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‘मुझे सिर्फ़ 72 घंटों का समय दें’

पिछले कुछ महीनों से सरकार की ओर से लगातार बयान आ रहे थे कि महाराष्ट्र चुनाव के बाद ऑपरेशन ग्रीन हंट ‘नक्सलवादियों के खिलाफ युद्ध’ शुरू किया जाएगा. पर आपके बातचीत के प्रस्ताव के बाद इनपर कुछ हद तक विराम लगा है. नक्सलवादियों के खिलाफ सरकार के पहले आक्रामक और फिर नरम रुख की क्या वजहें रहीं? और माओवादी हिंसा को खत्म करने का सबसे सही रास्ता क्या है?

मैंने गृह मंत्रालय में किसी भी दस्तावेज पर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ लिखा नहीं देखा. यह पूरी तरह से मीडिया की खोज है

युद्ध हर कोई पसंद करता है, खासतौर से मीडिया. आपको यह हर देश में देखने को मिलेगा चाहे वह अमेरिका में 9/11 के बाद हो या भारत में 26/11 के बाद. लेकिन आपको स्थिति की गंभीरता को कम नहीं करना चाहिए. इस समय सात राज्यों के कई जिले सीपीआई (माओवादी) के नियंत्रण में हैं और वहां के प्रशासन को उन्होंने पूरी तरह से ठप्प कर रखा है. तब भी सरकार ने ज्यादा कुछ कहने-सुनने की बजाय राज्य सरकारों से मश्विरा करके सिर्फ समस्या सुलझाने की दिशा में प्रयास किया. हमने ऐसा जनवरी में किया, फिर अगस्त में. हम इस नतीजे पर पहुंचे कि माओवादियों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई की जाए, हमने अपने इस फैसले को सार्वजनिक भी किया. केंद्र ने राज्यों में अर्धसैन्य बल भेजने, उन्हें इंटेलीजेंस सूचनाएं देने, प्रशिक्षण, उपकरण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी दिया. आप मेरा एक भी बयान बताइए जहां मैंने माओवादियों के खिलाफ ‘आक्रामक’ रुख अपनाया हो. मैं इस बात को नहीं मानता कि सरकार ने पहले भड़काऊ बयान दिए फिर नरम रवैया अपना लिया. जब हमने इस मसले पर मुख्यमंत्रियों से बात की तो इसे ‘आक्रामक रुख’ कहा गया और हमारे माओवादियों से बात करने की बात को नरमी कहा गया.

पहले माओवादियों से हथियार डालने को कहना और फिर केवल हिंसा छोड़ने को कहना क्या आपके रुख में एक बड़ी  तब्दीली नहीं है.

मैंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वे हथियार डाल दें. मुझे पता है वे ऐसा नहीं करेंगे, यह उनकी विचारधारा के खिलाफ है. दुर्भाग्य से हमारे मीडिया ने इस अंतर पर ध्यान नहीं दिया.

कई सरकारी अधिकारियों ने मीडिया में ऑपरेशन ग्रीन हंट की बात की थी, लेकिन आपने और गृह सचिव गोपाल पिल्लई ने इसपर हाल ही में बयान दिया कि यह सब मीडिया की उपज है. तो क्या अब हम मान लें कि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होने वाला? और यदि कुछ हो रहा है तो आने वाले महीनों में क्या होने वाला है?

ऑपरेशन ग्रीन हंट कुछ नहीं है. आप उस अधिकारी का नाम बताइए जो ऐसा कुछ है, मैं उसके खिलाफ कार्रवाई करूंगा. मैंने गृह मंत्रालय में किसी भी दस्तावेज पर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ लिखा नहीं देखा. यह पूरी तरह से मीडिया की खोज है. जहां तक आने वाले समय की बात है, जिन इलाकों में प्रशासन लगभग खत्म हो गया है उसे बहाल करने में, आपको पुलिस के  ज्यादा समन्वित प्रयास देखने को मिलेंगे. और इसके  लिए हम अर्धसैन्य बलों, खुफिया तंत्र और सूचनाओं के माध्यम से पुलिस की सहायता करेंगे.

लेकिन आपने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में एक बयान दिया था कि यदि जरूरत पड़ी तो आप सेना या राष्ट्रीय राइफल को भी बुला सकते हैं. आपने यह भी कहा था कि नागरिक समाज ‘आतंक का माहौल’ बनाने में सहयोग कर रहा है इसलिए अब उसे किसी एक को ‘चुनना’ चाहिए. व्यवस्था की जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ आवाज उठाना तो हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है, इसका मतलब यह तो नहीं कि वे माओवादी हिंसा का समर्थन कर रहे हैं. लोगों के ऐसे काले-सफेद आकलन का क्या मतलब? हमें दो शैतानों में से एक को क्यों चुनना चाहिए? आप लोकतांत्रिक स्वरों को अपराधी बनाकर उन्हें माओवादियों के साथ क्यों रखना चाहते हैं?

लेकिन कानून और प्रशासन राज्य का  विषय है. यदि मैं ज्यादा हस्तक्षेप करूंगा तो वे संविधान में राज्य के विषय वाली सूची मुझे थमा देंगे

मेरी बातों के गलत उल्लेख के लिए मैं आपको दोष नहीं देता. मैंने इनके साथ रहना सीख लिया है. आपने इंडियन एक्सप्रेस में दिए मेरे बयान से तीन चीजों का उल्लेख किया और तीनों ही गलत हैं. वहां मुझसे पूछा गया था कि क्या सेना बुलाई जाएगी?  मैंने कहा था नहीं, आंतरिक सुरक्षा से जुड़े अभियानों में सेना का उपयोग नहीं होगा लेकिन यदि जरूरी हुआ तो कुछ खास परिस्थितियों में सेना के कमांडो बुलाए जा सकते हैं. कमांडो को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए तैयार किया गया है और उनका उपयोग पूरी सावधानी से किया जाता है.

दूसरा उल्लेख आपने यह किया कि मैंने नागरिक समाज को दो (राज्य प्रायोजित हिंसा और माओवादी हिंसा) में से एक चुनने को कहा. आप मुझे बताएं कि ऐसा मैंने कहां कहा था. अपने बयान में मैंने माओवादियों के हिंसा के इतिहास और सशस्त्र संघर्ष से राज्य का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की उनकी नीति की ओर इशारा किया था. फिर मैंने यह कहा था कि हम लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा से बंधे हुए हैं. इसलिए नागरिक समाज को अब यह चुनना होगा कि वे सरकार के वर्तमान स्वरूप को चाहते हैं या एक सशस्त्र मुक्ति संघर्ष और फिर वंचितों की तानाशाही. आप इस कठोर चयन से मुंह नहीं मोड़ सकते. आप भारत के नागरिक हैं, यहां रह रहे हैं और आपको, मुझे और हर एक को इनमें में एक को रास्ता चुनना ही होगा. किशनजी, कोबाद गांधी और उनके जैसे दूसरों लोगों को इनमें से एक को चुनने का अधिकार है और वे तय कर चुके हैं. मैं भी अपना विकल्प चुन चुका है. भले ही इसमें कमियां हों लेकिन मैं एक लोकतांत्रिक गणतंत्र चाहता हूं. मैंने संविधान के तहत शपथ ली है. और अब सरकार के इस स्वरूप को बचाना मेरी जिम्मेदारी है जिसे मैंने, आपने और हमारी पिछली पीढ़ियों ने चाहे सही हो या गलत पर चुन लिया था. और यहां मैं बस यही कह रहा हूं कि दूसरों को भी इन विकल्पों में से एक को चुनना होगा. इसका मतलब दो तरह की हिंसा में से किसी एक को चुनना नहीं है. तो जब आप मेरे उस बयान के बारे में कहती हैं जहां मैं एक विकल्प चुनने की बात करता हूं तो आपको इसका संदर्भ भी बताना चाहिए कि मैंने किन चीजों में से चुनने की बात की थी.

ठीक बात है. लेकिन कुछ लोग तो माओवादियों को निशाना बनाने वाले अभियानों का विरोध करेंगे ही. हालांकि हमने एक प्रजातांत्रिक गणतंत्र में रहने का विकल्प चुना है लेकिन यह हमें इसकी खामियां बताने से नहीं रोकता. जब हम सरकार के दमन या निर्दोंषों को होने वाले नुकसान की ओर इशारा करते हैं तब आप गृहमंत्री होने के नाते न्याय के माहौल में बेहतरी लाने की कोशिश क्यों नही करते? क्या आप यह नहीं कह सकते कि पुलिस या अर्धसैन्य बलों की ज्यादतियों को सहन नहीं किया जाएगा?

