वराज लागू करने के सम्बन्ध में जारी निर्देश में लघु वनोपज के संरक्षण, संग्रहण एवं विपणन के समस्त अधिकार ग्राम सभा को दिये गये हैं। लघु वनोपज का अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 में समुदाय के अधिकार के रूप में मान्यता देने की विधिक व्याख्या की गयी है, जिसके कारण यह अधिकार स्वत: विभाग के नियंत्रण से मुक्त हो चुके हैं। वर्तमान में राष्ट्रीयकृत लघु वनोपज तेंदूपत्ता का केवल व्यापार मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे प्राप्त लाभांश स्थानीय समुदाय में वितरित किया जाता है।
डॉ. अलावा ने राज्यपाल से माँग की है कि लघु वनोपज संघ भोपाल के द्वारा ग्रामीण विकास मद एवं वन विकास मद की राशि प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों को देने के बजाय संघ के स्तर पर अन्य कार्यों में ख़र्च करने, राशि का अपव्यय करने तथा राशि का दुरुपयोग करने वाले संघ के अधिकारियों के विरुद्ध लोकायुक्त से जाँच कराकर आपराधिक प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किये जाए।
पूर्व में भी भोपाल स्थित ग़ैर-लाभकारी संस्था, किसान जागृति संगठन के कार्यकर्ता इरफ़ान जाफ़री की शिकायत पर 26 जून 2019 को मध्य प्रदेश लोकायुक्त ने राज्य में लघु वनोपज के व्यापार और विकास के लिए ज़िम्मेदार मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के खिलाफ़ मामला दर्ज किया था, जिसके कारण कई अधिकारियों के पसीने छूट गये थे। हालाँकि यह मामला अभी भी लोकायुक्त के समक्ष लम्बित है।