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उम्मीदों का विराट रूप

28 फरवरी को ऑस्ट्रेलिया के होबार्ट में खेला गया एकदिवसीय मैच क्रिकेट इतिहास के उन चुनिंदा मैचों में शामिल हो चुका है जिनकी स्मृति क्रिकेट प्रेमियों के मन में हमेशा रहेगी. खासकर श्रीलंकाई गेंदबाज लसिथ मलिंगा का वह ओवर तो शायद ही कोई भूल पाए  जिसमें उन्होंने एक छक्के और चार चौकों समेत 24 रन लुटवा दिए थे. रनों की यह बरसात इस मैच के महानायक और टीम के नए नायब कप्तान विराट कोहली के बल्ले से हुई. होबार्ट में उनके विराट रूप ने क्रिकेट के अगले कालखंड का महानायक बनने की सारी संभावनाएं दिखाई हैं. श्ृंखला में बने रहने के विकट दबाव के बीच भीमकाय लक्ष्य का पीछा करते हुए उस दिन कोहली को बल्लेबाजी करते देखना एक अद्भुत अनुभव था. विशेषकर डेथ ओवर्स के सबसे खतरनाक गेंदबाजों में शुमार लसिथ मलिंगा पर उनका आक्रमण हैरतखेज था. उस बुरे दिन में मलिंगा ने सिर्फ 7.4 ओवरों में 96 रन लुटाए जो वन-डे में उनका सबसे बुरा प्रदर्शन है. कोहली के 86 गेंदों में जुटाए गए अजेय 133 रन भारतीय क्रिकेट की निधि बन गए.

असल में 23 साल के विराट कोहली खुद पिछले कुछ समय से भारतीय क्रिकेट का सबसे ज्यादा चमकदार हीरा हैं. उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज 2008 में हुआ था, लेकिन क्रिकेट पंडितों की चर्चा उन्हें दो साल बाद मिली जब उन्होंने कर्नाटक के खिलाफ दिल्ली की तरफ से एक रणजी मैच में बकौल तत्कालीन कोच चेतन चौहान ‘सचमुच की विराट जुझारू पारी’ खेली थी. कोटला मैदान में खेले गए इस मैच के दौरान ही जिस दिन कोहली को अपनी पारी 40 रन से आगे बढ़ाने के लिए मैदान पर उतरना था, तड़के तीन बजे उनके पिता प्रेम कोहली का देहांत हो गया. तब सिर्फ 18 साल के कोहली इस खबर से दो पल के लिए एकदम बिखर-से गए थे. चूंकि वे दिल्ली में ही थे, इसलिए साथी खिलाड़ियों ने उन्हें सहारा देते हुए मैदान पर घर को तरजीह देने की सलाह दी. लेकिन कोहली ने जार-जार रोते हुए मैदान का चुनाव किया क्योंकि उनकी टीम पर हार का खतरा मंडरा रहा था. इसके बाद अपने निजी दुख को एकतरफ करते हुए कोहली एकदम नियत समय पर बल्लेबाजी करने उतरे और अपने जुझारू 90 रनों की बदौलत दिल्ली को हार के खतरे से उबार ले गए. दिल्ली टीम के तत्कालीन कप्तान मिथुन मिन्हास ने कोहली की इस पारी के बारे में कहा था, ‘हमने कोहली से कहा कि इस वक्त उसे घर पर होना चाहिए, ऐसा करने पर पूरी टीम उसके साथ है, लेकिन उसने खेलने का फैसला किया. यह प्रतिबद्धता का चरम था. अंतत: उसकी पारी हमारे लिए बेहद अहम साबित हुई.’

यही वह पारी थी जिसके बाद पहली बार कोहली के टेंपरामेंट को लेकर चर्चा हुई. लेकिन इससे भी ज्यादा गौरतलब बात यह है कि इसी पारी के बाद कोहली की तुलना पहली बार सचिन तेंदुलकर से की गई. सचिन ने भी 1999 के वर्ल्ड कप में पिता की मौत के चंद दिन बाद ही मैदान पर वापसी करते हुए शतक बना कर भारत को जीत दिलाई थी. यहां एक दीगर तथ्य यह भी है कि कोहली की उम्र सिर्फ 18 साल थी और उनके पिता की मौत चंद घंटे पहले ही हुई थी.

कोहली अपनी कप्तानी में अंडर-19 वर्ल्ड-कप पहले ही जितवा चुके हैं, इसलिए कप्तानी का जिक्र आने पर उन्हें सिरे से खारिज किया भी नहीं जा सकता

जल्द ही कोहली एक बार फिर चर्चा में थे जब उन्होंने अपनी उम्दा कप्तानी और बल्लेबाजी की बदौलत भारत की अंडर-19 टीम को विश्वविजेता बनाया और उसके बाद राष्ट्रीय टीम में जगह पक्की की. अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत के बाद उपलब्धियां और सचिन से तुलना दोनों कोहली के खाते में सिलसिलेवार आती रहीं. हाल में खत्म हुई सीबी सीरीज के बाद भी उन्हें सचिन के सामने रखकर देखा गया. गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया दौरे पर कोहली भारत की तरफ से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले और टीम के इकलौते शतकवीर खिलाड़ी थे.

सचिन तेंदुलकर से कोहली की तुलना के बारे में कोई भी निष्कर्ष निकालने से पहले इसके धरातल को जान लेना जरूरी है. असल में कोहली ने अपने चार साल के छोटे-से करियर में रिकार्ड्स का जो अकूत सरमाया जमा किया है,  तुलना की धारा वहां से निकलती है. करियर की शुरूआती पारियों को पैमाना बनाने पर कोहली रिकाॅर्डों के सबसे बड़े सरमायादार नज़र आते हैं. सीधे तौर पर सचिन से भी बड़े. सीबी सीरीज के खत्म होने तक कोहली ने भारत की तरफ से 82 मैचों की 79 पारियों में 47.54 की उम्दा औसत और 84.88 के धमाकेदार स्ट्राइक रेट के साथ 3233 रन बनाए हैं जिनमें नौ शतक और 20 अर्धशतक शामिल हैं. वहीं सचिन तेंदुलकर ने भी अपने करियर के शुरुआती 82 मैचों में 79 पारियां खेली थीं जिनमें उन्होंने 32.41 के साधारण औसत और 78.48 के कमतर स्ट्राइक रेट की मदद से सिर्फ 2236 रन बनाए थे. इसमें सिर्फ एक शतक और 17 अर्धशतक शामिल थे. सचिन को अपना पहला शतक बनाने में 79 एकदिवसीय मैच खेलने पड़े थे, जबकि इतने ही मैचों में कोहली के पास आठ वन-डे शतक हो चुके थे.

तो क्या यह मान लिया जाए कि कोहली सचिन से बेहतर हैं. एक धुर रिकॉर्डपूजक व्यक्ति भी कम से कम सचिन को लेकर कोहली के संदर्भ में ऐसी सपाट राय व्यक्त करने से बचेगा क्योंकि क्रिकेट को जानने-समझने वाले ज्यादातर लोग इस बात पर एक राय होंगे कि मौजूदा दौर में रिकॉर्डों का अगर कोई बादशाह है तो वह सचिन तेंदुलकर ही हैं. सचिन ने 23 साल मैदान पर गुजारे हैं जितनी कोहली की कुल उम्र है. 460 वनडे और 188 टेस्ट मैच खेले हैं और इसके बाद भी दोनो प्रारूपों में बेहद उम्दा माने जाने वाले औसत से कुल 99 शतक, 150 से ज्यादा अर्धशतक  और 33 हजार से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय रन बनाए हैं. ये भीमकाय रिकॉर्ड क्रिकेट प्रेमी जन-मानस में इस तरह रचे-बसे हैं कि इनका जिक्र करना जरूरी नहीं. लेकिन यह बात समझना जरूरी है कि कोहली को अभी बहुत क्रिकेट खेलना है, जिसमें उन पर अपनी शुरुआती चमक कायम रखने का दबाव होगा. इसके साथ ही उन्हें टेस्ट मैच यानी क्रिकेट के असल संस्करण में भी खुद को साबित करना बाकी है. यहां एक बात समझना जरूरी है कि सचिन जितने बड़े अपने रिकॉर्डों में नजर आते हैं रिकॉर्डों से बाहर उससे कहीं ज्यादा बड़े हैं. अगर तर्कों के आधार पर वे भगवान न भी हों फिर भी सालों तक वे टीम इंडिया की वन मैन आर्मी रहे हैं और करोड़ों उम्मीदों का बोझ अकेले अपने कंधे पर ढोते रहे हैं. सचिन युवा क्रिकेटरों की उस पूरी पीढ़ी की प्रेरणा हैं जिससे कोहली जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी निकले हैं. उनसे क्रिकेट तो सीखा जा ही सकता है, शालीनता का सबक भी लिया जा सकता है ताकि भविष्य में युवा खिलाड़ियों को मिडल फिंगर दिखाने का अभद्र कारनामा न करना पड़े. खेल-पत्रकार हेमंत सिंह विराट कोहली की सचिन से तुलना को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, ‘वास्तव में करियर के अंतिम दौर में खड़े सचिन की किसी भी युवा खिलाड़ी से तुलना करना ही बेमानी है. ये कोहली के साथ भी होगा. उनके सामने पूरा आसमान है. उन्हें फिलहाल बेफिक्री से उड़ने दिया जाना चाहिए.’

एक दूसरी बहस कोहली को उपकप्तान बनाए जाने को लेकर भी शुरू हो गई है. क्रिकेट पंडित इसे लेकर भी दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं. वसीम अकरम के मुताबिक इससे गंभीर और सहवाग खुश नहीं होंगे और टीम में तनाव उत्पन्न हो सकता है वहीं सौरव गांगुली का मानना है कि टेस्ट कप्तानी में कोहली निश्चित तौर पर धोनी का सही विकल्प हो सकते हैं. असल में यहां कुछ बातें समझ लेना जरूरी है. उपकप्तानी कोहली को ऑस्ट्रेलिया में उनके अच्छे प्रदर्शन के इनाम के बतौर मिली है, जो कोहली सहित अन्य युवा खिलाड़ियों को अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रेरित कर सकती है. दूसरी अहम बात यह है कि उपकप्तान बनने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपका कप्तान बनना तय है. रैना का उदाहरण हमारे सामने है जो कि उपकप्तान, कप्तान जैसी जिम्मेदारियां पाने के बाद आज इन सबकी दौड़ में तो पिछड़ ही चुके हैं टीम में जगह पक्की रखने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं. वनडे में और टी-ट्वेंटी में धोनी आज भी उम्दा प्रदर्शनकारी और बेहतरीन कप्तान हैं, इसलिए उपकप्तान के कप्तान बनने की हाल-फिलहाल संभावना नजर नहीं आती. हालांकि कोहली को उपकप्तान बनाए जाने से वे अपनी भविष्य की भूमिका के लिए अंडर ट्रेनिंग तो हो ही गए. 2015 वर्ल्ड-कप में और इसके बाद में अनुभवी युवा टीम तैयार करने की रणनीति के लिहाज से यह सही कदम ही है, कोहली अपनी कप्तानी में अन्डर-19 वर्ल्ड कप पहले ही जितवा चुके हैं, इसलिए कप्तानी का जिक्र आने पर उन्हें सिरे से खारिज किया भी नहीं जा सकता.

फिलहाल देश विराट कोहली की कप्तानी देखने से ज्यादा लालायित उनकी अच्छी बल्लेबाजी देखने को लेकर है.

सोच के सांचे बदलने का सबक

पिछले कुछ सालों में देश की राजनीति जिस तेजी से बदली है उसने नेताओं से लेकर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों तक को चौंका दिया है. जाहिर सी बात है, जनता की रग-रग से वाकिफ होने का दावा करने वाले नेता, समाजशास्त्री और विश्लेषक इस बदलाव को भांपने में पीछे रह गए. सतह के नीचे बहुत कुछ बहुत तेजी से बदल रहा था, लेकिन लोग इसे पकड़ पाने, महसूस कर पाने में असफल रहे. यही कारण है कि आजकल आने वाले चुनाव परिणाम सभी को चौंका देते हैं. जिस पार्टी को बहुमत मिलता है वह भी हैरान रह जाती है क्योंकि उसने भी इस प्रचंड बहुमत की कल्पना नहीं की होती और जिसकी जमानत जब्त हो जाती है वह भी अवाक और हैरान रह जाता है.

हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ही देखें तो 224 सीटों के साथ भले ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने खुद को सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित किया है लेकिन पार्टी के किसी नेता को इतने बड़े बहुमत की उम्मीद नहीं थी. उसी प्रकार कांग्रेस को भी इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि इतना बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ेगा.

