Home Blog Page 201

'वह रचना ज्यादा दिन तक नहीं चलती जिसका यथार्थ के धरातल से जुड़ाव नहीं होता'

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

 इन दिनों दो-तीन काम एक साथ कर रहा हूं. बहिरंग नाम से एक डायरी लिख रहा हूं. इसे डायरीनुमा संस्मरण कह सकते हैं. इसके अलावा एक कविता संग्रह भी हाल ही में प्रेस को दिया है जिसका नाम अभी नहीं रखा है. साथ ही आज-कल जेम्स हिंटन  की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी कर रहा हूं इसलिए इसी की पढ़ाई भी चल रही है. 

किस विधा में लिखना पसंद है?

वैसे तो कविता लेखन ही मुझे प्रिय है. कविता ही मेरी मूल शैली है. लेकिन बहिरंग  के जरिए मैं एक बार फिर से गद्य संसार में उतर रहा हूं. यह मेरी तीसरी गद्यात्मक रचना होगी. इससे पहले सुरों की सोहबत में प्रकाशित हुआ था.     

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

विष्णु नागर को इधर बीच मैंने खूब पढ़ा है. उनका उपन्यास आदमी स्वर्ग में अद्भुत रचना है. इसी तरह उनकी कहानी एक जिम्मेदार आदमी भी मुझे बहुत आकर्षित करती है.   

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

हजारी प्रसाद द्विवेदी के समकालीन एक साहित्यकार थे पीतांबर दत्त बर्थवाल. वे हिंदी के प्रथम साहित्यकार थे जिन्हें मानद उपाधि से विभूषित किया गया था. लेकिन उन्हें कोई ख्याति नहीं मिली क्योंकि उस दौर में भी आलोचक-समीक्षक व्यक्तिगत कुंठाओं की वजह से लोगों को नजरअंदाज करते थे.

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

रचना का लोकप्रिय होना अलग चीज है. पर वह रचना ज्यादा दिन तक नहीं चलती जिसका यथार्थ के धरातल से जुड़ाव नहीं होता. उदय प्रकाश  की एक कहानी राम संजीवन की प्रेम कहानी इसी तरह की रचना है. इसमें व्यक्ति के प्रति हीनभावना दिखाई देती है.

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

हाल ही में भारतीय दर्शन पर आधारित सत्यपाल गौतम की पुस्तक समाज दर्शन  खरीदी है.

साहित्य में विमर्शों के प्रति क्या विचार हैं?

सिद्धांतत: इसके पक्ष में हूं.

अतुल चौरसिया  

जारी त्रासदी की प्रदर्शनी

करीब 25 हजार लोगों की मौत, एक लाख की असाध्य बीमारी और तरह-तरह के दुष्प्रभावों को सालों से भोग रहे भोपाल के आम नागरिकों के लिए गैस कांड की 25वीं बरसी पर सरकार की झोली में क्या है? जवाब है पिकनिक स्पॉट का तोहफा. केंद्र और राज्य की सरकारें तत्कालीन यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री को जल्द ही पिकनिक स्पॉट में तब्दील करने के मंसूबे बांध रही हैं. दर्जनों सरकारी, गैर-सरकारी रिपोर्टों और शहर के प्रभावितों के बीच सक्रिय जन संगठनों की आपत्तियों को खारिज करते हुए दुनिया के औद्योगिक इतिहास की इस भीषणतम त्रासदी की याद में सरकार यहां एक स्मृति संग्रहालय का निर्माण करवाने पर तुली हुई है. राज्य के गैस राहत एवं पुनर्वास मंत्री बाबूलाल गौर और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश का कहना है कि कारखाने का परिसर पूरी तरह जहर मुक्त है और इसमें कोई भी आ-जा सकता है.

दर्जनों सरकारी, गैर-सरकारी रिपोर्टों और शहर के प्रभावितों के बीच सक्रिय जन संगठनों की आपत्तियों को खारिज करते हुए दुनिया के औद्योगिक इतिहास की इस भीषणतम त्रासदी की याद में सरकार यहां एक स्मृति संग्रहालय का निर्माण करवाने पर तुली हुई है

ढाई दशक में पीड़ितों तक पेयजल सरीखी बुनियादी सुविधा तक न पहुंचा सकी राज्य सरकार संग्रहालय के लिए करीब 116 करोड़ रूपए खर्च करने को तैयार है. 2005 में हुई एक डिजाइन प्रतियोगिता के आधार पर स्मृति संग्रहालय बनाने के लिए चुनी गई दिल्ली की कंपनी स्पेस मैटर्सकी भागीदार मौलश्री जोशी कहती हैं, ‘हमारे डिजाइन के अनुसार पूरे परिसर का विकास होना है. इसमें फैक्ट्री का पुराना ढांचा, प्रदर्शनियां और व्यापक दस्तावेजीकरण शामिल हैं. हिरोशिमा में भी तो परमाणु बम के प्रभावों की याद बनाए रखने के लिए अपनी तरह का संग्रहालय बनाया गया है.

भोपाल में सक्रिय जन संगठन मौलश्री की बात को पचा नहीं पा रहे. भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठनके संयोजक अब्दुल जब्बार कहते हैं, ‘गैस प्रभावितों के इलाज, पेयजल, निवास और मुआवजा वितरण की बदहाली के बरक्स सवा सौ करोड़ रुपए स्मारक पर खर्च करना बेशर्मी है. दरअसल, संग्रहालय के बहाने कहीं ज्यादा बड़े हित साधे जा रहे हैं.तथ्यों को देखें तो जब्बार की इस बात में दम दिखाई देता है.

2004 और 2005 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दाखिल अपने शपथपत्र में तत्कालीन यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के 87 एकड़ रकबे को जहरीला बताने वाली राज्य सरकार को आखिर अचानक यह क्या हो गया? प्रदेश में भाजपा के गद्दीनशीन होने के तुरंत बाद 2004 में गौर ने पिछली कांग्रेस सरकार की छीछालेदर करते हुए कहा था कि फैक्ट्री संबंधी सारी जानकारियां न सिर्फ सार्वजनिक की जाएंगी बल्कि  वहां दबा जहरीला कचरा भी साफ करवाया जाएगा. अब वही गौर दो रिपोर्टों का हवाला देकर उल्टा राग अलाप रहे हैं.

इनमें से एक रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के ग्वालियर स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंटकी है. परिसर को साफ-सुथरा बताने वाली केंद्र और राज्य सरकारों को भेजी गई इस रिपोर्ट के मुताबिक इलाके में इतना कम जहर है कि यदि 70 किलोग्राम वजन वाला कोई व्यक्ति फैक्ट्री में मौजूद पदार्थों का 200 ग्राम भी खा लेता है तो भी उसकी मृत्यु नहीं होगी. दूसरी रिपोर्ट राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थाननागपुर की है जिसमें संस्थान के कार्यकारी निदेशक डॉ टी. चक्रवर्ती ने फैक्ट्री परिसर की अपनी कई बार की यात्राओं का जिक्र करते हुए लिखा है कि ऐसा करने से उन्हें और उनके साथियों को कुछ भी नहीं हुआ. इन रिपोर्टों में हालांकि टेककी तरह परिसर को जहर मुक्त बताया गया है. लेकिन इसके ठीक उलट पिछले सालों की अनेक रिपोर्टें इस दावे को बेमानी ठहराती हैं.

स्थानीय लोगों और शोधकर्ताओं के मुताबिक 1969 में फैक्ट्री निर्माण के बाद से करीब 20 गड्ढों में कारखाने का प्रदूषित कचरा फेंका जाता था. कभी फैक्ट्री में प्रोडक्शन सुपरवाइजर रहे कमर सईद खान के मुताबिक यहां अभी भी करीब 8000 टन जहरीला कचरा मौजूद है

1990 और 1996 में मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं यांत्रिकी विभाग, 1999 में ग्रीनपीस इंटरनेशनल और 1990 और 1996 में सिटी एन्वायरनमेंट लैब, बोस्टन द्वारा जारी की गई रिपोर्टों ने फैक्ट्री और उसके आसपास के इलाके में खतरनाक रसायनों की उपस्थिति की पुष्टि की है. मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1998 से 2006 के बीच हर तीन महीने में पड़ताल करके यहां जहरीले पदार्थों की मौजूदगी पर ठप्पा लगाया है. इन पदार्थों से होने वाली बीमारियों पर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने 24 अध्ययन किए थे पर इनकी कोई रिपोर्ट सार्वजिनक नहीं की गई, उल्टे 1985 से 1994 के बीच इन सभी अध्ययनों को बंद कर दिया गया. अध्ययनों में शामिल विशेषज्ञों के मुताबिक प्रभावित लोगों में कैंसर, विकलांगता और फेफड़ों व आंखों से संबंधित बीमारियां पाई गईं. सबसे ताजा दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट’ (सीएसई) की रिपोर्ट है जिसमें प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं के हवाले से फैक्ट्री परिसर और आसपास का इलाका जहरीला बताया गया है.

भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉरमेशन एंड एक्शनकी रचना धींगरा कहती हैं, ‘केंद्र और राज्य की सरकारें यूनियन कार्बाइड के मौजूदा मालिक डॉउ केमिकल्स को बचाने में लगी हैं. दर्जनों रिपोर्टों को ठेंगे पर रखकर सरकारें परिसर को साफ-सुथरा बता रही हैं ताकि डॉउ केमिकल्स का कचरा साफ करने का खर्च बचाया जा सके. सीएसई की डायरेक्टर सुनीता नारायण के मुताबिक फैक्ट्री परिसर से जहरीला कचरा हटाने में करीब एक हजार करोड़ तक का खर्चा आ सकता है. परिसर के सुरक्षित होने की यह घोषणा डॉउ को न्यूयार्कडिस्ट्रिक्ट कोर्ट में इसी मामले पर 1999 से जारी मामले से भी मुक्त करवा सकती है.

फैक्ट्री के पूर्व कर्मचारियों, स्थानीय लोगों और शोधकर्ताओं के मुताबिक 1969 में फैक्ट्री निर्माण के बाद से करीब 20 गड्ढों में कारखाने का प्रदूषित कचरा फेंका जाता था. कभी फैक्ट्री में प्रोडक्शन सुपरवाइजर रहे कमर सईद खान के मुताबिक यहां अभी भी करीब 8000 टन जहरीला कचरा मौजूद है. पिछले साल भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठनके साथ खान ने इन जहरीले रसायनों की सूची तैयार की थी जिसके अनुसार आज भी फैक्ट्री में नेफ्थलीन सल्फोनिक एसिड, सोडियम नेफ्थलीन सल्फेट, सेविन टार, मर्करी, पाइप में मिथाइल आइसोसाइनेट और फास्जीन जैसे खतरनाक पदार्थ मौजूद हैं. राज्य हाईकोर्ट के आदेश पर 2005 में गठित टास्क फोर्स की तकनीकी उप-समिति का जिक्र करते हुए जब्बार कहते हैं, ‘इस समिति ने 2006 में कचरे को उचित उपचार के लिए अमरीका भेजने का सुझाव दिया था, लेकिन आज भी यह जहर जहां-का-तहां है.

जहरबुझे परिसर को साफ-सुथरा बताने के पीछे अब शहर के भू-माफिया के हित भी सामने आ रहे हैं. फैक्ट्री के पास करीब 20 एकड़ का जहरीला तालाबफैक्ट्री से निकलने वाले जहरीले पानी और प्रदूषित पदार्थों को ठिकाने लगाने के काम आता था. सूत्रों के मुताबिक आज भी इस सूखे तालाब में करीब दस हजार टन कचरा मौजूद है, लेकिन पिछले 25 सालों में पुराने शहर के लगभग बीच में आ चुके इस रकबे में रिहायशी प्लॉट काटे जाने लगे हैं. जहरबुझा क्षेत्र बताने से भू-माफिया की इस कमाई पर रोक लग सकती है.   

बाबरी पर बावरापन

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को लेकर सरकार की अपनी योजनाएं थीं जो इसके लीक हो जाने से धरी-की-धरी रह गईं. वह इसे अपने तरीके से संसद में पेश करने से चूक गई जिससे संघ परिवार का नुकसान सीमित हो गया और भाजपा को इसका जबर्दस्त फ़ायदा हुआ 

छह दिसंबर 1992 के बाद अचानक एक ही रात में संघ परिवार और भाजपा भारतीय मीडिया के लिए दुश्मन नंबर एक बन गए थे. ऐसा इसलिए नहीं हुआ था क्योंकि मीडिया खुद को भारत की बहुसांस्कृतिक विरासत के संरक्षक के तौर पर देखता है. बल्कि इसकी वजह यह थी कि गुस्साए कारसेवकों ने यह मानते हुए कि अयोध्या विवाद की एकपक्षीय कवरेज हो रही है, घटनास्थल पर अपना काम कर रहे फोटोग्राफरों के साथ मारपीट कर दी थी. मीडिया और भगवा परिवार के बीच के रिश्तों के बीच की यह कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि दो महीने बाद फरवरी 1993 में जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के बोट क्लब पर प्रस्तावित एक रैली पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन करने की कोशिश की और पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए पानी की तेज बौछार छोड़ी तो पत्रकारों का एक समूह इस पर खुश होते हुए कह रहा था – ‘इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए.’

संघ राजनीति को बहुत संकरे नजरिए से देख रहा था. उसे शायद सिर्फ यही चिंता रही होगी कि लिब्रहान रिपोर्ट आडवाणी को फिर से केंद्र में लाकर उनकी राजनैतिक अहमियत को पहले जैसा न बना दे और कहीं उसका आडवाणी को विपक्ष के नेता पद से हटाने का अभियान पटरी से न उतर जाए

ऐसा लगता है कि 17 साल बाद समय का चक्का पूरा एक चक्कर घूम गया है. भगवा परिवार खासकर संघ और विश्व हिंदू परिषद के लिए वही मीडिया अब संकटहारक की भूमिका में है. उसने लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी और बाबरी ढांचे के ध्वंस से जुड़ी लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट लीक कर भगवा परिवार को एक बड़ी मुश्किल से बाहर निकाल लिया है. सरकार की योजना तो यह थी कि वह इस रिपोर्ट को 22 दिसंबर के आसपास संसद में पेश करेगी यानी शीतकालीन सत्र खत्म होने से ठीक पहले. उसे आशंका थी कि अगर उसने यह काम पहले किया तो सदन को सामान्य रूप से चलाना बड़ा मुश्किल हो जाएगा. सत्र के आखिर तक रिपोर्ट पेश न करने की योजना का आधार यह भी था कि ऐसा करने से कार्रवाई रिपोर्ट में कुछ कड़े कदमों की घोषणा भी मुमकिन हो सकेगी. मगर यह योजना धरी-की-धरी रह गई. 23 नवंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के चुनिंदा अंश छाप दिए. जैसी कि संभावना थी तुरंत ही भूचाल आ गया. संसद में सवाल उठा कि सदन से पहले यह रिपोर्ट अखबार को कैसे मिल गई. हंगामा हो ही रहा था कि एनडीटीवी ने एलान कर दिया कि उसके पास भी इस रिपोर्ट की एक प्रति है. इसे सच साबित करने के लिए चैनल ने रिपोर्ट के कुछ अंशों को उद्धृत करना शुरू कर दिया.

