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"देवा.. देवा"

बाबा ने उससे पलट कर नहीं पूछा साल के बीच में छुट्टियां कैसे लग गईं तेरी? बल्कि जवाब सुन न वे खुश हुए, न दुखी, घर के बाहर वाले बरांडे में बैठ, सिर झुकाए जमीन ताकते रहे

बुरा वक्त टोटकों की शक्ल में हमारे घर आया. आई को सोने में जड़ी मूंगे की अंगूठी पहनाना जरूरी माना गया. दिवाकर पंडित के चार साल तक पीछे पड़ने पर, आई ने अपनी शादी में मिले कान के फूलों को बेच कर अंगूठी बनवाई. उस दिन, मैं भी आई के साथ नागपुर गया था, उसके कान फूल बेचने और फिर एक हफ्ते बाद अंगूठी लेने. आई ने सुनार के हाथ में कान फूल देने से पहले, दुकान में टंगे शीशे में अपने को देखते हुए कानफूल अपने कानों से सटाए थे और तुरंत नकार में सिर हिलाते हुए उन कान फूलों को सुनार की हथेली में उलीच दिया था. आई को सुंदर लगने से ज्यादा बाबा की परवाह सता रही थी, क्योंकि उस दोपहर बस से गांव वापस लौटते वक्त, आई ने मेरे अधखाए केले में से एक टुकड़ा मांग कर खाया था और गहरी सांस भरकर बोली थी
‘‘अब इसी का भरोसा है बाबू, दिवाकर पंडित का मानें तो, मेरे अंगूठी पहनने से तेरे बाबा का कष्ट कुछ कम हो जाएगा."
‘‘क्या अंगूठी पहनने से कापुस (कपास) बढ़िया उगने लगेगा आई?"

मैंने आई से पूछा था क्योंकि गांव के सब जन आपस में बात करते थे, कि बाबा के सारे कष्ट कापुस ठीक से न उगने से पैदा हुए हैं, मतलब – सारी परेशानियों की जड़ में वही कापुस था, बाद में बाकी बातें बढ़ उससे जुड़ती चली गईं. बाकी बढ़ने वाली बातों में, बाबा को खांसी का न जाने वाले रोग का लगना था, मेरी प्यारी गाय ‘काली’ का दूसरे किसी गांव में बेचा जाना था, और दीदी (जो मुझसे छह साल बड़ी थी) का ग्यारहवीं की पढ़ाई को छोड़ घर पर लौट आना भी था. हमारे गांव में हाईस्कूल नहीं था इसीलिए दीदी चिंचोली में बुआ के घर रहकर पढ़ती थी, मगर उसकी पढ़ाई का खर्चा बाबा देते थे. दो साल से, जब से बाबा ज्यादा परेशान रहने लगे थे वो दीदी को पैसा नहीं भेज पा रहे थे. पता नहीं, दीदी को इसपे क्या सूझा कि वह एक दिन बुआ को यह बता ‘बाबा याद कर रहे हैं,’ चिंचोली से गांव तक आने वाली बस पकड़ घर लौट आई. हम सब आश्चर्य से भरे घर के बाहर चले आए जब हमें दीदी की पुकार सुनाई पड़ी,‘‘बाबा.. बाबा, आई.. प्रकाश.. प्रकाश!"

उस दिन हमारे घर में धैर्य और निश्चिंतता के विशाल पक्षी ने अपने पंख पसार दिए थे और दीदी और मैं उस पक्षी के पंखों पर चढ़ उड़ने लगे थे
आई ने दीदी का हाथ बहुत धीरे से पकड़ उसका बैग अपने हाथ में लेकर पूछा था,
‘‘कैसे, क्यों आ गई, अचानक?" दीदी ने बाबा को देखते हुए कहा था, बहुत लाड़ से (वह बाबा को और बाबा उसे बहुत लाड़ करते थे, इतना कि कई बार मैं जल उठता था)
‘‘बाबा, पढ़ाई खत्म है, छुट्टियां लग गईं." कितना अजीब था बाबा ने उससे पलट कर नहीं पूछा साल के बीच में छुट्टियां कैसे लग गई तेरी? बल्कि उसका जवाब सुन न वे खुश हुए, न दुखी, घर के बाहर वाले बरांडे में बैठ, सिर झुकाए जमीन ताकते रहे.
दीदी का यूं लौट आना बाबा या आई को अनहोनी नहीं लगा बल्कि दीदी का रोज वहां होना हम सब की जिंदगी में ऐसे समा गया, जैसे दीदी कभी हमें छोड़ यहां से चिंचोली गई ही नहीं थी.
‘प्रकाश मैं तो उसी दिन अाने वाली थी रे, जिस दिन मेरे कमरे की खिड़की पर रखा मुंह देखने वाला आईना, नीचे गिर कर टूट गया था. आईने के टूटते ही, मुझे सबसे पहले बाबा की याद आयी थी, और मैं समझ गई थी, अब मुझे लौटना ही होगा. वो तो मेरे कपड़े भीगे थे. उसी दिन मैंने उन्हें धो कर सूखने को डाला था, इसीलिए दो दिन की देरी हो गई."

आई की अंगूठी दीदी के घर लौट आने के बाद ही बनवाई गई थी और आई को ऐसा करने के लिए दीदी ने ही मजबूर किया था. दीदी ने ठीक ही किया था, क्योंकि नागपुर से लौटने के बाद अंगूठी पहनी आई कुछ निश्चिंत दिखती थी. बाबा की खांसी में आ रही लगातार कमी, भी उसकी निश्चिंतता बढ़ा रही थी, और बाबा का अब घर के बाहर वाले जामुन के पेड़ के नीचे बैठ, अपने बचपन के मित्रों से बात करना बड़ी अच्छी बात थी. मैं उनके आसपास ही मंडराता रहता था. वहीं मैंने उनके बचपन के मित्र दत्ता पाटिल, हीरामन शिंडे, ढोंढू सावंत को बारिश न होने की बातें, सरकारी मुआवजा और कर्ज की बातें और कापुस बेहतर उगाने की तकनीकों के बारे में भी बातें करते सुना था. अपने बचपन के मित्रों से इस तरह बात करने पर बाबा की हिम्मत कुछ बढ़ी हुई दिखलाई पड़ती थी, दीदी ने आई से इस बारे में एक दिन कहा भी था, ‘‘आई, दिवाकर पंडित का बताया उपाय तो कुछ रंग ला रहा है. बाबा का चेहरा तो देख, अब उतना काला भी नहीं लग रहा. है न?"
‘‘हां," आई ने उसी दबी हुई खुशी के साथ कहा था, जिसे देखने की हमें आदत पड़ती जा रही थी.

मगर कुछ भी ठीक नहीं हुआ. अंगूठी मिलने के तुरंत बाद हमारे घर का पिछला हिस्सा जहां काली रहती थी एक दिन अचानक ही धसक गया. कोई आंधी तूफान भी नहीं आया था

जिस दिन बाबा के बचपन के मित्र सुबह-सुबह हमारे घर आए थे, बाबा को बुआ के घर वाले शहर चिंचोली ले जाने, उसी दिन दूधवाले से खरीदा गया आधा लीटर दूध, चूल्हे पर रखा रह गया था और उफन-उफन कर पूरा बिखर गया. मैं गाढ़ी नींद से उठ कर बैठ गया था, क्योंकि आई की पीड़ा भी तड़प वाली आवाज मेरे कान में पड़ी थी,
‘‘देवा.. देवा, अब क्या होने वाला है?" इतने में दीदी आई के पास दौड़ी आई थी और आई को डांटते हुए बोली थी,
‘‘आई, सुबह-सुबह कैसे बोल रही हो, अभी बाबा को जरूरी काम से बाहर जाना है और तुम? अरे दूध ही तो गिरा है, एक दिन प्रकाश को नहीं मिलेगा पीने को.. और क्या होगा? काली के जाने के बाद उसको तो दूध की वैसी आदत भी नहीं."

दीदी ने जान-बूझकर, यह बात रोज वाली अपनी आवाज से ज्यादा जोर की आवाज में कही थी, क्योंकि यह उसका मुझे इशारा करने का एक तरीका था, जिससे मैं उठते ही रोज की तरह दूध की मांग न कर बैठूं और आई को कम से कम ‘नहीं है’ या ‘नहीं दे सकती’ वाले अनेक दुखों में से, एक से बचा लूं. मैं दीदी की इस तरह वाली इशारे की भाषा को खूब समझने लगा था, क्योंेकि दीदी घर के कामों से फुर्सत पा अब मुझे पढ़ाने का काम भी करने लगी थी. पढ़ाने के दौरान मुझे वह कई तरह की बातें सिखाती जाती थी और उस वक्त उसका चेहरा अजीब सी चमक से भर उठता था. जब वह मेरी आंखों में आंखें डाल कहती थी,
‘‘प्रकाश, तुझे समझदार बनना है" तो, मैं उससे आंख नहीं मिला पाता था और कह उठता था, ‘‘जो तू बोलेगी, वही करूंगा."
उस वक्त मेरा जी करता था, मैं उसके पैरों में अपना सिर रखकर वसे ही रोने लगूं, जैसे आई मंदिर के देवा के चरणों में अपना सिर रखकर रोती थी और कहती जाती थी,
‘‘सब ठीक कर दे देवा, अब और कितनी परीक्षा लेगा?"

बाबा जब, अपने बचपन के मित्रों के साथ चिंचोली जाकर लौटे थे, वे उत्साह से भरे हुए थे. घर अाने से पहले उन्होंने चिंचोली के बाजार से हमारे लिए, नमकीन और मिठाई खरीदी थी. उसे हमारे बीच बांटते हुए वे अपनी खांसी के बावजूद चहक कर बोले थे,
‘‘धनंजय पाहिल – वही, तुम्हारी बुआ के रिश्ते वाले ने पचास हजार का वादा किया है. अभी दस हजार की मदद भी की है. अब बोलो तो खेत बचा भी कितना है अपना? उतने के लिए इतनी मदद भी बड़ी है. कम से कम बीज खरीदने की हिम्मत तो आई है, बाद में खाद का इंतजाम करेंगे अपना? अब अगले साल की तैयारी में लग जाना है. पिछला नुकसान सोच-सोचकर हड्डी नहीं गलानी है."
जब वह यह सब कह रहे थे तो आई ने उन्हें कुछ याद दिलाने के लिए टोकना चाहा था, ‘‘सरकारी..? तो उन्होंने आई की बात बीच में ही काट कर कहा था,
‘‘धनंजय पाटिल भरोसे का आदमी है, सभी मित्रों की यही राय है. एक राय है यह. सब यही कर रहे हैं, हम सब कापुस उगाएंगे.."
दीदी को न जाने क्यों उस क्षण बाबा पे बहुत सारा लाड़ उमड़ आया. वो बाबा की सिमट गई छाती में पुरानी चौड़ाई तलाश कर उनके गले लग गई और लगभग रूआंसी आवाज में बोली, ‘‘बाबा इन पैसों में से कुछ बचा कर एक बार खांसी की दवा करा लो,"
बाबा मुस्कुरा दिए थे और दीदी आई के कान के पास जाकर बोली थी,
‘‘देखा अंगूठी का कमाल, बाबा इतना बड़ा काम कर आए और तुम बिखर गए दूध की शंका लिए रोती थी."
उस दिन हमारे घर में धैर्य और निश्चिंतता के विशाल पक्षी ने अपने पंख पसार दिए थे और दीदी और मैं उस पक्षी के पंखों पर चढ़ उड़ने लगे थे.

मगर वह अंगूठी, जिसे आई और दीदी हमारे कठिन दिनों का रक्षा कवच मान रहे थे, एक दोपहर आई को अपने दाएं हाथ की चौथी ऊंगली में नजर नहीं आई. न जाने कब, किसी काम को करते हुए वह आई की ऊंगली से फिसल गई थी. हमें तो तब पता चला, जब हैरान सी दिखती आई, बाबा को खिला-पिला बाजार भेज, हमें भी भाखरी और चटनी परोस खुद खाने बैठी. दीदी और मैं उस वक्त नागपुर शहर की बातों में लगे हुए थे, कैसे हमें बड़े शहर पसंद नहीं, कैसे हमें इतनी खुली जगहों की आदत है, और कैसे हम बड़े शहर में जाने पर खो जाने जितने गंवार अभी भी बने हुए हैं. ‘‘ही.. ही.. ही, दीदी तू भी, अभी भी खो जाएगी, चिंचोली में रहने के बाद भी", ‘‘हां रे, दीदी हंसी थी चिंचोली कोई नागपुर थोड़े है?" तभी आई की धीमी सिसकियां हमें सुनाई पड़ीं और खाते-खाते रोने से भाखरी उसके गले में अटक गई. वह अब जोर-जोर से खांसने लगी थी,
‘‘अब क्या होगा? आहा.. अहाहा, अब मैं क्या करूं?"
‘‘क्या हुआ आई?" हम चौंक गए थे और उसे पानी पिलाने लगे थे.
‘‘अंगूठी खो गई रे.." आई बड़ी मुश्किल से अपनी बात कह पाई थी.
‘‘मैं कैसे इतनी लापरवाह हो गई?"

पता नहीं ज्यादा तोड़ देने वाली खबर क्या थी? आई की लापरवाही की सूचना या रक्षा कवच के खो जाने की दहशत? हम तुरंत चक्कीघिन्नी की तरह नाच-नाच, आई की अंगूठी ढूंढ़ने में लग गए थे, मगर हमें अंगूठी नहीं मिली थी. हम थक कर, अपनी हार से परास्त सो गए थे और उस रात जब बाबा, घर लौट कर आए थे तो उन्हें पता भी नहीं चल पाया था कि उनकी सुरक्षा के लिए किया गया सबसे महंगा उपाय अब आई के हाथ में नहीं था.

जल्द ही कापुस की बुआई के दिन आ गए और दीदी ने आई को सारी शंका दबा कर बाबा की हिम्मत बढ़ाने को कहा. गर्मियों के उन दिनों में दीदी और मैंने भी बाबा की खेत में खूब मदद की और बाद में भी वहां जा जाकर घंटों डेरा डाले कापुस के पौधों के बढ़ने का इंतजार करने लगे, जैसे हमारे वहां बैठने से कापुस के पौधे अपने समय से पहले ही बढ़ जाएंगे.
जब बारिश आने के दिन आए तो बाबा फिर उत्साहित हो खाद खरीदने का मन बनाते हुए चिंचोली गए. उस दिन जब दीदी और मैं, अपने बढ़ते पौधों को देखने खेत गए तो देखा, खेत की बांध पर किसी ने नींबू-मिर्च लाल कुंकुम लगा कर फेंक दिया था. दीदी ने मुझे उस फेंकी हुई चीज पर पैर रखने से मना कर दिया था और हम बिना खेत घूमे लौट जाते थे. उसके बाद दीदी मंदिर गई थी और खेत की बांध पर पड़ी बुरी चीज की बुरी शक्ति को खत्म करने की प्रार्थना करने लगी थी. उस दिन जब बाबा घर लौटे थे, तो उनकी हालत देख हम घबरा गए थे. उनकी आंखें लाल थीं, खांसी बढ़ी हुई थी और वे धीरे-धीरे चलते हुए अपनी चारपाई पर पड़ गए थे. हमारे बहुत पूछने पर उन्होंने बताया था,
‘‘चिंता की कोई बात नहीं, थकान ज्यादा हो गई है."
इसपे दीदी ने उन पर लाड़ से गुस्सा कर कहा था,
‘‘कहा था न, डाक्टर को दिखा दो."
‘‘दिखाया था" वो बड़ी मुश्किल से हांफते हुए बोले थे,
‘‘कह रहा है अब नागपुर दिखाओ."
इतना सुन दीदी और मेरे अंदर वही भाव आया था, जैसा तीन साल पहले, एक शाम बड़े लंबे पीले रंग के धामण सांप को अपनी चारपाई पर गुड़ी मुड़ी सोते देख आया था. बहुत गांव वाले हमारे यहां जमा हो गए थे और कहने लगे थे,
‘‘अरे ये तो देवा का आशीर्वाद हो गया, अब देखना कितने चटपट दिन सुधरते तुम्हारे,"
मगर उसी के बाद बाबा काली को दूसरे गांव बेच आए थे और काली के रहने वाली जगह एकदम खाली हो गई थी.
उस दिन सांप को इतने पास से देखने के बाद दीदी और मेरा खून हमारे भीतर ही जम गया था और दीदी बोली थी,
‘‘प्रकाश, जब बहुत डर लगता है, तो ऐसे ही खून जम जाता है. एकदम मर गए हों जैसा."

