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विकास : मिथक या सच्चाई

बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का दावा है कि राज्य की विकास दर इस वर्ष 14.15 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो देश में सबसे ज्यादा है. अर्थशास्त्रियों का दावा है कि इसमें सच्चाई से ज्यादा आंकड़ेबाजी है. इर्शादुल हक की रिपोर्ट

16 अक्टूबर को उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के केंद्रीय सांख्यिकी संगठन यानी सीएसओ के हवाले से प्रेस को सूचना दी, ‘2010-11 में बिहार की विकास दर 14.15 प्रतिशत रही है. इस प्रकार विकास के मामले में बिहार देश के तमाम राज्यों में अव्वल हो गया है’. हालांकि यह सीएसओ की तरफ से की गई कोई अधिकृत टिप्पणी नहीं थी, लेकिन मोदी के इस बयान के बाद बिहार के मीडिया में इस खबर की जबरदस्त धूम रही. इस खबर के मीडिया में छाने के बाद खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बड़े संयमित लहजे में कहा, ‘विकास के मामले में हम कोई दावा नहीं कर रहे हैं यह तो आंकड़े बता रहे हैं.’ लगे हाथों मुख्यमंत्री ने इस तेज रफ्तार तरक्की के लिए राज्य की जनता के भरपूर सहयोग के लिए उसका आभार भी जताया.

ठीक इसी तरह का बयान उपमुख्यमंत्री और राज्य के वित्तीय मामलों के मंत्री सुशील कुमार मोदी ने पिछले साल भी दिया था. तब मोदी ने सीएसओ के हवाले से दावा किया था कि 2009-10 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी की विकास दर 11.57 प्रतिशत रही है. मोदी का कहना था कि पूरे देश में बिहार तरक्की के मामले में गुजरात के बाद दूसरे स्थान पर आ गया है. तब मोदी के इस बयान के बाद सरकार ने अपनी इस ‘उपलब्धि’ को एक जश्न के रूप में लिया था और मीडिया ने भी इस खबर को हफ्तों तक अपनी प्राथमिकता में बनाए रखा. पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, विकास की इस सच्चाई के कई और पक्ष भी सामने आए. कई आर्थिक विशेषज्ञों ने सरकार के इस दावे  को आंकड़ों की बाजीगरी बताया तो कुछ ने इसे सिरे से ही नकार दिया. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्राध्यापक प्रवीण झा ने तो इन आंकड़ों को झूठ का पुलिंदा तक कह डाला था.

14.15 प्रतिशत विकास दर के जो आंकड़े जारी किए गए हैं वह संशोधित आंकड़े हैं. वास्तविक आंकड़े आनी अभी बाकी हैं

उस समय यह विवाद इतना गहराया कि सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के केंद्रीय सांख्यिकी संगठन पर भी सवाल खड़े किए जाने लगे. चूंकि राज्य सरकार ने विकास दर से संबंधित आंकड़े केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के हवाले से ही जनता के सामने रखे थे, इसलिए उसकी विश्वसनीयता को लेकर भी तरह-तरह की बातें की गईं. इस विवाद के बाद सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के तत्कालीन सचिव प्रणव सेन को कहना पड़ा था कि बिहार की विकास दर से संबंधित आंकड़ों के बारे में राज्य सरकार ने जो कहा है उसे हमारे आंकड़े बताना किसी तरह से उचित नहीं है. इसके बाद उसी वर्ष जब राज्य विधानसभा में विकास दर से संबंधित अंतिम रिपोर्ट पेश की गई तो उसमें राज्य की विकास दर 9.30 प्रतिशत बताई गई थी. इस अंतिम रिपोर्ट के बाद सरकार ने इस संबंध में चुप्पी-सी साध ली थी.
 
तकनीकी दांवपेंच

आम तौर पर सभी अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि विकास दर का आकलन आंकड़ों की जबर्दस्त कलाबाजी से भरा-पूरा एक बेहद जटिल मसला है और यह एक हद तक ही वास्तविकता का चित्रण कर सकता है. यही कारण है कि एक ही वित्तीय वर्ष में विकास दर को कम से कम तीन या चार स्तरों पर निर्धारित किया जाता है. सबसे पहले प्रोविजनल आंकड़े जुटाए जाते हैं. कुछ महीने बाद संशोधित आंकड़े निकाले जाते हैं. फिर एडवांस आंकड़े जुटाए जाते हैं और उसके बाद अंत में वास्तविक आंकड़े जारी किए जाते हैं. बिहार में विकास दर के मामले में 14.15 प्रतिशत विकास दर के जो आंकड़े 17 अक्टूबर को सरकार ने जारी किए थे वे संशोधित आंकड़े थे.

इसका मतलब स्पष्ट है कि एडवांस और वास्तविक आंकड़े अभी आने बाकी हैं. अगर पिछले साल की ही बात करें तो सरकार के संशोधित और वास्तविक आंकड़ों में काफी अंतर था. इसी बात के मद्देनजर अर्थशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं कि जब तक सरकार वास्तविक आंकड़े जारी नहीं कर देती तब तक इस संबंध में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा.  दूसरी तरफ सरकार संशोधित आंकड़ों को ही इतना प्रचारित करती है कि लोगों में यह भ्रम फैलता है कि राज्य की विकास दर काफी तेज है. लेकिन जब वास्तविक आंकड़े इससे अलग आते हैं तो वह इस पर एक तरह से मौन साध लेती है.
आंकड़ों के इस दांवपेंच की ओर इशारा करते हुए पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री नवलकिशोर चौधरी 2009-10 के वास्तविक आंकड़ों की मिसाल देते हुए कहते हैं, ‘तब सरकार ने 11.57 की विकास दर का खूब हो-हल्ला और प्रचार किया. पर जब वास्तविक आंकड़े  आए तो सरकार ने चुप्पी साध ली. 2009-10 मे विकास से संबंधित वास्तविक आंकड़ा 9.30 प्रतिशत पर ही सिमट कर रह गया था.’

मगर इन आंकड़ों में संशोधित और अंतिम आदि का पेंच होने के साथ ही इन पर और भी सवाल उठाए जाते रहे हैं. नवलकिशोर चौधरी कहते हैं, ‘विकास से संबंधित आंकड़े खुद बिहार सरकार के वित्त और योजना विभाग द्वारा तैयार किए जाते हैं. फिर इन्हें ही केंद्रीय सांख्यिकी संगठन को भेज दिया जाता है.’ चौधरी तो यहां तक कहते हैं कि विकास से संबंधित आंकड़े तो होटलों में बैठ कर ही तैयार कर लिए जाते हैं इसलिए इनकी प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है. हालांकि वे यह स्वीकार करते हैं कि पिछले चार-पांच साल में बिहार में विकास की गति तेज हुई है पर वह इतनी भी नहीं है जितना राज्य सरकार बता रही है क्योंकि कृषि, बुनियादी ढांचा, औद्यौगिक उत्पादन आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास दर अब भी चिंता का कारण बनी हुई है. ऐसी स्थिति में सेवा, होटल, पर्यावरण, रजिस्टर्ड मेनुफेक्चरिंग और निर्माण जैसे क्षेत्रों की विकास दर को राज्य के समग्र विकास से जोड़ कर देखा जाए तो स्थिति वैसी नहीं है जैसी कि बताई जा रही है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सच्चाई

आज भी राज्य की 89 प्रतिशत आबादी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ही आश्रित है. जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो यह संख्या आठ करोड़ 80 लाख के करीब होती है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात करें तो इसमें मुख्य तौर पर कृषि और पशुपालन शामिल हैं और पिछले छह में से तीन साल ऐसे रहे हैं जिनमें इन क्षेत्रों में विकास की दर नकारात्मक रही हैै. वर्ष 2005-06 में कृषि और पशुपालन की विकास दर -9 प्रतिशत थी तो  2007-08 में -7 प्रतिशत. जबकि 2009-10 में तो कृषि और पशुपालन जैसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले क्षेत्र की हालत और भी दयनीय होकर लगभग -13 फीसदी तक पहुंच गई.

कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह आंकड़ों की बाजीगरी है. सीएसओ के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है

हालांकि वर्ष 2010-11 में कृषि क्षेत्र की विकास दर में इजाफा हुआ और यह लगभग 10 प्रतिशत रही है. मगर जानकारों के मुताबिक असल में विकास की यह दर हाथी के दांत जैसी दिखाने की ही है. अर्थशास्त्री नवलकिशोर चौधरी विकास की इस गुत्थी को कुछ इस तरह सुलझाने की कोशिश करते हैं, ‘पिछले वर्ष यानी 2009-10 में राज्य ने कृषि क्षेत्र में 13 प्रतिशत की गिरावट झेली थी. ऐसे में इस वर्ष अगर दस प्रतिशत की वृद्धि हुई भी है तो 2008-09 के आंकड़ों की तुलना में यह 3 प्रतिशत की गिरावट ही है. ऐसी स्थिति में अन्य क्षेत्रों में विकास की दर बढ़ती भी है तो राज्य की अधिकांश जनसंख्या पर इसका नाम मात्र का ही प्रभाव दिख सकता है.’

जैसा कि अर्थशास्त्री  और एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक डीएम दिवाकर  कहते हैं, ‘निर्माण,  पर्यटन, होटल व रेस्टूरेंट और निबंधित उत्पाद क्षेत्रों के विकास को नकारा नहीं जा सकता पर विकास की इस दर को समग्रता में देखा जाए तो यह स्प्ष्ट हो जाता है कि इस विकास का समाज के सबसे बड़े तबके से कोई लेनादेना है ही नहीं.

छह साल छह सवाल

नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर छठे साल में हैं. दूसरी पारी का एक साल 26 नवंबर को पूरा हो रहा है. जिस प्रदेश के मुखिया हैं, वह 100वें साल में है. वे आजकल सेवा यात्रा पर निकले हुए हैं. बिहार के सौवें साल के आयोजन की तैयारी भी जोर-शोर से चल रही है. नीतीश और बिहार की चर्चा देश-दुनिया में हो रही है. वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखें तो फिलहाल बिहार में कोई नेता ऐसा दिखता भी नहीं जो नीतीश का विकल्प बनने की स्थिति में हो. संभव है, विपक्ष के इस बिखराव और भटकाव की वजह से नीतीश बिहार में अगली पारी भी आसानी से खेल लें. वे मृदुभाषी हैं, अपनी छवि के प्रति बेहद सचेत रहते हैं, वक्त की नजाकत को समझने में माहिर हैं, पार्टी और सरकार के बीच समन्वय की राजनीति करने की कला जानते हैं. और भी कई खासियतें हैं जो उन्हें अलग खड़ा करती हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन विशेषताओं और सत्ता में एकाध पारी और खेल लेने के बाद नीतीश एक ऐसे नेता के तौर पर लोकमानस में स्थापित हो जाएंगे जिसे पॉलिटीशयन की बजाय स्टेट्समैन कहते हैं. राजनेताओं के बारे में यह कहा जाता है कि वे तत्काल फायदे को ध्यान में रखकर राजनीति करते हैं और उनका ध्येय सत्ता-शासन में बने रहना होता है. स्टेट्समैन वह होता है जो कई मौकों पर नफे-नुकसान से परे जाकर दूर भविष्य के बारे में भी सोचता है. वह सत्ता के इर्द-गिर्द ही अपनी राजनीति का सारा ताना-बाना नहीं बुनता.

नीतीश कुमार को अगर उनसे पहले के शासन यानी लालू-राबड़ी के मुकाबले खड़ा करें तो वे अतुलनीय लग सकते हैं. चूंकि दोनों एक ही प्रदेश में राजनीति कर रहे हैं, इसलिए इनकी तुलना होना लाजिमी भी है. लेकिन समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र के अन्य पहलुओं पर भी गौर करना होगा. नीतीश इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं. गांव की बजाय कस्बाई माहौल में उनकी परवरिश हुई. उनके पिता एक प्रतिष्ठित और सम्मानित वैद्य थे, इसलिए बचपन से ही उनमें अलग किस्म का अनुशासन रहा होगा. लालू प्रसाद अलग परिवेश से आए थे. दोनों के व्यक्तित्व में फर्क दिखता है तो यह स्वाभाविक ही है. प्रदेश की राजनीति में दोनों के छा जाने के वक्त के माहौल भी जुदा थे. इसलिए सिर्फ लालू प्रसाद से तुलना करके, नीतीश को बेहतर मान लेना एक किस्म का चलताऊ तर्क-सा लगता है.

नीतीश का आकलन इससे अलग जाकर करना होगा. नीतीश नायक हैं लेकिन क्या वे महानायकों की श्रेणी में भी आ सकेंगे, इसके लिए उनका आकलन उनको ही आधार बना कर करना होगा. यह देखना होगा कि क्या विनम्र नीतीश में जब-तब जो अहंकार हावी होता है वह उनका कभी भला करेगा! यह देखना होगा कि उनकी कथनी और करनी का फर्क क्या कभी उन्हें दृढ़निश्चयी नेता के तौर पर स्थापित करेगा. खुद की छवि साफ रखते हुए भी गलत किस्म के लोगों से छुटकारा नहीं पा सकने की विडंबना उन्हें किस श्रेणी में खड़ा करेगी, यह भी देखना होगा. नीतीश जिस लोकप्रिय राजनीति को अपनाते नजर आते हैं वह क्या उन्हें औरों से अलग नायकत्व प्रदान करेगी?  नीतीश के नाम पर बिहार के लोगों के बीच लहर चलती है, नीतीश चुनावी राजनीति के महारथी भी हो जाते हैं लेकिन जो नीतीश को बनाने वाले होते हैं वे ही एक-एक कर उनका साथ छोड़ते जाते हैं तो यह भी एक सवाल बनता है कि इसकी वजह क्या है क्या नीतीश एक बेहतर टीम लीडर नहीं हैं या उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और नेतृत्व की कसौटी अलग-अलग हैं?

यहां हम जिन बिंदुओं पर बात कर रहे हैं वे जनता के मन में हैं. अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग रूपों में नीतीश से संबंधित ऐसे सवाल चौपालों में उछलते रहते हैं. ऐसे सवालों को सामने रखने का मतलब सिर्फ आलोचना करना नहीं, बल्कि यह ध्यान भी दिलाना है कि भले ही ये सवाल मीडिया में न दिखते हों लेकिन बिहार के अलग-अलग हिस्से में उठ रहे हैं. सत्ता की राजनीति से इन सवालों का वास्ता न भी हो तो ये खुद नीतीश के महानायक बनने की राह में रोड़े की तरह जरूर मौजूद रहेंगे.

चिर दुविधा, अनवरत द्वंद्व

लालू प्रसाद के बाद अब नीतीश से भी उतने ही आत्मीय संबंध रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार पहले का एक किस्सा सुनाते हैं. एक बार नीतीश कुमार के साथ वे हेलिकॉप्टर से कहीं जा रहे थे. बात लालू पर होने लगी. नीतीश ने कहा- लालू प्रसाद को इतिहास में बड़ी जगह मिलेगी. पत्रकार ने नीतीश को कहा- इतिहास में आपको भी अहम स्थान मिलेगा. नीतीश ने दुविधा जताई कि अभी इसका ठोस आधार तो नहीं दिखता! पत्रकार ने कहा- बिहार में भाजपा को जमीन देने, उसे मजबूत आधार बनाने का मौका देने के लिए आपको सदा याद किया जाएगा. उसके बाद नीतीश पूरी यात्रा में दुविधाग्रस्त रहे. चिंतन-मनन में लगे रहे.

यह बात बहुत पुरानी हो चली है. नीतीश तब बिहार के मुखिया नहीं थे. वे राजनीतिक आधार की तलाश में वाम दलों का साथ लेने के बाद भाजपा से जुड़ चुके थे. बाद में भाजपा के साथ केंद्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण पारी खेली. अब तो उनका और उनकी पार्टी का भाजपा के साथ चलने, बनने, निभने का लंबा अनुभव हो चला है. लेकिन इतनी लंबी सहयात्रा के बावजूद इस रिश्ते को लेकर नीतीश जब-तब दुविधा में पड़े रहने वाले नेता दिखते हैं. नीतीश के पुराने साथी पूर्व विधानपार्षद प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘जिसे आप दुविधा समझते हैं, वह उनकी नियति है.’ मणी अब उनके आलोचक हैं. इनकी आलोचना से परे नीतीश अगर खुद गौर करें तो कई बार उनका खुद का व्यवहार उन्हें दुविधाग्रस्त नेता के रूप में कटघरे में खड़ा करेगा. इसे पहली से लेकर दूसरी पारी तक में देखा जा सकता है. भाजपा से रिश्तों से परे अन्य मसलों पर भी.

