Home Blog Page 192

हाशिए की आवाजें

समाचार चैनलों खासकर हिंदी चैनलों पर भारतीय समाज की मुख्यधारा के सभी चरित्र किसी-न-किसी रूप में दिख ही जाते हैं- चाहे वे नेता हों या अभिनेता या फिर नायक-नायिकाएं और खलनायक. आजकल मुहावरे की तरह इस्तेमाल होने वाला ‘आम आदमी’ भी वहां दिखता है. तात्पर्य यह कि शायद ही कोई छूटा हो. यहां तक कि भूत-प्रेत, एलियंस और पशु-पक्षियों को भी समाचार चैनलों पर अच्छा-खासा समय मिल जाता है. लेकिन यही बात देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों के बारे में नहीं कही जा सकती. आश्चर्य नहीं कि हमारे ‘सबसे तेज’ से लेकर ‘खबर हर कीमत पर’ देने का दावा करने वाले लगभग एक दर्जन से अधिक चैनलों पर या तो वे बिलकुल नहीं दिखते या फिर कभी-कभार छोटे-मोटे अपराधों में शामिल अपराधियों और कभी सामंती-पुलिसिया उत्पीड़न के निरीह शिकारों की तरह दिख जाते हैं. आदिवासियों को तो वास्तव में एलियंस की तरह ही ट्रीट किया जाता है जो चैनलों पर कभी-कभार किसी दूसरे ग्रह के नागरिक की तरह सुदूर जंगलों में घूमते दिख जाते हैं.

चैनलों पर दलितों-आदिवासियों के चित्रण में एक खास तरह का स्टीरियोटाइप हावी रहता हैजाहिर है कि दलितों-आदिवासियों के चित्रण में एक खास तरह का स्टीरियोटाइप हावी रहता है. समाचार चैनलों पर उन्हें सेलिब्रेटेड ‘आम आदमी’ से भी कई पायदान नीचे गरीबी, भुखमरी, बलात्कार और हिंसा के शिकार निरीह प्राणियों या अपराधियों या फिर सीधे राज्यसत्ता को चुनौती देते बागियों (नक्सलियों/माओवादियों) की तरह पेश किया जाता है. गोया ‘आम आदमियों’ की तरह वे पढ़ते-लिखते नहीं, नौकरी-चाकरी नहीं करते, प्रेम-शादी-विवाह नहीं करते, घूमते-फिरते नहीं, नाचते-गाते नहीं, शापिंग मॉलों में खाते-पीते-खरीदारी नहीं करते और पर्व-त्योहार नहीं मनाते.

ऐसे में, अगर कभी इस स्टीरियोटाइप छवि को तोड़ते हुए इनमें से कोई मायावती या शिबू सोरेन जैसा निकल आए तो चैनलों के लिए वह एक चमत्कार होता है जिसे वे कुछ हैरत, कुछ झिझक और कुछ घृणा के मिले-जुले भाव के साथ दिखाते हैं. चैनलों को देखकर ऐसा लगता है कि वे न सिर्फ दलित-आदिवासी समुदाय के उभरते हुए मध्यवर्ग और उसकी आकांक्षाओं से पूरी तरह से अपरिचित हैं बल्कि उन्हें अपने हक के लिए सजग और लड़ने-मरने को तैयार दलित-आदिवासी भी नहीं दिख रहे. यही कारण है कि हमारे समाचार चैनलों पर दलितों-आदिवासियों की वे बहुरंगी छवियां नहीं दिखाई पड़तीं जो किसी भी जीवंत और अपने सम्मान-पहचान और हकों के लिए लड़ और बढ़ रहे समुदाय की निशानी होती हैं. निश्चय ही, चैनलों पर दलितों-आदिवासियों की वास्तविक छवियों की अनुपस्थिति की एक बड़ी वजह खुद न्यूजरूम में दलित-आदिवासी पत्रकारों-संपादकों की अत्यंत विरल या न के बराबर मौजूदगी है. यह भारतीय समाचार मीडिया के साथ-साथ चैनलों की भी सबसे बड़ी ‘लोकतांत्रिक कमियों’ में से एक है. खुद चैनलों की लच्छेदार भाषा में कहें तो आज़ादी के 63 साल बाद भी हमारे जनसंचार माध्यमों के समाचार कक्षों में देश की कुल आबादी के 23 प्रतिशत हिस्से की भागीदारी 5 प्रतिशत से भी कम है.

क्या चैनलों के न्यूजरूम में दलितों-आदिवासियों की संख्या बढ़ने और उन्हें निर्णय लेने वाले पदों पर बैठाने से उन समुदायों की वास्तविक तस्वीर पेश करने में कोई मदद मिलेगी? जवाब है- हां. इसके बेहतरीन उदाहरण हैं एनडीटीवी-इंडिया के रवीश कुमार. यह कहना गलत नहीं कि वे इस समय हिंदी समाचार चैनलों की छोटी-सी दुनिया में कुछ सबसे संवेदनशील, संजीदा, साहसी और चैनलों की मुख्यधारा से परे हमेशा कुछ नया करने को बेचैन पत्रकारों में से एक हैं. ब्रेकिंग न्यूज धुन पर नाचने वाले पत्रकारों में से नहीं हैं. उनकी पहचान भी है और शक्ति भी. उनकी रिपोर्टों में आप वंचित समुदायों खासकर दलित मध्यम वर्ग और उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं और संघर्षों-उपलब्धियों को मुखरित होते देख सकते हैं. हाल में पंजाब के लुधियाना में दलित समुदाय के बीच नए उभार और उसकी अभिव्यक्ति में जातिसूचक पहचान के साथ बन और बज रहे गीतों पर तैयार रिपोर्ट हो या दलित समुदाय के बीच से खामोशी से उभर रहे उद्योगपति-बिजनेसमैन तबके की कथा, उनकी रिपोर्टें न सिर्फ दलित समुदाय की कशमकश को दर्शाती हैं बल्कि उन्हें मौजूदा दौर में इस समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण आख्यानकर्ताओं (क्रॉनिकलरों) में से एक भी बनाती हं.

वास्तव में, रवीश का होना सिर्फ हिंदी ही नहीं समूची पत्रकारिता के उस ‘लोकतांत्रिक घाटे’ को कुछ हद तक कम करता है जो अपनी इस कमी के कारण खुद से लड़ते, बढ़ते और बदलते भारत की नब्ज को पकड़ पाने में बार-बार नाकामयाब हो रहा है. कहने की जरूरत नहीं कि हमें एक नहीं, ऐसे दर्जनों रवीश कुमारों की जरूरत है. और हां, एक आदिवासी रवीश कुमार की कमी तो बहुत दिनों से खल रही है. कोई सुन रहा है?        

मिस्टर खोखलापन मिसेज खराब एक्टिंग : मिस्टर सिंह/मिसेज मेहता

फिल्म  मिस्टर सिंह/मिसेज मेहता
निर्देशक  प्रवेश भारद्वाज
कलाकार  प्रशांत नारायणन, अरुणा शील्ड्स

नाम बताता है कि यह विवाहेतर संबंधों की कहानी हो सकती है. फिल्म भी कमोबेश यही बताती है. इससे आगे एक भी बात नहीं. फिल्म एक दूसरी चीज यह भी बताती है कि इस विषय पर पहले कहीं बेहतर फिल्में बन चुकी हैं, ज्यादा अच्छी ही नहीं, ज्यादा उत्तेजक भी. आप पहले बीस मिनट में फिल्म का स्तर जान लेते हैं और तब प्रचार के दौरान उड़ी उन अफवाहों को याद करते हैं जिनमें कहा गया है कि सेंसर ने इस फिल्म के कुछ नग्न दृश्यों को धुंधला करवा दिया है. मन बहलाने के लिए आप उन दृश्यों का इंतजार कर सकते हैं लेकिन यकीन मानिए, वे दृश्य भी कोई ‘मनोरंजन’ नहीं देते जिन्होंने हमारे देश में कई शशिलाल नायरों (एक छोटी सी लव स्टोरी) और मल्लिकाओं को प्रसिद्ध और मालामाल कर दिया है (कृपया नैतिकतावादी मुझे माफ करें और ईश्वर प्रवेश भारद्वाज को, जो एक्स्ट्रा-मेरिटल रिश्ते के बाकी सारे पहलुओं को छोड़कर सेक्स पर डेढ़-दो घंटे अटके रहे हैं और उसे भी ठीक से नहीं दिखा पाए हैं).

कहानी के बाद इस फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी नायिका जी हैं. अरुणा शील्ड्स जब बहुत दुखी होने का अभिनय करती हैं तब हॉल में दर्शकों की हंसी छूट पड़ती है. वे शर्माती हैं तो सहमी हुई बच्ची जैसी लगती हैं और बहुत प्यार से प्रशांत नारायणन को गले लगाती हैं तो उनके चेहरे पर ऐसे भाव होते हैं जैसे उनके साथ जबरदस्ती की जा रही हो. उन्हें चाहिए कि कुछ समय तक कैमरे से दूर रहकर एक्टिंग सीखें या म्यूजिक वीडियो करने लगें.

तीसरी समस्या बैकग्राउंड संगीत है जो इस बात की परवाह किए बिना बजता है कि स्क्रीन पर कैसा दृश्य चल रहा है. संगीत और दृश्य एक-दूसरे के पूरक होने की बजाय दुश्मन बन जाते हैं और एकाध अच्छे सीन का भी मजा किरकिरा कर देते हैं.

फिल्म उन सार्थक फिल्मों की श्रेणी में आने की नाकाम कोशिश करती है जो अपना अधिकांश अर्थ दर्शकों की समझ पर छोड़ देती हैं. फिल्म नैतिक-अनैतिक होने के बीच बेवजह डोलती है, लेकिन इतनी भी नहीं कि आप उसके बारे में सोचें. परेशान करना तो दूर, वह आपको खुद से जोड़ने की फिक्र भी नहीं करती और उसी मोड़ पर ठहरी रहती है जहां वह शुरू हुई थी. ‘दस कहानियां’ की सबसे पहली कहानी ‘मेट्रिमनी’ में संजय गुप्ता ने ऐसे ही रिश्ते की जटिलता को सिर्फ पंद्रह मिनट में कहीं ज्यादा रोचक ढंग से दिखा दिया था.

लेकिन किसी भी कीमत पर इस समीक्षा को प्रशांत नारायणन की बहुत सारी प्रशंसा किए बिना खत्म नहीं किया जा सकता. वे हर कमजोर दृश्य में भी (यानी हर दृश्य में) कीचड़ के कमल की तरह चमकते रहते हैं. यह हिंदी फिल्मों की बदकिस्मती है कि वे उनकी प्रतिभा को बार-बार ऐसी आत्माहीन फिल्मों में जाया होने दे रही हैं.

गौरव सोलंकी

क्यों छोड़ी कुमकुम ने कार्बाइड?

यह 1975 की बात है. 22 साल की कुमकुम सक्सेना को यकीन ही नहीं हो रहा था कि उन्हें यूनियन कार्बाइड जैसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई है. भोपाल निवासी और अब अमेरिका में रह रही कुमकुम कहती हैं, ‘मैं हमेशा से किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने का सपना देखती थी. इसलिए इतना बढ़िया मौका मिलने पर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था.’   लेकिन सात साल बीतते-बीतते उनके सपनों की चमक उतरने लगी. संभावित खतरों, नियमों के पालन में लापरवाही और सुरक्षा उपकरणों के प्रति उपेक्षा के बारे में उनकी बार-बार की चेतावनियों ने उन्हें मैनेजमेंट की आंखों की किरकिरी बना दिया. कुमकुम बताती हैं, ‘वे तो सब-कुछ अच्छा ही अच्छा बता रहे थे और मैं सिलिका की धूल और हाइड्रोकार्बन लेवल जैसी चीजों का शोर मचा रही थी. मैं जितना आवाज उठाती, मुझे उतना ही दरकिनार किया जाता. मेरी तनख्वाह नहीं बढ़ाई गई और जल्दी ही मुझे मैनेजमेंट की बैठकों में हिस्सा लेने से भी रोक दिया गया.’ 1982 के आखिर में कुमकुम ने फैसला किया कि अब बहुत हो चुका और उन्होंने कंपनी से इस्तीफा दे दिया.

3 दिसंबर 1984 की रात, कुमकुम ईदगाह पहाड़ी पर बने अपने मकान में बैठी पढ़ रही थीं. अगले दिन उनका न्यूरॉलॉजी का पेपर था. किताब खोले कुछ ही वक्त हुआ था कि फोन की घंटी बजी. दूसरी तरफ से लोग चीखते हुए उनसे कह रहे थे कि फैक्टरी में कैमिकल लीक हो गया है और वे कुछ करें. कुमकुम बताती हैं, ‘मैंने सोचा कि हे भगवान, फिर वही मुसीबत.’ कैमिकल रिसाव की बात सुनना उनके लिए नई बात नहीं था. उन्होंने यूनियन कार्बाइड इसी वजह से जो छोड़ी थी. वे बताती हैं, ‘मैंने कहा कि हवा की उलटी दिशा में भागो, अपने चेहरे को गीले कपड़े से ढक लो ताकि गैस घुल जाए.’

गैस रिसाव की छोटी-मोटी घटनाएं तो हमेशा ही होती रहती थीं. कोई महीना ऐसा नहीं जाता था जब फैक्टरी परिसर में लगा अलार्म सायरन न बजता होलेकिन कुमकुम को अंदाजा नहीं था कि मुसीबत ने इस बार कितना विकराल रूप धारण कर लिया है. फैक्टरी से निकली जहरीली मिथाइल आइसोसायनेट गैस बड़े पैमाने पर हवा में घुल गई थी और लोगों की सांसें उखाड़ रही थी. कुमकुम बताती हैं, ‘गैस इतनी ज्यादा थी कि मेरे घर के बाहर लगे पौधों की पत्तियां तक जल गईं. अगर मैं घबरा गई होती और दरवाजा खोल लिया होता तो मेरी भी जान चली जाती.’लेकिन भोपाल के 20,000 लोग उनके जितने किस्मतवाले नहीं थे. अगली सुबह शहर के लिए सबसे भयानक सुबह थी. लेकिन इस त्रासदी को टाला जा सकता था. कुमकुम कहती हैं, ‘अगर यूनियन कार्बाइड ने लोगों को यह बता दिया होता कि गैस से अपना बचाव कैसे करना है तो असमंजस में इधर-उधर भागने की बजाय हजारों लोग अपने घर के भीतर ही रहते.’

यूनियन कार्बाइड में नौकरी के दौरान कुमकुम हमेशा खतरे से आगाह करती रहीं पर कंपनी ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया. वे बताती हैं कि उनकी नौकरी किसी स्कूल नर्स की तरह थी जहां उन्हें चार बेड वाला एक मेडिकल सेंटर चलाना था और घायल वर्करों का इलाज करना था. अपनी ट्रेनिंग के तहत जब वे फैक्टरी की शोध एवं विकास प्रयोगशालाओं में गईं तो उन्हें पता चला कि फैक्ट्री में बेहद जहरीले रसायन बन रहे हैं. यहीं उन्हें यह भी पता चला कि एक सीमा के बाद इन रसायनों के साथ इनसान का संपर्क उसके लिए घातक हो सकता है. कुमकुम बताती हैं, ‘लेकिन यहां तो यह संपर्क उस हद तक हो रहा था जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता था. सिलिका और हाइड्रोकार्बन का स्तर निर्धारित से ज्यादा था. कभी-कभी तो ऐसा होता था कि गैस रिसाव की समस्या अभी ठीक से हल भी नहीं हुई होती थी और वर्करों को वहां काम करने भेज दिया जाता था.’

 

 कुमकुम सक्सेना 

कुमकुम ने खुद पहल करते हुए नियमित रूप से खून के नमूनों की जांच शुरू की. अक्सर उन्हें चिंताजनक परिणाम मिलते. वे बताती हैं, ‘मैं उन कर्मचारियों को वहां से हटवा देती और तब तक उनका इलाज चलता जब तक उनके खून के नमूने सामान्य नहीं हो जाते.’ वे यह भी कहती हैं कि गैस रिसाव की छोटी-मोटी घटनाएं तो हमेशा ही होती रहती थीं. कोई महीना ऐसा नहीं जाता था जब फैक्टरी में लगा अलार्म सायरन न बजता हो. लेकिन ऐसी घटनाओं को जान-माल का नुकसान हुए बगैर काबू कर लिया जाता था.

लेकिन भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है, इसकी एक अहम चेतावनी 1981 में तब मिली जब गैस रिसाव की ऐसी ही एक घटना में एक व्यक्ति की जान चली गई. अशरफ मुहम्मद नाम का एक वर्कर फॉस्जीन नाम की जहरीली गैस का शिकार हो गया. कुमकुम बताती हैं, ‘हम जब तक कुछ कर पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी.’ इस मौत ने कुमकुम को झकझोर कर रख दिया. उन्हें आशंका थी कि अगर जरूरी कदम फौरन नहीं उठाए गए तो कई लोगों का हश्र अशरफ जैसा हो सकता है. वे कहती हैं, ‘अशरफ की मौत के बाद चेतावनी की घंटी बज जानी चाहिए थी. इस घटना के बाद मैं इस बात पर जोर देती रही कि हमारे पास बड़े पैमाने पर लोगों से इलाका खाली कराने की प्रक्रिया की स्पष्ट योजना होनी चाहिए. किसी खतरनाक फैक्टरी के आसपास रहने वाले लोगों को यह जानने का हक है कि अगर कोई हादसा हो जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए.

लेकिन जैसी कि आशंका थी उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया. कुमकुम को इससे हैरानी नहीं हुई. वे कहती हैं, ‘ऐसे उपाय करने में, जिनसे लोग सुरक्षित रहें, काफी पैसे खर्च होते हैं और घाटे में चल रही किसी फैक्ट्री के लिए तो यह और भी ज्यादा झंझट है.’
वे गलत नहीं कह रहीं. 1983 यूनियन कार्बाइड के लिए जबर्दस्त घाटे का साल था. उस साल मॉनसून देरी से आया था, कपास की फसल चौपट हो गई थी और कार्बाइड के कीटनाशक सेविन की मांग बहुत घट गई थी. कुमकुम बताती हैं, ‘सेविन से लदे ट्रक के ट्रक वापस आ रहे थे. घाटा इतना ज्यादा हुआ कि कंपनी ने रखरखाव से संबंधित खर्चों में कटौती कर दी. उनकी किसी भी चीज में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी.’

कुल मिलाकर एक भीषण हादसे के लिए सारी परिस्थितियां पैदा हो चुकी थीं. जहरीले रसायनों से भरी एक फैक्टरी, जीर्ण-शीर्ण ढांचे, रखरखाव की कमी, निराश कर्मचारी और उदासीनता. जमा किए गए एमआईसी की मात्रा (तीन पूरे भरे हुए टैंक) पहले ही निर्धारित सीमा के पार पहुंच गई थी. कुमकुम बताती हैं कि फैक्टरी में उत्पादन रुका हुआ था इसलिए फ्लेयर टावर, सेफ्टी वाल्व आदि जैसे सारे सुरक्षा उपाय जो 3 दिसंबर को रिसी गैस को काबू कर सकते थे, बंद थे.

भोपाल त्रासदी के बाद जल्दी ही कुमकुम अमेरिका चली गई थीं. आज वे कनेक्टिकट में बतौर प्राइमरी हेल्थ फिजीशियन काम कर रही हैं. उनकी स्मृतियों से वह दिन गया नहीं है जिसकी भयावहता को समय रहते टाला जा सकता था. हालांकि अपनी तरफ से जितना हो सकता था, उन्होंने किया. वे कहती हैं, ‘उस दिन मेरे सामने दो विकल्प थे. या तो अपना पेपर देने जाती या फिर अस्पताल. मैंने दूसरा विकल्प चुना. मुझे लग रहा था कि वहां डॉक्टरों की जरूरत होगी.’ वे याद करती हैं, ‘मेरे हाथ में पांच इंजेक्शन थे. मैं उस चायवाले को बचाने की कोशिश कर रही थी जो मुझे समोसे खिलाता था. एक नेपाली लड़का था, एक हलवाई और उसकी पत्नी भी थे जो सांस लेने के लिए जूझ रहे थे.’ आज उन्हें लगता है कि काश समय रहते कुछ कर लिया गया होता. 

जिंदगी की कीमत, मुनाफे का टीका

प्रख्यात अमेरिकी मनोविज्ञानी इडा लेशान ने कहा था, ’एक बच्चे का जन्म नई शुरुआत है- आश्चर्य की, उम्मीद की, सपने की और संभावनाओं की.’ लेकिन यदि बच्चा भारतीय है तो कुछ लोगों के लिए यह एक और शुरुआत हो सकती है- मुनाफे की. इस गारंटी के साथ कि मुनाफा हमेशा बढ़ता रहेगा क्योंकि हमारे यहां हर साल करीब दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं और उनका टीकाकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए मां-बाप कोई समझौता नहीं करते.

डब्‍़ल्यूएचओ जिन वैक्सीनों को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने की पैरवी कर रही है उनकी गुणवत्ता ही संदेह के घेरे में है. इसके अलावा सरकार को इन वैक्सीनों की खरीद के लिए वर्तमान से 35 गुना ज्यादा राशि भी खर्च करनी पड़ेगी

बच्चे के जन्म के बाद उसे कुल कितने टीके लगें, इस बारे में भारत सरकार जल्दी ही एक नया फैसला करने वाली है. इस फैसले का जो असर होगा उसके तार सीधे अभिभावकों से जुड़ते हैं और कुछ अलग संदर्भों में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)  से भी. डब्ल्यूएचओ का जिक्र यहां इसलिए किया गया है कि पिछले कुछ महीनों से यह संस्था काफी कोशिश कर रही है कि कुछ और ‘जरूरी’ वैक्सीनों को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया जाए.

लेकिन अगर ऐसा होता है तो एक तरह से यह देश के नवजात शिशुओं की जान जोखिम में डालने जैसा होगा. दरअसल, संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी यह अंतर्राष्ट्रीय संस्था जिन वैक्सीनों को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने की पैरवी कर रही है उनकी गुणवत्ता ही संदेह के घेरे में है. इससे जुड़ी चिंताएं और भी हैं- सरकार को इन वैक्सीनों की खरीद के लिए वर्तमान से 35 गुना ज्यादा राशि खर्च करनी पड़ेगी. इसके अलावा अभी तक जो लोग अपने बच्चों को निजी अस्पतालों में टीके लगवाते हैं, उनके लिए यह बेहद महंगा विकल्प होगा. इस फैसले से भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के उन विदेशी कंपनियों के और भी ज्यादा नियंत्रण में जाने का खतरा पैदा हो जाएगा. साथ ही देश में इस समय जो सरकारी कंपनियां वैक्सीनों का निर्माण कर रही हैं उन्हें नए सिरे से वैक्सीनों के शोध और विकास के लिए भारी खर्च करना पड़ेगा. डब्ल्यूएचओ पर संदेह करने की और भी वजहें हैं. पिछले कुछ समय से यह संस्था बीमारियों का डर पैदा करने और फिर उन बीमारियों की दवाओं की पैरवी करने के लिए विवादों में रही है. हाल ही में ब्रिटिश मीडिया में एक खबर आई थी कि एच1एन1 इन्फ्लुएंजा (स्वाइन फ्लू) पर संस्था द्वारा दुनिया भर में जारी चेतावनी फर्जी थी. कहा गया कि संस्था ने एच1एन1 वैक्सीन और एंटीवायरल बनाने वाली कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए दुनिया भर में इस बीमारी का खतरा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. इन खबरों की पुष्टि जून के पहले सप्ताह में तब हो गई जब डब्ल्यूएचओ ने माना कि वह एच1एन1 इन्फ्लुएंजा पर इसे सलाह देने वाले वैज्ञानिकों के हितों को समझने में नाकाम रहा. अब लगता है कि ऐसा ही कुछ गड़बड़झाला भारत में भी होने जा रहा है.

