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महिला तस्करी की देवभूमि

2013 उत्तराखंड के लिए नंदा देवी राजजात का वर्ष है. हर 12 साल बाद राज्य के चमोली जिले में होने वाली इस विश्वप्रसिद्ध यात्रा में गढ़वाल और कुमाऊं के हजारों लोग 18 दिन में 280 किमी चलकर होमकुंड तक जाते हैं. नंदा-घुंघटी पर्वत की तलहटी तक की यह यात्रा नंदा (पार्वती) को ससुराल विदा करने के लिए होती है जो लोकमान्यताओं के अनुसार पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं और जिनका बाद में भगवान शिव से विवाह हुआ. उत्तराखंड के लोग नंदा को अपनी बहन की तरह मानते हैं. हर बहन की तरह नंदा को भी मायके की याद आती है. वह प्रतीकात्मक रूप में मायके आती है. मायके से ससुराल यानी कैलाश के लिए नंदा की विदाई ही ‘नंदा देवी राजजात’ है. गांव-गांव से गुजरती राजजात के दौरान नंदा को भावविह्वल विदाई मिलती है.

मायके की महिलाएं और पुरुष रोते हुए अपनी बहन/बेटी की तरह उसे भी कुछ न कुछ भेंट देकर विदा करते हैं. राजजात के अंतिम गांव बाण से आगे दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में नंदा की रक्षा के लिए उनके धर्म भाई ‘लाटू देवता’ जाते हैं. मान्यता है कि ‘लाटू देवता’ बोल नहीं सकते या वे ससुरालियों के भय से कुछ बोलते ही नहीं हैं. उत्तराखंड के हर पहाड़ी जिले में राजजात जैसे कई त्योहार और मेले हैं. ये सारे त्योहार बेटियों या बहनों को मायके बुलाने का सबसे बड़ा माध्यम हैं. देश के और हिस्सों की तरह उत्तराखंड में भी लोग भावी ससुराल की कई तरह से जांच-परख करने के बाद वहां अपनी बेटी को ब्याहते हैं. फिर बेटियों को साल में कई त्योहारी मौकों पर मायके बुलाया जाता है. कठोर से कठोर ससुराल वाले भी लोक-लाज और दैवी प्रकोप की आशंका के चलते अपनी बहुओं को इन मौकों पर मायके जाने से नहीं रोकते. लेकिन पहाड़ की सैकड़ों बेटियों के लिए इन तीज-त्योहारों-मौकों-मायके का कोई मतलब ही नहीं क्योंकि इनको शादी के नाम पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश ओर देश के अन्य हिस्सों में बेचा जा रहा है. इसके बाद कैसे त्योहार और कौन-सा मायका.

तहलका ने ‘कन्यादान’ के बजाय पैसा लेकर की जा रही इन शादियों की हकीकत जानने की कोशिश की. हमने मायके के इलाके से बहुत दूर रहने को मजबूर इन ‘नंदाओं’ की दुर्दशा की गहराई से पड़ताल की तो पता चला कि इन्हें जीते जी नरक भोगना पड़ रहा है. कहीं उनके साथ शादी के नाम पर बलात्कार होता है तो कहीं उनसे वेश्यावृत्ति करवाई जाती है. जब उनका शरीर देह व्यापार के काम का नहीं रहता तो जानकारों के अनुसार उसका कई और अमानवीय तरीकों से पैसे कमाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इनका सौदा करने वाले दलालों के मुताबिक पहाड़ से एक लाख में खरीदी गई लड़की उन्हें कई-कई लाख कमा कर देती है. हैरत की बात यह है कि उत्तराखंड के लगभग हर पहाड़ी जिले में फैली इस समस्या के बावजूद इस गंभीर मुद्दे पर उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जरा भी संवेदना या हलचल नहीं. उल्टे यहां के जनप्रतिनिधि क्षेत्र की बदनामी होगी, कहकर मामले में कुछ भी कहने-सुनने से बचते हैं.

चमोली जिले में एक सुंदर-सा गांव है बूरा. कल्पेश्वरी यहीं रहती थी. उसके घर के हालात ठीक-ठाक थे. दादा और चाचा सेना में नौकरी कर चुके थे. शहरों की चकाचौंध और मैदानी इलाकों की सुविधाओं के बारे में सुन-सुन कर कल्पेश्वरी के मन में भी यह इच्छा जग रही थी कि शादी के बाद उसका पति उसे पहाड़ के गांव में न छोड़कर अपने उस शहर में ले जाए जहां वह नौकरी कर रहा हो. कल्पेश्वरी के मन में हिलोरें ले रही इच्छाओं को उसके गांव की सुपली देवी भी ताड़ रही थी. सुपली दो बार बूरा गांव की प्रधान रह चुकी थी.

इस तरह हो रही शादियों में अधिकांश लड़कियों के माता-पिता नहीं जानते कि जिस व्यक्ति के साथ उनकी बेटी की शादी हो रही है वह कौन है, किस गांव का है और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है

14 सितंबर, 2012 को कल्पेश्वरी अचानक अपने घर से गायब हो गई. असहाय पिता ने उसे आस-पास के गांवों और रिश्तेदारी में तलाशा. लेकिन वह नहीं मिली. हारकर उसने राजस्व पुलिस में शिकायत दर्ज कर दी. लापता होने के छह दिन बाद राजस्व पुलिस ने कल्पेश्वरी को तहसील मुख्यालय विकास नगर (घाट) के पास घूनी गांव के 63 वर्षीय कुताली राम के कब्जे से बरामद किया.

कल्पेश्वरी ने जब गुमशुदगी के छह दिन की आपबीती सुनाई तो सभी को जो जो हुआ उसकी भयावहता का अंदाजा लगा. नादान कल्पेश्वरी को सुपली देवी मुजफ्फरनगर के किसी खाते-पीते किसान परिवार में शादी कराने का झांसा देकर भगा कर लाई थी. उसे भरमाया गया कि लड़का पंजाब में किसी सरकारी बैंक में काम करता है. घाट के नायब तहसीलदार (राजस्व पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक के समकक्ष अधिकारी) भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘जांच में पता चला कि कल्पेश्वरी का सौदा एक लाख रुपये में हुआ था. इसमें से दलालों ने 40 हजार रुपये पेशगी ले रखे थे. बाकी बचे हुए 60 हजार रुपये कुताली राम को हरिद्वार में कल्पेश्वरी को सौंपते ही मिलने वाले थे.’
जांच में पता चला कि कल्पेश्वरी को बेचने के काम में एक पूरा गिरोह लगा था. गिरोह का मुखिया घूनी गांव का कुताली राम उर्फ ‘भादू’ था. इस मामले में कुताली राम, उसकी बेटी शाखा देवी के अलावा पांच और आरोपित गिरफ्तार हुए. कुताली के कहने पर ही सुफली देवी, कल्पेश्वरी को उसके घर से भगा कर लाई थी. गिरोह के सदस्यों ने पांच दिन तक कल्पेश्वरी को अलग-अलग गांवों में छिपा कर रखा.

मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के बयानों से पहले किए गए मेडिकल में कल्पेश्वरी के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई. पूछताछ के दौरान कल्पेश्वरी ने राजस्व पुलिस को रोते हुए बताया कि उसे छिपा कर इधर-उधर भगाते समय बूढ़े कुताली राम ने उसके साथ दो बार दुष्कर्म किया. कुताली की इस दरिंदगी के बाद कल्पेश्वरी की आंखें खुल गईं. भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘इसीलिए कल्पेश्वरी ने बरामदगी के बाद राजस्व पुलिस को जांच में सहयोग देते हुए गिरोह के सदस्यों को जेल भिजवाने में मदद की.’ जांच के दौरान कल्पेश्वरी की सुपली द्वारा उसके लिए प्रस्तावित लड़के से मोबाइल पर बात कराई गई. भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘भाषा, लहजे और गालियों से वह आदमी निपट अनपढ़ और अपराधी लग रहा था.’ फिलहाल कल्पेश्वरी अपने गांव में सुरक्षित है.

लेकिन हर लड़की की किस्मत कल्पेश्वरी जैसी नहीं होती. घाट विकासखंड के पूर्व प्रमुख सुदर्शन कठैत बताते हैं, ‘गिरोह के सदस्य और उनके एजेंट गांवों की भोली-भाली लड़कियों और उनके परिजनों को इस हद तक बरगलाते हैं कि वे उन पर भरोसा कर अपना सब कुछ खो बैठते हैं.’ घाट के ही कनोल गांव की सरिता की कहानी इसका उदाहरण है. बेहद खूबसूरत कनोल गांव राजजात यात्रा का अंतिम पड़ाव है. सरिता को उसके गांव में सुनार का काम करने वाली दलाल सीता ने अच्छी नौकरी दिलवाने का लालच देकर पहले गांव से भगाया और फिर उसे अपने वन तस्कर भाई राजू को बेच दिया. यह तीन साल पहले की बात है. तब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. सीता ने गांव में यह अफवाह भी फैला दी कि सरिता किसी दूसरी जाति के लड़के के साथ भाग गई है. बदनामी के डर से सरिता के पिता ने उसे खोजने के बजाय चुप्पी साध ली. अधेड़ राजू की पहले ही दो शादियां हो चुकी थीं और उसके सात बच्चे थे. तीन साल तक राजू नाबालिग सरिता का शारीरिक शोषण करता रहा.

वह हमेशा सरिता को कैद में रखता ताकि वह भाग न जाए. पिछले साल राजू का गिरोह घनसाली में बाघ की खाल के साथ पकड़ा गया. सरिता भी उसके साथ थी. वह भी जेल भेज दी गई. छह महीने जेल में रहने के बाद पिछले दिनों राजू की जमानत हो गई. दो दिन बाद उसने सरिता की भी जमानत करा दी. बाहर आने के बाद सरिता ने राजू के साथ जाने-रहने से मना कर दिया. अब सरिता को इस गिरोह से अपनी जान का खतरा है. महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही योजना महिला समाख्या से जुड़ी रीना पंवार बताती हैं, ‘हमने सरिता के घर कई संदेश भेजे लेकिन उसके पिता उसे घर ले जाने को तैयार नहीं हैं.’ सरिता फिलहाल टिहरी में महिला समाख्या की व्यवस्था में रह रही है. तीन साल तक नरक भोगने के बाद वह फिर से अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ हंस-खेल कर पुराने बुरे दिनों को भूलने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना के बाद उत्तराखंड के हर शहर-कस्बे में मोमबत्तियां जलाने वालों को आज भी यह पता नहीं कि अपने राज्य की जिस लड़की का फोटो उन्होंने एक साल पहले वन तस्कर के रूप में देखा था वह एक बेकसूर नाबालिग थी. एक ऐसी बच्ची जो मानव तस्करी का शिकार बनी और जिसके साथ तीन साल तक शादी के नाम पर बलात्कार होता रहा. चमोली स्थित स्वयंसेवी संगठन ‘जनक समिति’ के सचिव सुरेंद्र भंडारी बताते हैं, ‘लड़कियों की तस्करी में लगे गिरोहों ने पिछले साल जिले की विकासनगर तहसील से 27 लड़कियां शादी के नाम पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में बेची हैं.’ उनकी संस्था के अध्ययन के अनुसार इनमें से कोई लड़की शादी के बाद वापस मायके नहीं आई है. कई मायके वालों को तो यह भी पता नहीं है कि उनकी लड़कियां कहां ब्याही गई हैं और अब किस हाल में हैं.

‘कड़ी पूछताछ में दलालों ने बताया कि पहले ये लड़कियां बच्चे पैदा करने की मशीन होती हैं. फिर इन्हें या तो वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है या इनमें से अधिकांश के साथ घर पर ही देह व्यापार कराया जाता है’

चमोली में गैरसैंण की पूर्व जिला पंचायत सदस्य गीता बिष्ट ने 2006 में  आदि-बदरी के पास एक ऐसे ही गिरोह के तीन सदस्यों को तत्कालीन जिलाधिकारी अजय नब्याल की मदद से पकड़वाया था. गीता बताती हैं, ‘पकड़े जाने पर ये दलाल शादी हुई है, यह दिखला कर पुलिस को भी झांसा दे देते थे.’ इन दलालों की गाड़ी से दूल्हे का सेहरा और दुल्हन का शादी का जोड़ा भी बरामद हुआ था. इस मामले में एक दलाल गैरसैंण के गांवली गांव का मूल निवासी था. मेरठ कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी का यह कर्मचारी भोली-भाली लड़कियों का शादी के नाम पर सौदा करता था. गीता का मानना है कि गैरसैंण विकास खंड के हर गांव की कोई न कोई लड़की शादी के नाम पर बाहर बेच दी गई है. वे बताती हैं, ‘यदि ये शादियां हैं भी तो बेमेल हैं और लड़कियां किसी भी रूप में खुश और सुरक्षित नहीं हैं.’

इस तरह हो रही शादियों में अधिकांश लड़कियों के माता-पिता नहीं जानते कि जिस व्यक्ति के साथ उनकी बेटी की शादी हो रही है वह कौन है, किस गांव का है और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है. इन क्षेत्रों में रिश्तेदारी तो दूर इनका नाम तक भी लड़की के घरवालों को पता नहीं होता है. तहलका की तहकीकात के दौरान अधिकांश मामलों में मायके वाले यह भी नहीं बता पाए कि उनकी बेटी जिस गांव में ब्याही है वह हरियाणा में है या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. गीता बिष्ट बताती हैं, ‘इनमें से अधिकांश लड़कियां तो पहली बार हरिद्वार या हल्द्वानी से आगे जाती हैं.’ दलाल यह भी जानते हैं कि इन अबलाओं के गरीब और असहाय परिवारों में उनके खिलाफ कुछ करने-बोलने वाला कोई नहीं है.

उत्तराखंड में इस कुप्रथा की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं. इतिहासकार योगंबर सिंह बर्त्वाल ‘तुंगनाथी’ बताते हैं, ‘जौनसार-बाबर और त्यूणी-आराकोट के बीच स्थित बंगाण इलाके की लड़कियों को अपने अच्छे नैन-नक्श के लिए जाना जाता है. इतिहास में ऐसे भी उदाहरण हैं कि देश के कई रजवाड़ों सहित अपने समय के माने हुए परिवारों ने इस क्षेत्र की लड़कियों से शादी कर अपनी नस्लों को सुधारा. फिर भी ये शादियां वैध थीं, उन्हें पूरी सामाजिक मान्यता थी और इन महिलाओं का सम्मान था.’ लगभग एक सदी पहले पत्रकार विशंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली नामक मासिक अखबार में गढ़वाल से खरीद कर बंबई ले जाकर ब्याही या रखी महिलाओं पर विस्तार से काम किया था. उन्होंने नवंबर 1913 के अंक में ऐसी महिलाओं का एक फोटो भी प्रकाशित किया था (इस स्टोरी का आखिरी पन्ना देखें). तुंगनाथी बताते हैं,  ‘उत्तरकाशी जिले के रवांई इलाके में बाजगी जाति की लड़कियां पिछली शताब्दी की शुरुआत से वेश्यावृत्ति के पेशे के लिए महानगरों की ओर जाने लगी थीं. लेकिन उनकी भी ऐसी दुर्दशा नहीं थी जैसी शादी के नाम पर बेची जा रही इन लड़कियों की है.’ वेश्यावृत्ति पेशे के लिए जाने वाली वे लड़कियां अपने गांव जाती रहती थीं. वे अपनी मर्जी की मालिक थीं और कुछ समय पेशा करने के बाद अपनी पसंद से शादी भी करती थीं. स्थानीय पत्रकार प्रेम पंचोली बताते हैं, ‘कोठों में गई इन औरतों ने ही अपने ग्राहकों के माध्यम से गरीब लड़कियों के रिश्ते मैदानी क्षेत्रों में तय करवाने शुरु किए थे.’

लगभग एक शताब्दी पहले यमुना घाटी से शुरू हुई यह कुप्रथा अब पूरे उत्तराखंड में सुरसा के मुंह की तरह पैर पसार चुकी है. पैसे के लेन-देन को मुख्य तत्व मानकर की गई इन शादियों में से 80 प्रतिशत बिखर जाती हैं. दरअसल ये शादियां केवल नाम के लिए होती हैं. इन असफल कहानियों के उदाहरण और लड़कियों के साथ हुई ज्यादतियों के किस्से पहाड़ के हर गांव-कस्बे में कुछ दिनों तक चर्चाओं में रहते हैं और फिर खो जाते हैं. पंचोली बताते हैं, ‘पहले ये लड़कियां बच्चे पैदा करने की मशीन होती हैं. फिर इन्हें या तो वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है या इनमें से अधिकांश के साथ घर पर ही देह व्यापार कराया जाता है.’ पंचोली कई सालों से लड़कियों की मानव तस्करी का विरोध कर रहे हैं, उन्होंने कई मामलों में लड़कियों को दलालों से बचाया भी है. वे बताते हैं, ‘शादी के नाम पर बेची गई लगभग 10 प्रतिशत लड़कियां वापस पहाड़ आ जाती हैं.’ हालांकि किसी तरह भागकर घर लौटने में सफल हो जाने वाली इन लड़कियों की जिंदगी में इससे कुछ अच्छा हो जाता हो, ऐसा नहीं है. वे सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना की शिकार होती हैं.

जानकारों के मुताबिक सिर्फ 10 प्रतिशत मामलों में लड़कियों के मन मारकर समझौता करने पर उनकी शादियों को सफल माना जा सकता है. पंचोली बताते हैं, ‘इन सफल मामलों में भी लड़कियों के रिश्ते उन परिवारों में होते हैं जिनकी अपने इलाकों में सामाजिक पृष्ठभूमि इतनी खराब होती है कि उन परिवारों से उस इलाके, समाज या जाति का कोई परिवार अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं होता. या फिर ये शादियां बिल्कुल उम्र या किसी अन्य लिहाज से बेमेल होती हैं.’

पहाड़ों में महिलाओं को जीवन भर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. ऐसे में मैदानी क्षेत्रों में शादी करके लड़कियों को घर में केवल खाना बनाना और झाड़ू-पोंछा करना कोई काम ही नहीं लगता. लेकिन मैदानी क्षेत्रों में जिन परिवारों में ये लड़कियां ब्याहने के नाम पर बेची जाती हैं वहां उनके सामने अलग ही तरह की तरह-तरह की समस्याएं आती हैं. पंचोली बताते हैं, ‘जिन परिवारों में ये लड़कियां ब्याही जाती हैं उनका सामाजिक या आर्थिक स्तर भी उतना अच्छा नहीं होता है.’ इसलिए जिन सुख-सुविधाओं के सपनों के साथ लड़की ससुराल पहुंचती है वहां हकीकत में उसके साथ बिल्कुल उल्टा होता है. पहाड़ों में खुले वातावरण में पली-बढ़ी लड़कियां ससुराल की खापों, जातियों, पर्दे और संकीर्णताओं वाले समाज के बंधनों में फंस कर घुट-घुट कर जीती हैं. पंचोली बताते हैं, ‘जहां ये लड़कियां ब्याही जाती हैं वहां का परिवेश पहाड़ों के विपरीत होता है. ऐसे में वहां इनका जिस्मानी रिश्ते के अलावा कोई और रिश्ता नहीं होता.’ इसलिए पहाड़ के खुले समाज में पली-बढ़ी ऐसी लड़कियों को घुट-घुट कर मौत का इंतजार करना होता है.

उत्तराखंड के आठ पहाड़ी जिलों में प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है.  महिलाओं की यह अतिरिक्त संख्या, खूबसूरती, गोरा रंग और कमजोर पारिवारिक पृष्ठभूमि उन्हें दलालों का आसान शिकार बनाती है

लड़कियों को ब्याहने के नाम पर बेचने वाले इन गिरोहों ने अपना जाल इस तरह फैला दिया है कि जिस लड़की पर इनकी नजर पड़ती है उसे ये किसी न किसी कुचक्र में फंसा कर ले ही जाते हैं. उत्तरकाशी जिले के कफनौल की मीना बेहद खूबसूरत थी. पति नादान और अनपढ़ था. ससुराल वालों के ताने सुनकर मीना मायके आ गई.  आठ-नौ महीने वह मायके में क्या रही कि दलालों की नजर उस पर पड़ गई. गांव के प्रधान और बिजली के लाइनमैन ने 65 हजार रुपये में उसका सौदा कर दिया. बात राज्य महिला आयोग और थाने तक गई. मीना के चचेरे भाई ने दलालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया. लेकिन दलाल कहां मानने वाले थे, उन्होंने मीना के पति को इतना प्रताड़ित किया कि उस बेचारे ने डर कर आत्महत्या कर ली. अब विधवा मीना कहीं भी शादी कर सकती थी. दलाल मीना को गहनों से लाद कर नौगांव नाम के एक कस्बे तक लाए. प्रस्तावित दूल्हा अपनी स्कॉर्पियो कार में वहीं मौजूद था. राज्य महिला समाख्या की राज्य परियोजना निदेशक, गीता गैरोला बताती हैं कि मीना के मामले में वे राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बडोनी के साथ उसके गांव गई थीं. वे बताती हैं, ‘साफ दिख रहा था कि वह बेची जा रही थी. लेकिन दलालों ने अपने प्रभाव से इसे शादी का रूप दे दिया था इसलिए हम इस मानव तस्करी को नहीं रोक पाए.’ पंचोली बताते हैं, ‘किसी को भी पता नहीं है कि मीना अब कहां और किस हाल में है. मीना के मां-बाप भी नहीं हैं. होते भी तो क्या कर लेते. अब यह व्यापार संगठित माफिया का रूप ले चुका है. दलालों के पास कानून के रखवालों को भरमाने के हर तरीके हैं.’