सरकार किसी की भी हो उसके लिए किसी जांच आयोग की हाईप्रोफाइल रिपोर्ट अपने पास रखना बड़ी सरदर्दी का काम होता है. इससे पहले इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में ठक्कर आयोग और राजीव गांधी हत्याकांड मामले में जैन आयोग की रिपोर्ट भी इसी तरह मीडिया में लीक होकर सरकार के लिए समीकरण खराब करने और अनपेक्षित परिणामों का सबब बनती रही हैं. इस बार भी ऐसा ही हुआ. पहला अनपेक्षित परिणाम तो यह रहा कि रिपोर्ट के अंशों के छपने के बाद बहस इस पर होने की बजाय संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन पर केंद्रित हो गई. दूसरा, भाजपा और संघ को प्रतिक्रिया की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल गया. लीक ने 17 साल पहले अयोध्या में जो हुआ उसकी रिपोर्ट से भाजपा को अचानक जोर का झटका लगने की संभावना खत्म कर दी.

तीसरा और आखिरी झटका सरकार के लिए शायद यह रहा कि रिपोर्ट के लीक होने से मीडिया को इसे मनमाने तरीके से इस्तेमाल करने का मौका मिल गया. अगर सरकार यह रिपोर्ट पेश करती तो वह यह भी ध्यान रखने की कोशिश करती कि रिपोर्ट को उसके हिसाब से इस्तेमाल किया जाए. सामान्य स्थिति में 1000 पन्नों की किसी रिपोर्ट के साथ इसका सार भी होता है जिसे सरकार उसी रंग में पेश करती है जो राजनैतिक रूप से उसे फायदा पहुंचाता है. इसकी बजाय हुआ यह कि सांप्रदायिक कड़वाहट फैलाने के लिए दोषी 68 लोगों की सूची में आश्चर्यजनक तरीके से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम होना और तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव सरकार की दोषमुक्ति (जिस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए) बहस का मुख्य विषय बन गया. जस्टिस लिब्रहान के निष्कर्षों पर होने वाली राजनैतिक बहस की दिशा क्या हो यह तय करने का मौका सरकार को नहीं मिल पाया.

मीडिया ने संघ परिवार को किस मुसीबत से बचाया है इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. रिपोर्ट में संघ परिवार पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं. इसमें दावा किया गया है कि ध्वंस सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई एक आपराधिक साजिश थी जिसमें छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी वाजपेयी सहित समूचा भगवा परिवार शामिल था. इसमें कहा गया है कि भाजपा तो सिर्फ संघ की कठपुतली है. रिपोर्ट की मानें तो भाजपा शासित राज्यों में प्रशासन तक पर संघ का नियंत्रण था. यहां यह बात गौण है कि लिब्रहान के कई निष्कर्ष ऐसे हैं जो बस दावे ही लगते हैं और जिनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिए गए हैं. कई जगहों पर रिपोर्ट किसी न्यायिक अधिकारी के फैसले की बजाय किसी पर्चे सरीखी लगती है. मगर गौर करने वाली बात यह है कि लिब्रहान ने किसी भी सरकार के लिए एक ऐसा आधार तैयार कर दिया था जिससे वह इस सूची में शामिल लोगों के खिलाफ आपराधिक से इतर जाकर भी कार्रवाई कर सकती थी. 17 साल की विवेचना के बाद लिब्रहान ने सरकार को भाजपा नहीं तो कम से कम संघ पर तो फौरन ही पाबंदी लगाने के लिए पर्याप्त बारूद दे दिया था.

आयोग के वकील रह चुके अनुपम गुप्ता ने दावा किया कि लिब्रहान ने वाजपेयी का नाम इसलिए शामिल किया ताकि आडवाणी की आलोचना की धार थोड़ी कम लग सके. उनके दावे माने बिना भी कहा जा सकता है कि जब वाजपेयी को आयोग के सामने पेशी के लिए कभी बुलाया ही नहीं गया तो रिपोर्ट में उनका नाम आना हैरानी का विषय तो है हीमगर ऐसा नहीं हो सका. वैसे भी जांच आयोग कोई न्यायिक संस्था नहीं होती और इसके निष्कर्षों का कोई वैधानिक महत्व नहीं होता. अगर संघ के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई की भी जाती तो उसे आज की जमीनी हकीकतों से संचालित एक राजनैतिक फैसला ही माना जाता. 17 साल पहले की इस घटना के लिए आज प्रतिबंध लगाने से संदेश यही जाता कि ऐसा भाजपा को कमजोर करने के लिए किया गया है. वैसे इस बात को लेकर भाजपा में भी ज्यादातर लोग आश्वस्त थे कि सरकार संघ पर प्रतिबंध नहीं लगाएगी. पर उन्हें यह आशंका नहीं थी कि रिपोर्ट में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की इतने कठोर शब्दों में निंदा की जाएगी. वे यह जरूर मान कर चल रहे थे कि सरकार रिपोर्ट से ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक फायदा उठाएगी और पूरे राम जन्मभूमि आंदोलन पर बुरे से बुरा ठप्पा लगा देगी. पार्टी के प्रतिबद्ध लोगों पर तो हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता मगर उस पीढ़ी को जरूर पड़ता जो गुजरात दंगों के बाद से वैसे ही भाजपा के बारे में अच्छी राय नहीं रखती.

इसका कोई सबूत नहीं है कि संघ नेतृत्व को लिब्रहान रिपोर्ट से पैदा हो सकने वाली मुश्किलों का इतना ज्यादा अंदाजा रहा होगा. वैसे भी अपनी ही दुनिया में रहने वाला संघ भाजपा को दुरुस्त करने की अपनी भूमिका में इतना मसरूफ था कि उसका ध्यान बाहरी घटनाक्रमों पर गया ही नहीं. दरअसल पिछले कुछ हफ्तों से भाजपा की कमान अपने हाथ में लेने की कवायद में लगा संघ राजनीति को बहुत संकरे नजरिए से देख रहा था. उसे शायद सिर्फ यही चिंता रही होगी कि लिब्रहान रिपोर्ट आडवाणी को फिर से केंद्र में लाकर उनकी राजनैतिक अहमियत को पहले जैसा न बना दे और कहीं उसका आडवाणी को विपक्ष के नेता पद से हटाने का अभियान पटरी से न उतर जाए.

शायद इससे समझा जा सकता है कि लिब्रहान रिपोर्ट के लीक होने पर संघ की शुरुआती प्रतिक्रिया एक हद तक बेतुकी थी. भाजपा का काम देखने वाला संघ का एक हिस्सा कुछ हद तक अजीबोगरीब एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि मीडिया उन भाजपा नेताओं के इशारे पर काम कर रहा है जिन्हें संघ का दखलंदाजी वाला रवैया पसंद नहीं है. उनका शक उस धड़े पर था जिसे वे आडवाणी खेमा मानते हैं. 23 नवंबर की शाम और अगले दिन सुबह पत्रकारों को फोन किए गए. फोन करने वाले पार्टी अध्यक्ष से जुड़े हुए सज्जन का कहना था कि रिपोर्ट को लीक करवाने का यह काम राज्य सभा में भाजपा के नेता अरुण जेतली ने किया है और इसमें उनकी मदद उनके साथी वकील पी चिदंबरम ने की है. पत्रकारों के लिए यह बात इतनी बचकानी थी कि इसे किसी गॉसिप कॉलम तक में जगह नहीं मिली. मगर इससे साफ संकेत मिला कि संघ पूरी तरह से असमंजस के भंवर में फंसा हुआ था.

मगर भाजपा के मामले में स्थिति बिल्कुल दूसरी थी. हालांकि लीक की टाइमिंग से – जिसे कम जानकार गन्ना आंदोलन पर विपक्षी दलों की एकता को तोड़ने के लिए चुना गया समय बता रहे थे –  वह भी हैरत में थी मगर उसने अपने बचाव के दो हथियार ढूंढ़ लिए. पहला था खुद लीक का मुद्दा. इंडियन एक्सप्रेस की खबर में गृह मंत्रालय के सूत्र का हवाला दिया गया था इसलिए भाजपा के कुछ सदस्यों ने चिदंबरम की तरफ उंगलियां उठाईं. यह दिलचस्प है कि जेतली, जिनकी मीडिया के शीर्ष स्तर तक पहुंच से उनके साथी ईर्ष्या करते हैं, ने अपनी उंगली आयोग की तरफ उठाई. यानी उद्देश्य शायद आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करना रहा होगा.

तोगड़िया भले ही कहते रहें कि राम मंदिर के लिए वे फांसी के फंदे पर चढ़ने के लिए भी तैयार हैं मगर देश उस दौर से आगे बढ़ चुका है जब कमंडल ने मंडल और मुस्लिम कार्ड का मुकाबला किया था

भाजपा के जवाबी हमले का दूसरा हथियार था पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के बारे में की गई तल्ख टिप्पणियां. यह सभी जानते हैं कि वाजपेयी मंदिर आंदोलन में भाजपा की सीधी भागीदारी नहीं चाहते थे और शायद वे अकेले ऐसे वरिष्ठ भाजपा नेता थे जिन्होंने ध्वंस पर खेद प्रकट किया था. यह बात भी सर्वविदित है कि संघ सरकार के काम में दखलअंदाजी न करे इसके लिए वाजपेयी हरमुमकिन कोशिश करते रहे. ऐसे नेता को संघ की कठपुतली कहना और देश का माहौल खराब करने के लिए उसकी आलोचना करना साफ तौर पर अप्रत्याशित था.

आयोग के वकील रह चुके अनुपम गुप्ता ने दावा किया कि लिब्रहान ने वाजपेयी का नाम इसलिए शामिल किया ताकि आडवाणी की आलोचना की धार थोड़ी कम लग सके. उनके दावे माने बिना भी कहा जा सकता है कि जब वाजपेयी को आयोग के सामने पेशी के लिए कभी बुलाया ही नहीं गया तो रिपोर्ट में उनका नाम आना हैरानी का विषय तो है ही. हालांकि इससे भाजपा को अपने खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों के खिलाफ वाजपेयी को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने का बड़ा मौका मिल गया. चूंकि रिपोर्ट एक ऐसे राजनैतिक दिग्गज की प्रतिष्ठा पर हमला कर रही थी जिसकी हर नेता इज्जत करता है इसलिए यह बात पूरी रिपोर्ट को खारिज करने का ही जरिया बन गई. निश्चित रूप से साजिश में शामिल 68 लोगों की सूची में वाजपेयी का नाम होना एक ऐसा कारक रहा जिसने सरकार के इस फैसले में सबसे बड़ी भूमिका निभाई कि रिपोर्ट पर किसी गंभीर कार्रवाई की जरूरत नहीं है.

यहां पर यह भी कहा जाना चाहिए कि लीक पर अपनी प्रतिक्रिया के रूप में सरकार को मजबूरी में तय समय से पहले ही रिपोर्ट को संसद में पेश करना पड़ा. प्रधानमंत्री अमेरिका के महत्वपूर्ण दौरे पर थे और सरकार नहीं चाहती थी कि कोई ऐसा राजनैतिक विस्फोट हो जाए जिससे देश और प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने शर्मिंदा होना पड़ जाए. हालात ऐसे बन गए थे कि सरकार को कम से कम आक्रामकता दिखानी पड़ी. इसके लिए भाजपा और संघ को मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए.

अगले महीने जब लिब्रहान रिपोर्ट संसद में व्यापक चर्चा का विषय बनेगी तो संभावना है कि भाजपा राम जन्मभूमि आंदोलन की राजनीति का अपना संस्करण पेश करे. वह एक बार फिर कहेगी कि उन हिंदू मंदिरों के पुरातात्विक अवशेषों के प्रमाण मिले हैं जो 1528 में मीर बकी द्वारा बाबरी मस्जिद बनाए जाने से पहले वहां मौजूद थे. वह फिर से इस बात पर जोर देगी कि न्यायिक प्रक्रिया में लग रही असीमित देरी ने हिंदू राष्ट्रवादियों में रोष भरा और सीधी कार्रवाई की मांग को हवा दी. यह संघ परिवार के खिलाफ लिब्रहान की कठोरता और पिछली कांग्रेस सरकार के खिलाफ उनकी चकित कर देने वाली उदारता की भी बात करेगी. मगर एक पहलू ऐसा है जो इसे रक्षात्मक रवया अपनाने के लिए मजबूर करेगा. वह है रिपोर्ट में लगाया गया यह आरोप कि यह राजनैतिक पार्टी नहीं बल्कि गैरजिम्मेदार संघ की कठपुतली है.

संघ द्वारा भाजपा की कमान अपने हाथ में लेने पर मची उथल-पुथल और संघ के मुखिया मोहन राव भागवत द्वारा अगले पार्टी अध्यक्ष के कथित चयन के संदर्भ में देखें तो भाजपा में ऐसे कई हैं जो पिछले दरवाजे से आने वाले नेताओं की तानाशाही से बहुत परेशान हैं. लिब्रहान रिपोर्ट के बाद उन्हें यह सोचकर उतनी ही चिंता हो रही है कि इसकी उन्हें बड़ी राजनैतिक कीमत इस तरह भी चुकानी पड़ सकती है कि उन्हें आने वाले समय में संघ की कठपुतली समझ जाएगा. सदन में भाजपा सफलतापूर्वक वाम दलों और समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर विपक्ष की एकता का दिखावा तो कर सकती है मगर संघ का नाम आते ही यह एकता तुरंत खत्म हो जाती है.

24 नवंबर को भाजपा के संसदीय दल की एक बैठक हुई. यह एक आम साप्ताहिक बैठक थी. इसमें बिहार के पूर्णिया से दूसरी बार चुनकर आए एक अपेक्षाकृत गुमनाम सांसद उदय सिंह ने खलबली पैदा कर दी. वे अचानक अपनी सीट से उठे और नेतृत्व से सवाल किया कि क्यों एक बाहरी आदमी पार्टी को सर्जरी और कीमोथेरेपी की सलाह दे रहा है. वे यही नहीं रुके और उन्होंने आगे पूछा कि अगला पार्टी अध्यक्ष उन लोगों द्वारा क्यों चुना जा रहा है जो खुद पार्टी में नहीं हैं.