सरकारी टीकाकरण

भारत में टीकाकरण की कोई सुस्पष्ट नीति नहीं है. देश में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम (ईपीआई) चलाया जाता है. हमारे यहां हर साल तकरीबन 2 करोड़ 5 लाख बच्चे जन्म लेते हैं. इनमें से सिर्फ 53 फीसदी बच्चों का टीकाकरण होने के बावजूद भारत दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन बाजार है. इसका मतलब है कि लगभग एक करोड़ दस लाख बच्चे, जो जाहिर तौर पर गरीब परिवारों के होते हैं, टीकाकरण से वंचित रह जाते हैं. भारत में 85 फीसदी टीकाकरण सरकारी तंत्र द्वारा होता है, शेष 15 फीसदी निजी अस्पतालों में.

भारतीय विशेषज्ञों के मुताबिक हेपेटाइटिस बी और हिब बीमारियों का हौव्वा खड़ा करने के पीछे इन वैक्सीनों का निर्माण करने वाली ग्लैक्सो-स्मिथक्लाइन फार्मास्युटिकल्स जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हाथ हैभारत में ईपीआई के तहत पांच प्राथमिक वैक्सीनों को इस्तेमाल होता है- बीसीजी (टीबी से बचाव का टीका), डीपीटी (इसे ट्राइवेलेंट वैक्सीन भी कहते हैं क्योंकि इसमें तीन वैक्सीनों का मिश्रण होता है, इसे कुकुर खांसी और टिटनेस से बचाव के लिए लगाया जाता है), डीटी (इसे डिप्थीरिया और टिटनेस से बचाव के लिए लगाया जाता है), टीटी (इसे आम तौर पर डीपीटी के रूप में लगा दिया जाता है या फिर अलग से भी), खसरा और पोलियो.

जो लोग भारत में निजी क्लीनिक का खर्च (यह आम तौर पर सरकारी टीकाकरण से काफी महंगा है) उठा सकते हैं वे अपने बच्चों का टीकाकरण निजी अस्पतालों में कराते हैं. निजी अस्पतालों का  टीकाकरण आम तौर पर राष्ट्रीय टीकाकरण नीति से अलग होता है. उदाहरण के लिए, कई क्लीनिक हेपेटाइटिस बी और हिब (हीमोफीलियस इन्फ्लुएंजा टाइप बी) वैक्सीन भी लगाते हैं. ये दोनों वैक्सीनें राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं और  इनकी कीमत 1,500 से 4,000 रुपए तक हो सकती है. जानकार बताते हैं कि दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को बेची जाने वाली पैंटावेलेंट (पांच वैक्सीनों का मिश्रण) वैक्सीन पर डॉक्टर काफी मुनाफा कमाते हैं.
अभी सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बच्चों को ट्राइवेलेंट (तीन वैक्सीनों का मिश्रण) वैक्सीन डीपीटी लगाया जाता है. डब्ल्यूएचओ इसकी जगह पैंटावेलेंट वैक्सीन, जिसमें हेपेटाइटिस बी और हिब बीमारियों से लड़ने की वैक्सीन शामिल हो, को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करवाना चाहता है.

मुनाफे का गणित

भारत की जन स्वास्थ्य नीति में पैंटावेलेंट वैक्सीन को शामिल कराने के लिए डब्ल्यूएचओ ने दो तर्कों को आधार बनाया है – पहला यह कि भारत में हिब और हेपेटाइटिस बी बीमारियां व्यापक स्तर पर फैल चुकी हैं. दूसरा यह कि पैंटावेलेंट वैक्सीन दूसरे एशियाई देशों खास तौर पर श्रीलंका और भूटान में कारगर रही हैं और भारत भी इसी भौगोलिक क्षेत्र में आता है.

भारतीय विशेषज्ञों के मुताबिक हेपेटाइटिस बी और हिब बीमारियों का हौव्वा खड़ा करने के पीछे इन वैक्सीनों का निर्माण करने वाली ग्लैक्सो-स्मिथक्लाइन फार्मास्युटिकल्स जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हाथ है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वैक्सीन के निर्माण और बिक्री में काफी मुनाफा है इसलिए कंपनियां डब्ल्यूएचओ के जरिए भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में बदलाव करवाना चाहती हैं.

भारत सरकार इस समय घरेलू कंपनियों से ट्राइवेलेंट वैक्सीन 15 रुपए की दर से खरीदती है. जबकि डब्लयूएचओ जिस पैंटावेलेंट वैक्सीन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है उसकी कीमत 525 रुपए प्रति वैक्सीन होगी. इसके अलावा सुरक्षित भंडारण और आवाजाही की लागत मिलाकर कीमत ट्राइवेलेंट वैक्सीन से 35 गुना ज्यादा हो जाएगी. इसका मतलब है सरकार को सालाना 735 करोड़ रुपए विदेशी फर्मों को देने होंगे. बाद में महंगाई बढ़ने के साथ-साथ इनकी कीमत भी बढ़ती रहेगी, जिसपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा.

भारत में हेपेटाइटिस बी से हो रही मौतों का आंकड़ा दस हजार प्रति वर्ष बैठता है. भारत में हर साल अलग-अलग वजहों से होने वाली 2 करोड़ 50 लाख मौतों का यह बहुत ही छोटा हिस्सा है. इसके लिए टीकाकरण कार्यक्रम में हेपेटाइटिस बी वैक्सीन को शामिल नहीं किया जा सकता

अहम सवाल यह भी है कि अभी देश में तकरीबन एक करोड़ बच्चों का टीकाकरण नहीं हो पाता क्योंकि निजी क्लीनिक का खर्च उनकी पहुंच से काफी दूर है और सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम अभी तक उन इलाकों तक नहीं पहुंच पाया है. इस स्थिति में पैंटावेलेंट वैक्सीन को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करना क्या सिर्फ खर्च बढ़ाना नहीं होगा? सामाजिक चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर रहे और दिल्ली में कई अस्पतालों के सलाहकार डॉ संजीव सिंह इस मसले पर कहते हैं, ‘हम अभी उपलब्ध वैक्सीन का ही सही ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे. ऐसे में 35 गुना महंगे विकल्प के बारे में सोचने की क्या जरूरत है? भारत में हेपेटाइटिस बी और हिब के मुकाबले डिप्थीरिया, टिटनेस और कुकुर खांसी कहीं बड़ी चुनौतियां हैं?’

सिंह भारत में ट्राइवेलेंट वैक्सीन के असरदार  साबित न हो पाने के तर्क पर कहते हैं, ‘वैक्सीन को एक निश्चित तापमान पर रखना पड़ता है. यहां कंपनियों से वैक्सीन सरकार को मिलती है. फिर राज्य, जिला, गांव और आंगनवाड़ी के स्तर पर पहुंचती है. लेकिन हर स्तर पर कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं. इसलिए ये वैक्सीन असरदार साबित नहीं होतीं. इसके अलावा देश में पर्याप्त डॉक्टर, नर्स और कार्यकर्ताओं की कमी है. जो हैं उनमें सभी प्रशिक्षित नहीं हैं. इस कमी पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.’

यदि सरकार पैंटावेलेंट वैक्सीन को अनुमति देती है तब ऐसी एजेंसी का होना जरूरी है जो भारत में इसकी लगातार सप्लाई कर सके. भारत में ट्राइवेलेंट वैक्सीन बनाने वाली घरेलू कंपनियों को यूपीए सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल बंद कर दिया था. हाल ही में विशेषज्ञों के दबाव में इन्हें दोबारा चालू किया गया है. लेकिन इन कंपनियों के पास पैंटावेलेंट वैक्सीन बनाने की विशेषज्ञता नहीं है. इस स्थिति में जब भारत को वैक्सीन सप्लाई करने की बात आएगी तो डब्ल्यूएचओ की सहायक या मित्र कंपनियों (जो ज्यादातर अमेरिका में स्थित हैं) को ये ठेके मिलेंगे. इनपर सरकार की कोई निगरानी या नियंत्रण
नहीं होगा.

‘कीमत’ जो चुकानी होगी भारत को

पैंटावेलेंट वैक्सीन पर भारी खर्च इस मसले से जुड़ी एक बड़ी चिंता है, लेकिन श्रीलंका और भूटान में इसके इस्तेमाल के बाद देखे गए दुष्प्रभावों ने जो चिंता जगाई है वह पहली चिंता से कहीं बड़ी है.

भूटान में अक्टूबर, 2009 में पैंटावेलेंट वैक्सीन को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया गया था. लेकिन इसके दो महीने बाद ही भूटान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इससे जुड़े सभी केंद्रों और क्लीनिकों को एक सर्कुलर भेजा. इसमें कहा गया था कि कुछ दुष्प्रभावों के चलते पैंटावेलेंट वैक्सीन का इस्तेमाल रोक दिया जाए और टीकाकरण के बाद के सभी विपरीत प्रभावों (एईएफआई) की सूचना देते हुए उनकी जांच की जाए. भूटान में इसके बाद वैक्सीन पर प्रतिबंध लगा दिया गया जो आज भी जारी है. सरकार ने वहां फिर से ट्राइवेलेंट वैक्सीन वाला टीकाकरण शुरू कर दिया है.

दिल्ली स्थित दवा निर्माण कंपनी पेनेशिया बॉयोटेक ने भूटान को पैंटावेलेंट वैक्सीन की सप्लाई की थी. लेकिन टीकाकरण के बाद चार बच्चों की मौत का मामला सामने आने की वजह से वैक्सीन का स्टॉक वापस ले लिया गया. इस कंपनी को यूनिसेफ से 2012 तक के लिए 22.20 करोड़ डॉलर का ठेका मिला है. भूटान की  घटना के बाद भारत के दवा नियंत्रक महानिदेशक (डीजीसीआई) ने देश में बालरोग विशेषज्ञों को कहा है कि ईजीफाइव का सावधानी से इस्तेमाल किया जाए और दुष्प्रभाव सामने आने पर सूचना दी जाए.
पैंटावेलेंट वैक्सीन से जुड़े कुछ ऐसे ही मामले श्रीलंका में भी सामने आए थे. डब्ल्यूएचओ के कहने पर श्रीलंका सरकार ने जनवरी, 2008 में वैक्सीन लगाने की अनुमति दे दी थी, लेकिन तीन महीनों के दौरान ही पांच बच्चों की मौत और 20 मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव सामने आने के बाद अप्रैल, 2008 में श्रीलंका ने इसका इस्तेमाल रोक दिया.

जब किसी वैक्सीन के दुष्प्रभावों की बात सामने आती है तो डब्ल्यूएचओ ऐसे मामलों की जांच करता है. जांच दस्तावेज के आधार पर वैक्सीन और दुष्प्रभाव के बीच संबंध को देखा जाता है. इस दस्तावेज में छह श्रेणियां होती हैं- निश्चित, अति संभावित, संभावित, न्यूनतम संभावित, गैरसंबंधित, और वर्गीकरण के योग्य नहीं (जहां जांच के लिए जरूरी सूचनाओं का अभाव है).
श्रीलंका में डब्ल्यूएचओ की एक विशेषज्ञ टीम जांच के लिए गई थी. लेकिन इस जांच दल ने मौतों और दुष्प्रभावों की सिर्फ चार श्रेणियों- निश्चित, न्यूनतम संभावित, गैरसंबंधित और वर्गीकरण के योग्य नहीं- के तहत जांच की. इस दस्तावेज में दो श्रेणियां- अति संभावित, संभावित हटा दी गई थीं. ऐसे में इन मामलों को आसानी से वैक्सीन के दुष्प्रभाव से अलग किया जा सकता था. इसके बाद जैसा कि स्वाभाविक था जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में इन मामलों में से किसी के लिए वैक्सीन को जिम्मेदार नहीं माना. चिंताजनक बात यह है कि इस साल तीन अप्रैल को पैंटावेलेंट वैक्सीन को अनावश्यक बताते हुए दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर जवाब देते हुए सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि यह वैक्सीन सुरक्षित है और उसने अपने दावे के समर्थन में श्रीलंका गए डब्ल्यूएचओ के इसी पैनल की रिपोर्ट पेश की.

इन श्रेणियों में बदलाव के मसले पर तहलका ने डब्ल्यूएचओ में वैक्सीन सुरक्षा से संबंधित समूह के प्रमुख पैट्रिक जुबेर से बात की तो उनका कहना था कि डब्ल्यूएचओ वैक्सीन दुष्प्रभाव को जांचने के लिए छह श्रेणियों वाली निर्देशिका जारी करता है. लेकिन जरूरी नहीं कि हर मामले में इन सभी श्रेणियों का इस्तेमाल किया जाए. वे बताते हैं कि फील्ड में अपने अनुभवों के आधार पर श्रीलंका गए पैनल के सदस्यों ने प्रस्ताव किया था कि श्रेणियों का सरलीकरण किया जाए. जुबेर यह भी तर्क देते हैं कि पैनल को अति संभावित और संभावित श्रेणी में रखे जा सकने वाली घटनाएं मिली ही नहीं.

लेकिन इस मामले से जुड़ा सबसे बड़ा पेंच यह है  कि श्रीलंका में हुई मौतों का कोई दूसरा स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया. ऐसे में इन मामलों पर सीधा यह कहना कि ये वैक्सीन से जुड़े नहीं है, तर्कसंगत नहीं है. गोलमाल जो किया जा रहा है. भारत में पैंटावेलेंट वैक्सीन के इस्तेमाल को शुरू करवाने के लिए यह जरूरी है कि यहां हेपेटाइटिस बी और हिब को इतना बड़ा खतरा बताया जाए जिससे वैक्सीन सरकारी टीकाकरण में शामिल कर ली जाए. यह काम बेहद खतरनाक तरीके से किया जा रहा है. साल 2000 में हेल्थ इकॉनॉमिक्स नाम के एक जर्नल में  अटलांटा (अमेरिका) के मार्क मिलर का आलेख छपा था. इसमें दावा किया गया था कि भारत में हर साल 2 लाख 25 हजार लोगों की मौत ‌लिवर कैंसर से होती है, जिसके लिए हेपेटाइटिस बी जिम्मेदार है. मिलर के निष्कर्ष से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें ताइवान से मिले प्राथमिक आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था. जबकि ताइवान में पाया जाने वाला हेपेटाइटिस बी वायरस भारत में पाए जाने वाले वायरस से अलग है. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) भी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत में हेपेटाइटिस से जुड़े सौ मामलों में से सिर्फ एक को लिवर कैंसर होने की संभावना होती है. इस हिसाब से भारत में हेपेटाइटिस बी से हो रही मौतों का आंकड़ा दस हजार प्रति वर्ष बैठता है. भारत में हर साल अलग-अलग वजहों से होने वाली 2 करोड़ 50 लाख मौतों का यह बहुत ही छोटा हिस्सा है. इसके लिए टीकाकरण कार्यक्रम में हेपेटाइटिस बी वैक्सीन को शामिल नहीं किया जा सकता.  दिल्ली के सेंट स्टीफन हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ जैकब पुलियेल मिलर के आंकड़ों को बकवास करार देते हैं. मिलर भी यह कहकर कि जिस मॉडल के आधार पर उन्होंने अपने आंकड़े दिए थे वह गुम हो गया है, अपनी बात को साबित करने में असफल रहे हैं. इस मामले से जुड़ी सबसे खतरनाक बात यह है कि डब्ल्यूएचओ मिलर के आलेख से मिलते-जुलते आंकड़ों के आधार पर ही भारत के टीकाकरण कार्यक्रम में हेपेटाइटिस बी वैक्सीन को शामिल कराना चाहता है.
हिब वैक्सीन के लिए डब्ल्यूएचओ साल 2006 में प्रकाशित हुई यूनिसेफ की रिपोर्ट को आधार बताता है. न्यूमोनिया: द फॉरगॉटन किलर ऑफ चिल्ड्रन नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में हर साल पांच साल से कम आयु के 1,000 में से 14 बच्चे न्यूमोनिया के कारण मौत का शिकार होते हैं. जबकि आईसीएमआर का साल 2005 का अध्ययन बताता है कि भारत में न्यूमोनिया से संबंधित मृत्यु दर प्रति हजार मात्र 0.26 है. यह आंकड़ा हिब वैक्सीन को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कराने के लिए काफी छोटा है.

इस तरह से देखा जाए तो पैंटावेलेंट वैक्सीन के पक्ष में दिए गए सारे तर्क संदेह के दायरे में हैं. इसके अलावा  वैक्सीन प्रभावी है, यह भी अब तक साबित नहीं हो पाया है. कुछ ही दिनों में आईसीएमआर को पैंटावेलेंट वैक्सीन पर निर्णय लेना है. अब तक इस मसले पर तीन बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं. देश को उम्मीद है कि चिकित्सा अनुसंधान की यह सबसे बड़ी संस्था मुनाफे के ऊपर जिंदगी को तरजीह देगी. 

एक पुराना आदमी

महान जर्मन कवि ब्रेख्त ने कोई आधी सदी से भी पहले के अपने समय के बारे में लिखा था, ‘मैं अंधेरे युग में जी रहा हूं.’ अगर आज की तारीख में कोई मुझसे पूछे, इस समय के बारे में, तो मैं कहूंगा, यह अंधेरे का नहीं, बल्कि अभूतपूर्व रोशनियों में अभूतपूर्व छल का समय है, झूठ का समय है, नक्कालों का समय है, और हमारे ठगे जाने का समय है. एक सेल्समैन जिस वाक्पटुता से, जिस आत्मविश्वास से अपनी चीजों की विशेषताएं बता रहा होता है मैं उसके बहुत सच लगते सरासर झूठ से कांपता रहता हूं. या मॉडल्स जिस खुशी और चहक से अपनी वस्तु का विज्ञापन कर रहे होते हैं, मुझे उसमें उतना ही कोई गहरा षड्यंत्र छिपा हुआ लगता है. दूसरे, चीजें आज इतनी ज्यादा हो गई हैं, और दिल-दिमाग में इस तरह काबिज कि हमें हमारे होश का पता नहीं होता. भाई लोगों ने आज यही नुस्खा अपना लिया है कि ग्राहक आया है तो उसे प्रेम से फटका लगाओ. उसके दुबारा आने की कोई गारंटी नहीं, जैसे अपने सामान की कोई गारंटी नहीं.

लड़के ने मेरे सामने ट्यूब में हवा भरी और धमेले के गंदले पानी में चेक किया. पंक्चर तो नहीं था, लेकिन ट्यूब का आधा भाग यों सूजा हुआ था जैसे फ्रैक्चर होने के बाद पैर सूज जाता है

मुझ बेचारे की यह भाव-दशा इसलिए है कि अभी ताजा-ताजा इस छल का शिकार हुआ हूं और अपने ठगे जाने की आशंकाएं कहीं से कम होती नहीं दिखतीं. पंद्रह दिन पहले की बात है, मुझे निजी काम से शहर के बाहर जाना पड़ा था. पत्नी साथ में थी. हम अपनी मोटरसाइकिल पर राष्ट्रीय राजमार्ग में थे फिर भी गाड़ी का पिछला पहिया पंक्चर हो गया. इधर शाम हो रही थी इसलिए जितनी जल्द गाड़ी का पंक्चर बन जाए उतना ही अच्छा था. कुछ ही आगे एक पंक्चर बनाने की दुकान थी. मेकेनिक ने मेरी मोटरसाइकिल का पिछला पहिया चेक किया तो बताया – नलकी उखड़ गई है. नया ट्यूब लगाना पड़ेगा. मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. उस सांवले मेकेनिक ने अपनी दुकान में उपलब्ध ट्यूब दिखाया. ट्यूब का रैपर लाल रंग का अति चमकीला था.

देखते ही शक हुआ कि लोकल है. मैंने उससे दूसरे किसी और कंपनी की ट्यूब दिखाने के लिए कहा, तो उसने कहा कि उसके पास सिर्फ यही है. मुश्किल यह थी कि आस-पास कोई दुकान भी नहीं थी ऑटो-पार्ट्स की. कितने का? तो बताया डेढ़ सौ का.
फिट करने का बीस रुपया अलग. एक सौ सत्तर लगेगा. मैंने कहा लगा दो. मरता क्या नहीं करता! और भई, नहीं मामा से काना मामा अच्छा! तो मेकेनिक ने ट्यूब बदल दिया. उस दिन तो चल गया, मगर दूसरे ही दिन ट्यूब की असलियत सामने आ गई, और इस बार भी मैं बाहर ही फंसा. मैं जिस गांव के स्कूल में पढ़ाता हूं वह शहर से चौबीस किलोमीटर दूर है. मोटरसाइकिल से आना-जाना करता हूं. गाड़ी के उसी पहिए के पंक्चर हो जाने का पता स्कूल की छुट्टी होने के बाद ही चला. गांव में ले देकर रिपेरिंग और पंक्चर बनाने की एक ही दुकान है, सो भी गनीमत है कि है. गांव से बाहर मेन रोड पर. यह अच्छा था कि स्कूल के क्लर्क वर्मा जी मेरे साथ थे, अपनी खुद की बाइक में. खैर पंक्चर बनाने गाड़ी दुकान तक ले आए. दुकान के मिस्त्री – जो पंद्रह साल का एक लड़का था – ने पिछला ट्यूब चेक किया. बताया नलकी उखड़ गई है ये नहीं बन सकता. ट्यूब बदलना पड़ेगा. अब मेरी जो स्थिति हुई होगी, आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं. मन में गालियों का अंबार लग गया. मुश्किल यह कि भन्नाऊं तो भन्नाऊं किस पर? कर ही क्या सकता था सिवा सिर धुनने के! लड़के से पूछा, ट्यूब रखे हो? दिखाओ. लड़के ने दुकान के रैक से निकालकर एक चमकदार नीले रैपर वाला ट्यूब दिखाया. मैं इसमें भी निर्माता कंपनी का एड्रेस ढूंढ़ रहा था जो कहीं नहीं था. कीमत डेढ़ सौ रुपया. पूछा, क्यों किसी दूसरी कंपनी का नहीं है. वह बोला नहीं है, जो है बस यही है. मैं सोच में पड़ गया. लोकल ट्यूब लगाकर मैं कल फिर परेशान नहीं होना चाहता था. नया ट्यूब खरीदने के लिए पास के कस्बे तक जाना पड़ेगा, जो यहां से आठ किलोमीटर दूर है. चूंकि वर्मा जी साथ में थे, इसलिए तय किया कि अब किसी अच्छी कंपनी का ही ट्यूब लगवाया जाए जिससे ऐसी बेकार की परेशानियों से बचा जा सके. वर्मा जी के पीछे बैठकर कस्बे तक गया. वहां जो पहले ऑटो-पार्ट्स की दुकान मिली, उसके दुकानदार से किसी अच्छी कंपनी का ट्यूब दिखाने को कहा. उसने एक नामी कंपनी का ट्यूब दिखाया जिसके ब्रांड एम्बेसडर भारत के प्रसिद्ध क्रिकेटर्स हैं. मूल्य दो सौ बीस रुपया. मन में सोचा, सस्ता रोवे बार-बार, महंगा रोवे एक बार! मैंने रैपर में कंपनी का एड्रेस, ईमेल एड्रेस देखा, तब भी मुझे इसके ‘ओरिजनल’ होने पर संदेह हो रहा था. इधर दुकानदार मुझे आश्वस्त कर रहा था, ले जाइये सर, ओरिजनल आइटम है. रेपुटेड ब्रांड है, आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी. मैंने आधे मन से उसे खरीद लिया. गांव लौटे तो सांझ गहरा चुकी थी, और इस बीच लड़का अपने दूसरे ग्राहक की गाड़ी बनाने में व्यस्त हो गया था. उसके फ्री होते तक पौन घंटा इंतजार करना पड़ा. लड़का जब ट्यूब का रैपर खोल रहा था, मेरा जी धड़क रहा था, कहीं यह भी कुछ गड़बड़ मत निकले. लड़का कह रहा था कि इसे चेक करा के लाना था. कई बार डुप्लीकेट माल भर के बेचते हैं. किंतु मैंने यह होशियारी नहीं दिखाई थी. लड़के ने मेरे सामने ट्यूब में हवा भरी, और धमेले के गंदले पानी में चेक किया. ट्यूब में पंक्चर तो नहीं था, लेकिन ट्यूब का आधा भाग यों सूजा हुआ था जैसे फ्रैक्चर होने के बाद पैर सूज जाता है. गनीमत थी कि चेक करने पर उसमें कोई पंक्चर नहीं निकला. लेकिन ट्यूब डुप्लीकेट था. वर्मा जी मेरी किस्मत पर हंस रहे थे, और मैं भी. मैंने लड़के से कहा इसे ही लगा दे. क्योंकि अब फिर आठ किलोमीटर दूर जाकर दुकानदार से हुज्जतबाजी करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी. फिर, वह कह सकता था कि आपको यहीं से चेक करा के ले जाना था, कि अब कुछ नहीं हो सकता. और दुकानवाले सामान वापस करने आए ग्राहक से किस रूखेपन और निष्ठुरता से पेश आते हैं मुझे इसका बहुत कड़वा अनुभव है. उनके लिए वह बिल्कुल फालतू आदमी होता है, बेफायदे का, उनका धंधा खराब करने वाला.

