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‘ऐसे भी ‘लो शुगर’ हो सकता है!’

मरीज के व्यवहार में पागलों जैसा परिवर्तन आना भी लो शुगरकी एक निशानी है. तो यदि डायबिटीज का मरीज, जो अभी तक एकदम ठीक-ठाक था, अचानक ही उत्तेजक हो जाए, पागलों सा व्यवहार करे, संभाले न संभले तो यह संभावना है कि उसका ब्लड ग्लूकोज लेवल बहुत कम हो गया हो

कहानी

यह कहानी डायबिटीज और ब्लडप्रेशर के एक पैंसठ वर्षीय रिटायर्ड फौजी की है. मेरे मरीज. रतलाम से हर माह मुझे दिखाने रेल में बैठकर पत्नी के साथ आया करते. बेहद चुप रहने वाले. शर्मीले, शांत और सीधे-साधे. फौजी इमेज के ठीक विरुद्ध पर बेहद अनुशासित, आज्ञाकारी टाइप का मरीज जो डाक्टर को सौभाग्य से ही मिलता है. पति-पत्नी की यह वृद्ध जोड़ी ऐसी दिलकश लगती थी कि मेरा दिल जुड़ा जाता था उनको देखकर.

पर इस बार आए तो दोनों ही बड़े परेशान. पत्नी बेहद उत्तेजित और गुस्सा-सी. और ये अपराध बोध और शर्म से सिर झुकाए. पत्नी ने शिकायती स्वर में बताया कि इस बार तो इनने ऐसी गजब की शर्मनाक हरकत की है कि क्या कहूं? मैं तो इन्हें देवता समझती थी. और इनने अभी रास्ते में ट्रेन में मुझे इतनी गालियां, भद्दी-भद्दी बातें.. वे रोने लगीं. पूछने पर पता चला कि घर से निकलने में लेट हो रहे थे, सो दवाई खाकर नाश्ते की पोटली लेकर वे लोग स्टेशन आ गए. ट्रेन देर से आई. वे चढ़े. कुछ दूर जाते ही फौजी महाराज अचानक ही पत्नी की किसी बात पर भयंकर उत्तेजित हो उठे. वह शख्स जो चुप रहने और बहुत कम तथा सौम्य बातें करने के लिये विख्यात तथा कुख्यात था अचानक ही बेहद हिंसक हो उठा. खूब गालियां. धक्का-मुक्की. साथ के यात्रियों को भी .. पत्नी और साथ के यात्रियों ने पुचकारा, संभाला, समझकर नाश्ता वगैरह दिया तो थोड़ी देर में ये वापस ऐसे बन गए मानो कुछ हुआ या किया ही न हो. पत्नी से बोले कि मैंने यह सब किया ही नहीं. मैंने बात समझ ली. दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे. मरीज को हाईपोहाईसीमिया (रक्त में ग्लूकोज कम हो जाना या लो शुगर’) हुआ होगा. वे डायबिटीज की दवा घर से ही खाकर निकले थे और नाश्ता करने में बहुत देर हो जाने के कारण ऐसा हुआ था.

शिक्षा

मरीज के व्यवहार में पागलों जैसा परिवर्तन आना भी लो शुगरकी एक निशानी है. तो यदि डायबिटीज का मरीज, जो अभी तक एकदम ठीक-ठाक था, अचानक ही उत्तेजक हो जाए, पागलों सा व्यवहार करे, संभाले न संभले तो यह संभावना है कि उसका ब्लड ग्लूकोज लेवल बहुत कम हो गया हो. इस फौजी को भी यही हुआ था. वो तो सही समय पर नाश्ता-चाय करा दिया तो ठीक हो गया वर्ना वे बेहोश हो सकते थे, उनको मिर्गी जैसे दौरे पड़ सकते थे और वे मर भी सकते थे – और यह सब मात्र ब्लड प्रेशर कम होने और कम होते चले जाने के कारण होता.

प्राय: हाथ-पांव कांपने, धड़कन होने, आंखों के आगे अंधेरा सा छाने, लड़खड़ाने, पसीना आने जैसी चेतावनियों से मरीज को पता चल जाता है कि शायद मेरी शुगर कम हो रही है. पर यदि बहुत लंबे समय से डायबिटीज हो तो कई बार इन चेतावनियों को पैदा करने वाला शरीर का एड्रिनर्जिक सिस्टमकाम नहीं करता है. शुगर कम होती जाती है और मरीज को चेतावनी ही नहीं मिल पाती. वह या तो सीधे बेहोश हो जाता है या पागलों सा व्यवहार करने लगता है. यह बात यदि हमें पता न हो तो उस मरीज के लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. डाक्टर तक कई बार ऐसे मरीजों को लकवा या साइकोसिस मान बैठते हैं. पुलिस ने कई बार इन्हें नशेड़ी मानकर इनको लॉकअप में डाल देने की गलती भी की है जहां ये सुबह तक या तो बेहोश मिले या लॉकअप में मौतके शिकार भी कहाए हैं.

डायबिटीज में ब्लड शुगर का कम हो जाना बेहद खतरनाक हो सकता है. पर यह होता क्यों है? आम तौर पर कारण वही होता है जो इस फौजी के केस में था – अर्थात दवाई तो खा ली और खाना खाने में या तो देर हो गई या भूख न होने के कारण रोज की अपेक्षा कम खाया. गोली ब्लड शुगर कम करती गई और खाना आपने खाया नहीं. ब्लड शुगर से ही दिमाग काम करता है. बार-बार शुगर कम हो तो मस्तिष्क को स्थायी रूप से नुकसान भी पहुंच सकता है.

याद रखें :

1- डायबिटीज की गोली/इंजेक्शन के साथ/बाद भोजन लेना कभी न भूलें. न ही देर करें.

2- डायबिटीज की गोली यदि सुबह ली है तो वह चौबीस घंटे तक कुछ न कुछ असर रखती है. तो जरूरी है कि थोड़ा-थोड़ा करके अपने भोजन को दिन में यूं बांटकर खाएं कि खाली पेट न रहना हो.

3- डायबिटीज के रोगी को, जो कुछ देर पहले तक एकदम ठीक था अचानक ही कुछ भी नया होने लगे – घबराहट, बेचैनी, पसीना, हाथ कांपना, चक्कर, बेहोशी या व्यवहार में परिवर्तन – तो इसे हाईपोहाईसीमिया (लो शुगर) मानकर तुरंत कुछ मीठा खिला दें फिर डाक्टर को दिखाएं.

यह भी याद रखें :

डायबिटीज हो तो लो शुगर हो जाने के बहाने चाहे जब मीठा खा लेने का अवसर न खोजें. यदि वास्तव में ही ऐसा बार-बार होता है तो तुरंत डाक्टर से पूछें क्योंकि दवा तथा भोजन के बीच उचित सामंजस्य बना रहे तो ऐसा नहीं होना चाहिए.   

26/11 कहने से बात नहीं बनती

26 नवंबर, 2008 की रात मुंबई में हुए आतंकवादी हमले को 26/11 कहते हुए शायद कुछ लोगों को आसानी होती हो, लेकिन मुझे असुविधा होती है. यह नामकरण मुंबई के इस हमले को आठ साल पहले न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए हमले से जोड़ देता है जिसे अमेरिका 9/11 के रूप में याद करता है. लेकिन अमेरिका के लिए 9/11 सिर्फ एक सुबह हुए आतंकी हमले का नाम नहीं है, वह उसके लिए आतंकवाद की पूरी परिघटना को समझने का एक संदर्भ बिंदु भी है. 9/11 के बाद अमेरिका के लिए आतंकवाद और आतंकवादी- दोनों का मतलब बदल गया. इसी हमले के बाद उन दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश ने आतंक के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय युद्ध की घोषणा की और यह चेतावनी भी उछाल दी कि जो इस युद्ध में अमेरिका के साथ नहीं है, वह आतंकवाद के साथ है. उन दिनों भारत ने बड़ी तत्परता से अमेरिका को सहयोग का प्रस्ताव भेजा और केंद्र की एनडीए सरकार यह उम्मीद करने लगी कि अमेरिका का अब पाकिस्तान से मोहभंग होगा और वह भारत के उन संकटों को समझेगा जो सीमा पार का प्रायोजित आतंकवाद भारत में पैदा कर रहा है.

अल क़ायदा की शाखाएं भले अमेरिका में हों, उसकी जड़ें वहां की जमीन में नहीं हैं. इसलिए अमेरिका के लिए यह आसान था कि वह अपनी सुरक्षा कुछ कड़ी करके, अपने नागरिकों की आजादी छीन कर, अपनी नागरिक स्वतंत्नता के मूल्यों को थोड़ा सिकोड़कर खुद को महफ़ूज कर ले

लेकिन अमेरिका को इसकी फुरसत नहीं थी. उसे अपने दोस्तों और दुश्मनों के पते पहले से मालूम थे. उसे पता था कि आतंक के खिलाफ इस लड़ाई में उसे फिलहाल भारत की नहीं, पाकिस्तान की ही जरूरत है. आखिर एक दौर में पाकिस्तान के साथ मिलकर ही उसने सोवियत संघ के विरुद्ध अफगानिस्तान में तालिबान को खड़ा किया था जो अल कायदा का सहोदर भले न हो, सगा जरूर है. तब से आज तक अमेरिका आतंक के विरुद्ध यह युद्ध कैसे लड़ रहा है, किन ताकतों की मदद ले रहा है, किन ठिकानों पर वार कर रहा है, यह दुनिया देखती रही है. भारत का भी यह भ्रम टूट चुका है कि अमेरिका उसका संकट दूर करने के लिए कोई लड़ाई लड़ेगा- या उसकी लड़ाई से भारत का भी कुछ भला हो जाएगा.

दरअसल, हमारे लिए समझने की जरूरत यही है कि 26/11- यानी मुंबई पर हुए हमले- 9/11 नहीं हैं. अमेरिका में आतंक की तारीख एक है, हमारे पास ऐसी तारीखें लगातार जमा होती गई हैं- हमारे कई 9/11 हैं. हमारे लिए मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, अहमदाबाद, बेंगलुरु , अयोध्या, लखनऊ, रामपुर आदि सिर्फ शहरों के नाम नहीं हैं, आतंकी मंसूबों के नक्शे भी हैं जो हाल के वर्षों में अंजाम दिए जाते रहे. और इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि अमेरिका ने अपनी कानून व्यवस्था दुरुस्त कर ली और हम कर नहीं पाए. दरअसल, भारत और अमेरिका में आतंकवाद की कैफियतें अलग-अलग हैं और जब तक हम उन्हें ठीक से नहीं समझेंगे, अपने यहां के आतंकवाद का खात्मा नहीं कर पाएंगे.

अमेरिका में जिन आतंकियों ने विमानों का अपहरण कर उन्हें अमेरिका के सबसे मजबूत आर्थिक और सामरिक प्रतीकों से टकरा दिया, उनका गुस्सा अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों और इस्लामी दुनिया को लेकर अमेरिका के तथाकथित शत्नुतापूर्ण रवैये से था. इस लिहाज से अल क़ायदा की शाखाएं भले अमेरिका में हों, उसकी जड़ें वहां की जमीन में नहीं हैं. इसलिए अमेरिका के लिए यह आसान था कि वह अपनी सुरक्षा कुछ कड़ी करके, अपने नागरिकों की आजादी छीन कर, अपनी नागरिक स्वतंत्नता के मूल्यों को थोड़ा सिकोड़कर खुद को महफ़ूज कर ले.

भारत के लिए यह काम इतना आसान नहीं है. इसका वास्ता सिर्फ पुलिस और प्रशासन की उस लुंज-पुंज व्यवस्था से नहीं है जिसका अपना वर्गीय चरित्न है और जिसकी वजह से वह या तो मजबूत लोगों के दलाल की तरह काम करती है या फिर कमजोर लोगों के दुश्मन की तरह – इसका वास्ता उस जटिल सामाजिक- राजनीतिक विडंबना से भी है जो बीते 60 साल में बदकिस्मती से भारत में विकसित होती चली गई है. इसी विडंबना के नतीजे में हमारे पास कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक का अलगाववाद है और नक्सलवाद-माओवाद से लेकर दलितवाद तक का असंतोष. कुछ प्रशासन की अपनी औपनिवेशिक विरासत और समझ के चलते और कुछ अमेरिका-यूरोप का मुखापेक्षी होने की आदत की वजह से, हम इन सबको एक ही डंडे से हांकना चाहते हैं- बिन यह समझे कि इन समस्याओं की जड़ें कहीं हमारे समाज में हैं और उन्हें खत्म किए बिना हम आतंकवाद या किसी भी समस्या के विरुद्ध अपना युद्ध नहीं लड़ पाएंगे. और मामला सिर्फ आतंकवाद का नहीं है. ध्यान से देखें तो भारतीय लोकतंत्न को जो सबसे बड़ी चुनौतियां मिल रही हैं, उन सबके जवाब हम एक ही तरीके से देना चाहते हैं. दरअसल यह भारतीय सुरक्षा तंत्न की कमजोरी है कि यह जवाब भी वह ठीक से नहीं दे पाता. यह अक्षमता उसे कुछ ज्यादा क्रूर और अमानवीय ही बनाती है. असली गुनाहगार या तो उसके ऊपर होते हैं या उससे दूर और उसका गुस्सा नकली और कमजोर गुनाहगारों पर निकलता है.

हम अब तक एक ऐसा भारत बना नहीं पाए जिसमें सबको बराबरी और इंसाफ़ का भरोसा हो. इस भारत में आदिवासी बेदखल हैं, दलित उपेक्षित और मुसलमान असुरक्षित. इससे पैदा हताशा का फायदा कहीं माओवाद को मिलता है कहीं आतंकवाद कोसुरक्षा तंत्न की इस विफलता का वास्ता कहीं ज्यादा बड़ी राजनीतिक विफलता से है. हम अब तक एक ऐसा भारत बना नहीं पाए जिसमें सबको बराबरी और इंसाफ़ का भरोसा हो. इस भारत में आदिवासी बेदखल हैं, दलित उपेक्षित और मुसलमान असुरक्षित. इससे पैदा हताशा का फायदा कहीं माओवाद को मिलता है कहीं आतंकवाद को. संकट यह है कि जो सरकारें बड़ी पूंजी के एजेंट की तरह आदिवासियों और किसानों की जमीन छीन कर सेज बनवाती हैं, जो अपराधियों और काले पैसे वालों के गठजोड़ से चुनाव नियोजित करती है, जो खड़ी-खड़ी बाबरी मस्जिद का टूटना देखती हैं या उसमें सहयोग करती हैं, जो 2002 के दंगाइयों के साथ खड़ी दिखती हैं, जो फर्जी मुठभेड़ें करने वाले अफसरों को इनाम देती हैं, वही नक्सलवादियों के विरुद्ध युद्ध की दुंदुभि बजाती हैं और वही आतंकवादियों के सफाये की घोषणा करती हैं. ऐसी सरकारें न लोक का भरोसा हासिल कर पाती हैं न तंत्न को चुस्त-दुरुस्त बना पाती हैं.

मुंबई हमलों की पहली बरसी पर प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह ने बड़ी भावुकता से कहा कि  हम कुछ भूलेंगे नहीं. लेकिन उन्हें किसी ने याद नहीं दिलाया कि हमलों के बाद महाराष्ट्र के जिस गृहमंत्नी का इस्तीफा लिया गया, उसे दुबारा उसी पद पर बिठा दिया गया. जाहिर है, हम भूल चुके हैं. या तो वह इस्तीफा एक राजनीतिक मजबूरी था या फिर मंत्नी की बहाली. यानी सरकार ने और पार्टी ने तब भी और अब भी जो फैसला किया, उसमें राजनीति की जरूरत ज्यादा रही, मुंबई का सवाल कम या सरोकार कम. 