मैं इस बात पर पूरी तरह सहमत हूं. हमारा लोकतंत्र खामियों से भरा है और ये दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं. हमें इस पर बहस करनी चाहिए और इसे सुधारने के लिए संघर्ष और पूरी कोशिश करनी चाहिए. चाहे यह प्रक्रिया कितनी ही धीमी क्यों न हों, इस दौरान हम कितने ही हताश क्यों न हों लेकिन सरकार के वर्तमान स्वरूप को खत्म न होने दें. एक ही दिन में व्यवस्था पूरी तरह से नहीं सुधारी जा सकती. संविधान में, अदालत, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति-जनजाति के आयोगों, सूचना आयोग और चुनाव आयोगों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे सरकार के कामकाज पर निगाह रखें. यदि ये संस्थाएं ठीक से काम करें तो हमारा तंत्र ठीक हो जाएगा. सबसे निराशाजनक बात यह है कि इनमें से कई संस्थाएं फैसले करने में हिचकती हैं या वे एक तरह से निष्क्रिय हैं. इससे हमारी व्यवस्था में खामियां बढ़ती हैं. कुछ निश्चित नियमों को लागू करना मेरे अधिकारक्षेत्र में आता है. उदाहरण के लिए, मैंने यह साफ-साफ कह रखा है कि राज्य या केंद्र स्तर पर पुलिस जिसे भी हिरासत में लेगी उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के  सामने पेश करना होगा. मैं फर्जी मुठभेड़ों के बिल्कुल खिलाफ हूं. पुलिस और अपराधियों की मुठभेड़ में लोग मर सकते हैं, लेकिन यदि आप किसी को हिरासत में लेते हैं तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए. मैं यह बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि जब से मैं गृहमंत्री बना हूं पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया कोई भी व्यक्ति मुठभेड़ में नहीं मारा गया.

यदि एसपीओ कानून का उल्लंघन करते हैं, जबर्दस्ती हिंसा करते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब एक चुनी हुई राज्य सरकार हो तो उन्हें कानून के पालन के प्रति रवैया बदलने को कहने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता

मैं आपको यह भी यकीन दिला सकता हूं कि कुछ नियमों का पालन अब विशेष रूप से सुनिश्चित किया जाता है. टॉर्चर चैंबर का ही मामला लें. मैंने इस बारे में गहन पड़ताल कराई है; इस समय देश की केंद्रीय एजेंसियों के नियंत्रण में एक भी टॉर्चर चैंबर नहीं है. यदि आपको भरोसा नहीं है तो आप मुझे ऐसे किसी भी चैंबर के बारे में बताएं, उसे भी समाप्त कर दिया जाएगा. इसी तरह से माओवादियों के मामले में हमारी समन्वित नीति के तहत मेरा निर्देश है जब तक हम पर गोली न चलाई जाए, हम गोली नहीं चलाएंगे और केवल खुफिया सूचनाओं के आधार पर ही अभियान चलाए जाएंगे. व्यापक स्तर पर तलाशी अभियान नहीं चलाए जाएंगे क्योंकि इससे स्थानीय आबादी हमारे खिलाफ हो जाती है. मुझे पंजाब का अनुभव है और इस तरह के खतरों के बारे में जानता हूं. मेरा कहने का मतलब है कि सरकार के हर अंग को अपनी जिम्मेदरी सही ढंग से निभानी चाहिए. यदि आपके जिले में एक सक्षम डिस्ट्रिक्ट जज है और वैसा ही मजबूत और निडर मजिस्ट्रेट है तो आपराधिक न्याय तंत्र में कहीं कुछ भी गलत नहीं हो सकता.

समस्या यही है कि बहुत-सी बातें यहां गलत हो रही हैं. मणिपुर में इसी साल अब तक 285 से ज्यादा फर्जी मुठभेड़ें हो चुकी हैं. तहलका ने भी जुलाई में एक स्तब्ध कर देने वाली मुठभेड़ की तस्वीरें छापी थीं. छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की हिंसा की आलोचना करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार सलवा जुडम के एसपीओ की कारगुजारियां उजागर करने की कोशिशें कर रहे हैं, वहां ये लोग आदिवासियों के घर जला रहे हैं, महिलाओं से बलात्कार कर रहे हैं. लोगों का सरकार पर से भरोसा उठ चुका है क्योंकि वहां आदिवासी एफआईआर भी दर्ज नहीं करा सकते. नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि नक्सलवादियों से शांतिवार्ता का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक न्यायतंत्र पर लोगों का भरोसा बहाल न किया जाए. क्या आप इस संकटग्रस्त इलाके को कोई संदेश नहीं दे सकते कि इस तरह की जबर्दस्ती स्वीकार नहीं की जाएगी? उन कुछ एसपीओ को गिरफ्तार कर लें जिनके खिलाफ शिकायतें मिली हैं..

मुझे खुशी है कि आपको लगता है कि मेरे पास इतनी ताकत है. लेकिन कानून और प्रशासन राज्य का  विषय है. आप जो भी कह रहीं हैं वह सब राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आता है. इसके लिए आपको उन प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और गृहमंत्रियों से बात करनी चाहिए. यदि मैं ज्यादा हस्तक्षेप करूंगा तो वे संविधान में राज्य के विषय वाली सूची मुझे थमा देंगे.

यह कहकर आप अपने को बचा रहे हैं?

नहीं, मैं कह रहा हूं कि आप यह सवाल संबंधित लोगों के सामने उठाइए. मैं जब गृहमंत्री बना था तो सबसे पहला मसला मेरे सामने सलवा जुडम का ही था और मैंने सार्वजनिक और निजी तौर पर मुख्यमंत्री से कह दिया था कि मैं इस बात के पक्ष में नहीं हूं कि राज्य में सरकार से बाहर के लोगों को इस तरह की जिम्मेदारी सौंपी जाए. यह पुलिस का काम है. वैसे जहां तक मेरी जानकारी है सलवा जुडम की गतिविधियां धीरे-धीरे न के बराबर हो गई हैं.

नहीं, एसपीओ के पास अभी भी बंदूकें हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि सलवा जुडम के कारण जिन गांवों को खाली कराया गया है वहां लोगों को दोबारा बसाया जाए, लेकिन एसपीओ ऐसा नहीं होने दे रहे हैं.

हो सकता है. लेकिन एसपीओ राज्य सरकार के अंतर्गत कार्य करते हैं. पंजाब में भी एसपीओ थे. एसपीओ कश्मीर में भी हैं. एक हिसाब से वे राज्य सरकार के कर्मचारी होते हैं. यदि एसपीओ कानून का उल्लंघन करते हैं, जबर्दस्ती हिंसा करते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब एक चुनी हुई राज्य सरकार हो तो उन्हें कानून के पालन के प्रति रवैया बदलने को कहने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता. निष्पक्षता और न्याय की जरूरत को पूरा करना राज्यों के मुख्यमंत्रियों का काम है.

आपने शांति वार्ता की जो बात की है वह उपदेशात्मक नहीं है. इसमें आपने सभी महत्वपूर्ण मसलों, जैसे भूमि अधिग्रहण, खनन, औद्यौगीकरण, वन अधिकार और स्थानीय प्रशासन को शामिल करने की बात की है. फिर भी ‘सिटीजेंस इनीशिएटिव फॉर पीस’ संगठन को लगता है कि आपको ऐसा कुछ करना चाहिए ताकि लोगों का न्याय व्यवस्था में भरोसा बहाल हो. उनका कहना है कि भले ही यह कितना ही सांकेतिक क्यों न हो आप नक्सल प्रभावित इलाकों में जनसुनवाइयां आयोजित क्यों नहीं करवाते?

यदि कोई नागरिक अधिकार संगठन या आदिवासियों के प्रतिनिधि इसे आयोजित कराते हैं तो मैं इसमें भाग लेने को तैयार हूं.

क्या मैं यह बात में ऑन रिकॉर्ड मानूं? हिमांशु कुमार का कहना है आपको माओवादियों से बात करने की तो जरूरत ही नहीं है, आप बस लोगों से सीधे बात करना शुरू कर दें, लोग अपने आप ही माओवादियों से दूर हो जाएंगे और उनका भारतीय गणतंत्र में भरोसा बहाल हो जाएगा. इन स्थानों पर गरीबी हटाने वाले कार्यक्रम तो हैं ही नहीं ऊपर से सरकार यहां अपने सबसे दमनकारी रूप में दिखती है.

मैं राज्य सरकारों से बात करूंगा. मैं वन अधिकारों, औद्योगीकरण, जमीन अधिग्रहण और विकास जैसे मुद्दों पर बातचीत में मदद  करूंगा

श्री श्री रविशंकर के कुछ अनुयायी मुझसे मिलने आए थे. यह अलग बात है कि मैं उनकी राजनीति से सहमत नहीं हूं लेकिन मैंने उनसे कहा कि यदि वे इन इलाकों में काम करना चाहते हैं और आदिवासियों को हिंसा का समर्थन छोड़ने और सरकार में भरोसा रखने के लिए  राजी करते हैं तो जहां तक होगा मैं आपकी मदद करूंगा. मैंने उनसे कहा कि मैं राज्य सरकारों से कहूंगा कि वे उनकी मदद करें और जहां भी जरूरत होगी आदिवासियों से बात करने मैं खुद भी आऊंगा. लेकिन उसके बाद उन्होंने मुझसे कभी संपर्क नहीं किया.

