कॉमेडी, गीत-संगीत, दर्शक

बॉलीवुड की कॉमेडी का अधिकांश हिस्सा ‘टॉम एंड जैरी’ का मानवीय संस्करण है. हमें हंसाने के लिए वे रंग से भरे हुए ड्रम में जाकर गिरते हैं, बिजली के झटके खाते हैं और पिटते हैं. ‘इश्क’ में हवा में लटकी संकरी पाइप पर चलते आमिर-अजय और ‘हंगामा’ में मंदिर के घंटे की तरह बार-बार बजाए जाते राजपाल यादव को देखकर हम पेट पकड़ कर हंसते हैं. उन्हें हमेशा अपनी जान जोखिम में डालकर हमें हंसाना होता है. उनकी स्थिति जितनी दयनीय होती है, फिल्म उतनी ही मजेदार होती है.

गुलजार ने ‘अंगूर’ बनाई थी जो एक अविस्मरणीय कॉमेडी है. वहां भी यही था- दो बिछुड़े हुए हमशक्ल भाई और बाकी लोगों की दुविधाएं. यही ‘गोलमाल’ में भी था, जब एक अमोल को मूंछें लगाकर अपना ही जुड़वां भाई बनना पड़ा था 

प्रियदर्शन की ‘हेराफेरी’ से चूहे-बिल्ली की भागदौड़ वाले अंत की श्रंखला की शुरुआत हुई जो ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘भागमभाग’ और ‘वेलकम’ से होती हुई ‘सिंह इज किंग’ तक बिना रुके जारी है. कभी ढोल तो कभी लॉटरी के टिकट के लिए मची यह भागदौड़, ‘हेराफेरी’ के बाद लगभग सभी कॉमेडी फिल्मों में किसी न किसी तरह इस्तेमाल की गई.

पर यह भागमभाग भी नई नहीं है. वर्षों पहले कुन्दन शाह ने ‘जाने भी दो यारों’ से बॉलीवुड को इसका रास्ता दिखाया था. उसके महाभारत के लोकप्रिय दृश्य की रेसिपी का प्रियदर्शन और अनीस बज्मी आज भी प्रयोग कर रहे हैं. ‘हंगामा’ इसके लिए आदर्श कहानी है. लड़की नौकरी पाने के लिए बड़े आदमी की बेटी का नाटक करती है. लड़का पैसे वाली समझ उससे नजदीकियाँ बढ़ाता है. बड़ा आदमी अपनी पत्नी पर शक करने लगता है और उसकी पत्नी उस पर. फिर एक और लड़का, एक और सेठ, एक नौकर, लड़की से शादी का इच्छुक एक और लड़का, लड़की का मकान मालिक और उसकी पत्नी. हो गई फिल्म तैयार. इनमें से दो लोगों का एक ही नाम रख दीजिए या किसी को किसी से कुछ झूठ कहलवा दीजिए. अब हर किसी को कोई न कोई कनफ्यूजन है. उन्हें आपस में खेलने दीजिए और बन गई आपकी ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’.

शेक्सपीयर के इसी नाम के नाटक पर गुलजार ने ‘अंगूर’ बनाई थी जो एक अविस्मरणीय कॉमेडी है. वहां भी यही था- दो बिछुड़े हुए हमशक्ल भाई और बाकी लोगों की दुविधाएं. यही ‘गोलमाल’ में भी था, जब एक अमोल को मूंछें लगाकर अपना ही जुड़वां भाई बनना पड़ा था. एक व्यक्ति की झूठी पहचान ही ‘चुपके चुपके’ में गुदगुदाती है और आवाज की झूठी पहचान ‘पड़ोसन’ में.

