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गोरखालैंड का सफ़र तेलंगाना की डगर

दार्जिलिंग की पहाड़ियों में छाई राजनैतिक अस्थिरता ने वहां की तीन जीवन रेखाओं चाय, पर्यटन और शिक्षा पर काफ़ी बुरा असर डाला है मगर लोग अलग राज्य के लिए सब कुछ सहने के लिए तैयार हैं. शोभिता नैथानी की रिपोर्ट

दार्जिलिंग जिले की तीन सबडिविजनों में से एक कलिमपोंग के नजदीक युवाओं की एक भीड़ हमारी कार को रोक लेती है. इन लड़के-लड़कियों में से ज्यादातर की उम्र 18 साल के आस-पास होगी. वे हमसे अपनी कार के दरवाजे और डिग्गी खोलने को कहते हैं. हमारा सामान खंगालते हुए उनमें से एक पूछता है, ‘रक्सी (शराब)?’ मतलब यह कि कहीं मेरे पास शराब तो नहीं है जिसपर इस इलाके में प्रतिबंध लगा हुआ है. धूल भरी सड़क पर तकरीबन 80 किलोमीटर आगे दार्जिलिंग में भी ऐसा ही एक और झुंड नजर आता है. पूछने पर कि वे सब वहां क्यों आए हैं, नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ चुकी एक लड़की कहती है, ‘अपनी मां, मिट्टी और गोरखालैंड के लिए.’

यहां के लोग पृथक राज्य की मांग के प्रति एकजुट हैं, उन्हें पता है कि बिमल गुरुंग दार्जिलिंग के नए सुभाष घीसिंग हैं, बस उनके राज में वह हिंसा नहीं है जो घीसिंग के राज में होती थी

शक्ल से 16 की लगने वाली मगर खुद को 18 साल की बताने वाली रश्मिका थापा नाम की यह लड़की गोरखालैंड पर्सनल (जीएलपी) की 8,500 सदस्यों में से एक है. यह संगठन बिमल गुरुंग की अगुवाई वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की एक इकाई है. इसके सदस्यों के जिम्मे कई काम हैं. मसलन जीजेएम द्वारा आहूत बंद को सफल बनाना, खुद को सांस्कृतिक रूप से भिन्न दिखाने के लिए यह सुनिश्चित करना कि स्थानीय गोरखा पारंपरिक नेपाली वेश-भूषा में रहें, शराब की बोतलें जब्त कर उन्हें तोड़ देना और गुरुंग को सुरक्षा प्रदान करना. इसके बदले में उन्हें मिलता है यह वादा कि जब अलग गोरखालैंड बनेगा तो उन्हें राज्य की पुलिस सेवा में जगह दी जाएगी. जीजेएम नेपाली भाषियों के लिए अलग राज्य की मांग कर रहा है जिसमें दार्जिलिंग की तीन पहाड़ी सबडिविजनों (कलिमपोंग, कुरस्योंग और दार्जिलिंग), सिलीगुड़ी तराई और डुआर्स के इलाके शामिल हों.

जीजेएम ने बिना जनादेश के ही इस इलाके में राज चलाना शुरू कर दिया है. 44 वर्षीय गुरुंग ने 2007 में अपने मुखिया और 80 के दशक में पृथक गोरखालैंड के लिए हिंसक आंदोलन चलाने वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के नेता सुभाष घीसिंग को निकाल बाहर किया था. दोनों के बीच तनाव तभी से बढ़ गया था जब घीसिंग ने पृथक राज्य की मांग छोड़कर पश्चिम बंगाल सरकार से ‘सिक्स्थ शेड्यूल स्टेटस’ की मांग की थी. इस शेड्यूल के तहत जिला परिषदों को विधायी और कार्यकारी अधिकार मिलते, ठीक वैसे ही जैसे असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में स्वायत्तता प्राप्त जिला परिषदों को हासिल हैं. लेकिन गुरुंग अलग राज्य से कुछ भी कम पर राजी नहीं थे.

आग में घी डालने का काम किया 2007 में इंडियन आइडल खिताब जीतने वाले प्रशांत तमांग ने. उस वक्त दार्जिलिंग की समूची पहाड़ियां प्रशांत के समर्थन में उठ खड़ी हुई थीं. मगर घीसिंग ने सार्वजनिक रूप से तमांग का समर्थन करने से इनकार कर दिया. गुरुंग ने इस मौके को लपकते हुए अपना पूरा समर्थन तमांग को दिया और खुद की छवि एक हिम्मती नेता की बना ली. उन्होंने तमांग के पक्ष में पैदा हुई लहर को चतुराईपूर्वक अपने पक्ष में मोड़ते हुए घीसिंग का विरोध करना शुरू कर दिया. गुरुंग ने 20 साल के असफल प्रशासन को हथियार बनाते हुए बिना किसी प्रतिरोध के घीसिंग की गद्दी हथिया ली. अक्टूबर 2007 में जीजेएम की नींव पड़ी.

प. बंगाल के शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य मानते हैं कि दार्जिलिंग में गुरुंग का शासन चल रहा है लेकिन सफाई देते हुए कहते हैं, ‘इसका यह मतलब नहीं है कि हम कमजोर हैं. हम किसी भी समय गोली दाग सकते हैं लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि हम बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझाना चाहते हैं.’

आरोप लगाए जाते हैं कि 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) का गठन होने के बाद घीसिंग ने खुद को सक्रिय कामकाज से दूर कर लिया था और सारी जिम्मेदारियां अपने पार्षदों और सहयोगी ठेकेदारों को सौंप दी थी. पश्चिम बंगाल सरकार ने भी इस स्थिति में किसी तरह का दखल नहीं दिया क्योंकि वह इससे ही संतुष्ट थी कि इस इलाके में शांति बनी हुई थी. इस अवधि के दौरान राज्य और केंद्र सरकार द्वारा परिषद को 250 करोड़ रुपए का सालाना बजट जारी किया गया लेकिन ऊबड़-खाबड़ सड़कें, अस्त-व्यस्त यातायात और पेयजल की कमी जैसी समस्याएं बताती हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल कैसे हुआ होगा. पृथक राज्य के लिए दस्तावेजों से जुड़े काम करने वाले जीजेएम स्टडी फोरम के सदस्य प्रोफेसर अमर रॉय बताते हैं, ‘इन सालों के दौरान खर्चे का कोई लेखा-जोखा नहीं रखा गया. घीसिंग की एकछत्र सत्ता के चलते किसी ने उनके खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत भी नहीं की.’ इस दौरान लोगों को गुरुंग के रूप में एक नया नेता मिल गया जो उनकी संवेदनाओं को समझता था. लोगों ने घीसिंग को हटाने की उनकी मुहिम का समर्थन किया.

घीसिंग के गोरखालैंड आंदोलन की ही उपज और आठवीं तक पढ़े गुरुंग के माता-पिता चाय बागान में मजदूर थे. पांच भाई-बहनों में दूसरे नंबर के गुरुंग 1986 में 16 साल की उम्र में इस आंदोलन में कूद पड़े थे. 1991 में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने से पहले तक वे भूमिगत ही रहे. इसके बाद अगले दो सालों तक वे ऑल इंडिया गोरखा लीग (एआईजीएल) से जुड़े रहे और फिर 1999 तक उन्होंने राजनीति से किनारा किए रखा. 1999 में उन्होंने निर्दलीय के रूप में डीजीसीए का चुनाव लड़ा. बेहद सीमित विकल्पों के बीच जीएनएलएफ के प्रभाव को देखते हुए उन्होंने इसी से जुड़ने का फैसला किया.

घीसिंग और गुरुंग के बीच मतभेद के बाद टकराव की एक नई प्रक्रिया शुरू हुई. घीसिंग, उनकी पार्टी के सदस्यों और जीजेएम से जुड़ने से इनकार करने वालों के ऊपर हमले किए गए. उनके घर जला दिए गए और उन्हें अपने बाल-बच्चों समेत पहाड़ी छोड़कर सुरक्षित मैदानी इलाकों का रुख करना पड़ रहा है. गुरुंग से यह पूछने पर कि उन्होंने लोगों को रोका क्यों नहीं, वे कहते हैं, ‘उन्होंने आवेश में आकर यह सब किया. अगर मैंने नहीं रोका होता तो वे घीसिंग को जान से मार देते.’

दो साल बाद आग की लपटें तो शांत हो चुकी हैं लेकिन पहाड़ियां अंदर ही अंदर अभी भी सुलग रही हैं. समय-समय पर बंद का आह्वान होता है और चक्का  जाम के चलते सिक्किम तक यातायात व्यवस्था चरमरा जाती है जो दार्जिलिंग के जरिए ही देश के मैदानी हिस्सों से जुड़ता है. यहां के लोग पृथक राज्य की मांग के प्रति एकजुट हैं, उन्हें पता है कि बिमल गुरुंग दार्जिलिंग के नए सुभाष घीसिंग हैं, बस उनके राज में वह हिंसा नहीं है जो घीसिंग के राज में होती थी.

गुरुंग ने शराब पर रोक लगा दी है, सबको टैक्स भरने से मना कर दिया है, बिजली और पानी का बिल जमा करने से रोक दिया है और लोगों को अपने घरों और दुकानों पर गोरखालैंड का झंडा लगाने का फरमान जारी कर दिया है. मगर लोग उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार हैं, जो नहीं हैं वे कम से कम यह सब सहने के लिए तो तैयार हैं ही. तब तक तो हैं ही जब तक अलग गोरखालैंड का सपना हकीकत में बदलने की उम्मीद लग रही है जिससे उनकी सामाजिक और आर्थिक दशा सुधर सकती है, उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है और उनकी अपनी पहचान को सम्मान मिल सकता है.

चाय, पर्यटन और शिक्षा, दार्जिलिंग की ये तीन मुख्य जीवनरेखाएं आज इस विवाद की वजह से संकट में हैं. हालांकि होटल मालिक अपने व्यापार में घाटे से इनकार करते हैं, लेकिन जिलाधिकारी सुरेंद्र गुप्ता स्वीकार करते हैं कि पर्यटन पर बुरा असर पड़ा है. वे कहते हैं, ‘यह साल पिछले साल की तुलना में थोड़ा बेहतर रहा है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता,’  जिस चाय उद्योग का आम तौर पर सालाना उत्पादन एक करोड़ किलोग्राम से ज्यादा होता था वह इस साल घटकर 90 लाख किलोग्राम से भी कम रह गया है. जहां तक शिक्षा का सवाल है तो 120 साल पुराने सेंट जोसफ स्कूल के फादर किनले शेरिंग सारी कहानी बयान कर देते हैं जिनके यहां आने वाले आवेदन दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं. वे कहते हैं,  ‘मां-बाप के मन में यहां हो रहे आंदोलनों की वजह से डर है.’

मार्च 2010 अब ज्यादा दूर नहीं. गुरुंग ने वादा किया है कि तब तक गोरखालैंड बन जाएगा. सबकी आंखें अब 21 दिसंबर को होने वाली त्रिपक्षीय वार्ता पर टिकी हुई हैं जिसमें जीजेएम, प. बंगाल सरकार के साथ ही केंद्र सरकार भी शामिल होगी. जहां तक घीसिंग का सवाल है तो वे फिलहाल भूमिगत हैं लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि उनके आवाज उठाने का यही सही वक्त है. पार्टी को पुनर्गठित करने में लगे जीएनएलएफ नेता राजन मुखिया कहते हैं ‘हम हार नहीं मानेंगे.’

उधर, डुआर्स और तराई के आदिवासी पृथक गोरखालैंड की मांग का विरोध कर रहे हैं. बंगाली और हिंदी भाषा की प्रधानता वाले इस हिस्से में संथाल, महतो, भील, मुंडा और ओरांव जातियों की बहुलता है जो यहां की कुल आबादी का 60 फीसदी हैं. ये सभी नहीं चाहते कि वे नेपाली भाषी राज्य का हिस्सा बनें.