एक अलग संदर्भ में बात करें तो आपने कहा था कि झारखंड में राष्ट्रपति शासन होने के  कारण आप कई काम कर पाए, हालांकि वह भी नक्सल प्रभावित राज्य है. यदि छत्तीसगढ़, उड़ीसा और प. बंगाल की कमान आपको सौंप दी जाती या वहां कांग्रेस का शासन होता तो आप किस तरह के सुधारात्मक कदम उठाते?

इस मसले पर मेरी स्पष्ट राय है, पहली चीज है यह सुनिश्चित करना कि किसी तरह की हिंसा नहीं होगी. खूनखराबे के माहौल में कोई किसी की नहीं सुनता, कोई किसी पर भरोसा नहीं करता और तब कुछ नहीं किया जा सकता. हो सकता है यह संदर्भ से अलग बात हो लेकिन यह गांधी की भूमि है और उन्होंने ही कहा था कि सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता. मैं उनकी तरह संत तो नहीं हूं लेकिन मेरा दृढ़ता से मानना है कि हमारे लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है. इसलिए हर किसी को, भारत सरकार को भी, हिंसा छोड़नी ही चाहिए. हमें इस बात पर भी एकराय होना चाहिए कि नागरिक प्रशासन, जिसमें चाहे जितनी खामियां क्यों न हों, उसे कुछ काम करने के लिए समय और मौका देना चाहिए. यही झारखंड में हुआ, सिर्फ ढाई महीनों में हमने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. यदि आपको मुझपर यकीन नहीं तो उनसे पूछिए जो पहले शिकायत कर रहे थे. एक साल पहले तक कहा जा रहा था कि राज्य असफल हो चुका है. आज वहां जन वितरण प्रणाली महिलासमूहों के हाथ में है, लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को मुफ्त राशनकार्ड वितरित किए गए हैं, कई स्कूल खोले गए हैं और इनमें शिक्षकों की नियुक्ति की गई है. जिस दिन चुनावों की घोषणा हुई मैंने सुनिश्चित किया कि 1000 स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों की नियुक्ति हो जाए. यहां दसवीं कक्षा के छात्रों को साइकिलें दी गई हैं. वन्य अधिकार उल्लंघन के हजारों केसों को वापस लिया गया है. और यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि हमने इन इलाकों पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित कर लिया था. मैं नहीं जानता कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन माओवादियों ने कभी-भी हमारे इन कामों में बाधा नहीं डाली.

सामाजिक कार्यकर्ता भी ठीक यही कह रहे हैं कि झारखंड में आपने कोई सैन्य अभियान नहीं चलाया, आपको इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी. आपने बस जमीनी स्तर पर प्रशासन सुधारने से शुरूआत की और माओवादियों की हिम्मत नहीं पड़ी कि वे इन कामों में बाधा डालें. वे जानते हैं कि जिस काम से जनता का भला हो रहा है यदि वे उसे बिगाड़ेंगे तो जनता उनके खिलाफ हो जाएगी. तो ऐसा ही आप छत्तीसगढ़ या दूसरी जगहों पर क्यों नहीं करते?

ऐसा नहीं है कि झारखंड में माओवादियों ने हिंसा नहीं की. फ्रांसिस इंदुवर की हत्या ऐसा ही मामला है. अब उन्होंने चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है. वे कहते हैं कि हम कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा को निशाना बनाएंगे और सजा देंगे. हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार है और किसे इसे रोकना चाहिए की बहस की बजाय  माओवादी मेरी अपील को मानकर यह क्यों नहीं कहते, ‘हां, हम हिंसा को रोक देंगे और अब हमें गृहमंत्री की प्रतिक्रिया का इंतजार है.’  फिर मुझे दो-तीन दिन का वक्त दिया जाए क्योंकि मुझे केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में शामिल लोगों से बात करनी होगी. मैं कोई तानाशाह नहीं हूं, मुझे सभी से मश्विरा करना होगा. एक बार वे हिंसा रोकने की बात कहते हैं और असल में ऐसा करते भी हैं तो यदि उनके ऐसा कहने और मेरी प्रतिक्रिया के दौरान जो कि उन्हें 72 घंटों में निश्चित ही मिल जाएगी, यदि किसी तरह की हिंसा नहीं होती तो मैं ऐसा जवाब देने की स्थिति में होऊंगा जिससे कि हिंसा हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी और विकास का रास्ता साफ हो जाएगा. माओवादियों से बातचीत भी की जा सकती है. लेकिन सबसे पहले उन्हें कहना होगा कि वे हिंसा रोक रहे हैं.

यह एक बड़ा बयान है. कोई भी इससे असहमत नहीं हो सकता. आपने कुछ अहम मुद्दों का जिक्र किया मसलन भूमि अधिग्रहण, वनाधिकार, स्थानीय प्रशासन, औद्योगीकरण. आखिर इनके बेहतर तरीके क्यों नहीं खोजे जाते? खासकर खनन की बात करें तो लोगों को शिकायत है कि इन इलाकों में सुरक्षा बलों के अभियानों का मुख्य मकसद संसाधनों से समृद्ध जमीन पर कब्जा करना है. टाटा और एस्सार जसी कंपनियों ने सरकारों के साथ सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं. आपको लगता है कि सलवा जुडम या सरकार की यहां पर नियंत्रण स्थापित करने की जल्दबाजी इन्हीं सहमति पत्रों का नतीजा है?

मुझे लगता है कि आप उस डरावनी योजना को देख रही हैं जिसका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं है. सहमति पत्र अलग-अलग समय पर अलग-अलग सरकारों के कार्यकालों के दौरान बने हैं, माओवादी हिंसा के इस हद तक पहुंचने से काफी पहले. फिर भी मैं प्रधानमंत्री से यह दरख्वास्त करने के लिए तैयार हूं कि सभी सहमति पत्रों पर रोक लगा दी जाए और झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और दक्षिण बिहार में जिन सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं उन सबकी व्यापक समीक्षा करने के बाद ही यह फैसला लिया जाए कि कौन-से सहमति पत्रों पर अमल होना चाहिए – सुधार या बिना सुधार के साथ.

यह बात आप ऑन रिकार्ड कह रहे हैं.

हां, ऐसा ही है. मगर मुझे नहीं लगता कि मुख्य मुद्दा यह है. असल मसला यह है कि माओवादियों की विचारधारा में संसदीय व्यवस्था एक सड़ चुकी व्यवस्था है. वे मानते हैं कि सशस्त्र क्रांति ही संसद को खत्म करने और लोगों की तानाशाही स्थापित करने का एकमात्र विकल्प है. यह एक मूलभूत विचारधारा वाला नजरिया है. ऐसे में कौन उनसे बहस करे और बताए कि आप गलत हैं? अगर कोई इस तरह का रुख रखता है तो मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता लेकिन..

(बात को काटते हुए) मैं माओवादियों को किनारे रखते हुए फिर से भारत सरकार पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हूं.

लेकिन अगर वे इस तरह का नजरिया भी रखते हैं और हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार से उन मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिनकी उन्हें चिंता है, तो भी मैं इसके लिए तैयार हूं. मैं राज्य सरकारों से बात करूंगा. मैं वन अधिकारों, औद्योगीकरण, जमीन अधिग्रहण और विकास जैसे मुद्दों पर बातचीत में मदद करूंगा. मगर अब तक मेरी पेशकश पर माओवादियों की प्रतिक्रिया यही रही है कि उनसे हिंसा बंद करने को कहना अतार्किक, बेतुका और उन लोगों को धोखा देने जैसा है जिनके लिए वे लड़ रहे हैं! दो दिन पहले ही उन्होंने बंगाल में चार पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी. ये पुलिसकर्मी तो गश्ती दल का हिस्सा भी नहीं थे! सवाल यह है कि माओवादियों को जज, कानूनवेत्ता और जल्लाद बनने का अधिकार किसने दिया?

मैं फिर से वही सवाल करती हूं. यह व्याख्या करने का अधिकार माओवादियों को क्यों हो कि निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और जनकल्याणकारी तरीके क्या होने चाहिए? भारत में खनन एक विवादित मुद्दा है. आप इस बारे में क्या सोचते हैं? आप तो ऐसा मानने वालों में से हैं कि खनन और विकास का आपस में अभिन्न रिश्ता है.

हां, मैं ऐसा मानता हूं. कोई भी देश अपने प्राकृतिक और मानव संसाधनों के बगैर विकास नहीं कर सकता. खनिज संपदा का दोहन करके उसे लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. और ऐसा क्यों न हो? क्या वे किसी म्यूजियम की शोभा बढ़ाने के लिए हैं? हम इस तथ्य का आदर करते हैं कि आदिवासी नियमगिरी पहाड़ी की पूजा करते हैं. मगर मुझे बताइए कि क्या इससे उनके बच्चे स्कूल में पढ़ सकेंगे या फिर उनके पैरों को जूते मिल जाएंगे? क्या इससे उनकी कुपोषण की समस्या हल हो जाएगी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच बढ़ जाएगी? खनन पर सदियों से विवाद चलता रहा है. इसमें कोई नई बात नहीं है.

