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अस्तित्व से जुड़े यक्षप्रश्न

भारत और चीन का मानना है यदि उन्होंने बिना किसी बाहरी सहयोग के अपनी ऊर्जा जरूरतों और इस तरह से उत्सर्जन को कम किया तो इसके दूर नहीं बल्कि निकटगामी परिणाम उनके लिए अत्यंत दुखदायी साबित होने वाले हैं

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति ही कुछ ऐसी है कि इसमें देशहित के नाम पर बड़े-बड़े पर-देशहित तो क्या विश्वहित भी कुर्बान किए जा सकते हैं. आजतक ऐसा ही परमाणु अप्रसार पर हुआ है, जिसमें कुछ बड़े देशों द्वारा अपनी दादागिरी बनाए रखने के लिए विश्वविनाशक हथियारों के समूल नाश की बजाय उन्हें अपने तक ही सीमित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं, और ऐसा ही पर्यावरण परिवर्तन के मुद्दे पर भी हो रहा है जो कि एक दिन समूचे विश्व के ही विनाश का कारण बन सकता है. क्योटो संधि जिसकी मियाद 2012 में खत्म हो रही है उसकी जगह किस तरह का विश्व-समझौता लेगा इसपर फैसले के लिए दो साल पहले बाली में 2009 के अंत तक की समय सीमा निर्धारित की गई थी. यह समयसीमा समाप्त होने को है, सारे देशों को दिसंबर में नई संधि पर फैसले के लिए कोपेनहेगन में मिलना भी है परंतु  सहमति के कोई आसार ही नहीं नजर आ रहे हैं.

क्योटो संधि पर सहमति 1997 में और यह बनी थी कि चूंकि विकसित देशों में अंधाधुंध औद्योगीकरण के चलते विश्व पर्यावरण को जबर्दस्त नुकसान हुआ है इसलिए उन्हें न केवल इसके लिए जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से 5.2 फीसद कम करना होगा बल्कि कोई दबाव न होते हुए भी विकासशील देश ऐसा कर सकें इसके लिए उन्हें आर्थिक और तकनीकी प्रोत्साहन भी देने होंगे. मगर अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों की हीलाहवाली के चलते यह संधि पूरे आठ साल तक लटकी रही और 2005 में ही लागू हो पाई. चूंकि क्योटो संधि को लागू होने में पूरे आठ साल लग गए थे इसीलिए भी शायद नई व्यवस्था को समय रहते स्थापित किये जाने पर जोर दिया जा रहा है ताकि क्योटो संधि के खत्म होते ही या उसके आसपास इसे लागू किया जा सके.

विकसित देशों का तर्क है कि चूंकि चीन और भारत सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने वालों में हैं और इसे भविष्य में बढ़ना ही है इसलिए क्योटो संधि के उलट नई व्यवस्था में उन जैसे तमाम देशों पर भी खुद की कीमत पर उत्सर्जन कम करने की बाध्यता लागू होनी चाहिए. जबकि विकासशील देशों के समूह जी-77 और चीन का मानना है कि अभी तो उनकी मुख्य समस्याएं अपने नागरिकों के लिए रोजी-रोटी और ठीकठाक सा जीवन सुनिश्चित करने की है और ऐसी हालत में यदि उन्होंने बिना किसी बाहरी सहयोग के अपनी ऊर्जा जरूरतों और इस तरह से उत्सर्जन को कम किया तो इसके दूर नहीं बल्कि निकटगामी परिणाम उनके लिए अत्यंत दुखदायी साबित होने वाले हैं. इसके अलावा विकसित देशों के विकास की कीमत वे क्यों अदा करें?

पक्ष-विपक्ष में चाहे कितने भी तर्क-प्रतितर्क दिये-लिए जाएं मगर सच यह है कि इस दिशा में जितनी जल्दी हो सके, युद्ध स्तर पर ठोस उपाय किए जाने की जरूरत है. विकासशील देशों को यह समझना होगा कि ऐसा न करने के सबसे भयावह और सबसे पहले परिणाम उन्हें ही झेलने होंगे और विकसित देशों को यह कि यह समस्या उन्हीं की जायी है और इसके कमोबेश उतने ही भयावह परिणाम उन्हें भी भुगतने ही होंगे. कल नहीं तो परसों!

संजय दुबे  

कटने के डर से उखड़ते बिखरते

अपनी जड़ों से उखड़ना आसान नहीं होता, मगर हर साल शरणार्थी बनकर भारत आने वाले लगभग 100 पाकिस्तानी हिंदुओं की कहानियां सुनकर लगता है कि उनके पास कोई और रास्ता भी नहीं. धार्मिक पूर्वाग्रह और जान का डर उन्हें घर-बार छोड़कर यहां आने और जिंदगी अधर में बिताने पर मजबूर कर रहा है, बता रही हैं निशा सूजन, सभी फोटो शैलेंद्र पांडेय 

‘पाकिस्तान में अपने घर के भीतर भी हमें जान का डर रहता था. यहां हम रात को चैन की नींद सोते हैं’

प्रीतम और प्यारी एक साल पहले जोधपुर आए

प्रीतम कभी पाकिस्तान में एक लेडी डॉक्टर के क्लीनिक में कंपाउडर थे. वहीं पैदा हुए इस शख्स का डर हिंदुओं के खिलाफ हमलों की अफवाहों से उपजा. वो राशन की दुकान से कम से कम सामान खरीदते ताकि हिंदुओं को लूटने या उनकी हत्या करने वाले तत्वों की निगाह में न आएं. फिर एक दिन एक मुसलमान ने अपनी पत्नी के साथ अवैध संबंध का आरोप लगाकर सरेआम उन्हें गोली मारने की धमकी दी. ये आखिरी चोट थी. प्रीतम ने बचत का पैसा वीजा जुटाने में खर्च किया और परिवार सहित भारत आ गए.

‘यहां दिक्कत तो हो रही है मगर हम वापस पाकिस्तान जाने के बारे में नहीं सोच सकते. वहां हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं थे’

 

अजमल राम, इसी साल भारत आए

करीब दो साल के भीतर अजमल के परिवार के दो बच्चे गायब हो गए. जब उनकी खोज-खबर मिली तो पता चला कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम अपना लिया है. उनके मां-बाप को उन्हें वापस घर नहीं ले जाने दिया गया. हालात ऐसे थे कि अजमल के परिवार की पुलिस के पास जाने की हिम्मत तक नहीं हुई. बेहतर जिंदगी की उम्मीद में वे परिवार सहित भारत चले आए. चार महीने पहले इस बड़े परिवार का बोझ अकेले अजमल के कंधे पर आ गया. दरअसल उनके पिता और भाई अपने रिश्तेदारों से मिलने जोधपुर से बीकानेर चले गए थे जो वीजा शर्तों का उल्लंघन था और तभी से वे जेल में हैं.

 

 

 

 

 

 

 

 

‘हिंदुओं को पाकिस्तान में इंसान नहीं समझ जाता. उनकी नजरों में हमारी कोई इज्जत नहीं’

 

राजूराम, इसी महीने भारत पहुंचे हैं

जोधपुर में रह रहे 25 साल के राजूराम कहते हैं, ‘हिंदुओं का पाकिस्तान में कोई भविष्य नहीं है.’ उनके छोटे भाई मुन्ना हामी भरते हुए सिर हिलाते हैं. दोनों भाई पाकिस्तान में खेतिहर मजदूर थे जिन्हें अच्छे जमींदार की तलाश में कई बार तो साल में छह बार जगह बदलनी पड़ती थी. मुन्ना कहते हैं, ‘पाकिस्तान में किसी हिंदू के स्कूल जाने या सरकारी नौकरी के लिए कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है.’ राजूराम आगे जोड़ते हैं, ‘हिंदू अपने बच्चों को स्कूल भेजते हुए डरते हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि मुसलमान हमारे बच्चों को पहचान लें. अगर उन्हें पता चल जाए कि हमारे बच्चे पढ़ाई में तेज हैं तो वे उन्हें गायब कर देते हैं.’

‘वे मेरे बेटे को तब ले गए थे जब वह अपना भला-बुरा नहीं सोच सकता था. मैंने उसके लिए कई साल इंतजार किया’

 

जियोबाई, इसी साल भारत आईं

जियोबाई का बेटा जब गायब हुआ तो उसकी उम्र 13 साल थी. कई दिन के बाद वह उन्हें पड़ोसी के घर में मिला. मगर उनसे कहा गया कि अब वह मुसलमान है. पुलिस ने जियोबाई की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया. कुछ साल बाद वह खुद ही घर लौट आया. यह सोचकर कि हिंदुओं के साथ रहने से उसका मन बदल जाएगा, जियोबाई का परिवार जोधपुर आ गया मगर कुछ महीने बाद ही उनका बेटा पाकिस्तान लौट गया.

‘हम हर दिन नफरत के बीच में जी रहे थे. हमने सब कुछ छोड़ दिया ताकि बिना किसी डर के जीने का एक मौका मिल सके’

 

कबीर राम और रानी, अक्टूबर में जोधपुर आए

कबीर खान कहते हैं, ‘हम अपने त्यौहार बिना हिचक के मनाना चाहते थे.’ बूढ़े होने की वजह से वो काम नहीं कर सकते और उनकी पत्नी सुन नहीं सकतीं. उन्हें पता नहीं कि उनके बच्चों को भारत आने के लिए वीजा कब मिलेगा. मगर यहां आने का उन्हें कोई अफसोस नहीं है.

वो कहते हैं, ‘मेरे गांव का हर हिंदू परिवार भारत आने के लिए वीजा पाने की कोशिश कर रहा है.’ 

 

ये शरणार्थी तालिबान की बात तो नहीं करते मगर ये जरूर बताते हैं कि तबलीगी हर महीने उनके घर आया करते थे. 23 साल के अजमल राम कहते हैं, ‘वो दौलत का झूठा लालच देते हैं, कहते हैं कि अपनी बेटियों से तुम्हारी शादी कर देंगे. वो हमें ये भी बताते हैं कि अगर हमने अपना धर्म नहीं बदला तो हम नरक में जाएंगे.’लगभग 1000 लोग हर साल पाकिस्तान से भागकर भारत आ जाते हैं. अजमल भी उन्हीं में से एक हैं. ये ऐसे लोग हैं जिनकी पिछली पीढ़ी भी पाकिस्तान में ही पैदा हुई है. इनमें से हर किसी की कहानी लगभग एक जैसी है. वे बताते हैं कि हर वक्त कुछ नजरें उनके पीछे लगीं रहती थीं, वे अपने में ही सिमटते जा रहे थे, तीज-त्यौहार चुपचाप मना लेते या फिर बिल्कुल ही नहीं मनाते थे. उनकी पूजा-प्रार्थना बंद कमरे में होती और कई अपने बच्चों का नाम अफजल या अजमल रख देते. बसों या रेल में सफर करना भी मुसीबत से कम नहीं होता.

हर शरणार्थी के पास जबरन धर्मातरण से जुड़ी कोई न कोई ऐसी कहानी भी सुनने को मिल जाएगी जिसका वो गवाह रहा है. वे बताते हैं कि महिलाएं और बच्चे गायब हो जाते थे और फिर एक दिन पता चलता था कि वे मुसलमान हो गए हैं. बच्चों को वापस लाने की मां-बाप की कोशिश नाकामयाब रहती क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें समाज और व्यवस्था से कोई मदद नहीं मिलती. इन शरणार्थियों से बात करने पर अक्सर ये बात भी सुनने को मिल जाती है, ‘हमने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था. अगर ये पता चल जाता कि वो पढ़ने में तेज हैं तो तबलीगी उन्हें ले जाते.’ ये सभी शरणार्थी बताते हैं कि उन्हें कई बार ये कहकर अपमानित किया जाता था कि वे भूतों की पूजा करते हैं. विंडबना देखिए कि इन शरणार्थियों में से ज्यादातर भील और मेघवाल हैं जिनके आराध्य 14 शताब्दी में हुए बाबा रामदेव या रामदेव पीर हैं और इन्हीं रामदेव पीर के लिए सीमा के दोनों तरफ के मुसलमानो में भी उतनी ही श्रद्धा है. दशकों तक इन सभी लोगों ने कोशिश की कि उनके रोजमर्रा के रहन-सहन में उनका धर्म कहीं से नजर न आए. मगर अब ऐसा लगता है कि ये कोशिश नाकाफी साबित हो रही है.