महंगी टोंटी ले जाओ तो चोर निकाल ले जाते हैं, और बिगड़ जाने पर अखरता भी है. चोरी का डर नहीं और बिगड़ जाए तो फिर नया लगवा लो, कोई गम नहीं

जो हो, मैं ठगा गया था. एक बार फिर.

इसीलिए मैं कह रहा हूं, यह अंधेरे का नहीं, अभूतपूर्व रोशनी में अभूतपूर्व छल का समय है!
इसीलिए, उस दिन जब शहर के मार्केट में एक हार्डवेयर की दुकान के सामने खड़ा था, तो उस चकाचौंध के बीच मेरे भीतर का विश्वास कांप रहा था, और मैं एक बार फिर ठगे जाने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रहा था.

हुआ यह था कि पिछले कुछ महीने से घर में लगी नल की टोटियां एक-एक करके लीक करने लगी थीं, पहले एक, फिर दूसरा, फिर तीसरा.. जैसे सभी टोटियों ने मानो योजना बना रखी हो. टपकते टोटियों की संख्या की संख्या अब छह पहुंच गई थी. टपकते नल के नीचे प्लास्टिक की बाल्टियां और मग रखते-रखते पत्नी खासा हलकान हो चुकी थी और गुस्सा बहुत तेजी से मेरी तरफ बढ़ रहा था. इसे अब और टाले रखना संभव नहीं था. सो उस दिन छुट्टी की अर्जी देकर मैं इस समस्या को हल कर ही लेना चाहता था. मैं अभी उसी हार्डवेयर की दुकान के सामने खड़ा था जहां मुझे कोई साल भर पहले एक अच्छा मिस्त्री मिल गया था, जिसने एक-डेढ़ घंटे काम करने के बाद भी महज पचास रुपए ही लिए थे, अनाप-शनाप नहीं. मुझसे उसका नाम-पता खो चुका था जो मैंने कहीं नोट किया था. उम्मीद थी कि यहां वह या कोई दूसरा मिस्त्री मिल ही जाएगा.

दुकान के काउंटर पर चालीसेक बरस का एक युवक बैठा था – दुकान का मालिक. वह मुझे पहचान गया कि एक साल पहले कुछ सामान खरीदकर ले गया था, और बीच में उससे एक-दो मुलाकातें राह चलते हुई हैं. उस युवक का मुझे पहचान जाना अच्छा लगा था, क्योंकि देख रहा था, यह दुकानदार की निपट व्यावसायिक मुस्कान से दस गुनी ज्यादा अच्छी, विश्वसनीय, शांत और गंभीर मुस्कान है. एक होशियार दुकानदार को ग्राहक को देखते ही उसकी खरीदी हैसियत का अंदाजा तुरंत हो जाता है. मेरी हैसियत छोटे स्तर के ग्राहक की होने को जानने के बावजूद ‘आइये भइया’ मुस्कुराकर कहना मुझे अलग ही खुशी दे गया.
मैंने बताया, घर के नल की टोटियां बदलवानी हैं, आपके यहां कोई प्लम्बर होगा?

‘अरे अभी था भइया, दो मिनट पहले. देखता हूं उसको फोन लगाके कहां है. यहीं-कहीं होगा.’ और युवक ने तत्काल उसे फोन लगाया, पूछा कहां है, और कहां, आ जा तुरंत. फिर मुझसे कहा – यहीं चौक में है, दो मिनट में आ जाता है.
मैं, जो मिस्त्री के न होने और उसके दो मिनट पहले चले जाने पर कुछ निराश-सा हो चला था उसके आने की बात से खुश हुआ.
प्लास्टिक की टोटियां होंगी आपके यहां? मैंने दुकानदार से पूछा.
मुझे लग रहा था शायद नहीं हो, सस्ता आइटम है. या दुकानदार ही कह सकता था मत ले जाइये. क्योंकि इसमें दुकानदार को कोई खास फायदा नहीं था. पीतल या स्टील की टोटियां प्लास्टिक की तुलना में चार-पांच गुनी महंगी मिलती हैं. बार-बार खराब होने के कारण पत्नी ने प्लास्टिक की ही लाने को कहा था. इसमें हमारा नुकसान कम था.
युवक ने बताया कि है, और आजकल यही चल रहा है. महंगी टोंटी ले जाओ तो चोर निकाल ले जाते हैं, और बिगड़ जाने पर अखरता भी है. इसकी चोरी का कोई डर नहीं. और बिगड़ जाए तो फिर नया लगवा लो, कोई गम नहीं. बीस-पच्चीस रुपए में साल भर भी चल गया तो बहुत है!

उसने काउंटर पर तीन-चार प्रकार की टोटियां रख दीं.
ये तीस का.. ये पैंतीस.. ये पच्चीस.. और ये पंद्रह का..
तभी वह मिस्त्री आ गया. बगल में खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर एक सहज मुस्कान है.. उसके व्यक्तित्व का हिस्सा.. शायद उसने मुझे पहचान लिया है.. यह वही मिस्त्री है जो साल पहले घर की टोटियां ठीक करने आया था. चेहरा-मोहरा एकदम साधारण.
मैंने इन टोटियों की बाबत उससे पूछा, ‘क्यों, ये ठीक रहता है?’ ..दरअसल मैं उसकी आश्वस्ति चाहता था, क्योंकि वह इस लाइन का जानकार है.
‘हां, अच्छा रहता है. अजकल तो यही चल रहा है. खर्चा भी कम बैठता है.’ उसने कहा.
दुकानदार ने कहा, ‘ये पैंतीस वाला ले जाओ भइया, अच्छा रहेगा.’
लेकिन मुझे पच्चीस वाला पसंद आ रहा था, उसकी बनावट अच्छी थी. मैंने मिस्त्री से फिर उसकी राय चाही, ‘ये वाला कैसा है? ठीक तो है न..?’
‘हां-हां, बिल्कुल ठीक है.’ उसने बताया, ‘इसमें वायसर नहीं होता. हाफ बस घुमाना पड़ता है. जल्दी खराब भी नहीं होता.’
मैंने दुकानदार से कहा, यही दे दो.
कितने दे दूं? उसने पूछा.
मैं यहां अटक गया. मैं ‘कनफर्म’ नहीं था कि कितने चाहिए.. चार.. या पांच.. या छह..? घर में फोन किया. पत्नी से पूछा, टोटियां कितनी खरीदनी हैं?
उसने कहा – छह. उसका स्वर एकदम साफ था – छह. कहीं कोई संशय नहीं – जैसे बरसों से उसे पता हो – छह. बहुत स्थिर और ठोस – छह. सुनकर मुझे बेइंतहा खुशी हुई.. कि वह घर को इतना ठीक-ठीक, और इस तरह जानती है जैसे कोई अपनी देह को जानता है. खुशी हुई कि दूसरी तरफ से फोन में बात कर रही स्त्री मेरी पत्नी है.
दुकान के बरामदे की चार सीढ़ियां उतर हम नीचे आ गए. मेरी बाइक के बाजू मिस्त्री की साइकिल खड़ी थी.
मिस्त्री ने मुझसे पूछा – ‘मुझे अपने संग ले जाओगे या.. मेरे पास सैकिल है..’
जाने कहां से मेरे भीतर उससे अच्छी आर्थिक स्थिति होने का बोध, उसको काम देने का स्वामी-बोध बहुत शातिरपने के साथ जाग गया. मैंने कहा, ‘तुमको साथ में ले जाऊंगा तो फालतू में मुझे तुमको छोड़ने फिर आना पड़ेगा. तुम घर तो देखे ही हो.’
अगर वह चाहता तो बिदक सकता था, कि घर भूल गया हूं, करके, और मुझे अपनी यह ठसक छोड़ झख मार के उसे साथ में ले जाना पड़ता.

मगर उसके भीतर ऐसा कुछ नहीं था. वह एकदम मान गया. उसे अपने काम से मतलब था. अपनी रोज से. उसी सरलता से उसने कहा, ‘हां, घर देखा हूं. आप गाड़ी में चलो, मैं सैकिल में आ रहा हूं..’
मेरे घर पहुंचने के पांच मिनट के भीतर वह आ गया. साइकिल उसने गेट के बाहर खड़ी की. कैरियर से अपने औजारों से भरी बोरी – ‘टूल बॉक्स’ – उतारी. और भीतर आ गया.उसके औजार एक साफ और नए बोरे में बहुत सलीके से बंधे थे, बहुत एहतियात से. वह उन्हें सावधानी से खोल रहा था, मुझसे बात करते-करते. मैं समझ रहा था सब नल चोरी हो गया करके. लीकेज है. अभी बदल देता हूं. दस मिनट का काम है. बोरे में तरह-तरह के औजार थे – प्लायर, पंच, पाना, हथौड़ी, छेनी, लोहे काटने की आरी, नल पाइप के टुकड़े, एलबो, सॉकेट.. वह प्लायर-पाना लेकर अपने काम में लग गया, और बात भी करता जाता था, कि दुकानवाला सामान खरीदने गया था तो मुझे भी संग ले गया था. दुकानवाला इस डिजाइन को पसंद नहीं कर रहा था, नहीं चलेगा सोच के, मैं बोला, रख लो चलेगा. और देखो, कई डब्बा बेच डाला होगा अब तक.
छत में उसने टंकी के पानी सप्लाई करने वाले वाल्व को चेक किया. बताया, वाल्व खराब हो गया है.
मैंने पूछा – ‘नया ले आऊं’?
उसने कहा, ‘रहने दो. नया लाओगे तो चार महीना में वो भी खराब हो जाएगा. बोर के पानी में नमक होता है, और नमक वाल्व के चूड़ी को जाम कर देता है. क्या मतलब बेकार में ढाई-तीन सौ खर्च करने का!’
उसने मुझे नया वाल्व खरीदने से रोक दिया.
मिस्त्री ने कहा, ‘कोई बात नहीं, मैं चालू नल में भी टोंटी बदल सकता हूं. पानी का लीकेज भी तुरंत चेक हो जाता है.’
वह टोटियां बदलने में लग गया. टोंटी में पाना सेट करके जो लगाता तो जाम से जाम टोंटी घूम जाती. नई टोंटी लगाने के पहले उसके नट पर जूट के छोटे-छोटे धागे लपेट देता ताकि टोंटी अच्छी तरह कस जाए. वह बता रहा था कि आजकल कंपनी वाले रबड़ का वायसर देते हैं. लेकिन बाद में वायसर दब जाता है और नल लीक करने लगता है. ये रस्सी ही असल काम करता है. जूट की ये रस्सियां वह अपने साथ रखता है. मैं देख रहा था, उसे अपने काम में कोई हड़बड़ी नहीं थी. न ही किसी किस्म की कोई चालाकी. वह मगन होके अपना काम कर रहा था.

बाथरूम के एक नल की टोंटी खोलते वक्त टोंटी खुलने की बजाए टूट गई. नट वाला हिस्सा पाइप में ही फंसा रह गया. उसने कहा, ‘देखा, नकली माल था. प्लास्टिक में क्रोम पालिश चढ़ा के स्टील बता के बेचते हैं मार्केट में. अब ग्राहक को क्या पता? देखा था तभी जान गया था. आजकल इस लाइन में बहुत धोखाधड़ी है. असली-नकली का पता नहीं चलता.’
इधर टोंटी से पानी बह रहा था. मिस्त्री ने उसी हाल में फंसी चूड़ी को छेनी से निकालने की कोशिश की. पर नहीं निकल सका. इस चक्कर में वह खासा भीग गया. प्यार से खिसियाके खुद ही से कहता है, ‘ये साला मुझको आज दुबारा नहलाएगा!’
मुझसे बोला – ‘अब टंकी खाली होने तक रुकना पड़ेगा. तभी खुलेगा.’
मैंने पूछा, ‘चूड़ी खोलने में अब तुमको दिक्कत होगी?’

मुस्कराकर बोला, ‘नहीं. नए आदमी के लिए दिक्कत होगी. हम लोग तो ऐसी हर बीमारी का इलाज जानते हैं. इसका जुगाड़ है न अपने पास. टंकी खाली होने दो, पांच मिनट में बना दूंगा’.. वह बिल्कुल चिंतामुक्त था, अपने साथ मुझे भी चिंतामुक्त करते हुए..
पत्नी ने चाय बना दी थी. चाय पीते हुए हम बातें करने लगे.
मैंने उसे यों ही बताया, हमारे घर का नल फिटिंग रमन ने किया है. उसको जानते होगे..?
‘वो नयापारा वाला न..?’
मैं बोला, हां.
‘ठीक मिस्त्री है. वो ठेकेदारों के साथ काम करता है.’
‘तुम नहीं करते?’ मैं अब उस पैंतालिस-पचास के दुबले-पतले, बहुत साधारण आदमी को ध्यान से देख रहा था.
‘नहीं, मैं नहीं करता,’ कहने लगा, ‘मेरे को नई पोसाता. ठेकेदार पहले से अपना कमीशन मांगते हैं, वो भी ज्यादा-ज्यादा. जितने का कमीशन दो उतने की कमाई नहीं होती. और मकान मालिक से धोखाधड़ी अपने को नई जमता. इन ठेकेदारों के चक्कर में कमाई अलग फंस जाती है. ठेकेदार हम लोगों का पेमेंट टाइम पे कहां करते हैं? घुमाते रहते हैं आजकल-आजकल. ये हो गया, वो हो गया. कि पार्टी से पैसा नहीं मिला है बोलके. पर हमारा पैसा तो फंस गया न लेबर पेमेंट में. लेबर लोग का पेमेंट कितने दिन तक रोक के रखोगे? वो तो बेचारे रोज कमाने रोज खाने वाले! देख लो, दीवाली में एक ठेकेदार संग काम किया हूं, चार महीना से उप्पर हो गया, पर आज तक पेमेंट नहीं किया है. लाइन में खराब लोग घुस के धंधा बिगाड़ दिए हैं. इसलिए अपना रोज का काम अच्छा! सिन्हा के दुकान में चले जाओ, चिल्हर काम रोज मिल जाता है. तब अपने को कल की क्या चिंता? कौन लालच पाले?’

मैंने उसे बताया, इस कॉलोनी वाले अक्सर दिलीप को बुलाते हैं, पर उसका भाव बढ़ा हुआ है, वो छोटे-मोटे रिपेिरंग के काम में नहीं आता. मैं उसको दो-तीन बार फोन कर चुका हूं..
‘उसको जानता हूं,’ मिस्त्री बताने लगा. वो और हम साथ में थे. दोनों ने मेरे काका – सगे काका – के पास काम सीखा है. वो आज गाड़ी में घूम रहा है. मैं और काका अभी तक सैकिल में ही घूम रहे हैं. रमन सब दो नंबरी का काम करने लगा है. मेरे को तो वो शुरू से मामा मानता है. मैं तो उसको उसके मुंह पे कह देता हूं, अरे भांजा, तू मेरे से कम काम जानता है, फिर भी नल ठेकेदार बने गाड़ी में घूम रहा है! मैं जानता हूं बाबू, तू गाड़ी में कैसे घूम रहा है! वो गोयल के यहां से सामान खरीदवाता है. जो नल की टोंटी आप पच्चीस में लाए हो, उसका वो पचास-पचास का बिल बनवाता है. साला अपने से ये नहीं होता. ईमानदारी का नून-चटनी ही ठीेक है.’
मैंने कहा, ‘पर दुनिया तो इसी रास्ते से तरक्की कर रही है. तुम भी तो कमीशन ले सकते हो?’
‘अपन से हजम नहीं होता भइ!’ चाय का आखिरी घूंट भरकर कप उसने टी-टेबल में रखते हुए कहा, ‘जो सामान जितने का है उतने का ही बताओ. अब आप यकीन नहीं करोगे, मैं भैया की दुकान से एक-एक लाख का सामान खरीदवाया हूं, पर कोई कमीशन नहीं लिया. मैं खाली दो दुकान के लिए काम करता हूं. साल के साल दोनों दुकानवाले दीवाली में मेरे को पैंट-शर्ट्र देते हैं, मैं उसी में खुश हूं.’ वह अब मुस्करा रहा था, अपनी वही सरल मुस्कान.

मैं बहुत हैरानी से इस आदमी को देख रहा था. कैसा है ये मानुष? कमाई के सब रस्ते जानता है, पर अपनी ईमानदारी में ही खुश है! संतुष्ट है! अपनी साइकिल में ही! कल को लेकर कोई हाय-हाय नहीं. उसने बताया था, वह शक्ति नगर में रहता है. शक्ति नगर – शहर के मजदूरों, ठेलेवालों, रिक्शेवालों का मुहल्ला. इसी गंदी बस्ती में इसकी भी एक झोपड़ी होगी, किसी न किसी काम में खटती पत्नी होगी, किसी सरकारी स्कूल में आठवीं-नौवीं दज्रे में पढ़ते बच्चे.. सब कुछ एकदम साधारण.. बल्कि गरीब.. दूर-दूर तक किसी भी असाधारणता से मानो हमेशा-हमेशा के लिए वंचित. जबकि ठीक इसके सामने वह दुनिया है जहां लोग दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की में लगे हुए हैं, ऐशो-आराम का हर साधन जुटाते हुए.. कमाई का हर वैध-अवैध तरीका अपनाते हुए..
और यह अपनी ‘सैकिल’ में ही खुश है!

टंकी खाली हो चुकी थी. छेनी-हथौड़ी लेकर वह अपने काम में जुट गया. थोड़ी ही देर में उसने आखिरी टोंटी भी फिट कर दी.
..अब वह अपने औजार समेटकर बोरी बांध रहा है. उसी एहतियात से.
‘कितना देना होगा?’ मैं पूछ रहा हूं उससे. अपने ठगे जाने का भय मुझे दूर-दूर तक नहीं है, वह भी इस अभूतपूर्व रोशनियों के अभूतपूर्व छल के समय में!

कैलाश बनवासी का जन्म 10 मार्च, 1965 को दुर्ग में हुआ. तीन कहानी संग्रह लक्ष्य तथा अन्य कहानियां, बाजार में रामधन  तथा पीले कागज की उजली इबारत प्रकाशित. कहानी कुकरा कथा  को ‘कहानियां’  पत्रिका द्वारा 1987 का सर्वश्रेष्ठ कहानी पुरस्कार. श्याम व्यास  पुरस्कार से सम्मानित

वर चाहिए तो इधर आइए

खरवांस उतर गया है और आज भोर से ही जीयनपुर के बगीचे में कोयल कूंकने लगी है.

ऐ दुनियावालों ! अगर तुम्हारे घर कोई कन्या है, कुंवारी है और सयानी हो चुकी है, हाई स्कूल पास या फेल है, चिट्ठी पत्री लिखना सीख गई है (भले प्राणनाथ प्राड़नाथ लिखते हुए उनकी कुसलता चाहती हो), अपनी सहेली के घर ज्यादा आने-जाने लगी है और उसके भाई के साथ एक-आध बार पकड़ी गई है और आपको अपनी नाक की चिंता होने लगी है तो घबड़ाइए नहीं, इधर आइए. बाबू जोखन सिंह तीन साल से आप जैसे ही देखुआर का इंतजार कर रहे हैं पर शर्त यह है कि वह सास-ससुर की इज्जत करना जानती हो, हलवा मोहन भोग बना लेती हो सिलाई-तंगाई में माहिर हो, पति लाख लुच्चई करे मगर वह सती हो, सावित्री हो.

जोखन सिंह ने इससे सबक सीखा. उन्होंने जाड़े में एक पेड़ कटवाया, उससे दो बेंचे और दो कुर्सियां बनवाईं और इनके साथ कचहरी से लौटते वक्त आधा दर्जन चम्मच भी ले लिए

जोखू ने अपने बड़े लड़के को शहर भेज कर पांच किलो आदमचीनी चावल मंगा लिया है, अरहर तो अपने यहां भी चार-पांच पसेरी हो जाती है लेकिन ठीक से पकती नहीं, इसलिए दो किलो अरहर की दाल भी आ गई है, कोआपरेटिव से आधा मन चीनी, मिट्टी का तेल, डेढ़ावल बाजार से दो बट्टी लाइफबाय, ब्राह्मी आंवला की शीशी, भुर्रा चाय, आधा किलो बताशे, शीशा-कंघी गरज कि आप के आवभगत का पूरा-पूरा इंतजाम है.

जाड़े में विकट अनुभव हुए थे जोखू को. उन्होंने माधो के साथ मिलकर पिछली गर्मी में ही भविष्य को ध्यान रखकर आधे दर्जन प्याले और तश्तरियां मंगवाई थीं और संयोग देखिए कि एक ही दिन दोनों जने के यहां देखुआर आ गए. जब जोखू ने अपने लड़के को दौड़ाया तो माधो नट गए. इनकी कितनी बेइज्जती हुई होगी इसकी कल्पना की जा सकती है. इसी खार पर उन्होंने शहर की देखा देखी स्टील के मग मंगवा लिए हैं. न टूटने का डर, न फूटने का! माधो से बोलचाल जरूर बंद है लेकिन अब निश्चिंत हैं वे.