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मराठी की तलवार हिंदी की ढाल

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पहले ही बता चुकी थी कि वह किसी को हिंदी में शपथ लेने नहीं देगी. मनसे के इस आक्रामक रवैये का विरोध जरूरी था जो समाजवादी विधायक अबू आजमी ने किया. उन्होंने हिंदी में शपथ लेने की कोशिश की और धक्कामुक्की के शिकार हुए. विधानसभा के भीतर इस शर्मनाक नजारे पर चिंता जताते और चुटकी लेते टीवी चैनलों को अचानक पुराने भाषा विवाद याद आने लगे. याद आया कि संविधान ने हिंदी को अकेली राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है, कई राजभाषाएं हैं और सबकी समान हैसियत है. लेकिन क्या यह हिंदी बनाम मराठी का झगड़ा था? क्या राज ठाकरे को मराठी से या अबू आजमी को हिंदी से प्रेम है? या यह दो नेताओं के अपने अतिवादी रुख और तेवर थे जिनका शिकार हिंदी और मराठी के उपेक्षित बहनापे को होना पड़ा?

हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती हैन अबू आजमी समझ पा रहे हैं कि हिंदी की लड़ाई इतनी आसान नहीं है और न ही राज ठाकरे कि मराठी को हिंदी नहीं कोई और भाषा नुकसान पहुंचा रही है. टीवी चैनलों की बहसें भी हिंदी बोलने के अधिकार और राज ठाकरे के अनाचार के आगे नहीं बढ़ पा रहीं. कुल मिलाकर यह विधानसभा के भीतर एक अशालीन और आक्रामक व्यवहार का मामला होकर रह गया है जो जल्द भुला दिया जाएगा. वैसे सच भी यही है. मामला वाकई हिंदी मराठी का नहीं, अशालीन व्यवहार का है. इस व्यवहार की तीखी आलोचना होनी चाहिए और दोनों पक्षों को आगे से ऐसा कुछ करने से रोका जाना चाहिए.

लेकिन क्या यह संभव होगा? क्या राज ठाकरे और अबू आजमी मराठी की तलवार और हिंदी की ढाल उठाने से बाज आएंगे? और क्या हिंदी और मराठी के नाम पर खड़े होने वाले ध्वजधारी उनके पीछे अपनी लाठियां लेकर खड़े नहीं होंगे? संकट यही है. भले ही बहुत सतही ढंग से उठाया गया हो, लेकिन ठाकरे और आजमी ने भाषा के जिस सवाल को छुआ है, वह इतना नकली भी नहीं है.

आज की तारीख में हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती है. जाने-अनजाने इस दुखती रग को दोनों पक्ष समझते हैं और इनका अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं. 

लेकिन यह मामला हिंदी बनाम मराठी का नहीं है. आज की तारीख में अपनी सामाजिक हैसियत के हिसाब से ये दोनों गरीब भाषाएं हैं जिन्हें लगातार अंग्रेजी अपदस्थ और बेदखल कर रही है. हमारे गांव-देहातों, जंगल-पहाड़ों में तरक्की के नाम पर जिस तरह आदिवासियों और दलितों का विस्थापन लगातार जारी है, उसी तरह हमारे नगरों-महानगरों में सामाजिक और शैक्षणिक विकास के नाम पर भाषाओं का विस्थापन जारी है. सिर्फ मराठी और हिंदी नहीं, तमिल, तेलुगू, बांग्ला और ओडिया भी इस प्रक्रिया की चपेट में हैं- अंग्रेजी उदारवाद का बुलडोजर सारी भाषाओं को एक तरह से कुचल रहा है. भाषाएं सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होतीं, उनमें हमारे समय का सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्ववाद भी बोलता है. भाषाओं की हैसियत उनसे जुड़ी हुकूमत तय करती है. भारत में मूलत: अंग्रेजी शिक्षा और सामाजिकता के रेशों से बना जो अल्पतंत्न शासन कर रहा है, वह अंग्रेजी की हैसियत तय कर रहा है. 

अंग्रेजी की यह राजनैतिक हैसियत उसे शिक्षा और रोजगार दोनों की भाषा में बदलती है, उसकी अंतरराष्ट्रीयता के मिथक और उसकी अपरिहार्यता के तर्क गढ़ती है. जमीन पर यह दिखता भी है कि भारतीय भाषाओं में पढ़ाई या रोजगार हासिल करने वाले पीछे छूट जा रहे हैं, साहित्य लिखने और विचार करने वाले दूसरे दर्जे की नागरिकता के लिए अभिशप्त हैं और उच्च शिक्षा ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा में भी अमीर-गरीब सबकी नई पसंद अंग्रेजी है.

निश्चित तौर पर आज की तारीख में अंग्रेजी एक भारतीय भाषा हो चुकी है. उसका विरोध न उचित है न फलप्रद. लेकिन उसकी विशेषाधिकारसंपन्न हैसियत दूसरी भाषाओं को विपन्न बना रही है, इसमें संदेह नहीं. इत्तिफाक से आज जो शासक जमातें है, उनमें विचार और सरोकार की वह संस्कृति नजर नहीं आती कि वे भाषाओं के इस महीन द्वंद्व और उसके गहन प्रभाव को समझ सकें. दरअसल यह संस्कृतिविहीन राजनीति कभी भाषाओं को उपभोक्तावादी कचरे के आयात की मशीन की तरह इस्तेमाल कर रही है तो कभी अपने अपनी राजनीतिक संकीर्णताओं के उपकरण की तरह. कहने की जरूरत नहीं कि इसकी शिकार एक भाषा के रूप में अंग्रेजी भी हो रही है और हिंदी-मराठी भी.

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं) 

पामेला बोर्डेस (पामेला सिंह चौधरी): सेक्स स्कैंडल

पामेला बोर्डेस का असली नाम पामेला सिंह चौधरी था. भारतीय सेना में मेजर रहे महिंदर सिंह काद्यान की बेटी पामेला का जन्म 1961 में हुआ था. दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज की इस बेहद खूबसूरत छात्रा ने कॉलेज की पढ़ाई के दौरान 1982 की  मिस इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और मिस इंडिया चुनी गई. बाद में वह यूरोप चली गई जहां उसने हथियारों के डीलर हेनरी बोर्डेस से शादी कर ली.

इस दौरान पामेला ब्रिटेन में भी रही. यहां रहते हुए ही 1988 से 1989 के बीच हुए एक खुलासे ने पामेला को ब्रिटेन सहित पूरे विश्व मीडिया में सबसे चर्चित चेहरा बना दिया. पामेला के बारे में कहा गया कि उसके ब्रिटेन में कई सांसदों, मंत्रियों और विशिष्ट लोगों से अंतरंग संबंध हैं. इन लोगों में ब्रिटिश अखबार संडे टाइम्स के संपादक एंड्रस नील और ब्रिटेन के खेलमंत्री भी शामिल थे. पामेला के पास हाउस ऑफ कॉमंस का सिक्योरिटी पास था जिसे उसने अपनी राजनीतिक पहुंच से हासिल किया था. यहां पामेला टोरी पार्टी के  सांसद डेविड शॉ की रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम करती थी.

इस विवाद के सामने आने के बाद तक ब्रिटिश सरकार इसे महज एक सेक्स स्कैंडल मानती रही. लेकिन इसी बीच एक और खबर आई जिसके मुताबिक पामेला के  संबंध लीबिया से थे और वह इस साम्यवादी शासन वाले देश की तरफ से ब्रिटेन में जासूसी कर रही थी. दरअसल बात यह थी कि लीबिया के शासक गद्दाफी के रिश्तेदार और लीबिया सरकार के वरिष्ठ अधिकारी अल डैम और पामेला के बेहद करीबी संबंध थे. पामेला डैम से मिलने कई बार लीबिया भी जा चुकी थी. मीडिया में चल रही खबरों पर पामेला का कहना था कि यदि उसकी असली कहानी लोगों के सामने आ जाए तो ब्रिटेन में सरकार गिर जाएगी. इस स्कैंडल के बाद कई सालों तक पामेला बोर्डेस गायब रही. बाद में वह भारत लौटकर प्रोफेशनल फोटोग्राफर बन गई.

पवन वर्मा 

'संगीत पर स्तरीय रचनाओं का बेहद अभाव है'

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

एक यात्रा-वृत्तांत लिख रहा हूं. मैंने देश में 62,000 किलोमीटर की यात्रा की थी. अब उससे जुड़े अनुभवों को कलमबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूं. यह पुस्तक तीन हिस्सों में प्रकाशित होगी. अमेरिका में पढ़ाने वालीं एक इतिहासविद हैं वेंडी डॉनिगर जिनकी पुस्तक द हिंदूज में इन दिनों उलझा हुआ हूं.  

किस विधा में लिखना पसंद है?

इतिहास मेरा प्रिय विषय है. ऐतिहासिक विषयों पर लिखना मुझे हमेशा से पसंद रहा है. इसके अतिरिक्त यात्रा वृत्तांत लिखने में भी मेरी काफी रुचि है. माउंटबेटेन  पर आधारित पुस्तक लिखने की भी तैयारी कर रहा हूं. इसी विषय से संबंधित एक पुस्तक पचास दिन पचास साल पहले भी लिख चुका हूं.   