गुरुंग की योजनाएं चाहे जो हों, इस मामले में मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य के सहायक और सलाहकार प. बंगाल के शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि बंटवारा उनके एजेंडे में नहीं है. हालांकि वे मानते हैं कि दार्जिलिंग में गुरुंग का शासन चल रहा है लेकिन सफाई देते हुए कहते हैं, ‘इसका यह मतलब नहीं है कि हम कमजोर हैं. हम किसी भी समय गोली दाग सकते हैं लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि हम बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझना चाहते हैं.’ अगर 21 दिसंबर को राज्य का दर्जा नहीं मिला तो असंतोष और गहरा जाएगा. पत्रकार और समाजसेवी वर्षा दीवान कहती हैं, ‘दार्जिलिंग टाइम बम है जो फटने के इंतजार में है.’  शायद जीएलपी खुद को इसके लिए तैयार भी कर रहा है.

वीरू जहां, जय है वहां

क्रिकेट को लेकर सहवाग की प्रतिभा असाधारण है, न कि उनका इतिहासबोध (ओपनर के रूप में पंकज राय के साथ वीनू मांकड़ के विश्व रिकॉर्ड से तीन रन दूर रह जाने के बाद उन्होंने कहा था कि उन्होंने दोनों में से किसी भी खिलाड़ी का नाम नहीं सुना) या व्याकरणखेल में कोई भी नियम आदर्श नहीं होता, यह बात हमें वीरेंद्र सहवाग की बल्लेबाजी बताती है. श्रीलंका के खिलाफ मुंबई टेस्ट में तिहरे शतक से मामूली अंतर से चूक जाने के बाद उनका कहना था, ‘ड्रेसिंग रूम में वे (साथी) मुझसे कह रहे थे कि मैं अच्छी गेंदों को बाउंड्री के बाहर भेज रहा था लेकिन असल में तो मैं सिर्फ खराब गेंदों को ही उड़ा रहा था.’ ऐसे ही हैं सहवाग. सरलता के साथ निर्दयता और खुद पर संदेह के साथ-साथ भरोसे का एक अद्भुत समागम. सहवाग यानी एक ऐसा खिलाड़ी जो बल्लेबाजी के प्रचलित नियमों पर इतना दबाव डाल देता है कि वे उसी की इच्छा के मुताबिक ढलने को मजबूर हो जाते हैं. श्रीलंका के खिलाफ मुंबई में उन्होंने खड़े-खड़े जो रिवर्स पैडल शॉट खेला वह जितना सहज था उतना ही अचूक भी. क्रिकेट के व्याकरण में ऐसे शॉट का जिक्र तक नहीं मिलता मगर सहवाग ने जब इसे खेला तो यह हर तरह से सही ही लगा. उन्होंने खेलते-खेलते ही इस शॉट का आविष्कार कर डाला था.

बल्लेबाजी और सोच को सरलता के इस स्तर तक ले जाने वाले इस खिलाड़ी को एक दिलचस्प किस्सा सबसे अच्छी तरह बयां कर सकता है. इंग्लैंड के बल्लेबाज जेरेमी स्नेप और सहवाग किसी काउंटी मैच में साथ-साथ बल्लेबाजी कर रहे थे. गेंद पुरानी हो चुकी थी इस वजह से रिवर्स स्विंग होने लगी थी. स्नेप ने सहवाग से कहा कि उन्हें रिवर्स स्विंग खेलने में परेशानी हो रही है. सहवाग ने उनसे चिंता न करने को कहा और साथ ही यह भी कि वे दूसरे छोर पर आते ही ऐसा शॉट मारेंगे कि गेंद स्टेडियम के बाहर पहुंच जाएगी जिसके बाद अंपायरों को दूसरी गेंद लानी पड़ेगी. और उन्होंने ठीक ऐसा ही किया. तरकीब काम कर गई क्योंकि दूसरी गेंद उतनी स्विंग नहीं हो रही थी.

अभिमान से कहीं ज्यादा यह अपने साथी खिलाड़ी की मदद करने की इच्छा थी. अगर स्नेप को मुश्किल नहीं हो रही होती तो इसकी पूरी संभावना थी कि सहवाग ने अगली गेंद पर कोई दूसरा शॉट खेलकर एक रन ले लिया होता. और उतना ही मुमकिन यह भी है कि ऐसा नहीं हुआ होता. आखिरकार हर तरह के अनुमानों के परे होना ही तो सहवाग की बल्लेबाजी की सबसे बड़ी खासियत रही है. जैसे ही गेंदबाज यह समझता है कि उसे सहवाग की काट मिल गई है, वे कुछ ऐसा कर डालते हैं कि गेंदबाज सर थामने को मजबूर हो जाता है. वे लय में हैं या नहीं यह जानने के लिए उन्हें सिर्फ वह आवाज सुनने की जरूरत होती है जो बॉल के उनके बल्ले से टकराने पर होती है. और जब वे अपनी लय में होते हैं तो यह आंखों के साथ-साथ कानों के लिए भी एक आनंददायी अनुभव होता है.

सहवाग की असफलताओं को भी उनकी सफलताओं जितनी सरलता से समझ-समझया जा सकता है. वे असफल तब होते हैं जब उनकी लय उनका साथ छोड़ देती है. और जब ऐसा होता है तो उन्हें देखकर डर लगता है. इंच भले ही छोटी माप हो पर क्रिकेट के खेल में इसकी बड़ी भूमिका होती है. बल्ला जहां पर सबसे चौड़ा होता है वहां पर इसकी माप सिर्फ सवा चार इंच होती है जिसका मतलब यह है कि शॉट में सिर्फ दो इंच की चूक से बॉल, बल्ले का बाहरी किनारा छूते हुए बल्लेबाज को वापस पवेलियन भेजने का इंतजाम कर सकती है. ऑफ स्टंप से लेकर लेग स्टंप तक महजा नौ इंच की चौड़ाई का खेल में सर्वाधिक महत्व होता है.

मगर सहवाग के लिए इन मापों के अक्सर कोई मायने नहीं होते. वे बॉल की लाइन से अलग हटते हुए भी इस विश्वास के साथ अपना बल्ला लहरा सकते हैं कि प्रहार इसके बीच वाले हिस्से से ही हो और बॉल बिजली की तेजी के साथ फील्डरों के बीच से ही दौड़ती हुई जाए. मगर जब दिन खराब होता है तो एक साधारण सी डिलिवरी के बावजूद भी ये छोटे-छोटे इंच उनके लिए बहुत बड़े हो जाते हैं. बॉल की लाइन से हटते हुए वही सहवाग अपना बल्ला घुमाते हैं मगर बॉल बल्ले को जरा सा छेड़ती हुई या तो उनके विकेट पर जा लगती है या फिर पैड पर या बाहरी किनारा लेती हुई विकेट कीपर के हाथ में.

बड़े शॉट लगाने वाले खिलाड़ियों का अहम भी बड़ा रहा है. विवियन रिचर्ड्स के विस्फोटक शॉट अपने रंग को लेकर उनके मन में गहरे दबे गुस्से की अभिव्यक्ति थे. इयान बॉथम अपने शॉट से सबको यह अहसास करवाने की इच्छा रखते थे कि वे दुनिया के बादशाह हैं. मगर सहवाग ऐसा कोई झंडा उठाकर नहीं चलते

हालांकि बल्लेबाजी की अपनी अलग ही शैली के बावजूद सहवाग में एक आदर्श सुरक्षात्मक स्ट्रोक खेलने की भी क्षमता है, बल्ले और पैड को साथ-साथ इस्तेमाल करते हुए. हालांकि यह अलग बात है कि यह शॉट उनकी प्राथमिकताओं में सबसे आखिरी नंबर पर आता है. क्रिकेट का इतिहास बताता है कि बड़े शॉट लगाने वाले खिलाड़ियों का अहम भी बड़ा रहा है. विवियन रिचर्ड्स के विस्फोटक शॉट अपने रंग को लेकर उनके मन में गहरे दबे गुस्से की अभिव्यक्ति थे. इयान बॉथम अपने शॉट से सबको यह अहसास करवाने की इच्छा रखते थे कि वे दुनिया के बादशाह हैं. मगर सहवाग ऐसा कोई झंडा उठाकर नहीं चलते. वे किसी चीज का प्रतीक नहीं हैं. उनका मतलब उन से इतर कुछ भी नहीं. उनके लिए गेंद बनी ही इसलिए है कि उसे जम के कूटा जा सके. सीधी सी बात. इसके परे इसमें कोई भी गहरे मायने ढूंढना बेकार है.

सभी महान गेंदबाजों में एक बात समान होती है और वह है उनका याद रखने का गुण. वे बल्लेबाजों की कमियां भी याद रखते हैं और अपना हर विकेट भी. श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट में लगभग 800 विकेट लिए हैं और उन्हें अपना हर विकेट आखिरी विकेट की तरह याद है. यही गुण महान बल्लेबाजों में भी होता है. सचिन तेंदुलकर आराम से बता सकते हैं कि 162 टेस्ट मैचों में से किसी में भी वे किस तरह आउट हुए.

मगर सहवाग महानता की तरफ बिल्कुल उल्टी दिशा से बढ़े हैं. याद रखने की बजाय उनके पास भूल जाने का गुण है. न कोई दुख और न ही किसी खराब पारी या शॉट का विश्लेषण. सहवाग आज और अभी में जीते हैं. बीता कल भुला चुके होते हैं और आने वाले कल के बारे में सोचते नहीं. उनकी जगह कोई और होता तो 293 पर आउट होने के बाद दुख से सराबोर हो सकता था. मगर सहवाग कह रहे थे कि वे खुश हैं कि दो तिहरे शतकों के बाद इतना बड़ा स्कोर बनाने वाले वे अकेले बल्लेबाज हैं. इसके बाद उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसे दुनिया भर के गेंदबाज सुनकर अपना सिर धुन सकते हैं. उनका कहना था कि इस बार वे अपने तीसरे तिहरे शतक से चूक गए पर कोई बात नहीं, आगे फिर मौके आएंगे.

वर्तमान से सहवाग के जुड़ाव को समझना हो तो उनकी पारी के किसी भी क्षण पर नजर डालकर देखें. ज्यादातर बल्लेबाजों को बल्लेबाजी करते देखकर ही यह बताया जा सकता है कि यह उनकी पारी की शुरुआत है या मध्य. कभी-कभी तो यहां तक पता चल जाता है कि अब बल्लेबाज जल्द ही अपना विकेट देने वाला है. मगर सहवाग को देखकर यह बताना बेहद मुश्किल होता है कि वह 25 के स्कोर पर हैं या 250 के. उनके चेहरे पर हमेशा वही शांति होती है, उनका बल्ला हर समय उसी रचनात्मकता के साथ चलता है.

सचिन तेंदुलकर ने एक बार उनसे कहा था, ‘जब मौजूदा स्ट्रोकों से ही तुम इतनी आसानी से रन बना लेते हो तो नए स्ट्रोक मत पैदा करो.’ तेंदुलकर सहवाग के हीरो थे और आज भी हैं. सहवाग के बारे में तेंदुलकर ने कभी कहा था, ‘वे एक ऐसे बल्लेबाज हैं जिनके साथ बल्लेबाजी करते हुए मैं सबसे ज्यादा सहज होता हूं. वह गेंदबाज के दिमाग में झांककर दूसरों से कहीं जल्दी तैयार हो जाते हैं.’ झपटने की यह तैयारी शिकार कर रहे किसी चीते जैसी होती है. यानी स्थिरता के बाद कम से कम समय में निर्णायक वार. जो लोग सहवाग के फुटवर्क की आलोचना करते हैं वे कहीं ज्यादा बुनियादी चीज पर उनके शानदार नियंत्रण को देखना भूल जाते हैं. वह है उनका संतुलन.

