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कवच की जरूरत कफ़न की ख्ररीदारी

सियाचिन में तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे तक पहुंच जाता है. यहां मोर्चे पर डटे सैनिकों के लिए सभी कायदों को ताक पर रख कर एक ऐसी पोशाक खरीदी जा रही है जो उनके लिए कवच की बजाय कफन साबित हो सकती है. नेहा दीक्षित की विशेष पड़ताल

रक्षामंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी शुरू करने के पांच दिन बाद 26 मई को एके एंटनी का एक सख्त बयान आया. इसमें उन्होंने कहा था कि अगर मंत्रालय को किसी भी रक्षा सौदे में यदि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का पता चलता है तो उस सौदे को रद्द कर दिया जाएगा. साफ था कि अपने पिछले कार्यकाल के दौरान दो ऐसे सौदों को रद्द कर चुके एंटनी एक कड़ा संदेश देना चाहते थे.

कंपनी स्ट्रेच्ड टेफलॉन की जगह पॉली यूरेथेन का इस्तेमाल कर रही है. आज तक इस तकनीक को -10 डिग्री सें. से नीचे इस्तेमाल किए जाने का कोई उदाहरण नहीं है

मगर लगता है कि रक्षा सौदों के जरिए अपने हित साधने वालों को इसकी कोई परवाह ही नही है. अपनी दो महीने लंबी तहकीकात में तहलका ने पाया कि रक्षा मंत्रालय के कई शीर्ष अधिकारियों ने एक ऐसे फैसले की बुनियाद रख दी है जो दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन में तैनात 6000 सैनिकों की जिंदगी को खतरे में डालने वाला है. इन अधिकारियों में मास्टर जनरल ऑफ ऑर्डिनेंस (एमजीओ) भी शामिल हैं. तहलका को पता चला कि एक दागी मगर अपनी पसंद की कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को खूब तोड़ा-मरोड़ा गया.

दरअसल अगस्त 2006 में रक्षा मंत्रालय ने गोरटैक्स सूट के 53,480 जोड़ों की आपूर्ति के लिए टेंडर आमंत्रित किए थे. ये एक खास किस्म की पोशाक होती है जिसे एक्स्ट्रीम कोल्ड वेदर क्लोदिंग सिस्टम भी कहा जाता है. सियाचिन में 22000 फीट की ऊंचाई पर तैनात सैनिकों के लिए ये सूट बेहद जरूरी होता है क्योंकि यहां तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे तक पहुंच जाता है. इसकी बनावट कुछ ऐसी होती है कि ये ठंडी हवा, बर्फ और बारिश से शरीर को बचा सकने की क्षमता रखता है. इस सूट में सबसे अहम होती है इसके भीतर लगी पॉली टेट्रा फ्लोरो थाइलीन या स्ट्रेच्ड टेफलॉन की परत. इस परत की खासियत यह होती है कि यह शरीर से पैदा होने वाले पसीने को सुखाने में मदद करती है. अगर ऐसा न हो तो यह पसीना जम कर शरीर से चिपक जाता है और व्यक्ति फ्रॉस्टबाइट का शिकार हो जाता है जो सियाचिन में होने वाली मौतों की प्रमुख वजहों में से एक है. कहा जाता है कि सियाचिन में जान गंवाने वाले सैनिकों में 90 फीसदी गोली के नहीं बल्कि यहां की जानलेवा ठंड के शिकार होते हैं. सूत्र बताते हैं कि यहां का खतरनाक मौसम हर महीने औसतन छह सैनिकों की बलि ले लेता है. इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि लड़ाई के इस मैदान में जितनी अहमियत सैन्य प्रशिक्षण की है उतनी ही उचित उपकरणों और कपड़ों की भी है. अमेरिकी सेना और नाटो बल भी स्ट्रेच्ड टेफलॉन का इस्तेमाल करते हैं जो -50 डिग्री सें. जैसे कम तापमान पर भी असरदार तरीके से काम करने वाली इकलौती तकनीक है. भारतीय सेना भी इसका इस्तेमाल करती रही है और ये सूट्स आखिरी बार 1999 में खरीदे गए थे.

ये भी अहम है कि मंत्रालय ने जब अगस्त 2006 में टेंडर की अधिसूचना जारी की थी तो इसमें किसी तरह के तकनीकी मानकों का कोई जिक्र ही नहीं था. इसका मतलब ये था कि टेंडर्स को किसी भी आधार पर खारिज या स्वीकार किया जा सकता था. सबसे पहले एक दक्षिण कोरियाई कंपनी वोनरयोंग का चयन किया गया और इसके द्वारा भेजे गए नमूनों का परीक्षण हुआ. जनवरी 2007 में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी ऐश्योरेंस ने कंपनी को संबंधित उत्पाद के बारे में कुछ मानक (स्पेसीफिकेशंस) भेजे. कंपनी ने इन मानकों को तकनीकी रूप से अव्यावहारिक बताया. मंत्रालय ने अपनी गलती मान ली और तीन जून 2008 को एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस ने एमजीओ कार्यालय को एक पत्र भेजकर शुरुआत में 5000 सूट्स मंगाने का सुझाव दिया. मगर ये पत्र कथित तौर पर कहीं गुम हो गया और भिन्न-भिन्न नमूनों के मानकों के एक जैसा न होने को आधार बना कर टेंडर रद्द कर दिया गया.

2006 में टेंडर आमंत्रित करते हुए रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा था कि सिर्फ वही कंपनियां इस पर प्रतिक्रिया दें जो उपकरणों की मूल निर्माता भी हों. ब्लैक डायमंड इस वर्ग में नहीं आती

अगस्त 2008 में टेंडर के लिए नई अधिसूचना जारी की गई और दक्षिण कोरियाई कंपनी को इससे बाहर रखा गया. इस बीच मंत्रालय में यह भी फैसला हुआ कि एमजीओ को कुछ वित्तीय अधिकार सौंपे जाएं ताकि जिन चीजों की तत्काल जरूरत है उन्हें खरीदने में आम प्रक्रियाओं में लगने वाली देरी न हो. ये सूट भी इन्हीं चीजों के तहत आते थे. 53,480 सूट्स के शुरुआती ऑर्डर को घटाकर 27,000 कर दिया गया और एमजीओ ले. जनरल एसएस ढिल्लन ने करीब 37.4 करोड़ रुपए का ये कांट्रैक्ट ब्लैक डायमंड नाम की एक अमेरिकी कंपनी को दे दिया.

तहलका के पास इस कांट्रैक्ट की एक प्रति है जिससे पता चलता है कि नियमों को किस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया ताकि ब्लैक डायमंड को पिछले दरवाजे से एंट्री दिलवाई जा सके. नियमों में सबसे गंभीर उल्लंघन ये है कि ब्लैक डायमंड कथित रूप से एक ऐसी टेक्नॉलाजी का इस्तेमाल कर रही है जिसके बारे में पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि शून्य से 50 डिग्री में भी ये असरदार साबित होगी. कंपनी स्ट्रेच्ड टेफलॉन की जगह पॉली यूरेथेन का इस्तेमाल कर रही है जिसे पीयू कोटेड टेक्नॉलॉजी भी कहा जाता है. पॉली यूरेथेन को कपड़े पर दोनों तरफ किसी पेंट की तरह चढ़ाया जाता है. आज तक इस तकनीक को -10 डिग्री सें. से नीचे इस्तेमाल किए जाने का कोई उदाहरण नहीं है. इसका मतलब ये है कि किसी ने भी ऐसा किया नहीं. और ऐसा बेवजह नहीं है. दरअसल तापमान अगर -10 डिग्री सें. से नीचे चला जाए तो पीयू कोटिंग में दरारें पड़ने लगती हैं. इससे हवा और पानी कपड़े के भीतर घुसने लगता है. इससे शरीर का तापमान तेजी से गिरने लगता है जो सियाचिन जैसी जगह पर जानलेवा हो सकता है.

आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल डिपार्टमेंट में कार्यरत उच्च पदस्थ सूत्र इसकी पुष्टि करते हैं कि पीयू कोटिंग पसीने के सूखने में मददगार नहीं होती. नतीजतन भागदौड़ के बाद जब काफी पसीना आता है तो ये सूखकर उड़ जाने की बजाय बदन पर ही जम जाता है और फ्रॉस्टबाइट का कारण बनता है. ये भी अहम है कि ब्लैक डायमंड के साथ सौदा पटाने वाला एजेंट कुछ साल पहले तक उस इतालवी कंपनी का प्रतिनिधि था जो सियाचिन में तैनात सैनिकों के लिए खराब स्नोबूट सप्लाई करने की वजह से चर्चा में रही थी.

सियाचिन उन सबसे दुरूह जगहों में से एक है जहां भारतीय सैनिक अपना कर्तव्य निभा रहे हैं. यहां पर उनका सामना सिर्फ दुश्मन से ही नहीं बल्कि अमानवीय हालात पैदा करने वाले मौसम से भी होता है. हवा में ऑक्सीजन की मात्रा सामान्य से 30 फीसद कम होती है. नतीजनत सैनिकों को ऑक्सीजन मास्क लगाना पड़ता है. फ्रॉस्टबाइट, बर्फ की चमक से होने वाला अंधापन, फेफड़ों और दिमाग की सूजन जैसी चीजें यहां सैनिकों को तोड़ कर रख देती हैं. ज्यादा ऊंचाई की वजह से भूख भी मर जाती है. और अगर भूख हो भी तो खाने की चीजें कम ही समय तक खाने लायक रहती हैं. संतरे ऐसे हो जाते हैं कि छीलें तो क्या हथोड़े से भी तोड़े नहीं जा सकते. तीन महीने की तैनाती में ही कई सैनिकों का वजन 20 किलो तक गिर जाता है.

दस्तानों के मामले में तो हाल ये है कि कुल जरूरत का 30 फीसद स्टॉक ही उपलब्ध है. इसका मतलब यह है कि किसी भी समय सियाचिन में तैनात हर दस सैनिकों में सिर्फ तीन ही खुद को घातक फ्रॉस्टबाइट से बचा सकते हैंआधिकारिक आंकड़ों की मानें तो अप्रैल 1984 में सियाचिन चौकी बनने के बाद से मौसम यहां पर कुल 670 सैनिकों की जान ले चुका है. मगर कुछ साल पहले सियाचिन में तैनात रहे एक सेवानिवृत्त मेजर जनरल के मुताबिक ये आंकड़ा 20,000 तक भी हो सकता है. जान अगर बच भी जाए तो भी शरीर कई तरह की अपंगताओं का शिकार हो जाता है. सियाचिन में एक बार की तैनाती के बाद ही कई सैनिकों को जिंदगी भर याद्दाश्त, श्रवणशक्ति या नजर की कमजोरी से जूझना पड़ता है.

उधर, सेना इन समस्याओं से यह कहकर पीछा छुड़ा लेती है कि सियाचिन में तैनाती के लिए हर सैनिक को हर महीने 7000 रुपये का भत्ता अलग से भी तो मिलता है. नाम न छापने की शर्त पर सेना में कार्यरत एक कैप्टन कहते हैं, ‘रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) इस दिशा में आखिर क्या कर रहा है? हम देश के लिए अपनी जान देने को तैयार रहते हैं. कम से कम ये तो हो ही सकता है कि हमें ऐसे खराब सूट न दिए जाएं.’

2006 में टेंडर आमंत्रित करते हुए रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा था कि सिर्फ वही कंपनियां इस पर प्रतिक्रिया दें जो उपकरणों की मूल निर्माता भी हों. ब्लैक डायमंड इस वर्ग में नहीं आती. इसकी वेबसाइट बताती है कि यह एक विक्रेता भर है और अपने उत्पाद दूसरी कंपनियों से खरीदती है. खुद को एक अमेरिकी पत्रकार बता जब तहलका संवाददाता ने ब्लैक डायमंड से संपर्क किया तो इसके निदेशकों में से एक बिल क्राउस का कहना था, ‘हम किसी चीज का उत्पादन नहीं करते. हम तो सिर्फ रक्षा मंत्रालय की विशेष प्रार्थना पर ये सूट उन्हें भेज रहे हैं.’

ये विशेष प्रार्थना रक्षा मंत्रालय ने उस कंपनी से की है जो उत्पादनकर्ता नहीं है. इससे भी बदतर ये है कि कांट्रैक्ट में सिर्फ चीन के डैलियन एयरपोर्ट का जिक्र है जहां से ये सामान भारत लाया जाना है. ये सूट किस जगह और किस फैक्ट्री में बने हैं इसका कहीं कोई जिक्र नहीं किया गया है. स्ट्रेच्ड टेफलॉन तकनीक का पेटेंट गोरटैक्स कंपनी के नाम है जो ऐसे हर एक सूट के लिए 570 अमेरिकी डॉलर कीमत वसूलती है. कोरियन कंपनी ने इसकी कीमत 248 डॉलर लगाई थी. जबकि ब्लैक डायमंड एक ओर तो पीयू कोटिंग वाले सूट दे रही है जिनका कभी भी -10 डिग्री सें. तापमान के नीचे इस्तेमाल नहीं किया गया है और ऊपर से ये ऐसे हर सूट के लिए 289 डालर वसूल रही है.

अभी माल भारत नहीं पहुंचा है जबकि इसकी पहली खेप को अप्रैल 2009 तक पहुंच जाना था. जब तहलका ने डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी ऐश्योरेंस ब्रिगेडियर अजय गहलोत से इस मामले पर बात करनी चाही तो उन्होंने ये कहते हुए इससे इनकार कर दिया, ‘ये राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है. मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं है.’

तहलका ने डीआरडीओ और वर्तमान एमजीओ मेजर जनरल विजय शर्मा से बात करने की पूरी कोशिश की मगर कोई भी इस बारे कुछ बोलने को तैयार नहीं था. गौरतलब है कि 28 जनवरी 2009 को जब ले. जनरल एसएस ढिल्लन ने ब्लैक डायमंड के साथ कांट्रैक्ट पर दस्तखत किए तो इसके ठीक तीन दिन बाद ही उनका कार्यकाल खत्म होने वाला था. जब हमने ढिल्लन से संपर्क किया तो उनका कहना था, ‘मैं यही कह सकता हूं कि किसी पद से हटने के 15 दिन पहले तक हम कोई बड़े फैसले नहीं लेते.’ उन्हें अब आर्म्र्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का सदस्य बनाया गया है जो सैन्य अधिकारियों के खिलाफ लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए गठित किया गया है.

रक्षा मंत्रालय में इस सौदे को लेकर चुप्पी है. मगर ये और पिछले कुछ साल में हुई अन्य घटनाएं सियाचिन में तैनात सैनिकों की बेहतरी के लिए एमजीओ की भूमिका पर कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं. अक्टूबर 2008 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि खरीद में देरी की वजह से सियाचिन में तैनात सैनिकों को जो खास पोशाक दी गई थी वह फटी-पुरानी थी और उसकी मरम्मत कर सैनिकों को उसे वापस दे दिया गया था. इस रिपोर्ट के शब्द थे, ‘सेना मुख्यालय ठीक समय पर सियाचिन जैसे इलाकों के लिए जरूरी खास पोशाक और उपकरणों की खरीद में नाकाम रहा. इस तरह इन अहम चीजों के स्टॉक में 44 से 70 फीसदी की कमी आ गई है..इस्तेमाल की हुई विशेष पोशाक को फिर से इस्तेमाल करना स्वच्छता, उपयुक्तता और सैनिकों की मन:स्थिति के नजरिये से भी ठीक नहीं है.’ कैग ने हैरानी जताई कि गुणवत्ता मानकों को नजरअंदाज कर सिर्फ कम कीमत के आधार पर खरीद की जाती है जिसका खामियाजा आखिर में सैनिकों को उठाना पड़ता है.