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

बहुत-सी रचनाएं इस श्रेणी में आती हैं. शूद्रक का नाटक मृच्छ कटिकम बहुत व्यापक संदर्भ समेटे हुए है. इसी तरह अज्ञेय की शेखर एक जीवनी भी विस्तृत फलक की रचना है. हम काफी भाग्यशाली हैं कि मार्खेज और नाइजीरिया के लेखक चिनुआ अचेबे जैसे लेखक हमारे ही समय में लिख रहे हैं.

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

मैंने देखा है कि हिंदी में कलाकारों पर काफी लिखा गया है, कलाओं पर भी पढ़ने को मिल जाता है लेकिन संगीत पर स्तरीय रचनाओं का बेहद अभाव है. और अगर कुछ स्तरीय आता भी है तो वो अलक्षित चला जाता है. शंभुनाथ मिश्र की रचना सात सुर सत्ताईस दायरे इसी तरह की रचना थी. आप सोचिए कि अगर आज हमें केसरबाई केलकर के बारे में कुछ पढ़ना हो तो अभिलेखागारों की खाक छाननी पड़ जाएगी. 

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

झुंपा लाहिड़ी की शुरूआती रचनाएं बहुत अच्छी थीं लेकिन बाद में उनमें एक दोहराव देखने को मिलता है जैसे अनअकस्टम्ड अर्थ. 

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

वेंडी डॉनिगर की लगभग 1000 पन्नों की पुस्तक द हिंदूज.

अतुल चौरसिया

'कभी-कभार जाति, क्षेत्र, विचारधारा आदि के समीकरणों में उलझ कर बेमतलब की रचनाएं चर्चित हो जाती हैं'

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

अपनी उपन्यासत्रयी का तीसरा हिस्सा पूरा करने में लगा हूं. दो नाटकों पर भी काम चल रहा है. पहला तुलसीदास, अब्दुर्रहीम खानखाना और अकबर पर लिखा जा रहा है. इसमें कला और राज्य के अंर्तसंबंध को दर्शाने की कोशिश है. दूसरा गांधीजी  पर आधारित है. जहां तक पढ़ने का सवाल है तो महान कृतियों को बार-बार पढ़ता रहता हूं. इन दिनों रूसो की ऑटोबॉयोग्राफी फिर से पढ़ रहा हूं.

किस विधा में लिखना पसंद है?

मैं फिक्शन ही लिखता हूं. ज्यादातर जोर कहानी और उपन्यास पर ही होता है.

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

किसी एक रचना का जिक्र तो मुश्किल है. मुझे इस्मद चुगताई  की कहानियां अच्छी लगती हैं, मंटो और निर्मल वर्मा का लेखन भी बढ़िया लगता है. फणीश्वरनाथ रेणु के लेखन से भी मैं बहुत निकटता महसूस करता हूं. 

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

हाल ही में मधुकर उपाध्याय का कविता संग्रह बात नदी बन आए आया है जो मेरे ख्याल से अलक्षित रह गया. पर मेरा मानना है कि रचनाएं कभी-न-कभी चर्चा अवश्य पाती हैं. जैसे 1952 में एक किताब आई थी शिवालिक की घाटियों में, मेरे ख्याल से वन्यजीवन और पर्यावरण के ऊपर हिंदी में इतना बढ़िया शायद ही कभी लिखा गया हो. अब मैं इसे पुन: प्रकाशित करवा रहा हूं.

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

मैं किसी किताब या लेखक का नाम नहीं लूंगा. असल में कभी-कभार जाति, क्षेत्र, विचारधारा आदि के समीकरणों में उलझ कर बेमतलब की रचनाएं चर्चित हो जाती हैं.

पुरस्कार कितने महत्वपूर्ण हैं?

पुरस्कारों का सरलीकरण हो गया है. महज आर्थिक पहलू तक ही ये सीमित हो गए हैं. इसमें सुधार की गुंजाइश है.

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

जसवंत सिंह की किताब जिन्ना : भारत विभाजन के आइने से खरीदी है.

अतुल चौरसिया  

 

स्वेतलाना स्तालिन: भारतीय विदेश नीति का धर्मसंकट

स्वेतलाना स्तालिन रूस के तानाशाह शासक जोसफ स्तालिन की बेटी थी जिसकी शादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और  लखनऊ के पास स्थित कालाकांकर रियासत के कुंवर बृजेश सिंह से हुई थी.

पढ़ने-लिखने की शौकीन स्वेतलाना का साम्यवाद की तरफ शुरू से ही कोई खास झुकाव नहीं था; यहां तक कि वह अपने पिता को भी पसंद नहीं करती थी. 1953 में जोसफ स्तालिन की मृत्यु के बाद स्वेतलाना मॉस्को में शिक्षिका बन गई. इस समय तक वे रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी सदस्य थी. मॉस्को में ही 1963 में स्वेतलाना पहली बार भारतीय नागरिक बृजेश सिंह से मिली. आकर्षक और सौम्य व्यक्तित्व के धनी बृजेश उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के तौर पर मॉस्को प्रवास पर थे. स्वेतलाना और बृजेश सिंह का मेलजोल बढ़ता गया और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. रूसी सरकार इस विवाह के खिलाफ थी और सरकार के इस रवैये ने स्वेतलाना को पूरी तरह से साम्यवादी शासन के खिलाफ कर दिया.

कहा जाता है कि सरकार के विरोध के बावजूद स्वेतलाना और बृजेश सिंह ने गुपचुप तरीके से शादी कर ली थी. मॉस्को प्रवास के दौरान ही 1966 में बृजेश सिंह की मृत्यु हो गई. स्वेतलाना  चाहती थीं कि उसके पति की अस्थियों का विसर्जन परंपरागत हिंदू रीतिरिवाजों से गंगा में किया जाए. इसके लिए 1967 में स्वेतलाना ने रूसी सरकार से भारत जाने की अनुमति मांगी. रूसी सरकार ने उसे भारत जाने की अनुमति तो दे दी मगर सिर्फ दो सप्ताह के लिए.

भारत आकर स्वेतलाना दो महीने तक कालाकांकर में बृजेश सिंह के परिवार के साथ रही. इस बीच रूसी सरकार की तरफ से कई बार उसे वापस लौटने के निर्देश मिलते रहे लेकिन साम्यवादी सरकार से आजिज आ चुकी स्वेतलाना रूस वापस जाना ही नहीं चाहती थी.  उसने तय किया कि वह अपनी बाकी जिंदगी भारत में ही बिताएगी.

स्वेतलाना ने भारत सरकार के समक्ष राजनीतिक शरण के लिए आवेदन दिया. लेकिन सरकार के लिए यह धर्म संकट की स्थिति थी, क्योंकि स्वेतलाना को शरण देने का मतलब था रूस की नाराजगी मोल लेना और शरण न देने पर भारत के गुटनिरपेक्ष देश होने की छवि पर प्रश्नचिह्न् लगाए जाते. आखिर में भारत सरकार ने रूस से अपने रिश्तों को तवज्जो देते हुए स्वेतलाना को शरण न देने का निर्णय किया.

स्वेतलाना के पास अब किसी दूसरे देश में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, इसीलिए उसने पहले तो भारत के अमेरिकी दूतावास में शरण ली और फिर वहां से वह सीधे अमेरिका चली गई. शीतयुद्ध के दौरान इस घटना को अमेरिकी विजय और रूसी पराजय के रूप में देखा गया. कहा जाता है कि बाद में भारत सरकार ने रूस की नाराजगी को कम करने के लिए स्वेतलाना से एक पत्र भी लिखाया था जिसके मुताबिक उसके अमेरिका जाने में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

पवन वर्मा 

वही सपने, वही लन्दन! लंदन ड्रीम्ज

फिल्म: लंदन ड्रीम्ज

निर्देशक: विपुल शाह

कलाकार: सलमान खान, अजय देवगन, असिन

उम्मीद का कुछ हो तो बहुत अच्छा लगता है. ट्रेलर और पोस्टर देखकर जैसी लगती है, यह ठीक वैसी ही फ़ॉर्मूला फ़िल्म है, जिसके लिए बॉलीवुड विख्यात और कुख्यात है. अजी वही फ़ॉर्मूला, जिसमें बचपन का सपना, घर से भाग जाना, दोस्ती और उसमें बलिदान, दो लड़के-एक लड़की और हर पन्द्रह मिनट बाद बेवज़ह गाने होते हैं. गानों की शूटिंग पर अच्छा खासा धन और मेहनत खर्च की जाती है, इसलिए अक्सर ऐसी फ़िल्मों में चित्रहार अच्छा लगता है. आधी फ़िल्म के बाद आप भी एक निश्चित समयांतराल पर गाना देखने के आदी हो जाते हैं, इसलिए बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं.    