मीना जैसा ही हाल विकास नगर के पडेर गांव की 27 वर्षीया कमला का भी हुआ. कमला का भी सौदा एक स्थानीय गिरोह ने हापुड़ में किया था. खबर मिलने पर राजस्व पुलिस ने कमला को खरीद कर ले जाने वाले गिरोह को रंगे हाथों विकास नगर में पकड़ लिया. कमला का सौदा करने वालों में उसके दो रिश्ते के भाई, दो स्थानीय दलाल और चार हापुड़ निवासी थे. नायब तहसीलदार भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘इस मामले के मुख्य आरोपी संजय राठी ने जमानत पर बाहर आते ही कमला से कोर्ट मैरिज कर ली और उसे हापुड़ ले गया. शादी के नाम पर कमला बिक कर हापुड़ चली गई.’

बेटियों के व्यापार के मामले कुमाऊं कमिश्नरी में भी कम नहीं हैं. नैनीताल जिले की धारी तहसील का ही उदाहरण लीजिए. यहां डालकन्या गांव के कुंवरदेव पनेरू की 14 साल की बेटी भगवानी का सौदा अप्रैल, 2011 में गांव के ही चंद्रमणि भट्ट ने मथुरा के एक 35 साल के व्यक्ति के साथ करा दिया था. डालकन्या गांव नैनीताल जिले के सबसे दूरस्थ गांवों में से एक है. नाबालिग लड़की की अनजान जगह शादी की बात जब महिला संगठनों को पता चली तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करानी चाही. लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई. बाद में जिलाधिकारी के दखल से यह शादी रुकी. जांच के दौरान पनेरू ने बताया कि चंद्रमणि ने उसे 20 हजार रुपये दे कर यह शादी तय करवाई थी. महिला समाख्या, नैनीताल की बसंती पाठक बताती हैं, ‘डालकन्या ग्राम सभा के 20 परिवारों की 35 लड़कियों को भगवानी की तरह शादी के नाम पर मथुरा, बरेली, सितारगंज, अलीगढ़, खटीमा और मुरादाबाद में बेचा गया है.’ शादी के बाद अधिकांश लड़कियां वापस नहीं आई हैं. जो वापस आती भी हैं, वे बताती हैं कि उनसे बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है. पैसे से खरीद कर ले जाने वाले लोग इन लड़कियों के साथ बहुत अत्याचार करते हैं. बसंती पाठक कहती हैं, ‘लेकिन लड़कियों के जीवन की विडंबना यह है कि वे मायके आकर अपने मां-बाप की खुशी के लिए यह बताती हैं कि वे ससुराल में खुश हैं.’

इस मुद्दे पर तत्कालीन जिलाधिकारी नैनीताल ने डालकन्या गांव में सामूहिक बैठक रखी थी. इसमें दलालों द्वारा कराई जा रही इन शादियों की हकीकत सामने आई. गांव के ही रेवाधर पनेरू ने बताया कि उसकी दो बेटियों की शादी भी इन्हीं बिचौलियों ने छह साल पहले 30 हजार रुपये में उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के गदरपुर में कर दी थी. ससुराल में परेशान ये लड़कियां शादी के दो साल बाद वापस मायके आ गई थीं. उस दिन से ससुराल वाले इनका फोन ही नहीं उठा रहे. बसंती पाठक कहती हैं, ‘ये हाल जब अपने राज्य में शादी के नाम पर बेची गई लड़कियों के हैं तो बाहरी राज्यों में बेची गई लड़कियां किस हाल में होंगी, भगवान ही जानता है.’ जिलाधिकारी द्वारा रखवाई गई इस बैठक में पता चला कि आस-पास के गांवों की लगभग 60 लड़कियां शादी के नाम पर मैदानी क्षेत्रों में बेची गई हैं. नैनीताल के डालकन्या गांव की खरीदने-बेचने वाली शादियां कुमाऊं के हर जिले के दूरस्थ गांव में हो रही हैं.

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में 1,000 पुरुषों की तुलना में 800 से भी कम महिलाएं हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के आठ पहाड़ी जिलों में प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है. अल्मोड़ा जिले में तो हजार पुरुषों पर 1,142 स्त्रियां हैं. महिलाओं की यह अतिरिक्त संख्या, उनकी खूबसूरती, गोरा रंग और कमजोर परिवारिक पृष्ठभूमि उन्हें दलालों का आसान शिकार बनाती है. दलालों ने इस व्यापार के लिए दूरस्थ पहाड़ी इलाकों के राजस्व पुलिस वाले क्षेत्रों को चुना है. प्रदेश के पहाड़ी जिलों का 80 प्रतिशत भाग राजस्व पुलिस के अधीन है. लेकिन आरोप लगते हैं कि हर तरह से कमजोर राजस्व पुलिस इन मामलों को अपराध तक नहीं मानती या ले-देकर इन मामलों को निपटा देती है.

एक सदी पहले पत्रकार विशंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली नामक मासिक अखबार में गढ़वाल से खरीद कर बंबई ले जाकर ब्याही या रखी महिलाओं के बारे में लिखा था. नवंबर 1913 के अंक में उनकी एक तस्वीर भी छपी थी

ब्याह के नाम पर बेची गई लड़कियों की कथित ससुराल में क्या हालत है, यह जानने के लिए उत्तरकाशी जिले की बड़कोट तहसील की 22 साल की मीता की दर्दनाक कहानी काफी है. पूर्व सैनिक पिता ने उसकी शादी पास के ही गांव में की थी. शादी के कुछ ही महीने बाद हरिद्वार स्थित एक फैक्टरी में नौकरी करने गए उसके पति की दुर्घटना में मृत्यु हो गई. शादी की उम्र से पहले ही मीता विधवा हो गई. ससुरालियों ने भी मीता को परेशान करके भगा दिया. मीता के पास मायके के अलावा कोई ठिकाना नहीं था. लड़कियों की खरीद-फरोख्त में लगे दलाल गिरोहों की नजर ऐसी ही लड़कियों पर होती है. यहां मीता की दुश्मन नई टिहरी में रहने वाली उसके गांव की रिश्ते की बुआ अंबिका निकली. अंबिका ने भोली मीता को समझाना शुरू किया कि इतनी लंबी उमर है अकेले क्या करोगी. उसने मीता से कोई अच्छा लड़का देखने की बात कहते हुए उसे आश्वस्त किया कि उसने पहले भी ऐसी कई शादियां करवाई हैं.

अंबिका मीता को लेकर मेरठ गई. यहां उसने उसे दरौला के पास बंशीपुरम इलाके के पिंटू नाम के लड़के और उसके रिश्तेदारों से मिलवाकर पिंटू के साथ शादी के नाम पर छोड़ दिया. पिंटू के मां-बाप बचपन ही में मर गए थे, उसे उसके जीजा विजेंद्र ने पाला था जो आपराधिक प्रवृत्ति का दबंग आदमी था. इस शादी की हकीकत जल्द ही मीना के सामने आ गई. वह बताती है, ‘पिंटू का जीजा और उसके कई दोस्त मेरे साथ जबरदस्ती करते थे.’ जीजा के टुकड़ों पर पल कर बड़ा हुआ मजदूर और मजबूर पिंटू विरोध में कुछ नही कह पाता था. मीता के विरोध करने पर विजेंद्र उसे धमकाता था कि उसे दो लाख रुपये में अंबिका से खरीदा गया है इसलिए वे उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं. मीता ने मायके जाने के लिए मिन्नतें कीं तो विजेंद्र ने उसे बताया कि मां और भाई से मिलने की इच्छा है तो वह उन्हें यहीं बुला ले और अब वापस पहाड़ जाने की बात भूल जाए. बाहर जाते समय विजेंद्र मीता को कमरे में ताला बंद करके रखता था ताकि वह भाग न सके.

आखिर एक दिन किसी तरह मीता वहां से भाग कर नई टिहरी पहुंची. अगले ही दिन विजेंद्र भी उसे खोजते हुए वहां पहुंच गया. मीता ने पुलिस की महिला हेल्प लाइन में रिपोर्ट लिखवाई पर कुछ नहीं हुआ. कई दिनों तक विजेंद्र 12 लोगों के साथ उसे वापस ले जाने की जिद के साथ बेखौफ टिहरी में डटा रहा और मीता अपने मायके के क्षेत्र में उसके डर से इधर-उधर भागती रही. बाद में मीता महिला समाख्या के पास गई, जहां उसे, पिंटू और उसके जीजा को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया. महिला समाख्या, टिहरी की रिसोर्स पर्सन रीना पंवार बताती हैं, ‘मीता के आरोप सही थे. उसका बुरी तरह शारीरिक शोषण और मानसिक उत्पीड़न हो रहा था.’ महिला समाख्या ने विजेंद्र और पिंटू को आगे मीता को परेशान न करने की हिदायत दी. मीता बताती है, ‘अंबिका ने पहले भी मेरी तरह तीन परेशान लड़कियों को बेचा है.’

ऐसी ही कहानी चमोली जिले की पोखरी तहसील से सात किमी दूर के एक गांव की रीना की भी है. रीना की बहन के मुताबिक हरियाणा के पानीपत में ब्याही गई रीना को उसका नशाखोर पति पैसे के लिए दोस्तों के सामने परोसता है. कुछ समय पहले वह अपने मायके आई थी. रीना की बहन बताती है, ‘हाल ही में रीना के पति के दोस्तों ने उसके बैंक खाते में पैसे डाले और उसे फिर ले गए हैं.’ बहन को भरोसा नहीं है कि रीना की जान और इज्जत-आबरू उसकी कथित ससुराल में सुरक्षित है. रीना के पिता की भी मौत हो चुकी है और उसका कोई भाई भी नहीं है.

तहलका ने बाहर ब्याही लड़कियों के वास्तविक हालात के बारे में कई माध्यमों से गहराई से जांच-पड़ताल की और पाया कि अच्छे घरों में ब्याहने के नाम पर बेची गई अधिकांश लड़कियों से कई तरीकों की वेश्यावृत्ति कराई जाती है. नायाब तहसीलदार भूपेंद्र सिंह तो स्थितियों को और भी भयावह बताते हैं. वे कहते हैं, ‘दो मामलों में कड़ी पूछताछ में दलालों और खरीददारों ने बताया कि पहले इन लड़कियों से बच्चे पैदा कराए जाते हैं. फिर पत्नी की तरह रख कर वेश्यावृत्ति कराई जाती है या बेच दिया जाता है. जब उनका शरीर देह व्यापार के काम का नहीं रहता तो इनसे खून बिकवाया जाता है और अंत में कई बार इनके किडनी जैसे अंग भी बेचे जाते हैं.’ कड़ी पूछताछ में दलालों ने पुलिस के सामने स्वीकारा कि पहाड़ से एक लाख में खरीदी गई लड़की उन्हें कई लाख कमा कर देती है और उसके मायके वालों से किसी किस्म के विरोध और कानूनी परेशानी का भी उन्हें डर नहीं रहता है. राज्य में मानव तस्करी रोकने के लिए पुलिस क्षेत्र में एक सेल बनाया गया है. लेकिन यह बस नाम का ही है. कुमाऊं के आईजी दीपक ज्योति घिल्डियाल बताते हैं, ‘नैनीताल में मानव तस्करी सेल खुला है, अब उसका दायरा बढ़ा कर उधम सिंह नगर जिले तक कर दिया गया है.’ इस सेल के पास अभी केवल एक शिकायत रामनगर में दर्ज हुई है. घिल्डियाल बताते हैं, ‘यदि राजस्व क्षेत्र से भी इस तरह के मामले हमारे पास आते हैं तो हम उन्हें लेंगे.’

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद लड़कियों को ब्याहने के नाम पर बेचने के हजारों मामले हुए हैं. लेकिन आज तक एक भी मामला विधान सभा में नहीं उठा है. हर पर्वतीय विधायक के क्षेत्र में यह काला-व्यापार हो रहा है लेकिन उन्होंने इन मामलों का कोई संज्ञान नहीं लिया. अधिकांश जनप्रतिनिधि इलाके की बदनामी के नाम पर इन सामाजिक व्यापार-व्यवहारों को प्रचारित न करने की सलाह देते हैं. बहुत-से दलाल किसी न किसी पार्टी के ‘सम्मानित कार्यकर्ता’ भी हैं. विधायकों को डर है कि ये दबंग उनकी जीत को कुछ सौ वोटों से तो प्रभावित कर ही सकते हैं.

उत्तराखंड में हर आंदोलन की अगुवाई महिलाएं करती हैं, लेकिन बेटियों के इस कुत्सित और घृणित व्यापार के विरोध में राज्य बनने के बाद कोई आंदोलन होना तो दूर एक संगठित आवाज तक नहीं उठी. देहरादून में नित होने वाले बौद्धिक सम्मेलनों में भी कभी इस दर्द को मंचों पर साझा नहीं किया गया. शायद इसलिए कि बिक रही ये बेटियां उन गरीबों और असहाय लोगों की थीं जो किसी प्रचार माध्यम को प्रभावित नहीं करते.
राज्य आंदोलनकारी और राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बलूनी बताती हैं, ‘हमें राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों में इस तरह की बिक्री की बातें तो सुनने में मिलती हैं, लेकिन आज तक कोई लिखित शिकायत हमारे सामने नहीं आई है और न ही किसी जनप्रतिनिधि या संगठन ने इस बारे में उन्हें पत्र लिखा है.’ गीता गैरोला बताती हैं, ‘कोई भी महिला संगठन मानव तस्करी करने वाले इन सशक्त गिरोहों को मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि इन्हें किसी न किसी रूप से प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है.’

शारीरिक शोषण, उत्पीड़न और बिक कर ब्याहने की पीड़ा जैसे बड़े कष्टों के अलावा अपरिचित इलाकों में बेच कर ब्याही इन बेटियों के जीवन में कई गहरी भावनात्मक पीड़ाएं भी हैं. पहाड़ में ससुराल के कठिन और अनुशासित जीवन के बीच मन को हल्का करने के लिए मायके आने के लिए अनेकों मौके और परंपराएं हैं. लोकमान्यता है कि इन मेलों या त्योहारों में यदि लड़कियों को मायके न भेजा जाए तो लड़की के मायके की नंदा देवी ससुरालियों पर कुपित हो कर कहर बरपाती हैं. इस पारंपरिक डर से कठोर से कठोर दिल वाले ससुराली भी कम से कम इन मेलों के समय अपनी बहुओं को उनके मायके भेजते ही हैं. मैदानी इलाकों में ब्याही गई इन लड़कियों के ससुरालियों को इन परंपराओं से कोई मतलब ही नहीं होता. 

चमोली-रुद्रप्रयाग जिले में तुंगनाथ मंदिर से जुड़े गांवों में हर तीसरे साल नंदा देवी को गांव आने का न्यौता दिया जाता है. इस तरह के मेलों में नंदा के साथ-साथ गांव की बेटियों को भी मायके बुलाया जाता है. ऐसे ही एक गांव की बेटी थी सोनम. उसका गांव रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि विकास खंड में है. सोनम के पिता गांव के लोहार थे. अपने पिता के साथ गांव भर के घरों में घूमती-हंसती-खेलती बड़ी हो रही सोनम अपने पिता के अलावा पूरे गांव की भी बेटी थी. चार साल पहले पिता के मरने के बाद मां ने 15 वर्षीया सोनम की शादी रुड़की तहसील के झबरेड़ा थाने के एक गांव में एक 45 वर्षीय किसान के साथ तय कर दी. तहलका ने किसी तरह सोनम से बात की. उसने बताया, ‘ससुराल आ कर पता चला कि पति की पहली पत्नी भी थी जो मर गई थी. पहली शादी की लड़की उम्र में मेरे ही बराबर है.’ वह आगे कहती है,‘यदि मां शादी करने से पहले मुझे हकीकत बताती तो मैं कभी इसके लिए तैयार नहीं होती.’

शादी के कुछ दिनों बाद ही सोनम को पता चल गया कि उसकी मां ने उसे 70 हजार रुपये में बेचा था. अब उसकी सास हमेशा ताने देती है कि जितने रुपयों में उसे  खरीदा गया है उस हिसाब से उसे शऊर नहीं है. सोनम की एक देवरानी मुजफ्फर नगर और दूसरी शामली की है. सोनम बताती है, ‘मेरी दोनों देवरानियों के मायके वाले हर महीने उनसे मिलने आते हैं, मेरे मायके में कोई नहीं है.’ मायूस सोनम कहती है, ‘यदि कोई होता भी तो इतनी दूर और अनजाने माहौल में डर के मारे मुझसे मिलने नहीं आता.’

शादी के एक साल बाद ही सोनम की एक लड़की भी हो गई. हर लड़की की तरह सोनम को भी मायके की याद आई. मिन्नतें करने पर भी ससुराली नहीं माने. आखिर सोनम भाग कर अपने मायके आ गई. मायके में भी मां-बाप थे नहीं, सो अधिक दिन किसके पास रहती. तीन महीने बाद ताऊ-चाचा ने भी ताने देने शुरु किया तो सोनम थक-हारकर एक बार फिर मजबूर होकर मायके से खुद को खरीदने वाली ससुराल चली गई. अब वह 19 साल की है और इतनी सी उम्र में इतना कुछ भुगत लिया है. मोबाइल पर बात करते हुए रुआंसी होकर सोनम कहती है, ‘मेरे जैसा बिना मायके वाला दुर्भाग्य किसी और लड़की का न हो और बेच कर मुझे  दूसरे मुल्क में ब्याहने वाली मां का भी कभी भला न हो.’ सोनम के गांव की 17 साल की कुंती को उसके पिता ने 40 साल के आदमी के हाथों गाजियाबाद बेच दिया है. उसी गांव की पांच और लड़कियों का सौदा उनके मां-बापों या दलालों ने मैदानी क्षेत्रों में किया है. सोनम के मायके के आस-पास के पांच गांवों की करीब 30-32 लड़कियों को उनके माता-पिता ने हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश या मैदानी जिलों में शादी के नाम पर बेचा है.

पहाड़ में जानवरों को खरीदने-बेचने वाले दलालों को पहले ‘गलदार’ कहते थे. गलदार इतना चालाक होता था कि यदि उसकी नजर किसी के अच्छे-खासे दूध देने वाले या स्वस्थ जानवर पर पड़ जाती थी तो उस जानवर का बिकना निश्चित था. स्थानीय पत्रकार देवेंद्र सिंह रावत कहते हैं, ‘अब मासूम लड़कियों की खरीद-फरोख्त करने वाले गलदारों ने सारे पहाड़ में जाल फैला दिया है.’ गीता बिष्ट कहती हैं, ‘देश के किसी भी भाग की तुलना में सीमाओं की रक्षा में उत्तराखंड के अधिक जवान लगे हैं. लेकिन दुश्मनों को किसी भी हाल में धराशायी करने का इतिहास रखने वाले ये वीर भाई भी दलालों से अपनी बहनों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं. और यहां के राजनेता और नौकरशाह इस मामले में ‘लाटू देवता’ की तरह मौन हैं.’

(पीड़ित लड़कियों और परिवार के सदस्यों के नाम बदले हुए हैं. अपराधियों, दलालों या आरोपितों के नाम यथावत हैं)

(महिपाल कुंवर के सहयोग के साथ)

‘गिरोहों की जकड़बंदी से मुक्ति हो साहित्य ’

उदय प्रकाश हिंदी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में से हैं.  अपने रचनात्मक जीवन तथा मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर पूजा सिंह से उनकी बातचीत.

आपके लेखन या कहें रचनात्मक जीवन की शुरुआत कब हुई?
मैं काफी लंबे समय से लिख रहा हूं. जब मैं करीब 6-7 साल का था तभी से लिख रहा हूं. उस समय कविता और पेंटिंग का शौकीन था. एक पुराना कैमरा था, उससे फोटोग्राफी करता था और खूब घूमता था. कविताएं मैंने छंदों और गीतों में लिखीं. पढ़ता खूब था क्योंकि वहीं मेरी दुनिया थी. किताबों और चित्रों की दुनिया में रहता था. मेरे पिता जी बीमार थे और कोमा में जाने से पहले उन्होंने मेरी मां को लिखा था कि वो सबसे अधिक मुझे लेकर परेशान रहते हैं कि इसका क्या होगा. एक लेखक का दुनिया को देखने का अलग बोध होता है. वो अपनी क्रिएटिविटी के जरिए दुनिया को देख और समझ पाता है.