कैग द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण में पता चला कि सैन्य बलों की 50 फीसदी डिविजंस या रेजिमेंट्स उन्हें दी जा रही पोशाक की गुणवत्ता और फिटिंग से संतुष्ट नहीं थीं. असंतोष के कई कारण थे. उदाहरण के लिए पैंट और शर्ट का बेमेल साइज, कपड़े की खराब क्वालिटी और उसका रंग जल्द फीका पड़ जाना, जूतों का निर्धारित समय से कम में बेकार हो जाना, टोपियों का वाटरप्रूफ न होना आदि. 2002 से 2007 के बीच विभिन्न वस्तुओं के स्टॉक में कमी के लिए सेना के एमजीओ को जिम्मेदार ठहराते हुए कैग की रिपोर्ट कहती है कि आयात की जाने वाली चीजों की गुणवत्ता के मामले में हीला-हवाली की जा रही है. कैग के ऑडिट में पता चला कि स्लीपिंग बैग, मोजे, जैकेट, दस्ताने, जूते और बर्फीले इलाकों में इस्तेमाल होने वाले चश्मे जैसी चीजों तक की भी स्टॉक में कमी है. दस्तानों के मामले में तो हाल ये है कि कुल जरूरत का 30 फीसद स्टॉक ही उपलब्ध है. इसका मतलब यह है कि किसी भी समय सियाचिन में तैनात हर दस सैनिकों में सिर्फ तीन ही खुद को घातक फ्रॉस्टबाइट से बचा सकते हैं जिसका हमला अक्सर शुरू ही हाथ और पैरों की उंगलियों से होता है.

दो साल पहले यानी 2007 में कैग ने नोट किया था कि एमजीओ ने कुल 10 कांट्रैक्ट दिए थे जिसके तहत मंगाई गई चीजों की कीमत करीब 49 करोड़ रुपए थी. इसमें से 29 करोड़ रूपये की चीजें या तो जांच के दौरान अनुपयोगी पाई गईं या फिर सैनिकों ने उन्हें खारिज कर दिया. जब तहलका ने रक्षा मंत्री एके एंटनी को इन गड़बड़ियों का हवाला देते हुए उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि इसकी शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज की जाए तब ही वे इस पर कुछ प्रतिक्रिया देंगे.

साफ है कि सियाचिन में सैनिकों को होने वाली तकलीफों के लिए यहां का निर्दयी मौसम तो जिम्मेदार है ही, पर अपने सैनिकों को ढंग के कपड़े तक उपलब्ध नहीं करवा पाने वाले बेपरवाह देश और एमजीओ की जिम्मेदारी भी कुछ कम नहीं. 

समलैंगिकता की विषमता

सहमति की समलैंगिकता अब दिल्ली में अपराध नहीं है यह तो ठीक है लेकिन यह बताइए कि इसमें इतना उत्सव मनाने का क्या कारण है? समलैंगिकों को राहत महसूस हो कि वे जो अपने दोस्तों के साथ करते हैं वह कानूनी अपराध नहीं माना जाएगा और उन्हें मुक्ति का अहसास हो यह भी समझा जा सकता है. लेकिन अत्याचार से पीड़ित होने का उनका त्रास कानूनी उतना नहीं है जितना सामाजिक और सांस्कृतिक. वे कानूनी रूप से लगातार तंग किए जा रहे हों इसके कोई असंख्य उदाहरण तो कहीं नहीं हैं.

कोई भी समाज मलैंगिकता को सहज स्वस्थ प्रक्रिया मान कर मान्यता और सम्मान नहीं देता. यह बीमारी नहीं तो विचलन तो है ही

लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में चले विधि आयोग के कोई एक सौ उनपचास साल पहले बनाए गए इस कानून के तहत अब तक कुल जमा एक मुकदमे में सन् पैंतीस में सजा हुई है. और इन एक सौ उनपचास साल में कुल छह मामले दर्ज हुए हैं. इन आंकड़ों से इतना तो साफ है कि अपने देश की पुलिस समलैंगिकों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने में कोई बहुत सक्रिय नहीं रही है. उन अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं जिनने अपने विक्टोरियन युग की नैतिकता के चलते भारत में यह कानून बनाया. और आजाद भारत में भी नहीं जिसने हिजड़ों की चली आ रही पुरानी संस्था को मलमास की तरह अपने समाज के ‘‘मित्र अल्प और अनैसर्गिक’’ मैथुन व्यवहार को सम्मान नहीं तो एक तरह की सामाजिकता जरूर दी है. चूंकि यह कानून सख्ती से और व्यापक रूप से कभी लागू ही नहीं किया गया इसलिए कानूनी उत्पीड़न की शिकायत नहीं की जा सकती.

हां, यह हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए कानून यानी धारा 377 का होना ही उत्पीड़न का पर्याप्त कारण हो. लेकिन यह भी उत्पीड़न तभी बन सकता है जब सामाजिक और पारंपरिक मान्यताओं का दबाव भी बहुत ज्यादा हो. मेरा निवेदन है कि माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बताए जा रहे इस फैसले से अपने समाज की पारंपरिक मान्यताएं नहीं बदलती. यह फैसला तो भारत के बहुत छोटे से छोटे वर्ग को प्रभावित करता है. लेकिन शारदा एक्ट और दहेज विरोधी कानून तो लगभग हर परिवार को प्रभावित करता है. फिर भी न दहेज प्रथा रुकी है व बाल विवाह.

यह दलील कानून और अदालती फैसलों को अप्रभावी बताने के लिए नहीं है. कहना बस यही है कि कानून और अदालती फैसलों से सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं और पूर्वाग्रह नहीं बदलते. जो कानून सामाजिक चलन को कानूनी मंजूरी देता है वहीं सचमुच और बिना बड़ी कोशिश के लागू हो जाता है. कानून को समाज के पीछे चलना चाहिए. कानून के जरिए समाज को बदलने की कोशिशें सफल नहीं होती. साम्राज्य चलाने वाले लोग ही अपने कानून से ऐसे समाज को बदलने की कोशिश करते हैं जिसे वे नहीं जानते और जिसमें बदलाव लाने के आंतरिक उपाय जिनकी समझ से बाहर होते हैं.

समलैंगिक समानता की भारतीय लड़ाई की प्रेरणा यूरोप में है तो इसीलिए कि अंग्रेजी मीडिया में भारतीय समलैंगिकता-नपुंसकलिंगता की समझ नहीं है

दिल्ली उच्च न्यायालय के सहमति की समलैंगिकता को अपराध न मानने के फैसले से समलैंगिकता के बारे में भारतीय समाज के पारंपरिक रवैये और पूर्वाग्रह में बदलाव नहीं होगा. होगा भी तो इतने धीमे और अदृश्य तरीके से होगा कि कब हो गया इसका पता ही नहीं चलेगा. यानी समलैंगिकों और उनके समर्थकों का उत्साह आंशिक और अल्पजीवी है. जिन लोगों ने धारा 377 से सहमति की निजी समलैंगिकता को अपराध मुक्त करवाया है वे समाज के रवैये और पूर्वाग्रह को बदलने की बुनियादी सामाजिक कार्य नहीं कर रहे हैं. अगर उनके ध्यान में ऐसा बुनियादी बदलाव लाना होता तो वे अदालत के फैसले पर ऐसा जश्न नहीं मनाते. आप सच पूछें तो उनके जश्न ने समाज की संवेदनशीलता पर चोट ही की है. चोट करना भी बदलाव लाने का एक तरीका है. लेकिन वह तभी असर करता है जब उसकी प्रेरणा अंदर से आती है.

समलैंगिकता को कुल समाज स्वीकार करे इसकी प्रेरणा भारतीय समाज से निकल कर नहीं आई है. समलैंगिक लॉबी के व्यवहार और तौर-तरीके से ही साफ दिखता है कि इसकी प्रेरणा यूरोपीय या पश्चिमी समाज से आई है. उनके व्यवहार से साफ लगता है कि यह एक ऐसे समाज से आई है जिसमें विषमता और असमानता के ज्यादा बुनियादी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलू लगभग हल कर लिए गए हैं. यह एक ऐसे समाज की समस्या लगती है जो सहज उपभोग से अघाया हुआ समाज है और स्वाभाविक संवेदनों से इतना ऊब गया है कि उसे नित नए और सनसनीखेज उपायों की जरूरत होती है. यूरोप का विकसित और परमिसिव समाज समलैंगिकों की समानता की लड़ाई लड़ सकता है. लेकिन भुखमरी, बेरोजगारी और सब तरह की वंचनाओं में किसी प्रकार जीते हुए रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई लड़ने वाले अधिसंख्य भारतीय समाज में समलैंगिकों की समानता तो कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनती. पश्चिमी में भी ईसाइयत ने अगर लैंगिक और मैथुनिक संबंधों पर इतना कट्टर रवैया नहीं अपनाया होता तो वहां भी समलैंगिकों को ऐसा संघर्ष नहीं करना पड़ता. भारत के अंदर से अगर यह लड़ाई निकली होती तो हिजड़ों की दयनीय हालत पर ध्यान गया होता. अदालतों में जाने वाले और हवाई यात्राओं से प्रदर्शनों में भाग लेने वाले भारत के समलैंगिक कौन हैं यह सचाई किसी से छुपी नहीं है.

इस मामले पर अंग्रेजी टीवी चैनलों पर हुई बहस को आपने सुना है? वहां सवाल कुछ ऐसे बनाए जा रहे थे जैसे समलैंगिकों और समलैंगिकता का समर्थन करना प्रगतिशीलता और विकसित होने का सबूत हो और जो लोग सहज प्रकृतिक स्त्री पुरुष लैंगिकता का आग्रह कर रहे हों वे पुराणपंथी और पारंपरिक किस्म के घटिया लोग हों. इससे बड़ी मानसिक विकृति कोई हो नहीं सकती. किसी भी सभ्यता संस्कृति ने समलैंगिकता को प्राकृतिक मान कर उसका उत्सव नहीं मनाया. ईसाइयत ने आखिर पश्चिमी समाज में व्याप्त मान्यताओं को ही धार्मिक वर्जनाओं में शामिल किया. अब शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान में इतना काम हो जाने के बाद भी यही फर्क आया है कि समलैंगिकता को व्यक्त करने का एक तरीका है भले ही यह प्रजनन की सहज स्वाभाविक प्रक्रिया से जुड़ी न हो. कोई भी समाज इसे सहज स्वस्थ प्रक्रिया मान कर मान्यता और सम्मान नहीं देता. यह बीमारी नहीं तो विचलन तो है ही.

लेकिन हमारा अंग्रेजी मीडिया इसे कुछ ऐसे पेश करता है जैसे समलैंगिकता को स्वीकार करना विकसित होना है. पश्चिम में यूरोप के विकसित समाज ने इसे मंजूर किया है तो यह निश्चित ही तरक्की की निशानी है. ये बेचारे नहीं समझते कि ईसाइयत ने जो कि यूरोपीय समाज का धर्म है वहां के लोगों के मन में समलैंगिकता पर कैसी वितृष्णा भर रखी है और वहां इस वर्जना से मुक्त पाना कैसी स्वतंत्रता है. भारत में पहले तो धर्म ही संगठित नहीं है फिर स्थानीयता और व्यक्तिमत्तता को बहुलता और विविधता ने खूब अच्छी तरह समो रखा है. महाभारत के महावीर अजरुन को जब पांडवों के वनवास में छद्म रूप में रहना था तो वे बृहन्नला बन कर रहे. हिजड़ों को हमारे समाज में जो एक सांस्थानिकता दी गई हे वह इसीलिए कि उन्हें भी समाज में उपयोगिता की एक भूमिका मिले. वे आम स्त्री-पुरुष से भिन्न और विचल तो माने गए लेकिन उन्हें भी जगह दी गई. दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जवाहर लाल नेहरू के हवाले से जिस ‘समावेशिता’ का गुण गाया है वह भारतीय समाज का ही एक पारंपरिक गुण है.

लेकिन हमारा अंग्रेजी मीडिया भारतीयता को भी पश्चिमी और अंग्रेजी रास्ते से ही स्वीकार करता है. और जब तक यूरोप और अंग्रेजी-समलैंगिकता और नपुंसकता की भारतीय समाज व्यवस्था में जगह को परिभाषित नहीं करती तब तक हम उन्हें ईसाइयत की नजर से ही देखते जाएंगे. हमारा यह दृष्टि दोष ही हमें यूरोप के सेकुलरज्म और भारत के सर्व धर्म समानत्व का अंतर नहीं समझने देता. ऊपर मैंने कहा है कि समलैंगिक समानता की भारतीय लड़ाई की प्रेरणा यूरोप में है तो इसीलिए कि अंग्रेजी मीडिया में भारतीय समलैंगिकता-नपुंसकलिंगता की समझ नहीं है. इसीलिए ऐसे वाक्य लिखे गए कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से भारत का भूमंडलीकरण हो गया और हम उन विकसित देशों की सूची में आ गए जो समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते.

समलैंगिकता के रुझान पर किसी से भेद करना तो अन्याय है ही और दिल्ली उच्च न्यायालय ने हमारे संविधान का हवाला ठीक ही दिया है. इसमें भी कोई संदेह नहीं कि ब्रिटेन के विक्टोरियन युग की ईसाई नैतिकता भारतीय समाज की नैतिकता नहीं है. यह कहने का मतलब यह भी नहीं कि भारतीय समाज तो शुरू से ही बहुत उदार है और समलैंगिकता को स्वीकार करता है. भारतीय समाज में भी इसका सहज निषेध है. इसलिए वह दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके प्रांगण के बाहर ‘गे लोगों’ के प्रदर्शन को सहज आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं मानता. अंग्रेजी मीडिया ने भारत के मध्य और उच्च मध्यवर्ग के कुछ लोगों की लड़ाई को भारत में न्याय की लड़ाई बना कर पेश करने की कोशिश की है.

यह एक अल्पसंख्यक – बहुत ही अल्पसंख्यक – वर्ग की लड़ाई को एक अल्पसंख्यक मीडिया का प्रोजेक्शन है. हमारा अंग्रेजी मीडिया भारत के अल्पसंख्यक अंग्रेजी समुदाय की राय बताने वाला मीडिया है. और भारत के लोगों की न्याय की लड़ाई कहीं बड़ी और व्यापक है. समझे कि नहीं?    

संकटहारक संकट सिटी

मार्च 2001 की एक शाम, दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर के ऑडिटोरियम के बाहर काफी लोग जमा थे. इसमें डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के शौकीन भी थे और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में जाने का सपना संजोए छात्र भी. मौका था उर्फ प्रोफेसर नाम की एक फिल्म के प्रदर्शन का. दर्शक रोमांचित थे क्योंकि फिल्म को उन्हीं दिनों चल रहे डिजिटल टॉकीज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिल चुका था.

कुंदन शाह कहते हैं, ‘पंकज हमेशा एक तरह का पागलपन दिखाना चाहते हैं, एक ऐसा भंवर जिसमें लोग फंस जाते हैं.