नीतीश की एक चूक वर्षों बाद भी उनके व्यक्तित्व, कृतित्व व नेतृत्व पर सवाल खड़ा करती रहेगी

फारबिसगंज-भजनपुर कांड पर नीतीश दुविधा में ही दिखे. दुविधा को स्वाभाविक साबित करने के लिए वे एकबारगी बच्चों-से जिद्दी बन गए. संभव है, नीतीश की दुविधा को संतुष्टि मिल गई हो लेकिन यह एक चूक वर्षों बाद भी उनके व्यक्तित्व, कृतित्व व नेतृत्व पर सवाल खड़ा करेगी. आखिर उन्होंने फारबिसगंज जाने की जरूरत क्यों नहीं समझी? भजनपुर में पांच लोगों को मार दिए जाने का मामला चाहे पुलिस ऐक्शन का रहा हो या जरूरत के अनुसार की गई जरूरी कार्रवाई या नीतीश के ही अनुसार यह संयोग ही हो कि मारे गए सभी अल्पसंख्यक समुदाय के थे. मगर जिस तरह से पुलिस ने नृशंस व्यवहार किया, उस हालत में मुख्यमंत्री से स्वाभाविक उम्मीद थी कि वे वहां पहुंचेंगे, खुलकर बोलेंगे. दिखावे के लिए ही सही, राहुल, लालू, रामविलास समेत कई नेता वहां पहुंचे. मगर नीतीश नहीं गए. एक न्यायिक जांच आयोग का गठन उन्होंने किया, लेकिन वह भी चार माह तक गति की बजाय दुर्गति में रहा. इस बात को बल मिला कि नीतीश भाजपा के दबाव की वजह से वहां नहीं गये! इसके तार भी जुड़े. जिस कंपनी को लेकर पुलिस फायरिंग की वहां घटना हुई, उसमें भाजपा के एक विधान पार्षद के बेटे की सहभागिता है. लोग कहते हैं कि भाजपा के एक बड़े नेता के दबाव में नीतीश दुविधाग्रस्त और इतने जिद्दी बने कि उन्होंने इस घटना से मुंह मोड़ने का फैसला कर लिया.

प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘नीतीश के रेलमंत्रित्व काल में ही गुजरात का गोधराकांड हुआ था. नीतीश तब गोधरा भी नहीं गए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने तो खुलकर इतना कह दिया था कि नरेंद्र मोदी ने राजधर्म का निर्वाह नहीं किया. लेकिन नीतीश तब भी कुछ नहीं बोले थे. उन्होंने बाद में कहा था कि गोधरा नहीं जाना बड़ी भूल थी.’ मणी को विरोधी मानकर फिर उनकी बातों को खारिज किया जा सकता है लेकिन नीतीश उस गोधरा की ऐतिहासिक भूल को फारबिसगंज जाकर सुधार सकते थे. मगर दुविधाग्रस्त नीतीश एक बार फिर चूक गए. वे नरेंद्र मोदी का नाम सुनकर ही खफा हो जाते हैं. मोदी भाजपा के एक बड़े नेता है. भाजपा मोदी की अनदेखी नहीं कर सकती. नीतीश नरेंद्र मोदी को बिहार से दूर रखकर, उनके नाम से भड़ककर सुविधा और सत्ता की राजनीति तो कर सकते हैं लेकिन क्या दृढ़निश्चयी और सिद्धांतवादी नेता के तौर पर भी स्थापित हो सकते हैं? हां या ना के बीच का रास्ता अवसरवादी होता है. क्या सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम से भड़कने से व्यक्तित्व व कृतित्व पर चस्पा हो गए फारबिसगंज या गोधरा के सवाल हट पाएंगे?

संभव है नीतीश से अभी ये सवाल न पूछे जाएं लेकिन सिर्फ पूछे जाने वाले सवाल ही बड़े व दूरगामी प्रभाव डालने वाले नहीं होते, अंतर्मन के सवालों से भी धारणाओं का निर्माण होता है. इसका अहसास शायद नीतीश को हालिया दिनों में सिताबदियारा के बाद छपरा पहुंचने पर हुआ होगा, जहां वे लालकृष्ण आडवाणी की यात्रा को हरी झंडी दिखाने पहुंचे थे. भाजपा नेताओं से अपने दल के इकलौते सदस्य के तौर पर घिरे नीतीश बच्चों की तरह सफाई देते रहे कि वे उस आडवाणी को विदा करने आए हैं जो भ्रष्टाचार से लड़ने निकले हैं. लेकिन आडवाणी मंच से कहते रहे कि रामरथ यात्रा उनके राजनीतिक जीवन की अहम यात्रा थी और आज उन्हें गर्व हो रहा है कि दो दशक पहले जिस आडवाणी की रामरथ यात्रा को बिहार के एक मुख्यमंत्री ने रोका था, आज वहीं का दूसरा मुख्यमंत्री उसी रामरथ यात्रा पर गर्व करने वाले आडवाणी को विदा करने आया है. नीतीश पसीने-पसीने थे. परेशान दिख रहे थे लेकिन वहां दुविधा की गुंजाइश नहीं थी. वे मंच पर थे, सुनना मजबूरी थी. धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक मोर्चे पर आडवाणी जाने-अनजाने लालू प्रसाद को मजबूत कर रहे थे, नीतीश की दुविधा पर सुविधाजनक तरीके से.

आरंभ में नीतीश ने अलग होने की उम्मीद भी जगाई लेकिन बाद में वे लगातार समर्पण की मुद्रा में आते गए

नीतीश फारबिसगंज जैसे सवाल या भाजपा से रिश्ते पर ही दुविधा में नहीं दिखते. पहली पारी में उन्होंने बंदोपाध्याय समिति बनाते समय कहा था कि भूमि सुधार के बगैर बिहार का कभी भला नहीं होगा. समग्र विकास भी नहीं होगा. बंदोपाध्याय ने रिपोर्ट सौंपी. उसके कुछ हिस्से सार्वजनिक हुए. फिर चुनाव आ गया. दूसरी पारी के लिए चुनाव परिणाम वाले दिन भूमि सुधार के सवाल पर नीतीश का जवाब मिला – यह सवाल पुराना हो चुका है. नीतीश उसे लागू करने, ना करने की दुविधा में फंसे, अपने निश्चय पर दृढ़ नहीं रह सके तो सवाल को पुराना बता दिया. क्या उन्हें नहीं पता कि समाधान के बगैर कोई सवाल पुराना नहीं होता? कुछ ऐसी ही हालत समान शिक्षा प्रणाली के लिए मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में कमेटी बनाने व रिपोर्ट आने के बाद हुई. रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. महादलित आयोग के बाद सवर्ण आयोग गठित करने का फैसला नीतीश का ही रहा. बाद में सवर्ण आयोग एक दफ्तर तक के लिए तरसता रहा. उसके अध्यक्ष को खोजना दिल्ली से पटना पैदल आने-जाने के बराबर हुआ. सवर्ण आयोग बनाने की आलोचना हुई तो नीतीश फिर दुविधा में फंसे, उसकी कोई खबर ही नहीं ली.
संभव है, ऐसे आयोग वगैरह बनाते समय नीतीश के मन में दुविधा की बजाय भविष्य के सवाल-खयाल रहते हों लेकिन उन्हें अमलीजामा पहनाते वक्त शायद राजनीति व सत्ता की अड़चनें सामने आ जाती हैं. लेकिन यह भी तो सच है कि इतिहास के सुनहरे पन्नों में कुछ पंक्तियां उन्हीं के लिए सुरक्षित रहती हैं जो अतीत की जकड़न तोड़, दूरदृष्टा की तरह बहुत आगे की सोचते हैं. दृढ़निश्चयी होते हैं. वरना सुविधा और दुविधा के साथ तो देश भर में 30 मुख्यमंत्री अभी भी अपना काम चला ही रहे हैं.

मजबूती के लिए मजबूरी का वास्ता

बुजुर्ग हो चले बाबू विनोदानंद सिंह पुराने समाजवादी नेता हैं. विधायक रहे हैं. समाजवादियों के बीच उनका बड़ा सम्मान है. नीतीश उन्हें ‘भाई साहब’ कहते हैं. विनोदा बाबू के दिल में भी नीतीश के लिए स्नेह और प्यार है. वे नीतीश के प्रशंसक हैं. बतकही में वे एक पुराना किस्सा सुनाते हैं. नीतीश जब केंद्रीय मंत्री थे तो विनोदा बाबू किसी दोस्त के साथ उनसे मिलने गए. नीतीश ने बहुत सम्मान दिया. फिर बातों-बातों में एक बात कही, ‘भाई साहब, आपलोग तो हवा के साथ कभी चलते ही नहीं, अगर हवा के अनुसार चलते तो कहां से कहां पहुंच गए होते…!’
 दरौंदा चुनाव के वक्त जब विनोदा बाबू ने यह किस्सा सुनाया तब सवाल उठा कि क्या नीतीश स्वभावतः ही हवा के साथ चलने वाले रहे हैं! दरौंदा विधानसभा उपचुनाव में अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह की जीत के बाद तसवीरों में नीतीश के चेहरे पर बिखरी खुशी इसका आभास करा रही थी. अजय सिंह की क्या छवि है, इस पर अलग से चर्चा की जरूरत नहीं. न ही यह किसी से छिपा हुआ है कि कविता की शादी अजय के साथ फटाफट करवाकर कैसे उन्हें विधानसभा तक पहुंचाया गया. कविता की जीत चाहे जिस वजह से हुई हो, लोकतंत्र के इस राजनीतिक प्रहसन के सूत्रधार के रूप में नीतीश को याद किया ही जाएगा.

सत्ता की राजनीति में नीतीश फिलहाल अपार बहुमत के साथ हैं. अभी चुनाव भी काफी दूर है तो एक-एक सीट के लिए मर-मिटने जैसी हालत भी नहीं है. नीतीश बिहार में बदलाव और सुशासन के प्रतीक हैं. खुद के भरोसे भी वे विधायकी में किसी को जीत दिलवा सकते थे! ऐसे में अजय सिंह-कविता सिंह के प्रयोग से वे बचते तो एक साथ राजनीति के अपराधीकरण और परिवारवाद को परोक्ष संरक्षण दिए जाने का जो ठप्पा उन पर लग रहा है वह और मजबूत न होता. मगर नीतीश ऐसा नहीं कर सके. अब यदि चौपाली सभा से लेकर राजनीतिक गलियारे में जब कोई कहेगा कि नीतीश के लिए सत्ता ही महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा है, तो उसे ऐसा करने से कैसे रोका जा सकता है. बिना किसी राजनीतिक अनुभव वाली एक राबड़ी को अचानक राजनीति में थोपकर लालू प्रसाद लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रहसन के ऐतिहासिक पात्र बने. मगर तब जमाना और था. क्या लंबे समय तक एक और राबड़ी के प्रयोग का श्रेय नीतीश को नहीं दिया जाएगा?
विरोधियों की मीन-मेख और टिप्पणी की बजाय खुद नीतीश के खासमखास और उनके ही दल के शिवानंद तिवारी भी उनके इस प्रयोग पर नहीं बोल पाते. वे तर्क देते हैं कि परिवारवाद कांग्रेस की देन है. शिवानंद तिवारी जैसे नेता कांग्रेस की दुहाई देकर कुतर्क गढ़ते हैं. मगर इसके जरिए वे खुद को ही तसल्ली दे सकते हैं.

यह सच है कि लालू प्रसाद या उनके पहले के बहुतेरे नेताओं की तुलना में नीतीश कुछ हद तक अलग छवि रखते हैं. इनके सत्ता में आने के बाद भी इनके निकटवर्ती या दूर-दराज के रिश्तेदार राजनीतिबाज नहीं बने. नीतीश के बड़े भाई सतीश बाबू आज भी मुख्यमंत्री के भाई होने के प्रभाव का इस्तेमाल नहीं करते. अन्य रिश्तेदारों की तो बात ही दूर, नीतीश के बेटे भी इस सब से दूर नजर आते हैं. इससे वर्षों बाद बिहार की राजनीति में एक संभावना जगी थी कि थोथे और खोखले परिवारवाद का खात्मा करने में नीतीश ही सक्षम होंगे.

बिहार में धीरे-धीरे यह बात घर कर रही है कि सबकुछ सिर्फ फीलगुड जैसा दिखता है तो उसमें मीडिया की भूमिका ज्यादा है

आरंभ में नीतीश ने इसे लेकर उम्मीद भी जगाई लेकिन बाद में लगातार समर्पण की मुद्रा में आते गए. उनके समर्थक इसे मजबूरी बताते रहे. खुद की मजबूती के लिए दूसरे नेता भी इसी तरह मजबूरी का वास्ता देते थे. लेकिन नीतीश खुद सोचें कि क्यों नहीं उन्हें भी इस कसौटी पर एक ऐसे सत्तापरस्त नेता के रूप में याद किया जाए जिसने मजबूती के लिए मजबूरी को ढाल बनाया. व्यक्तिगत तौर पर अपनी छवि बचाए-बनाए रखने की बात हो तो सिर्फ नीतीश ही क्यों, बिहार में कई और नेता भी पहले हुए, जो बेदाग रहे और अपने परिजनों को जीते-जी राजनीति से दूर रखा.

नीतीश ने आरंभ में जब धाकड़ नेता जगदीश शर्मा की पत्नी का टिकट काटा तो यह कदम सुर्खियों का बादशाह बना. बाद के दिनों में जगदीश शर्मा के बेटे राहुल को नीतीश ने ही टिकट दिया. महेंद्र सहनी के बेटे अनिल सहनी को राज्यसभा भेजकर, मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नु शुक्ला को टिकट देकर, अश्वमेघ देवी, मीना सिंह, कौशल्या देवी आदि को चुनावी राजनीति में मुकाम दिलाकर नीतीश ने अपने को ‘औरों’ की श्रेणी में ही शामिल कर लिया.

बात परिवारवाद से निकलकर राजनीति में अपराध के परोक्ष संरक्षण तक भी पहुंचती है. स्पीडी ट्रायल के जरिए अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की प्रक्रिया से नीतीश को वाहवाही तो मिली लेकिन अनंत सिंह, तसलीमुद्दीन, उनके बेटे सरफराज, सुनील पांडेय के भाई हुलास पांडेय आदि के साथ कई नामचीन बाहुबलियों की पत्नियों को राजनीतिक संरक्षण देना नीतीश कुमार को मजबूती के लिए मजबूरी के रास्ते को अपनाने वाला नेता बना देता है.

मीडिया को नाथने की कोशिश

जहानाबाद के एक गांव सचई में जाना हुआ था. सनातन नामक एक व्यक्ति से बातचीत हो रही थी. पत्रकारिता से आजीविका चलाता हूं, जानने के बाद सनातन ने एक सवाल सामने रखा. ‘वेदव्यास जब महाभारत की रचना कर रहे थे और विष्णु के अवतार कृष्ण को मानव रूप में महानायक के तौर पर स्थापित कर रहे थे, तो भी उन्होंने कृष्ण का सिर्फ यशोगान नहीं किया. कृष्ण की जो कमियां थीं, उनकी नीतियों-रणनीतियों में जो चूक थी, उन्हें भी सामने रखा.’ सनातन पूछते हैं, ‘इधर के वर्षों में अधिकांश जगहों पर लिखे-पढ़े को देख-समझकर ऐसा लगता है कि नीतीश इस भारत की धरा पर एक ऐसे नायक के रूप में अवतरित हुए हैं जिनमें कहीं, कभी, कोई मीन-मेख नहीं निकाली जा सकती. ना ही छह वर्षों के शासन में इनसे कभी कोई एक चूक हुई.’ सनातन कहते हैं, ‘आनेवाले कल में जब भावी पीढ़ी नीतीश के बारे में जानना चाहेगी तो उसे यही मालूम होगा कि बिहार में नीतीश नाम का एक ऐसा नेता हुआ था जिसने गलती से भी एक बार गलती नहीं की. क्या भावी पीढ़ी पौराणिक, ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन के बाद सहज ही यह मानेगी कि धरा पर आकर, शासन में रहकर यथार्थ में ऐसा नायक होना संभव है?’