इस पूर्वाग्रह ने गरीबी के उस अभिशाप को और भी गहरा कर दिया था जो ये लोग पीढ़ियों से ङोलते रहे हैं. खेतिहर मजदूरों के रूप में इन भीलों के लिए काम की कोई कमी नहीं थी मगर इसके बावजूद उनका भविष्य हमेशा अधर में लटका रहा. उधर, मेघवालों, जिनमें से ज्यादातर का पुश्तैनी व्यवसाय जूते बनाना है, ने खुद को समझाया कि अगर कल को उन्हें कामयाबी मिल भी जाए तो वे हिंदू विरोधी तत्वों की निगाह में आ जाएंगे इसलिए जगह छोड़ने में ही बेहतरी है.

भारत आने की प्रक्रिया में अक्सर इन शरणार्थियों के कई साल शार्ट टर्म वीजा पाने में निकल जाते हैं जिसके लिए इन्हें कई बार इस्लामाबाद के चक्कर लगाने पड़ते हैं. सभी लोगों के पास इस्लामाबाद में बिताए दिनों की यादें हैं, कृष्ण मंदिर की, जहां वो रहते हैं, हाई कमीशन की भी, जहां के कर्मचारियों से वो गुहार लगाते हैं कि हिंदू होने के नाते वे उनकी तकलीफ को समझें जब उन्हें ये वीजा मिल जाता है तो राजस्थान आने के लिए थार एक्सप्रेस में चढ़ते वक्त उनके पास कपड़े-लत्तों के सिवाय ज्यादा कुछ नहीं होता.

भारत आने के बाद भी उन्हें पता होता है कि यहां की नागरिकता पाने के लिए उन्हें मुश्किलों से भरे कई और साल देखने होंगे. तब तक सरकार से उन्हें कुछ नहीं मिलता सिवाय इस शर्त के कि वो अपना शहर नहीं छोड़ेंगे जो कि अक्सर बीकानेर या जोधपुर होता है. मगर ये सब वजहें भी शरणार्थियों की बढ़ती तादाद को नहीं थाम पातीं. जैसा कि रावत राम कहते हैं, ‘हमारे बाप-दादा पाकिस्तान में गुलामों की तरह रहे हों मगर हम नहीं रह सकते.’ 23 साल के रावत राम कभी कॉलेज में एक प्रतिभावान छात्र हुआ करते थे मगर अब जोधपुर में कपड़े सिलने का काम करते हैं.

हालांकि यहां भी मुश्किलें कम नहीं है. उनकी दस साल पुरानी बस्तियों में भी न बिजली है न पानी. सरकार उन्हें नागरिकता और इससे जुड़े लाभ देने के लिए तैयार तो है मगर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक इन शरणार्थियों की जिंदगी बस उम्मीद पर ही टिकी है.     

ऑपरेशन ब्ल्यू माउंटेन: नंदादेवी पर्वत

डिवाइस का गायब होना अमेरिका और भारत दोनों के लिए बेहद चिंता की बात थी क्योंकि ये रेडियोएक्टिव डिवाइस थी, इससे ऋषि गंगा नदी का पानी प्रदूषित होने का खतरा पैदा हो गया था 

अक्टूबर 1964 में चीन ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दुनियाभर को चौंका दिया था. साम्यवादी ताकतों को दुश्मन मानने वाले अमेरिका के लिए चीन का परमाणु शक्ति बनना एक नया खतरा था. इधर 1962 में चीन से मिली पराजय के बाद भारत में भी इस घटना से बैचैनी बढ़ गई थी. इसी दौर में चीन की बढ़ती ताकत ने अमेरिका और भारत को चीन के खिलाफ सक्रिय सामरिक सहयोग के लिए मजबूर कर दिया.

1965 में भारत-अमेरिका का खुफिया अभियान ब्ल्यू माउंटेनशुरू हुआ. यह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और भारत की खुफिया एजेंसियों का अभियान था जिसके तहत चीन के परमाणु और मिसाइल परीक्षणों पर नजर रखी जानी थी. इस अभियान के तहत भारत के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर नंदादेवी (23,500 फीट) पर एक न्यूक्लियर डिवाइस (एक जासूसी यंत्र जो परमाणु ऊर्जा से संचालित होता था) लगाई जानी थी ताकि चीन की निगरानी की जा सके. सितंबर 1965 में अमेरिकी और भारतीय पर्वतारोहियों, परमाणु वैज्ञानिकों, खुफिया अधिकारियों का एक दल नंदा देवी के लिए रवाना हुआ. इसी दल को नंदादेवी पर्वत चोटी पर परमाणु ऊर्जा से संचालित डिवाइस लगानी थी. लेकिन भारी हिमपात के चलते ये दल पर्वत की चोटी पर नहीं पहुंच सका. दल ने न्यूक्लियर डिवाइस को वापस लाने की बजाय पर्वत श्रेणी की एक गुफा में सुरक्षित रख दिया और तय किया गया कि अभियान अगले साल पूरा किया जाएगा.

मई 1966 में अभियान फिर शुरू हुआ. लेकिन इस बार मौसम की बजाय उनका सामना एक नई मुसीबत से हुआ. जिस गुफा में न्यूक्लियर डिवाइस को सुरक्षित रखा गया था, वह बर्फबारी में नष्ट हो गई थी और उसके साथ ही डिवाइस भी गायब हो चुकी थी. डिवाइस का गायब होना अमेरिका और भारत दोनों के लिए बेहद चिंता की बात थी क्योंकि ये रेडियोएक्टिव डिवाइस थी, इससे ऋषि गंगा नदी का पानी प्रदूषित होने का खतरा पैदा हो गया था. इस घटना के बाद डिवाइस खोजने का अभियान शुरू किया गया लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी खोजी दल इसे ढूंढ़ने में सफल नहीं हो पाए.

हालांकि इस घटना के बाद भी भारत-अमेरिका जासूसी अभियान चलता रहा. 1966 में नंदादेवी पर्वत की चोटी की बजाय उससे 500 फीट नीचे एक निगरानी डिवाइस लगा दी गई. लेकिन कुछ ही दिनों बाद डिवाइस ने काम करना बंद कर दिया. बाद में इस डिवाइस को नंदादेवी से लाकर वापस अमेरिका भेज दिया गया. इसके साथ ही ये जासूसी अभियान भी समाप्त हो गया. इस समय तक जासूसी सैटेलाइट छोड़े जाने लगे थे इसलिए बाद में इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया गया. इस अतिगोपनीय जासूसी अभियान पर भारत सरकार ने लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी. लेकिन 1978 में अमेरिकी मीडिया में इस अभियान संबंधित खबरें छपने के बाद तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने स्वीकार किया कि चीन के खिलाफ भारत और अमेरिका ने एक योजना पर काम किया था.

पवन वर्मा 

शेयर घोटाला: हर्षद मेहता

इस घोटाले के सामने आने के बाद तमाम निवेशकों और जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि आखिर मेहता को बैंकों से पैसा मिला कैसे?भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सन् 1990 से 92 का वक्त बड़े बदलाव का वक्त था. देश ने उदारवादी अर्थव्यवस्था की राह पर चलना शुरू ही किया था. इसी दौर में एक ऐसा घोटाला हुआ जिसने भारत में शेयरों की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन कर दिए. 1990 की शुरुआत से ही शेयर बाजार में तेजी का रुख था. इस तेजी के लिए जिम्मेदार शेयर ब्रोकर हर्षद मेहता, कारोबारी मीडिया में ‘बिग बुल’ का दर्जा पाकर शेयर बाजार को अपनी अंगुलियों पर नचाने वाला व्यक्ति बन चुका था. वह शेयर बाजार में लगातार निवेश करता जा रहा था और इसके चलते बाजार में तेजी बनी हुई थी. लेकिन किसी को भी ये अंदाजा नहीं था कि आखिर मेहता को बाजार में निवेश के लिए इतना पैसा कहां से मिल रहा है.

23 अप्रैल 1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकार सुचेता दलाल का एक लेख छपा. इसमें बताया गया था कि किस तरह मेहता बैंकिग के एक नियम का फायदा उठाकर बैंकों को बिना बताए उनके करोड़ों रुपए शेयर बाजार में लगाकर अकूत पैसा कमा रहा था. ये बात सामने आते ही शेयर बाजार तेजी से नीचे गिरा और निवेशकों को करोड़ों की रकम गंवानी पड़ी. माना जाता है कि इस घोटाले में कई बैंकों को सम्मिलित रूप से तकरीबन पांच हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.   

इस घोटाले के सामने आने के बाद तमाम निवेशकों और जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि आखिर मेहता को बैंकों से पैसा मिला कैसे?दरअसल आमतौर पर बैंक  आपस में अल्पावधि (अधिकतम 15 दिन) के लिए ऋण का लेनदेन करते हैं. एक बैंक को जब अपनी तत्काल नकद आपूर्ति बढ़ानी होती है तब वो दूसरे बैंकों के पास सरकारी प्रतिभूतियां गिरवी रखकर पैसा उधार ले लेता है. लेकिन इस तरह के सौदों में वास्तविक रूप से सरकारी प्रतिभूतियों का लेनदेन नहीं होता. जिस बैंक को नकद की जरूरत है, वो एक बैंक रिसीप्ट (बीआर) जारी करता है जो ऋण उपलब्ध कराने वाले बैंक को दी जाती है. बीआर इस बात की गारंटी होती हैं कि उधार लेने वाले बैंक की सरकारी प्रतिभूतियों पर ऋण देने वाले बैंक का अधिकार है. दो बैंकों के बीच इस तरह का लेनदेन बिचौलिए के माध्यम से किया जाता है. मेहता को बैंकों के इस लेनदेन की सारी बारीकियों का पता था. शेयर बाजार में उसकी अच्छी खासी साख थी जिसका फायदा उठाते हुए उसने दो छोटे बैंकों- बैंक ऑफ कराड (बीओके) और मेट्रोपॉलिटन को-ऑपरेटिव बैंक (एमसीबी) से फर्जी बीआर जारी करवाईं. इनके बदले मेहता ने कई बैंकों से नकद पैसा लिया और उसे शेयर बाजार में लगाया. इससे वह फौरन मुनाफा कमाता और बैंकों का पैसा उन्हें लौटा देता. जब तक शेयर बाजार ऊपर चढ़ता रहा तब तक तो इसकी भनक किसी को नहीं लगी लेकिन अप्रैल 1992 में मेहता के इस खेल का अंत हो गया. इस घोटाले का सबसे अहम परिणाम यह हुआ कि सरकार शेयर बाजार में नियमन को लेकर सजग हो गई. और उसने बाजार पर निगरानी और नियमन के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) का गठन कर दिया.

पवन वर्मा  

'विमर्श अच्छा भी हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व गौण है'

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

फिलहाल एक कहानी लिख रहा हूं जिसका नाम है रिवॉल्वर. इसके पूर्व मेरा कहानी संग्रह भूलना  प्रकाशित हो चुका है. इन दिनों उम्बर्तो इको  का उपन्यास द आइलैंड ऑफ द डे बिफोर पढ़ने में लगा हुआ हूं साथ ही हिंदी पत्रिका तद्भव  भी बड़ी रुचि से पढ़ रहा हूं.

किस विधा में लिखना पसंद है?

एक शब्द में कहूं तो कहानी. सिर्फ कहानी ही लिखता हूं.

किसके जैसा लिखने की इच्छा होती है?

उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ मुझे बेहद पसंद है. ज्ञानरंजन  की बहुत सी कहानियां हैं जो मुझे बेहद करीब महसूस होती हैं. इसके अलावा जैसा गालिब ने लिखा है उसी तरह का कुछ गद्य में लिखने की इच्छा है मेरी. 

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

किसी एक रचना का नाम तो नहीं ले सकता लेकिन कुछ कहानियां हैं जो इसका शिकार हो गईं. प्रियंवद की कहानी थी अधेड़ औरत का प्रेम. इसी तरह से नवीन कुमार नैथाणी  की एक कहानी थी पुल जो बिल्कुल अनजान रह गई. 