बाबा जिस दिन अपने बचपन के मित्र दत्ता पाटिल के साथ नागपुर जाने वाली बस में बैठे थे, ठीक उसी दिन दोपहर में दीदी, आई को बिना बताए गांव वाली अपनी सहेली से मिलने चल दी थी. और जब वह वापस आई तो उसका चेहरा चिंता से लाल हो रहा था. आई उसे देखते ही चिल्लाने लगी थी,
‘‘क्या? क्या हुआ?"
‘‘आई", दीदी आई को जमीन पर अपने पास बिठाते हुए बोली,
‘‘आई वो जाे नीले रंग की मेरी पंजाबी ड्रेस है न, उसका दुपट्टा सुबह से नहीं मिल रहा था. मुझे लगा, कहीं गलती से मेरी सहेली तो नहीं ले गई. मैं वही ढूंढ़ने उसके घर निकल गई थी. आई, मगर दुपट्टा उसके पास नहीं था. वो तो.. वो तो, उसके घर जाने वाले रास्ते पे जो सूखा कुआं पड़ता है न, जहां बरगद का पेड़ है, वहीं, वहीं आई वो पेड़ पर झूल रहा था. उसमें किसी ने बाजार में बिकनेवाली पानी की बोतल को टांग फंदा कस दिया है. ये कैसी बात हुई आई? मेरा दुपट्टा वहां कौन ले गया?"
‘‘इसका मतलब क्या हुआ आई?"
‘‘हैं… आई सिर पर हाथ रखे गिरने सी दिखी,
‘‘हे.. देवा.., अब ये किसने क्या कर दिया, अरे मेरी बेटी क्या देख कर आ रही है? अब क्या होगा?"

दीदी और आई को एक-दूसरे को समझाते हुए वहीं बैठा छोड़ मैं दीदी की बताई वाली जगह पर गया था, और मुझे वहां बरगद के पेड़ की एक डाल पर दीदी के दुपट्टे से झूलती वह बोतल नजर आई थी. बोतल को बहुत बार देखने पर मुझे बोतल के अंदर किसी आदमी का चेहरा दिखाई देने लगा था. मैं बहुत कांपने लगा था और तेजी से घर भाग आया था.
उस दिन देर रात, दत्ता पाटिल नागपुर से अकेले लौटे थे और हमें खबर दी थी,
‘‘तुम्हारे बाबा, कल आएंगे, डाक्टर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया है, जांच वगैरह करना है."
जब अगले दिन भी बाबा नहीं लौटे तो दीदी मुझे ले दत्ता पाटिल के घर गई और उनसे बोली,
‘‘काका, अस्पताल का पता दो, हम बाबा को देखने जाएंगे."
‘‘ओहो," दत्ता पाटिल ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
‘‘कल तक रुक, कल तक वो नहीं आएगा, तो मैं तुम लोगों को लेकर जाऊंगा."

हमने और दो दिन इंतजार किया और जब बाबा फिर भी नहीं आए तो हम दत्ता पाटिल के साथ उनका हाल लेने नागपुर चल दिए. अस्पताल के मरीजों की सूची में बाबा का नाम दर्ज था. हम तीनों उनके वार्ड के पलंग तक पहुंचे, मगर वहां हमें बाबा दिखलाई नहीं पड़े. हमने आसपास के लोगों से पूछा, मगर हमें कोई नहीं बता पाया कि बाबा कहां थे. कोई यह भी नहीं बता पा रहा था कि बाबा पलंग पर पिछले चार दिनों से थे भी या नहीं. हमने उनका पहले-पहल दाखिला कर इलाज करने वाले डाक्टर से भी पूछा, मगर वह उतना ही बता पाया जितना हमें पता था. दिन भी अस्पताल में इंतजार करने के बाद, गांव जाने वाली, शाम की आखरी बस में जब हम बैठे तो मुझसे रहा नहीं गया. मैं दीदी के कंधे पर झुक फफक पड़ा था,
‘‘बाबा कहां गए दीदी?"

दीदी कुछ नहीं बोली थी, बस की खिड़की के बाहर न जाने क्या देखती रही थी. आंख गड़ाए हुए. बाबा को बहुत अच्छी तरह जानने वाले, बाबा के बचपन के मित्र दत्ता पाटिल ने उदास होकर कहा था,
‘‘दुख मत कर बेटा मैं उसे खूब समझता हूं लौट आएगा, कहां चला गया होगा. जो फिर भी नहीं लौटेगा तो हम आके दुबारा ढूंढेंगे."
फिर दो दिन, फिर दो दिन बाद, और फिर दो दिन बाद भी जब बाबा नहीं लौटे थे तो आई ने ही हमें धीरज रखने को कहा था और हमने नागपुर जाना छोड़ दिया था. गांववालों ने थाने में रिपोर्ट लिखवाने को कहा तो बाबा के बचपन के तीनों मित्रों ने थाने में रिपोर्ट लिखाई थी, हीरामन पाटिल, वल्द रामनाथ पाटिल, उम्र 45 वर्ष, गांव इच्छापुर, दिनांक 10 अगस्त 2005 से नागपुर जनरल अस्पताल से लापता. बाबा की एक फोटो भी बाबा के मित्र हमसे मांगकर ले गए थे, जो उन्होंने थाने में जमा करवा दी.
बाबा के लापता हो जाने के कुछ ही दिनों बाद दिवाकर पंडित के कहने पर आई को पहनाई गई मूंगा जड़ी सोने की खोई हुई अंगूठी मिल गई. आई के कपड़े के बक्से के पीछे से मैंने ही उसे ढूंढ़ा था. ढूंढ़ने तो मैं अपनी गोटियां गया था, मगर जब वहां पहुंचा तो देखा, बक्से के पीछे वही अंगूठी पड़ी चमक रही है.
‘‘आई.. आई.. देखो अंगूठी मिल गई, अब सब ठीक हो जाएगा, आई."
बाबा के जाने के इतने ही दिनों में आई के माथे पर कितने नए निशान बन गए थे. वह बहुत दुबली भी हो गई थी. वह जब चलती, उठती, बैठती थी तो उसकी हड्डियां चटाक की अवाज करती थीं. लगता था सब एक साथ टूट रही हैं. मेरी आवाज सुन आई उन्हीं टूटने वाली आवाजों के साथ मेरे पास आई और चिल्लाई जैसे मैं कहीं बहुत दूर हूं उससे,
‘‘कहां.. कहां?"

मैंने जब जीत से भर आई की हथेली में अंगूठी रखी तो पानी से भरी उसकी आंखों में पत्थर उछाले जाने जैसी खुशी कौंधी, मगर दीदी उसके पास आ, उसका कंधा थामे चुप बनी रहीे.
‘‘दीदी, अंगूठी.." मैं खुशी से चिल्ला रहा था, नाच रहा था, मगर दीदी तब भी चुपचाप रही.
बहुत दिनों बाद दीदी ने अंगूठी मिलने के बावजूद खुश नहीं होने का राज खोला था, ‘‘प्रकाश, मैं क्या खुश होती रे, दिवाकर पंडित ने तो बहुत पहले ही मुझे बता दिया था, ‘सोना खोना और पाना दोनों अच्छा नहीं होता है."
दीदी ने ठीक कहा था शायद क्योंकि आई ने सब-कुछ ठीक हो जाने की लालच में बिना दिवाकर पंडित से उपाय पूछे, हड़बड़ाकर अंगूठी मिलने के तुरंत बाद ही पहन ली थी और कहती गई थी,
‘‘देवा, अब सब ठीक कर दो."

मगर कुछ भी ठीक नहीं हुआ. अंगूठी मिलने के तुरंत बाद हमारे घर का पिछला हिस्सा जहां काली रहती थी एक दिन अचानक ही धसक गया. कोई आंधी तूफान भी नहीं आया था उस दिन. खेत में कपास खड़ा-खड़ा सूख गया और उसकी डंठल सूखी टहनी जैसी कड़ी हो गई.‘‘बारिश कम आना इसकी वजह है", दत्ता पाटिल ने बताया था. हम क्या समझते इसकी वजह, हमने तो खेत को देखना ही छोड़ दिया था. इधर बुआ भी दो तीन बार धनंजय पाटिल का संदेशा पहुंचाने आई थी और रो-रोकर वापस लौटी थी,
‘‘देखो, इधर दादा (भाई) नहीं मिल रहा, उधर धनंजय पाटिल की दादागिरी".
इन सारी उलझाने वाली घटनाओं के बीच इन दिनों मैं एक सपना देखने लगा हूं. रोज तो नहीं, मगर कभी-कभी. मैं अपने सपने में देखता हूं कि बाबा मर गए हैं. उन्हें तरह-तरह से आंख बंद किए लेटा हुआ मैं देखता हूं. चार-पांच बार उसी सपने को देखने की बात, जब मैंने दीदी को बताई तो बड़े दिनों बाद वो थोड़ा खुश होकर बोली थी,
‘‘प्रकाश, ये तो बड़ा अच्छा है रे, बहुत बहुत अच्छा, मैंने एक बार नागपुर के बड़े अखबार के एक पन्ने पर पढ़ा था, जब हम सपने में किसी को मरा हुआ देखते हैं, तो उल्टा होता है. जानता है, जिसे हम मरा हुआ देखते हैं, असली में तो उसकी उम्र बढ़ जाती है."
बाबा आज तक लापता हैं.

वंदना राग समकालीन कथा-जगत का एक सुपरिचित नाम हैं. पहला कहानी-संग्रह ‘यूटोपिया’ इसी वर्ष प्रकाशित हुआ. एरिक हॉब्सबॉम की इतिहास की एक किताब का हिंदी में ‘पूंजी का युग’ शीर्षक से अनुवाद कर चुकी हैं. पुणे में रहती हैं.

अकाल मृत्यु

चार-पांच मिनट बाद इम्मी दिखाई दिया. अपने नाप से कहीं छोटा गुसा-मुसा सफेद कुरता-पजामा पहने, घुटा हुआ सिर और पीछे छोटी-सी चोटी. पहचान में नहीं आ रहा था बात तब की है जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था. हमारी कक्षा में अमृतलाल नाम का एक लड़का था. प्यार से सब उसे ‘इम्मी’ कहते थे. इम्मी फुटबॉल का बहुत अच्छा खिलाड़ी था. वह न सिर्फ स्कूल की फुटबॉल टीम में था बल्कि संभाग की टीम में भी खेल चुका था. उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. कई बार वह समय पर फीस जमा नहीं करवा पाता था और उसे अक्सर अपनी फीस माफ करवाने के लिए इस-उसके पीछे घूमते देखा जा सकता था. उससे कहा गया था कि जिस दिन उसका चयन राज्यस्तरीय टीम में हो जाएगा, उसकी फीस माफ कर दी जाएगी. नतीजा यह कि स्कूल के बाद अंधेरा होने तक वह स्कूल के मैदान पर फुटबॉल खेलता रहता – चाहे अकेला ही, या दौड़ते हुए मैदान के चक्कर लगाता रहता.

एक दिन सुबह-सुबह पता चला कि इम्मी के पिताजी की मृत्यु हो गई है. हमें बड़ा दुख हुआ. पूरी कक्षा पर जैसे पाला पड़ गया. आधी छुट्टी में जब बाहर निकले तो सड़क से इम्मी के पिताजी की शवयात्रा निकल रही थी. सबसे आगे एक आदमी इम्मी की बांह थामे चल रहा था. इम्मी के हाथ में एक छींका था जिसमें एक धुंआती मटकी रखी थी. पीछे-पीछे उसके पिताजी की अर्थी और अर्थी के साथ चलते बीस-पच्चीस लोग.

तीसरे दिन हमारी कक्षा के बड़े छात्रों – बालकिशन और राधेश्याम ने आपस में कुछ बात की और हम सबको बुलाकर कहा कि हम लोगों को इम्मी के घर ‘बैठने’ जाना चाहिए. तब तक मुझे पता नहीं था कि बैठने जाने का मतलब अफसोस जाहिर करने जाना होता है. बालकिशन और राधेश्याम के सुझाव से सब सहमत थे.

इम्मी की बात सुनकर हम लोग चुप और उदास हो गए. लग रहा था जैसे वह हमको नहीं खुद को समझा रहा था. बोलते समय उसकी आवाज कांप रही थीलेकिन जब अमीर वकील कुटुम्बले के बेटे अशोक ने कहा कि सब सफेद कपड़े पहनकर जाएंगे, तो मामला जरा उलझ गया. सबके पास तो सफेद पेंट-शर्ट था भी नहीं, एक-दो के पास था भी तो धुला हुआ नहीं था या फटा हुआ था. दूसरी बात यह थी कि सफेद कपड़े पहनने के लिए स्कूल की छुट्टी के बाद पहले घर जाना पड़ता, और फिर घरवाले पता नहीं आने देते या नहीं. अधिकांश बच्चों के लिए स्कूल की छुट्टी के बाद स्कूल से सीधे इम्मी के घर जाना ज्यादा सुविधाजनक था. वैसे भी इम्मी का घर स्कूल से ज्यादा दूर नहीं था.

तो अगले दिन हम लोग स्कूल से सीधे इम्मी के घर गए – बैठने. इम्मी का घर खूब सारे पेड़ों से घिरा एक खंडहरनुमा, लेकिन हवादार एक-मंजिला मकान था जो इस समय सूना पड़ा था. हम बाहर खड़े संकोच में पड़े ताकाझांकी कर रहे थे. इतने में एक बड़ी उम्र की लड़की ने हमें देखा और पूछा, ‘कौन चाहिए? इम्मी? आओ आओ. आ जाओ. इम्मी..तेरे दोस्त आए हैं.’
बोलते-बोलते लड़की मकान के पीछे कहीं चली गई.

हम चुपचाप सरकते हुए भीतर घुसे और कमरे के नंगे-ठंडे फर्श पर एक-दूसरे से सटे-सटे पालथी मारकर बैठ गए. चार-पांच मिनट बाद इम्मी दिखाई दिया. अपने नाप से कहीं छोटा गुसा-मुसा सफेद कुरता-पजामा पहने, घुटा हुआ सिर और पीछे छोटी-सी चोटी. पहचान में नहीं आ रहा था. इम्मी जोर-जोर से बोलता हुआ भीतर आया, ‘मैं सोच ही रहा था कि स्कूल से भी कोई न कोई तो आएगा जरूर. और? क्या हाल है? कैसा चल रहा है? कल गणित का टेस्ट हुआ था क्या? और गहलोत सर के क्या हाल हैं? स्टेट में सिलेक्ट करवा देते मेरे को तो कम से कम जूता और जर्सी तो मिल जाती. पर उनकी तो फरमाइशें ही गजब! अरे यार भार्गव आ रहा है क्या? मेरी गणित की कॉपी भार्गव के पास ही रह गई है. खैर, उससे कहना वही रख ले. अब मुझे उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी!’
‘तेरे पिताजी को क्या हुआ था इम्मी?’ अशोक ने पूछा.
‘उनको तो टीबी थी न! बहुत दिनों से थी.’ इम्मी ने ऐसे कहा जैसे यह बात तो अन्य सभी की तरह हमें भी मालूम होनी चाहिए थी.
इतने में ही वह बड़ी लड़की पीतल के एक लोटे में ठंडा पानी ले आई. साथ ही पीतल का एक गिलास भी. प्यास तो हम सबको लगी ही थी. सबने पानी पिया.