हिंदी साहित्य के सांस्थानिक स्वरूप से आपका विरोध जगजाहिर है. यह विरोध क्यों है? इसका आपको क्या खामियाजा उठाना पड़ा?
विरोध इसलिए है क्योंकि मैंने वहां की स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी है. मैंने जाति व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया. मैं हिंदी समाज की आंखों का तारा कभी नहीं रहा. मुझे हाशिये से भी धकेलने की हर संभव कोशिश की गई. अगर आप पीली छतरी वाली लड़की कहानी पढ़ें तो आप पाएंगे कि आज हमारे देश में कोई ऐसी जाति नहीं है जो यह दावा कर सके कि वह शुद्ध है. मेरी उस रचना को लेकर इतना विष वमन किया गया कि मैं आपको बता नहीं सकता. हिंदी में इन लोगों का पूरा गिरोह है. वे अगर ठान लें तो आपको कहीं काम नहीं करने देंगे. आप अगर पहले से कहीं काम कर रहे हैं तो आपको निकलवा दिया जाएगा. मुझे जेएनयू में करीब 25 साल की उम्र में दाखिला मिला. पीली छतरी वाली लड़की किसी दूसरे की कहानी नहीं है. उसमें मेरे खुद के अहसास हैं. लेकिन मुझे मेरी ही भाषा से लगातार निष्कासित करने की कोशिश की गई. मुझे निरंतर अपमानित किया गया. लेकिन मैं लगातार उनके खिलाफ मुखर रहा. आज भी मैं अपनी प्रिय भाषा को उनकी जकड़बंदी से मुक्त कराने में लगा हूं.

इन सब बातों के बावजूद आप हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में से हैं.
यह तो आम पाठकों का स्नेह है जिसके भरोसे मैं खड़ा हूं. उस वक्त की एक बात आपको बताता हूं. उस कहानी को लेकर मुझे जो समस्या हुई है उसके बारे में केवल मैं ही महसूस कर सकता हूं. कुछ साल पहले की बात है. मुझे जेएनयू से नौकरी ऑफर हुई लेकिन ऐन वक्त पर अड़ंगा लगा दिया गया कि यह नौकरी तो एससी एसटी के लिए है. अगर मैं इसका विरोध करता तो मुझे एंटी एससी एसटी मान लिया जाता. इसके बाद डीयू में मेरी नौकरी की बात चली तो एचआरडी मिनिस्टर तक को साधा गया ताकि मुझे नौकरी न मिल सके. तो यह नेक्सस इतना करप्ट हो चुका है कि क्या कहूं? इसी के बाद मैंने मोहनदास लिखी.

एक लेखक या कहें एक रचनाकार की संवेदनशीलता अन्य लोगों से किस तरह अलग होती है?
एक लेखक का दुनिया को देखने का अलग बोध होता है. वो अपनी क्रिएटिविटी के जरिए दुनिया को देख और समझ पाता है. यही वजह है कि वह स्वभाव से क्रांतिकारी होता है. वह बेहद संवेदनशील होता है और एक तितली की मौत से भी विचलित हो सकता है. इतना ही नहीं, उस मौत के पीछे वह न केवल पर्यावरण संबंधी खामियों को बल्कि पूरी व्यवस्था की असफलता को पहचान सकता है. यह पॉलिटीशियन नहीं समझेगा. आपको याद होगा किसी कवि ने कहा है कि जो सरकारें बाघ को बचाने का दावा करती हैं वे झूठ बोलती हैं क्योंकि वे घास के बारे में चुप हैं. क्योंकि घास बचेगी तभी बाघ बचेगा. हम सबका जीवन बहुत छोटी-छोटी चीजों से बना है…

आप पर आरोप है कि आप अपने आस-पास के लोगों पर रचनाएं लिखते हैं. कहानी राम सजीवन की प्रेम कथा के बारे में कहा जाता है कि वह मशहूर कवि गोरख पांडेय पर केंद्रित है.
मुझे सच बोलने के लिए तमाम यातनाओं से गुजरना पड़ा है. उनमें से एक हैं ये आरोप. मोहनदास से लेकर पीली छतरी वाली लड़की और राम सजीवन की प्रेम कथा तक पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मेरे निजी अनुभवों पर हैं. गोरख मेरे बहुत अच्छे मित्र थे. यह कहानी पढ़कर हम दोनों खूब हंसा करते थे. वैसे भी राम सजीवन की प्रेम कथा को जो लोग किसी का मजाक उड़ाने वाली कहानी मानते हैं उनकी समझ में समस्या है. 

गोरखपुर जाकर योगी आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार लेने का विवाद भी जब तब प्रेत की तरह उठ खड़ा होता है.
यह अनायास नहीं है कि मैं यहां पुरस्कार लेता हूं और वहां हिंदी साहित्य जगत के खेमेबाज मुझ पर टूट पड़ते हैं. मैं एक बार फिर कहता हूं. मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जिस पर मुझे सफाई देनी पड़े. वह एक नितांत पारिवारिक समारोह था. कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे फुफेरे भाई थे और उनकी मौत के बाद पहली बरसी पर पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान मुझे दिया गया और यह उनके परिवार की इच्छा थी. हां, मेरी गलती यह जरूर रही कि मैं एक नितांत पारिवारिक आयोजन के व्यावहारिक राजनीतिक पक्ष के बारे में नहीं सोच सका.

‘आप जिन्हें हिंदी के बड़े आलोचक कहते हैं वे छोटी-छोटी चीजों पर बिक जाने वाले लोग हैं. वे किसी को भी प्रेमचंद, मुक्तिबोध या टैगोर कह सकते हैं’

आप देश के आदिवासी बहुल इलाके से आते हैं. इस वक्त आपकी नियुक्ति भी इंदिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय, शहडोल में है. तो प्राकृतिक संसाधनों को लेकर आदिवासियों के साथ ज्यादती का जो सिलसिला है उस पर एक लेखक के रूप में आपका क्या नजरिया है?
जो लोग आज आदिवासी इलाकों में बॉक्साइट या कोयले के लिए अतिक्रमण कर रहे हैं वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वे बॉक्साइट तो निकाल लेंगे लेकिन उसकी कीमत कितनी ज्यादा होगी. आप सोच रहे हैं कि केवल आदिवासियों का ही विस्थापन हो रहा है तो ऐसा नहीं है. विस्थापन और भी कई चीजों का हो रहा है जिसे आम तौर पर लोग देख नहीं पाते हैं. जब मैं जाता हूं तो रास्ते में बाण सागर परियोजना पड़ती है, जिसके लिए सोन नदी को पहाड़ों के बीच में रोक दिया गया है. इसकी वजह से बहुत-से जानवर गए, वनस्पतियां गईं. लेकिन जो विस्थापन हुआ वह वहां के लोगों के साथ-साथ बंदरों का भी हुआ. आज अगर आप रीवा से शहडोल के लिए निकलें तो रास्ते में आप पाएंगे कि लंगूर अपने पूरे कुनबे के साथ सड़क पर बैठे हैं. आप हॉर्न दीजिए, वे नहीं भागते हैं. ऐसा लगता है उन्होंने ड्रग ले लिया है. रोज सड़क पर कई बंदर आपको मरे हुए मिलेंगे. यह एक किस्म की आत्महत्या है जो विस्थापित होने के दुख से उपजी है. इस पर किसी का ध्यान नहीं है. जंगल तो डूब गया वे कहां जाएंगे. वे गांवों में आते हैं और दलहन और फल-सब्जियों को खाते हैं. तो पैटर्न इतना चेंज हुआ है कि अब वहां कोई दलहन नहीं उगाता. वह नकदी फसल थी लेकिन बंदरों के कारण बंद हो गई. अब फलदार पेड़ों की रक्षा नहीं हो पा रही. लोगों ने अब बंदरों की वजह से खपड़े की छत का इस्तेमाल बंद कर दिया क्योंकि वे तोड़ देते थे. अब उनकी वजह से टिन या एस्बेस्टस की छत इस्तेमाल हो रही है. तो आप देखिए कि महज एक बांध बनाने से क्या-क्या बदला? आपका खान-पान बदल गया क्योंकि आपने दलहन व फल उगाने बंद कर दिए. कुंभकार का पेशा खत्म हो गया क्योंकि आपने खपरैल व मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल करने बंद कर दिए. आप आंदोलन करते हैं केवल आदिवासियों के लिए. वह ठीक है, अपनी जगह जरूरी है लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं है कि एक पूरी जीवनशैली खत्म हो रही है.

आपके लेखकीय जीवन की बड़ी चुनौतियां कौन-सी रहीं?
मेरा तो पूरा जीवन ही चुनौतियों से भरा रहा. मैं तो एक आम मेहनतकश मजदूर हूं अपनी भाषा का. आप देखिए कि हिंदी पर किसका कब्जा है. हम जैसे लोग कहीं नहीं हैं. 90 के बाद सबसे ज्यादा शोषण भाषा का हुआ है. पूरा कारोबार भाषा का है. मीडिया भाषा का दोहन कर रहा है, विज्ञापन में, इंटरनेट पर हर जगह भाषा का ही खेल है. राजनीति से लेकर पॉप कल्चर तक हर जगह भाषा का इस्तेमाल है, लेकिन लेखक की आवाज इसमें गायब है. जो बात अरविंद केजरीवाल या शरद पवार बोलेंगे, उसको तो पूरा कवरेज मिलेगा. एक लेखक अपने दुख बयान करेगा या एक तितली के मरने की बात करेगा तो उसे कौन सुनेगा. तो भाषा एक कमोडिटी में बदल गई है.

आपने अभी कहा कि मीडिया भाषा का शोषण कर रहा है. इस बात को थोड़ा स्पष्ट करेंगे?
देखिए, एक कविता है जिसका अनुवाद करें तो वह कहती है कि शब्दों को बबलगम की तरह चबाया जा रहा है और गुब्बारे की तरह फुलाया जा रहा है. खूबसूरत एंकर शब्दों को चबाती हैं और राजनेता उनसे दांत मांजते हैं और कुल्ला करते हैं. मास मीडिया झूठ का कारोबार है. वह सच दिखाने नहीं सच को छिपाने का काम करता है. आप सुधीर चौधरी का मामला देखिए या नीरा राडिया का. यह सारा काम भाषा के जरिए ही तो हो रहा है. मीडिया के बारे में किसी को कोई गलतफहमी नहीं है. रोम्यां रोलां कहते हैं कि अथॉरिटी शब्द ऑथर से ही बना है. जो भाषा पर अधिकार रखता था, वह ऑथर था. क्राइस्ट, प्रोफेट मोहम्मद, वेदव्यास ये ऐसे ही लोग थे. लेकिन जब प्रिंट आया तो भाषा पर अचानक बहुतों का कब्जा हो गया. वकील, नेता, डॉक्टर सबका. यही वह वक्त था जब ऑथर की जगह राइटर ने ले ली. ऑथर व राइटर में फर्क है. ऑथर बोलता था और राइटर लिखता था. यह मुश्किल काम था, इसीलिए ऑथर का इतना अधिक सम्मान था. आप अपने यहां ही देखिए कि गांधी और टैगोर को एक ही धरातल पर रखा जाता था. आज क्या स्थिति है? लेखक एक पुलिसवाले के पीछे चापलूस की तरह दौड़ रहा है. आप जिन्हें हिंदी के बड़े आलोचक कहते हैं वे छोटी-छोटी चीजों पर बिक जाने वाले लोग हैं. वे किसी को भी प्रेमचंद, मुक्तिबोध या टैगोर कह सकते हैं. लेखक की अथॉरिटी नहीं रही. आज अगर हम ये सोचें कि सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह आकर कहें कि उदय प्रकाश आप कैसे हैं, आपकी तबीयत तो खराब नहीं तो यह नहीं होने वाला. आज स्थिति यह है कि आप कलेक्टर से मिलने जाएंगे तो आपको चपरासी
रोक लेगा.

पिछले दो दशक में सबसे बड़ा बदलाव आपने क्या महसूस किया है?
आर्थिक असमानता को छोड़ दें तो मनुष्य की मनुष्य से भावनात्मक दूरी बहुत बड़ी है. मेरी कहानी तिरिछ अगर आपने पढ़ी हो तो वह यही कहती है. यह बात सन 82 की है. मैं उस वक्त अशोक विहार से आईटीओ आता था- टाइम्स ऑफ इंडिया. मैं गौर से देख रहा था विकास बहुत तेजी पर था. बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही थीं और दिल्ली का नक्शा बदल रहा था. मैं एक मोपेड से आता था. मैंने देखा कि पहाड़गंज के आस-पास ऐसे पोस्टर लगने लगे कि किसी अपरिचित से बात न करें. अपने सामान की खुद देखभाल करें. तो संदेह संदेह संदेह. हर किसी पर संदेह करो. इसकी शुरुआत वहीं से हुई. लोगों ने एक-दूसरे की परवाह करनी बंद कर दी. आज देखिए उस राह पर हम कितना आगे निकल आए हैं.

‘तैने सौ नंबर डायल किया था?’

दिल्ली पुलिस का एक नारा है– दिल्ली पुलिस सदा आपके साथ. दिल्ली पुलिस का यह सूक्त वाक्य गली-चौराहों और आए दिन अखबारों में साया होने वाले विज्ञापनों के बावजूद जनता में क्यों नहीं पैठ बना पाया है… इसका अनुभव आखिरकार पिछले दिनों हो ही गया. उसी दिन समझ में आया कि राह चलते घायलों को देखने के बाद मददगार भावों के बावजूद दिल्ली का नागरिक क्यों सौ नंबर पर फोन करने से बचता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बगल से गुजरते वक्त एक दिन शाम को सड़क पर दूर से ही नजर आई भीड़ ने बता दिया कि वहां कोई अनहोनी हो गई है. नजदीक जाने पर भयावह नजारा था.

एक ऑटो सड़क के ठीक बीचोबीच पलट गया था. उससे कुछ दूर एक साइकिल ठेला उलटा पड़ा था. ठेलावाला एक तरफ बेसुध सड़क पर ही गिरा पड़ा था… नजदीक जाने के बाद पता चला कि ऑटो में लहूलुहान एक महिला और ऑटो ड्राइवर फंसे पड़े हैं. कुछ लोग उस ऑटो को उठाने की जुगत में लगे हुए थे. मैंने भी मदद की नीयत से अपनी कार एक किनारे खड़ी कर दी… घायलों की सहायता में भी ऊंच-नीच का भाव साफ नजर आ रहा था. ऑटो में फंसी संभ्रांत-सी महिला की मदद में कई हाथ उठे. लेकिन साइकिल ठेलेवाले के पास कोई नहीं था. भागकर मैंने एक व्यक्ति की मदद से उसे उठाया और सड़क के किनारे ले जाकर बैठाया. उसकी बुरी हालत देख सौ नंबर को डायल भी कर दिया. जब मैं सौ नंबर डायल कर रहा था तो कई लोगों ने मुझे टोका भी- भइया, मुसीबत क्यों मोल रहे हो? मैंने सोचा- इसमें भला कैसी मुसीबत. लेकिन सौ नंबर डायल क्या किया मुसीबत मेरे पीछे दौड़ने लगी. दिल्ली पुलिस का दावा है कि वह पांच मिनट में पहुंच जाती है.

लेकिन पांच मिनट में पुलिस तो नहीं पहुंच पाई, अलबत्ता पांच नंबरों से पांच फोन आ भी गए. हर बार डांटने जैसी आवाज में पूछा जाता- कहां है ये जगह. मैं जगह की तफसील से जानकारी देना खत्म करता कि दूसरा फोन आ जाता- तैने सौ नंबर डायल किया था… कहां है ये जगह? बहरहाल कोई बीस-पच्चीस मिनट बाद पुलिस की गाड़ी आई. इंचार्ज एक हेड कांस्टेबल थे. उन्हें सारी बात बताकर मैंने उनसे इजाजत ली और अपने गंतव्य की तरफ निकल पड़ा. अभी कार स्टार्ट कर ही रहा था कि अगला नंबर आ गया- पहला सवाल वही- तैने सौ नंबर डायल किया था… क्या हुआ… कहां है ये जगह… मैंने जवाब दिया- पुलिस आ गई है और घायल को ले गई. अभी कुछ दूर और गया कि फिर दूसरा फोन आ गया.

‘कई लोगों ने सौ नंबर न मिलाने की सलाह भी दी, लेकिन मैंने सौ नंबर डायल क्या किया मुसीबत मेरे पीछे दौड़ने लगी’

फिर वही सवाल- कहां है ये जगह, क्या हुआ… किसको कितनी चोट लगी. मेरा जवाब था- भैया, चोट तो अस्पताल बताएगा. बहरहाल सौ नंबर वाले घायलों को अस्पताल ले गए. तब दन से दूसरा सवाल- किस अस्पताल ले गए? अपनी रिरियाती आवाज में जवाब दिया- भइया, मुझे क्या पता. सौ नंबर वाले जानें. शाम साढ़े पांच बजे की इस घटना की जानकारी मैं साढ़े सात बजे तक देता रहा. फोन पर ये जानकारी दे-देकर मैं परेशान हो गया था. आठ बजे तक फोन नहीं आया तो मुझे लगा कि पुलिस महकमा अब संतुष्ट हो गया. लेकिन यह क्या, अपनी सारी खुशी काफूर हो गई. सवा आठ बजते-बजते फोन आ गया- पहला सवाल तो वही- तैने सौ नंबर डायल किया… फिर अगला सवाल- ये कहां हुआ… उसका जवाब देते ही अगला सवाल – लेकिन यहां तो कुछ नजर नहीं आ रहा. अब अपना धैर्य जवाब दे गया था. मैंने कहा कि हादसे के तीन घंटे हो गए. अभी तक क्या लोग वहीं रहेंगे. लगा मैंने सौ नंबर डायल करके गुनाह कर दिया और पुलिसवाले नए-नए नंबरों से इस गुनाह की सफाई मांग रहे हैं. चूंकि मेरा धैर्य चुक गया था, लिहाजा मैंने भी उल्टे सवाल दाग दिया- क्या पुलिस के बीच कोई कोऑर्डिनेशन नहीं है.

इतना सवाल पुलिसवाले के कान में पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे उसके वजूद को चुनौती ही दे डाली- ज्यादा भाषण ना दे… नहीं होता कोऑर्डिनेशन… साफ-साफ बता कहां हुआ ये हादसा… उसके बाद मुझे भी अपनी वाली पर उतरना पड़ा. बहरहाल उसके बाद एक और फोन आया और उस छोर पर सफाई मांग रहे सब इंस्पेक्टर साहब से भी बकझक हुए बिना नहीं रही.
इसके बाद समझ में आ गया कि आखिर लोग क्यों सौ नंबर पर डायल करने से बचते हैं. आखिर इतनी पूछताछ के बाद कोई यह गुनाह करने का जोखिम क्यों उठाए. बहरहाल राहत की बात यह है कि इस गुनाह-ए-जिल्लत के बावजूद उन घायलों की हालत सुधर रही है.                                       

नए बैंकों के लिए लाइसेंस

सरकार नए बैंकों के लिए लाइसेंस क्यों जारी करना चाहती है?
वर्ष 2004 के बाद से सरकार ने कोई नया बैंकिंग लाइसेंस जारी नहीं किया है. नए बैंकों को ग्रामीण इलाकों में एक निश्चित संख्या में शाखाएं खोलने और कर्ज आदि देने की प्रतिबद्धता होगी जिससे देश की अर्थव्यवस्था में सक्रियता आएगी. बैंकों और उनकी शाखाओं की संख्या जितनी ज्यादा होगी, आम जनता की उन तक पहुंच उतनी ही सुगम होगी. तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने फरवरी 2010 के बजट में नए लाइसेंस की बात कही थी लेकिन बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की अनिच्छा के कारण यह मामला अब तक टलता आ रहा था. अब आरबीआई ने कहा है कि इसके मानक जल्द घोषित किए जाएंगे.

कारोबारी घरानों को लाइसेंस देने पर क्या विवाद है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर बड़े कारोबारियों ने बैंक भी खोल लिए तो उनका उद्देश्य अपने लिए लाभ कमाना ही रहेगा. ऐसे में हितों का टकराव पैदा होगा. वे बैंक की पूंजी अपने कारोबार की बिगड़ती सेहत दुरुस्त करने में लगा सकते हैं जिससे जनता के पैसे का नुकसान होगा. वरिष्ठ अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज के मुताबिक अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी कारोबारियों को बैंक खोलने की अनुमति नहीं है. जापान और उत्तर कोरिया जैसे चुनिंदा देशों में ही इसकी अनुमति है.