पंजाब में तो 46 साल से चला आ रहा इतिहास ही बदल गया. यहां राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं आई थी. यानी जो पार्टी सत्ता में होती थी उसे अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ता था. लेकिन इस बार एक नया इतिहास रचा गया. शिरोमनि अकाली दल (बादल)-भाजपा गठबंधन न सिर्फ दोबारा सत्ता में आने में सफल रहा बल्कि शिरोमनि अकाली दल तो पिछले चुनाव के मुकाबले अपनी सीटें बढ़ाने में भी कामयाब रहा. उसे पिछले चुनाव के मुकाबले सात सीटें अधिक मिलीं. इससे पहले राज्य में आलम यह था कि सत्तासीन पार्टी इस बात के लिए तैयार रहती थी कि अगली बार उसे विपक्ष में बैठना है. खैर, इस ऐतिहासिक क्षण ने सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इनकमबेंसी को इतिहास की बात बना दिया. अब का समय प्रो इनकमबेंसी का है. यानी जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा वह दोबारा सत्ता में आएगा.

एंटी इनकमबेंसी युग के सबसे बड़े उदाहरण रहे पंजाब ने भले ही 46 साल से यहां की राजनीति का स्थायी भाव रही एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदला है लेकिन अन्य राज्यों में एंटी इनकमबेंसी नामक कारक के अप्रभावी होने की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. पिछले कुछ समय के चुनाव परिणामों को अगर हम देखें तो देश की बदली राजनीति और जनता के बदले मानस को समझना आसान हो जाएगा. बिहार, हरियाणा, दिल्ली तथा गुजरात जैसे राज्यों से एक नई राजनीति की शुरुआत हुई है. इन राज्यों में सरकारें एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदलते हुए दोबारा चुनकर सत्ता में आईं. अलग-अलग कारणों से यहां की सरकारें भले ही विवादों में रही हों लेकिन लोगों ने उस पर ध्यान न देकर उन सरकारों के विकास और गवर्नेंस पर अपनी मोहर लगाई. अब पूरे देश में उसी विकास और गवर्नेंस की बयार है. चारों तरफ विकास और सुशासन की चर्चा है. जनता के मन में विकास और सुशासन के प्रति इसी आग्रह ने वर्तमान राजनीतिक दलों को अपने चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति में बदलाव करने पर मजबूर किया. जो बदल गए हैं या बदल रहे हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह अखाड़े में चित पड़ा हुआ है.

बदलाव की इस बयार में सबसे अधिक परिवर्तन उन क्षेत्रीय दलों में आया है जो पिछले कुछ समय तक संकीर्णता के दायरे में जी रहे थे. किसी खास धर्म, पंथ, जाति, मुद्दे या पहचान के आधार पर राजनीति करने वाले इन दलों के राजनीतिक दृष्टिकोण में सबसे अधिक विस्तार आया है. बहुत तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी राजनीति से समाज के बाकी तबकों को जोड़ने की कोशिश की है या फिर यह कह सकते हैं कि अपनी राजनीति को उन्होंने कुछ इस ढंग से विस्तार दिया है कि उसमें अब अपने परंपरागत आधार के अलावा बाकी के लिए भी स्थान है. इन दलों ने अपने आप को सर्वग्राही बनाते हुए समाज के सभी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बनाने की कोशिश की है. बीते कुछ समय में इन क्षेत्रीय दलों ने जहां अपनी राजनीति करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाया है वहीं अपनी क्षेत्रीय पहचान और दृष्टि को राष्ट्रीय तथा सर्वसमावेशी बनाने की कोशिश की है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिस तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने खुद को राष्ट्रीय बनाने की शुरुआत की है शायद उस गति से राष्ट्रीय दल अपना क्षेत्रीयकरण नहीं कर पाए हैं.
विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों ने साबित किया है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां जनता की नब्ज पर जिस तरह की पकड़ उनकी है उससे राष्ट्रीय दल बहुत दूर हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में राष्ट्रीय दलों की स्थिति इतनी दयनीय है. इन राज्यों में जनता ने पिछले सालों में क्षेत्रीय दलों पर अपना विश्वास दिखाते हुए राष्ट्रीय दलों को लगातार नकारा है. उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम इसका ताजा उदाहरण है.

क्षेत्रीय दलों में खुद को समाज के सभी वर्गों से जोड़ने की जो बेचैनी दिखाई दे रही है उसके पीछे बड़ा कारण उनके भीतर अपने जनाधार का विस्तार करने की इच्छा है. चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार या फिर पंजाब. अभी तक स्थिति यह थी कि पार्टियां अपने सीमित वोट बैंक को ही लेकर आगे चलती थीं. उनके सीमित लेकिन समर्पित वोटर थे. इससे बड़ी समस्या इन दलों को यह हुई कि ये कभी भी अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाए, इन्हें हमेशा दूसरे दलों या अधिकांश परिस्थितियों में राष्ट्रीय दलों का सहयोग लेना पड़ता था.

समय की मांग है कि राजनीतिक दल चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति बदलें. जो बदल गए हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह चित पड़ा है

उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने सिर्फ दलितों की राजनीति की. दलित आंदोलन से उपजी इस पार्टी ने न सिर्फ दलित हितों की बात की वरन दलितों के मन में इस बात को अच्छी तरह बैठा दिया कि वही उनकी एकमात्र हितैषी पार्टी है. अगर वे सुखी, सुरक्षित तथा सवर्णों के अत्याचार से मुक्त रहते हुए एक सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं तो उन्हें उसका साथ देना होगा.

सदियों से सवर्णों के हाथों प्रताड़ित दलित बड़ी संख्या में बसपा के साथ जुड़े. सवर्णों को ललकारने एवं गरियाने की बसपा की रणनीति ने उसे दलितों के हृदय में स्थापित कर दिया. लेकिन दलितों के इस अपार और स्थायी समर्थन के बावजूद भी पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आने में सफल नहीं हो पाई. हर बार उसे किसी न किसी दल से गठबंधन करना पड़ता. यही कारण है कि पार्टी ने अपनी रणनीति बदली. उसने सोचा कि अगर अपने दम पर यूपी में सत्ता में आना है तो उसे दलितों के साथ ही अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त करना होगा. इसी के तहत पार्टी ने दूसरी जातियों को लुभाना शुरू किया. उसने बहुजन की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का नारा दिया. जो पार्टी ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ सरीखे नारे दिया करती थी उसका नारा बदल गया. अब वह ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ सरीखे जुमलों का सहारा लेती दिखने लगी. पार्टी ने चुनावों में न सिर्फ बड़ी संख्या में सवर्णों को टिकट दिया बल्कि बड़ी संख्या में उन्हें मंत्री भी बनाया. पार्टी ने दूसरे वर्गों को अपनी राजनीतिक मजबूरी के चलते खुद से जोड़ने को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया.

उत्तर प्रदेश में बहुमत से दूर रहने की जिस समस्या के कारण बसपा ने दूसरे वर्गों को खुद से जोड़ने की शुरुआत की, ठीक उसी प्रकार की समस्या से पीड़ित रहने के कारण पंजाब में भी शिरोमनि अकाली दल (बादल) ने हिंदुओं और शहरी मतदाताओं की तरफ अपना हाथ बढ़ाया. भारत की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी (1920 में स्थापना) होने का गौरव होने के बावजूद  सिख पार्टी (विशेष रुप से जाट सिख) तथा किसानों की पार्टी के रूप में ही उसकी पहचान रही. यही कारण है कि आंदोलन से उपजी इस पार्टी के लिए अपने दम पर राज्य में सरकार बनाना हमेशा मुश्किल रहा है. इसी को देखते हुए उसने भाजपा से हाथ मिलाया. भाजपा को हिंदुओं और शहरी मतदाताओं का वोट मिल जाता और शिरोमनि अकाली दल के पास अपना एक वोट बैंक था ही. दोनों मिलकर सरकार बना लेते. लेकिन पिछले सालों में पार्टी की कमान धीरे-धीरे जूनियर बादल अर्थात सुखबीर बादल के हाथों में आ गई है. अब सुखबीर की तैयारी शिरोमणी अकाली दल को अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में लाने की थी. यही कारण है कि इस बार पार्टी ने 11 हिंदुओं को टिकट दिया. पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्रों, घोषणाओं तथा बयानों से बार-बार शहरी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की. शहरी मतदाताओं को ध्यान में रखकर उसने चुनाव में तमाम वादे किए. इस तरह हिंदू और शहरी मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग जारी है. वैसे इसके नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं. जिन 11 हिंदुओं को पार्टी ने टिकट दिया था उसमें से 10 जीत कर आ गए हैं साथ में ही शहरी क्षेत्र में पार्टी को पूर्व के चुनावों की तुलना में बहुत अधिक समर्थन मिला है. इसी सोशल इंजीनियरिंग का कमाल है कि पार्टी पिछले चुनावों से सात सीटें अधिक जीतने में सफल रही है और अपने दम पर सरकार बनाने से केवल तीन सीट दूर है. यह संभव है कि अगले चुनाव में पार्टी इस कमी को भी पूरा कर ले और उसे बीजेपी की बैसाखी की जरूरत पड़े ही नहीं.

चुनावी वैतरणी अपने दम पर पार करने के लिए वोट बैंक में इजाफा करने की रणनीति पर काम करने के साथ ही हम देखते हैं कि यूपी में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में जेडीयू या फिर पंजाब में शिरोमनि अकाली दल, इन दलों ने पिछले कुछ सालों में अपनी राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं.

शिरोमनि अकाली दल सिख आंदोलन की उपज है. इसके लिए सिख पंथ की रक्षा हमेशा से चुनावी मुद्दा रहा है. इतिहास में पार्टी ने इसी पहचान के आधार पर चुनाव लड़ा. लगभग एक धार्मिक दल के रूप में राजनीति करने वाले इस दल की राजनीति में पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से बदलाव आया. जानकार मानते हैं कि पहले यह पार्टी हर चुनाव में धार्मिक एवं भावनात्मक मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, ‘अकाली दल जो पिछले सालों में लगभग हर चुनाव में पंथिक मामलों को उठाता था, लोगों के बीच 1984 में सिखों के कत्लेआम का मुद्दा जोर-शोर से उठाकर कांग्रेस को घेरता था, उसने अब इन मुद्दों से काफी हद तक दूरी बना ली है.’ 2012 के विधानसभा चुनाव ने अकाली दल की राजनीति में आए क्रांतिकारी बदलाव से लोगों को परिचित कराया.

इस बार पार्टी ने किसी प्रकार की भावनात्मक या पंथ से जुड़ी राजनीति करने की कोशिश नहीं की, जबकि पहले चुनावों में भावनात्मक मुद्दों के आधार पर ही वह चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करती थी. यहां तक कि कई बार 84 के दंगों में मारे गए लोगों के परिवार वालों को सामने लाकर यह कहते हुए कि इन लोगों को आज तक न्याय नहीं मिला, पार्टी पुराने जख्मों के सहारे राजनीतिक युद्ध में अपना कद बढ़ाने की कोशिश करती थी. अभी तक सिखों में भी जाट सिखों की ही पार्टी समझे जाने वाले शिरोमनि अकाली दल ने राज्य में अन्य तबकों से खुद से जुड़ने की शुरुआत की है.
वोट बेस में इजाफा करने और अन्य वर्गों को पार्टी से जोड़ने के साथ ही पार्टी ने बदलती राजनीति के तौर-तरीकों से भी खुद को अपडेट कर लिया. पार्टी ने विकास और सुशासन को अपना नारा बनाया. इस बार का चुनाव पार्टी ने विकास और सुशासन के इसी मुद्दे पर लड़ा. यहां तक अपनी सरकार के दौरान भी पार्टी ने ऐसी तमाम योजनाएं शुरु कीं जिन्होंने राज्य के हाशिये पर खड़े अंतिम व्यक्ति को न सिर्फ प्रभावित किया बल्कि उसे पार्टी से जोड़ा भी. आटा-दाल जैसी स्कीम ने राज्य के लगभग 17 लाख गरीबों को दो जून की रोटी दिलाई.

इसी तरह साइकिल बांटने से लेकर शगुन (शादी के लिए दिए जाने वाले पैसे) तथा बाकी तमाम कल्याणकारी स्कीमों ने पार्टी को दुबारा सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. चुनाव अभियान में विकास और सुशासन के अलावा पार्टी ने चुनाव घोषणापत्र में भी तमाम तरह की कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने या फिर उनका विस्तार करने की बात की. पूरे चुनाव में पार्टी ने पहचान की राजनीति को हाशिये पर रखते हुए विकास की राजनीति को अपना नया नारा बनाया. जानकारों का कहना है कि इस बार शिरोमनि अकाली दल का चुनावी घोषणापत्र जितना लोकलुभावन था उतना शायद ही कभी रहा हो. लैपटॉप बांटने, किसानों को फ्री में बिजली देने, पेंशन देने, बेरोजगारी भत्ता देने, विभिन्न चीजों पर मिलने वाली रियायतों को और बढ़ाने के अलावा पार्टी ने इस बार राज्य का सर्वांगीण विकास करने जैसे वादों को तरजीह दी.