फिर कुछ शोर जैसा सुनाई दिया तो इम्मी उठकर पीछे गया, तुरंत लौटकर आया तो हाथ में आठ-दस अमरूद थे. बोला – ‘अमरूद खाएंगे? अपने बगीचे के हैं. लो, खा लो. कुछ अमरूद तोतों के कुतरे हुए हैं. मालूम है न, तोतोंे के कुतरे हुए अमरूद बहुत मीठे होते हैं. लो..’ वह एक-एक अमरूद फेंकता गया, हम कैच करते गए. समझ में नहीं आ रहा था खाएं या न खाए, पर इम्मी खुद खा रहा था. हमें सकुचाते देख उसने बेतकल्लुफी से कहा, ‘अरे खाओ खाओ. ऐसा कुछ नहीं. हमारे यहां चलता है.’

संकोच के मारे हम धीरे-धीरे खाने लगे. अमरूद मीठे थे. और भूख तो लगी ही थी. इम्मी बोला, ‘तोते हैं न! इत्ते आते हैं कि क्या बताऊं! और खाएं तो खाएं, चलो कोई बात नहीं, पर साले कच्चे-कच्चे भी जरा सा कुतरकर नीचे गिरा देते हैं. हमने पेड़ पर जाली भी बिछाई, तो पट्ठे जाली को ही काट गए. और खाओगे? अरे यार, तुम लोग पीछे ही क्यों नहीं आ जाते? जक्कू को चढ़ा देंगे, वो तोड़-तोड़कर देता जाएगा. बाकी कोई मत चढ़ना. अमरूद की डाली बहुत कच्ची होती है.’ बोलते-बोलते वह चल पड़ा. पीछे-पीछे हम..
घर के पिछवाड़े अमरूद के दो बड़े-बड़े पेड़ थे. फलों से लदे हुए. कुछ छोटे बच्चे अमरूद तोड़ और खा रहे थे वे हमें देखकर भाग गए. हम लोग भी अमरूद खाने में लग गए और थोड़ी देर के लिए भूल ही गए कि हम यहां अमरूद खाने नहीं, बैठने आए थे.
कोई घंटे भर बाद बाहर निकलने लगे तो मज्जू ने इम्मी से पूछा – ‘इम्मी! तू स्कूल कब आएगा?’ इम्मी बोला, ‘अब नहीं आऊंगा.’
राधेश्याम ने पूछा, ‘तो फिर क्या करेगा?’

इम्मी बोला, ‘सब्जी का ठेला लगाऊंगा. जहां बाऊजी लगाते थे – भंडारी मिल के सामने – वहीं लगाऊंगा. काका गांव से सब्जी लाते हैं. उनके दोनों बेटे हुकमचंद मिल के आगे लगाते हैं. मैं इधर लगाऊंगा. दिन के पचास रुपए भी कमाऊंगा तो बहुत है यार! मैं हूं और मां है. और है कौन? एक बहन थी, उसकी शादी कर दी. वैसे आदमी पढ़-लिखकर भी क्या करता है? काम-धंधा ही तो करता है.’
‘और फुटबॉल?’ किसी ने धीरे से पूछा. ‘फुटबॉल से रोटी नहीं मिलती. समझे? कोई कितना ही बड़ा प्लेयर हो जाए..? समझे?  ये खेल-वेल सब भरे पेटवालों की बातें हैं.’ इम्मी चिढ़ गया. ‘हो जाओ प्लेयर.. लेकिन काम-धंधा तो तुम्हें करना ही पड़ेगा.’ 

इम्मी की बात सुनकर हम लोग चुप और उदास हो गए. लग रहा था जैसे वह हमको नहीं खुद को समझा रहा था. बोलते समय उसकी आवाज कांप रही थी और लग रहा था किसी भी पल वह रो पड़ेगा. राधेश्याम ने इम्मी को गले लगा लिया और कहा, ‘तेरे पिताजी की डेथ का बहुत अफसोस हुआ इम्मी.’ इम्मी बोला, ‘सब लिखाकर लाते हैं भैया. जब खत्म हो जाती है तो हो जाती है. फिर रोओ चाहे छाती कूटो, चाहे जो भी करो.’ इम्मी अपनी उम्र से बहुत बड़ा लग रहा था और एकदम आदमियों की तरह बोल रहा था. हम लोग चुपचाप और मुंह लटकाए बाहर निकल गए और चले आए.

चार-पांच साल बाद एक शाम कुछ बच्चे स्कूल के मैदान पर फुटबॉल खेल रहे थे. तभी बारिश आ गई. अंधेरा-सा हो गया, लेकिन खेल बंद नहीं हुआ. कुछ बच्चे बारिश में तरबतर भीगते हुए भी खेल रहे थे. अचानक एक लंबा-चौड़ा आदमी पता नहीं कहां से आया और बच्चों के साथ खेलने लगा. वह बच्चों को छका रहा था और उससे लटकने-चिपकने के बावजूद बच्चे उससे गेंद नहीं छीन पा रहे थे. घंटे भर बाद वह आदमी अपने कपड़े निचोड़ता चुपचाप उधर चला गया जहां सड़क किनारे एक सब्जी का ठेला तेज बरसात में लावारिस-सा खड़ा था.

स्वयं प्रकाश का जन्म 1947 में इंदौर में हुआ. जटिल कहानियों को भी सरल भाषा में खूबसूरती से कहने के लिए जाने जाते हैं. कहानियों का रूसी में भी अनुवाद हो चुका है. पहल सम्मान, वनमाला सम्मान और राजस्थान साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित

समकालीन कहानी: कितना जोर कितना शोर?

इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के समाप्त होते-होते साहित्यिक विधा के रूप में कहानी ने केंद्रीयता हासिल कर ली है. ऐसा नहीं है कि कविता या उपन्यास लिखे नहीं जा रहे हैं. वे खूब लिखे जा रहे हैं, लेकिन पूरा फोकस कहानी पर आकर सिमट गया है. इस कहानी विधा में भी चर्चा के केंद्र में केवल युवा पीढ़ी है. युवाओं की एक बहुत बड़ी तादाद अचानक कहानी लेखन में सक्रिय हो गई है. प्रतिनिधि प्रकाशनों से एकाएक उनके संग्रह भी आ गए हैं. लगभग सभी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाएं इस नई पीढ़ी को लेकर अपने-अपने विशेषांक भी निकाल चुकी हैं. कइयों ने तो दो-दो अंक निकाले. छोटे-बड़े तमाम साहित्यिक आयोजनों में इस नई पीढ़ी को लेकर चर्चाएं होती रही हैं. इस नई पीढ़ी का शोर हिंदी में ऐसा है कि सारे साहित्यिक मुद्दे ही गौण हो गए हैं.

‘ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जानते हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे’

अगर हिंदी साहित्य के इतिहास को देखें तो नई पीढ़ी का आना कोई अनहोनी घटना नहीं है. कहानी के इतिहास लेखन पर काम कर रहे आलोचक गोपाल राय कहते हैं, ’नई पीढ़ी को लेकर शोर हमेशा से होता आया है. साठ के आसपास युवा पीढ़ी का बहुत शोर था. वह शोर अभी खत्म ही नहीं हुआ था कि अकहानी को लेकर शोर शुरू हो गया.’ लेकिन सवाल यह है कि क्या वर्तमान शोर पूर्ववर्ती पीढ़ियों के शोर जैसा ही है. क्या यह शोर भी रचनात्मकता का ही है? वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह इसे रचनात्मकता से अधिक बाजार का मामला बताते हुए कहते हैं, ’पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मैं उन आरंभिक लेखकों में से हूं, जिसने वागर्थ का नवलेखन आने पर इस नई पीढ़ी का उत्साह बढ़ाया था. मैंने ऐसा यह जानते हुए भी किया था कि इस पीढ़ी में अमरकांत, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, शेखर जोशी, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया की तरह रचनात्मक नयापन या ताजगी नहीं है जिसे लेकर वे कहानी लेखन में सक्रिय हुए थे. इसके बावजूद मैंने इनकी प्रशंसा की थी, तो इसलिए कि मुझे लगा था कि चाहे जो हो, इनके आने से भूमंडलीकरण के इस दौर में संकट से जूझ रहे साहित्य को गति मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि इन लेखकों की शुरुआती कहानियों के बाद एक ठहराव या बासीपन दिखाई देने लगा.’ यदि ऐसा है तो इस नई पीढ़ी का शोर थम क्यों नहीं रहा है?  काशीनाथ जी कहते हैं, ’ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जानते हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे. ये लोग लेखन पर कम ध्यान देकर विज्ञापन की आधुनिक सुविधाओं का लाभ अधिक उठा रहे हैं. साथ ही दूसरी बात यह है कि प्रतिष्ठान से जो पत्रिकाएं निकलती हैं उनकी नजर बाजार पर होती है. उन्हें बाजार के लिए एक आंदोलन की जरूरत होती है. इसके लिए पत्रिका को किसी सही या गलत आंदोलन से जोड़ दिया जाता है. कमलेश्वर जब ’सारिका’ में गए थे तो उन्होंने आम आदमी, समानांतर कहानी जैसे आंदोलन चलाए. वर्तमान में वैसा ही हो रहा है. जो युवा लेखन है, उसमें बाजार अधिक है, लेखन की ताजगी और नयापन कम. ये लेखक बाजार की मांग के अनुरूप चल रहे हैं.’

‘हमारी पहचान बनी है और हम पर बात हो रही है इसी से साबित होता है कि हमने कुछ नया किया है’

इतिहास का अनुभव यही बताता है कि किसी भी तरह की मांग के अनुरूप लिखा गया साहित्य कभी दीर्घजीवी नहीं होता. कुछ समय के लिए धूम मचाकर अंततः विलीन हो जाता है. आखिर कमलेश्वर द्वारा चलाए गए आंदोलनों के कहानीकार आज कहां हैं? कहानी के इतिहास में उनकी क्या जगह है? ऐसे में यह खयाल उठता है कि काशीनाथ जी के कहे मुताबिक बाजार के हिसाब से चलने वाली यह पीढ़ी भी क्या लुप्त हो जाने के लिए अभिशप्त है? काशीनाथ सिंह की ही पीढ़ी के वरिष्ठ कथाकार और अरसे तक पहल का संपादन करने वाले ज्ञानरंजन कहते हैं, ’मेरी यह समझ है कि कहानी और कविता लगभग डूबती हुई विधाएं हैं लेकिन कहानी को नए बाजार ने थोड़ा-बहुत बचाया है. अनेक नए कहानीकार इसी बाजार की उपज हैं. बाजार जल्दी अपनाता है और जल्दी हड़पता है. उसका पेट बड़ा होता है और उसे निरंतर नायाब एवं अजूबा चाहिए. नए कहानीकारों ने बाजार की मांग की आपूर्ति भरपूर की है. उन्होंने चमकदार लिखा है. कई बार अखबारी खबरों को भी तिलिस्म की तरह खूबसूरत बनाया है. इनका पाठ लोकप्रिय और पठनीय भी है. कई बार ये अभूतपूर्व भी हैं. पर लगता है कि यह विधा इंटरनेट में विलीन होने के लिए अभिशप्त है. शायद यह किराए और बाजार की कोख है. इसे आधुनिक ’टेस्ट ट्यूब बेबी’ भी कह सकते हैं.’ अगर ऐसा है तो पत्रिकाओं के संपादक इन कहानीकारों को लेकर विशेषांक पर विशेषांक क्यों निकाले जा रहे हैं? ’हमारे अनेक संपादक समकालीनता के बाजार से अभिभूत हैं और बाजार का अमूर्त कमांड ले रहे हैं. कई बार बाजार की खिलाफत करने वाले भी उसके असंख्य चाकरों में शुमार हो जाते हैं’ इस पीढ़ी की कहानियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए ज्ञानरंजन कहते हैं, ’इस नव्यतम कहानी में पर्याप्त सकारात्मक अपवादों के बावजूद बहुलांश अत्याधुनिक बाजार की उपज है और इसीलिए अमूर्त रूप से क्रूर, हिंसक और मनुष्य विरोधी है. नामवर सिंह ने ’हंस’ की गोष्ठी में जो कहा और विजय कुमार ने ’नया ज्ञानोदय’ में जो लिखा वह फूहड़, दुखद लेकिन अकाट्य सत्य भी है.’

‘जिन फॉर्मूलों को साहित्य में स्थापना के नुस्खे माना जाता था उनके बिना ये कैसे स्थापित हो गए’

यानी इन वरिष्ठ आलोचकों और कथाकारों की राय से ऐसा प्रतीत होता है कि यह पीढ़ी अपनी रचनात्मकता के सहारे नहीं बल्कि बाजार के सहारे आगे बढ़ रही है और इनको लेकर जो शोर हो रहा है वह रचनात्मकता का नहीं है. वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, ’दरअसल यह विज्ञापनी मानसिकता का दौर है. इसमें जोर चाहे कम हो, शोर अधिक होता है. यह विज्ञापनी मानसिकता आज साहित्य को अधिक प्रभावित कर रही है.’ वे आगे कहते हैं, ’अगर वस्तु पर जोर नहीं दिया जाएगा तो शोर ही किया जाएगा. यही कारण है कि ये सारे कहानीकार एक जैसे लगते हैं. इनकी कोई निजता या व्यक्तित्व नहीं है और ये पाठक के मन में पहचान नहीं बना पाते.’ इसे कुछ और स्पष्ट करते हुए काशीनाथ सिंह आगे कहते हैं, ’दरअसल कोई कहानी अपने चरित्र या पात्र के माध्यम से याद रह जाती है. पूर्ववर्ती कहानियां अपने चरित्रों या पात्रों के कारण ही याद रह जाती थीं. उन कहानियों में घटनाओं के केंद्र में मनुष्य होता था. इनकी कहानियों में मनुष्य घटनाओं में घुलमिल गया है. वह याद ही नहीं आता. पुरानी कहानियों में मनुष्य की केंद्रीयता थी. इनकी कहानियों में वह केंद्रीयता से बाहर है.’

यह लगभग वैसी ही बात है जिसे ज्ञानरंजन मनुष्यविरोधी होना कहते हैं. लेकिन सवाल यह है कि ऐसा परिदृश्य बना कैसे? इसके बारे में आलोचक और वागर्थ के संपादक विजय बहादुर सिंह कहते हैं, ’इसका कारण बहुत साफ है. आज साहित्य कैरियर और महत्वाकांक्षा का मामला हो गया है. उसका भी एक अपना बाजार हो गया है, जिसमें लिखा चाहे जितना कम जाए पर शोर अधिक किया जाता है.’ विजय बहादुर सिंह आगे कहते हैं, ’यह जो पढ़ा-लिखा अंग्रेजीदां नया मध्यवर्ग आया है, वह संघर्षशील नहीं बल्कि घुटनाटेकू है. यह मु्क्तिबोध की कविता ’अंधेरे में’ में वर्णित मध्यवर्ग की अगली पीढ़ी है. जहां तक रचनात्मकता का सवाल है, इस पीढ़ी में कुछ लोग लंबी कहानियां लिख रहे हैं. अगर कहानी ’कंटेंट’ के कारण खिंचती जाए तो बात अलग है लेकिन यहां तो कंटेंट के बिना ही खींचा जा रहा है. अब लंबी कहानी लिखने मात्र से कोई उदय प्रकाश थोड़े ही हो जाएगा.’  समय-समय पर इस पीढ़ी पर उदय प्रकाश की नकल करने के आरोप लगते रहे हैं. ये कितने सही हैं, पूछने पर युवा कहानीकार उमाशंकर चौधरी कहते हैं, ‘हम अपने ऊपर उदय प्रकाश के प्रभाव को गर्व से स्वीकार करते हैं, लेकिन हम नकल नहीं कर रहे. हमारी पहचान बनी है और हम पर बात हो रही है इसी से साबित होता है कि हमने कुछ नया किया है. लेकिन सभी लंबी कहानियां भी नहीं लिख रहे हैं और लंबी कहानियां भी पठनीय हों तब क्या समस्या है?’