खालिस कॉमेडी बनाने का चलन तो बहुत नया है. बॉलीवुड की अधिकतर फिल्में तो रोमांस, एक्शन, ड्रामा, कॉमेडी सबको मिलाकर बनाई जाती रही हैं. ऐसे में हीरो का साथी बनकर कॉमेडी करने का सिलसिला जॉनी वाकर ने गुरु दत्त की फिल्मों से शुरु  किया और फिर यह रिवाज ही बन गया. ‘प्यासा’ का ‘सर जो तेरा चकराए’ इतना लोकप्रिय हुआ कि फिर कॉमेडियन के हिस्से एक गीत भी आने लगा और एक नायिका भी. फिर जॉनी वाकर की जगह महमूद और राजेन्द्रनाथ ने ले ली. महमूद ने हँसाने के लिए श्लीलता की सीमा लाँघना अनुचित नहीं समझ और मद्रासी वेशभूषा में महमूद का लुंगी उठाना बॉलीवुड की कॉमेडी को फूहड़ता की ओर खींच लाया. इन फिल्मों ने द्विअर्थी संवाद बोलने वाले हास्य चरित्न पैदा किए, जिन्हें बाद में शक्ति कपूर और कादर खान ने जम कर जिया. भारतीय समाज में वैसे भी हास्य गंभीरता से काफी निचले स्तर का माना जाता रहा है इसलिए बड़े हीरो हास्य अभिनेता की इमेज में बंधने से कतराते रहे हैं. पूरे परिवार के साथ बैठकर न देखी जा सकने वाली कॉमेडी ने इस दूरी को और बढ़ा दिया. इस दिशा में भी ‘हेराफेरी’ महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई. वह समय था जब गोविन्दा और डेविड धवन की जोड़ी की ‘राजा बाबू’, ‘दूल्हे राजा’ और ‘कुली नं 1’ जैसी फिल्में ही बॉलीवुड की कॉमेडी बनकर रह गई थीं. वह कॉमेडी के अगली पंक्ति के दशर्कों तक सिमट जाने के भय का समय था, जब ‘हेराफेरी’ स्वस्थ हास्य लेकर आई. हालांकि बार बार दोहराए जाने से वह ताजगी भी छूटती रही, फिर भी ‘हेराफेरी’ ने बॉलीवुड को कॉमेडियन नहीं कॉमेडी हीरो दिया, जो उससे तुरंत पहले के कॉमेडियनों की तरह अपने नाटेपन, अन्धेपन, तुतलाहट, मिमिक्री या भद्दे चुटकुलों से नहीं हंसाता था.

इसी बीच हॉलीवुड के असर से कॉमेडी की एक नई किस्म ‘सेक्स कॉमेडी’ भी आ गई. ‘मस्ती’ और ‘क्या कूल हैं हम’ अपने ‘एक’ ही अर्थ वाले संवादों से सजी बदलती बयार की फिल्में हैं. यह वही सीमा है, जिसे महमूद और डेविड धवन बार-बार छूकर लौट आए. खुशी इस बात की है कि ‘खोसला का घोंसला’ और ‘भेजा फ्राई’ जैसी फिल्में उस शिकायत को दूर कर रही हैं, जो कहती है कि बॉलीवुड की कॉमेडी हमेशा बेवकूफाना और सतही रही है.

गीत-संगीत

दिल जलता है तो यह उसे जलने देने का नहीं, उससे बीड़ी जला लेने का समय है अब की नायिकाएं ‘न जाओ सैंया’ का अनुरोध करती हुई रोती नहीं, बल्कि  छोड़कर जाने की स्थिति में ‘तू साला काम से गया’ की धमकी देती हैं. यह ‘फूलों की रानी, बहारों की मलिका’ से ‘अपुन बोला, तू मेरी लैला’ तक का परिवर्तन है ‘लग जा गले से, फिर कभी.’ की जगह ‘लग जा गले से मेरे ठां करके’ ने ले ली है और लता के ‘तेरे बिना जिया जाए ना’ का ‘तेरे बिन मैं यूं कैसे जिया’ का आतिफ असलमी संस्करण आ गया है. जमाने के डर से जहां कभी नायिका आंचल को भी छोड़ देने को कहती थी, वही आज अपने अधनंगे बदन को छूने के लिए नशीली आवाज में ‘जरा जरा टच मी’ कहकर पुकारती है.