ऐसा ही उदाहरण हमें यूपी के चुनाव में देखने को मिलता है. समाजवादी पार्टी जो पिछले चुनाव में कंप्यूटर और अंग्रेजी का विरोध कर रही थी वह इस चुनाव में जीतने पर 12वीं पास छात्रों को लैपटॉप बांटने का वादा करती नजर आई. यही नहीं जिस पार्टी की छवि पिछले कुछ समय में गुंडों और बदमाशों की शरणस्थली के रूप में बन गई थी वही पार्टी प्रदेश को साफ-सुथरा, भयमुक्त और गुंडागर्दी मुक्त शासन देने का वादा कर रही थी. पूरे चुनाव अभियान में सपा विकास और सुशासन की बात करती नजर आई.

इस चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में सपा की तरफ से एक और बड़ा बदलाव टिकट बंटवारे में देखने को मिला. अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने कई ऐसे लोगों को टिकट दिया जो पारंपरिक रूप से न तो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे और न उनका धनबल या बाहुबल से कोई लेना-देना था.

कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने अपने संगठन, कार्यक्रम और विचारधारा के स्तर पर कई क्रांतिकारी बदलाव किए हैं. वे न सिर्फ अपनी सोच तथा राजनीतिक कार्यक्रमों को समावेशी बनाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि उसमें कामयाब भी हो रहे हैं. संदेश साफ है कि जब तक आप खुद को समाज के हर तबके से नहीं जोड़ते और बदलते समय के साथ जनता के बदलते मानस के हिसाब से तैयारी नहीं करते, तब तक आपकी नैय्या पार लगना मुश्किल है.

रपटीली राह

कांग्रेस नतीजों से सबक नहीं लेती, यह उत्तराखंड में नए मुख्यमंत्री के मनोनयन और  शपथ ग्रहण समारोह ने दिखा दिया. यही वजह रही कि मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा के नाम की घोषणा से लेकर उनके शपथ ग्रहण तक परिदृश्य पल-पल बदलता रहा. दिल्ली में आलाकमान के आशीर्वाद के बाद बहुगुणा को 13 मार्च को11 बजे देहरादून के जौली-ग्राउंड हवाई अड्डे पर उतरना था. इसके बाद शाम को उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेनी थी. लेकिन तब तक दिल्ली से केंद्रीय मंत्री  हरीश रावत और उनके साथी विधायकों के विरोध की खबरें उड़ने लगीं. विजय बहुगुणा के देहरादून उतरने के बाद आने वाली हर खबर पहली खबर से जुदा होती. कभी खबर आती कि शपथ ग्रहण समारोह टलने जा रहा है तो कभी यह कि पद के लिए अपनी दावेदारी ठुकराए जाने से नाराज हरीश रावत अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं. काफी उथल-पुथल के बीच आखिरकार टिहरी से सांसद बहुगुणा ने 13 मार्च की शाम पांच बजे  मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली. शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के 32 विधायकों और उसे समर्थन देने वाले सात यानी कुल 39 विधायकों में से केवल 10-11 विधायक ही शामिल थे. राज्य के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले बहुगुणा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र हैं. उत्तर प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी उनकी बहन हैं और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी उनके ममेरे भाई.

इससे पहले सबसे बड़ा दल होने के बाद भी उत्तराखंड के कांग्रेसियों की होली भागदौड़ और आपसी खींचतान में गुजरी. चुनावी नतीजे  के छह दिन बाद 12 मार्च की शाम को कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व सांसद विजय बहुगुणा को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में मनोनीत कर पाया. लेकिन इतनी लंबी जद्दोजहद के बाद भी कांग्रेस हाईकमान संभवतया दूसरे खेमों को संतुष्ट नहीं कर पाया. नतीजा यह था कि एक तरफ मनोनीत मुख्यमंत्री शपथ लेने के लिए दिल्ली से देहरादून उड़ने वाले थे और दूसरी ओर  दिल्ली में केंद्रीय  राज्य मंत्री और मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार  हरीश रावत अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेज रहे थे. उनका आरोप था कि पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं का निरादर हुआ है. शपथ ग्रहण समारोह तक  रावत के साथ 32 में से 18 विधायक बताए जा रहे थे. इन परिस्थितियों में शपथ ग्रहण के बाद भी बहुगुणा सदन में बहुमत साबित कर पाएंगे, कहना मुश्किल है.

राज्य बनने के बाद अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में पहली बार इतना खंडित जनादेश आया था. कांग्रेस और भाजपा के बीच महज एक सीट का फर्क था. दोनों ही राष्ट्रीय दल साधारण बहुमत के पास पहुंच कर भी बहुत दूर थे और बहुमत के लिए उन्हें निर्दलीयों और बसपा के समर्थन की दरकार थी. जानकारों के मुताबिक इस छितरे जनादेश के लिए कांग्रेस और भाजपा में मुख्यमंत्री के दावेदार स्थानीय क्षत्रप जिम्मेदार रहे जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने उत्तराखंड को अजीब-सी राजनीतिक अनिश्चितता में धकेल दिया है.

वैसे विधानसभा की 70 सीटों में से 63 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों को जिता कर उत्तराखंड के मतदाताओं ने स्पष्ट किया है कि कई मुद्दों पर मोहभंग के बावजूद अब तक उनकी पहली पसंद राष्ट्रीय दल ही हैं. लेकिन दोनों ही बड़े दलों में से एक भी चुनाव तक अनिश्चित-से दिख रहे मतदाताओं के मूड को सरकार बनाने लायक सामान्य बहुमत में नहीं बदल पाए. ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ नारे के नायक भुवन चन्द्र खंडूड़ी भले ही अपना चुनाव हार गए, लेकिन कुछ महीने पहले पतली हालत में दिख रही भाजपा उनके नेतृत्व में कयासों से काफी अधिक 31 विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही. उधर, 70 सदस्यीय विधानसभा में 32 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में तो उभरी, लेकिन यह संख्या भी सामान्य बहुमत की जादुई संख्या से चार कम थी. पिछली विधानसभा में आठ सीटों वाली बसपा भी अब केवल हरिद्वार जिले में जीती तीन सीटों पर सिमट गई है. मतदान तक ताकतवर लग रहे एक दर्जन निर्दलीयों में से भी तीन ही जीतकर विधानसभा पहुंचे. एक सीट क्षेत्रीय पार्टी उक्रांद के पंवार धड़े के खाते में गई थी.

लेकिन कुल सात की संख्या वाले बसपाई, निर्दलीय और उक्रांद विधायकों ने कांग्रेस के स्थानीय क्षत्रपों से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक को घुटनों के बल खड़ा कर दिया. तीनों निर्दलीय विधायक हल्की ना-नुकर के बाद कांग्रेस को समर्थन देने को तो राजी थे लेकिन कुछ शर्तों के साथ. ये तीनों विधायक पहले कभी न कभी कांग्रेसी ही थे. कांग्रेस के बागी और निर्दलीय लड़कर जीते मंत्री प्रसाद नैथानी की मुख्यमंत्री पद पर पहली पसंद सतपाल महाराज  या उनकी पत्नी अमृता रावत थीं तो बुजुर्ग विधायक हरीश दुर्गापाल, पूर्व मंत्री इंदिरा हृदयेश को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे. तीसरे निर्दलीय विधायक दिनेश धनै, सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रुप में देखना चाहते थे. उक्रांद विधायक प्रीतम पंवार की पहली पसंद  हरीश रावत थे. ये सभी विधायक मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद बताने के अलावा किसी न किसी बड़े नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखने की शर्त भी थोप रहे थे.

इस बार भी 2002 वाला इतिहास दोहराया गया जब विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज खेमों के विरोध के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे

नौ मार्च को कांग्रेसी नेताओं ने  राज्यपाल के सामने अपने विधायकों, तीन निर्दलीयों और एक उक्रांद विधायक की परेड करवाते हुए सामान्य बहुमत का प्रदर्शन किया. अब झगड़ा मुख्यमंत्री पद के लिए था. 10 मार्च को कांग्रेस के महामंत्री गुलाम नबी आजाद विधायकों की राय जानने के लिए देहरादून आए. विधायक अपने बीच में से मुख्यमंत्री चुने जाने के लिए एकमत थे. विधायकों के अनुसार उन्हें भी यह समझाया गया कि पार्टी सांसदों में से मुख्यमंत्री चुनने की हालत में नहीं है. लेकिन सांसद  हरीश रावत, विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी आसानी से छोड़ने को राजी नहीं थे. उसी दिन सभी खेमों के विधायक और नेता दिल्ली उड़ चले.

विधायकों के दिल्ली पहुंचने पर यह मान लिया गया था कि राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस उपचुनाव लड़ने का जोखिम नहीं उठाएगी. इसलिए दो दिन तक चले नाटकीय घटनाक्रमों में मुख्यमंत्री पद के लिए कभी प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य का नाम उछलता तो कभी इंदिरा हृदयेश, प्रीतम सिंह चौहान, सुरेंद्र सिंह नेगी या हरक सिंह का. सूत्रों के मुताबिक हरीश रावत समर्थक युवा प्रीतम सिंह एक बार सर्वमान्य तो हो रहे थे लेकिन उन पर बात नहीं बनी. 11 मार्च को  हरीश रावत हरिद्वार आए और अपने साथ बसपा के तीन विधायकों को दिल्ली ले उड़े. बसपा ने भी कांग्रेस को समर्थन देना स्वीकार लिया. अब कांग्रेस के पास सामान्य बहुमत के लिए जरूरी संख्या यानी 36 से तीन अधिक विधायक जुट गए थे. बसपा के तीन विधायकों का समर्थन पाने के साथ  हरीश रावत ने मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी तेज कर दी. लेकिन बाकी खेमे उनके विरोध में थे. 12 मार्च को सुबह से 10 जनपथ पर कई दौर की वार्ता चली. सूत्र बताते हैं कि आलाकमान हरीश रावत खेमे का विद्रोही रुख बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था. ऐसे में उसी दिन हमेशा एक-दूसरे के विरोधी रहे सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा खेमे ने आपस में हाथ मिला लिए और कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद ने मुख्यमंत्री के रूप में बहुगुणा के नाम की घोषणा कर दी.

इस बार कांग्रेस के टिकट पर जीते विधायकों में से ज्यादातर मुख्यमंत्री पद के लिए  हरीश रावत या उनकी पसंद के साथ थे.  लेकिन इस बार भी वर्ष 2002 का इतिहास दोहराया गया. तब भी विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज खेमों के विरोध के बाद रावत मुख्यमंत्री पद पाने मंे नाकामयाब रहे थे.

2009 के लोकसभा चुनावों में राज्य की पांचों सीटें कांग्रेेस को जिताने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य ने विधानसभा चुनावों में प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व किया था. जानकारों के मुताबिक दिल्ली की लॉबिंग में यह कमजोर दलित नेता आलाकमान के पैमानों पर फिट नहीं बैठा. हरक सिंह रावत पांच साल तक नेता प्रतिपक्ष के रूप में सड़क से लेकर विधानसभा में संघर्ष करते रहे, लेकिन उनकी आक्रामकता भी मुख्यमंत्री बनने की उनकी कामना को पूरा नहीं कर पाई. गढ़वाल के सांसद सतपाल महाराज खुद या अपनी पत्नी अमृता रावत को मुख्यमंत्री देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें भी किसी और खेमे का समर्थन नहीं मिल पाया. सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री बनने और बनाने के खेल में दो मौकों पर महाराज और  हरीश रावत की तीखी नोक-झोंक हुई. इन सारी स्थितियों का फायदा बहुगुणा ने उठाया जिनके पास अपेक्षाकृत कम संख्या में विधायक थे. उन्हें कांग्रेस के पर्यवेक्षकों की सिफारिश का फायदा मिला.

अब देखना दिलचस्प होगा कि अपने जमाने में राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले एचएन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा किस हुनर से बहुमत साबित करते हैं. 10-11 विधायकों के समर्थन के साथ फिलहाल तो उनकी राह मुश्किल दिखती है.

लाचार सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावों से काफी उम्मीदें लगा रखी थीं. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी और केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल वाले दिनों की शुरुआत कर दी है. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी कि अब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन वाली केंद्र सरकार महीनों और सालों की बजाय हफ्तों के हिसाब से चलने वाली बन गई है. हर तरफ मनमोहन सिंह की सरकार की उम्र को लेकर सवाल उठाए जाने लगे. हालत यह हो गई कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बाहर आकर यह कहना पड़ा कि संप्रग को कोई खतरा नहीं है. इसके बाद कांग्रेस नेता जयंती नटराजन ने भी सोनिया की हां में हां मिलाते हुए यही बात दोहराई.