जब ऐसे वास्तविक सवाल और सरोकार नहीं बचते तभी हम उधार के मुहावरों में सोचते हैं और सुरक्षा और स्मृति के आडंबर रचते हैं. मुंबई पर हुए आतंकी हमले की पहली बरसी पर मुंबई और देश भर में जो सरकारी-गैरसरकारी आयोजन हुए, उनमें भी यह आडंबर दिखता रहा. इस आडंबर में यह कहने का रिवाज फिर दिखा कि मुंबई बीते साल के हमलों और जख्मों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ चुकी है. हकीकत यह है कि जख्म उन्हीं के सूखे हैं जिन्हें कोई खरोंच नहीं आई. वरना जिन लोगों की जिंदगी में किसी जलजले की तरह तीन दिन आए, वे अब भी सोते-जागते उनका पीछा करते हैं. आख़िर क्यों कोई कविता करकरे अपने दिवंगत पति की खोई हुई बुलेट प्रूफ जैकेट का पता लगाना चाहती है और क्यों कोई विनीता कामटे ‘द लास्ट बुलेट’ जैसी किताब लिखकर अपनी हताशा जाहिर करती है? दरअसल, जब हम कविता करकरे या विनीता कामटे या उन जैसे सैकड़ों दूसरे लोगों की तकलीफ़ समझेंगे तब हमारे लिए मुंबई के हमलों का मर्मभेदी अर्थ खुलेगा और तभी हम 26/11 जैसा फैशनेबल मुहावरा गढ़ने की जगह इसके प्रतिकार और प्रतिरोध के सच्चे रास्ते सोच पाएंगे.

लेकिन सच यह है कि सरोकारों की इस कड़ी में कविता करकरे, विनीता कामटे या मुंबई पर हुआ हमला बाद में आएगा, उसके पहले देश के न्यायवंचित वर्गों की याद आएगी जिनके साथ हमारा जुड़ाव बन सका तो आतंकवाद या नक्सलवाद को कहीं ज्यादा तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा. 

क्या विडंबना है कि मुंबई के हमलावर नाव से आए थे. नावें अक्सर तबाही से बचाव का एक पुराना सपना रही हैं- कि जब धरती हिलेगी या खत्म हो रही होगी तो हम एक नाव बना लेंगे और उसमें सबको बिठा लेंगे- दुर्भाग्य है कि हमने अपने समाज के सारे समुदायों को बिठाने वाली ऐसी नाव नहीं बनाई है. अगर बनाई होती तो कोई आतंकी बाहर से किसी नाव पर बैठकर आने का दुस्साहस नहीं कर पाता.     

प्रियदर्शन 

कुछ और नहीं तो वंदे मातरम्

जहां तक वंदे मातरम् में देश को माता मानकर उसकी पूजा करने का सवाल है तो उसपर थोड़ा ठहरकर विचार करने की जरूरत है. हिंदी में वंदना का मतलब केवल पूजा करना ही नहीं है बल्कि स्तुति या यशोगान करना भी है 

कुछ मुद्दे सामयिक होते हैं और कुछ सनातन. वंदे मातरम् से जुड़े विवाद दूसरी श्रेणी में आते हैं. पिछले करीब सौ साल से राष्ट्रीय गीत से जुड़े कमोबेश एक जैसे विवाद ठंडे पड़कर फिर गर्म होने को उठते रहे हैं.

ताज विवाद करीब एक महीने पहले तब उठा जब जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपने 30वें आम अधिवेशन में (जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री सहित देश के तमाम बड़े राजनेताओं ने शिरकत की थी) वंदे मातरम् गाने के खिलाफ जारी दारुलउलूम देवबंद के फतवे के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया. 2006 में राष्ट्रीय गीत की रचना के 125 साल पूरे होने पर केंद्र सरकार के एक नियत समय पर वंदे मातरम् गाने के निर्देश पर भी इस और उस ओर के संगठनों द्वारा तरह-तरह के एतराज जताए गए थे. इससे पहले 1998 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के शिक्षा मंत्री को तो इसपर उठे विवाद के चलते अपने मंत्री पद से ही हाथ धोना पड़ा था. आजादी से पहले जिन्ना और मुस्लिम लीग के दूसरे नेताओं और सावरकर जैसे कट्टरपंथी हिंदू नेताओं ने वंदे मातरम् सनातन मुद्दा बन सके, इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए.

वंदे मातरम् गाने को लेकर दो वजहों से मुस्लिम समुदाय के तमाम लोगों को एतराज रहा है – पहली, इसके कुछ हिस्सों में हमारे देश को माता मानकर उसकी तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू धर्म के प्रतीकों से की गई है और दूसरी यह कि इस्लाम एक ही ईश्वर की सत्ता में विश्वास करता है और अल्लाह को छोड़कर किसी और की पूजा-उपासना की उसमें इजाजत ही नहीं है, फिर चाहे वह स्वयं पैगंबर या अपनी माता ही क्यों न हों.

1937 में पहले तो कांग्रेस की कार्य समिति ने वंदे मातरम् के विवादित हिस्सों को हटाने का प्रस्ताव पारित कर शुरू के केवल दो अंतरों को राष्ट्रीय गान का दर्जा दिया और फिर बाद में 1939 में इसे गाने की अनिवार्यता को खत्म करने वाला स्वयं गांधी जी का तैयार किया प्रस्ताव पारित कर इससे जुड़े हर झगड़े की गुंजाइश खत्म कर दी. देश आजाद होने पर संविधान सभा ने भी इसी राह पर थोड़ा और आगे बढ़ते हुए वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों को ही राष्ट्रीय गान का नहीं बल्कि राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया.

जहां तक वंदे मातरम् में देश को माता मानकर उसकी पूजा करने का सवाल है तो उसपर थोड़ा ठहरकर विचार करने की जरूरत है. हिंदी में वंदना का मतलब केवल पूजा करना ही नहीं है बल्कि स्तुति या यशोगान करना भी है. मेरे पास कई पत्र ऐसे आते हैं (कुछ मैंने भेजे भी हैं) जिनकी शुरूआत ‘सादर वंदे’ से होती है. स्पष्ट है कि वंदे का यहां पर इस्तेमाल अभिवादन के संदर्भ में है न कि पूजा-उपासना के. यानी कि ऐतिहासिक तथ्यों और वंदे शब्द के तमाम अर्थों और उपयोगों की रोशनी में देखा जाए तो बिना ज्यादा विचारे कहा जा सकता है कि किसी भी समुदाय या व्यक्ति को वंदे मातरम् गाने के लिए बाध्य करने और उसकी देशभक्ति को इसके गायन से जोड़ने का किसी भी व्यक्ति या समुदाय को जरा भी अधिकार नहीं. साथ ही वंदे मातरम् के राष्ट्रीय गीत वाले स्वरूप में ऐसा कुछ भी नहीं जो मुस्लिम या किसी अन्य समुदाय की भावनाओं के जरा भी विपरीत जाता हो.

संजय दुबे  

बीटी बैंगन यानी सेहत का भर्ता

जीएम फसलों पर बनी सरकारी समिति ने तो बीटी बैंगन के पक्ष में राय दे दी है लेकिन इस बैंगन से जुड़े खतरों पर सवाल जस के तस हैं. सम्राट चक्रवर्ती की रिपोर्ट

महिको ने जनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक मोंसेंटो से खरीदी थी जिसका इस्तेमाल बीटी बैंगन के विकास में किया गया. मोंसेंटो भारतीय कृषि शोध संस्थानों को एबीएसपी-2 जैसी परियोजनाओं के जरिए वित्तीय सहायता देती है

सब्जियों के राजा बैंगन पर पिछले कुछ समय से बवाल मचा है. वजह है भारत में आनुवंशिक रूप से संवर्धित यानी जनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) बैंगन की व्यावसायिक खेती की तैयारी. संभावना जताई जा रही है कि इंसानी इस्तेमाल के लिए किसी जीएम फसल की सीधी बिक्री की इजाजत देने वाले पहले देशों की सूची में भारत जल्द ही शामिल हो सकता है. बीटी बैंगन उगाने के प्रस्ताव को मंजूरी देने या न देने के लिए सरकार द्वारा गठित जैव प्रोद्योगिकी नियामक समिति (जीईएसी) ने हाल ही में यह कहते हुए इसके भारत में उत्पादन की अनुमति दी है कि बीटी बैंगन बनाने और खाने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित है. बीटी बैंगन समर्थक लॉबी का कहना है कि इससे खेती में कीटनाशकों के प्रयोग में कमी आएगी और फसल व जमीन को होने वाला नुकसान भी कम होगा.

उधर, किसान नेताओं, वैज्ञानिकों, पर्यारणविदों और योजना आयोग के कई सदस्यों का कहना है कि बीटी बैंगन भारत के लिए ‘टाइम बम’ साबित होगा जो देश में बड़े पैमाने पर कैंसर, पर्किसन और  शरीर में दवाओं को बेअसर होने की वजह बनेगा. इस जीएम फसल पर अब अंतिम निर्णय केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय को करना है. इस मुद्दे पर वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का कहना है कि अंतिम फैसला सभी पक्षों की राय जानने के बाद किया जाएगा.

दरअसल जीएम फसलों और सब्जियों के इस्तेमाल से जुड़ी बहस के केंद्र में वह तकनीक  है जिसे जेनेटिक इंजीनियरिंग कहा जाता है. जीएम तकनीक को आप दो बिल्कुल अलग-अलग प्रजातियों के जींस यानी जीवन की बुनियादी इकाई में बदलाव की तकनीक कह सकते है, जैसे बैक्टीरिया या मछली में कोई खासियत पैदा करने वाले जीन को एक पूरी तरह से अलग प्रजाति ,जो कोई  फसल या सब्जी हो सकती है, के भीतर डाल दिया जाए. इस प्रक्रिया में हमें जो नई प्रजाति (फल या सब्जी) मिलती है, उसमें उस बैक्टीरिया की विशेषताएं भी होती हैं. एक बीटी बैंगन, सामान्य बैंगन से इसी मामले में भिन्न है. बीटी बैंगन का विकास इस तरह किया गया है कि इसमें अपने आप ही एक रसायन (जो कीटनाशकों में भी पाया जाता है) पैदा होता है जो बैंगन में लगने वाले एक कीड़े को (शूट बोरर) मार  देता है. समर्थक लॉबी इसे बैंगन की खूबी बता रही है.

लेकिन इसके पीछे कई खतरे भी छिपे हैं जिन्हें यह लॉबी पूरी तरह से नजरअंदाज करती है. पहली बात तो यही है कि ‘नया’ बैंगन खुद अपने भीतर कीड़े मारने के लिए जहरीला रसायन पैदा करता है और इसलिए बैंगन का इस्तेमाल करने से पहले इसे पानी से धोकर, जो कि आमतौर पर किया जाता है, जहरीले रसायन से मुक्त नहीं किया जा सकता. दूसरी बात यह कि कीटनाशकों का प्रभाव धूप के संपर्क में आने पर कम होता जाता है लेकिन बीटी बैंगन में कीटनाशक इसके भीतरी हिस्से में पैदा होता है जहां धूप नहीं पड़ती.

अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जीएम फसलें कई मायनों में खतरनाक हैं. साक इंस्टीटच्यूट ऑफ बायोलॉजिकल स्टडीज (सेन डियागो, अमेरिका) के प्रोफेसर डेव शूबर्ट के मुताबिक इसकी पहली वजह यह है कि जीएम फसलों में कार्सिनोजंस (कैंसर पैदा करने वाले रसायन) और टैरेटोजंस (जन्मजात बीमारियों के लिए जिम्मेदार रसायन) पैदा करने का गुण होता है. इसके अलावा जीएम पौधे में रसायनों का पैदा होना एक अनियंत्रित प्रक्रिया होती है. नतीजतन पौधे ऐसे जहरीले रसायनों की फैक्टरी बन जाते हैं जो कैंसर और पार्किसन जैसी बीमारियां फैला सकते हैं.

बीटी बैंगन में जहरीले रसायन पैदा करने वाला जीन अगर हमारे शरीर के भीतर रहने वाले और हमारे लिए फायदेमंद प्राकृतिक बैक्टीरिया के भीतर घुस गया तो  हमारे भीतर ही वही जहर पैदा होने लगेगा

जीएम फसलों के दुष्प्रभावों की बात करने वाले प्रो. डेव अकेले नहीं हैं. इस वैज्ञानिक बिरादरी में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रो. इग्नासियो चैपेला, न्यूयॉर्क की सिटी यूनिवर्सिटी के प्रो. बैरी कॉमनर और भारत में सेंटर फॉर सेल्युलर एण्ड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के संस्थापक निदेशक डा. पीएम भार्गव भी शामिल हैं. ये वैज्ञानिक जिस खतरे की बात कर रहे हैं उसका असर देखने के  लिए ‘लांग टर्म फीडिंग स्टडीज’ का सहारा लिया जाता है. मसलन कम-से-कम 50 चूहों को लिया जाए और दस साल की अवधि के दौरान उनकी कई पीढ़ियों को जीएम खाद्य खिलाकर देखा जाए कि उनमें कौन-सी बीमारियां या लक्षण पैदा होते हैं. कुछ देशों में इस तरह के जो अध्ययन हुए हैं उनमें देखा गया है कि चूहों की प्रजनन क्षमता कम हो गई या उन्हें कई तरह की गंभीर एलर्जियां हो गईं.

मगर भारत में इसके इस्तेमाल को मंजूरी देने वाली सरकारी एजेंसी जीईएसी ने इस तरह का कोई शोध नहीं करवाया. बल्कि उसने तो जीएम बैंगन को विकसित करने वाली फर्म महिको के अध्ययन और अनुसंधान को ही मंजूरी का आधार बना लिया. एक अरब लोगों की जिंदगी से जुड़े मसले के लिए इस फर्म ने सिर्फ 10 चूहों पर प्रयोग किया था और प्रयोग अवधि मात्र तीन महीने थी.  इससे किसी तरह का नकारात्मक परिणाम मिलने की उम्मीद नहीं थी. यह मिला भी नहीं. पर जीईएसी को कोई आपत्ति नहीं है. तहलका से बातचीत में इसके को-चेयरमैन डा. अजरुला रेड्डी का कहना था, ‘ बीटी बैंगन से नुकसान का कोई ठोस सबूत नहीं है.’  यह पूछे जाने पर कि क्या  बीटी बैंगन सुरक्षित है? उनका जवाब था, ‘इसके लिए कई स्तरों पर शोध की जरूरत होती है, बीटी बैंगन के लिए इस तरह के अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं.’ तो फिर इसे भारत में बिक्री की अनुमति क्यों दी गई? इस पर रेड्डी कहते हैं कि बीटी बैंगन विकसित करने वाली फर्म ने सरकार द्वारा तय किए सारे मानकों को पूरा किया था इसलिए. जीएम फसलों का एक और खतरा है जिसे हॉरिजांटल जीन ट्रांसफर (एचजीटी) कहते हैं. एचजीटी एक कुदरती प्रक्रिया है जिसमें एक प्रजाति का जीन दूसरी प्रजाति जो कि कोई पौधा, मानव शरीर या जानवर भी हो सकता है, के जीन में प्रवेश करने और अनुकूलित होने का रास्ता तलाश करता है. ऐसा ही जीएम फसलों के मामले में भी हो सकता है. उदाहरण के लिए, बैंगन में जहरीले रसायन पैदा करने वाला जीन अगर हमारे शरीर के भीतर रहने वाले और हमारे लिए फायदेमंद प्राकृतिक बैक्टीरिया के भीतर घुस गया तो  हमारे भीतर ही वही जहर पैदा होने लगेगा. और यदि बैंगन के भीतर मौजूद एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन हमारे जीन के साथ घुलमिल जाए तो इसका मतलब होगा कि बीमारियों में शरीर पर दवाओं का बेअसर होना.