इस घटनाक्रम का दिलचस्प पहलू यह था कि न तो इस सांसद से किसी ने चुप होने के लिए कहा और न किसी ने उनकी बात पर अप्रसन्नता जताई.  उनके सवालों के दौरान एक चुप्पी छाई रही और आखिरकार पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए यह आश्वासन देकर उदय सिंह को शांत किया कि बाहर का कोई भी आदमी यह फैसला नहीं करेगा कि पार्टी अध्यक्ष कौन हो. बैठक खत्म होने के बाद उदय सिंह को कई लोगों ने हिम्मत कर वह बात कहने के लिए बधाई दी जिसे कहने की वे भी काफी समय से सोच रहे थे.

व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो लगता नहीं कि लिब्रहान रिपोर्ट अयोध्या मामले में लोगों की दिलचस्पी फिर से पैदा कर सकेगी. तोगड़िया भले ही कहते रहें कि राम मंदिर के लिए वे फांसी के फंदे पर चढ़ने के लिए भी तैयार हैं मगर देश उस दौर से आगे बढ़ चुका है जब कमंडल ने मंडल और मुस्लिम कार्ड का मुकाबला किया था. हिंदुओं को यह इच्छा अब भी हो सकती है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम का भव्य मंदिर बने मगर अब वे इसके लिए कोई भी नाटक-नौटंकी करने और सहने को तैयार नहीं. स्पष्ट देखे जा सकने वाले भविष्य में अयोध्या में स्टील बैरीकेडों और सुरक्षा बलों से घिरा हुआ अस्थायी राम मंदिर ही रहने वाला है इसलिए हैरत नहीं कि भाजपा के यथार्थवादी अयोध्या से ज्यादा गन्ने के मूल्य और मधु कोड़ा पर बहस करने के पक्ष में दिखते हैं.

लिब्रहान रिपोर्ट का सीमित असर सिर्फ यही होगा कि संघ एक बार फिर तीखे विवाद का विषय बन जाएगा और खुद को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए इसे भाजपा की जरूरत होगी. रिपोर्ट पर शुरुआती बवाल शांत होने के बाद भाजपा कार्यकर्ता इस विडंबना की तरफ इशारा कर रहे थे कि भागवत द्वारा ब्लैक लिस्ट किए गए चार नेताओं में से दो यानी सुषमा स्वराज और अरुण जेतली ही संघ के वकील की भूमिका निभा रहे हैं. मीडिया में छिड़ी बहस में संघ ने भी पाया कि इसके पसंदीदा राजनाथ जैसे नेता या तो पूरी तरह से अप्रभावी रहे या उनमें वह गहराई नजर नहीं आई जिसकी ऐसे मौकों पर जरूरत होती है. संघ के सुर्खियों में आने से आडवाणी को नया जीवन मिल सकता है. उन्होंने भले ही अपना प्रधानमंत्री बनने का सपना छोड़ दिया हो मगर सदन में एक भरोसेमंद सांसद की भूमिका निभाने के लिए वे अब भी पार्टी के पसंदीदा हैं, तब तक तो हैं ही जब तक प्रधानमंत्री पद का अगला उम्मीदवार चुना नहीं जाता. दो हफ्ते पहले तक ऐसा लग रहा था कि जैसे संघ को भाजपा की हर कमान अपने हाथ में लेने से अब कोई रोक नहीं सकता. मगर राजनीति में दो हफ्ते भी लंबा वक्त होता है. जिस तरह छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में हुए विस्फोट के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में उदारवादी नेताओं को आगे आना पड़ा था उसी तरह लिब्रहान रिपोर्ट संघ को अपने विस्तारवाद की समीक्षा करने के लिए मजबूर कर सकती है. भाजपा में उदारवादी भले ही एक लुप्तप्राय प्रजाति हो मगर ऐसे मौके आते हैं जब यही प्रजाति भाजपा को राजनैतिक रूप से खत्म या अप्रासंगिक होने से बचाती है. भाजपा में मौजूद राजनेता यह बात समझते और मानते हैं. मगर क्या संघ भी इस बात को समझेगा? 

स्वपन दासगुप्ता (वरिष्ठ पत्रकार)

कर्म की वीरता

टेस्ट क्रिकेट द्रविड़ के मिजाज से मेल खाता है. जैसे उनसे पहले गावस्कर और उनसे भी पहले विजय हजारे और मर्चेंट के मिजाज से खाता था. ऐसे में यह कल्पना करना आसान है कि द्रविड़ का असली रूप खेल के इस लंबे संस्करण में ही दिख सकता है. मगर अपनी शुरुआती प्रतिकूलता पर विजय पाकर उन्होंने एकदिवसीय क्रिकेट में सफलता के जो झंडे गाड़े वह दिखाता है कि उनके दिल और दिमाग का तालमेल कितना जबर्दस्त है. गावस्कर ऐसा नहीं कर पाए थे.

इस बात पर बहस हो सकती है कि सबसे बड़ा भारतीय बल्लेबाज कौन है या किस स्पिनर को नंबर वन कहा जाना चाहिए मगर इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारतीय टीम में अब तक द्रविड़ सर्वश्रेष्ठ स्लिप फील्डर रहे हैं जिनके नाम आउटफील्ड में सबसे ज्यादा कैच लेने का विश्व रिकॉर्ड है

द्रविड़ को खेल के इस छोटे संस्करण में स्वीकार्यता पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी. शुरुआती दिनों में उनके तरकश में शॉट तो होते थे मगर एक पारंपरिक क्षेत्ररक्षण व्यूह बनाकर उन्हें काबू किया जा सकता था. वे बॉल को उठाकर नहीं मारते थे और तेज पिचों पर उठती गेंदों को तेंदुलकर और गांगुली की तरह उनकी उछाल पर नहीं खेलते थे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अपने पहले साल में एकदिवसीय मैचों में द्रविड़ का उच्चतम स्कोर 90 रहा. उन्होंने 20 मैच खेले और उनका औसत रहा 28 जिसे ठीक-ठाक कहा जा सकता है. अगले साल उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ एक शतक जमाया और उनका औसत बढ़कर 40 हो गया. मगर इसके बाद उनसे साथ एक छल हुआ जो भारतीय क्रिकेट में नई बात नहीं है. उनसे कहा गया कि जब टीम में तेंदुलकर, अजहरुद्दीन, गांगुली, अजय जडेजा जैसे बल्लेबाज हैं तो उनकी भूमिका यह है कि वे एक छोर थामे रखें और 50 ओवर तक बल्लेबाजी करें.

द्रविड़ ने इन निर्देशों का पालन किया, इतनी अच्छी तरह किया कि उनका स्ट्राइक रेट गिर गया और विडंबना देखिए कि उन्हें इसी वजह से टीम से बाहर कर दिया गया. उनपर एक ठप्पा लगाकर उन्हें खारिज कर दिया गया. ठप्पा यह था कि उनकी रन गति धीमी है और इसलिए वे एकदिवसीय क्रिकेट में फिट नहीं हो सकते. मगर द्रविड़ ने कड़ी मेहनत की और टीम में फिर से जगह पाने में कामयाब रहे. 1999 का विश्व कप सामने था और इसमें उन्होंने खुद को एक शानदार एकदिवसीय बल्लेबाज के रूप में स्थापित कर लिया. अब उनके बल्ले से निकले शॉट सीमा पार पहुंच रहे थे और उन्हें उठाकर शॉट मारने में कोई हिचक नहीं हो रही थी. नतीजतन 461 रनों के साथ वे टूर्नामेंट के अगुवा बल्लेबाज के रूप में उभरे. इस दौरान उनका औसत 66 था और स्ट्राइक रेट 86. टूर्नामेंट में उन्होंने दो शतक लगाए थे.

जल्दी ही बल्लेबाजी क्रम में उन्होंने खुद को एक लचीले विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया. वे पारी की शुरूआत भी कर सकते थे, नंबर तीन पर भी खेल सकते थे और अगर लक्ष्य का पीछा करते हुए मानसिक रूप से सुरक्षित रहने की जरूरत पड़ी तो और भी नीचे के क्रम में आ सकते थे. अनिच्छा के बावजूद उन्होंने विकेटकीपिंग भी की क्योंकि इससे टीम में जरूरत के मुताबिक एक अतिरिक्त गेंदबाज या बल्लेबाज की जगह हो जाती थी. एकदिवसीय क्रिकेट ने विश्वनाथ और द्रविड़ के बीच अंतर भी पैदा किया. विश्वनाथ अपने करिअर के बाद के वर्षों में शैली के लिहाज से लगातार पारंपरिक होते चले गए थे. यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसे बढ़ती उम्र और धीमी प्रतिक्रिया ने उनपर थोप दिया था. उन्होंने लेग की बजाय मिडिल स्टंप पर गार्ड लेना शुरू कर दिया था और वे सीधे बल्ले से ज्यादा खेलने लगे थे. द्रविड़ इससे बिल्कुल उल्टी दिशा में गए. उन्होंने अपने कुछ ऐसे छिपे पहलू खोज निकाले जो एकदिवसीय क्रिकेट पर बिल्कुल फिट बैठते थे. उन्होंने परंपरा की बेड़ियों से धीरे-धीरे खुद को मुक्त किया और खेल को और भी सृजनात्मक तरीके से खेलना शुरू किया. वैसे भी अगर गेंदबाज और विकेटकीपर को छोड़ दें तो मैदान पर नौ जगहों पर ही तो क्षेत्ररक्षक लगाए जा सकते हैं. खाली जगहें तमाम होती हैं. मिड ऑन और मिड विकेट के बीच की जगह तो द्रविड़ की पसंदीदा बन गई. कवर प्वाइंट के बाईं तरफ की खुली जगह भी उन्हें रास आई. अगर कप्तान फील्डरों की जगह में बदलाव करते तो उनके तरकश में तब भी पर्याप्त हथियार होते जिनसे वे रन बटोर लेते.

तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी खेल में दुर्लभता से ही पैदा होते हैं और जब वे जाते हैं तो यह मान लिया जाता है कि उनकी जगह को कभी नहीं भरा जा सकता. उनकी कोई विरासत नहीं होती. विरासत गावस्कर और द्रविड़ सरीखे खिलाड़ी छोड़ते हैं

जब द्रविड़ ने कप्तानी की कमान संभाली तो उन्होंने खेल का आनंद लेने की अहमियत पर जोर दिया. यह बढ़िया रणनीति थी. उनका कहना भी था कि सहजता के बिना अच्छा नहीं खेला जा सकता. और जब इंग्लैंड के दौरे के बाद तत्कालीन बोर्ड मुखिया के साथ झड़पों की वजह से उन्होंने कप्तानी छोड़ी तो वे तेंदुलकर का ही अनुसरण कर रहे थे. तेंदुलकर ने भी कप्तानी छोड़ दी थी. इसलिए नहीं कि उन्हें यह पसंद नहीं थी बल्कि इसलिए कि इसके साथ जुड़ी राजनीति से उन्हें नफरत थी. इस बात पर बहस हो सकती है कि सबसे बड़ा भारतीय बल्लेबाज कौन है या किस स्पिनर को नंबर वन कहा जाना चाहिए मगर इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारतीय टीम में अब तक द्रविड़ सर्वश्रेष्ठ स्लिप फील्डर रहे हैं जिनके नाम आउटफील्ड में सबसे ज्यादा कैच लेने का विश्व रिकॉर्ड है. उनके इस पहलू का ज्यादा जिक्र नहीं हुआ है. कैच लेने की उनकी शैली भी किसी कला से कम नहीं. अपने सटीक पूर्वानुमान के बूते वे तुरंत पोजीशन में आ जाते हैं और कैच कितना भी मुश्किल हो इसकी वजह से अक्सर उन्हें रोमांचक छलांग लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. स्लिप में खड़े द्रविड़ का संतुलन देखने लायक होता है. पोजीशनिंग की कला का अध्ययन उन्हें देखकर किया जा सकता है. खासकर स्पिनरों के साथ. 100 के करीब कैच तो उन्होंने कुंबले और हरभजन की गेंदों पर पकड़े हैं. इससे पता लगता है कि भारत के दो सफलतम स्पिनरों के करिअर को आकार देने में उन्होंने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसलिए जब द्रविड़ खेल को अलविदा कहेंगे तो टीम में दो शून्य पैदा होंगे. पहला मध्यक्रम में एक शानदार बल्लेबाज की कमी का और दूसरा स्लिप में अब तक के सर्वश्रेष्ठ फील्डर का.

यह सब देखते हुए स्वाभाविक रूप से उनकी तुलना हैमंड के साथ होती है. हैमंड भी एक मनोहर बल्लेबाज थे जिनके पास सबसे मशहूर कवर ड्राइव थी और वे स्लिप के असाधारण फील्डर भी थे. हैमंड भी अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज होते मगर उनसे कम मनोहर मगर ज्यादा प्रभावी ब्रैडमैन के चलते ऐसा नहीं हो पाया. द्रविड़ पुराने मिजाज के आधुनिक खिलाड़ी हैं.

क्रिकेट उन चंद खेलों में से एक है जहां पुराने मिजाज का यानी ओल्ड फैशंड होना तारीफ के तौर पर लिया जाता है. दूसरे खेलों में ऐसा नहीं होता. उदाहरण के तौर पर यदि आप रफेल नाडाल को ओल्ड फैशंड कहेंगे तो यह उनका अपमान हो जाएगा. दरअसल भाषा में यह शब्द इस तरह से ढल गया है कि इसके मायने जिद्दी, कठोर या किसी नकारात्मक बात से लगाए जाने लगे हैं. मगर द्रविड़ के मामले में यह शब्द एक ऐसे खिलाड़ी को दर्शाता है जिसने आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया, एक ऐसा खिलाड़ी जो खेल का व्याकरण समझता है और इसका प्रयोग आदर्श निबंध जैसी पारियां लिखने में करता है.

हर पेशे में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने साथियों के लिए आदर और प्रेरणा की वजह होते हैं. यह सिर्फ क्षमताओं की बात नहीं होती बल्कि इसका लेना-देना स्वभाव, अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में संकट से बाहर निकलने और निकालने की योग्यता से भी होता है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से द्रविड़ भारतीय क्रिकेट में यह भूमिका निभाते आ रहे हैं. इसे देखते हुए यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है कि जब भी कल की बड़ी उम्मीदें लड़खड़ाने लगती हैं तो वर्तमान और भविष्य के बीच के पुल को मजबूत करने के लिए द्रविड़ सामने आते हैं. हाल ही में ऐसा तब हुआ जब दो साल तक एकदिवसीय क्रिकेट से दूर रखे जाने के बाद उन्हें चैंपियंस ट्रॉफी के लिए एकदिवसीय टीम में शामिल किया गया. मगर साफ था कि उनकी भूमिका उन्हें अच्छे से नहीं समझाई गई थी. क्या यह एक अस्थायी इंतजाम था क्योंकि टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका की उछाल भरी पिचों पर खेला जा रहा था जहां आईपीएल के पहले एपिसोड के कई युवा स्टार ढेर हो चुके थे? या इसका मतलब यह था कि वे 2011 के विश्वकप के दौरान टीम में होंगे? या फिर ऐसा यूं ही किया जा रहा था?