‘नमस्ते लन्दन’ वाले विपुल शाह इस बार नाम और कहानी में लन्दन को पहले ले आए हैं. ऐसा लगता है कि किसी समझौते के तहत हर बड़े बैनर ने विदेशी शूटिंग के लिए एक शहर या देश चुन लिया है. जैसे यशराज ने न्यूयॉर्क और विपुल शाह जी ने लन्दन. मगर इम्तियाज़ अली से लेकर विपुल शाह तक भारत में सबका ठिकाना वही तय है,  अपना पंजाब, जहाँ बिना किसी कारण के मस्त होकर नाचा जा सके और कुछ मीठी गालियाँ दी जा सकें. वैसे ऐसे गिने चुने विदेशी ही होंगे, जो भारत को जाने बिना दो-चार हिट हिन्दी फ़िल्में देख चुके होंगे मगर सोचिए कि बेचारे ऐसे लोग तो इस बात पर हज़ारों की शर्त लगाने को भी तैयार होंगे कि भारत हरे भरे सरसों के खेतों में नाचने वाले लोगों का ख़ुश देश है. शर्त के बयान में वे यह भी जोड़ देते होंगे कि सब भारतीय जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर विदेश यात्रा ज़रूर करते हैं.

पूरी फ़िल्म में असहज लग रहे अजय देवगन के चेहरे पर वही भाव है, जिसे वे ‘दीवानगी’ आदि फ़िल्मों के समय से ढोते चले आ रहे हैं. इसी तरह शंकर-अहसान-लॉय ने भी बहुत बेमन से संगीत दिया है, जिसने प्रसून के अच्छे गीतों का भी कबाड़ा कर दिया है. सलमान सिद्ध करते हैं कि स्टार होने के लिए अच्छा अभिनेता होने से ज़्यादा अच्छा एंटरटेनर होना ज़रूरी है. चौंकाने वाली बात यह है कि वे अभिनय में भी अजय पर हावी रहे हैं.

बहरहाल यदि आप उस दर्शक-समूह से ताल्लुक रखते हैं, जिसे ‘रॉक ऑन’ पिछले साल की सबसे अच्छी फ़िल्मों में से एक लगी थी तो आपको ‘लन्दन ड्रीम्स’ ज़रूर देखनी चाहिए. यह उसी दर्शन की कुछ अधिक साधारण फ़िल्म है. मगर यदि आप उस समूह के हैं, जो ‘रॉक ऑन’ की मसाले में लिपटी भावुकता बर्दाश्त नहीं कर पाता तो आप कृपया एकाध हफ़्ते इंतज़ार कर लें. शायद समय बदले और कोई अच्छी फ़िल्म आए. हम भी इंतज़ार ही कर रहे हैं. 

गौरव सोलंकी  

 

शिकार: ग़ैरज़रूरी कहानियाँ

पुस्तक :     शिकार

लेखक :     हृदयेश

कीमत :     125 रुपए

प्रकाशक :     हार्पर कॉलिंस हिन्दी  

ये साहित्य की मुख्य धारा की – यदि कोई मुख्य धारा है, तो – कहानियाँ नहीं जान पड़तीं. ये उस तरह की कहानियाँ हैं, जिस तरह की फ़िल्में अस्सी के दशक में ख़ूब बनी थीं और जिन्हें महिला पत्रिकाओं और लोकप्रिय अख़बारों के पारिवारिक परिशिष्टों ने ख़ूब भुनाया है. इस किताब को पढ़ते हुए मुझे कुछ समय पहले आई एक फ़िल्म ‘मॉर्निंग वॉक’ की याद आई. वह एक घिसी पिटी कहानी पर बनी उबाऊ फ़िल्म थी, बाग़बान का ख़राब वर्जन.

हमारे समय के तथ्यों के ज़िक्र के बावज़ूद हृदयेश की कहानियाँ कम से कम तीन दशक पहले के समाज की कहानियाँ हैं. इस बात को यूँ भी कहा जा सकता है कि वे सामाजिक परिस्थितियाँ आज भी हैं, लेकिन उन्हें कई बार अलग अलग तरह से अलग अलग लोग कह चुके हैं और फ़िलहाल कहीं ज़्यादा ज़रूरी समस्याएँ ख़ुद को कहलवाना चाहती हैं. अब कोई लेखक बदलते समय की नब्ज़ पर से अपनी उंगलियाँ हटाकर बैठा है तो उसके लिखने का व्यक्तिगत या सामजिक लाभ मुझे नज़र नहीं आता.

अब प्रश्न यह कि क्या इस संग्रह की कहानियाँ, कहानियाँ भी हैं? वे जहाँ से शुरु होती हैं, ठीक उसी बिन्दु पर ख़त्म होती हैं. बीच में कहानी का मुख्य पात्र या तो सड़क पर घूमकर लोगों से बतियाता है या शहर के सारे मन्दिर देखकर उनके बारे में बताता है या जेल में घूमकर कैदी देखता है. ये मधुर भंडारकर की फ़िल्मों की तरह वर्णनात्मक कहानियाँ हैं. विशेषकर ‘मेरे नगर के मन्दिर’ और ‘बड़ी दुनिया का आईना बनी छोटी दुनिया’ स्कूल के बच्चों के उन निबन्धों की तरह आगे बढ़ती हैं, जिनका शीर्षक ‘जब मैंने ताजमहल देखा’ जैसा कुछ होता है.

इन कहानियों का मुख्य पात्र टीवी विज्ञापनों और उपभोग की संस्कृति के बारे में लगातार बोलते रहकर समय के साथ चलता दिखने की कोशिश तो करता है, लेकिन पत्नी खो चुके वृद्ध का बेटे-बहू के साथ रहना और रोज़ बाज़ार जाकर सब्ज़ी खरीदना ही यदि किसी कहानी का केन्द्रीय विषय है तो मेरे ख़याल से वह किसी भी समय में उतनी ही अनावश्यक है. इसीलिए ये सब कहानियाँ अपने लेखक से अधिक सजग और उत्तरदायी होने की माँग करती हैं.

हृदयेश का मुख्य पात्र अक्सर नींद में किसी नई ज़गह पहुँच जाता है और जब वह जागता है तो पाता है कि वह एक सपने में था. उनका लेखक भी इसी तरह अपनी दुनिया में खोया हुआ है. ‘जन्नत की हकीकत’ का नायक सपने में स्वर्ग में पहुँच गया है, जहाँ वह हिन्दी के लेखक-लेखिकाओं से मिलता है. यह कहानी साहित्य की छोटी सी दुनिया को अपने खेलने का मैदान बनाती है और यदि आप उन दस-बीस लोगों को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते तो आपको इस लम्बी कहानी का कोई औचित्य समझ नहीं आएगा. यह कहानी भड़ास निकालने और पुरस्कार न पाने का ज़रिया बनकर ही रह गई है.

कहीं कहीं उनका नायक समाज के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा फ़िक्रमन्द दिखता है और इस चक्कर में अपने प्रति सहानुभूति जुटाने का (असफल) प्रयास करता है, इसीलिए उसकी ईमानदारी पर सन्देह होता है. वह कहानी को आगे बढ़ाने की बजाय अपना दर्शन, अपनी सोच और उपदेश आप पर थोपने की कोशिश करता है, इसीलिए ‘शिकार’ की कहानियाँ कुढ़न पैदा करती हैं और कहीं कहीं जुगुप्सा भी. वैसे यह कहानी-संग्रह यदि डायरी के कुछ पन्नों या संस्मरणों के नाम से प्रकाशित होता तो यह आलोचना कुछ सुखद हो सकती थी.

गौरव सोलंकी

एक रुकी ट्रेन कुछ ठहरे सवाल

पश्चिम बंगाल के बांसतला नाम के एक अनजान स्टेशन पर करीब पांच घंटे तक भुवनेश्वर से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस रुकी रही. इन पांच घंटों के दौरान कोलकाता से दिल्ली तक अफरातफरी मची रही और मीडिया सांस रोक कर देखता रहा कि उसे कहीं और ज्यादा खौफनाक खबर तो मिलने वाली नहीं. आखिर एक पूरी ट्रेन नक्सलियों के कब्जे में है और वे मुसाफिरों के साथ कुछ भी कर सकते हैं.

माओवादियों ने जब हथियार उठाए नहीं थे तो किसी सरकार को विकास की क्यों नहीं सूझी तो इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, सवाल पूछने वाले पर नक्सली हिंसा का समर्थक होने की तोहमत भले मढ़ दी जाती है

लेकिन नक्सलियों ने कुछ नहीं किया. उन्होंने ट्रेन को जाने दिया. बस उस पर लिख दिया अपना संदेश- कि छत्नधर महतो अच्छा आदमी है, छत्नधर महतो संताल भाइयों का दोस्त है. मीडिया हैरान हुआ, कुछ मायूस भी- एक बड़ा अंदेशा एक राहत भरी सांस बन कर टल गया. वह समझ नहीं पाया कि नक्सलियों ने ऐसा क्यों किया ये नक्सली तो थानों पर हमला करते हैं, पुलिसवालों का अपहरण करते हैं, उनकी हत्या करते हैं, फिर उन्होंने इतने सारे मुसाफिरों को छोड़  क्यों दिया? सवाल यहीं खत्म हो गए क्योंकि मीडिया अपने दूसरे खेलों में लग गया.