मगर फिल्म का प्रदर्शन नहीं हो पाया. पता चला कि फिल्म को सेंसर बोर्ड की मंजूरी नहीं मिली थी और इसलिए इसका प्रदर्शन हैबिटेट सेंटर में नहीं हो सकता था. इसके बाद ये शो ब्रिटिश काउंसिल के ऑडिटोरियम में करवाने की व्यवस्था की गई. अफरा-तफरी में दर्शक वहां पहुंचे. फिल्म सभी को खूब भायी.

तभी से पंकज आडवाणी की प्रतिभा के चर्चे होने लगे थे. हाल ही में उनकी फिल्म संकट सिटी रिलीज हुई. समीक्षकों ने इसकी खूब तारीफ करते हुए कहा कि बहुत दिनों बाद ऐसी फिल्म देखने को मिली है जिसमें कॉमेडी स्वाभाविक लगती है. कइयों को अब भी याद था कि ये उसी शख्स की फिल्म है जिसने उर्फ प्रोफेसर बनाई थी. देखा जाए तो ये भी अपने आप में एक उपलब्धि है कि कोई ऐसी फिल्म जो रिलीज भी न हो पाई हो, आठ साल बाद भी लोगों को याद रहे. फिल्मों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच लोकप्रिय ब्लॉग पैशन फॉर सिनेमा पर एक प्रशंसक के शब्दों में तो उर्फ प्रोफेसर पिछले 30-40 साल के दौरान हिंदी सिनेमा की तीन सबसे अच्छी कॉमेडी फिल्मों में से एक है.मगर कुछ फिल्म समारोहों के अलावा उर्फ प्रोफेसर कहीं प्रदर्शित नहीं हो सकी. आडवाणी कहते हैं, ‘जब मैं उर्फ प्रोफेसर बना रहा था तो मुझे सेंसर बोर्ड का ख्याल तक नहीं आया. मैंने वही किया जो मैं चाहता था. इसकी एक वजह ये थी कि मैं एक डिजिटल फिल्म बना रहा था. मगर इससे भी बड़ी वजह ये थी कि मुझे फिल्म बनाते हुए मजा आ रहा था.

दर्शकों को चौंकाने के मामले में संकट सिटी, उर्फ प्रोफेसर जैसी तो नहीं है मगर इसे देखकर साफ हो जाता है कि 43 साल के आडवाणी आज भी अपने काम का मजा ले रहे हैं. उनके सिनेमा में अनुराग कश्यप से ज्यादा स्याह और कुंदन शाह की फिल्मों से ज्यादा हास्य रंग देखने को मिलते हैं. संकट सिटी को देखा जाए तो ये सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों को मजे-मजे में दी गई एक श्रंद्धाजंलि की तरह लगती है. इसमें एक कार चोर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता केके मेनन कहते हैं, ‘80 के दशक के दौरान अनगिनत फिल्मों में जो बहुत ही गंभीरता से किया जाता था पंकज ने उसकी पैरोडी की है.

उर्फ प्रोफेसर और संकट सिटी, दोनों में भूमिका निभाने वाले मनोज पाहवा कहते हैं, ‘आप भले ही बारह-चौदह घंटे तक लगातार शूटिंग कर रहे हों मगर पंकज के साथ आपको थकान महसूस नहीं होती.’

आडवाणी की एक खूबी ये भी है कि काम करते हुए वे कभी थकते नहीं. उर्फ प्रोफेसर और संकट सिटी, दोनों में भूमिका निभाने वाले मनोज पाहवा कहते हैं, ‘आप भले ही बारह-चौदह घंटे तक लगातार शूटिंग कर रहे हों मगर पंकज के साथ आपको थकान महसूस नहीं होती.’ पाहवा याद करते हैं कि उर्फ प्रोफेसर के दौरान किस तरह उन्हें महज डेढ़ घंटे में कांदीवली में शूटिंग खत्म करके बांद्रा के एक होटल में आना था और वहां स्वीमिंग पूल में एक सीन शूट करना था. वे कहते हैं, ‘एक सेकेंड टेक का टाइम तक नहीं था मगर एक टेक में ही उन्होंने क्या कमाल का सीन फिल्माया.

ये चमत्कार ही है कि आडवाणी लंबे समय तक इस जोश को बरकरार रख पाए. उनके कई प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चले गए थे. उर्फ प्रोफेसर के अलावा उन्होंने एक फिल्म लवेरिया भी बनाई थी. इसकी स्क्रिप्ट उन्होंने कुंदन शाह के साथ मिलकर लिखी थी. मगर ये रिलीज नहीं हो सकी. उन्होंने बीआई टीवी के लिए फोटो स्टूडियो नाम से एक धारावाहिक भी बनाया. मगर इसका प्रसारण शुरू होने से पहले चैनल ही बंद हो गया.

बड़ौदा की एमएस यूनिवर्सिटी से फाइन आर्ट्स की पढ़ाई के बाद आडवाणी ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से फिल्म एडिटिंग का कोर्स किया. इसके बाद वे फिल्म स्क्रिप्ट्स लिखना सीखना चाहते थे और उनकी दिली इच्छा थी कि वे ये काम कुंदन शाह से सीखें. शाह बताते हैं, ‘पंकज ने मुङो दादर स्टेशन से फोन किया. मैंने कहा, अरे बाबा, मेरे पास तुम्हारे लिए काम नहीं है. मगर उसने कहा, मैं आ रहा हूं.

हंसते हुए आडवाणी कहते हैं, ‘उन्हें लगा कि मैं एडिटिंग का काम चाहता हूं. मगर मैं तो बस उनके साथ लिखना चाहता था.ये 1989 की बात है. आडवाणी कुंदन शाह से मिले और इसके बाद दोनों ने कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया जिसमें 1993 में प्रदर्शित हुई कभी हां कभी ना भी शामिल है. आडवाणी इसके सहलेखक थे. 1993 में उन्होंने चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी के लिए संडे के नाम से एक फिल्म बनाई. इसे दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. हालांकि ये फिल्म भी सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो पाई.

आडवाणी ने कभी कसम खाई थी कि वे कभी टीवी के लिए काम नहीं करेंगे. मगर फिल्मी दुनिया में गाड़ी इतनी बार अटक गई थी कि परेशान होकर उन्होंने अपनी कसम तोड़ दी और चैनल वी के पास गए जिसने उन्हीं दिनों भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर कार्यक्रम बनाने शुरू ही किए थे. चैनल वी के लिए उन्होंने भेजा फ्राई और तूफान टीवी नाम के दो कार्यक्रम बनाए. इन्हें बनाने के दौरान उनकी मुलाकात कई तरह के लोगों से हुई. आडवाणी बताते हैं, ‘मुझे बी ग्रेड फिल्मों के अभिनेताओं, निर्माताओं और निर्देशकों से मिलने का मौका मिला जो सेक्स, हॉरर, डाकू और टारजन टाइप फिल्में बनाते थे.इन कार्यक्रमों से आडवाणी ने काफी कुछ सीखा जिसकी झलक अब उनके काम में भी देखने को मिलती है. अनुराग कश्यप कहते हैं, ‘उनकी फिल्में हाशिए पर पड़े लोगों के इर्द-गिर्द घूमती हैं.कुंदन शाह कहते हैं, ‘पंकज हमेशा एक तरह का पागलपन दिखाना चाहते हैं, एक ऐसा भंवर जिसमें लोग फंस जाते हैं.आलोचकों और दर्शकों, दोनों को उनका ये अंदाज भा रहा है.

 

अविराम आरोह की साधिका

21 जुलाई 2009 को गंगूबाई हंगल का संसार से विदा होना, एक 96 वर्षीय संगीतकार का निधन मात्र नहीं है. ये अपने आप में एक विश्वविद्यालय का बंद होना है. वे इस दौर में किराना घराने का सबसे रोशन चिराग थीं. इस घराने का दूसरा सबसे बड़ा नाम उनके गुरुभाई पं. भीमसेन जोशी हैं. वे भी जीवन की सांध्यवेला में हैं

निषाद पर अद्भुत पकड़ वाले उस्ताद अब्दुल करीम खान, उनकी संगीतज्ञ बेटियों हीराबाई बरोडेकर और रोशनआरा बेगम, उनके शागिर्द पंडित रामभाऊ कुंडगोलकर (सवाई गंधर्व) और उस्ताद आमिर खान ने अपने पीछे गायिकी का ऐसा संग्रह छोड़ा है जो अपने आप में राष्ट्रीय धरोहरहै. गंगूबाई संगीत की इस विस्तृत धरोहर की आखिरी वारिस थीं, जो अपनी संपूर्ण संगीत यात्रा के दौरान कभी भी किराना घराने की मूल विशेषताओं से नहीं हटीं. भजन, अभंग या ठुमरी को एक तरफ रखते हुए उन्होंने अपने गायन में घराने की शास्त्रीयता हमेशा बनाए रखी.

दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के छह दशकों के बाद भी हमने इस विरासत को संभालने, उसे संरक्षित करने और पोषित होने की दिशा में काफी कम प्रयास किए हैं. यदि ऐसा हो पाता तो हमारे यहां पिछली पीढ़ी के मजबूत स्तंभों की जगह लेने को तैयार एक नई पीढ़ी खड़ी दिखती. चौंकाने वाली बात यह भी है कि कलाक्षेत्र में हमारी समृद्धि को बढ़ाने और पोषित करने वाली सोच भी आज भी नदारद है. पिछले महीने ही कर्नाटक संगीत की महान गायिका डीके पट्टम्मल का चेन्नई में निधन हुआ, उस समय भी मेरे दिमाग यही विचार उठे थे. पट्टम्मल भी अपने आप में संगीत विश्वविद्यालय थीं. 20वीं सदी में हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के पुनर्जागरण युग के दो सबसे चमकीले सितारे अब आसमान में नहीं हैं. गंगूबाई और पट्टम्मल दुनिया से विदा हो चुकीं है, जल्द ही कोई इन दोनों की जगह ले पाए फिलहाल ऐसी उम्मीद नहीं है.

कर्नाटक का धारवाड़ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मामले में बेहद उर्वरा भूमि माना जाता है. गंगूबाई का जन्म भी यहीं हंगल गांव में हुआ था. देवदासी परंपरा से संबंधित उनकी मां अंबाबाई और नानी कमलाबाई को कर्नाटक संगीत में महारत हासिल थी.

शुरुआत में गंगूबाई का झुकाव नाट्य संगीत की ओर था. पास-पड़ोस में कहीं रेडियो या ग्रामोफोन पर कोई गाना बज रहा हो तो वे अक्सर वहां पहुंच जाया करती थीं और उसकी नकल करने की कोशिश करतीं थीं. संगीत की तरफ झुकाव को देखते हुए उनके परिवार ने उन्हें हिंदुस्तानी संगीत की शिक्षा देनी शुरु की. शुरुआती शिक्षा-दीक्षा के बाद उन्होंने हुबली के एस कृष्णाचार्य और दत्तुपंत देसाई से गायिकी सीखी. इसके बाद वे कुंडगोल के सवाई गंधर्व की शागिर्द बनीं. सवाई गंधर्व की शागिर्दी अपने आप में नई चुनौती थी. यहीं पर उन्हें पहली बार किराना घराना के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खान से मिलने का मौका मिला, जिन्होंने गंगूबाई से मिलते ही समझ लिया कि यह छोटी लड़की भविष्य की बड़ी संगीतकार बनने वाली है. इसके बाद गंगूबाई का असल प्रशिक्षण शुरू हुआ. अब वे हर दिन हुबली से 30 किमी दूर कुंडगाल जाने लगीं. अपनी पहली मंचीय प्रस्तुति देने से पहले 13 साल तक हर दिन ये क्रम चला.गंगूबाई की संगीत साधना में सबसे बड़े रोड़े उस दौर की रूढ़ियों और समाज ने अटकाए. अपनी आत्मकथा नांना बादुकिना हादू (मेरा जीवनगीत) में वे लिखती हैं कि अपने परिवार से बाहर लोगों ने कभी उन्हें संगीत सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया. कुछ बदमाश लोग रास्ते में उन्हें गाने वालीकहकर गोबर फेंक दिया करते थे. पड़ोसी टीन के डब्बे बजाकर कोशिश करते कि वे अपना रियाज न कर पाएं.

भैरवी, आसावरी तोड़ी, भीमपलास, पूरिया धनश्री, मारवा, केदार और चंद्रकौंस जैसे रागों के गायन में गंगूबाई की जैसी महारत थी, वो दुर्लभ है. बड़ा ही विचित्र विरोधाभास है कि परंपराओं से हर पल विद्रोह कर संगीत सीखने वाली यह उस्तादजिंदगी भर किराना घराने की गायिकी में शुद्धता की कट्टर पैरोकार बनी रही. ये उनकी गायिकी का ही करिश्मा था कि संगीत सुनना भी एक कला बन गया. 

 

मासूम मोहब्बत और दुविधाएं: लव आजकल

फिल्म  लव आजकल

निर्देशक इम्तियाज अली

कलाकार सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण

हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं

इम्तियाज बॉलीवुड की अब तक की सबसे मासूम प्रेम-कहानियां बना रहे हैं और यह तब, जब उनके किरदारों के पास अभूतपूर्व खिलंदड़पना है. ओमकारा या कल हो न हो  से कहीं अधिक लव आजकल के लिए सैफ को याद रखा जाएगा. यह ऐसी फिल्म है जिसे सैफ खास बना देते हैं और जो सैफ को और भी खास बना देती है. यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इम्तियाज ने करीना और सैफ दोनों को उनके करियर की क़रीब क़रीब सर्वश्रेष्ठ फिल्में दी हैं. पिछले दशक की सतही प्रेमकथाओं से निकल कर हम भाग्यशाली समय में हैं कि ऐसी फिल्में देख पा रहे हैं. इम्तियाज के पास वास्तविक और मजेदार संवादों का ऐसा खजाना है कि आप हंसते और अभिभूत रहते हैं. दीपिका भी इतनी शोख और मुखर इससे पहले कभी नहीं दिखी. अगर आपने सोचा न था और जब वी मेट  देखी है तो आपको पहले से ही पता होगा कि नतीजा क्या होगा? कहानी के कुछ हिस्से अलग परिस्थितियों में अलग ढंग से दोहराए जाते हैं और आप उन्हें हर बार पकड़ भी लेते हैं. साथ ही प्रीतम का मधुर संगीत है जिसके कुछ हिस्से इधर उधर से उठा लिए गए हैं. लेकिन तभी आप फिर से फिल्म में डूब जाते हैं क्योंकि कहानी वो तत्व नहीं है जो इम्तियाज की फिल्मों को इतना रोचक बनाती है. वह तत्व है उस कहानी को कहने का तरीका और उसके पीछे की ईमानदारी. आप जानते हैं कि मिलन होगा ही और सब कुछ अच्छा हो जाएगा, लेकिन आप नायक-नायिका के बीच होने वाले संवाद को सुनने को उत्सुक रहते हैं. वे जब पहली बार एक दूसरे को छूते हैं, तब से फिल्म के अंत तक उनके रिश्ते में बच्चों की सी मासूमियत है.

हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं. वह हीर रांझा या रोमियो जूलियट की तरह अमर होने की बजाय साथ रहने को ज्यादा जरूरी समझता है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में हमारे रिश्तों में जो दोस्ती, प्यार और कमिटमेंट के बीच की दुविधाएं हैं, यह उन दुविधाओं की फिल्म है. इसमें आपसी सहमति से होने वाले ब्रेक अप हैं, उनको मनाने के लिए दी गई पार्टियां भी और फिर दूरियों से बढ़ने वाला प्रेम भी जिसे आजकल की आपाधापी भरी जिन्दगी भी मैला नहीं कर पाई है. यह युवाओं की फिल्म है जिसमें गजब की मिठास है.