सनातन यहीं अपनी बात खत्म करते हैं. नीतीश यहीं कुछ देर सोच सकते हैं. यह हर कोई जानता, मानता है कि कुछ मायनों में नीतीश बेहतर काम कर रहे हैं. संभावनाओं से भरे हुए नेता हैं. उनके नेतृत्व से जनता के बीच उम्मीद जगी थी जो आज भी कायम है. इस उम्मीद की परिणति पिछले चुनाव में अपार बहुमत के रूप में दिखी. सिर्फ स्थानीय जनता ही नहीं, देश-दुनिया के जाने-माने बौद्धिकों का एक बड़ा तबका भी यह मानता है. रामचंद्र गुहा, अमर्त्य सेन, लॉर्ड मेघनाथ देसाई, आरके पचौरी, बिल गेट्स जैसे लोग सार्वजनिक मंचों से यह कहते रहे हैं.

इतना सब कुछ पा लेने के बाद क्या नीतीश को अति आत्मप्रचार से बचने की जरूरत नहीं? थोड़ा बचने से क्या उनकी स्थिति और ज्यादा मजबूत नहीं होगी?लेकिन वे मीडिया को साधने के साथ शायद नाथने में भी भरोसा रखते हैं. उनके कार्यकाल में जिस तरह मीडिया पर विज्ञापन मद में अंधाधुंध पानी की तरह पैसा बहा, उससे नीतीश कई बार खुद प्रहसन के पात्र बनते हैं. आंकड़ों की तह में जाए बगैर ही अगर सीधे-सीधे बात करें तो लालू-राबड़ी की तुलना में नीतीश के कार्यकाल में विज्ञापन पर हुआ खर्च लगभग 700 प्रतिशत बढ़ा. छवि निर्माण का यह अर्थशास्त्र नीतीश के दिमाग की उपज न हो तो इससे सावधान रहना चाहिए. इससे किरकिरी ही हो रही है.
आज बिहार समेत देश के अलग-अलग हिस्से में धीरे-धीरे यह बात घर कर रही है कि बिहार में यदि सब कुछ सिर्फ फीलगुड-फीलगुड जैसा दिखता है तो उसमें मीडिया की भूमिका ज्यादा है, जो बड़ी से बड़ी खबरों को या तो निगल जाता है या उन्हें पेश करने की रस्मअदायगी भर करता है.

सरकारी योजनाओं को प्रचारित करने के लिए प्रचारतंत्र को मजबूत करने की बात तो एक हद तक समझ में आती है लेकिन उसका विस्तार निचले स्तर तक छिछले रूप में पहुंचता है. नीतीश भले ही अरविंद केजरीवाल पर निशाना साध यह कहें कि उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं लेकिन वे भूल जाते हैं कि यदि किसी निजी संस्थान द्वारा अवसरवादी सम्मान के रूप में भी उन्हें कोई सर्टिफिकेट दिया जाता है तो उसका ढिंढोरा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग हर शहर में होर्डिंग आदि लगाकर पीटता है. यह बेहद अटपटा-सा लगता है. राजधानी पटना में कई बार अचानक से अधिकतर होर्डिंगों पर रातों-रात छाने को आतुर नेता नीतीश गान की इबारतें चस्पा कर देते हैं. उसकी हद यह होती है कि जब उनकी माता जी का निधन होता है तो इसे भी छुटभैये नेता एक अवसर मान पटना में होर्डिंग लगा देते हैं- ‘धन्य हो मां, जिसने नीतीश जैसे लाल को जन्म दिया..’

संभव है, नीतीश को इन सभी बातों की जानकारी न हो लेकिन लोग यह नहीं जानते कि यह सब उनके जाने बगैर कुछ खुराफाती मगज वाले चाटुकार करते रहते हैं. संदेश यही जाता है कि नीतीश प्रचार के गोयबल्सी तंत्रों के सहारे भी जनमानस में सदा-सदा के लिए बसना चाहते हैं!मीडिया फ्रेंडली नीतीश को समझना होगा कि आज मीडिया खुद अपनी साख और विश्वसनीयता बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है और वह किसी की छवि का स्थायी निर्माण करके उसे सत्ता दिलवाने की क्षमता नहीं रखता. वरना कोई कारण नहीं कि तमिलनाडु में करीब 70 प्रतिशत मीडिया को नियंत्रित करने वाले करुणानिधि परिवार चुनाव में बुरी तरह परास्त हो जाता. बिहार में तो वैसे ही मीडिया की साख इन दिनों भंवरजाल में है. मड़वन एस्बेस्टस कंपनी के खिलाफ आंदोलन के बाद एक रैली मीडियावालों के खिलाफ भी तरह-तरह के बैनरों के साथ निकली थी. वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं, ‘हमलोग तो अब अपने आयोजन में मीडिया को बुलाते ही नहीं हैं और उसके बगैर हमारे आंदोलन पर कोई अंतर या असर नहीं पड़ता.’ सिन्हा की बातों को छोड़ भी दें तो नीतीश तो जानते ही होंगे कि उनके राजनीतिक गुरु जयप्रकाश नारायण बगैर किसी मीडियाई करिश्मे के महानायक बने थे. सदा-सदा के लिए.

लोकप्रियता की राजनीति

नीतीश अपनी छठी राजनीतिक यात्रा के रूप में विकास यात्रा पर हैं. यात्रा के दौरान खुद ही बीडीओ, दारोगा आदि की भूमिका में आ रहे हैं. गरीब के घर जाकर भूंजा भी फांक रहे हैं. इस यात्रा में नीतीश की चक्रवर्ती सम्राट अशोक से लेकर सबरी के बेर खाने वाले राम तक से तुलना की जा रही है. जब-तब नीतीश की ऐसी तुलना होती रहती है. नीतीश भी जब-तब ऐसे आयोजन करते रहते हैं. ऐसे आयोजनों को महज राजनीतिक नाटक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि जनविमुख राजनीति के दौर में ऐसे आयोजन भी कई बार सुकून दे सकते हैं. महज आलोचना करने वाले भी ऐसा ही कोई राजनीतिक नाटक करने के बाद नीतीश की आलोचना करें तो उसका महत्व भी होगा. लेकिन दूसरों की आलोचना और नुक्ताचीनी से परे ऐसी वाहवाही से उपजी सुखद अनुभूति के बीच नीतीश खुद थोड़ी देर रुककर आकलन करें तब शायद उन्हें अहसास हो कि महज लोकप्रियता की राजनीति की उम्र कम होती है.

लालू प्रसाद भी अपने आरंभ के दिनों में जब-तब, जहां-तहां पहुंचकर खटिया पर बैठते-लेटते थे. घोंघा-सतुआ खाते थे. राहुल गांधी भी दो-तीन साल पहले ऐसे ही कुछ यात्रापरक अभियानों के जरिए लोकप्रियता में परवान चढ़े थे.जहां-तहां, खाते-सोते रहते थे. अब उनकी यात्राओं का निहितार्थ-फलितार्थ सबको पता है.इन यात्राओं से इतर भी नीतीश कुमार एक अणे मार्ग में नियमित तौर पर लगने वाले जनता के दरबार में घंटों पसीने-पसीने होकर बैठे रहते हैं, लोगों की फरियाद सुनते हैं तो बहुतों को लगता है कि एक मुख्यमंत्री इतनी देर बैठता तो है. एसी के बगैर रहता तो है. नीतीश दरबार में धैर्य से लोगों की बातें सुनते हैं. लेकिन उसकी सीमा छोटी होती है. एक हद के बाद सेचुरेशन की स्थिति बनती है. जब फरियादी चार-चार बार दरबार में जाने के बाद भी अपनी समस्याओं का समाधान नहीं पाता या फरियाद सुनाने के एवज में एक अणे मार्ग में ही अधिकारियों की धौंस का सामना करता है तो वह टूट जाता है. नीतीश दरबार के फल को जानने की कोशिश नहीं करते. उनके पास दूर-दराज से किसी तरह पहुंचने वाले लोगों के आवेदन पर अधिकारी गंभीरता से कार्रवाई कर भी रहे हैं या नहीं, यदि नीतीश बीच-बीच में इसकी भी खबर लेते तो ज्यादातर यात्राओं की जरूरत ही नहीं पड़ती. तब शायद आरटीआई से सूचना मांगने पर नीतीश के जनता दरबार में जाने के बाद भी लंबित मामलों की सूची इतनी लंबी नहीं होती

जब फरियादी चार-चार बार दरबार में जाने के बाद भी समस्याओं का समाधान नहीं पाता तो वह टूट जाता है

यात्राओं में भी नीतीश बीडीओ, दारोगा बनने के साथ ही समाज के बनाव-बिगड़ाव-बिखराव का भी अध्ययन करते तो कई बार रात में उन्हें नींद नहीं आती. उनके ही कार्यकाल में शराब का ठेका पंचायत तक पहुंचा. द्वारे-द्वारे पहुंचे दारू के प्रभाव से समाज में आए बदलाव को भी जानने की कोशिश करते तो बहुत हद तक संभव है वे दारू से मिलने वाले राजस्व के विकल्प के लिए दूसरे स्रोत पर भी सोचते. यह संभव है, नीतीश के प्रयास से बिहार भविष्य में चमक जाए लेकिन चमके बिहार में दारू के जरिए दलाली के बाद कलाली और बवाली फौज के रूप में सामने होंगे. उनके लिए विकास के क्या मायने होंगे?

नीतीश अब अपनी यात्रा में वंचितों के घर पहुंच रहे हैं. यह अच्छा है, लेकिन कुछ माह से इंसेफलाइटिस ने जिन इलाकों में कहर बरपाया हुआ है वहां का भी एकाध दौरा अगर कर लिया होता तो उस दौरे का महत्व इन यात्राओं से कहीं ज्यादा होता. इंसेफलाइटिस से मरने वाले अधिकांश बच्चे महादलित और अतिपिछड़ा समुदाय से ही थे. अपने ही शहर नालंदा में नाई महिला पर दबंग जाति के अत्याचार और व्यभिचार के समय नीतीश बिहारशरीफ जाकर, घंटों रुके. तब अगर चंद फर्लांग की दूरी पर अस्पताल में भर्ती उस नाई महिला से भी वे मिल लिए होते तो उसका संदेशा पूरे बिहार के अतिपिछड़ों के बीच जाता.

नीतीश के आलोचक भी कई मामलों में उनके कायल हैं, पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, ‘पिछली सरकार की तुलना में नीतीश बेहतर कोशिश करते हुए दिखते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं. नीतीश कुमार के शासन काल में आप कम से कम मीन-मेख निकालने की स्थिति में तो हैं. यह होना चाहिए, यह नहीं होना चाहिए, यह नहीं हो रहा है, यह गलत हो रहा है. पिछले राज में तो ‘होने’ जैसा प्रचलन ही ठहर-सा गया था. नीतीश के सत्ता में दुबारा से बने रहने की बड़ी वजह भी वही है. बावजूद इसके नीतीश कुमार की जो दरबारी पद्धति है वह शासन की अवधारणा को ही झुठलाती है. दरबार की परंपरा हमेशा से ही राजा से जुड़ी रही है. राजतंत्र में राजा ही सब कुछ होता था, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका सबकी ताकत उसके हाथों में होती थी. वह दरबार में कुछ भी फैसले ले सकता था. राजतंत्र के खात्मे के साथ ही इस दरबारी पद्धति का भी खात्मा हो गया. क्या ऐसा संभव है कि नीतीश कुमार विधायिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका से जुड़े किसी भी मसले पर अपने दरबार में या कथित तौर पर जनता के दरबार में फैसले ले लें?’ प्रभाकर सिन्हा आगे कहते हैं, ‘यह संभव नहीं है. अधिकतर आबादी का फैसला अधिकारी ही करेगा. निपटारा कोर्ट-कचहरी, अधिकारियों के यहां ही होगा. पाई-पाई जोड़कर किसी तरह पटना पहुंचने वाले गरीबों को अपने ही यहां शासन का फल मिले, उनकी समस्याएं वहीं सुलझें, नीतीश इसके लिए कोशिश करेंगे तो उससे सुशासन का सिस्टम स्थायी भाव में विकसित होगा वरना खुद को खपाते रहने और उससे निकले परिणामों की सीमा बहुत छोटी होती है.’

असहमति से परहेज

अन्ना हजारे के आंदोलन को नैतिक व मौखिक समर्थन देने वाले नेताओं में नीतीश आरंभ से ही आगे की पंक्ति में रहे. अन्ना ने बिना बिहार आए दिल्ली से नीतीश व उनके विकास के मॉडल की जमकर प्रशंसा की. नीतीश कुमार प्रकारांतर से अन्ना आंदोलन के पक्ष में बयान देते रहे. जब अन्ना का आंदोलन परवान चढ़ा, एक तबके के बीच भ्रष्टाचार बड़ा मसला बन गया. ऐसे में नीतीश ने उसके निवारण के एकाध प्रयोग भी कर डाले. खूब तारीफ हुई. नीतीश अन्ना के इतने फैन हुए कि ‘राइट टू रिकॉल’ पर भी खुले मन से अपने विचार रखे. लालकृष्ण आडवाणी से अलग राह पकड़कर अन्ना की इस मंशा का समर्थन किया. सब कुछ ठीक-ठाक ही चलता रहा, लेकिन जैसे ही टीम अन्ना के अरविंद केजरीवाल ने बिहार के लोकायुक्त के संदर्भ में एक छोटी टिप्पणी भर की, नीतीश झल्ला गए. उन्होंने टीम अन्ना को हद में रहने के अलावा अन्य कई किस्म की नसीहतें दे डाली. नीतीश बिना झल्लाए भी यही बात कह सकते थे लेकिन जो नीतीश को जानते हैं उन्हें अच्छे से पता है कि बाकी सारी चीजों पर तो नीतीश सुन भी सकते हैं लेकिन असहमति और आलोचना से उन्हें सख्त परहेज है. हो सकता है केजरीवाल विवाद एक संयोग रहा हो लेकिन अतीत की परछाइयां भी ऐसी ही गवाही देती हैं.

नीतीश के प्रमुख सहयोगी रहे पूर्व विधान पार्षद डॉ शंभू शरण श्रीवास्तव, जो अब भाकपा में हैं, कहते हैं कि ‘मैं नीतीश की व्यक्तिगत आलोचना कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं करूंगा लेकिन यह तो उनसे पूछा ही जा सकता है कि उनके दल में पिछले कई साल से संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन क्यों नहीं हुआ?’ श्रीवास्तव कहते हैं, ‘आंतरिक लोकतंत्र और आपसी सहमति में भरोसा न रखने के बावजूद छोटे से छोटे दलों में भी यह व्यवस्था रहती है लेकिन जदयू में यह परंपरा ताक पर रख दी गई है.’ श्रीवास्तव के अनुसार वजह यह है कि टिकट बंटवारे के समय कोई असहमति का स्वर उठाने वाला न आ जाए इसलिए जदयू में आंतरिक लोकतंत्र के इस मजबूत आधार को ध्वस्त किया गया. श्रीवास्तव भी अब उनके विरोधियों के खेमे में हैं, इसलिए उनके सवाल विरोधी के सवाल हो सकते हैं लेकिन नीतीश खुद सोचें कि एक के बाद एक अगर नीतीश को बनानेवाले उनका साथ छोड़ते ही गए तो उसके पीछे कोई ठोस वजह तो रही होगी.उपेंद्र कुशवाहा, प्रेम कुमार मणी, ललन सिंह, पीके सिन्हा, डॉ शंभू शरण श्रीवास्तव और बीच के दिनों में शिवानंद तिवारी आदि के साथ छोड़ जाने की अफवाहों को अगर अनदेखा भी कर दें तो दिग्विजय सिंह और जॉर्ज फर्नांडिस वाला सवाल बना रहेगा. फर्नांडिस नीतीश कुमार को बनाने-बढ़ाने वाले नेताओं में से रहे, लेकिन चूंकि वे कई बिंदुओं पर नीतीश से असहमति रखते थे और उसे जताते भी थे, इसलिए उन्हें धीरे-धीरे किनारे किया गया. धाकड़ फर्नांडिस की हालत यह हुई कि वे 2009 में टिकट के लिए गिड़गिड़ाते नजर आए और अंत में सार्वजनिक तौर पर कह भी दिया कि नीतीश अहंकारी हैं. डैमेज कंट्रोल के लिए फर्नांडिस को राज्यसभा भेजने की रस्मअदायगी करनी पड़ी थी.