ऐसे ही परसाल जो देखुआर आए थे, उनमें कुछ सूट-बूट वाले लौंडे भी थे. खटिया पर बैठते ही नहीं बनता था उनसे और उनमें से एक जो बदमाश और फंटूश जैसा लगता था, खाने के वक्त चम्मच मांग बैठा. परसनेवाले अनसुनी कर रहे हैं लेकिन बात वह समझ नहीं रहा है या समझ कर भी जोखू की इज्जत उतारने पर उतारू था और वह कोई और भी नहीं था, लड़की का भाई था- खास भाई.
जोखन सिंह ने इससे सबक सीखा. उन्होंने जाड़े में एक पेड़ कटवाया, उससे दो बेंचे और दो कुर्सियां बनवाईं और इनके साथ कचहरी से लौटते वक्त आधा दर्जन चम्मच भी ले लिए. अब कोई चाय में ऊपर से चीनी भी मांगे तो कोई बात नहीं.

एक और काम किया है इस खरवांस में उन्होंने. जब पप्पू दर्जा नौ में पहुंचा था और पहली बार देखुआर आए थे तब नातजुर्बेकारी में एक गड़बड़ी हो गई थी उनसे. चीनी तो थी लेकिन उसमें डालने के लिए कुछ न था- न दूध न दही. ये थे जरूर मगर सीते के घर और उनसे मुकदमेबाजी थी. एक की इज्जत पूरे गांव भर की इज्जत हुआ करती है. इज्जत के लिए ये झुके लेकिन सीता की मेहर ने सारा दोष बिल्ली के सिर मढ़ दिया. तब से जोखू हर खरवांस में जरूरते नागहानी माधो की देखा देखी अपने यहां भी ‘रूह आफ़ज़ा’ की बोतल रखते हैं.

माधो ने कच्चे मकान के रहते पक्का बनवाने के लिए ईंटो का भट्टा लगवाया तो उनके पोते की कीमत दुगनी तिगुनी हो गई. जोखू ने इसके बाद ही अपने दुआर के आगे दो ट्रक बालू गिरवा लिए और पांच ट्रक ईंटे. हालांकि मकान तो तभी बनेगा, जब सौहर होगा लेकिन इसके फायदे सामने आने लगे हैं. अब कोई यह नहीं पूछता कि आप जो इतना मांग रहे हैं, ठीक है देंगे लेकिन बताइए यह कि लड़की आएगी तो कहां रहेगी? इस खोबार में? अब तो खुद जोखू ही उलट के सवाल पूछते हैं कि लड़की आएगी तो रहेगी कहां? ईंट और बालू से क्या होगा? सीमेंट, लोहे-लक्कड़, हेन तेन सारा कुछ तो पड़ा है करने को. और किसी तरह से ढांचा खड़ा भी हो गया तो सोफासेट, बाजा, मोटरसैकिल के बेगार कैसा लगेगा?

जोखू, माधो की तरह लनतरानियां नहीं हांकते- सिवान दिखाकर देखुआरों से यह नहीं कहते कि ‘यह सब आप ही का है!’ खुद तो घास करें या गोबर फेंके और जब मेहमान आएं तो नहलाने के लिए कहार बुलवा लें, भट्टी पर से खोया मंगवा लें, बीड़ी के लालच में दो-चार बैठकबाजों को बुलवा लें, कोयर-कांटा और झाड़ू-बुहारू के लिए एक दो लौंडो को लगा दें… जोखू यह सब नहीं करते. किराए पर ट्रैक्टर मंगवाते हैं और जुताई-बुआई-दंवाई-ओसाई करवा के मस्त रहते हैं. वे इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें अपने पप्पू पर- उसके रंग, रूप और गुण पर भरोसा है.

आप या जो भी वरदेखुआ सादी ब्याह के लिए जाएगा, वह जमीन-जायदाद से तो ब्याह करेगा नहीं, करेगा लड़के से और अगर वही खोटा है तो दुनिया भर का टीमटाम किस काम का? इसमें शक नहीं कि जगह-जमीन के कारण देखुआर माधो के यहां अधिक जाते हैं लेकिन जोखू के लिए तकलीफ नहीं खुशी का कारण है- कि एक दिन ससुर इसी तरह खिलाते-खिलाते उजड़ जाएंगे और तब मिलेगा क्या? घंटा !

तो इस मसले को लेकर माधो और जोखू में जितनी ही लाग-डांट है, पप्पू और मुन्ना में उतनी ही छनती है. पप्पू- जिनका रजिस्टर का नाम गणपत सिंह है- अपने टोले के मेधावी विद्यार्थी हैं. मेधावी इसलिए कि उन्होंने अपने लंगोटिया यार मुन्नाजी को पीछे छोड़ दिया और खुद इंटर में आ गए. ये दोनों मित्र तीन साल से हाई स्कूल में थे और हर साल परीक्षा के समय इनके लिए गांव और संगी साथी दो महीने पहले से युद्धस्तर पर तैयारी करते थे. जामवंत यादव- जो अहिरान के थे और फौज से रिटायर कर गए थे- बंदूक के साथ विद्यालय के बगीचे में बिठाए जाते, कुछ दूसरे नौजवान छूरे-तमंचों के साथ बस स्टेशन के पास रहते जहां से गार्डी करने वाले अध्यापक चलते और मुन्ना का कोई एक दोस्त- जिसके पास मोटर साइकिल थी- अपने तीनों चेलों के साथ विद्यालय के पिछवाड़े खड़ा रहता. उनमें से एक पर्चा लाता, दूसरा किताबों और कुंजियों से उत्तर फाड़ता और तीसरे की जिम्मेदारी होती- झरोखे या गार्ड या पानी पिलाने वाले या पहरे पर तैनात सिपाही के हाथों कागज उन तक पहुंचाना.

इस रणनीति में कहीं कोई चूक नहीं हुई लेकिन किस्मत का खेल कि मुन्ना रह गए और तीसरे प्रयत्न में पप्पू सप्लीमेंटरी के रास्ते धूमधाम से उत्तीर्ण हो गए. इसका नतीजा यह निकला कि पप्पू का भाव वरदेखुओं के बाजार में मुन्ना के टक्कर में आ गया- हल-बैल न होने के बावजूद!

माधो ने तय किया है कि वे मुन्ना को तब तक पढ़ाएंगे जब तक उसका ब्याह नहीं हो जाता. अगर लड़का घर बैठ गया तो कौन झांकेगा? इधर जोखू बोलते थे दो लाख और एक फटफटिया, उधर माधो बोलते थे तीन लाख और एक मारुति. पप्पू के हाई स्कूल पास करने के बाद जोखू ने कहा- चार लाख तो बसंत पंचमी के दिन दुआर की नींव खुदवा कर माधो ने किया – पांच लाख. इन मांगों में गहने और खिचड़ी वाले वे सामान नहीं शामिल हैं जो अपने दुआर की इज्जत के मुताबिक आप लजाते-लजाते भी देंगे (यानी एक सुनने वाला बाजा, एक देखने वाला बायस्कोप, सोफा, पलंग आदि आदि), लेकिन कार के बिना दोनों में से किसी का काम न चलेगा. लोगों ने पूछा कि कार का करोगे क्या? तो दोनों का कहना था कि और कुछ नहीं तो धानापुर से मुगलसराय तक मुन्ना-पप्पू सवारी ढोएंगे. बिजनेस…

जोखू जानते हैं कि माधो और ब्याहों की तरह इसमें भी धोखा करेगा और चढ़ावे का गहना सोनार से भाड़े पर ले आएगा. और माधो की पॉलिटिक्स यह है कि लड़के का बाजार भाव इतना चढ़ा दिया जाय कि होड़ में जोखू का माल धरा का धरा रह जाय.
तो दुनियावालों, इस वक्त इन कश्यपगोत्रियों, दोनों सूर्यवंशी क्षत्रिय कुमारों की कीमत सात लाख और एक नैनो लगाई गई है. अगर आपकी लड़की बिचारी को किसी योग्य वर की जरूरत हो तो आइए, अपनी किस्मत आजमाइए.

गांव घर का मामला है, किसी एक की ओर से बोलना दूसरे से झगड़ा मोल लेना है. यों लड़के आप-आप को दोनों ही लाखों में एक हैं. दोनो इस समय सहर बनारस में कोचिंग कर रहे हैं. काहे की? यह मत पूछिए. जब उन्हें ही नहीं पता तो हम क्या बताएं? बस आ जाइए ! दूसरे आएं इससे पहले. बाजार के हिसाब से ये चीपो के चीपो और बेस्टो के बेस्टो पड़ेंगे आप के लिए.

काशीनाथ सिंह पांच दशकों से हिंदी साहित्य जगत में सक्रिय हैं. अपने लेखन के जरिए उन्होंने पाठकों की एक नई जमात तैयार की है. उनके बारे में कहा जाता है कि कथा-कहानी में आने वाली हर युवा पीढ़ी उन्हें अपना समकालीन और सहयात्री समझती रही है

दिनों की स्क्रिप्ट

एक

सुबह किसी फिल्म की तरह शुरू हुआ करती थी. हमें नहीं मालूम होता था लेकिन हमारे दिन की स्क्रिप्ट पहले से लिखी हुई होती थी.

सुबह उठते ही हम स्क्रिप्ट में अपना नाम ढूंढ़ते थे. क्यूंकि जिनका नाम नहीं होता था उन्हें खुद अपने दिन की कोई स्क्रिप्ट लिखनी होती थी. और हम सभी लिखने से कतराते थे. हमें किसी और की लिखी हुई स्क्रिप्ट की आदत थी.
मार्च’ 85 की खुशनुमा सर्दी के दिन मैंने देखा कि स्क्रिप्ट में मेरे नाम के साथ लिखा हुआ था – अमित. यह पहली बार हुआ था, पहली बार हमें मालूम था कि उस दिन स्क्रिप्ट में हमें कौन-सा नाम मिलने वाला था. आइन्दा हमें मालूम नहीं होता था कि हमें कौन-सा नाम मिलेगा, हमें कौन-सा पात्र बनाया जाएगा. एक बार मैं कोई संजय था, मुझे पूरे दिन मालूम नहीं था कि मेरा नाम क्या था. बिल्कुल अंत में, शाम को, जब मेरी पत्नी लौटती है, पूरे छह दिन गायब रहकर, तब मुझे नाम से पुकारती है. तभी मुझे यह मालूम होता है कि मेरी पत्नी छह दिन से गायब है. पूरे दिन संजय ऑफिस जाता है, वहां एक लड़की से अगले रविवार कहीं मिलने के लिए कहता है, अपने अफसर के बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने जाता है, रास्तों में उनके जिद करने पर कार से नीचे उतरकर सड़क पर कुत्ता बनता है, भौंकता है और जब उनके िज़द करने पर उनकी टीचर को काटने को दौड़ता है, वे उसे कहीं छोड़कर सड़क के दूसरी ओर की गली से होकर पैदल ही अपने घर चले जाते हैं. उनके जाने के बाद वो दौड़कर कार में लौटता है, टीचर के पास कार ले जाकर पूछता है, ‘क्या मैं आपको छोड़ दूं?’

इस पूरे दिन में मुझे कोई उसके नाम से नहीं पुकारता, पूरे दिन मैं और वह नहीं सोच पाते कि उसकी पत्नी छह दिन से गायब है. मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वह मेरे पास ही सोती हुई छह दिन पहले कहीं गायब हो गई थी और छह दिन यह भूली रही कि वो मेरी पत्नी है. मैंने कहा – ‘मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ.’

दो

मैं उससे पहले सिर्फ एक अमित को जानता था. ‘क्या मैं वही अमित बनने वाला हूं.’
यह अमित माँ के पड़ोस में कलकत्ता में रहा करता था. माँ का बचपन कलकत्ता में बीता है. वे बताती हैं वो एक शर्मीला लड़का था, जो एक दिन बिना बताए अपने चाचा के पास रहने के लिए रूस चला गया था. चार-पांच साल पहले कलकत्ता के उसी कमरे में, जो उसके जाने के दिन से ही बंद था, उसकी लाश पाई गई थी. उसके चाचा ने बताया कि वो उसी तरह बिना बताए वहां से कलकत्ता चला आया था. बंद कमरे में वो या उसकी लाश कैसे आई सबने अपनी-अपनी तरह से सुलझा लिया. मेरी मां मानती है वो नहीं, उसकी लाश ही कमरे में लौटकर आयी थी.
मैं सोचता हूँ वो कहीं गया ही नहीं था, बरसों से उसी कमरे में बंद था.
अमित बनकर बाहर निकलने से पहले मैंने एक बार इन्ना से मिलने की कोशिश की. लेकिन वो अपने कमरे में नहीं थी. ‘उसे आज क्या बनाया होगा?’
मैं बहुत दिनों से चाहता था कि इन्ना और मैं एक ही स्क्रिप्ट में साथ हों.

तीन

मेरे बिस्तर के पास कुछ कपड़े पड़े थे. हमें हमेशा अपने कमरे में ही उस पात्र के कपड़े मिल जाया करते थे जो हमें बनना होता था.

मैंने बाहर देखा-मार्च की वैसी ही खुशनुमा सुबह जो हमेशा होती है – धूप हो या न हो. जब मैं अमित के कपड़े पहनकर बाहर आया – एक बूढ़ा आदमी बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था. हमें दूसरे लोगों से मिल कर ही सही-सही मालूम होता था कि हमें क्या करना है.

उस बूढ़े आदमी के बाल बेतरतीब बिख़रे हुए थे – उसके कपड़ों पर मैल और धब्बों की तरह और मेरा हाथ पकड़कर मुझे पास की संकरी गली में ले गया. पहले कभी वो मेरे साथ किसी स्क्रिप्ट में नहीं रहा था. न जाने या लड़ने या कुछ पूछने का कोई मतलब नहीं था. उसने कोट के अंदर की जेब से एक पर्ची निकालकर मुझे दी और कहा – ‘इसमें मेरे गांव वाले घर का पता है, तुम इसी वक्त निकल लो और जब तक मैं तुमसे सम्पर्क ना करूं वहीं रहो. आखिर उन्होंने तुम्हारे बारे में फेसला कर लिया है. वे तुम्हें अब पकड़ लेंगे’.

इतना कहकर वो गली से बाहर निकल ही रहा था कि एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उसे पकड़ लिया और फिर दो पुलिस वालों ने मुझे. यह कहने का कोई मतलब नहीं था कि मैंने कुछ नहीं किया है. अमित ने किया होगा.

चार

इंस्पेक्टर और दूसरे साथी भी पहले कभी मेरे साथ किसी स्क्रिप्ट में रहे थे. इंस्पेक्टर ने रजिस्टर में लिखने के लिए मेरा नाम बताया – अनंत. ये तो मेरा ही नाम है? मैंने कहा-‘लेकिन मैं अमित हूँ’. वो हंसने लगा. लेकिन कुछ भी लिखा नहीं गया.

एक कांस्टेबल ने कहा – ‘हर बार में झूठा, उल्टा-सीधा लिखते तो थे ही, अब नाम भी बदल लिया क्या?’ मैंने सोचा शायद यही स्क्रिप्ट हो.

मैंने कहा – ‘मैं अमित हूँ. और लिखने से तो मुझे यूं ही डर लगता है. आपको कोई गलतफ़हमी हुई है’.
इंस्पेक्टर फिर हंसने लगा. वही कांस्टेबल उस दिन का अखबार ले कर आया और बीच का पेज खोलकर मेरे सामने रखा – ‘तो ये फिर क्या है गुरूजी’?

मैंने देखा किनारे पेपर के किनारे मेरी एक छोटी सी तस्वीर थी. उसमें एक लेख था और नीचे लिखा था – अनंत भद्रवाल.
मैं लेख पढ़ नहीं सका. मुझे और बूढ़े आदमी को लॉकअप में बंद कर दिया गया था. मार्च लॉकअप में भी उतना ही खुशनुमा था. क्या स्क्रिप्ट है! मैंने सोचा. अब मुझे ये यकीन हो गया था कि मैं मां का पड़ोसी व कलकत्ता वाला अमित तो नहीं बना था.

पांच

बूढ़े ने कहा – ‘मैंने तुम्हें कितनी बार मना किया था ये सब करने-लिखने की कोई जरूरत नहीं.’
मुझे इतना समझ में आ गया था कि कुछ उल्टा-सीधा लिखने की वजह से अमित या अनंत को पकड़ लिया गया है. लॉकअप में, खुशनुमा मार्च के बावजूद, चुपचाप बैठे रहना मुझे अखरने लगा था. मैंने इंस्पेक्टर से कहा – और पता नहीं मेरा तर्क कितना कमजोर था – ‘लेकिन सिर्फ कुछ लिखने की वजह से आप मुझे बंद नहीं कर सकते?
‘लिखना वजह है. आरोप दूसरे हैं. आपने पैसों की हेराफेरी की है. और क्या आपको मालूम है, हमने आपको एक होटल में, आपके ऑफिस की स्टेनो के साथ पकड़ा है?’
उसने बिना मेरी ओर देखे कहा. फिर वही कांस्टेबल मेरे पास आया – ‘गुरु, छोकरी बहुत कमजोर निकली, उसने तो बयान भी दे दिया है’ क्या स्क्रिप्ट है! मैंने फिर सोचा.

छह

पूरे दिन हम लॉकअप में रहे. बूढ़ा आदमी मुझसे काफ़ी शिकायतें करने के बाद चुप हो गया था. मैं सोच रहा था – आगे स्क्रिप्ट को इस तरह होना चाहिए कि वे मुझे लॉकअप में ही रात को मार देते हैं और मैंने सोचा ये काम उसी मसखरे कांस्टेबल को करना चाहिए, और फिर मेरे कमरे में मेरी लाश रखकर कमरे को ताला लगा देते हैं. बंद कमरे में मैं या मेरी लाश कैसे आई, इसे फिर अपने-अपने तरीके से सुलझा लिया जाता है. अनंत या अमित की माँ मान लेती है कि कमरे में लाश ही आई थी, उसका बेटा नहीं. फिर आखिरी शॉट इन्ना के चेहरे पर. मैं सोच रहा था कि उसके चेहरे पर एकाध आंसू होता है. तभी मैंने सोचा इन्ना को भी इस स्क्रिप्ट में होना चाहिए – स्टेनो. ऐसा दृश्य हो कि वो मेरी लाश देखे और फिर बयान दे कि उसने कुछ नहीं देखा.

इन्ना के स्क्रिप्ट में आते ही मैंने स्क्रिप्ट की बजाय इन्ना के बारे में सोचना शुरू कर दिया. मुझे याद आया कि पिछली बार जब मैं उसके कमरे में आया था, उसने कहा था कि उसे उस दिन ‘इन्ना’ ही बनना पड़ा था. लेकिन पूरे दिन उसकी स्क्रिप्ट में मैं नहीं था. ‘क्यूंकि मुझे रात में होना था?’ मैंने मजाक किया था. और उसने उसे संकेत समझा था. उसने हैरतअंगेज फुर्ती  से अपने कपड़े उतारे और मेरे पास बिस्तर में आ कर पूछा – ‘क्या तुम भी आज अनंत ही थे?’
लेकिन मैं अनंत, मार्च’८५ के एक खुशनुमा दिन पुलिस के लॉकअप में बन्द था.

सात

रात को नौ बजे एक फोन आया. वो इंस्पेक्टर पायजामे और बनियान में भागता हुआ, अपने क्वार्टर से आया जो वहीं पीछे बना हुआ था. उसने हमें छोड़ दिया और कहा – ‘मैं सुबह से ही सोच रहा था कि तुम इतने निहत्थे नहीं हो सकते. फिलहाल तो छुट्टी ही समझो.’
हम बाहर आ गए. बूढ़े आदमी ने कहा – ‘मैं तो गांव जा रहा हूँ इसी वक्त.’ और वह जल्दी से एक गली में घुस गया. मेरे पास उसका गांव का पता रह गया था. उसे खुद याद तो था ना! मुझे लग रहा था कि अब मैं अपने कमरे में लौट जाऊँगा और शायद मेरी आज की स्क्रिप्ट खत्म. मुझे अब स्क्रिप्ट बेकार लगने लगी थी और भूख लग रही थी.

आठ

मैं अपनी बिल्डिंग के पास ही ढाबे में खा रहा था. जहां मैं हमेशा खाया करता था. तभी वह बूढ़ा आदमी आया और मेरे सामने ही, टेबिल की दूसरी ओर बैठ गया. ऐसा लगा वो मुझे पहचानता ही नहीं.
‘मेरे साथ खा लीजिए.’
‘जी!!’
‘आप कमाल के एक्टर हैं, ये मैं जान चुका हूँ – अब छोड़िए भी’.
‘अजीब आदमी है.’ मैंने उसी की तरह कहा और हंसने लगा.

नौ

मैं लौटने में देरी कर रहा था. सिगरेट का पैकेट खरीदा और वहीं सड़क पर इधर-उधर टहलने लगा. मैं इन्ना के कमरे में सोना चाहता था. थोड़ी बहुत ना-नुकुर के बाद वो महीने में एक-दो बार मुझे ऐसा करने देती है. अपने कमरे की चाबी को नाली में फेंक दिया ताकि इन्ना से कह सकूं कि क्या उसे अच्छा लगेगा कि मैं उसके होते किसी और लड़के या लड़की के कमरे में सोऊँ?
‘ मेरा ये मजाक काफ़ी होगा ‘ मैंने सोचा.
मुझे सड़क काले लम्बे सांप जैसे लग रही थी. जब मैं चीजों को अपने मनचाहे बेतुके  ढंग से देख सकता था. अमित बने रहते हुए ये मुमकिन नहीं था.
मुझे बिल्डिंग वो अजीब बूढ़ा नजर आ रही थी जो मुझे कभी कह सकता हो कि वो मुझे पहचानता नहीं. जब मैं बिल्डिंग यानी उस अजीब बूढ़े की ओर बढ़ रहा था तो मेरे ठीक पास वाले कमरे में रहने वाला लड़का मेरे पास आया.
‘हाय अमित!’, उसने कहा.
क्या मेरी स्क्रिप्ट अभी खत्म नहीं हुई?
वो मेरे पास आया, मुझसे हाथ मिलाया और फिर इधर-उधर देखकर, मेरे कानों में कुछ कहने लगा. जैसे कोई हमें देख रहा हो, वैसे छुपाकर.
मैं तो दिन भर बेकार था. आज मेरा काम इतना ही है. तुम तो आज की स्क्रिप्ट में दिनभर इन्ना के साथ थे. साले बहुत मज़े किये होंगे.’
तो क्या मुझे आज इन्ना के साथ होना था?