कहानी में सब मसाले रखे गए, म्यूजिक  में भी रखने जरूरी रहे. कम से कम एक सैड सांग अपरिहार्य है चाहे वह ‘पूरब और पश्चिम’ का ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ हो या ‘जोधा-अकबर’ का ‘जश्ने बहारां’हालांकि जरा-जरा बहकते इस तन-बदन की प्यास ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ की गुहार जैसी ही है और ‘कोई नहीं है कमरे में’ के पीछे छिपी हुई संभावनाएं ‘हम तुम एक कमरे में बन्द हों’ से बहुत भिन्न नहीं है. फिर भी फिल्मी गानों में सब कुछ अलग, नया और बोल्ड है. यह नयापन नकारात्मक, खुरदरा या अश्लील ही हो, ऐसा भी नहीं है. ‘कजरारे’ की उपमाएं और ‘मस्ती की पाठशाला’ नई सदी की उपलब्धियां हैं. ‘चांद सी महबूबा होगी’, ऐसा तो बहुत पहले सोच लिया था लेकिन ‘कभी कभी आस-पास चांद रहता है’ का विश्वास इतना नजदीक तो नहीं था और कहां थी चांद से होकर जाने वाली सड़क पर आगे अपना मकान होने की खूबसूरत कल्पना. क्या ‘जिस्म’ का ‘आवारापन बंजारापन’, ‘आवारा’ के ‘आवारा हूं’ पर भारी नहीं पड़ता और क्या ‘यूं ही चला चल राही’ की फक्कड़ दार्शनिकता ‘जीना यहां मरना यहां’ की सादगी याद नहीं दिलाती? ‘नो स्मोकिंग’ का ‘हयात फूंक दे, हवास फूंक दे’ ‘प्यासा’ के ‘जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया’ जितना विद्रोही ही तो है.

हिंदी फिल्मों के संगीत का सफर शूटिंग के साथ-साथ झाड़ियों के पीछे छिपकर वाद्ययंत्न बजाते संगीतकारों और गीत गाते अभिनेताओं से लेकर अत्याधुनिक यंत्नों की मदद से रिकॉर्डिग स्टूडियो में संगीत रचने तक का सफर है और अगर गायकी की बात की जाए तो इस सफर के हर टुकड़े में मखमली और नर्म आवाजें ही भारत की पहली पसंद रही हैं, चाहे वे रफी और किशोर हों या उदित नारायण और सोनू निगम. गायिकाओं में लता की पतली आवाज की मिठास पिछले पचास वर्षो में इतनी लोकप्रिय रही कि नरगिस से करीना तक सब नायिकाओं (पर्दे के पीछे गायिकाओं) ने लगभग एक जैसी आवाज में गाया.

हर फिल्म में औसतन पांच या छ: गाने रहे जिन्होंने अक्सर कहानी के प्रवाह को रोककर मनोरंजक ब्रेक का काम किया. प्राय: वे फिल्म की कहानी से इतने अलग रहे कि वीडियो या सीडी पर फिल्म देखते समय उन्हें हर घर में बेहिचक फास्ट फॉरवर्ड किया जाता रहा. लेकिन वे चित्नहारों, रंगोलियों, बिनाका गीतमालाओं, नाई की दुकानों, शादियों के बैंडबाजों और ऑटो रिक्शों में जमकर बजे और ‘हम आपके हैं कौन’ व ‘दिल तो पागल है’ अपने गीतों के कारण ही इतनी बड़ी हिट बनीं.