चैंपियंस ट्रॉफी में तो द्रविड़ ने अच्छा प्रदर्शन किया मगर आसान घरेलू विकेटों पर उन्हें कहीं बड़ी चुनौती मिली और उन्हें नौजवानों के लिए जगह छोड़नी पड़ी. यह देखकर खराब लगता है कि अपने करिअर के शुरुआती और आखिरी दोनों छोरों पर द्रविड़ जैसे खिलाड़ी को इस तरह खिलाया गया. करिअर के मध्य दौर में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था. इंग्लैंड के दौरे पर उनके लिए जो गड्ढ़ा खोदा गया था उससे बाहर निकलने में द्रविड़ को दो साल लग गए. वक्त बुरा हो तो साथी भी साथ छोड़ देते हैं. इस सीरिज के बाद कुछ जूनियर खिलाड़ियों ने भी उनकी आलोचना की थी. उनकी बल्लेबाजी का वह आत्मविश्वास गायब हो गया था. यहां तक कि उनकी फील्डिंग भी खराब हो गई. 14 पारियों में वे कोई शतक नहीं बना सके और उनका औसत फिसलकर 38 पर आ गया. लगातार यह कहा जाने लगा कि उनका वक्त खत्म हो गया है. कइयों ने उन्हें लड़ने की बजाय सम्मानजनक तरीके से संन्यास की सलाह भी दी. मगर शायद वे द्रविड़ की प्रकृति को भूल गए थे. भूल गए थे कि द्रविड़ को सबसे ज्यादा प्रेरणा ही तब मिलती है जब कोई कहे कि तुम इस लायक नहीं हो.

दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के खिलाफ उनके शतक आलोचकों को शांत करने में नाकामयाब रहे. मगर इसके बाद न्यूजीलैंड सीरिज में भी जब उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया तो सब खामोश हो गए. फिर अहमदाबाद और कानपुर की पारियों में उसी पुराने द्रविड़ की झलक दिखी. उसी सफाई, आक्रमण और नियंत्रण की जिसके बल पर वे अपने बेहतरीन वर्षों में गेंदबाजों को पस्त करते रहे थे. अचानक ही 36 की उम्र में दो महान भारतीय खिलाड़ियों को एक नया जीवन मिल गया है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 175  रनों की असाधारण पारी ने इस बहस को फिलहाल तो विराम दे दिया है कि 2011 में होने वाले विश्वकप के लिए तेंदुलकर टीम में होंगे अथवा नहीं. द्रविड़ भी हो सकते हैं मगर यदि ऐसा नहीं होता तो भी उन्हें ज्यादा निराशा नहीं होगी. क्योंकि उनके बल्ले से अब फिर से रनों की बरसात होने लगी है. और ये रन उसी तरीके से बन रहे हैं जिसमें उन्हें सबसे ज्यादा आनंद आता है.

तेंदुलकर सरीखी प्रतिभा की महानता को आंकना मुमकिन नहीं. द्रविड़ की महानता न सिर्फ समझ में आती है बल्कि आश्वस्त भी करती है. तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी खेल में दुर्लभता से ही पैदा होते हैं और जब वे जाते हैं तो यह मान लिया जाता है कि उनकी जगह को कभी नहीं भरा जा सकता. उनकी कोई विरासत नहीं होती. विरासत गावस्कर और द्रविड़ सरीखे खिलाड़ी छोड़ते हैं. अपनी सही कीमत और भारतीय क्रिकेट में अपने योगदान को जानने के लिए द्रविड़ को शायद अभी इंतजार करना होगा. वे असीमित धैर्य वाले इंसान हैं और लगता भी नहीं कि उन्हें कोई जल्दी है.

कर्म की वीरता, भाग्य की क्रूरता

क्रिकेट के इतिहास में राहुल द्रविड़ की क्या जगह होगी? क्या उन्हें एक सर्वश्रेष्ठ सहायक स्तंभ के रूप में याद किया जाएगा या फिर एक महान खिलाड़ी के तौर पर जो गलत दौर में पैदा हो गया? सुरेश मेनन का दिलचस्प आकलन 

प्रशंसा और सहानुभूति, राहुल द्रविड़ के करिअर में ये दोनों चीजें अक्सर एक साथ मौजूद रही हैं. क्रिकेट के मक्का लॉर्ड्स में अपना पहला ही टेस्ट खेलते हुए द्रविड़ ने जब 95 रन बनाए तो उनसे सहानुभूति रखे बिना उन्हें बधाई नहीं दी जा सकती थी क्योंकि उसी मैच में सौरव गांगुली ने 131 रन बना दिए थे और गांगुली का भी वह पहला मैच था. इसी तरह अहमदाबाद में श्रीलंका के खिलाफ पहले टेस्ट में भी 177 रन की शानदार पारी के लिए उन्हें बधाई तो मिली पर साथ ही उनसे सहानुभूति भी जताई गई कि वे दुर्भाग्य से अपना छठवां दोहरा शतक बनाने से चूक गए.

द्रविड़ के मूल्यांकन की हर चर्चा तेंदुलकर से शुरू होती है, वैसे ही जैसे वॉल्टर हैमंड के आकलन के लिए पहले डॉन ब्रैडमैन और रोहन कन्हाई के विश्लेषण के लिए गैरी सोबर्स की बात करना जरूरी होता है. द्रविड़, हैमंड और कन्हाई की उपलब्धियों को सही जगह सिर्फ इसलिए नहीं मिल सकी क्योंकि उनके साथ उनके दौर के सबसे महान खिलाड़ी पैदा हो गए

द्रविड़ की किस्मत ही कुछ ऐसी रही है. एक टेस्ट में उन्होंने 180 रन का आंकड़ा छुआ तो उन्हीं के साथ दूसरे छोर पर खड़े वीवीएस लक्ष्मण ने 281 रन की पारी खेल डाली जिसे किसी भी भारतीय बल्लेबाज द्वारा अब तक खेली गई सर्वश्रेष्ठ पारी कहा जाता है. एक वनडे मैच में जब उन्होंने उस समय का अपना सबसे बड़ा स्कोर बनाते हुए 145 रन बनाए तो उसी पारी में सौरव गांगुली ने 183 रनों का शिखर छू लिया. फिर जब द्रविड़ ने अपना यह रिकॉर्ड तोड़ते हुए न्यूजीलैंड के खिलाफ 153 रन मारे तो उसी पारी में सचिन तेंदुलकर ने नाबाद रहते हुए 186 रन ठोक डाले. सवाल है कि क्रिकेट के इतिहास में राहुल द्रविड़ को कैसे याद किया जाएगा. एक सर्वश्रेष्ठ सहायक स्तंभ के रूप में या एक महान खिलाड़ी के तौर पर जो गलत दौर में पैदा हो गया? जवाब है, दोनों तरह से. खेल के इतिहास में द्रविड़ अब तक के सबसे सर्वश्रेष्ठ सहायक स्तंभ हैं इसका सबूत है टेस्ट मैचों में उनकी 79 शतकीय साझेदारियां, जो एक विश्व रिकॉर्ड है. और वे महान खिलाड़ी हैं यह इससे साबित हो जाता है कि खेल के दोनों ही संस्करणों में उन्होंने दस हजार से ज्यादा रन बनाए हैं.

इससे यह निष्कर्ष निकालना आसान लगता है कि द्रविड़ गलत दौर में पैदा हो गए जिसकी वजह से उन्हें सचिन तेंदुलकर की छाया में खेलना पड़ा. मगर यह बात उस शख्स के लिए जरा भी मायने नहीं रखती जिसकी होड़ सिर्फ खुद से है और जिसने कभी बिना हिचक कहा था, ‘ज्यादातर लोग चाहते हैं कि मैं जल्दी आउट हो जाऊं ताकि वे सचिन को बल्लेबाजी करता देख सकें.’ मगर आज सचिन का कोई धुर प्रशंसक भी द्रविड़ की बल्लेबाजी को धैर्य से देखने के लिए तैयार है क्योंकि उसे पता है कि द्रविड़ के जल्दी आउट होने का मतलब है मुसीबत. श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद में खेले गए टेस्ट में 32 रन पर भारत के चार विकेट गिर गए थे. सहवाग, तेंदुलकर, लक्ष्मण पैवेलियन लौट चुके थे, मगर दर्शकों की उम्मीदें कायम थीं. इसलिए कि द्रविड़ क्रीज पर थे और जब तक वे क्रीज पर थे तो बिना चिंता किए रहा जा सकता था. उन्होंने निराश नहीं किया और भारत को 400 के पार ले गए.

सहवाग या तेंदुलकर जहां दर्शकों की सांसें ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे कर देते हैं वहीं द्रविड़ के साथ ऐसा नहीं होता. वे जिंदगी को सामान्य ताल से चलने देते हैं. चकाचौंध से परहेज करने वाला यह शख्स अपने लिए ज्यादा जगह घेरने में यकीन नहीं रखता. खेल के लिए उनके जुनून और उनकी सूझबूझ के बारे में सब जानते हैं और यह एक ऐसा संयोग है जो लगाव और उनसे घुलने-मिलने की इच्छा से कहीं ज्यादा उनके लिए प्रशंसा और आदर का भाव पैदा करता है. किसी को अगर यह जानना हो कि एक आदर्श खिलाड़ी को कैसा होना चाहिए तो द्रविड़ इसका जवाब हैं-विनम्र, भरोसेमंद, शिक्षित, दबाव में भी अपनी गरिमा बनाए रखने वाले और परिपक्व. राहुल द्रविड़ उन लोगों के लिए राहत हैं जिन्हें पता है कि वे सचिन तेंदुलकर नहीं बन सकते. वीरेंद्र सहवाग ने कभी उन्हें एक ऐसा मनोवैज्ञानिक कहा था जिसके पास अपनी सभी समस्याएं लेकर जाया जा सकता है.

तेंदुलकर के साथ खेलते हुए भी द्रविड़ ने अपनी एक अलग ही पहचान विकसित की. इस दौरान उन्होंने सुनिश्चित किया कि भारतीय टीम में क्रिकेट के कुछ अनूठे परंपरागत मूल्य बचे रहें. कोलकाता में लक्ष्मण के साथ की गई ऐतिहासिक पारी के कुछ साल बाद तक द्रविड़ ने भारतीय बल्लेबाजी को एक तरह से अपने कंधों पर ढोया. पोर्ट ऑफ स्पेन, जॉर्ज टाउन और नॉटिंघम में खेले गए टेस्ट मैचों में जिनमें हार सामने दिख रही थी, वे टीम के तारनहार बने. हेडिंग्ली, एडीलेड, कैंडी और रावलपिंडी में टीम को मिली जीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई. लगातार चार पारियों में उनके बल्ले से चार शतक निकले और 15 टेस्टों में उन्होंने चार दोहरे शतक अपने नाम किए. दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि इस दौरान सौरव गांगुली की कप्तानी में भारत ने जिन 21 मैचों में जीत हासिल की उनमें टीम के कुल रनों में से 23 फीसदी अकेले द्रविड़ बना गए थे और उनका औसत 102.84 था. इस दौरान उनका कुल औसत सचिन से भी आगे निकल गया था और गेंदबाजों के लिए उनका विकेट सबसे कीमती हुआ करता था.

गंभीरता और शांतचित्तता, द्रविड़ के ये दो ऐसे गुण हैं जो उन्हें उस तरह का हीरो नहीं बनने देते जैसे गांगुली कोलकाता में, धोनी झारखंड में और तेंदुलकर पूरे देश में हैं

आंकड़ों की गहराई में उतरने का मकसद सिर्फ यही दिखाना है कि द्रविड़ की वीरता को अक्सर भाग्य की क्रूरता लीलती रही है. वे एक मनमोहक शैली वाले बल्लेबाज हैं जिनकी हर पारी परिणाम के साथ जुड़ी दिखती है, जिनका हर शतक अलग नजर नहीं आता बल्कि टीम के अच्छे प्रदर्शन के साथ घुला-मिला लगता है. और इसके बावजूद द्रविड़ के मूल्यांकन की हर चर्चा तेंदुलकर से शुरू होती है, वैसे ही जैसे वॉल्टर हैमंड के आकलन के लिए पहले डॉन ब्रैडमैन और रोहन कन्हाई के विश्लेषण के लिए गैरी सोबर्स की बात करना जरूरी होता है. द्रविड़, हैमंड और कन्हाई की उपलब्धियों को सही जगह सिर्फ इसलिए नहीं मिल सकी क्योंकि उनके साथ उनके दौर के सबसे महान खिलाड़ी पैदा हो गए. ऐसे खिलाड़ी जिन्होंने उपलब्धियों के मामले में उनसे कुछ बड़ी लकीरें खींच दीं.

जिस गरिमा के साथ द्रविड़ ने अभी तक अपना सफर तय किया है वह एक असाधारण मिसाल है. विवादों से वे अप्रभावित रहे हैं. मैदान पर उनके साथ सबसे बुरा वाकया यही हुआ कि एक मैच के दौरान उनके मुंह में रखी टाफी अचानक बाहर निकलकर उनके हाथ पर गिर गई और चिपचिपी हो गईं उनकी उंगलियां जब गेंद पर लग गईं तो उन्होंने इसे पोंछ दिया. मैच रैफरी क्लाइव लॉयड ने इसे गेंद के साथ छेड़छाड़ माना और जुर्माने के तौर पर उनकी 50 फीसदी मैच फीस काट ली. द्रविड़ ने भी कुछ नहीं कहा और न किसी और ने. बात आई गई हो गई. मगर जब ऐसा ही एक फैसला तेंदुलकर के मामले में सुनाया गया तो पूरे देश में भूचाल आ गया और यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की खबर बन गई.

गंभीरता और शांतचित्तता, द्रविड़ के ये दो ऐसे गुण हैं जो उन्हें उस तरह का हीरो नहीं बनने देते जैसे गांगुली कोलकाता में, धोनी झारखंड में और तेंदुलकर पूरे देश में हैं. असल में सज्जनता को बाजार भाव नहीं देता. हालांकि द्रविड़ कड़े मन वाले इंसान भी हैं. मुल्तान टेस्ट को ही लें जब उन्होंने यह जानते हुए भी कि तेंदुलकर 194 पर नाबाद हैं, पारी घोषित कर दी थी. मगर फिर भी उनमें वह धार नहीं है जो लोगों में बहस पैदा कर सके.मान लें कि तेंदुलकर पैदा नहीं हुए होते तो? (और यह बात पक्की है कि उन्हें बनाया नहीं जा सकता था) तो फिर हम उसी जुनून के साथ द्रविड़ की बात करते जिस जुनून में हम तेंदुलकर को भगवान कहते हैं. मीडिया यह बहस करता कि उनमें या सुनील गावस्कर में कौन श्रेष्ठ है. आंकड़ों के ये तर्क पेश किए जाते कि 23 टेस्ट मैचों में भारत की जीत के दौरान गावस्कर का औसत 44 था जबकि द्रविड़ के टीम में रहते भारत को जिन 44 मैचों में जीत हासिल हुई उनमें द्रविड़ का औसत लगभग 67 है. और जिन मैचों में भारत हारा उनमें द्रविड़ का औसत 26 है जो उनकी उपयोगिता दर्शाता है. यह भी कहा जाता कि द्रविड़ का औसत घर से ज्यादा विदेशी धरती पर बेहतर रहा है और उन्होंने जो 27 शतक बनाए हैं उनमें से 26 टीम की जीत के साथ जुड़े हैं.