दिग्विजय सिंह भी असहमति के स्वर को उठाते थे, तो उन्हें भी दरकिनार किया गया. हालांकि उन्होंने नीतीश से अलग होकर भी अपनी ताकत दिखाई और बाद में नीतीश ने दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल सिंह को बिना मांगे समर्थन भी दिया. लेकिन पुतुल सिंह को समर्थन देने या नहीं देने का फैसला अलग है, असहमति का साहस दिखाने वाले को दरकिनार करना, नीतीश के व्यक्तित्व के लिए ज्यादा घातक होगा.
नीतीश कुमार खुद याद करें. एक बार जनता के दरबार के बाद जब वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित हुए थे और एक अखबार के पत्रकार ने सिर्फ इतना पूछा था कि असंतोष बढ़ रहा है, जगह-जगह आंदोलन चल रहे हैं तो उन्होंने क्या जवाब दिया था. नीतीश का कहना था कि जाकर आप भी आंदोलन में शामिल हो जाइए. लगे हाथ उस अखबार को पर्चा-पोस्टर तक भी कह डाला था. नीतीश के लिए वह घटना छोटी होगी, लेकिन न्यू मीडिया के जमाने में इंटरनेटी पत्रकारिता के जरिए वह बात दूर-दूर तक पहुंची.

निंदक को भी नियरे रखना, व्यक्तित्व निर्माण में कितना सहायक होता है, क्या यह नीतीश नहीं जानते ?

असहमति को भी सम्मान देना और निंदक को भी नियरे रखना व्यक्तित्व निर्माण में कितना सहायक होता है, क्या यह नीतीश नहीं जानते? लोहिया और नेहरू प्रसंग को तो जानते ही होंगे. दोनों में कभी राजनीतिक तौर पर नहीं बनी. दोनों के रास्ते अलग रहे. लोहिया सदैव नेहरू की आलोचना करते रहे, लेकिन नेहरू अपनी किताब सबसे पहले लोहिया को ही पढ़ने के लिए भेजते थे और कहते थे कि तुम जो कहोगे, वही सही आकलन होगा, बाकी तो सब स्तुतिगान करते रहते हैं. नेहरू-लोहिया का कद सदा-सदा के लिए बड़ा दिखता है तो ऐसी छोटी-छोटी वजहों से भी…

…और अंत में सुविधा का मौन

नीतीश कुमार जब बोलते हैं तो यहां तक बोल जाते हैं कि आजादी के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ जो कदम उन्होंने उठाए हैं, वैसा किसी नेता ने नहीं किया और न ही किसी सरकार ने. जब चुप्पी साधते हैं तो नरसिंह राव की तरह मौनी बाबा बन जाते हैं या टालमटोल कर कट जाना चाहते हैं. जब नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय पर बोलना था तो वे खूब बोले, लेकिन इस ड्रीम प्रोजेक्ट में जरा- सा पेंच फंसा और एपीजे अब्दुल कलाम के अलग हो जाने की खबर सार्वजनिक हुई तो चुप्पी साध ली और यह कहकर टाल गए कि यह मामला केंद्र सरकार का है, केंद्र सरकार ही जाने. वे चाणक्य, चंद्रगुप्त, आर्यभट्ट आदि नामों से शुरू हुए संस्थानों के पक्ष में तो खुलकर बोलते हैं लेकिन पटना विश्वविद्यालय, पटना कॉलेज, पटना साइंस कॉलेज, पटना आर्ट कॉलेज जैसे बिहार के प्रतिष्ठित व अहम संस्थानों की खस्ताहाली पर बोलने का जिम्मा दूसरे पर सौंप देते हैं. उपेंद्र कुशवाहा, प्रेम कुमार मणी, ललन सिंह जैसे नेता चाहे लाख खिलाफत वाले बयान देते रहें, नीतीश मौन साधे रहते हैं, जवाब नहीं देते लेकिन जो कार्रवाई होनी होती है वह हो जाती है. लखीसराय में जब चार पुलिसवाले माओवादियों द्वारा अपहृत होते हैं, तब भी नीतीश कुछ दिनों तक मौन साधे रहते हैं जब मामला पटरी पर आ जाता है, तभी बोलते हैं. विशेष राज्य दर्जा अभियान चलाते हैं तो नीतीश खूब बोलते हैं, केंद्र को निशाने पर लेते हैं, इसे ही बिहार को पटरी पर ला देने के लिए संजीवनी की तरह बताते हैं लेकिन इस पर कभी चर्चा नहीं करते कि जब वे खुद केंद्र में थे और बिहार-झारखंड का बंटवारा हो रहा था तब क्यों नहीं इसी तरह, इस मांग को लेकर सक्रिय दिखे थे. नीतीश बेगुसराय के सिमरिया में हो रहे अर्धकुंभ पर भी मौन साधे रहते हैं, उनकी ओर से किशोर कुणाल जैसे लोग बोलते रहते हैं, प्रवीण तोगडि़या जैसे लोग सिमरिया में हिंदुत्व का पाठ पढ़ाकर चले भी जाते हैं, नीतीश मौनव्रत्त में ही रहते हैं. नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ आग उगलते हैं, लेकिन बियाडा और कैग रिपोर्ट से उजागर गड़बड़झाले पर मौन साधते हैं या खुलकर कुछ नहीं बोलना चाहते. एक समय में गोधरा पर मौन साध गए थे, अब अपने बिहार के फारबिसगंज पर भी लगभग मौन साधे रहे. जिस दिन बाबा रामदेव पर दिल्ली पुलिस ने रात को धावा बोला था उस दिन नीतीश ने इस मसले पर तो केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा मगर मीडियाकर्मियों द्वारा फारबिसगंज के बारे में पूछने पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

­नीतीश कुमार सुविधानुसार मौन की राजनीति करते रहते हैं. नरसिंह राव भी मौन ही साधते थे, बाद में उनकी कितनी फजीहत हुई और कांग्रेस उनसे अब कैसे पीछा छुड़ाती हुई दिखती है, यह नीतीश भी जानते होंगे. मनमोहन भी मौनमोहन बनते रहते हैं तो उनकी कितनी आलोचना होती है, यह भी नीतीश जानते हैं. नीतीश विनम्र हैं, कम बोलते हैं, मृदुभाषी हैं यह उनकी खासियत तो है लेकिन सुविधानुसार मौन साध लेना उन्हें उधेड़बुन में रहने वाले और जरूरी मुद्दों से कन्नी काटने नेता के रूप में भी स्थापित कर रहा है.

आगे पाठ, पीछे सपाट?

पिछले कुछ सालों के दौरान मध्य प्रदेश में भाजपा ने बेहद मजबूत छवि गढ़ी है. लेकिन प्रदेश सरकार की हालिया विकास यात्रा के रद्द होने और अपनी सरकार के खिलाफ ही मंत्रियों की बयानबाजी से अब संकेत मिलने लगे हैं कि यहां पार्टी की राह उतनी आसान नहीं रही. बृजेश सिंह की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश में पिछले कुछ समय तक ऐसा लग रहा था मानो भाजपा के सामने अब कोई चुनौती ही नहीं बची है और 2013 फतह करने में उसे कोई खास दिक्कत नहीं आएगी. ऐसा मानने की वजहों में भाजपा संगठन और सत्ता की मजबूती के साथ ही कांग्रेस की अनबूझी निष्क्रियता भी शामिल थी. लेकिन पिछले कुछ दिनों में घटनाक्रम तेजी से बदले हैं. पार्टी का मिशन 2013 अब उतना आसान नहीं दिख रहा. ऐसा नहीं है कि प्रदेश भाजपा को अपनी कमजोर होती स्थिति का अंदाजा नहीं है. हाल ही में पार्टी ने अपनी उस बहुप्रतीक्षित यात्रा को रद्द कर दिया जिसे उसने विकास यात्रा का नाम दिया था. इस यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश का दौरा करके सरकार जनता को अपनी लोकप्रिय योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही उसे यह बताने जा रही थी कि उसने राज्य की जनता के लिए अब तक कितने अच्छे-अच्छे काम किए हैं. यात्रा के साथ ही पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए औपचारिक रूप से चुनाव प्रचार भी  शुरू करने वाली थी. प्रदेश के सभी विधानसभा क्षेत्रों से गुजरने वाली इस यात्रा की तैयारियों को लेकर सत्ता और संगठन ने दिन-रात एक कर दिया था. लेकिन अचानक यात्रा दो महीने तक के लिए टाल दी गई. यात्रा को टालने के कारण पर पार्टी का कहना था कि चूंकि इसी समय चुनाव आयोग नयी वोटर लिस्ट पर काम कर रहा है इसलिए यात्रा को टाल दिया गया.

सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामले सरकार के ‘सुशासन’ के दावे पर सवाल खड़े कर रहे हैं 

लेकिन सूत्रों का कहना है कि यात्रा को टालने के पीछे वोटर लिस्ट नहीं वरन कुछ और कारण है. कहा जा रहा है कि विधायकों, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ ही विभिन्न जिलों के अधिकारियों ने सरकार तक यह बात पहुंचाई कि इस समय अगर यात्रा की गई तो पार्टी को किसानों की नाराजगी और गुस्से का सामना करना पड़ेगा. उल्लेखनीय है कि इस समय रबी की फसल बोने का समय चल रहा है. खाद, बीज और बिजली न मिलने की शिकायतें आम हो चुकी हैं. पूरे राज्य में किसान परेशान हैं. कहीं खाद नहीं मिल रहा है तो कहीं बिजली संकट छाया है. लगभग हर रोज प्रदेश के किसी न किसी कोने से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं. इसी को ध्यान में रखकर जो रिपोर्ट भोपाल भेजी गई उसमें इस समय यात्रा से परहेज करने को कहा गया था.

विभिन्न क्षेत्रों से मिली फीडबैक में किसानों में व्याप्त रोष की बात कही गई थी. शीर्ष नेताओं तक यह बात पहुंचाई गई कि ऐसे में अगर उपलब्धियां गिनाने सरकार लोगों के बीच गई तो इससे उसे लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. लोगों पर इस यात्रा का नकारात्मक असर पड़ेगा. इधर सत्ता और संगठन तक यह फीडबैक पहुंचा और वहीं दूसरी तरफ संघ के अानुषंगिक संगठन भारतीय किसान संघ ने भी राज्य में किसानों की आत्महत्याओं और बीज, बिजली और खाद की किल्लत को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया. सरकार को भी उस समय की याद आ गई जब किसान संघ के आह्वान पर राज्य भर के किसान अपनी मांगों के साथ रातों-रात भोपाल पहुंच गए थे और उन्होंने पूरे शहर को एक तरह से अपने कब्जे में ले लिया था. कुछ उसी तरह की परिस्थितियां बनती देख सरकार ने तुरंत यात्रा को रद्द करके किसानों को कोई दिक्कत न होने देने की बात दोहरानी शुरू कर दी. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर यात्रा के टालने के पीछे सत्ता और संगठन के बीच तालमेल के अभाव को कारण मानते हैं. वे कहते हैं, ‘यात्रा की योजना तो संगठन ने बनाई थी लेकिन सत्ता को वह वर्तमान समय में सही नहीं लगी इसलिए उसने इससे इनकार कर दिया.’

‘रघुनंदन शर्मा जैसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई इसलिए हो रही है कि उन्हें पॉवरफुल नहीं समझा जाता’

सूत्र बताते हैं कि क्षेत्र में किसानों के आक्रोश का  आलम यह है कि पार्टी के विधायक तक अपने क्षेत्र में नहीं जा रहे हैं. इसके अलावा भी सरकार और कई मोर्चों पर घिरती जा रही है. मंत्रियों से लेकर प्रशासन के छोटे-से-छोटे अधिकारियों पर आए दिन भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. आलम यह है कि राज्य में प्रशासनिक सेवा से जुड़े कर्मचारियों के अलावा छोटे-से- छोटे कर्मचारी के यहां पड़ रहे छापों में करोड़ों की काली कमाई उजागर हो रही है. अरविंद जोशी और टीनू जोशी के यहां छापे में निकली करोड़ों की काली कमाई तो इस कड़ी में महज एक उदाहरण है. हाल ही में प्रदेश के सागर ग्रुप पर पड़े आयकर विभाग के छापे में जब्त दस्तावेजों में जो डायरी बरामद हुई है उसमें भोपाल नगर निगम आयुक्त मनीष सिंह का भी उल्लेख है. सूत्रों की मानें तो मनीष के नाम के आगे लाखों की रकम लिखी है. आयकर विभाग पूरे मामले की जांच कर रहा है.

भ्रष्टाचार के अलावा नौकरशाहों की कार्यप्रणाली को लेकर भी लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं. आम आदमी तो दूर, सत्तासीन पार्टी के नेता, मंत्री और विधायक भी नौकरशाहों के व्यवहार से पीड़ित नजर आ रहे हैं. हाल ही में भाजपा के वयोवृद्ध नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर ने नौकरशाहों को लेकर अपनी पीड़ा साझा करते हुए बयान दिया था कि अधिकारी सुनते नहीं हैं. नौकरशाहों के अंदर सरकार का कोई भय नहीं है. ऐसी ही कुछ पीड़ा समय-समय पर प्रदेश के अन्य मंत्री और जनप्रतिनिधि भी जाहिर करते रहते हैं.

इन अवरोधों के अलावा पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के वक्त-बेवक्त आने वाले बयान भी पार्टी को न सिर्फ परेशान कर रहे हैं वरन कांग्रेस को भी उस पर हमला करने के लिए पर्याप्त मौके दे रहे हैं.  हाल ही में पार्टी ने वरिष्ठ भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य रघुनंदन शर्मा को प्रदेश उपाध्यक्ष के पद से उनके विवादास्पद बयान के कारण हटा दिया. अपने बयान में शर्मा ने कहा था कि सरकार के मंत्री घोषणावीर हैं और हों भी क्यों नहीं जब उनके मुखिया (मुख्यमंत्री) खुद एक बड़े घोषणावीर हैं. इसके अलावा शर्मा ने प्रदेश के नौकरशाहों को नामर्द भी ठहराया था. शर्मा के इन बयानों से पार्टी इतनी नाराज हो गई कि उसने आनन-फानन में उन्हें पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष पद से हटा दिया. हालांकि पार्टी के ही कई नेता पार्टी के इस निर्णय को उचित नहीं मानते. एक नेता कहते हैं, ‘ शर्मा ने जो कुछ कहा उस पर पार्टी को चिंतन करना चाहिए था. अगर अपने ही चेहरे पर कालिख पुती है तो इसमें आईने का क्या दोष.’ राजनीतिक जानकार इस कार्रवाई को पार्टी के भीतर खत्म हो रहे आंतरिक लोकतंत्र के रूप में भी देख रहे हैं. उनका मानना है कि शर्मा ने कोई नयी बात नहीं कही है. उन्होंने सिर्फ उस सच को बोलने की हिम्मत दिखाई है जिसे भाजपा का हर नेता जानता है. लेकिन पार्टी अनुशासन के कारण कुछ बोलता नहीं. सभी जानते हैं कि घोषणाएं खूब हो रही हैं लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है. योजनाओं का क्रियान्वयन कागजों पर हो रहा है.