इसके बावजूद लंबे समय तक सहवाग बाहरी रहे जबकि सबका ध्यान तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली यानी फैब फोर पर रहा. शायद ऐसा इसलिए था कि फैब फोर यानी चौकड़ी एक सुविधाजनक लेबल था और पांच लोगों को लेकर इतना आकर्षक ठप्पा नहीं गढ़ा जा सकता था. शायद ऐसा इसलिए भी रहा क्योंकि सहवाग उतने ज्यादा वाकपटु नहीं थे और कुछ-कुछ ग्रामीण परिवेश से आने वाले ठेठ किस्म के व्यक्ति थे. कुछ हद तक ऐसा शायद उनके अजीबोगरीब शॉटों की वजह से भी रहा होगा. यहां तक कि ज्योफ बायकॉट जैसे खिलाड़ी ने भी उन्हें प्रतिभावान किंतु दिमाग से पैदल बल्लेबाज कहा. हो सकता है कि इसके पीछे का कारण और ज्यादा गहरा हो यानी उनकी जाट पृष्ठभूमि बनाम दूसरों की मध्यवर्गीय ब्राह्मण पृष्ठभूमि.

सहवाग नर्सरी राइम सुनाती किसी बच्ची की तरह हैं. जब वे बढ़िया होते हैं तो बहुत बढ़िया होते हैं और जब खराब होते हैं तो बहुत खराब. इसका मतलब है एक किस्म की अनिश्चितता जो उन्हें महानता की श्रेणी में जाने से रोकती रही है

मगर सहवाग को इस विश्लेषण से कभी कोई मतलब नहीं रहा. वे एक सीधे इंसान हैं जिसका सीधा सा मकसद है जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा रन बनाना. टेस्ट मैचों में उनका स्ट्राइक रेट 80.44 है. रिकी पोंटिंग के मामले में यह आंकड़ा 59 और ब्रायन लारा के मामले में 60 है. सिर्फ एडम गिलक्रिस्ट ही 82 के स्ट्राइक रेट के साथ उनसे आगे हैं जिन्हें टेस्ट मैचों में शायद ही कभी नई गेंद खेलने को मिली हो. सहवाग नर्सरी राइम सुनाती किसी बच्ची की तरह हैं. जब वे बढ़िया होते हैं तो बहुत बढ़िया होते हैं और जब खराब होते हैं तो बहुत खराब. इसका मतलब है एक किस्म की अनिश्चितता जो उन्हें महानता की श्रेणी में जाने से रोकती रही है: तीन साल पहले लाहौर में 254 रन बनाने के बाद अगली 11 पारियों में वे एक भी अर्धशतक नहीं बना सके; सेंट लूशिया में 180 जड़ने के बाद अगली 12 पारियों में उन्होंने सिर्फ एक अर्धशतक लगाया और चेन्नई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 319 बनाने के बाद अगली छह पारियों तक वे एक भी अर्धशतक नहीं बना सके.

सहवाग की बल्लेबाजी में एक सीधापन है जो उन लोगों को नहीं भाता जो जटिलता और रहस्यों को पसंद करते हैं. मगर उन्हें समझना चाहिए कि सादा होने का अर्थ सरल होना नहीं है. यही तो सहवाग की विशेषता है कि वे सब कुछ ऐसा बना देते हैं जो बेहद सरल दिखने लगता है. ऐसा लगता तक नहीं कि वे दुनिया के सबसे विध्वंसक बल्लेबाज हैं. बिना पैर हिलाए वे रनों का पहाड़ खड़ा कर सकते हैं.

आदर्श बल्लेबाजी के बुनियादी नियम कहते हैं कि बल्ले को सीधा रखते हुए नीचे लाकर पैर को बॉल की पिच के साथ लाइए, बल्ले और पैड को करीब रखते हुए शाट लगाइए, फिर फॉलो थ्रू कीजिए. यानी क्रिकेट खेलना पूरा हारमोनियम बजाने जैसा है जिसमें यह तय होता है कि किस धुन को बजाने के लिए किन-किन खटकों पर कब और कैसे उंगली रखनी है. मगर सहवाग और उनसे पहले जयसूर्या ने इस हारमोनियम से एक ऐसा संगीत छेड़ा जो पारी की शुरुआत करने वाले बल्लेबाजों से सुनना दुर्लभ था. सहवाग के लिए सिर्फ एक ही सुर मायने रखता है, वह है संतुलन का स्वर.

इतिहास में ऐसे बल्लेबाज रहे हैं जिन्होंने अपने नियम खुद बनाए. गैरी सोबर्स को भी फुटवर्क से कोई खास मतलब नहीं था. विश्व एकादश के लिए खेलते हुए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी 254 रनों की पारी जिसे ब्रैडमैन ने भी अपने देश की धरती पर खेली सबसे शानदार पारी कहा था, वह इस मामले में भी असाधारण थी कि इसमें फुटवर्क की कोई खास भूमिका नहीं थी. तब यह तर्क दिया जाता था कि सोबर्स को इसलिए कोई कुछ नहीं कहता क्योंकि वे एक जीनियस थे.

भारत में क्रिकेट की तकनीक को लेकर शुद्धतावादी जुनून शायद इसलिए है क्योंकि इस मामले में हम अंग्रेजों का अनुकरण करते हैं. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. जिस तरह भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी ज्यादा रंगबिरंगी और मौलिक होती है उसी तरह उनके द्वारा खेला जाने वाला क्रिकेट भी अनूठा होता है. सहवाग इसका उदाहरण हैं जो परंपरागत नियमों पर कम ध्यान देते हुए विदेशी सरजमीं पर पहला शतक लगाने वाले भारतीय मुश्ताक अली के जैसी अंग्रेजी शैली का जरा भी लिहाज नहीं करते.

सहवाग ने खुद को तेंदुलकर की तर्ज पर ढाला और शुरुआत में वे जब टीम में आए थे तो हेलमेट पहने इन दोनों खिलाड़ियों को पिच पर देखकर बताना मुश्किल होता था कि तेंदुलकर कौन है और सहवाग कौन. शायद उन्होंने इसीलिए बाद में अपना वजन बढ़ा लिया ताकि दशर्क उन्हें ज्यादा आसानी से पहचान सकें. 2001 में जब सहवाग ने अपना पहला ही टेस्ट खेलते हुए सेंचुरी लगाई तो वे नंबर छह पर बल्लेबाजी कर रहे थे. चार सीरीज बाद उन्हें लॉर्ड्स में पारी की शुरुआत करने का मौका मिला जहां उन्होंने 84 रन बनाए. अगले ही मैच में उन्होंने शतक बनाया. उनके पहले छह शतकों में से पांच अलग-अलग देशों में बने हैं. यह भी दिलचस्प है कि ये मैच के पहले ही दिन बने.

महानता की तरफ सहवाग ने अपने आखिरी कदम उस बेफिक्री के साथ बढ़ाए जिसके बारे में इस श्रेणी में पहले से ही मौजूद लोग सोच भी नहीं सकते थे. तीस (सहवाग 31 के हो गए हैं) की उम्र के बाद गावस्कर का औसत 48 और तेंदुलकर का 46 तक गिर गया था. लेकिन तेंदुलकर और द्रविड़ के रिटायर होने के बाद सहवाग से लोगों की उम्मीदें और भी बढ़ने वाली हैं. अब तक मध्य क्रम में महान बल्लेबाजों की वजह से सहवाग को ऊपरी क्रम में थोड़ी सी बेपरवाही से खेलने की छूट मिली हुई है. इसलिए उनके सफर का आखिरी स्वरूप तब बनेगा जब उनसे बल्लेबाजी को स्थिरता देने की अपेक्षा की जाएगी. जब उन पर विस्फोटक शुरुआत करने की जिम्मेदारी भी होगी और वक्त पड़ने पर लंगर डालकर खड़े रहने की भी. तेंदुलकर खुद में यह बदलाव लाने में सफल रहे. उन्होंने खुद को एक बेपरवाह किशोर से एक जिम्मेदार वयस्क की भूमिका में सफलतापूर्वक ढाल लिया. यह देखना दिलचस्प होगा कि सहवाग इस बदलाव से कैसे निपटते हैं और जिम्मेदारी का जुआ अपने कंधों पर कितनी गंभीरता से रखते हैं.

मगर इसमें अभी कुछ साल लगने हैं. फिलहाल तो उन्होंने बल्लेबाजी के मायने ही बदल दिए हैं. वे उत्तरआधुनिक दौर के ओपनर हैं जो खेल के तीनों संस्करणों में उपयोगी हैं. 1980 के दशक में जब बैरी रिचर्ड्स ने कहा था कि बल्लेबाजी की तकनीक बदल रही है तो परंपरावादियों ने उनका विरोध किया था जिनका कहना था कि तकनीक कभी नहीं बदल सकती. हारमोनियम के सुर तय रहेंगे. इसके बावजूद अगर सहवाग बिना पैर हिलाए इतने रन बना रहे हैं और समय और ऊर्जा बचा पा रहे हैं तो पूछा जा सकता है कि उनकी शैली को खेल की प्रशिक्षण पुस्तिका में जगह क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

परंपरावादी कहते रहे हैं कि बल्लेबाजी के दो तरीके हैं- सही और गलत. पहला तरीका लिखा हुआ है और दूसरा ऐसा कोई भी तरीका है जो लिखित नियमों को तोड़ता हो. उधर, आधुनिक बल्लेबाज महसूस करते हैं कि बल्लेबाजी के दो तरीके हैं-प्रभावी और अप्रभावी. फिटनेस का स्तर सुधर गया है. बहुत आदर्श कवर ड्राइव भी अक्सर आराम से रोक ली जाती है. लेकिन फील्डिंग कर रही टीम के कप्तान को अगर यह पता न हो कि बल्लेबाज कवर में मारेगा या प्वाइंट में या फिर मिडविकेट में तो फिर बॉल रोकना काफी मुश्किल हो जाता है. वास्तव में देखा जाए तो आधुनिक बल्लेबाजी का सार ही उसकी अनिश्चितता होनी चाहिए. तकनीक के मामले में कुशल किसी बल्लेबाज को बांधा जा सकता है क्योंकि उसके शॉट हारमोनियम की तय धुनों की तरह निश्चित होते हैं. सहवाग ने बल्लेबाजी को बार-बार एक जैसी ही धुन बजाने की बाध्यता से मुक्त किया है.

इसके बावजूद बायकॉट की बात की समीक्षा भी करते चलें. क्या इस तरह के रिकॉर्ड के बावजूद सहवाग को बुद्धिहीन बल्लेबाज कहा जा सकता है? बायकॉट जैसी ही बात कुछ दूसरे खिलाड़ियों ने भी कही थी मगर कम अशिष्टता के साथ. खेल का एक विरोधाभास है. महान खिलाड़ी अक्सर एक दूसरी ही तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं जो दुनिया की आम समझ से अलग होती है. पेले का दिमाग एक मायने में मोजार्ट या आइंस्टीन की तरह चल सकता है जिससे वे फुटबाल के मैदान पर वह कर सकते हैं जिसे कोई आम आदमी समझ नहीं सकता कि उन्होंने यह कैसे किया. अब इसका मतलब यह नहीं कि यही बुद्धि वे स्टॉक मार्केट में भी दिखा सकें.