गौरव सोलंकी 

साझा बयान और अनुमान

टीवी चैनलों से लेकर संसद तक में आजकल भारत और पाकिस्तान द्वारा शर्म-अल-शेख में जारी संयुक्त वक्तव्य पर गर्मागर्म बहसों का दौर जारी है. इस वक्तव्य के दो सबसे विवादित वाक्य हैं-

प्रधानमंत्री की नीयत पर शक करने की कोई वजह नहीं मगर ये भी सच है कि संयुक्त बयान भारतीय दृष्टि से एक बहुत बुरे लेखन और लापरवाही का नमूना है

1- ‘आतंकवाद पर कार्रवाई को समग्र वार्ता प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और इन्हें एक साथ नहीं रखा जाना चाहिए.और

2- ‘प्रधानमंत्री गिलानी ने ये उल्लेख किया कि पाकिस्तान के पास बलोचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में खतरे के बारे में कुछ जानकारियां हैं.

जानकार साझा बयान को पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रहे हैं. उनका कहना है कि हमारे खिलाफ कुछ भी किये जाने पर भी यदि हम उससे बात करते रहेंगे तो ये तो पाकिस्तान को हमारे खिलाफ गतिविधियां चलाने का लाइसेंस देना हुआ. दूसरा, बलोचिस्तान के जिक्र का मतलब ये हुआ कि भारत में आतंकी गतिविधियों को लेकर जिस तरह के आरोप हम पाकिस्तान पर लगाते हैं, वैसे ही इल्जाम लगाने का मौका हमने भी संयुक्त वक्तव्य की थाली में सजा कर उसे दे दिया है.

मगर संसद में प्रधानमंत्री की सफाई ये थी कि पहले वाक्य का मतलब ये है कि वार्ता हो न हो, आतंकवाद पर कार्रवाई होती रहनी चाहिए और चूंकि बलोचिस्तान के मसले पर हमारी नीयत साफ है और ऐसा उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से कहा भी है, इसलिए उन्हें बातचीत से कोई गुरेज नहीं है.

अब यदि संयुक्त वक्तव्य के दोनों विवादित वाक्यों के आगे-पीछे भी देखें तो अर्थ बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है. यदि पहले वाक्य को लें तो इससे ठीक पहले उसी पैरा में लिखा है कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने माना कि आगे बढ़ने का एक मात्र रास्ता संवाद ही हैऔर वाक्य के ठीक बाद उसी पैरा में लिखा है कि भारत पाकिस्तान के साथ बाकी बचे मसलों सहित सभी मसलों पर बातचीत के लिए तैयार है.स्पष्ट है कि जोर यहां बातचीत पर है, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई पर नहीं.

वाक्य नंबर दो यानी बलोचिस्तान पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के पास जानकारियां होने के जिक्र से ठीक पहले संयुक्त वक्तव्य कहता है कि दोनों देश भविष्य में किसी भी आतंकी हमले के बारे में सही समय पर, विश्वसनीय और कार्रवाई योग्य सूचना का आदान-प्रदान करेंगे.मगर संयुक्त वक्तव्य कहीं भी इस मसले पर हमारी नीयत साफ होने का जिक्र नहीं करता. ऐसा प्रतीत होता है कि सूचनाएं साझा करने पर सहमति के तुरंत बाद पाकिस्तान ने बलोचिस्तान और अन्य क्षेत्रों’(कौन से अन्य क्षेत्र?) पर हमें सूचना दे डाली और हम उन्हें तुरंत नकारने की बजाय उन पर विचार कर रहे हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री की नीयत पर शक करने की कोई वजह नहीं मगर ये भी सच है कि संयुक्त बयान भारतीय दृष्टि से एक बहुत बुरे लेखन और लापरवाही का नमूना है. अगर हम ये मानते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत के अलावा हमारे पास कोई और चारा नहीं है और पाकिस्तान मुंबई हमलों में शामिल आतंकियों के खिलाफ अपर्याप्त ही सही मगर कदम उठा रहा है और वो आगे भी ऐसा करता रहे इसके लिए उसे प्रोत्साहित करने और वहां की लोकतांत्रिक सरकार के हाथ थोड़ा मजबूत करने की जरूरत है तो इस दिशा में ये साझा बयान सही तरीके से प्रयास करता नहीं दिखाई देता.

संजय दुबे  

कॉमेडी, गीत-संगीत, दर्शक

बॉलीवुड की कॉमेडी का अधिकांश हिस्सा ‘टॉम एंड जैरी’ का मानवीय संस्करण है. हमें हंसाने के लिए वे रंग से भरे हुए ड्रम में जाकर गिरते हैं, बिजली के झटके खाते हैं और पिटते हैं. ‘इश्क’ में हवा में लटकी संकरी पाइप पर चलते आमिर-अजय और ‘हंगामा’ में मंदिर के घंटे की तरह बार-बार बजाए जाते राजपाल यादव को देखकर हम पेट पकड़ कर हंसते हैं. उन्हें हमेशा अपनी जान जोखिम में डालकर हमें हंसाना होता है. उनकी स्थिति जितनी दयनीय होती है, फिल्म उतनी ही मजेदार होती है.

गुलजार ने ‘अंगूर’ बनाई थी जो एक अविस्मरणीय कॉमेडी है. वहां भी यही था- दो बिछुड़े हुए हमशक्ल भाई और बाकी लोगों की दुविधाएं. यही ‘गोलमाल’ में भी था, जब एक अमोल को मूंछें लगाकर अपना ही जुड़वां भाई बनना पड़ा था 

प्रियदर्शन की ‘हेराफेरी’ से चूहे-बिल्ली की भागदौड़ वाले अंत की श्रंखला की शुरुआत हुई जो ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘भागमभाग’ और ‘वेलकम’ से होती हुई ‘सिंह इज किंग’ तक बिना रुके जारी है. कभी ढोल तो कभी लॉटरी के टिकट के लिए मची यह भागदौड़, ‘हेराफेरी’ के बाद लगभग सभी कॉमेडी फिल्मों में किसी न किसी तरह इस्तेमाल की गई.

पर यह भागमभाग भी नई नहीं है. वर्षों पहले कुन्दन शाह ने ‘जाने भी दो यारों’ से बॉलीवुड को इसका रास्ता दिखाया था. उसके महाभारत के लोकप्रिय दृश्य की रेसिपी का प्रियदर्शन और अनीस बज्मी आज भी प्रयोग कर रहे हैं. ‘हंगामा’ इसके लिए आदर्श कहानी है. लड़की नौकरी पाने के लिए बड़े आदमी की बेटी का नाटक करती है. लड़का पैसे वाली समझ उससे नजदीकियाँ बढ़ाता है. बड़ा आदमी अपनी पत्नी पर शक करने लगता है और उसकी पत्नी उस पर. फिर एक और लड़का, एक और सेठ, एक नौकर, लड़की से शादी का इच्छुक एक और लड़का, लड़की का मकान मालिक और उसकी पत्नी. हो गई फिल्म तैयार. इनमें से दो लोगों का एक ही नाम रख दीजिए या किसी को किसी से कुछ झूठ कहलवा दीजिए. अब हर किसी को कोई न कोई कनफ्यूजन है. उन्हें आपस में खेलने दीजिए और बन गई आपकी ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’.

शेक्सपीयर के इसी नाम के नाटक पर गुलजार ने ‘अंगूर’ बनाई थी जो एक अविस्मरणीय कॉमेडी है. वहां भी यही था- दो बिछुड़े हुए हमशक्ल भाई और बाकी लोगों की दुविधाएं. यही ‘गोलमाल’ में भी था, जब एक अमोल को मूंछें लगाकर अपना ही जुड़वां भाई बनना पड़ा था. एक व्यक्ति की झूठी पहचान ही ‘चुपके चुपके’ में गुदगुदाती है और आवाज की झूठी पहचान ‘पड़ोसन’ में.

खालिस कॉमेडी बनाने का चलन तो बहुत नया है. बॉलीवुड की अधिकतर फिल्में तो रोमांस, एक्शन, ड्रामा, कॉमेडी सबको मिलाकर बनाई जाती रही हैं. ऐसे में हीरो का साथी बनकर कॉमेडी करने का सिलसिला जॉनी वाकर ने गुरु दत्त की फिल्मों से शुरु  किया और फिर यह रिवाज ही बन गया. ‘प्यासा’ का ‘सर जो तेरा चकराए’ इतना लोकप्रिय हुआ कि फिर कॉमेडियन के हिस्से एक गीत भी आने लगा और एक नायिका भी. फिर जॉनी वाकर की जगह महमूद और राजेन्द्रनाथ ने ले ली. महमूद ने हँसाने के लिए श्लीलता की सीमा लाँघना अनुचित नहीं समझ और मद्रासी वेशभूषा में महमूद का लुंगी उठाना बॉलीवुड की कॉमेडी को फूहड़ता की ओर खींच लाया. इन फिल्मों ने द्विअर्थी संवाद बोलने वाले हास्य चरित्न पैदा किए, जिन्हें बाद में शक्ति कपूर और कादर खान ने जम कर जिया. भारतीय समाज में वैसे भी हास्य गंभीरता से काफी निचले स्तर का माना जाता रहा है इसलिए बड़े हीरो हास्य अभिनेता की इमेज में बंधने से कतराते रहे हैं. पूरे परिवार के साथ बैठकर न देखी जा सकने वाली कॉमेडी ने इस दूरी को और बढ़ा दिया. इस दिशा में भी ‘हेराफेरी’ महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई. वह समय था जब गोविन्दा और डेविड धवन की जोड़ी की ‘राजा बाबू’, ‘दूल्हे राजा’ और ‘कुली नं 1’ जैसी फिल्में ही बॉलीवुड की कॉमेडी बनकर रह गई थीं. वह कॉमेडी के अगली पंक्ति के दशर्कों तक सिमट जाने के भय का समय था, जब ‘हेराफेरी’ स्वस्थ हास्य लेकर आई. हालांकि बार बार दोहराए जाने से वह ताजगी भी छूटती रही, फिर भी ‘हेराफेरी’ ने बॉलीवुड को कॉमेडियन नहीं कॉमेडी हीरो दिया, जो उससे तुरंत पहले के कॉमेडियनों की तरह अपने नाटेपन, अन्धेपन, तुतलाहट, मिमिक्री या भद्दे चुटकुलों से नहीं हंसाता था.

इसी बीच हॉलीवुड के असर से कॉमेडी की एक नई किस्म ‘सेक्स कॉमेडी’ भी आ गई. ‘मस्ती’ और ‘क्या कूल हैं हम’ अपने ‘एक’ ही अर्थ वाले संवादों से सजी बदलती बयार की फिल्में हैं. यह वही सीमा है, जिसे महमूद और डेविड धवन बार-बार छूकर लौट आए. खुशी इस बात की है कि ‘खोसला का घोंसला’ और ‘भेजा फ्राई’ जैसी फिल्में उस शिकायत को दूर कर रही हैं, जो कहती है कि बॉलीवुड की कॉमेडी हमेशा बेवकूफाना और सतही रही है.

गीत-संगीत

दिल जलता है तो यह उसे जलने देने का नहीं, उससे बीड़ी जला लेने का समय है अब की नायिकाएं ‘न जाओ सैंया’ का अनुरोध करती हुई रोती नहीं, बल्कि  छोड़कर जाने की स्थिति में ‘तू साला काम से गया’ की धमकी देती हैं. यह ‘फूलों की रानी, बहारों की मलिका’ से ‘अपुन बोला, तू मेरी लैला’ तक का परिवर्तन है ‘लग जा गले से, फिर कभी.’ की जगह ‘लग जा गले से मेरे ठां करके’ ने ले ली है और लता के ‘तेरे बिना जिया जाए ना’ का ‘तेरे बिन मैं यूं कैसे जिया’ का आतिफ असलमी संस्करण आ गया है. जमाने के डर से जहां कभी नायिका आंचल को भी छोड़ देने को कहती थी, वही आज अपने अधनंगे बदन को छूने के लिए नशीली आवाज में ‘जरा जरा टच मी’ कहकर पुकारती है.

कहानी में सब मसाले रखे गए, म्यूजिक  में भी रखने जरूरी रहे. कम से कम एक सैड सांग अपरिहार्य है चाहे वह ‘पूरब और पश्चिम’ का ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ हो या ‘जोधा-अकबर’ का ‘जश्ने बहारां’हालांकि जरा-जरा बहकते इस तन-बदन की प्यास ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ की गुहार जैसी ही है और ‘कोई नहीं है कमरे में’ के पीछे छिपी हुई संभावनाएं ‘हम तुम एक कमरे में बन्द हों’ से बहुत भिन्न नहीं है. फिर भी फिल्मी गानों में सब कुछ अलग, नया और बोल्ड है. यह नयापन नकारात्मक, खुरदरा या अश्लील ही हो, ऐसा भी नहीं है. ‘कजरारे’ की उपमाएं और ‘मस्ती की पाठशाला’ नई सदी की उपलब्धियां हैं. ‘चांद सी महबूबा होगी’, ऐसा तो बहुत पहले सोच लिया था लेकिन ‘कभी कभी आस-पास चांद रहता है’ का विश्वास इतना नजदीक तो नहीं था और कहां थी चांद से होकर जाने वाली सड़क पर आगे अपना मकान होने की खूबसूरत कल्पना. क्या ‘जिस्म’ का ‘आवारापन बंजारापन’, ‘आवारा’ के ‘आवारा हूं’ पर भारी नहीं पड़ता और क्या ‘यूं ही चला चल राही’ की फक्कड़ दार्शनिकता ‘जीना यहां मरना यहां’ की सादगी याद नहीं दिलाती? ‘नो स्मोकिंग’ का ‘हयात फूंक दे, हवास फूंक दे’ ‘प्यासा’ के ‘जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया’ जितना विद्रोही ही तो है.

हिंदी फिल्मों के संगीत का सफर शूटिंग के साथ-साथ झाड़ियों के पीछे छिपकर वाद्ययंत्न बजाते संगीतकारों और गीत गाते अभिनेताओं से लेकर अत्याधुनिक यंत्नों की मदद से रिकॉर्डिग स्टूडियो में संगीत रचने तक का सफर है और अगर गायकी की बात की जाए तो इस सफर के हर टुकड़े में मखमली और नर्म आवाजें ही भारत की पहली पसंद रही हैं, चाहे वे रफी और किशोर हों या उदित नारायण और सोनू निगम. गायिकाओं में लता की पतली आवाज की मिठास पिछले पचास वर्षो में इतनी लोकप्रिय रही कि नरगिस से करीना तक सब नायिकाओं (पर्दे के पीछे गायिकाओं) ने लगभग एक जैसी आवाज में गाया.

हर फिल्म में औसतन पांच या छ: गाने रहे जिन्होंने अक्सर कहानी के प्रवाह को रोककर मनोरंजक ब्रेक का काम किया. प्राय: वे फिल्म की कहानी से इतने अलग रहे कि वीडियो या सीडी पर फिल्म देखते समय उन्हें हर घर में बेहिचक फास्ट फॉरवर्ड किया जाता रहा. लेकिन वे चित्नहारों, रंगोलियों, बिनाका गीतमालाओं, नाई की दुकानों, शादियों के बैंडबाजों और ऑटो रिक्शों में जमकर बजे और ‘हम आपके हैं कौन’ व ‘दिल तो पागल है’ अपने गीतों के कारण ही इतनी बड़ी हिट बनीं.