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसकी संदर्भ में कम ही रुचि रहती है. इस खेल की प्रकृति के चलते ही यह संभव है कि हम न सिर्फ व्यक्तिगत प्रदर्शनों को अलग करके देख सकते हैं बल्कि व्यापक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता की परवाह किए बिना उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. द्रविड़ के रिकॉर्ड को  अलग करके देखा जाए तो यह शानदार और हैरतअंगेज है, खासकर जीत और हार के संदर्भ में. उस दौर में जब भारत जीतने की बजाय हारता ज्यादा था तो कुछ व्यक्तिगत प्रदर्शनों को अलग करके देखना टीम के निराशानजनक प्रदर्शन की पीड़ा पर राहत के थोड़े से मरहम का काम करता था. आस्ट्रेलिया ने भले ही भारत को पस्त कर दिया हो मगर उस मैच को याद रखने के लिए विजय हजारे के दो शतक होते थे, टीम भले ही वेस्टइंडीज के सामने बिखर गई हो मगर सुनील गावस्कर की बल्लेबाजी सांत्वना का काम कर देती थी.

मैदान में भी कहानी कुछ ऐसी ही है. तेंदुलकर की बल्लेबाजी जहां घूमते बल्ले के अलग-अलग कोणों से निकलते शॉटों का सुखद नजारा होती है वहीं द्रविड़ सीधे बल्लों से खूबसूरत शॉटों की झड़ी लगाते हैं

तेंदुलकर और द्रविड़ दोनों अपनी पीढ़ी के और कहा जाए तो हर पीढ़ी के तकनीकी रूप से सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में से हैं. उनके बीच बुनियादी फर्क है उनकी शैली. तेंदुलकर सुरक्षात्मक कम हैं और आक्रामक ज्यादा. आक्रमण करते हुए वे ज्यादा सृजनात्मक होते हैं. उनके लिए शॉट के तरीके से ज्यादा जरूरी चीज है उस शॉट का नतीजा. वहीं बनिस्बत ऊंचे कद के द्रविड़ के लिए शैली और नतीजा दोनों ही अहम हैं. वे सही काम सही तरीके से करने में यकीन रखते हैं. यानी चीज आदर्श हो तो उसे बनाने का तरीका भी आदर्श ही होना चाहिए.

इस विचार प्रक्रिया का जितना लेना-देना लालन-पालन से है उतना ही शिक्षा से भी. द्रविड़ उस स्कूल और कॉलेज में पले-बढ़े जहां यह सिखाया जाता था कि अगर आप तरीके पर ध्यान दें तो उत्पाद अपने आप ही अच्छा बन जाएगा. अपनी जीवनी के जारी होने के मौके पर वक्ताओं द्वारा प्रशंसा किए जाने पर द्रविड़ का कहना था, ‘अगर आप 30 साल की उम्र तक कुछ अच्छा कर लेते हैं तो कुछ लोग इसे इस तरह बताते हैं कि आपने बहुत असाधारण काम कर दिया है. मेरे बारे में कही गई ये सब चीजें बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हैं इसलिए जब आप इस किताब को बढ़ें तो हर चीज पर आंख मूंदकर यकीन न करें.’ यह है द्रविड़ का बेजोड़ फॉरवर्ड डिफेंस और उनकी विनम्रता का उदाहरण भी.

यह बंगलुरु की घटना है, एक ऐसा शहर जहां के वे बाशिंदे हैं. जहां वे किसी रेस्टोरेंट या किसी आयोजन में बेझिझक जा सकते हैं. मुझे याद है कि एक संगीत आयोजन के दौरान वे किस तरह भीड़ में किसी आम आदमी की तरह जगह बनाते हुए आगे जा रहे थे. उन्हें तेंदुलकर की तरह भेष बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. दूसरी ओर यह उनके गृहनगर में उनके प्रशंसकों की परिपक्वता को भी दिखाता है.

मैदान में भी कहानी कुछ ऐसी ही है. तेंदुलकर की बल्लेबाजी जहां घूमते बल्ले के अलग-अलग कोणों से निकलते शॉटों का सुखद नजारा होती है वहीं द्रविड़ सीधे बल्लों से खूबसूरत शॉटों की झड़ी लगाते हैं. इस मायने में वे गुंडप्पा विश्वनाथ के उत्तराधिकारी हैं जिनके स्क्वॉयर कटों की कला उन्हें मानो विरासत में मिल गई है. जब द्रविड़ को भारतीय टीम के लिए चुना गया था तो उन्होंने अपने एक साथी से कहा था, ‘मैं एक आम खिलाड़ी भर नहीं रह जाना चाहता. मैं चाहता हूं कि मुझे गावस्कर और विश्वनाथ की श्रेणी में रखा जाए.’ स्कूली दिनों में उन्होंने इन दोनों शख्सियतों के साथ फोटो खिंचवाई हुई थी. आने वाले दौर में वे अपने उन्हीं आदर्शों के साथ एक मेज पर खाना खाने वाले थे.

उन्होंने गावस्कर से ज्यादा स्ट्रोक खेले हैं और वह भी गावस्कर से ज्यादा निरंतरता के साथ. उन्होंने विश्वनाथ से भी ज्यादा जोखिम भरे शॉट खेले हैं मगर विश्वनाथ की तुलना में ज्यादा सुरक्षित तरीके से. अपनी पीढ़ी में अपनी तरह का यह अकेला खिलाड़ी तेज गेंदबाजों को या तो अपनी जगह पर खड़े-खड़े परेशान करता रहा है या कलाई के सटीक घुमाव और सही टाइमिंग और प्लेसमेंट के जरिए. पुल शॉट मारते हुए कभी-कभी तो द्रविड़ इतना घूम जाते हैं कि उनका चेहरा विकेटकीपर के सामने आ जाता है. यह बात भी गौर करने वाली है कि टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण के बाद 94 मैचों तक वे किसी बीमारी या चोट की वजह से बाहर नहीं हुए. यह उनकी शानदार फिटनेस का नमूना है. तेंदुलकर के कद पर डॉन ब्रैडमैन ने मुहर लगाई. द्रविड़ इस मामले में रह गए. उनके संदर्भ में यह काम वॉल्टर हैमंड कर सकते थे, मगर उनका देहावसान द्रविड़ के जन्म से पहले ही हो चुका था. और ग्रेग चैपल अभी उतने पुराने नहीं हुए कि यह काम कर सकें.

कुछ साल पहले द्रविड़ ने कहा था कि ऑफ साइड ड्राइव के मामले में भगवान के बाद तो सौरव गांगुली ही हैं. गांगुली ने अगर इसके बदले में कुछ कहा होता तो वे शायद यह कहते कि ऑन साइड में द्रविड़ की होड़ भगवान के साथ है. इस दौर के बल्लेबाजों को देखा जाए तो सिर्फ महेला जयवर्धने ही ऐसे नजर आते हैं जो लेग ग्लांस के मामले में द्रविड़ का मुकाबला कर सकें. द्रविड़ की लंबी पारियों पर नजर डालें तो साफ दिख जाता है कि ऑन साइड पर वे एकछत्र राज करते हैं. खेल के इतिहास की सबसे खूबसूरत कवर ड्राइवों में एक उनके पास है.

द्रविड़ के साथ अक्सर ऐसा रहा कि पहले उन्हें खारिज कर दिया गया और बाद में उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से हर आलोचक को खामोश कर दिया. चाहे वह एक दिवसीय क्रिकेट में छाने का उदाहरण हो या फिर आईपीएल में अपनी धाक जमाने का जिसके पहले संस्करण में असफल रहने के बाद दूसरे संस्करण में उन्होंने अपने बल्ले से सबका मुंह बंद कर दिया. द्रविड़ के पिता भी क्रिकेटर रहे हैं और उनके लिए भी यह सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि जीवन दर्शन रहा है. शुरुआती दिनों में ही द्रविड़ ने यह साफ कर दिया था कि वे न सिर्फ टीम में किसी भी जगह पर बल्लेबाजी करने के लिए तैयार हैं बल्कि विकेटकीपिंग भी कर लेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो शायद पिच भी तैयार कर लेंगे. खेल के साथ उनका जुड़ाव संपूर्ण है. 12 साल की उम्र पार करने के बाद भी किसी खेल के लिए इस तरह का जुनून किसी को समझने में मुश्किल लग सकता है मगर तेंदुलकर और द्रविड़ के लिए क्रिकेट ही जीवन है. एक आदर्श दिन की उनकी कल्पना किसी आम दिन से अलग नहीं है जिसमें वे क्रिकेट खेलते हैं और लगातार बल्लेबाजी करते चले जाते हैं.

मगर तेंदुलकर जहां हमले के जरिए अपनी बादशाहत कायम करते हैं वहीं द्रविड़ अपने प्रभुत्व को खुद के और गेंदबाज के बीच का राज रहने देते हैं. सिर्फ अनुभवी आंखें ही बता सकती हैं कि उन्होंने गेंदबाज को परेशान कर रखा है. उनकी भाव-भंगिमाएं या और कोई हरकत उनके हमले का संकेत नहीं देती. एक महान अभिनेता की तरह द्रविड़ बहुत ज्यादा मुखर नहीं होते. वे द्रुत की जगह विलंबित ताल में खेलते हैं और समय-समय पर अपने सुरक्षात्मक ठोस शॉट के जरिए भी गेंदबाज की हवा निकालते रहते हैं. उनके लिए रचा गया द वॉल यानी दीवार का संबोधन सही नहीं है. दीवार तो सिर्फ आक्रमण को झेलती है. उसका जवाब नहीं देती. द्रविड़ ऐसे नहीं हैं. वे जानते हैं कि शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर वे गेंदबाज से इक्कीस हैं. और वे इसी रणनीति के साथ लड़ाई को दुश्मन के खेमे में ही ले जाते हैं.

टेस्ट क्रिकेट द्रविड़ के मिजाज से मेल खाता है. जैसे उनसे पहले गावस्कर और उनसे भी पहले विजय हजारे और मर्चेंट के मिजाज से खाता था. ऐसे में यह कल्पना करना आसान है कि द्रविड़ का असली रूप खेल के इस लंबे संस्करण में ही दिख सकता है. मगर अपनी शुरुआती प्रतिकूलता पर विजय पाकर उन्होंने एकदिवसीय क्रिकेट में सफलता के जो झंडे गाड़े वह दिखाता है कि उनके दिल और दिमाग का तालमेल कितना जबर्दस्त है. गावस्कर ऐसा नहीं कर पाए थे.

इस बात पर बहस हो सकती है कि सबसे बड़ा भारतीय बल्लेबाज कौन है या किस स्पिनर को नंबर वन कहा जाना चाहिए मगर इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारतीय टीम में अब तक द्रविड़ सर्वश्रेष्ठ स्लिप फील्डर रहे हैं जिनके नाम आउटफील्ड में सबसे ज्यादा कैच लेने का विश्व रिकॉर्ड है

द्रविड़ को खेल के इस छोटे संस्करण में स्वीकार्यता पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी. शुरुआती दिनों में उनके तरकश में शॉट तो होते थे मगर एक पारंपरिक क्षेत्ररक्षण व्यूह बनाकर उन्हें काबू किया जा सकता था. वे बॉल को उठाकर नहीं मारते थे और तेज पिचों पर उठती गेंदों को तेंदुलकर और गांगुली की तरह उनकी उछाल पर नहीं खेलते थे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अपने पहले साल में एकदिवसीय मैचों में द्रविड़ का उच्चतम स्कोर 90 रहा. उन्होंने 20 मैच खेले और उनका औसत रहा 28 जिसे ठीक-ठाक कहा जा सकता है. अगले साल उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ एक शतक जमाया और उनका औसत बढ़कर 40 हो गया. मगर इसके बाद उनसे साथ एक छल हुआ जो भारतीय क्रिकेट में नई बात नहीं है. उनसे कहा गया कि जब टीम में तेंदुलकर, अजहरुद्दीन, गांगुली, अजय जडेजा जैसे बल्लेबाज हैं तो उनकी भूमिका यह है कि वे एक छोर थामे रखें और 50 ओवर तक बल्लेबाजी करें.

द्रविड़ ने इन निर्देशों का पालन किया, इतनी अच्छी तरह किया कि उनका स्ट्राइक रेट गिर गया और विडंबना देखिए कि उन्हें इसी वजह से टीम से बाहर कर दिया गया. उनपर एक ठप्पा लगाकर उन्हें खारिज कर दिया गया. ठप्पा यह था कि उनकी रन गति धीमी है और इसलिए वे एकदिवसीय क्रिकेट में फिट नहीं हो सकते. मगर द्रविड़ ने कड़ी मेहनत की और टीम में फिर से जगह पाने में कामयाब रहे. 1999 का विश्व कप सामने था और इसमें उन्होंने खुद को एक शानदार एकदिवसीय बल्लेबाज के रूप में स्थापित कर लिया. अब उनके बल्ले से निकले शॉट सीमा पार पहुंच रहे थे और उन्हें उठाकर शॉट मारने में कोई हिचक नहीं हो रही थी. नतीजतन 461 रनों के साथ वे टूर्नामेंट के अगुवा बल्लेबाज के रूप में उभरे. इस दौरान उनका औसत 66 था और स्ट्राइक रेट 86. टूर्नामेंट में उन्होंने दो शतक लगाए थे.