यहां एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों को युवा रचनाशीलता मात्र से समस्या है या कुछ मुद्दों को लेकर असहमति भी है? कथाकार व ’हंस’ के कार्यकारी संपादक संजीव कहते हैं, ’नई पीढ़ी और युवा रचनाशीलता से किसी को समस्या नहीं है. दरअसल ’वागर्थ’ के नवलेखन अंत तक तो सबकुछ ठीक था लेकिन उसके बाद रवींद्र कालिया लेखक को बनाने से अधिक सजाने की प्रक्रिया में लग गए. इसलिए एक व्यक्ति, पत्रिका या प्रतिष्ठान ने जो किया उसे सब पर लागू न किया जाए. रवींद्र कालिया की कार्यशैली अलग किस्म की है. हंगामा, ग्लैमर, प्रोजेक्शन उस कार्यशैली के अनिवार्य हिस्से हैं. अब इसे बाजारवाद का प्रभाव भी कह सकते हैं और उनके व्यक्तित्व का आग्रह भी. ये चीजें हमलोगों को नागवार गुजरीं. जिन-जिन नए रचनाकारों के प्रशंसा के पुल बांधे गए सब फुलझड़ियों की तरह चमक बिखेर कर खत्म हो गए. नए की अतिशय प्रशंसा परोक्ष रूप से उसकी हत्या होती है. हमने भी हंस में ’मुबारक पहला कदम’ नाम से नए रचनाकारों को प्रकाशित किया. इनकी दूसरी रचनाओं ने भी आश्वस्त किया जबकि उस ’विवादास्पद पीढ़ी’ की दूसरी रचनाएं प्रभावित नहीं कर पाईं. अलबत्ता अपवाद के रूप में कुछ नाम तो भीड़ से हमेशा अलग रहते ही हैं.’

संजीव नई पीढ़ी के जिस हिस्से को ‘विवादास्पद पीढ़ी’ की संज्ञा देते हैं वह जाहिर है कि उनकी निगाह में हिंदी की स्वाभाविक नहीं बल्कि प्रोमोट की गई पीढ़ी है. कथाकार व ’समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट कहते हैं, ‘दरअसल इस तरह के काम प्रकाशन गृह करते हैं. उन्हें रचनाशीलता से मतलब न होकर सूची पत्रों में नए नाम जोड़ने में दिलचस्पी होती है. वर्तमान में जो नई पीढ़ी का शोर है वह बाजारसंचालित है.’ बाजार के अतिरिक्त पंकज बिष्ट एक दूसरे कारण की ओर भी संकेत करते हैं, ’इस समय साहित्य में एक ठहराव है. नई कहानी के दौर के रचनाकार ही किसी न किसी बहाने चर्चा के केंद्र में रहे. जबकि उस आंदोलन को खत्म हुए चालीस साल से अधिक हो गए. बहुत-से तो नई कहानी के बाद की पीढ़ी को जानते ही नहीं. उनका सीधा संपर्क इन नए रचनाकारों से हो रहा है. इस तरह नई पीढ़ी की चर्चा द्वारा नई कहानी के बाद के ’वैक्यूम’ को भरने का प्रयास हो रहा है.’

इन सबसे इतर ’वसुधा’ के संपादक कमला प्रसाद नई पीढ़ी के इन रचनाकारों के प्रति ’जनरल रिमार्क’ देने से बचने की सलाह देते हुए कहते हैं, ’केवल दो-चार कहानीकारों को न देखा जाए. सभी कहानीकारों को एक साथ लिया जाए तो यह स्पष्ट रूप से दिखेगा कि इन रचनाकारों ने अपने समय की नब्ज को बखूबी पकड़ा है. यह बहुत समर्थवान पीढ़ी है. जो ज्ञान पुरानी पीढ़ी को वर्षों में मिलता था, इन्हें तुरंत सुलभ हो जाता है. इस पीढ़ी ने सारे ’फॉर्म’ तोड़े हैं, नैतिक बंधनों को तोड़ा है. मैं इस पूरी पीढ़ी का स्वागत करता हूं.’ अगर यह पीढ़ी इतनी ही समर्थवान है तो इनकी कहानियों में विषय वस्तु का संकुचन हो गया है ऐसी बातें क्यों सुनने में आ रही हैं? जैसा कि विश्वनाथ त्रिपाठी पूछते हैं, ’ये लोग अपने से अलग दलित या स्त्री जीवन पर उस तरह की कहानियां क्यों नहीं लिख पा रहे हैं जैसे प्रेमचंद और उनके बाद के रचनाकारों ने लिखीं? यह समर्थ होने की निशानी है या असमर्थता की?’ इस पर कमला प्रसाद कहते हैं, ’मिडिल क्लास में कथा विस्तार की संभावना नहीं है. यह क्लास जब तक डीक्लास होकर दूसरे क्लास से नहीं जुड़ेगा तब तक विस्तार की गुंजाइश नहीं है.’ मध्य वर्ग का तर्क भी बहुत दिया जाता है. इस पीढ़ी के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि इस पीढ़ी के लेखक शहरी मध्यवर्ग के हैं इसलिए इनकी कहानियों में मध्यवर्ग और मध्यवर्गीय संबंधों की व्यापक उपस्थिति है. लेकिन सवाल यह भी है कि हिंदी में कौन सा लेखक सर्वहारा वर्ग का हुआ है? अब तक के सभी रचनाकार मध्य वर्ग या उच्च वर्ग के ही रहे हैं. अगर इस तर्क को मान लिया जाए तो हिंदी में गरीब, किसान, मजदूर आदि को लेकर कोई कहानी ही नहीं होनी चाहिए. दरअसल लेखकीय सामर्थ्य इसी में निहित है वह अपनी संवेदना का कितना विस्तार कर पाता है.  काशीनाथ सिंह कहते हैं, ’पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह कथा लेखन के प्रति वैसी आत्मीयता या प्रतिबद्धतता इस पीढ़ी के पास नहीं हैं.’

नए कहानीकारों को लेकर की जा रहीं इन तमाम शिकायतों का ‘प्रतिलिपि’ के युवा संपादक गिरिराज किराडू कुछ इस तरह जवाब देते हैं, ‘नए कहानीकारों में चन्दन पाण्डेय और कुणाल सिंह की कुछ कहानियां बिलकुल नए का प्रस्ताव हैं. इधर गौरव सोलंकी की कहानी ‘सुधा कहां है’ भी. प्रभात रंजन का सतह पर दीखता पुरानापन भी बहुत अंतर-पाठीय और धोखादेह है.  दरअसल दृश्य  में नकली परदुखकातर और यांत्रिक लेखन की भरमार है करीब से पढने पर जिसकी क्रूरता और हिंसा भी साफ़ झांकने लगती है. वैसा रिव्यू-भीरु, बॉस-भीरु  लिखने वाले बहुत सारे लोगों को झल्लाहट है कि जिन फॉर्मूलों को साहित्य में स्थापित होने के लिए अचूक नुस्खा माना जाता था वो सब बिना किये ये नए लोग स्थापित कैसे हो गए.’

वर्तमान समय को देखते हुए एक सवाल यह भी उठता है कि क्या नए लेखकों की बाजारोन्मुखता या उनका बाजार से संचालित होना अस्वाभाविक है? उपन्यासकार व महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय इसे स्वाभाविक मानते हुए कहते हैं, ’हमारा पूरा का पूरा समय ही बाजार से संचालित है. भूमंडलीकरण के बाद सब-कुछ बाजार से संचालित हो रहा है. ऐसे में यह नई पीढ़ी भी बाजार से संचालित हो रही है तो इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है. धीरे-धीरे जब ये परिपक्व होंगे तो बाजार के अच्छे-बुरे पक्षों को जानेंगे और उसका इस्तेमाल अपनी रचनात्मकता के पक्ष में कर सकेंगे.’

वरिष्ठ कथाकार व नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया नई पीढ़ी को लेकर लग रहे तमाम आरोपों-प्रत्यारोपों को खारिज करते हुए कहते हैं,’ मैं बाजार के दबाव को मानता हूं. कुछ लोग बिकना ही नहीं चाहते. हिंदी में ऐसा भी लेखन हो रहा है जो नहीं बिकता. जीवन से जुड़े रचनाकार बिकेंगे ही. मुझे खुशी है कि नए लोगों ने बाजार बना लिया है. इससे अच्छी कुछ बात हो ही नहीं सकती.’ रवींद्र कालिया आगे कहते हैं, ’इस नई पीढ़ी के आने के बाद पुरानी पीढ़ी के सारे लेखक असुरक्षित हो गए हैं. अब तक पुरानी पीढ़ियां नई पीढ़ी के लिए ’स्पीड ब्रेकर’ का काम करती हैं. मैंने सिर्फ इतना किया है कि उस स्पीड ब्रेकर को हटा दिया. हटाते ही ये लोग दौड़ने लगे और अपनी जगह बना ली. पूर्ववर्ती पीढ़ी की सोच पिछड़ी हुई है. मैं समझता हूं कि यह हिंदी की पहली पढ़ी-लिखी पीढ़ी है.’ रवींद्र कालिया यह भी स्पष्ट करते हैं कि ’मैं केवल नई पीढ़ी को ही नहीं छापता हूं. बहुत कम लेखक होंगे जो मेरे संपादन में नहीं छपे हैं. वर्तमान साहित्य’ के कहानी महाविशेषांक और ’वागर्थ’ के फोकस के स्तंभ के अंतर्गत पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों को हमने पर्याप्त छापा है.’

ऐसे विरोधाभासी बयानों के बीच समकालीन कहानी के परिदृश्य को कैसे समझा जाए ? संजीव कहते हैं, ’इसमें तीन तरह के लोग हैं. एक जो प्रचारित हैं. दूसरे जो चुपचाप रचनाशील हैं और तीसरे जिनका प्रचार भी है और उनमें दम भी. अगर ये भटके नहीं तो इनमें संभावनाएं हैं.’ काशीनाथ सिंह कहते हैं, ’इन्हीं लेखकों में से कुछ ’जेनुइन’ हैं, लेकिन प्रचार-प्रसार के मामले में पीछे हैं. ये आज से कुछ वर्ष बाद सामने आ सकते हैं.’ ज्ञानरंजन कहते हैं, ’यह समय कहानी की विपदा का है और अंततः उसके लोप का. बावजूद इसके होनहार नक्षत्र अंधेरे में ही चमकते हैं.’ 

 

' राजनीति गंदली है तो आचमन करो '

मित्रों के बीच देश की मौजूदा गंदली राजनीति पर बातचीत हो रही थी. मेरे भीतर मुख्यमंत्री मायावती द्वारा कटौती प्रस्ताव के मुद्दे पर कांग्रेस का पक्ष-समर्थन किए जाने का क्षोभ व्याप्त था. पानी पी-पी कर कांग्रेस को कोसने वाली बसपा सुप्रीमो का यह नया ‘पोलिटिकल स्टैंड’ कम से कम मेरी राय में समझ से परे था. बातचीत के लहजे में आक्रोश घुला था.
काफी देर से चुपचाप सुन रहे मेरे एक मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘अच्छा यह बताओ, बनारस की गंगा नदी क्या पहले जैसी ही साफ-सुथरी है? क्या उसका जल उतना ही स्वच्छ और निर्मल है, जैसा अतीत में कभी रहा हो?’ ‘बिल्कुल नहीं!’ तपाक से मैंने जवाब दिया.

जिंदगी में बढ़ रहे शोर-शराबों, चिल्ल-पों और राजनीतिक हो-हल्लों से आजिज हर आदमी फौरी तौर पर बचने का उपाय खोजता फिर रहा है

‘तो क्या यह मान लिया जाए कि मैली होती जा रही गंगा अब लोगों का पाप नहीं धोती? अरे! राजनीति गंदली है तो आचमन करो. लाभ के हिसाब से ‘मन शुद्धिकरण’ करो. उसमें डूब मरने की क्या जरूरत?’ मेरी क्या प्रतिक्रिया रही होगी, उसे छोड़ दें. असल बात यह है कि आपसी बातचीत और संवाद में हम कितनी जल्दी बीच का रास्ता ढूंढ़ निकालते हैं. जिंदगी में बढ़ रहे शोर-शराबों, चिल्ल-पों और राजनीतिक हो-हल्लों की सरगर्मी से हर आदमी आजिज हो चला है. वह फौरी तौर पर बचने का उपाय खोजता फिर रहा है. लिहाजा, अधिकांश लोग नफे-नुकसान के हिसाब से सोचने लगे हैं. शौक के हिसाब से चीजों को जानने-परखने के कला-कौशल में पारंगत हो गए हैं. ऐसे में उन्हें क्यों कचोटे  यह ख़बर कि ‘धान-कटनी से लौटते मजदूरों से भरा ट्रक पलटा, 30 मरे’, ‘नरेगा-मनरेगा में धांधली से अफसरों की चांदी’ या कि ‘लालगढ़ हुआ फिर लाल.’

तो क्या हम यह मान लें कि जनधर्मी लोकतंत्र, जिसने सभी को अलग-अलग प्रकार से आजादी दी है, उसका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग, यह उनका बिल्कुल निजी मामला है? क्या मानवीय मूल्यों, व्यवहार, संवेदनशीलता और सक्रियता में दिखता फर्क आजादी के नए तरानों का हिस्सा है?  

मेरे मित्र की वह बात अब भी मेरे भीतर हलचल मचाए हुए है. वह बता रही है कि सभ्य और संभ्रांत वर्ग के युवाओं में आज दिखावे की प्रवृति तेज है, समय से तत्काल सौदेबाजी करने की बेचैनी अधिक है, अवसर मिलते ही येन-केन-प्रकारेण हर प्रकार का सुख-साधन और दौलत-ऐश्वर्य बटोर लेने की चाहत और महत्वाकांक्षा ज्यादा है. परिणाम यह हुआ है कि कोई आजादी को लूट-खसोट का जरिया मान रहा है, तो किसी के लिए राजनीतिक संबंधों का अर्थ मुनाफे के अवसर का सृजन है. कोई राहुल गांधी को ‘युवराज’ बनाने की खातिर ‘हिट आइडिया’ सुझा रहा है, तो कोई उनकी रैली को ‘महाख़बर’ साबित करने के लिए ‘ख़बरिया अभियान’ चला रहा है. कई ऐसे भी हैं जो अपनी काली कमाई क्रिकेट के ‘आईपीएल’ संस्करण के बहाने उगाहने में मशगूल है.

और मेरे जैसे कई लोग व्यवस्था और व्यक्ति के मुद्दे पर सवाल खड़े कर रहे हैं, राजनीति में चल रहे घालमेल पर सर पीट रहे हैं. समाज के अंदर कुलबुलाते दुख, तकलीफ और पीड़ा पर बात करने के लिए ‘स्पेस’ ढूंढ़ रहे हैं. नक्सल घटनाओं में बेमौत मारे जा रहे निर्दोष और निरपराध लोगों की खातिर अपनी आंखें लाल कर रहे हैं .