जिस तरह फिल्मों कहानी में सब मसाले रखे गए, म्यूजिक  में भी रखने जरूरी रहे. कम से कम एक सैड सांग अपरिहार्य है चाहे वह ‘पूरब और पश्चिम’ का ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ हो या ‘जोधा-अकबर’ का ‘जश्ने बहारां’. उसे नायक नायिकाओं ने या तो ‘दिल के झरोखे में’ गाने वाले शम्मी कपूर की तरह पियानो पर गाया या किसी पार्टी में बेवफा प्रेमी/प्रेमिका, उनके नए साथी और शराब पीते सूट बूट वाले बेवकूफ से दिखने वाले लोगों के बीच धीमे कदमों से टहलते हुए. धीरे धीरे पियानो छूटते गए और गाना गाते हीरो के हाथ में वायलिन या गिटार आ गए. ‘कर्ज’ और ‘सागर’ में गिटार बजाते ऋषि कपूर इस परिवर्तन के अगुवा रहे. उन्होंने ‘डफली वाले’ की पुकार पर डफली भी बजाई और गिटार भी जिसे वे ‘पापा कहते हैं’ गाते आमिर और ‘ओ ओ जाने जाना’ गाते सलमान को थमा गए, जिन्होंने उसे ‘रॉक ऑन’ के अर्जुन रामपाल को दे दिया. गीतों के फिल्मांकन में आता यह बदलाव पर्दे के पीछे बन रहे संगीत में आते बदलाव का ही प्रतिबिम्ब था. यह ढोलक, शहनाई, हारमोनियम और सारंगी जैसे भारतीय वाद्ययंत्नों में पश्चिम के पियानो, वायलिन और गिटार का जुड़ना था, जिसने अविस्मरणीय धुनें पैदा की.

उदासी के गाने की तरह ही एक बारिश का उत्तेजक गीत, एक मुजरे का गीत, एक लोकगीत और एक भक्ति गीत आमतौर पर डाले जाते रहे हैं.  बाकी बचे गाने जरूरत के हिसाब से संयोग श्रंगार के रोमांटिक गीत होते हैं, जिनका फिल्मांकन पहाड़ों, बगीचों या रेगिस्तान में होता रहा है. ‘हाय हाय ये मजबूरी’ से ‘ऑन द रूफ, इन द रेन’ तक बरसात के गीत और ‘दिल्ली की सर्दी’ और ‘इश्क़ कमीना’ जैसे आइटम गाने, कैंची चलाते सख्त सेंसर और जिद्दी दर्शक की इच्छाओं के बीच का रास्ता रहे, जिनके बोल और उन पर अभिनेताओं के हावभाव उस कमी को पूरा करते रहे, जिसकी फिल्म की कहानी में अनुमति नहीं थी. भक्तिगीत मुख्यत: हिन्दू देवी देवताओं के लिए गाए गए जिसमें पिछले कुछ वर्षों में सूफी संगीत और गुरबाणी भी जुड़ गए.

‘जागते रहो’ के ‘मैं कोई झूठ बोलेया’ के जमाने से ‘मौजां ही मौजां’ तक पंजाबी गीत बॉलीवुड में सब पर हावी रहे. कभी कभी ‘पधारो म्हारे देस’ और ‘नींबूड़ा’ जैसे राजस्थानी लोकगीत और ‘ओ मांझी रे, अपना किनारा’ जैसे भटियाली गीत भी सुनाई पड़े और इक्का-दुक्का ‘हुतूतू’ के ‘निकला, नीम के तले से निकला’ जैसा लावणी संगीत.

दर्शक

यह सब माथापच्ची जिसके लिए है और मुहूर्त शॉट से पहले जिसके लिए नारियल फोड़ा जाता है या फिल्म की शुरु आत से पहले स्क्रीन पर गायत्नी मंत्न पढ़ा जाता है, वह ईश्वर नहीं, परमपूज्य दर्शक है. ‘रंगीला’ का मुन्ना कहता भी है, ‘अपुन पब्लिक है. अपुन का पैसा वसूल नहीं तो अपुन किसी का भी डब्बा गुल करवा सकता है.’ और पब्लिक ऐसा ऊंट है, जिसकी करवटों का किसी को अंदाज नहीं. खुद मुन्ना यानी आमिर को भी नहीं. तभी तो ‘लगान’ और ‘दिल चाहता है’ के तूफान के बाद ‘मंगल पाण्डे’ चारों खाने चित्त हो जाती है.

‘रंगीला’ का मुन्ना कहता भी है, ‘अपुन पब्लिक है. अपुन का पैसा वसूल नहीं तो अपुन किसी का भी डब्बा गुल करवा सकता है.’ और पब्लिक ऐसा ऊंट है, जिसकी करवटों का किसी को अंदाज नहीं

सत्तर के दशक के मध्य तक भारत के उच्च और शिक्षित वर्ग ने हिन्दी फिल्मों को अछूत सा समझकर उससे एक दूरी बनाए रखी. लेकिन जब सरकार ने विदेशी फिल्मों की संख्या को नियंत्नित करना शुरु किया और अंग्रेजी फिल्में दिखाने वाले सिनेमाहॉलों के पास दिखाने को कुछ नहीं बचा तो मजबूरन उन्हें हिन्दीं फिल्में लगानी पड़ीं. यह श्याम बेनेगल और समानांतर सिनेमा के उदय का समय था, जिसने बुद्धजीवी समझे जाने वाले भारतीयों को बॉलीवुड का उपभोक्ता बनाया. लगभग इसी समय में कई फिल्मी पत्निकाएं शुरु हुईं और समीक्षकों ने फिल्मों के साथ साथ दशर्कों को भी दो भागों में बांटना आरंभ कर दिया. मजेदार बात यह है कि यह वर्ग-विभाजन परदे से सीटों की दूरी जैसे अति-भौतिक आधार पर हुआ. अगली पंक्तियों का टिकट पिछली पंक्तियों से कम था और उनमें बैठने वाले दशर्क अपेक्षाकृत गरीब थे. उन्हें मारधाड़ और मसालेदार नाटकीयता वाली फिल्में पसंद थीं. वे मेहनतकश थे और फिल्में देखकर थकान मिटाना चाहते थे. वे अपनी पसंद के दृश्यों पर सीटियां बजाते थे और पसंद न आने पर खुलकर गालियां देते थे. पिछली पंक्तियों के दशर्क कुछ अधिक शिक्षित और धनी थे. इसीलिए वे कुछ अधिक कलात्मक रुचियों वाले समझे गए. ये परिवार के साथ फिल्म देखने वाले दशर्क थे, इसीलिए सिनेमाहॉल में चुपचाप फिल्में देखते थे. इन में से कुछ के लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बौद्धिक खुराक भी था.

फिर प्रवासी भारतीयों का एक तीसरा दशर्क-वर्ग आया. उनकी तादाद कम थी, लेकिन वे देश में रहने वाले मध्यमवर्गीय दशर्कों की अपेक्षा कहीं ज्यादा मुनाफा दे सकता था. नब्बे के दशक में खास इन्हें लक्ष्य कर फिल्में बनाई जाने लगीं. इन फिल्मों का एनआरआई शादियों और त्योहारों से प्रेम के सांचे में ढला हुआ है. उसे भारत की बहुत याद आती है. इन फिल्मों ने उसे इस तरह प्रस्तुत किया है जैसे वह बनारस के मिश्रा जी से कहीं अधिक संस्कारित और साथ ही रूढ़िवादी भी है.

उनके बाद महानगरों में मल्टीप्लेक्स खुलने लगे और एक चौथा दर्शक वर्ग आया जो दो सौ रुपए की टिकट खरीदकर फिल्म देख सकता है और मध्यांतर में सौ रुपए के पॉपकॉर्न खा सकता है. पिछले कुछ वर्षो से बॉलीवुड के दिमाग में यही दर्शक बैठा हुआ है और इसी के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं. महानगरों में सिनेमाहॉल में जाकर फिल्म देखना अब मध्यवर्ग के बूते की बात नहीं रह गई है. अब वह केबल पर फिल्में देखता है या डीवीडी पर देखने के लिए मजबूरी में पाइरेसी को पोषित करता है. बॉलीवुड बिहार और उत्तरप्रदेश के उस कस्बाई दर्शक को भूल गया है, जो एक समय उसका मुख्य उपभोक्ता हुआ करता था. अब यह पेड़ की उस फुनगी की कहानी है, जो अपनी जड़ों को ही नहीं पहचानती.

बॉलीवुड के दस सांचे

खलनायक, कामकाजी

हर समय ने अपने खलनायक खुद चुने. पचास और साठ के दशक के तीन मुख्य खलनायक थे- साहूकार, डाकू और जमींदार. नाक पर चश्मा चढ़ाए हुए खूसट साहूकार मुट्ठी भर चावल के दानों के लिए ‘दो बीघा जमीन’ के कागजों पर अनपढ़ गरीब किसानों का अंगूठा लगवा लेते थे और फिर किसान की पीढ़ियां उस कर्ज का ब्याज चुकाते चुकाते जीती-मरती रहती थी. इसी तरह किसान जमींदारों के खेतों में बेगार करते-करते आहें भरते रहे और अय्याश जमींदार गांव की बहू बेटियों पर अपनी वहशी नजरें जमाए रहे. डाकुओं की फिल्में उस समय के मध्य भारत में उनके आतंक का प्रतिबिम्ब थीं. तब की हिंसा प्रत्यक्ष हिंसा नहीं थी और न ही वह संघर्ष राम-रावण के पारम्परिक संघर्ष जैसा था. वह कुचलने वाले और कुचले गए के बीच की लड़ाई थी, जिसमें नायक अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए लड़ता था. सत्तर और अस्सी के दशक में तस्कर और व्यापारी विलेन बन गए और अब वे अधिक सुविधा-सम्पन्न और खतरनाक भी हो गए थे. पहलवानों-लठैतों का स्थान हट्टे कट्टे शहरी गुंडों ने ले लिया, जो अक्सर धारीदार टी शर्ट पहने और गंजे होते थे. चूंकि स्मगलिंग विदेशों में होती थी, इसलिए खलनायक के साथ एक अंग्रेज सा दिखने वाला किरदार भी परिदृश्य में आने लगा, जो अपने दर्शर्कों की सहूलियत के लिए हिन्दी बोलता था. वह विदेशी कभी-कभी अरब का शेख भी होता था, जिसकी विचित्न वेशभूषा का फायदा हीरो ने अक्सर उसके वेश में तस्करी के अड्डों पर पहुंचकर उठाया. यही वह फिल्में थीं, जिन्हें देखकर इस गरीब देश का बच्चा-बच्चा सोने के बिस्कुटों के बारे में जानने लगा.

इसी बीच 1975 में एक ऐसा खलनायक आया जिसके बुरा होने की कोई वजह नहीं थी. वह बस बुरा था. वह गब्बर सिंह था, जिसका नाम सुनकर पचास कोस दूर रोते बच्चे भी सो जाते थे

अब यह युद्ध राम-रावण का हो गया था, जिसमें नायक समाज और देश के लिए लड़ता था और खलनायक एक ऐसी शक्ति थी, जो पूरे देश पर अपना अधिकार चाहती थी. इस दौर ने अजीबोगरीब दिखने वाले, बच्चों की कहानियों के राक्षसों सी हंसी हंसने वाले, सिंहासन पर बैठे, काल्पनिक दुनिया के से खलनायकों को जन्म दिया. ‘कर्मा’ का डॉक्टर डैंग और ‘मिस्टर इंडिया’ का मोगेंबो इन्हीं में से थे.

कभी कभी पुलिस वाला नायक खलनायक के माल से लदे हुए ट्रक को जब्त कर लेता था (माल कौनसा होता था, यह कभी नहीं बताया जाता था), जिसे छुड़ाने के लिए तीसरे खलनायक की आवश्यकता पड़ती थी, जो भ्रष्ट नेता था. कहीं-कहीं इस कड़ी में बेईमान पुलिस अफसर भी जुड़ गए और इस तरह बनी चांडाल चौकड़ी से एंथनी से लेकर मिस्टर इंडिया तक सबको जूझना पड़ा.

यही वह दौर था, जब खलनायक अपने खास स्टाइल में किसी ऐसे जुमले को बार बार दोहराने लगे, जो दशर्कों की जुबान पर चढ़ कर बोल सके. वह चाहे ‘बॉबी’ का प्रेम नाम है मेरा..प्रेम चोपड़ा हो या ‘राम-लखन’ के गुलशन ग्रोवर का बैड मैन. और मोगेंबो खुश हुआ को आखिर कौन भूल सकता है? उस दौर के खलनायक अपने आलीशान बंगले में बने स्विमिंग पूल में नहाया करते थे और बाहर उनके इंतजार में मोना या लिली तौलिया और व्हिस्की लिए खड़ी रहती थी.

गीत-संगीत से भरी हिन्दी फिल्मों की अजीब बात यह थी कि खलनायकों ने गाने देखे-सुने तो, लेकिन कभी गाए नहीं. उन्हें वास्तविक मनुष्य से इतना भिन्न दिखाया गया कि ऐसा लगता ही नहीं था कि वे किसी संवेदना को समझ सकते हैं या किसी से प्रेम कर सकते हैं. यही कारण था कि प्राण को जब ‘जंजीर’ में ‘यारी है ईमान मेरा’ गाना था तो वे बहुत मुश्किल से सहज हो पाए थे. यह वही प्राण थे, जिन्होंने अपने दुष्चरित्नों से इतनी नफरत पैदा की कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना ही छोड़ दिया.

इसी बीच 1975 में एक ऐसा खलनायक आया जिसके बुरा होने की कोई वजह नहीं थी. वह बस बुरा था. वह गब्बर सिंह था, जिसका नाम सुनकर पचास कोस दूर रोते बच्चे भी सो जाते थे. वह बाकी डकैतों की तरह परिस्थितिवश डाकू नहीं बना था. हिन्दी समझने वाला ऐसा भारतीय मुश्किल ही मिलेगा, जिसने ‘अब तेरा क्या होगा बे कालिया’ न सुना हो.

अमजद खान के बाद वैसा खौफ  सिर्फ  ‘दुश्मन’ और ‘संघर्ष’ के आशुतोष राणा ने ही पैदा किया. इन दोनों फिल्मों का सीरियल किलर नब्बे के दशक के उत्तरार्ध के उन खलनायकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो मानसिक रूप से बीमार थे. ‘दीवानगी’ के अजय देवगन और ‘कौन’ की उर्मिला भी ऐसे ही खलनायक हैं.

मानसिक अपंगता के साथ शारीरिक अपंगता भी बॉलीवुड में खलनायकों के गुण की तरह इस्तेमाल की जाती रही है. अपनी क्षतिग्रस्त आंख के कारण ललिता पंवार सालों तक दुष्ट सास के रोल करती रहीं. डाकुओं को भी कई दफे एक आँख पर काली पट्टी लगाए हुए दिखाया गया. ‘डर’ के हकलाते शाहरुख और ‘ओमकारा’ का लंगड़ा त्यागी भी इसी कड़ी में हैं.

बुरी सासों के अलावा स्त्नियों के खलनायिका बनने के बस गिने चुने उदाहरण हैं. या तो ‘खलनायिका’ की अनु अग्रवाल हैं या ‘गुप्त’ की काजोल और ‘कलयुग’ की अमृता सिंह.