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

इस तरह की रचनाओं की लंबी लिस्ट है. मसलन विमर्श पर आधारित उपन्यासों की बात करें तो ये एक बढ़िया विमर्श तो हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं होता. मैत्रेयी पुष्पा  का उपन्यास अल्मा कबूतरी और कही ईसुरी फाग इसी तरह की रचनाएं हैं.

विमर्शों के प्रति क्या विचार हैं?

विमर्श होने चाहिए पर इन दिनों देखने में आ रहा है कि जो लोग साहित्यिक विधाओं को संभालने में नाकाम हो जाते हैं वो विमर्शों की आड़ में खुद को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. विमर्श अच्छा भी हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व गौण है.

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

रेणुजी और मंटो  का समग्र संकलन खरीदा है. इसके अलावा उदय प्रकाश  का कविता संग्रह एक भाषा हुआ करती थी भी खरीदा है. 

अतुल चौरसिया  

नकाब-पोशियां भाईं जिन्हें वो बुत तो नहीं

अक्सर मध्यकालीन बर्बरता के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है हिजाब. पर निशा सूजन को अचरज है कि लोग उनसे भी क्यों नहीं पूछते जिन्होंने खुद ही इसे अपनाने का फैसला किया है 

हिजाब पहनने वाली लड़कियों की खोज के आखिर में मेरी मुलाकात एक बेहद दिलचस्प लड़की से हुई. उमस भरा दिन था और पुरानी दिल्ली की एक चाय की दुकान में मैं तबस्सुम से बातें कर रही थी. 26 साल की तबस्सुम एक एनजीओ में काम करती हैं. काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर यात्राएं करनी पड़ती हैं. हिजाब के बारे में पूछने पर बातों में माहिर तबस्सुम बताती हैं कि उन्होंने हिजाब पहनना इसलिए शुरू किया क्योंकि उनके चेहरे पर मुंहासे थे.

‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है’

कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.तबस्सुम खुद को एक बहुरूपिया कहती हैं. शायद इसलिए क्योंकि वो तो दूसरों के लिए अनजान होती हैं मगर दूसरों की पहचान उनके लिए खुली होती है. दुनिया को देखने-बरतने के उनके तरीके पर हिजाब पहनने से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो चुपचाप चल सकती हैं, जोर से हंस सकती हैं, लड़कों से मिल सकती हैं और साइबर कैफे में अजनबियों के साथ चैट करते हुए घंटों भी बिता सकती हैं. लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास है कि उनका हिजाब लोगों के मन में कई सवाल खड़े करता है.

हालांकि तबस्सुम के पास इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं. वो और उनके जैसी नई पीढ़ी की मुस्लिम महिलाएं हिजाब के उस रूढ़िवादी विचार के लिए चुनौती हैं जिसके मुताबिक ये पुरुषसत्तामक समाज में महिलाओं के दमन का हथियार है. इन महिलाओं के लिए ये बिल्कुल निजी और अपनी इच्छा से लिया गया फैसला है. इसके बावजूद उनकी राय पूछने की बजाय पूरी दुनिया ने खुद ही उनकी तरफ से हिजाब के विरोध का बिगुल बजा रखा है. फ्रांस में उदारवादियों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तो मंगलोर के बेकाबू कट्टरपंथी इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहते हैं.

यहां पर दो बातें बड़ी दिलचस्प लगती हैं. भारत जैसे देश में, जहां परंपरावादी महिलाओं में बढ़ते जा रहे खुलेपन पर शोर मचाते ही रहते हैं, ये सोचना स्वाभाविक कहा जा सकता है कि हिजाब की तरफदारी होगी. इसकी बजाय इसका हर तरफ विरोध हो रहा है. उधर पश्चिमी आधुनिकता के पैरोकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इसका अहम तत्व बताते हैं मगर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वालों को लेकर उनका विरोध उनके अपने ही सिद्धांतों के उलट जाता दिखता है. उधर, तमाम मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब पहनना या न पहनना एक ऐसा मुद्दा है जिसके कई जटिल पहलू हैं.

तबस्सुम को ही लें जिन्हें दिल्ली के बाहर हिजाब की जरूरत महसूस नहीं होती. मगर दिल्ली में अपनी मां के बार-बार ये कहने के बावजूद कि- तुम इतनी खूबसूरत हो फिर अपनी खूबसूरती छिपाती क्यों हो- वो हिजाब उतारने से मना कर देती हैं. उम्र में बड़े उनके कई पुरुष रिश्तेदार कई साल तक उन पर हिजाब पहनने का दबाव डालते रहे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. और जब सबने कहना छोड़ दिया तो उन्होंने ये पहनना शुरू कर दिया. तबस्सुम के कई ऐसे रिश्तेदार ऐसे भी हैं जो अपने इलाकों के बाहर अपनी पत्नियों के हिजाब पहनने के खिलाफ हैं क्योंकि इससे लोग उन्हें महिलाओं के शोषक के रूप में देखते हैं. तबस्सुम इन दोनों तरह के लोगों पर हंसती हैं. वो अकेली नहीं हैं. हैदराबाद की 24 वर्षीय डेंटल विभाग की छात्रा महरीन अहमद जो कि डॉक्टर-इंजीनियर मां-बाप की संतान हैं ने बड़ी मुश्किल से अपने भाई को ये विश्वास दिलाया कि हिजाब पहनने की वजह से उनके ऊपर कोई खतरा नहीं है. वक्त के साथ सोच के तरीकों में भी कितना बदलाव आ गया है ये तबस्सुम और उनकी मां को देखकर समझा जा सकता है. मामला बिल्कुल उल्टा हो गया है. पहले मां बेटी से हिजाब पहनने को कहती थी और बेटी इसके लिए ना-नुकर करती थी. मगर अब मां इसे न पहनने को कह रही है और बेटी ने इसे पहनने की जिद ठान रखी है.

अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है?मगर ऐसा नहीं है कि हिजाब सबके लिए चुनने या न चुनने की आजादी वाला विकल्प बन गया हो. नाम न छापने की शर्त पर हैदराबाद स्थित एक उर्दू मीडियम महिला कॉलेज के प्रोफेसर अपने कॉलेज में आ रहे बदलावों पर बात करते हैं. वो बताते हैं कि 1980 के दशक में हिजाब पहनने वाली लड़कियां ज्यादातर इसे मजबूरी में पहनती थीं. मसलन गरीब तबके की लड़कियां जिनके लिए हिजाब कपड़ों की कमी को छिपाने का जरिया होता था. मगर अब इसे पहनना एक सख्त परिपाटी बन गई है, ऐसी ही जैसे कॉलेज खत्म होने पर भाई का गेट पर इंतजार करना. तबस्सुम की तरह ही ये लड़कियां भी महंगे डिजाइनर हिजाब पहन सकती हैं, सिनेमा जा सकती हैं, ब्वॉयफ्रेंड बना सकती हैं. मगर हिजाब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं पहना है ये कॉलेज में एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान तब साफ हो गया जब उनसे पूछा गया कि अगर वे पुरुष होतीं तो क्या करतीं. सभी प्रतिभागियों ने जवाब दिया, ‘हम हिजाब पहनना छोड़ देते.’ 

इस तरह के किस्से हिजाब पर प्रतिबंध की मांग कर रहे कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की आजादी की वकालत करते प्रगतिवादियों के तरकश के लिए अच्छे तीर हो सकते हैं. पर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वाली आधुनिक महिलाओं का क्या? तबस्सुम सोच में आ रहे उस खामोश और क्रांतिकारी बदलाव की एक झलक भर हैं जिसके तहत मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से हिजाब पहनने का विकल्प चुन रही हैं. उनके लिए हिजाब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है. वे शहरी हैं, पढ़ी-लिखी हैं, अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखती हैं और कई तो ऐसी हैं जिनकी कई पीढ़ियों में भी किसी ने हिजाब नहीं पहना होगा.  अगर सशक्तिकरण और आधुनिकता के मायने फैसले की आजादी से लगाए जाते हैं तो ये महिलाएं इस विचार के लिए बड़ी अजीब सी चुनौती पेश करती हैं. सवाल उठता है कि उदार और मुक्त समाज बनाने के उत्साह में हम उन लोगों के लिए कितनी जगह छोड़ रहे हैं जो परंपरावादी रहना चाहते हैं? 

हिजाब को अपनाने का फैसला इन महिलाओं ने अपनी इच्छा से किया है और वो भी लंबे समय तक आत्ममंथन और काफी कुछ पढ़ने-जानने के बाद वे समझती हैं कि अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है? 

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि हिजाब पहनने वाली इस नई पीढ़ी के सभी बातें सहज ही लगती हों. एक हिजाबी महिला कहती हैं, ‘कुरान आपको मर्यादित रहने की सीख देता है. परदा करने की नहीं’ दूसरी महिला कहती हैं, ‘ये आपको बाल और कान ढकने और नजरे नीची रखने का हुक्म देता है.’ एक तीसरी महिला के मुताबिक हिजाब बलात्कार से बचाता है. ये सभी महिलाएं सवाल करती हैं कि हिजाब को लेकर इतनी आपत्ति क्यों है?

 ‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ 9/11 के बाद जब भारत सहित सारी दुनिया में मुस्लिम समुदाय के प्रति शक और नाराजगी की भावना बढ़ी तो कई महिलाओं ने ये जानने के लिए कुरान की शरण ली कि क्या इसकी वजह वास्तव में उनके धर्म में छिपी है. क्या इस्लाम 17 साल के किसी लड़के को ये संदेश देता है कि वह अपने शरीर पर बम बांधकर खुद सहित कई बेगुनाह जिंदगियों को खत्म कर दे? इन महिलाओं में डॉक्टर भी थीं और कलाकार व लेखिकाएं भीं. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि इस्लाम जीने की एक सुव्यवस्थित और करुणामय शैली है और यही समझने के बाद उन्होंने हिजाब पहनने का फैसला किया.

ऐसी जिन भी महिलाओं से हमने बात की उनमें से सभी ने एक बात तो मानी और ये कि उनके इस फैसले से उनका काफी सशक्तिकरण हुआ है. मसलन बस या रेल के डिब्बे में उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ रुक गई है. जैसा कि 27 साल की सबा हाजी कहती हैं, ‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है,’ सबा ने बैंगलोर में पढ़ाई के दौरान हिजाब पहनने का फैसला किया. वो अब जम्मू में रहती हैं और अपने परिवार का एक एजुकेशनल ट्रस्ट चलाती हैं.

हिजाब पहनने के फैसले ने आधुनिकता से उपजे उपभोक्तावाद के लिए भी चुनौती खड़ी कर दी है. ऐसा इसलिए क्योंकि उपभोक्तावाद ने जिस शरीर को प्रदर्शन की चीज बना दिया है हिजाब उसे ढक देता है. आम धारणा के तहत भले ही हिजाब को किसी कैद की तरह देखा जाता हो मगर इसे पहनने वाली नई पीढ़ी का मानना है कि कैद दरअसल देहदर्शन की वो संस्कृति है जिसे उपभोक्तावाद पैदा कर रहा है और हिजाब उन्हें इस कैद से आजादी देता है. एनआरआई मां-बाप की संतान 24 वर्षीय फराह सलीम कहती हैं, ‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ उपभोग और दिखावे को बढ़ावा देते बाजार के इस दौर में ये ऐसी बातें ये सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि क्या हमें आजादी की अपनी परिभाषा को थोड़ा और समावेशी बनाने की जरूरत नहीं?

हिजाब को बाकी दुनिया हमेशा मुस्लिम महिलाओं की गुलामी से जोड़कर देखती रही है इसलिए नई सोच के साथ इसे पहनने वाली महिलाओं के बारे में आप कितने भी आंकड़े दे दें किसी को आसानी से इस पर यकीन नहीं होता. इस बारे में बात करने पर तबस्सुम कहती हैं, ‘कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.’

तो कुल मिलाकर बात यही है कि हिजाब बस कपड़े का एक टुकड़ा है और इसके भीतर मौजूद महिला को इसमें फैसले की आजादी का अहसास होता है या सुरक्षा के बंधन का, ये उसके नजरिए पर निर्भर करता है.         

गांधी जी और नोबेल पुरस्कार

जिसकी राह पर चलने की कोशिश भर से लोग नोबेल के हक़दार बन जाते हों उसे खुद इसकी क्या जरूरत! 