मैं उन बच्चों पर छपी रिपोर्ट पढ़कर व्यथित हूं, जो भोजन के अभाव में पत्थर खा रहे हैं. मेरी नज़र उन घरों की देहरी की तरफ निहार रही है जिन घरों की स्त्रियां घरेलू प्रताड़ना से ऊबकर रेल की पटरियों पर जान देने को मजबूर हैं. मेरे अनुत्तरित सवालों के घेरे में आधुनिक लबादा ओढ़े बौद्धिक समाज का वह कुनबा है, जो सामाजिक-सांस्कृतिक प्रगति के तमाम दावों को लजाते हुए अपनी नाक के लिए अपनी ही औलादों का गला घोंट रहा है.

कोई मुझे सुझाव और सलाह दे, ताकि पत्रकारिता में ‘गोल्ड मेडेलिस्ट’ का तमगा लिया मैं, सुनहले सपने बेचने वाले ख़बर-प्रबंधकों से अपने लिए भी कुछ खरीदारी कर सकूं. ऐसी ही कोई सलाह कि अगर राजनीति गंदली है तो आचमन करो. लाभ के हिसाब से ‘मन शुद्धिकरण’ करो. उसमें डूब मरने की क्या जरूरत? क्या मैली होती जा रही गंगा अब लोगों का पाप
नहीं धोती?  

' हिंदी में सरकारी खरीद नाम की अलालत ने किताबों को पाठकों से दूर किया है '

आपकी मनपसंद लेखन शैली क्या है ?

रचना का फॉर्म, शैली, गठन या बुनावट कोई भी या कैसी भी हो, यह आवश्यक है कि उसमें बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा व्यक्त हुई हो. सब चीजों के ऊपर जीवन का महत्व रेखांकित हुआ हो. लेखन को करियर मानने वाले लेखकों और फैशनेबल, बनावटी, यांत्रिक, अलंकृत लेखन से मुझे अरुचि है.

इन दिनों क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

इन दिनों नूर जहीर का हाल ही में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘रेत पर खून’ पढ़ रहा हूं. यह किताब उदाहरण है कि उर्दू की रवायत से जुड़े लोग जब हिंदी में लिखते हैं तो क्या जादू पैदा करते हैं.

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों.

दोस्तोयेव्स्की, तोल्स्तोय, तुर्गनेव, चेखव, हावर्ड फास्ट, जैक लंडन, रसूल हमजाजोव, ब्रेख्त, लोर्का, मयाकोवस्की, इजाबेल आयेंदे, चिनुआ अचेबे, प्रेमचंद, रेणु, मुक्तिबोध, शमशेर, ज्ञानरंजन, मंटो, इस्मत चुगताई.

कोई महत्वपूर्ण रचना जो अलक्षित रह गई हो.

हमारी भाषा में चर्चा का तंत्र किन्हीं और आधारों पर चलता है, किताबों की श्रेष्ठता के आधार पर नहीं. सर्वश्रेष्ठ किताबों की चर्चा नहीं होती. नूर जहीर और मंजूर एहतेशाम  की कोई चर्चा नहीं होती. हाल ही में विष्णु खरे के द्वारा किया गया गोएठे की कालजयी कृति ‘फाउस्ट’ का बहुत पठनीय अनुवाद प्रकाशित हुआ है, उसके बारे में भी किसे पता है?

क्या किया जा सकता है कि किताबें पढ़ने की परंपरा खत्म न हो?  

हिंदी में ‘सरकारी खरीद’ नाम की अलालत ने किताबों को पाठकों से दूर किया है. इसे  खत्म होना चाहिए जिससे प्रकाशक पाठकों की क्रय क्षमता के अनुसार किताबों के मूल्य कम रखने के लिए बाध्य हों.

गौरव सोलंकी

भूख के कलापक्ष से बचते हुए : खुदाई में हिंसा

पुस्तक  खुदाई में हिंसा (कविता संग्रह)

लेखक  बद्री नारायण

कीमत  200 रुपए

प्रकाशक  राजकमल प्रकाशन

ऐसे समय में जब समकालीन हिंदी कविता से कवि की निजी काव्यात्मक पहचान तेजी से गायब हो रही है, उसी समय में बद्री की कविताएं अपने विशिष्ट तेवर और अंतर्वस्तु की वजह से अलग से ही पहचानी जा सकती हैं. ‘खुदाई में हिंसा’ बद्री का तीसरा कविता संग्रह है.

बद्री इस किताब की पहली ही कविता में लिखते हैं कि ‘मैं भूख के कलापक्ष से अभिभूत होने से बचते हुए उसके राजनीतिक पक्ष पर बात करना चाहता हूं.’ इन्हीं अर्थों  में बद्री की कविताएं राजनीतिक कविताएं हैं. इस किताब की कविताओं का बुनियादी स्वर संवेदनहीन अभिजन के खिलाफ लोक के संघर्ष या तनाव को रचने का है. इन कविताओं में लोक स्वर की अनगिन अनुगूंजें हैं पर बद्री का लोक वह लोक नहींे है जो सत्ता की चाकरी करता है बल्कि बद्री का लोक वह है जो सत्ता के खिलाफ विद्रोह की योजनाएं बनाता रहता है. बद्री के कवि के पास एक वैकल्पिक सौंदर्य दृिष्ट है जो श्रम की संस्कृति से जुड़ती है, जो एक वैकल्पिक जनपक्षधर व्यवस्था के सपने से जुड़ती है इसलिए बद्री के लोकनायक सिर्फ संघर्ष ही नहीं करते निर्माण भी करते हैं.

‘सुभाषनगर’ जैसी कविता में बद्री इस बात को रखते हैं कि कैसे सारी सुंदरता, सभ्यता, कला, संगीत, संस्कृति सबको अपनी मेहनत और रचनात्मकता के दम पर पैदा करने वाला ही इस सबसे दूर कहीं हाशिए पर ढकेल दिया जाता है. उसके समूचे निर्माण पर अभिजन व्यवस्था कब्जा कर लेती है और उसे भदेस या पिछड़ा हुआ कहकर दूर फेंक देती है. पर जो लोक इस पूरी सभ्यता को खड़ा कर सकता है, उसे निखार-संवार कर इस काबिल बना सकता है कि अभिजन उस पर इतरा सकें वह उसमें अपनी वाजिब जगह छीन भी सकता है. बद्री इस लोक-ताकत को बखूबी पहचानते हैं, उस पर भरोसा करते हैं.
बद्री वहां भी ताकतवर साबित होते हैं जहां वह लोक की पीड़ा, उसकी निरीहता या उदासी को तो स्वर देते ही हैं साथ-साथ उसकी कमियों और उसके आपसी अंतर्विरोधों को भी रेखांकित करते चलते हैं जिनसे उबरे बिना उसे कोई निर्णायक कामयाबी नहीं मिलने वाली है. बद्री लोक के गुमनाम नायकों की पहचान करते हैं जिनके बारे में अभिजन जानता सब-कुछ है पर वह उन्हें उनकी असली जगह देने को तैयार नहीं है. उन्हें पहचान देने और दिलाने की इसी काव्यात्मक संघर्ष के परिणामस्वरूप ‘समुद्र-गाथा’, ‘बच्चे का गीत’, ‘मछली’, ‘सब चुप थे’, ‘आप उसे फोन करें तो’, ‘बीच आकाश में’, ‘यही हो तुम, ‘नई दुनिया में लोक’, ‘नगाड़े’, ‘मदन गोपाल सर्वहारा’ या ‘दलित बस्ती में रग्घू मेहतर’ जैसी अनेक श्रेष्ठ कविताएं रचते हैं.

बद्री नारायण का सामाजिक इतिहास के क्षेत्र में जो अन्य परंतु बहुत महत्वपूर्ण काम है वह बहुत तेजी से उनकी कविताओं मंे अपना विस्तार कर रहा है. बद्री को यह ध्यान में रखना होगा कि उनका वह काम उनकी ताकत ही बना रहे, सीमा न बने.

मनोज कुमार पाण्डेय

बुरी नीयत और गर्भवती नायिकाओं की फिल्म : राजनीति

फिल्म राजनीति
निर्देशक प्रकाश झा
कलाकार नसीरुद्दीन शाह, मनोज बाजपेयी, अजय देवगन, नाना पाटेकर, रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ

राजनीति मनोरंजक है (आखिरी आधे घंटे को छोड़कर) लेकिन इसकी नीयत उतनी ही ठीक है, जितनी कैटरीना कैफ की हिन्दी. इसके सामाजिक सरोकार उतने ही आधुनिक हैं, जितना प्रचार के लिए राहुल गांधी की नकल करते हुए लोकल ट्रेन में घूमने वाले रणबीर के रहे होंगे. यह महाभारत का (या बकौल प्रकाश झा, उसके किरदारों का) आधुनिक संस्करण है लेकिन हिम्मती नहीं.

मगर शुरू से ऐसा नहीं होता. यह साल की सबसे मजबूत फिल्मों की तरह शुरू होती है, अपने बहुत सारेकिरदारों, बहुत सारी पार्टियों और एक परिवार की कहानी के साथ. तब यह कसी हुई है और महाभारत से मिलते जुलते नए किरदारों को पहचान कर आप खुश और चकित भी होते हैं. फिर धोखे और हत्याएं होनी शुरू होती हैं और तब भी यह सब थ्रिलिंग है और बाँधे रखता है. बीच में कैटरीना जरूर आती हैं और अच्छीएक्टिंग करने की पूरी कोशिश करती हैं लेकिन उन्हें नाकाम होते देखना बहुत कष्टदायक है और आपको उनपर इतना तरस आता है कि आप उनका चेहरा देखने से बचते हैं (वही चेहरा, जिसके लिए आपने कई सौ रुपए कई बार खर्च किए होंगे- उनकी बेवकूफ फिल्मों के लिए, जिन्हें वे गर्व से करती हैं). बाकी सब तो कमाल के एक्टर हैं ही, लेकिन अर्जुन रामपाल की एक्टिंग सरप्राइजिंग पैकेज है. फिर मासूम से रणबीर आते हैं और उतने मासूम नहीं रहते. यहीं से फिल्म अपनी दिशा पकड़ना शुरू करती है और साथ ही ‘सही’ होने से बचते रहना भी.

नाटकीय घटनाएं तो हैं और वे प्रकाश झा की पिछली फिल्मों में भी रही हैं. मैंने पहले भी एक बार लिखा था कि प्रकाश झा की फिल्में सामाजिक-राजनैतिक ताने-बाने के बीच वही एंग्री यंग मैन वाली मसाला फिल्में रही हैं और चूंकि वे हमेशा पिछड़े हुए बिहार की कहानी होती हैं (इस बार मध्यप्रदेश में भी बिहार की ही), इसलिए लोग उन्हें सिर्फ सामाजिक या ‘सार्थक’ फिल्में समझने की भूल कर बैठते हैं. उनमें आक्रोश होता है और स्टाइलिश हिंसा, इसीलिए उन्हें दर्शक भी मिलते हैं. हां, उन्हें वोट नहीं मिलते और शायद और कोई माध्यम उनकी लोक जनशक्‍ति पार्टी का प्रचार भी नहीं करता इसलिए उन्होंने फिल्म के जरिए बार-बार अपनी पार्टी के गुण गाये हैं.

फिल्म का पहला आधा हिस्सा महाभारत के पांडवों और श्रीकृष्ण को भी नकारात्मक सा दिखाता है और चूंकि घटनाएं कहीं न कहीं महाभारत से मिलती हैं इसलिए आपको अच्छा लगता है कि यह एक पुरानी गलत व्याख्यायित की गई कहानी का आधुनिक और स्वतंत्र वर्जन होगा. मतलब यह कि आप उम्मीद करेंगे कि द्रोपदी को बलिदान नहीं देने पड़ेंगे और अर्जुन को धर्म का रक्षक नहीं बताया जाएगा. मगर आखिरी आधे-एक घंटे में वे वही करते हैं, जो ‘महाभारत’ हमारे समाज के साथ करती आई है. द्रोपदी के साथ कुछ भी करो, आप उसे इस्तेमाल की चीज बना लो और बेच-खरीद लो लेकिन तीन-चार दिन में वह सब भूल जाएगी (पहले यह रोना रोकर कि हम औरतों को समझौते करने ही पड़ते हैं) और आपके किसी भी नायक से बेतहाशा प्यार करने लगेगी. क्योंकि आप इस अपराधबोध के साथ नहीं जी सकते कि आपने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी है इसलिए आखिरी हिस्से में वह आपको माफ कर चुकी होगी और यह भी अहसास करवाएगी कि हां, हीरो जी, आपने जो भी किया, वह आपकी मजबूरी थी और हीरो जी आपका जीवन तबाह करके चल देंगे और सॉरी बोलेंगे, आँखों में नकली से आँसू भर लाएँगे. इसीलिए यह बहुत सी मुंबइया फिल्मों की तरह घोर पुरुष-शासित फिल्म है और इसमें स्त्रियाँ पैसिव ही हैं. वे आपके खेलने के लिए बनी हैं और खुश या बेवकूफ या दोनों हैं.

अजय देवगन का किरदार, जो कर्ण का है, सशक्त है लेकिन निर्देशक महोदय के चक्कर में उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं. कितना अच्छा होता कि यह ‘महाभारत’ का कुछ वैसा ही रीमेक बन पाता जैसा ‘देव डी’ ‘देवदास’ का थी. कुछ लोग आपके खोखले और नकली आदर्शों से विद्रोह करते और नई दुनिया बना डालते.लेकिन यही ‘राजनीति’ की सबसे बड़ी कमजोरी है. उसमें धारा के विरुद्ध चलने की हिम्मत नहीं है. उसके लेखक-निर्देशक नहीं समझ पाते कि कैसे खत्म करें तो वे पुरानी हिन्दी फिल्मों को ही याद करते हैं, जिनमें हीरो आखिर में हीरो ही बना रहेगा और खबरदार, जो आप उसके बारे में कुछ बुरा सोचते हुए थियेटर सेनिकले. इसके लिए आखिर में मधुर सा संगीत बजेगा और हीरो अपने पक्ष में सहानुभूति जुटाने के लिए चार लाइनें बोलकर चलता बनेगा और हीरोइन को गर्भवती होने की खुशखबरी सुनानी होगी.

आप बस ये मत कहिए कि आपने कुछ अलग या नया बनाया है या आप हमारी और समाज की फिक्र करते हैं. हम इसे एक अच्छी एक्शन थ्रिलर तो मानने को तैयार हैं लेकिन सच्ची और बोल्ड फिल्म नहीं.यह बच्चों के लिए नहीं है, इसलिए नहीं कि इसमें अश्लीलता या क्रूरता है, बल्कि इसलिए कि यह अपनी बुराइयों को नैतिक शिक्षा की किताब में सिखाती है. यह साल की सबसे कमजोर फिल्मों की तरह खत्म होती है और आपसे उम्मीद करती है कि आप उसके खलनायक से सहानुभूति से पेश आएं और उनके आगे हाथ जोड़ें, जो अर्जुन है या स्वयं श्रीकृष्ण.

गौरव सोलंकी

आज के आराध्य

‘कोस-कोस पे पानी बदले सवा कोस पे बानी’ वाली कहावत में बहुत आसानी-से अगला हिस्सा जोड़ा जा सकता है -‘दस कोस पे ध्यानी’. ध्यानी यानी भक्त.

हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आराधक और उनके आराध्य उतनी ही तेजी के साथ अपना चोला बदलते चलते हैं जितनी तेजी से यहां के लोगों की बोली. हर गांव-शहर-मुहल्ले के अपने आस्था के प्रतीकों का होना इस देश में उतना ही सहज है जितना जीने के लिए हवा-पानी. लमही के बेलवांबाबा, सरायमीर के अलीअश्कां बाबा, नरसिंहपुर के दुल्हादेव, लखनऊ के बाबा खम्मन पीर, रामदेवरा के रामदेव बाबा, मोकामा के चूहड़मल, छपरा की अंबा देवी से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के अय्यप्पन तक स्थानीय देवी-देवताओं और श्रद्धा-उपासना के बिंबों की एक ऐसी अनवरत श्रृंखला है जिसका संबंध भारतीय पौराणिक संदर्भों से उतना गहरा या जुड़ा न भी हो तो भी सब के सब उसी परंपरा से प्रेरित-आस्वादित हैं जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं.

आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं – शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें

अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि हर कोस पर दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं. फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है. किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है. ‘परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत है’ वाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है.

धर्मभीरुता भारतीय समाज के मूल में है इसके बावजूद धर्म और आस्था के मामलों में छोटी-मोटी छूट लेने और नए-नए प्रयोगों से हमें कोई परहेज नहीं. ये छूट और प्रयोग धीरे-धीरे कब एक नए चलन का सूत्रपात कर देते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते ये चलन किसी अलग ही मत, संप्रदाय या हमारी श्रद्धा के किसी जबर्दस्त प्रतीक का स्वरूप धारण कर लेते है. इसीलिए अब तक गुमनाम रहे कुछ आराध्य पिछले कुछ वर्षों में अचानक इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि टीवी चैनलों से लेकर सड़कों पर दौड़ती बेशुमार कारों के शीशों तक पर दिख जाते हैं. रातों-रात धरती का सीना फाड़कर प्रकट हो जाने वाले मंदिर-मस्जिद-मजारों और उनके ऊपर दो-चार दिन के भीतर ही ‘अतीव शक्तिसंपन्न, प्राचीन सिद्धपीठ’ का बोर्ड लटक जाने की परंपरा का एक अक्खड़ बनारसी नमूना वरिष्ठ साहित्यकार डॉ काशीनाथ सिंह ने अपने मशहूर उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में कुछ यूं पेश किया है- ‘कंपटीशन शुरू हो गया है जीटी रोड के किनारे मंदिर, मस्जिद, मजार बनाकर जमीन हड़पने का. वे भी हड़प रहे हैं, लेकिन तुम्हारे मुकाबले वे कहीं नहीं हैं. मस्जिद खड़ी करने में तो समय लगता है, यहां तो एक ईंट या पत्थर फेंका, गेरू या सेनुर पोता, फूल-पत्ती चढ़ाया और माथा टेक दिया- जै बजरंग बली. और दो आदमी ढोलक-झाल लेकर बैठ गए- अखंड हरिकीर्तन! भगवान धरती फोड़कर प्रकट भए हैं..’

आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है. इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता. लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है और धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है.’ स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली
मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है.

परंपरागत हिंदू देवी-देवताओं में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की आराधना सबसे ज्यादा होती रही है. इसके अतिरिक्त शिवजी, गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा आदि ऐसे देवी-देवता रहे हैं जिन्हें थोड़ी आसान भाषा में मुख्यधारा के भगवान कहा जा सकता है. तमाम स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ इनकी आराधना का ग्राफ कमोबेश पूरे देश में एक-सा रहता रहा है. किंतु विगत एक दशक के दौरान धर्मालुओं की पूजा-पाठ की शैलियों और व्यवस्थाओं में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. कई अध्ययनों में भी इस तरह की चौंकाने वाली प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं. साथ ही ये तथ्य कुछ और नई और रोचक परिपाटियों के गठन की ओर भी इशारा कर रहे हैं.

शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है

भक्तों की धर्मभीरुता, पीर-पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और इन सबसे ऊपर मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा है. परंपरागत देवी-देवता, भक्तों की संख्या और आराधना के मामले मे पीछे छूटते जा रहे हैं और मुख्य रूप से आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं – शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और जगह-जगह दिखने वालीं विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें. यहां पहले तीन तो आस्था के एक प्रकार से निश्चित रंग-रूप, हानि-लाभ और पूजा-पद्धतियों वाले प्रतीक हैं लेकिन मजारों के मामले में ऐसा नहीं है. घड़ी वाले से लेकर मटके वाले पीर तक की मजारें इस देश के अमूमन हर हिस्से में फैली हुई हैं. ये अलग-अलग लोगों की मजारें है, जिनके संदेश-उपदेश, और जियारत के तौर-तरीके एक-दूसरे के जैसे होते हुए भी अलग हो सकते हैं. मसलन हर जगह मजारों पर चादर तो चढ़ाई जाती है लेकिन इसके साथ कहीं पर घड़ी और कही मटका चढ़ाने का चलन भी है.

इस श्रेणी के धार्मिक प्रतीकों को अगर एक दर्जे में रखकर देखें तो इनकी शरण में आने वालों की संख्या बड़े-बड़े देवी-देवताओं के भक्तों को मात दे सकती है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दरगाहों-मजारों की प्रतिष्ठा और हिंदू धर्म के नये-नये देवताओं के अचानक ही चलन में आने की क्या वजह हो सकती है? इस सवाल पर स्वामी अग्निवेश की राय है, ‘वक्त-वक्त पर लोग नए-नए प्रतीक गढ़ते हैं, फिर उनका भय दिखाकर लोगों का भयादोहन किया जाता है. धीरे-धीरे जब उनका असर कम होता है, तब यह तबका किसी नए प्रतीक को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाता है.’

महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके न तो क्रोध की कोई सीमा थी और न ही कृपा का कोई पारावार. आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है. एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है. एसी नेल्सन के एक सर्वे के मुताबिक शनिदेव ने देवताओं की लोकप्रियता सूची के सभी पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है. वे बाकी तमाम देवी-देवताओं के साथ ही साईंबाबा और भैरवनाथ जैसे भक्तप्रिय अाराध्यों को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. जहां परंपरागत देवी देवताओं की भक्ति के पीछे भक्तों की श्रद्धा काम कर रही होती है वहीं शनि भक्ति की लहर आने की मुख्य वजह है उनके प्रकोप से खुद को बचाने की मुराद और साथ ही उनकी कृपा से खुद को धनधान्य से भरपूर बनाने की लालसा. वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है. और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं. इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, भैरव आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं.’ लोग शनिदेव के दर्शन तो करने जाते हैं पर उनसे नजरें चुराते हुए. शनिभक्ति की लहर शिंगणापुर से निकलकर भोपाल-दिल्ली के  गलीकूचों तक फैल गई है. समय ने शनिदेव के पक्ष में पलटी खाई है और पिछले चार-पांच सालों के दौरान भोपाल में कदम-कदम पर शिंगणापुर वाले शनिदेव प्रकट हो गए हैं. हर नुक्कड़-बस्ती में उनके मंदिर दिख जाते हैं और शनिदेव की आस्था की लहर में हजारों एकड़ जमीन तमाम नियम कानूनों को धता बताकर शनिदेव को समर्पित हो गई है.

आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगीअगर इस तथ्य पर सावधानी से निगाह डालें तो हम पाएंगे कि शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है. टीवी के इस विस्तार के साथ दाती मदन महाराज, आसाराम बापू, स्वामी रामदेव जैसे धर्म गुरुओं और संतों की पहुंच भी घर-घर में बढ़ी है. शनिदेव की बढ़ती लोकप्रियता में सबसे बड़ा योगदान हिंदी के एक बड़े ‘समाचार’ चैनल इंडिया टीवी और शनिदेव के परमभक्त दाती मदन महाराज का है. दाती महाराज शनिदेव की लोकप्रियता को अलग कोण से देखते हैं, ‘शनि शत्रु है, अमंगलकारी है, दुखदायी है, ये सब भ्रांतियां थी. अब समाज से भ्रम और भ्रांति का पर्दा उठा है तो लोगों को सच्चाई का अहसास हो गया है. मैं तो साधनमात्र था. टेलीविज़न ने मुझे आपसे जुड़ने का सुअवसर मुहैया कराया तो चुनौती थोड़ी आसान हो गई.’

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे टीवी इवेंजलिस्म की संज्ञा देते हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका में हुई थी. उनका मत है, ‘जिस भी समाज में टीवी का विस्तार हुआ वहां धार्मिकता का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है. अमेरिका में अकेले ईसाइयत के अलग-अलग पंथों के कम से कम पचास धार्मिक चैनल हैं. भारत में भी टीवी के विस्तार ने इस दुर्गुण को अपना लिया है. चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने धार्मिकता को बढ़ाया है और लोगों को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है.’

समय-समय पर देश के लोकप्रिय माध्यमों ने भी देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा के संतुलन को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई है. मसलन 70 के दशक में आई बहुचर्चित और सिनेमा की कमाई के आंकड़े की नई इबारत लिखने वाली फिल्म जय संतोषी मां ने घर-घर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा की थी. हर शुक्रवार को संतोषी माता की व्रत कथा की लहर पूरे देश में उमड़ पड़ी थी. संतोषीमाता का अभ्युदय एक निम्न मध्यवर्गीय परिघटना थी. गणेश की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता धन और सुख-समृद्धि की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी. जाहिर-सी बात है जिस तबके को इन साधनों की सबसे अधिक इच्छा थी उन्हीं के बीच संतोषी माता की भक्ति का सागर उमड़ रहा था. कुछ ऐसी ही स्थितियां 80 के दशक में आई राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और गुलशन कुमार के मातारानी के भजनों ने माता वैष्णो देवी के लिए पैदा की थीं. आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगी.
आस्था का यह ज्वार अभी थमा नहीं है, हां कालांतर में इसमें एक और आयाम जुड़ गया – भैरवनाथ. फिर कथा चली कि भैरवनाथ का दर्शन किए बिना वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. भैरवनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी वैष्णो देवी की गुफा से कुछ दूरी पर ही स्थित है.

फिलहाल यही भैरवनाथ शीर्ष गति से बढ़ रहे चार देवताओं में शामिल हो गए हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भैरवनाथ एक तांत्रिक थे जिन्होंने वैष्णो देवी का पीछा करते हुए उस मार्ग की खोज की थी जिसके जरिए आज 13 किलोमीटर लंबी वैष्णो देवी की यात्रा संचालित होती है. कथा यह थी कि वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध करने के साथ ही उन्हें माफ कर दिया था और उन्हें विद्वान की संज्ञा देते हुए अपने जितना ही पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया था. शिव के परम भक्त भैरवनाथ का प्रभाव दो दशक पहले तक देश के विस्तृत मैदानी इलाकों की बजाय हिमालय की पहाड़ियों तक ज्यादा था. अल्मोड़ा में काल भैरव, बटुक भैरव, भाल भैरव, शैव भैरव, आनंद भैरव, गौर भैरव और खटकूनियां नाम के आठ प्राचीन भैरव मंदिरों का अस्तित्व रहा है और लोगों के पास इनकी महिमा की अनगिनत दंतकथाएं भी बताने को हैं. लेकिन वैष्णो देवी के प्रसार के साथ ही भैरवनाथ का दायरा भी दुर्गम पहाड़ियों से निकल कर समतल मैदानों में फैल गया. दिल्ली में पुराने किले के पास स्थित मशहूर भैरव मंदिर है जहां चढ़ावे के रूप में शराब चढ़ाने की परंपरा है. इतना ही प्रसिद्ध और भीड़भाड़ से भरा और खुद को पांडव कालीन बताने वाला भैरव मंदिर दिल्ली के वीआईपी इलाके चाणक्यपुरी में भी स्थित है. यह अलग बात है कि भक्तों को इसका ज्ञान महज़ दशक भर पहले हुआ है. इस मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प दास्तान वहां पिछले दस सालों से बिना नागा दर्शन करने आने वाली एक भक्त सरोज शर्मा सुनाती हैं- ‘दस साल पहले तक यहां इक्का दुक्का ही कभी कोई दर्शन के लिए आता था. हम यहां आते थे और घंटों तक शांति से बैठ कर ध्यान-मग्न रहते थे. मंदिर के पुजारी अक्सर बातचीत के दौरान निराश होकर कहा करते थे, ‘बहनजी क्या कभी हमारे मंदिर में भी पुराने किले वाले भैरव बाबा के जैसी रौनक होगी?’ आखिर भैरव बाबा ने उनकी सुनी और आजकल चाणक्यपुरी का भैरव मंदिर हर रविवार वैसे ही गुलजार रहता है जैसे पुराने किले के पीछे वाले किलकारी भैरव महाराज.
लखनऊ के अमीनाबाद में स्थित बटुक भैरव मंदिर भी खुद के प्राचीन होने का दावा करता है. मगर यहां के महंत श्याम किशोर गिरि नितांत व्यावहारिक नजरिया रखते हैं- ‘मंदिर तो करीब सात सदी पुराना है लेकिन यहां लोगों की विशाल भीड़ पिछले सात-आठ सालों से आनी शुरू हुई है. यहां पंद्रह आने दुखी लोग आते हैं और सिर्फ एक आना भक्त आते हैं.’

सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा में भी भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा आज तक किसी को पता नहीं चल सकी है

भैरवनाथ की श्रद्धा के पीछे भी वही मानसिकता देखने को मिलती हैं जो कि शनिदेव के भक्तों की है. दंतकथा के मुताबिक अपने जीवन काल में भैरवनाथ एक अड़ियल गुस्सैल सिद्ध तांत्रिक थे. उन्होंने वैष्णो देवी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी. लेकिन लगे हाथ भैरवनाथ उतने ही पहुंचे हुए ज्ञानी भी थे. तमाम काली सिद्धियों पर उनका एकाधिकार था और उनके अनुयायियों पर कोई कुदृष्टि कभी हावी नहीं होने पाती थी. भैरवनाथ की आस्था और प्रभाव का एक जीता-जागता नमूना हाल ही में कश्मीर घाटी में देखने को मिला जहां सालों पहले पलायन कर गए हिंदुओं के बंद पड़े भैरव मंदिर को वहां के मुसलमानों ने दोबारा से खुलवाकर उन्हें कश्मीरी पंडितों के हवाले कर दिया.

कुछ साल पहले तक साईंबाबा का जिक्र आते ही लोग सीधे शिरडी का ध्यान करते थे. शिरडी में स्थित साईमंदिर की महिमा के तमाम किस्से सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं. साईंबाबा काफी कुछ भारत में सदियों से चली आ रही रमता जोगी और बहता पानी वाली पंरपरा की ही एक कड़ी थे. फक्कड़पना उनके स्वभाव में था, संतई और ईमानदारी उनके चरित्र के गुण थे और लोगों को सत्संगत की सीख देना उनकी विशेषता थी. इस परंपरा से जुड़ी तमाम दूसरी दास्तानंे भी देश के अन्य हिस्सों में देखने सुनने को मिल जाती हैं मसलन कबीर या फिर देश भर में जगह-जगह फैली पीरों की दरगाह और मजारें. समय बीतने के साथ किस तरह से इनके दामन से चमत्कारवाद जुड़ जाता है यह बात किसी पीएचडी छात्र के लिए शोध का बढ़िया विषय हो सकती है. पहले इस परंपरा के साथ एक सुंदर प्रवृत्ति का घालमेल भी देखने को मिलता था जिसे सही मायनों में गंगा जमुनी तहजीब कहा जा सकता था – इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थे – पर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है. कुछेक दशकों के दौरान देश भर में अस्सी हजार के करीब साईं मंदिर अस्तित्व में आ गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है. दिल्ली स्थित मशहूर इस्कॉन मंदिर के ठीक सामने साई बाबा का नया मंदिर बना है. सुबह-शाम आरती होती है और महीने में दो दिन साईं बाबा की गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में फैलाव के साथ-साथ इसकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे भटकाव आता गया है जिसके साथ ही शिरडी और देश के दूसरे हिस्सों में बने साईं मंदिरो में मुसलमानों की भागीदारी भी धीरे-धीरे खत्म हो गई है. उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है, पौराणिक हिंदू देवी देवताओं की भांति ही फूल-माला, धूप-बत्ती से सराबोर साईं मंदिर अपने मूल स्वरूप से ही भटक गए से लगते हैं. शिरडी साईं संस्थानम ट्रस्ट के चेयरमैन जयंत ससाने मुसलमानों की साईं से दूरी की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उनके पास इसकी वजह भी बताने को है- ‘मुसलमान साईं से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साईं की मूर्ति से परेशानी होती है. यह इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है. इसके चलते साईं भक्तों में मुस्लिमों की संख्या घटी है.’ साईं संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साईं मंदिरों के पुजारियों के लिए एक 15 दिन के ट्रेनिंग कार्यक्रम की व्यवस्था की है. शिरडी स्थित साईं धाम में इन लोगों के प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके. जिस पथ के पुजारी साईं बाबा थे उसी की अगली कड़ी के तौर पर हम देश भर में प्रचलित दरगाहों-मजारों को रख सकते हैं. देश का कोई भी इलाका नहीं होगा जहां दरगाहों मजारों पर शीश नवाने वाले हिंदू श्रद्धालु न हों.