2005 में पर्यावरणविद अरुणा रॉड्रिग्ज के नेतृत्व में कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि भारत में जीएम फसलों की सुरक्षा का प्रमाणन करने वाला तंत्र पारदर्शी नहीं है और इसमें कई खामियां हैं. इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में कहा था कि जीईएसी को महिको द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं. लेकिन महिको आंकड़े सार्वजनिक करने से बचती रही. आखिर में जब उसे कोर्ट की अवमानना की धमकी दी गई तब जाकर अगस्त 2008 में उसने ये आंकड़े सार्वजनिक किए. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से फरवरी 2008 में जीईएसी पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किए गए डा. पीएम भार्गव कहते हैं, ‘जीईएसी को किसी भी विश्वसनीय प्रयोग के आंकड़े नहीं मिले. पहली बात, सारे परीक्षण महिको ने किए थे और इसके लिए इस्तेमाल किए गए बीज भी इसी कंपनी के थे. इनका किसी निष्पक्ष एजेंसी द्वारा सत्यापन नहीं हुआ इसलिए इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. दूसरी बात, सभी परीक्षण कम अवधि के थे जबकि इस तकनीक से जुड़े कई खतरे लंबी अवधि में ही देखने को मिलते हैं. तीसरी बात, कई जरूरी परीक्षण महिको ने किए ही नहीं जबकि यह तथ्य है कि एक प्रजाति के जीन को दूसरे में प्रत्यारोपित करने से कोशिकाओं में तेजी से बढ़ोतरी होने लगती है जिससे कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. इसे परखने के कई आसान तरीके हैं, लेकिन ऐसा कोई भी परीक्षण नहीं किया गया.

इन सब मुद्दों पर जब हमने महिको से बात की तो उसका दावा था कि सुरक्षा को लेकर उसने बीटी बैंगन पर हर तरह के वैज्ञानिक परीक्षण किए हैं. कंपनी के मुताबिक इस बारे में उसका अनुसंधान किसी भी प्रतिष्ठित वज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित होने लायक है. तहलका ने जब इस मुद्दे पर डा. एसबी डोंगरे, जो जीईएसी और बीटी बैंगन पर बनी विशेषज्ञ समिति (ईसी) के सदस्य और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रतिनिधि हैं, से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने जोर देते हुए कहा कि कोई भी टिप्पणी सिर्फ जीईएसी के चेयरमैन से ली जाए. इसके अलावा जब हमने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के पूर्व सदस्य और जीईएसी व ईसी के सदस्य डा. वसंत मुथुस्वामी से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने भी कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

तो क्या हमें महिको की बात पर यकीन करना चाहिए. गौर करें कि भारत की इस सबसे बड़ी बीज कंपनी की 26 फीसदी हिस्सेदारी दिग्गज अमेरिकी कंपनी मोंसेंटो के पास है जो उसने 1998 में खरीदी थी. महिको ने जनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक मोंसेंटो से खरीदी थी जिसका इस्तेमाल बीटी बैंगन के विकास में किया गया. रॉड्रिग्ज बताती हैं कि मोंसेंटो भारतीय कृषि शोध संस्थानों को एबीएसपी-2 जैसी परियोजनाओं के जरिए वित्तीय सहायता देती है.

सरकारी और निजी क्षेत्र के सहयोग से चलने वाली इस योजना में मोंसेंटो भागीदार है. इस परियोजना के  तहत भारत के दो विश्वविद्यालयों-तमिलनाडु एग्रीकल्चर रिसर्च यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस, धारवाड़ को कंपनी से काफी पैसा मिल रहा है. उल्लेखनीय है कि ये संस्थान जीएम तकनीक के बड़े समर्थक हैं और इन फसलों के कथित ‘पक्षपाती’ परीक्षणों में शामिल भी रहे हैं.

तहलका से बातचीत में डा. भार्गव बताते हैं, ‘मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई कि वे (जीईएसी) मोंसेंटो की बात को ईश्वर की बात मानते हैं और सोचते हैं कि उसके खिलाफ हर बात को अनसुना किया जाए. जीएम फसलों के दुष्प्रभावों के बारे में काफी वैज्ञानिक लेख उपलब्ध हैं लेकिन ऐसे किसी मुद्दे पर मैंने वहां (जीईएसी) चर्चा होते नहीं देखी.’ उधर, मोंसेंटो पक्षपात की बात से इनकार करते हुए तर्क देती है कि निजी और सरकारी, दोनों कंपनियों के उत्पादों को एक ही मानदंडों वाली नियामक जांच से गुजरना पड़ता है.

अब सवाल यह है कि क्या हमें खाद्य सुरक्षा के लिहाज से वास्तव में बीटी बैंगन की जरूरत है? बिल्कुल नहीं. हमारे देश में बैंगन का इतना ज्यादा उत्पादन होता है कि राज्य सरकारें कीमतें गिरने से रोकने के लिए बैंगन की सरकारी खरीद करती हैं. और इसके अलावा हमारे पास कीटनाशकों के विकल्प के रूप में जैव रसायन भी हैं. पिछले दिनों ही आंध्रप्रदेश ने बिना कीटनाशकों का इस्तेमाल किए सफलतापूर्वक 20 लाख एकड़ में फसलें (जिसमें बैंगन भी शामिल है) पैदाकर साबित किया है कि हमारे यहां जीएम फसलों की कवायद कितनी निर्थक है. फिलहाल इस मामले की कमान पर्यावरण और वन मंत्रालय के हाथ में है. जो आगे तय करेगा कि इस तथाकथित बेहतर बैंगन को भारतीयों की रसोई में पहुंचाया जाए या नहीं. 

यह भी गौर करते चलें कि इस तकनीक को खोजने वाले और इसका सबसे ज्यादा प्रयोग करने वाले अमेरिका में किसी भी जीएम फसल का इस्तेमाल इंसानी खाने में नहीं किया जाता.   

बाजार का नया बाजीगर

आज भारत की नामचीन शख्सियतों की सूची में झारखंड के महेंद्र सिंह धोनी पहले पायदान पर हैं. ऐसा होने के पीछे की वजहें जानने का प्रयास कर रहे हैं. कुणाल मजूमदार

‘वे न तो बिल्कुल अलग राह चलने वालों में ही हैं और न ही बहुत चटकीले-भड़कीले हैं. बल्कि वे कहीं ज्यादा टिकाऊ और वास्तविक हैं, और यही चीज उन्हें सबका चहेता बना देती है’  

इसी साल जनवरी की सर्दियों के दौरान झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू होने से कुछ ही दिन पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने अपने शिक्षामंत्री बंधु तिर्की को धोनी से एक प्रचार अभियान शूट कराने के लिए कहा. जब उन्हें यह बताया गया कि धोनी का कार्यक्रम पहले से ही तय है और उनके पास अतिरिक्त समय नहीं है तो कोड़ा ने तिर्की को आदेश दिया कि वे खुद ही एक कैमरामैन को लेकर धोनी के पास चले जाएं. ‘उनसे कैमरे में देख कर प्रदेश के छात्रों के लिए कुछ भी संदेश देने के लिए कहिए,’ जानकारों के मुताबिक कोड़ा ने तिर्की से कहा, ‘झारखंड में धोनी के अलावा कोई भी नहीं चलेगा.’ कोड़ा के कहे मुताबिक तिर्की सीधे धोनी के घर पहुंचे और तीन मिनट के अंदर शूट पूरा हो गया जो कि आज तक टीवी पर दिखाया जाता है. कई मायनों में यह घटना देश की इस सर्वसुलभ शख्सियत के व्यक्तित्व को काफी-कुछ परिभाषित कर देती है.

उनकी यही पहचान अब उनके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हो रही है. परसेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट और हंसा रिसर्च द्वारा करवाए गए एक हालिया सर्वेक्षण में धोनी को देश की सबसे बड़ी सेलिब्रिटी घोषित किया गया है. इस स्थान और सम्मान के लिए उनका मुकाबला शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, अमिताभ बान और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गजों से था. सर्वेक्षण में नामचीन हस्तियों का आकलन उनकी लोगों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, सुंदरता, छवि, लोकप्रियता और मीडिया में उपस्थिति जैसे मानकों के आधार पर किया गया था और इन शख्सियतों में तमाम बड़े अभिनेता, संगीतकार और खिलाड़ी शामिल थे.

ज्यादातर लोग धोनी को अपने ही आस-पास का महसूस करते हैं. ‘वह एक आदर्श हिंदुस्तानी हैं’ ओगिल्वी एंड माथेर इंडिया के क्रिएटिव हेड पीयूष पांडे कहते हैं, ‘छोटे-से शहर के एक लड़के ने कठिन मेहनत से खुद को साबित कर दिया है जो कि भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार का सपना होता है.’ ऐसा प्रतीत होता है कि धोनी की सहजता ही उनकी लोकप्रियता के मूल में है. उन्होंने साबित कर दिया है कि अब मध्यवर्ग को औसत दर्जे का मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फ्युचर ब्रांड के प्रमुख संतोष देसाई धोनी को उभरते भारत के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला मानते हैं. वे कपिल देव के ‘माटी का लाल’ वाली छवि से कहीं ज्यादा का प्रतिनिधित्व करते हैं’ देसाई कहते हैं. ‘मेरा मानना है कि धोनी के सिर पर पुरानी यादों का कोई बोझ नहीं है’ इतिहासकार मुकुल केसवन कहते हैं, ‘अगर वे इतने लोकप्रिय नहीं होते तो मुझे आश्चर्य होता. वे सुंदर हैं, असंयमित हुए बिना भी आक्रामक बने रहते हैं और हर स्थिति में स्थिर रहते हैं. भारतीय टीम के कप्तान के रूप में भी वे सफल हैं. भारत को उनके जैसे कप्तान की ही जरूरत थी.’ एक ऊर्जावान टीम की अगुवाई करने के अलावा झारखंड के इस खिलाड़ी ने क्रिकेट से इतर भी कई ऊंचाइयों को छुआ है. 1986 में बूस्ट ने कपिल देव को ‘बूस्ट इज़ द सीक्रेट ऑफ माइ एनर्जी’ कहने के लिए 1.75 लाख रूपए दिए थे. एक दशक से भी कम समय में बूस्ट ने कपिल की जगह सचिन की उंगली पकड़ ली जिसकी कीमत थी 5 करोड़ रुपए. मार्च 2008 में कंपनी ने इस कैंपेन के लिए धोनी को चुन लिया.

‘लोग धोनी के उदय को गलत ढंग से ले रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि उनकी लोकप्रियता के पीछे उनकी क्षेत्रीय पृष्ठभूमि की कोई भूमिका है. सहवाग और युवराज भी इसी तरह की पृष्ठभूमि से आते हैं. उन्हें इन सबसे अलग खड़ा करती है उनकी क्षेत्रीय लहजे से मुक्त स्पष्ट अंग्रेजी’ दिलचस्प बात यह है कि लोकप्रियता के इस शीर्ष पर भी सारा जोर उनकी सहजता पर ही केंद्रित करने की कोशिश रहती है. ‘उन्हें कभी भी सचिन तेंदुलकर जैसा चमत्कारिक खिलाड़ी नहीं माना गया’ कपिल देव के बूस्ट अभियान से जुड़े रहे बिजनेस कंसल्टेंट प्रभात सिन्हा कहते हैं. ‘वे न तो बिल्कुल अलग राह चलने वालों में ही हैं और न ही बहुत चटकीले-भड़कीले हैं. बल्कि वे कहीं ज्यादा टिकाऊ और वास्तविक हैं, और यही चीज उन्हें सबका चहेता बना देती है’ एयरसेल की शालिनी सेठी बताती हैं, ‘धोनी को चुनने की वजह यह थी कि वे भी हमारी तरह सरल, रचनात्मक और विश्वसनीय हैं. वे बड़े पैमाने पर लोगों को आकर्षित करते हैं. बच्चों से लेकर बूढ़े तक उन्हें पसंद करते हैं.’ केशवन धोनी की लोकप्रियता से जुड़े भाषागत पहलू की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘लोग धोनी के उदय को गलत ढंग से ले रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि उनकी लोकप्रियता के पीछे उनकी क्षेत्रीय पृष्ठभूमि की कोई भूमिका है. सहवाग और युवराज भी इसी तरह की पृष्ठभूमि से आते हैं. उन्हें इन सबसे अलग खड़ा करती है उनकी क्षेत्रीय लहजे से मुक्त स्पष्ट अंग्रेजी. वे अपनी क्षेत्रीय छवि को पीछे छोड़ कर एक महानगरीय चोला धारण कर चुके हैं. उनकी यह खासियत उस मध्यवर्ग को लुभाती है जो या तो अंग्रेजी बोलता है या फिर बोलने की इच्छा रखता है.’

पीढियों के बदलाव ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है. अकेले धोनी ही तेंदुलकर, कुंबले, द्रविड़ और गांगुली द्वारा खाली की गई जगह को भर पाने में सक्षम साबित हुए हैं. और इस वक्त वे अपनी किस्मत को भुना रहे हैं- सीमेंट से लेकर पेन तक, मोटरसाइकल से लेकर चिप्स तक और शीतल पेय से लेकर जूते तक हर जगह धोनी ही अपनी अजीब सादी सी मुस्कान बिखेरते नजर आ रहे हैं.

ब्रांड विशेषज्ञ ऊंचे और छोटे ब्रांड के बीच भेदभाव न करने की उनकी आदत से चिंतित नजर आते हैं. एड गुरू प्रहलाद कक्कड़ कहते हैं, ‘कुछ ही ब्रांड ऐसे हैं जो उनके व्यक्तित्व से मेल खाते हैं. यही वजह है कि वे जिन ब्रांड्स का प्रचार करते हैं वे ज्यादा दिनों तक लोगों को याद नहीं रहते.’ तमाम सवालों का शायद यही सबसे सरल और सटीक जवाब है- एक खिलाड़ी के तौर पर धोनी सिर्फ अपने लिए खेलते हैं.’

आम-सी एक खास अदाकारा

फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद कोंकणा सेन शर्मा सिनेमा में करिअर बनाने को लेकर खास उत्साहित नहीं थीं. मगर फिल्मोद्योग में अनमनी-सी दाखिल होने वाली इस अभिनेत्री ने अब इस दुनिया में अपनी एक अलग ही लीक बना ली है. तृषा गुप्ता का आलेख

‘फिल्मों में आ जाने के बाद भी मैं सोचा करती थी कि मुझे एक ढंग की नौकरी करनी है. मैं क्लासीफाइड्स देखती रहती. फिर मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. उसके बाद ये सब छोड़कर जाना उतना आसान नहीं था’कुछ ही दिन पहले की बात है. दिन के तीन बजे के करीब का वक्त रहा होगा. कोलकाता की लिटिल रसेल स्ट्रीट से गुजरते कई लोग न्यू केलिनवर्थ होटल के बाहर खड़ी एक महिला को देखकर पहले तो चौंकते और फिर उसे गौर से देखने लगते. उस महिला का पहनावा उस जगह और वक्त से मेल नहीं खा रहा था. लाल रंग की रेशमी साड़ी, गहरा मेकअप और भारी जूड़ा सत्तर के दशक की किसी नायिका जैसी लगती यह महिला थी हिंदी सिनेमा में आम लड़की के खास किरदारों का पर्याय बन चुकीं कोंकणा सेन शर्मा. दरअसल कोंकणा की मां और जानी-मानी फिल्मकार अपर्णा सेन यहां पर अपनी नई फिल्म इति मृणालिनी की शूटिंग कर रही थीं और कोंकणा का यह रूप इसी फिल्म का एक हिस्सा था. आमतौर पर ढीले-ढाले कुरते और जींस में ज्यादा सहज रहने वाली कोंकणा को कभी भारी-भरकम पहनावा बिल्कुल नहीं भाता था, मगर फिल्मों में आने के बाद ऐसी कई चीजें अब उनकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं.