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार क्या मिला हममें से कई कलेजा कूटने लग गए कि हाय हमारे बापू को जो नहीं मिला वो इस मुए ओबामा को कैसे मिल गया. आलोचकों का कहना है कि यह सौगात तो ओबामा को ऐसे पकड़ा दी गयी मानो नोबेल कोई झुनझुना हो.

मगर हम लोगों को इसका मातम मनाने की आवश्यकता ही क्या है कि गांधी जी को नोबेल नहीं दिया गया. गांधीजी के नोबेल पुरस्कारों के लिए नामांकित होने के दौरान की गईं टिप्पणियों पर गौर करें तो साफ़ जाहिर है कि उन जैसे कद के मनुष्य की कल्पना तक नोबेल पुरस्कार देने वालों ने नहीं की थी. मनुष्य के आचार-विचार की जो भी सीमाएं नोबेल के आदर्शों के लिए मानक मानी गयी हैं यदि वे सभी गांधीजी के व्यक्तित्व के आगे बौनी साबित हो गईं तो इसमें दुखी होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए. दरअसल नोबेल के निर्णायकों को गांधी जी के व्यक्तित्व के बहुआयामी पहलू परेशान किये रहे. वे समझ ही नहीं पाए कि उन्हें साधु-संत की श्रेणी में रखें या समाज सुधारक की या फिर एक नेता की. उनका हर रूप बेजोड़ था और अपनी ही परिधियों को तोड़ता भी रहता था. नोबेल जैसे पुरस्कार ऐसी व्यतिक्रमी विभूतियों के लिए नहीं हैं जिनकी सीमाओं का कोई ओर-छोर न हो और जो कई मोर्चों पर मानवता के लिए सक्रिय रहते हुए भी आम आदमी बनी रहें. और लानत है ऐसे नोबेल पर जो गांधी सरीखे व्यक्तित्वों के लिए अपनी सीमाओं में फेरबदल को तैयार न हो.

नोबेल के लिए गांधीजी का नाम वर्ष 1937,1938, 1939 1947 और उनकी मौत के बाद 1948 में अंतिम सूची में शामिल किया गया था. लेकिन उन्हें पुरस्कृत क्यों नहीं किया गया इस संदर्भ में एक टिप्पणी पर गौर करें. 1937 में नोबेल समिति के सलाहकार जैकब वर्म म्युलर ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में एक शांति कार्यकर्ता और राजनेता की गांधीजी की दोहरी भूमिका की आलोचना करते हुए लिखा, ‘वह अक्सर ईसा मसीह होते हैं लेकिन अचानक ही एक आम नेता बन जाते हैं.अर्थात उन्हें इकहरी भूमिका वाला व्यक्ति चाहिए था. चयन समितियों ने गांधी जी को नोबेल न मिलने के कई कारण बताए जिनमें एक यह भी था कि वह अत्यधिक भारतीय राष्ट्रवादी थे.म्युलर ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि गांधी जी एक प्रतिबद्ध शांतिवादी नहीं थे और उन्हें यह पता रहा होगा कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके कुछ अहिंसक आंदोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे.अपने मुल्क को आजाद कराने के प्रति सक्रियता यदि किसी को पुरस्कृत होने से रोकती है तो क्या ऐसे पुरस्कार की आवश्यकता किसी जागरुक व्यक्ति को है? एक समिति का विचार था कि गांधी असल राजनीतिज्ञ या अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थक नहीं थे, न ही वह प्राथमिक तौर पर मानवीय सहायता कार्यकर्ता थे तथा न ही वे अंतरराष्ट्रीय शांति कांग्रेस के आयोजक थे.

मगर देखा जाए तो ये सब गांधीजी की सीमाएं नहीं बल्कि विशेषताएं हैं. और यही वे बातें हैं जो गांधी जी को सदैव प्रासंगिक बनाये रखेंगी. ये आलोचनाएं ही दरअसल गांधीजी की प्रशस्तियां हैं और बताती हैं कि नोबेल पुरस्कार के आदर्श गांधीजी के आदर्शों से कितने बौने हैं. रही बात ओबामा की तो खुद ओबामा गांधी जी के व्यक्तित्व के फैन हैं. क्या हमारे लिए यह गौरव की बात नहीं कि ओबामा को नोबेल उनके उन संकल्पों और स्वप्नदर्शिता की वजह से दिया गया है, जिनमें गांधी जी के आदर्शों को भी पर्याप्त जगह मिली हुई है. पुरस्कारों का औचित्य यही होना चाहिए कि वे चयनित व्यक्ति के कार्यों की सराहना ही न करें बल्कि  उसे और श्रेष्ठ कार्यों को करने के लिए प्रेरित भी करें. इस लिहाज से ओबामा जसे युवा और स्वप्नदृष्टा को दिया गया यह पुरस्कार औचित्यपूर्ण है और प्रशंसनीय भी.

अभिज्ञात

(लेखक सन्मार्ग में वरिष्ठ उप-सम्पादक और साहित्यकार हैं)   

एक घोटाले की प्रेतमुक्ति

दो दशक और 250 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद निष्कर्ष ये है कि बोफोर्स मामले को यहीं दफन कर दिया जाए. शांतनु गुहा रे इस बहुचर्चित कांड के विभिन्न पड़ावों और इससे जुड़ी तमाम किंवदंतियों को याद कर रहे हैं 

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के पश्चिमी छोर से निकलने वाली साफ-सुथरी सड़क के दोनों किनारों पर फैले ग्रामीण अंचल के नयनाभिराम दृश्यों को देखते हुए घंटे भर में आप कार्ल्सकोगा पहुंच जाएंगे. तकरीबन 1500 की आबादी वाला एक बेहद शांत सा कस्बा है कार्ल्सकोगा. दशकों से यहां के निवासी जिस आयुध निर्माण कंपनी में काम करके अपनी आजीविका चलाते आ रहे हैं उसका नाम है एबी बोफोर्स. 1873 में स्थापित हुई इस कंपनी का नाम पास ही में चलने वाली सत्रहवीं सदी की एक हैमरमिल के नाम पर पड़ा जिसे लोग बूफोर्स के नाम से पुकारा करते थे.

पटना के आकाशवाणी केंद्र में एक दस वर्षीय बच्चे से कोई कविता पढ़ने के लिए कहा गया तो उसने छूटते ही लाइव कार्यक्रम में कह डाला, ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है.’

25 मार्च, 1986 की रात कार्ल्सकोगा का आसमान आतिशबाजियों की चकाचौंध से गुलजार था, लोग खुशी से पागल हुए जा रहे थे. हमेशा शांत रहने वाले इस कस्बे में मानो दीवाली मनाई जा रही थी. कंपनी में काम करने वाले पुरुष अपनी संगिनियों के साथ सज-संवर कर शैंपेन की बोतलें उड़ेल रहे थे. वो खुशी की रात थी. पैसे और काम की कमी से जूझ रही एबी बोफोर्स को एक नया जीवन जो मिल गया था. दरअसल एक दिन पहले ही उसके हाथ भारतीय सेना को 400 हॉवित्जर  तोपें (155 एमएम) आपूर्ति करने का ठेका मिला था जिसकी कुल कीमत थी 1,437 करोड़ रूपए.

एबी बोफोर्स के आंतरिक दस्तावेज बताते हैं कि ‘वो पूरी रात नाचते-गाते और जश्न मनाते रहे. इस उत्सव का आयोजन सत्ताधारी लेबर यूनियन पार्टी ने किया था जिसका समापन पूरे कस्बे ने अलोफ पामे को धन्यवाद ज्ञापित करने वाले एक पत्र पर हस्ताक्षर करके किया. पामे स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी लेकिन सौदे पर दस्तखत होने के महीने भर पहले ही उनकी हत्या कर दी गई थी. कस्बेवालों को उस वक्त इस बात का रत्तीभर भी अंदेशा नहीं था कि जिस ऐतिहासिक सौदे को लेकर वो इतनी खुशियां मना रहे हैं वो जल्द ही भारत के इतिहास के सबसे कुख्यात घोटाले में तब्दील होने वाला है. जल्द ही ये आरोप फिजा में तैरने लगे कि सौदे को पक्का करने के लिए 64 करोड़ रुपए की घूस दी गई. ये ऐसा घोटाला था जो अगले दो दशकों तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर पर चढ़ कर नाचने वाला था.

आने वाले समय में इस घोटाले ने देश के इतिहास की सबसे मजबूत सरकार की बलि ले ली और कभी ‘मिस्टर क्लीन’ के नाम से पुकारे जाने वाले प्रधानमंत्री- राजीव गांधी – के ऊपर भी इस घोटाले की कालिख के तमाम छींटे पड़े; इस घोटाले ने सियासत के एक नए सितारे – वीपी सिंह – को जन्म दिया जिन्होंने इस मुद्दे पर पूरे देश में अभियान चलाया और अंत में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे; प्रभावशाली उद्योगपति – हिंदुजा भाइयों – को भी इस घोटाले ने अपनी चपेट में लिया और उन्हें छुटभैए अपराधियों की तरह देश की निचली अदालत के चक्कर काटने पड़े; और घोटाले से कथित तौर पर जुड़े एक अहम खिलाड़ी ने तो इसके चलते ट्रेन से कटकर अपनी जान तक दे दी. मगर एक बिचौलिया – इतालवी व्यापारी ओतावियो क्वात्रोकी- जो इस मामले में वांछित था – नाटकीय रूप से इंटरपोल की गिरफ्त में आने से बच निकला जबकि एक और बोफोर्स एजेंट- विश्वेश्वरनाथ ‘विन’ चड्ढा – सालों तक निर्वासन में रहा और दिल्ली लौटने के कुछ ही दिनों बाद हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गई.

इसके अलावा अलोफ पामे की फरवरी 1986 को संदिग्ध हालत में उस समय हत्या हो गई जब वो अपनी पत्नी के साथ स्टाकहोम के एक थियेटर से फिल्म देखकर बाहर निकल रहे थे. बोफोर्स सौदे के महीने भर पहले हुई उनकी हत्या का राज भी आज तक राज ही बना हुआ है. असल में बोफोर्स की कथा की तुलना किसी भी सास-बहू वाले सीरियल से की जा सकती है जिसमें कभी भी कुछ भी हो सकता है मगर कहानी कभी अंत की ओर जाती नहीं दिखती.

सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का एक बार कुछ निजी से माहौल में कहना था, ‘इसे दफन करने के लिए ढेर सारा समय और पैसा खर्च किया गया.’

बोफोर्स घोटाले ने आम जनमानस के ऊपर इस कदर असर डाला था कि देश भर में गांवो, कस्बों और शहरों की दीवारों पर इससे जुड़े नारे लिखे दिख जाते थे. इस घोटाले ने किस कदर राजीव गांधी की प्रतिष्ठा को चौपट किया था इसका अंदाजा हमें उस समय की एक घटना से मिल जाता है. पटना के आकाशवाणी केंद्र में एक दस वर्षीय बच्चे से कोई कविता पढ़ने के लिए कहा गया तो उसने छूटते ही लाइव कार्यक्रम में कह डाला, ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है.’ शाम होते-होते बेचारा आकाशवाणी निदेशक अपने घर का प्यारा हो चुका था.

बोफोर्स घोटाले का प्रभाव इतना व्यापक था कि किसी सुपरहिट टेलीविजन सोप की तरह इसमें तमाम छोटे-छोटे उप-विवाद और घोटाले  भी जन्म लेते रहे- मसलन राजीव गांधी प्रशासन ने वीपी सिंह के पुत्र को भ्रष्टाचार के फर्जी मामले में फंसाने की कोशिश की, सीबीआई ने बार-बार इस मामले को लटकाने और अदालत को गुमराह करने के प्रयास किए.

ये भी उतना ही बड़ा सच है कि दो दशकों तक देश और विदेश में थका देने वाली कानूनी प्रक्रियाओं के बावजूद इस मामले में एक भी व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया जा सका. मलेशिया से लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन तक इसका दायरा फैला हुआ था, पनामा से लेकर लिसेंस्टीन और लक्जमबर्ग तक अनगिनत बार कानूनी खतो-किताबत भी हुई जिसका उद्देश्य था घोटाले से जुड़ी रकम कहां-से कहां और कैसे गई, इसकी जांच करना. लेकिन बोफोर्स का जिन्न आज भी बार-बार कांग्रेस पार्टी और विशेषकर पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी के के गले की हड्डी बना हुआ है. कुछ दिन पहले सरकार द्वारा क्वात्रोकी के खिलाफ आपराधिक आरोप वापस लेने के फैसले से तत्काल ही उन तमाम लोगों की भृकुटियां तन गईं जिन्होंने इस मामले को रफा-दफा करने की हर सरकारी कोशिश का कदम-कदम पर प्रतिरोध किया था.