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, नई दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन ऑलिया और फतेहपुर सीकरी की शेख सलीम चिश्ती  की दरगाह जैसी मिसालों को छोड़ दिया जाए तो काफी दरगाहों और मजारों पर शीश नवाने वाले जियारतमंदों को उनके अतीत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता है. सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा भी कायम है जिसमें भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा किसी को पता नहीं होती. लखनऊ के खम्मन पीर दरगाह में  मन्नत मांगने आए मोहित मिश्रा से जब तहलका ने दरगाह की महिमा और खम्मन पीर की श्रद्धा के बारे में जानने की कोशिश की तो एक रोचक कारण सामने आया. मोहित ने बताया, ‘जब आपके काम नहीं बन रहे होते हैं तब आप मजहब की सीमाओं को पार कर जाते हैं.’

काफी हद तक वाचिक परंपरा या किस्सागोई की आदत की तरह महिमा की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं. स्वाभाविक है व्यक्ति दर व्यक्ति कहानियां परिष्कृत होती जाती हैं और समयातंर में एक बिल्कुल नई  कहानी सामने आती है जिसमें चमत्कार, भय, आस्था, अपूर्ण इच्छा जैसे नवरसों का मिश्रण होता है.

किस तरह से कोई मजार समय के साथ सर्वशक्तिसंपन्न और हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली पीठ बन जाती है इसकी एक दिलचस्प बानगी भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत में है. एक वेश्या रतना जो कि उपन्यास की नायिका भी है, को एक बच्चे की लंबे समय से चाह है. एक दिन पुलिस से भागा हुआ भूरा उसके पास आता है जिसके संसर्ग में आने से रतना की यह मुराद पूरी हो जाती है. शराबी भूरा के देहांत के बाद रतना उसकी पक्की  कब्र बनवा देती हैै. दो साल बाद कोई शरारतन कब्र के ऊपर ‘भूरा पीर की मजार’ लिख देता है और  कुछ ही दिनों में वहां संतान की इच्छा रखने वाले जोड़े मन्नतें मांगने के लिए आने लग जाते हैं. इस कब्र पर जो बोर्ड लगा होता है उपन्यास में उसका जिक्र भी बड़ा दिलचस्प है.

दरगाह-ए -बाबा भूरा पीर.
सालाना उर्स- रबीउल अव्वल (जून की 25 तारीख)
भंडारा- हर महीने के अंतिम दिन
खादिम – मोहम्मद अमीन
‘यहां मर्द और औरत दोनों का शर्तिया इलाज होता है’
खुद मोरवाल के शब्दों में, ‘उपन्यास का यह दृष्टांत मेरे निजी अनुभव पर आधारित है. जब मैं लिखने के सिलसिले में उस इलाके में शोध कर रहा था तब मुझे इस घटना के बारे में पता चला. मैंने जाकर देखा तो वहां उस मजार पर अगरबत्तियां जल रही थीं.’
स्वामी अग्निवेश धर्म के इस विकृत स्वरूप के विस्तार के लिए समाज में आते जा रहे दुर्गुणों की बात करते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म के प्रति अंध रुझान की जड़ें वर्तमान समाज में बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार, गंदगी और अनैतिक क्रिया कलापों से जुड़ी हुई हैं. जब समाज गलत चीजों में लगा होगा तो स्वाभाविक है कि उसके अंदर एक तरह का भय, असुरक्षा और ग्लानिबोध रहता है. इस ग्लानिबोध से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति धर्म के चमत्कारिक पहलू की ओर झुकता चला जाता है.’

देखते ही देखते अनजानी मजारों और दरगाहों के साथ लोग दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण, हर कामना की पूर्ति करने वाली, संतानहीनों को संतान और बेटी वालों को बेटे देने वाली जैसे विशेषण जोड़ते चले जाते हैं. एटा में सय्यद वाली गली के पीर से लेकर लखनऊ में लबे चारबाग रेलवे स्टेशन स्थित खम्मन पीर बाबा की मजार, दिल्ली में पुराने किले के पास दरगाह-ए-अबू बकर तूसी उर्फ मटके वाले पीर की दरगाह और हरियाणा के मलेरकोटला वाले पीर के आश्रम तक पूरे देश में दरगाहों की ऐसी ही एक अनवरत श्रृंखला देखी जा सकती है.
नई दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित मटके वाले पीर की दरगाह पर सालों से मटका चढ़ाने के लिए चांदनी चौक से यहां आने वाले साड़ियों के व्यापारी ईश्वरचंद गुप्ता को पीर के इतिहास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है. पूछने पर वे बस इतना ही बता पाते हैं कि किसी ने उनसे यहां मन्नत मानने के लिए कहा था. संयोग से उनकी मन्नत पूरी हो गई और गुप्ता जी की श्रद्धा भी अटल हो गई. उनके मुताबिक, ‘अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा तो हम बचपन से ही करते चले आ रहे थे. इसके बाद भी हमारी मुश्किलें जब दूर नहीं हो रही थीं तो फिर पीर की मजार को आजमाने में क्या बुराई थी. मेरे तमाम परिचितों को यहां मुंहमांगी मुराद मिल चुकी है.’
साधकों की इस प्रकार की निष्ठा के पीछे विशिष्ट भूमिका होती है अंधश्रद्धा और तर्कवितर्क की क्षमता के अभाव की. पर इसकी अच्छाई की बात करें तो इन दरगाहों-मजारों पर शीश नवाने वालों में हिंदू-मुसलमान समान संख्या में होते हैं जो मौजूदा संवेदनशील, अस्थिर भारतीय समाज के नजरिए से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. यह अलग बात है कि एक बृहस्पतिवार को दरगाहों पर एक साथ सिर झुकाने वाले अगले शुक्रवार और मंगलवार को ही किसी मौलाना की तकरीर और पंडित के प्रवचन को गांठ बांधकर एक दूसरे को ललकारने से नहीं हिचकते.

अवध और लखनऊ के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ योगेश प्रवीण इस चलन को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटकर देखते हैं- ‘भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है जबकि वही भक्त जब किसी मजार पर जाता है तो उसके मन में कोई न कोई मुराद होती है.’ इन मजारों में भी मस्ती, सूफियाना फक्कड़पन जैसी शानदार हिंदुस्तानी परंपरा धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है. लोग धर्म के कट्टरवादी स्वरूप की तरफ जाने-अनजाने बढ़े जा रहे हैं.

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे धार्मिक समूहों की मन:स्थिति में व्याप्त आत्मविश्वास की कमी से जोड़कर देखते हैं, ‘मस्ती और फक्कड़पना जो कबीर की विशेषता थी, असल में समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी हुई चीज है. जब समाज में आत्मविश्वास की कमी होती है, असुरक्षा की भावना बढ़ती है तब वह इन चीजों से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद जैसी चीजों की तरफ चला जाता है. यह बात आज समाज के हर पहलू से जुड़ गई है चाहे वो पढ़ाई-लिखाई हो, रोजी रोटी हो नौकरी हो या फिर कुछ और.’

अच्छाइयों और बुराइयों की तुलना से इतर एक जरूरी प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में धर्म का स्वरूप समय सापेक्ष और परिवर्तनीय ही है तो आने वाले समय में भारत में इसका नया स्वरूप क्या उभरेगा? यह कबीर, कंबन, तुलसी, अकबर, विवेकानंद और गांधी के विचारों का सुंदर मिश्रण बनकर उभरेगा या तालिबानी तर्ज का कट्टरवादी प्रतीक या फिर आधुनिकता से ओत-प्रोत पूरी तरह अमेरिकी-यूरोपीय समाज की शक्ल ले लेगा?        

वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों. हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक आलोचना की जा सकती है. बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने?                    

(हिमांशु बाजपेयी के योगदान के साथ)                

राजनीति की फिल्मी नियति

एक रोचक संयोग है. हिंदी फिल्मों के सितारों का राजनीति में अक्सर जो हश्र होता है, वही बॉलीवुड (और मुंबइया फिल्म उद्योग को ‘बॉलीवुड’ कहने के अपने राजनीतिक खतरे हैं) में राजनीतिक विषयों का होता है. मतलब यह है कि यदि आप इस देश के लोगों के लिए, जिनके लिए फिल्म और क्रिकेट के साथ राजनीति की बहसें दैनिक खुराक का हिस्सा हैं, एक कमाल के राजनीतिक विषय पर जबर्दस्त तनाव भरी फिल्म बनाना चाहते हैं तो आपको हिंदी फिल्मों का इतिहास पढ़ ही लेना चाहिए.

आपके पास सितारे, आक्रोश और स्टाइलिश हिंसा हो तो आपकी आवाज जनता जरूर सुनेगी

प्रकाश झा, जिनकी पहली फिल्म ‘दामुल’ से अभी रिलीज होने वाली ‘राजनीति’ तक हर फिल्म में समाज का राजनीति से संवाद रहा ही है, कहते हैं कि वे इसे पढ़े बिना मैदान में उतरे हैं. वैसे शायद वे बिना पढ़े पार उतर जाएं क्योंकि बॉक्स ऑफिस पर चलने वाली गिनी-चुनी राजनीतिक फिल्मों में एक-चौथाई तो उनका हिस्सा है ही. इसकी एक वजह यह भी है कि उनकी फिल्मों की गंभीरता ने कहानी में से मसाले को ज्यादा कम नहीं किया है. वे बिहार के अपने ‘कंफर्ट जोन’ से बाहर नहीं निकलते, उनके पास स्टार होते हैं और स्पष्ट दिखने वाला गुस्सा उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ वाली फिल्मों की तरह लोकप्रिय बनाता है. आपके पास सितारे, आक्रोश और स्टाइलिश हिंसा हो तो आपकी आवाज जनता जरूर सुनेगी.  ‘गंगाजल’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘शूल’ समेत ऐसी अनेक फिल्में रहीं जिनमें एक अकेला व्यक्ति (अधिकांशत: ईमानदार पुलिस अफसर) उसे कुचल डालने पर आमादा राजनीतिक तंत्र के विरुद्ध लड़ा और जीता भी. जिस कानून ने पहले हिस्से में उसके हाथ बांधे, उसी को तोड़कर उसने भ्रष्ट नेताओं की हत्या की. चलने वाली सब फिल्मों की खासियत यह रही कि उन्होंने अपने समय के बहुमत की आवाज ही पुष्ट की. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ 1988 में आती और ‘तेजाब’ 2006 में तो शायद दोनों की नियति कुछ अलग होती.

विषय राजनीति न हो, लेकिन फिर भी आपसे पॉलिटिकली करेक्ट होने की उम्मीद करना इतना ज्यादा भी नहीं है. लेकिन हमारे ज्यादातर निर्देशक इतना रहम भी नहीं खाते. उनके कई सकारात्मक चरित्र भी अक्सर दोमुंहे होते हैं. लेकिन कुछ फिल्मकार ऐसे भी हैं जो अपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदेश को लेकर लगातार सजग रहे हैं. जैसे मणिरत्नम ने ‘रोजा’, ‘बॉम्बे’ और ‘दिल से’ में प्रेम कहानियां कही हैं लेकिन उनके भीतर की परत में वे स्पष्ट रूप से जानते हैं और बताते भी हैं कि सांप्रदायिकता और कश्मीर पर उनकी राय क्या है. उनकी ‘युवा’ भी एक तरफ खड़े होकर उस पार की व्यवस्था को गाली देने की बजाय हर तरफ जाकर चीर-फाड़ करती है. इसी तरह गुलजार की ‘आंधी’, ‘माचिस’ और ‘हुतूतू’ यूं तो प्रेम-कहानियां ही हैं, लेकिन वे उस जमीन की बात करती हैं जिसमें पड़ रही दरारें उसके किरदारों की जिंदगियां तोड़ रही हैं. श्याम बेनेगल भी अपने संदेशों को लेकर सचेत रहे हैं. अपनी पिछली दो फिल्मों ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ और ‘वेल डन अब्बा’ में वे एक नए अंदाज में सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य करते हैं. व्यंग्य आपको निरीह भी नहीं होने देता और दर्शक देता है. इसी तरह सुधीर मिश्रा की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ अमीर युवाओं के आदर्शवाद और जमीनी हकीकत की टक्कर के बीच की दुविधा के बीच में से सिर्फ प्रेम करने वाला नायक निकालकर लाती है. इसका ‘विक्रम मल्होत्रा’ यूं तो अपने नाम की वजह से ही बॉलीवुड का पसंदीदा नायक रहा है लेकिन इस खास फिल्म में सुधीर उसके लिए अपने विद्रोही लगने वाले नायक को खलनायक बनाते हैं. वे उस क्रांतिकारी के खोखलेपन को हराते हैं जिसे क्रांति के विचारों की बजाय उसका नशा सम्मोहित करता है.

बॉलीवुड की मसाला फिल्में नेताओं के दो रूप दिखाती हैं: एक बुरा नेता, जो बेवजह बुरा है और किसी भी हद तक जा सकता है. दूसरा अच्छा, जो ईमानदार है लेकिन राजनीति में फैली गंदगी के कारण मजबूर है. दोनों की ही अक्सर कोई विचारधारा या लक्ष्य नहीं होता. मिश्रा इस बचकाने रूप के पीछे निर्देशकों की बचकानी समझ को दोषी मानते हुए कहते हैं, ‘जो निर्देशक भारत को ही ठीक से नहीं समझते, उनसे आप भारतीय राजनीति समझने की उम्मीद कैसे करें?’

हमारे पास विभाजन, आजादी, आपातकाल, सांप्रदायिकता और आतंकवाद जैसे सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे हैं, लेकिन आखिरी दो पर ही ज्यादा फिल्में बनी हैं. उनमें भी संतुलित और ईमानदार कम, उग्र और विध्वंसक ज्यादा. विभाजन पर बनी ‘गरम हवा’ के आखिरी दृश्य में फारुख शेख बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन कर रहे युवाओं के एक जुलूस में शामिल हो जाते हैं. कुछ वैसा ही जुलूस, जिसके नेता ‘युवा’ के अजय देवगन हैं और जिसके भ्रम में ‘गुलाल’ में राजस्थान की एक यूनिवर्सिटी में वकालत पढ़ने आया दिलीप अपना सब-कुछ खो बैठता है. ‘गुलाल’ किसी भी समय की कहानी नहीं है, फिर भी हमारे समय की सबसे डार्क राजनीतिक फिल्मों में से एक है. उसमें पीयूष मिश्रा का पागल होना आदर्शों के स्वाहा हो जाने के सबसे अच्छे बिंबों में से एक है. दिलीप चुनाव जीतता है लेकिन उसका ‘युवा’ के अजय देवगन की तरह फिल्म के आखिरी दृश्य में विधानसभा स्वागत नहीं करती. न ही वह ‘हासिल’ के जिमी शेरगिल की तरह दलदल में से जीवित बचकर अपने प्यार को पा लेता है. राजनीति उसे बदलाव के सुनहरे मौके नहीं देती बल्कि अंधे कुएं में धक्का दे देती है. यही हाल ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ के शाइनी आहूजा का होता है.