दस

‘क्या दिन काफी नहीं था? इन्ना ने मेरे चाबी गुम हो जाने वाले मज़ाक के जवाब में कहा.
‘मैं सुबह लेट उठी थी. मुझे मालूम नहीं था कि आज हम साथ होने वाले थे. मैंने सोचा आज मेरा नाम ही नहीं है. खुद अपनी स्क्रिप्ट कौन बनाए. जैसे ही बाहर निकली तुम मिल गए’
तो फिर मैं लॉकअप में क्या कर रहा था? अखबार में मेरा फोटो भी तो था. मैंने खुद को गौर से देखा – शर्ट के अन्दर झांककर.
‘तो मैं दिन में भी, और अब रात में भी हूँ?’
मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. बचने के लिए मैंने संकेत का इस्तेमाल किया.
‘नहीं’. इन्ना ने कहा और अपने कुर्ते को खोल दिया. फिर कहा – ये देखिये. आपने इतनी जोर से काटा कि मुझे ड्रेसिंग करनी पड़ी.
उसकी छाती पर बाँयी ओर रुई और टेप से एक जगह ड्रेसिंग की हुई थी. मैं उठकर उसके पास गया और रुई को उतार कर देखा. दांतों के दो गहरे निशान थे.
‘ये स्क्रिप्ट नहीं है. यहाँ ऐसी सच्ची वाली एक्टिंग दुबारा मत कीजिएगा.’
मुझे एक क्षण के लिए अपने मनचाहे बेतुके ढंग से सोचने का मौका मिला था. मैंने सोचा कि मैं पूरे दिन इन्ना के ही साथ था.

गिरिराज किराड़ू का जन्म 1975 के किसी महीने में बीकानेर में हुआ. पहली प्रकाशित कविता के लिए ही प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार मिला. उर्दू, मराठी, स्पेनिश, कातलान और अंग्रेजी में कविताएं अनूदित. आलोचना और कहानी भी लिखते हैं. हिंदी-अंग्रेजी में छपने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिलिपि’ के संपादक हैं

नया

तारीख: दो अगस्त दो हजार कुछ भी

सेवा में,

सम्माननीय प्रधानमंत्री महोदय,
भारत सरकार,
प्रधानमंत्री कार्यालय,
नॉर्थ ब्लॉक,
नई दिल्ली, 01.

विषय:  अंक गणित के एक सदियों पुराने आसुरी सूत्र में थोड़े मानवोचित परिवर्तन की खातिर महामहिम प्रधानमंत्री से एक विनम्र दरख्वास्त.

महानुभाव,

मैं, राजेश कुशवाहा, भारत देश का, नागरिक नहीं, ग्रामीण हूँ. मेरे लिये यह फख्र की बात है जो मैं अपने मुल्क के प्रधानमंत्री से मुखातिब हूँ. श्रीमान, साथ ही मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी अर्जी सुनी जायेगी वरना, आवेदन की शुरुआत में ही अत्यंत निराशाजनक बात कहने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ, मेरे लिये जीवन के दूसरे सारे रास्ते बन्द हैं.
मैं अपने कस्बे के निजी शिक्षण संस्थान में कक्षा दसवीं तक के होनहारों को भूगोल पढ़ाता हूँ. बैंक मैनेजर ने आज दोपहर का समय दिया था. पिताजी भी चाहते थे सावन के पहले पखवाड़े में ट्रैक्टर द्वार पर खड़ा हो. पिछले छह महीने से हम चक्कर काट रहे थे. सरपंच जी और लेने-देने वाले लोगों ने समय से साथ दिया. इसलिये दो चार लोगों से लेन-देन की बात तब बुरी नहीं लगती जब काम बन जाता है.

पढ़ाने से ज्यादा उबाऊ मुझे पढ़ना भी नहीं लगता है. इसलिये मैंने पहले पहल खेती का काम चुना. जमीन अपनी तो न थी, पर पट्टे के चलन और मेरे उत्साह ने बात बना दी

सर, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि सीधे आपको सम्बोधित कर, मैं आपके पद की गरिमा का मजाक नहीं बना रहा, जैसा कि चलन है. भारत जैसे सोये हुए राष्ट्र के प्रधानमंत्री की गरिमा, शक्ति और दुश्वारियों का मुझे खूब भान है. दूसरे, जैसी मुश्किलें मुझे बख्शीश में मिल गयी हैं और छोटा मुँह बड़ी बात, जिस तरीके से मैं इस आसुरी सूत्रों से तथा शक्तियों से भिड़ा हूँ, उससे मुझे यह नैतिक साहस मिला कि मैं आपसे ही अपनी बात कहूँ. तीसरे, मैं मतदान करता हूँ, मैं उन बड़े लोगों मैं से नहीं हूँ जो इस लोकतंत्र का शामिल हिस्सा तो नहीं है पर अपने हिस्से की कमाई और अपराध खूब करते हैं. शिक्षक होना मेरी पसन्द का काम कभी नहीं रहा पर, जैसा कि आप आगे के हिस्से में देखेंगे, जरूरत भी अनोखा शब्द है. पढ़ाने से ज्यादा उबाऊ मुझे पढ़ना भी नहीं लगता है. इसलिये मैंने पहले पहल खेती का काम चुना. जमीन अपनी तो न थी, पर पट्टे के चलन और मेरे उत्साह ने बात बना दी. आज की तारीख में जमीन होती तो पता है उसके पट्टे का सालाना किराया कितना होता? आप इतने व्यस्त दिखाये जाते हैं कि आपको पता भी नहीं चल सकता, देश के अर्थतंत्र से कितनी चीजें छूटी पड़ी है. पैंतीस हजार रुपए प्रति एकड़. इसे आप विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ पढ़ें. और उससे भी अनूठी बात यह कि हम, गर्जू किसान, हर वर्ष इतना देते हैं, देने के लिये तैयार रहते हैं. बीज पानी बिजली दवाइयों के खर्चे, आपकी जानकारी के लिये बता रहा हूँ, इससे अलग हैं. पहले साल मैंने दो एकड़ के पट्टे लिए और साल की दो फसलें लीं. धान और टमाटर. टमाटर के बीज थोड़े खराब निकल गये, पर उसका किस्सा अलग. मेरी मेहनत बेकार नहीं गई थी, फायदा मिला था. पिताजी भी खुश थे और इस बार हम चार एकड़ का पट्टा लेने वाले थे कि उन्ही दिनों किसी निर्माण कम्पनी ने मेरे छोटे से गांव में चार पार पुल बनाने का परोपकारी जिम्मा लिया. जी, मैं जरा सा गलत हो रहा हूँ, शायद तथ्य कुछ ऐसे हैं कि मुख्यमंत्री के तीन लगातार चुनावों का खर्चा पानी ढोने वाली यह कम्पनी है जिसे विश्वास और साथ निभाने का तोहफा मिला – अगले पांच सालों तक ये कम्पनी जितना चाहे उतने पुल, भवन, बांध का निर्माण राज्य में कर सकती है. सारे टेंडर इसी कम्पनी के नाम गये.

मेरे गाँव के जितने जमीन मालिक हैं सब बाहर रहते हैं, बड़ी बड़ी नौकरियाँ करते हैं, और कहने को अपनी जमीन से खूब प्यार करते थे. जब उस कम्पनी ने जमीन की कीमत बढ़ानी शुरू की तो सबने रोते रोते अपनी जमीन बेच दी. सबको अपनी जमीन जाने का बहुत दुख हुआ था. कुछ लोग तो उस पैसे को बैंक मे रखते हुए भी बहुत रोये थे. सर, आपसे निवेदन है कि पत्र का यह पैरा कहीं बाहर कोट ना करियेगा, क्योंकि अपनी जमीन बेचने वालों मंे ज्यादातर बुिद्धजीवी थे और इन लोगों ने अपनी सारी उम्र शब्दों की बाजीगरी के सहारे क़ाट दी. वो आपको ही गलत साबित करने लग जायेंगे. वो ये साबित करेंगे कि जमीन बेचना उनकी मजबूरी थी. वो कोई आन्दोलन नहीं कर सकते थे क्योंकि इस देश मंे आन्दोलनों का हश्र वो लगातार देखते आये हैं.

उस समाचार चैनल और समाचार पत्र के सम्पादक का नाम आपने सुना ही होगा, मेरे ही गाँव का है और जमीन बेच कर सबसे ज्यादा पैसा उसी ने कमाया, इसलिये सबसे ज्यादा दुखी भी वही होगा. आप जैसे ही कुछ कहेंगे, वो सम्पादक आपकी सरकार और पार्टी के खिलाफ खबरें छापने लगेगा फिर आपको उसे मोटा विज्ञापन और राज्य सभा की कुर्सी देनी पड़ेगी. पर इसमें भी नुकसान आपका नहीं होगा. मेरा होगा. पिछले पांच वर्षों से मैं उससे नौकरी मांग रहा हूँ और वो मुझे पिछले पांच सालों से नौकरी नहीं देने का सटीक बहाना ढूंढ रहा है. उसे बहाना मिल जायेगा.

गाँव अब मेंढक का खुला हुआ पेट हो गया है, जिसे हाईस्कूल में जीवविज्ञान पढ़ने वाली कोई लड़की ठीक से सिलना भूल गई है. मेंढक अपनी आंतें बाहर झुलाये इधर उधर फुदक रहा है

वैसे मैंने पहले साल जिनकी जमीन पट्टे पर ली थी वे देश के बड़े नामी मास्टर और साहित्यकार हैं. एक पत्रिका के सम्पादक भी हैं. और इस बात के लिये ख्यात हैं कि आज तक उन्होंने कभी किसी को अपना वोट नहीं दिया पर सरकारी विज्ञापन और वेतन उठाने में उस्ताद हैं. जब जमीन लूटी जा रही थी (मेरे हिसाब से लूटना ही था) तब मैं उनके पास गया था. राजधानी में रिहाइश रखते हैं. जब मैं उनके पास पहुंचा तब वे दो-दो आलेख लिख रहे थे. एक जमीन छीनने के पक्ष में और दूसरा, जाहिर है, जमीन छीनने के विरोध में. दोनों आलेख साथ ही साथ पूरे हुए. उन्होंने मुझे पढ़ाये. लगा कि वाह! क्या बुद्धिजीवी है! मेरे तारीफ करने से वो खुल गये और मेरे तत्कालीन सपनों पर पानी बहा दिया. कहा: जमीन का मन माफिक दाम मिल जाये तो सरकार को झूठ की परेशानी में डालने की क्या जरूरत? है कि नहीं? मैंने कहा: है.
जिस किसी के पास मैं अपनी मुश्किल ले कर गया सबने यही कहा, “इसमें नया क्या है?” जबकि सभी जानते हैं कि हर रोज लगने वाली भूख नई होती है, रोज उगने वाला सूरज नया होता है और उतने ही महत्व का जितना पिछले रोज का सूरज या पिछली भूख. कुछ लोगों को मेरा दुख मजा देने लगा था और मेरा दुख सुनने के लिये मुझे दूर दूर से बुलावे आने लगे. मेरा दुख सुन के कहते, “इसमें नया क्या है?”

जब पुलों के बनने की कवायदें शुरु हुईं और जमीन जाती रही तब से मैंने कस्बे के मॉडर्न एकेडमी में पढ़ाना शुरू किया है. मेरी मार-पिटाई स्कूल में प्रसिद्ध है. जिस दिन मैं दाहिने हाथ से अंगूठी उतार बायें में डाल लेता हूँ उस दिन किस कक्षा पर शामत टूटेगी ये मैं भी नहीं जान रहा होता हूँ.

सरकार के पैसों की कोई फिक्र भले नहीं पर पुलों ने हमारे गाँव का ढाँचा ही खराब कर दिया. छोटे से गाँव में चार-चार पार-पुल और दो हाई-वे. सामान्य पूर्णविराम के बाद इस खराब वाक्य को एक बार विस्म्यादिबोधक चिह्न के साथ पढ़ंे. मेरा गाँव अब किसी मेंढक का खुला हुआ पेट हो गया है, जिसे हाईस्कूल में जीवविज्ञान से पढ़ने वाली कोई लड़की ठीक से सिलना भूल गई है. मेंढक अपनी आंतें बाहर झुलाये इधर उधर फुदक रहा है. हम रोज रोज मिलने वाले लोग थे और अब तीज त्योहार पर मिलना भी मुहाल हुआ है. जमीन पर चलते सारे रास्ते बन्द कर दिये गये हैं ताकि ग्रामीणों को पार पुल की आदत लगे. साइकिल चढ़ाते हुए मेरी सांस फूल जाती है और मैं रोज ही देर कर जाता हूँ. जैसे कि आज.

जब मै उछल कर साइकिल पर चढ़ा तभी अचानक मेरा ध्यान राजकुमारी कुशवाहा और उनके बछड़े मुन्नन पर गया. मैंने देखा, मुन्नन अपना खुर खुजला रहे हैं और राजकुमारी देख रही हैं. कल भी मैने हू-ब-हू यही दृश्य देखा था और सोचा था शाम को खुरपका की दवा ले आनी है. पिताजी ने भी कितनी बार कहा होगा. करीब दस या बीस बार. जब से रिटायर हो कर आये हैं सब-कुछ ऐसे देखते-निरेखते हैं जैसे विछोह का अपराधबोध हो. उनकी बातचीत पर ना जायें, भाव भंगिमायें ऐसी बनाये रखते हैं जैसे अगले ही पल घर का तिनका-तिनका सहेज देंगे. सेवानिवृति के बाद जो डेढ़ लाख मिले हैं उनमें उनकी योजनायें सुनेंगे तो चौंक जायेंगे. पर अब ट्रैक्टर लेना है. और आज इंतज़ार की आखिरी तारीख थी. जब अपने राम खेती कर रहे थे तब तो कभी अपना ट्रैक्टर नसीब नहीं हुआ. किराये पर लेकर जुताई कराये. पिताजी की इच्छा है कि अपना ट्रैक्टर हो और किराये पर चले. आज बैंक मैनेजर कागजात पर दस्तखत कर देंगे और कल ट्रैक्टर अपने द्वार पर होगा. पर आज स्कूल आते हुए देर हुई तो डर लगा कहीं दोपहर में बैंक जाने से पहले प्रधानाचार्य किच-किच ना मचाये.

प्रधानाचार्य की खिड़की से झाँक कर देखा, झौं झौं चल रही है या नहीं? चल रही थी. राहत मिली कि आज देर से आने का सबब नहीं पूछा जायेगा. मेरा सारा ध्यान इस बात पर लगा था कि कहीं कोई ऐसी गलती न हो जाये जिससे आज दोपहर बैंक जाने की छुट्टी ही ना मिले. अध्यापक कक्ष में नागेन्द्र जी मिल गये. ये कक्षा सप्तम ‘ब’ के कक्षाध्यापक हैं और भाषा के काटे हुए हैं. परनामी के बाद बोल पड़े: राकेश जी, स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में जो प्रभातफेरी आयोजित होनी है मैं उस दल का नेतृत्वकर्ता हूँ. तैयारियाँ जोर शोर से चल रही हैं, यही वजह है कि मैं व्यस्त हूँ. अतएव कृपया आप दोनों वर्गों की कक्षायें सम्मिलित रूप से ले लेवें.

मैने चॉक, डस्टर और रजिस्टर उठाते हुए कहा: क्यों ना मैं तीनों वर्गों की कक्षायें सम्मिलित रूप में ले लूँ? ऐसा मैंने क्यों कहा ये मैं भर ही जानता हूँ. मेरा बैंक लोन तीन लाख का है और आजकल मुझे सब कुछ तीन के पहाड़े में ही दिखता है. पर इसका अर्थ नागेन्द्र समझ नहीं पाये ‘अतएव’ बेहद विनीत मुद्रा में लटकते हुए कहा, “होs होs होs आप तो राकेश जी खा-म-खा कुपित हो जाते हैं, मैं तो अपनी समस्या का आसान निवारण ढूंढ़ रहा था.“  मैं जानता था कि नागेन्द्र भाषा का जानकार होने के साथ ही प्रधानाचार्य का चम्मच भी है. कोई खतरा मोल लिये बिना मैं सम्मिलित कक्षा के लिये तैयार हो गया. आज कल मुझे हुआ क्या है कि मैं ट्रैक्टर और तीन के अलावा कुछ सोच विचार भी नहीं पाता हूँ. दो कक्षायें साथ में चल रही थीं फिर भी माहौल हल्का और स्वस्थ था. नहीं पढ़ने के उस्तादों ने सुझाया , आचार्य जी सामान्य ज्ञान के प्रश्न पूछें. मैंने जाने कैसे पूछ दिया, ट्रैक्टर में कितने पहिये होते हैं? विद्यार्थियों को आप थोड़ी छूट दीजिये फिर देखिये इतने छोटे से प्रश्न का उत्तर देने मे वो कितनी घंटियाँ गवाँ देंगे? किसी ने कहा, चार. किसी ने कहा, छह. जिसने छह कहा वो तन कर खड़ा हो गया. जैसे समूची कक्षा से कहना चाहता हो कि है कोई माई का लाल जो बता दे ट्रैक्टर में छ: पहिये कैसे होते हैं? किसी विद्यार्थी ने उसके तनाव में दिलचस्पी नहीं दिखाई. सभी इस अन्दाज में ऐंठे रहे कि छह हो या सात, हमें क्या पड़ी है. मेरा दिमाग जरूर घूम गया था. मैंने डरते डरते कहा: ट्रॉली के पहियों को जोड़ कर बता रहे हो क्या? वो सकुचाकर बैठ गया.

जो ब्याज दर मेरे सामने रख दी गई थी उसके बाद छोटी से छोटी संख्या भी मुझे हताश कर देने के लिये काफी थी. उसी वक्त मैंने यह तय किया कि मैं बच्चों के पास जाऊंगा

मेरे जेहन में तभी यह उभरा था कि ट्रैक्टर के साथ ट्रॉली मुफ्त नहीं मिलती है. उसे अलग से खरीदना पड़ता है. मतलब ट्रैक्टर से कमाई करने में ट्रॉली का साथ जरूरी है. माल असबाब की ढुलाई हो, शादी बारात में नाच ले जाना हो सबमें ट्रॉली ही महत्व रखती है. खेती से कमाई तो मौसमी कमाई है. मैं जानता हूँ कि मेरे पास ट्रॉली खरीदने भर के रुपए अगले साल छह महीने तक नहीं होने वाले हैं. आप यकीन करें महोदय, ऐसी लाचारी में एक शिक्षक का गुस्सा जायज है. मैने उस छात्र को खड़ा किया और डराने के अन्दाज में समझाया: जब तक कोई ऐसी कम्पनी नहीं आ जाती है जो ट्रैक्टर के साथ ट्रॉली भी बनाये तब तक मेरे प्रश्न का जबाव है, चार पहिये.

दूसरी घंटी के बाद मैं बैंक के लिये निकला. उपर आसमान देखा, बादल नहीं थे. मुझे इतनी खुशी हुई कि हुई ही नहीं. धान की रोपाई का हरा मौसम है. बारिश होगी और ट्रैक्टर मालिकों के भाव उछल जायेंगे. एक सौ बीस रुपए प्रति बीघे की दर चल रही है. कल जब मेरा ट्रैक्टर आ जाये तब जितना मर्जी हो उतना बरस लेना मेरे ईश्वर. पिताजी के साथ सेक्रेटरी साहब, सरपंच लोग भी बैंक आये थे. लोन के पैसे में से इन बेचारों ने अपना हिस्सा पहले से तय कर रखा था फिर भी ये इतने भले लोग हैं कि आज भी आये हैं.

मैनेजर साहब ने उठ कर स्वागत किया. चाय आई. पी गई. पिताजी ने कई एक कागजों पर अपने हस्ताक्षर परोसे. पिताजी ने यह भी सोचा कि लगे हाथ पेंशन के कागज भी तैयार हो जायें पर एक साथ सभी ने ऐसी तेजी दिखाई कि पिताजी खुशी के मारे चुप हो गये. मैनेजर साहब ने बताया कि खेती से फिर से सोना उगने लगे ऐसे ऐसे खाद, बीज, ट्रैक्टर, मौसम और पानी किसानों को उपलब्ध होने लगे हैं. सर, यहीं वो बात हुई, जिसे लेकर मैं आप तक आया हूँ.

बंगाली बाबू, जो क्लर्क और ना जाने क्या क्या थे, से मैंने आखिरकार पूछ ही लिया कि ब्याज कितना लगेगा? सर, जब से मैंने वो रकम सुनी है, जो मुझे बैंक को चुकानी है तब से मैं सच में बहुत परेशान हूँ. आप भी कहेंगे इसे पहले ही पता कर लेना था? पर क्या आप बैंक वालों की तकनीक से वाकिफ नहीं हैं? शुरुआत में उन्होने चीजों को इतना सरल करके बताया कि लगा, ये रहा ट्रैक़्टर और वो हुई कर्ज की वापसी. गाँव के वे लोग जो हमें कर्ज दिलाना चाहते थे उन्होने कभी यह जानने नहीं दिया कि ब्याज कितना होगा और चुकाने के साल कितने मिलेंगे?

और सबसे ऊपर अपना दोष. मुझे नहीं पता, आप इस पर कितना भरोसा करेंगे पर कहना मेरा फर्ज है. हम, पिता और पुत्र, किसी जादू में उलझ गये थे और चाहते ही नहीं थे कि हमें कुछ बुरा भी मालूम चले. हम हर वक्त यही चर्चा करते रहते थे कि ट्रैक्टर आ जायेगा तो जीवन कैसा खुशहाल हो जायेगा? गाँव के बचे खुचे बीघों का आंकड़ा बिठाया करते थे. ट्रैक्टर अगर एक सपना था तो पिताजी ने मुझसे छुपा कर यह सपना मेरे लिये ही देखा था जब राज्य सरकार और एक सीमेंट कम्पनी ने मेरे खेती करने के स्वाभिमानी फैसले पर चार पार पुल बना दिये थे. पिताजी नौकरी के लिये रिश्वत दे नहीं सकते थे और मेरी सारी असफलताओं को स्वीकार करते हुए अपनी आखिरी जमापूंजी मुझ पर खेल गये. ऐसे में उन्हें यह सुनना भी बुरा लगता था कि कहीं अन्य जगहों पर भी किसी बहाने ब्याज की बात चल रही है.

मैं मन ही मन कोई बेहद मामूली दर सोचता जो बैंक मुझ पर थोपने वाला था. पर मुझे सरकार और जनतंत्र का ऐसा नशा था कि मैं यह जान लेने के बाद भी विश्वास नहीं कर पा रहा था कि, सरकार ने अपनी प्रजा के लिये इतनी ऊंची सालाना दर तय की है. आप सरकार हैं और मेरा यकीन करिये मैं इतनी मोटी और गैरजरूरी रकम चुका ही नहीं सकता. जब मेरी गर्दन फंसी है तब मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि चक्रवृद्धि ब्याज का यह सूत्र जानलेवा है. सामंती है यह सूत्र जिसके बिना पर कितनों की नींद रोज हराम होती है. सूत्र की काली आड़ ले कितने अपराधी अपना गुनाह महसूस तक नहीं कर पाते. रतजगे अब कर्ज के कारण होने लगे हैं ये आप किसी सर्वे में आसानी से जान सकते हैं. किसी सुदूर द्वीप में नहीं अपने ही भारत में आत्महत्याओं के अन्तहीन सिलसिलों की खबर आप तक नहीं पहुंचती होगी, इस पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं है. लोग आत्महत्याओं मैं भी नया खोजने के आदी हो चुके हैं और अब मेरी उम्र के खिलाफ वो आत्महत्या की तकनीक आजमाना चाहते हैं.