इसी बीच हीरो हीरोइन के घर से भागकर शादी करने वाली फिल्मों ने उनके माता-पिता को ही खलनायक बनाना शुरु कर दिया. इसके उलट ‘बागबान’ और ‘अवतार’ की संतानें अपने माता-पिता की खलनायक ही बन गईं. कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा तो ‘रोजा’ ने पाकिस्तान और आतंकवादियों के रूप में बॉलीवुड को एक नया दुश्मन दिया. इन्ही दिनों बॉलीवुड के चरित्न वास्तविक जीवन के चरित्नों की तरह आधे भले-आधे बुरे होने लगे. ‘परिंदा’, ‘बाजीगर’, ‘डर’, ‘अंजाम’ और अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों ने एक नई परिपाटी शुरु की, जिनके मुख्य चरित्न नकारात्मकता लिए हुए थे. नायक और खलनायक के बीच की रेखा कई बार इतनी धुंधली पड़ गई कि ‘पिंजर’ में मनोज और ‘1947:अर्थ’ में आमिर इस रेखा के कभी इस तो कभी उस पार आते-जाते रहे. अब्बास-मस्तान और रामगोपाल वर्मा की डार्क फिल्मों ने ऐसे धूसर चरित्नों को और बढ़ावा दिया. संजय दत्त ने डॉन के अनेक किरदार निभाए. इसी दौर में माफिया खलनायक बना.

कभी कभी इन सब रीतियों से हटकर खलनायक अमूर्त भी रहे. ‘जख्म’ में धर्म मुख्य विलेन था और ‘साथिया’ में गलतफहमी. ‘अभिमान’ में अहं खलनायक था तो ‘दिल्ली 6’ में अदृश्य काला बन्दर. और अब यह तो आप ही तय करेंगे कि ‘ब्लू अम्ब्रेला’ की नीली निर्जीव छतरी और ‘तारे जमीन पर’ के नन्द किशोर अवस्थी भी नई तरह के खलनायक ही हैं या कुछ और?

कामकाजी

जब नायक गुंडों को पस्त कर चुका होता है, तब पुलिस देरी से पहुंचती है और लाउड स्पीकर पर ‘पुलिस ने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है’ के फर्जी ऐलान के बाद स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा ‘दी एंड’ लिखा आने से पहले ‘हैंड्स अप, हैंड्स अप’ करती हुई हथकड़ियां पहनाती है. इस ड्रामे से कुछ देर पहले तक वह अपनी लम्बी नाकामी को ‘कानून के हाथ बहुत लम्बे हैं’ की झूठी दिलासा के पीछे छिपाती रहती है.

हाल के कुछ कम्प्यूटर इंजीनियरों से पहले इंजीनियर सदा ऊंची इमारत या पुल बनवाने वाले ही रहे हैं, जो सिर पर पीला टोप पहनते हैं. वे अपने नीचे काम करने वाले मजदूरों के चहेते रहे हैं

अदालतें प्राइमरी पाठशाला की तरह शोरगुल में डूबी रहती हैं, जिन्हें शांत करने के लिए जज साहब आते ही ‘ऑर्डर ऑर्डर’ का हथौड़ा पीटते हैं. वक़ील अक्सर ‘ऑब्जेक्शन यॉर ऑनर’ कहकर आपत्ति जताते हैं और जवाब में ‘ऑब्जेक्शन सस्टेंड’ या ऑब्जेक्शन ओवररूल्ड’ सुनते हैं, जिनका अर्थ वकीलों के उतरे या खुश चेहरे देखे बिना देसी दशर्क कभी नहीं समझ पाता. जरूरत पड़ने पर अचानक नायक या नायिका के पास वकालत की डिग्री होने का रहस्य कई बार खुलता रहा है और बिना प्रैक्टिस उन्होंने तीसियों साल के अनुभवी वकीलों को अनगिनत बार हराया है.

पुरानी फिल्मों के डॉक्टर एक जादुई काला सूटकेस साथ रखते हैं, जिसमें हर बीमारी की दवा होती है. वे शायद ऐसे मेडिकल कॉलेज से पढ़कर आए हैं, जहां घिसी-पिटी बातें दोहराने का भी कोर्स होता होगा. इसीलिए ‘इन्हें आराम की जरूरत है’, ‘इन्हें दवा की नहीं दुआ की जरूरत है’, कहने के साथ साथ कभी-कभी वे ‘इसकी क्या जरूरत है’ कहकर फीस लेने से भी इनकार करते रहे हैं. नए डॉक्टर घर नहीं आते, इसलिए अब अस्पतालों में जाना होता है. पर अब भी वे किसी की मौत पर ‘सॉरी’ और बचने पर ‘भगवान का लाख-लाख शुक्र है’ कहना नहीं भूलते.

गांव के स्कूलों में हमेशा एक ही मास्टरजी होते हैं, जो बूढ़े होते हैं, मोटे फ्रेम वाला चश्मा लगाते हैं, कुरता पाजामा पहनते हैं, झोला लटकाए रखते हैं और बेबस दिखते हैं. पीपल के पेड़ के तने पर ब्लैकबोर्ड टिकाकर वे या तो पहाड़े रटवाते हैं या फ़ुर्सत में नैतिक शिक्षा पढ़ाते हैं. कई बार उन्हें अपनी नैतिकता का नतीजा सरपंच या ठाकुर के हाथों अपनी जान गंवाकर भी भुगतना पड़ता है. उनके उलट शहरों के अध्यापक अंग्रेजी बोलते हैं और कमरे की दीवार पर टंगे ब्लैक या व्हाइट बोर्ड पर फिजिक्स या गणित पढ़ाते हैं. कभी-कभी कैमिस्ट्री भी. कॉलेज की कक्षाएं प्रेमपत्नों को बेंच के नीचे से मंजिल तक पहुंचाने के लिए होती हैं.

हाल के कुछ कम्प्यूटर इंजीनियरों से पहले इंजीनियर सदा ऊंची इमारत या पुल बनवाने वाले ही रहे हैं, जो सिर पर पीला टोप पहनते हैं. वे अपने नीचे काम करने वाले मजदूरों के चहेते रहे हैं. सत्तर के दशक में पढ़े लिखे बेरोजगारों को दिखाने के लिए भी उनका ही इस्तेमाल किया गया है. जेंटलमेन बनने वाला राजू भी वैसा ही है.

मजदूरों का यूनियन लीडर ऊपर से चरित्नवान दिखता है, लेकिन अक्सर लालची होता है. वह हड़ताल इसीलिए करवाता है ताकि उसे खत्म करने के एवज में मिल मालिक से मोटी रकम ऐंठ सके. मजदूर और ठेलेवाले अब भोजपुरी लहजे में हिंदी बोलने वाले ही होते हैं. कुली का रोल यदि दस सेकंड से लम्बा खिंचे तो वह निश्चित रूप से फिल्म का नायक है.

नौकर कन्धे पर अंगोछा रखते हैं और रसोइये मोटे होते हैं. टैक्सी और ऑटो ड्राइवर ज्यादा बोलते हैं और ईमानदार होते हैं. हालांकि बहुत सी परम्पराओं के साथ ‘देव डी’ इसे भी तोड़ देती है. टाइपिस्ट और सेक्रेटरी स्कर्ट पहनने वाली एंग्लो इंडियन लड़कियां रहीं हैं, जो नौकरी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं. एयर होस्टेस सुन्दर होती हैं, जो अमीरजादों पर आसानी से फिदा हो जाती हैं और आप ‘गरम मसाला’ के अक्षय कुमार जितने प्रतिभावान हों तो अमीरी के बिना भी एक साथ तीन-तीन चक्कर चला सकते हैं.

परिवार, दृश्य

बॉलीवुड के दस सांचे

नायक, नायिका, जाति व धर्म

वह अपने ढाई किलो के हाथ से जमीन में गड़ा नल उखाड़ कर चिल्लाता है तो पूरी पाकिस्तानी सेना के होश फाक्ता हो जाते हैं. वह 120 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर यू टर्न ले सकता है और उसकी मोटरसाइकिल रास्ते में आने वाली रेलगाड़ियों के ऊपर से अक्सर छलांग मारकर गुजरती है. वह रिक्शे से लेकर हवाई जहाज तक चलाना जानता है. उसका दिमाग इतना तेज है कि किसी भी टाइम बम को तीन सेकंड देखकर ही वह उस तार को पहचान सकता है, जिसको हटाने से बम निष्क्रिय हो जाएगा. उसके चेहरे में वह जादू है कि वह सिर्फ मूंछें कटवा ले तो चौबीस घंटे साथ रहने वाली उसकी पत्नी भी उसे नहीं पहचान सकती.

हमारे नायक जैसा लड़का गली-मोहल्लों-सड़कों-बाजारों में कहीं नहीं दिखता. वह राम और कृष्ण का आदर्श मिश्रण है जिसकी पूजा करने का मन करता है

वह क्रूर आतंकवादी हो तो भी उसे वह रूमानी शायरी आती है जिसे सुनकर खूबसूरत लड़कियां जान छिड़कती हैं. वह अपने कॉलेज का सबसे लोकप्रिय लड़का है जो बिना ज्यादा पढ़े-लिखे बड़ा आदमी बनता है. वह इतना खुद्दार है कि फेंके हुए पैसे आज भी नहीं उठाता. वह असहायों जैसी बातें करता है लेकिन कभी किसी की सहायता नहीं स्वीकारता. बिगड़ैल होते हुए भी वह इतना चरित्रवान है कि मजबूर अनजान लड़की को अपने बिस्तर पर सुलाकर खुद अस्तबल में सोता है. स्टेशन पर जाती हुई नायिकाएं उसे पलटकर देखना नहीं भूलती और वही है जिसके ऊपर हमेशा नायिका का उड़ता हुआ दुपट्टा आ गिरता है. उसके पास बूढ़ी मौसी को मनाने के तरीके भी हैं और बावर्ची बनकर पूरे परिवार के दिल में बस जाने के भी. वह बुजुर्गो की इज्जत करता है और बच्चों को ढेर सारा प्यार. उसका बचपन किताबें बेचकर बीमार मां की दवा खरीदने में बीता है और जवानी मृत पिता का प्रतिशोध लेने में, फिर भी वह हंसमुख है और नकचढ़ी शिवानियों को हंसाना जानता है. आखिरी दृश्य में अक्सर वह पचासों गुंडों को अकेला मारकर अपने माथे पर लिखा ‘मेरा बाप चोर है’ पोंछ डालता है. वह बॉलीवुड का हीरो है.

असल में ‘क्रिश’ के आने से पहले से ही बॉलीवुड हर फिल्म को सुपरहीरो की फिल्म की तरह बनाता आ रहा है. हमारे नायक जैसा लड़का गली-मोहल्लों-सड़कों-बाजारों में कहीं नहीं दिखता. वह राम और कृष्ण का आदर्श मिश्रण है जिसकी पूजा करने का मन करता है.

हमारी फिल्मों में हर दौर के सुपरस्टारों की खूबियों और क्षमताओं के अनुरूप कहानियां गढ़ी गईं और नायक बारंबार उन्हीं खूबियों से सजी-धजी कहानियों को अपना नायकत्व देते रहे. पचास के दशक और साठ के पूर्वार्ध में तीन हीरो हिन्दी सिनेमा के परिदृश्य पर छाए रहे- दिलीप, देव और राज. दिलीप ने ग्रामीण ‘गोपी’ और उदास ‘देवदास’ बनने का जिम्मा सँभाला. देवआनंद पहले शुद्ध रोमांटिक हीरो थे, जिन्हें देखकर लाखों लड़कियों ने आहें भरना सीखा. उनके बाद यह दायित्व राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र ने संभाला. अपने आप पर हँस सकने की क़ाबिलियत ने इंडस्ट्री को ‘आवारा’ राजू दिया जो दुख में भी मुस्कुराता था. दिलीप की अतिरंजित वेदना और देव की असामान्य खुशमिजाजी के बीच गांव से शहर आने के अपने सफर में आम आदमी के सामान्य सुख-दुख जीता यही राजू दशर्कों को अपने सबसे करीब लगा. राजकपूर ने अपनी फिल्मों से उन नायकों की शुरु आत की, जो देश और समाज के लिए भी हल्के से फिक्रमंद थे.

साठ के उत्तरार्ध में राजेश खन्ना ने देव आनंद के प्रेमी और दिलीप के ट्रेजडी किंग को मिलाकर अपना नया संस्करण पेश किया, जिसने वर्षों तक परदे को चमत्कृत किए रखा. लेकिन आजादी के बाद के सपने के लगातार धूमिल होते जाने से जो आक्रोश नए भारत में पनप रहा था, उसे कह देने के लिए अमिताभ बच्चन से जरा भी कम काफी नहीं था. वह आनंद के शांत भास्कर बैनर्जी और चुपके चुपके के बॉटनी के प्राफेसर सुकुमार सिन्हा से बिल्कुल अलग था, जिसे राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र की परछाइयों से बाहर निकलने के लिए गुस्सैल होना पड़ा. वह आपातकाल के वर्षो के भारत का स्वर था जो नब्बे के ग्लोबलाइजेशन तक सब नायकों पर हावी रहा. वे सब नायक फुटपाथ की जूठनों पर पलकर जवान हुए थे और किसी सेठ के अवैध धन्धों को सँभालते थे. आधी फिल्म के बाद वे उन्हीं बुरी ताकतों के विरुद्ध लड़ते थे, जिनके लिए वे इंटरवल से पहले तक काम कर रहे होते थे. पिछले दशकों में प्यासा, मुग़ल-ए-आजम, मदर इंडिया और आवारा जैसी फिल्मों ने जो क्लासिक उम्मीद जगाई थी, उसे एंग्री यंगमैन का यह बुखार ले डूबा.

हां, विपरीत धारा के इस समय में भी संजीव कुमार और अमोल पालेकर सरीखे अभिनेताओं ने अपनी साधारण (असाधारण) फिल्मों से क्लर्क या इलेक्ट्रीशियन जैसी नौकरी करने वाले सामान्य से दिखने वाले नायक बॉलीवुड को दिए जो इतने चमत्कारी नहीं थे कि उनकी एक ललकार पर भीड़ उनके पीछे हो लेती. वे कभी बॉलीवुड की मुख्यधारा के हीरो नहीं थे लेकिन वे समाज की धारा के सबसे निकट थे. उस दुबले-पतले या मोटे हीरो की वापसी के लिए बॉलीवुड को लगभग दो ढाई दशक तक इरफान खान, राहुल बोस, रणवीर शौरी और अभय देओल की पीढ़ी का इंतजार करना पड़ा. इनका संघर्ष बीस साल पुराने उस रोमांटिक प्रेम, राहुल, रोहित या राज से है, जिसे ‘लवस्टोरी’ के कुमार गौरव और ‘मैंने प्यार किया’ के सलमान ने जन्म दिया. वे अमीर परिवारों के क्लीनशेव्ड लड़के हैं जो निठल्ले रहते हैं, सूट पहनते हैं, गिटार बजाते हैं, बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं, पार्टियां देते हैं, प्यार करते हैं और कभी कभी हकलाते भी हैं. उनकी प्रेमिकाएँ इतनी अमीर हैं कि उन्हें छोड़कर जाती हैं तो लंदन, पेरिस या न्यूयॉर्क ही जाती हैं. उन नायकों के जीवन की असली परीक्षा जाम में फंसी हुई गाड़ी को फ्लाइट छूटने से पहले किसी तरह हवाई अड्डे तक पहुंचाने से अधिक नहीं होती. गरीब भारत से उनका जुड़ाव नौकर की मां के बीमार होने पर उसे पैसे और छुट्टी देकर गांव भेजने तक ही सीमित है. हां, परफ्यूम, काले चश्मों और विदेशी गाड़ियों के बावजूद उसका आत्मविश्वास पिछले कुछ वर्षो में थोड़ा कम तो हुआ है या यह कहा जा सकता है कि वह सर्वगुणसंपन्न देवता के नकली कवच से बाहर निकलने की प्रक्रिया में है. ‘लक्ष्य’ में वह करियर को लेकर कनफ्यूज्ड है और ‘सोचा न था’ में प्यार को लेकर. अब उसे ‘स्वदेस’ की कुछ-कुछ याद आने लगी है और ‘दिल्ली 6’ में वह लौटकर आया है तो सुपरहीरो नहीं है. वह सवाल उठाने वाला आम भारतीय है, जिसे पुलिस भी मारती है और भीड़ भी. और हां, देवदास भी अब कभी-कभी पारो के प्यार में मौत को गले लगाने की बजाय चंदा को चुनने लगा है.