ऐसा नहीं है कि शर्मा वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने सरकार की आलोचना की है. समय-समय पर अन्य भाजपा नेता भी सरकार और संगठन को घेरते रहे हैं. मंत्री बाबूलाल गौर ने तो प्रदेश के विकास पर ही प्रश्न उठा दिया था. ऐसा नहीं है कि गौर की बयानबाजी शांत हो गई है वरन हर दिन गौर के मुख से कुछ न कुछ ऐसा जरूर निकल जाता है जो पार्टी की फजीहत के लिए पर्याप्त हो गया है. एक अन्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी अपने अधिकारों में हुई कटौती को यह कहकर प्रस्तुत किया था कि मेरी स्थिति शोले के ठाकुर जैसी हो गई है क्योंकि मेरे हाथ कटे हुए हैं. इन नेताओं की लिस्ट में वित्त मंत्री राघव जी ,वन मंत्री सरताज सिंह, सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन, कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया समेत और कई नाम हैं जो पार्टी और संगठन के लिए आए दिन समस्या खड़ी करते रहते हैं. सबके सामने सरकार की आलोचना करने वाले भाजपा नेताओं से बहुत बड़ी संख्या उन नेताओं की है जो नाम न छापने की शर्त पर सरकार या संगठन की खुले दिल से आलोचना कर रहे हैं. गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘बयानबाजी इसलिए हो रही है कि नेताओं में असंतोष है. कुछ लोग अपनी बात खुल कर कह रहे हैं वहीं कुछ मुंह बंद किए हुए हैं.’ वहीं इस मामले पर पत्रिका के मध्य प्रदेश ब्यूरो चीफ धनंजय सिंह कुछ अलग ही राय रखते हैं. उनके मुताबिक, ‘कार्रवाई रघुनंदन शर्मा जैसे लोगों के खिलाफ हो रही है क्योंकि वे इतने पॉवरफुल नहीं हैं. अगर अनुशासन की इतनी ही चिंता है तो ये लोग कैलाश विजयवर्गीय या बाबूलाल गौर पर कार्रवाई करके बता दें.’  

पार्टी अभी इन मामलों से जूझ ही रही थी कि उसे सबसे बड़ा झटका हरदा नगरपालिका चुनाव हारने से लगा. हरदा नगरपालिका में कांग्रेस की जीत के साथ ही भाजपा का लंबे समय से चल रहा चुनावी रथ जीत की पटरी से उतर गया. हाल में हुए विधानसभा के सभी उपचुनाव और नगरीय निकायों के सभी चुनाव भाजपा ने जीते. कुक्षी, सोनकच्छ और जबेरा जैसे कांग्रेसी गढ़ों में भगवा फहराने के साथ ही भाजपा ने मंडीदीप जैसे नगरीय निकाय के चुनाव में जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. पार्टी हर चुनाव में जीतती आ रही थी, लेकिन जीत की यह यात्रा हरदा नगरपालिका चुनाव में आकर रुक गई. हालांकि नगरपालिका चुनाव परिणाम के प्रभाव को बहुत बड़े स्तर पर नहीं देखा जा सकता है. कोई और राज्य होता तो शायद इसकी चर्चा भी नहीं होती, लेकिन पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में नगरपालिका चुनाव भी कुछ इस अंदाज में हो रहे हैं मानो लोकसभा का चुनाव हो रहा है.

इन नगरीय निकाय चुनावों तक में भाजपा मुख्यमंत्री से लेकर लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज समेत तमाम मंत्रियों और विधायकों को झोंक रही है. जब नगरपालिका जीतने के लिए इस तरह से युद्धस्तर की तैयारी की जा रही हो तो फिर परिणाम महत्वपूर्ण हो जाता है. कुछ ऐसी ही तैयारी से भाजपा ने मंडीदीप नगरपालिका पर अपना परचम फहराया. लेकिन इस बार हरदा में उसे अनपेक्षित रूप से हार का सामना करना पड़ा. भाजपा का हरदा नगरपालिका का चुनाव हारना उसके लिए जहां एक बड़ा झटका है वहीं कांग्रेस जो राज्य में लंबे समय से मरणासन्न पड़ी हुई है उसके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है.

खैर, अभी विधानसभा चुनाव होने में दो साल का वक्त है और इन दो साल में काफी कुछ बन-बिगड़ सकता है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अपनी आंतरिक कमियों, नौकरशाही की गड़बड़ियों और पिछले आठ साल में पार्टी और सत्ता विरोधी लहर से किस तरह निपटती है. 

‘वजन कम करने के चमत्कारी दावों से सावधान रहें’

हमारी तरफ मोटे को मोटा नहीं कहते. कहते हैं यार तुम ‘हेल्दी’ हो रहे हो. ऐसा हम ‘हेल्दी’ शब्द का अर्थ न जानने के कारण करते हैं या कि अपनी उस सांस्कृतिक विरासत के कारण जहां ‘अंधे को अंधा’ न कहकर ‘सूरदास’ कहने का रिवाज है.  बहरहाल, वास्तविकता, बल्कि कटु वास्तविकता यही है कि समाज में ऐसे ‘हेल्दी’ (मोटे) लोग बढ़ रहे हैं. मोटे आदमी (इसमें औरतें भी शामिल हैं और खास तौर पर शामिल हैं) की हार्दिक तमन्ना होती है कि वे छरहरे बदन के हो जाएं और यह भी कि यह सब काम खटिया पर पड़े-पड़े हो. वे भोजन की मात्रा या उसके ‘गिजा वाले तत्व’ को कम करना अपने पेट पर लात मारना मानते हैं. ये लोग पूड़ी, परांठे, अंडा, मुर्गा इत्यादि भकोसते हुए वजन कम कर सकने वाले चमत्कारी फॉर्मूले की तलाश में रहते हैं.

‘सालों में बढ़ाए वजन को हफ्तों में कम करने के दावे जानलेवा साबित हो सकते हैं’

यही लोग हैं जो रातोंरात मोटे आदमी को दुबला बनाने का दावा करने वाली दुुकानों के चक्कर में फंसते हैं. क्या चार सप्ताह में ‌दस किलो वजन कम करने की कोई जादुई डाइट या प्रोग्राम हो सकता है? यदि ऐसा हो भी जाए तो क्या यह सुरक्षित है? और क्या ऐसा करने वाले का वजन यह ‘विशेष डाइट’ छोड़ने पर वापस ‘अपनी पुरानी वाली’ पर नहीं आ जाएगा? क्या यह संभव है कि जो वजन आपने वर्षों तक ठूंस कर, अल्लम-गल्लम खाकर तथा आरामतलबी का एक अपनी तरह का सुनहरा जीवन बिताकर हासिल किया है, उसे रातोंरात कम किया जा सके? इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है जो आप भी खूब जानते हैं. ऐसी कुछ भी जादुई चीज नहीं है और जो बताई जाती है उसका आज तक कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. वैसे भी जो बात स्वयंसिद्घ है उसके लिए वैज्ञानिक क्यों समय खराब करें? दूसरी बात यह कि दुबला करने, तेजी से छरहरा बनाने और इसी तरह के चमत्कारिक परिणाम देने वाली एक बड़ी ‘हेल्थ इंडस्ट्री’ खड़ी हो गई है. यह धंधे के सारे हथकंडे अपनाकर अपने ग्राहकों को यह भ्रम देती रहती है कि वे एक सिद्घ वैज्ञानिक गणित पर चलते हुए गोलमटोल को सरल रेखा में तब्दील कर देंगे. अच्छी तरह जान लें कि रातोंरात वजन कम नहीं किया जाता. करने की कोशिश भी नहीं की जानी चाहिए. वे सटीक, आकर्षक विज्ञापन जिनमें एक तरफ एक थुलथुल भद्दी-सी मोटी महिला की तसवीर होती है और दूसरी ओर चार सप्ताह का कोर्स लेने के बाद इसी महिला की छरहरी सुंदर काया वाली कामिनी की तसवीर होती है – कृपया इनके चक्कर में न पड़ें. हमें ये प्रस्ताव लुभाते अवश्य हैं क्योंकि आदमी की मानसिकता शार्टकट्स तलाशने और चोर रास्तों पर चलने की बन गई है. मैं इन चोर रास्तों से आपको आगाह करने के लिए ही यह लेख लिख रहा हूं.

आपका वजन हड्डियों, फैट (वसा), प्रोटीन (मांसपेशियां) तथा पानी से बनता है. जब आप वजन बढ़ा लेते हैं तो यह मूलतः फैट अर्थात् चर्बी के कारण ही बढ़ता है. शरीर को चर्बी का गोदाम बना लेना न केवल शरीर को यहां-वहां से बेडौल बनाता है वरन कैंसर, डायबिटीज, हार्ट-अटैक तथा आर्थराइटिस आदि बीमारियों को न्योता भी देता है.  अब यदि आप आज अपना वजन कम करना चाहेंगे तो कायदे से इसी चर्बी को कम करने की कोशिश करनी होगी. वजन भी कम होगा और आप उक्त बीमारियों से भी बचेंगे. परंतु चर्बी कम करना, वह भी रातोंरात, लगभग असंभव बात है. तो ये लोग जो रातोंरात वजन कम कर देते हैं वह कहां से कम होता है? वह कितना सुरक्षित है? यह जान लें कि आधा किलो चर्बी का मतलब है चार हजार पांच सौ कैलोरी जबकि आधा किलो प्रोटीन का मतलब है मात्र दो सौ कैलोरी. तो जो तुरंत वजन कम कर देने वाले फॉर्मूले हैं वे शरीर की मांसपेशियों और पानी को कम करके वजन कम करते हैं. चर्बी पर उनका प्रभाव बहुत कम होता है. यह नुकसानदायक है. कुछ ऐसे फॉर्मूलों में ‘हाई प्रोटीन डाइट’ दी जाती है जो लिवर तथा किडनी पर इतना लोड डाल सकती है कि गॉल ब्लेडर की पथरी से लगाकर, पोटैशियम में तब्दीली लाकर दिमाग तथा दिल पर जानलेवा प्रभाव पड़ सकता है. मार्च, 1990 में अमेरिकी संसद की सब-कमेटी ने इस तरह के डाइट प्रोग्रामों को ‘अवैज्ञानिक’ तथा ‘खतरनाक’ बताया था. उस कमेटी में 48 वर्षीय एक कॉलेज प्रोफेसर का केस भी प्रस्तुत हुआ था जिसका मस्तिष्क प्रोटीन तथा पोटैशियम की कमी के कारण हमेशा के लिए डैमेज हो गया था – वे ऐसे ही ‘रातोंरात वजन कम करने’ की किसी क्लीनिक में ऐसा करते हुए कोमा में चले गए थे और फिर स्थायी रूप से मानसिक विकलांग हो गए. ऐसे ही अनगिन केस गॉल ब्लेडर में पथरी के भी हुए थे. जिसके लिए ‘कोर्ट के बाहर’ लाखों रुपयों की क्षतिपूर्ति भी हुई थी.

एक जमाने में मोटापा पश्चिमी जगत की समस्या थी, खासकर अमेरिका वालों की. अब यह हमारी भी समस्या बन गई है. ‘मोटापा कम करना’  एक बड़े बाजार की संभावना भी बनी है. तभी तो भोपाल, ग्वालियर और रायपुर जैसे शहरों तक ‘रातोंरात वजन घटाने’ की दुकानें खुल गई हैं. तरह-तरह के विज्ञापन हैं. बिना हिले-डुले, बिना खाना कम किए ही वजन कम करने के दावे हैं. पढ़कर अच्छा भी लगता है. विश्वास करने का मन भी करता है. लोग करते भी हैं. पैसे भी फूंकते हैं. जबकि कौन नहीं जानता कि ठीक से भोजन की मात्रा, मीठे व्यंजनों तथा तेल-घी की मात्रा पर समझदारी से नियंत्रण किया जाए और बीस-पच्चीस मिनट का व्यायाम हो तो प्राय: केसों में मोटापा कम किया जा सकता है. इनके बारे में मैं आगे आपको बताऊंगा. अभी तो बस यह संदेश पर्याप्त है कि रातोंरात  दुबला कर देने वाले मायावी झांसों में न आएं.  

सावधान, उनके हाथ में नश्तर नहीं खंजर है

टीवी पत्रकारों के बारे में जस्टिस मार्कंडेय काटजू की राय पर हो रहा बवाल बताता है कि टीवी पत्रकारिता सच दिखाने को ही नहीं, सच सुनने को भी तैयार नहीं है. जस्टिस काटजू का लहजा जैसा भी हो, लेकिन उन्होंने जो बातें कही हैं उनमें ज्यादातर – दुर्भाग्य से सत्य हैं. जस्टिस काटजू की मूलतः तीन शिकायतें हैं- एक तो यह कि मीडिया अक्सर वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाता है. दूसरी यह कि मीडिया मनोरंजन के नाम पर परोसे जा रहे कूड़े को सबसे ज्यादा जगह देता है. और तीसरी यह कि मीडिया अंधविश्वास को बढ़ावा देता है. इन सबके बीच एक बड़ी शिकायत की अंतर्ध्वनि यह निकलती है कि मीडिया कई तरह के गर्हित गठजोड़ों और समझौतों का शिकार है जिसके तहत खबरों को तोड़ा-मरोड़ा और मनमाने ढंग से पेश किया जाता है.
इसके अलावा काटजू ने पत्रकारों के सामान्य ज्ञान पर भी कुछ टिप्पणियां की हैं- यह भी जोड़ा है कि टीवी पत्रकारों को न साहित्य की समझ है न इतिहास की और न दर्शन शास्त्र या किन्हीं दूसरे विषयों की. लेकिन काटजू टीवी पत्रकार से इतना पढ़ा-लिखा होने की अपेक्षा क्यों करते हैं?

यह अयोग्यता मीडिया को जैसे टीआरपी की होड़ में ले जाती है, उसी तरह उसे दूसरे दबावों का आसान शिकार बना डालती है

जाहिर है, इसलिए कि काटजू शायद खबर को साबुन-तेल और टीवी-फ्रिज की तरह महज एक उत्पाद नहीं, उससे ज्यादा कुछ समझते हैं. इसीलिए वे किसी दुकानदार से पढ़ने-लिखने की, इतिहास-साहित्य और दर्शन की समझ होने की अपेक्षा नहीं रखते, पत्रकार से रखते हैं. वे पत्रकारिता को एक गंभीर काम मानते हैं. लेकिन पत्रकार हैं जो इसी अपेक्षा पर सवाल उठा रहे हैं. जाहिर है, अपनी खबर या पेशे की गुरुता और गंभीरता का एहसास उनके भीतर उतना नहीं है जितना जस्टिस मार्कंडेय काटजू के भीतर है. शायद इसलिए भी पत्रकारिता की मौजूदा सूरत काटजू को इस कदर नाराज करती है कि वे बहुत निर्मम लहजे में पत्रकारिता की आलोचना करते हैं और इसके विरुद्ध सख्त कानून का प्रस्ताव कर डालते हैं.

लेकिन काटजू जज रहे हैं पत्रकार नहीं, इसलिए वे कुछ व्याधियों को ठीक से पहचानते तो हैं लेकिन उनके समाजशास्त्रीय संदर्भ को समझने की जगह उनका कानूनी उपचार खोजने या करने में जुट जाते हैं. वे जैसे तथ्यों को बिलकुल ठोस और उपलब्ध सबूतों के आधार पर जांचते हुए फैसला सुनाते हैं और उन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को समझने की कोशिश नहीं करते जिनकी वजह से पत्रकारिता का यह हाल हुआ है.  

दरअसल यह देखना और कहना बहुत आसान है कि टीवी पत्रकारिता असली मुद्दों से ध्यान भटकाती है, मनोरंजन को तमाशे की तरह बेचती है और अंधविश्वासों पर यकीन करती है. इतनी भर टिप्पणी के लिए जस्टिस काटजू होने की जरूरत भी नहीं. सैकड़ों की संख्या में टीवी चैनल 24 घंटे ये काम करते हैं और इन आरोपों के प्रमाण सुलभ कराते रहते हैं.