आप मेरा यकीन करें, कर्ज की सबसे बड़ी चालाकी उसकी पहली किस्त में छुपी होती है. उसका मारक असर तब दिखता है जब हम पहली किस्त चुकाते हैं. बीस सालों तक मुझे चुकाना है. मैं तबाह हो जाऊंगा. मेरे साथ मेरे स्वप्न ध्वस्त हो जायेंगे. जब बीस सालों बाद मैं कर्ज चुकता कर उठूंगा, ये सर्वाधिक सुखद संकल्पना मैं आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ, तब मैं इस शेष और धूसर जीवन का क्या करूँगा. इस यकीन की भी कोई सुखद वजह नहीं है कि यह टैक्टर बीस सालों तक चलता चला जायेगा. आय का एकमात्र स्रोत यह ट्रैक्टर है. हम गाड़ी बंगला वाले लोग नहीं हैं. यकीनन, मैंने यह कर्ज किसी हराम आराम के नाम पर नहीं लिया है.

इसका समाधान आप कर सकते हैं. इस सूत्र की राक्षसी ताकतों को कुचल दीजिये. इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. जैसे विकास का कोई फर्क नहीं पड़ा. सत्तर के दशक में पुल बनवाने के लिये लड़ाइयाँ लड़ी गईं और उस समय सरकार ने इन चीजों को गैर जरुरी माना था तब भी हम ऐसे ही थे जैसे आज जब हर जगह, हर नदी नाले पर निर्माण उद्योग पनप रहा है. ये तर्क ही गलत है कि बैंक अपने कर्मचारियों के हित के लिये ब्याज लेता है. बैंक मुनाफा कमाने के लिये सूद लेता है जिसमंे, बुरा ना मानें, आप भी भागीदार हैं. ऐसे तमाम रास्ते निकाले जा सकते हैं जिससे इस सूत्र को थोड़ा मानवीय स्वरूप दिया जा सके. आप खुद इसका वर्तमान स्वरूप देख लें:

मिश्रधन= मूलधन(1+ दर/100)n
जहाँ n = समय

अगर आप ऐसा करते हैं तो लोग खुद ब खुद इस सारी प्रक्रिया को नई बात मान लेंगे.
सर, मानवीय स्वरूप से मेरा अर्थ किसी परोपकार से नहीं बल्कि सर्वजनहित से है. आप इस देश के प्रधानमंत्री हंै और सीधे अर्थों में कहें तो लोक कल्याण की जहीन भावना भी रखते हैं. आप यह भी जानते हैं कि गणित दोमुहाँ नहीं होता. एक मतलब एक. गणित में नौ और दो सचमुच के ग्यारह होते हैं. अंक झूठे नहीं होते. और बेईमान तो हर्गिज नहीं. उल्टे मैं तो कहूंगा कि गणित पालतू होता है. गणित चाह कर भी भौतिकी जितना आजाद और इतिहास जितना गलत नहीं हो सकता. फिर भी सभ्यताओं को शर्मिन्दगी तक पहुंचाने में इतिहास से ज्यादा गणित का इस्तेमाल हुआ है. फटा हुआ नोट भी अपने मूल्य के बराबर ही चलना चाहता है. इसका सीधा और सच्चा अर्थ है कि सूत्रों को एक बार जो आदेश आप देंगे, आप जैसी हस्ती जो सच को झूठ और झूठ को उतना ही बड़ा सच बना देने की क्षमता रखता हो, वो उसे मानने को विवश होंगे.  

इस सूत्र में बदलाव सम्भव है. जाहिर है इसका विरोध आपके प्रिय बैंकर और आपके उतने ही अजीज देश के लाखों साहूकार करेंगे. मैं आपके सामने अपनी कक्षा की मिसाल पेश करता हूँ. जब मैं बैंक से बाहर निकला तो ग्राम प्रधान ने चेयरमैन की कोठी दिखाई और किसी आश्चर्यलोक में डूबते हुए कहा: कोई जानता था कि एक ट्रैक्टर के सहारे यह अभागा इतनी ऊंची पदवी तक जा पहुंचेगा. मैं उनकी बात पर विश्वास करना चाहता था पर तब तक पिताजी भी बैंक से बाहर निकल आये. वो जैसे किसी भी सुख, दुख से उबर चुके थे तभी शायद बाहर आते ही मुझसे उन्होंने मुन्नन के खुरपके की बात चला दी. किसी को जो सुहाया हो. सब के सब ट्रैक्टर के सपने में मगन रहना और रखना चाहते थे. पिताजी चाहते थे मैं खुरपके की दवा लेकर आऊँ. फिर जाने क्या सोच मुझे स्कूल भेज दिया और खुद दवा लेने चले गये.  मैं जितना खुश होना चाहता हूँ, चाहकर भी नहीं हो पा रहा हूँ. ऐसी उदासी नहीं है जो सफलता के साथ साथ चली आती है. मुझे मुश्किल साफ साफ दिख रही है. स्कूल के अध्यापक कक्ष में किसी से बात करने की जरा भी इच्छा नहीं हुई. कुछ देर महापुरुषों की तस्वीरों के साथ उनकी जगतप्रसिद्ध सूक्तियों को देखता रहा. सप्तम ‘अ’ में भूकम्प पढ़ाना है. कक्षा तक पहुंचाने वाले गलियारे में अजब कसकता एहसास हुआ.

दोपहर के भोजन के बाद की यह पहली घंटी है. गलियारा खाली पड़ा है. पर कुछ इस तरह जैसे वहाँ उठती गर्द यह बता रही है कि यह अभी अभी खाली हुआ है. गलियारे में बच्चे नहीं हैं पर उनका गिरना, उठना उनकी आवाज वहीं मौजूद जान पड़ती है और जैसे ये सारी गतिविधियाँ भी उठ के जाने की तैयारी कर रही हों. मैं खूब परिश्रम से अपने आप को यह सोचने पर मजबूर करता हूँ कि अनुपस्थिति भी अपने आप में समय सापेक्ष होती है. इतना कुछ सोचते हुए मैंने खुद को एक बात याद दिलाने से रोक ले गया था कि पिताजी को रिटायरमेंट के बाद इतने कम पैसे क्यों मिले? श्यामपट्ट पर मंैने पाठ का शीर्षक लिखा. आज मैं नाराज था फिर भी विद्यार्थियों को पीटने की एक जरा इच्छा भी नहीं हुई. मेरी मन:स्थिति को विद्यार्थी बूझ लें, इतना समय मैंने उन्हें दिया और इस बीच समय में मैने श्यामपट्ट पर हीरे का चित्र बनाया. चित्र के नीचे कुछ लिखा और लिखने के बाद बोल बोल के पढ़ा – चक्रवृद्धि ब्याज. गणित से सब डरते हैं, मेरी मंशा ना समझ पाये छात्रों ने समवेत स्वर में कहा, आचार्य जी गणित अब और नहीं, सुबह से गणित की तीन घंटियाँ हो चुकी हैं.

सर, मैं आपको बताऊँ, चाहता तो दो एक पल में अपने लोन पर लगने वाला मिश्रधन मैं पता कर सकता था पर मैं बुरी तरह अकेला पड़ चुका था और डर चुका था. जो ब्याज दर मेरे सामने रख दी गई थी उसके बाद छोटी से छोटी संख्या भी मुझे हताश कर देने के लिये काफी थी. उसी वक्त मैंने यह तय किया कि मैं बच्चों के पास जाऊंगा. सारे बच्चों ने सूत्र रट रखे होंगे पर नये की सम्भावना इन्हीं के पास है या इतना तो विश्वास से कह सकते हैं कि नये की सम्भावना यहाँ ज्यादा है.

मैं धीरे धीरे अपना आपा खो रहा था और श्यामपट्ट पर चॉक को किरकिराते हुआ लिखा: तीन लाख. छात्र मेरी खामोशी से परिचित थे इसलिये उनमें से किसी ने नहीं पूछा, यह तीन लाख है क्या? फिर मैं तन्मय हुआ और शिक्षक के किरदार में लौटा, श्यामपट्ट पर लिखा साफ किया और पुन: लिखा:

मूलधन= 300000 रूपये समय =  20 वर्ष
 दर =  9% मिश्रधन = ? किस्त प्रति महीने = ? 

सवाल दो थे और चॉक को मेज पर रखते हुए मैं पूरा का पूरा तैयार हो चुका था. यही मेरे लिये आखिरी मौका था जब मैं विद्यार्थियों में जरूरी अनुशासन या खौफ भर पाता. समूची कक्षा चुप थी. मेज पर दो बार डस्टर पटकते हुए मैंने कक्षा को निहारा. जब सारे मेरी तरफ देखने लगे तब कोई भी दया मेरे सारे स्वप्नों को धराशायी कर सकती थी. मैंने सबको दिखाते हुए दाहिने हाथ से अंगूठी निकाल कर बाईं में डाल ली. मेरी आवाज में जो गम्भीरता थी वो हरेक की आवाज में तब पाई जा सकती है जब उसका सर्वस्व दांव पर लगा हो. मेरी तरफ से जो बच्चों ने जो सुना वो यह था, “यह प्रश्न अंकगणित का है और ऐसे सवाल आप पांचवीं कक्षा से हल करते आ रहे हैं, मैं यह नहीं जानता कि आप इसे कैसे करेंगे पर मैं सबकी कॉपी देखूंगा. आज जो छात्र मार कुटाई से बचना चाहता है उसके लिये शर्त है कि उसका उत्तर सबसे न्यूनतम हो. आपके पास अगले पाँच मिनट हैं”.

छात्रों को सवाल दे जब मैं खिड़की तक आया तो बाहर एक गाय चर रही थी. मुझे राजकुमारी और मुन्नन याद आये. मुन्नन का खुरपका याद आया. खुरपका नया मर्ज नहीं है, सर्वाधिक विश्वसनीय तथ्यों तक जायें तो बाबर के घोड़े को खुरपका था. पर तकलीफ यह कि मेरे जेहन में खुरपके की दवाई की कोई शक्ल नहीं थी. इतना निचाट था कि लगा मैं फफक पड़ूंगा. मैं यह कर्ज तुरंत के तुरंत वापस करना चाहता था.

मैं ट्रैक्टर और इसके सपनों को किसी अतल गहरी खाई में फेंक आना चाहता था. मैं पट्टे की ही सही पर खेती की जमीन चाहता था. इस बार मैं शर्तिया टमाटर की लहरदार पैदावार लेता पर जमीन पर पुल बन चुके थे. कर्ज बैंक से मिल चुका था और स्वप्न लंगड़े कुत्ते की तरह मेरे आगे आगे दिख रहा था. मुझे लगा मैं किसी विद्यार्थी को उठाऊँ और उसे पैरों से पकड़ कर उसका सर अपनी मेज पर दे मारूँ. जहाँ मुझे हत्या करने तक का अधिकार मिला था वहीं मैं अपने गुस्से को दबा नहीं पा रहा था. सबने सवाल हल कर लिये थे पर दिखाने से डर रहे थे और इसी कारण सर अभी भी कॉपी पर झुकाये हुए थे. मेरी आवाज अभी भी दमदार थी, जब मंैने आदेश दिया: लिखना बन्द. पहली बेंच के एक लड़के को कान से उठाया और जब तक वो रो पाता तब तक मैंने उसे आदेश दे दिये थे: सबकी कॉपी जमा करो. तकरीबन या कुल तीस कॉपियाँ थीं. खिड़की से मेज तक आने जितने समय में जाने क्या हुआ कि मेरी आंखें झिलमिला गईं. अट्ठाईस वर्ष के नौजवान या बूढ़े के लिए यह अनुचित है. मेरी उम्र रोने की हर्गिज नहीं है. मुझे अपनी यह हरकत कत्तई बर्दाश्त नहीं हो रही थी पर पुस्तिकाओं में मुझे जरा भी कुछ दिख नही रहा था. वैसे भी मैं इतना कमाने वाला नहीं हूँ जो अगर कोई सूत्र ढूंढ भी ले तो लागू कर पाये. आपके लिये यह खेल चुटकियों का है. आप चाह लेंगे तो इसे संविधान में भी दाखिल करा सकते हैं. शायद बच्चों ने मेरे आँसू भाँप लिये थे तभी वो बिना किसी आज्ञा के कक्षा से बाहर चले गये. जब कुछ भी सम्भव ना हो सका तो मैने विद्यार्थियों की कापियाँ समेटी और बाहर निकल आया.

अभी मैं सरयू के तट पर बैठा हूँ और बहुत दूर से कोई नाव आती दीख रही है. रामायण के किस्सों का निहायत आखिरी प्रसंग लगातार याद आ रहा है. जैसे-जैसे अन्धेरा बढ़ता जा रहा है अपनी ही लिखावट देखने में मुश्किल आ रही है. आपको लिखते हुए मेरी कोशिश रहेगी कि बच्चों की उत्तर पुस्तिकाओं का पुलिंदा भी आप तक जा पहुंचे. इससे कोई रास्ता मिलेगा. कई बार मंजिल तक पहुंचाने वाले रास्ते से ज्यादा जरुरी उस रास्ते का पता लगाना होता है जो हमें मंजिल के रस्ते पर ले आये. देर सबेर जो भी मिलता है मंजिल तो उसे समझ ही लिया जाता है.

मुझे अन्धेरे की फिक्र नहीं है, मुझे फिक्र उस आने वाली नाव के मल्लाह की है. उसके आने से पहले यह खत पूरा कर लूँ तभी उससे अपना हाथ दिखा पाऊँगा. आज तक ज्योतिष में विश्वास करने का कोई कारण नहीं था, अब नहीं करने का कोई कारण नहीं है. इस मल्लाह की ज्योतिष के किस्से मशहूर होने की काबिलियत रखते हैं. मैं इससे तीन सवाल करूंगा. पहला: मेरा अतीत कैसा रहा है? दूसरा: मेरे पिताजी को सेवानिवृति के बाद इतने कम पैसे क्यों मिले या दूसरा सवाल यह भी हो सकता है कि पुल बनने और नहीं बनने के पहले के जीवन में आये फर्क को मिटाया जा सकता है? परंतु तीसरा सवाल तो यही रहेगा: क्या मैं ट्रैक्टर की ड्राईवरी सीख सकता हूँ?

ट्रैक्टर ड्राईवरी जरूरी है. क्योंकि जिस अन्दाज का कर्ज है उसमें किसी बाहरी ड्राईवर को सात सौ महीना और दो जून का खाना देना अतिरिक्त खर्च होगा. अगर मैं खुद ड्राईवर रहूँ तो इतना रूपया हर महीने की किस्त में जुड़ता चला जायेगा. यह तब तक जब तक आपकी तरफ से हमारी मदद का कोई सूत्र ना आये. मुझे कर्ज की माफी भी नहीं चाहिये. मुझे इंसाफ के अलावा साबुन सोटा सर्फ कुछ नहीं चाहिये. और इंसाफ है कम ब्याज. कर्ज लिया है और उसे चुकाना हमारा धर्म है पर अनाप शनाप ब्याज के साथ नहीं. इसके लिये, सर, मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप चक्रवृद्धि ब्याज के सूत्र में कोई ना कोई मानवोचित परिवर्तन जरूर करायेंगे.

भवदीय,
राकेश कुशवाहा बौली, लार
देवरिया(उ.प्र.) पिनकोड: 20001
………………………………………………………………….

पत्र की प्रतिलिपि:
1) ईश्वर के लिये : आदरणीय महोदय, आपके बारे में कितना कुछ सुना है, लोग आपकी पूजा करते हैं, सदियों से आपके लिये जान लेते रहे हैं, आपको सर्वशक्तिशाली कहते हैं पर मैने आज तक आपका कोई कारनामा नहीं देखा. इस बार कुछ चमत्कार दिखायें. इस गन्दे सूत्र में एक जरा मानवीय बदलाव भी समूची मानवता के हित में होगा. लोग नीन्द भर सोयेंगे और पेट भर खायेंगे. नस्लें सुधर जायंेगीं और आप पर हो रहे अथाह खर्चे का एक औचित्य भी दिखेगा. यह आपके लिये आखिरी मौका है, मेरे ईश्वर.

2) अमेरिकी राष्ट्रपति के लिये : क्षमाप्रार्थी हूँ कि आपका नाम ईश्वर के बाद लिया. दरअसल यह जमाने की पुरानी टेर है वरना सच्चाई से आप भी वाकिफ हैं कि आपमें और ईश्वर में मुकाबिला हो तो कौन बीस छूटेगा. क़ृपया, आप मेरे जीवन मरण के इस सवाल में जरा भी दिलचस्पी दिखायें, फिर तो आपकी देखा देखी यह नकलची और पिट्ठू दुनिया इस जीवन मरण जितने मुश्किल सवाल को हल करने में भिड़ जायेगी. क्या पता, ईश्वर से आप इस बार बाजी मार ले जायें, यह आपकी ताकत का सत्यापन होगा. 

चंदन पांडेय का जन्म 9 अगस्त, 1982 को हुआ. हमारे समय के चुनिंदा युवा कथाकारों में से एक हैं. कहानियों की पहली किताब ‘भूलना’ के लिए 2007 में भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार मिला. आजकल करनाल में रहते हैं.

रेडियो

 उन्हें चिप्स खाने का बहुत शौक था और कोल्हू से निकलते गर्म गर्म गुड़ का. उनके शौक ज़्यादा महंगे नहीं थे, मगर पैंतीस की उम्र के बाद वे दोनों ही चीजें नहीं खा पाएज़िद और अनशन उसके लिए आम थे, लेकिन हमारे लिए नहीं. हमारे लिए सिर्फ आम ही आम थे या निरंतर उनकी चाह. वह हमारी माँ थी और वह हमारी छाती में चाक़ू घोंपकर हमें मार भी डालती तो भी हमें चाहिए था कि चूँ भी न करें. मगर अपने गुणसूत्रों में ही हम विद्रोही थे…हम सब- पापा, मैं और भाई. गुस्सा आने पर हम तीनों चिल्लाते थे, चीजें तोड़ते थे या रोने लगते थे. इसीलिए अनशन हमारे लिए इतिहास की किताबों की कोई चीज थी या कोई अखबारी शब्द.

जब मैंने यह कहानी लिखना शुरु किया, तब तक इसमें जावेद और शाहरुख़ ही थे. मैं शाहरुख़ की सारी िफ़ल्में बार बार देखा करती और उनमें जावेद को उसकी जगह रिप्लेस करके बहुत सारे सपने बुनती. जावेद रेडियो जॉकी था. मैंने अख़बार के फिल्मी गपशप वाले पन्ने पर पढ़ा था कि ‘मुन्नाभाई’ वाली फिल्मों के जो निर्देशक हैं..मुझे उनका नाम बिल्कुल भी याद नहीं आ रहा…देखिए मेरी इतनी अच्छी याददाश्त थी, वह कैसे पिछले दिनों में जाती रही है…चलिए छोड़िए, जो भी हैं, उन्होंने कहा था कि वे पहले शाहरुख़ को ही मुन्नाभाई बनाना चाहते थे. यदि ऐसा हो जाता तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में भी शाहरुख़ ही होता और तब मैं उसे जावेद से रिप्लेस करके सपना देखती और तब मैं उसकी हीरोइन की जगह होती और इसलिए रेडियो जॉकी होती.

मैं भी अपने जावेद के लिए चिल्ला चिल्लाकर इस तरह ‘गुड मॉर्निंग’ बोलना चाहती थी कि पूरा देश सुनता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शाहरुख़ की पीठ में दर्द रहने लगा था और उसी गति से मेरी सब कहानियों और सपनों में माँ आती जा रही थी. वह बार बार मुझे डाँटती और परिवार की इज्जत का ख़याल रखने की नसीहत देती. कभी प्यार से अपने पास बुलाती और समझाती कि यह जो उम्र है, पन्द्रह-सोलह के आसपास की, इस उम्र में पागल हो जाने या घर से भाग जाने का बहुत मन करता है, इसलिए मैं ये जावेद जावेद के सपने न देखूँ और पढ़ाई में ध्यान लगाऊँ. वह चाहती थी कि मैं एम ए कर लूँ और पंचायती राज के किसी स्कूल में मास्टरनी बन जाऊँ. मास्टरनी बनना मेरे पूरे कस्बे को बच्चों के खेल जैसा लगता था. जो कुछ और नहीं बन पाता था, यही बन जाता था. मैं घंटों दीवार को देखते हुए इन उबाऊ सपनों पर रोया करती, जो शोर मचाते बच्चों और छुट्टी की घंटी के इंतज़ार से जुड़े होते थे. मैं अपने जावेद के पास चली जाना चाहती थी, लेकिन रेडियो पर वह अपना पता या फ़ोन नम्बर कभी नहीं बताता था.वह हमेशा हँसने के मूड में रहता था और मुझे लगता था कि उसके साथ रहना आसमान में रहने जैसा लगेगा. वह अपने शो में एक नम्बर तो देता था, मगर वहाँ का फ़ोन तो हमेशा बिज़ी जाता रहता था. मैंने उस रेडियो स्टेशन के पते पर उसके नाम से बहुत चिट्ठियाँ भी लिखी, मगर शायद वह व्यस्त रहा हो और इसलिए चाहकर भी जवाब न दे पाया हो. मुझे लगता था कि किसी दिन वह ख़ुद हमारे घर आएगा और मुझे अपनी गोद में उठाकर अपनी सब व्यस्तताओं के लिए माफ़ी मांगेगा. मैंने सोच रखा था कि पाँच सात मिनट तक नखरे करूँगी और फिर मान जाऊँगी.

मैंने माँ को कभी टीवी देखते या रेडियो सुनते नहीं देखा. हाँ, अक्सर रेडियो वाली अलमारी के पास से गुज़रते हुए उसकी आँखों में आ जाने वाली एक चमक कई बार देखी हैमाँ जब मेरी उम्र की थी तो उसे गाने सुनने का बहुत शौक था. वह सबसे छिपकर ट्रांजिस्टर पर कान लगाए रखती थी और अपनी पसन्द के गाने काग़ज़ पर लिखकर बाद में याद किया करती थी. वह चूल्हे के सामने बैठकर रोटियाँ बना रही होती तो वह छोटा सा ट्रांजिस्टर रबड़बैंड से उसके कान पर बँधा होता और ऊपर दुपट्टा ढका होता था. मेरे पिता एक किसान थे और मेरे नाना भी. वह एक छोटा सा दुनिया से कटा हुआ गाँव था और इसमें मेरे स्वर्गीय नाना का कोई दोष नहीं कि एक दिन जब वे सात आठ बार रोटी सेकती माँ को आवाज़ लगाते रहे और वह किशोर कुमार के ‘कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा’ में खोकर अपने पिता की पुकार नहीं सुन पाई तो वे ग़ुस्से में माँ तक आए और माँ का चेहरा अपनी ओर फिराकर ज़ोर से थप्पड़ मारा. कान पर बँधा ट्रांजिस्टर दूर जा गिरा और उसके पुर्जे बाहर बिखर गए.