क्रिकेट को लेकर सहवाग की प्रतिभा असाधारण है, न कि उनका इतिहासबोध (ओपनर के रूप में पंकज राय के साथ वीनू मांकड़ के विश्व रिकॉर्ड से तीन रन दूर रह जाने के बाद उन्होंने कहा था कि उन्होंने दोनों में से किसी भी खिलाड़ी का नाम नहीं सुना) या व्याकरण. काल्पनिक जासूस शरलाक होम्स अक्सर कहता है कि वह कभी अपने दिमाग को ऐसी बेकार जानकारी से नहीं भरता जिसे किताबों में खोजा जा सके, मगर वह हमेशा अपराधियों का पकड़ा जाना सुनिश्चित करता है. सहवाग भी यह दावा कर सकते हैं. उन्हें यह भले ही पता न हो कि मांकड़ कौन थे मगर उन्हें यह पता है कि एक्स्ट्रा कवर के पीछे दूसरी कतार में बैठे दर्शक तक गेंद कैसे पहुंचानी है. वे भले ही अपनी बल्लेबाजी को खंड-खंड में तोड़कर न समझ सकें पर वे गेंदबाज के उत्साह को तोड़कर उसे उसकी जगह समझा देते हैं.

टेस्ट क्रिकेट में भारत को नंबर एक की गद्दी तक पहुंचाने में सहवाग का योगदान बेहद अहम रहा है. पिछली आठ सीरीज में उन्होंने किसी भी दूसरे बल्लेबाज की अपेक्षा ज्यादा रन बनाए हैं. पिछले 20 टेस्ट मैचों में उनका कुल स्कोर रहा है 2093. वे भारत का नेतृत्व कर चुके हैं, उन्हें टीम से हटाया जा चुका है और फिर उन्होंने शानदार वापसी भी की है. रन बनाने की उनकी रफ्तार ने अक्सर भारत को विपक्षी टीम को आउट करने के लिए पर्याप्त समय दिया है. पिछले साल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ 68 गेंदों में बनाए गए उनके 83 रनों की वजह से भारत को एक अप्रत्याशित सी जीत मिली.

मेलबॉर्न में एक बार उन्होंने एक दिन में ही 195 रन ठोक डाले और उनका कैच बिल्कुल बाउंड्री के पास पकड़ा गया. यह हैरत की बात इसलिए नहीं थी क्योंकि उन्होंने अपना पहला तिहरा शतक भी छक्का मारकर पूरा किया था. शायद वे यह कहना चाह रहे थे कि आप 195 पर हों या 295 पर, कैच होने की संभावनाएं समान ही होती हैं! सही मायने में उनसे साहस भी सीखा जा सकता है और प्रेरणा भी ली जा सकती है.

उनकी रफ्तार का मतलब यह भी है कि वर्तमान खिलाड़ियों में से सिर्फ वही ऐसे हैं जो ब्रायन लारा के 400 रनों के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं, अगर वे 395 पर फिर से कुछ अप्रत्याशित न कर बैठें तो.

यह शहर नहीं, दिल्ली है!

पुस्तक       :     दिल्ली शहर दर शहर

लेखक        :     निर्मला जैन

कुल कीमत   :     250 रुपए

प्रकाशक      :     राजकमल प्रकाशन

निर्मला जैन की यह किताब जिस दिल्ली की बात करती है वह पूरी बीसवीं सदी तक फैली हुई है. एक तरह से यह उस दिल्ली की कहानी है जिसे उन्होंने अपने जन्म से अब तक बदलते-बिखरते और टूटते-जुड़ते देखा है. किताब का शुरुआती हिस्सा, जो स्वतंत्नता से पहले की पुरानी दिल्ली पर है, लाजवाब है और बाद के पन्नों के लिए उम्मीद पैदा करता है. लेकिन ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़ती हैं, उनका क्षेत्न सिकुड़ता जाता है.

वे उन दिनों से अपनी बात आरंभ करती हैं जब दिल्ली सिर्फ पुरानी दिल्ली वालों की थी और जिसे वे अपने बचपन की पैनी आंखों से देख रही थीं. उसके गली-कूचों, बाजारों, वैद्य-हक़ीमों, संस्कृति और परंपराओं को बयान करते हुए वे संपूर्ण हैं और बहुत खूबसूरती से अपने घर और गली को पूरे शहर से जोड़ देती हैं. चटोरेपन के लिए मशहूर दिल्ली वालों और इसके हुनरमंद हलवाइयों को एक पूरा अध्याय समर्पित है. ऐसे कम ही शहर होते हैं जहां के लोग किसी खास दुकान की जलेबी या परांठे खाने के लिए सपरिवार तीस-चालीस किलोमीटर दूर भी पहुंच जाते हैं. निर्मला को इसी दिल्ली पर नाज है और होना भी चाहिए.

नई दिल्ली के निर्माण से संबंधित कई रोचक जानकारियां भी वे अपने पाठकों को देती हैं और उनकी दृष्टि उस वर्ग-विभाजन को बार-बार भेदती है, जिसे ध्यान में रखकर गोरे साहबों और उनके क़रीबी हिंदुस्तानियों के लिए नई दिल्ली बनाई गई थी और पुरानी दिल्ली उसके पुराने बाशिंदों के लिए छोड़ दी गई थी. वे नई दिल्ली की वास्तुकला का भी विश्लेषण करती हैं और इसे बनाने वाले ल्यूटियन की दो महत्वपूर्ण उपलब्धियों का भी – छायादार सड़कें और ऐसी इमारतें जिनमें जून की गर्मी में भी कूलर की जरूरत नहीं पड़ती.

अपने व्यक्तिगत अनुभवों के जरिए निर्मला आजादी से पहले की अंग्रेजीपरस्त शिक्षा-व्यवस्था के बारे में भी लिखती हैं जिसमें संस्कृत भी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई जाती थी. वे हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में भी लिखती हैं और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान व्याप्त डर के बारे में भी. इसी के साथ कई नई बातें मुझे पता चलीं, जो शायद आपके लिए भी नई हों. जैसे स्वाधीनता के कई वर्ष बाद तक भी चांदनी चौक के दोनों सिरों को जोड़ने के लिए धीमी गति वाली एक ट्राम चलती थी या लालकिले से फतेहपुरी तक, यानी चांदनी चौक के बीचोंबीच एक नहर बहती थी या जी.बी. रोड की वेश्याओं का ठिकाना चौथे दशक से पहले चावड़ी बाजार में था. मगर आप ग़ौर करें कि जितनी भी नई बातें उन्होंने लिखी हैं, उनमें से अधिकांश पुरानी दिल्ली की ही हैं. शायद उन्होंने उसी को ज्यादा क़रीब से देखा है और इसीलिए उसे लिखते हुए वे अधिक सहज हैं. मगर इस स्थिति में पुस्तक के नाम मेंदिल्लीके स्थान पर पुरानी दिल्लीहोना चाहिए. जब भी वे आजादी के बाद की या चांदनी चौक और लाल किले के पार की, यानी विस्तार के लिहाज से नई दिल्ली की बात करती हैं तो भटक जाती हैं और शहर की बजाय उसकी राजनैतिक गतिविधियों की बातें करने लगती हैं.

आजादी के बाद के अध्यायों में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने जीवन और हिंदी साहित्य को ही पूरा शहर मान बैठती हैं और उनका लेखन अधिक आत्मकथात्मक हो जाता है. वे समाज की बात करती हैं तो वह साहित्य पर आकर ठहर जाती हैं और उस पर भी नहीं, उसके लोगों पर. अपनी किताब में उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित रहने में निर्मला असफल रही हैं और कई पृष्ठों में उन्होंने वह जगह घेर ली है जिसे उन्होंने अपने शहर को देने का वादा किया था. यह पुस्तक के पूर्वार्ध और उस शहर के साथ भी अन्याय है, जिसमें उनकी आत्मा बसती है.

वे पूरी दक्षिणी दिल्ली के बारे में महज दो-चार बातें कहकर आगे बढ़ जाती हैं और दिल्ली का ही हिस्सा बनते गुड़गांव, नोएडा और फरीदाबाद जैसे शहरों का जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझतीं. कॉल सेंटरों से आई आर्थिक और नैतिक क्रांति पर तो वे थोड़ा बहुत लिखती भी हैं, मगर आई टी कंपनियों और मल्टीप्लेक्स संस्कृति को भूल जाती हैं. साथ ही वे संस्कृतियों के घालमेल से भी हल्की सी नाराज नजर आती हैं और इसके जिम्मेदार बाहरी लोगों से भी. वे खुलकर नहीं कहती मगर उनके लिखे को पढ़कर लगता है जैसे बाहर से यहां आकर बसे लोगों ने उनकी पुरानी दिल्ली का शील भंग कर दिया है.

बहरहाल, यदि ऐसा है तो मैं इसपर अपनी आपत्ति दर्ज करता हूं. दिल्ली किसी की नहीं है, इसीलिए हम सबकी है.      

गौरव सोलंकी   

‘वॉकिंग के भी नियम हैं भाईसाहब’

हम डाक्टर लोग सलाह देते हैं कि घूमा करो. लोग घूमते भी हैं. परंतु प्राय: वे ठीक से जानते नहीं कि कैसे घूमना चाहिये? अब आप कहेंगे कि घूमना तो घूमना है साहब. आदमी घूमने की सोच ले तो घूमने निकल पड़ता है – इसमें ऐसा क्या है? पर घूमने (वॉकिंग) के भी कुछ कायदे हैं जो न माने जायें तो स्वास्थ्य को फायदे की जगह नुकसान भी पहुंच सकता है.

कथा-1

डाक्टर ने डायबिटीज बताई और कहा कि नियमित वॉकिंग करेंगे तो ब्लड शुगर ठीक रहेगी. तय कर लिया. नये वॉकिंग शूज लिये, ट्रेक सूट भी. घूमेंगे तो कायदे से घूमेंगे. रोज तेज-तेज चलने भी लगे – चालीस मिनट की ब्रिस्क वॉकिंग’. चार दिनों तक ऐसा चले कि बलैंया लेने को मन हो आए. फिर सब बंद. बाद में बताने लगे कि अपने बस की चीज नहीं यह. ऐसे हाथ पांव टूटने लगते थे कि चार दिन वॉकिंग के बाद दो दिन छुट्टी लेकर बच्चों से हाथ-पांव दबवाने पड़े रहे.

हुआ यह था कि वे बेहद तेज गति से वॉकिंग को निकलते और आखिरी पल तक तेज चलते हुए ही घर वापस पहुंच जाते. करना यह था कि पहले पांच मिनट आराम से चलते-चलते धीरे-धीरे तेज गति पकड़ते, फिर तेज गति से पचीस-तीस मिनट चलकर आखिरी के पांच मिनट फिर धीमे-धीमे गति कम करते हुए घूमना बंद करते.

शिक्षा

घर से सीधे तीर की तरह न निकलें और घर इतनी तेजी से वापस न लौटें कि बंद दरवाजे से टकराकर मुंह तोड़ लें. शुरू में पांच मिनट का वॉर्मिग अपसमय और आखिरी के पांच मिनट का कूलिंग ऑफसमय दें नहीं तो हाथ-पांव बेहद दर्द करते रहेंगे.

कथा-2

डाक्टर ने एन्जियोप्लास्टी के बाद चेताया कि रोज चालीस-पैंतालीस मिनट घूमेंगे तो ही ठीक रहेंगे. घूमे. बाद में गणित लगाया कि यदि चालीस मिनट से इतना बढ़िया चल रहा है तो अस्सी मिनट में तो दुगना बढ़िया होगा. सो रोज डेढ़-पौने दो घंटे तेज चलने लगे. बस, एक दिन उलट गए. चक्कर, थकान, पसीना, पुलिया पर लेट गए. लोग उठाकर हमारे पास भागे कि हार्ट अटैक हो गया है. उन्हें हार्ट अटैक तो नहीं हुआ था. वे जरूरत से ज्यादा व्यायाम से पस्त हो गए थे. इतना श्रम हुआ कि ब्लड शुगर बेहद कम हो गई और चकरा कर गिरते-गिरते बचे.

इसी कथा से जुड़ी एक उपकथा भी है : ये सज्जन सुबह-सुबह खाली पेट ही घूमने निकले थे. रात में ब्लड शुगर पहले ही कम हो गई थी और सुबह सुबह की ब्रिस्क वॉकिंग. घूमोगे तो मांसपेशियां ब्लड शुगर से ताकत लेंगी. चक्कर आएंगे, लेट जाओगे.