नायिका

‘कुछ कुछ होता है’ में जब रानी मुखर्जी माइक्रो मिनी स्कर्ट पहनकर कॉलेज में आती हैं तो हल्ला सा मच जाता है. रानी की नग्न टांगों के साथ आगे बढ़ते इस लम्बे सीक्वेंस से उत्पन्न उत्तेजना ‘बॉबी’ में डिम्पल के बिकिनी वाले दृश्यों से या ‘आवारा’ में स्विमसूट पहने हुई नरगिस को देखकर पैदा होने वाली उत्तेजना से ज्यादा अलग नहीं है. यह ग़ौर करने लायक बात है कि ऐसे अधिकांश दृश्यों के तुरंत बाद नायिका को अपने सच्चरित्न होने का सुबूत देना पड़ा.

समाज इतना अडिग है कि तैंतीस साल बाद ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ में परिवार की सहमति से दूसरा विवाह करने वाली विधवा को उसके पति समेत बिरादरी वाले पेड़ पर लटका देते हैं. जबकि ‘हम आपके हैं कौन’ में एक विधुर का दूसरा विवाह दर्शक बेहिचक गले उतार लेते हैं

‘कुछ कुछ होता है’ में रानी को अपने पदार्पण के ठीक अगले दृश्य में आरती गानी पड़ती है और ‘आवारा’ में नरिगस ऐसा कुछ नहीं करतीं तो राजू के हाथों पिटती है. नरगिस के राजकपूर के पैरों पर गिरकर गिड़गिड़ाने के बाद दृश्य खत्म होता है. सीता की अग्निपरीक्षा अलग अलग रूपों में बॉलीवुड में बार बार दोहराई जाती रही है.

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बॉलीवुड की नायिकाएं कभी वास्तविक स्त्रियों जैसी नहीं रही. देवदास के व्याकरण में कहें तो उनके पास दो ही विकल्प छाड़े गए – या तो पारो बनकर रोती रहें या पतित होकर चन्द्रमुखी बन जाएं. बहुत जगह एक ही नायिका से दोनों काम लिए गए, लेकिन यह विशेष ध्यान रखा गया कि यदि पाश्चात्य ढंग के कपड़े पहनकर, शराब पीकर या तेज गति से गाड़ी चलाकर वह अपना चरित्न खोती है तो नायक की जिम्मेदारी है कि वह उसे सुधारे और पूर्ण भारतीय नारी (जिसे कभी परिभाषित नहीं किया गया) बनाकर ही दम ले. गोविन्दा की बीसियों फिल्मों में नायक-नायिका का परिचय ही अमीरी के ग़ुरूर में डूबी नायिका द्वारा कार से एक्सीडेंट कर देने वाले सीन से होता है, जिसके बाद गोविन्दा हीरोइन को डांटते हैं, अपमानित करते हैं और उसे सही राह पर लाने की ठान लेते हैं.

‘पूरब और पश्चिम’ में सायरा बानो पर यही उपकार मनोज कुमार करते हैं, लाडला में श्रीदेवी के लिए यही काम अनिल कपूर करते हैं और यह परम्परा तब अपनी हद पर पहुँच जाती है, जब ‘रब ने बना दी जोड़ी’ में अनुष्का को सही राह दिखाने का काम स्वयं ईश्वर करते हैं.

बॉलीवुड में वेशभूषा व्यक्ति के चरित्न पर इतनी हावी रही कि सत्तर के दशक की अनेक फिल्मों में लड़की को चुस्त जींस या स्कर्ट में दिखाकर ही उसे चरित्नहीन मनवा दिया गया. इसके उलट आदर्श नायिका सलवार सूट या साड़ी पहनती थी, नजरें झुका कर चलती थी, कम बोलती थी, अपने कौमार्य को अपने जीवन से भी अधिक मूल्यवान समझती थी, सजना के लिए सजती थी और सजना के चले जाने के बाद ‘शोले’ की जया की तरह सफेद साड़ी में अभिशप्त जीवन जीती थी. उसने कभी समाज या देश के लिए कोई बुरा काम नहीं किया. किया तो हद से हद विजातीय या विधर्मीय प्रेम कर लिया. उस प्रेम को विवाह तक पहुंचाने का काम भी अक्सर नायक ने ही किया. उसका हौसला बनाए रखने के लिए नायिका ने पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचकर चार-छ: गीत गा दिए या दो-चार व्रत भर रख लिए. उसने इससे आगे दहलीज लांघी तो सामने कष्टों का पहाड़ था.

’अछूत कन्या’ में हरिजन युवती बनी देविका रानी को ब्राह्मण युवक अशोक कुमार से प्यार करने का नतीजा अंत में ट्रेन से कटकर भुगतना पड़ा और ‘बंदिनी’ में प्रेम के लिए नूतन को जेल जाना पड़ा. ‘शोले’ आरम्भ में विधवा विवाह की संभावना दिखाती है लेकिन फिल्म सब दशर्कों को पसन्द आए, इस मोह में अमिताभ को मारकर पूरा मुद्दा ही खत्म कर दिया जाता है. समाज इतना अडिग है कि तैंतीस साल बाद ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ में परिवार की सहमति से दूसरा विवाह करने वाली विधवा को उसके पति समेत बिरादरी वाले पेड़ पर लटका देते हैं. जबकि ‘हम आपके हैं कौन’ में एक विधुर का दूसरा विवाह दर्शक बेहिचक गले उतार लेते हैं क्योंकि यह तथाकथित भारतीय संस्कृति को कहीं से भी चोट नहीं पहुँचाता.

ऐसा भी नहीं है कि हिन्दी फिल्मों की नायिका का यही एक रूप रहा. पचास के दशक और साठ के दशक के  आरंभिक वर्षो की कई नायिकाएं प्लास्टिक की गुड़ियों जैसी नहीं थीं. 1957 में आई ‘मदर इंडिया’ बॉलीवुड के इतिहास में नींव का पत्थर है. हालांकि यह बहस का विषय है कि नरगिस का अपने बेटे को मारना दृढ़ चारित्निक बल ही था अथवा वही त्याग और बलिदान, जिसकी केवल स्त्नी से ही अपेक्षा की जाती रही है. ‘मुग़ल-ए-आजम’ की मधुबाला भी अपने प्रेम को गर्व से स्वीकार करती है, हालांकि यह क्लासिक भी अपनी विद्रोही नायिका के प्राण लिए बिना समाप्त नहीं होती. पति के दूसरी औरत से प्रेम से उपजी पीड़ा को ‘निशांत’ में स्मिता पाटिल ने और ‘अर्थ’ में शबाना आजमी ने भी अपने अलग-अलग अंदाज में सक्षमता से निभाया है. ‘अर्थ’ बॉलीवुड के इतिहास में अपनी तरह की इकलौती फिल्म है क्योंकि ‘अर्थ’ की नायिका को पुरुष के कन्धे की जरूरत नहीं है.

पिछले कुछ वर्षों में प्रयोगवादी सिनेमा और मल्टीप्लेक्स संस्कृति के विकास ने उन नायिकाओं को जन्म दिया है, जिनमें आधुनिक भारतीय नारी अपनी छवि देख सकती है. ‘वाया दार्जीलिंग’ में पुरुष दोस्तों के साथ बैठकर शराब पीती संध्या मृदुल बुरी लड़की की तरह पेश नहीं की जाती और न ही तरक्की के लिए ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ में बॉस के साथ सोने वाली कंगना को अंत में जान देकर अपने पापों का प्रायश्चित करना पड़ता है. ये दोनों किरदार महानगरों की आम कामकाजी लड़कियां हैं जो अपना भला-बुरा खुद समझती हैं और अपनी जरूरतों के हिसाब से अपनी प्राथमिकतां तय करती हैं. वे अपनी

शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक इच्छाओं को खुलकर कहने लगी हैं. ‘जिस्म’ की बिपाशा सदाचार के सब लबादे उतार फेंकती है और उसे यह स्वीकार करने में कोई परहेज नहीं है कि वह सिर्फ अपने आप से प्यार करती है और यह अचानक नहीं होता कि ‘ऐतराज’ में प्रियंका अक्षय से कहती हैं- शो मी यू आर एन एनिमल. बात पहले भी कही जाती रही है, लेकिन इस बार इसे कहने वाले होंठ किसी वेश्या या खलनायिका के नहीं, नायिका के हैं.

‘चीनी कम’ की सॉफ्टवेयर इंजीनियर तब्बू स्वयं से तीस साल बडें आदमी को जीवनसाथी चुनती है और ‘ख्वाहिश’ की मल्लिका शेरावत मेडिकल स्टोर पर जाकर कॉन्डम खरीदती है. और ‘एक हसीना थी’ की उर्मिला भी हैं जो अपनी जिंदगी तबाह कर देने वाले धोखेबाज प्रेमी से बदला लेती हैं. डॉन को जो जंगली बिल्लियां पसन्द थीं, वे अब दोस्त, पत्नी और प्रेमिका बनकर घरों में आ गई हैं. लेकिन डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ऑफिस जाने से पहले वे आज भी अपने हिस्से का दूध आपको पिलाना नहीं भूलती.

जाति व धर्म

‘मकबूल’, ‘सरदारी बेगम’, ‘जुबैदा’ तथा ‘मिशन कश्मीर’ जैसी कुछ फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो पिछले कई दशकों में न तो बॉलीवुड में कभी मुस्लिम नायक रहे हैं और न ही पृष्ठभूमि में मुस्लिम परिवेश. ‘सिंह इज किंग’ के हैप्पी सिंह से पहले कोई पगड़ी वाला सरदार भी हीरो की भूमिका में दिखा हो, याद नहीं आता. हां, पंजाबी और सिख बैकग्राउंड हमेशा से हिन्दी सिनेमा पर हावी रहा है. ईसाई नायकों की तलाश करें तो ‘जोश’ के शाहरुख, गुस्सा करते अल्बर्ट पिंटो और एंथनी गॉंजाल्वेज ही याद आते हैं. ‘बीईंग साइरस’ और ‘परजानिया’ से पहले पारसी भी हिन्दी फिल्मों से पूरी तरह गायब रहे हैं. बस पुराने मॉडल की कोई कार चला रहा ऐनक वाला अधेड़ पारसी और जवान हीरो की ओर आकर्षित होती उसकी मोटी पत्नी साल में एकाध बार दस बीस सेकंड के लिए दिखते रहे हैं. और बौद्ध तो कहीं हैं ही नहीं.

कुछ फिल्में सामाजिक सद्भाव बताती हुई कुछ ऊपर भी चली गईं. ‘शोले’ कहीं भी वीरू, जय या बसंती की जाति का जिक्र नहीं करती और वीरू-बसंती के विवाह पर मौसी को हजार आपत्तियां हैं, लेकिन जाति को लेकर कोई सवाल या शिकायत नहीं

यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्न के सबसे बड़े सिनेमा का लोकतांत्निक स्वरूप है. यदि आप बॉलीवुड की फिल्में देखकर भारत का समाजशास्त्न जानना चाहें तो इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि यहाँ के 99 फीसदी लोग हिन्दू हैं.

मुस्लिम घर-बार और संस्कृति तो साठ के दशक की ‘मेरे महबूब’ जैसी फिल्मों के बाद से तवायफों के कोठों तक ही सिमटकर रह गई है. किसी सामान्य कहानी में वह सादगी से ईमानदार और निरपेक्ष पृष्ठभूमि की तरह नहीं खड़ी हैं. ‘पाकीजा’ और ‘उमराव जान’ के अलावा या तो ‘जुबैदा’, ‘मम्मो’ और ‘सरदारी बेगम’ जैसी ऑफबीट फिल्में हैं या ‘फिजा’, ‘सरफरोश’ और ‘मिशन कश्मीर’ जैसी आतंकवाद पर आधारित फिल्में. नब्बे के बाद का फिल्मी मुसलमान या तो धर्मान्ध आतंकवादी है या दिन रात अपनी देशभक्ति को सिद्ध करने में लगा जाबांज पुलिस अफसर. वह ‘चक दे इंडिया’ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेलता हो या ‘रंग दे बसंती’ में कॉलेज जाने वाला सामान्य लड़का हो, राष्ट्र के प्रति उसकी आस्था पर प्रश्नचिह्न लगाना एक नियम रहा है. कोई सलीम खान कभी ‘गजनी’ के संजय सिंघानिया या ‘कुछ कुछ होता है’ के राहुल खन्ना की जगह नहीं ले पाया. अपने देशभक्त मुस्लिम पुलिस वाले के बावजूद ‘सरफरोश’ आखिरी में यही सबक देती है कि अगर जिन्दगी को मौत बनने से बचाना है तो वे किसी भी रूप में हों, उन पर शक किया जाना चाहिए. विचित्न समानता यह है कि ‘फिजा’ और ‘मिशन कश्मीर’ की मुस्लिम नायिकाएं अपने भटके हुए भाइयों और प्रेमियों को सही राह पर लाने की कोशिश में लगी रहती हैं. अपने धर्मान्ध भाइयों के उलट वे समझदार और पढ़ी लिखी भी हैं. ‘जख्म’, ‘गदर’, ‘अनवर’ और ‘आवारापन’ तक हिन्दू लड़कों से प्रेम और विवाह करके उन्होंने अपने आधुनिक होने का परिचय भी दिया है. यह बात और है कि हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के की प्रेम-कहानी वाली फिल्म याद करने के लिए दिमाग पर काफी जोर डालना पड़ता है.

ईसाई या तो कॉंन्वेंट स्कूल के प्रधानाचार्य के पद की शोभा बढ़ाते हैं या ‘माई सन’ और ‘लॉर्ड तुमको शान्ति दे’ जैसी बातें कहने वाले पादरी होते हैं, जिनके पास शैतानी शक्तियों से सुरक्षा करने वाला लॉकेट होता है, जिसे वे हीरो को दे देते हैं और खुद असुरक्षित हो जाते हैं. तीसरी तरह के ईसाई पियक्कड़ होते हैं. जो पुलिस की मुखबिरी भी करते हैं. वे उधार मांगते रहते हैं और एंथनी की तरह लगातार बकबक करते रहते हैं. ‘मजबूर’ के प्राण इसके आदर्श उदाहरण हैं, जो कहते हैं कि ‘फिर ना कहना कि माइकल दारू पीके दंगा करता है’. इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि ईसाई अंग्रेंजों के लहजे में हिन्दी बोलें, जैसे ‘तुम’ को ‘टुम’ और ‘आएगी’ को ‘आएगा’ और ‘मैन’ शब्द का अत्यधिक प्रयोग करें. ‘सोचा न था’ और ‘सिन्स’ तक वे कमोबेश ऐसे ही हैं.