नानाजी ने कहा कि ‌फिल्मी गीत सुनना एक सभ्य और इज्जतदार परिवार की लड़की के लक्षण नहीं हैं और बाद में जब अपनी आँखों के सामने नानाजी ने माँ से उसकी गानों की कॉपी चूल्हे में फिंकवाई तो भी इसमें उनका उतना दोष नहीं है, जितना उनकी डायबिटीज का है, जिसके कारण वे बहुत ग़ुस्सा कर बैठते थे और बाद में शायद पछताते भी हों. उन्हें चिप्स खाने का बहुत शौक था और कोल्हू से निकलते गर्म गर्म गुड़ का. उनके शौक ज़्यादा महंगे नहीं थे, मगर पैंतीस की उम्र के बाद वे दोनों ही चीजें नहीं खा पाए. वे बार बार अपने बच्चों पर गुस्सा निकालते थे या नानी को बिना वज़ह मारने लगते थे. मगर जब आग में माँ ने गानों की कॉपी जलते देखी तो लोग बताते हैं कि उसकी आँखों का रंग स्थायी रूप से भूरा हो गया. पहले उसकी आँखें काली थीं. माँ इस बारे में कुछ नहीं कहती, मगर वह मुझे बार बार कहती है कि मैं पढ़ाई में ध्यान लगाऊँ और जावेद के ख़ुमार से बाहर निकलूँ. मगर मैं भी क्या करूँ? मुझ पर जावेद का नशा चढ़ता ही जा रहा है और मुझे उसके और शाहरुख़ के सिवा कुछ नहीं सूझता. जावेद का नहीं मगर कम से कम शाहरुख़ का नशा तो आपमें से कुछ लोग महसूस कर ही सकते होंगे. इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, मगर माँ उदास रहने लगी थी. मुझे लगता था कि वह मेरे और जावेद के प्यार से चिढ़ती है. तब मेरा उससे बात करने का मन भी नहीं करता था और हमारे बीच का अबोला मेरे शरीर की तरह आश्चर्यजनक रूप से बढ़ता जाता था।

मैंने पहले भी आपको बताया कि माँ का जब और कोई हथियार नहीं चलता तो वह अनशन कर देती है. न ठीक से किसी से बात करती है और कई-कई दिन तक खाना भी नहीं खाती. इस बार भी उसने ऐसा ही किया. उसने पापा या भाई को इस बात की भनक भी नहीं लगने दी कि वह ऐसा क्यों कर रही है. यह सिर्फ मैं और वह ही जानते थे. पापा और भाई भी खाने के लिए एकाध बार उसे कहकर चुप हो गए और मैं भी अपने गुस्से में थी, इसलिए मैं माँ से बोली तक नहीं. अब यह भी कोई बात है भला? कोई माँ ऐसी कैसे हो सकती है कि अपनी बेटी की ख़ुशी न देख पाए? इसलिए मैं सोचती थी कि इस तरह वह अपने आप को सज़ा ही दे रही है.
मैंने माँ को कभी टीवी देखते या रेडियो सुनते नहीं देखा. हाँ, मैंने अक्सर रेडियो वाली अलमारी के पास से गुज़रते हुए उसकी आँखों में आ जाने वाली एक चमक कई बार देखी है, जो उसकी आँखों के रंग को फिर से काला कर देती थी. वह बस एक सेकंड के लिए रेडियो की तरफ देखती थी और फिर पलटकर चल देती थी.

पूरे चार वक़्त बीत चुके थे और माँ ने खाना नहीं खाया था. चार बजे जावेद का शो शुरु होता था और शाम के सात बजे तक चलता था. मैं हर दिन इंतज़ार करती थी कि वह मेरा नाम अपने शो में बोलेगा और शायद यह भी कह दे कि हाँ, वह भी मुझसे प्यार करता है.मैंने सोच रखा था कि उस दिन मैं मिश्रा वाली दुकान पर कम से कम पचास गोलगप्पे खाऊँगी. उस दोपहर भी मैं यही सोचते सोचते सो गई थी और जब मैं पौने चार बजे जगकर बाहर आँगन में गई तो…..रुकिए.क्या आप मेरी माँ को जानते हैं? वह औरत जो हर समय सिर पर पल्ला रखती है और बहुत दुखों में भी जिसे हमने कभी रोते नहीं देखा. वह, जो मुझे मास्टरनी बनाना चाहती है क्योंकि आठवीं से आगे उसके गाँव में स्कूल नहीं था, इसलिए वह पढ़ नहीं पाई और मास्टरनी नहीं बन पाई. वह औरत, जिसने ग़ुस्से में भी कभी हम पर हाथ नहीं उठाया, उल्टे सदा ख़ुद ही कमरा बन्द कर घंटों तक चुपचाप पड़ी रही. मीठी आवाज़ वाली वह औरत, जो लाख चाहकर भी किशोर कुमार के बाद के किसी गायक का नाम नहीं जान पाई और फिर धीरे धीरे वह चाहना भी भूल गई. वही औरत, मेरी माँ, आँगन के बीचोंबीच खड़ी हुई, आसमान की विनीत उपस्थिति में फूट फूटकर रोए जा रही थी और मेरा फिलिप्स का रेडियो टुकड़े टुकड़े हुआ उसके सामने पड़ा था.

गौरव सोलंकी की उम्र चौबीस साल है. बचपन संगरिया (राजस्थान) में बीता. आई.आई.टी. रुड़की से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक. कविताएं भी लिखते हैं. एक फिल्म के लिए गीत भी लिखे हैं. फिलहाल दिल्ली में रहते हैं

ललमुनिया मक्खी की छोटी सी कहानी

उसने किसी भी दुकान, किसी भी भोज-भात से अपने को काट लिया था. वह बता नहीं रही थी लेकिन उसे तो अपनी सहेलियों से भी परहेज हो गया था जो उसे लो स्टैंडर्ड लगने लगी थीं जैसा कि शीर्षक से भी स्पष्ट है, मैं एकदम शुरुआत में ही बता दे रहा हूं कि यह एक मक्खी की कहानी है. मक्खी की कहानी! सुनकर आप एकदम से चौंक गए होंगे. हिन्दी साहित्य में आपने लघु मानव और आम आदमी की बातें बहुत सुनी होंगी और सुनी क्या होंगी, हमारे प्रगतिशील लेखकों ने तो बजाप्ता इस पर पूरा का पूरा आन्दोलन ही खड़ा कर दिया है. लेकिन हिन्दी साहित्य में पहली बार किसी कहानी का नायक या नायिका एक मक्खी है. लेकिन मैं इसमें यह भी बता दूं कि इस कहानी में आदमी भी है. मतलब यह आदमी की भी कहानी है. लेकिन पहले यह एक मक्खी की कहानी है. या इसे ठीक-ठीक यह कह लें कि यह आदमी की जिन्दगी में मक्खी की कहानी है. कहानी तीन खण्डों में बंटी हुई है पहले खण्ड में मक्खी की कहानी है, दूसरे खण्ड में आदमी की कहानी है और तीसरे खण्ड में आदमी और मक्खी की कहानी है.

इस कहानी में मैं अब सीधे उस मक्खी पर आऊं, उससे पहले मैं जीवविज्ञान से मक्खी के जन्म और मृत्यु के बारे में थोड़ी सी जानकारी यहां दे दे रहा हूं. यूं आपने सब छठी-सातवीं की किताब में इसे पढ़ा ही होगा, बस इसे पुनरावृति ही समझिए. मक्खी का जन्म नर और मादा मक्खी के बीच निषेचन से होता है. मादा मक्खी अण्डे देती है फिर उस अण्डे से लारवा फिर प्यूपा और फिर मक्खी. एक मक्खी की उम्र ज्यादा से ज्यादा तीन से चार महीने की होती है. मादा मक्खी अपने पूरे जीवन में लगभग एक हजार अण्डे दे देती है. एक हजार अण्डे मतलब एक हजार बच्चे भी. मक्खियों में अभी तक नसबन्दी का चलन नहीं चला है.  बच्चा जन्म के सात-आठ घंटे बाद ही उड़ने लग जाता है. जानकारी बस इतनी ही, बाद बाकी थोड़ा-बहुत कहानी के बीच में ही आते रहेंगें.

कहानी का यह पहला खण्ड

उसने दरवाजे के भीतर कदम रखा और उसे अचानक से बहुत ठंड सी महसूस हुई, एकदम जन्नत. उसने सोचा कितना फर्क है यहां और उस छोटे से गांव में

उस छोटी सी मक्खी का नाम था ललमुनिया. नाम बड़ा प्यारा था. उसे उसकी मां प्यार से लाली कहती थी. जैसे यह कि लाली बेटा यहां शोर मत मचाओ, बाहर जाकर अपनी सहेलियों के साथ घूमकर आओ, लाली बेटा उड़ते वक्त पंख को ज्यादा ऊपर-नीचे मत हिलाया करो जल्दी थक जाओगे, बिल्कुल सीध में बगैर पंख को हिलाए उड़ने की प्रैक्टिस किया करो. लाली बेटा अपनी छहों टांगों के नाखून हमेशा काटते रहा करो नहीं तो ज़मीन पर पैर रखने में बैलेंस नहीं बनने का खतरा रहता है. लाली बेटा उधर कम ही जाया करो जिधर ज्यादा चमक-दमक हो या फिर उधर जिधर लोग ज्यादा हंस रहे हों. इस चमक-दमक से ललमुनिया की मां बहुत डरा करती थी. कारण भी था.

ललमुनिया कहां की निवासी थी इस सवाल का जवाब तो यह है कि उत्तर प्रदेश के किसी छोटे-से गांव में ही उसका पूरा खानदान रहता था लेकिन ललमुनिया का जन्म दिल्ली में हुआ था. दिल्ली यानी देश की राजधानी में और जिसका कि ललमुनिया को गर्व भी था. ललमुनिया की मां अपनी जिद के कारण दिल्ली आई थी और यही कारण था कि ललमुनिया का जन्म दिल्ली में हुआ.
ललमुनिया की मां जब जवान थी तब वह काफी जोशीली थी और सुन्दर भी. उसने दिल्ली की चमक-दमक के बारे में काफी सुन रखा था. उसने टेलीविजन पर देखा भी था दिल्ली की साफ चौड़ी सड़कें, दिल्ली की ऊंची-ऊंची इमारतें, और उसके मन में दिल्ली को लेकर ख्वाब पलने लगे थे. फिर क्या था उसे अचानक गांव और गांव की सड़ांध से एकाएक ऊबन-सी हो गई था. उसे लगने लगा था जैसे यहां सब-कुछ कैसा विकृत है. उसे अचानक लगने लगा था, क्या यह वही बासी और सूखा गन्ना है जिस पर बैठकर और जिसका रस चूसकर वह पेट भर रही थी. उसने हिकारत की निगाह से कल्लू की मिठाई की दुकान की ओर देखा था. उसे लगा था जैसे उसे अभी उलटी हो जायेगी. उसने सड़क किनारे मैले-कुचैले आदमियों के शरीर को देखा था और मुंह फेर लिया था. उसने खाना-पीना सब त्याग दिया. और त्याग क्या दिया था उससे अब यह गंदी गंदी चीजें खायी ही नहीं जा रही थी. उसके दिमाग में तो बस दिल्ली का मल्टीप्लैक्स और बड़े बड़े रेस्टोरेन्ट दिख रहे थे. उसने सुन रखा था कि मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट जैसी भी वहां दुकानें हैं जहां तरह तरह की खाने की चीजें और पेय पदार्थ मिलते हॆं. पेय पदार्थ के बुलबुले उसको अपनी ओर आकर्षित करने लगे थे. उसने एक बार टेलीविजन पर पिज्जा हट का विज्ञापन देख लिया था. पिज्जा के उस लिसलिसे से पदार्थ पर तो उसका दिल ही आ गया था. उसने अपने मन के भीतर उस लिसलिसी सी चीज के स्वाद को महसूस किया था. आहा, आहा. उसने सोचा था जब इस स्वाद को सोचने में इतना आनंद आ रहा है तो फिर उसका सेवन करने में कितना मजा आयेगा. उसका दिल्ली जाने का विचार एकदम पक्का हो गया था.

देबाशीष के पिता के दोस्त माछ भात खाते और दुनिया को बदलने के लिए निकल पड़ते थे. देवाशीष के पिता इस रूप में अपनी पत्नी को भी अपनी क्रांति में हिस्सेदार समझते थे

ललमुनिया की मां ने अपने घर वालों को अपना विचार सुनाया तो घर वाले एकदम से भौचक रह गये थे. इतनी दूर परदेश में, वह भी अकेली. घरवालों ने बहुत समझाया था, सहेलियों ने बहुत समझाया था लेकिन वह कहां मानने वाली थी. घरवालों ने विरोध किया तो उसने खाना-पीना छोड़ दिया. उसे वैसे भी वे सारी चीजें बेकार लगने लगी थीं जो अब तक वह खाती रही थी. उसने किसी भी दुकान, किसी भी भोज-भात से अपने को काट लिया था. वह बता नहीं रही थी लेकिन उसे तो अपनी सहेलियों से भी परहेज हो गया था. उसे वे सारी सहेलियां बिल्कुल लो स्टैंडर्ड लगने लगी थीं, बिल्कुल गंवार. उसके घरवालों ने उसे बहुत समझाया था कि तुम शहर के चक्कर में फंस रही हो तुमको मालूम नहीं, वहां जो दिखता है वही असलियत नहीं है यह सब तो उसका नकली चेहरा है. लेकिन उसने सारे घरवालों को गंवार और दकियानूसी कहकर उसकी बातों को सिरे से काट दिया था।

खैर उसके घरवालों को उसकी जिद के सामने झुकना पड़ा था. और फिर एक दिन अपने पंखों को सीधा करके उसने बिल्कुल सीध में दिल्ली की ओर उड़ान भर दी थी. दो-तीन दिन लगे लेकिन वह दिल्ली पहुंच गयी थीं. दिल्ली पहुंचकर पहले तो उसने खूब यहां-वहां के चक्कर काटे थे. यहां की साफ चौड़ी सड़कों को देखा था, बड़ी बड़ी इमारतों को देखा था बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स बड़े बड़े रेस्टोरेन्ट देखे थे. वह बहुत खुश हुई थी. उसके चेहरे पर निखार आ गया था. मुस्कराहट उसके चेहरे पर बिल्कुल चिपकी हुई थी. उसने यहां की चकाचौंध से गांव की तुलना करके देखा तो उसे लगा वह अभी तक कहां फंसी हुई थी. उसने दिल्ली आने के अपने निर्णय पर संतोष महसूस किया था. उसके मन में अपने उन गांव वालों के प्रति एक तरह की हिकारत का भाव आ गया था. उसने अपनी दूरदृष्टिता और अपने तीक्ष्ण मस्तिष्क को बहुत धन्यवाद दिया था. वह घुमते हुए इतना खुश थी कि उसे दो दिनों तक तो भूख भी नहीं लगी. जबकि पिछले कुछ दिनों से वह बढ़िया और पूरी तरह से खा भी नहीं पायी थी. उसे अब गांव की कोई भी चीजें पसंद जो नहीं आ रही थी.

लेकिन वह अभी थोड़ी देर को रिलैक्स हुई ही थी और अपने भोज्य पदार्थ का निशाना लगाने ही वाली थी कि उसे महसूस हुआ  कि वह अचानक से एक तरफ को खिंची हुई जा रही हैदो दिनों के बाद काफी घूम लेने के बाद जब वह काफी थक गयी थी तब उसे भूख महसूस हुई. और इस भूख के साथ ही उसे उस लिसलिसी चीज का स्वाद भी याद आया. उसके मुंह में एकदम से पानी भर आया था उससे भूख एकदम से भड़क गयी थी. चूंकि उसने इन दो दिनों में दिल्ली का चप्पा चप्पा छान मारा था इसलिए उसे पिज्जा हट ढूंढने में मुश्किल नहीं हुई. पिज्जा हट के दरवाजे पर आकर वह काफी खुश हुई थी. उसको लगा जैसे उसकी मंजिल उसे मिल गयी. उस पिज्जा हट के सामने के दीवारों पर तरह तरह के खाने की चीजों की तस्वीरें लगी हुईं थीं. उसने बाहर पिज्जा का फोटो देखा साथ ही वह पेय पदार्थ जिसमेें से पिक्चर में ही बुलबुले निकलते दिखाए गए थे. उसे अचानक याद आया टेलीविजन पर चलने वाला वह विज्ञापन ‘बुलबुले जब भी गुनगुनायेंगे लोग पास आयेंगे’. उसे लगा वह भी तो इसी बुलबुले के चक्कर में ही तो सैकड़ों किलोमीटर से दौड़ कर आयी है. उसने सोचा इस बुलबुले में है ही कुछ बात जो वह इस तरह ‌खिं‌ची चली आयी है. वह अब पिज्जा हट के अंदर जाना चाह रही थी. उसने दरवाजे के भीतर कदम रखा और उसे अचानक से बहुत ठंड सी महसूस हुई, एकदम जन्नत. उसने सोचा कितना फर्क है यहां और उस छोटे से गांव में. उसे लगा था कि काश ऐसा होता कि उसे यहां आराम करने की छूट दे दी जाती. लेकिन वह अभी थोड़ी देर को रिलैक्स हुई ही थी और अपने भोज्य पदार्थ का निशाना लगाने ही वाली थी कि उसे महसूस हुआ  कि वह अचानक से एक तरफ को खिंची हुई जा रही है. पहले तो लगा कि यह उसी विज्ञापन का ही असर है कि जहां बुलबुले गुनगुनाएंगे वहां लोग पास आयेंगे लेकिन अचानक उसकी निगाह के सामने तेज चलने वाली लाइट पड़ी. उसने इस तरह की लाइट को पहले नहीं देखा था इसलिए वह समझ तो नहीं पायी लेकिन उसकी नज़र अचानक उसमें पड़ी हुई तमाम मक्खियों की लाशों पर पड़ी और उसने देखा कि उसके सामने ही कई मक्खियां चर-चर कर उसमें जल रही थीं. उसका उस मशीन की ओर खिंचाव बहुत तेज था लेकिन उसने अपने को संभाल लिया था. उसने उसी रफ्तार से अपने शरीर को दरवाजे की तरफ को खींचा था. उसकी किस्मत अच्छी थी और वह दरवाजे से बाहर हो गई. उसकी जान बच गई. उसने अपनी जवानी और अपने जोश को मन से धन्यवाद दिया था. उसने बाहर निकल कर राहत की सांस ली थी.

इसके बाद फिर वह कुछ दिनों तक अच्छे खाने की तलाश में यहां वहां भटकती रही थी लेकिन वह हार गयी थी. हर जगह या तो यह मशीन होती या फिर दरवाजे शीशे से पैक होते और खाने के सारे समान शीशे से बंद होते. उसने यह भी महसूस किया था कि यहां की दुकानों में सफाई भी बहुत रहती है और वह भी कुछ ऐसी दवाइयों से कि वहां जाते ही बिल्कुल ही दम घुटने लगे. उसे फिर बहुत याद आई कल्लू की दुकान की वे मिठाइयां. वे गन्ने, वे मैले-कुचैले लोग. तब उसने सोचा उसके घरवाले कितना ठीक कहते थे. यहां तो सब दिखावटी भर है. सब नकली. अंततः जब भुखमरी की नौबत आ गई तब उसे यहां से झोपड़पट्टी की तरफ भागना पड़ा था. मरती क्या न करती. उसने गंदी नालियों पर बैठना शुरू किया और फिर वे मैले कुचैले लोग ही उसके यहां भी सहारा बने थे. लेकिन उसने एक चीज महसूस जरूर की कि गांव की तुलना में यहां मैले कुचैले लोगों के पास मक्खियों के लिए ज्यादा अवसर हैं. उसने महसूस किया था कि इस चमक-दमक से बिल्कुल ही अलग यह दुनिया है जिसको तो कभी टीवी पर दिखाया ही नहीं जाता है.

इन्हीं सब घटनाओं के बाद जब उसने अपने जीवन को फिर उन्हीं सब दोयम दर्जे के भोजन पर आश्रित कर लिया था तब कुछ दिनों के बाद ललमुनिया का जन्म हुआ था. ललमुनिया के पिता कौन थे ललमुनिया नहीं जानती थी. ललमुनिया अपनी मां से बहुत पूछती थी कि आखिर उसके पिता कौन हैं लेकिन उसकी मां चुप्पी लगा जाती थी. ललमुनिया की मां जानती थी कि वह इस महानगर का कोई दगाबाज मक्खा था जिसने उसके रूप-सौंदर्य पर फिसलकर उसके साथ सहवास किया था. उसके साथ उसने प्रेम का नाटक किया. वह भी इस शहर की तरह एकदम नकली निकला. वह एक दुष्ट, धोखेबाज और बेवफा प्रेमी था.

ललमुनिया की मां ने इस शहर में आकर सब-कुछ खो ही दिया था. इज्जत आबरू, अपने घरवाले, अपनी संस्कृति सब. ललमुनिया की मां ने अपने जीवन में जो भी हजार अण्डे दिये होंगे वह कई नर मक्खियों के सहयोग से थे. लेकिन सच यह है कि उसने प्रेम सिर्फ ललमुनिया के पिता से ही किया था. वही उसका पहला और सच्चा प्रेम था. यही कारण था कि ललमुनिया की मां अपने सारे बच्चों में से सबसे अधिक ललमुनिया को ही प्यार करती थी. उसे अपने बहुत सारे बच्चों के तो नाम भी नहीं मालूम थे. उसे इस बात की चिंता रहती थी कि कहीं ललमुनिया भी इस चकाचौंध भरी दुनिया में धोखा खाकर अपनी जिंदगी तबाह न कर ले. लेकिन ललमुनिया एक संस्कारी और आज्ञाकारी बेटी थी. जब ललमुनिया जवान हुई तब उसकी मां बूढ़ी होने लगी थी. उसकी मां के चेहरे पर झुर्रियां आने लगी थीं और उसे खांसी ने कसकर जकड़ लिया था.

चूंकि ललमुनिया का जन्म और पालन-पोषण ही दिल्ली में हुआ था इसलिए वह काफी स्मार्ट और चंचल थी. ललमुनिया देखने में बहुत सुन्दर तो नहीं थी लेकिन उसके चेहरे पर नमक था और पानी भी. उसके पंख भूरे थे. उसके पैर पतले और नाखून नुकीले थे. सभी मांओं की तरह ललमुनिया की मां को भी अपना बच्चा इस बड़े शहर के लिए काफी भोला और मासूम लगता था. ललमुनिया की मां उसे अक्सर इस चमक दमक और इस हंसी भरे माहौल से सचेत करती थी. चूंकि उसकी मां ने शहर में बहुत धोखा खाया था इसलिए वह अपने बच्चों को लेकर ज्यादा सतर्क और चौकन्नी थी. लेकिन ललमुनिया इस चमक-दमक में एक दिन आखिर फंस ही
गयी थी.

वह एक खास दिन था जब ललमुनिया अपने लम्बे वॉक के बाद घर लौटी थी. वह आज अपने निश्चित समय से थोड़ा पहले थी और काफी खुश और उत्साहित भी. उसने अपनी मां को बताया था कि उसने आज पीने की एक बहुत ही स्वादिष्ट चीज का पता लगाया है. उसने बताया कि वह आज जहां गयी थी वह एक फैक्ट्री जैसी है और जहां बोतल में कोई पेय पदार्थ तैयार होता है और शीशे की बोतल में पैक किया जाता है. उसने उसके लाजवाब स्वाद के बारे में बताया था और यह भी कि उसे ही शायद बाहर लोग कोल्ड ड्रिंक कहते हैं. उसने मां को बताया था कि इन्हीं पेय पदार्थों के ही विज्ञापन में कई सितारे दिखते हैं. उन विज्ञापनों में वे खुद भी इसे पीते हैं और लोगों से भी इसे पीने के लिए अपील करते हैं. अब इतने बड़े सितारे क्या झूठ बोलते होंगे. वे सितारे तो यहां तक कहते हैं कि इसके घूंट लो तब पता चलेगा कि मैं इसके इतर और कुछ क्यों नहीं पीता हूं.