हालांकि, कांग्रेस प्रमुख और अन्य कांग्रेसी नेता जो कह रहे हैं उसे सच्चाई से मुंह छिपाने के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि अगर सब कुछ ठीक होता तो सोनिया गांधी के बयान के अगले ही दिन केंद्रीय रेल मंत्री और तृणमूल के प्रमुख नेता दिनेश त्रिवेदी इंडियन एक्सप्रेस को यह नहीं कहते कि वे चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव जल्दी हो जाएं क्योंकि ऐसा होने पर तृणमूल की सीटों में बढ़ोतरी होगी. बाद में जब कांग्रेस की तरफ से हो-हल्ला मचा तो त्रिवेदी ने यह कहकर सुलगती चिंगारी पर थोड़ी-सी राख डालने की कोशिश की कि यह उनकी निजी राय है. मगर उनके मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि त्रिवेदी ऐसे नेता नहीं हैं जो सोचे-समझे बिना ऐसा बयान दे दें. कुछ ही दिन पहले राहुल गांधी से मिलने उनके घर चले जाने की वजह से त्रिवेदी को ममता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था. रेल मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस घटना के बाद तो इस बात की संभावना और भी कम हो जाती है कि त्रिवेदी इतना बड़ा बयान बगैर ममता की हरी झंडी के दे दें. इनका कहना है कि मंत्रालय में त्रिवेदी की पहचान ‘दस्तखत मंत्री’ की है और यह इसलिए बनी है कि उन्हें फैसले की मंजूरी कोलकाता से लेनी होती है.

इसका मतलब यह निकलता है कि आने वाले दिनों में तृणमूल का रवैया आक्रामक रहेगा और ऐसे में केंद्र सरकार के लिए कोई भी बड़ा फैसला लेना आसान नहीं होगा. तृणमूल के अलावा और भी क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो लोकसभा चुनावों के लिए 2014 तक का इंतजार नहीं करना चाहती हैं. इनमें जयललिता की एआईएडीएमके, प्रकाश सिंह बादल की शिरोमणि अकाली दल और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी शामिल हैं. ये सभी अपने-अपने राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से उत्साहित हैं और इन्हें उम्मीद है कि यदि लोकसभा चुनाव जल्दी होते हैं तो इनकी सीटें बढ़ेंगी.

भाजपा की ओर से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने चुनाव परिणाम के दिन ही यह संकेत दिया था कि देश में आम चुनाव हो सकते हैं. लेकिन पार्टी सूत्रों की मानें तो जल्दी चुनाव के मसले पर भाजपा दो धड़ों में बंटी है. एक धड़ा वह है जो लालकृष्ण आडवाणी के साथ है. ये लोग और खुद आडवाणी भी चाहते हैं कि जल्दी चुनाव हो जाएं. अगर चुनाव जल्दी होते हैं तो आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना पूरा करने का एक मौका और मिल सकता है. वहीं एक दूसरा धड़ा ऐसा नहीं चाहता है. इसे लगता है कि संप्रग की सरकार जितने दिन और चलेगी उतनी ही ज्यादा इसकी फजीहत होने वाली है. इसके बाद जो चुनाव होंगे उनमें भाजपा और उसके घटक दलों को कहीं अधिक फायदा मिलेगा.

अब मनमोहन सिंह सरकार का भविष्य पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस का राजनीतिक प्रबंधन कैसा रहता है

कांग्रेस और संप्रग सरकार की मुश्किलें कम होती इसलिए भी नहीं लग रही हैं कि तमाम क्षेत्रीय पार्टियां एक नया राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश में जुट गई हैं. इसके केंद्र में उड़ीसा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक हैं. वे अभी न संप्रग में हैं और न ही भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में. उनका साथ आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलगूदेशम पार्टी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू दे रहे हैं. इस कोशिश को ममता बनर्जी और जयललिता का साथ तो मिल ही रहा है, खबर यह भी है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख व केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इस नए विकल्प को खड़ा करने में गुपचुप सहयोग दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश के चुनावों में बेहद मजबूती के साथ उभरे मुलायम सिंह यादव और पंजाब में दोबारा जीतकर वापस सत्ता में लौटे प्रकाश सिंह बादल को भी इससे जोड़ने की कोशिश चल रही है. ममता को शपथ ग्रहण समारोह के लिए बादल और मुलायम द्वारा भेजे गए निमंत्रण को नए राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.

हालांकि, कहा जा रहा है कि नीतीश, बादल और पवार जैसे लोग चुनाव से पहले ऐसे किसी विकल्प में खुले तौर पर शामिल होने से बचेंगे लेकिन चुनाव बाद ये पास आ सकते हैं. इस विकल्प की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार हैं और कांग्रेस यह सोचकर संतुष्ट हो सकती है कि यही टकराव नए विकल्प के बिखराव की वजह बन सकता है.

नीतियों के स्तर पर बड़े फेरबदल की तैयारी मनमोहन सिंह यह सोचकर कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद राज्य में कांग्रेस के समर्थन से समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी जो केंद्र में उन्हें तृणमूल की धमकियों से मुक्ति दिलाएगी. इसी आत्मविश्वास में प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि चुनावों के बाद वे फिर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी दिलाने की कोशिश करेंगे. लेकिन नतीजों ने प्रधानमंत्री के मंसूबे पर पानी फेर दिया.

अब केंद्र सरकार को दिए जा रहे मुलायम सिंह के समर्थन को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, इसलिए तृणमूल पर केंद्र सरकार की निर्भरता और बढ़ गई है.  हालांकि, लालू प्रसाद यादव की बेटी की शादी के मौके पर सोनिया और मुलायम की मौजूदगी को कई जानकार कांग्रेस द्वारा सपा को और करीब लाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘नीतियों के स्तर पर जो ठहराव इस सरकार में आ गया है उसे तोड़ना अब मनमोहन सिंह के लिए बहुत मुश्किल है क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को मिली मजबूती से साफ है कि वे राष्ट्रीय पार्टियों के साथ अपनी शर्तों पर काम करेंगी.’ वरिष्ठ पत्रकार और गठबंधन राजनीति पर चर्चित किताब ‘डिवाइडेड वी स्टैंड’ लिखने वाले परंजय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ‘अब कई उन नीतियों पर भी क्षेत्रीय दल अड़ंगा लगाएंगे जिनको लेकर ऊपरी तौर पर एक सहमति दिख रही थी. इन दलों को यह पता है कि केंद्र सरकार की जितनी अधिक फजीहत होगी चुनावों में उन्हें उतना अधिक फायदा होगा. लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस की कमजोर स्थिति का फायदा ये दल हर मोड़ पर उठाने की कोशिश करेंगे.’

क्षेत्रीय पार्टियों के आक्रामक रवैये के बीच जब भी मनमोहन सिंह सरकार किसी महत्वपूर्ण विधेयक को संसद से पारित करवाना चाहेगी तो उसे विपक्ष का साथ अनिवार्य तौर पर चाहिए होगा. जिस दिन चुनावी नतीजे आ रहे थे उसी दिन राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कह दिया था कि अब संप्रग सरकार विपक्ष के सहयोग के बिना न तो राष्ट्रपति का चुनाव करा सकती है और न ही कोई बड़ा नीतिगत फैसला ले सकती है. संसद के बजट सत्र में ही महत्वपूर्ण 30 विधेयक आने हैं. अभी के सियासी समीकरण में अब विपक्ष के पास यह ताकत आ गई है कि वह किस विधेयक को आगे बढ़ने दे और किसे रोक दे. खाद्य सुरक्षा, लोकपाल और जमीन अधिग्रहण समेत कई ऐसे विधेयक हैं जिन्हें पारित करवाकर कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव की अपनी तैयारियों को मजबूती देना चाहती है. लेकिन इन चुनावी नतीजों के बाद के समीकरण ने देश की सबसे पुरानी पार्टी को इतना लाचार बना दिया है कि उसे अब हर कदम पर विपक्ष की बैसाखी का भी आसरा चाहिए. भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन राजग ने 2जी मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का संसद के अंदर का बहिष्कार खत्म करके कांग्रेस को एक तात्कालिक राहत तो दी है लेकिन जो सियासी समीकरण अभी उभरते दिख रहे हैं उनमें यह कहना मुश्किल है कि विपक्ष द्वारा संप्रग सरकार का सहयोग कितने दिनों तक जारी रहने वाला है.

इन सबके बीच ॔निरजा चौधरी यह मानती हैं कि अगर कांग्रेस अब भी अच्छे राजनीतिक प्रबंधन का परिचय दे तो यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकती है. ‘मायावती राज्य की सत्ता से बाहर हो गई हैं. वैसे वे पहले से भी केंद्र सरकार का समर्थन कर रही हैं लेकिन अगर कांग्रेस के लोग चाहें तो उनके साथ ऐसा संबंध विकसित कर सकते हैं कि नीतिगत मसलों पर वे कांग्रेस का साथ दें. मायावती के लिए भी यह जरूरी है कि अगर वे राज्य की सत्ता से बाहर हो गई हैं तो केंद्र की सत्ता से थोड़ी नजदीकी बढ़ाएं’ चौधरी कहती हैं, ‘अब मनमोहन सिंह सरकार का भविष्य पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस का राजनीतिक प्रबंधन कैसा रहता है.’

कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधन का सबसे बड़ा इम्तहान होने जा रहा है राष्ट्रपति चुनाव में. विधायकों और सांसदों के वोटों के आधार पर होने वाले इन चुनावों में जीत के लिए जरूरी वोट कांग्रेस और संप्रग के पास नहीं हैं. मार्च के आखिरी दिनों में राज्यसभा की जिन 58 सीटों के लिए चुनाव होना है उनमें कांग्रेस की सीटें घट रही हैं तो केंद्र सरकार के लिए खतरा बने तृणमूल और सपा की सीटें बढ़ रही हैं. ऐसे में प्रतिभा पाटिल की तरह अपनी पसंद का राष्ट्रपति नियुक्त करना कांग्रेस के लिए असंभव सरीखा है. इस चुनाव के कुल 10.98 लाख वोटों में से कांग्रेस के पास महज 30.7 फीसदी वोट हैं. इनमें संप्रग के सहयोगी दलों को जोड़ें तो यह आंकड़ा 40 फीसदी के पास पहुंचता है. यानी कांग्रेस को कोई ऐसा उम्मीदवार तलाशना होगा जिस पर आम सहमति बने या फिर जिसका विरोध करना राजनीतिक तौर पर आसान नहीं हो. इसके तुरंत बाद उपराष्ट्रपति चुनाव होना है जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद भाग लेते हैं. इसमें एक बार फिर कांग्रेस को अपने सारे दांव आजमाने पड़ सकते हैं.

किले में ढेर कांग्रेस

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने 200 के करीब रैलियां कीं. इनमें से कई में उन्होंने कहा कि हम यहां जीतने नहीं बल्कि बदलाव करने आए हैं. उनके और उनकी मां के संसदीय क्षेत्र अमेठी और रायबरेली की जनता को शायद उनका यह कहना खूब भाया. नतीजा यह रहा कि यहां की दस में से दो सीटें ही कांग्रेस के खाते में आ सकीं. बाकी की सात सीटें समाजवादी पार्टी और एक पीस पार्टी के हिस्से में चली गई. 2007 के विधानसभा चुनाव में दोनों जगहों को मिला कर कांग्रेस के खाते में सात सीटें आई थीं. यानी अपने ही गढ़ में राहुल और सोनिया को इस बार पिछली बार के मुकाबले पांच सीटों का नुकसान उठाना पड़ा.

बात शुरू करते हैं कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के लोकसभा क्षेत्र रायबरेली से. यहां की पांच में से चार सीटों – सरेनी, उंचाहार, बछरावां और हरचंदपुर – पर 2007 के चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी विजयी हुए थे. लेकिन 2012 में कांग्रेस ये चारों जीती हुई सीटें हार गई है. इन सभी सीटों पर कांग्रेस एक साथ क्यों हारी, इसका जो जवाब हारे हुए प्रत्याशी देते हैं उससे लगता है कि कहीं न कहीं कमी नेतृत्व करने वाले शीर्ष नेताओं में ही थी.

हरचंदपुर सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे शिव गणेश लोधी, क्यों हारे, यह सवाल सुनते ही बिगड़ जाते हैं. उनके निशाने पर सीधे स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी और पार्टी का संगठन आता है. लोधी कहते हैं, ‘पूरे प्रदेश में कांग्रेस की हार का कारण सपा का घोषणा पत्र था जिसमें सरकार बनने पर युवाओं को लैपटॉप, बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता, किसानों को कर्ज माफी जैसे लुभावने वादे किए गए थे. जबकि हमारी पार्टी ने हमें कोई घोषणा पत्र दिया ही नहीं था. आखिर जनता सोनिया जी, राहुल जी और प्रियंका का चेहरा देख कर कब तक वोट देगी.’ प्रियंका सहित राहुल व सोनिया के भाषणों को भी लोधी कांग्रेसियों की हार का सबसे बड़ा कारण मानते हैं. चुनाव प्रचार के समय प्रियंका की एक सभा का उदाहरण देते हुए लोधी बताते हैं कि जो बात प्रियंका को रायबरेली सदर के बाहुबली विधायक व पीस पार्टी के प्रत्याशी अखिलेश सिंह के लिए सदर सीट पर बोलनी थी वह उन्होंने हरचंदपुर की जनता के सामने बोल दी. इसके अतिरिक्त सपा में पहले से ही साफ था कि मुलायम सिंह यादव या अखिलेश ही मुख्यमंत्रीं बनेंगे जिसके आधार पर उन्हें अच्छा ओबीसी वोट मिला. जबकि कांग्रेस में ऐसा कुछ नहीं था.