इससे जनता को क्या लाभ होगा?
सरकार ने हाल ही में सब्सिडी के नकदी हस्तांतरण का जो फैसला किया है उसके लिए खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में बैंक शाखाओं की आवश्यकता होगी. यह व्यवस्था उन लोगों के लिए काम की साबित हो सकती है. लेकिन एक विचार यह भी है कि देश के बैंकिंग क्षेत्र में 70 फीसदी हिस्सा सरकारी बैंकों का है. निजी बैंकों की हिस्सेदारी 30 फीसदी है. नए बैंकिंग लाइसेंस के जरिए सरकार निजी क्षेत्र में ही प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगी. इस प्रतिस्पर्धा का आम जनता को बहुत अधिक फायदा मिल पाएगा, कई जानकारों को ऐसा नहीं लगता. अर्थशास्त्रियों का एक धड़ा ऐसा भी है जो मानता है कि देश में अनेक छोटे-छोटे बैंकों के बजाय कुछ बड़े और विश्वस्तरीय बैंक होने चाहिए.
  -पूजा सिंह

गुरुजी के सबक का सबब

सात जनवरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) प्रमुख शिबू सोरेन के रांची आवास पर गहमागहमी थी. नेताओं-कार्यकर्ताओं की भीड़ में सरकार रहेगी या जाएगी, इस पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही थीं. तभी मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा वहां पहुंचे. यह दिन के करीब साढ़े बारह बजे की बात है. आधा घंटे तक वे अपने मूल राजनीतिक गुरु शिबू सोरेन के आवास पर रुके. बात फैली कि यह सत्ता बचाने की आखिरी कोशिश है. यह भी कि अर्जुन मुंडा क्राइसिस मैनेजमेंट में माहिर हैं, बात बन जाएगी. अंदरखाने से निकले एक झामुमो नेता बोले, ‘शिबू सोरेन तीन दिन का और समय देने पर राजी हो रहे हैं.’ मोहलत की इस खबर से कुछ लोगों ने राहत की सांस ली.
मामला सुलझता दिख रहा था, लेकिन पार्टी नेताओं की बैठक शुरू होने के बाद अचानक बात गड़बड़ा गई. एक वरिष्ठ झामुमो नेता बताते हैं, ‘झामुमो खेमे के मंत्रियों में अधिकांश ने सरकार नहीं गिराने की बात कही थी. परेशान शिबू सोरेन बैठक से उठकर अपने कमरे में गए. वहां उनकी नजर टीवी पर आ रही खबरों पर पड़ी. एक नेता का बयान आ रहा था कि झामुमो की कोई बात नहीं मानेंगे. शिबू ने पूछा कि यह कौन नेता है! बताया गया कि झारखंड भाजपा के प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान हैं. कमरे से निकलकर शिबू सोरेन ने कहा कि ‘अब तीन दिन का समय नहीं दिया जाएगा,  सरकार से समर्थन आज ही वापस लेंगे.’ सूत्रों के मुताबिक शिबू के ऐसा कहने से वे मंत्री भी हक्के-बक्के रह गए जो सरकार गिराने के फैसले का विरोध कर रहे थे.

लेकिन ऐसा लगा जैसे शिबू सोरेन के बेटे और राज्य के उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस इशारे के इंतजार में ही थे. वे बाहर निकले और मीडियाकर्मियों को बयान दे दिया कि पार्टी सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करती है. हेमंत जब यह एलान कर रहे थे तब झामुमो के ही दो वरिष्ठ नेताओं साइमन मरांडी और हेमलाल मुर्मू के चेहरे पर उभरा तनाव साफ दिख रहा था. सूत्रों के मुताबिक इसके बाद भीतर हो रही बैठक में वे बिफरे भी कि हेमंत कौन होते हैं यह एलान करने वाले. बेटे की घोषणा पर अंदरूनी विवाद और न गहराए, इसलिए आधे घंटे में शिबू खुद मीडिया के सामने आए और उन्होंने बेटे हेमंत की बात पर मुहर लगा दी.

एक पखवाड़े से अधिक समय से सरकार पर संकट छाया था. इसके बावजूद भाजपा का कोई केंद्रीय नेता इसके हल की कोई संभावना तलाशने रांची नहीं आया

झामुमो के वरिष्ठ नेता यह किस्सा ऐसे सुनाते हैं जैसे टीवी पर दिखे झारखंड भाजपा प्रभारी के बयान की वजह से सरकार चली गई. जबकि उस दिन अपने ही नेताओं से घिरते जाने के बाद परेशान शिबू सोरेन की छटपटाहट और हेमंत सोरेन में सत्तापलट करने की अकुलाहट साफ-साफ दूसरी कहानी बयान कर रही थी.

खबर लिखे जाने तक झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर चुके हैं. अपने 12 वर्षों के सफर में झारखंड आठ मुख्यमंत्री और दो राष्ट्रपति शासन देख चुका है. इस बार सत्ता की सियासत साधने के लिए चले खेल के आखिरी परिणाम से यह बात साफ हुई है कि एक समय सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन में संघर्ष के जरिए अहम भूमिका निभाने के चलते गुरुजी और दिशोम गुरु के नाम से प्रतिष्ठित हुए और बाद में पूरी तरह से परिवारवाद के पोषक बने शिबू सोरेन की आखिरी महत्वाकांक्षा यही है कि उनका बेटा उनके सामने एक बार मुख्यमंत्री जरूर बने. जानकारों के मुताबिक शिबू ऐसा इसलिए भी चाहते हैं कि झामुमो में बुजुर्ग-वरिष्ठ हो चले नेताओं से लेकर नए-नवेले कार्यकर्ता भी यह मान लें कि उनके बाद झामुमो के तारणहार सिर्फ और सिर्फ उनके बेटे हेमंत ही हैं और उन्हें ही उनका असली उत्तराधिकारी माना जाए.
लेकिन क्या सरकार की असामयिक बलि तीन बार मुख्यमंत्री बनने का मौका जुगाड़ लेने के बावजूद एक साल भी उस पद पर रह पाने में नाकाम शिबू सोरेन, उनके बेटे हेमंत सोरेन और पार्टी झामुमो को इस मकसद में सफल होने देगी? जानकार बताते हैं कि इतनी आसानी से नहीं, क्योंकि झामुमो अब बैकफुट पर है और गेंद पूरी तरह कांग्रेस के पाले में जा चुकी है. कांग्रेस झामुमो को अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करना जानती है, इसलिए हेमंत की रांची-दिल्ली दौड़ और छटपटाहट के बाद भी कांग्रेसी नेता इत्मीनान के मूड में दिखे. झारखंड कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद का कहना था, ‘हमें कोई जल्दबाजी नहीं, भाजपा और झामुमो की अंदरूनी लड़ाई में सरकार गई है और इसमें हम किसी भी तरह की पहल तभी करेंगे जब पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएं.’

कांग्रेस अपनी सुविधानुसार पूरी तरह आश्वस्त होने की प्रक्रिया में है. झामुमो समेत दूसरे कई दलों के नेता और मौके की ताक में बैठे निर्दलीय सरकार बनवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर एक किए हुए हैं जबकि भाजपा, सरकार की दूसरी सहयोगी पार्टी आजसू और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा फिर से चुनाव के पक्ष में हैं. मरांडी कहते हैं कि फिर से सरकार बनने देने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि इसके लिए तमाम समझौते होंगे इसलिए बेहतर है कि नया जनादेश प्राप्त किया जाए. सरकार में तीसरी साझेदार रही आजसू के प्रमुख और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो भी कहते हैं कि फिर से चुनाव हो. फिलहाल 81 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में भाजपा और झामुमो, दोनों के पास 18-18 विधायक हैं.

सरकार के तीसरे सहयोगी आजसू के पास छह विधायक हैं. झारखंड विकास मोर्चा के 11 और कांग्रेस के 13 विधायक हैं. राजद के पांच विधायक हैं, भाकपा माले के पास एक सीट है और शेष पर निर्दलीयों का कब्जा है. झामुमो और कांग्रेस के पास यह आसान विकल्प है कि फिर से चुनाव की मांग कर रहे भाजपा, आजसू और झाविमो को छोड़कर भी आपस में तमाम किस्म के समझौते करके सरकार बना ली जाए. लेकिन ऐसी सरकार का क्या होगा और वह कितनी कारगर होगी, झारखंड के लोगों को इसका लंबा अनुभव रहा है. भाकपा माले के विधायक विनोद सिंह कहते हैं, ‘अब फिर से समझौतावादी रुख से सरकार बनाने के बजाय जनता पर फैसला छोड़ा जाए क्योंकि यह तो साफ हुआ कि झामुमो और भाजपा के मेल से यह सरकार राज्यहित में नहीं बनी थी. समझौते के तहत अगली सरकार भी राज्यहित में नहीं बनेगी.’

आगे क्या होगा यह तो दिल्ली में तय होगा, लेकिन सरकार बनाने-बिगाड़ने के इस खेल के बाद राज्य की राजनीति में झामुमो और भाजपा का क्या होगा, यह झारखंड में ही तय होना है क्योंकि सरकार के बनने और अब चले जाने की अंदरूनी कहानी से लोग धीरे-धीरे वाकिफ होते जाएंगे. अंदरूनी कहानियां कई तरह की हैं. एक बड़ी बात तो शिबू सोरेन का पुत्रमोह है ही, उसके समानांतर ही सरकार जाने के पीछे और भी कई चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में हैं. एक तो यह कि शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत सोरेन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से लेकर कोयला घोटाले तक में सीबीआई का शिकंजा कसने की संभावना बढ़ती जा रही थी, इसलिए याचक की तरह केंद्र सरकार की शरण में जाना झामुमो की मजबूरी हो गई थी.

दूसरी चर्चा यह चल रही है कि झारखंड का संथाल परगना झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ रहा है और  वहां भाजपा लगातार झामुमो को कमजोर करने के अभियान में लगी हुई थी. उदाहरण के लिए, भाजपा के राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे वहां लगातार झामुमो पर वाकप्रहार कर रहे थे, शिबू सोरेन को भ्रष्ट नेता बता रहे थे. उधर, भाजपा-झामुमो की अंदरूनी लड़ाई का फायदा उठाने के लिए राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी लगातार संथाल परगना में कैंप भी करने लगे थे. संथाल में बाबूलाल की मजबूत पकड़ रही है और जानकारों के मुताबिक झामुमो को यह डर सताने लगा था कि भाजपा वहां अगर झामुमो के खिलाफ काम करती रही तो वह अपना कुछ भला करे ना करे, बाबूलाल मरांडी जरूर मजबूत होते जाएंगे. जानकारों के मुताबिक ऐसे में जरूरी था कि अपना गढ़ बचाने के लिए झामुमो सरकार से अलग हो जाए. 

चर्चा यह भी चल रही है कि इस सरकार को झामुमो ने भाजपा को समर्थन देकर बनवाया ही इसलिए था ताकि समय आने पर बदला लिया जा सके. दरअसल 2010 में शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने थे और तब भाजपा समर्थन दे रही थी. भाजपा ने भी तब झामुमो को बैकफुट पर लाकर समर्थन वापस ले लिया था और 30 मई, 2010 को आखिरकार सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. उसके बाद फिर दोनों दलों के सहयोग से सरकार बनी. इस बार झामुमो भाजपा को बैकफुट पर लाई और बीच में समर्थन वापसी करके उसने अपने नेताओं को सत्ताच्युत करने से उभरे जख्मों को भरते हुए हिसाब-किताब बराबर किया. एक जानकार यह भी बताते हैं कि खनन और दूसरे किस्म के ठेकों में भाजपा और आजसू के कार्यकर्ताओं-नेताओं का दबदबा बढ़ता जा रहा था. ऐसे में झामुमो कार्यकर्ता और नेता लगातार अपने नेताओं पर दबाव बना रहे थे कि ऐसी सरकार का क्या मतलब जब कोई फायदा ही न हो.

संकेत साफ है कि सरकार जाने की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार हो रही थी. हो सकता है, इनमें से कोई वजह सही हो या एक-एक कर सभी वजहें सही हों. झामुमो ने इसके लिए पहले राज्य में स्थानीय नीति तय करने से लेकर अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर एक पत्ता फेंका था लेकिन इस पर भी उसकी भद ही पिटी. सवाल उठे कि इन दोनों मसलों पर अगर सरकार कुछ नहीं कर रही तो उसमें झामुमो भी बराबर की दोषी है. तब झामुमो ने कहा कि समन्वय ठीक से नहीं हो रहा, इस पर भी उसकी हंसी उड़ी क्योंकि सरकार के समन्वयक खुद शिबू सोरेन थे. इसी बीच शिबू सोरेन काफी दिनों से 28-28 माह की सरकार का वास्ता देकर मीडिया को बयान दे रहे थे. हालांकि तब हेमंत ने तहलका से बातचीत में भी कहा था कि ऐसा कोई करार सरकार के लिए नहीं हुआ है.

संकेत साफ है कि सरकार जाने की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार हो रही थी. हो सकता है, इनमें से कोई वजह सही हो या एक-एक कर सभी वजहें सही हों.

लेकिन बाद में हेमंत ने भी अपने पिता का राग दोहराना शुरू कर दिया. एक सीडी भी जारी की गई, जिसमें 28-28 माह के करार की बात सामने आई लेकिन तुरंत ही उस सीडी की बात भी खंडित हो गई क्योंकि वह बातचीत वर्तमान सरकार के बजाय इसके पहले सरकार बनाने की पहल के लिए की गई थी. बात खंडित हो गई लेकिन यह साफ हुआ कि अर्जुन मुंडा ने ऐसे समझौते से सरकार बनाने की कोशिश की थी.

अभी जो सरकार चल रही थी वह भी भाजपा संसदीय बोर्ड के फैसले के उलट जाकर बनाई गई थी. अर्जुन मुंडा की यह सरकार नहीं बचे, इसे लेकर राज्य के कुछ भाजपाई नेता तो बहुत दिनों से भीतरघात कर ही रहे थे लेकिन इस संकट के दौरान यह भी साफ हुआ कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी इस सरकार को ज्यादा पसंद नहीं कर रहा था. एक पखवाड़े से अधिक समय से सरकार पर संकट छाने के बावजूद पार्टी का कोई केंद्रीय नेता इसमें पहल करने को नहीं आया. जानकारों का मानना है कि अर्जुन मुंडा आखिरी दिन तक शिबू सोरेन के आवास पर जिस तरह से अपनी सत्ता बचाने की ललक लिए हुए पहुंचे थे, उससे यह भी साफ होता है कि झामुमो की लाख लताड़ के बावजूद वे सत्ता के लिए बेचैन थे.

आखिर में सवाल उठता है कि अगर चुनाव हो तो कोई स्थायी सरकार बनने की कितनी संभावना है. जानकारों के मुताबिक फिलहाल जो राजनीतिक हालात हैं उनमें यह कतई संभव नहीं दिखता. तो फिर क्या रास्ता है जिससे झारखंड राजनीतिक प्रयोगशाला बनने से मुक्त हो जाए? इसका एक जवाब बिहार के दो नेताओं के बयान से आता है. लालू प्रसाद कहते हैं कि बिहार-झारखंड को फिर से एक कर दिया जाए. और नीतीश कुमार का मानना है कि झारखंड में विधानसभा सीटों की संख्या कम से कम 150 की जाए नहीं तो यह संकट बना ही रहेगा.    

अधिकार पर वार

उत्तराखंड के एक व्यक्ति को अपनी शिक्षिका पुत्री के लिए एक शिक्षक वर की तलाश थी. इन महोदय को एक अनोखा आइडिया सूझा. इन्होंने सोचा कि क्यों न सूचना के अधिकार या आरटीआई के तहत एक हनुमान  रूपी आवेदन भेजकर शिक्षक वरों की सूचनाओं का पूरा पहाड़ ही मंगा लिया जाए. जनाब ने उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में एक आवेदन दाखिल किया. इसमें उन्होंने प्रदेश में एक निश्चित आयु वर्ग तक के शिक्षकों के नाम, उनकी शैक्षिक योग्यताएं, तैनाती स्थल, मूल निवास आदि की सूचना मांगी. एक महीने से भी कम समय और मात्र 10 रुपये में इनको योग्य वरों की संपूर्ण सूची उपलब्ध हो गई. फिर इन्होंने अपनी पसंद के हिसाब से अपनी बेटी का रिश्ता भी करवा दिया. दामाद ढूंढ़ने का इससे सस्ता, सुलभ और प्रामाणिक तरीका शायद ही कोई और हो.

सहारनपुर के पवन विहार में रहने वाले एक युवक का रिश्ता मेरठ से तय हुआ तो लड़की के परिजनों ने सहारनपुर एसएसपी के दफ्तर में सूचना का आवेदन करके पूछ लिया कि संबंधित लड़के का नाम किसी आपराधिक गतिविधि के लिए पुलिस रिकॉर्ड में तो नहीं है. आरटीआई के जरिए होने वाले दामाद का पुलिस रिकॉर्ड सुनिश्चित करने के बाद ही बात आगे बढ़ी.

 ‘यदि मान भी लिया जाए कि कुछ लोग आरटीआई द्वारा अधिकारियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं तो भी कोई ईमानदार अधिकारी इस बात से कभी नहीं घबराएगा’

आरटीआई से जुड़े ये किस्से सुनने में दिलचस्प जरूर लगते हैं, लेकिन ऐसे ही किस्से सरकार को इस कानून के पर कतरने का बहाना दे रहे हैं. ऐसे ही किस्सों के सहारे सरकार इस कानून को कमजोर करने की ताकत हासिल कर रही है. लोकतंत्र में ‘लोक’ के प्रति ‘तंत्र’ की जवाबदेही होना आवश्यक है. सूचना के अधिकार ने यह काम बखूबी किया भी है जिसके लिए इस कानून की खूब तारीफ हुई है. लेकिन आरटीआई के जरिए सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का तर्क सरकार द्वारा कई बार दिया जा चुका है. इसके चलते इस कानून को नियंत्रित करने की बात भी उठ रही है. हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी आरटीआई के दुरुपयोग का हवाला देते हुए इसकी समीक्षा की बात कही थी. तमाम राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया. भारी विरोध के चलते केंद्र सरकार भले ही आरटीआई में प्रस्तावित संशोधन से पीछे हट गई हो, लेकिन अलग-अलग राज्यों के आरटीआई प्रावधान देखे जाएं तो साफ हो जाता है कि इस कानून को कमजोर करने की पहल हो चुकी है.

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 एक केंद्रीय अधिनियम है. लेकिन देश भर के सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, उच्च न्यायालयों, विधान सभाओं, सर्वोच्च न्यायालय, संसद के दोनों सदनों और सभी सूचना आयोगों को आरटीआई से संबंधित अपने नियम बनाने का अधिकार है. इस तरह पूरे देश में आरटीआई के 100 से भी ज्यादा अलग-अलग नियम हो जाते हैं. नियम बनाने की इसी ताकत के जरिए कई राज्यों और संस्थाओं ने धीरे-धीरे इस अधिकार को आम आदमी की पहुंच से बाहर करने का रास्ता ढूंढ़ निकाला है.आरटीआई हर आदमी की पहुंच में रहे, इस मकसद से इसके तहत आवेदन शुल्क मात्र 10 रुपये निर्धारित किया गया था. लेकिन कई राज्यों ने यह शुल्क बढ़ा दिया है. हरियाणा में तो आरटीआई के अंतर्गत आवेदन शुल्क शुरू से ही 50 रुपये निर्धारित किया गया था. अब अन्य राज्यों और संवैधानिक संस्थाओं ने भी शुल्क बढ़ाना शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश विधान सभा तो आरटीआई की मूल अवधारणा को लगभग समाप्त ही कर चुकी है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा से यदि आपको कोई सूचना प्राप्त करनी है तो 500 रुपये आवेदन शुल्क के तौर पर अदा करने होंगे, साथ ही मांगी गई सूचना का भुगतान 15 रुपये प्रति पेज की दर से देना होगा. इतना ही नहीं, विधान सभा के नियमों में यह भी शामिल है कि एक आवेदन-पत्र में केवल एक ही बिंदु पर सूचना मांगी जा सकती है. इन नियमों से भी यदि आप हताश नहीं हुए और सूचना लेने पर अड़े रहे तो भी जरूरी नहीं कि आपको सूचना मिल ही जाए. आपके आवेदन को इस नियम के आधार पर भी ठुकराया जा सकता है जो कहता है कि ‘यदि अनुरोध पत्र में प्रयुक्त भाषा उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रतिष्ठा या गरिमा के विरुद्ध हो तो भी सूचना प्रदान करने से इनकार किया जा सकता है.’ सिर्फ विधान सभा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय और सभी जिला न्यायालयों में भी सूचना प्राप्त करने के नियम कुछ ऐसे ही हैं. हालांकि न्यायिक क्षेत्र में आवेदन शुल्क को 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दिया गया है.