जल्दी ही बल्लेबाजी क्रम में उन्होंने खुद को एक लचीले विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया. वे पारी की शुरूआत भी कर सकते थे, नंबर तीन पर भी खेल सकते थे और अगर लक्ष्य का पीछा करते हुए मानसिक रूप से सुरक्षित रहने की जरूरत पड़ी तो और भी नीचे के क्रम में आ सकते थे. अनिच्छा के बावजूद उन्होंने विकेटकीपिंग भी की क्योंकि इससे टीम में जरूरत के मुताबिक एक अतिरिक्त गेंदबाज या बल्लेबाज की जगह हो जाती थी. एकदिवसीय क्रिकेट ने विश्वनाथ और द्रविड़ के बीच अंतर भी पैदा किया. विश्वनाथ अपने करिअर के बाद के वर्षों में शैली के लिहाज से लगातार पारंपरिक होते चले गए थे. यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसे बढ़ती उम्र और धीमी प्रतिक्रिया ने उनपर थोप दिया था. उन्होंने लेग की बजाय मिडिल स्टंप पर गार्ड लेना शुरू कर दिया था और वे सीधे बल्ले से ज्यादा खेलने लगे थे. द्रविड़ इससे बिल्कुल उल्टी दिशा में गए. उन्होंने अपने कुछ ऐसे छिपे पहलू खोज निकाले जो एकदिवसीय क्रिकेट पर बिल्कुल फिट बैठते थे. उन्होंने परंपरा की बेड़ियों से धीरे-धीरे खुद को मुक्त किया और खेल को और भी सृजनात्मक तरीके से खेलना शुरू किया. वैसे भी अगर गेंदबाज और विकेटकीपर को छोड़ दें तो मैदान पर नौ जगहों पर ही तो क्षेत्ररक्षक लगाए जा सकते हैं. खाली जगहें तमाम होती हैं. मिड ऑन और मिड विकेट के बीच की जगह तो द्रविड़ की पसंदीदा बन गई. कवर प्वाइंट के बाईं तरफ की खुली जगह भी उन्हें रास आई. अगर कप्तान फील्डरों की जगह में बदलाव करते तो उनके तरकश में तब भी पर्याप्त हथियार होते जिनसे वे रन बटोर लेते.

तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी खेल में दुर्लभता से ही पैदा होते हैं और जब वे जाते हैं तो यह मान लिया जाता है कि उनकी जगह को कभी नहीं भरा जा सकता. उनकी कोई विरासत नहीं होती. विरासत गावस्कर और द्रविड़ सरीखे खिलाड़ी छोड़ते हैं

जब द्रविड़ ने कप्तानी की कमान संभाली तो उन्होंने खेल का आनंद लेने की अहमियत पर जोर दिया. यह बढ़िया रणनीति थी. उनका कहना भी था कि सहजता के बिना अच्छा नहीं खेला जा सकता. और जब इंग्लैंड के दौरे के बाद तत्कालीन बोर्ड मुखिया के साथ झड़पों की वजह से उन्होंने कप्तानी छोड़ी तो वे तेंदुलकर का ही अनुसरण कर रहे थे. तेंदुलकर ने भी कप्तानी छोड़ दी थी. इसलिए नहीं कि उन्हें यह पसंद नहीं थी बल्कि इसलिए कि इसके साथ जुड़ी राजनीति से उन्हें नफरत थी. इस बात पर बहस हो सकती है कि सबसे बड़ा भारतीय बल्लेबाज कौन है या किस स्पिनर को नंबर वन कहा जाना चाहिए मगर इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारतीय टीम में अब तक द्रविड़ सर्वश्रेष्ठ स्लिप फील्डर रहे हैं जिनके नाम आउटफील्ड में सबसे ज्यादा कैच लेने का विश्व रिकॉर्ड है. उनके इस पहलू का ज्यादा जिक्र नहीं हुआ है. कैच लेने की उनकी शैली भी किसी कला से कम नहीं. अपने सटीक पूर्वानुमान के बूते वे तुरंत पोजीशन में आ जाते हैं और कैच कितना भी मुश्किल हो इसकी वजह से अक्सर उन्हें रोमांचक छलांग लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. स्लिप में खड़े द्रविड़ का संतुलन देखने लायक होता है. पोजीशनिंग की कला का अध्ययन उन्हें देखकर किया जा सकता है. खासकर स्पिनरों के साथ. 100 के करीब कैच तो उन्होंने कुंबले और हरभजन की गेंदों पर पकड़े हैं. इससे पता लगता है कि भारत के दो सफलतम स्पिनरों के करिअर को आकार देने में उन्होंने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसलिए जब द्रविड़ खेल को अलविदा कहेंगे तो टीम में दो शून्य पैदा होंगे. पहला मध्यक्रम में एक शानदार बल्लेबाज की कमी का और दूसरा स्लिप में अब तक के सर्वश्रेष्ठ फील्डर का.

यह सब देखते हुए स्वाभाविक रूप से उनकी तुलना हैमंड के साथ होती है. हैमंड भी एक मनोहर बल्लेबाज थे जिनके पास सबसे मशहूर कवर ड्राइव थी और वे स्लिप के असाधारण फील्डर भी थे. हैमंड भी अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज होते मगर उनसे कम मनोहर मगर ज्यादा प्रभावी ब्रैडमैन के चलते ऐसा नहीं हो पाया. द्रविड़ पुराने मिजाज के आधुनिक खिलाड़ी हैं.

क्रिकेट उन चंद खेलों में से एक है जहां पुराने मिजाज का यानी ओल्ड फैशंड होना तारीफ के तौर पर लिया जाता है. दूसरे खेलों में ऐसा नहीं होता. उदाहरण के तौर पर यदि आप रफेल नाडाल को ओल्ड फैशंड कहेंगे तो यह उनका अपमान हो जाएगा. दरअसल भाषा में यह शब्द इस तरह से ढल गया है कि इसके मायने जिद्दी, कठोर या किसी नकारात्मक बात से लगाए जाने लगे हैं. मगर द्रविड़ के मामले में यह शब्द एक ऐसे खिलाड़ी को दर्शाता है जिसने आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया, एक ऐसा खिलाड़ी जो खेल का व्याकरण समझता है और इसका प्रयोग आदर्श निबंध जैसी पारियां लिखने में करता है.

हर पेशे में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने साथियों के लिए आदर और प्रेरणा की वजह होते हैं. यह सिर्फ क्षमताओं की बात नहीं होती बल्कि इसका लेना-देना स्वभाव, अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में संकट से बाहर निकलने और निकालने की योग्यता से भी होता है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से द्रविड़ भारतीय क्रिकेट में यह भूमिका निभाते आ रहे हैं. इसे देखते हुए यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है कि जब भी कल की बड़ी उम्मीदें लड़खड़ाने लगती हैं तो वर्तमान और भविष्य के बीच के पुल को मजबूत करने के लिए द्रविड़ सामने आते हैं. हाल ही में ऐसा तब हुआ जब दो साल तक एकदिवसीय क्रिकेट से दूर रखे जाने के बाद उन्हें चैंपियंस ट्रॉफी के लिए एकदिवसीय टीम में शामिल किया गया. मगर साफ था कि उनकी भूमिका उन्हें अच्छे से नहीं समझाई गई थी. क्या यह एक अस्थायी इंतजाम था क्योंकि टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका की उछाल भरी पिचों पर खेला जा रहा था जहां आईपीएल के पहले एपिसोड के कई युवा स्टार ढेर हो चुके थे? या इसका मतलब यह था कि वे 2011 के विश्वकप के दौरान टीम में होंगे? या फिर ऐसा यूं ही किया जा रहा था?

चैंपियंस ट्रॉफी में तो द्रविड़ ने अच्छा प्रदर्शन किया मगर आसान घरेलू विकेटों पर उन्हें कहीं बड़ी चुनौती मिली और उन्हें नौजवानों के लिए जगह छोड़नी पड़ी. यह देखकर खराब लगता है कि अपने करिअर के शुरुआती और आखिरी दोनों छोरों पर द्रविड़ जैसे खिलाड़ी को इस तरह खिलाया गया. करिअर के मध्य दौर में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था. इंग्लैंड के दौरे पर उनके लिए जो गड्ढ़ा खोदा गया था उससे बाहर निकलने में द्रविड़ को दो साल लग गए. वक्त बुरा हो तो साथी भी साथ छोड़ देते हैं. इस सीरिज के बाद कुछ जूनियर खिलाड़ियों ने भी उनकी आलोचना की थी. उनकी बल्लेबाजी का वह आत्मविश्वास गायब हो गया था. यहां तक कि उनकी फील्डिंग भी खराब हो गई. 14 पारियों में वे कोई शतक नहीं बना सके और उनका औसत फिसलकर 38 पर आ गया. लगातार यह कहा जाने लगा कि उनका वक्त खत्म हो गया है. कइयों ने उन्हें लड़ने की बजाय सम्मानजनक तरीके से संन्यास की सलाह भी दी. मगर शायद वे द्रविड़ की प्रकृति को भूल गए थे. भूल गए थे कि द्रविड़ को सबसे ज्यादा प्रेरणा ही तब मिलती है जब कोई कहे कि तुम इस लायक नहीं हो.

दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के खिलाफ उनके शतक आलोचकों को शांत करने में नाकामयाब रहे. मगर इसके बाद न्यूजीलैंड सीरिज में भी जब उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया तो सब खामोश हो गए. फिर अहमदाबाद और कानपुर की पारियों में उसी पुराने द्रविड़ की झलक दिखी. उसी सफाई, आक्रमण और नियंत्रण की जिसके बल पर वे अपने बेहतरीन वर्षों में गेंदबाजों को पस्त करते रहे थे. अचानक ही 36 की उम्र में दो महान भारतीय खिलाड़ियों को एक नया जीवन मिल गया है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 175  रनों की असाधारण पारी ने इस बहस को फिलहाल तो विराम दे दिया है कि 2011 में होने वाले विश्वकप के लिए तेंदुलकर टीम में होंगे अथवा नहीं. द्रविड़ भी हो सकते हैं मगर यदि ऐसा नहीं होता तो भी उन्हें ज्यादा निराशा नहीं होगी. क्योंकि उनके बल्ले से अब फिर से रनों की बरसात होने लगी है. और ये रन उसी तरीके से बन रहे हैं जिसमें उन्हें सबसे ज्यादा आनंद आता है.

तेंदुलकर सरीखी प्रतिभा की महानता को आंकना मुमकिन नहीं. द्रविड़ की महानता न सिर्फ समझ में आती है बल्कि आश्वस्त भी करती है. तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी खेल में दुर्लभता से ही पैदा होते हैं और जब वे जाते हैं तो यह मान लिया जाता है कि उनकी जगह को कभी नहीं भरा जा सकता. उनकी कोई विरासत नहीं होती. विरासत गावस्कर और द्रविड़ सरीखे खिलाड़ी छोड़ते हैं. अपनी सही कीमत और भारतीय क्रिकेट में अपने योगदान को जानने के लिए द्रविड़ को शायद अभी इंतजार करना होगा. वे असीमित धैर्य वाले इंसान हैं और लगता भी नहीं कि उन्हें कोई जल्दी है.

नौटंकियां सरकारी, पात्र हम

दादाजी को जब रिटायरमेंट के बाद नगर पालिका से अपना हिसाब-किताब निपटाने के लिए अपनी दो-तीन चप्पलें-सैंडिल कम पड़ रही थीं तो वे अक्सर कहा करते थे कि हमारा तंत्न ही कुछ ऐसा है कि यह ईमानदार को झिला-झिलाकर परेशान-बेईमान होने और बेईमान को अपनी बेईमानी में चार-चांद लगाने के अवसर छप्पर फाड़ कर दिया करता है. बाद में बिजली का बिल हजारों में आने पर कुछ साल पहले पिताजी को भी कुछ-कुछ ऐसी ही पंक्तियां भुनभुनाते सुना है. चूंकि पिताजी और दादाजी की बातें केवल कानों से सुना करते थे इसलिए कभी ज्यादा समझ नहीं आईं. मगर हाल ही में जब रांची के मुकेश कुमार वल्द सियाशरण प्रसाद (कृपया इस नाम और नाम के पिता के नाम को कंठस्थ करें अन्यथा मेरी तरह आप भी अनंत में चक्कर लगाते रहेंगे) ने अपनी दुखभरी दास्तां सचित्न हमें लिख भेजी तो दादाजी का कहना सजीव हो उठा. हुआ दरअसल यह कि हाल ही में निर्वाचन आयोग ने उन्हें और उनकी पत्नी को मतदाता पहचान पत्न जारी किए हैं. पहले श्रीमान कुमार की बात करें तो उनके मतदाता पहचान पत्न में उनका नाम हिंदी में मुकेश कुमार है मगर अंग्रेजी वाले स्थान पर लिख दिया गया है राजेश कुमार. इसके अलावा उनके पिता के नाम को भी इसी प्रकार किसी अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान ने हिंदी और अंग्रेजी में दो प्रकार से- सियाशरण प्रसाद और सिया प्रसाद- लिखा है. यानी कि पिता के नामों के आलोक में अब श्रीमान कुमार (उनके सभी नामों में बस एक यही स्थायी तत्व है) एक से चार हो चुके हैं.

अब श्रीमती कुमार (असली नाम आशा) के पहचान पत्न को लें तो हिंदी में उनका नाम कुमारी आशा लिखा गया है और अंग्रेजी में मधु देवी तथा उनके पति भी हिंदी में मुकेश कुमार और अंग्रेजी में राजेश कुमार हैं. यानी कि पति के आलोक में देखा जाए तो वे भी चतुर्नामधारी और केवल हिंदी वाले नाम को देखने पर दो पतियों वाली कुमारी यानी कि अविवाहिता बन चुकी हैं. मुकेश कुमार ने अपने पत्न में जो सबसे पहली पंक्ति लिखी है वो है – यह क्या नौटंकी है?’ जाहिर सी बात है जिस व्यक्ति के दो पिता बना दिए गए हों, जिसकी बीबी को पहले कुमारी बनाया गया हो और फिर उसके पति के स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम लिख दिया गया वह इतना झल्लाने का अधिकार तो रखता ही है. श्रीमान कुमार परेशान हैं और पिछले काफी समय से इन गलतियों को सुधरवाने की कोशिश करते-करते खुद निर्वाचन आयोग पर बिगड़ते घूम रहे है.

मगर इसी प्रकार के पहचान पत्न यदि किसी उल्हासनगर के माल मार्का नकली आदमी के पल्ले पड़ जाते तो वह श्रीमान कुमार की तरह परेशान होकर दर-दर की खाक छानने की बजाय वोट से लेकर लोन और बिजली का कनेक्शन आदि पहले अपने चार-चार नामों से और फिर बाद में अपनी बीवी के चार-चार नामों से लेने-देने की कोशिश कर सकता था. ऐसा करने में पहचान पत्र की कचहरी के बाहर पांच मिनट में दावे के साथ खींची जाने वाली तस्वीरों से भी बढ़िया तसवीर उसका दिल खोलकर साथ देने वाली थी.

भैया श्रीमान कुमारजी, कोई ईमानदार होने को कहकर मंगल ग्रह चला गया है क्या? दादाजी और पिताजी (मेरे) की बात गांठ बांधो, यदि धोती कुर्ता पहनते हो तो या फिर रूमाल में ही सही और सुखमय जीवन का गारंटीशुदा सरकारी आशीर्वाद प्राप्त करो.