शिक्षा

पैंतालीस मिनट की ब्रिस्क वॉकिंगपर्याप्त है. ज्यादा करेंगे तो पस्त ही होंगे. वॉकिंग को कहा है, पहलवानी को नहीं. और यदि घूमने निकलो तो आपका पेट न तो एकदम खाली हो और न ही ठसाठस भरा हुआ. चाय, बिस्कुट, दूध या कोई फल लेकर ही निकलें.

कथा-3

डाक्टर ने कहा कि रोज घूमने जाया करो तो वे बोले कि हम तो रोज ही, रात में खाने के बाद आधा-पौना घंटा घूमते हैं. सुनकर डाक्टर हंसने लगा. खाने के बाद बाइक या दोस्तों के साथ गप लगाते हुये रात में मजे लेकर टहलना शारीरिक नहीं मानसिक व्यायाम है, बस (परसाई लिख गये हैं कि खाली पेट दर्शन सूझता है और भरे पेट हरामखोरी!) यह डिनर के बाद का खरामा-खरामा टहलना जिसे हम जनवासे की चाल कहते हैं – इससे स्वास्थ्य को कुछ नहीं मिलता है.

शिक्षा

टहलने को घूमना मत मान बैठिए. इतना तेज चलिए जितना आप कोशिश करके चल सकें. तेजी इतनी हो कि न तो थकें, न ही साथ वाले से बात करने में आपकी सांस टूटे. ..हां, खाने के बाद तो तेज चलने को हम कह ही नहीं रहे. हल्के पेट पर तेज चलें.

कथा-4

कड़ाके की ठंड है पर वे चार बजे सुबह उठ जाते हैं. हर मौसम में मॉर्निग वॉकका नियम-सा बांध रखा है. ठंडी तीखी हवा है. चिल्ला जाड़े में निकल पड़े वे घूमने. अचानक छाती में तेज दर्द हुआ. बैठ गए. दर्द बढ़ता गया. बमुश्किल घर लौटे. मेरे पास लाए गए. मैंने बताया कि यह दिल का दर्द था – एन्जाइना. हार्ट अटैक भी हो सकता था. बच गए. हुआ यह था कि तेज ठंड में एक्सपोजर से ब्लड प्रेशर भी बढ़ा, खून की नलियों में सिकुड़न आई, दिल पर दबाव पड़ा – ऐसे में हार्ट अटैक भी हो गया होता तो आश्चर्य न था.

शिक्षा

वॉकिंग का मतलब मॉर्निग वॉकही नहीं. और मॉर्निग वॉक का मतलब सुबह चार पांच बजे ही नहीं. तेज ठंड हो तो धूप निकलने के बाद या शाम को ही घूमने निकलें. याद रखें कि सरकार इस बात पर अभी तक तो तमगा नहीं देती है कि आप इतनी सुबह घूमने चल पड़ते हैं.      

ख़बर क्यों नहीं है पत्नकारों की छंटनी?

गलाकाट होड़ के बावजूद चैनलों के बीच एक अघोषित सहमति है कि वे किसी भी प्रकार के मामले में एक दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं बोलेंगे

जिस तरह से पत्नकारों को निकाला गया है, उसका संपादकीय स्वतंत्नता पर भी असर पड़े बिना नहीं रहेगा. आखिर यह छंटनी देखने के बाद कौन पत्नकार पेड कंटेंट या खबरों में मिलावट या मीडिया कंपनी के ऐसे ही उलटे-सीधे निर्देशों को मानने से इनकार कर पाएगा

जानी-मानी टीवी कंपनी टीवी-18 ने अभी हाल में अपने बिजनेस समाचार चैनलों से एक झटके में 200 से ज्यादा मीडियाकर्मियों को निकाल दिया. इनमें काफी संख्या में पत्नकार भी हैं. लेकिन इस खबर को अधिकांश अखबारों और चैनलों ने ख़बर नहीं माना. इसलिए यह खबर कहीं नहीं छपी या चली, सिवाय कुछ ब्लॉगों के. इससे पहले भी पिछले एक साल में कई अखबारों और टीवी समाचार चैनलों में मंदी के नाम पर या उसके बहाने सैकड़ों पत्नकारों की छंटनी हुई, बाकी के वेतन में कटौती हुई और नई भर्तियों पर रोक लगा दी गई, लेकिन उसकी भी कोई खबर कहीं नहीं दिखाई दी. टिप्पणी या चर्चा तो दूर की बात है. सवाल यह है कि पत्नकारों की छंटनी खबर क्यों नहीं बनती है? क्या यह खबर नहीं है?

शायद आपको याद हो, पिछले साल जब जेट एयरवेज ने इसी तरह अपने कुछ सौ कर्मचारियों को निकाला था, तब चैनलों ने उस खबर को खूब उछाला था. उस व्यापक कवरेज के कारण जो जनदबाव बना, उसकी वजह से जेट को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था. फिर पत्नकारों और चैनलकर्मियों को निकाले जाने की खबर को इस तरह ब्लैकआउट करने की वजह क्या है? यही नहीं निकाले गए चैनलकर्मियों के हक में किसी पत्नकार संगठन या यूनियन या चैनलों के संपादकों की संस्था – ब्राडकास्ट एडिटर्स संगठन – ने भी कुछ नहीं कहा. गोया कुछ हुआ ही नहीं हो. अलबत्ता उसी के आसपास सभी चैनल आईबीएन लोकमत पर शिवसैनिकों के हमले को लोकतंत्न पर हमला बताते हुए सर आसमान पर उठाए हुए थे.

इरादा इन दोनों घटनाओं की तुलना करने का नहीं है और न ही आईबीएन लोकमत पर हुए हमले को कम करके आंकने का है. लेकिन चैनलों के संपादकों से कुछ अपेक्षा तो थी ही. क्या कारण है कि चैनलों और मीडिया के अंदर चल रही हलचलों या पत्नकारों की समस्याओं को खबर या चर्चा के लायक नहीं माना जाता? असल में, आपस में गलाकाट होड़ के बावजूद इस मामले में चैनलों के बीच एक अघोषित सहमति है कि वे ऐसे मामलों में एक दूसरे के खिलाफ नहीं बोलेंगे, भले ही वह कितनी बड़ी खबर क्यों न हो.

चैनल चलाने वाली कंपनियां कह सकती हैं कि इसमे नया क्या है? खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में कर्मचारियों को हायर और फायर किया जाता रहता है. पिछले एक साल में आर्थिक मंदी के कारण लाखों लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है. ऐसे में, मीडियाकर्मी अपवाद कैसे हो सकते हैं? सच यह है कि चैनलों समेत पूरे कॉर्पोरेट मीडिया ने जेट जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर अन्य क्षेत्नों में मंदी के नाम पर लाखों कर्मचारियों की छंटनी की खबरों को कोई महत्व नहीं दिया. यही नहीं, उसने इन खबरों को अंडरप्ले किया और अब तो वह अर्थव्यवस्था के पुराने दिन लौटने के गीत गाने में जुटा है.

कहा जा सकता है कि ऐसे में पत्नकारों की छंटनी को इतना तूल देने का क्या मतलब है? निश्चय ही, पत्नकार कोई विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग नहीं है. लेकिन चैनलों और मीडिया में चल रही इस छंटनी का संबंध केवल मीडिया कंपनियों और उनके कर्मचारियों यानी पत्नकारों तक सीमित नहीं है. यह इसलिए चिंता की बात है कि इसका सीधा सम्बन्ध चैनलों के कंटेंट से है. जिन भी चैनलों से पत्नकारों की छंटनी हुई है, वहां उनके न्यूज ऑपरेशन पर इसका असर पड़ना तय है. खबरों का दायरा कम होगा और इसके कारण खबरों के संग्रह से लेकर विभिन्न बीटों की कवरेज पर नकारात्मक असर पड़ेगा. इसका मतलब यह होगा कि आनेवाले दिनों में चैनलों पर बेसिर-पैर का इंडिया टीवी मार्का सस्ता कंटेंट और बढ़ेगा. आखिर जब पत्नकार और खबरें नहीं होगीं तो चैनल क्या दिखाएंगे?

इससे भी बड़ी बात यह है कि चैनलों से जिस तरह से पत्नकारों को निकाला गया है, उसका संपादकीय स्वतंत्नता पर भी असर पड़े बिना नहीं रहेगा. आखिर यह छंटनी देखने के बाद कौन पत्नकार पेड कंटेंट या खबरों में मिलावट या मीडिया कंपनी के ऐसे ही उलटे-सीधे निर्देशों को मानने से इनकार कर पाएगा. इससे पत्नकारों और अन्य मीडियाकर्मियों पर काम का दबाव और तनाव और भी बढ़ जाएगा. चैनलों में पहले ही पत्नकारों को बारह-बारह घंटे काम करना पड़ रहा है जिससे अधिकांश टीवी पत्नकार डायबिटीज से लेकर ब्लड प्रेशर और अन्य तरह की बीमारियों से ग्रस्त हैं. नए हालात में उनकी स्थिति और बिगड़ेगी. इसका असर भी कंटेंट पर पड़ेगा.

क्या अब भी बताने की जरूरत है कि एक दर्शक के रूप में इसकी कीमत आप-हम सभी को और अंतत: पूरे लोकतंत्न को चुकानी पड़ेगी?

आनंद प्रधान

25 बरस पुराने हादसे, सौ साल पुरानी किताब

दो दिसंबर, 1984 की रात, भोपाल में यूनियन कार्बाइड के आसपास की बस्तियों में रहने वाले सैकड़ों लोग सोने गए तो फिर उठ नहीं पाए. आधी रात के करीब, कारखाने से रिसी गैस उनकी बेख़बर नींद में ही उन्हें लील गई.

सच्चाई यह है कि यह कुछ लोगों का लोकतंत्न है जो कुछ लोगों द्वारा और कुछ लोगों के लिए चलाया जा रहा है. सारे मानवाधिकार उन्हीं के हैं, सारी कचहरियां और अदालतें उन्हीं के लिए हैं, पुलिस और प्रशासन के सारे इंतजाम उन्हीं के लिए हैं 

वे फिर भी खुशनसीब लोग थे. उस रात जिन लोगों की नींद एक बेचैनी के साथ अचानक टूटी, उन्होंने पाया कि उनकी आंखें जल रही हैं, उनके बदन में अजब तरह की ऐंठन है और उन्हें सांस लेना भी भारी हो रहा है. आधी रात के बाद अपने घर छोड़कर बदहवास भागे ये लोग सड़कों पर गिरे, कुचले गए, घुटन और सांस की तकलीफ की वजह से मारे गए.

ये लोग भी खुशनसीब निकले- उन लोगों के मुकाबले, जो उस रात की त्नासदी के बाद भी बच गए. क्योंकि अगले कई बरसों तक कई त्नासदियां इन बचे हुए लोगों का पीछा करती रहीं- अब भी कर रही हैं. उनके बच्चे अपनी आधी-अधूरी, अशक्त और विकलांग जिंदगी का अभिशाप लेकर पैदा हुए और उससे भी ज्यादा एक ऐसी व्यवस्था का बोझ लेकर, जिसमें उनके साथ न्याय करने की चिंता तो दूर, उनकी न्यूनतम जरूरतें पूरी करने का सहज मानवीय बोध भी नहीं है. 

आज 25 साल बाद जितनी सिहरन गैस त्नासदी को याद करके होती है, उससे कहीं ज्यादा यह खयाल करके कि उस त्नासदी के करीब छह लाख पीड़ित लोगों को- यह सरकार द्वारा स्वीकृत आंकड़ा है- न्याय देना तो दूर, अब तक किसी व्यवस्था में न्याय देने की चाहत भी नहीं दिखी है.