सरदार सदा मस्तमौला रहे हैं और चूंकि वे देश और विदेश में हिन्दी फिल्मों का एक बड़ा दर्शक-वर्ग बनाते हैं, इसलिए भारतीय समाज में वे चुटकुलों का स्थाई विषय होने के बावजूद फिल्मों में ऐसे नहीं हैं. वे अक्सर कनाडा या लंदन गए हीरो को टैक्सी ड्राइवर के रूप में मिलते हैं और बाद में मददगार दोस्त साबित होते हैं. वे बिला-शक़ वफादार हैं.धर्मों की तरह जातियां भी सांचों में ढली हुई हैं. फिल्म के मुख्य पात्न अधिकांशत: सवर्ण जातियों के होते हैं. उनमें भी ब्राह्मण, बनिया या पंजाबी. पुलिस या सेना का जवान निश्चित रूप से जाट या राजपूत होगा. बड़े उद्योगपति जिन्दल या सिंघानिया होंगे और चालाक सेठ होगा, लगातार ‘वड़ी सांई’ कहता रहने वाला सिन्धी या हर उंगली में सोने की अंगूठी पहने हुए मारवाड़ी.

चौकीदार के पद पर ‘सलाम शाब’ कहने वाले नेपाली गोरखे ही रहे. और इसी तरह ‘चक दे इंडिया’ भी क्षेत्नीय स्टीरियोटाइप्स से चिपकी रही. वह हर क्षेत्न की लड़कियों को ठीक उसी रूप में दिखाती है, जैसी छवि आपके दिमाग में वर्षो से बनी हुई है.

सबकी चहेती बनने की चाह में कुछ फिल्में सामाजिक सद्भाव बताती हुई कुछ ऊपर भी चली गईं. ‘शोले’ कहीं भी वीरू, जय या बसंती की जाति का जिक्र नहीं करती और वीरू-बसंती के विवाह पर मौसी को हजार आपत्तियां हैं, लेकिन जाति को लेकर कोई सवाल या शिकायत नहीं. इसी तरह ‘सागर’ में अमीर हिन्दू नायक और गरीब ईसाई नायिका के विवाह में धन की ही अड़चनें हैं, धर्म की नहीं. असल भारत में आज इतने सालों बाद भी यह असंभव सा है.

खलनायक, कामकाजी

बॉलीवुड के दस सांचे

परिवार, दृश्य

बॉलीवुड में मुख्यत: तीन प्रकार की माएं रहीं. पहली, जिनके पति जीवित थे. वे गहनों से लदी खुश मांएं थीं. वे त्योहार मनाती थीं, डिजाइनर बनारसी साड़ियां पहनती थीं और करवाचौथ के व्रत रखती थीं. यदि वे विधवा हो गई तो दूसरी या तीसरी तरह की मांएं बनीं. दूसरी मांएं नायक के बचपन में बीमार रहने वाली मांएं थीं. वे पड़ोसियों के कपड़े सिलकर नायक को पढ़ाती लिखाती थीं और इस वजह से उनकी नजर कमजोर होती जाती थी. फिर वे बिस्तर पर पड़ जाती थीं. उन्हें अक्सर कैंसर होता था और बरसात की किसी रात को जब बच्चा हीरो दवा खरीदने जाता है, वे उसके लौटने से पहले मर जाती थीं. यदि वे नायक के बड़ा होने तक जी जातीं तो तीसरी तरह की मांएं बनती. उस स्थिति में उन्हें कोई बीमारी नहीं होती. बेटा जिस दिन पुलिस इंसपेक्टर बनकर घर लौटता, वे उसे उसके पिता की तस्वीर के सामने ले जाकर भीगे नयनों से भीगी आवाज में कहतीं- आज तेरे पिताजी होते तो कितने खुश होते!

‘मुगल-ए-आजम’ के अकबर से ‘मोहब्बतें’ के अनुशासनप्रिय प्रधानाचार्य तक पिता प्राय: बच्चों के प्यार के बीच में खलनायकों की तरह खड़े रहे. उन्होंने अक्सर अपने बचपन के दोस्तों की औलादों से अपने बेटे-बेटी ब्याहने का वचन देकर मुसीबतें खड़ी की हैं 

ऐसी मांओं का एक बेटा बचपन में बिछुड़ गया होता था, जो क्लाइमेक्स में मिलता था. उससे पहले दोनों बेटे एक दूसरे की जान के दुश्मन हुआ करते थे. सत्तर के दशक की लोकप्रिय मां निरुपा राय ने जाने कितनी बार ऐसे मौकों पर कहा होगा – एक बार मुझे मां कहकर पुकारो बेटा! फिल्म की शुरुआत में किसी विपत्ति के कारण बिखर जाने वाले ऐसे परिवार की कहानी में एक पारिवारिक गीत जरूर होता था, जो परिवार के हर सदस्य को बीस साल तक अक्षरश: याद रहता था. ‘दीवार’, ‘सुहाग’, ‘राम लखन’, ‘करण अर्जुन’ समेत पचासों फिल्मों में तीसरी तरह की मांएं हर दौर की सबसे लोकप्रिय मांएं रहीं. असल में ये सब मांएं महाभारत की कुंती का ही एक अथवा दूसरा रूप थीं. ‘दिलवाले दुल्हनिया.’ की फरीदा जलाल और ‘मैंने प्यार किया’ की रीमा लागू ने नए भारत की नई मां से दशर्कों को परिचित करवाया जो अपने बच्चों की दोस्त भी थीं

‘मुगल-ए-आजम’ के अकबर से ‘मोहब्बतें’ के अनुशासनप्रिय प्रधानाचार्य तक पिता प्राय: बच्चों के प्यार के बीच में खलनायकों की तरह खड़े रहे. उन्होंने अक्सर अपने बचपन के दोस्तों की औलादों से अपने बेटे-बेटी ब्याहने का वचन देकर मुसीबतें खड़ी की हैं या मरते मरते किसी सुरेन्द्र साहनी के हाथ में बेटी का हाथ थमाकर परेशानियां पैदा कर गए हैं. उनकी खानदानी दुश्मनियों ने सैंकड़ों कहानियों की रोचकता बढ़ाई है. ‘कल आज और कल’ के जेनरेशन गैप का पहला शिकार और पहले शिकारी वे ही हैं. डाइनिंग टेबल की बीच वाली कुर्सी पर किसी और का बैठ जाना उनका सबसे बड़ा अपमान रहा है.

ज्यादातर फिल्मी पिता सख्त होते हैं, कम हंसते हैं और काम की बात ही करते हैं. ‘वक्त’ के अमिताभ की तरह बेटे को सुधारने के लिए वे उसे बहुत बार घर से निकालकर बाद में अकेले में रोते भी रहे हैं. मांएं अक्सर बच्चों के सामने यह भेद खोलती रही हैं कि तुम्हारे बाबूजी उतने कठोर नहीं हैं, जितने दिखते हैं, और है भी ऐसा ही. अमरीश पुरी चाहे ‘दिलवाले दुल्हनिया..’ के गुस्सैल पंजाबी हों या ‘गदर’ के कट्टर पाकिस्तानी, बेटियों के जिद्दी प्यार के सामने आखिर में झुकते ही आए हैं. ‘गोलमाल’ के उत्पल दत्त से लेकर ‘मुन्नाभाई’ के बोमन ईरानी तक वे कुछ कम या ज्यादा सनकी भी रहे हैं.

लेकिन इससे निरपेक्ष ‘सारांश’ के अनुपम से लेकर ‘पिता’ के संजय, ‘जागो’ के मनोज और ‘विरुद्ध’ के अमिताभ तक वे मृत बेटों और शोषित बेटियों के लिए व्यवस्था से लड़ने वाले कुछ दृढ़निश्चयी पिता भी हैं. ‘खोसला का घोंसला’ तक आते आते वे युवा पुत्नों की निकटता पाने के लिए उनके साथ बैठकर शराब जरूर पीने लगे हैं. लेकिन यह मेहरबानी बड़े हो चुके समझदार बेटों पर ही है नन्हें ईशान के लिए वे आज भी डांट और तमाचे के पर्याय ही हैं.

कोई लड़की यदि बॉलीवुड के नायक की बहन है  तो तीन बातें हो सकती हैं. या तो वह हीरो के दोस्त या सहनायक से प्यार करती होगी या फिर पहले बीस मिनट के भीतर उसका बलात्कार हो जाएगा. इनमें से दूसरी बात कम से कम मिथुन दा की बी ग्रेड फिल्मों के लिए तो बिल्कुल सटीक है ही. तीसरा विकल्प यह है कि उसका रोल बहुत छोटा हो और वह अपने भाई की प्रेम-कहानी आगे बढ़ाने या राखी बांधने के काम ही आए. बॉलीवुड ने अक्सर तीसरा विकल्प ही चुना है. और हीरो चाहे कितना ही आवारा क्यों न हो,

उसकी बहन मोहल्ले की सबसे सच्चरित्न लड़की होगी, जिसे उसके जैसे लड़के परेशान करते होंगे. यदि परिवार में नायक के बड़े भाई भी हैं तो वे अक्सर पूरी जायदाद हड़पना चाहते हैं. बीच में ‘तेरे नाम’ के सचिन खेड़ेकर जैसे पिता-तुल्य भाइयों को छोड़ दिया जाए तो वे सदा ‘प्यासा’ के महमूद जैसे ही संवेदनहीन रहे हैं. नायिका के बड़े भाई ‘अनाड़ी’ के सुरेश ऑबेरॉय जैसे होते हैं, जो अपनी बहन से बहुत स्नेह करते हैं, लेकिन साथ ही स्वयं को उसका मालिक मानते हैं. जबकि नायक के छोटे भाई हमेशा उसे अपना आदर्श मानने वाले और नायिका के छोटे भाई उससे बहुत प्यार करने वाले रहे हैं. इतना प्यार कि बहन की शादी के बाद ‘बंधन’ के सलमान और ‘हम तुम्हारे हैं सनम’ के अतुल अग्निहोत्नी बहन की ससुराल में ही रहने लगे. ‘जाने तू या जाने ना’ और ‘फिजा’ जैसी कुछ फिल्में ही भाई-बहन के रिश्ते के इससे अलग आयाम दिखाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कही जा सकती हैं.

बुजुर्ग अक्सर औलाद की उपेक्षा का शिकार हुए. मेहमानों के सामने कई बार उन्हें घर के नौकरों की तरह पेश किया गया. मगर तीसरी पीढ़ी के बच्चों ने हमेशा उनसे प्यार किया. बच्चे उनके लिए खाना चुराकर लाते रहे और अपने जेबखर्च से उनके चश्मे बनवाते रहे. नब्बे के दशक तक आते आते दादा-दादी ने उनका बदला चुकाना शुरु किया और पोते-पोतियों के प्यार को परवान चढ़ाने में मदद करने लगे.

दृश्य

लड़की हाथ में ढेर सारी किताबें लेकर जा रही होगी और लड़के से टकरा जाएगी. किताबें गिरेंगी, दोनों झुककर उन्हें उठाने लगेंगे और नजरें मिलते ही हो जाएगा पहली नजर का प्यार. कभी कभी यह पहली मुलाकात थोड़ी और करीबी होगी, जब लड़का और लड़की गिरेंगे मगर इधर उधर कभी नहीं, वे हमेशा ऊपर नीचे होंगे.

सुहागरात में गुलाब के फूलों से सजी सेज पर दुल्हन घूंघट काढ़े बैठी होगी, सिरहाने के पास मेज पर दूध का गिलास होगा और टेबल लैम्प जल रहा होगा

फिल्म के क्लाईमेक्स में किसी महत्वपूर्ण किरदार की जान जाने वाली होगी तो नायक, नायिका या उनकी दुखिया मांएं मंदिर में जाकर झोली फैलाएंगी. वह रात का समय होगा, तूफान के साथ बरसात हो रही होगी और तेज हवा से मंदिर की घंटियां अपने आप बजने लगेंगी. आखिर भगवान की मूर्ति से कोई फूल उस फैली हुई झोली में गिरेगा और उसी क्षण मृत्युशैय्या पर पड़ा व्यक्ति आंखें खोल लेगा.

सुहागरात में गुलाब के फूलों से सजी सेज पर दुल्हन घूंघट काढ़े बैठी होगी, सिरहाने के पास मेज पर दूध का गिलास होगा और टेबल लैम्प जल रहा होगा. दूल्हा दुल्हन को बांहों में भरते हुए लेटेगा तो एक हाथ से टेबल लैम्प बुझ देगा. दूध रखा रहेगा, उसे पिया नहीं जाएगा. अंधेरा होने के अगले दृश्य में दो फूल मिलते दिखेंगे या दो पक्षियों की चोंचें. सत्तर-अस्सी के दशक में मुश्किल ही कोई ऐसी फिल्म होगी जिसकी सुहागरात इससे तिनका भर भी हटकर हो.

कुछ दृश्य बॉलीवुड को इतने प्यारे रहे कि फिल्म देखते हुए बार-बार ये भ्रम होता रहा कि दृश्य महीने भर पहले देखी फिल्म के हैं. कॉलेज जाती हुई हीरोइन को छेड़ते शोहदे और उसे हीरो द्वारा बचाना भी ऐसा ही सीक्वेंस है, जिसमें गुंडे कभी असली रहे और कभी लड़की पटाने के लिए हीरो ने ही उन्हें भेजा.

ऐसे ही किसी के लापता होने पर अक्सर पुलिस को उससे मिलते-जुलते हुलिए वाली लाश जरूर मिलती है, जिसका चेहरा पहचानने लायक नहीं होता. यदि चेहरा पहचाना जा सकता है तो मुर्दाघर में शिनाख्त का एक लम्बा दृश्य होता है, मगर अंत में लाश किसी और की निकलती है.

नब्बे के आसपास फिल्म के अंत में रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डे पर हीरो को हमेशा के लिए छोड़कर जाती हीरोइन भी बहुत बार दिखने लगी. हीरो अक्सर फ्लाइट या ट्रेन के निकल जाने पर पहुंचता और दुखी होता. हालांकि यह बात एक-एक दशर्क को पता होती कि आखिरी क्षणों में नायिका का इरादा बदल गया होगा और वह वहीं खाली प्लेटफॉर्म की किसी बेंच पर बैठी होगी.

उन्हीं दिनों कुछ और नए सिद्धांत भी आए. तारे टूटने लगे और पलकें बन्द करके मुरादें मांगी जाने लगीं. किसी को बताने पर उनका पूरा होना संदिग्ध रहता, इसलिए उन्हें गुप्त रखा गया. यह मालूम करना भी बहुत आसान हो गया कि कौन किससे प्यार करता है? बस आंखें बन्द करो और जिसका चेहरा भी नजर आए, वही आपका सच्चा प्रेम है. हां, यह बात और है कि दशर्कों को सब कुछ पहले से पता होता है. मुरादें भी और प्रेमी भी.

कॉमेडी, गीत-संगीत, दर्शक

बॉलीवुड के दस सांचे