‘देश में वर्षों से काम अव्यवस्थित तरीकों से होता आया है. आरटीआई आने के बाद कुछ लोगों को रातों-रात सब कुछ व्यवस्थित चाहिए जो व्यवहार में संभव नहीं है’

छत्तीसगढ़ विधान सभा में भी उत्तर प्रदेश की ही तरह आवेदन शुल्क 500 रुपये कर दिया गया है. यही नहीं, यहां पहले गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाला कोई व्यक्ति बिना किसी शुल्क के ही सूचना प्राप्त कर सकता था. अब उसे यह छूट सिर्फ उन्हीं मामलों में मिलेगी जब मांगी गई सूचना का लेना-देना उससे ही हो. इसके अलावा यदि छत्तीसगढ़ के किसी भी विभाग से कोई बीपीएल कार्ड-धारक सार्वजनिक सूचना चाहता है तो उसे बस 50 पेज तक की ही सूचना नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएगी. सिर्फ आवेदन शुल्क के जरिए ही नहीं, कई और तरीकों से भी आरटीआई कानून को कमजोर और सीमित करने की कोशिशें हो रही हैं. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में आरटीआई के तहत किए जाने वाले आवेदन को 150 शब्दों तक ही सीमित करने का नियम बनाया गया है. साथ ही प्रत्येक आवेदन एक ही विषय पर होना भी जरूरी है. झारखंड के आरटीआई कार्यकर्ता सुमित कुमार महतो कहते हैं, ‘झारखंड उच्च न्यायालय में तो आवेदन शुल्क बढ़ाने के साथ ही नियमों में यह भी जोड़ दिया गया है कि सूचना प्राप्त हेतु आवेदक की मंशा क्या है. कई आवेदन सिर्फ यह कहकर खारिज कर दिए जाते हैं कि आवेदक की मंशा ठीक नहीं है.’ जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर जब भी इस कानून को कमजोर करने की बात उठी है तो पूरे देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका व्यापक विरोध किया है. शायद यही कारण है कि अब राज्यों और संस्थाओं के स्तर पर आरटीआई को कई तरीकों से सीमित करने की कोशिश की जा रही है.

विभिन्न स्तरों पर आरटीआई को कमजोर करने की जो मुहिम पूरे देश में चल रही है इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यही दिया जाता है कि इस अधिकार का दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर हो रहा है और कई लोग आरटीआई के जरिए ब्लैकमेलिंग का धंधा करने लगे हैं. वैसे इस तर्क को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता. व्यापक स्तर पर न सही लेकिन ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां इस अधिकार का इस्तेमाल दुर्भावना से और ब्लैकमेलिंग के लिए ही किया जा रहा है. ऐसे ही मामले सरकार और संस्थाओं को इस कानून को कमजोर करने का बल भी प्रदान कर रहे हैं. ठाणे में एक इंजीनियर द्वारा एक स्थानीय आरटीआई कार्यकर्ता के साथ मिलकर एक डॉक्टर को ब्लैकमेल करने का मामला चर्चा का विषय बन चुका है. इस मामले में आरोपित इंजीनियर अजीत कार्निक और आरटीआई कार्यकर्ता मुकेश कनाकिया ने मिलकर एक डॉक्टर से 2.75 लाख रुपये की मांग की थी. यह मांग वह आरटीआई आवेदन वापस लेने के लिए की गई थी जिसमें आवासीय कॉलोनी में नर्सिंग होम चलाए जाने संबंधी सूचना मांगी गई थी. ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड का भी है जहां जिलाधिकारी कार्यालय से प्लाटों के आवंटन संबंधी सूचना मांगी गई थी.

सूत्र बताते हैं कि टिहरी जिले के मसूरी-चंबा फल पट्टी पर दो प्लॉट अवैध रूप से आवंटित किए गए थे. कुछ आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इससे संबंधित सूचनाओं हेतु आवेदन विभाग में किया और कुछ दिनों बाद आवेदन वापस ले लिया गया. इस पूरे मामले में 7-8 लाख रुपये में समझौता होने की बात कही जा रही है. उत्तराखंड में ‘सूचना का अधिकार हेल्पलाइन’ चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मोहन नेगी बताते हैं, ‘कुछ तथाकथित पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता इस कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. इन लोगों के संपर्क विभाग के ही कुछ लोगों से होते हैं जो इन्हें गड़बड़ी की सूचना दे देते हैं. जहां भी इन लोगों को किसी गड़बड़ी की भनक लगती है वहां ये लोग आरटीआई आवेदन की धमकी देकर अपना हिस्सा मांग लेते हैं. निशंक सरकार के दौरान तो ऐसे कुछ लोगों की जांच भी करवाई गई थी.’ नेगी का मानना है कि ऐसे लोगों का खुलासा होना बहुत जरूरी है क्योंकि इन्हीं के कारण आरटीआई जैसा महत्वपूर्ण कानून बदनाम होता है और सरकार को इसे कमजोर करने का बहाना मिल जाता है. वे कहते हैं, ‘ऐसे कुछ लोगों की करतूतों का परिणाम पूरे समाज को ही भुगतना पड़ता है.’

ऐसे ही कुछ मामले देश के अन्य हिस्सों से भी हैं जिनको आधार बनाकर आरटीआई पर रोक लगाने की वकालत की जाती है. लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं कि कानून को कमजोर कर देना इस समस्या का समाधान कत्तइ नहीं हो सकता. महाराष्ट्र के ‘माहिती अधिकार मंच’ से जुड़े आरटीआई कार्यकर्ता भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘पूरे देश में आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों में से मुश्किल से एक फीसदी ही ऐसे लोग हैं जो इस अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हों. इन एक फीसदी लोगों का उदाहरण देकर देश के करोड़ों लोगों से उनका अधिकार छीन लेना या उसे कमजोर कर देना बिल्कुल भी सही नहीं ठहराया जा सकता.’ ‘हरियाणा सूचना का अधिकार मंच’ के राज्य संयोजक सुभाष कहते हैं, ‘यदि मान भी लिया जाए कि कुछ लोग आरटीआई द्वारा अधिकारियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं तो भी कोई ईमानदार अधिकारी इस बात से कभी नहीं घबराएगा. आरटीआई से सिर्फ उसी को ब्लैकमेल किया जा सकता है जो खुद किसी भ्रष्टाचार में लिप्त होगा. क्या ऐसे भ्रष्ट लोगों की चिंता करते हुए आरटीआई पर रोक लगाना उचित होगा?’

आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि कई-कई पन्नों के आवेदन लोग किसी दुर्भावना से नहीं बल्कि जागरूकता के अभाव में भी करते हैं

वैसे देश में जहां भी आरटीआई को दुर्भावना के साथ इस्तेमाल करने के मामले सामने आए हैं उनमें से कुछ मामलों में ऐसा करने वालों को दंडित भी किया गया है. दिल्ली स्थित एक संस्था ‘पारदर्शिता पब्लिक वेलफेयर फाउंडेशन’ द्वारा दिल्ली नगर निगम में एक आवेदन दाखिल करके पूछा गया था कि क्या विभाग के दक्षिण जोन के किसी अधिकारी को यौन रोग है और क्या किसी की सरोगेट या सौतेली मां है. साथ ही आवेदन में एक इंजीनियर की डीएनए रिपोर्ट भी मांगी गई थी. एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जब उच्च न्यायालय के संज्ञान में यह बात आई तो कोर्ट ने आरटीआई का गलत इस्तेमाल करने के लिए संस्था पर 75 हजार रु का जुर्माना लगाया. छत्तीसगढ़ के आरटीआई विशेषज्ञ और ‘छत्तीसगढ़ सिटिजनस इनिशिएटिव’ के राज्य समन्वयक प्रतीक पांडे कहते हैं, ‘आरटीआई अधिनियम में ही वह प्रावधान मौजूद है जिसके तहत नाजायज सूचना मांगे जाने पर आवेदन ठुकराया जा सकता है. छत्तीसगढ़ सूचना आयोग द्वारा एक व्यक्ति के 200 आवेदन इसीलिए खारिज कर दिए गए थे क्योंकि वे अनुचित थे. हल यह नहीं है कि कानून को कमजोर कर दिया जाए.’

कई लोगों का यह भी मानना है कि सूचना के अधिकार ने कई लोगों को जरूरत से ज्यादा ही सक्रिय कर दिया है. गुजरात की आरटीआई कार्यकर्ता पंक्ति जोग मानती हैं कि इस देश में कई वर्षों से काम अव्यवस्थित तरीकों से होता आया है. सरकारी विभागों में आज भी अधिकतर दस्तावेज अव्यवस्थित ही हैं, लेकिन आरटीआई के आने से कुछ लोगों को रातों-रात सब कुछ व्यवस्थित चाहिए जो व्यवहार में संभव नहीं है. पंक्ति कहती हैं, ‘कई लोग ऐसे भी हैं जो इस अधिकार का उपयोग किसी पैसे के लिए नहीं बल्कि नाम के लिए कर रहे हैं. इस अधिकार ने सभी लोगों को एक्टिविस्ट और अतिसक्रिय बना दिया है. कई ऐसे लोग भी हैं जो अब खाली समय में आरटीआई आवेदन बनाने का ही काम कर रहे हैं. इनका उद्देश्य किसी को तंग करना या ब्लैकमेल करना नहीं है, लेकिन इन्हें समाज सेवक के रूप में मशहूर होना है तो इन्होंने आरटीआई को रास्ता बनाया है. इनमें रिटायर्ड लोग भी हैं और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं.’ गुजरात के दूरदर्शन केंद्र का उदाहरण देते हुए पंक्ति बताती हैं कि इस विभाग के एक तृतीय श्रेणी के कर्मचारी ने सारे विभाग की नाक में दम कर रखा है.

इस कर्मचारी द्वारा अपने ही विभाग में लगभग 700 आरटीआई आवेदन दाखिल किये गए हैं. नए-नए आरटीआई एक्टिविस्ट बने इन कर्मचारी का खौफ पूरे विभाग में इतना है कि ये महोदय अब ऑफिस में बैठ कर भी बस आरटीआई आवेदन ही बनाते रहते हैं, लेकिन कोई भी अधिकारी इन्हें कुछ नहीं बोलता. इनके द्वारा रोज लगभग 30-35 आवेदन अपने ही विभाग में दाखिल किए जाते हैं. कुछ आवेदनों में तो यह भी पूछा जाता है कि फलां कमरे में रखी फलां अलमारी की कितनी चाबियां हैं. ये कर्मचारी कुछ राष्ट्रीय आरटीआई कार्यकर्ताओं के भी काफी नजदीकी हैं, इसलिए विभाग के अधिकारी भी इन्हें कुछ बोलने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते. पंक्ति जोग ‘माहिती अधिकार गुजरात पहल’ की समन्वयक हैं और आरटीआई कानून के लागू होने से पहले से ही इस अधिकार के आंदोलन में शामिल रही हैं. आरटीआई के ऐसे उपयोग पर वे कहती हैं, ‘ऐसे ही कुछ लोगों की वजह से अब लोग आरटीआई कार्यकर्ताओं के नाम से ही तंग आने लगे हैं. हमें तो अब खुद को आरटीआई कार्यकर्ता बताते हुए भी शर्म महसूस होती है. हम किसी से नहीं कहते कि हम आरटीआई कार्यकर्ता हैं.’ लेकिन पंक्ति इसके लिए एक हद तक सरकारी विभागों को भी जिम्मेदार मानती हैं. वे कहती हैं, ‘जिन जानकारियों को विभाग द्वारा सार्वजानिक कर दिया जाना था, उनमें से 15 प्रतिशत भी सार्वजनिक नहीं हुई हैं. ऐसे में लोग यदि सूचनाओं के लिए आवेदन करते भी हैं तो उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता.’

सभी राज्यों के सूचना आयोगों में लंबित मामलों की सूची इतनी बड़ी है कि कई जगह तो चार-पांच साल से लोगों की अपील की सुनवाई ही नहीं हुई है

छत्तीसगढ़ में आरटीआई के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्था ‘समर्थन’ से जुड़े दिनेश कहते हैं, ‘किसी भी जगह के आरटीआई आवेदकों की सूची पर यदि गौर किया जाए तो आप पाएंगे कि हर जगह कुछ ऐसे लोग मौजूद हैं जो लगातार इस कानून का उपयोग कर रहे हैं. इनमें अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी हैं जिनमें फर्क कर पाना काफी मुश्किल है. लेकिन इतना जरूर देखा गया है कि जब भी किसी व्यक्ति को आरटीआई में थोड़ी-सी भी महारत हासिल हो जाती है और सरकारी कर्मचारी इन्हें सम्मान देने लगते हैं तो ये लोग भी समझौता करना सीख जाते हैं. यहीं से आरटीआई की बर्बादी शुरू हो जाती है.’ छत्तीसगढ़ के ही आरटीआई विशेषज्ञ प्रतीक पांडे लोगों द्वारा लगातार आरटीआई के इस्तेमाल को सही ठहराते हुए कहते हैं, ‘आरटीआई एक ऐसा लड्डू है जिसे एक बार खाने के बाद लोग बार-बार खाना चाहते हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है, हर व्यक्ति को गणतंत्र में यह अधिकार तो अनिवार्य रूप से होना ही चाहिए. सरकार स्वतः ही सूचनाएं सार्वजानिक करने में जितनी पारदर्शिता बरतेगी, लोग उतना ही आवेदन कम करेंगे. लेकिन आज तो सरकारी विभागों ने धारा चार के अंतर्गत बहुत ही कम सूचनाएं सार्वजनिक की हैं.’

आरटीआई एक्ट की धारा चार के अंतर्गत सभी सरकारी विभागों को कई जानकारियां स्वतः ही सार्वजनिक करनी होती हैं. पूरे देश में शायद ही कोई ऐसा विभाग हो जिसके द्वारा धारा चार का पूर्ण रूप से पालन किया जा रहा हो. लगभग सभी राज्यों के आरटीआई कार्यकर्ता इन जानकारियों को सार्वजनिक न किए जाने को एक भारी समस्या मानते हैं. महाराष्ट्र के भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘विभागों द्वारा धारा चार के तहत बहुत ही कम जानकारियां सार्वजनिक करना ही लोगों को अधिक से अधिक आवेदन दाखिल करने पर मजबूर करता है, लेकिन अब तो लोगों के इस अधिकार को भी सीमित किया जा रहा है. प्रदेश सरकार ने आरटीआई आवेदन को 150 शब्दों तक सीमित कर ऐसा ही किया है. ऐसा करने के पीछे सरकार तर्क देती है कि लोग कई-कई पन्नों के आवेदन देकर आरटीआई का दुरुपयोग कर रहे हैं.’ एक ही आवेदन पत्र में कई जानकारियां मांगने और कई-कई पन्नों के आवेदन पत्रों को आरटीआई का दुरुपयोग मानते हुए कुछ राज्यों ने आवेदन पत्र में शब्दों की सीमा निर्धारित कर दी है.

लेकिन क्या वास्तव में कई-कई पन्नों का आवेदन देना आरटीआई का दुरुपयोग है? आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसे आवेदन लोग किसी दुर्भावना से नहीं बल्कि जागरूकता के अभाव में भी करते हैं. छत्तीसगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता दिनेश बताते हैं कि चूंकि हर व्यक्ति आवेदन लिखने में परिपक्व नहीं होता इसलिए सीमित शब्दों में अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पता. ‘हरियाणा सूचना अधिकार मंच’ के सुभाष भी ऐसे आवेदनों को दुरुपयोग न मान कर लोगों की अपरिपक्वता ही मानते हैं. ऑल इंडिया रेडियो, रोहतक का किस्सा सुनाते हुए सुभाष बताते हैं कि एक आवेदक ने यहां के निदेशक से उनकी सरकारी गाड़ी के खर्चे का ब्यौरा मांगना चाहा. इस आवेदक ने सीधे सवाल करने के बजाय घुमा-फिरा कर कुल 79 सवाल पूछे जिनमें यह तक पूछा गया था कि जब निदेशक महोदया जा रही थीं तो गाड़ी में उनके बाएं कौन बैठा था और उनके दाएं कौन. आवेदन पत्र में पूछे गए कुल 79 सवालों में से कोई पांच या छह सवाल ही सही थे. सुभाष आगे बताते हैं, ‘लोग आवेदन पत्र में स्पष्ट प्रश्न पूछने से कतराते हैं इसलिए अपनी बात को घुमा-फिरा कर लिखते हैं. इसे अधिकार का दुरुपयोग नहीं बल्कि उनकी जागरूकता की कमी कहना ही बेहतर होगा.

लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदकों की सहायता करें तो ऐसी कई समस्याएं आसानी से सुलझाई जा सकती हैं ‘सूचना का अधिकार अधिनियम लागू करवाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लोक सूचना अधिकारियों की ही होती है. यही वह कड़ी है जो जनता को सीधे इस कानून से जोड़ती है. आरटीआई अधिनियम की यह सबसे जरूरी कड़ी ही सबसे ज्यादा विवादास्पद भी है. आरटीआई को किताबों से धरातल पर उतारने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी इन्ही लोक सूचना अधिकारियों के कंधों पर है, इसलिए लोगों की नाराजगी और निंदा का सामना भी इसी वर्ग को करना पड़ता है. सरकार भी जब आरटीआई अधिनियम को कमजोर करने की बात करती है तो बंदूक इसी वर्ग के कंधों पर होती है और तर्क होता है कि लोक सूचना अधिकारियों का कार्यभार बढ़ रहा है. सूचना देने में यदि देर हुई तो जुर्माना भी इसी वर्ग को भुगतना पड़ता है. अकेले आंध्र प्रदेश में ही पिछले कुछ वर्षों में इन कर्मचारियों पर 4.5 लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगाया जा चुका है. इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि लोक सूचना अधिकारियों को अपने आधिकारिक कार्य के साथ ही सूचना आवेदनों का जवाब भी देना होता है.

आवेदनों को प्राथमिकता देना और भी ज्यादा ज़रूरी इसलिए हो जाता है जुर्माने का भय भी हमेशा बना रहता है. उत्तराखंड के शिक्षा विभाग के एक लोक सूचना अधिकारी जगदीश पंत कहते हैं, ‘मेरे पास 20 से 25 आवेदन प्रतिदिन आते हैं. कुछ आवेदनों में तो इतनी ज्यादा सूचनाएं मांगी जाती हैं जिनको इतने कम समय में एकत्रित करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. हम विभागीय कार्य करें या पूरा समय आवेदनों का जवाब देने में बिता दें?’ पंत शिक्षा विभाग में दाखिल किए गए एक आरटीआई आवेदन का जिक्र करते हुए बताते हैं कि राज्य के शिक्षा निदेशालय में किसी ने एक आवेदन दाखिल करके प्रदेश भर के शिक्षकों की आय का ब्यौरा और सभी की पासबुक की प्रतिलिपि मांगी है. राज्य के निदेशालय से यह आवेदन प्रदेश के सभी ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को भेजा गया है और उनसे जानकारी देने को कहा गया है. पंत आगे कहते हैं, ‘आरटीआई के तहत आवेदन शुल्क बढ़ाकर 1,000 या 500 रुपये कर देना चाहिए. आवेदन शुल्क 10 रूपए होने के कारण कोई भी कुछ भी जानकारी मांग लेता है.

‘जोश-जोश में कानून तो बना दिया, अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं’

आवेदन शुल्क यदि 1,000 रुपये हो तो वही व्यक्ति सूचना का आवेदन करेगा जिसे सच में किसी महत्वपूर्ण जानकारी की आवश्यकता होगी.’ हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी आरटीआई के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा है, ‘देश को ऐसी स्थिति नहीं चाहिए जहां 75 फीसदी सरकारी कर्मचारी अपना 75 फीसदी समय आरटीआई आवेदनों का जवाब देने में ही लगाते रहें. आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत जुर्माने का भय इतना भी नहीं बढ़ना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी अपने विभागीय कार्य से ज्यादा सूचना आवेदनों के जवाब को प्राथमिकता देने लगें.’

लोक सूचना अधिकारियों को आरटीआई की वजह से होने वाली समस्याओं का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता. इनकी एक समस्या यह भी है कि अधिकतर इनसे इनके वरिष्ठ अधिकारी के संबंध में सूचनाएं मांगी जाती हैं. ऐसे में जहां एक तरफ इनको अपने विभागीय वरिष्ठ का खौफ होता है तो दूसरी तरफ सूचना आयोग द्वारा जुर्माने का डर भी बना रहता है. आरटीआई कार्यकर्ता भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘कई विभागों में निचली श्रेणी के कर्मचारियों को ही लोक सूचना अधिकारी बनाया गया है. ये लोग अधिकतर अपने वरिष्ठ अधिकारी से संबंधित सूचनाएं नहीं दे पाते और जुर्माना  भुगतते हैं. कई जगह सूचना अधिकारी बेवजह ही बलि का बकरा बन जाया करते हैं.’

लेकिन ज्यादातर आरटीआई कार्यकर्ता इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. उनके मुताबिक लोक सूचना अधिकारी ही सूचना न मिलने का सबसे बड़ा कारण हैं और इन अधिकारियों ने सूचना न देने के कई तरीके खोज निकाले हैं. आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष बताते हैं, ‘हरियाणा की ग्राम पंचायतों में सरपंचों को लोक सूचना अधिकारी बनाया गया है. इनके पास जब लोग आरटीआई आवेदन दाखिल करते हैं तो कई बार ये लोग सूचना देने के बजाय खाली लिफाफे भेज दिया करते हैं. एक बार तो लिफाफे का वजन बढ़ाने के लिए एक सरपंच ने लिफाफे में पुराने अखबार के टुकड़े और कुछ कंकड़ भेज दिए थे.’ आरटीआई अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि यदि आवेदक अनपढ़ हो तो सूचना अधिकारी को उसके लिए लिखित आवेदन तैयार करना होगा. सुभाष बताते हैं, ‘हरियाणा की ग्राम पंचायतों में तो कई जगह खुद सूचना अधिकारी ही अनपढ़ हैं. ऐसे भी कई किस्से हो चुके हैं जहां आवेदक और अधिकारी दोनों ही अनपढ़ हों. कई बार तो ऐसी स्थिति में आवेदन लिखवाने के लिए लड़ाइयां भी हो चुकी हैं.’

उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता इजहर अहमद अंसारी लोक सूचना अधिकारियों के रवैये के बारे में कहते हैं, ‘आरटीआई के लागू होने के कुछ समय तक तो सूचना अधिकारियों में इस कानून का भय था भी, लेकिन अब तो कई सूचना अधिकारी साफ कह देते हैं कि हम सूचना नहीं देंगे, तुम चाहो तो आयोग चले जाओ. सूचना अधिकारी भी जान गए हैं कि सामान्यतः हर व्यक्ति अपील करने आयोग तक जाता ही नहीं, और यदि गया भी तो दो साल तक तो उसका नंबर ही नहीं आएगा.’ सभी राज्यों के सूचना आयोगों में लंबित मामलों की सूची इतनी बड़ी है कि कई जगह तो चार-पांच साल से लोगों की अपीलों की सुनवाई नहीं हुई है. झारखंड के सुमित कुमार महतो बताते हैं, ‘प्रदेश के सूचना आयोग में सुनवाई बंद होने के चलते यहां के सूचना अधिकारियों का रवैया मनमाना हो गया है. विभाग के अपीलीय अधिकारी से तो सूचना अधिकारियों के अच्छे संबंध होते ही हैं. ऐसे में आवेदक उनके पास अपील करने जाएं भी तो उसको कोई न्याय नहीं मिलता.’ पंक्ति जोग कहती हैं, ‘किसी भी विभाग के घोटाले वहां के अधिकारियों से छुपे नहीं होते और अधिकतर मामलों में बड़े अधिकारी खुद घोटालों में शामिल होते हैं. ऐसे में यदि कोई  सूचना मांगे तो विभाग के बड़े अधिकारी और अपीलीय सूचना अधिकारी भी सूचना न देने में लोक सूचना अधिकारी की पूरी सहायता करते हैं.’

कई प्रदेशों में तो सूचना अधिकारी आवेदन के जवाब में इतने ज्यादा दस्तावेज जुटा देते हैं कि आवेदक को शुल्क ही लाखों में देना पड़े. आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि सूचना अधिकारी जान-बूझकर ज्यादा दस्तावेज देने की बात करते हैं ताकि आवेदक को हतोत्साहित कर सकें. उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश के परिवहन निगम से मांगी गई एक सूचना का जवाब हासिल करने के लिए आवेदक से एक लाख 24 हजार रूपये मांगे गए. इतना ज्यादा शुल्क होने के कारण अधिकतर आवेदक जवाब लेने से इनकार कर देते हैं. हरियाणा के आरटीआई कार्यकर्ताओं की मानें तो प्रदेश के कुछ लोक सूचना अधिकारी यहां तक कह देते हैं कि जानकारी से संबंधित दस्तावेज जिस जगह रखे थे वहां आग लग जाने के कारण सूचना नहीं दी जा सकती. कुछ सूचना अधिकारी यह भी कह चुके हैं कि बाढ़ आने के कारण संबंधित दस्तावेज बह चुके हैं या उन्हें
दीमक खा गई है.

सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुए सात साल हो गए हैं. एक तरफ आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं कि अभी तक इस कानून का 50 प्रतिशत उपयोग भी नहीं हो रहा. लोगों को इस अधिकार के प्रति जागरूक करने की कई मुहिमें चलाई जा रही हैं. दूसरी तरफ कई सरकारों ने इसके दुरुपयोग की बात करके इस पर लगाम लगाने की पहल कर दी है. सर्वोच्च न्यायालय भी आरटीआई के दुरुपयोग पर टिप्पणी कर चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या इतने जन आंदोलनों और अथक प्रयासों के बाद हासिल किए गए सूचना के अधिकार को कमजोर करना ही इसका दुरुपयोग रोकने का एकमात्र तरीका है. इस संदर्भ में महाराष्ट्र के भास्कर प्रभु का सुझाव व्यावहारिक लगता है. वे कहते हैं, ‘सरकार का यही तर्क होता है कि कई लोग लगातार इस अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं और इसके जरिए ब्लैकमेल कर रहे हैं. तो सरकार को हर विभाग में आने वाले आवेदनों को सार्वजनिक कर अपनी वेबसाइट पर डाल देना चाहिए. जब हर आवेदन वेबसाइट पर होगा तो जनता को भी यह पता चलेगा कि कौन व्यक्ति कितने और किस तरह के आवेदन कर रहा है. लगातार कई आवेदन करने वाले और दुर्भावना से सूचना मांगनेवाले व्यक्तियों को जनता भी पहचान सकेगी. ऐसे लोगों को समाज भी स्वीकार नहीं करेगा और तब इन लोगों पर रोक लगाना भी संभव हो सकेगा.’  बात वाजिब भी लगती है, जिन लोगों का हवाला देकर सरकार इस कानून को कमजोर करने की बात कहती है उन लोगों पर रोक लगाना कानून पर रोक लगाए जाने से बेहतर है.    

साक्षात्कार:“जोश-जोश में कानून तो बना दिया, अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.”

केंद्रिय सूचना आयुक्त एमएल शर्मा से राहुल कोटियाल की बातचीत.

सात साल बाद आरटीआई को आप कैसे देखते हैं?
आजादी के बाद जो भी कानून बनाए गए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना का अधिकार ही है जिसने आम आदमी को सशक्त करने का काम किया है. केंद्रीय सूचना आयोग के स्तर पर तो यह काफी प्रभावी रहा है. हां, कुछ राज्यों में इतना सराहनीय कार्य नकेंद्रिय सूचना आयुक्त एमएल शर्माहीं हो पाया क्योंकि लंबित मामलों की संख्या काफी ज्यादा है, स्टाफ कम है, आवेदनों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है और यदि शीघ्र निस्तारण न हो तो सूचना का महत्व ही खत्म हो जाता है. इस सबके बावजूद भी यह कानून एक सफल है क्योंकि इसके जरिए कम से कम आम आदमी को बोलने का मौका तो मिला वरना उसकी तो कोई सुनवाई ही नहीं हो पाती थी. हमारे सामने जब दोनों पक्ष उपस्थित होते हैं तो आम नागरिक जमकर अपनी भड़ास सरकारी कर्मचारियों पर निकालते हैं. मैं तो कहूंगा कि यह कानून ‘सेफ्टी वॉल्व’ का काम कर रहा है जिसके जरिए आम नागरिक सरकार के प्रति अपनी भड़ास निकाल रहे हैं.
इसके दुरूपयोग और अनावश्यक उपयोग की बातें भी पिछले कुछ समय से उठती रही हैं. प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय  इस सन्दर्भ में टिप्पणी कर चुके हैं.
हां, आरटीआई का दुरुपयोग भी है और इसको नकारा नहीं जा सकता. हमारे सामने ही एक आवेदन आया जिसमें विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय से किसी ने पूछा था कि ‘मैंने सुना है कि विदेश में एक ऐसी मशीन बनी है जिससे देश के भाग्य का पता लग जाता है. बताया जाए कि वो कौन-सा देश है जहां ऐसी मशीन बनी है और यह भी बताया जाए कि इस देश का भाग्य क्या है; तो ऐसे भी मामले हैं लेकिन यह दुरूपयोग अपवाद के तौर पर ही है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से सूचना आयोग को बल दे दिया है कि ऐसे मामले यदि आते हैं तो इन्हें सिरे से नकार दिया जाए. आखिर आरटीआई का मतलब सिर्फ नागरिक का ही नहीं बल्कि देश का भला भी है.

विभिन्न सूचना आयोगों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं. क्या इसका एक कारण लोगों द्वारा आरटीआई का अनावश्यक उपयोग भी है?
मैं इसका कारण आरटीआई के अनावश्यक उपयोग को ज्यादा नहीं मानता. स्टाफ की कमी एक बड़ा कारण जरूर है और सूचना आयुक्तों को भी तो ज्यादा काम करना चाहिए. जो भी सूचना आयुक्त एक दिन में 25 से कम मामले देखता है वह ठीक नहीं है. प्रत्येक सूचना आयुक्त को महीने में 400 से 500 मामलों का निस्तारण कर देना चाहिए. लेकिन देश में ऐसे भी आयोग हैं जहां आयुक्त दिन में तीन या चार मामले ही देख रहे हैं. इसके अलावा स्टाफ को बढ़ाए जाने की भी आवश्यकता है. सरकार ने पर्याप्त स्टाफ नहीं दिया है. हमारे केंद्रीय आयोग में ही आप स्टाफ की हालत देख लीजिए. अधिकतर लोग संविदा पर हैं और कई तो सेवानिवृत्त लोग ही काम कर रहे हैं.

कई राज्यों और संस्थाओं ने अपने आरटीआई नियमों में बदलाव कर आवेदन शुल्क 500 रुपये तक कर दिया है. क्या ऐसा करना आरटीआई के मूल उद्देश्य को ही समाप्त करना नहीं है?
आरटीआई के अंतर्गत आवेदन शुल्क 10 रुपये बहुत सोच-समझ कर रखा गया था. अब तंग आकर यदि कोई सरकार या संस्था इसे 20-30 रुपये बढ़ा देती है तो बात फिर भी समझ में आती है लेकिन शुल्क को  500 रुपये कर देना मेरी समझ से बाहर है. मैं मानता हूं कि 10 रुपये बहुत ही कम हैं लेकिन 500 रुपये तो बहुत ही ज्यादा हैं. जहां भी ऐसा किया गया है वह गलत है. ऐसी स्थिति जरूर बने कि इस अधिकार का दुरुपयोग रुके मगर ऐसी भी स्थिति ना हो जाए कि इस अधिकार का कोई उपयोग ही ना कर सके. दरअसल जोश-जोश में कानून तो
बना दिया लेकिन अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.   

लोक सूचना अधिकारियों की मानें तो उन्हें आरटीआई की वजह से कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
लोक सूचना अधिकारी इस आंदोलन की जान हैं, वे ही इसकी आधारशिला हैं. शुरू में उन्हें यह कार्य जरूर बोझ जैसा महसूस हो रहा था परंतु अब वे मान चुके हैं कि सूचना तो उन्हें देनी ही है. वैसे भी कोई सारी उम्र के लिए तो सूचना अधिकारी बनाया नहीं जाता, ज्यादा से ज्यादा दो-तीन साल के लिए ही किसी को लोक सूचना अधिकारी बनाया जाता है फिर उसे हटाकर किसी और को यह कार्य सौंप दिया जाता है. अब दो-तीन साल के लिए यदि कुछ लोगों को अतिरिक्त कार्यभार संभालना भी पड़े तो कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि जिसे भी लोक सूचना अधिकारी बनाया जाए उसे कुछ अतिरिक्त स्टाफ भी प्रदान किया जाए.

कई राज्यों ने फीस बढ़ाने के साथ ही आवेदन पर 150 शब्दों की सीमा लगा दी है. ऐसा किया जाना कितना उचित है?
बिल्कुल उचित है. हमने 50-50 पेज के भी आवेदन देखे हैं, परन्तु उन्हें आरटीआई आवेदन नहीं कहा जा सकता. वह तो पूरी राम कथा है. मैं समझता हूं कि 150 शब्द ऐसी सीमा है जिसमें हर तरह का प्रश्न पूछा जा सकता है. अगर आपका काम एक आवेदन से नहीं बनता तो दो आवेदन दाखिल कर लीजिए. एक आवेदन एक ही विषय पर हो यह भी बिल्कुल सही है. अगर आप कई विषयों से संबंधित सूचना एक ही आवेदन में मांगते हैं तो आपको खुद भी पूरी सूचना प्राप्त नहीं हो पाती. ऐसे में यह सभी के हित में है कि एक आवेदन एक ही विषय पर हो और सीमित शब्दों में लिखा गया हो. हमें इस कानून को व्यावहारिक बनाना है सैद्धांतिक नहीं.

तो आपके अनुसार आरटीआई एक्ट में किसी संशोधन की गुंजाइश है या फिर आप मानते हैं कि यह अपने आप में बिल्कुल सही और सपूंर्ण है?
इसमें बिल्कुल संशोधन की गुंजाइश है. पहला तो यह कि आरटीआई आवेदन में शब्दों की सीमा राष्ट्रीय स्तर पर ही निर्धारित की जाए. दूसरा, फीस भी कुछ हद तक बढ़ाई जानी चाहिए. माना कि 500 रूपये बहुत ज्यादा है लेकिन 10 रुपये फीस बहुत ही कम है. केंद्र सरकार को दोबारा विचार कर इसे बढ़ाना चाहिए जो कि पूरे देश के लिए एक ही रहे और कोई भी लोक प्राधिकारी इसमें संशोधन न कर सके. तीसरा, आरटीआई अधिनियम में आयोग को जुर्माना वसूलने का कोई भी प्रावधान नहीं है, इसलिए इसकी व्यवस्था भी होनी चाहिए. चौथा, प्रथम अपीलीय अधिकारियों पर जुर्माना करने का भी कोई प्रावधान कानून में नहीं है और मेरी नजर में इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी प्रथम अपीलीय अधिकारी ही हैं क्योंकि उनको आयोग का भी कोई डर नहीं होता. इसलिए अपीलीय अधिकारियों को भी आयोग के अधिकार क्षेत्र में लाया जाना चाहिए. आखिरी बात यह कहूंगा कि आयोग में अपील करने हेतु कोई भी शुल्क नहीं देना होता तो लोग धड़ाधड़ आयोग में अपील करते चले जाते हैं. इसलिए चाहे 50 रुपये ही हो मगर आयोग आने वाले हर आवेदक से शुल्क लिया जाना चाहिए.

न्याय को ना

पिछले साल 15 फरवरी, 2012 के अंक में तहलका ने एक खबर प्रकाशित की थी. ‘न्यायिक नियुक्ति का धनचक्कर नाम से प्रकाशित इस खबर में बताया गया था कि किस तरह से उत्तर प्रदेश में जजों की नियुक्ति में भी मुंह खोलकर पैसे मांगे जा रहे हैं. उस वक्त प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं और राज्य में चुनावी माहौल था. चुनाव के बाद प्रदेश में सरकार बदली. अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी नई सरकार से लोगों ने काफी उम्मीदें लगाईं. लेकिन कानून-व्यवस्था से लेकर कई मोर्चों पर अब तक नाकाम साबित हुई राज्य सरकार ने न्यायिक नियुक्ति के इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी करने को लेकर अब तक हीलाहवाली ही बरती है. वह भी तब जब देश के राष्ट्रपति से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक उसे इस मामले में कार्रवाई करने को कह चुके हैं.

इस मामले में तब से लेकर अब तक की सरकारी सुस्ती को समझने से पहले इसकी पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति को मंजूरी दिए जाने के बावजूद राज्य के नियुक्ति विभाग के आला अधिकारियों द्वारा नियुक्ति पत्र जारी करने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व सहायक महाधिवक्ता गगनगीत कौर ने लगाया था. उन्होंने इन अधिकारियों को न सिर्फ रिश्वत देने से मना कर दिया था बल्कि अपनी सीट यह कहते हुए सरेंडर कर दी कि वह भ्रष्ट बनकर न्याय देने वाली कुर्सी तक नहीं पहुंचना चाहती हैं. उन्होंने राज्य नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव कुंवर फतेह बहादुर, संयुक्त सचिव युगेश्वर राम मिश्रा और अंडर सेक्रेटरी सुनील कुमार पर नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक अपनी शिकायत पहुंचाई थी.

2009 में उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे. परीक्षा हुई और उसमें गगनगीत कौर का चयन हुआ. कुल 24 सीटों में से पांच पर महिलाओं की नियुक्ति होनी थी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने महिलाओं के लिए 20 फीसदी आरक्षण का नियम बना रखा है. लेकिन साक्षात्कार तक पहुंचने वाली सामान्य वर्ग की महिलाओं की संख्या चार रही. सरकारी नियमों के मुताबिक इनमें से सभी का चयन हो जाना चाहिए था. लेकिन 12 जनवरी, 2010 को जो अंतिम परिणाम आया उसके मुताबिक सामान्य वर्ग से सिर्फ तीन महिलाएं चुनी गईं और दो सीटें सामान्य वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों को दे दी गईं. कौर ने इसकी शिकायत इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से की. कौर की नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए एक बार फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक पत्र 5 मई, 2011 को सूबे के नियुक्ति विभाग को लिखा. अदालत का कहना था, ‘पूर्ण कोर्ट ने गगनगीत कौर की नियुक्ति के मामले पर विचार किया और यह निष्कर्ष निकाला कि 2009 में आयोजित परीक्षा में 20 फीसदी महिला आरक्षण कोटे के तहत चौथी महिला उम्मीदवार के तौर पर कौर की नियुक्ति की सिफारिश राज्य सरकार को की जाए.इस पत्र में यह भी लिखा गया कि सरकार की तरफ से गगनगीत कौर की नियुक्ति का आदेश जारी किया जाए और इसकी एक प्रति इलाहाबाद उच्च न्यायालय को जल्द से जल्द भेजी जाए.

‘मैंने इस गलत बात पर आपत्ति जताई तो उनका जवाब था कि पैसा कुंवर फतेह बहादुर और मुख्यमंत्री तक जाता है इसलिए बगैर पैसा दिए कुछ नहीं होगा’कौर ने जब नियुक्ति विभाग के अधिकारियों से नियुक्ति पत्र जारी करने के संबंध में संपर्क साधा तो अधिकारियों ने उनसे रिश्वत की मांग शुरू कर दी. कौर कहती हैं, ‘सुनील कुमार ने नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले मुझसे लाखों रुपये की मांग की.कौर ने इसकी शिकायत करते हुए 31 मई, 2011 को भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय को पत्र लिखा. कुछ होता नहीं देख तकरीबन दो साल की भागदौड़ और अदालत से लेकर उत्तर प्रदेश के नियुक्ति विभाग के अधिकारियों का चक्कर काटने के बाद अंततः 23 जनवरी, 2012 को कौर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखकर अपनी सीट सरेंडर कर दी. उसी समय तहलका ने इस मामले को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद तीन पूर्व केंद्रीय मंत्रियों ने इस मामले की जांच के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखा था. ये तीन पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं- सुब्रमण्यम स्वामी, जयनारायण निषाद और संजय पासवान. संजय पासवान ने भारत के राष्ट्रपति और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच कराने का आग्रह किया. वे अपने पत्र में लिखते हैं, ‘नियुक्ति विभाग के अधिकारी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फुल कोर्ट की सिफारिश के बाद भी नियुक्ति पत्र जारी करने से मना कर रहे हैं और वे चयनित अभ्यर्थी गगनगीत कौर से पैसे मांग रहे हैं. पैसे देने से मना करने पर ये अधिकारी लगातार हीलाहवाली कर रहे हैं. इसे देखते हुए कौर ने अपना दावा वापस ले लिया है. लेकिन यह घटना न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाती है. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी उच्चस्तरीय जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए और दोषियों को सजा मिले, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार ने 19 जुलाई को एक पत्र लिखकर संजय पासवान को बताया कि अदालत ने तमाम भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों पर आगे की कार्रवाई के लिए शासन को लिख दिया है. कुमार ने यह भी बताया कि गगनगीत कौर की शिकायत के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने शासन यानी प्रदेश सरकार को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा. लेकिन आज की तारीख में तथ्य यह है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा कार्रवाई के लिए लिखे जाने के बावजूद अब तक शासन ने इस मामले में कुछ नहीं किया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच की मांग की. स्वामी लिखते हैं, ‘इस मामले की जांच कराने के लिए कौर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था. उन्होंने न्यायिक पद से अपना दावा भी वापस ले लिया. लेकिन इसके बावजूद अब तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. इसलिए मेरा आपसे आग्रह है कि इस मामले में हस्तक्षेप करें और जरूरी कार्रवाई का आदेश दें.स्वामी के पत्र के बाद उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे एसएच कपाडि़या ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उचित कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा. उन्होंने चीफ जस्टिस को बताया कि इस संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को गगनगीत कौर ने पहले भी लिखा था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद ने भी इस मसले को भारत के राष्ट्रपति और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सामने पत्र लिखकर उठाया. राष्ट्रपति ने निषाद के पत्र के बाद उतर प्रदेश के मुख्य सचिव को नियुक्ति विभाग के संबंधित अधिकारियों के न्यायिक नियुक्ति में भ्रष्टाचार को लेकर कार्रवाई के लिए कहा. लेकिन मुख्य सचिव स्तर पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

जब इस संवाददाता ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके इन पत्रों पर शासन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरफ से हुई कार्रवाई की जानकारी चाही तो जो सूचनाएं मिलीं उनसे पता चला कि अब तक तो इन मामलों में कुछ हुआ ही नहीं है. बदहाली का आलम यह है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा इस मामले की जांच कराने के लिए लिखे जाने के बावजूद इस दिशा में कुछ नहीं हो रहा है. कौर कहती हैं, ‘ऐसे में फिर कोई भी इंसाफ की गुहार आखिर कहां लगाए? ‘ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार से जब तहलका ने कार्रवाई के बारे में जानना चाहा तो पहले तो उन्होंने यह कहा कि कई मामले हमारे सामने आते हैं और ऐसे में किसी एक मामले के बारे में बताना तो मुश्किल है. लेकिन जब उन्हें उन्हीं के दस्तखत से आए एक पत्र का हवाला देकर याद दिलाने की कोशिश की गई तो उनका जवाब बदल गया. वे कहने लगे, ‘देखिए, यह तो गोपनीय मामला है. हम किसी को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकते हैं कि इस शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच की मांग की.