लेकिन भोपाल अकेली त्नासदी नहीं है. भोपाल के गैस रिसाव से बस महीना भर पहले पूरे देश ने उन्माद का एक डरावना रिसाव देखा. 31 अक्तूबर, 1984 की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्नी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश में हजारों सिखों से इसका बदला लिया गया- उनके घर लूट लिए गए, उनकी दुकानें जला दी गईं, उन्हें मार डाला गया. भोपाल की गैस ने आधी रात को सोते हुए लोगों को उनके घर से निकलने को मजबूर किया था, लेकिन 84 के उन्माद ने लोगों को दिन-दहाड़े घरों और दुकानों से निकालकर मारा. डरावनी बात यह थी कि इस उन्माद को पुलिस और प्रशासन का मुखर सहयोग नहीं तो मौन समर्थन जरूर हासिल रहा. 25 साल पुरानी इन दो त्नासदियों के आगे-पीछे ऐसी ढेर सारी घटनाएं हैं जहां न्याय अभी तक प्रतीक्षित है- या शायद प्रतीक्षित भी नहीं है- उसकी उम्मीद पूरी तरह मिट चुकी है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्न की बहुत बड़ी आबादी अपने अनुभव से यह समझ चुकी है कि न्याय नाम की चिड़िया उन्हीं के पास आएगी जिनके पास सोने और फौलाद के बड़े-बड़े पिंजरे होंगे. निश्चय ही इस टिप्पणी का वास्ता न्यायतंत्न या न्यायपालिका में पैसे की बढ़ रही भूमिका से नहीं है, हालांकि यह भी एक सच है- सबसे धनाढ्य अपराधियों को इस देश के सबसे योग्य वकील बचाते हैं.

लेकिन समझने की बात यह है कि न्याय किसी व्यवस्था का इकहरा या इकलौता मूल्य नहीं हो सकता. उसका वास्ता कई और मूल्यों से है. जो व्यवस्था अपने समाज की भयावह गैरबराबरी से विचलित नहीं होती, जो इस बात से बेखबर रहती है कि पिछले दस या पंद्रह साल में उसके सवा लाख नागरिकों ने आत्महत्या कर ली है, जो इस बात से बेपरवाह रहती है कि उसके एक तिहाई नागरिक गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करते हैं, उस व्यवस्था से हम ऐसी संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वह किसी हिंसा या गैस रिसाव के कुछ हजार या लाख लोगों की तकलीफ से पसीजकर उनके हिस्से का न्याय पाने और दिलाने की कोशिश करेगी?

ऐसी संवेदनहीन व्यवस्था में न्याय भी बस एक सौदा हो जाता है जो लोग अपनी ताकत के मुताबिक कर लेते हैं. भोपाल ने ही बताया है कि त्रासदी का मुआवजा सबसे ज्यादा उन लोगों को मिला, जो सबसे ऊंचे ओहदों पर थे- मिसाल के तौर पर राज्य के तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव को 3 लाख रु पए मिले जिनकी बेटी हादसे के तीन महीने बाद पैदा हुई. तीन लाख रुपए की रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यह याद करना जरूरी है कि हादसे के 90 फीसदी पीड़ितों को बस 25,000 की रकम नसीब हुई.

दरअसल, यह पूरा मामला बताता है कि भारतीय राष्ट्र राज्य अपने नागरिकों के साथ किस तरह की बेईमानी करता रहा है. इस हादसे का जो सबसे बड़ा मुजरिम है, उस वारेन एंडरसन को सरकारी विमान से विदेश भेज दिया गया जो अब तक भगोड़ा है. इस हादसे के पीड़ितों के इलाज के लिए जो विशेष अस्पताल बनाए गए, वहां से उन्हें लौटाया जाने लगा क्योंकि अस्पतालों में उनकी भर्ती से मुआवजा पाने का उनका दावा मजबूत होता. सरकार ने यूनियन कार्बाइड से जो समझोता किया, वह इतनी कम रकम का निकला कि उससे किसी का पुनर्वास संभव नहीं हो पाया.

84 की सिख विरोधी हिंसा में न्याय के और भी विद्रूप दिखते हैं. यह मामला दिल्ली का था और एक समुदाय से जुड़ा हुआ- इसलिए शायद पीड़ित लोगों को मुआवजा भोपाल के मुकाबले कहीं ज्यादा मिल गया, लेकिन उन्हें न्याय देने-दिलाने की कोशिश या संवेदनशीलता कभी नहीं दिखी. कांग्रेस के नेता अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग ढंग से 84 की हिंसा पर अफसोस जताते रहे, लेकिन पार्टी कभी यह तय नहीं कर पाई कि उसके जिन नेताओं पर हिंसा भड़काने के आरोप लगते रहे हैं, उनके साथ वह क्या सलूक करे. वह अपनी राजनैतिक सहूलियत के हिसाब से कभी उन्हें मंत्नी बनाती रही और कभी उनके टिकट काटती रही. नेताओं के विरुद्ध मुकदमे चले, लेकिन सबूतों और गवाहों के अनमने-हताश सिलसिले में सब दम तोड़ते चले गए.

25 बरस पुरानी दो त्नासदियों का यह हाल देखते हुए याद आती है 100 बरस पुरानी एक किताब. 1909 में, लंदन से दक्षिण अफ्रीका जाते हुए पानी के जहाज पर महात्मा गांधी ने हिंद स्वराजलिखी. पाठक और संपादक के संवाद के रूप में लिखी गई इस किताब में गांधी जी ने रेलों, वकीलों और डॉक्टरों को खूब कोसा- कहा कि हिंदुस्तान को कंगाल बनाने में इन तीनों की भूमिका सबसे बड़ी है.

गांधी जी की बात बहुत कड़ी लगती है- एक हद तक सनक से भरी हुई भी. लेकिन ध्यान से पढ़ें तो समझ में आ जाता है कि गांधी कहना क्या चाहते हैं. उनका बैर वकील, डॉक्टर या रेल से नहीं है, उस प्रवृत्ति, प्रयोजन और प्रेरणा से है जो वकीलों, डॉक्टरों और रेलों के पीछे होती है- कमाई की, वर्चस्व की और उपभोग के अतिरेक की. भोपाल की त्नासदी जैसे गांधी को अक्षर-अक्षर सही साबित करती है. यहां रेल की जगह एक कारखाना है जहां कीटनाशक बनते थे और जिनसे निकली गैस ने आदमी को कीड़ों-मकोड़ों की तरह नष्ट कर दिया. जो बच गए, वे इतने साधनहीन थे कि उन्हें न इलाज करने वाले डॉक्टर मिले न इंसाफ दिलाने वाले वकील.

लेकिन भोपाल की त्नासदी सिर्फ सौ साल पहले लिखे गए हिंद स्वराजको सही साबित नहीं करती, आज के हिंद स्वराज का भी सच बताती है. यह जनता से बहुत दूर खड़ा स्वराज है- इतनी दूर कि उसे आम जन कीड़े-मकोड़ों जैसे ही दिखाई पड़ते हैं. उनके मारे जाने पर उसे परेशानी भले होती हो, अफसोस नहीं होता. जाहिर है, यह दूरी उसे अमानवीय, अन्यायी और हिंसक बनाती है- कई बार यह हिंसा प्रत्यक्ष होती है और कई बार छुपी हुई- जिसमें वह हत्यारों और आक्रमणकारियों का बचाव ही नहीं करता, उन्हें जमीन भी दिलाता है और उनके पकड़े जाने की हालत में भागने की सुविधा भी मुहैया कराता है. हम अक्सर यह कहते नहीं अघाते कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्न हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि यह कुछ लोगों का लोकतंत्न है जो कुछ लोगों द्वारा और कुछ लोगों के लिए चलाया जा रहा है. सारे मानवाधिकार उन्हीं के हैं, सारी कचहरियां और अदालतें उन्हीं के लिए हैं, पुलिस और प्रशासन के सारे इंतजाम उन्हीं के लिए हैं. अब तो अर्थनीति भी उन्हीं के इशारों पर बनाई जा रही है.

ब्रेख्त की एक जानी-पहचानी कविता की पंक्तियां हैं- हमारे हाथ में थमा दिए गए हैं छोटे-छोटे न्याय / ताकि जो बड़ा अन्याय है, उस पर परदा पड़ा रहे.अब तो लगता है कि इन छोटे-छोटे न्यायों में भी राज्यसत्ता की दिलचस्पी नहीं रह गई है. क्या इसलिए कि उसके बड़े अन्यायों पर से परदा हट चुका है?

प्रियदर्शन 

अलग वृत्ति की पुनरावृत्ति

आज जो मांगें की जा रही हैं वे भाषा के जरिये विकास और न्याय को सुनिश्चित करने से आगे बढ़कर न्याय और विकास के उपकरणों तक आसान पहुंच स्थापित करने के लिए हैं. एक गोरखालैंड को छोड़कर तेलंगाना, बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, विदर्भ आदि राज्यों की मांगें इसी प्रकार की तो हैंआजादी से पहले राज्यों का गठन अंग्रेजों ने कभी अपनी सुविधा के मुताबिक, कभी देश विखंडित ही रहे, ऐसी सोच के साथ और कभी बिना सोचे-समझे भी किया था. मगर कांग्रेस ने देश आजाद होने से पहले 1921 में ही अपने संविधान में बदलाव लाकर अपने सांगठनिक ढांचे को भाषायी आधार पर पुनर्गठित कर लिया था. इससे ही आजादी के बाद भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के विचार की नींव पड़ी. चूंकि आजादी के तुरंत बाद तमाम तरह की सुरसा सरीखी चुनौतियां देश के सामने थीं इसलिए संविधान सभा और कांग्रेस की सरकार और नेताओं ने राज्यों के पुनर्गठन के काम की शुरुआत को कुछ सालों के लिए टालना ही उचित समझ. परंतु उसके बाद मद्रास प्रेसिडेंसी के तेलगू भाषी इलाकों में जो कुछ हुआ उसे पिछले महीने के अंत से जो कुछ आंध्र प्रदेश और पूरे देश में हो रहा है, उससे स्पष्ट रूप से जोड़कर देखा जा सकता है.

के चंद्रशेखर राव की तर्ज पर 1952 में अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर एक स्वतंत्रता सेनानी पट्टी श्रीरामलु ने आमरण अनशन शुरू किया और केसीआर की तरह ही उनकी हालत दिसंबर के मध्य में काफी खराब हो गई और उनका देहांत हो गया. इस दौरान आज के आंध्र प्रदेश के तब वाले स्वरूप में वही सब हुआ जो केसीआर के उपवास के दौरान हुआ. जिस तरह से कुछ दिन पहले आधी रात को अचानक ही हमारे गृह मंत्री ने अलग तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा की थी उसी तरह अचानक ही पंडित नेहरू ने भी 1952 में मद्रास प्रेसिडेंसी के तेलगू भाषी इलाकों को अलग कर आंध्र नाम का राज्य बनाने की घोषणा की थी जो 1953 के अक्टूबर माह में बन भी गया. वर्तमान में जिस तरह से तेलंगाना राज्य के गठन की घोषणा के बाद से देश भर में ऐसे कई नए राज्यों की मांग का पिटारा खुल गया है वैसा ही तब भी हुआ था और केंद्र सरकार को तुरंत ही एक राज्य पुनर्गठन आयोग की घोषणा करनी पड़ी जिसने भाषायी आधार पर कई नए राज्यों को बनाने और हैदराबाद स्टेट के तेलगूभाषी इलाके (तेलंगाना क्षेत्र) अपनी विशेष परिस्थितियों की वजह से आंध्र राज्य से जुड़ें या न जुड़ें, इस बात का फैसला उन्हीं पर छोड़ने की सिफारिश की थी.