2001 में बंगाली फिल्म एक जे आछे कन्या से अपनी चित्रपट यात्रा की शुरूआत करने वाली कोंकणा अपने अभिनय के लिए अब तक कई पुरस्कार बटोर चुकी हैं. मगर अभिनय को लेकर वे हमेशा से इतनी सहज नहीं थीं. जैसा कि वे बताती हैं, ‘शुरूआती दिनों में मैं बहुत सोचा करती थी कि यह क्यों पहन रही हूं या फिर ऐसा क्यूं कह रही हूं..मुझे इस पूरे तामझम से बड़ी शर्मिंदगी होती थी.’ मगर 25 फिल्मों के बाद आज कोंकणा बदल चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘अगर मुझे कुछ करना है तो मैं कर देती हूं. मैं खुद को काम से अलग करके रखती हूं जो कि काम को करने का ज्यादा रचनात्मक दृष्टिकोण है.’ कोंकणा एक ऐसी मां की बेटी हैं जो मशहूर अभिनेत्री भी हैं और चर्चित फिल्म निर्देशिका भी. घर में हमेशा से फिल्मी माहौल रहा शायद इसलिए दूसरों की तरह उन्हें यह दुनिया ग्लैमरस नहीं लगती थी. इसे करीब से देखते हुए उन्होंने पाया कि यहां काम करने का मतलब है कड़ी मेहनत, वक्त का कोई ठिकाना न होना और कुछ हद तक अनिश्चितता भी. मगर इसके साथ ही फिल्मों को लेकर उनमें एक आकर्षण भी हमेशा मौजूद रहा. 

1983 में बनी एक बंगाली फिल्म इंदिरा में कोंकणा ने एक छोटे-से लड़के की भूमिका निभाई. तब वे चार साल की थीं. इसके बाद 1989 में अपर्णा ने उन्हें अपनी फिल्म पिकनिक में एक भूमिका दी. जैसा कि अपर्णा याद करती हैं, ‘वह इतनी सहज थी कि शबाना आजमी ने कहा, अगर तुम्हें लगता है कि वह अभिनेत्री के अलावा कुछ और बनेगी तो फिर से सोचना.’ 15 साल की उम्र में कोंकणा ने फिल्म आमोदिनी में एक किशोर सौतेली मां की भूमिका निभाई. 1994 में आई इस फिल्म का निर्देशन किया था उनके दादा चिदानंद दासगुप्त ने जो फिल्म आलोचक और सत्यजीत रे के अच्छे मित्र थे. मगर जितना ही अपर्णा उन्हें कहतीं कि वे अभिनय के बारे में गंभीरता से सोचें, कोंकणा उतना ही इसका विरोध करतीं. हंसते हुए वे बताती हैं, ‘जब मां और सबने कहा कि मैं अच्छी अभिनेत्री हूं तो मुझे लगा कि सब ऐसे ही कह रहे हैं. वैसे भी मेरी ये आदत रही है कि मैं वह नहीं करती जो लोग मुझसे करने को कहते हैं.’ अभिनय मजेदार अनुभव हो सकता है इसका अहसास कोंकणा को पहली बार तब हुआ जब उन्होंने बीए में दिल्ली स्थित सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाखिला लिया. वे बताती हैं कि यहां उन्होंने कई नाटकों में हिस्सा लिया और उन्हें इसमें खूब मजा आया.

अपर्णा ने जब कोंकणा से कहा कि ‘तुम ये मोजे अपनी सहेली को ही क्यों नहीं दे देतीं’, तो कोंकणा का जवाब था, ‘अगर मैं ऐसा करूंगी तो उसे पता चल जाएगा कि मैं नाराज हूं. दोस्त ज्यादा जरूरी हैं या मोजे?’फिर एक दिन फिल्मकार सुब्रतो सेन ने उन्हें अपनी फिल्म एक जे आछे कन्या में काम करने का ऑफर दिया. इसमें उन्हें मानसिक रूप से असंतुलित एक लड़की की भूमिका करनी थी. कोंकणा कहती हैं, ‘मैंने यह फिल्म मजाक-मजाक में कर ली. मैंने कभी नहीं सोचा था कि इसका मेरी जिंदगी पर ऐसा असर पड़ेगा. मैंने इतनी दूर की नहीं सोची थी. मैं अब भी दूर की नहीं सोचती.’ इस फिल्म की पूरी शूटिंग कोंकणा ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान की. ऐसा करना संयोग से ज्यादा मजबूरी थी क्योंकि उनके ही शब्दों में ‘सेंट स्टीफेंस में उपस्थिति के मामले में बड़ी सख्ती रहती है.’ इसके बाद वे फिर से कॉलेज लौट गईं. इस दौरान फिल्म हिट हो गई और परिवार के करीबी मित्र रिततुपर्णो घोष, जो कि काफी समय से कोंकणा के साथ फिल्म बनाने की सोच रहे थे, ने उन्हें लेकर फिल्म तितली बनाने का फैसला किया. कोंकणा बताती हैं, ‘कई मायनों में यह अनुभव घर जैसा ही था. रितु मामा निर्देशक थे और इसमें मां भी एक्टिंग कर रहीं थीं. फिल्म बनाने से ज्यादा ये पिकनिक मनाने जैसा था.’

लेकिन कोंकणा की जिंदगी का सबसे अहम मोड़ साबित हुई 2002 में आई मिस्टर एंड मिसेज अय्यर जिसका निर्देशन उनकी मां ने ही किया था. अपर्णा द्वारा ही लिखी गई इस फिल्म का मुख्य चरित्र एक तमिल गृहिणी थी जिसके पूर्वाग्रहों और मानवता में सांप्रदायिक दंगों के दौरान टकराव होता है. शुरूआत में कोंकणा इस फिल्म में काम नहीं करना चाहतीं थीं. उन्होंने अपनी मां से कहा कि उन्हें इस फिल्म में किसी दक्षिण भारतीय लड़की को ही लेना चाहिए. मगर अपर्णा फैसला कर चुकीं थीं. कोंकणा बताती हैं, ‘उन्होंने मुझे चेन्नई भेज दिया. मेरा काम एक रिसर्च असिस्टेंट की तरह था. मुङो कुछ डॉयलॉग्स का अनुवाद करवाना था और पहनावे का अध्ययन करना था.’ कोंकणा चेन्नई से लौटीं तो पूरी तरह से किरदार में डूबी हुईं थीं. इसके बाद उन्होंने शूटिंग का पूरी तरह से आनंद लिया. मगर अब भी पूरी तरह से निश्चित नहीं थीं कि उन्हें फिल्मों में ही करिअर बनाना है. वे कहती हैं, ‘फिल्मों में आ जाने के बाद भी मैं सोचा करती थी कि मुझे एक ढंग की नौकरी करनी है. मैं क्लासीफाइड्स देखती रहती. फिर मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. उसके बाद ये सब छोड़कर जाना उतना आसान नहीं था. मुझे अमू, पेज थ्री जैसे ऑफर्स मिल रहे थे और मेरी ऐसी कोई दूसरी महत्वाकांक्षा भी नहीं थी. देखा जाए तो मुझे पता ही नहीं था कि मैं कुछ और करूंगी भी तो कैसे करूंगी.’ अब कोंकणा अभिनय क्षेत्र की शुक्रगुजार हैं कि इसकी वजह से उनकी जिंदगी को एक मकसद मिला. मगर वे सावधान भी रहती हैं कि कहीं यह उनकी असली पहचान को ही न ढक ले. वे कहती हैं, ‘यह बहुत उबाऊ भी हो सकता है. आप एक जीता-जागता पुतला होते हैं. कोई दूसरा आपको बताता है कि आपको क्या बोलना है, पहनना है, करना है.’

फिर भी कोंकणा को फिल्में अपनी तरफ खींचती हैं. एक बार उन्हें न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के एक फिल्म स्टडीज प्रोग्राम के लिए चुन लिया गया था. वे कहती हैं, ‘मगर मुङो स्कॉलरशिप नहीं मिली और यह बहुत महंगा था.’ 2005 में उन्होंने एक लघुफिल्म का निर्देशन किया. नामकोरोन नाम की यह फिल्म कोलकाता के दो जेबकतरों की जिंदगी पर थी.  क्या आगे चलकर वे निर्देशक बनना चाहती हैं? जवाब आता है, ‘यह कहना तो ऐसा ही होगा जसे मैं कहूं कि मैं एक उपन्यासकार बनना चाहती हूं. मगर ये इस तरह से नहीं होता. अगर ये होना होगा तो हो ही जाएगा.’ यानी फिलहाल इस काम में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं. मगर यह देखना उन्हें जरूर दिलचस्प लगता है कि किस तरह अभिनय आपके शरीर और खुद के साथ आपका संबंध बदल देता है.

पद्मिनी रे मरे कोंकणा की बचपन की दोस्त हैं. वे उन्हें बिखरे बालों वाली एक ऐसी शर्मीली लड़की के तौर पर याद करती हैं जिसकी बड़ी और भूरी आंखों से जिज्ञासा और मासूमियत झांकती थी. जब एक बार उनसे मजाक में कहा गया कि पद्मिनी के डॉक्टर पिता ऑपरेशन करके लोगों का दिल निकाल देते हैं तो तब 11 साल की कोंकणा की प्रतिक्रिया यूं थी, ‘अगर वे दिल निकाल देते हैं तो क्या उसके बाद भी वे लोग दूसरों को प्यार कर सकते हैं?’ पद्मिनी के मुताबिक कोंकणा में बचपना काफी समय तक रहा और झिझक के कारण वे अपनी कोमल भावनाओं को लंबे समय तक दिल में ही रखे रहीं. वे कहती हैं, ‘बचपना कोंकणा में अब भी है. वे अभी भी किसी बच्चे की तरह हैरान होती हैं. मगर साथ-ही-साथ उनमें एक खास समझदारी भी है.’ अपर्णा याद करती हैं कि किस तरह सात साल की उम्र में उनकी बेटी एक सहेली की शिकायत किया करती थी जो उसके पसंदीदा मोजे मांग लेती और उन्हें गंदा कर देती. अपर्णा ने जब कोंकणा से कहा कि ‘तुम ये मोजे अपनी सहेली को ही क्यों नहीं दे देतीं’, तो कोंकणा का जवाब था, ‘अगर मैं ऐसा करूंगी तो उसे पता चल जाएगा कि मैं नाराज हूं. दोस्त ज्यादा जरूरी हैं या मोजे?’ आज 29 की उम्र में भी कोंकणा को पहले की तरह ही पता है कि उनके लिए सबसे ज्यादा अहम वे लोग हैं जो उनकी जिंदगी में हैं. इनमें से एक हैं उनकी मां जिनका उन पर काफी असर है और जिन्होंने पसोपेश में पड़ी अपनी बेटी को अक्सर दिशा दी. विज्ञान लेखक और पत्रकार उनके पिता मुकुल शर्मा के साथ उनका बचपन खेल, गिटार और यात्राओं के बीच काफी मजे में बीता. उनकी बड़ी बहन कमलिनी उनसे आठ साल बड़ी हैं और उनके लिए दूसरी मां जैसी भी. खासकर तब से जब से मुकुल और अपर्णा अलग-अलग हो गए. कोंकणा तब सिर्फ सात साल की थीं. वे कहती हैं, ‘ साथ रहते हुए नाखुश रहने से अच्छा है कि वे अलग रहते हुए खुश हैं.’ अपने सौतेले पिता और अमेरिका में अंग्रेजी के प्रोफेसर कल्याण रे से भी उनकी अपने पिता जैसी ही पटती है. वे कहती हैं, ‘मेरे लिए जिंदगी का मतलब है साझा अनुभव.’ कुल मिलाकर कोंकणा एक अजीब सा मिश्रण हैं. उनमें साफगोई है मगर आक्रामकता नहीं. अपर्णा कहती हैं, ‘यहां तक कि वे अगर बहुत गंभीर किरदार को निभा रही हों तो भी वे बहुत ज्यादा संजीदा नहीं होतीं. उनके अभिनय में  दिखावा नहीं है.’

अपनी आम छवि के उलट कोंकणा कभी-कभार ही गंभीर होती हैं. पेज थ्री, लाइफ इन अ मेट्रो और वेकअप सिड जैसी फिल्मों में लगातार उन्हें बड़े शहर में अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्ष कर रही छोटे शहर की लड़की के तौर पर दिखाया गया है. सुब्रतो सेन कहते हैं, ‘उन्हें आम लड़की की भूमिकाएं ही मिली हैं मगर मुझे लगता है कि वे ग्लैमरस भूमिकाओं में भी उतनी ही जंचेंगी.’ कोंकणा भी कहती हैं, ‘लगातार गंभीर किरदार करना थोड़ा उबाऊ हो गया है. मैंने दूसरी तरह की भी भूमिकाएं कीं जैसे कि मिक्स्ड डबल्स या दोसार में, मगर उनकी ज्यादा चर्चा ही नहीं हुई.’ हालांकि वे खुद भी मानती हैं कि उन्हें सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं अपनी मां की फिल्मों में ही मिली हैं, पहले मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, फिर 15 पार्क एवेन्यू और अब इति मृणालिनी जिसमें उन्होंने 70 के दशक की एक बंगाली अभिनेत्री की भूमिका निभाई है. कोंकणा बताती हैं, ‘मृणालिनी की भूमिका चुनौती है क्योंकि मैं ऐसे किरदारों से बचती रही हूं जो शर्मीले, असहाय या फिर सीधे होते हैं. ये भावनाएं मेरे लिए अजनबी हैं.’

कोंकणा का दोटूकपन मुंबई जैसी जगह में पचाना मुश्किल है जहां आपको बहुत कुछ ओढ़कर चलना पड़ता है. मगर लगता है कि वे मुंबई की अपनी नई दुनिया में अच्छी तरह से रम गई हैं. अपने ब्वॉयफ्रेंड रणवीर शौरी के साथ मिलकर उन्होंने गोरेगांव में एक फ्लैट लिया है. वे दोनों अपने खाली समय में अपनी मनपसंद फिल्में देखते हैं या फिर दोस्तों के साथ घूमते-फिरते हैं. कोंकणा बताती हैं, ‘इंडस्ट्री में मेरे चंद ही दोस्त हैं, संध्या मृदुल, तारा शर्मा, रजत कपूर, विनय पाठक और उनका गैंग.  वैसे भी मुझे जगहों की याद नहीं आती. मैं जहां भी रहती हूं वही जगह मेरे लिए कोलकाता हो जाती है.’ बात सही है. कोंकणा कहीं भी हों कोलकाता उनके साथ रहता है. चाहे वह वहां के विवेकानंद पार्क से खरीदा गया फुचका मसाला हो या फिर मधुबन पान मसाला जिसके बिना वे नहीं रह सकतीं.’

‘हम पांडव हैं और वे कौरव’

मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी बिना झिझक, गर्व के साथ खुद को देश का दूसरा सर्वाधिक वांछित व्यक्ति बताते हैं. सीपीआई (माओवादी) की पोलित ब्यूरो के इस 53 वर्षीय सदस्य की तुषा मित्तल के साथ फोन पर हुई बातचीत के मुख्य अंश: 

सबसे पहले अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ बताइए. सीपीआई (माओवादी) से जुड़ने का ख्याल कैसे आया?