बछरावां सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे राजाराम त्यागी का दर्द भी लोधी जैसा ही है. त्यागी अपनी हार का ठीकरा संगठन व नेतृत्व पर फोड़ते हुए कहते हैं कि रायबरेली में 20 साल से संगठन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है. जो लोग संगठन में हैं वे इसे अपनी बपौती और अपने कद को इतना ऊंचा मानते हैं कि आम लोगों से मिलना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. सपा के घोषणा पत्र को त्यागी भी लुभावना बताते हैं जिससे युवाओं का रूझान सपा की ओर अधिक रहा. सपा के वादों के बाद अकेले रायबरेली में 29 हजार से अधिक युवाओं ने रोजगार कार्यालय में इस उम्मीद से पंजीकरण कराया कि रोजगार न भी मिला तो कम से कम बेरोजगारी भत्ता तो मिलेगा.

पार्टी के अन्य बड़े नेताओं के साथ ही गांधी परिवार के खास समझे जाने वाले तथा अमेठी व रायबरेली के प्रभारी केएल शर्मा पर भी हार के बाद उंगलियां उठाई जाने लगी हैं. राहुल गांधी की अमेठी लोकसभा की पांच में से तीन सीटें कांग्रेस हार चुकी है. इनमें सबसे प्रतिष्ठित समझी जाने वाली अमेठी विधानसभा से पिछले तीन बार से सुल्तानपुर के सांसद संजय सिंह की पत्नी रानी अमिता सिंह चुनाव जीत रही थीं. तहलका से बात करते हुए अमिता सिंह भी इशारों-इशारों में हार की एक बड़ी वजह केएल शर्मा को ठहराते हुए कहती हैं, ‘अमेठी कांग्रेस का गढ़ है. ऐसे में यहां का नेतृत्व बाहर से आयातित किसी व्यक्ति को सौंपना आखिर कहां की समझदारी है. क्या जो राजपरिवार गांधी परिवार के लिए समर्पित है उस पर इतना भरोसा नहीं कि वह अपनी जनता का नेतृत्व ठीक से कर सकेगा.’ यहां बताना जरूरी है कि केएल शर्मा को गांधी परिवार ने पंजाब से लाकर अमेठी व रायबरेली का नेतृत्व दिया है. अमिता आगे कहती हैं, ‘अब समय आ गया है कि इस बात पर चिंतन व मंथन किया जाए कि मेरे चुनाव में ऐसे लोग जो बाहर से आकर संगठन का काम देख रहे हैं, उनका रोल कैसा रहा है.’

बताते हैं कि जिन केएल शर्मा के जिम्मे सोनिया ने रायबरेली को सौंपा था वे कार्यकर्ताओं को उनसे मिलने ही नहीं देते थे

अमिता सिंह भले ही केएल शर्मा का नाम दबी जुबान से ले रही हों लेकिन उनकी अमेठी स्थित कोठी में मौजूद समर्थक बृजेश प्रताप सिंह खुल कर शर्मा और उनके करीबी पदाधिकारियों पर आरोप लगाते हैं. अपनी बात के समर्थन में कुछ आंकड़े रखते हुए वे कहते हैं, ‘पीसीसी सदस्य नरेंद्र मिश्रा के बूथ पर कांग्रेस को मात्र 87 वोट मिले हैं जबकि सपा को वहां से 200 वोट मिले हैं. इसी तरह पीसीसी सदस्यों देव नारायण वर्मा और राम अधार पासी के बूथों पर भी कांग्रेस को 75 व 243 वोट मिले हैं जबकि सपा को यहां 240 व 341 वोट मिले हैं. संग्रामपुर ब्लाक के अध्यक्ष व पीसीसी सदस्य राजीव सिंह के बूथ की स्थिति भी ऐसी ही थी जहां कांग्रेस को महज 100 वोटों से ही संतोष करना पड़ा, जबकि सपा को 332 वोट मिल गए थे. हद तो तब हो गई जब अमेठी के जिला अध्यक्ष प्रेम नारायण मिश्र के बूथ संख्या 78 पर कांग्रेस को 98 वोट जबकि बसपा को 99 वोट मिले हैं.’

शर्मा पर आरोप सिर्फ राजघराने की चारदीवारी के भीतर ही नहीं लग रहे बल्कि संग्रामपुर बलॉक निवासी हंसराज सिंह तो यहां तक बोलते हैं कि राजा संजय सिंह और रानी अमिता सिंह का कद पार्टी में केएल शर्मा को काफी दिनों से खटक रहा था लिहाजा विधानसभा चुनाव में राजघराने की हार के माध्यम से इस परिवार के वर्चस्व को कम करने का काम किया गया है. अमेठी निवासी अब्दुल रशीद खां कहते हैं, ‘यदि अमेठी की जनता कांग्रेस प्रत्याशी से नाराज होती तो 50 हजार वोट भी उनको न मिलते. जीत हार का जो आंकड़ा मात्र आठ हजार का है वह साबित करता है कि कहीं न कहीं कुचक्र रचा गया है.’ अब्दुल रशीद के गुस्से का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वे लोकसभा चुनाव में अपनी कांग्रेस पार्टी को ही सबक सिखाने की ठाने बैठे हैं. वे कहते हैं, ‘संगठन के लोगों ने जो खिलाफत विधानसभा चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी के लिए की है वही खिलाफत हम 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के लिए करेंगे.’

केएल शर्मा के प्रति नाराजगी रायबरेली की आम जनता में भी देखने को मिलती है. स्वतंत्र पत्रकार भालेंदु मिश्र जिले की चार सीटों पर कांग्रेस की हार व सपा की जीत का श्रेय कांग्रेस पार्टी को ही देते हैं. कुछ देर की बातचीत के बाद वे खुल कर बताते हैं कि सपा का घोषणा पत्र तो स्थानीय कांग्रेसियों के लिए एक बहाना भर है. हार का मुख्य कारण राहुल व सोनिया के वे प्रभारी हैं जो स्थानीय लोगों के साथ हिटलर जैसा व्यवहार करते हैं. मिश्र की इन बातों का समर्थन कुंवर प्रताप सिंह भी करते हैं. सिंह के मुताबिक जिन केएल शर्मा के जिम्मे सोनिया जी ने रायबरेली को सौंपा था वे कभी कार्यकर्ताओं को सोनिया से मिलने ही नहीं देते थे. रायबरेली की जनता के विकास के लिए लालगंज में एक रेलकोच कारखाना बनाया गया है. लेकिन आसपास के करीब एक दर्जन गांवों के जिन किसानों की जमीन कारखाने के लिए अधिगृहीत की गई उनके परिवार वालों को अभी तक इसमें नौकरी नहीं मिली है. तौधापुर के पप्पू त्रिवेदी हों या खैरानी गांव के बद्री. सभी पिछले साल से ही इस बात को लेकर नाराज थे कि सोनिया या राहुल गांधी अमेठी या रायबरेली में जहां भी गए स्थानीय नेताओं ने लोगों को उनसे मिलने ही नहीं दिया.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी रहे रायबरेली के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष आरपी सिंह को चुनाव के बाद हाल ही में पार्टी से निकाल दिया गया. पार्टी ने उन्हें किस लिए निकाला खुद सिंह को भी नहीं पता. वे बताते हैं, ‘निकाले जाने के संबंध में न तो कोई पत्र आया न ही नोटिस. अखबार में पढ़ कर पता चला कि मैं पार्टी में नहीं हूं.’ पुराने कांग्रेसियों में यह हाल सिर्फ आरपी सिंह का ही नहीं है. रोखा विधानसभा क्षेत्र, जो कि अब सलोम में मिल गया है, वहां से चार बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे राम प्रसाद धोबी के पुत्र राम नरेश बताते हैं कि लगता है अब हम लोग पार्टी के लिए अछूत हो गए हैं. आजादी के पहले से ही कांग्रेस के लिए जी जान एक करने वाले परिवारों को अब रायबरेली में कोई पूछता तक नहीं. पार्टी की लाख उपेक्षा के बाद भी ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो पार्टी से जुड़े तो हैं लेकिन उनको न कोई जिम्मेदारी दी गई है और न ही संगठन में कोई स्थान. राम नरेश केएल शर्मा का नाम लिए बिना कहते हैं कि पार्टी का सारा दारोमदार उसी चेहरे पर टिका है जिसे सोनिया व राहुल गांधी ने यहां भेज कर जिम्मेदारी दी है.

कभी कांग्रेस का गढ़ रहे सुल्तानपुर की स्थिति भी काफी बदतर है. पांच सीटों वाले इस लोकसभा क्षेत्र  में कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई है. अमेठी लोकसभा से सटी सुल्तानपुर की इसौली विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने अपने पुराने नेता मुईद अहमद को इस वजह से टिकट दिया कि परिसीमन के बाद इस क्षेत्र में नए मुसलिम वोट जुड़ गए थे. लेकिन मुईद का करिश्मा मुसलिम मतदाताओं पर ही नहीं चला. इसौली की जनता ने सपा से खड़े दूसरे मुसलिम प्रत्याशी अबरार के सिर जीत का सेहरा बांध दिया. करीब 96 हजार मुसलिम आबादी वाली इसौली विधानसभा के अलीगंज बाजार के मोहम्मद अशफाक खान कहते हैं, ‘कांग्रेस का प्रत्याशी भले ही मुसलिम था लेकिन उसका अधिकांश समय लखनऊ में ही बीतता है. जबकि अबरार हर वक्त अपने गांव अंझुई में ही मौजूद रहते हैं. ऐसे में इनसे मिलकर अपनी समस्या का समाधान कराना आसान होगा.’

मशीन मरम्मत मांगती है

उत्तर प्रदेश में छह मार्च को मतगणना के साथ शुरू हुई जनादेश की सुनामी ने मायावती को तो सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखा ही दिया मगर इसने राज्य में सत्ता के केंद्र रहे सचिवालय (पंचम तल) के तिलिस्म को भी भरभरा कर ध्वस्त कर दिया है. पूरे पांच साल तक पंचम तल उत्तर प्रदेश पर निरंकुश राज करता रहा है. अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका तानाशाह चरित्र समाजवाद की बौछार में धुल कर साफ हो जाए.

उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार को किस तरह का जनादेश मिलने जा रहा है इसकी आहट तो करीब दो महीने पहले तब ही मिल गई थी जब पंचम तल में मौजूद मायावती के सारे सिपहसालारों ने उत्तर प्रदेश से दिल्ली जाने के लिए राज्य सरकार की स्वीकृति हासिल कर ली थी. चूहे जिस तरह जहाज डूबने से पहले भाग खड़े होते हैं उसी तरह उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार के डूबते भविष्य की सुगबुगाहट लगते ही पंचम तल में भी भगदड़ शुरू हो गई थी.

मायावती का पिछला कार्यकाल कई कारणों से याद किया जाएगा और उनमें से एक बड़ा कारण पंचम तल भी होगा. उत्तर प्रदेश में सचिवालय एनेक्सी के नाम से पहचाने जाने वाले सचिवालय में पांचवें तल पर मुख्यमंत्री के दफ्तर में मायावती अपने पिछले कार्यकाल में मुश्किल से तीन-चार बार ही पहुंची थीं. इस पूरे दौर में प्रमुख रूप से कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ही एक तरह से सरकार और मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते रहे. मुख्यमंत्री की कोर टीम के कई अन्य अधिकारी भी पंचम तल के बादशाह बन कर सरकार का काम-काज चलाते रहे. सारी शक्तियां इन्हीं लोगों के हाथों में थीं.

इस दौर में पंचम तल की स्थिति ऐसी थी कि बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के विधायकों और माया सरकार के मंत्रियों को भी शशांक शेखर सिंह से मुलाकात करने के लिए इंतजार करना पड़ता था. पंचम तल के अधिकारी जो चाहते थे वही होता रहा. न विधायकों की बात सुनी जाती थी, न ही मंत्रियों की और आम आदमी के लिए तो पंचम तल तक पहुंचने की बात सोचना भी गुनाह जैसा था.

पंचम तल में शशांक शेखर सिंह की तूती इस कदर बोलती थी कि उत्तर प्रदेश के तमाम वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी उनके सामने नतमस्तक रहते थे. आईएएस न होते हुए भी उन्होंने उत्तर प्रदेश की सबसे ताकतवर नौकरशाही को अपने सामने बौना बना कर रखा हुआ था. हालांकि खुद उनकी नियुक्ति हमेशा विवादों में रही, लेकिन उनका इतना खौफ था कि उत्तर प्रदेश आईएएस एसोसिएशन भी उनके खिलाफ कोई कानूनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाई. उनके खिलाफ जो जनहित याचिकाएं दर्ज की गई थीं वे या तो बगैर किसी सुनवाई के या बीच में ही वापस ले ली गईं. ये याचिकाएं कानूनी दांव-पेंचों में ही फंसी रह गईं. इन्हें किसी अंजाम तक नहीं पहुंचाया गया.