‘क्वात्रोकी के खिलाफ मामला वापस लेने का फैसला उस कोशिश का नतीजा है जो लंबे समय से इस मामले को खत्म करने के लिए की जा रही थी. इस कदम के साथ ही बोफोर्स घूस मामले पर पर्दा डालने की कोशिशें पूरी हो गई हैं’ ये कड़ी प्रतिक्रिया सीपीआई (एम) ने 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख दिए सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के उस बयान के बाद दी जिसमें उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इतालवी व्यापारी के खिलाफ मामला खत्म करने का फैसला किया है.

बोफोर्स के अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो की गोपनीय डायरी से हासिल हुए थे जिसमें ‘क्यू’, ‘नीरो’ और ‘गांधी का विश्वस्त वकील’ जैसे शब्दों का बार-बार जिक्र हुआ थापूर्व राजदूत बीएम ओझा, जो कि सौदे पर दस्तखत के वक्त स्वीडन में भारतीय राजदूत थे, ने एक समाचार एजेंसी को बताया, ‘अगर क्वात्रोकी को भारत लाया भी जाता तो भी वो नेताओं को दी घूस की जानकारी नहीं देने वाला था क्योंकि वो पहले ही बता चुका है कि राजीव गांधी से उसके बहुत अच्छे पारिवारिक रिश्ते थे. इसलिए ईमानदारी से कहा जाए तो ये रास्ता बंद होना है.’ ओझा की बात सही लगती है.

‘भारत में बोफोर्स मामले में किसी ने कुछ नहीं किया. सारे लोग बस इसे दूर से देखते और एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे.’ सीपीआई नेता डी राजा चुटकी लेते हैं. मुख्य विपक्षी दल भाजपा सारा ठीकरा कांग्रेस के सिर ये कह कर फोड़ रही है है कि कांग्रेस का रवया इस मामले में बेहद ढुलमुल रहा है. ‘हमने क्वात्रोकी के खाते सील किए, उसके खिलाफ इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करवाया लेकिन कांग्रेस की सहायता से वो बच निकला’ ये कहना है भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी का. मजे की बात ये है कि राजीव गांधी के ही एक फैसले ने बोफोर्स मामले को घूस कांड में बदला था. साल 1984 के आखिरी दिनों में लोकसभा चुनावों की सबसे बड़ी जीत दर्ज करके प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले राजीव गांधी ने फैसला किया कि अब से सैनिक साजो-सामान की कोई भी खरीदारी सीधे-सीधे सरकार और आपूर्तिकर्ता के बीच होगी, इसमें किसी बिचौलिए की भूमिका नहीं होगी. ये फैसला उस समय तक चली आ रही व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत था. उससे पहले तक दलाली एक नियमित और वैध प्रक्रिया थी, बिचौलियों को हथियार सौदों में एक निश्चित रकम मिला करती थी.

इस सौदे पर बारीकी से निगाह रखने वालों के मुताबिक बोफोर्स सौदे पर दस्तखत से काफी पहले ही यानी मार्च 1986 में इसकी घोषणा से पूर्व ही ये समझौता पक्का हो चुका था. घोषणा के दो महीने पहले ही जब अलोफ पामे छह देशों के राष्ट्राध्यक्षों के एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आए हुए थे तो उस दौरान उनकी राजीव गांधी से एक गोपनीय मुलाकात हुई थी. दिल्ली के मौर्या शेरेटन होटल में हुई इस मुलाकात में पामे ने राजीव गांधी को दलील दी कि अगर ये हथियार समझौता नहीं हुआ तो उनकी लेबर यूनियन पार्टी को आगामी चुनावों में हार का मुंह तक देखना पड़ सकता है. गांधी, जो कि पामे को अपना करीबी दोस्त मानते थे, सौदा एबी बोफोर्स को देने पर राजी हो गए. इस तरह बैठक खत्म करके पामे खुशी-खुशी एयरपोर्ट रवाना हो गए. अतिउत्साह में वो अपना एयरकोट तक लेना भूल गए थे जिसके लिए विदेश मंत्रालय के दो अधिकारियों को तुरंत ही एयरपोर्ट दौड़ाया गया था.

लेकिन समझौते के साल भर बाद ही इसकी परतें उघड़ने लगीं. स्वीडिश रेडियो के दो संवाददाताओं ने 16 अप्रैल 1987 की सुबह ये दावा किया कि बोफोर्स ने सौदा हासिल करने के लिए शीर्ष भारतीय राजनीतिज्ञों और रक्षा अधिकारियों को घूस दी है. भारतीय सरकार ने बिना समय गंवाए इस विस्फोटक खबर को ‘झूठी, आधारहीन और शरारतपूर्ण करार दिया’. इसके बावजूद  खतरे की घंटी बज चुकी थी और प्रधानमंत्री और शीर्ष अधिकारियों के बीच बैठकों की मानो बाढ़ सी आ गई.

खबर उजागर होने के चार दिन बाद 20 अप्रैल 1987 को राजीव गांधी ने लोकसभा को बताया कि सौदे में कोई बिचौलिया या लेन-देन शामिल नहीं है. लेकिन तनाव कम नहीं हुआ क्योंकि विपक्ष इस मामले में अपनी कमर कस चुका था. मजबूरन सरकार को अगस्त 1987 में मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की घोषणा करनी पड़ी.

सरकार के इरादों पर संदेह करने की कई वजहे हैं मसलन उसने क्वात्रोकी के लंदन स्थित बैंक खातों को फिर से खोलने की छूट दे दी, पहले मलेशिया और फिर अर्जेंटीना से उसका प्रत्यर्पण करवाने में नाकाम रही

बी शंकरानंद (तत्कालीन राजीव सरकार में मंत्री) की अगुवाई वाली इस जेपीसी ने जुलाई 1989 में अपनी रपट संसद के सामने रखी जिसमें उसने राजीव सरकार को क्लीनचिट दे दी थी. इसके  विरोध में विपक्ष ने संसद से ‘वॉकआउट’ किया और इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया. द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस  इन दो अखबारों ने भी अपनी खोजी रपटों के माध्यम से इतना कुछ जनता के सामने रख दिया कि इस आधार पर मामले में आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता था. नुकसान हो चुका था, कांग्रेस पार्टी को 1989 के आम चुनावों में 200 से भी कम सीटें मिलीं. 

दो दशक बाद बोफोर्स मामले में सीबीआई की जांच भारत की अब तक की सबसे महंगी जांच है जिसमें करदाताओं की गाढ़ी कमाई का करीब 250 करोड़ रुपया खर्च या यूं कहें कि बर्बाद किया जा चुका है. ‘भारत में किसी और मामले की जांच में इतना वक्त नहीं लगा और किसी मामले में इतने सारे पेंच भी नहीं थे.’ मामले की जांच से जुड़े रहे सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का एक बार कुछ निजी से माहौल में कहना था, ‘इसे दफन करने के लिए ढेर सारा समय और पैसा खर्च किया गया.’

बहरहाल इस मामले में शामिल सभी आरोपी या तो बरी हो गए जैसे कि हिंदुजा बंधु या फिर दुनिया से ही रुखसत हो गए मसलन राजीव गांधी, विन चड्ढा और पूर्व रक्षा सचिव एसके भटनागर. इनमें से राजीव गांधी को दिल्ली हाईकोर्ट ने मरणोपरांत निर्दोष करार दिया. फिलहाल इस मामले का एकमात्र जीवित आरोपी है 70 वर्षीय ओतावियो क्वात्रोकी जो कि 1985 में इतालवी कंपनी स्नैमप्रोगेटी का भारत में प्रतिनिधि था. उसके खिलाफ आरोप है कि उसने राजीव गांधी के मोहरे के रूप में 64 करोड़ रूपए की घूस हासिल की.

‘इसकी वजह ये है कि सरकार में कोई भी मामले को हल करने के लिए इच्छुक नहीं जान पड़ता है,’ सरकार के ताजे रुख पर सुप्रीम कोर्ट के वकील अजय अग्रवाल कहते हैं. जनवरी 2006 को अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके मांग की थी कि क्वात्रोकी के बैंक अकाउंट को सील करने के लिए सरकार विदेशी कोर्ट का सहारा ले. सुप्रीम कोर्ट ने ने याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को ऐसा करने का निर्देश दिया. अग्रवाल ने अब नई दिल्ली के मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कावेरी बवेजा के समक्ष एक याचिका दायर करके सीबीआई के ताजा कदम का विरोध किया है. उनका कहना है कि सीबीआई को न्यायपालिका के साथ खेल खेलने की छूट नहीं दी जा सकती है.

विडंबना ये रही कि वीपी सिंह जिन्होंने बोफोर्स घोटाले पर देश के मानस को राजीव गांधी के खिलाफ खड़ा किया और 1988 में इलाहाबाद के उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की वो अपने 11 महीने के प्रधानमंत्रित्वकाल में इस घोटाले की जांच की गति में तेजी लाने में असफल रहे. जैसे ही राजीव गांधी के समर्थन से वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार से अलग हुए चंद्रशेखर ने सरकार बनाई इस मामले की जांच पूरी तरह से ठप पड़ गई.

1991 के आम चुनावों के मध्य में ही राजीव गांधी की हत्या हो जाने के बाद पीवी नरसिंहा राव प्रधानमंत्री बने. उस दौरान राजनीति के गलियारों में ये एक आम धारणा थी कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी राव बोफोर्स जांच का इस्तेमाल सोनिया गांधी को काबू में रखने के लिए कर रहे हैं. 1996 में राव के चुनाव हार जाने के बाद अल्पकाल के लिए बने दो प्रधानमंत्रियों (एचडी देवेगौड़ा और आईके गुजराल) के समय में कुछ भी उम्मीद रखना बेमानी था क्योंकि दोनों ही कांग्रेस की बैसाखी पर टिके हुए थे.

लेकिन विशेषज्ञों को चकराने वाली चीज रही भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के दौरान बोफोर्स मामले की जांच में कोई ठोस प्रगति न हो पाना. हालांकि 1998 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के काल में ही इस मामले में पहला आरोपपत्र निचली अदालत में दाखिल किया गया. इसके बाद सीबीआई ने आरोपियों की सूची में राजीव गांधी का नाम भी इसी दौरान जोड़ा और हिंदुजा भाइयों का नाम भी शामिल किया गया जिन्होंने बोफोर्स को सौदा दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. पर इसी एनडीए के कार्यकाल में इस मामले में सीबीआई को अदालतों में सबसे बड़े झटके भी लगे थे. इस दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी और हिंदुजा भाइयों के खिलाफ आरोपों को निरस्त कर दिया और उन्हें रिहा करने का आदेश भी दिया. कोर्ट के मुताबिक सीबीआई उन ब्रिटिश उद्योगपतियों के खिलाफ न सिर्फ अपनी जांच ठीक से नहीं कर रही थी बल्कि उन्हें निशाना बनाने में सरकारी धन का दुरुपयोग भी कर रही थी. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात रही सीबीआई का प्रमाणित किये गए उन दस्तावेजों को अदालत में पेश न कर पाना जो स्विटजरलैंड से मामले को पुख्ता करने के लिए मंगाए गए थे. इसने आरोपियों को बरी कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

इसका एक दूसरा पहलू भी है. दो दशक की उबाऊ जांच के बाद भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों में इस मामले के बंद होने को लेकर एक तरह की संतुष्टि का भाव भी देखने को मिल रहा है. उनके मुताबिक ये खबर प्रस्तावित 30 अरब डॉलर के रक्षा सौदों के लिहाज से बहुत अच्छी है. ये देखना और भी दिलचस्प है कि बोफोर्स मामला मुकदमेबाजी के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है और साथ ही इसने कई नए सवालों को भी जन्म दिया है मसलन सीबीआई को या किसी भी जांच एजेंसी को आरोप वापस लेने या कोर्ट को मामला बंद करने की सलाह देने का अधिकार है या फिर क्या ट्रायल कोर्ट इसमें कुछ कर सकता है.