मैं करीमनगर के पेड्डापल्ली गांव में पैदा हुआ. मेरा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, पर हमारे परिवार ने कभी जाति को तवज्जो नहीं दी. मेरे पिता आंध्र प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे. मैंने गणित में बीएससी की और उसके बाद 1983 में लॉ की पढ़ाई के लिए हैदराबाद आ गया. यहां मैं तेलंगाना संघर्ष समिति से जुड़ गया. बाद में यहीं रैडिकल स्टूडेंट्स यूनियन की नींव रखी. इसके पहले इमरजेंसी में मैंने भूमिगत रहते हुए इसके खिलाफ अभियान चलाया था. मेरे ऊपर कई चीजों का प्रभाव रहा: लेखक वारवरा राव, देश की राजनीतिक दशा और जिस तरह के प्रगतिशील माहौल में पला-बढ़ा. मेरे पिता एक स्वतंत्रता सेनानी और लोकतंत्र में अगाध श्रद्धा रखने वाले व्यक्ति थे. जब मैंने सीपीआई (एमएल) की सदस्यता ग्रहण की तो मेरे पिताजी ने यह कहते हुए कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी कि एक छत के नीचे दो तरह की राजनीति नहीं चल सकती. 1977  में आपातकाल खत्म होने के बाद मैंने एक देशव्यापी आंदोलन की अगुवाई की जिसमें देश भर से करीब 60,000 किसानों ने हिस्सा लिया था.

किसी भी राजनीतिक पार्टी का नेता अपने अध्यक्ष के खिलाफ आवाज उठा सकता है? औपचारिक और वास्तविक लोकतंत्र के बीच गहरी खाई है 

गृहमंत्री अब सीपीआई (माओवादी) से कई मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं. आप उनका प्रस्ताव क्यों ठुकरा रहे हैं? वे आपसे सिर्फ हिंसा न करने के लिए ही तो कह रहे हैं.

अगर सरकार सुरक्षा बलों को वापस बुला लेती है तो हम बात करने के लिए तैयार हैं. हिंसा हमारे एजेंडे में नहीं है. हम सिर्फ जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. पिछले महीने बस्तर में कोबरा फोर्स ने 12 माओवादियों के साथ 18 निर्दोष ग्रामीणों को मार दिया. छत्तीसगढ़ में उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया जो विकास कार्यों के जरिए हमारी मदद कर रहे थे. हाल ही में छत्तीसगढ़ के डीजीपी ने सलवा जुडूम के 6000 विशेष पुलिस अधिकारियों को गौरव का प्रतीक बताया. नई भर्तियां चालू हैं. ये लोग सालों से हत्या, बलात्कार और लूटपाट करते आ रहे हैं. हम सरकार के वादे पर भरोसा नहीं कर सकते. वह अपनी नीतियों को कैसे बदलेगी जब उसके हाथ में ही कुछ नहीं है? यह तो विश्व बैंक और अमेरिका के हाथों में है.

हिंसा रोकने के लिए आपकी क्या शर्तें होंगी?

प्रधानमंत्री वनवासियों से माफी मांगें, सुरक्षा बलों को हटाएं, जेल में बंद कैदियों को रिहा किया जाय. सुरक्षा बलों को हटाने के लिए जरूरी समय लीजिए लेकिन यह सुनिश्चित कीजिए कि पुलिस अब कोई हमला नहीं करेगी. अगर सरकार इसपर राजी है तो हम हिंसा रोक देंगे. हम पहले की तरह गांवों में अपना आंदोलन चलाएंगे.

क्या आप भी यह वादा कर सकते हैं कि एक महीने तक कोई हमला नहीं करेंगे?

हम विचार करेंगे. मुझे अपने महासचिव से बात करनी होगी. पर इस बात की क्या गारंटी है कि अगले एक महीने पुलिस भी हमला नहीं करेगी? पहले सरकार को इसकी घोषणा करने और सुरक्षा बलों को हटाने दीजिए, सिर्फ दिखाने से भी काम नहीं चलेगा. आंध्र प्रदेश में क्या हुआ, हमारी केंद्रीय समिति के सदस्य राज्य के मुख्य सचिव से बात करने गए थे. उन्हें गोली मार दी गई.

अगर आप जनहित की बात करते हैं तो हथियार क्यों उठा रखे हैं? आपका लक्ष्य आदिवासी हित है या राजनीतिक ताकत?

राजनीतिक ताकत. आदिवासी हित हमारा लक्ष्य है पर राजनीतिक ताकत के बिना यह संभव नहीं. हथियार के बिना सत्ता नहीं मिलती. आदिवासियों का शोषण इसीलिए हुआ क्योंकि उनके पास राजनीतिक ताकत नहीं थी. अपनी ही संपदा पर उनका अधिकार जाता रहा. पर हथियार हमारी विचारधारा नहीं है. हम उसे दूसरे स्थान पर रखते हैं. इसकी वजह से हम आंध्र प्रदेश में नुकसान भी उठा चुके हैं.

सरकार कह रही है पहले हिंसा रोको. आप कह रहे हैं पहले पुलिस हटाओ. इन सबके बीच पिस रहा है वह वनवासी जिसके हित का आप दावा कर रहे हैं.

हमने वाममोर्चे के घटक दलों- फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी, सीपीआई- के दरवाजे खड़काए हैं. मैं तो बंगाल सरकार के कई मंत्रियों तक के संपर्क में हूं. मैंने मुख्यमंत्री से भी बात की है

तो फिर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों को बुला लीजिए. हमने कहीं हिंसा नहीं शुरू की. आंध्र प्रदेश हो या पश्चिम बंगाल या उड़ीसा, हमने कहीं हिंसा शुरू नहीं की. बंगाल में सीपीएम ने सबको गांवों में घुसने से रोक दिया था. जब बंगाल में न्यूनतम मजदूरी 85 रूपए थी तब उन्हें 22 रुपए दिए जा रहे थे. हम सिर्फ 25 रुपए मांग रहे थे. कौरवों ने पांडवों को पांच गांव भी देने से इनकार कर दिया था इसीलिए महाभारत हुआ. हम पांडव हैं और वे कौरव हैं.

आप अहिंसक होने की बात कर रहे हैं और आपके अभियानों में पिछले चार साल के दौरान 900 से ज्यादा पुलिस वाले मारे जा चुके हैं. इनमें से कई गरीब आदीवासी भी हैं. यह कैसा जनहित है?

हमारी लड़ाई व्यवस्था से है. हम पुलिस वालों की हत्याएं कम करना चाहते हैं. पिछले 28 सालों के सीपीएमराज में 51,000 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है. हां पिछले सात महीनों में हमने भी सीपीएम के 52 लोगों को मारा है लेकिन यह सिर्फ बदले की कार्रवाई है.

सीपीआई (माओवादी) को धन कहां से मिलता है? आपपर जबरन वसूली के आरोप भी लगते हैं?

कोई जबरन वसूली नहीं होती. हम बड़े औद्योगिक घरानों और बुर्जुआओं से कर लेते हैं लेकिन यह राजनीतिक पार्टियों द्वारा वसूले जाने वाले चंदे के जैसा ही है. ग्रामीण भी साल में दो दिन की अपनी कमाई स्वेच्छा से हमें दान देते हैं. इस साल गढ़चिरौली में बांस की कटाई के दो दिनों से हमें 25 लाख रुपए मिले. बस्तर में तेंदू पत्तों से 35 लाख. बाकी जगहों पर किसानों ने हमें करीब 1000 कुंतल के करीब धान का दान दिया. एक-एक पैसे का हर छह महीने में ऑडिट होता है.

किसानों ने कभी इनकार किया?

नहीं. वे हमारे साथ हैं. हम ग्रामीणों के विकास के लिए जो करते हैं उसके एवज में एक पैसा भी नहीं लेते.

आपने किस तरह के विकास कार्य किए हैं? इससे  आदिवासियों के जीवन में क्या सुधार आया है?

हम उन्हें राज्य और अमीरों का असली चेहरा दिखाते हैं. वे पहले एक रुपए में 1000 तेंदू पत्ते बेचते थे हमने इन्हें कई जगह 50 पैसा प्रति पत्ता करवा दिया है. कागज मिलों में 50 पैसा प्रति बंडल के हिसाब से बांस बिकता था हमने इसे 55 रुपए प्रति बंडल करवाया. सीपीआई (माओवादी) हर दिन देश के 1,200 गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाती है. अकेले बस्तर जिले में इस तरह के करीब 50 मोबाइल स्वास्थ्य दल और 100 के लगभग मोबाइल अस्पताल हैं. हम लोगों को मुफ्त दवाएं मुहैया कराते हैं. सरकार को तो पता भी नहीं कि ये दवाएं उसी की हैं.

अगर नक्सली इलाकों में सरकार अपना दल भेजती है तो आप आने देंगे?

हम इसका स्वागत करेंगे. छात्र और डॉक्टर यहां आ सकते हैं. लालगढ़ के लोग एक दशक से अस्पताल की मांग कर रहे थे, पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. जब लोगों ने अपने पैसे से अस्पताल बना लिया तो सरकार ने उसे सेना की छावनी बना दिया.

आपकी दीर्घकालिक योजनाएं क्या हैं? तीन मुख्य लक्ष्य बताइए.

राजनीतिक ताकत हासिल करके एक नया लोकतंत्र फिर समाजवाद और साम्यवाद स्थापित करना. दूसरा, अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना ताकि हमें साम्राज्यवादियों से कर्ज लेने की जरूरत न पड़े. हम आज भी दशकों पुराने कर्ज चुका रहे हैं. हमें ऐसी अर्थव्यवस्था की जरूरत है जो कृषि और उद्योग पर आधारित हो. आदिवासियों का उनकी जमीन पर अधिकार होना चाहिए. हम उद्योगों के विरोधी नहीं हैं, आखिर इसके बिना विकास कैसे होगा? पर हमें सोचना होगा कि भारत के लिए क्या ठीक रहेगा. बड़े-बड़े बांधों और उद्योगों की बजाय हमें छोटे-छोटे उद्योग लगाने होंगे. तीसरा लक्ष्य है देश में मौजूद तमाम बड़े औद्योगिक समूहों- टाटा से लेकर अंबानी तक- की संपत्ति जब्त करके उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना और उनके मालिकों को जेल में डालना.

लेकिन दुनिया भर में कम्युनिस्ट सरकारों का इतिहास देखें तो वे दमन का ही प्रतीक दिखती हैं. माओवादी राज्य-व्यवस्थाओं में असहमति की कोई जगह नहीं होती. ये जनता के हित में कैसे हैं?

ये कहानियां पूंजीवादियों की फैलाई हैं. गांवो में सैकड़ों लोग मर रहे हैं, लेकिन डॉक्टर शहरों में रहना चाहते हैं, इंजीनियर जापान में काम करना चाहते हैं. वे देश के संसाधनों से वहां तक पहुंचे हैं मगर देश के लिए क्या कर रहे हैं? राज्य आपको डॉक्टर बनने के लिए मजबूर नहीं करता लेकिन अगर आप बनते हैं तो आपको दो साल गांवों में काम करने के लिए मजबूर करने में कोई बुराई नहीं है. कोई राज्य कितना दमनकारी है यह इसपर निर्भर करता है कि सत्ता की कुंजी किसके पास है. हम लोकतांत्रिक संस्कृति चाहते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते तो ग्रामीण एक और क्रांति करके हमें उखाड़ फेंकें. बस्तर जिले में एक वैकल्पिक लोकतांत्रिक सरकार शैशवावस्था में है. चुनावों के जरिए हम स्थानीय सरकार बनाते हैं जिसे रिवॉल्यूशनरी पीपुल्स गवर्नमेंट  कहा जाता है. इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और कानून व्यवस्था से जुड़े पदाधिकारी होते हैं. यह व्यवस्था देश के 40 जिलों में काम कर रही है. यह धारणा बिल्कुल गलत है कि हम लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते. भारत में इस समय सिर्फ औपचारिक लोकतंत्र है. किसी भी राजनीतिक पार्टी का नेता अपने अध्यक्ष के खिलाफ आवाज उठा सकता है? औपचारिक और वास्तविक लोकतंत्र के बीच गहरी खाई है.

अगर आप लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं तो फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बहिष्कार क्यों करते हैं? नेपाल में तो माओवादियों ने चुनाव लड़ा

नया लोकतंत्र स्थापित करने के लिए पुराने को खत्म करना जरूरी है. नेपाल में माओवादियों ने राजनीतिक पार्टियों से समझौता कर लिया. आप किस लोकतंत्र की बात कर रही हैं. 180 सांसदों पर आपराधिक आरोप हैं, 310 सांसद करोड़पति हैं. आपको पता है अमेरिकी सेना ने उत्तर प्रदेश में एक छावनी में अभ्यास शुरू कर दिया है? वे खुलेआम कहते हैं हम जहां चाहे भारतीय सेना को ले जा सकते हैं. उन्हें ऐसा करने की छूट कौन दे रहा है? मैं तो नहीं दे रहा. मैं सच्चा देशभक्त हूं.

आप भारत को कैसा देखना चाहते हैं? कोई एक देश बताइए.

हमारा पहला रोल मॉडल था पेरिस. उसका विघटन हो गया. रूस भी ध्वस्त हो गया. इसके बाद चीन का उदय हुआ, लेकिन माओ के बाद वह भी भटक गया है. फिलहाल पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां असली ताकत जनता के पास हो. हर जगह मजदूर अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. फिलहाल तो कोई भी रोलमॉडल नहीं है.

जब साम्यवाद दुनिया-भर में कहीं नहीं चला तो फिर भारत में यह कैसे सफल होगा?

चीन भी यह मानता है कि माओ के सिद्धांत में त्रुटियां थीं. नेपाल में माओवादी विदेशी निवेश स्वीकार कर रहे हैं. नेपाली माओवादी गलत रास्ते पर जा रहे हैं, वे एक और बुद्धदेब बाबू बनने की राह पर हैं. जहां भी साम्यवाद ने पैर जमाया है पूंजीवाद ने उसे उखाड़ने की कोशिश की है. लेनिन, माओ, प्रचंड सबकी कुछ कमजोरियां हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लेनिन और स्तालिन ने आंतरिक लोकतंत्र को खत्म करके नौकरशाही को बढ़ावा दिया. उन्होंने जनता की हिस्सेदारी को नकारा. हमने उन गलतियों से सीख ली है. लेकिन पूंजीवाद को भी मुंह की खानी पड़ी है. आप कह सकती हैं कि पूंजीवाद सफल रहा है? साम्यवाद ही एकमात्र रास्ता है.

सत्ता में आने के बाद आप भी नेपाली माओवादियों या सीपीएम की तरह असफल साबित हो सकते हैं?

मैं लोगों से अपील करता हूं कि यदि हम बदल जाते हैं तो हमारे खिलाफ भी क्रांति करें. अगर शासक शोषक बन जाए तो जनता का अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए उठ खड़ा होना जरूरी होता है. उन्हें किसी के ऊपर अंध श्रद्धा रखने की जरूरत नहीं है.

क्या आप कभी द्वंद्व से गुजरे हैं? क्या राज्य पर दबाव बनाने के लिए हिंसा ही एकमात्र रास्ता है?

मुझे विश्वास है कि हम सही काम कर रहे हैं. हम एक लड़ाई लड़ रहे हैं. इस दौरान हमसे गलतियां भी हो सकती हैं. लेकिन राज्य के उलट हम इसे स्वीकार करते हैं. फ्रांसिस इंदूवर का सर काटना गलती थी. हम इसके लिए माफी मांगते हैं. लालगढ़ में हम अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. हमने सरकार से पूर्ण विकास की मांग की है और उन्हें 27 नवंबर की समय सीमा दी है. हमने उनसे 300 बोरवेल और 50 अस्थायी अस्पताल की मांग की है. अगर सरकार ने इन्हें पूरा कर दिया तब हम उनसे कुछ और मांग करेंगे. हमने वाममोर्चे के घटक दलों- फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी, सीपीआई- के दरवाजे खड़काए हैं. मैं तो बंगाल सरकार के कई मंत्रियों तक के संपर्क में हूं. मैंने मुख्यमंत्री से भी बात की है.

मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसका खंडन किया है.

मैंने मुख्यमंत्री से बात की है मैंने उनसे सरकारी दमन रोकने को कहा. उन्होंने कहा कि उनके ऊपर अपनी पार्टी और गृहमंत्री पी चिदंबरम का दबाव है.

पुलिस आप तक क्यों नहीं पहुंच पा रही है?

मैं देश में दूसरा सर्वाधिक वांछित व्यक्ति हूं. आठ राज्यों में दिन-रात मेरी तलाश हो रही है. आज कल बंगाल के 1600 गांवों में लोग रात को जागकर पहरा देते हैं ताकि पुलिस मुझे पकड़ नहीं सके. जहां मैं इस समय हूं वहां से डेढ़ किलोमीटर दूर पुलिस की छावनी है जहां 500 पुलिस वाले रह रहे हैं. बंगाल के लोग मुझे प्यार करते हैं. मुझे पकड़ने से पहले उन्हें उनको मारना होगा.

गृहसचिव ने आरोप लगाया कि चीन आप लोगों को हथियार पहुंचा रहा है. यह बात सच है?

जीके पिल्लई को हमारे मूल दर्शन की जानकारी ही नहीं है. युद्ध जीतने के लिए अपने शत्रु की पूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है. हमारी स्थिति चीन से बिल्कुल भिन्न है. मैंने सोचा था कि चिदंबरम और पिल्लई मुझे कड़ी टक्कर देंगे, मगर यह नहीं पता था कि वे किसी लायक नहीं निकलेंगे. वे हवा में तलवारें भांज रहे हैं. जीत हमारी ही होगी.

लश्कर-ए-तैयबा के बारे में क्या सोचते हैं? आप उनकी लड़ाई का समर्थन करते हैं?

हम उनकी कुछ मांगों का समर्थन करते हैं लेकिन उनके तरीके गलत और जनविरोधी हैं. उन्हें अपनी आतंकी गतिविधियों को रोकना चाहिए क्योंकि इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है. आप सिर्फ जनता का दिल जीतकर ही सफल हो सकते हैं. 

‘मैं हीरो दिखता हूं, पर हीरो वाले रोल नहीं करना चाहता’

रोमांटिक दिखने के बावजूद नील नितिन मुकेश की रोमांटिक ब्वॉय वाली आम भूमिकाएं करने में दिलचस्पी नहीं.  उनके फिल्मी सफर को अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ मगर इस थोड़े-से समय में ही अलग-सी भूमिकाओं के बूते उन्होंने अपने कई प्रशंसक बना लिए हैं, बता रही हैं टिया तेजपाल  

नील के चतुर फैसले साफ इशारा करते हैं कि भविष्य के लिए उन्होंने क्या सोचा है. वे दावा करते हैं कि ‘मेथड एक्टिंग’ की कोशिश करने वाले वे भारत के अकेले अभिनेता हैंमशहूर गायक नितिन मुकेश के यहां जब बेटे का जन्म हुआ तो स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर उसे देखने गईं. बच्चे को देखते ही उनके मुंह से निकला, ‘अरे यह तो किसी अंग्रेज बच्चे जैसा दिखता है.’ नितिन अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्रांग के बहुत बड़े प्रशंसक थे. यह सुनते ही उन्होंने बेटे का नाम रख दिया, नील. 27 साल बाद आज नील नितिन मुकेश मनोरंजन के क्षेत्र में अपने परिवार की विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं. मगर उनका रास्ता गायन की बजाय अभिनय का है. पिछले ही दिनों उनकी नई फिल्म जेल रिलीज हुई है. जाने-माने फिल्मकार मधुर भंडारकर की यह फिल्म पिछले कुछ महीनों से लगातार सुर्खियों में रही है. रिलीज के बाद अच्छी समीक्षाओं ने फिल्म को और भी ज्यादा चर्चा में ला दिया है. भंडारकर के ऑफिस में पत्रकारों का जमावड़ा लगा हुआ है. एक सवाल उनसे बार-बार पूछा जाता है कि उन्होंने विषय के रूप में जेल क्यों चुना? और उनके जवाब का सार अक्सर यही होता है कि उन्हें इसमें एक मजबूत कहानी नजर आई. यही वजह है कि उन्होंने इस फिल्म की मुख्य भूमिका नील नितिन मुकेश को देने का फैसला किया. दरअसल अच्छी कहानियों के लिए जुनून ही 27 साल के इस अभिनेता को उन नए और चाकलेटी चेहरों से अलग करता है जिनकी इन दिनों मुंबई फिल्म उद्योग में भरमार है. ग्लैमर की बजाय नील कहानी के पीछे भागते हैं.

मुंबई में पेड़ों के झुरमुट से घिरे एक बंगले में पले-बढ़े नील की जिंदगी में शुरू से ही सिनेमा का दखल रहा. चार साल की उम्र में उन्होंने ऋषि कपूर और हेमामालिनी द्वारा अभिनीत फिल्म विजय में काम किया. अपने परिवार की विरासत के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, ‘मुझे गर्व है कि मैं मुकेश के नाम और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं. मैं अपनी फिल्मों में गाऊंगा भी. मगर अभिनय मेरे दिल के ज्यादा करीब है. दरअसल देखा जाए तो हमारे परिवार की विरासत मनोरंजन है सिर्फ गायन नहीं.’ अपनी मां के बारे में बात करते हुए नील की मुस्कान और भी गहरी हो जाती है. वे खुलकर उनके धीरज, सादगी और संतुलित व्यवहार की तारीफ करते हैं. स्कूल के बारे में बताते हुए नील कहते हैं कि उन्हें लड़कियों से लगाव जल्दी हो जाता था. वे कहते हैं, ‘मुझे पसंद था कि कोई मेरा दिल तोड़े.’ हालांकि कॉलेज जाने पर यह शगल बिल्कुल उल्टा हो गया. अपनी प्रभावी शख्सियत के चलते उनके लिए निश्चित रूप से यह मुश्किल काम नहीं था.

जेल की रिलीज के मौके पर उनकी तैयारी किसी निर्देशक का सपना है और किसी पत्रकार का दुस्वप्न. काले रंग की कमीज पहने नील जानते हैं कि इस मौके पर इकट्ठा मीडिया से उन्हें क्या बात करनी है. वे आते हैं, बैठते हैं और फिर मुस्कराते हैं. इससे पहले कि कोई कुछ पूछे वे बताना शुरू कर देते हैं कि जेल में ठूंस दिए गए बेगुनाह पराग दीक्षित का किरदार किस तरह उनके अब तक के करिअर का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार रहा है. फिर नील उन निर्देशकों के लिए अपने आदर की बात करते हैं जिनके साथ उन्होंने काम किया है. इनमें लगभग सभी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हैं. अलग किरदारों को जीवंत करने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने के लिए वे कबीर खान, मधुर भंडारकर, श्रीराम राघवन और रे आचार्य की तारीफ करते हैं. अचानक एक तेज घुरघुराहट की आवाज उनकी वाणी पर विराम लगा देती है. नील हैरत से चारों तरफ देखते हैं और पाते हैं कि बीमार चल रहे उनके बिजनेस मैनेजर सोफे पर बैठे-बैठे अचानक सो गए हैं. एक लड़के की तरफ देखकर वे चिल्लाते हैं, ‘चाय पिलाओ, दवाई खिलाओ.’ लड़का हड़बड़ाया-सा जाता है और चाय के साथ वापस आता है. इसके बाद नील फिर अपने कारोबार में लग जाते हैं.

जब हम जोर देकर उनसे पूछते हैं कि क्या नील में कोई खराबी भी है तो खान हंसते हुए शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘वे अपने बालों और मेकअप पर कुछ ज्यादा ही वक्त खर्च करते हैं.’

मगर सिनेमा में आने के उनके फैसले की वजह सिर्फ कारोबारी नहीं है. जैसा कि नील कहते हैं, ‘हर अभिनेता को अपनी कला पर ध्यान देना चाहिए, बजाय इसके कि पैसा आ रहा है या नहीं उसे यह सोचना चाहिए कि क्या उसने उस फिल्म के लिए अपना फर्ज ठीक से पूरा किया है.’ वे मानते हैं कि अभिनेता का काम है वह किरदार बन जाना जो उसे सौंपा गया है. नील कहते हैं, ‘तभी मैं एक बार में एक ही फिल्म करता हूं. मैं एक साथ तीन किरदार नहीं निभा सकता. इसका मतलब होगा कि मैं किसी पर भी ध्यान केंद्रित नहीं कर रहा.’ यानी वे हरमुमकिन कोशिश करते हैं कि भूमिका में पूरी तरह से डूब जाएं और जब कोई प्रशंसक उन्हें जॉनी, पराग या उमर कहकर पुकारता है तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है. नील ने लीक से अलग चलने की हिम्मत करके एक अलग पहचान बना ली है. जब उनसे पूछा जाता है कि जेल जैसी और फिल्में क्यों नहीं बन रही तो थोड़ा सोचने के बाद जवाब आता है, ‘मुझे लगता है कि बतौर समाज हम हकीकत को स्वीकारने से डरते हैं. हम असल दुनिया से बचने की कोशिश करते हैं. मगर मैं जानता हूं कि मुझे किस तरह का सिनेमा करना है.’ जेल में नील के साथी अभिनेता मनोज बाजपेयी, जो खुद भी लीक से अलग भूमिकाएं करने के लिए जाने जाते हैं, उनकी प्राथमिकताओं को लेकर आश्वस्त हैं. वे कहते हैं, ‘यह लड़का अपनी खासियत जानता है. उसे एक आम स्टार बनने का सपना नहीं पालना चाहिए. अगर वह ऐसा करे तो उसकी प्रतिभा के कई कद्रदान होंगे. वह अलग तरह की फिल्मों का स्टार होगा.’

नील के चतुर फैसले साफ इशारा करते हैं कि भविष्य के लिए उन्होंने क्या सोचा है. वे दावा करते हैं कि ‘मेथड एक्टिंग’ की कोशिश करने वाले वे भारत के अकेले अभिनेता हैं. जेल में अपनी भूमिका के लिए वे 50 दिन तक फिल्म के सेट पर ही रहे और इस दौरान उन्होंने दोस्तों और परिवारवालों से फोन पर भी बात नहीं की. साथ ही वे तभी प्रतिक्रिया देते थे जब कोई उन्हें उनके किरदार के नाम से यानी पराग दीक्षित कहकर बुलाए. फिल्म के विवादित न्यूड सीन के बारे में वे कहते हैं कि किरदार को जो यातना झेलनी पड़ती है उसकी गहराई दिखाने के लिए वह दृश्य जरूरी था.

फिल्म न्यूयॉर्क में नील को निर्देशित कर चुके कबीर खान उनकी काफी तारीफ करते हैं. जब हम जोर देकर उनसे पूछते हैं कि क्या नील में कोई खराबी भी है तो खान हंसते हुए शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘वे अपने बालों और मेकअप पर कुछ ज्यादा ही वक्त खर्च करते हैं.’ बाजपेयी से असहमति जताते हुए वे कहते हैं, ‘अब जबकि ड्रामा में नील अपनी प्रतिभा सिद्ध कर चुके हैं तो उन्हें दूसरी शैलियों में भी हाथ आजमाना चाहिए.’

बॉलीवुड में नील ने अपनी शुरूआत सही मायनों में श्रीराम राघवन की फिल्म जॉनी गद्दार से की जिसमें उन्होंने एक निर्मम हत्यारे का किरदार निभाया था. इसके बाद आई फिल्म आ देखें जरा में उनकी भूमिका एक ऐसे व्यक्ति की थी जिसके हाथ भविष्य दिखाने वाला एक कैमरा लग जाता है. फिर न्यूयॉर्क में वे एक जासूस बने. और अब जेल में एक बेगुनाह कैदी की भूमिका. नील ने अपने लिए जानबूझकर एक अलग राह चुनी है जिसमें उनकी अलग-सी खूबसूरती उनके आड़े नहीं आ रही. थोड़ा आगे झुकते हुए वे कहते हैं, ‘देखिए, अच्छा दिखने का फायदा है. मैं हीरो दिखता हूं, मगर हीरो वाले रोल नहीं करना चाहता.’ फिर पीछे की तरफ झुकते हुए वे कहते हैं, ‘यह अच्छा ही है. मुझे एक्टिंग करने दीजिए और लुक्स को मुझे स्टार बनाने दीजिए.’

पर्दे पर नजर आने वाले नील और असल जिंदगी के नील में साफ फर्क महसूस किया जा सकता है. उनकी बढ़िया हिंदी, सहज मुस्कान और गर्मजोशी भरी भाव-भंगिमाएं उन्हें स्क्रीन पर निभाए गए उनके किरदारों से काफी जुदा करती हैं. हालांकि यह गर्मजोशी और सहजता तब गायब हो जाती है जब वे दोटूक लहजे में कहते हैं कि उनसे उनकी गर्लफ्रेंड के बारे में सवाल न किया जाए.

रोमांटिक हीरो की तरह दिखने वाले नील जब अपनी पारी शुरू करना चाहते थे तो उन्हें कई रोमांटिक भूमिकाओं के प्रस्ताव मिले. मगर उन्होंने इन्हें खारिज कर दिया. उनका इरादा अटल था. वे अपनी शुरूआत अलग तरह की फिल्म से करना चाहते थे. जैसा कि नील कहते हैं, ‘लव स्टोरी किसी लव स्टोरी जैसी ही होनी चाहिए. ऐसी नहीं जिसमें लव थोड़ा-सा हो और स्टोरी बिल्कुल नहीं.’ उनकी अगली फिल्म यशराज बैनर के तले है जिसका निर्देशन प्रदीप सरकार कर रहे हैं. इसमें दीपिका पादुकोण भी हैं. नील कहते हैं, ‘अगर स्क्रिप्ट का कोई मतलब है तो मैं इसमें दिलचस्पी दिखाऊंगा. मैं उसी तरह का सिनेमा करूंगा जिसमें मेरा यकीन है.’

मधुर भंडारकर, नील को बेशकीमती रत्न और सही मायनों में निर्देशक का अभिनेता कहते हैं. उन्हें विश्वास है कि मुकेश खानदान का यह वारिस कम-से कम अगले 25 साल तक दर्शकों का मनोरंजन करेगा.

नील का नजरिया देखकर तो यही लगता है.

‘मुझे सिर्फ़ 72 घंटों का समय दें’

पिछले कुछ महीनों से सरकार की ओर से लगातार बयान आ रहे थे कि महाराष्ट्र चुनाव के बाद ऑपरेशन ग्रीन हंट ‘नक्सलवादियों के खिलाफ युद्ध’ शुरू किया जाएगा. पर आपके बातचीत के प्रस्ताव के बाद इनपर कुछ हद तक विराम लगा है. नक्सलवादियों के खिलाफ सरकार के पहले आक्रामक और फिर नरम रुख की क्या वजहें रहीं? और माओवादी हिंसा को खत्म करने का सबसे सही रास्ता क्या है?