मगर 60 के दशक की नए राज्यों की मांगों और आज की मांगों में एक बहुत बड़ा बुनियादी अंतर है. भाषायी आधार पर राज्यों के गठन के पीछे उद्देश्य यह था कि यदि प्रदेश का प्रशासन, न्याय व्यवस्था और शिक्षा पद्धति उसके अपने निवासियों की भाषा में संचालित होंगे तो इससे उनके विकास और न्यायप्राप्ति के रास्ते अधिक सुगम हो जाएंगे. जबकि आज जो मांगें की जा रही हैं वे भाषा के जरिये विकास और न्याय को सुनिश्चित करने से आगे बढ़कर न्याय और विकास के उपकरणों तक आसान पहुंच स्थापित करने के लिए हैं. एक गोरखालैंड को छोड़कर तेलंगाना, बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, विदर्भ आदि राज्यों की मांगें इसी प्रकार की तो हैं.

इन मांगों से निपटने का सबसे बढ़िया तरीका वही है जो 1953 में नेहरू जी ने अपनाया था – राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन कर राजनीति से प्रेरित निर्णय की बजाय एक सुविचारित और निष्पक्ष निर्णय लेते दिखना. ऐसा पहले ही हो जाना चाहिए था, मगर अब भी देर नहीं हुई है.

संजय दुबे 

अराजकता की सेना

मैं एक पक्का मुंबईकर हूं. मेरी पैदाइश मुंबई में हुई. इसी शहर में मैं पला बढ़ा. यहां का कोना-कोना मेरा जाना-पहचाना है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह वही शहर है जिसने मेरी जिंदगी को आकार दिया है. मगर आज मैं इस शहर से खुश नहीं हूं. लगता है जैसे यहां मैं अजनबी हूं. गुस्सा भी आता है, दुख होता है और घुटन भी होती है. और चीजों की बात तो छोड़िए यहां तो मेरा जीने तक का अधिकार छीन लिया गया है. जब यही अधिकार आपके पास न हो तो फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे दूसरे संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ाई कैसे लड़ी जाए?

शिव सेना, उसके सहयोगियों और सत्तासीन पार्टियों, तीनों के लिए मीडिया की स्वतंत्रता असहजता पैदा करती है. बर्बर तत्वों को निष्पक्ष पत्रकारिता कभी स्वीकार नहीं होगी

20 नवंबर को आईबीएन लोकमत के दफ्तर पर शिवसैनिकों का हमला हुआ. वे अपने साथ लाठियां और लोहे की छड़ें लेकर आए थे. मेरे लिए यह कोई हैरत की बात नहीं थी. 1991 से लेकर आज तक मैं आठ बार शिवसैनिकों के हमलों का निशाना बन चुका हूं. सिर्फ इसलिए क्योंकि मैंने उनके पसंदीदा नेता की आलोचना करने की हिम्मत की थी. मुझे अक्सर धमकियां दी जाती रही हैं कि अगर मैं नहीं सुधरा तो मुझे जान के लाले पड़ जाएंगे. वैसे तो शिव सेना के सभी हमलों में एक भयावह समानता रहती है मगर इस बार यह अलग था. इसलिए क्योंकि आईबीएन लोकमत के स्टाफ ने सात हमलावरों को पकड़ लिया और उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया जो घटना के आधे घंटे बाद पहुंची. ये सातों और उनके अलावा 17 शिव सैनिक जिन्होंने चैनल के पुणे और मुंबई स्थित दफ्तरों पर हमला किया था, अब हत्या की कोशिश के आरोप में पुलिस हिरासत में हैं.

मगर अब तक सिर्फ हुक्म के ताबेदार ही पकड़े गए हैं. हमले का मास्टरमाइंड सुनील राउत अब भी फरार है. सुनील शिव सेना सांसद और इस पार्टी के मुखपत्र सामना के एक्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत का भाई है. ये हमले दो दिनों तक चले. इनके काफी हद तक खत्म हो जाने के बाद भी संजय राउत हमलावर संपादकीय छापते रहे. मगर पूरी तरह से अक्षम कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. 1966 में शुरू हुई शिव सेना अब तक दक्षिण भारतीयों, मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों और उसकी बर्बरता को सामने लाने वाले मीडिया को निशाना बनाती रही है. पार्टी को लगता है कि इससे वह मजबूत होगी.

अब सवाल यह उठता है कि जब शिव सैनिक एक ऐसे दफ्तर पर हमला और लूटपाट कर सकते हैं तो उनके राज में क्या एक आम आदमी का घर सुरक्षित होगा? मैं दो दशक से शिव सेना के निशाने पर रहा हूं. 1991 में उन्होंने पत्रकारों पर तलवारों से हमला किया था और 1993 में उन्होंने एक टूटी बोतल से मेरा पेट फाड़ने की कोशिश की. लेकिन अब तक उनमें से एक भी हमलावर को अपने किए का दंड नहीं मिला है. या तो पुलिस इन घटनाओं की ठीक से जांच नहीं करती या फिर वह हमलावरों पर ऐसी धाराएं लगा देती है जिससे वे सजा से बच जाते हैं. कई मामलों ने तो पुलिस ने गुंडों को गिरफ्तार करने में खुद ही देर की ताकि उन्हें बचकर भागने के लिए पर्याप्त समय मिल जाए. इन्हीं वजहों से शिव सैनिकों को कानून का कोई डर नहीं है. चिंता यह भी है कि कुछ राजनैतिक संगठनों ने उनकी नकल शुरू कर दी है और वे भी अब मीडियाकर्मियों पर हमले करने लगे हैं. वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर तक पर हमला हो चुका है.

मगर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री या विपक्षी पार्टियों को इसकी कोई परवाह नहीं. और शहर की पुलिस तो शिव सेना के प्रति सहानुभूति रखने वाले तत्वों से भरी पड़ी है. उन्हीं की मदद से 1992 के मुंबई दंगों में गुंडों ने जमकर मार-काट मचाई थी. इस शैतानी गठजोड़ की तरफ श्रीकृष्ण आयोग ने भी संकेत किया था जिसने सीधे-सीधे बाल ठाकरे और शिवसैनिकों को कटघरे में खड़ा किया था. शिवसेना से टूटी एमएनएस की विचारधारा अलग नहीं है. मुझे पत्रकारों के पत्र आते रहते हैं जिनमें वे कहते हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है. शिव सेना, उसके सहयोगियों और सत्तासीन पार्टियों, तीनों के लिए मीडिया की स्वतंत्रता असहजता पैदा करती है. बर्बर तत्वों को निष्पक्ष पत्रकारिता कभी स्वीकार नहीं होगी.

मुझे दुख है, मगर इसके बावजूद इस घटना ने मुझे और भी कृतसंकल्प कर दिया है कि मैं शिवसेना की गलत नीतियों पर सवाल उठाऊं. अराजकता की वे कार्रवाइयां भी मुंबई हमले जैसी ही चिंताजनक हैं जिन्हें देश के भीतर से ही खाद-पानी मिल रहा है. 

निखिल वागले

(लेखक आईबीएन लोकमत के संपादक हैं)  

इधर कुआं उधर खाई

व्यवस्था को उनकी सुध नहीं और कट्टरपंथी संगठनों ने उनका जीना दूभर कर रखा है. ऐसे में गुजरात के दंगापीड़ितों को समझ नहीं आ रहा कि वे जाएं तो कहां जाएं? संजना की रिपोर्ट, फोटो: एस राधाकृष्णा 

इदरीश इस्माइलभाई वोहरा कहते हैं, ‘डर हमारी जिंदगी का हिस्सा है. गुजरात में मुसलमानों के लिए बचकर भागने का कोई रास्ता नहीं.’ थोड़ी देर चुप रहने के बाद पेशे से दर्जी 36 वर्षीय वोहरा एक ऐसे रास्ते का जिक्र करते हैं जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. वे कहते हैं, ‘मैं और मेरा परिवार खुदकुशी कर सकते हैं.’ उनके साथ भटकने वाला 10 साल का उनका बेटा सिर उठाकर हमें देखता है मगर कहता कुछ नहीं. माहौल में बच्चे की खामोशी और वोहरा की निराशा पसर जाती है. तहलका से बातचीत के हफ्ते भर बाद ही आधी रात को कुछ लोगों ने वोहरा पर हमला कर दिया. उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं और उन्हें एक हफ्ता अस्पताल में गुजारना पड़ा. उन्हें बार-बार उबकाई और याद्दाश्त के जाने की समस्या हो गई थी. वोहरा अब अस्पताल से छुट्टी पा चुके हैं लेकिन उनके ऊपर खतरा जस का तस बना हुआ है. किसी का सहयोग न मिलने की वजह से उन्होंने पुलिस में भी रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई. मजबूरी में उनके सामने खुद को घर में कैद करने और अपने दोनों बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेजने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है.

‘हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा कर दी गई है और इस खाई को बार-बार और चौड़ा किया जा रहा है. हमें ऐसे मुस्लिम संगठन की क्या जरूरत है जो मुसलमानों के साथ ही अन्याय कर रहा हो? वह भी कट्टरपंथी विचार थोपकर?’

मुंह खोलने पर गंभीर नतीजे भुगतने का वोहरा का डर बेबुनियाद नहीं है. एक महीना पहले ही अब्दुलभाई पठान को टंकारिया रिलीफ कॉलोनी स्थित उनके घर से इसलिए बाहर फेंक दिया गया था क्योंकि उन्होंने वहां हो रही ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाई थी. अब वे मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर देते हैं.

वोहरा और पठान उन हजारों लोगों में से हैं जिन्हें 2002 में गुजरात में हुए भंयकर दंगों के चलते बेघर होने के बाद 81 राहत कॉलोनियों में शरण लेनी पड़ी थी. मगर 2002 के उलट इस बार उनकी मुसीबतों का सबब बिल्कुल ही दूसरा है. तहलका ने इन कॉलोनियों में रह रहे जिन तमाम मुसलमानों से बातचीत की उनका आरोप था कि तबलीगी जमात के लोगों ने उनका जीना दूभर कर दिया है. इसकी वजह यह है कि ये कट्टरपंथी तत्व अब उन कई राहत शिविरों में अपनी सत्ता चला रहे हैं जहां लाखों दंगा पीड़ित मुसलमान रहते हैं.गौरतलब है कि तबलीगी जमात एक ऐसा गुट है जो खुद को अराजनीतिक कहता है और मुसलमानों के सुधार के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करता है.

इन लोगों को ऐसे नियम और पाबंदियां थोपने में भी हिचक नहीं जो स्थानीय रीति-रिवाजों और संस्कृति से मेल नहीं खाते. लोगों को पांच वक्त की नमाज अदा करने की सख्त हिदायत दी गई है और वह भी तय मस्जिदों में. तीन दिवसीय धार्मिक परिचर्चा में सबकी हिस्सेदारी और मौजूदगी अनिवार्य है. किसी घर में टेलीविजन लगाने या फिर रेडियो पर संगीत सुनने की कड़ी मनाही है. इन शिविरों में रहने वाले सभी लोगों से जबर्दस्ती इन नियमों का पालन करवाया जाता है. इसके अलावा मुस्लिम पुरुषों को जहां टोपी लगाने और दाढ़ी रखने का हुक्म  है वहीं महिलाओं को हिजाब पहनने और पर्दे में रहने की हिदायत है. जो लोग इन निर्देशों का पालन नहीं करते उन्हें अक्सर या तो चेतावनी दी जाती है या फिर आधी रात को घर से बाहर निकलने के लिए कहा जाता है.