सवाल है, वे ऐसा क्यों करते हैं? इस सवाल के कई जवाब हैं. पहला जवाब तो पत्रकारिता की तरफ से ही आना चाहिए. 24 घंटे के टीवी चैनलों की यह जरूरत और मांग है कि उसकी खपत के लिए खबर को नये सिरे से परिभाषित किया जाए. लेकिन यह काम कौन करेगा? मीडिया में ऐसे बड़े संपादक नहीं दिखते जिनकी अभिरुचियों का दायरा समाज, संस्कृति, शिक्षा, भाषा और संप्रेषण के बारीक रेशों तक जाता हो. वे राजनीति की मोटी खबरों के बाद सिनेमा, क्रिकेट या दूसरे तमाशों की तरफ मुड़ जाते हैं. यह काम भी वे इतने सतही ढंग से करते हैं कि मीडिया अचानक अपनी उपयोगिता जैसे खो देता है.

लोग मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नये कानून चाहते हैं. इसकी प्रस्तावना इस झूठ के साथ लिखी जा रही है कि मीडिया को रोकने के लिए कोई कानून ही नहीं है

एक लिहाज से यह अपनी नाकाबिली है जिसे छिपाने के लिए मीडिया टीआरपी की होड़ की दलील देता है. निश्चय ही टीआरपी की एक होड़ है और हर बुधवार टीवी चैनलों के भीतर अलग-अलग कार्यक्रमों के जिम्मेदार लोग ऐसे बच्चों की तरह सहमे बैठे होते हैं जिनका रिजल्ट निकलना हो. लेकिन यह दबाव दरअसल इसलिए बड़ा हो गया है कि माध्यम में वह संजीदगी नहीं बची है जो अपने प्रतिबद्ध दर्शक बनाए या दूसरों को बताए कि असली खबर असल में दिखाए जाने वाले तमाशों से बाहर है.

लेकिन यह मीडिया के ट्रिवियलाइजेशन- क्षुद्रीकरण- की पहली वजह है, अंतिम नहीं. दरअसल यह अयोग्यता मीडिया को जिस तरह टीआरपी की होड़ में ले जाती है, उसी तरह उसे दूसरे दबावों का आसान शिकार बना डालती है. अचानक इसी मोड़ पर ऐसे बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं जो पूंजी और सत्ता के हितों के रखवालों की तरह काम करते हैं. सत्ता और पूंजी को भी यह खेल रास आता है इसलिए वह अपने चैनल शुरू करने से लेकर दूसरों के चैनलों में घुसपैठ करने तक का काम बड़ी आसानी से करती है. इसी के बाद मीडिया अचानक गैरजिम्मेदार भी दिखने लगता है, गैरभरोसेमंद भी- वह किसी की तरफ से खेलता नजर आता है और किसी की तरफ से बोलता, वह किसी को बचाता और किसी को पीटता दिखाई पड़ता है. जब इन सबका वक्त नहीं रहता तो वह फिर सिनेमा, क्रिकेट और अंधविश्वास के अपने जाने-पहचाने शगल में लग जाता है और जस्टिस काटजू जैसे विद्वतजनों की फटकार सुनता है.

लेकिन जस्टिस काटजू फटकार कर संतुष्ट नहीं हैं, उन्हें कानून का चाबुक भी चाहिए. वे मानते हैं कि मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं है और वह अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है. मगर क्या ये दोनों बातें सच हैं? हकीकत इसके ठीक उलट है. देश में मीडिया के लिए अलग से कोई कानून नहीं है, न उसे कोई अलग अधिकार हासिल है. अभिव्यक्ति की आजादी का जो और जितना अधिकार इस देश के किसी भी नागरिक को हासिल है, उतना ही मीडिया को भी है. यह अधिकार भी बिल्कुल निरंकुश नहीं है. मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए मानहानि से लेकर अपशब्द कहने के खिलाफ और अश्लीलता विरोधी कई कानून हैं. सरकारी गोपनीयता कानून भी इसी मीडिया नियंत्रण का हिस्सा है. इन कानूनों का इस्तेमाल भी खूब होता रहा है.  

सवाल है, फिर नया कानून क्यों चाहिए और किसे चाहिए? मीडिया ऐसे कौन-से नये अपराध कर रहा है जिसे पुराने कानूनों के तहत रोका न जा सकता हो?  अगर सरकार को लगता है कि समाचार चैनल समाचार का लाइसेंस लेकर कुछ और दिखा रहे हैं तो उसे पूरा हक है कि वह इन चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दे. लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे कुछ और दिखाने वाले चैनलों से नहीं, असल में समाचार दिखाने वाले चैनलों से परेशानी है.

दरअसल मीडिया को कानून से कोई छूट या रियायत सबसे ज्यादा वे लोग देते या देना चाहते हैं जो मीडिया का सम्मान नहीं, उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं. मीडिया में जो भ्रष्टाचार आता है वह भ्रष्ट राजनीति और भ्रष्ट पूंजी के गठजोड़ से आता है. हम सबको मालूम है कि इस पूंजी ने अपनी तरफ से मीडिया का वर्ग चरित्र बदलने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. कुछ इस वजह से भी सत्ता, पूंजी और मीडिया का यह गठजोड़ पहले से आसान हुआ है. लेकिन मुश्किल यह है कि हर दूसरे माध्यम की तरह मीडिया भी अपना एक स्वायत्त ‘स्पेस’ बनाता है जहां उसके अपने नियम और दबाव काम करते हैं. इसलिए कोई गठजोड़ एक सीमा से आगे नहीं चलता. यह भारत में लोकतांत्रिक चेतना के विकास का नतीजा है कि अंततः असली खबर लोगों तक पहुंच जाती है- चाहे वह छत्तीसगढ़ में पिट रहे नक्सलियों की तकलीफ हो या जंतर-मंतर पर चल रहा अण्णा का आंदोलन. मीडिया चाहे जितने तमाशे करे, जब खबर की घड़ी आती है तो वह खबर के साथ खड़ा हो जाता है- यह उसे उसकी परंपरा ने सिखाया है जिसमें यह समझ भी शामिल है कि लोगों को इस असली खबर का इंतजार होगा.  

दिलचस्प यह है कि ऐसे ही मौकों पर सत्ता और पूंजी को मीडिया का गैरजिम्मेदार चेहरा याद आता है. सरकार को हाल के दिनों में मीडिया को नियंत्रित करने वाले कानून की याद तब आई जब अण्णा हज़ारे के आंदोलन को मीडिया की मदद मिली. जाहिर है, मीडिया के खिलाफ अगर कोई कानून बनेगा तो उसका इस्तेमाल असली गुनहगारों के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता पर शिकंजा कसने के लिए होगा जो व्यवस्था को आईना दिखा रही होगी, उसके लिए असुविधाजनक स्थितियां और सवाल खड़े कर रही होगी.

जस्टिस काटजू की अदालत में मीडिया की बेईमानी तो पहुंचती है, उसके पहले सत्ता के अंतःकक्षों में चलने और पलने वाला वह गठजोड़ नहीं दिखता जो दरअसल मीडिया के मूल और प्रतिरोधमूलक चरित्र को बदलना चाहता है. निश्चय ही यह गठजोड़ टूटना चाहिए, लेकिन वह कड़े कानूनों से नहीं तोड़ा जा सकता- उसकी लड़ाई और बड़ी है. दरअसल यह अनुभव बहुत स्पष्ट हो चुका है कि कड़े कानून ज्यादातर सत्ता को निरंकुश बनाते हैं. एएफएसपीए यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून कश्मीर में आतंकियों को नहीं, आम लोगों को डराता है. टाडा और पोटा से आतंकवाद नहीं मिटा, उनकी वजह से पकड़े गए बेकसूर लोगों से भरी जेलें आतंकवाद की नयी पौधशालाओं में बदल गईं.

लेकिन अब लोग मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नये कानून चाहते हैं और इसकी प्रस्तावना इस झूठ के साथ लिखी जा रही है कि मीडिया को रोकने के लिए तो कोई कानून ही नहीं है. जाहिर है, यह झूठ मीडिया को कमजोर करने के लिए बोला जा रहा है. जहां तक मीडिया की अपनी गलतियों का सवाल है, वे काफी बड़ी हैं, लेकिन उन्हें अंततः अंदर से ही साफ करने का रास्ता निकालना होगा. कानून के नाम पर इसकी शल्य क्रिया करने वाले असल में हाथ में नश्तर नहीं, खंजर लेकर खड़े हैं और उनकी निगाह शरीर में पल रहे किसी जख्म पर नहीं, उस गर्दन पर है जो सारे घावों के बाद फिर भी तनी हुई है. लेकिन यह गर्दन तनी रहे और पत्रकारिता सबसे आंख मिलाने लायक बनी रहे, इसके लिए हमें कुछ काटजू को भी सुनना होगा, और वे जैसा सोचते हैं वैसा पत्रकार बनना होगा. 

बाजार बड़ा या आत्मनियमन?

न्यूज चैनलों की दुनिया में इन दिनों खासी उथल-पुथल है. प्रेस काउंसिल के नये अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के बयानों और इरादों से हड़कंप है. ऐसा लगता है कि चैनलों को जस्टिस काटजू के डंडे का डर सताने लगा है. नतीजा, काटजू के भूत से निपटने के लिए चैनलों के अंदर कुछ कम लेकिन बाहर कुछ ज्यादा आत्मानुशासन और आत्मनियमन का जाप होने लगा है.

आत्मनियमन को लेकर अपनी ईमानदारी का सबूत देने के लिए चैनलों के संपादकों ने मिल-जुलकर ‘तीसरी कसम’ के हीरामन की तर्ज पर तीन नहीं, दस कसमें खाई हैं. इनका लब्बोलुआब यह है कि चैनल जानी-मानी अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म की रिपोर्टिंग करते हुए बावले नहीं होंगे.

अगले कुछ सप्ताहों में ही यह पता चल जाएगा कि चैनलों के लिए बाजार बड़ा है या आत्म-नियमन?

वैसे कहते हैं कि कसमें तोड़ने के लिए ही होती हैं. देखें, इस कसम पर चैनल कितने दिन टिकते हैं और सबसे पहले इसे कौन तोड़ता है? नहीं-नहीं, संपादकों और उनकी कसम की ईमानदारी पर मुझे कोई शक नहीं है. उनकी बेचैनी भी कुछ हद तक समझ में आती है. उनमें से कई थक गए हैं, कुछ पूरी ईमानदारी से उस अंधी दौड़ से बाहर निकलना चाहते हैं जिसके कारण चैनलों के न्यूजरूम में अधिकतर फैसले संपादकीय विवेक से कम और इस डर से अधिक लिए जाते हैं कि अगर हमने इसे तुरंत नहीं दिखाया तो हमारा प्रतिस्पर्धी चैनल इसे पहले दिखा देगा.

लेकिन क्या इस अंधी दौड़ से बाहर निकलना इतना आसान है? शायद नहीं. असल में, सिर्फ संपादकों के हाथ में कंटेंट की बागडोर होती है. उन पर कोई बाहरी दबाव मतलब टीआरपी का दबाव नहीं होता तो शायद इतनी मुश्किल नहीं होती. लेकिन कमान उनके हाथ में नहीं है. वह बाजार के हाथ में है. बाजार टीआरपी से चलता है. इसलिए चैनलों के लिए कंटेंट के मामले में नीचे गिरने की इस अंधी दौड़ से बाहर निकलना न सिर्फ मुश्किल बल्कि नामुमकिन दिखने लगा है. वजह साफ है. जहां टीआरपी के लिए ऐसी गलाकाट होड़ हो, संपादकीय फैसले प्रतिस्पर्धी चैनलों को देखकर लिए जाते हों और सभी भेड़ की तरह एक-दूसरे के पीछे गड्ढे में गिरने को तैयार हों, वहां इस अंधी दौड़ का सबसे पहला शिकार आत्मानुशासन और आत्मनियमन ही होता है.

यह संभव है कि इस बार ऐश्वर्या राय के मामले में न्यूज चैनल अपनी कसम निभा ले जाएं. लेकिन इस कसम की असल परीक्षा यह नहीं है कि ऐश्वर्या राय के मामले में चैनलों ने अपनी कसम कितनी ईमानदारी से निभाई. असल सवाल यह है कि क्या चैनलों को ऐसे हर मामले पर संयम बरतने के लिए सामूहिक कसम खानी पड़ेगी. क्या चैनलों का अपना संपादकीय विवेक इतना कमजोर हो चुका है कि वे खुद यह फैसला करने में अक्षम हो गए हैं कि क्या दिखाया जाना चाहिए और क्या नहीं? क्या यह इस बात का सबूत नहीं है कि चैनल बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के आत्म- नियंत्रण करने में सक्षम नहीं रह गए हैं? सवाल है कि जिन मामलों में चैनलों ने सामूहिक कसम नहीं खाई होगी मतलब बीईए ने निर्देश नहीं जारी किए होंगे, क्या उन चैनलों को खुला खेल फर्रुखाबादी की छूट होगी? हैरानी की बात नहीं है कि जिन दिनों ऐश्वर्या राय के मामले में बीईए के निर्देशों को आत्म-नियमन के मेडल की तरह दिखाया जा रहा था, उन्हीं दिनों दो हिंदी न्यूज चैनलों ने खुलकर और कुछ ने दबे-छुपे राजस्थान के भंवरी देवी हत्याकांड में भंवरी और आरोपित कांग्रेसी नेताओं की सेक्स सीडी दिखाई. सवाल है कि इस सेक्स सीडी को दिखाने के पीछे उद्देश्य क्या था? इसमें कौन सा जनहित शामिल था? क्या यह ‘अच्छे टेस्ट’ में था? आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार ने इस मामले में दोनों चैनलों को नोटिस भेजने में देर नहीं लगाई. सवाल है कि सरकार को अपनी नाक घुसेड़ने का मौका किसने दिया.

दूसरी ओर, एक गंभीर अंग्रेजी चैनल में आत्मनियमन का हाल यह है कि उसके एक प्राइम टाइम लाइव शो में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का घंटों पहले किया गया इंटरव्यू ऐसे दिखाया गया मानो वे उस चर्चा में लाइव शामिल हों. साफ तौर पर यह धोखाधड़ी थी. कार्यक्रम के अतिथि रविशंकर के साथ भी और दर्शकों के साथ भी. इसके लिए चैनल की खूब लानत-मलामत हुई है. शुरुआती ना-नुकुर और तकनीकी बहानों के बाद चैनल ने अपनी गलती को ‘अनजाने में हुई गलती’ बताते हुए माफी मांग ली है. लेकिन क्या यह अनजाने में हुई गलती थी या समझ-बूझकर की गई थी? इसी चैनल पर कुछ महीने पहले प्राइम टाइम में फर्जी ट्विटर संदेश दिखाने का आरोप लगा था. न सिर्फ ये ट्विटर संदेश फर्जी और न्यूजरूम में लिखे गए थे बल्कि उनमें बहस में एक खास पक्ष लिया गया था. चैनल ने उसे भी ‘अनजाने में हुई गलती’ बताकर माफी मांग ली थी. इन दोनों प्रकरणों से एक बात पक्की है कि चैनल के संपादक ‘जाने में’ मतलब सोच-समझकर काम नहीं कर रहे हैं.

ऐसे में, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि इस हालत में कितने चैनलों को मौके पर उन कसमों-निर्देशों की याद आएगी और कितने अनजाने में उन्हें भूल जाएंगे. देखते रहिए. 