मैंने गृह मंत्रालय में किसी भी दस्तावेज पर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ लिखा नहीं देखा. यह पूरी तरह से मीडिया की खोज है

युद्ध हर कोई पसंद करता है, खासतौर से मीडिया. आपको यह हर देश में देखने को मिलेगा चाहे वह अमेरिका में 9/11 के बाद हो या भारत में 26/11 के बाद. लेकिन आपको स्थिति की गंभीरता को कम नहीं करना चाहिए. इस समय सात राज्यों के कई जिले सीपीआई (माओवादी) के नियंत्रण में हैं और वहां के प्रशासन को उन्होंने पूरी तरह से ठप्प कर रखा है. तब भी सरकार ने ज्यादा कुछ कहने-सुनने की बजाय राज्य सरकारों से मश्विरा करके सिर्फ समस्या सुलझाने की दिशा में प्रयास किया. हमने ऐसा जनवरी में किया, फिर अगस्त में. हम इस नतीजे पर पहुंचे कि माओवादियों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई की जाए, हमने अपने इस फैसले को सार्वजनिक भी किया. केंद्र ने राज्यों में अर्धसैन्य बल भेजने, उन्हें इंटेलीजेंस सूचनाएं देने, प्रशिक्षण, उपकरण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी दिया. आप मेरा एक भी बयान बताइए जहां मैंने माओवादियों के खिलाफ ‘आक्रामक’ रुख अपनाया हो. मैं इस बात को नहीं मानता कि सरकार ने पहले भड़काऊ बयान दिए फिर नरम रवैया अपना लिया. जब हमने इस मसले पर मुख्यमंत्रियों से बात की तो इसे ‘आक्रामक रुख’ कहा गया और हमारे माओवादियों से बात करने की बात को नरमी कहा गया.

पहले माओवादियों से हथियार डालने को कहना और फिर केवल हिंसा छोड़ने को कहना क्या आपके रुख में एक बड़ी  तब्दीली नहीं है.

मैंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वे हथियार डाल दें. मुझे पता है वे ऐसा नहीं करेंगे, यह उनकी विचारधारा के खिलाफ है. दुर्भाग्य से हमारे मीडिया ने इस अंतर पर ध्यान नहीं दिया.

कई सरकारी अधिकारियों ने मीडिया में ऑपरेशन ग्रीन हंट की बात की थी, लेकिन आपने और गृह सचिव गोपाल पिल्लई ने इसपर हाल ही में बयान दिया कि यह सब मीडिया की उपज है. तो क्या अब हम मान लें कि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होने वाला? और यदि कुछ हो रहा है तो आने वाले महीनों में क्या होने वाला है?

ऑपरेशन ग्रीन हंट कुछ नहीं है. आप उस अधिकारी का नाम बताइए जो ऐसा कुछ है, मैं उसके खिलाफ कार्रवाई करूंगा. मैंने गृह मंत्रालय में किसी भी दस्तावेज पर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ लिखा नहीं देखा. यह पूरी तरह से मीडिया की खोज है. जहां तक आने वाले समय की बात है, जिन इलाकों में प्रशासन लगभग खत्म हो गया है उसे बहाल करने में, आपको पुलिस के  ज्यादा समन्वित प्रयास देखने को मिलेंगे. और इसके  लिए हम अर्धसैन्य बलों, खुफिया तंत्र और सूचनाओं के माध्यम से पुलिस की सहायता करेंगे.

लेकिन आपने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में एक बयान दिया था कि यदि जरूरत पड़ी तो आप सेना या राष्ट्रीय राइफल को भी बुला सकते हैं. आपने यह भी कहा था कि नागरिक समाज ‘आतंक का माहौल’ बनाने में सहयोग कर रहा है इसलिए अब उसे किसी एक को ‘चुनना’ चाहिए. व्यवस्था की जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ आवाज उठाना तो हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है, इसका मतलब यह तो नहीं कि वे माओवादी हिंसा का समर्थन कर रहे हैं. लोगों के ऐसे काले-सफेद आकलन का क्या मतलब? हमें दो शैतानों में से एक को क्यों चुनना चाहिए? आप लोकतांत्रिक स्वरों को अपराधी बनाकर उन्हें माओवादियों के साथ क्यों रखना चाहते हैं?

लेकिन कानून और प्रशासन राज्य का  विषय है. यदि मैं ज्यादा हस्तक्षेप करूंगा तो वे संविधान में राज्य के विषय वाली सूची मुझे थमा देंगे

मेरी बातों के गलत उल्लेख के लिए मैं आपको दोष नहीं देता. मैंने इनके साथ रहना सीख लिया है. आपने इंडियन एक्सप्रेस में दिए मेरे बयान से तीन चीजों का उल्लेख किया और तीनों ही गलत हैं. वहां मुझसे पूछा गया था कि क्या सेना बुलाई जाएगी?  मैंने कहा था नहीं, आंतरिक सुरक्षा से जुड़े अभियानों में सेना का उपयोग नहीं होगा लेकिन यदि जरूरी हुआ तो कुछ खास परिस्थितियों में सेना के कमांडो बुलाए जा सकते हैं. कमांडो को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए तैयार किया गया है और उनका उपयोग पूरी सावधानी से किया जाता है.

दूसरा उल्लेख आपने यह किया कि मैंने नागरिक समाज को दो (राज्य प्रायोजित हिंसा और माओवादी हिंसा) में से एक चुनने को कहा. आप मुझे बताएं कि ऐसा मैंने कहां कहा था. अपने बयान में मैंने माओवादियों के हिंसा के इतिहास और सशस्त्र संघर्ष से राज्य का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की उनकी नीति की ओर इशारा किया था. फिर मैंने यह कहा था कि हम लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा से बंधे हुए हैं. इसलिए नागरिक समाज को अब यह चुनना होगा कि वे सरकार के वर्तमान स्वरूप को चाहते हैं या एक सशस्त्र मुक्ति संघर्ष और फिर वंचितों की तानाशाही. आप इस कठोर चयन से मुंह नहीं मोड़ सकते. आप भारत के नागरिक हैं, यहां रह रहे हैं और आपको, मुझे और हर एक को इनमें में एक को रास्ता चुनना ही होगा. किशनजी, कोबाद गांधी और उनके जैसे दूसरों लोगों को इनमें से एक को चुनने का अधिकार है और वे तय कर चुके हैं. मैं भी अपना विकल्प चुन चुका है. भले ही इसमें कमियां हों लेकिन मैं एक लोकतांत्रिक गणतंत्र चाहता हूं. मैंने संविधान के तहत शपथ ली है. और अब सरकार के इस स्वरूप को बचाना मेरी जिम्मेदारी है जिसे मैंने, आपने और हमारी पिछली पीढ़ियों ने चाहे सही हो या गलत पर चुन लिया था. और यहां मैं बस यही कह रहा हूं कि दूसरों को भी इन विकल्पों में से एक को चुनना होगा. इसका मतलब दो तरह की हिंसा में से किसी एक को चुनना नहीं है. तो जब आप मेरे उस बयान के बारे में कहती हैं जहां मैं एक विकल्प चुनने की बात करता हूं तो आपको इसका संदर्भ भी बताना चाहिए कि मैंने किन चीजों में से चुनने की बात की थी.

ठीक बात है. लेकिन कुछ लोग तो माओवादियों को निशाना बनाने वाले अभियानों का विरोध करेंगे ही. हालांकि हमने एक प्रजातांत्रिक गणतंत्र में रहने का विकल्प चुना है लेकिन यह हमें इसकी खामियां बताने से नहीं रोकता. जब हम सरकार के दमन या निर्दोंषों को होने वाले नुकसान की ओर इशारा करते हैं तब आप गृहमंत्री होने के नाते न्याय के माहौल में बेहतरी लाने की कोशिश क्यों नही करते? क्या आप यह नहीं कह सकते कि पुलिस या अर्धसैन्य बलों की ज्यादतियों को सहन नहीं किया जाएगा?

मैं इस बात पर पूरी तरह सहमत हूं. हमारा लोकतंत्र खामियों से भरा है और ये दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं. हमें इस पर बहस करनी चाहिए और इसे सुधारने के लिए संघर्ष और पूरी कोशिश करनी चाहिए. चाहे यह प्रक्रिया कितनी ही धीमी क्यों न हों, इस दौरान हम कितने ही हताश क्यों न हों लेकिन सरकार के वर्तमान स्वरूप को खत्म न होने दें. एक ही दिन में व्यवस्था पूरी तरह से नहीं सुधारी जा सकती. संविधान में, अदालत, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति-जनजाति के आयोगों, सूचना आयोग और चुनाव आयोगों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे सरकार के कामकाज पर निगाह रखें. यदि ये संस्थाएं ठीक से काम करें तो हमारा तंत्र ठीक हो जाएगा. सबसे निराशाजनक बात यह है कि इनमें से कई संस्थाएं फैसले करने में हिचकती हैं या वे एक तरह से निष्क्रिय हैं. इससे हमारी व्यवस्था में खामियां बढ़ती हैं. कुछ निश्चित नियमों को लागू करना मेरे अधिकारक्षेत्र में आता है. उदाहरण के लिए, मैंने यह साफ-साफ कह रखा है कि राज्य या केंद्र स्तर पर पुलिस जिसे भी हिरासत में लेगी उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के  सामने पेश करना होगा. मैं फर्जी मुठभेड़ों के बिल्कुल खिलाफ हूं. पुलिस और अपराधियों की मुठभेड़ में लोग मर सकते हैं, लेकिन यदि आप किसी को हिरासत में लेते हैं तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए. मैं यह बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि जब से मैं गृहमंत्री बना हूं पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया कोई भी व्यक्ति मुठभेड़ में नहीं मारा गया.

यदि एसपीओ कानून का उल्लंघन करते हैं, जबर्दस्ती हिंसा करते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब एक चुनी हुई राज्य सरकार हो तो उन्हें कानून के पालन के प्रति रवैया बदलने को कहने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता

मैं आपको यह भी यकीन दिला सकता हूं कि कुछ नियमों का पालन अब विशेष रूप से सुनिश्चित किया जाता है. टॉर्चर चैंबर का ही मामला लें. मैंने इस बारे में गहन पड़ताल कराई है; इस समय देश की केंद्रीय एजेंसियों के नियंत्रण में एक भी टॉर्चर चैंबर नहीं है. यदि आपको भरोसा नहीं है तो आप मुझे ऐसे किसी भी चैंबर के बारे में बताएं, उसे भी समाप्त कर दिया जाएगा. इसी तरह से माओवादियों के मामले में हमारी समन्वित नीति के तहत मेरा निर्देश है जब तक हम पर गोली न चलाई जाए, हम गोली नहीं चलाएंगे और केवल खुफिया सूचनाओं के आधार पर ही अभियान चलाए जाएंगे. व्यापक स्तर पर तलाशी अभियान नहीं चलाए जाएंगे क्योंकि इससे स्थानीय आबादी हमारे खिलाफ हो जाती है. मुझे पंजाब का अनुभव है और इस तरह के खतरों के बारे में जानता हूं. मेरा कहने का मतलब है कि सरकार के हर अंग को अपनी जिम्मेदरी सही ढंग से निभानी चाहिए. यदि आपके जिले में एक सक्षम डिस्ट्रिक्ट जज है और वैसा ही मजबूत और निडर मजिस्ट्रेट है तो आपराधिक न्याय तंत्र में कहीं कुछ भी गलत नहीं हो सकता.

समस्या यही है कि बहुत-सी बातें यहां गलत हो रही हैं. मणिपुर में इसी साल अब तक 285 से ज्यादा फर्जी मुठभेड़ें हो चुकी हैं. तहलका ने भी जुलाई में एक स्तब्ध कर देने वाली मुठभेड़ की तस्वीरें छापी थीं. छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की हिंसा की आलोचना करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार सलवा जुडम के एसपीओ की कारगुजारियां उजागर करने की कोशिशें कर रहे हैं, वहां ये लोग आदिवासियों के घर जला रहे हैं, महिलाओं से बलात्कार कर रहे हैं. लोगों का सरकार पर से भरोसा उठ चुका है क्योंकि वहां आदिवासी एफआईआर भी दर्ज नहीं करा सकते. नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि नक्सलवादियों से शांतिवार्ता का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक न्यायतंत्र पर लोगों का भरोसा बहाल न किया जाए. क्या आप इस संकटग्रस्त इलाके को कोई संदेश नहीं दे सकते कि इस तरह की जबर्दस्ती स्वीकार नहीं की जाएगी? उन कुछ एसपीओ को गिरफ्तार कर लें जिनके खिलाफ शिकायतें मिली हैं..

मुझे खुशी है कि आपको लगता है कि मेरे पास इतनी ताकत है. लेकिन कानून और प्रशासन राज्य का  विषय है. आप जो भी कह रहीं हैं वह सब राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आता है. इसके लिए आपको उन प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और गृहमंत्रियों से बात करनी चाहिए. यदि मैं ज्यादा हस्तक्षेप करूंगा तो वे संविधान में राज्य के विषय वाली सूची मुझे थमा देंगे.

यह कहकर आप अपने को बचा रहे हैं?

नहीं, मैं कह रहा हूं कि आप यह सवाल संबंधित लोगों के सामने उठाइए. मैं जब गृहमंत्री बना था तो सबसे पहला मसला मेरे सामने सलवा जुडम का ही था और मैंने सार्वजनिक और निजी तौर पर मुख्यमंत्री से कह दिया था कि मैं इस बात के पक्ष में नहीं हूं कि राज्य में सरकार से बाहर के लोगों को इस तरह की जिम्मेदारी सौंपी जाए. यह पुलिस का काम है. वैसे जहां तक मेरी जानकारी है सलवा जुडम की गतिविधियां धीरे-धीरे न के बराबर हो गई हैं.

नहीं, एसपीओ के पास अभी भी बंदूकें हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि सलवा जुडम के कारण जिन गांवों को खाली कराया गया है वहां लोगों को दोबारा बसाया जाए, लेकिन एसपीओ ऐसा नहीं होने दे रहे हैं.

हो सकता है. लेकिन एसपीओ राज्य सरकार के अंतर्गत कार्य करते हैं. पंजाब में भी एसपीओ थे. एसपीओ कश्मीर में भी हैं. एक हिसाब से वे राज्य सरकार के कर्मचारी होते हैं. यदि एसपीओ कानून का उल्लंघन करते हैं, जबर्दस्ती हिंसा करते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब एक चुनी हुई राज्य सरकार हो तो उन्हें कानून के पालन के प्रति रवैया बदलने को कहने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता. निष्पक्षता और न्याय की जरूरत को पूरा करना राज्यों के मुख्यमंत्रियों का काम है.

आपने शांति वार्ता की जो बात की है वह उपदेशात्मक नहीं है. इसमें आपने सभी महत्वपूर्ण मसलों, जैसे भूमि अधिग्रहण, खनन, औद्यौगीकरण, वन अधिकार और स्थानीय प्रशासन को शामिल करने की बात की है. फिर भी ‘सिटीजेंस इनीशिएटिव फॉर पीस’ संगठन को लगता है कि आपको ऐसा कुछ करना चाहिए ताकि लोगों का न्याय व्यवस्था में भरोसा बहाल हो. उनका कहना है कि भले ही यह कितना ही सांकेतिक क्यों न हो आप नक्सल प्रभावित इलाकों में जनसुनवाइयां आयोजित क्यों नहीं करवाते?

यदि कोई नागरिक अधिकार संगठन या आदिवासियों के प्रतिनिधि इसे आयोजित कराते हैं तो मैं इसमें भाग लेने को तैयार हूं.

क्या मैं यह बात में ऑन रिकॉर्ड मानूं? हिमांशु कुमार का कहना है आपको माओवादियों से बात करने की तो जरूरत ही नहीं है, आप बस लोगों से सीधे बात करना शुरू कर दें, लोग अपने आप ही माओवादियों से दूर हो जाएंगे और उनका भारतीय गणतंत्र में भरोसा बहाल हो जाएगा. इन स्थानों पर गरीबी हटाने वाले कार्यक्रम तो हैं ही नहीं ऊपर से सरकार यहां अपने सबसे दमनकारी रूप में दिखती है.