दरअसल इस सवाल का जवाब न देश के गृह मंत्नी-प्रधानमंत्नी खोज पा रहे हैं, न मीडिया समझ पा रहा है कि देश में बढ़ते नक्सलवाद से कैसे निबटें. गृह मंत्नी और प्रधानमंत्नी आंकड़े दे-देकर बताते हैं कि नक्सली आतंकवादियों से भी खतरनाक हैं. उनकी हिंसा में कहीं ज्यादा लोग मरे हैं. वे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. गृह मंत्नी और प्रधानमंत्नी द्वारा प्रस्तुत यही सरलीकरण अखबारों में समाचार और विचार बनकर छप रहा है- नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई जरूरी है, हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, माओवादी आतंकवादियों से कम खतरनाक नहीं, उनके बीच सांठगांठ भी है.

इस राय के पक्ष में कई प्रमाण भी जुटे हुए हैं. नक्सलियों ने गढ़ चिरौली में 18 पुलिसवालों को मार डाला, खूंटी में स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंद्वार का सिर काट लिया, दंतेवाड़ा में चार सिपाहियों की हत्या कर दी और बंगाल में दो पुलिस वालों को मार और एक को अगवा कर अपने साथियों को रिहा करवाया.

लेकिन इतनी साफ दिखाई देती हिंसा के समांतर एक दूसरी हिंसा भी है जो कहीं ज्यादा बारीक, बड़ी और खौफनाक है, यह देखने को मीडिया तैयार नहीं. राज्य की इस हिंसा पर उंगली उठाने को भी नहीं. अगर कोई यह पूछने की हिमाकत करे कि नक्सलियों को इस मोड़ तक लाने का जिम्मेदार कौन है, किनकी वजह से आदिवासी हथियार उठाने को मजबूर हुए, माओवादियों ने जब हथियार उठाए नहीं थे तो किसी सरकार को विकास की क्यों नहीं सूझी तो इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, सवाल पूछने वाले पर नक्सली हिंसा का समर्थक होने की तोहमत भले मढ़ दी जाती है.

फिर इस तोहमत के अलावा यह नसीहत भी मिलती है कि माओवादी नहीं चाहते कि उनके इलाकों का विकास हो. यह भी कि अगर पहले विकास नहीं हुआ तो अब विकास होगा. यह सरलीकृत दृष्टि लेकिन खुद यह समझने को तैयार नहीं कि दरअसल यह विकास ही है जो आदिवासियों के विरुद्ध चल रही हिंसा का, उनके दमन का, उनके साधनों के दोहन का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है. नक्सली हिंसा की वजह से हुई चंद सौ या हजार मौतों का हवाला देने वाले लोग भूल जाते हैं कि इसी देश में बीते दस साल में करीब सवा लाख किसान खुदकुशी के लिए मजबूर हुए हैं. दरअसल इस विकास की वजह से हुई बेदखली ने माओवादी पैदा किए हैं. पश्चिमी मिदनापुर की लड़ाई भी इसी विकास की वजह से शुरू हुई, यह भूलना नहीं चाहिए. आखिर जिंदल इस्पात कारखाने का उदघाटन कर लौट रहे मुख्यमंत्नी बुद्धदेब भट्टाचार्य के काफिले के रास्ते में ही वह बारूदी सुरंग फटी, जिसके गुनहगारों को खोजने के लिए पुलिस लालगढ़ गई और महिलाओं से बदसलूकी करके लौटी.

इसी बदसलूकी के विरोध में बनी थी वह पुलिस संत्नास विरोधी जनसाधारण समिति जिसने पिछले हफ्ते राजधानी एक्सप्रेस रोक ली. ट्रेन चली तो बोगियों पर लिखे अक्षरों की शक्ल में एक संदेश लेकर चली- कि सरकार जिसे खूंखार नक्सली मानती है, उसे आदिवासी अपना दोस्त और भाई मानते हैं. दिल्ली में बैठा मीडिया इस इबारत का अर्थ समझने को तैयार नहीं और न राज्य की हिंसा का चरित्न समझने को तैयार है. क्या यह संसदीय राजनीति में लगभग अंधविश्वास की तरह पैठा विश्वास है जो मीडिया से एक आलोचक दृष्टि छीन लेता है और उसे वहीं तक देखने देता है जो सरकार दिखाती है?

उसकी नागर दृष्टि न इन इलाकों की तकलीफ का मर्म समझती है और न ही आदिवासियों की हथियार उठाने की मजबूरी का मतलब.

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं)  

हम नमक सत्याग्रही

जो लोग ठाठ से जी सकते हैं उन्हें जीना चाहिए और अपने ठाठ-बाट पर कोई अपराध भावना नहीं रखनी चाहिए. अपने मध्यवर्ग में नए आए उपभोक्तावाद का यही औचित्य है

आखिर उनके पोते गोपालकृष्ण ने ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की लाज बचाई. दांडी कूच का 100 करोड़ का स्मारक और कोई एक हजार आठ सौ करोड़ की लागत से अमदाबाद से दांडी तक के उसी मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के प्रस्ताव को प. बंगाल के राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने खारिज कर दिया है जिस पर चलकर महात्मा गांधी और उनके अठहत्तर सहयात्रियों ने नमक सत्याग्रह किया था जिसने भारत की ब्रिटिश सरकार ही नहीं पूरी दुनिया की आत्मा को झकझोर दिया था. दांडी कूच और उसके मार्ग को आजादी के आंदोलन की धरोहर बनाकर स्थाई महत्व देने पर विचार करने वाली समिति के अध्यक्ष के नाते गोपालकृष्ण गांधी ने कहा कि ऐसा प्रस्ताव और विचार गांधीजी के विचार और जीवन से बिल्कुल असंगत होगा.

खासकर ऐसे वक्त जब आधे से ज्यादा भारत अकाल की चपेट में है और गुजरात में ही कोई कम समस्याएं नहीं हैं तब ऐसी चीजों पर इतना पैसा खर्च करना बिल्कुल अनुपातविहीन और असंगत होगा-और गांधी की आत्मा के विरुद्ध भी-गोपालकृष्ण गांधी ने कहा. तय हुआ कि एक सादा सा स्मारक बने जिस पर दांडी कूच करने वालों के नाम खुदे हों. प्रस्ताव यह था कि गांधी और उनके साथ कूच पर चले सत्याग्रहियों के भव्य मूर्तिशिल्प बनाए जाएं और उस सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग जिस पर सन् तीस में बारह मार्च से छह अप्रैल तक चलकर वे समुद्र किनारे दांडी पहुंचे थे. समिति ने कहा है कि उसे धरोहर मार्ग बना दिया जाए जिसका वहां रहने वाले सभी लोग इस्तेमाल कर सकें.

मैंने कहा कि गोपाल गांधी ने अपने दादा की लाज बचा ली तो इसलिए कि अभी जब इकनॉमी क्लास में मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं की हवाई यात्राओं का विवाद चला था तो न सिर्फ मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं को पाखंडी कहा गया था एक दो विचारवान अंग्रेजी अखबारों ने अपने संपादकीय पेजों पर सरोजनी नायडू का वह कथन भी दिया था कि गांधी को उनकी सादगी और गरीबी में रखने के लिए हमको कितना खर्च और तामझाम करना पड़ता है. वे तीसरे दर्जे में सफर करते हैं तो उनकी सुविधा और सुरक्षा के लिए हमें पूरा डब्बा ही खाली रखना पड़ता है. यानी आखिर तो गांधी की सादगी और गरीबी भी पाखंड थी क्योंकि उसके लिए दूसरों को इतना खर्च करना पड़ता था. इन जानकार और विचारवान लोगों ने सरोजनी नायडू की बात तो याद रखी लेकिन यह पड़ताल करने की कोशिश नहीं की कि इसके बावजूद गांधी ने कैसा जीवन जिया और उनका व्यवहार कैसा रहा. गांधी तक को पाखंडी बताने की कोशिश में लगे ये लोग पहले ही तय कर चुके हैं कि सादगी पाखंड और गरीबी अभिशाप है. जो लोग ठाठ से जी सकते हैं उन्हें जीना चाहिए और अपने ठाठ-बाट पर कोई अपराध भावना नहीं रखनी चाहिए. अपने मध्यवर्ग में नए आए उपभोक्तावाद का यही औचित्य है. गांधी उसे लजाते हैं तो वह अपने राष्ट्रपिता को ही पाखंडी कहता है.