देत्राल शरणार्थी कैंप का दौरा करने पर तहलका ने लोगों के उस डर को नजदीक से महसूस किया जिसका जिक्र वोहरा ने किया था. अपनी पहचान उजागर होने और घर से बेघर होने के डर से कैंप के निवासी कुछ भी बोलने से डरते रहे. हर सवाल पर उनका एक ही जवाब होता कि आप मुस्लिम रिलीफ ऑर्गनाइजेशन (एमआरओ) के लोगों से बात करिए. एमआरओ ने ही इस कैंप को बसाया है. हालांकि यह संस्था तबलीगी जमात से जुड़ी हुई नहीं है लेकिन इसके मुख्य प्रतिनिधि बशीर अहमद दाउद खुद को एक समर्पित जमाती बताते हैं. निर्देशों के बारे में पूछने पर वे इनकार नहीं करते बल्कि इसके समर्थन में तर्क देते हुए कहते हैं कि ये इस्लामी रवायतें हैं और इसका पालन करना ही मुसलमानों के लिए अच्छा है. जोर-जबर्दस्ती और उत्पीड़न के सवाल पर वे जवाब देते हैं कि लोग तो बेवजह ही शिकायतें करते रहते हैं. वे कहते हैं, ‘ये घर जकात (दान का पैसा) से बने हैं और अगर कोई टेलीविजन का खर्च उठा सकता है तो फिर उसे हमारी सहायता की जरूरत नहीं है.’ वैसे जहां तक टेलीविजन की बात हैं तो स्थानीय बाजार में यह 1000 रुपए से भी कम कीमत पर उपलब्ध है. मगर बशीर इस बात पर कोई ध्यान नहीं देते और इंटरव्यू अचानक ही खत्म कर देते हैं.

‘जमात के नेता हम पर बार-बार इस बात का दबाव डाल रहे थे कि हम अपने बच्चों को कैंप के अंदर ही चल रहे मदरसे में पढ़ने के लिए भेजें. कुछ महीने तक तो हम विवाद से बचने के लिए बच्चों को वहां भेजते रहे. मगर मदरसों में सिर्फ धार्मिक शिक्षा दी जाती है. हमारे बच्चे आज की दुनिया में कैसे जिंदा रहेंगे?’

ऐसे में स्वाभाविक ही है कि ऐसी कॉलोनियों के कैंपों में रह रहे ज्यादातर लोगों को ये नियम रास नहीं आ रहे. देत्राल कैंप- जहां वोहरा अभी भी रह रहे हैं- से 2002 के ज्यादातर पीड़ित एक बार फिर से पलायन कर गए हैं. कैंप के 48 घरों में 2002 दंगा पीड़ितों के सिर्फ पांच परिवार रह गए हैं. इस कॉलोनी के सबसे पहले निवासियों में एक 71 वर्षीय मोहम्मद शाह दीवान कहते हैं, ‘हम सब वहां से बाहर आ गए क्योंकि हमसे उनका उत्पीड़न सहा नहीं जा रहा था. कुछ ही घंटों के भीतर हमारे घरों को तबलीगी जमात के सदस्यों के परिवारों को आवंटित कर दिया गया.’  आज दीवान अपने पैतृक गांव लौटने और उन्ही लोगों के बीच में रहने के लिए मजबूर हैं जिन्होंने 2002 में उनके घर को उजाड़ा था. जिस डर का अनुभव उन्होंने कैंप में किया है, गांव में भी स्थिति उससे अलग नहीं हैं.

तहलका ने भरुच, आनंद, पंचमहल, साबरकांठा और वड़ोदरा जिलों का दौरा किया और हर जगह शोषण और अत्याचार की एक सी ही कहानी सामने आई. साबरकांठा के मोदासा स्थित अलांयस-सियासत नगर कैंप में इस तनाव ने बेहद गंभीर रुख अख्तियार कर लिया. जमात नेताओं की हर मनमानी और हस्तक्षेप सहते आ रहे लोगों के सामने जब अपने बच्चों की शिक्षा का सवाल आया तो उन्होंने एक नया रास्ता चुना. कैंप के 110 परिवारों ने एक शिक्षक की नियुक्ति की जो उनके बच्चों को पढ़ाता था. 35 वर्षीय मुमताज बानो महबूब कहती हैं, ‘जमात के नेता हम पर बार-बार इस बात का दबाव डाल रहे थे कि हम अपने बच्चों को कैंप के अंदर ही चल रहे मदरसे में पढ़ने के लिए भेजें. कुछ महीने तक तो हम विवाद से बचने के लिए बच्चों को वहां भेजते रहे. मगर मदरसों में सिर्फ धार्मिक शिक्षा दी जाती है. हमारे बच्चे आज की दुनिया में कैसे जिंदा रहेंगे?’

इसके एक हफ्ते बाद ही जमात के लोगों ने कैंप के चार लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा दी. उन पर एक मौलाना को पीटने का आरोप लगाया गया. इससे कैंप के निवासियों में और ज्यादा असंतोष पैदा हो गया. मामले के एक आरोपी शेख महमूद भाई पूछते हैं, ‘हम दो साल तक उनके निर्देशों का चुपचाप पालन करते रहे. हमें डर था कि कॉलोनी से बाहर कर दिए जाने पर हम कहां जाएंगे. अगर हमें उसे पीटना होता तो हम दो साल तक इंतजार करते?’ पेशे से दिहाड़ी मजदूर महमूद का कहना था कि 2008 में कैंप के निवासियों ने 5,000 रुपए इकट्ठा करके पुलिस को घूस दी ताकि उनके खिलाफ मामला खत्म हो जाए. उसके बाद से जमात का कोई नेता कैंप में नहीं लौटा है.

सवाल उठता है कि तबलीगी जमात शरणार्थी शिविर में कैसे काम करती है? दरअसल देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही गुजरात में भी जमात के लोग जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के साथ मिलकर काम करते हैं जो उत्तर प्रदेश के देवबंद में स्थित दक्षिणपंथी संस्था दारुल उलूम की एक शाखा है. जमीयत द्वारा गुजरात में स्थापित तमाम राहत शिविरों में तबलीगियों को आसानी से प्रवेश मिल जाता है. जबकि जमाते-ए-इस्लामी से संबद्ध इस्लामी रिलीफ कमेटी के शिविरों में तबलीगी जमात का कहीं सीमित प्रभाव है. युसुफ शेख आंतरिक विस्थापित हक रक्षक समिति के प्रमुख हैं. यह संस्था भी 2002 दंगों के विस्थापितों के लिए राहत कार्य चला रही है. शिविरों में तबलीगियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में पूछने पर वे साफ-साफ कहते हैं, ‘वे बेहद रूढ़िवादी इस्लामी विचार का प्रचार करते हैं जो कि गुजराती मुसलमान के लिए अजनबी चीज है.’ दरअसल गुजराती मुसलमानों की एक बड़ी संख्या अहमद रजा बरेलवी की वंशज है. इसे बरेलवी संप्रदाय कहा जाता है. इसकी छवि थोड़ी उदारवादी है और इसे रूढ़िवादी देवबंदी संप्रदाय के विरोधी के तौर पर देखा जाता है. यूसुफ कहते हैं, ‘हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा कर दी गई है और इस खाई को बार-बार और चौड़ा किया जा रहा है. हमें ऐसे मुस्लिम संगठन की क्या जरूरत है जो मुसलमानों के साथ ही अन्याय कर रहा हो? वह भी कट्टरपंथी विचार थोपकर?’

मगर इन सवालों का तबलीगी जमात के नेताओं और जमीयत उलेमा ए हिंद के पास कोई जवाब नहीं है. तबलीगी जमात के सदस्य किसी  मजबूत सांगठनिक ढांचे से इनकार करते हैं. उनके शब्दों में ‘हमारे यहां कोई नेता नहीं रहे क्योंकि यह एक ढीला-ढाला सा समूह है जो इस्लाम पर चर्चा और मुसलमानों को सही राह दिखाने का काम करता है.’ लेकिन गुजरात के प्रभावशाली तबलीगी नेता अफजल मेमन बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं. ‘हम मुसलमानों को सुधारने का मकसद लेकर चल रहे हैं. अगर हम खुद ही सही रास्ते पर नहीं चलेंगे तो फिर दूसरों द्वारा की गई हिंसा की बात कैसे कर सकते हैं?’ शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों के शोषण के सवाल को वे पूरी तरह से नकारते हुए कहते हैं, ‘तबलीगी जमात के सदस्य किसी के साथ जोर-जबर्दस्ती नहीं करते. ये सब हमें बदनाम करने के लिए फैलाई गई अफवाहें हैं.’

उधर, इस्लामी रिलीफ कमेटी के गुजरात इकाई के अध्यक्ष मुहम्मद शाह मदनी इस बात को मानते हैं कि तबलीगी जमात और दूसरे संगठनों के बीच टकराव की स्थिति है. वे कहते हैं, ‘यह बात कई बार हमारे सामने लाई गई है. मगर हम इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. अब यह लोगों पर है कि वे संगठित होकर अपनी राय का इजहार करें.’ गुजरात में पिछले सात साल से काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी को कैंपों के अंदरूनी हालात से कोई हैरानी नहीं होती. वे कहती हैं, ‘जब राज्य अपने नागरिकों की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है तो ऐसे संगठन इन जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए पैदा हो जाते हैं और वे ऐसा अपनी शर्तों पर करते हैं.’

तो कुल मिलाकर गुजरात में मुसलमानों के लिए इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति है. व्यवस्था उनकी तरफ से आंखे मूंदे हुए है और इसका फायदा उठाकर कट्टरपंथी संगठन उन्हें मध्ययुग की तरफ धकेलने में जुटे हुए हैं. ऐसे में ये लोग ज्यादा से ज्यादा सिर्फ उम्मीद ही कर सकते हैं.  

'वह रचना ज्यादा दिन तक नहीं चलती जिसका यथार्थ के धरातल से जुड़ाव नहीं होता'

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

 इन दिनों दो-तीन काम एक साथ कर रहा हूं. बहिरंग नाम से एक डायरी लिख रहा हूं. इसे डायरीनुमा संस्मरण कह सकते हैं. इसके अलावा एक कविता संग्रह भी हाल ही में प्रेस को दिया है जिसका नाम अभी नहीं रखा है. साथ ही आज-कल जेम्स हिंटन  की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी कर रहा हूं इसलिए इसी की पढ़ाई भी चल रही है. 

किस विधा में लिखना पसंद है?

वैसे तो कविता लेखन ही मुझे प्रिय है. कविता ही मेरी मूल शैली है. लेकिन बहिरंग  के जरिए मैं एक बार फिर से गद्य संसार में उतर रहा हूं. यह मेरी तीसरी गद्यात्मक रचना होगी. इससे पहले सुरों की सोहबत में प्रकाशित हुआ था.     

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

विष्णु नागर को इधर बीच मैंने खूब पढ़ा है. उनका उपन्यास आदमी स्वर्ग में अद्भुत रचना है. इसी तरह उनकी कहानी एक जिम्मेदार आदमी भी मुझे बहुत आकर्षित करती है.   

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

हजारी प्रसाद द्विवेदी के समकालीन एक साहित्यकार थे पीतांबर दत्त बर्थवाल. वे हिंदी के प्रथम साहित्यकार थे जिन्हें मानद उपाधि से विभूषित किया गया था. लेकिन उन्हें कोई ख्याति नहीं मिली क्योंकि उस दौर में भी आलोचक-समीक्षक व्यक्तिगत कुंठाओं की वजह से लोगों को नजरअंदाज करते थे.

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

रचना का लोकप्रिय होना अलग चीज है. पर वह रचना ज्यादा दिन तक नहीं चलती जिसका यथार्थ के धरातल से जुड़ाव नहीं होता. उदय प्रकाश  की एक कहानी राम संजीवन की प्रेम कहानी इसी तरह की रचना है. इसमें व्यक्ति के प्रति हीनभावना दिखाई देती है.

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

हाल ही में भारतीय दर्शन पर आधारित सत्यपाल गौतम की पुस्तक समाज दर्शन  खरीदी है.

साहित्य में विमर्शों के प्रति क्या विचार हैं?

सिद्धांतत: इसके पक्ष में हूं.

अतुल चौरसिया