संजय दुबे 

आतंक का ऑक्सीजन बनता मीडिया

यदि समाचार चैनलों ने 26/11 से कोई एक सबक सीखा है तो वह यह कि खून का बहना ही सबसे बड़ी सुर्खी है

जाने-माने पत्नकार वीर संघवी ने 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों के दौरान समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की भूमिका पर हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा है कि मीडिया ने अपनी गलतियों से सबक लिया है. उनका दावा है कि अगर भविष्य में ऐसा कोई आतंकवादी हमला फिर हुआ तो मीडिया इस बार वे गलतियां नहीं दोहराएगा.

लेकिन 26/11 के बाद पिछले एक साल में और खासकर इस साल उसकी बरसी पर मीडिया और उसमें भी टीवी चैनलों के कवरेज को देखकर ऐसी कोई उम्मीद नहीं बंधती. इस कवरेज को देखकर नहीं लगता कि टी.वी चैनलों ने कोई सबक सीखा है. वीर संघवी से शर्त लगाने की इच्छा होती है कि अगर दुर्भाग्य से फिर कोई आतंकी हमला हुआ तो टी.वी चैनल वही गलतियां दोहराएंगे. असल में, चैनलों ने 26/11 से सिर्फ एक सबक सीखा है. वह यह कि अगर खून बहा है तो यही सुर्खी है (इफ इट ब्लीड्स, इट लीड्स). यानी आतंक बिकता है. आतंक टी.आर. पी. की गारंटी बन गया है. सच पूछिए तो चैनलों को खून का स्वाद लग चुका है. आतंक उनके लिए एक लुभावना फॉर्मूला बन गया है. खासकर हिंदी समाचार चैनलों को लगता है कि दशर्कों को डराकर चैनल के साथ बांधे रखा जा सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि 26/11 की तकलीफदेह और सुन्न कर देनेवाली स्मृतियां लोगों को डराती, चौंकाती और परेशान करती हैं.

यही कारण है कि चैनल इस या उस बहाने 26/11 के जख्म को हमेशा हरा रखने की कोशिश करते हैं. पिछले एक साल में कभी 26/11 के आतंकवादियों और उनके पाकिस्तानी आकाओं के एक्सक्लुसिव टेप सुनाने, गिरफ्तार कसाब की कहानी बताने और लगभग दैनिक तौर पर कभी लश्कर और कभी अन्य आतंकवादी जमातों की अगले हमलों की तैयारियों की सच्ची-झूठी रिपोटरें के बहाने आतंकवाद हिंदी चैनलों के प्राइम टाइम का एक स्थायी विषय बन चुका है. रही-सही कसर चैनलों में तथ्य को गल्प और गल्प को तथ्य की तरह पेश करने वाले भाषा के जादूगर और फेफड़े के जोर से चिल्लाते एंकर पूरा कर देते हैं. चैनलों पर लगभग रोज उबकाई की हद तक पाकिस्तान की पिटाई-धुलाई के साथ अल कायदा, ओसामा और तालिबान का हौव्वा खड़ा किया जाता है.

ऐसे में, चैनल 26/11 की बरसी को भुनाने में कैसे पीछे रह सकते थे? हालांकि इस बरसी से पहले केंद्र सरकार ने सभी समाचार चैनलों को एक निर्देशनुमा सलाह भेजकर अपील की थी कि वे 26/11 की बरसी पर अपने कार्यक्रमों और रिपोर्टों में संतुलन और जिम्मेदारी का ध्यान रखें. सरकार ने साफ-साफ कहा कि 26/11 के आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों के शवों, घायलों के खून और चीत्कार, रिश्तेदारों के दर्द आदि के दृश्यों को बार-बार दिखाने से न सिर्फ उस त्नासद और दुखद घटना की यादें ताजा होंगी बल्कि  लोगों में डर और असुरक्षा का भाव पैदा करने का आतंकवादियों का बुनियादी मकसद भी पूरा होगा.

लेकिन किसी भी चैनल ने इस सलाह का ध्यान नहीं रखा और उन 60 घंटों को याद करने के बहाने वह सब फिर-फिर दिखाया जो नहीं दिखाने के लिए कहा गया था. इन कार्यक्रमों में तथ्य और तर्क कम और भावनाएं और अतिरेक ज्यादा था. हमेशा की तरह इंडिया टी.वी सबसे आगे रहा जिसने उस आतंकवादी हमले को एक बार फिर फिल्मी अंदाा में रीक्रियेट किया. लेकिन इंडिया टी.वी. ही क्यों, बाकी हिंदी चैनल भी पीछे नहीं थे. सबने यहां तक कि सोबर और संतुलित माने जाने वाले अंग्रेजी चैनलों ने भी पूरी नाटकीयता से उन 60 घंटों को पेश किया. शहीदों की याद में एक बार फिर पिछली बार की तरह मास हिस्टीरिया जैसा माहौल बनाने की कोशिश की गई. टाइम्स नाउ के अर्नब गोस्वामी तो ऐसा लगता है कि 26/11 से आगे बढ़े ही नहीं हैं. यदि उनकी चलती तो 26/11 के बाद भारत ने पाकिस्तान पर हमला बोल दिया होता. हालांकि ऐसा हुआ नहीं लेकिन अर्नब पर इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा है और पाकिस्तान के खिलाफ उनका अभियान जारी है.

लेकिन जाने-अनजाने ऐसा करके चैनल आतंकवादियों की ही मदद कर रहे हैं. याद रखिए आतंकवादियों का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रचार पाना होता है. पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्नी मार्गरेट थैचर के शब्दों में कहें तो आतंकवाद के लिए प्रचार ऑक्सीजन की तरह है. इसीलिए आतंकवाद को प्रोपेगंडा बाई डीडमाना जाता रहा है. मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों का मकसद भी दो समुदायों और देशों के बीच नफरत पैदा करने से लेकर युद्ध भड़काने के अलावा प्रचार पाना भी था. मीडिया 26/11 को इस तरह और इस हद तक याद कर उन आतंकवादियों की ही तो मदद नहीं कर रहा है?

आनंद प्रधान

मद्धम पड़ती दहाड़

अगर चीन ने बाघ के अंगों की अपनी भूख पर लगाम नहीं लगाई तो यह शानदार जीव जल्द ही इतिहास का हिस्सा बन जाएगा

भारत में बाघों की लगातार कम हो रही संख्या की मुख्य वजह है चीन में इस जीव के अंगों की लगातार बढ़ रही मांग. 22 अक्टूबर को ब्रिटेन के एक गैर सरकारी संगठन एन्वायरमेंटल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (ईआईए) ने एक बेहद निराशाजनक रिपोर्ट जारी की. इससे पता चलता है कि चीन में बाघ की खाल और हड्डियों का व्यापार कितने व्यापक पैमाने पर हो रहा है.

दुनिया भर के जंगलों में बाघों की संख्या सिमटकर 3,100 रह गई है. इनमें 1,400 के करीब भारत में और 30 से 50 के करीब चीन में हैं. इस शानदार जीव को बचाने की तमाम कोशिशों के बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों में आजादी से घूमने वाले बाघों का अंत निकट है. 

दुनिया में किसी भी दूसरे जीव ने संस्कृति, इतिहास और धर्म पर उतना प्रभाव नहीं डाला है जितना बाघ ने. यह भारत समेत छह देशों का राष्ट्रीय पशु है. शायद ही कोई बच्चा होगा जो बाघ से अपरिचित हो. संभवत: इस धरती पर कोई भी दूसरा जीव इससे ज्यादा सम्मान और संरक्षण का अधिकारी नहीं होगा.

वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई), ईआईए के साथ मिलकर काम कर रही है. यह लगातार छठवां साल है जब ईआईए ने चीन में बाघ से जुड़े व्यापार की जांच की है. हर साल इस जांच के नतीजे चीनी सरकार को सौंपे जाते हैं. हालांकि चीन में बाघ के अंगों का व्यापार 1993 से ही प्रतिबंधित है. बावजूद इसके कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाएं इस व्यापार की तरफ से आंखें मूंदे हैं. समृद्धि की बाढ़ आने के साथ ही इसकी कीमतें भी आसमान छूने लगी हैं. चीन में बाघ की खाल 11,660 डॉलर से 21,860 डॉलर के बीच बिकती है जबकि हड्डियों का दाम 1,250 डॉलर प्रति किलो है.

इसी साल जुलाई और अगस्त के दौरान सिर्फ तीन हफ्तों में ईआईए की खुफिया टीम को बाघ की चार, तेंदुए की 12, बर्फीले तेंदुए की 11 और क्लाउडेड तेंदुए की दो खालों के साथ तमाम दूसरे जीवों की खालें, हड्डियां और खोपड़ियां खरीदने के प्रस्ताव मिले. तिब्बत में घोड़ों के एक मेले के दौरान 9 लोगों को बाघ और 25 लोगों को तेंदुए की खाल पहने देखा गया, वह भी स्थानीय प्रशासन की आंखों के सामने. पूछने पर दुकानदारों ने बताया कि ज्यादातर बड़ी बिल्लियों की खालें और हड्डियां भारत से तस्करी करके लाई जाती हैं.

अपने यहां होने वाली अनदेखी, घटिया प्रबंधन, ढुलमुल प्रशासन, शिकार, आपसी खींचतान और बाघ के खाने लायक शिकारों और पर्यावासों का विनाश जैसे विषयों पर मैं पहाड़ भर कागज बर्बाद कर सकती हूं. हालांकि फिलहाल भारत बाघों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है. सरकार बाघ संरक्षण के उपायों पर पैसा खर्च कर रही है, मसलन उन्हें सुरक्षा देना और उनके प्राकृतिक पर्यावासों का संरक्षण करना ताकि वे उन्मुक्त रूप से पनप सकें. इसका लक्ष्य सिर्फ बाड़ से घिरे अभ्यारण्यों में इन्हें सुरक्षित रखना भर ही नहीं है बल्कि उस संपूर्ण वन्यजीवन के जटिल ताने-बाने को बचाने के साथ-साथ उसे और अधिक समृद्ध करना भी है जिसका प्रतिनिधित्व यह प्रजाति करती आई है.

14 फरवरी, 2010 से चीन में बाघ वर्षकी शुरुआत हो रही है. अहम सवाल यह है कि क्या चीन इन बातों पर ध्यान देने की जहमत उठाएगा:

1.बड़ी बिल्लियों की खालों के अवैध कारोबार को जड़ से मिटाने के लिए भारत और नेपाल के साथ सहयोग

2.दुनिया और चीन में मौजूद उपभोक्ताओं को कठोर संदेश देना कि चीन 1993 में बाघ और तेंदुए की खालों पर लगाए गए प्रतिबंध पर कायम है

3.प्रशासन में सुधार के साथ ही इंटेलिजेंस आधारित एक वन्यजीव टीम का गठन

4.बाघ प्रजनन केंद्रों को खत्म करने के फैसले पर अमल

5.दुनिया के सामने खुद को अवध व्यापार के खिलाफ साबित करने के लिए बाघ के अंगों के भंडार को नष्ट करना

इस साल अगस्त महीने में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस मसले को चीन के सामने उठाकर एक साहसिक पहल की है. लेकिन उनकी मांगों को दुनिया भर से समर्थन मिलने के बावजूद चीन का असहयोग जारी है. अगर चीन इस बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव की अनदेखी करना जारी रखता है तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि हम बाघ संरक्षण की लड़ाई हारने वाले हैं.

बेलिंडा राइट

(बाघ संरक्षण से जुड़ी बेलिंडा वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया (डब्ल्युपीएसआई) की कार्यकारी निदेशक हैं)  

‘ऐसे भी ‘लो शुगर’ हो सकता है!’

मरीज के व्यवहार में पागलों जैसा परिवर्तन आना भी लो शुगरकी एक निशानी है. तो यदि डायबिटीज का मरीज, जो अभी तक एकदम ठीक-ठाक था, अचानक ही उत्तेजक हो जाए, पागलों सा व्यवहार करे, संभाले न संभले तो यह संभावना है कि उसका ब्लड ग्लूकोज लेवल बहुत कम हो गया हो

कहानी

यह कहानी डायबिटीज और ब्लडप्रेशर के एक पैंसठ वर्षीय रिटायर्ड फौजी की है. मेरे मरीज. रतलाम से हर माह मुझे दिखाने रेल में बैठकर पत्नी के साथ आया करते. बेहद चुप रहने वाले. शर्मीले, शांत और सीधे-साधे. फौजी इमेज के ठीक विरुद्ध पर बेहद अनुशासित, आज्ञाकारी टाइप का मरीज जो डाक्टर को सौभाग्य से ही मिलता है. पति-पत्नी की यह वृद्ध जोड़ी ऐसी दिलकश लगती थी कि मेरा दिल जुड़ा जाता था उनको देखकर.

पर इस बार आए तो दोनों ही बड़े परेशान. पत्नी बेहद उत्तेजित और गुस्सा-सी. और ये अपराध बोध और शर्म से सिर झुकाए. पत्नी ने शिकायती स्वर में बताया कि इस बार तो इनने ऐसी गजब की शर्मनाक हरकत की है कि क्या कहूं? मैं तो इन्हें देवता समझती थी. और इनने अभी रास्ते में ट्रेन में मुझे इतनी गालियां, भद्दी-भद्दी बातें.. वे रोने लगीं. पूछने पर पता चला कि घर से निकलने में लेट हो रहे थे, सो दवाई खाकर नाश्ते की पोटली लेकर वे लोग स्टेशन आ गए. ट्रेन देर से आई. वे चढ़े. कुछ दूर जाते ही फौजी महाराज अचानक ही पत्नी की किसी बात पर भयंकर उत्तेजित हो उठे. वह शख्स जो चुप रहने और बहुत कम तथा सौम्य बातें करने के लिये विख्यात तथा कुख्यात था अचानक ही बेहद हिंसक हो उठा. खूब गालियां. धक्का-मुक्की. साथ के यात्रियों को भी .. पत्नी और साथ के यात्रियों ने पुचकारा, संभाला, समझकर नाश्ता वगैरह दिया तो थोड़ी देर में ये वापस ऐसे बन गए मानो कुछ हुआ या किया ही न हो. पत्नी से बोले कि मैंने यह सब किया ही नहीं. मैंने बात समझ ली. दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे. मरीज को हाईपोहाईसीमिया (रक्त में ग्लूकोज कम हो जाना या लो शुगर’) हुआ होगा. वे डायबिटीज की दवा घर से ही खाकर निकले थे और नाश्ता करने में बहुत देर हो जाने के कारण ऐसा हुआ था.

शिक्षा

मरीज के व्यवहार में पागलों जैसा परिवर्तन आना भी लो शुगरकी एक निशानी है. तो यदि डायबिटीज का मरीज, जो अभी तक एकदम ठीक-ठाक था, अचानक ही उत्तेजक हो जाए, पागलों सा व्यवहार करे, संभाले न संभले तो यह संभावना है कि उसका ब्लड ग्लूकोज लेवल बहुत कम हो गया हो. इस फौजी को भी यही हुआ था. वो तो सही समय पर नाश्ता-चाय करा दिया तो ठीक हो गया वर्ना वे बेहोश हो सकते थे, उनको मिर्गी जैसे दौरे पड़ सकते थे और वे मर भी सकते थे – और यह सब मात्र ब्लड प्रेशर कम होने और कम होते चले जाने के कारण होता.