बीएसपी विधायकों को भी उनसे हमेशा ढेरों शिकायतें रहीं, लेकिन फिर भी मायावती के ‘सबसे खास’ बने रहने की वजह से उनके अधिकार को कोई चुनौती नहीं मिल सकी. करीब चार साल तक उत्तर प्रदेश में अपना राज चलाने के बाद जब उन्हें माया सरकार की नैया डूबती नजर आने लगी तो उन्होंने नई सरकार आने से पहले ही स्वेच्छा से समय पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली. यानी नई सरकार के आते ही उन पर कोई गाज न गिरे उससे पहले ही वे पंचम तल से दबे पांव रुख्सत हो गए. मायावती की कृपा से एक बार सेवा का विस्तार पा चुके शशांक को 31 मार्च, 2012 को रिटायर होना था, लेकिन उन्होंने अपनी फजीहत की आशंका से नौ मार्च को ही चुपचाप पंचम तल से विदाई ले ली.

उम्मीद है कि अखिलेश ‘चेहरा पसंद’ नीति को खत्म करके सरकार के कार्य और योजनाओं के लिए समर्पित अधिकारियों को तैनात करने की नीति को अमल में लाना पसंद करेंगे

इस कवायद में वे अकेले नहीं हैं. पंचम तल से पहले ही खिसक जाने की कोशिश करने वालों में मायावती के खास दुर्गाशंकर मिश्र, रवींद्र सिंह और मुख्य सचिव अनूप मिश्र को भी केंद्र सरकार की सेवा में प्रतिनियुक्ति के लिए राज्य सरकार की हरी झंडी मिल चुकी है और इन अधिकारियों का केंद्र में जाना तय है. एक और चर्चित अधिकारी फतेह बहादुर भी इसी लाइन में हैं, यानी पंचम तल का पाप अब खुद-ब-खुद साफ होने लगा है.

लेकिन समाजवादी पार्टी और अखिलेश की चुनौतियों का सिलसिला भी यहीं से शुरू होता है. मनपसंद अधिकारियों को चुनने की आजादी तो उनके पास है मगर जैसा उन्होंने खुद कहा है कि प्रशासन में ईमानदार अधिकारियों को तरजीह दी जाएगी तो उन्हें अपनी टीम बनाने में बहुत सावधानी रखनी होगी. उनके पिता के मुख्यमंत्री रहते हुए पिछले कार्यकाल में उनके कुछ चहेते अधिकारियों ने समाजवादी पार्टी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा की थीं. यह माना जा रहा है कि अखिलेश इन सब विवादों से बचने का प्रयास करेंगे.

दरअसल उत्तर प्रदेश का हालिया समय देखा जाए तो हम पाते हैं कि यहां नौकरशाही सरकार की मशीनरी होने की बजाय पार्टी की मशीनरी के तौर पर काम करने लगी है. इस कारण हर बार सत्ता बदलते ही अधिकारियों के चेहरे बदल जाते हैं. पुराने चेहरों को कहीं किनारे कर दिया जाता है और उनकी जगह पार्टी या सरकार की सुविधा से काम करने वाले अधिकारियों की तैनाती हो जाती है. लेकिन अब यह उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश इस ‘चेहरा पसंद’ नीति को खत्म करके सरकार के कार्य और योजनाओं के लिए समर्पित अधिकारियों को तैनात करने की नीति को अमल में लाना पसंद करेंगे.

यह तय है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने जो भरोसा उनमें दिखाया है उसे कायम रखने के अखिलेश के सारे प्रयासों की सफलता में नौकरशाही की सबसे अहम भूमिका होगी. नए निजाम में न सिर्फ पंचम तल का चेहरा बदलेगा बल्कि नौकरशाही की कार्य संस्कृति में भी व्यापक स्तर पर बदलाव आने की उम्मीद की जा रही है.

अखिलेश की सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश में गुंडाराज की वापसी की आशंका है. उन्होंने अब तक लगातार यही कहा है कि गुंडागर्दी किसी भी हालत में सहन नहीं की जाएगी. चाहे कोई व्यक्ति पार्टी में कितने भी महत्वपूर्ण पदों पर क्यों न हो अगर वह गुंडागर्दी करेगा तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक ही कार्रवाई होगी. पार्टी के लोगों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे इस तरह का कोई काम न करें और न ही होने दें. यहां यह भी गौरतलब है कि राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई होने पर उन्हें येन केन प्रकारेण छुड़ा लेने के राजनीतिक प्रयास भी शुरू हो जाते हैं. नई सरकार में ऐसा नहीं होगा यह यकीन तो किया जा सकता है लेकिन अपराध नियंत्रण के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की क्षमताएं हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही हैं.

राज्य में पुलिस का मनोबल तो कमजोर है ही, संख्या और संसाधनों की भी उसके पास भारी कमी है. उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में पुलिस के ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन के बिना किसी भी सरकार के लिए अपराध पर नियंत्रण करना संभव नहीं है. वे कहते हैं, ‘चूंकि अखिलेश युवा हैं, उनकी सोच में दूरदर्शिता दिखती है, इसलिए हमें उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पुलिस सुधार शुरू हो जाएंगे और प्रदेश की पुलिस सरकार तथा जनता दोनों की ही अपेक्षाओं पर खरी उतरने के काबिल बन जाएगी.’

उत्तर प्रदेश में अखिलेश की उम्मीदों की साइकिल लंबे समय तक दौड़ती रहे, इसके लिए प्रदेश की नौकरशाही और पुलिस दोनों की चाल, चेहरा और चरित्र बदलना जरूरी है. फिलहाल प्रदेश की जनता इन्हीं उम्मीदों के सपनों में जी रही है.

एमपी, यूपी या उमा भारतीय!

भाजपा में वापसी के बाद जब उमा भारती को उत्तर प्रदेश भेजा गया तब किसी को भी यह भ्रम नहीं था कि वे वहां जाकर क्रांति करने वाली हैं. भाजपा और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी समेत खुद उमा भारती भी जानती थीं कि पार्टी में वापसी के बाद यूपी में उन्हें मिली पहली पोस्टिंग का क्या मतलब है. खैर, कार्यकर्ता, संगठन और नेतृत्व विहीन या कहें मरणासन्न प्रदेश भाजपा के साथ उन्होंने काम किया. नतीजा सामने है. पार्टी बुरी तरह चुनाव हार चुकी है. 2007 के मुकाबले न सिर्फ उसे चार सीटें कम मिली हैं बल्कि वोट प्रतिशत में भी कमी आई है. हां, उमा चरखारी विधानसभा से अपनी सीट जीतने में कामयाब हुईं. अब फिर से वही यक्ष प्रश्न सामने है कि उमा भारती का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा.

अगर उमा भारती के गृह प्रदेश की बात करें तो 2003 के मध्य प्रदेश और अब के मध्य प्रदेश में बहुत परिवर्तन आ गया है. वहां अब प्रदेश भाजपा में बहुत कम ऐसे लोग बचे हैं जो साल 2003 के उस वक्त को याद करना चाहते हैं जब उमा ने राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह को चुनावी दंगल में धूल चटाई थी. उनके जो थोड़े-बहुत शुभचिंतक यहां हैं भी उनकी स्थिति बेहद कमजोर है.

उमा इस बात को जानती हैं कि वापसी के समय जिन शर्तों को उन्होंने स्वीकार किया उनमें सबसे बड़ी यही थी कि वे मध्य प्रदेश की राजनीति से दूर रहेंगी. ऐसे में एक चीज स्पष्ट है कि भले ही उमा की और कहीं कोई भूमिका निकल सकती हो लेकिन मध्य प्रदेश के राजनीतिक कपाट उनके लिए बंद हो चुके हैं. यहां के भाजपा नेताओं ने उमा की वापसी का सबसे ज्यादा विरोध किया था. उन्हें डर था कि वापसी के बाद प्रदेश के मामलों में उमा हस्तक्षेप जरूर करेंगी.

यह भी रोचक तथ्य है कि जैसे ही उमा को बुंदेलखंड के चरखारी से विधानसभा का टिकट दिया गया उमा से ज्यादा खुशी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य नेताओं को हुई. इससे वे आश्वस्त हो गए कि उमा अब उत्तर प्रदेश में ही रहने वाली हैं. यही कारण है कि जो उमा शिवराज सिंह चौहान पर कभी बच्चा चोर होने का आरोप लगाती थीं वही कुछ समय बाद उनके गले लगते दिखाई दीं. और जिन उमा को शिवराज अपनी राजनीति के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे उन्हीं को चुनाव जितवाने की अपील वे चरखारी की जनता से करते हुए नजर आए. शिवराज को उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत या हार से उतना मतलब नहीं था जितना कि चरखारी में उमा की जीत से था क्योंकि ऐसा होने पर उनके वापस मध्य प्रदेश जाने की आशंका कुछ और कम हो जाती.

जानकारों का मानना है कि उमा इस बात को अच्छी तरह समझ चुकी हैं कि मध्य प्रदेश में अब उनके लिए कोई राजनीतिक जमीन बची नहीं है और राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं के बीच ऐसे ही पद और वर्चस्व को लेकर सिर-फुटौव्वल मची हुई है. उमा के एक अत्यंत करीबी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘देखिए, दीदी जानती हैं कि उनके पास विकल्प नहीं है. मध्य प्रदेश वे जा नहीं सकती. केंद्र में अभी न कोई जगह है न ही पार्टी के कई नेता उन्हें वहां देखना चाहते हैं ऐसे में उनके लिए यूपी ही एकमात्र विकल्प बचता है.’

कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि उमा आगे क्या करेंगी, पार्टी में उन्हें क्या नई जिम्मेदारी मिलेगी, उनकी राजनीतिक हैसियत कितनी कमजोर या मजबूत होगी यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि नितिन गडकरी की स्थिति आने वाले समय में कैसी रहती है. तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए पार्टी में उन्हें वापस लाने वाले गडकरी अगर कमजोर होते हैं तो उमा की राजनीतिक यात्रा में जबरदस्त मुश्किलें पेश आने वाली हैं.

राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि खुद को स्थापित करने और खोई हैसियत पाने के साथ ही पार्टी को स्थापित करने के लिए भी यह जरूरी है कि उमा उत्तर प्रदेश में रहकर काम करें क्योंकि वर्तमान चुनाव परिणामों ने बता दिया है कि जब तक दिल दिल्ली में लगा रहेगा तब तक उत्तर प्रदेश में जीत नामुमकिन है. उमा ने भी जीत के बाद पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा है कि वे यूपी में ही काम करना चाहेंगी, उनकी नई पहचान उत्तर प्रदेश के चरखारी की विधायक के तौर पर है और वे इससे बहुत खुश हैं. अब देखने वाली बात यह होगी कि जो व्यक्ति विधानसभा में सबसे पहली पंक्ति के सबसे पहले स्थान पर कभी बैठा हो वह 403 लोगों की भीड़ में किसी कोने में बैठा कैसा महसूस करेगा. मगर पिछले सात-आठ साल में उमा इससे कहीं ज्यादा अजीबोगरीब और बुरा एक नहीं बल्कि कई-कई बार देख चुकी हैं.

प्रश्नों से घिरे परीक्षण

हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर में वैध दवा परीक्षण (ड्रग ट्रायल) के मामले उजागर होने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2010 में दवा परीक्षण के दौरान 22 लोगों की मौत हुई. आर्थिक अपराध शाखा की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008 से 2010 तक कुल 81 लोगों की दवा परीक्षण के दौरान मौत हुई. इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों ने चिकित्सा की आड़ में चल रहे इस जानलेवा और आपराधिक खेल पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

इस घटना ने यह भी उजागर कर दिया है कि हिंदी पट्टी में इंदौर दवा परीक्षण के एक हब के रूप में वर्षों से सक्रिय है. प्रदेश विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने माना था कि यहां 2010 तक 2365 मरीजों पर दवाओं के परीक्षण हुए जिनमें 1644 तो बच्चे थे. इसी तरह संसद में एक सवाल के उत्तर में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने माना कि एलोपैथिक दवा परीक्षण के दौरान देश में 2008 में 288, 2009 में 637 तथा जून 2010 तक के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 597 मौतें हो चुकी थीं.

इंदौर अवैध दवा परीक्षण कांड ने चिकित्सकों की नैतिकता और चिकित्सा व्यवस्था की पवित्रता पर फिर से बहस छेड़ दी है. दवा परीक्षण की अहम शर्तों में नैतिक समितियों का गठन जरूरी माना जाता है. इंदौर में भी यह समिति सक्रिय है. लेकिन समाज के प्रतिष्ठित एवं प्रबुद्ध वर्ग के प्रतिनिधियों वाली यह समिति इस अवैध दवा परीक्षण पर मौन रही और सैकड़ों निरीह मरीज एक-एक कर मरते रहे. विडंबना देखिए  कि इस नैतिक समिति से जुड़ा एक चिकित्सक स्वयं अवैध परीक्षण में लिप्त था.