जिस तरह फिल्मों कहानी में सब मसाले रखे गए, म्यूजिक  में भी रखने जरूरी रहे. कम से कम एक सैड सांग अपरिहार्य है चाहे वह ‘पूरब और पश्चिम’ का ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ हो या ‘जोधा-अकबर’ का ‘जश्ने बहारां’. उसे नायक नायिकाओं ने या तो ‘दिल के झरोखे में’ गाने वाले शम्मी कपूर की तरह पियानो पर गाया या किसी पार्टी में बेवफा प्रेमी/प्रेमिका, उनके नए साथी और शराब पीते सूट बूट वाले बेवकूफ से दिखने वाले लोगों के बीच धीमे कदमों से टहलते हुए. धीरे धीरे पियानो छूटते गए और गाना गाते हीरो के हाथ में वायलिन या गिटार आ गए. ‘कर्ज’ और ‘सागर’ में गिटार बजाते ऋषि कपूर इस परिवर्तन के अगुवा रहे. उन्होंने ‘डफली वाले’ की पुकार पर डफली भी बजाई और गिटार भी जिसे वे ‘पापा कहते हैं’ गाते आमिर और ‘ओ ओ जाने जाना’ गाते सलमान को थमा गए, जिन्होंने उसे ‘रॉक ऑन’ के अर्जुन रामपाल को दे दिया. गीतों के फिल्मांकन में आता यह बदलाव पर्दे के पीछे बन रहे संगीत में आते बदलाव का ही प्रतिबिम्ब था. यह ढोलक, शहनाई, हारमोनियम और सारंगी जैसे भारतीय वाद्ययंत्नों में पश्चिम के पियानो, वायलिन और गिटार का जुड़ना था, जिसने अविस्मरणीय धुनें पैदा की.

उदासी के गाने की तरह ही एक बारिश का उत्तेजक गीत, एक मुजरे का गीत, एक लोकगीत और एक भक्ति गीत आमतौर पर डाले जाते रहे हैं.  बाकी बचे गाने जरूरत के हिसाब से संयोग श्रंगार के रोमांटिक गीत होते हैं, जिनका फिल्मांकन पहाड़ों, बगीचों या रेगिस्तान में होता रहा है. ‘हाय हाय ये मजबूरी’ से ‘ऑन द रूफ, इन द रेन’ तक बरसात के गीत और ‘दिल्ली की सर्दी’ और ‘इश्क़ कमीना’ जैसे आइटम गाने, कैंची चलाते सख्त सेंसर और जिद्दी दर्शक की इच्छाओं के बीच का रास्ता रहे, जिनके बोल और उन पर अभिनेताओं के हावभाव उस कमी को पूरा करते रहे, जिसकी फिल्म की कहानी में अनुमति नहीं थी. भक्तिगीत मुख्यत: हिन्दू देवी देवताओं के लिए गाए गए जिसमें पिछले कुछ वर्षों में सूफी संगीत और गुरबाणी भी जुड़ गए.

‘जागते रहो’ के ‘मैं कोई झूठ बोलेया’ के जमाने से ‘मौजां ही मौजां’ तक पंजाबी गीत बॉलीवुड में सब पर हावी रहे. कभी कभी ‘पधारो म्हारे देस’ और ‘नींबूड़ा’ जैसे राजस्थानी लोकगीत और ‘ओ मांझी रे, अपना किनारा’ जैसे भटियाली गीत भी सुनाई पड़े और इक्का-दुक्का ‘हुतूतू’ के ‘निकला, नीम के तले से निकला’ जैसा लावणी संगीत.

दर्शक

यह सब माथापच्ची जिसके लिए है और मुहूर्त शॉट से पहले जिसके लिए नारियल फोड़ा जाता है या फिल्म की शुरु आत से पहले स्क्रीन पर गायत्नी मंत्न पढ़ा जाता है, वह ईश्वर नहीं, परमपूज्य दर्शक है. ‘रंगीला’ का मुन्ना कहता भी है, ‘अपुन पब्लिक है. अपुन का पैसा वसूल नहीं तो अपुन किसी का भी डब्बा गुल करवा सकता है.’ और पब्लिक ऐसा ऊंट है, जिसकी करवटों का किसी को अंदाज नहीं. खुद मुन्ना यानी आमिर को भी नहीं. तभी तो ‘लगान’ और ‘दिल चाहता है’ के तूफान के बाद ‘मंगल पाण्डे’ चारों खाने चित्त हो जाती है.