नियमों के तहत तो ट्रायल कोर्ट आरोपपत्र रद्द करने की सीबीआई याचिका से बंधा नहीं है. इसकी बजाय अदालत सीबीआई को निर्देश दे सकती है कि जिस आधार पर वो मामला वापस लेना चाहती है उस पर एक बार फिर से गंभीरतापूर्वक विचार करे और अदालत को सलाह दे कि क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण के लिए और क्या-कुछ किया जा सकता है.

कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली पहले ही कह चुके हैं कि बोफोर्स मामला भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में नहीं आता है और न ही क्वात्रोकी समेत इसमें शामिल किसी भी आरोपी के खिलाफ इसके तहत कार्रवाई हो सकती है. पार्टी के नेता इस आधार पर भी मामले को हमेशा-हमेशा के लिए दफन होते देखना चाहते हैं कि ये महज 64 करोड़ रुपए की मामूली घूस का मामला ही तो है.

एक बात तो साफ है कि अगर सीबीआई चाहती तो इस मामले से किसी-न-किसी तरह से जुड़े रहे लोगों की एक लंबी-चौड़ी सूची थी, जो मामले की जांच और अपराधियों को सजा दिलाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकते थे. रक्षा मंत्रालय में तत्कालीन संयुक्त सचिव एसके अग्निहोत्री ने सार्वजनिक तौर पर इस सौदे का विरोध किया था. उस वक्त 155 एमएम की तोप की कीमत निर्धारण के लिए बनी समिति के सदस्य रहे अग्निहोत्री का कहना था कि एबी बोफोर्स हमारे गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करती है. बोफोर्स के हाथ में सौदा जाने सेतीन महीने पहले ही अग्निहोत्री का तबादला कपड़ा मंत्रालय में कर दिया गया. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बोफोर्स कांड कांग्रेस के लिए उसी तरह का निर्णायक मोड़ था जैसा कि 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस भाजपा के लिए. ‘बोफोर्स ऐसा मुद्दा रहा है जिसने भारतीय राजनीति पर हमेशा अपनी छाया डाली. इसका भूत आज भी भारत की सुरक्षा तैयारियों को सवाल के घेरे में खड़ा करता है’ पूर्व पत्रकार दिलिप चेरियन कहते हैं. पर सवाल ये है कि आखिर इस घोटाले का इतना दीर्घकालिक प्रभाव क्यों पड़ा? उस पीढ़ी के तमाम लोगों की नजर में इस घोटाले ने कांग्रेस पार्टी पर भ्रष्ट संगठन का ठप्पा लगाया जो देश के स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई वाली अपनी प्रतिष्ठा पहले ही गंवा चुकी थी.

हालांकि इस मामले में अभी तक कुछ भी साबित नहीं हो सका है लेकिन इसका कीचड़ बीते दो दशकों से कांग्रेस के दामन से चिपका हुआ है. बहुतों की निगाह में इसकी वजह ये है कि राजीव गांधी सरकार बार-बार वायदे करने के बावजूद कभी भी सच्चाई को उजागर करने के प्रति गंभीर नहीं रही. जबकि दूसरों का मानना है कि सीबीआई क्वात्रोकी के खिलाफ सबूतों के बावजूद कार्रवाई के प्रति अनिच्छुक रही. उसके खिलाफ अधिकतर सबूत बोफोर्स के अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो की गोपनीय डायरी से हासिल हुए थे जिसमें ‘क्यू’, ‘नीरो’ और ‘गांधी का विश्वस्त वकील’ जैसे शब्दों का बार-बार जिक्र हुआ था. माना जाता है कि क्यू क्वात्रोकी के लिए और नीरो अरुण नेहरू के लिए इस्तेमाल हुआ था जो कि उस वक्त कैबिनेट में एक ताकतवर मंत्री थे.

1989 के आम चुनावों के प्रचार के दौरान वीपी सिंह हर सभा में अपनी जेब से एक छोटा सा कैलकुलेटर निकालते थे और मौजूद भीड़ से कहते थे कि इस छोटी सी मशीन में स्विस बैंको के खाता नंबर हैं जिनमें बोफोर्स घूस की रकम जमा है. और अगर उन्हें सत्ता हासिल हुई तो वो उन खातों को खोलने में सफल हो जाएंगे. हालांकि ये अलग बात है कि उन्होंने ऐसा कुछ किया नहीं. जॉर्ज फर्नांडिज भी उस वक्त इसी तरह के दावे किया करते थे जो बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में रक्षामंत्री भी बने. कोलकाता के अखबार टेलीग्राफ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जल सिंह को एक स्विस बैंक के खाते की पूरी जानकारी दी है जिससे बोफोर्स घोटाले से जुड़ी सभी जानकारियां मिल सकती थी. आज दो दशक बाद भी किसी स्विस खाते को सामने नहीं लाया जा सका है.

जिस वक्त बोफोर्स घोटाला उजागर हुआ था उस वक्त प्रतिष्ठित कानूनविद राम जेठमलानी ने भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस दौरान उनका हर दिन राजीव गांधी से दस सवाल पूछने का तरीका बहुत मशहूर हुआ था. लेकिन वाजपेयी की सरकार बनने के बाद कुछ समय के लिए कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी के समय में भी बोफोर्स मामले की जांच घिसट-घिसट कर ही चलती रही. एक चौंकाने वाली बात ये रही कि 2003 में जेठमलानी ने अचानक ही हिंदुजा भाइयों की पैरवी करने की घोषणा कर दी और वे उन्हें कानून के चंगुल से मुक्ति दिलाने में भी सफल रहे.

इस मामले में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वालों में एक और नाम रहा अरुण जेटली का, लेकिन एक भाजपा नेता के रूप में नहीं बल्कि एक युवा वकील के रूप में. 1990 में वीपी सिंह द्वारा उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त करने के बाद उन्होंने बेहद आक्रामक ढंग से इस मामले को आगे बढ़ाया. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वाजपेयी सरकार में कानून मंत्री रहते हुए वो कभी भी उस गति को हासिल नहीं कर पाए जैसी 1990 में दिखी थी. बावजूद इसके इसी साल अप्रैल में उन्होंने दावा किया कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वो बोफोर्स मामले में सीबीआई की असफलताओं की जांच के लिए आयोग गठित करेंगे.

ये बयान उस वक्त आया जब सीबीआई ने क्वात्रोकी को अपनी वांछितों की सूची से बाहर निकाल दिया था और इंटरपोल ने उसके खिलाफ जारी हुआ 12 साल पुराना रेड कॉर्नर नोटिस भी वापस ले लिया था. संक्षेप में कहें तो राजनीतिक दांवपेंच में फंस कर ये मामला सालों तक लटकता रहा. सरकार के इरादों पर संदेह करने की कई वजहे हैं मसलन उसने क्वात्रोकी के लंदन स्थित बैंक खातों को फिर से खोलने की छूट दे दी, पहले मलेशिया और फिर अर्जेंटीना से उसका प्रत्यर्पण करवाने में नाकाम रही, जहां उसे इंटरपोल के नोटिस के आधार पर गिरफ्तार किया गया था और अब उसने क्वात्रोकी के खिलाफ सारे आरोप वापस लेने का निर्णय कर लिया.

सवाल उठता है कि वाजपेयी सरकार ने इस मामले की सच्चाई सामने लाने की क्या कोशिशें की? वाजपेयी की मलेशियाई प्रधानमंत्री के साथ एक मुलाकात से जुड़ी बेहद दिलचस्प कहानी राजनीतिक हल्कों में सुनी-सुनाई जाती है. उस वक्त क्वात्रोकी कुआलालंपुर में रहता था और उसने मलेशिया की सुप्रीम कोर्ट में अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ अर्जी लगा रखी थी. जब मोहम्मद ने वाजपेयी से क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण के संबंध में भारत की गंभीरता के बारे में पूछा तो बैठक में मौजूद एक अधिकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री खिड़की से बाहर देखते रहे थे.

ऐसा ही एक नाटक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के फार्महाउस पर उस दिन सुबह देखने को मिला जब वो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे. गुस्साए चंद्रशेखर अपने फार्महाउस के देहाती माहौल में बैठे हुए थे, घोटाले में फंसे एक व्यापारिक घराने के कुछ सदस्य घंटों से उनके पैर दबाए जा रहे थे. उस वक्त वहां मौजूद एक व्यक्ति के मुताबिक- ‘वो नहीं चाहते थे कि नेताजी (चंद्रशेखर) बोफोर्स की फाइलों में उनके खिलाफ कुछ लिखें.’

एक पल के लिए ऐसा लग सकता है कि क्वात्रोकी के खिलाफ आरोप वापस लेने के फैसले के बाद बोफोर्स मामला खत्म हो चुका है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई की याचिका पर निर्णय देना अभी बाकी है और तब तक सोनिया गांधी के इतालवी मित्र ठीक से राहत की सांस नहीं ले सकते. हैरत की बात ये है कि कांग्रेस की धुर विरोधी राजनीतिक पार्टियां जिनमें भाजपा भी शामिल है, सीबीआई के फैसले पर ज्यादा कुछ नहीं बोल रहीं हैं. ढेरों संदिग्ध चरित्रों, आपराधिक मामलों और ऑफ द रिकॉर्ड कहानियों की घालमेल के बीच देश के सबसे बड़े मामलों में से एक की गुत्थी अभी उलझी ही पड़ी है.  

ट्विटर- 140 आखर का टोटका

समाचार चैनल एनडीटीवी की मैनेजिंग एडिटर बरखा दत्ता तो ट्विटर पर हैं ही साथ ही उनके नाम पर एक फर्जी प्रोफाइल भी चल रहा है और इस सदस्य ने पूरी ईमानदारी दिखाते हुए अपना नाम फेक बरखा दत्ता यानी नकली बरखा दत्त रखा है

किसी के लिए ये बेकार का शोर है तो कोई इसे गागर में सागर भरना सिखाने वाला माध्यम करार दे रहा है. चर्चित वेबसाइट ट्विटर के प्रभावों और इसकी संभावनाओं की थाह ले रही हैं मंजुला नारायण 

यूं तो विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की विवादास्पद टिप्पणी से पहले भी भारत में ट्विटर का जिक्र कई बार हो चुका था. मसलन पिछले साल नवंबर में मुंबई हमले के दौरान अखबारों और समाचार चैनलों पर इसकी चर्चा हुई, फिर इस साल अप्रैल में खबरें आईं कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक ने 50 करोड़ डॉलर में ट्विटर को खरीदने की कोशिश की मगर सौदा नहीं पट सका और अब गूगल इसकी कोशिश कर रहा है. 14 जुलाई को जानी-मानी अभिनेत्री मल्लिका शेरावत को ट्विटर के हेडक्वार्टर में आमंत्रित किया गया जो अमेरिका के कैलिफोर्निया में है. इसके कुछ ही दिन बाद प्रीतिश नंदी ने कमबख्त इश्क को लेकर करीना पर आलोचना के तीर छोड़े तो फिर ट्विटर शब्द सुनाई दिया. फिर पिछले महीने मशहूर हीरोइन कैटरीना कैफ की तरफ से एक बयान जारी किया गया कि वे ट्विटर का इस्तेमाल नहीं करतीं और कोई शख्स उनके नाम से इस पर अकाउंट बनाकर लोगों से बात कर रहा है. पर तब तक भी अपने यहां ट्विटर का जिक्र अखबारों में पीछे के पन्नों और समाचार चैनलों पर इक्का-दुक्का चर्चाओं तक सीमित था. थरूर की टिप्पणी ने इसे अखबारों के मुख्यपृष्ठ और चैनलों की मुख्यचर्चा का विषय बना दिया.

सवाल उठता है कि आखिर ये ट्विटर है क्या? दरअसल ये एक वेबसाइट है, एक माध्यम जिसके जरिए आप किसी को छोटे-छोटे संदेश भेज सकते हैं और उनका जवाब पढ़ सकते हैं. मगर इन संदेशों के अक्षरों की सीमा बंधी हुई है. ये है अधिकतम 140 अक्षर. यही वजह है कि इसे माइक्रोब्लॉगिंग सर्विस कहा जाता है. यानी ब्लॉग मगर बहुत छोटा. ट्विटर की खासियत ये है कि इससे भेजा गया संदेश जिसे ट्वीट भी कहते हैं, फौरन ही हजारों लोगों तक पहुंच जाता है. वहीं ये आपको प्राइवेसी की सुविधा भी देता है. यानी ऐसा नहीं हो सकता कि कोई आपकी मर्जी के बिना आपसे कुछ भी कह जाए.