दवा परीक्षण की एक और अनिवार्य शर्त है, परीक्षण और अध्ययन का प्रतिष्ठित शोध पत्रिका में प्रकाशन तथा परीक्षण के लिए प्राप्त राशि और इसके स्रोत का सार्वजनीकरण. इंदौर मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ. खबर है कि मध्य प्रदेश के 95 फीसदी चिकित्सकों (जो वैध या अवैध दवा परीक्षण में शामिल हैं) ने न तो परीक्षण के नतीजे किसी शोध पत्रिका में प्रकाशित कराए हैं और न ही प्राप्त धन की राशि व इसके स्रोत सार्वजनिक किए हैं. दवा परीक्षण में शामिल मरीजों का जीवन बीमा भी कराना अनिवार्य है, लेकिन इंदौर के धन पिपासु चिकित्सकों ने ऐसा भी नहीं किया. गोपनीयता की आड़ लेकर मरीजों के ये ‘दूसरे भगवान’ उनकी जान से खेलते रहे, लेकिन न तो सरकार और न ही समाज ने समय पर इसका संज्ञान लिया.

दुनिया में दवा परीक्षण की शुरुआत सन 1747 में हुई जब डॉ जेम्सलिंड ने कुछ सैनिकों पर यह अध्ययन किया कि खट्टे-मीठे फल खाने वाले सैनिकों को स्कर्वी रोग नहीं होता. बाद में दवा परीक्षण की जरूरत जब बढ़ने लगी तो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक संस्था कांट्रेक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (सीआरओ) बनी. इस संगठन की मदद से कई कंपनियां मनमर्जी के मानदंड तय करके अपने फायदे के लिए दवा परीक्षण करने लगीं. विडंबना देखिए कि अमीर एवं विकसित देशों की बड़ी कंपनियां नई एलोपैथिक दवाओं का अविष्कार तो अमेरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि में करती हैं लेकिन दवाओं का परीक्षण अफ्रीका के देश, भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, भूटान आदि गरीब व अल्पविकसित देश के नागरिकों पर करती हैं.

तेजी से बढ़ती कथित आधुनिकता और झटपट विकास के मंसूबे पाले नवउदारवादी समाज के लोग सेहत के लिए अब प्रकृति की बजाय अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हैं. इस ताबड़तोड़ विकास ने लोगों को कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा धन बटोरने का जो नुस्खा दे दिया है, आधुनिक चिकित्सकों का एक वर्ग उससे खासा प्रभावित है. इसके लिये वह पेशागत नैतिकता को भी भुलाकर हर वैध-अवैध कार्य करने को तैयार है. अनुमान है कि एक मरीज पर दवा के परीक्षण के लिये चिकित्सकों को दो से पांच लाख रुपये तक मिल जाते हैं. इसके लिये उसे थोड़ा बेईमान, बेशर्म और नीच बनना पड़ता है जो आज के दौर में बिल्कुल सहज है. बताते हैं कि दवा परीक्षण का धंधा इन दिनों 1500 करोड़ रुपये का है जो तेजी से फल-फूल रहा है और इस वर्ष के अंत तक इसके 2700 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है. यह भी खबर है कि इन दिनों भारत में लगभग 2000 विभिन्न प्रकार की दवाओं के परीक्षण चल रहे हैं. इनमें अधिकांश दवाएं ‘खतरनाक’ हैं. हालांकि भारत सरकार ने 2005 में ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन कर ड्रग ट्रायल के नये मानदंड निर्धारित किए हैं, लेकिन लालच में फंसे चिकित्सकों, कानून के रखवालों और पर्यवेक्षकों की मिलीभगत से ‘धंधा’ बेखौफ जारी है. इंदौर का दवा परीक्षण कांड इसकी गवाही दे रहा है जहां अवैध दवा परीक्षक  चिकित्सकों ने महज ‘पांच हजार’ रुपये में इन मासूम रोगियों का जीवन तबाह कर दिया. उल्लेखनीय है कि दोषी चिकित्सकों पर मात्र पांच हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया गया है.

व्यापक जनहित में दवा परीक्षण जरूरी होते हैं, लेकिन उसके कुछ उसूल व कायदे हैं. मरीजों के लिए ‘भगवान’ का दर्जा प्राप्त चिकित्सकों को यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि डॉ एडवर्ड जेनर ने खसरे के टीके का आविष्कार करने के बाद उसका पहला परीक्षण अपने बेटे पर किया था और फिर उसे अपने रिश्तेदार मरीजों और अन्य लोगों को दिया. दवा परीक्षण की इस नैतिक मिसाल को क्या हम चिकित्सक याद रख सकेंगे?

(लेखक जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं)

वैचारिक आस्था के स्तंभ थे डॉ राममनोहर लोहिया

डॉक्टर राममनोहर लोहिया का व्यक्तित्व बहुआयामी था और भारत की सांस्कृतिक चेतना पर उनके विचारों की छाप गहरी थी. स्त्री-पुरुष संबंध, जाति व्यवस्था, भारतीय भाषाओं और कला व जीवन को प्रभावित करने वाले मिथकीय आदर्श पुरुषों राम, कृष्ण और शिव से संबंधित सामाजिक चेतना को उन्होंने अपनी विशिष्ट दृष्टि से आलोकित किया. जो मिथक अपने पारंपरिक रूप में जड़ हो गए थे वे लोहिया के स्पर्श से फिर स्पंदित होकर सामाजिक जीवन के लिए सार्थक बनते दिखाई दिए. खास तौर से राम एक मर्यादापुरुष के रूप में राजनीति में छीजती हुई मर्यादाओं को फिर से जागृत करने की मांग करने लगे. लौकिक जीवन को संवारने-बनाने में मिथकों की बड़ी भूमिका होती है और लोहिया ने राम के मर्यादित व्यक्तित्व को इसी दृष्टि से उजागर किया.

लोहिया खुद से और अपने अनुयायियों से भी नीति और कार्य में कुछ कठोर मर्यादाओं के पालन की अपेक्षा रखते थे. 1956 में उनकी नवगठित सोशलिस्ट पार्टी ने बिहार में कुछ मांगों को लेकर आंदोलन शुरू किया था. आंदोलन के संचालन में लोहिया की गहरी रुचि थी. इसमें बिहार भर में सरकारी प्रतिष्ठानों के सामने सविनय अवज्ञा से गिरफ्तारी देने का कार्यक्रम था. लोहिया ने पाया कि आंदोलन रस्मी बनता जा रहा है और सरकार आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने की बजाय नजरअंदाज कर रही है. यह देखकर उन्होंने आंदोलनकारियों को संदेश दिया कि उनको अपनी अवज्ञा में ऐसी दृढ़ता दिखानी चाहिए कि सरकार को उन्हें या तो जेल भेजना पड़े या अस्पताल. इसके बाद अवज्ञा की दृढ़ता का ऐसा असर हुआ कि अनेक जगह आंदोलनकारियों पर बर्बर प्रहार हुए और उन्हें गिरफ्तार किया जाने लगा. अनेक लोग घायल अवस्था में अस्पताल भेजे गए. इस आंदोलन के क्रम में लगभग छह हजार लोग गिरफ्तार किये गए.

लोकतांत्रिक राजनीति में मर्यादा का महत्व सर्वोपरि है. यह शासक और शासित दोनों को बांधती है. मर्यादा के अभाव में शासक स्वेच्छाचारी और लोकतंत्र अनियंत्रित भीड़तंत्र में बदल जाता है. वर्तमान परिदृश्य में इसके अभाव का नतीजा भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में देखा जा सकता है. राम से जुड़े मिथक से लोहिया ने भारत के लोकतंत्र को मर्यादा में बंधे रहने का गंभीर संदेश दिया था. शासकीय उच्छृंखलता के इसी पक्ष को लोहिया ने संसार में उजागर किया जब उन्होंने इस तथ्य की ओर देश का ध्यान खींचा कि देश का सबसे गरीब आदमी तीन आने रोज पर गुजारा करता है जबकि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर रोजाना पच्चीस हजार रुपये खर्च होते हैं. आज यह अनुपात शायद बीस रुपये और कई लाख का हो गया है. लेकिन सत्ताधरियों के ऐसे उच्छृंखल व्यवहार पर आज कोई उंगुली नहीं उठाता. बीस रुपया रोजाना पर गुजर करने वालों को नजरअंदाज करके सांसद और मंत्री रोज अपनी सुविधाएं बढ़ाते जाते हैं.

अपने व्यक्तित्व में बहुआयामी होने के बावजूद लोहिया मूलतः एक राजनेता थे, इसलिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए राजनीति के संबंध में उनके विचारों का विशेष महत्व है. उनका कहना था कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति. इस परिभाषा से राजनीति करने वालों पर एक कठोर नैतिक बंधन लग जाता है. यह प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक कांट के ‘क्रिटिक ऑफ प्रैक्टिकल रीजन’ में व्यक्त ’कैटेगोरिकल इम्परेटिव’ जैसा है जो कहता है कि कर्तव्य का पालन बिना इसके लिए तर्क ढूंढ़े करो.

जब लोहिया राजनीति को अल्पकालिक धर्म बताते हैं तो इसे कठोर मूल्यों से बांधने का आग्रह जाहिर करते हैं

शायद अपने इस विचार में लोहिया गांधी से प्रेरणा प्राप्त करते हैं. गांधी लोहिया को अपने समय में जीवित मर्यादापुरुष लगते थे. राजनीति की यह परिभाषा राजनीतिशास्त्र की सभी प्रचलित परिभाषाओं से भिन्न है. भारतीय और पश्चिमी दोनों परंपराओं में आम तौर पर राजनीति  छल-बल से किसी भी तरह सत्ता पाने और इसे सुरक्षित रखने के कौशल से जुड़ी रही है. भारत में इसे कौटिल्य के व्यक्तित्व से जोड़ा जाता रहा है, तो पश्चिमी दुनिया में मैकियावेली से जिसकी विख्यात किताब ‘प्रिंस’ उन सारी मानवीय कमजोरियों का निर्मम विश्लेषण है जिनका सहारा लेकर राजनेताओं को सत्ता हासिल करना और उस पर काबू बनाए रखना चाहिए. अनेक लोगों को यह साक्षात ‘शैतान प्रदत्त शासन सूत्र दिखाई देता है.

इसके विपरीत जब लोहिया राजनीति को अल्पकालिक धर्म बताते हैं तो इसे कठोर मूल्यों से बांधने का आग्रह जाहिर करते हैं. यहां सत्ता स्वयं में काम्य नहीं हो सकती. इसे सदा किसी बड़े मानवीय उद्देश्य से बंधा रहना है.

लेकिन यह नैतिक उद्देश्य कैसे निर्धारित होगा? शायद इसी सवाल के जवाब में लोहिया धर्म को ‘दीर्घकालिक राजनीति’  के रूप में परिभाषित करते हैं. इस अर्थ में धर्म आइडियोलॉजी यानी विचारधारा के एक परिष्कृत रूप की भूमिका में उपस्थित होता है.

विचारधारा  को आम तौर से किसी समूह या वर्ग के स्वार्थों से जोड़ा जाता है. यह समूह के गंतव्य और मार्ग दोनों को निर्देशित करती है. नैतिक दृष्टि से यह तटस्थ हो सकती है या समूह का स्वार्थ ही उसकी नैतिकता बन जाती है. लेकिन जब विचारधारा एक धर्म के रूप में आती है तो यहां नैतिक तटस्थता की गुंजाइश नहीं रह जाती. यहां यह कह कर सभी बंधनों से मुक्ति नहीं मिल सकती कि हमारे वर्ग, हमारे समुदाय या हमारे देश हित के सामने सही या गलत का कोई भी विवाद अर्थहीन है. सबके ऊपर, विवाद से परे है देशहित, वर्गहित या जनहित. भीड़तंत्र के पीछे सामूहिक वफादारी का यह उन्माद बना रहता है. धर्म कम से कम सिद्धांत के स्तर पर कुछ उदात्त मूल्यों को सर्वोपरि मानता है और मानव संबंधों में स्वेच्छाचारिता पर लगाम कसने की नसीहत देता है. दया, परोपकार, सत्य के प्रति इसके घोषित उद्देश्य हैं. यह कहा जा सकता है कि हकीकत में धार्मिक समूहों पर भी उन्माद छा जाता है जिसका उदाहरण अनेक धर्मयुद्ध और हाल के दिनों में उभरा धार्मिक कट्टरपन है.