प्राय: हाथ-पांव कांपने, धड़कन होने, आंखों के आगे अंधेरा सा छाने, लड़खड़ाने, पसीना आने जैसी चेतावनियों से मरीज को पता चल जाता है कि शायद मेरी शुगर कम हो रही है. पर यदि बहुत लंबे समय से डायबिटीज हो तो कई बार इन चेतावनियों को पैदा करने वाला शरीर का एड्रिनर्जिक सिस्टमकाम नहीं करता है. शुगर कम होती जाती है और मरीज को चेतावनी ही नहीं मिल पाती. वह या तो सीधे बेहोश हो जाता है या पागलों सा व्यवहार करने लगता है. यह बात यदि हमें पता न हो तो उस मरीज के लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. डाक्टर तक कई बार ऐसे मरीजों को लकवा या साइकोसिस मान बैठते हैं. पुलिस ने कई बार इन्हें नशेड़ी मानकर इनको लॉकअप में डाल देने की गलती भी की है जहां ये सुबह तक या तो बेहोश मिले या लॉकअप में मौतके शिकार भी कहाए हैं.

डायबिटीज में ब्लड शुगर का कम हो जाना बेहद खतरनाक हो सकता है. पर यह होता क्यों है? आम तौर पर कारण वही होता है जो इस फौजी के केस में था – अर्थात दवाई तो खा ली और खाना खाने में या तो देर हो गई या भूख न होने के कारण रोज की अपेक्षा कम खाया. गोली ब्लड शुगर कम करती गई और खाना आपने खाया नहीं. ब्लड शुगर से ही दिमाग काम करता है. बार-बार शुगर कम हो तो मस्तिष्क को स्थायी रूप से नुकसान भी पहुंच सकता है.

याद रखें :

1- डायबिटीज की गोली/इंजेक्शन के साथ/बाद भोजन लेना कभी न भूलें. न ही देर करें.

2- डायबिटीज की गोली यदि सुबह ली है तो वह चौबीस घंटे तक कुछ न कुछ असर रखती है. तो जरूरी है कि थोड़ा-थोड़ा करके अपने भोजन को दिन में यूं बांटकर खाएं कि खाली पेट न रहना हो.

3- डायबिटीज के रोगी को, जो कुछ देर पहले तक एकदम ठीक था अचानक ही कुछ भी नया होने लगे – घबराहट, बेचैनी, पसीना, हाथ कांपना, चक्कर, बेहोशी या व्यवहार में परिवर्तन – तो इसे हाईपोहाईसीमिया (लो शुगर) मानकर तुरंत कुछ मीठा खिला दें फिर डाक्टर को दिखाएं.

यह भी याद रखें :

डायबिटीज हो तो लो शुगर हो जाने के बहाने चाहे जब मीठा खा लेने का अवसर न खोजें. यदि वास्तव में ही ऐसा बार-बार होता है तो तुरंत डाक्टर से पूछें क्योंकि दवा तथा भोजन के बीच उचित सामंजस्य बना रहे तो ऐसा नहीं होना चाहिए.   

26/11 कहने से बात नहीं बनती

26 नवंबर, 2008 की रात मुंबई में हुए आतंकवादी हमले को 26/11 कहते हुए शायद कुछ लोगों को आसानी होती हो, लेकिन मुझे असुविधा होती है. यह नामकरण मुंबई के इस हमले को आठ साल पहले न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए हमले से जोड़ देता है जिसे अमेरिका 9/11 के रूप में याद करता है. लेकिन अमेरिका के लिए 9/11 सिर्फ एक सुबह हुए आतंकी हमले का नाम नहीं है, वह उसके लिए आतंकवाद की पूरी परिघटना को समझने का एक संदर्भ बिंदु भी है. 9/11 के बाद अमेरिका के लिए आतंकवाद और आतंकवादी- दोनों का मतलब बदल गया. इसी हमले के बाद उन दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश ने आतंक के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय युद्ध की घोषणा की और यह चेतावनी भी उछाल दी कि जो इस युद्ध में अमेरिका के साथ नहीं है, वह आतंकवाद के साथ है. उन दिनों भारत ने बड़ी तत्परता से अमेरिका को सहयोग का प्रस्ताव भेजा और केंद्र की एनडीए सरकार यह उम्मीद करने लगी कि अमेरिका का अब पाकिस्तान से मोहभंग होगा और वह भारत के उन संकटों को समझेगा जो सीमा पार का प्रायोजित आतंकवाद भारत में पैदा कर रहा है.

अल क़ायदा की शाखाएं भले अमेरिका में हों, उसकी जड़ें वहां की जमीन में नहीं हैं. इसलिए अमेरिका के लिए यह आसान था कि वह अपनी सुरक्षा कुछ कड़ी करके, अपने नागरिकों की आजादी छीन कर, अपनी नागरिक स्वतंत्नता के मूल्यों को थोड़ा सिकोड़कर खुद को महफ़ूज कर ले

लेकिन अमेरिका को इसकी फुरसत नहीं थी. उसे अपने दोस्तों और दुश्मनों के पते पहले से मालूम थे. उसे पता था कि आतंक के खिलाफ इस लड़ाई में उसे फिलहाल भारत की नहीं, पाकिस्तान की ही जरूरत है. आखिर एक दौर में पाकिस्तान के साथ मिलकर ही उसने सोवियत संघ के विरुद्ध अफगानिस्तान में तालिबान को खड़ा किया था जो अल कायदा का सहोदर भले न हो, सगा जरूर है. तब से आज तक अमेरिका आतंक के विरुद्ध यह युद्ध कैसे लड़ रहा है, किन ताकतों की मदद ले रहा है, किन ठिकानों पर वार कर रहा है, यह दुनिया देखती रही है. भारत का भी यह भ्रम टूट चुका है कि अमेरिका उसका संकट दूर करने के लिए कोई लड़ाई लड़ेगा- या उसकी लड़ाई से भारत का भी कुछ भला हो जाएगा.

दरअसल, हमारे लिए समझने की जरूरत यही है कि 26/11- यानी मुंबई पर हुए हमले- 9/11 नहीं हैं. अमेरिका में आतंक की तारीख एक है, हमारे पास ऐसी तारीखें लगातार जमा होती गई हैं- हमारे कई 9/11 हैं. हमारे लिए मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, अहमदाबाद, बेंगलुरु , अयोध्या, लखनऊ, रामपुर आदि सिर्फ शहरों के नाम नहीं हैं, आतंकी मंसूबों के नक्शे भी हैं जो हाल के वर्षों में अंजाम दिए जाते रहे. और इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि अमेरिका ने अपनी कानून व्यवस्था दुरुस्त कर ली और हम कर नहीं पाए. दरअसल, भारत और अमेरिका में आतंकवाद की कैफियतें अलग-अलग हैं और जब तक हम उन्हें ठीक से नहीं समझेंगे, अपने यहां के आतंकवाद का खात्मा नहीं कर पाएंगे.

अमेरिका में जिन आतंकियों ने विमानों का अपहरण कर उन्हें अमेरिका के सबसे मजबूत आर्थिक और सामरिक प्रतीकों से टकरा दिया, उनका गुस्सा अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों और इस्लामी दुनिया को लेकर अमेरिका के तथाकथित शत्नुतापूर्ण रवैये से था. इस लिहाज से अल क़ायदा की शाखाएं भले अमेरिका में हों, उसकी जड़ें वहां की जमीन में नहीं हैं. इसलिए अमेरिका के लिए यह आसान था कि वह अपनी सुरक्षा कुछ कड़ी करके, अपने नागरिकों की आजादी छीन कर, अपनी नागरिक स्वतंत्नता के मूल्यों को थोड़ा सिकोड़कर खुद को महफ़ूज कर ले.

भारत के लिए यह काम इतना आसान नहीं है. इसका वास्ता सिर्फ पुलिस और प्रशासन की उस लुंज-पुंज व्यवस्था से नहीं है जिसका अपना वर्गीय चरित्न है और जिसकी वजह से वह या तो मजबूत लोगों के दलाल की तरह काम करती है या फिर कमजोर लोगों के दुश्मन की तरह – इसका वास्ता उस जटिल सामाजिक- राजनीतिक विडंबना से भी है जो बीते 60 साल में बदकिस्मती से भारत में विकसित होती चली गई है. इसी विडंबना के नतीजे में हमारे पास कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक का अलगाववाद है और नक्सलवाद-माओवाद से लेकर दलितवाद तक का असंतोष. कुछ प्रशासन की अपनी औपनिवेशिक विरासत और समझ के चलते और कुछ अमेरिका-यूरोप का मुखापेक्षी होने की आदत की वजह से, हम इन सबको एक ही डंडे से हांकना चाहते हैं- बिन यह समझे कि इन समस्याओं की जड़ें कहीं हमारे समाज में हैं और उन्हें खत्म किए बिना हम आतंकवाद या किसी भी समस्या के विरुद्ध अपना युद्ध नहीं लड़ पाएंगे. और मामला सिर्फ आतंकवाद का नहीं है. ध्यान से देखें तो भारतीय लोकतंत्न को जो सबसे बड़ी चुनौतियां मिल रही हैं, उन सबके जवाब हम एक ही तरीके से देना चाहते हैं. दरअसल यह भारतीय सुरक्षा तंत्न की कमजोरी है कि यह जवाब भी वह ठीक से नहीं दे पाता. यह अक्षमता उसे कुछ ज्यादा क्रूर और अमानवीय ही बनाती है. असली गुनाहगार या तो उसके ऊपर होते हैं या उससे दूर और उसका गुस्सा नकली और कमजोर गुनाहगारों पर निकलता है.

हम अब तक एक ऐसा भारत बना नहीं पाए जिसमें सबको बराबरी और इंसाफ़ का भरोसा हो. इस भारत में आदिवासी बेदखल हैं, दलित उपेक्षित और मुसलमान असुरक्षित. इससे पैदा हताशा का फायदा कहीं माओवाद को मिलता है कहीं आतंकवाद कोसुरक्षा तंत्न की इस विफलता का वास्ता कहीं ज्यादा बड़ी राजनीतिक विफलता से है. हम अब तक एक ऐसा भारत बना नहीं पाए जिसमें सबको बराबरी और इंसाफ़ का भरोसा हो. इस भारत में आदिवासी बेदखल हैं, दलित उपेक्षित और मुसलमान असुरक्षित. इससे पैदा हताशा का फायदा कहीं माओवाद को मिलता है कहीं आतंकवाद को. संकट यह है कि जो सरकारें बड़ी पूंजी के एजेंट की तरह आदिवासियों और किसानों की जमीन छीन कर सेज बनवाती हैं, जो अपराधियों और काले पैसे वालों के गठजोड़ से चुनाव नियोजित करती है, जो खड़ी-खड़ी बाबरी मस्जिद का टूटना देखती हैं या उसमें सहयोग करती हैं, जो 2002 के दंगाइयों के साथ खड़ी दिखती हैं, जो फर्जी मुठभेड़ें करने वाले अफसरों को इनाम देती हैं, वही नक्सलवादियों के विरुद्ध युद्ध की दुंदुभि बजाती हैं और वही आतंकवादियों के सफाये की घोषणा करती हैं. ऐसी सरकारें न लोक का भरोसा हासिल कर पाती हैं न तंत्न को चुस्त-दुरुस्त बना पाती हैं.

मुंबई हमलों की पहली बरसी पर प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह ने बड़ी भावुकता से कहा कि  हम कुछ भूलेंगे नहीं. लेकिन उन्हें किसी ने याद नहीं दिलाया कि हमलों के बाद महाराष्ट्र के जिस गृहमंत्नी का इस्तीफा लिया गया, उसे दुबारा उसी पद पर बिठा दिया गया. जाहिर है, हम भूल चुके हैं. या तो वह इस्तीफा एक राजनीतिक मजबूरी था या फिर मंत्नी की बहाली. यानी सरकार ने और पार्टी ने तब भी और अब भी जो फैसला किया, उसमें राजनीति की जरूरत ज्यादा रही, मुंबई का सवाल कम या सरोकार कम. 

जब ऐसे वास्तविक सवाल और सरोकार नहीं बचते तभी हम उधार के मुहावरों में सोचते हैं और सुरक्षा और स्मृति के आडंबर रचते हैं. मुंबई पर हुए आतंकी हमले की पहली बरसी पर मुंबई और देश भर में जो सरकारी-गैरसरकारी आयोजन हुए, उनमें भी यह आडंबर दिखता रहा. इस आडंबर में यह कहने का रिवाज फिर दिखा कि मुंबई बीते साल के हमलों और जख्मों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ चुकी है. हकीकत यह है कि जख्म उन्हीं के सूखे हैं जिन्हें कोई खरोंच नहीं आई. वरना जिन लोगों की जिंदगी में किसी जलजले की तरह तीन दिन आए, वे अब भी सोते-जागते उनका पीछा करते हैं. आख़िर क्यों कोई कविता करकरे अपने दिवंगत पति की खोई हुई बुलेट प्रूफ जैकेट का पता लगाना चाहती है और क्यों कोई विनीता कामटे ‘द लास्ट बुलेट’ जैसी किताब लिखकर अपनी हताशा जाहिर करती है? दरअसल, जब हम कविता करकरे या विनीता कामटे या उन जैसे सैकड़ों दूसरे लोगों की तकलीफ़ समझेंगे तब हमारे लिए मुंबई के हमलों का मर्मभेदी अर्थ खुलेगा और तभी हम 26/11 जैसा फैशनेबल मुहावरा गढ़ने की जगह इसके प्रतिकार और प्रतिरोध के सच्चे रास्ते सोच पाएंगे.

लेकिन सच यह है कि सरोकारों की इस कड़ी में कविता करकरे, विनीता कामटे या मुंबई पर हुआ हमला बाद में आएगा, उसके पहले देश के न्यायवंचित वर्गों की याद आएगी जिनके साथ हमारा जुड़ाव बन सका तो आतंकवाद या नक्सलवाद को कहीं ज्यादा तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा. 

क्या विडंबना है कि मुंबई के हमलावर नाव से आए थे. नावें अक्सर तबाही से बचाव का एक पुराना सपना रही हैं- कि जब धरती हिलेगी या खत्म हो रही होगी तो हम एक नाव बना लेंगे और उसमें सबको बिठा लेंगे- दुर्भाग्य है कि हमने अपने समाज के सारे समुदायों को बिठाने वाली ऐसी नाव नहीं बनाई है. अगर बनाई होती तो कोई आतंकी बाहर से किसी नाव पर बैठकर आने का दुस्साहस नहीं कर पाता.     

प्रियदर्शन