क्या गांधी ने कभी कहा था कि मेरी सुविधा और सुरक्षा के लिए वह पूरा डब्बा खाली रखा जाय जिसमें मैं यात्रा करता हूं? आप पाएंगे कि गांधी ने इसका विरोध किया और इसके बावजूद उन्हीं के साथियों व मानने वालों ने ऐसा किया

क्या गांधी ने कभी कहा था कि मेरी सुविधा और सुरक्षा के लिए वह पूरा डब्बा खाली रखा जाय जिसमें मैं यात्रा करता हूं? आप पाएंगे कि गांधी ने इसका विरोध किया और इसके बावजूद उन्हीं के साथियों व मानने वालों ने ऐसा कियाजहां गांधी की अंत्योष्टि की गई थी दिल्ली के उस राजघाट को स्मारक के नाते बनाए रखने और उससे लगे दूसरे नेताओं के स्मारकों के जगह घेरने की बात उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी कही है. वे अपनी, कांशीराम और दूसरे दलित नेताओं की मूर्तियां लगाने के लिए दिल्ली के पास के नोएडा और लखनऊ में बड़े-बड़े पार्क बनवा रही हैं. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग कारणों से उसे रोक रखा है. लेकिन बहन मायावती ने गरीब उत्तर प्रदेश की जनता के कोई ढाई हजार करोड़ रुपए इन मूर्तियों और पार्कों पर खर्च करने को इसी से तो उचित ठहराने की कोशिश की है कि राजघाट और उससे लगे स्मारकों पर कितना खर्च होता है और उनने कितने अरबों की जमीन घेर रखी है. मायावती भले ही अपने को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से बड़ी नेता समझती हों और उनके इस दावे को दलित चिंतक ताली बजाकर मंजूर करते हों, अपनी और कांशीराम की मूर्तियों पर जनता के इस पैसे के खर्च को कौन उचित बताएगा? लेकिन महात्मा गांधी मायावती के सबसे प्रिय निशाने हैं और उस पर वार करने का मौका वे बेचारी नहीं चूकती. अपना आत्मभोगी और स्वयंसिद्ध मध्यवर्ग भी गांधी के उदाहरण को मिटाना जरूरी समझता है.

इन दोनों के लिए गोपालकृष्ण गांधी ने उस अविनाशी गांधी को कुछ मूर्त करने की कोशिश की है जो मूर्तियों, स्मारकों, मार्गों, संग्रहालयों और पोथियों से परे है. खुद गांधी ने कहा था- ‘मेरे लिखे हुए की मेरे शरीर के साथ ही अंत्येष्टि कर दी जानी चाहिए. मैंने जो किया है वही टिकेगा मेरा बोला या लिखा हुआ नहीं.’ दांडी कूच भी तो गांधी का किया हुआ है इसलिए उसे टिकाए रखने के लिए मूर्तियों और राजमार्ग की जरूरत नहीं है. वह एक कृतज्ञ राष्ट्र के इस तरह टिकाए नहीं टिकेगा. दांडी कूच अन्यायी कानून को तोड़ने और तोड़ने में हर उस व्यक्ति को लगाने के लिए हुआ था जो उससे प्रभावित होता है. नमक ऐसी चीज है जिसका इस्तेमाल हर आदमी तो करता ही है पशु भी करते हैं. ऐसी सर्वव्यापी और सार्वकालिक वस्तु को आजादी के आंदोलन से जोड़ना ही गांधी विचार और कर्म की विशिष्टता है. दांडी कूच और नमक सत्याग्रह ने इसीलिए दुनिया को हिला दिया. गांधी ने इस देश के नमक को जगा दिया. अन्यायी कानून को तोड़ने में हर व्यक्ति को लगा देना ही दांडी कूच का अविनाशी संदेश है. इसलिए उसका सा स्मारक तो यही है कि क्या इस देश के सभी लोग मिलकर अन्यायी कानूनों को तोड़ रहे हैं? अगर हां तो वे दांडी कूच कर रहे हैं.

गांधी के काम की गांधीय कसौटी तो यही है. उनके पोते गोपाल गांधी ने इस अविनाशी तत्व को पत्थर बनने से रोक लिया. उनने अपने दादा का कुछ नमक चुकाया है लेकिन क्या इससे सरोजनी नायडू और मायावती की नसीहत कुछ कम होगी? शायद नहीं. क्योंकि जो उसका इस्तेमाल कर रहे हैं वे गांधी को समझने के लिए नहीं अपनी बात समझने के लिए कर रहे हैं. रेल के तीसरे दर्जे में यात्रा करने की ही बात लीजिए. क्या गांधी ने कभी कहा था कि मेरी सुविधा और सुरक्षा के लिए वह पूरा डब्बा खाली रखा जाय जिसमें मैं यात्रा करता हूं? आप पाएंगे कि गांधी ने इसका विरोध किया और इसके बावजूद उन्हीं के साथियों व मानने वालों ने ऐसा किया. इसकी सच्चाई समझना हो तो एक किस्सा सुनिए.

भारत के वायसरॉय को महात्मा गांधी से कुछ जरूरी बातें जल्दी ही करनी थीं. उनने मालूम किया तो पता चला कि गांधी पुणे में हैं. उन्हें पुणे से दिल्ली बुलवाने के लिए वायसरॉय ने विशेष रेलगाड़ी यानी एक इंजन में एक डिब्बा लगवा कर पुणे भिजवाया. गांधी अपने साथियों के समेत दिल्ली आए. आते ही उनने अपने और अपने सभी साथियों के पुणे से दिल्ली आने के तीसरे दर्जे के किराए का हिसाब लगवाया और जो रकम बनी वो वाइसरॉय के दफ्तर में अपने एक साथी को हाथों भिजवा दी. वाइसरॉय का सचिव उसे देखते ही आग बबूला हो गया. उसने गांधी के साथी से कहा- तुम्हारा बुढ़ऊ समझता है कि उसे यहां बुलाने में हमने इतना सा खर्च किया है? तुम जानते हो पुणे रेलगाड़ी भेजने और उसे वापस दिल्ली लाने में कितना पैसा खर्च होता है? ले जाओ इसे और अपने बुढ़ऊ को दे दो. वह गांधी के पास आ गया. सचिव की सारी बातें सुनने समझने के बाद गांधी ने उसे कहा कि उन्हें कहो गांधी अपनी मर्जी से और अपने कार्यक्रम के मुताबिक आता तो इतना ही किराए पर खर्च करता. चूंकि वायसरॉय को जल्दी थी और जरूरी बात करनी थी इसलिए उनने विशेष रेलगाड़ी भिजवाई. वे वायसरॉय हैं अपने काम पर कितना ही खर्च कर सकते हैं. मैं तो इतने ही किराए पर आता हूं और अपना किराया जरूर देता हूं. इसलिए मेरा किराया मंजूर किया जाय. और रेलगाड़ी भेजने का खर्च वायसरॉय भरें.

गांधी का साथी फिर वायसरॉय के दफ्तर पहुंचा और गांधी की दलील सचिव को सुना दी. बात इतनी सही और सच थी कि सचिव उसे काट नहीं सकता था. गांधी को दिल्ली बुलाना और जल्दी बुलाना वायसरॉय के लिए जरूरी था. गांधी अपना पहले से तय कार्यक्रम रद्द करके आए थे और वे अपना किराया जरूर देते थे. सचिव को गांधी का भेजा किराया लेना पड़ा. अब समस्या यह कि उसे जमा कहां करवाएं? वह पैसा रेलवे कर्मचारी कल्याण कोष में जमा किया गया.

एक और दुर्घटना लीजिए.

बीस जनवरी 1948 के दिन गांधी प्रार्थना सभा में बोल रहे थे कि बिड़ला हाउस में बम फटा. जहां से वे बोल रहे थे वहां से कोई पच्चीस गज की दूरी पर बम फटा जो उन पर फेंका गया था. इतिहास जानता है कि बम नाथूराम गोडसे के एक शरणार्थी साथी मदनलाल ने फेंका था. गांधी पल भर भी विचलित नहीं हुए. वे समझे थे कि धमाका सैनिक कवायद में हुआ होगा. उनने लोगों से कहा- सुनो, सब सुनो. कुछ भी हुआ नहीं है. और बोलते रहे. दूसरे दिन उन्हें पता चला कि बम उन पर फेंका गया था और बम फेंकने वाला कुछ बिन फूटे बमों के साथ पकड़ा गया. दूसरे दिन की प्रार्थना सभा में उनने कहा कि मुझे तो कोई अंदाज ही नहीं था. भगवान ही जानता है कि उन्हें मालूम होता कि बम उन पर फेंका गया है और फिर उसके फटने पर वे क्या करते. इसलिए मेरी तारीफ की कोई जरूरत नहीं है, उन्हें तो प्रमाणपत्र तभी दिया जा सकता है जब वे ऐसे बम के फटने से मरें और फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहे और बम फेंकने वाले के लिए मन में कोई मलाल न हो.

उनने सरदार पटेल गृहमंत्री की कोई सुरक्षा मंजूर नहीं की. भगवान ही मेरा रक्षक है. मैंने अपने को उसे सौंप दिया है. वह चाहेगा तो कोई मुझे मार नहीं सकता. वह मारेगा तो कोई बचा नहीं सकता. उनने ऐसा कई बार कहा था. तीस जनवरी को प्रार्थना सभा में जाते हुए नाथूराम गोडसे ने बिल्कुल पास और सामने से तीन गोलियां मारीं. वे हे राम कहते हुए गिरे बिल्कुल वैसे ही जैसा कि चाहते थे.

कौन उनकी सुविधा और सुरक्षा करना चाहता था? हम! और हमारी व्यवस्था जो गांधी को मंजूर नहीं थी. लेकिन उसके लिए हम गांधी को दोषी मानते हैं. पाखंडी कहते हैं. राष्ट्रपिता का नमक चुका रहे हैं ना!   

प्रभाष जोशी