लेकिन जब लोहिया धर्म की बात करते हैं तो इसके आदर्श रूप में ही. धर्म का सर्वाेच्च रूप होता है आदर्शों के लिए आत्मबलिदान की तैयारी. लोहिया ने अपने जीवन में अपने आदर्शों के लिए- चाहे वह स्वतंत्रता संघर्ष में हो चाहे समाजवादी आंदोलन के उद्देश्यों के लिए- सदा जोखिम उठाया.
इन आदर्शों के विपरीत आचरण के वे कटु आलोचक भी रहे. नेहरू ने पहले पहल लोहिया को कांग्रेस की विदेश विभाग के देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी थी. वे उनके काफी करीब थे. लेकिन आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने समता के आदर्शों के विपरीत काम करना शुरू किया तो लोहिया उनके सबसे कट्टर आलोचक बन गए. जब लोहिया प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महामंत्री थे तब उन्होंने केरल के अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री पी पिल्लई को वहां पुलिस गोलाबारी में कुछ लोगों के मारे जाने पर तुरंत न्यायिक जांच की घोषणा करके इस्तीफा देने का आदेश दिया.

उदात्त मूल्यों को लेकर चलने वाले आंदोलन अपने मूल आदर्शों की बजाय बाहरी आंडबरों को ही लेकर चलने लगते हैं

इससे पैदा हुए विवाद के कारण उन्हें न सिर्फ पार्टी के महामंत्री का पद छोड़ना पड़ा बल्कि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना करनी पड़ी.

शायद अपने देश की यह नियति रही है कि सभी उदात्त मूल्यों को लेकर चलने वाले आंदोलन अपने मूल आदर्शों की बजाय बाहरी आंडबरों को ही लेकर चलने लगते हैं. शायद ऐसा भटकाव काफी पहले से रहा है जिस पर कबीर ने यह व्यंग्य किया था ‘मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा’. हमारे देश में समाजवादी नामधारी एक पार्टी है जो लोहिया की विरासत को लेकर चलने का दावा करती है. इसके कई लोग युवा काल में लोहिया के नेतृत्व में काम भी कर चुके हैं. यह पार्टी देश में सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में शासन भी कर चुकी है और फिलहाल फिर वहां शासन करने का जनादेश प्राप्त कर चुकी है. इसके नेता केंद्रीय मंत्रिपरिषद में भी रह चुके हैं.

लेकिन लोहिया की विरासत से इन्होंने क्या लिया है? यह जरूर है कि कभी-कभी उस राज्य की सड़कें प्रदर्शनों के समय लाल टोपियों से पट जाती हैं. परिवारवाद इस पार्टी में भी हावी होता दिखता है जिसके कारण लोहिया ने नेहरू की कड़ी आलोचना की थी. आज लोहिया की कमी उस सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अभाव में दिखती है जो देश की राजनीति पर हावी है.

कानपुर की नाक का संकट

एक तस्वीर से पूरी कहानी बयां करने की बात सही है तो एल्गिन मिल की यह तस्वीर इस बात को बहुत अच्छी तरह साबित करती है. 1862 में बनी इसी कपड़ा मिल की वजह से कभी कानपुर को ‘पूरब का मैनचेस्टर’ का खिताब मिला था. आज यह तस्वीर उसी मैनचेस्टर की बदहाली का एक संकेत है.

मिल के मेन गेट पर ही हमारा सामना कुछ मजदूरों से होता है. मिल से निकाले गए ये मजदूर पिछले 3,181 दिन से यहां विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. न्याय पाने के लिए लड़ रहे इन लोगों की आपबीती सुनते हुए आप उस शहर की कहानी से भी रूबरू होते हैं जो जाति और राजनीति के दांवपेचों से तालमेल नहीं बैठा पाया और धीरे-धीरे अपनी प्रतिष्ठा खोते हुए लाखों अधेड़ उम्र के बेरोजगारों का शहर बन गया. यहीं से कुछ दूरी पर महलनुमा लाल इमली मिल है. ढहने के कगार पर खड़ा लाल ईंटों से बना यह ढांचा ऐतिहासिक इमारतों की तरह लगता है. कभी यहां तकरीबन 20 हजार लोग काम करते थे. अब यहां सिर्फ 1,300 कामगार आते हैं.

इस औद्यौगिक शहर के पतन की कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि मुद्दे के रूप में इस समस्या का वजन खत्म हुए भी एक दशक हो गया है.  65 साल के मोतीलाल साहू चाय की दुकान चलाते हैं. 26 साल पहले वे इन्हीं दर्जनों मिलों में काम करने वाले लाखों मजदूरों में से एक थे. साहू बताते हैं कि आज शहर के दस में से नौ रिक्शावाले मिल मजदूर या उनके परिवारों के ही सदस्य हैं. 70 के दौर की बात करते हुए उनके चेहरे पर चमक आ जाती है. तब वे सरकारी कर्मचारियों से भी ज्यादा पैसा कमाते थे. मोतीलाल कहते हैं, ‘यदि सरकार कुछ मिलें चालू कर दे तो वे दिन फिर वापस आ सकते हैं.’ लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा होने के बावजूद यह समस्या राजनीतिक रूप से संवेदनशील उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कभी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनी? इसका जवाब वे इन शब्दों में देते हैं, ‘हम कई नेताओं के पास जाकर बात कर चुके हैं. सभी ने वादा तो किया लेकिन हुआ कुछ नहीं.’ 
एक वर्ग इस असफलता का ठीकरा नेताओं पर भी फोड़ता है. एक उद्योगपति बताते हैं, ‘कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में जो फैसले लिए गए थे उन्हें मुलायम सिंह यादव ने इस डर से पलट दिया कि कहीं कल्याण इसका राजनीतिक फायदा न उठा लें. अपने दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह (2003-07) ने कई दौरे किए, उद्योगपतियों को प्रदेश में निवेश के लिए आमंत्रित किया लेकिन खुद राज्य सरकार की सहमति न मिलने से ज्यादातर एमओयू जमीनी हकीकत नहीं बन पाए. कुल मिलाकर राजनीतिज्ञों की तरफ से स्पष्टता के अभाव ने प्रदेश में औद्योगिक विकास का माहौल खराब कर दिया.’

उत्तर प्रदेश में उद्योगपतियों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उद्योगों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा बर्बादी के कगार पर है. बिजली की भारी कमी के चलते ज्यादातर छोटी औद्योगिक इकाइयां दूसरे राज्यों में चली गई हैं.  सीवर लाइन के लिए सालों पहले खोदे गए गड्ढों की वजह से खराब हुई सड़कें आज भी बदहाल हैं.

दसवीं लोकसभा (1991) में इस क्षेत्र से सांसद रह चुकी सीपीएम की सुभाषिनी अली बताती हैं, ‘ प्रदेश में कानपुर दूसरे शहरों की अपेक्षा सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला क्षेत्र रहा है, इसके बाद भी सबसे ज्यादा उपेक्षा इसी शहर को झेलनी पड़ी. यदि आप उद्योगों को आकर्षित करना चाहते हैं तो आपको सड़कें, बिजली और परिवहन की सुविधाएं उपलब्ध करानी ही होंगी.’ शहर के शानदार अतीत से लेकर इसकी मौजूदा बदहाली तक के साक्षी रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद तिवारी कहते हैं, ‘ इस शहर में कभी बसपा और सपा का मजबूत जनाधार नहीं रहा है जबकि पिछले तकरीबन बीस साल से यही दो पार्टियां सत्ता में हैं. इन पार्टियों के बड़े नेता अक्सर पूछते हैं कि इस शहर से उन्हें क्या मिला है. वे सोचते हैं कि कानपुर की मिलें यदि चालू भी हो जाएं तो उसका फायदा उन्हें नहीं मिलेगा बल्कि केंद्र में बैठी सरकार इसका श्रेय ले लेगी. इसलिए उनकी योजनाओं में कानपुर कभी शामिल नहीं होता.’

पिछले उदाहरण बताते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति करने वाले नेताओं ने भी कानपुर के लिए बड़े-बड़े वादे किए लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला. प्रधानमंत्री बनने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि कानपुर की मिलों की चिमनियों से धुआं निकलना फिर शुरू होगा. यह बयान काफी चर्चित तो हुआ लेकिन एनडीए सरकार के समय में भी शहर की किस्मत जस की तस रही. हाल की यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री और कानपुर से लोकसभा सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल से जब भी औद्योगिक समूहों के प्रतिनिधि मिलते हैं तो वे राज्य सरकार की उदासीनता का हवाला देकर अपनी असमर्थता जाहिर कर देते हैं.

कुछ लोगों की राय में बाबरी मस्जिद ढहाने की घटना के बाद कानपुर के दंगों से बुरी तरह प्रभावित होने की वजह भी यही रही कि शहर की ज्यादातर मिलें और औद्योगिक इकाइयां सालों से बंद पड़ी थीं. अली कहती हैं, ‘एक बार जब मिलें बंद हो गईं तो कामगारों की एकता भी टूट गई. वे वापस अपनी पुरानी पहचान की तरफ लौटने लगे.’ हालांकि सांप्रदायिक द्वेष ज्यादा दिन तक कायम नहीं रहा और शहर बाद में धीरे-धीरे इस संकीर्णता से बाहर आ गया.

तो क्या प्रदेश के राजनीतिक आकाओं से शहर के उद्योग-धंधे दोबारा आबाद करने की उम्मीद की जा सकती है? जानकारों के मुताबिक यह हवा में महल खड़ा करने जैसा है. प्रमोद तिवारी कहते हैं, ‘ मुलायम सिंह और मायावती दोनों ही जातिवादी राजनीति की उपज हैं. यहां उद्योगों को पुनर्जीवित करना कोई मुद्दा ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसा करना चाहे तो पहले यह देखना होगा कि उत्तर प्रदेश में सरकार के पास कोई औद्योगिक नीति है कि नहीं. फिर यह भी कि इसके तहत कानपुर के लिए कुछ खास किया जा सकता है. प्रदेश में किसी भी सरकार के पास अपनी कोई औद्योगिक नीति नहीं रही है, ऐसे में कानपुर के लिए अलग नीति की बात ही बेमानी है.’

एक बड़े उद्योगपति नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘जब कारोबारी दूसरे राज्यों में निवेश के लिए जाते हैं तो उनके लिए सुविधाओं का पिटारा खोल दिया जाता है : टैक्स में छूट, सस्ती दरों पर जमीन और जबर्दस्त बुनियादी सुविधाएं. वहां की सरकारें औद्योगीकरण के फायदे समझती हैं. कानपुर में तो हमें यही महसूस होता है कि सरकार हमें यहां से किसी भी तरह भगाना चाहती है. शहर में जो भी औद्योगिक इकाइयां बची हैं वे अपने दम पर सरकारी मुसीबतों को झेलते हुए यहां टिकी हैं.’

शहर के औद्योगिक ढांचे के बर्बाद होने की वजह सिर्फ राजनीतिक उपेक्षा ही नहीं है. जानकारों के मुताबिक इसके लिए कुछ हद तक मिल मालिक भी जिम्मेदार हैं. अपने अच्छे समय में जब कपड़ा मिलें भारी मुनाफा काट रही थीं तब उनके आधुनिकीकरण के लिए पैसा ही नहीं लगाया गया. नतीजा उनका उत्पादन घटता गया. लाखों की तादाद में मिल मजदूर होने की वजह से ट्रेड यूनियनों की भूमिका का भी यहां नकारात्मक असर पड़ा. जहां एक मिल में एक ट्रेड यूनियन होनी चाहिए वहां कानपुर की इन मिलों में एक समय में दस-दस ट्रेड यूनियनें बन गईं. इस समय जब केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों से मिलों को मदद मिलनी चाहिए थी, लेकिन उनकी नीतियों ने अचानक उन्हें बर्बाद कर दिया. इन हालात में मिल मालिकों ने भी कारोबार से हाथ खींचना शुरू कर दिया. इसके बाद सरकारी हस्तक्षेप हुआ और बीमारू मिलों को सरकार ने अधिगृहीत कर लिया. एनटीसी इसी का एक उदाहरण है और इस बात का भी कि सरकारी मिलें बाद में कैसे सफेद हाथी बनकर रह गईं.

सुभाषिनी अली इस बात से सहमति जताती हैं कि सुदूर और पिछड़े इलाकों को छूट मिलने का बुरा असर कानपुर पर पड़ा है. वे कहती हैं, ‘सरकार ने यह कभी नहीं सोचा कि जिस जगह कुशल श्रमिकों की भरमार है और जो पिछले 75 सालों से यहां काम कर रहा है, वहां क्यों नहीं कुछ नई मिलों या उद्योगों को शुरू करने के लिए सरकारी मदद या प्रोत्साहन दिया जाए.’ कानपुर के एक उद्योगपति अपने दर्द को इन शब्दों में साझा करते हैं, ‘यह शहर असहाय भी है और अनाथ भी. हमें कोई ऐसा प्रभावशाली आदमी चाहिए जो कानपुर की आवाज को लखनऊ के साथ-साथ दिल्ली तक पहुंचा सके. और जब तक यह नहीं होता, शहर का तिल-तिल कर मरना जारी रहेगा.’