इस तरह से देखा जाए तो ट्विटर, ऑरकुट या फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स और मोबाइल से भेजे जाने वाले संदेश के बीच की चीज है. शायद इसीलिए इसे इंटरनेट का एसएमएस भी कहा जाता है. इसकी शुरुआत जैक डॉर्सी ने 2006 में अमेरिका में की थी और सिर्फ दो ही साल में ये दुनिया की 13वीं सबसे लोकप्रिय वेबसाइट बन गई है. मगर ट्विटर सिर्फ संदेश भेजने का जरिया ही नहीं बल्कि एक असरदार राजनीतिक हथियार भी हो सकता है, इसका अहसास दुनिया को इस साल जून में तब हुआ जब राष्ट्रपति चुनावों के बाद ईरान में उथल-पुथल मची. ये ट्विटर का ही कमाल था कि ईरान में अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के जाने पर रोक के बावजूद सरकार विरोधी प्रदर्शनों और इसके बाद पुलिस की बर्बरता की खबरें दुनियाभर को मिलती रहीं. ईरान में रह रहा ट्विटर का कोई सदस्य किसी घटना के बारे में ट्वीट भेजता और वह फौरन ही सैकड़ों दूसरे सदस्यों तक पहुंच जाता. ये सैकड़ों लोग इसे हजारों और फिर लाखों लोगों तक पहुंचा देते.

कुछ समय बाद जब भारत में ट्विटर की प्रगति पर बात होगी तो थरूर को उन पहली शख्सियतों में से एक के तौर पर याद किया जाएगा जिन्होंने अनजाने ही देश में इसकी पहुंच को कई गुना बढ़ा दिया. उनकी कैटल क्लास वाली टिप्पणी से पहले ट्विटर की पहुंच फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के मुकाबले बहुत कम थी और इनका इस्तेमाल करने वाले लोगों में इसके इस्तेमाल की कोई खास ललक भी नहीं थी. इंटरनेट मार्केट रिसर्च कंपनी कॉमस्कोर के मुताबिक इस साल फरवरी तक भारत में ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले लोगों का आंकड़ा 1.19 लाख था. ये संख्या भले ही बहुत बड़ी लगती हो मगर तब ये बहुत छोटी लगने लगती है जब एक जानी-मानी बिजनेस पत्रिका द्वारा हाल ही में करवाया गया एक अध्ययन बताता है कि भारत में इंटरनेट सोशल नेटवर्क्स का नियमित इस्तेमाल करने वाले लगभग 1.7 करोड़ लोग हैं. यही अध्ययन ये भी बताता है कि हर वर्ग में 30 फीसदी लोग ऐसे हैं जो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से ऊब चुके हैं.

‘मैंने इसे शर्म करार दिया तो ऐसा करते ही कुछ लोग मुझ पर टूट पड़े. ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरा खून पीने पर उतारू हों. मैंने उनसे कहा कि मैं नरेंद्र मोदी से सहमति नहीं रखता और मुझे वो पसंद नहीं. वो लोग अब भी मेरे संपर्क में हैं ’

ऐसे लोगों के लिए बनिबस्त सीधा विकल्प है ट्विटर. बस एक संदेश भेजिए और काम खत्म. नियम सीधे हैं कोई सेलिब्रिटी खोजिए और उसे फॉलो करने का विकल्प चुनिए. बस, आप बन गए उसके अनुयायी यानी कि फॉलोअर. इसके बाद वो शख्सियत जब भी कोई संदेश लिखेगी यानी ट्वीट करेगी तो वो न सिर्फ फौरन आप तक पहुंच जाएगा बल्कि आप अगले ही पल उसका जवाब भी दे सकेंगे.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किया गया एक हालिया अध्ययन बताता है कि ट्विटर पर 90 फीसदी ट्वीट्स इस पर सबसे सक्रिय दस फीसदी सदस्यों के होते हैं. हॉलीवुड स्टार एश्टन कचर और उनकी पत्नी डेमी मूर के कुल 5.8 लाख फॉलोअर्स हैं. भारत में भी इसके दीवानों की संख्या तेजी से रफ्तार पकड़ रही है और शशि थरूर इस मामले में सबसे आगे लगते हैं जिनके फॉलोअर्स का आंकड़ा 2.92 लाख है. भारत में ट्विटर पर होने आवाजाही में पहला बड़ा इजाफा मार्च में हुआ. इस दौरान पत्रकार और फिल्म निर्माता प्रीतिश नंदी और टीवी पत्रकार बरखा दत्त इसके सदस्य बने. जैसा कि नंदी बताते हैं, ‘मैंने पढ़ा था कि किस तरह ईरान की महिलाएं ट्विटर के जरिए अपने राजनैतिक विचार लोगों के सामने रख रही हैं. मैंने ये भी पढ़ा था कि ओबामा की टीम भी ट्विटर पर मौजूद रहती है ताकि सरकार के कामकाज में पारदर्शिता में मदद मिल सके. मेरी जिज्ञासा बढ़ी. इसलिए मैं इस वेबसाइट पर गया और मुझे ये अच्छी लगी.’

आज प्रीतिश नंदी के कुल 5208 फॉलोअर्स हैं जिनमें आईटी प्रोफेशनल्स, नई पीढ़ी के फिल्मकार और मीडिया पर निगाह रखने वाले लोग भी शामिल हैं. नंदी कहते हैं, ‘फेसबुक में आपकी निजता का कुछ ज्यादा ही अतिक्रमण हो जाता है जबकि ट्विटर एक ऐसा सार्वजनिक माध्यम है जहां अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति की उपेक्षा करते हैं जो कहता है कि वो एक असाधारण अभिनेता है और आपकी फिल्म में रोल चाहता है, तो वो इतना शर्मिंदा हो जाता है कि वो आपको अकेला छोड़ देगा. ट्विटर आप पर किसी किस्म का दबाव नहीं डालता.’

नंदी का ये भी मानना है कि ट्विटर जैसी वेबसाइट बोलचाल की कला का ही एक विस्तार है. वे कहते हैं, ‘आपको लोगों के साथ संवाद करना होता है नहीं तो कोई भी आपको फॉलो नहीं करेगा. फिल्मस्टार्स को फॉलो करने वाले बहुत से लोगों को 15 दिन तक ऐसा करना बहुत अच्छा लगता है, उसके बाद वे छिटकना शुरू हो जाते हैं. स्टार्स के फॉलोअर्स की लिस्ट लंबी जरूर हो सकती है मगर संवाद के आदान-प्रदान के मामले में वहां न के बराबर वाली स्थिति होती है. इसकी तुलना में हम जैसे लोग भी हैं जो बातचीत करते रहते हैं और आप देखेंगे कि हमारे पेज पर ट्वीट्स का ढेर है.’

नंदी के मुताबिक ट्विटर की ताकत इस बात में छिपी है कि इस माध्यम के जरिए आप किसी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप अपना पक्ष रख सकते हैं और फिर जब चाहें तुरंत उसका बचाव भी कर सकते हैं. वे इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘मैंने इसे शर्म करार दिया तो ऐसा करते ही कुछ लोग मुझ पर टूट पड़े. ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरा खून पीने पर उतारू हों. मैंने उनसे कहा कि मैं नरेंद्र मोदी से सहमति नहीं रखता और मुझे वो पसंद नहीं. वो लोग अब भी मेरे संपर्क में हैं.’ नंदी ये भी मानते हैं कि ट्विटर सार्वजनिक बहस के स्तर को समृद्ध कर रहा है क्योंकि अखबार जैसे माध्यम के उलट ये लोगों को सीधे और कई स्तरों पर आपस में जुड़ने का मौका देता है.

साइकोथेरेपिस्ट नीतू सरीन कहती हैं, ‘ट्विटर आत्मअभिव्यक्ति का पर्याय बन चुका है. फेसबुक या माइस्पेस की तरह इसका इस्तेमाल अपनी खोई जड़ें तलाशने के लिए नहीं हो रहा. बल्कि ये अपनी राय देने और उसे दुनिया तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है.’जैसा कि किसी भी जीवंत माध्यम की विशेषता होती है, ट्विटर भी कई तरह के काम कर सकता है. ये किसी भड़काऊ राजनैतिक बयान के लिए इस्तेमाल हो सकता है, इससे उपयोगी जानकारी आपस में बांटी जा सकती है या फिर इसे छोटी-छोटी बातों पर शोर मचाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. लोकप्रिय वेबसाइट प्लग्ड डॉट इन के संस्थापक और देश में ट्विटर के विकास पर निगाह रखने वाले आशीष सिन्हा का मानना है कि ट्विटर पर होने वाली बेकार की बातचीत में से ज्यादातर वक्त के साथ खत्म हो जाएगी, ठीक ऐसे ही जैसा ब्लॉग जगत में हुआ जहां अब धुरंधर और समर्पित लिखाड़ ही बचे हुए हैं. सिन्हा कहते हैं, ‘यहां पर कई सोशल मीडिया कंसल्टेंट्स से लेकर स्वनामधन्य गुरुओं तक कई लोग हैं जो बेकार के शोर में शामिल हैं. मगर साथ ही जब बात दिलचस्प लोगों से मिलने और बातचीत में झिझक को खत्म करने की हो तो ट्विटर संभावनाओं के नए द्वार खोलता है. ट्विटर से शशि थरूर पर बात करना श्री शशि थरूर से सीधे बात करने से कहीं आसान है.’

सिन्हा के मुताबिक एक हालिया अध्ययन में उन्होंने पाया कि भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों में से ज्यादातर अब भी ट्विटर के बारे में नहीं जानते. हालांकि करण जौहर और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारों द्वारा अपनी फिल्मों कुर्बान और व्हाट्ज योर राशि के प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल बताता है कि ये भारत में धीरे-धीरे अपनी मजबूत पैठ बनाता जा रहा है. समाचार चैनल एनडीटीवी की मैनेजिंग एडिटर बरखा दत्ता तो ट्विटर पर हैं ही साथ ही उनके नाम पर एक फर्जी प्रोफाइल भी चल रहा है और इस सदस्य ने पूरी ईमानदारी दिखाते हुए अपना नाम फेक बरखा दत्ता यानी नकली बरखा दत्त रखा है. ये सदस्य कभी-कभी बरखा पर तंज भी कसता है और इसके 100 से भी ज्यादा फॉलोअर्स हैं.

बरखा ट्विटर को अपने टीवी कार्यक्रमों का ही एक हिस्सा मानती हैं. इसमें उन्हें दर्शकों को परदे के पीछे होने वाली घटनाओं के बारे में बताना आसान हो जाता है. जसा कि उन्होंने संजना जॉन की उस रूखी प्रतिक्रिया पर किया जो संजना ने 59 साल कैद की सजा काट रहे अपने डिजाइनर भाई आनंद जॉन पर बने चैनल के कार्यक्रम पर दी थी. जैसा कि बरखा कहती हैं, ‘ट्विटर बातचीत का एक ऐसा माध्यम है जिसमें आप तुरंत ही बहुत से लोगों से एक साथ बात कर सकते हैं. मैं इसे टीवी और दर्शक के बीच एक संपर्क की तरह इस्तेमाल करती हूं, काफी कुछ एसएमएस और ईमेल की तरह. मैं इसे ये जानने के लिए उपयोग करती हूं कि लोग क्या सोच रहे हैं.’

मगर क्या इसमें बातचीत के एक समंदर में डूब जाने का खतरा नहीं है, ये पूछने पर बरखा कहती हैं, ‘ये इस पर निर्भर करता है कि आप क्या खोज रहे हैं. ट्विटर का मतलब पत्रकारिता या विश्लेषण नहीं है. ये बात करने का एक अवसर है. मगर मैं इसे उथला नहीं कहूंगी. भारतीयों को राय देने का शौक होता है और जब मैं कोई टिप्पणी करती हूं तो इसके जवाब में ढेर सारी प्रतिक्रियाएं आती हैं.’ कोलंबिया ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के प्रोफेसर श्री श्रीनिवासन बरखा की बात का समर्थन करते हुए कहते हैं, ‘ट्विटर नए आइडियाज, ट्रेंड्स और सूत्र खोजने में पत्रकारों की मदद कर सकता है. इसकी मदद से वे पाठकों और दर्शकों से नई तरह से जुड़ सकते हैं और नए दर्शकों तक अपना काम पहुंचा सकते हैं. वैसे ये बात हर क्षेत्र के लिए लागू होती है.’