उसकी मां एकदम घबरा गई थी. उसे लगा था, वह जिन चीजों से अपने बच्चों को बचाना चाह रही थी ललमुनिया तो उसी में फंसती जा रही है. उसने ललमुनिया को बहुत समझाया था कि बेटा ऐसी जगह पर नहीं जाया करते. ऐसी जगह हमारे जैसे छोटे से जीव के लिए ठीक नहीं है. वहां हमें फंसाने के लिए हमेशा कोई न कोई षडयंत्र होता है. लेकिन ललमुनिया कहां मानने वाली थी उसे तो बस उस कोल्ड ड्रिंक का स्वाद ही याद था. उसने मां को समझाना चाहा था कि वहां फंसने जैसा कुछ भी नहीं है. वहां न तो इतनी सफाई है और न ही मक्खियों के लिए कोई रोकथाम ही है. उसने अपनी मां को बताया कि उसकी जैसी कई मक्खियां उसके रसास्वादन के लिए वहां आती है. और हम सारी मक्खियां वहां काफी देर तक जूं जूं करके आवाज़ भी निकालती हैं और सभी बोतलों के मुंह पर बैठकर उसके रस को धीरे धीरे खींचती भी रहती हैं.

ललमुनिया की मां ने उसे समझाया था कि बेटा ज्यादा लोभ में नहीं पड़ते, यह लोभ एक दिन जिन्दगी बर्बाद कर देता है. उसने ललमुनिया को बहुत समझाया था और बहुत डांटा भी था कि उधर मत जाया करो. तुम जानती नहीं कि इस लोभ में ही फंसकर तो मेरी जिन्दगी बर्बाद हुई है. पर ललमुनिया ने एक नहीं सुनी थी. ललमुनियां की मां ने उसे बताया था कि तुम लोग तो इस महानगर की पैदाइश हो इसलिए साहित्य वाहित्य तो पढ़ी नहीं हो. बहुत पहले भारतेन्दु जैसे एक बड़े साहित्यकार हुए थे जिन्होंने अंधेर नगरी जैसी किताब लिखी थी. उसमें भी एक चेला था जो इस लोभ के चक्कर में फंस जाता है और उसका गुरु उसे बहुत समझाता है. चेला नहीं मानता है और एक दिन बड़ी मुसीबत में फंस जाता है. अब तुम्हारा तो ईश्वर ही मालिक है.

और फिर एक दिन ललमुनिया की मां को पता भी नहीं चल पाया था लेकिन उसका अंदेशा सच निकल गया. ललमुनिया एक दिन अचानक गायब हो गई. वह कहां गई उसका क्या हुआ उसे कुछ पता नहीं चल पाया. सच यह है कि एक दिन उसी रसास्वादन के चक्कर में ललमुनिया की मौत हो गई थी. वह उस फैक्ट्री में लंच का समय था. सारे मजदूर अपने घर से लाये खाने में व्यस्त थे. पूरी फैक्ट्री में खाने की सौंधी खूशबू थी लेकिन ललमुनिया के मस्तिष्क में बस उस पेय पदार्थ का स्वाद था. ललमुनिया ने अच्छा मौका देखा था और उसका फायदा उठाना चाहा था. वह शांति से उस बोतल पर बैठकर उस स्वादिष्ट पेय का आनन्द लेती रही थी. उसका लोभ बढ़ता रहा था और वह बोतल के अंदर घुसती जा रही थी. उसने बहुत सारा कोल्ड ड्रिंक उस दिन पी लिया था. वह मस्त हो गई थी. लंच टाइम कब ओवर हो गया उसे पता ही नहीं चला था. तभी मशीन के चलने की आवाज़ आयी थी. उसने आवाज़ के कारण उड़ना तो चाहा था लेकिन अधिक कोल्ड ड्रिंक पीने के कारण वह एक अलसायी हुई मक्खी बन गई थी. उसने ज्योंही उस बोतल से निकलना चाहा कि उसका पांव फिसल गया था. और फिर धड़ाक से बोतल सील बंद हो गई थी.

ललमुनिया की मौत इस बोतल के सील बंद होने के एक घंटे के बाद हुई थी. और वह इस बीच सिर्फ छटपटाती रही थी. वह अब कोल्ड ड्रिंक पीने की स्थिति में नहीं थी. उसे बार-बार अपनी मां की नसीहतें याद आ रही थी. ललमुनिया का जिस दिन निधन हुआ था उस दिन वह मात्र एक महीने बाइस दिन की थी. ललमुनिया की मां अपनी बची हुई जिन्दगी में उसका बस इंतजार ही करती रह गई थी. ललमुनिया की मां यह जान नहीं पायी थी कि अगर ललमुनिया की मौत भी हो गई, तो हुई कैसे? ललमुनिया की मौत दम घुटने से हुई थी.

कहानी का यह दूसरा खण्ड

अब यहां कहानी में आदमी के रूप में देबाशीष मुकर्जी का प्रवेश होता है. देबाशीष सत्ताइस-अठ्ठाइस साल का एक स्मार्ट युवक. बदन बिल्कुल छरहरा, चेहरा गोरा. चेहरे पर कभी दाढ़ी या मूंछ का कोई खूंट तक भी नहीं दिखने देने वाला. आप उसे देव कह देते वह बुरा नहीं मानता. आप उसे देवेश कह देेते वह बुरा नहीं मानता लेकिन अगर आप उसे देबाशीष मुकर्जी के बदले देवाशीष मुखर्जी कह देते तो वह रुष्ट हो जाता. जैसा नाम से स्पष्ट है देबाशीष बंगाली था और बंगाल की ही पैदाइश भी. बंगाल में उसका घर कलकत्ता के आसपास ही कहीं था. कलकत्ता के आसपास, लेकिन किसी गांव में. वह गांव में पला बढ़ा था, कलकत्ता में वह पढ़ा लिखा था. किन्तु अब वह पिछले सात-आठ वर्षों से दिल्ली में रह रहा था. इन्हीं सात आठ वर्षों में उसने दिल्ली में बहुत कुछ पाया था एक अदद नौकरी भी और एक घर भी.

पिता अध्यापक थे और मां घर में खाना पकाती थी. पिता कई बार अपने कॉमरेड दोस्तों को अपने घर बुलाते और मां उनके लिए खाना बनाती थी. देबाशीष की मां माछ भात बनाती और माछ में गोट अवश्य डालती थी. देबाशीष के पिता के दोस्त माछ भात खाते और दुनिया को बदलने के लिए निकल पड़ते थे. देवाशीष के पिता इस रूप में अपनी पत्नी को भी अपनी क्रांति में हिस्सेदार समझते थे. उसके हाथ का ही यह जादू था कि माछ भात खाकर क्रांतिकारियों को समाज ज्यादा असंतुलित दिखने लगता था।

देबाशीष के पिता रुद्राशीष मुकर्जी ने आजीविका के लिए भले ही नौकरी की हो लेकिन उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य इस समाज को बदलना, इस समाज में बराबरी लाने का था. वे कहते इस समाज को समुद्र के पानी की तरह होना चाहिए एकदम समतल. अगर उसका पानी हिलोर लेता भी है तो थोड़ी देर में शांत हो जाता है फिर सब बराबर. वे पक्के मार्क्सवादी थे और उन्हें लाल रंग से गहरा प्रेम था. वे अक्सर रैलियों में जाते थे, नारे लगाते थे. कई बार वे क्रांति का बिगुल बजाने के लिए पोस्टर भी चिपकाते थे. वे पूंजीपतियों को अपना और समाज का सबसे बड़ा शत्रु समझते थे. वे कहते थे इनकी नसों पर प्रहार करना पड़ेगा और फिर देखना दुनिया बदल जायेगी. दुनिया एकदम हसीन हो जायेगी. वे कहते अब इस दुनिया की व्याख्या करने का वक्त नहीं रहा बल्कि उसे बदलने का वक्त आ गया है. उन्होंने अपने जीवन में भी इन सिद्धांतों का पालन किया था और पूंजी को अपने जीवन में नहीं के बराबर आने दिया था. अपने वेतन के भी बहुत सारे पैसे उन्होंने क्रांति के लिए खर्च कर दिये थे. आज उनके पास सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ उनका यह छोटा सा मकान था और उनकी पेंशन थी.

देबाशीष ने अपने जीवन में चूंकि लाल रंग को बहुत देखा था इसलिए उसे लाल रंग से नफरत सी हो गयी थी. वह लाल किताब कभी नहीं पढ़ता था और सब्जी के साथ लाल गाजर कभी नहीं लाता था. लाल टमाटर वह खाता था लेकिन उसे वह पीला टमाटर कहता था. वह अक्सर सोचता था कि क्या जीवन में किसी एक रंग को इतना महत्व देना ठीक है. वह सोचता था कि खून का रंग मनुष्य के साथ साथ सभी जीव जन्तुओं तक का लाल ही होता है लेकिन एक मनुष्य ही है जो इस खूनी क्रांति और लाल रंग की बात करता है. वह अक्सर सोचता था कि क्या मच्छरों ने अपने लाल खून के साथ समाज में क्रांति के बारे में विचारा होगा।

देबाशीष की शुरुआती पढ़ाई कलकत्ता में हुई. पिता की ख्वाहिश थी कि बेटा पढ़-लिखकर सामाजिक कार्यों में लग जाए. वे कहते जीवन में रुपयों की बस उतनी ही जरूरत है जिससे हम जिन्दा रह सकें. पिता ने घर में मार्क्स से लेकर लेनिन और न जाने किन किन विचारकों के पोस्टर लगा रखे थे. लेकिन देबाशीष की रुचि उसमें जग नहीं पायी. वह उन तस्वीरों की ओर देखता और सोचता क्या वाकई ये इस समय में अपने को संयमित रख पाते. जब सामने रुपयों का अंबार और एक विलासी जीवन दिखता तो क्या वे अपने को इन सिद्धांतों पर टिकाये रख पाते. वह उन विचारकों को विचारक इसलिए मानता था क्योंकि उनके सामने कोई चकाचौंध भरी दुनिया नहीं थी. चमचमाती दुनिया का तिलिस्म नहीं था.

जब वह कलकत्ता में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर चुका था तब पिता की इच्छा उसके स्वर्णिम भविष्य के सामने बाधा बनकर खड़ी हो गयी. देबाशीष के सामने यहां से एक ऐसी दुनिया के दरवाजे खुल रहे थे जहां सब प्रकार का ऐशो आराम था. गाड़ी, बंगला, चमक-दमक, पैसे, मल्टीप्लेक्स और बड़े बड़े रेस्टोरेन्ट. उसके सामने बदली हुई दुनिया का विराट संसार था और उसके पिता उसको छोटी सी दुनिया में समेटकर उसकी जिन्दगी को संकुचित करना चाह रहे थे.

देबाशीष ने जब दिल्ली जाकर वहां आवारा पूंजी की दुनिया में अपना हस्तक्षेप चाहा तो पिता एकदम से भड़क उठे. वे बहुत हताश हुए और कहा कि आखिर क्या कमी रह गई थी हमारी परवरिश में जो तुम पूंजीपतियों की दुनिया में शामिल होना चाहते हो. पिता का आदर्श और पुत्र की चाहत आपस में जब टकराये तो पिता ने फरमान जारी किया फिर समझो इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए बन्द हो गये. पिता ने सोचा जो पुत्र आवारा पूंजी का साथ देकर गरीब और लाचार लोगों की बेबसी को सुनना नहीं चाहता उस पुत्र के होने और न होने से क्या फर्क पड़ता है. पिता को एक पल को यह उम्मीद थी कि देबाशीष इस बड़े निर्णय के सामने सर झुका देगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. देबाशीष का मानना था कि यह मरियल सी जिन्दगी भी तो मृत्यु के समान ही है. उसने अपना झोला -उठाया और पहुंच गया दिल्ली.

दिल्ली में देबाशीष ने अपने पैर जमाने के लिए खूब मेहनत की. वह इस विराट दुनिया में पूरी मजबूती के साथ प्रवेश करना चाह रहा था. उसने अपनी छोटी मोटी नौकरी के साथ कंप्यूटर में मास्टरी हासिल की. कंप्यूटर की बड़ी डिग्री ने उसे इस चमकीली दुनिया में मजबूत प्रवेश दिलाया. देबाशीष के दिल्ली जाने के कुछ दिनों बात तक तो उसके पिता को यह उम्मीद बची हुई थी कि शायद उसके खून में बहने वाला आदर्श, पुत्र के भीतर से कुलांचे मारने लगे और वह लौट आये. लेकिन पुत्र पर पिता के आदर्श से ज्यादा इस बाजार का असर रहा. वह धीरे धीरे एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहा था जो रंगीन थी.

देबाशीष को कुछ वर्ष तो अवश्य लगे इस रंगीन दुनिया में अपने पैर जमाने में लेकिन वह इसमें पूर्णतया सफल रहा. उसका वेतन पैकेज में शुरू हुआ. वह नौकरियां बदलता रहा और पैकेज बढ़ता रहा. वह बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स में घुसता, माॅल्स में घुसता और वहां की तेज रोशनी को देखकर सोचता क्या वाकई इस तेज रोशनी के चमत्कार से बचना संभव है. उसे पिता जो बनाना चाह रहे थे उसके बारे में वह सोचता और वह अंदर से सिहर जाता.

उसने ढेर पैसे कमाये और इनकम टैक्स से बचने के ढेरों उपाय ढ़ूंढ़े. उसने एक मकान खरीदा. अपने पास जितने पैसे थे उसके साथ उसने एक बड़े निजी बैंक से पैसे उधार लिये. वह अपने घर के लिए इस उधार को अंग्रेजी में होम लोन कहता था और इसके सहारे वह बड़ी मात्रा में इनकम टैक्स बचा पा रहा था. उसने अपनी जिन्दगी से अपने पिता को निकाल बाहर कर दिया था और अपने इस बड़े मकान में इसी चमकदार दुनिया से एक पत्नी ले आया था. उसका जीवन सुकून से कट रहा था. उसने सोचा क्रांतियों से अगर दुनिया बदलती तो दुनिया आज इतनी रंगीन नहीं हो पाती. उसने अपने मन में पिता की बैठक में लगे सारे पोस्टरों के बारे में सोचा और एक हेय दृष्टि उन पर डाली.

देबाशीष अपने उस बड़े से घर में अपने दोनों डैनों को फैलाकर रात में उड़ा करता था. वह अपनी गाड़ी से उसकी ठंडी हवा में ऑफिस से आता और एलसीडी टीवी पर फिल्में देखकर, खाकर रात में सो जाता था. वह अपनी पत्नी और अपने बच्चों के साथ खाना खाने उन बड़े बड़े रेस्टोरेन्टों में जाता था जहां मक्खियों को फंसाने और मारने के लिए एक विचित्र किस्म की लाइट लगी होती थी. वह अपने जीवन को भरपूर जी रहा था और मन के भीतरी कोने से दुनिया के उस बड़े से देश को धन्यवाद देता था जिसने वर्षों चले किसी ठंडे युद्ध को सिरे से गायब कर दिया था. उसके मन में होता, इस विश्व के कुछ लोेग कैसे जाहिल हैं, युद्ध को शांत करने वाले को ही गालियां दे रहे हैं. वह सोचता था भला हुआ जो एक नई सोच की विजय हुई नहीं तो इन क्रांतिकारियों ने तो इस विश्व को डुबो ही दिया था. उसकी आसक्ति उस विजयी देश के साथ थी. उस देश ने जहां भी बम गिराये वह उसके साथ था. उस देश ने जिसको भी पकड़कर उसे सशंकित किया वह उसके साथ था. वह मानता था इस धरती पर जीने का अधिकार तो सिर्फ उसे ही मिलना चाहिए जो सबल है. वह मानता था क्रांतियां तो कमजोर करती हैं, ताकतवर तो सत्ता में होते हैं. वह उस विजयी देश को सभी देशों का बाप कहता था.

लेकिन उस विजयी देश ने ज्यादा बम गिराये और एक दिन पूरे विश्व से पैसे गायब हो गये. ऐसा लगा जैसे उसने बम बनाने में सारे विश्व के पैसों को बिना पूछे ही चुपके से निवेश कर दिया था. देश में मंदी आयी तो देश की सारी कम्पनियां भौचक रह गयीं. सारी कम्पनियों ने अपने गल्ले को देखा आखिर वह कौन सी तरकीब थी जिससे बिना उनकी जानकारी के ही उसके गल्ले से उसके पैसे चुरा लिए गए. सारी कम्पनियों ने जार जार आंसू बहाये. फिर शुरू हुई छंटनी और देबाशीष को अपने पिता की हाय लग गयी. यह एक आदर्श मार्क्सवादी की हाय थी. थोड़ी देर से लगी लेकिन इतनी आसानी से तंदुरुस्त होने वाली नहीं थी. उनकी इस हाय में सारे मार्क्सवादी चिंतकों की शुभकामनायें थीं. देबाशीष छंटनी का शिकार हुआ.

जिस विशाल पैकेज से वह बाहर हुआ था उसके हाथ पांव फूल गये. उसे अचानक यह सांप सीढ़ी का खेल लगा. यह था निन्यानवे पर जाकर सीधे तीन पर आना. देबाशीष ने सोचा साला यह तो तीन पर भी नहीं रहा. उसकी पत्नी ने जिस वैश्विक अर्थव्यवस्था के बल पर उससे शादी की थी वह चरमराती हुई दिखी. उसकी पत्नी ने सोचा क्या इस देश में किसी भी चीज पर भरोसा करना मुश्किल है. देबाशीष ने अपने घर में अपने डैनों को फैला कर उड़ना बन्द कर दिया. वह अपने उस बड़े घर में मुरझाया हुआ बैठा रहता था. रोज सुबह पूजा करते समय उसकी पत्नी उस विजयी देश के राजा को बददुआएं देती थी और चमक दमक की दुनिया से दूर अपनी भदेस भाषा में उसे कलमुंहा कहती थी. देबाशीष की गाड़ी अब दरवाजे पर खड़ी थी और धीरे धीरे उसके चक्कों की हवा पास हो गई थी.

कहानी का यह तीसरा खण्ड

कहानी के इस तीसरे खण्ड में अपने वायदे के मुताबिक मैं आदमी और मक्खी दोनों को लाऊंगा. देबाशीष उस दिन उदास था. अंत समय पास आ गया था. देबाशीष ने सोचा कहीं सारे क्रांतिकारी सही तो नहीं कह रहे थे. कहीं इस विजयी देश ने वाकई सारे विश्व के पैसों को अपनी अय्याशी में उड़ा तो नहीं दिया. कहीं वह शिकारी तो नहीं.

देबाशीष के सामने जितनी चिंता इस बात की थी कि वह अपना और अपने परिवार का पेट कैसे भरेगा उससे ज्यादा चिंता इस बात की थी कि वह अपने उस बड़े से घर की, जिसमें वह अपने डैनों को फैलाकर उड़ा करता था, किस्त कैसे भरेगा. उसे अब अपनी बीबी और बच्चों के पेट भरने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. लेकिन वह इस संघर्ष से इस बड़े से ऋण को हिला भी नहीं सकता. वह उदास रहता था और उसकी दाढ़ी के खूंटे बढ़ गये थे. उसने नौकरी ढूंढ़ने की कोशिश की लेकिन यह तो छंटनी का दौर था, नई नौकरियां कहां. कहीं नौकरी मिल भी जाय तो उससे उसके घर का केवल खर्च चल सकता था. लेकिन इस घर की किस्त. उस निजी बैंक ने, जिसका मालिक भी उसी विजयी देश में बैठा था, ने चिट्ठी पर चिट्ठी भेजनी शुरू कर दी. आखिर पैसे लेकर जाओगे कहां बच्चू. देबाशीष पर हर चिट्ठी एक प्रहार की तरह थी. देबाशीष मुखर्जी को यह विश्वास नहीं हो पाता था कि मंदी इतनी लंबी हो जायेगी. आखिर कितने बम फोड़ दिए भाई?

देबाशीष को नौकरी नहीं मिली. जमा पूंजी से घर का खर्च चला लेकिन कब तक. उसका दुख बढ़ता रहा और चिट्ठी के बाद गुण्डों ने आना शुरू कर दिया. यह नए बैंक की नई संस्कृति थी. देबाशीष जानता था. वह था तो इसी संस्कृति का. वह इन गुण्डों के बाद के सच को भी जानता था. गुण्डे आते और देबाशीष अपने घर के भीतर कहीं छुप जाता. बाहर उसकी पत्नी उसी अर्थव्यवस्था के साइड इफैक्ट को झेल रही होती.

देबाशीष के सामने इस घनघोर मंदी में जो दो तीन उपाय दिख रहे थे उसमें सबसे अंतिम था भाग कर अपने बाप की क्रांति में हिस्सा ले लिया जाए. लेकिन जिस बाप को उसने अपनी जिन्दगी से निकाल बाहर कर दिया था उसके पास वह किस मुंह से जाए. अगर वह अपने डैनों को समेटकर वहां चला जाता तो भी उसकी पत्नी इसके लिए तैयार नहीं थी. वह साफ कहती थी इस अर्थव्यवस्था का मामला इसी अर्थव्यवस्था में निपटेगा. देबाशीष के सामने घर बेच देने का एक विकल्प था लेकिन फिर वह रहेगा कहां. देबाशीष की उस दिन बड़ी बेइज्जती हुई जिस दिन उन गुण्डों ने भरे मुहल्ले में उसका काॅलर पकड़ लिया. जब काॅलर पकड़ ही लिया तो बचा ही क्या. देबाशीष को दिन में तारे दिख गये और आंखों के सामने बाप के द्वारा लगाये गये सारे पोस्टर एकबारगी नाच गए.

अब वह निजी बैंक वाला उसके सामान को सड़क पर फेंक देता, उसकी पत्नी उसे छोड़कर नये विकल्प पर विचार करती, उसकी गाड़ी को कबाड़ी वाला पुर्जा-पुर्जा खोलकर ले जाता उससे पहले ही देबाशीष की जिन्दगी में मक्खी का प्रवेश हुआ. उस दिन देबाशीष उदास था. वह अपने काॅलर को संभालता पागल की तरह सड़क पर चलता चला जा रहा था. एकदम सनकी की तरह. आवारा पूंजी का आवारा. उसने अब यह जान लिया था कि इस पूंजी को आवारा क्यों कहते हैं. धूप बहुत तेज थी और देवाशीष पसीने से तरबतर था. धूप तेज नहीं भी होती तब भी वह पसीने से तरबतर ही होता. वह कहां जा रहा था उसे नहीं मालूम था. वह क्यों जा रहा था, नहीं मालूम था. वह चार कदम चलता था और फिर रुक कर सोचता था कि क्या वाकई वह आगे बढ़ रहा है. वह बहुत देर तक ऐसा करता रहा होगा. सड़क पर अगल-बगल से गुजरने वाले लोग उसे देखते थे और समझ जाते थे. क्योंकि यह वह समय था जब इस तरह के सनकी बहुतायत में सड़कों पर मिलने लगे थे. तेज धूप थी या उसकी सनक, देबाशीष को लगा उसके गले में कांटे उग आये हैं. उसे लगा क्या उस विजयी देश ने कोई विषैला कीटाणु तो नहीं छोड़ दिया है. उसने अपने गले को कसकर पकड़ लिया. वह अभी मरना नहीं चाहता है. वह अपने ग