तहलका से बातचीत में कौर बताती हैं, ‘जब मैंने पैसे देने से मना कर दिया तो नियुक्ति विभाग के अधिकारी सुनील कुमार और योगेश्वर राम मिश्रा ने मेरी नियुक्ति पत्र जारी करने संबंधी फाइल पर आपत्ति लगा दी. उनका तर्क था कि गगनगीत कौर राज्य की बाहर की महिला हैं इसलिए उतर प्रदेश में वे नौकरी नहीं कर सकती हैं. जबकि मेरे साथ ही परीक्षा में बैठी हरियाणा राज्य के पानीपत की निवासी बबीता रानी को महिला अभ्यर्थी के तौर पर चयनित होने के बाद शासन के उसी अधिकारी सुनील कुमार और योगेश्वर राम मिश्रा ने नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुशंसा की. बबीता रानी अभी उतर प्रदेश के कानपुर देहात कोर्ट में एडिशनल सेशन जज के पद पर हैं.वे आगे कहती हैं, ‘जब मैंने बबीता रानी को राज्य के बाहर का होने के बावजूद नियुक्ति दिए जाने को आधार बनाकर उनके कुतर्क को काटना चाहा तो उनका जवाब था कि पैसा कुंवर फतेह बहादुर और मुख्यमंत्री तक जाता है. इसलिए बगैर पैसा दिए कुछ नहीं हो सकता.

दिलचस्प बात है कि गगनगीत कौर ने जब सूचना के अधिकार कानून के तहत नियुक्ति विभाग से अपने मामले से संबंधित सारी फाइलों की नोटिंग मांगी तो लेकिन आज तक उन्हें फाइलों की नोटिंग उपलब्ध नहीं कराई गई. उन्हें आवेदन के जवाब में कहा गया कि फिलहाल उनकी नियुक्ति को लेकर उच्च न्यायालय से पत्राचार चल रहा है इसलिए जवाब पत्राचार समाप्त होने के बाद देंगे.

इस मामले में भले ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार औपचारिक तौर पर कुछ जवाब देने से बच रहे हों लेकिन उच्च न्यायालय में इस मामले की प्रगति से वाकिफ लोगों से जब तहलका ने बातचीत की तो पता चला कि अभी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश हैं इसलिए कोई खास प्रगति नहीं हुई है. इन लोगों का यह भी कहना है कि जैसे ही नए पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश आएंगे वैसे ही इस मामले से संबंधित फाइल को उनके सामने रखा जाएगा और उम्मीद है कि तब इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई हो.   

कैद में बुढ़ापा

Hemraaj

उत्तर प्रदेश की जेलों में बड़ी संख्या में बुजुर्ग कैदियों की मौजूदगी  जेलों और इन कैदियों दोनों को भारी पड़ रही है. एक ओर जहां क्षमता से अधिक कैदियों की मौजूदगी से जेलें प्रभावित हो रही हैं वहीं ये उम्रदराज कैदी महज इसलिए सलाखों के पीछे दिन काट रहे हैं क्योंकि इनकी रिहाई में कभी सरकारी नियम-कायदे तो कभी परिजनों की उपेक्षा आड़े आ रही है. कई मामलों में तो कैदी सजा पूरी होने के बाद भी बंद हैं क्योंकि उनके लिए नियमानुसार जमानतदार की व्यवस्था नहीं हो पा रही है.

राज्य के जेल आईजी आरपी सिंह पर यकीन किया जाए तो पूरे प्रदेश में बुजुर्ग कैदियों की संख्या केवल एक हजार के आस-पास है जबकि एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो प्रदेश में बुजुर्ग बंदियों की संख्या छह से सात हजार के बीच है. अकेले बरेली केंद्रीय कारागार और बरेली जिला जेल में ही 800 के करीब बुजुर्ग कैदी बंद हैं. ये वे कैदी हैं जिनकी उम्र 60 से 90 साल के बीच है. इन बुजुर्ग कैदियों को उठाने-बैठाने तक के लिए जेल प्रशासन को दूसरे कैदियों या बंदी रक्षकों की मदद लेनी पड़ती है.

उम्र के इस पड़ाव पर बुजुर्ग बंदियों को आए दिन कोई न कोई बीमारी घेरे रहती है. ऐसे में जेल अस्पताल के एक बड़े हिस्से में इन्हीं का इलाज चलता रहता है. इन कैदियों के इलाज में भी जेल अधिकारियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनात एक जेलर बताते हैं कि जेल के अस्पतालों की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है. लिहाजा इलाज के लिए बुजुर्ग कैदियों को आस-पास के जिलों में स्थित मेडिकल कॉलेजों में भेजना पड़ता है. मेडिकल कॉलेज में बेहतर इलाज के लिए सबसे बड़ी समस्या धन की आती है. बीमार कैदी के इलाज के लिए शासन से धन की व्यवस्था करने की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि जब तक व्यवस्था हो पाती है तब तक बीमार बुजुर्ग कैदी या तो अपने प्राण त्याग देता है या भगवान की कृपा से ही ठीक हो जाता है.

ऐसे हजारों कैदी हैं जो बिना सहारे के चल तक नहीं सकते. नियमों के मुताबिक रिहाई के हकदार ये कैदी प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अब तक कैद हैं

जेल के एक अधिकारी बताते हैं कि नियमों के अनुसार आजीवन कारावास की सजा काट रहे किसी कैदी को यदि जेल में 14 साल हो चुके हों तो उसे छोड़ा जा सकता है. लेकिन इन कैदियों के बुजुर्ग होने के बावजूद इनको छोड़ने की प्रक्रिया में न तो सरकार ही कोई दिलचस्पी लेती है और न प्रशासन. 1938 के प्रोबेशन एक्ट के अनुसार यदि बुजुर्ग कैदी 14 साल की सजा पूरी कर चुका है तो जेल से उसका फॉर्म ए भरवाया जाता है. फिर जेल से जिलाधिकारी के यहां और वहां से आईजी जेल के यहां रिपोर्ट जाती है. आईजी जेल के यहां से रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है. शासन का एक बोर्ड अपनी रिपोर्ट राज्यपाल के यहां भेजता है. इस प्रक्रिया के बाद राज्यपाल की संस्तुति से बुजुर्ग कैदियों को छोड़ने का नियम है.

हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे देवकली बंडा निवासी 71 साल के छोटे सिंह इन्हीं नियमों के शिकार हैं. वे 14 साल से ज्यादा समय बरेली केंद्रीय कारागार में बिता चुके हैं और डंडे के बिना जरा भी चलने में असमर्थ हैं. गांव देवकली में 1977 में हुई एक हत्या के मामले में अदालत ने छोटे सिंह को 1979 में सजा सुनाई. 1979 से लेकर 1985 तक छह साल लगातार छोटे सिंह जेल में रहे. इस बीच छोटे सिंह के परिजनों ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में छोटे सिंह को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया. छह साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की स्थिति में छोटे सिंह 11 साल तक अपने परिवार के बीच रहे.

इस बीच हत्या के मामले की सुनवाई हाई कोर्ट में चलती रही. हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए 1997 में छोटे सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. हाई कोर्ट से सजा होने के बाद 1997 से लेकर आज तक छोटे सिंह लगाकार जेल में हैं. जेल के अधिकारी बताते हैं कि यदि सरकार के नियम को देखें तो छोटे सिंह उम्र को देखते हुए अपनी न्यूनतम 14 साल से करीब आठ साल अधिक सजा भुगत चुके हैं. लेकिन सरकारी अमले की शिथिलता कहें या उपेक्षा, वे अब जेल की दीवारों के पीछे दिन काट रहे हैं.

जेल विभाग के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ‘रिहाई संबंधी रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया में हर स्तर पर अधिकारी अपने को बचाने का काम करते हैं. लिहाजा रिपोर्ट के साथ एक लाइन यह भी बढ़ा दी जाती है कि बंदी को छोड़ने पर समाज में भय व आतंक व्याप्त हो सकता है. इस लाइन के बढ़ने के बाद छूटने की प्रक्रिया पर विराम लग जाता है.’

बुजुर्ग कैदियों के साथ ही प्रदेश की जेलों में दर्जनों की संख्या में ऐसे कैदी भी बंद हैं जिनकी रिहाई का आदेश राज्यपाल या कोर्ट की ओर से तो दे दिया गया है लेकिन सालों या महीनों से उनकी रिहाई नहीं हो पा रही है. क्योंकि रिहाई बांड भरने के लिए उन्हें जमानतदार ही नहीं मिल पा रहे हैं.

तमिलनाडु निवासी जॉन डैनियल बरेली के केंद्रीय कारागार में करीब 20 साल से बंद हैं. वे उन दर्जनों कैदियों में से एक हैं जो न्यायालय द्वारा निर्धारित सजा पूरी करने के बाद भी नहीं छूट पा रहे हैं. 20-22 साल पहले डैनियल रोजी-रोटी की तलाश में घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बरेली आए थे. यहां आकर उन्होंने चिटफंड कंपनी खोली जो कुछ दिनों बाद ही बैठ गई. कंपनी में जिन लोगों का रुपया लगा था उन लोगों ने पुलिस में शिकायत की. 11 लोगों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डैनियल के खिलाफ 1993 में धोखाधड़ी के 11 अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए. डैनियल के मुताबिक मुकदमों के आधार पर न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई जहां से 1995 में उन्हें दस साल की सजा हुई. सजा के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

हाई कोर्ट ने इस सजा को कम करते हुए सात साल कर दिया और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया. जुर्माने की रकम अदा न कर पाने की स्थिति में तीन साल का कारावास और निर्धारित किया गया. डैनियल जुर्माने की रकम अदा नहीं कर पाए लिहाजा उन्होंने तीन साल की सजा और काटी. जेलर एके सक्सेना बताते हैं कि न्यायालय से डैनियल को जो सजा हुई थी वह 2005 में ही पूरी हो चुकी है. इसके बावजूद रिहाई न हो पाने का कारण यह है कि हाई कोर्ट से उन्हें पांच मामलों में सजा देते समय यह शर्त भी रख दी गई थी कि उन्हें जेल से छूटते वक्त हर मामले में दो-दो लोगों की जमानत देनी होगी. रिहाई के लिए डैनियल को दस स्थानीय जमानतदार नहीं मिल सके इसलिए सजा पूरी होने के सात साल बाद भी वे जेल में हैं.

प्रदेश की जेलों पर यदि नजर डालें तो यहां की कुल 40 हजार व्यक्तियों को रखने की क्षमता वाली 65 जेलों में करीब 82 हजार लोग कैद हैं.

पीलीभीत निवासी 48 साल के गिरधारी का मामला भी इससे बहुत अलग नहीं है. हत्या के मामले में पिछले 26 साल से जेल की दीवारों के पीछे कैद गिरधारी को गत अक्टूबर माह में उस वक्त रिहाई की उम्मीद जगी जब कैद की अवधि को देखते हुए राज्यपाल की ओर से उनकी रिहाई के आदेश दिए गए. लेकिन रिहाई के आदेश को तीन माह से अधिक का समय हो गया है पर छूटने के आसार अभी नहीं दिख रहे हैं. इसके लिए लिए उन्हें दो जमानती चाहिए. जेल के अधिकारी बताते हैं, ‘ गिरधारी के परिवार को रिहाई के आदेश की जानकारी दे दी गई है. लेकिन परिवार इतना गरीब है कि दो जमानतदारों की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है जिसके कारण रिहाई नहीं हो पा रही है.’ लंबे समय से जेल में रहने के कारण गिरधारी की मानसिक स्थिति भी अब ठीक नहीं है. उनकी हरकतों को देखते हुए जेल अधिकारी उन्हें अब यदा-कदा ही बैरक से बाहर निकालते हैं. गिरधारी के साथी कैदी बताते हैं कि जैसे ही कोई उनके सामने जाता है वे अपनी रिहाई की बात शुरू कर देते हैं और मारपीट तक पर आमादा हो जाते हैं. जेल अधीक्षक एके राय बताते हैं, ‘बिना जमानतदार के रिहाई संभव नहीं है.’

एक और मामला है शाहजहांपुर के 85 साल के बुजुर्ग लालजीत सिंह का. 35 साल पूर्व 1977 में शाहजहांपुर जिले के छोटे-से गांव पिपराजप्ती में जमीनी रंजिश के चलते दो पक्षों के बीच हुई गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी. विवाद में एक पक्ष की ओर से लिखाए गए हत्या के मुकदमे में लालजीत सिंह को 1997 में हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई. मरने वालों में लालजीत का एक भाई भी शामिल था. लालजीत अब चलने-फिरने से भी लाचार हैं. उन्हें उठाने-बैठाने के लिए दो लोगों की जरूरत होती है. ऊपर से अनेक बीमारियों ने भी उन्हें जकड़ रखा है. उनकी शारीरिक हालत को देखते हुए जेल प्रशासन उनसे अब कोई काम भी नहीं ले सकता. आजीवन कारावास के लिए जो न्यूनतम सजा सरकार की ओर से 14 साल की निर्धारित है वो लालजीत काट चुके हैं इसके बावजूद उनकी रिहाई संभव नहीं है तो इसलिए कि हत्या के आरोप में वे अकेले जेल में नहीं हैं बल्कि उनका छोटा भाई 65 साल का राजेन्द्र सिंह भी बरेली केंद्रीय कारागार में बंद है. हाईकोर्ट से सजा होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सजा के खिलाफ अपील क्यों नहीं की. इस सवाल पर लालजीत बताते हैं, ‘परिवार में कोई बचा ही नहीं था. वैसे भी मुकदमे आदि में रुपया काफी लग जाता है.’

प्रदेश की जेलों पर यदि नजर डालें तो यहां की कुल 40 हजार व्यक्तियों को रखने की क्षमता वाली 65 जेलों में करीब 82 हजार लोग कैद हैं. प्रदेश की जेलें क्षमता से अधिक कैदियों के अलावा स्टाफ की कमी की दोहरी समस्या से भी जूझ रही हैं. यदि केंद्रीय जेलों की बात करें तो प्रदेश में स्थित पांच केंद्रीय जेलों की क्षमता सिर्फ दस हजार कैदियों की है लेकिन इन जेलों में 27 हजार से ज्यादा कैदी बंद हैं. जेलों में क्षमता से दोगुनी संख्या में कैदियों के होने का सबसे बड़ा कारण है कि प्रदेश के कुशीनगर, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, अमरोहा, चंदौली, संतरविदासनगर, औरैया, हाथरस, महोबा, अमेठी, हापुड़, संभल और शामली जिलों में जिला जेल ही नहीं है. यदि बात इलाहाबाद की करें तो वहां एक केंद्रीय जेल तो है लेकिन जिला जेल अभी तक नहीं बन सकी है. जिन जिलों में जेल नहीं है उन जिलों के कैदियों को आस-पास के जिलों में भेजा जाता है. अंबेडकरनगर, गौतमबुद्धनगर, चित्रकूट और कासगंज सहित चार जिलों में नई जेल बनाने का काम चल रहा है. लेकिन काम इतना धीमा है कि ये कब पूरी होंगी यह तय ही नहीं है.

जेलों में अधिकारियों व कर्मचारियों की तैनाती की स्थिति भी काफी दयनीय है. कैदी तो जेलों में क्षमता से दोगुने हैं लेकिन तैनाती प्रस्तावित पदों से भी कम है. पूरे प्रदेश की जेलों के लिए डिप्टी जेलरों के 448 पद स्वीकृत हैं जबकि तैनाती मात्र 222 डिप्टी जेलरों की है. इसी तरह जेलर के 87 पद हैं और तैनात 76 ही हैं.

आलम यह है कि जेल में कर्मचारियों की कमी होने के कारण कैदियों तक से काम लेना पड़ रहा है. ऐसा ही एक कैदी है उत्तराखंड के अल्मोड़ा का निवासी उमेश चंद्र जोशी. 1997 में बीएससी पार्ट वन की पढ़ाई कर रहा था उसी समय अल्मोड़ा के गढ़ाई गंगोली में एक हत्या के आरोप में उमेश नामजद हुआ और न्यायालय ने 1999 में आजीवन कारावास की सजा सुना दी. 33 साल का उमेश 1999 से लेकर आज तक बरेली जेल में ही बंद है. वैसे तो उमेश जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है लेकिन 1999 से ही वह जेल कार्यालय में लिखापढ़ी का काम देख रहा है. पहली नजर में उसके कामकाज के तरीके को देख कर कोई भी उसे सजायाफ्ता मुजरिम नहीं कहेगा.

क्योंकि जेल के सिपाही हों या जेलर या अधीक्षक सभी को जेल में बंद किसी भी कैदी के बारे में कोई भी जानकारी चाहिए होती है तो घंटी बजा कर जोशी को ही बुलाता है. कौन सा कैदी किस मामले में कब से सजा काट रहा है या किसके ऊपर कितने मामले चल रहे हैं और मामले लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में किस स्थिति में हैं ये सारी जानकारी जोशी के पास रहती है. कैदियों का पूरा सिजरा उमेश को मुंहजबानी याद है. हाई कोर्ट से सजा होने के बाद अब उसका मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इस सबसे लगता है कि उत्तर प्रदेश की जेलों की अंधेरी कोठरियों में बंद उम्रदराज कैदियों के लिए फिलहाल रोशनी की कोई किरण दूर दूर तक नहीं है.

बालपन में ब्याह

‘हमारी जाति डोम है और हमारे यहां सात-आठ साल में शादी अनिवार्य है. यदि आपने इससे ज्यादा देरी की तो अपने बच्चे के लिए जोड़ा मिलना मुश्किल हो जाएगा. जोड़ा तलाश भी लें तो उसमें किसी न किसी तरह की कमी होगी. वह किसी दुर्घटना या बीमारी का शिकार होगा. इसलिए हमारी जाति में समय रहते शादी की परंपरा है. गौना (लड़की की विदाई) जरूर हम अठारह पार करने के बाद ही करते हैं. विदाई में उम्र को लेकर कोई समझौता नहीं करते.’

मोहन डोम बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं. बिहार में पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया से उनका गांव धांगड़ टोली पांच-सात किलोमीटर के फासले पर ही होगा. धांगड़ टोली की तरफ मुख्य सड़क पर जाते हुए सड़क के किनारे ही मोहन डोम का आशियाना है. वे सड़क के किनारे झोपड़ी डाल कर रहते हैं. उनसे घर पर ही मुलाकात होती है. बातचीत के बाद साफ होता है कि मोहन इकलौते व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने कम उम्र में अपने एक लड़के और एक लड़की की शादी की है. एक-दो दिन और भागदौड़ के बाद यह भी स्पष्ट होता है कि डोम समाज कम उम्र में शादी को स्वीकार करने वाला अकेला समाज नहीं है. कई दूसरे समाजों में भी कम उम्र में शादियां हुई हैं.

बेतिया के भरपटिया माध्यमिक विद्यालय की प्राचार्य उषा दुबे बताती हैं, ‘इतनी कम उम्र में शादी-शुदा बच्चों को देखकर मन ग्लानि से भर जाता है.’ वे आगे कहती हैं कि उन्हें इस स्कूल में एक साल ही हुआ है. पहली बार जब वे इस स्कूल में आईं और शादी-शुदा लड़कियों को देखा तो बहुत परेशान हुईं. वे कहती हैं, ‘ये बच्चियां स्कूल में आकर अपनी ससुराल का किस्सा सुनाती थीं, मैं सुनती थी क्योंकि हमें ट्रेनिंग के दौरान बताया गया है कि बच्चों के साथ घुल-मिल कर रहना है, जिससे वे आपको अपना अच्छा दोस्त समझें. इस घटना से आहत होकर मैं इन बच्चों के परिवार- वालों से भी मिली, लेकिन वे मुझसे ही लड़ने लगे. मैं शादी की बात लेकर पुलिस के पास भी जाना चाहती थी पर मेरे साथियों ने मुझे यह कहकर रोक दिया कि हमारा काम इन बच्चों को पढ़ाना और ऐसे संस्कार देना है कि बच्चों की छोटी उम्र में शादी न की जाए.’ 

एक स्कूल में छह साल की प्रेमा (काल्पनिक नाम) मिलती है. उसका हंसना, बोलना, बतियाना सब अपनी उम्र के बच्चों जैसा ही है. बेतिया से आठ किलोमीटर दूर अपने स्कूल की चौथी कक्षा में प्रेमा अपने क्लास के दूसरे बच्चों के साथ घुल-मिलकर ही बैठती है लेकिन अपनी एक खासियत के चलते क्लास में दूर से ही पहचानी जा सकती है. वह है उसकी मांग में भरा हुआ सिंदूर. प्रेमा के बिना कुछ कहे ही यह सिंदूर उसकी कहानी काफी कुछ बयान कर देता है. प्रेमा जिस माध्यमिक स्कूल में पढ़ती है वहां 800 बच्चे हैं. इनमें 80 बच्चे शादीशुदा हैं. यह आंकड़ा स्कूल की प्रधानाध्यापिका देती हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि संख्या इससे कहीं अधिक है. 