जैसा कि किसी भी मंच पर होता है, ट्विटर यूजर्स को अपने फॉलोअर्स से कई तरह की प्रतिक्रियाएं मिल सकती हैं. असहमति के सुर को मर्यादा की सीमा पार करते देर नहीं लगती. बरखा ऐसी किसी भी चीज को फौरन ब्लॉक कर देती हैं. वे कहती हैं, ‘इंटरनेट लोगों को आपसे सीधे बात करने की सहूलियत देता है. लोगों के साथ मजाक भी होता है मगर मुझे अभी तक बहुत ज्यादा बदतमीजी नहीं झेलनी पड़ी है.’

श्रीनिवासन कहते हैं, ‘ट्विटर का मतलब है एक नई तरह का शिष्टाचार सीखना. मगर वास्तविक जीवन में जो कॉमन सेंस है वही यहां पर भी कॉमन सेंस है. आप जो कहते हैं वह लंबे समय तक मौजूद रहता है. इसलिए मेरा नियम ये है कि ट्विटर को अपनी और दूसरों की मदद के लिए इस्तेमाल करिए न कि अपना भोंपू बजाने के लिए.’ जैसा कि आम जिंदगी में भी होता है, बदतमीज, बेकार की बातें करने वाले और असभ्य लोगों को ज्यादातर लोग ब्लॉक कर देते हैं. बरखा कहती हैं, ‘आपको सावधान रहते हुए सार्वजनिक शिष्टाचार के नियमों के हिसाब से चलना पड़ता है. याद रखना पड़ता है कि एक तरह से इंटरनेट की दुनिया प्रकाशन की दुनिया है.’ और इस दुनिया भी असल दुनिया की तरह उन लोगों से बचा जाता है जो आत्ममुग्धता से ग्रस्त होते हैं और उन लोगों से मिलने-जुलने को प्रोत्साहन दिया जाता है जो काम के होते हैं.

जैसा कि नंदी कहते हैं, ‘आपमें ये क्षमता होनी चाहिए कि आप किसी विचार को 140 अक्षरों में पूरी तरह से व्यक्त कर सकें. कभी-कभी मैं ऐसा करता हूं कि छह बिंदु लेता हूं और उन्हें बुन देता हूं. ये माध्यम आपको भाषा को असरदार तरीके से इस्तेमाल करना सिखाता है.’ नंदी मानते हैं कि एक ऐसे माहौल में जहां चापलूसी को प्रोत्साहन मिल रहा है, ट्विटर आपको बहस के लिए जगह देता है. वे कहते हैं, ‘सभी नए मंचों की तरह ये व्यवस्था विरोधी और तर्कवादी है. इसमें कई बेकार की बातें भी हो रही हैं मगर वहीं इस पर कई गूढ़ विचारक भी हैं. कई मंच इस तरह की सुविधा नहीं देते भले ही वे कितने भी व्यापक क्यों न हों.’ नंदी का मानना है कि अगले आठ महीनों के दौरान इस माध्यम की लोकप्रियता में विस्फोट होगा.

हालांकि इसकी सफलता एक बड़ी हद तक इस बात पर भी निर्भर करेगी कि ये कितनी आसानी से प्रचार और मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल हो सकता है. सिन्हा कहते हैं, ‘प्रियंका चोपड़ा आसानी से अपनी आने वाली फिल्मों का प्रचार ट्विटर पर कर रही हैं. कई ब्रांड्स भी ग्राहकों से फीडबैक पाने के लिए ट्वीट्स की मदद ले रहे हैं. टीवी चैनल्स भी अपनी ट्विटर आईडीज प्रोमोट कर रहे हैं. ब्लॉगिंग के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ था.’ हालांकि ये बात भी सही है कि जसा अधिकांश तकनीकों के साथ होता है, इसके नए और अप्रत्याशित उपयोगों के बारे में तो सिर्फ आने वाला समय ही कुछ बता सकेगा. चेन्नई के डा वेंकटचलम ट्विटर पर इस साल जुलाई में किए गए घुटने के एक ऑपरेशन के बारे में बताते हैं तो हाल ही में इंफोसिस द्वारा एक सौदा पक्का करने की खबर बताती है कि देश में माइक्रोब्लॉगिंग का भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है.

मगर ऐसा नहीं है कि हर कोई इसे लेकर इतना ही उत्साहित हो. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुद को इस तेजरफ्तार दुनिया से परे कर रहे हैं. जैसा कि लीगल रिसर्चर लॉरेंस लियांग कहते हैं, ‘मोबाइल्स, एसएमएस और ईमेल के इस जमाने में हम पहले से ही तेज रफ्तार के पीड़ित हैं. हर चीज की तुरंत प्रतिक्रिया देने की जरूरत होती है, हर चीज को तुरंत जानने की जरूरत होती है. ऐसे लोग जरूर हैं जो इसे रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं और जिनके लिए तात्कालिकता एक जरूरत है मगर मैं धीमी रफ्तार में यकीन रखता हूं. और ये ट्विटर के संसार में अजनबी सी चीज है जहां चौबीसों घंटे मुझसे कुछ न कुछ कहने की अपेक्षा की जाती है.’ लियांग मानते हैं कि इंटरनेट की दुनिया में सांस लेने में उन्हें अब थोड़ी-थोड़ी दिक्कत होने लगी है. मगर जिंदगी की रफ्तार को सुस्त करने की ये कोशिश सबके लिए नहीं है. खासकर उनके लिए जो जिंदगी तेज रफ्तार में जीना चाहते हैं और जी भी रहे हैं. शशि थरूर को छोड़ दिया जाए तो ट्विटर का इस्तेमाल करने वाली बड़ी शख्सियतों में से ज्यादातर फिल्म और मीडिया से जुड़ी हुई हैं. जैसा कि साइकोथेरेपिस्ट नीतू सरीन कहती हैं, ‘ट्विटर आत्मअभिव्यक्ति का पर्याय बन चुका है. फेसबुक या माइस्पेस की तरह इसका इस्तेमाल अपनी खोई जड़ें तलाशने के लिए नहीं हो रहा. बल्कि ये अपनी राय देने और उसे दुनिया तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है.’

सरीन मानती हैं कि इन शख्सियतों की ट्वीट्स उनके एक ऐसे हिस्से को दर्शाती हैं जो छिपा हुआ होता है. वे कहती हैं, ‘आप चाहें पत्रकार हों या अभिनेता, आपके भीतर एक कोना ऐसा होता है जो सबके सामने आना चाहता है. एक दूसरा हिस्सा होता है जो छिपे रहना चाहता है. ट्विटर आपको ऐसा करने की सुविधा देता है. हालांकि यहां पर ऐसा दुर्लभता से ही होता है कि कोई सनसनी मचाने वाली नितांत निजी जानकारियां सार्वजनिक करे. तो एक तरह से ये किसी व्यक्ति को किसी दूसरे की जिंदगी में झांकने का मौका तो देता है मगर ऐसा करते हुए एक साफ लकीर भी खिंची होती है जिसके आगे नहीं बढ़ा जा सकता.’ इस तरह देखा जाए तो आप इसके बारे में अपनी राय कायम करने के लिए आजाद हैं. सवाल कई हो सकते हैं. मसलन क्या इसके आने का मतलब ये है कि मुद्दों पर होने वाले विमर्श का बौद्धिक स्तर गिर जाएगा? क्या बड़ी से बड़ी लड़ाइयां और विरोध 140 अक्षरों के ट्वीट तक सिमट कर रह जाएंगे? या फिर इससे गहरे जमी हुईं कई धारणाएं टूटेंगी?

ट्विटर के प्रति इस असहजता की एक वजह शायद इसकी आजादख्याली के प्रति डर भी है. ये इसका एक ऐसा गुण है जिसे बाहर से लोकतंत्र का चोला ओढ़े मगर भीतर काफी हद तक सामंती मानसिकता में डूबे इस समाज में तारीफ भी मिली है और आलोचना भी. सवाल ये भी है कि क्या ट्विटर भारतीयों के सोचने का तरीका बदलेगा? क्या इससे बौद्धिकता का स्तर बढ़ेगा या फिर घटेगा? शायद आपको ये सवाल ट्वीट करने चाहिए. हो सकता है आपको कोई जवाब मिल जाए, वो भी सिर्फ 140 अक्षरों में.  

जलती हुई कारों के बीच अच्छी थ्रिलर: एसिड फैक्ट्री

फिल्म एसिड फैक्ट्री

निर्देशक सुपर्ण वर्मा

कलाकार इरफान खान, मनोज वाजपेयी, डीनो मोरिया, दिया मिर्जा

यह एक उम्दा और कसी हुई स्क्रिप्ट वाली फिल्म है, एक अच्छी थ्रिलर. संजय गुप्ता के प्रोडक्शन की कांटे और जिन्दा स्टाइल वाली यह पूरी कहानी विदेश में ही घटती है, जहां पांच लोग एक एसिड फैक्ट्री में बन्द हैं और अपनी याददाश्त खो बैठे हैं. हमारे यहां की जितनी फिल्में भी विदेश में शूट होती हैं, उनका बड़ा प्रतिशत कॉपी की गई फिल्मों का होता है. इस तरह मूल पटकथा में ज्यादा बड़े संशोधन करने की मेहनत बच जाती है. एक उड़ती हुए खबर हम तक भी पहुंची है कि यह अननोननाम की किसी फिल्म की कॉपी है, उसी तरह, जैसे जिन्दा’, ‘ओल्ड बॉयकी थी और कांटे’, ‘रिजरवॉइर डॉग्सकी. यदि हम इस तथ्य से निरपेक्ष रह पाते हैं और अपनी याददाश्त, फिल्म के चरित्नों की तरह बनाकर यह भूल जाते हैं कि यह नकल से बनी फिल्म है तो वाकई यह एक अच्छी फिल्म है जो आपको बांधे रखती है और पलक झपकने जितनी फुरसत भी मुश्किल से ही देती है. बीच में देर तक हवा में उड़ती और जलती हुई कारों के लगभग अर्थहीन सीक्वेंस जरूर हैं, मगर वे धूमकी तरह बिल्कुल बेवजह भी नहीं हैं. उनके आसपास और बीच में एक मजबूत कहानी है, बढ़िया सिनेमेटोग्राफी एडिटिंग और सब कलाकारों का अच्छा अभिनय खासकर मनोज वाजपेयी का, जो तालियां और ध्यान खींचने वाली चुम्बक से बने लगते हैं. अच्छे निर्देशक और अच्छी फिल्म की विशेषता होती है कि उसमें साधारण और बुरे अभिनेता भी अपने किरदार संजीदगी से निभा जाते हैं. फरदीन और डीनो से भी सुपर्ण वर्मा ने अच्छी एक्टिंग करवा ली है.

यह टेरन्टिनो की शैली की फिल्म है, अपराधियों की कहानी और उनके आपस के रिश्तों और व्यवहार पर बनी हल्की डार्क फिल्म और हल्की कॉमेडी भी. यह ग़ैरजवाबदेह और झूठे लोगों की कहानी है और फिल्म के मूड के अनुरूप बहुत खूबसूरती से पुरानी बन्द फैक्ट्री का परिदृश्य रचा गया है. कितना अच्छा है कि फिल्म के रंग भी उनकी याददाश्त की तरह सीमित हैं और फिल्म देखने के बाद आपको जंग लगे लोहे का रंग देर तक याद रहता है जो शायद वहां रखे लोहे के पुराने सामान का रंग है. यह तकनीकी रूप से सुदृढ़ होते हुए भी अपने ज्ञान को कमीनेकी तरह आप पर नहीं थोपती. सुपर्ण वर्मा को याद है कि एक अच्छी सब्जी, मसालों में सब्जी डालने से नहीं, सब्जी में मसाले डालने से बनती है. 

गौरव सोलंकी