सही और ग़लत के पार : रॉकस्टार

फिल्म रॉकस्टार 

निर्देशक इम्तियाज अली

कलाकार रणबीर कपूर, नरगिस फाखरी, पीयूष मिश्रा, अदिति राव हैदरी, शम्मी कपूर

जनार्दन जाखड़ पागल है और उसे इस पर गर्व है. वह लड़की, जिसके लिए उसे लगता है कि जो क्लास बंक करके गोलगप्पे खाने को पागलपन समझती है, उससे वह आंखों में आंखें डालकर कहता है कि गर्लफ्रेंड बन जा मेरी. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके अक्खड़ लहजे और एक्स्ट्रा टाइट जींस पर आसपास के लोग हंस रहे हैं. इसी तरह उसे बाद में अपने दीवानों की भीड़ से कोई फ़र्क नहीं पड़ता और वह उन्हें मिडल फिंगर दिखाता है. वह किसी भी क्षण आपकी महफिल छोड़कर जा सकता है, गाना पूरा होने से पहले ही स्टेज छोड़कर आ सकता है और उस लड़की को चूम सकता है जिससे उसने रूमी के शब्दों में वादा किया है कि सही और गलत के पार जो मैदान है, उससे वो एक दिन वहाँ मिलेगा. वह शराब की कुछ बूंदें अपने चेहरे पर छिड़ककर अपने दोस्तों को तसल्ली करवा देता है कि उसने पी ली है. और नशा तो उसकी आत्मा में है ही.

वह कलाकार है और इम्तियाज उसके बनने और होने की कहानी बिना स्टीरियोटाइप चक्करों में पड़े कहते हैं. रॉकस्टार बनने के लिए जनार्दन जाखड़ को अंग्रेजी बोलने और गांजा पीने की ज़रूरत नहीं है. उसे बस इश्क की ज़रूरत महसूस होती है और उसमें दिल के टूटने की. और यहीं नरगिस फाखरी फिल्म में आती हैं और उनके बर्बाद किए हुए दृश्यों को बचाने के लिए रणबीर कपूर अपनी एक्टिंग में दुगुनी जान फूंकते हैं.

रणबीर कपूर ऐसा काम करते हैं, जिसके लिए आप उन्हें बार बार उसी तरह सीने से लगाना चाहते हैं जैसे फिल्म की हीरोइन हीर चाहती है. इम्तियाज की बाकी फिल्मों की तरह उनकी पहचान, उनके डायलॉग इस फिल्म में उभरकर नहीं आते (शायद यह जानबूझकर ही किया गया है और कुछ जगहों को छोड़ दें तो इससे फिल्म अलग भी दिखती है और अच्छी भी) और हर जगह उस जगह को भरने के लिए रणबीर आते हैं. अपने जुनून से लेकर बेपरवाही और अपने अन्दर लगी आग तक वे हूबहू वही हैं, जो जनार्दन जाखड़ होता. वे ऐसे इक्का दुक्का स्टारपुत्रों में से हैं जिनके मुंह की चम्मच ही सोने की नहीं है, वह सोना उनके काम में भी है. मोहित चौहान इस फिल्म के लिए बिल्कुल मुफ़ीद आवाज़ हैं और उनकी आवाज़ के लिए रणबीर बिल्कुल मुफ़ीद अभिनेता. इरशाद कामिल और ए आर रहमान के गाने फिल्म की जान हैं और शायद यह इम्तियाज की पहली फ़िल्म है, जिसमें वे ख़ुद उभरकर सामने नहीं आते बल्कि परतों के पीछे खड़े रहते हैं.

यह इम्तियाज की अब तक की सबसे अमूर्त फ़िल्म है. बहुत सारी बातों और घटनाओं से बचती हुई, दरगाह और स्टेज पर एक सी शिद्दत से वक्त बिताती हुई, बार बार अपने गहरे दृश्यों पर लौटती हुई, अपने अंत पर चौंकाने से बचती हुई और शाश्वत सन्नाटे को अपने परदे पर दिखाने की हर संभव कोशिश करती हुई जिसमें वह कहीं कहीं नाकाम होती है.

रॉकस्टार इम्तियाज़ की पिछली फ़िल्मों से मुश्किल फ़िल्म है और उन पर यह ज़िम्मेदारी भी है कि उन्हें अपने आपको दोहराना नहीं है. हालांकि अपनी प्रेमकहानी में वे पूरी तरह इससे बच नहीं पाते, लेकिन फिर भी वे अपने स्त्री किरदार को थोड़ा अलग बनाते हैं. मगर नरगिस की खराब एक्टिंग उसे सपाट बना देती है. कमियाँ आरती बजाज की लापरवाह लगती एडिटिंग की वज़ह से भी हैं और आखिरी एक तिहाई हिस्से में स्क्रिप्ट में भी, लेकिन फिर भी रॉकस्टार ईमानदार है, पागल है और प्यारी भी. वह भागती नहीं और न ही लोकप्रिय हिन्दी फिल्मों की तरह आपके सामने हाथ जोड़कर खड़ी होती है. अर्जियों की सब परंपराओं को फाड़ती हुई वह अपनी मर्जी की जगह पहुंचती है जहां कॉंन्ट्रेक्ट के कागज, जानलेवा बीमारियाँ और मुझ जैसे समीक्षक नहीं हैं. जहां दुनिया अच्छी है.

– गौरव सोलंकी

' अरब बहार और अमेरिका की वॉल स्ट्रीट '

20 अक्टूबर की शाम को गद्दाफी की मौत का दृश्य देखकर यूनानी त्रासदी की वह नायिका याद आई जब वह राजा के आदेश के खिलाफ अपने मरे भाई की लाश को दफनाने के लिए ले जाती है. नायिका को जब दंडित करने के लिए राजा के सामने पेश किया जाता है तो वह राजा से कहती है कि हे राजा! राज्य का कानून जिंदा लोगों पर लागू होता है, लाशों पर नहीं. गद्दाफी की मौत के बाद लीबियाई क्रांतिकारी उसकी लाश को दंडित करते हैं – पता नहीं यह किस लीबियाई त्रासदी का संकेत है. सत्य की गति सूक्ष्म हुआ करती है. महाभारत में असत्य का पक्ष यानी कौरव स्वर्ग प्राप्त करते हैं जबकि पांडव जो कि सत्य के साथ थे और कृष्ण का भी साथ था वे नरक में जाते हैं एक युधिष्ठिर को छोड़कर.  कर्नल गद्दाफी को स्वर्ग मिलेगा या नरक यह तो बस राम जाने! लेकिन यह वही राम थे जिन्होंने दुश्मन के मरने पर जश्न नहीं मनाया बल्कि उससे नसीहत लेने की सीख दी.

किसी बच्चे को यदि आप हिंदुस्तान का मानचित्र बनाने के लिए कहेंगे तो बस उसे एक पेंसिल की ही जरूरत पड़ेगी, लेकिन क्रांति की लहर से प्रभावित अरब देशों के मानचित्र को यदि आप देखें तो इनकी सीमाएं सीधी-सपाट कुछ-कुछ ऐसी जैसे किसी ने जश्न के तहत किसी केक को चाकू से सीधे-सीधे टुकड़ों में बांट दिया हो. अरब समाजों को जब देशों में बांटा जा रहा था तो उस समय भी केक और चाकू की घटना घटी. केक अरब समाज था और चाकू पश्चिमी देशों के हाथ.

सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्राध्यक्ष मिखाइल गोर्बाचोव का मानना है कि वॉल स्ट्रीट आंदोलन पूंजीवाद की समाप्ति का संकेत है

ऐसा क्या है कि अरब समाजों में क्रांति की लहर इस तेजी से बढ़ी? इस बदलाव को समझने के लिए हमें इनके इतिहास पर एक नजर डालनी चाहिए. इस्लाम के उदय के बाद इन देशों में सत्ता की धुरी इस्लाम के इर्द-गिर्द घूमा करती थी और एक संक्षिप्त काल को छोड़ इसका नेतृत्व सऊदी अरब नाम के देश ने ही किया.  लेकिन 1908 में ईरान, और 1938 में सऊदी अरब में तेल के भंडार मिलने पर सत्ता के समीकरण बदले और साथ ही पश्चिमी देशों का रुझान भी. ऐसा नहीं है कि प्रत्येक अरब देश में यह प्राकृतिक संपदा मिली, लेकिन इसका प्रभाव अवश्य समस्त अरब राष्ट्रों पर पड़ा. विश्व का लगभग 20 प्रतिशत तेल सऊदी अरब और इसके पश्चात पश्चिम एशिया में ही स्थित एक गैरअरब देश ईरान के पास है.  यूरोप जो कि औद्योगीकीकरण को अपने वर्चस्व का हथियार बनाए हुए था, इस प्राकृतिक ऊर्जा को अपने नियंत्रण में लेने के प्रयास करने लगा.  पश्चिमी एशिया के पास तेल तो था लेकिन तकनीक पश्चिमी देशों के पास थी इसी पारस्परिक जरूरत के तहत लेन-देन का रिश्ता पनपा, लेकिन यह रिश्ता बराबरी पर आधारित नहीं था और इसी गैरबराबरी के खिलाफ अरब देशों में पश्चिमी देशों के विरुद्ध संघर्ष भी हुए. ऐसा नहीं है कि यह संघर्ष सत्तासीन राजघरानों ने किया हो बल्कि अरब समाजों ने अपने देश की सत्ता को पश्चिमी राष्ट्रों की जी-हुजूरी के खिलाफ प्रेरित किया. इस संघर्ष के परिणामस्वरूप मिस्र, सीरिया और लीबिया में अब्दुल जमाल नासिर, हाफिज असद और मुअम्मर गद्दाफी सरीखा नेतृत्व उभर कर सामने आया.  लेकिन समय के साथ-साथ इस नेतृत्व में भी शिथिलता आई और इसने भी अपने समाज की नजरअंदाजी की और रेगिस्तान से महलों में जा बसा.. शायद वे यह भूल गए थे कि रेगिस्तानी महल उम्रदराज नहीं होते.  

अरब समाज में यूं तो यदा-कदा विद्रोह के स्वर सुनाई देते थे लेकिन जनवरी, 2011 की शुरुआत में ट्यूनीशियाई युवक के आत्मदाह से जो चिंगारी सुलगी उसमें ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन और यमन पूरी तरह से झुलसने लगे और इसकी आंच जॉर्डन, मोरोक्को और सऊदी अरब तक जा पहुंची. दुनिया ने इसे अरब बहार का नाम दिया. सुना था कि बहार निष्पक्ष हुआ करती है वह पेड़-पौधों की जात और उम्र नहीं देखा करती हालांकि यह बहार कुछ देशों में बदलाव तो लाई, लेकिन बाकी देश अब भी इसकी बाट जोह रहे हैं. क्यों कुछ देशों में सत्ता परिवर्तन जल्दी हुए और कुछ देशों में क्रांतिकारी अब भी सफल नहीं हुए हैं? यह कोई पेचीदा समीकरण नहीं है. इसे समझने के लिए इतना भर जरूरी है कि अरब देशों की सत्ता या तो राजे-रजवाड़ों के कब्जे में है या फिर किसी करिश्माई अरब व्यक्तित्व पर केंद्रित है. जॉर्डन, बहरीन, मोरोक्को और सऊदी अरब की सत्ता की बागडोर राजा और सुल्तानों के हाथ में है लेकिन ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया और में यमन लोकतंत्र की आड़ में वंशवाद का एकछत्र शासन. लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि राजघराने अब तक सुरक्षित हैं जबकि बाकी अरब राष्ट्रों में क्रांति ने सत्ता को या तो गिरा दिया अथवा उसकी नींव हिला दी? शायद पश्चिमी लोकतंत्र को अरब राष्ट्रों का राजतंत्र अपने हितों के लिए अधिक कारगर महसूस होता है, इसीलिए वह बहरीन में क्रांतिकारियों के समर्थन में और इस देश के सुल्तान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलता जहां क्रांतिकारियों का दमन न सिर्फ इस देश की सेनाएं करती हैं बल्कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के टैंक भी इस दमन में शरीक हो जाते हैं.  इसके विपरीत बहरीन जैसे हालात से गुजर रहे देश सीरिया पर पश्चिमी देशों का दबाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है.  हालांकि रूस, चीन और हिंदुस्तान ने सीरिया के खिलाफ पश्चिमी दखलंदाजी पर कुछ मायनों में लगाम लगा दी. 

कुछ पश्चिम एशियाई देशों के अपने निहित स्वार्थ भी इस क्रांति को अपने अपने अर्थों में व्याख्यायित कर रहे हैं. एक ओर सऊदी अरब, यमन और बहरीन की क्रांति को ईरान की शिया दखलंदाजी मानता है लेकिन  इस बहाने के जरिए वह अपने खिलाफ उभर रहे आतंरिक असंतोष को दबाने की कोशिश में लगा है. इसी तर्ज पर सीरिया की सत्ता को बचाने में ईरान ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. उसका यह मानना है कि यदि सीरिया का सिंहासन डोलता है तो उसका इजराइल विरोध का स्वर कुंद पड़ जाएगा और लेबनान में हिजबुल्लाह संगठन को सहायता पहुंचाना भी कठिन हो जाएगा.

वैसे इस पूरे प्रकरण में ऐसा नहीं है कि अरब देश ही प्रभावित हुए हों. अमेरिका और यूरोप में भी इसका गहरा असर इन देशों में गैरबराबरी के खिलाफ चल रहे अभियानों पर साफ-साफ दिखाई देता है. यूं तो अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश माना जाता है लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि यह देश आर्थिक दृष्टि से इतना कमजोर हो चुका है कि वहां की सरकार अपना कर्जा चुकाने के लिए भी कौड़ी-कौड़ी की मोहताज हो गई है. सैनिक अभियानों एवं सेना के रख रखाव में अत्यधिक खर्च इसकी एक वजह है जिसकी खातिर जनता पर करों का बोझ दिन-प्रतिदिन बढ़ाया जा रहा है. वहां की सरकार के अमीर और गरीब के बीच सौतेले व्यवहार के कारण अमेरिकी जनता ने 17 सितंबर से एक अभियान चलाया जिसे हम वॉल स्ट्रीट आंदोलन के नाम से जानने लगे हैं. इस आंदोलन के नेतृत्व का कहना है कि उनका प्रेरणास्रोत मिस्र का अल-तहरीर मैदान है जिसने शांति और अहिंसा का मार्ग अपनाकर अपने अधिकारों को प्राप्त किया और तानाशाही के अंत का सबब बना. वॉल स्ट्रीट आंदोलन अब तक अमेरिका के 70 शहरों में फैल चुका है और बहुत-से यूरोपीय देशों में इसी आंदोलन की तर्ज पर संघर्ष शुरू हो चुके हैं.

कुछ दिन पहले सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्राध्यक्ष मिखाइल गोर्बाचोव ने अमेरिका के पेंसिलवानिया में एक भाषण में कहा कि वॉल स्ट्रीट आंदोलन पूंजीवादी व्यवस्था के ताबूत पर आखिरी कील साबित होगा और जिस तरह से सोवियत संघ का खात्मा हुआ, यह व्यवस्था भी खत्म होगी. जनवरी, 2011 में एक सब्जी बेचता हुआ मुहम्मद बुअजीजी नाम का ट्यूनीशियाई युवक उस देश की संसद के सामने आत्मदाह करता है और इससे पहले कि उसका बलिदान मात्र उसके परिवार के शोक का कारण बने वह तब्दील हो जाता है उस हवा में जो क्रांतिकारियों के लिए बहार बनकर आई और तानाशाहों के लिए भय, शर्म और मृत्यु की आंधी. इस बहार का रुख अब पश्चिम के देशों की तरफ है. काश कोई चिट्ठी लिखे इस बहार के नाम इस संदेश के साथ कि ऐ हवा! पूरब में बसे हिंदुस्तान में अब तक ढाई लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं तुझे देखने की खातिर. पूरब की ओर कब रुख करोगी? 

पाक जमीन को लगी नापाक बीमारी के लक्षण

ओसामा बिन लादेन को पकड़ने में अमेरिका की मदद करने वाले डॉक्टर के खिलाफ पाकिस्तान सरकार का रवैया कई कड़वे तथ्यों को सामने ला रहा है

2002 में पाकिस्तानी अखबारों के पहले पन्ने पर एक विज्ञापन छपा था. इसमें कहा गया था कि ओसामा बिन लादेन की जानकारी देने वाले को लाखों डॉलर बतौर इनाम दिए जाएंगे. जिन तक अखबार नहीं पहुंचता था उन तक इस विज्ञापन को माचिस और सिगरेट के डिब्बे पर छापकर पहुंचाया गया. पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के कबाइली इलाके में छोटी-मोटी दुकानों को भी इस विज्ञापन के प्रसार का जरिया बनाया गया. फिलहाल हालत यह है कि जिस व्यक्ति ने ओसामा को खोजने में मदद की उस पर अब विदेशी शक्ति के साथ मिलकर देश की संप्रभुता के साथ समझौता करने के चलते राजद्रोह का मुकदमा चल रहा है और आरोप सिद्ध होने पर उसे मौत की सजा दी जा सकती है. पाकिस्तानी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी डॉ शकील अफरीदी ने एबटाबाद में ओसामा का सुराग लेने के लिए फर्जी टीकाकरण कैंप लगा रखा था.