प्लान यूके की एक रिपोर्ट के अनुसार हर दिन 27,397 कम उम्र की लड़कियां जबरन शादी की भेंट चढ़ती हैं. यानी हर तीन सेकंड में एक बच्ची

एक राजकीय विद्यालय में प्राचार्य जनक मिश्र की मानें तो शादीशुदा बच्चे-बच्चियां इस क्षेत्र के स्कूलों में आम हैं. मिश्र कहते हैं, ‘कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे रोकने से यह रुकने वाला भी नहीं है. शादी के बाद बच्चे स्कूल आ रहे हैं, शुक्र मनाइए. शादी वाले मसले पर अधिक बातचीत करेंगे तो वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर देंगे. बहुत सोच-विचार कर हमने बच्चों को पढ़ाने और शिक्षित करने को अपनी प्राथमिकता बनाया है.’

कल्पना (काल्पनिक नाम) सात साल की है, तीसरी कक्षा में पढ़ती है. एक साल पहले उसकी शादी हुई. उसे पता है कि उसकी शादी साठी (बेतिया) में हुई है. पति का नाम याद नहीं आता तो उसी स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ने वाली उसकी बड़ी बहन याद दिलाती है. छोटी उम्र में शादी कर चुकी कुछ मुस्लिम लड़कियां भी स्कूल में मिलती हैं. उनकी मांग में सिंदूर तो नहीं मगर नाम के साथ खातून जुड़ा है. हालांकि इस सबमें एक अच्छी बात यह देखी जा सकती है कि शादी के बाद भी परिवार- वालों ने इनके स्कूल जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाया. शादी का सही-सही अर्थ भी न जानने वाली लड़कियां, सुबह-सुबह अपने पति के नाम का सिंदूर मांग में डालकर स्कूल में उपस्थित रहती हैं.

जानकार मानते हैं कि जो परिवार शादी के बाद भी बच्चियों को स्कूल भेज रहे हैं, उन्हें अब इस बात के लिए राजी करने में सरकारी और गैरसरकारी संगठनों को अधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए कि बच्चियों की शादी वे सही समय पर ही करें. अब छोटी उम्र में बच्चियों की शादी कराने वाले परिवारों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है कि अठारह साल गौने की नहीं, कानून की तरफ से शादी की तय उम्र सीमा है. वैसे छोटी उम्र में शादी की बात की जाए तो एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में हर तीसरे सेकंड में एक बच्ची को जबरन शादी के लिए राजी किया जाता है. हाल ही में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान गैरसरकारी संस्था ‘गर्ल्स नॉट ब्राइड्स’ की कम्यूनिकेशन ऑफिसर लॉरा डिकिन्सन का कहना था, ‘बहुत-से समुदायों में बाल विवाह को मंजूरी मिली हुई है, ऐसे परिवारों में लड़कियों को लड़कों से कम महत्व मिलता है.’

जब हम महिला अधिकारों की बात करते हैं, बाल अधिकारों की बात करते हैं या बच्चियों में या बच्चों में स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी विषयों की चर्चा करते हैं, उस दौरान ऐसे हजारों बच्चों को चर्चा में शामिल नहीं कर पाते जिनके शादी-शुदा होने की जानकारी सरकारी या किसी गैर सरकारी फाइल में भी दर्ज नहीं है. बिहार के पश्चिम चम्पारण में महादलित समाज से आने वाले बहारन राउत अपने क्षेत्र में समाज के मुखिया भी हैं. समाज के विवादों को वे पंच बनकर सुलझाते रहे हैं. वे बताते हैं, ‘मैंने तय किया कि अपनी पोती की शादी छोटी उम्र में नहीं करूंगा इसलिए दस साल के बाद ही पोती के लिए लड़का तलाशना प्रारंभ किया. लेकिन उस उम्र में भी इसके लिए लड़का तलाशना हमारे लिए मुश्किल हो रहा था क्योंकि हमारे समाज में छोटी उम्र में ही शादियां हो जाती हैं.’

बहारन के अनुसार उन्होंने जाति पंचायत में भी इस बात को उठाया, लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. बहारन अपनी शादी का किस्सा भी सुनाते हैं जब वे पांच साल की उम्र में दूल्हा बने. उन्होंने शादी के मंडप पर बैठने से पहले मां का दूध पीने की जिद कर दी. अब शादी में मां मौजूद नहीं थीं. लोगों ने भागकर कहीं से गाय के दूध का इंतजाम किया और दूल्हा बने बहारन राउत शादी के मंडप पर दूध पीने के बाद ही बैठे.

 आंकड़े बताते हैं कि हर सौ में से सात लड़कियों की शादी कानूनी तौर पर तय समय सीमा 18 साल से कम उम्र में हुई है. ऐसा तब है जब हमारे पास बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाला 1929 का कानून है जिसमें 1949 और 1978 में संशोधन हुआ. 2006 में बाल विवाह को लेकर कानून को और मजबूत बनाया गया. उसके बावजूद सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे: 2005-06) के मुताबिक 20-24 वर्ष आयु वर्ग की 44.5 फीसदी युवतियां 18 साल से पहले विवाहिता हो चुकी थीं.

बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने के पीछे के तर्क जायज हैं. इन्हें आम तौर पर उन परिवारों के मुखिया स्वीकार भी करते हैं जिनसे बिहार के पश्चिम चंपारण के चनपटिया और योगापट्टी प्रखंड में हमारी बात होती है. बाल विवाह की पीडि़त आम तौर पर लड़कियां ही बनती हैं. शादी के बाद सबसे पहले उनका ही स्कूल छुड़ा दिया जाता है. जानकार मानते हैं कि यदि लड़कियों को हम स्कूल नहीं भेजेंगे तो देश भर की लड़कियों को मिले शिक्षा का अधिकार कानून का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा. दूसरे, यदि कम उम्र में लड़की की शादी होती है तो वह गर्भ धारण के लिए तैयार नहीं होगी. ऐसे में जच्चा और बच्चा दोनों असुरक्षित होंगे. देश में मातृत्व मृत्यु दर ऊंची होने की बड़ी वजह इस तरह बचपन में की जाने वाली शादी ही हैं. इस तरह की शादियों में लड़कियां बार-बार गर्भवती होती हैं. सही प्रकार से पोषक आहार और देखभाल ना मिलने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. वे बच्चियां नहीं जानतीं कि कब और कितनी बार उन्हें मातृत्व चाहिए, यह निर्णय लेना उनका अपना अधिकार है लेकिन किसी परिवार में उनकी नहीं सुनी जाती. 

‘प्लान यूके’ लड़कियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक गैरसरकारी संस्था है. इसके अनुसार दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लड़कियों की जबरन कम उम्र में शादी कराई जाती है. प्लान यूके की एक रिपोर्ट के अनुसार हर दिन 27,397 कम उम्र की लड़कियों की जबरन शादी कराई जाती है. यह आंकड़ा बारीकी से देखा जाए तो इसका मतलब हुआ कि हर तीन सेकंड में एक लड़की की जबरन शादी. यूनिसेफ की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ 2012 रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हो रहे बाल विवाह में 40 फीसदी से अधिक की भागीदारी भारत की है. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 20-24 साल की 22 फीसदी महिलाओं ने अपने पहले बच्चे को अठारह साल से कम उम्र में जन्म दिया है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ‘फैमिली वेलफेयर स्टेटिस्टिक्स 2011’ के अनुसार 18 साल से कम उम्र की बच्चियों की शादी के मामले में ग्रामीण भारत शहरी भारत से तीन गुना आगे है.

परंपरा, संस्कार और संस्कृति के नाम पर कब तक इन बच्चियों के साथ अन्याय होता रहेगा? बिहार का पश्चिम चंपारण अपनी शादीशुदा बेटियों को स्कूल भेज रहा है शायद इसलिए यह किस्सा बाहर आ पाया. लेकिन उन बाल विवाहिताओं का क्या जो चौखट के बाहर कदम तक नहीं रख पातीं?

बे-काम का कानून

देश में पहली बार बाल विवाह पर रोक लगाने वाला कानून 1930 में आया. ‘द चाइल्ड मैरिज रिस्ट्रेंट एक्ट 1929’ नामक इस कानून को ‘शारदा एक्ट’ के नाम से भी जाना जाता है. पहली बार इसी कानून के जरिए लड़कों के विवाह की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों की 18 साल निर्धारित की गई. ‘शारदा एक्ट’ की कमियों को दूर करने के लिए 2007 में ‘द प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट 2006’ लागू किया गया. नाम में इस बदलाव की वजह थी कानून के प्रावधानों को अधिक सख्त बनाना. दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी साल एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यह कानून सभी निजी कानूनों से ऊपर होगा और देश के हर नागरिक पर लागू होगा.

यूनिसेफ की रिपोर्ट

 वर्ष 2009 में आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में होने वाले कुल विवाहों में से करीब 40 फीसदी बाल विवाह होते हैं. वहीं यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण ‘मैरिंग टु यंग: एंड चाइल्ड मैरिज’ के मुताबिक देश में 20 से 24 की उम्र की 47 फीसदी महिलाओं का बाल विवाह हुआ था. 

घोषणावीर मुख्यमंत्री

यह वाकया 25 साल पहले का है. मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा नदी के नीलकंठ (सीहोर) घाट में एक नवयुवक गले तक डूबा हुआ था. गांव के सारे लोग इस नौजवान को देखने के लिए जुटे थे. अचानक गांव के लोगों में हलचल बढ़ती है और यह नवयुवक मां नर्मदा को साक्षी मानते हुए घोषणा करता है कि इस क्षेत्र की सेवा के लिए आजीवन अविवाहित रहेगा. ठीक तीन साल बाद वह भाजपा के टिकट से इस क्षेत्र का विधायक चुना जाता है. इस दौरान वह अपनी पहली ही सार्वजनिक घोषणा भूलकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर जाता है. आज यही नवयुवक प्रदेश में में मुख्यमंत्री की गद्दी पर आसीन है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बारे में यह कहानी कितनी सच्ची है इसकी पुष्टि तो तभी हो सकती है जब वे खुद स्वीकार करें लेकिन मध्य प्रदेश में उनके कुछ साथी विधायक इस घटना के साक्षी रहे हैं.

हालांकि आजीवन कुंवारे रहने की कसम खाकर शादी कर लेना कोई अपराध नहीं है. लेकिन घोषणा करके उसे भुला देने की जो नजीर चौहान ने राजनीति में प्रवेश के समय बनाई थी वह अब उनके शासनकाल में और पक्की हो गई दिखती है. यदि चौहान के कार्यकाल पर निगाह डाली जाए तो बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश के इतिहास में घोषणा करने के मामले में वे सबसे आगे हैं. पिछले सात साल का उनका रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने एक दिन में औसतन तीन से अधिक घोषणाएं की हैं. यह और बात है कि उनकी ज्यादातर घोषणाएं हवाई सिद्ध हुईं.

दरअसल चौहान की एक दिक्कत यह है कि वे जिस गति से घोषणाएं कर रहे हैं उससे उन्हें ही याद नहीं रहता कि उन्होंने कहां और कौन-सी घोषणा की है. इसी का एक नजारा महेश्वर उपचुनाव (2012) में तब देखने को मिला जब उन्होंने प्रदेश में पहला हिंदी विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा कर दी. मगर लोगों ने जब चौहान को याद दिलाया तो उन्हें याद आया कि यह घोषणा तो वे पहले ही कर चुके हैं. इसी तरह उन्होंने चार साल पहले श्योपुर जिले के दौरे के दौरान विजयपुर में पेयजल योजना के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा कर दी. जनसंपर्क विभाग ने बाकायदा उसकी प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की. मगर विधानसभा के पटल पर चौहान का जवाब था कि उन्होंने ऐसी कोई घोषणा ही नहीं की है. 

मुख्यमंत्री चौहान ने जिस ढंग से घोषणाओं के हवाई किले खड़े किए हैं उससे उनकी ही पार्टी भाजपा के कई बड़े नेता अब तंग आ चुके हैं. पार्टी सांसद रघुनंदन शर्मा ने पिछले साल उज्जैन में एक कार्यक्रम के दौरान कहा भी था, ‘राज्य सरकार के कई मंत्री इसलिए बेलगाम घोषणाएं कर रहे हैं क्योंकि उनके मुखिया भी ऐसा ही कर रहे हैं.’ शर्मा के मुताबिक घोषणाएं महज अखबारों में छपने और वाहवाही लूटने के काम आ रही हैं. विधानसभा में ही मंत्रियों द्वारा विधायकों के सवाल पर दिए गए आश्वासनों की संख्या बताती है कि करीब ढाई हजार आश्वासन अब तक पूरे नहीं हो पाए. वहीं चौहान भी सदन के भीतर यह मान चुके हैं कि वे घोषणावीर हैं. उनकी मानें तो, ‘वीर ही घोषणाएं करते हैं. यदि कुछ घोषणाएं पूरी नहीं हुईं तो इसलिए कि उनमें तकनीकी गड़बडि़यां थीं.’ चौहान का दावा है कि उन्होंने 80 फीसदी घोषणाएं पूरी भी कर दीं.

लेकिन मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक की हालिया रिपोर्ट खुद ही उनके दावे की कलई खोल देती है. इसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने सात साल में कुल 7,334 घोषणाएं की हैं. मगर इनमें से 3,513 यानी आधे से अधिक घोषणाएं अटकी हुई हैं. वहीं करीब एक हजार घोषणाएं ऐसी हैं जो या तो शुरू नहीं हो सकीं या जिन्हें शुरू करा पाना अब संभव नहीं हो पाया है. अधर में फंसी इन घोषणाओं  तक में से भी अधिकतर पंचायत व ग्रामीण विकास (485), जल संसाधन (426), राजस्व (231) और स्वास्थ्य (193) जैसे आम आदमी से सीधे ताल्लुक रखने वाले महकमों से जुड़ी हैं.

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं

विशेषज्ञों की राय में किसी भी राज्य का बजट घोषणाओं के बजाय योजनाओं के आधार पर तैयार किया जाता है. ऐसे में चौहान जिस अनुपात में घोषणाओं की झड़ी लगा रहे हैं उससे बजट पूरी तरह से गड़बड़ा गया है. खुद राज्य के वित्त मंत्री राघवजी को मुख्यमंत्री की घोषणाओं को साकार कर पाना संभव नहीं लगता. वे पहले ही मीडिया में साफ कर चुके हैं, ‘यदि भाजपा सत्ता में लौटी भी तो पांच साल तक इन घोषणाओं को अमली जामा पहनाना असंभव है.’  उनके मुताबिक यदि आपात कोष का खजाना भी खोल दिया जाए तो सौ करोड़ रुपये से अधिक रकम नहीं जुटाई जा सकती. जबकि चौहान की घोषणाओं को पूरा करने के लिए बारह हजार करोड़ रुपये की दरकार है. सरकार की माली हालत इतनी खराब है कि उसे अपने सभी महकमों का बजट कम करना पड़ा है. वहीं चौहान सरकार के कार्यकाल में यह प्रदेश 85 हजार करोड़ रुपये का कर्जदार बन चुका है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री द्वारा नित नई-नई घोषणाएं करना ‘कर्ज लेकर घी पीने’ जैसा लग रहा हैं.

सवाल यह है कि जब राज्य का खजाना खाली है तो मुख्यमंत्री अलग-अलग वर्ग की पंचायतों और महापंचायतों का भव्य आयोजन करके उनमें करोड़ों रुपये क्यों खर्च कर रहे हैं. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अपने आवास पर अब तक 25 से अधिक पंचायतें करा चुके हैं. इस बारे में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया का कहना है, ‘चौहान बताएं कि उन्होंने अपने आवास पर अब तक जितनी भी पंचायतें कराई हैं उनमें की गई घोषणाओं की स्थिति क्या है. साथ ही वे यह भी बताएं कि इस पूरे तामझाम में सरकार का अब तक कुल कितना पैसा खर्च हो चुका है.’

जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री की कोई भी घोषणा शासन की योजना मानी जाती है. इसलिए चौहान को चाहिए कि वे ऐसी घोषणा न करें जिससे शासन को व्यर्थ की माथापच्ची करनी पड़े. प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा के मुताबिक, ‘मुख्यमंत्री की कोई घोषणा यदि बहुत लंबे समय से अधूरी पड़ी है तो इसका सीधा अर्थ है कि उसमें वित्त या विधि की ऐसी अड़चन है जिसे दूर करना मुश्किल है.’ उदाहरण के लिए, पांच साल पहले मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति पंचायत में इस वर्ग के साहित्यकारों और कलाकारों को पुरस्कार देने की घोषणा की थी. इस घोषणा पर संस्कृति मंत्रालय ने शासन को बताया कि उसने पुरस्कारों का किसी वर्ग विशेष से संबंधित कोई दायरा तय नहीं किया है.

लिहाजा इस घोषणा को पूरा करने का काम अनुसूचित जाति कल्याण मंत्रालय को सौंपा जाए. तब से दोनों मंत्रालयों के बीच यह घोषणा अटकी पड़ी है. इसी तरह, चार साल पहले मुख्यमंत्री ने प्रदेश में बीस हजार आंगनबाड़ी खोलने की घोषणा की थी. तब तक सरकार ने बेरोजगारों को भर्ती करने की कोई तैयारी नहीं की थी. बावजूद इसके मुख्यमंत्री ने आंगनबाडि़यों में बेरोजगारों को भर्ती करने की घोषणा कर दी. जनसंपर्क विभाग ने भी अखबारों में विज्ञापन जारी कर दिया. उसमें पांच लाख से अधिक आवेदन आए. मगर सरकार ने यह पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी. इस दौरान सरकार के विज्ञापन में तीन करोड़ रुपये तो खर्च हुए ही, बेरोजगारों के भी आवेदन भरने में एक करोड़ रुपये खर्च हो गए. 

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं. इसमें वह घोषणा भी शुमार है जिसमें उन्होंने किसानों का पचास हजार रुपये तक का कर्ज माफ करने की घोषणा की थी. भाजपा कर्णधारों का मानना है कि चौहान की इस घोषणा ने पार्टी की सत्ता में वापसी कराने में अहम भूमिका अदा की थी.

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं.

गौरतलब है कि 2003 में कांग्रेस को इसी बीएसपी (बिजली, सड़क और पानी) फैक्टर के चलते सत्ता गंवानी पड़ी थी. चुनावी वर्ष में अब यही फैक्टर यहां फिर जोर पकड़ रहा है. हालत यह है कि भाजपा विधायक दल की बैठक में विधायकों ने कहना शुरू कर दिया है कि चुनाव में बिजली और सड़क की बदहाली भारी पड़ सकती है. 13 दिसंबर, 2012 को विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पार्टी विधायक दल की बैठक में विधायकों ने मुख्यमंत्री से साफ-साफ कहा कि यदि इन क्षेत्रों में जल्द ही कुछ काम नहीं किया गया तो चुनावी मैदान में मोर्चा संभालना मुश्किल हो जाएगा. दरअसल 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सौ दिन के भीतर हर घर में 24 घंटे बिजली पहुंचाने की घोषणा दम तोड़ चुकी है.

हकीकत यह है कि यहां बिजली का उत्पादन मांग के मुकाबले आधा भी नहीं हो पा रहा है. चौहान सरकार का दूसरा बड़ा सिरदर्द राजकीय राजमार्गों को लेकर है. राज्य में लोक निर्माण विभाग की कुल 25 हजार किलोमीटर सड़कें हैं. मगर विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक इसमें भी 9,500 किलोमीटर सड़कें खस्ताहाल हैं. वहीं मुख्यमंत्री की 31 दिसंबर तक 15 हजार किलोमीटर सड़कें बनाने की घोषणा मखौल बनकर रह गई है. खुद मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बुधनी से राजधानी तक 80 किमी का फासला सड़क मार्ग से तय करने में साढ़े तीन घंटे का समय लगता है.

मजेदार यह भी है कि मुख्यमंत्री चौहान खुद अपने लिए की गई घोषणाओं पर भी कायम नहीं रहते. इनमें न तो वित्त और न ही प्रशासन का ही कोई पेंच फंसता है. मसलन, 2008 में जब केंद्र ने पेट्रोल की कीमत में बढ़ोतरी की तो उसके बाद चौहान की वह घोषणा सिर्फ घोषणा ही बनी हुई है जिसमें उन्होंने सप्ताह में एक दिन साइकिल से मंत्रालय जाने की बात की थी. बेशक चौहान ने इन सालों में घोषणाओं के बूते लोकप्रिय नेता की छवि बना ली है लेकिन अब इनकी जमीनी हकीकत सामने आने के साथ-साथ राज्य भाजपा की पेशानी पर बल पड़ना शुरू हो गए हैं.