हमें शायद फिल्मों में ही नहीं, राजनीति में भी इन नायकों की नियति बदलनी है. ‘नायक’ के अनिल कपूर का जीतना तो फिल्मी लगता है, लेकिन कब हम अपनी रियलिस्टिक कहानियों के अंत में ‘गुलाल’ के दिलीप को किसी छायादार पेड़ के नीचे बैठकर शांति से गिटार बजाते देख पाएंगे?  

 

तीरथ के तारनहार

बात उन दिनों की है जब केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन हुआ करते थे. एक बार वे पर्यटन और रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए बनी चार धाम सर्किट योजना की समीक्षा करने बदरीनाथ पहुंचे. वहां उन्हें बताया गया कि कुछ पंडे उनसे मिलना चाहते हैं. ये पंडे जानना चाहते थे कि जगमोहन का पैतृक स्थान कहां है. मगर जगमोहन ने उनमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और कह दिया कि उनका घर दिल्ली है. मगर पंडों ने आग्रह किया कि वे पाकिस्तान स्थित अपने मूल क्षेत्र का नाम बताएं. झिझकते हुए जब जगमोहन ने  प्रांत और जिले का नाम बताया तो पंडों की भीड़ छंट गई. सिर्फ एक दुबला-पतला युवक ही वहां खड़ा रहा जिसका कहना था कि उस जिले का पंडा वह है. बाद में जब उस युवा पंडे ने जगमोहन को उनके पैतृक गांव के लोगों के बारे में भी बताना शुरू किया तो वे हैरान रह गए. इसके बाद उन्होंने भी खुद पंडे की बही में अपनी बदरीनाथ यात्रा का विवरण दर्ज किया.

इतने कठिन समय में भी अगर लोग इस यात्रा पर जाने का साहस जुटा लेते थे तो इसमें उनकी श्रद्धा के साथ बदरी-केदार के तीर्थ पुरोहितों यानी पंडों का भी अहम योगदान थायह एक छोटा-सा उदाहरण है जो बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे महत्वपूर्ण तीर्थों  की यात्रा में यहां के तीर्थपुरोहितों यानी पंडों की भूमिका और उनके योगदान के बारे में बताता है. मीडिया और तकनीक के इस युग में आज हर तरह की जानकारी और सुविधा सुलभ है. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब स्थितियां इसके उलट थीं. जानकारी और सुविधाएं नहीं के बराबर थीं और बदरी-केदार की यात्रा इतनी दुष्कर और खतरों से भरी हुआ करती थी कि जाने वाले अक्सर कहते थे कि क्या पता अब मिलना हो न हो. इतने कठिन समय में भी अगर लोग इस यात्रा पर जाने का साहस जुटा लेते थे तो इसमें उनकी श्रद्धा के साथ बदरी-केदार के तीर्थ-पुरोहितों यानी पंडों का भी अहम योगदान था. आज भी ऐसे यात्रियों की संख्या बहुत है जिन्हें दूसरी किसी भी व्यवस्था की तुलना में अपने पंडों पर ज्यादा भरोसा है.

बदरी-केदार के कपाट छह महीने ही यात्रा के लिए खुलते हैं. सर्दियों में विकट भौगोलिक परिस्थितियों और पौराणिक मान्यताओं के कारण इन्हें बंद रखा जाता है. सड़क मार्ग न होने के कारण मोक्ष धाम बदरीनाथ (ऊंचाई 3,133 मीटर) और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ (3,680 मीटर) तक पहुंचना पहले बहुत टेढ़ी खीर हुआ करता था. चीन के हमले के बाद, वर्ष 1965 में बदरीनाथ तक सड़क मार्ग पहुंचाना सरकार की मजबूरी हो गई. हालांकि केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आज भी गौरीकुंड से 14 किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर जाना पड़ता है. यात्रा की मुश्किलों और सुविधाओं के अभाव के कारण उन दिनों यात्री भी कम संख्या में आते थे. प्रसिद्ध घुम्मकड़ राहुल सांकृत्यायन 17  मई 1951 को बदरीनाथ पहुंचे थे. यहां उन्होंने तीन दिन प्रवास किया. अपने यात्रा विवरण में वे लिखते हैं, ‘मंदिर के आसपास के कुछ मकानों को छोड़कर बदरीपुरी में कच्चे मकान ही हैं. इन्हीं झोपड़ियों में छह महीने के यात्रा काल में आने वाले कुछ हजार यात्री ठहरते हैं.’

श्री बदरीनाथ पंडा पंचायत के अध्यक्ष मुकेश भट्ट ‘प्रयागवाल’ बताते हैं, ‘सौ साल पहले तो परिस्थितियां और भी दुष्कर थीं. ऋषिकेश से आगे कहीं भी सड़क मार्ग नहीं थे.’ जानकार बताते हैं कि उस समय पैदल यात्रा चट्टी व्यवस्था के भरोसे चलती थी. चट्टी यानी वह जगह जहां पर  आस-पास के गांवों के लोग यात्रियों को राशन और चौका-बर्तन उपलब्ध कराते थे. हर 5 मील पर कम से कम एक चट्टी होती थी. ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ तक की यात्रा में 46 चट्टियां पड़ती थीं. तब यात्रा पर भी ज्यादातर बुजुर्ग लोग ही आते थे. प्रयागवाल बताते हैं, ‘उस कठिन समय में भी तीर्थ-पुरोहितों ने हिमालय के इन दुर्गम तीर्थों की यात्रा करने के लिए श्रद्धालुओं को तैयार किया.’

श्री केदार पंडा पंचायत के तीर्थपुरोहित श्रीनिवास पोस्ती तथा प्रयागवाल का दावा है कि उत्तराखंड में तीर्थपुरोहित परंपरा आदिगुरु शंकराचार्य की बदरी-केदार यात्रा के समय से ही शुरू हो गई थी. पोस्ती बताते हैं कि केदारखंड में भी बदरीकाश्रम निवासी धर्मदत्त नामक ब्राह्मण के अवंति नगर जाकर चंद्रगुप्त नामक वैश्य को यात्रा पर आने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है. बदरी-केदार  के पंडों की बहियों में लगभग दो सौ साल पुराने यजमानों के यात्रा विवरण उपलब्ध हैं. पोस्ती कहते हैं, ‘पहले यात्री बदरीनाथ तथा केदारनाथ की यात्रा पर बहुत कम संख्या में आते थे इसलिए उनकी जानकारी मौखिक रुप से ही रहती थी. बाद में जब संख्या बढ़ने लगी और शिक्षा का प्रसार होने लगा तो  यात्रियों के नाम बहियों में दर्ज किए जाने लगे.’ आज यहां आने वाले लोग जब अपने पुरखों द्वारा अंकित साक्ष्यों को देखते हैं तो उन्हें हैरानी के साथ-साथ गौरव का भी अनुभव होता है. इस तरह यहां आने वाला व्यक्ति स्वयं ही इस परंपरा से जुड़ जाता है.

बदरीनाथ पंडा पंचायत के महासचिव रहे मुकेश अल्खानियां अपने यजमान रायबहादूर कस्तूर चंद समीर चंद डागर के अभिलेखों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘दो सौ साल पहले इसी परिवार ने बदरीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था तथा तप्त कुंड से लेकर मंदिर तक की सीढियां भी बनवाई थीं.’ बदरी-केदार के पंडों के पास राजा-महाराजाओं की दी सनदें और ताम्र पत्र भी मिलते हैं.

बदरी-केदार के कपाट बंद होने के बाद भी पंडों का यजमानों से संपर्क नहीं टूटता. श्रीनिवास पोस्ती बताते हैं, ‘सर्दियों में ये तीर्थपुरोहित देश भर में अपनी-अपनी यजमानी के क्षेत्रों में जाते हैं. भौगोलिक रूप से दुष्कर तीर्थों में हुई सेवा-सत्कार से कृतज्ञ यजमान अपने घरों में इन तीर्थपुरोहितों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं. तीर्थपुरोहितों के अपने यजमानों के साथ आत्मीय पारिवारिक संबंध होते हैं इसलिए तीर्थपुरोहित अपने रिश्तेदारों से अधिक अपने यजमानों के सुख-दुख में सम्मिलित होते हैं. शीतकाल की इन यात्राओं सेे पंडों और यजमानों के पुराने संबंधों में एक नया पहलू तो जुड़ता ही है उस क्षेत्र के अन्य श्रद्धालुओं को भी बदरी-केदार यात्रा पर आने का संबल और प्रेरणा  मिलती है. तीर्थपुरोहितों का मानना है कि सदियों से अनवरत चली आ रही इस परंपरा का ही परिणाम है कि पहले संैकड़ों की संख्या में आने वाले यात्रियों की संख्या समय बीतने के साथ लाखों में पहुंच गई है.

तिब्बत सीमा के पास चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम में उत्तराखंड और नेपाल के पंडे चमोली जिले के डिमरी जाति के हैं. बाकी सारे भारत के तीर्थपुरोहित बदरीनाथ से लगभग 250 किमी नीचे देवप्रयाग कस्बे के आसपास स्थित टिहरी और पौड़ी जिले के 20-25 गांवों के निवासी हैं. केदारनाथ (रुद्रप्रयाग जिला) के पंडे  जाड़ों में मंदिर के कपाट बंद होने पर वहां से 60-70 किमी नीचे आकर ऊखीमठ और गुप्तकाशी के पास के गांवों में रहते हैं. 
बदरी तथा केदार दोनों तीर्थों के पुरोहितों के तीर्थ कृत्य भी अलग-अलग हैं. बदरीनाथ के पंडे तप्त कुंड व पंच शिला पूजन कराकर जाते समय यात्रियों को सुफल आशीर्वाद देते हैं तो केदारनाथ के तीर्थपुरोहित यात्रियों के पूर्वजों के पिंड भरते हैं मंदिर के भीतर संकल्प पूजा कराते हैं और सावन के महीने यात्रियों द्वारा संकल्पित ब्रह्म कमल के पुष्पों को केदारनाथ मंदिर के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं. पिछले साल राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल बदरीनाथ यात्रा पर आई थीं. उनके तीर्थ पुरोहित प प्रकाश नारायण बाबुलकर ‘शास्त्री’ बताते हैं, ‘महामहिम ने सभी धार्मिक कार्य श्रद्धापूर्वक संपन्न कराए.’

प्रतिष्ठित यात्रियों का आना भले ही सम्मानजनक हो परंतु बदरी-केदार के ये तीर्थ पुरोहित अपने सभी यजमानों को समभाव से देखते हैं. पोस्ती बताते हैं, ‘होटल और धर्मशालाओं का किराया देने में असमर्थ गरीब यात्रियों को तीर्थपुरोहित अपने घरों में ठहराते हैं. यात्रियों को वापस जाते समय सुफल(यात्रा आर्शीवाद)  देते हुए उनसे यह भी पूछा जाता है कि उनके पास वापस जाने के लिए धन है या नहीं. यात्रियों के पास धनाभाव होने पर पंडे उन्हें वापस जाने कर खर्चा भी देते हैं. बाद में जब इन गरीब किसानों के घरों में धन-धान्य होता है तो ये श्रद्धालु  तीर्थपुरोहितों से लिए गए इस धन को वापस कर देते हैं. पोस्ती बताते हैं कि यात्री को पहचाने बिना भी सारा लेन-देन पीढ़ियों से चले आ रहे आपसी विश्वास पर चलता है.’

इस बारे में एक घटना उल्लेखनीय है. बदरीनाथ के पास 7 साल पहले एक बस दुर्घटना हुई थी. बस में सवार यात्री पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे जिनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. इन गरीब यात्रियों को सबसे पहले मिलने उनका पंडा ही आया. पंडे को देखते ही यात्रियों में जान आ गई. हालांकि पंडे की भी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी इसलिए उसने उधार लेकर 30,000 रुपए का बंदोबस्त किया और पहले बदरीनाथ अस्पताल में भर्ती घायलों को रजाइयां भेजीं. इसके बाद वह बदरीनाथ से सबसे नजदीक स्थित कस्बे जोशीमठ पहुंचा जहां कुछ और घायल भर्ती थे. फिर वह पंडा एक और कस्बे गोपेश्वर पहुंचा जहां गंभीर रूप से घायल यात्री भर्ती थे और जहां दुर्घटना में मरे यात्रियों का पोस्टमार्टम भी होना था. यात्रियों के परिजनों के आने तक पंडा अन्तिम संस्कार की तैयारी भी कर चुका था. बदरीनाथ के तत्कालीन थाना प्रभारी दिनेश बौंठियाल इस घटना की पुष्टि करते हैं.

दुर्गम हिमालय की यात्रा में अपनेपन का अहसास, तन -मन-धन से सेवा और धार्मिक कार्यों को संपन्न कराने का काम कोई भी ट्रैवल एजेंसी नहीं कर सकती इसीलिए किसी भी माध्यम से बदरी-केदार आने वाला यात्री यहां आकर अपने पंडे से जरूर मिलता है. श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी जगत सिंह बिष्ट कहते हैं, ‘यात्रा को बढ़ावा देने में तीर्थपुरोहितों का सबसे बड़ा योगदान है. परंपरा से बने विश्वास के कारण यात्री बेहिचक अपने तीर्थपुरोहितों की बात पर विश्वास कर नि:संकोच यात्रा करने आते हैं.’

तीर्थपुरोहितों के उपनाम भी उनके यजमानी के क्षेत्रों के नाम से हो जाते हैं. जैसे इलाहाबाद के आस-पास के क्षेत्र के पंडे प्रयागवाल, कंुमायूं के पंडे कूर्मांचली, नेपाल राजपरिवार के पंडे लालमुह्रया और मेरठ के पंडे मेरठवाल के नाम से जाने जाते हैं. देश भर में घूमने वाले पंडे अपने यजमानों के क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, खान-पान और रीति-रिवाजों को उस क्षेत्र के निवासियों से अधिक जानते हैं. देवप्रयाग संस्कृत महाविद्यालय के आचार्य शैलेंद्र कोटियाल ‘शास्त्री’ बताते हैं, ‘तीर्थपुरोहितों के गांवों में मिनी भारत बसता  है.  इन गांवों में भारत की सभी भाषाओं के जानकार मिल जाते हैं.’

शास्त्री आगे बताते हैं कि तीर्थपुरोहित उत्तराखंड जैसे दुर्गम क्षेत्र में पूरे भारत की संस्कृति लाए और सदियों के इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से पहाड़ के दुर्गम इलाकों मंे आर्थिकी का संचार होने के साथ-साथ शिक्षा का प्रसार भी हुआ. वे कहते हैं, ‘100 साल पहले देवप्रयाग मे मुकुंद दैवज्ञ के निर्देशन में संस्कृत व ज्योतिष के संैकड़ों स्तरीय ग्रंथ प्रकाशित हुए. बाद में उनकी परंपरा को उनके शिष्य आचार्य चक्रधर जोशी ने आगे बढ़ाते हुए न केवल प्रकाशन कार्य जारी रखा बल्कि ज्योतिष की तथ्यपरक व वैज्ञानिक जानकारियों के लिए देवप्रयाग में एक वेद्यशाला भी खोली.’ पोस्ती बताते हैं कि केदार के तीर्थपुरोहितों ने भी 200 साल पहले गुप्तकाशी के पास शोणितपुर में संस्कृत पाठशाला खोली जो आज भी शिक्षा के प्रसार में लगी है. देश के अन्य तीर्थों में भले ही तीर्थ पुरोहितों के साथ यात्रियों को कड़वे अनुभव होते हों मगर  बदरी-केदार के तीर्थ पुरोहित अपनी कुछ विशिष्टताओं के कारण आज भी अपने यजमानों के दिलों में बसे हैं.