दशक भर बाद हालात बिल्कुल बदल गए हैं. सदी की शुरुआत में जो पाकिस्तान और अमेरिका कंधे से कंधा मिलाकर अल कायदा के खिलाफ अभियान चला रहे थे, आज दोनों एक-दूसरे पर विश्वासघात और दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगा रहे हैं. पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में आई तल्खी का अंदाजा इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि जिस ओसामा की मौत पर भारी इनाम मिलने थे अब उस पर मौत के बादल मंडरा रहे हैं. मोटे तौर पर देखें तो डॉ अफरीदी के साथ पैदा हुए हालात पाकिस्तान की उस दुर्दशा का इशारा करते हैं जिसमें एक तरफ उसे देश के भीतर फैल रहे धार्मिक अतिवाद से जूझना पड़ रहा है और दूसरी तरफ उसके ऊपर अमेरिका के साथ बराबरी और सम्मान का रिश्ता बनाए रखने का भी दबाव है. पाकिस्तान में बहुमत का मानना है कि हथियारबंद और हिंसक धार्मिक समूह देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा हैं. लेकिन ऐसे समूहों से निपटने के तौर-तरीकों को लेकर इनमें सहमति नहीं है. आम पाकिस्तानी का मत है कि पाकिस्तान को अमेरिका के साथ सशर्त दोस्ती नहीं करनी चाहिए. यहां अमेरिका को भी धार्मिक उग्रवादियों की तरह ही पाकिस्तान की मुसीबतों में इजाफा करने वाले के तौर पर देखा जा रहा है न कि आर्थिक, ऊर्जा, शिक्षा, पर्यावरण और रोजगार जैसी समस्याओं को दूर करने वाले की. धार्मिक हिंसा के शिकार पाकिस्तान दक्षिण एशिया और अफगानिस्तान के प्रति अमेरिका की स्वार्थी नीतियों में फंसकर विरोधाभासी प्रतिक्रियाएं दे रहा है. पाकिस्तान में हर स्तर पर डॉ अफरीदी के साथ बरती जा रही कठोरता को हमें इन्हीं हालात के मद्देनजर देखना चाहिए.

अमेरिका को लेकर पाकिस्तान के भरोसे में आई कमी ही डॉ. अफरीदी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाने के सरकारी फैसले की मूल वजह है 

पिछले कुछेक दशकों के दौरान सेना के तमाम अधिकारियों ने अपने ही संस्थान और नेताओं के खिलाफ अनेक हिंसक अिभयान चलाए. दिसंबर 2003, 2006 और 2007 में परवेज मुशर्रफ पर हुए आतंकवादी हमले में सेना और वायुसेना के कई अधिकारी हिरासत में हैं. वायु सेना के कई अधिकारी सैन्य ठिकाने से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां आतंकवादियों तक पहुंचाने के आरोप में 2009 से ही हिरासत में हैं. 2009 और 2011 के बीच दो अति महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर हुए आतंकी हमलों  में सेना के ही लोग जानकारियां मुहैया करवा रहे थे.

सेना के प्रवक्ता ने इस बात की पुष्टि की है कि 2009 में रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय और 2011 में कराची स्थित वायु सेना बेस पर हुए हमले के मामले में सेना के पूर्व और मौजूदा अधिकारियों पर मुकदमा चल रहा है. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल अली खान प्रतिबंधित धार्मिक संगठन हिज्ब-उत-तहरीर से संबंध रखने के आरोप में कोर्ट मार्शल झेल रहे हैं. यह संगठन बार-बार लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट करने के लिए सेना को प्रोत्साहित करता रहा है ताकि पाकिस्तान में खलीफा आधारित इस्लामी राज स्थापित हो सके. अफगानिस्तान में संयुक्त सेनाओं के जितने सैनिक मारे गए हैं उनसे  कई गुना ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक धार्मिक उग्रवाद से संघर्ष में शहीद हो चुके हैं. पाकिस्तानी सेना विचारधारात्मक खतरे और नीतिगत गड़बड़ियों के बीच धार्मिक चरमपंथ और अमेरिका की स्वार्थी अपेक्षाओं का सामना कर रही है.

दोहरे दबाव के बीच पिस रही सेना की हालत का एक और नमूना है पश्चिमोत्तर के सीमावर्ती इलाकों में जारी अमेरिका के ड्रोन हमले, धार्मिक उग्रवाद से निपटने के तौर-तरीके और अमेरिका के साथ कूटनीतिक व सामरिक संबंधों पर देश के सियासी दलों का रवैया.
पाकिस्तान के सभी सियासी दलों ने ड्रोन हमलों की निंदा की है और इसे पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन माना है. अब जाकर एक महीना पहले सर्वदलीय बैठक में ड्रोन हमलों की निंदा का फैसला एकमत से लिया गया. इस बैठक में इस बात पर भी एकराय बनी कि सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी सेना के साथ हैं. अमेरिका के हमले असल में पाकिस्तान और कुछ खास अफगानी आतंकी समूहों को आमने-सामने ला खड़ा करने की रणनीति का हिस्सा हैं. बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि सरकार को देश के धार्मिक अतिवादी समूहों के साथ बातचीत के रास्ते खोलने की जरूरत है.

इसी तरह का प्रस्ताव पाकिस्तान की संसद ने भी तब पारित किया था जब अमेरिका ने ऑपरेशन एबटाबाद को अंजाम दिया था. संसद ने एक सुर में कहा था कि पाकिस्तान की सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन करने वाली इस तरह की घटना को रोकने के लिए जो भी संभव हो वह किया जाएगा. इस प्रस्ताव में उस व्यक्ति का नाम तक नहीं था जिसके लिए अमेरिकी सेना ने पाकिस्तानी सीमा का उल्लंघन किया था.

सत्ता और ताकत के लिए लालायित कई नेता लगातार अमेरिका विरोधी राग अलापते रहते हैं. इनमें पूर्व क्रिकेटर इमरान खान का नाम सबसे ऊपर है. कई विपक्षी दल इस अमेरिका विरोध को शक्तिशाली सेना के साथ संबंध मजबूत करने का जरिया मान रहे हैं. हालांकि इक्का-दुक्का को छोड़कर ज्यादातर का अमेरिका विरोध तात्कालिक है. कोई भी अमेरिका के साथ सीधा टकराव नहीं चाहता है- इमरान खान भी नहीं. ज्यादातर नेता अमेरिका के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध रखने की जरूरत को समझते हैं, वह भी ऐसी स्थिति में जब कुछ लोग पश्चिम के खिलाफ बने ईरान-चीन-रूस गठजोड़ में पाकिस्तान के शामिल होने की हिमायत कर रहे हैं. सत्ता में बैठे हुए राजनीतिक दल और नेता पश्चिम और खास तौर पर अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखने की अहमियत से वाकिफ हैं.
मजे की बात है कि ये लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर छिपे गैरपाकिस्तानी उग्रवादियों से निपटने के लिए अमेरिकी ड्रोन हमले को जरूरी मानते हैं क्योंकि यह इलाका बहुत दुर्गम है और पाकिस्तानी सेना यहां कार्रवाई नहीं करना चाहती. मौजूदा स्थिति में सार्वजनिक बयानबाजी और निजी बातचीत के बीच जो कॉमन रुझान सामने आता है वह कुछ यूं है- अमेरिका हमेशा पाकिस्तान का इस्तेमाल टिश्यू पेपर की तरह करता है, संकट की घड़ी में उसने कभी पाकिस्तान का साथ नहीं दिया, वह ऐसा दक्षिण एशिया बनाना चाहता है जिसमें सिर्फ भारत का प्रभुत्व रहे और इस काम में अफगानिस्तान अमेरिका का पिछलग्गू बना हुआ है. आज पाकिस्तान में इस तरह का अमेरिका विरोध व्यापक हो गया है.

इस हालत ने लोगों को डॉ अफरीदी मामले को उचित ठहराने का बहाना दे दिया है. ऑपरेशन ओसामा पर पाकिस्तानियों को अंधकार में रखकर उसकी सीमा में सैकड़ों किलोमीटर घुस आने को पाकिस्तानी अमेरिका का धोखा मानते हैं क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई में सबसे बड़ा सहयोगी था. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब अमेरिका ने अपने निजी हितों को पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंधों पर तरजीह दी है. अमेरिका को लेकर पाकिस्तान के भरोसे में आई कमी ही डॉ अफरीदी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाने के सरकारी फैसले की मूल वजह है.

इसकी तुलना उस दौर से की जा सकती है जब अमेरिका और पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंध इतने कटु नहीं थे. उस वक्त पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों ने अमेरिकी एजेंसियों के साथ मिलकर तमाम अल कायदा और तालिबानी नेताओं और लड़ाकों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई थी और उन्हें ग्वांतनामोबे भेजा था. लेकिन उस वक्त किसी ने भी खुद गिरफ्तार करके एक विदेशी शक्ति को सौंपने का विरोध नहीं किया था. पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन ऑफ फायर’ में साफ-साफ लिखा है कि उस समय ऐसा करने वाले तमाम पाकिस्तानी लोगों और संस्थानों को इनाम के तौर पर अमेरिका से लाखों डॉलर मिले थे. लेकिन उस वक्त किसी ने न तो कोई सवाल पूछा था और न ही किसी का नाम सार्वजनिक हुआ था. 

– बदर आलम (संपादक, हेराल्ड पत्रिका, पाकिस्तान)

‘ जाहिदे तंग नजर ने काफिर मुझे समझा…’

जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ कुछ ऐसे तीखे और कटु अनुभव भी होते हैं जिनके बाद लगता है कि शिक्षा, डिग्री और समाज के लिए किए गए सारे काम बेकार हैं. बस अगर कुछ है तो आपका मजहब है जिसके आधार पर आपको बड़ी बेदर्दी के साथ नकार दिया जाता है. ऐसे अनुभवों के बाद लगता है कि समाज में अपनी राजनीति की खातिर कुछ तत्वों ने ऐसे बीज बो दिए हैं जिनकी फसल आज लहलहा रही है.

‘पुजारी जानता था कि मैं मुसलमान हूं, मगर उसने कभी गर्भगृह में बैठकर पढ़ने को मना नहीं किया’ 

कुछ समय पहले एक अखबार के काम से तीन महीने के लिए मुरादाबाद जाना पड़ा तो एक कमरे की भी आवश्यकता हुई. संयोग से कार्यालय के सामने ही एक कमरा खाली मिल गया. मकान मालिक से बात की और उसे तीन महीने का एडवांस किराया दे कर घर से आवश्यक सामान लेने आ गया. तीसरे दिन जब अपना सामान कमरे के सामने टिकाया तो मकान मालिक ने कमरा देने को मना कर दिया. वजह बताई कि आप मुसलमान हैं और आपने यह बात पहले नहीं बताई थी. स्टाफ के लोगों ने मकान मालिक को खूब समझाया तो वह बोला कि अगर मैंने कमरा दे दिया तो आसपास के लोग मेरा सामाजिक बहिष्कार कर देंगे. मजबूरी में कहीं और व्यवस्था करनी पड़ी.

ऐसा ही एक और कटु अनुभव पिछले दिनों हुआ. एक सेकंड हैंड गाड़ी की आवश्यकता थी. अखबार में विज्ञापन के बाद दिल्ली के जनकपुरी इलाके में एक गाड़ी के मालिक से बात हुई. गाड़ी पसंद आ गई, सौदा हो गया और भुगतान कर दिया गया. गाड़ी के सेल लेटर पर लड़के का नाम देख कर गाड़ी मालिक ने गाड़ी देने से इनकार कर दिया और पैसे वापस कर दिए. पूछने पर बताया कि वह किसी मुसलमान को अपनी गाड़ी नहीं बेचेगा.

उम्र के सातवें दशक से पहले ऐसे अनुभव कभी नहीं हुए थे. मेरा जन्म गांव में हुआ और अब भी मैं गांव में ही रह रहा हूं. गांव में हमारा एकमात्र मुसलिम परिवार था. अकेला परिवार था तो सारे खेल-कूद दूसरे बच्चों के साथ ही होते थे. गांव में एक शिव कुटी नाम से छोटा-सा मंदिर था. किशोरावस्था में चार-पांच मित्र शिव कुटी पर शाम के समय जाते थे. कुटी पर एक साधु रहते थे. उनके धूने के चारों ओर सब बैठ जाते और चिलम भर कर बारी-बारी से सब उसमें दम लगाते थे. हिंदू-मुसलमान की कोई बात न मित्रों के मन में थी और न ही साधु महाराज के मन में. हाई स्कूल और इंटर की परीक्षा से पहले तैयारी के लिए छुट्टियां होती थीं. गांव के पास एक प्राचीन मंदिर है. इन छुट्टियों में हम चार मित्र मंदिर पर जाते और वहां अपनी तैयारी करते, दोपहर में धूप तेज होने पर मंदिर के पुजारी से हमने गर्भगृह में बैठ कर पढ़ने की अनुमति ले ली थी. पुजारी इस बात को जानता था कि मैं मुसलमान हूं, मगर उसने कभी गर्भगृह में बैठ कर पढ़ने को मना नहीं किया.

इंटर के बाद प्राइमरी टीचर का प्रशिक्षण प्राप्त करके दिल्ली में नौकरी की शुरुआत की. 12 साल की सेवा के बाद डिग्री कॉलेज में भी कुछ समय नौकरी की. यहां भी मैं अकेला ही मुसलमान था. इन दोनों नौकरियों के दौरान कभी ऐसा नहीं लगा कि मुसलमान होने के नाते मुझसे कोई भेदभाव किया जा रहा है. प्रगाढ़ मित्रताएं रहीं जिनमें मजहब कभी आड़े नहीं आया. लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही. पहले बस्तियों में हिंदू-मुसलमान साथ-साथ ही रहते आए हैं. चार घर हिंदुओं के हैं तो दो घर मुसलमानों के भी हैं, मगर अब जो नई बस्तियां बस रही हैं उनमें ऐसा नहीं हो रहा. हमारे गांव के पास एक काॅलोनी विकसित हुई. हमने भी वहां मकान बनाने की सोची. काॅलोनी बसाने वालों से बात की तो उन लोगों ने साफ कह दिया कि वे किसी मुसलमान और दलित को इस कॉलोनी में नहीं बसाएंगे. ये सभी स्थानीय लोग हैं और मुझे भली प्रकार जानते भी हैं. इनका यह जवाब सुन कर मन पर क्या बीती यह मैं ही जानता हूं. अब मुसलमानों के बीच ही मकान बनाने की मजबूरी हो गई. यानी मुसलमान मुसलमानों के बीच बस रहा है, हिंदू हिंदुओं में और दलित दलितों के बीच. हर नगर में अलग-अलग टापू बनते जा रहे हैं. सेकुलर भारत के लिए यह शुभ नहीं. हालत यह है कि गांव के जिस मंदिर में बैठ कर चिलम में दम लगाते थे उसकी सीढ़ियां चढ़ते भी डर लगता है. कहीं कोई टोक न दे कि यह मुसलमान मंदिर में क्यों घुसा जा रहा है.

अब इस सब के लिए सारे हिंदू समाज को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता मगर प्रबुद्ध हिंदुओं से यह अपील तो की ही जा सकती है कि वे समाज में आ रहे इस बदलाव पर गंभीरता से विचार करें और चंद लोग जो ऐसी भावनाओं को बल प्रदान कर रहे हैं उन्हें बेनकाब करें. अंत में यही कह सकता हूं, ‘जाहिदे तंग नजर ने काफिर मुझे समझा, काफिर ये समझता है कि मुसलमान हूं मैं.’