‘रंगीला’ का मुन्ना कहता भी है, ‘अपुन पब्लिक है. अपुन का पैसा वसूल नहीं तो अपुन किसी का भी डब्बा गुल करवा सकता है.’ और पब्लिक ऐसा ऊंट है, जिसकी करवटों का किसी को अंदाज नहीं

सत्तर के दशक के मध्य तक भारत के उच्च और शिक्षित वर्ग ने हिन्दी फिल्मों को अछूत सा समझकर उससे एक दूरी बनाए रखी. लेकिन जब सरकार ने विदेशी फिल्मों की संख्या को नियंत्नित करना शुरु किया और अंग्रेजी फिल्में दिखाने वाले सिनेमाहॉलों के पास दिखाने को कुछ नहीं बचा तो मजबूरन उन्हें हिन्दीं फिल्में लगानी पड़ीं. यह श्याम बेनेगल और समानांतर सिनेमा के उदय का समय था, जिसने बुद्धजीवी समझे जाने वाले भारतीयों को बॉलीवुड का उपभोक्ता बनाया. लगभग इसी समय में कई फिल्मी पत्निकाएं शुरु हुईं और समीक्षकों ने फिल्मों के साथ साथ दशर्कों को भी दो भागों में बांटना आरंभ कर दिया. मजेदार बात यह है कि यह वर्ग-विभाजन परदे से सीटों की दूरी जैसे अति-भौतिक आधार पर हुआ. अगली पंक्तियों का टिकट पिछली पंक्तियों से कम था और उनमें बैठने वाले दशर्क अपेक्षाकृत गरीब थे. उन्हें मारधाड़ और मसालेदार नाटकीयता वाली फिल्में पसंद थीं. वे मेहनतकश थे और फिल्में देखकर थकान मिटाना चाहते थे. वे अपनी पसंद के दृश्यों पर सीटियां बजाते थे और पसंद न आने पर खुलकर गालियां देते थे. पिछली पंक्तियों के दशर्क कुछ अधिक शिक्षित और धनी थे. इसीलिए वे कुछ अधिक कलात्मक रुचियों वाले समझे गए. ये परिवार के साथ फिल्म देखने वाले दशर्क थे, इसीलिए सिनेमाहॉल में चुपचाप फिल्में देखते थे. इन में से कुछ के लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बौद्धिक खुराक भी था.

फिर प्रवासी भारतीयों का एक तीसरा दशर्क-वर्ग आया. उनकी तादाद कम थी, लेकिन वे देश में रहने वाले मध्यमवर्गीय दशर्कों की अपेक्षा कहीं ज्यादा मुनाफा दे सकता था. नब्बे के दशक में खास इन्हें लक्ष्य कर फिल्में बनाई जाने लगीं. इन फिल्मों का एनआरआई शादियों और त्योहारों से प्रेम के सांचे में ढला हुआ है. उसे भारत की बहुत याद आती है. इन फिल्मों ने उसे इस तरह प्रस्तुत किया है जैसे वह बनारस के मिश्रा जी से कहीं अधिक संस्कारित और साथ ही रूढ़िवादी भी है.

उनके बाद महानगरों में मल्टीप्लेक्स खुलने लगे और एक चौथा दर्शक वर्ग आया जो दो सौ रुपए की टिकट खरीदकर फिल्म देख सकता है और मध्यांतर में सौ रुपए के पॉपकॉर्न खा सकता है. पिछले कुछ वर्षो से बॉलीवुड के दिमाग में यही दर्शक बैठा हुआ है और इसी के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं. महानगरों में सिनेमाहॉल में जाकर फिल्म देखना अब मध्यवर्ग के बूते की बात नहीं रह गई है. अब वह केबल पर फिल्में देखता है या डीवीडी पर देखने के लिए मजबूरी में पाइरेसी को पोषित करता है. बॉलीवुड बिहार और उत्तरप्रदेश के उस कस्बाई दर्शक को भूल गया है, जो एक समय उसका मुख्य उपभोक्ता हुआ करता था. अब यह पेड़ की उस फुनगी की कहानी है, जो अपनी जड़ों को ही नहीं पहचानती.

बॉलीवुड के दस सांचे