मैं राज्य सरकारों से बात करूंगा. मैं वन अधिकारों, औद्योगीकरण, जमीन अधिग्रहण और विकास जैसे मुद्दों पर बातचीत में मदद  करूंगा

श्री श्री रविशंकर के कुछ अनुयायी मुझसे मिलने आए थे. यह अलग बात है कि मैं उनकी राजनीति से सहमत नहीं हूं लेकिन मैंने उनसे कहा कि यदि वे इन इलाकों में काम करना चाहते हैं और आदिवासियों को हिंसा का समर्थन छोड़ने और सरकार में भरोसा रखने के लिए  राजी करते हैं तो जहां तक होगा मैं आपकी मदद करूंगा. मैंने उनसे कहा कि मैं राज्य सरकारों से कहूंगा कि वे उनकी मदद करें और जहां भी जरूरत होगी आदिवासियों से बात करने मैं खुद भी आऊंगा. लेकिन उसके बाद उन्होंने मुझसे कभी संपर्क नहीं किया.

एक अलग संदर्भ में बात करें तो आपने कहा था कि झारखंड में राष्ट्रपति शासन होने के  कारण आप कई काम कर पाए, हालांकि वह भी नक्सल प्रभावित राज्य है. यदि छत्तीसगढ़, उड़ीसा और प. बंगाल की कमान आपको सौंप दी जाती या वहां कांग्रेस का शासन होता तो आप किस तरह के सुधारात्मक कदम उठाते?

इस मसले पर मेरी स्पष्ट राय है, पहली चीज है यह सुनिश्चित करना कि किसी तरह की हिंसा नहीं होगी. खूनखराबे के माहौल में कोई किसी की नहीं सुनता, कोई किसी पर भरोसा नहीं करता और तब कुछ नहीं किया जा सकता. हो सकता है यह संदर्भ से अलग बात हो लेकिन यह गांधी की भूमि है और उन्होंने ही कहा था कि सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता. मैं उनकी तरह संत तो नहीं हूं लेकिन मेरा दृढ़ता से मानना है कि हमारे लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है. इसलिए हर किसी को, भारत सरकार को भी, हिंसा छोड़नी ही चाहिए. हमें इस बात पर भी एकराय होना चाहिए कि नागरिक प्रशासन, जिसमें चाहे जितनी खामियां क्यों न हों, उसे कुछ काम करने के लिए समय और मौका देना चाहिए. यही झारखंड में हुआ, सिर्फ ढाई महीनों में हमने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. यदि आपको मुझपर यकीन नहीं तो उनसे पूछिए जो पहले शिकायत कर रहे थे. एक साल पहले तक कहा जा रहा था कि राज्य असफल हो चुका है. आज वहां जन वितरण प्रणाली महिलासमूहों के हाथ में है, लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को मुफ्त राशनकार्ड वितरित किए गए हैं, कई स्कूल खोले गए हैं और इनमें शिक्षकों की नियुक्ति की गई है. जिस दिन चुनावों की घोषणा हुई मैंने सुनिश्चित किया कि 1000 स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों की नियुक्ति हो जाए. यहां दसवीं कक्षा के छात्रों को साइकिलें दी गई हैं. वन्य अधिकार उल्लंघन के हजारों केसों को वापस लिया गया है. और यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि हमने इन इलाकों पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित कर लिया था. मैं नहीं जानता कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन माओवादियों ने कभी-भी हमारे इन कामों में बाधा नहीं डाली.

सामाजिक कार्यकर्ता भी ठीक यही कह रहे हैं कि झारखंड में आपने कोई सैन्य अभियान नहीं चलाया, आपको इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी. आपने बस जमीनी स्तर पर प्रशासन सुधारने से शुरूआत की और माओवादियों की हिम्मत नहीं पड़ी कि वे इन कामों में बाधा डालें. वे जानते हैं कि जिस काम से जनता का भला हो रहा है यदि वे उसे बिगाड़ेंगे तो जनता उनके खिलाफ हो जाएगी. तो ऐसा ही आप छत्तीसगढ़ या दूसरी जगहों पर क्यों नहीं करते?

ऐसा नहीं है कि झारखंड में माओवादियों ने हिंसा नहीं की. फ्रांसिस इंदुवर की हत्या ऐसा ही मामला है. अब उन्होंने चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है. वे कहते हैं कि हम कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा को निशाना बनाएंगे और सजा देंगे. हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार है और किसे इसे रोकना चाहिए की बहस की बजाय  माओवादी मेरी अपील को मानकर यह क्यों नहीं कहते, ‘हां, हम हिंसा को रोक देंगे और अब हमें गृहमंत्री की प्रतिक्रिया का इंतजार है.’  फिर मुझे दो-तीन दिन का वक्त दिया जाए क्योंकि मुझे केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में शामिल लोगों से बात करनी होगी. मैं कोई तानाशाह नहीं हूं, मुझे सभी से मश्विरा करना होगा. एक बार वे हिंसा रोकने की बात कहते हैं और असल में ऐसा करते भी हैं तो यदि उनके ऐसा कहने और मेरी प्रतिक्रिया के दौरान जो कि उन्हें 72 घंटों में निश्चित ही मिल जाएगी, यदि किसी तरह की हिंसा नहीं होती तो मैं ऐसा जवाब देने की स्थिति में होऊंगा जिससे कि हिंसा हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी और विकास का रास्ता साफ हो जाएगा. माओवादियों से बातचीत भी की जा सकती है. लेकिन सबसे पहले उन्हें कहना होगा कि वे हिंसा रोक रहे हैं.

यह एक बड़ा बयान है. कोई भी इससे असहमत नहीं हो सकता. आपने कुछ अहम मुद्दों का जिक्र किया मसलन भूमि अधिग्रहण, वनाधिकार, स्थानीय प्रशासन, औद्योगीकरण. आखिर इनके बेहतर तरीके क्यों नहीं खोजे जाते? खासकर खनन की बात करें तो लोगों को शिकायत है कि इन इलाकों में सुरक्षा बलों के अभियानों का मुख्य मकसद संसाधनों से समृद्ध जमीन पर कब्जा करना है. टाटा और एस्सार जसी कंपनियों ने सरकारों के साथ सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं. आपको लगता है कि सलवा जुडम या सरकार की यहां पर नियंत्रण स्थापित करने की जल्दबाजी इन्हीं सहमति पत्रों का नतीजा है?

मुझे लगता है कि आप उस डरावनी योजना को देख रही हैं जिसका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं है. सहमति पत्र अलग-अलग समय पर अलग-अलग सरकारों के कार्यकालों के दौरान बने हैं, माओवादी हिंसा के इस हद तक पहुंचने से काफी पहले. फिर भी मैं प्रधानमंत्री से यह दरख्वास्त करने के लिए तैयार हूं कि सभी सहमति पत्रों पर रोक लगा दी जाए और झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और दक्षिण बिहार में जिन सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं उन सबकी व्यापक समीक्षा करने के बाद ही यह फैसला लिया जाए कि कौन-से सहमति पत्रों पर अमल होना चाहिए – सुधार या बिना सुधार के साथ.

यह बात आप ऑन रिकार्ड कह रहे हैं.

हां, ऐसा ही है. मगर मुझे नहीं लगता कि मुख्य मुद्दा यह है. असल मसला यह है कि माओवादियों की विचारधारा में संसदीय व्यवस्था एक सड़ चुकी व्यवस्था है. वे मानते हैं कि सशस्त्र क्रांति ही संसद को खत्म करने और लोगों की तानाशाही स्थापित करने का एकमात्र विकल्प है. यह एक मूलभूत विचारधारा वाला नजरिया है. ऐसे में कौन उनसे बहस करे और बताए कि आप गलत हैं? अगर कोई इस तरह का रुख रखता है तो मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता लेकिन..

(बात को काटते हुए) मैं माओवादियों को किनारे रखते हुए फिर से भारत सरकार पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हूं.

लेकिन अगर वे इस तरह का नजरिया भी रखते हैं और हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार से उन मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिनकी उन्हें चिंता है, तो भी मैं इसके लिए तैयार हूं. मैं राज्य सरकारों से बात करूंगा. मैं वन अधिकारों, औद्योगीकरण, जमीन अधिग्रहण और विकास जैसे मुद्दों पर बातचीत में मदद करूंगा. मगर अब तक मेरी पेशकश पर माओवादियों की प्रतिक्रिया यही रही है कि उनसे हिंसा बंद करने को कहना अतार्किक, बेतुका और उन लोगों को धोखा देने जैसा है जिनके लिए वे लड़ रहे हैं! दो दिन पहले ही उन्होंने बंगाल में चार पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी. ये पुलिसकर्मी तो गश्ती दल का हिस्सा भी नहीं थे! सवाल यह है कि माओवादियों को जज, कानूनवेत्ता और जल्लाद बनने का अधिकार किसने दिया?

मैं फिर से वही सवाल करती हूं. यह व्याख्या करने का अधिकार माओवादियों को क्यों हो कि निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और जनकल्याणकारी तरीके क्या होने चाहिए? भारत में खनन एक विवादित मुद्दा है. आप इस बारे में क्या सोचते हैं? आप तो ऐसा मानने वालों में से हैं कि खनन और विकास का आपस में अभिन्न रिश्ता है.

हां, मैं ऐसा मानता हूं. कोई भी देश अपने प्राकृतिक और मानव संसाधनों के बगैर विकास नहीं कर सकता. खनिज संपदा का दोहन करके उसे लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. और ऐसा क्यों न हो? क्या वे किसी म्यूजियम की शोभा बढ़ाने के लिए हैं? हम इस तथ्य का आदर करते हैं कि आदिवासी नियमगिरी पहाड़ी की पूजा करते हैं. मगर मुझे बताइए कि क्या इससे उनके बच्चे स्कूल में पढ़ सकेंगे या फिर उनके पैरों को जूते मिल जाएंगे? क्या इससे उनकी कुपोषण की समस्या हल हो जाएगी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच बढ़ जाएगी? खनन पर सदियों से विवाद चलता रहा है. इसमें कोई नई बात नहीं है.

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मराठी की तलवार हिंदी की ढाल

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पहले ही बता चुकी थी कि वह किसी को हिंदी में शपथ लेने नहीं देगी. मनसे के इस आक्रामक रवैये का विरोध जरूरी था जो समाजवादी विधायक अबू आजमी ने किया. उन्होंने हिंदी में शपथ लेने की कोशिश की और धक्कामुक्की के शिकार हुए. विधानसभा के भीतर इस शर्मनाक नजारे पर चिंता जताते और चुटकी लेते टीवी चैनलों को अचानक पुराने भाषा विवाद याद आने लगे. याद आया कि संविधान ने हिंदी को अकेली राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है, कई राजभाषाएं हैं और सबकी समान हैसियत है. लेकिन क्या यह हिंदी बनाम मराठी का झगड़ा था? क्या राज ठाकरे को मराठी से या अबू आजमी को हिंदी से प्रेम है? या यह दो नेताओं के अपने अतिवादी रुख और तेवर थे जिनका शिकार हिंदी और मराठी के उपेक्षित बहनापे को होना पड़ा?

हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती हैन अबू आजमी समझ पा रहे हैं कि हिंदी की लड़ाई इतनी आसान नहीं है और न ही राज ठाकरे कि मराठी को हिंदी नहीं कोई और भाषा नुकसान पहुंचा रही है. टीवी चैनलों की बहसें भी हिंदी बोलने के अधिकार और राज ठाकरे के अनाचार के आगे नहीं बढ़ पा रहीं. कुल मिलाकर यह विधानसभा के भीतर एक अशालीन और आक्रामक व्यवहार का मामला होकर रह गया है जो जल्द भुला दिया जाएगा. वैसे सच भी यही है. मामला वाकई हिंदी मराठी का नहीं, अशालीन व्यवहार का है. इस व्यवहार की तीखी आलोचना होनी चाहिए और दोनों पक्षों को आगे से ऐसा कुछ करने से रोका जाना चाहिए.

लेकिन क्या यह संभव होगा? क्या राज ठाकरे और अबू आजमी मराठी की तलवार और हिंदी की ढाल उठाने से बाज आएंगे? और क्या हिंदी और मराठी के नाम पर खड़े होने वाले ध्वजधारी उनके पीछे अपनी लाठियां लेकर खड़े नहीं होंगे? संकट यही है. भले ही बहुत सतही ढंग से उठाया गया हो, लेकिन ठाकरे और आजमी ने भाषा के जिस सवाल को छुआ है, वह इतना नकली भी नहीं है.

आज की तारीख में हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती है. जाने-अनजाने इस दुखती रग को दोनों पक्ष समझते हैं और इनका अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं. 

लेकिन यह मामला हिंदी बनाम मराठी का नहीं है. आज की तारीख में अपनी सामाजिक हैसियत के हिसाब से ये दोनों गरीब भाषाएं हैं जिन्हें लगातार अंग्रेजी अपदस्थ और बेदखल कर रही है. हमारे गांव-देहातों, जंगल-पहाड़ों में तरक्की के नाम पर जिस तरह आदिवासियों और दलितों का विस्थापन लगातार जारी है, उसी तरह हमारे नगरों-महानगरों में सामाजिक और शैक्षणिक विकास के नाम पर भाषाओं का विस्थापन जारी है. सिर्फ मराठी और हिंदी नहीं, तमिल, तेलुगू, बांग्ला और ओडिया भी इस प्रक्रिया की चपेट में हैं- अंग्रेजी उदारवाद का बुलडोजर सारी भाषाओं को एक तरह से कुचल रहा है. भाषाएं सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होतीं, उनमें हमारे समय का सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्ववाद भी बोलता है. भाषाओं की हैसियत उनसे जुड़ी हुकूमत तय करती है. भारत में मूलत: अंग्रेजी शिक्षा और सामाजिकता के रेशों से बना जो अल्पतंत्न शासन कर रहा है, वह अंग्रेजी की हैसियत तय कर रहा है. 

अंग्रेजी की यह राजनैतिक हैसियत उसे शिक्षा और रोजगार दोनों की भाषा में बदलती है, उसकी अंतरराष्ट्रीयता के मिथक और उसकी अपरिहार्यता के तर्क गढ़ती है. जमीन पर यह दिखता भी है कि भारतीय भाषाओं में पढ़ाई या रोजगार हासिल करने वाले पीछे छूट जा रहे हैं, साहित्य लिखने और विचार करने वाले दूसरे दर्जे की नागरिकता के लिए अभिशप्त हैं और उच्च शिक्षा ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा में भी अमीर-गरीब सबकी नई पसंद अंग्रेजी है.

निश्चित तौर पर आज की तारीख में अंग्रेजी एक भारतीय भाषा हो चुकी है. उसका विरोध न उचित है न फलप्रद. लेकिन उसकी विशेषाधिकारसंपन्न हैसियत दूसरी भाषाओं को विपन्न बना रही है, इसमें संदेह नहीं. इत्तिफाक से आज जो शासक जमातें है, उनमें विचार और सरोकार की वह संस्कृति नजर नहीं आती कि वे भाषाओं के इस महीन द्वंद्व और उसके गहन प्रभाव को समझ सकें. दरअसल यह संस्कृतिविहीन राजनीति कभी भाषाओं को उपभोक्तावादी कचरे के आयात की मशीन की तरह इस्तेमाल कर रही है तो कभी अपने अपनी राजनीतिक संकीर्णताओं के उपकरण की तरह. कहने की जरूरत नहीं कि इसकी शिकार एक भाषा के रूप में अंग्रेजी भी हो रही है और हिंदी-मराठी भी.

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं)