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गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज

आईपीएल में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी के खुलासे के बाद से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष और आईपीएल टीम- चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन मीडिया से बहुत नाराज हैं. उन्हें लगता है कि मैच फिक्सिंग मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ हो रहा है. उनकी नाराजगी की वजह किसी से छिपी नहीं है. श्रीनिवासन के दामाद और चेन्नई सुपर किंग्स के प्रिंसिपल (सीईओ) रहे गुरुनाथ मयप्पन सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग रैकेट में शामिल होने के आरोपों में पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं. जाहिर है कि श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने और बीसीसीआई पर चेन्नई सुपर किंग्स का लाइसेंस खत्म करने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

लेकिन श्रीनिवासन को लगता है कि यह मांग सिर्फ मीडिया से आ रही है. उन्होंने एलान कर दिया है कि मीडिया उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. लेकिन वे भूल रहे हैं कि यही मीडिया है जिसने आईपीएल को आईपीएल बनाया है. न्यूज चैनलों और अखबारों ने शुरू से आईपीएल को जिस तरह हाथों-हाथ लिया, उसे जितनी कवरेज दी और सबसे बढ़कर उसकी चमक के पीछे के अंधेरे को अनदेखा किया, उससे आइपीएल को एक विश्वसनीयता मिली. यह मीडिया ही था जिसने आईपीएल को भारत के अपने पहले सफल लीग की तरह प्रचारित और प्रतिष्ठित किया.

इसलिए आइपीएल को मिले ‘मीडिया हाइप’ का मजा ले चुके श्रीनिवासन अब ‘मीडिया ट्रायल’ की शिकायत किस मुंह से कर रहे हैं? मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू, यह कैसे चलेगा? यह सही है कि जब से श्रीसंथ सहित तीन खिलाड़ियों और विंदू दारा सिंह और मयप्पन की ‘स्पॉट फिक्सिंग’ और सट्टेबाजी के आरोपों में गिरफ्तारी हुई है, मीडिया ने ऐसे आसमान सिर पर उठा रखा है जैसे उसे आईपीएल की चमक के पीछे छिपी बजबजाहट के बारे में आज पता चला है. सवाल यह है कि आज जो चैनल या अखबार आईपीएल की चीरफाड़ में जुटे हुए हैं वे कल तक उस गलाजत से आंखें क्यों मूंदे हुए थे.

क्या चैनलों को यह पता नहीं था कि जैसे हर चमकती चीज सोना नहीं होती, आइपीएल भी शुरू से ही क्रिकेट से ज्यादा पैसे और ग्लैमर के कारण चमक रहा था? सच यह है कि मीडिया को यह सब मालूम था. लेकिन चैनल खुद भी इसी ‘चमक’ से अभिभूत थे. यहां तक कि अधिकांश चैनलों पर क्रिकेट के एक्सपर्ट वे पूर्व खिलाड़ी हैं जिन पर फिक्सिंग के आरोप लग चुके हैं. मजे की बात यह है कि वे अब खिलाड़ियों के लालच और उनमें नैतिकता की बढ़ती कमी पर ‘ज्ञान’ देते हैं. यही नहीं, आईपीएल में सट्टेबाजी की पोस्टमार्टम कर रहे चैनल या अखबार कल तक खुद मैच से पहले सट्टा बाजार में टीमों के भाव बताया करते थे.

इसे कहते हैं, गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज. इसका सबूत यह है कि आईपीएल में फिक्सिंग के आरोपों में एन श्रीनिवासन का सिर मांग रहे अखबार या चैनल उस आईपीएल पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं जिसे काले धन को सफेद करने के लिए ही खड़ा किया गया है. सट्टेबाजी और नतीजे में फिक्सिंग उसके मूल चरित्र में है. सवाल है कि अगर आईपीएल को खत्म कर दिया जाए तो क्रिकेट का क्या नुकसान होगा. लेकिन यह सवाल कोई चैनल या अखबार नहीं उठाएगा क्योंकि आईपीएल को टेलीविजन यानी मनोरंजन उद्योग के लिए ही बनाया गया है. उसमें बड़े टीवी समूहों (जिनमें न्यूज चैनल भी शामिल हैं) के हजारों करोड़ रुपये लगे हुए हैं और सभी को विज्ञापनों से भारी कमाई हो रही है.

जाहिर है कि चैनल बेवकूफ नहीं हैं कि अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारें. वे तो सिर्फ श्रीनिवासन का सिर दिखाकर दर्शकों को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि आईपीएल में अब सब ठीक-ठाक है. वैसे ही जैसे ललित मोदी के बाद राजीव शुक्ल को आईपीएल कमिश्नर और श्रीनिवासन को बोर्ड अध्यक्ष बनाने के बाद हो गया था.

झारखंड:फरारी का खेल!

पिछले कुछ वक्त से झारखंड में सियासी नौटंकी पूरे शबाब पर है. वहां सरकार गिरने, राष्ट्रपति शासन लागू होने, फिर सरकार बनने की संभावना पैदा होने व उस पर विराम लगने की घटनाएं एक के बाद एक हो रही हैं. लेकिन इस किरकिरी से इतर एक और बात राज्य की छवि को धूमिल कर रही है. वह है जनप्रतिनिधियों की फरारी. मजेदार बात यह है कि तीनों फरार प्रतिनिधि खासे नामचीन हैं लेकिन पता नहीं उनकी तलाश कैसे की जा रही है कि वे पकड़ में ही नहीं आ रहे हैं.

पहला नाम सीता सोरेन का है, जो झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख शिबू सोरेन की बहू होने के अलावा संथाल परगना के जामा विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी हैं. इन्हें लेकर अदालत ने तमाम आदेश जारी किए. कभी गिरफ्तारी का आदेश, कभी कुर्की का तो कभी गिरफ्तारी पर रोक का और अब जमानत का आदेश. उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट 19 फरवरी को जारी हुआ था. सीता अपने सहयोगी रहे विकास पांडेय नामक शख्स को अपहृत करके बंधक बनाने, मारने-पीटने के आरोप में पिछले ढाई महीने से फरार रहीं. जब सीता पर नोट फॉर वोट मामले में सीबीआई की जांच शुरू हुई थी, उनका सहयोगी विकास पांडेय सरकारी गवाह बन गया था. दर्ज मामले के अनुसार सीता के लोगों ने विकास पांडेय को घर से उठाया और सीता सोरेन के घर ले जाकर उसके साथ मारपीट की. इतना सब होने पर जब  पुलिस और कुछ मीडियावाले उनके आवास पहुंचे तो विकास को विधायक के घर से छुड़वाया जा सका था. हालांकि अब सीता सोरेन को जमानत मिल गई है इसलिए तकनीकी तौर पर अब वह फरार नहीं कही जा सकतीं लेकिन बीच की पूरी अवधि वह फरार रहीं.

दूसरी चर्चित फरार प्रतिनिधि हैं रमा खलखो. रमा राजधानी रांची की महापौर रह चुकी हैं. गत माह जब महापौर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई तो चुनाव के ठीक एक दिन पहले यानी सात अप्रैल को रांची के एक होटल से 21 लाख 90 हजार रुपये की जब्ती हुई. इस सिलसिले में रमा के दो सहयोगियों को गिरफ्तार भी किया गया. इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत के भाई सुनील सहाय का भी नाम आया. अगले दिन रमा फरार हो गईं, तब से लेकर अब तक उनका कोई अता-पता नहीं है. चार मई को उनके रांची आवास पर कुर्की- जब्ती का इश्तहार भी लगाया जा चुका है.

दो फरार महिला प्रतिनिधियों के बीच एक चर्चित पुरुष नेता भी फरार चल रहे हैं. इनका ताल्लुक भी झारखंड मुक्ति मोर्चा से ही है. ये हैं संथाल परगना के शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र के विधायक नलिन सोरेन. वे मंत्री भी रह चुके हैं. नलिन को साढ़े बारह करोड़ रुपये के बीज घोटाले का आरोपित मानकर उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है. इसके बाद खाद घोटाले में भी उनका नाम आया है.

[box]तीनों फरार प्रतिनिधि खासे नामचीन हैं लेकिन पता नहीं उनकी तलाश कैसे की जा रही है कि वे पकड़ में ही नहीं आ रहे हैं[/box]

बहरहाल, इन प्रमुख प्रतिनिधियों के फरार होने की घटना से राज्य के राजनीतिक प्रहसन में एक नया अध्याय जरूर जुड़ा है. कहा जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में नोट फॉर वोट मामले में कुछ और प्रतिनिधि फरारी को तैयार हैं. वे प्रतीक्षा में हैं कि उनके खिलाफ मुकदमा खुले और वे अदृश्य हो जाएं.

झारखंड की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है. गत वर्ष कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सावना लकड़ा भी एक हत्याकांड में कई माह फरार थे. भाजपा के नेता व पूर्व मंत्री सत्यानंद भोक्ता की फरारी भी चर्चा में रही है. स्वास्थ्य मंत्री रह चुके भानुप्रताप देहाती भी एक वक्त फरार होकर खूब चर्चित हुए थे.

भाकपा माले विधायक विनोद सिंह कहते हैं, ‘न्यायालय ने भले ही राहत की बात की हो लेकिन जहां तक सरकार की बात है तो वह इतनी कमजोर नहीं है कि विधायक या किसी अन्य को गिरफ्तार न कर सके. यह सब सरकार और पुलिस की मिलीभगत से हो रहा है. सरकार सख्त हो तो वारंट निकलने के बाद लोगों को दुनिया के किसी कोने से खोजा जा सकता है. रमा खलखो के यहां जब छापा पड़ा तो रमा और सुबोधकांत भी थे पर उन्हें भगा दिया गया.’

वहीं विधायक बंधु तिर्की कहते हैं, ‘ये सब फरार कहां हैं? नलिन सोरेन रोज चश्मा लगाकर घूमते दिखते हैं. रमा भी घर के पास ही रहती हैं और रोज सुबह घर आती हैं. यह कहना सही होगा कि सरकार इन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहती.’

आशा थी कि पुलिस अधिकारी इन मामलों पर कुछ रोशनी डालेंगे लेकिन वे कुछ भी स्पष्ट कहने से कतराते नजर आए, आईजी (प्रोविजन) आरके मल्लिक ने प्रक्रिया की जानकारी देते हुए कहा कि जो भी व्यक्ति फरार होता है उसके घर एक माह का नोटिस लगाकर एक माह के अंदर कुर्की होती है. फिर उसकी समीक्षा होती है और उसके बाद उनकी संपत्ति को जब्त किया जाता है या कानूनी कार्रवाई की जाती है. उन्होंने भी इन मामलों के बारे में कोई खास मालूमात होने से इनकार किया. वहीं पुलिस प्रवक्ता रिचर्ड लाकड़ा से तमाम कोशिशों के बावजूद संपर्क नहीं हो सका.

उत्तराखंड: ‘ठंडे’ पर सरगर्मी

उत्तराखंड में जमीन से शुरू होने वाले विवादों का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा. ताजा विवाद ‘कोका कोला’ कंपनी को जमीन आवंटित करने का है. इस पर गहराई से नजर डाली जाए तो साफ दिखता है कि राज्य सरकार न सिर्फ निवेश की हड़बड़ी में स्थानीय हितों की उपेक्षा कर रही है बल्कि वह अतीत से कोई सबक सीखने को भी तैयार नहीं.

बीती 17 अप्रैल को राज्य सरकार ने हिंदुस्तान कोका कोला बेवरेज प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक करार किया था. इसके मुताबिक कंपनी उत्तराखंड में 600 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश करके प्लांट लगाएगी. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की उपस्थिति में हुए इस करार को सरकार ने बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया. कोका कोला से हुए समझौते के अनुसार राज्य सरकार कंपनी को देहरादून जिले की विकास नगर तहसील के छरबा गांव में लगभग 70 एकड़ (368 बीघा) जमीन 95 लाख रुपये प्रति एकड़ (19 लाख रुपये प्रति बीघा) के भाव पर देगी. प्रस्तावित प्लांट में नान अल्कोहलिक कार्बोनेटेड बेवरेज और जूस बनेगा जिससे 1,000 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने की संभावना है.

कोका कोला का यह निवेश औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल फेज-2 की शुरुआत होने के आठ महीने बाद उत्तराखंड में पहला बड़ा औद्योगिक पूंजी निवेश था. पिछले कुछ सालों से बड़े उद्योग उत्तराखंड की ओर रुख नहीं कर रहे थे. उल्टे औद्योगिक पैकेज में मिलने वाली छूट में हुई कटौती के कारण कई कंपनियां यहां से काम समेटने की फिराक में थीं. ऐसे में सरकार ने कोका कोला के निवेश को बड़ी उपलब्धि बताया. लेकिन इस बड़े पूंजी निवेश की खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी. करार के चार दिन बाद ही चर्चित पर्यावरणविद वंदना शिवा ने इस पर सवाल उठा दिए. 21 अप्रैल को देहरादून में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. वंदना शिवा ने कोका कोला कंपनी को ‘पानी का लुटेरा’ बताते हुए आरोप लगाया कि देश में जहां भी कंपनी के प्लांट लगे हैं वहां पानी आम आदमी की पहुंच से बाहर चला गया है. उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि उसे पहले केरल के प्लाचीमाड़ा और उत्तर प्रदेश में बनारस के पास मेहंदीगंज जाकर वहां की हालत देखनी चाहिए और तब कोका कोला को छरबा में प्लांट स्थापित करने की इजाजत देनी चाहिए.

वैसे इस पूरे विवाद की पड़ताल की जाए तो सरकार की अदूरदर्शिता साफ दिखती है. देहरादून से लगभग 32 किमी दूर सहसपुर कस्बे से थोड़ा आगे बढ़ते ही छरबा गांव शुरू हो जाता है. सड़क पर ही राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ग्राम सभा छरबा का बोर्ड लगा है. ग्राम प्रधान रोमी राम जायसवाल बताते हैं कि पिछले साल ही उनकी ग्राम सभा छरबा को राष्ट्रीय स्तर पर शराबबंदी के लिए प्रथम पुरस्कार मिला था. वे बताते हैं कि छरबा को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कार मिले हैं. 80 के दशक में भी इसे उत्तर प्रदेश में सबसे अच्छे वृक्षारोपण के लिए पुरस्कार मिला था. गांव के पश्चिम में आसन और उत्तर में शीतला नदी बहती है. आसन में साल भर पानी रहता है लेकिन शीतला बरसाती नदी है. गांव छह किमी लंबाई और छह किमी चौड़ाई में बसा है, इसीलिए इसका नाम छरबा पड़ा. 1,659 परिवारों का यह गांव कई मायनों में आदर्श है. करीब 10 हजार की आबादी में 40 फीसदी मुसलमान हैं और 60 फीसदी हिंदू. गांव में छोटे बच्चों के लिए 18 आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं.

[box]‘जिस भूमि का चयन सरकार ने कोका कोला प्लांट लगाने के लिए किया है उस पर ग्रामीण कृषि विकास के लिए अनुसंधान केंद्र स्थापित करना चाहते थे’[/box]

ग्राम सभा ने 120 आवारा गायों के लिए शेल्टर बनाया है. ये गायें ग्रामीणों ने समय-समय पर कसाइयों से छुड़वाई थीं. गांव के पूर्व प्रधान मुन्ना खां बताते हैं, ‘कसाइयों से गायों को छुड़वाने वालों में मुस्लिम भाई आगे रहते हैं.’ गांव के 70 साल के बुजुर्ग मोर सिंह बताते हैं, ‘गांव के लोग 40 साल पहले पानी के लिए दो कुओं, तालाब या तीन किलोमीटर दूर आसन नदी के पानी पर निर्भर थे.’ पानी न होने से तब गांव के अधिकांश खेत बंजर ही रहते थे. वे बताते हैं, ‘हालत इतनी बदतर थी कि पानी की कमी के चलते आस-पास के गांवों के लोग छरबा में अपनी बेटियों को ब्याहने से कतराते थे.’ सरकारें हैंडपंप लगाने की कोशिश करती थीं, लेकिन जल स्तर बहुत नीचे होने के कारण पानी नहीं आ पाता था. मोर सिंह बताते हैं, ‘तब गांववालों ने इस समस्या का हल खुद निकालने की सोची. आज 40 साल की मेहनत के बाद गांव में 68 एकड़ (520 बीघा) भूमि पर खैर, शीशम और पेड़ों की अन्य प्रजातियों का घना जंगल है. इससे जल स्तर 150 फुट के लगभग आ गया है. जहां कभी खराब भू जल स्तर के कारण हैंडपंप नहीं चल पाते थे, वहां आज 14 ट्यूब वेल और 22 हैंडपंप काम कर रहे हैं. ‘प्रधान रोमी राम जायसवाल बताते हैं, ‘गांव के बुजुर्गों की मेहनत से आज छरबा में अन्न और जल की कोई कमी नहीं है.’

लेकिन 18 अप्रैल की सुबह जब गांववालों को गांव की लगभग 70 एकड़ (368 बीघा) भूमि कोका कोला कंपनी को देने की खबर अखबारों के माध्यम से मिली तो उनके पांवों तले जमीन खिसक गई. कोका कोला को दी जाने वाली भूमि में गांव के लोगों द्वारा पाला-पोसा गया गांव का जंगल तो था ही पास बहने वाली शीतला नदी का बड़ा हिस्सा भी इसकी जद में आ रहा था. लोगों में रोष है कि जिनके जीवन पर इस फैसले का सबसे ज्यादा असर होना है उन्हें सरकार ने पूछा तक नहीं. प्रधान जायसवाल कहते हैं, ‘हमारी ग्राम सभा से कभी भी कोका कोला प्लांट स्थापित कराने का प्रस्ताव पारित नहीं कराया गया.  न ही सरकार ने इस विषय में हमसे कभी कोई राय या सहमति ली.’ गांव के लोग बताते हैं कि 2006 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने गांव की भूमि दून विश्वविद्यालय को देने के लिए एक बैठक बुलाई थी.

ग्रामीणों ने शिक्षा के पवित्र उद्देश्य के लिए भूमि कुछ शर्तों पर देने पर सहमति जताई थी. उनकी पहली शर्त थी कि दो साल की समय सीमा के भीतर विश्वविद्यालय के भवन का निर्माण होना चाहिए. दूसरी शर्त के अनुसार ग्राम पंचायत की जमीन को लीज पर लिए जाने पर सरकार को ग्राम पंचायत के खाते में कुछ पैसा डालना था. सरकार ने 27 मार्च, 2006 को शासनादेश जारी करके छरबा गांव की लगभग 40 हेक्टेयर (520 बीघा) भूमि दून विश्वविद्यालय को सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाने के लिए आवंटित कर दी थी. लेकिन सात साल बीत गए और कुछ नहीं हुआ. हाल ही में गांववालों को राजस्व दस्तावेजों से पता चला कि लगभग छह महीने पहले सरकार ने ग्राम सभा की 520 बीघा भूमि ग्राम सभा के नाम से निकाल कर पहले तो दून विश्वविद्यालय के नाम स्थानांतरित कर दी और फिर गुपचुप तरीके से इसे सिडकुल के नाम दर्ज कर दिया. इसी जमीन में से 368 बीघा जमीन कोका कोला कंपनी को बेची जा रही है.

वैसे ग्रामीणों को बहुत पहले से इसकी आशंका थी. इसीलिए जिस भूमि का चयन सरकार ने हाल में कोका कोला प्लांट लगाने के लिए किया है उस पर ग्रामीण कृषि विकास के लिए अनुसंधान केंद्र स्थापित करना चाहते थे. दो साल पहले छरबा के ग्रामीणों ने विधानसभा के सामने इस जमीन पर कृषि अनुसंधान केंद्र स्थापित करने के लिए धरना भी दिया था. एक बैंक इस जमीन के 60 बीघा हिस्से में कृषि अनुसंधान केंद्र स्थापित करने के लिए ग्राम पंचायत की मदद करने के लिए तैयार था. पूर्ववर्ती निशंक सरकार ने तब इस जमीन को कृषि अनुसंधान संस्थान के बजाय जड़ी-बूटी शोध संस्थान को आवंटित करने का प्रस्ताव मंगवाया था. लेकिन यह प्रस्ताव भी रद्दी की टोकरी में चला गया. छरबा गांव की जमीन के विषय में यह भी दिलचस्प तथ्य है कि कुछ समय पहले जब प्रधान रोमी राम जायसवाल के नेतृत्व में ग्रामीण विधानसभा के सामने धरने पर बैठे थे तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, जो उस समय टिहरी के सांसद थे, ने ग्रामीणों का समर्थन करते हुए धरना स्थल पर आकर वादा किया था कि छरबा गांव की इस जमीन का अधिग्रहण नहीं होने दिया जाएगा. ग्रामीणों का आरोप है कि पहले अधिग्रहण तक न होने देने का वादा करने वाले बहुगुणा मुख्यमंत्री बनने के बाद इस जमीन को औने-पौने दामों में बहुराष्ट्रीय कंपनी को बेचने पर आमादा हैं.

कोका कोला कंपनी कई दूसरी जगहों पर अपने प्लांटों को लेकर विवादों में रही है. भयानक जल दोहन किए जाने से जल स्तर नीचे जाने से स्थानीय खेती चौपट होने का उदाहरण हो या उसके प्लांट से निकलने वाले कचरे में मौजूद कैडमियम, क्रोमियम और लेड जैसे जहरीले रसायनों से स्थानीय जन-जीवन और पर्यावरण को होने वाला नुकसान, कंपनी लगातार सवालों के घेरे में रही है. सरकार को पता था कि कंपनी के लिए भूजल दोहन पर बवाल मचेगा, इसलिए अधिकारियों ने कोका कोला के साथ एमओयू करते समय ही यह घोषणा कर दी कि कंपनी भूजल का उपयोग नहीं करेगी. लेकिन सरकार ने अभी तक अधिकारिक रूप से यह नहीं बताया है कि पूरी तरह से साफ पानी पर आधारित कोका कोला कंपनी भूजल नहीं लेगी तो पानी आएगा कहां से. सरकारी अधिकारी अपुष्ट रूप से बताते हैं कि कंपनी को पानी यमुना पर बने डाकपत्थर बैराज या आसन बैराज से दिया जाएगा. इन बैराजों में इकट्ठा पानी से उत्तराखंड की तीन और उत्तर प्रदेश की दो जल विद्युत परियोजनाएं चलती हैं. पहले ही पानी की किल्लत के कारण ये परियोजनाएं पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहीं. जानकारों के मुताबिक कोका कोला को पानी देने पर इन परियोजनाओं का भी ठप पड़ना तय है. यानी बिजली उत्पादन में कटौती.

सामाजिक कार्यकर्ता और जल बचाओ आंदोलन के सूत्रधार सुरेश भाई कहते हैं, ‘पानी राज्य सरकार की संपत्ति नहीं है, और न ही इस पानी के उपयोग के लिए राज्य सरकार अकेले कोई फैसला ले सकती है.’ सुरेश भाई का मानना है कि राज्य सरकार कोका कोला कंपनी को देने के लिए डाकपत्थर या आसन बैराज से पानी नहीं ले सकती. इससे पहले उसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों के अलावा केंद्र की भी सहमति लेनी पड़ेगी. जायसवाल कहते हैं, ‘सरकार गांववालों को धोखे में रखने के लिए बैराज से पानी लेने की बात प्रचारित कर रही है. वास्तव में कंपनी को पानी के लिए भूजल ही लेना होगा जिसके लिए गांववाले कभी राजी नहीं होंगे.’ छरबा के लोग अपने गांव के पानी और जंगल को बचाने के लिए हर हद तक जाने को तैयार हैं.

ग्रामीणों और पर्यावरणविदों की दूसरी आशंका प्लांट से निकलने वाले दूषित जल को लेकर है. इस गांव से निकलने वाला यह जल ढलान से होते हुए आसन नदी और आसन बैराज में मिलेगा. 4,440.40 हेक्टेयर में फैले आसन बैराज में हर साल करीब 250 से अधिक प्रजाति के विदेशी पक्षी आते हैं. पक्षी विशेषज्ञों का आकलन है कि इससे पक्षियों का यह बसेरा उजड़ जाएगा. छबरा गांव में दिख रहे गिद्धों की अच्छी-खासी संख्या भी इस क्षेत्र की जैव विविधता को सिद्ध करती है. कोका कोला विवाद के कारण सरकार की निकाय चुनावों से पहले फजीहत तो हुई ही, लेकिन दूसरी ओर छबरा गांव द्वारा सालों से किए जा रहे क्रांतिकारी कार्यों पर भी सबकी नजर पड़ी. गांववालों को आशंका है कि कोका कोला के कारण कहीं वे 40 साल पहले की पेयजल की किल्लत की स्थिति में न पहुंच जाएं जिससे उबरने के लिए उनके बुजुर्गों ने 40 साल तक तपस्या की है. यानी एक तरफ अदूरदर्शी तरीके से जमीन को बेचने का फैसला करने वाली राज्य सरकार है और दूसरी तरफ उसे मां की तरह पालने और बचाने के लिए संघर्ष करने वाले लोग. अब सवाल यह है कि उनके संघर्ष की परिणति क्या होगी.

मुश्किल में टाइटलर

क्या है कोर्ट का हालिया आदेश?

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे के साये एक बार फिर से कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर पर पड़ने लगे हैं. दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई को एक बार फिर से आदेश दिया है कि वह 1984 के दंगों में टाइटलर की संलिप्तता की फिर से जांच करे. कोर्ट ने यह फैसला दंगों के पीड़ित एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. 10 अप्रैल को आए इस आदेश के बाद एक बार फिर से जगदीश टाइटलर के राजनीतिक भविष्य और सीबीआई की संदिग्ध भूमिका पर बहस छिड़ गई है. सीबीआई ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी.

टाइटलर पर क्या आरोप हैं? 
टाइटलर उन तीन बड़े कांग्रेसी नेताओं में से एक हैं जिन पर आरोप है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान उन्होंने लोगों को भड़काया और उस हिंसक भीड़ की अगुवाई की जिसने एक नवंबर, 1984 को तीन सिखों की हत्या कर दी थी. इसके अलावा उनके भड़कावे के कारण दिल्ली में कई और जगहों पर सिखों का कत्लेआम हुआ. 1984 के इन दंगों में तीन हजार से भी ज्यादा लोगों की जानें गई थीं. इन दंगों में टाइटलर के अलावा दो और बड़े कांग्रेसी नेताओं एचकेएल भगत और सज्जन कुमार का नाम सामने आया था. एचकेएल भगत की मृत्यु हो चुकी है, जबकि सज्जन कुमार के खिलाफ अदालत में मामला लंबित है.

मामला फिर से क्यों सामने आया है? 
टाइटलर के खिलाफ सीबीआई द्वारा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बाद मामला खत्म हो गया था. इसके फैसले के विरोध में कोर्ट में अपील दायर की गई थी जिसमें यह दलील दी गई है कि सीबीआई ने इस मामले में कई अहम गवाहों से पूछताछ नहीं की. इन्हीं दंगों में अपने पति को खो चुकी एक महिला लखविंदर कौर के मुताबिक जांच एजेंसी ने दो ऐसे गवाहों से बातचीत ही नहीं की जो इस घटना के चश्मदीद थे और महत्वपूर्ण जानकारियां दे सकते थे. अदालत ने सीबीआई को आदेश दिया है कि वह इन गवाहों से पूछताछ करने के बाद फिर से जांच रिपोर्ट दाखिल करे. अदालत के इस फैसले से टाइटलर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. उनका राजनीतिक भविष्य भी अधर में लटक गया है.
-प्रदीप सती

उल्टा पड़ता दांव

जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी

भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में हुई कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित भाटी आयोग की रिपोर्ट आने के बाद उत्तराखंड में पक्ष-विपक्ष के बीच शुरू हुआ घात-प्रतिघात का दौर थमता नहीं दिख रहा. भाजपा को साधने के लिए जांच रिपोर्ट को हथियार की तरह इस्तेमाल करती दिख रही कांग्रेस अब रिपोर्ट के खुलासे के बाद नित बदलते घटनाक्रम से खुद फंसती नजर आ रही है.

अतीत बताता है कि उत्तराखंड में हर नई सरकार अपने से पहली सरकार के कार्यों की जांच कराने के लिए जांच आयोगों का गठन करती रही है. 13 साल में अलग-अलग सरकारों ने उत्तराखंड में दर्जन भर से अधिक जांच आयोग बनाए. इन आयोगों पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं. इनमें से अधिकांश की जांच पूरी ही नहीं हो पाई. जिनकी जांच पूरी हुई भी तो उन्हें गठित करने वाली सरकारों ने जांच रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर नहीं रखी. ऐसे में यह आरोप लगना अस्वाभाविक नहीं कि ऐसे आयोग बस दो दलों की नूराकुश्ती होते हैं.

खैर, जांच आयोगों के गठन की परंपरा आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार ने भी सरकार बनने के लगभग छह महीने बाद एक सदस्यीय भाटी आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी. इसका काम था पिछली भाजपा सरकार में हुई कथित अनियमितताओं की जांच. पूर्व नौकरशाह केआर भाटी को पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के छह विवादास्पद मामलों की जांच करनी थी. इनमें ऋषिकेश में सिटजुरिया कंपनी को औद्योगिक भूमि में दी गई छूट, लद्यु और सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में हुई अनियमितता, कुंभ मेला-2010 में हुए कथित घोटाले, उत्तराखंड बीज और तराई विकास निगम में 2007 से 2012 के बीच हुई गड़बड़ी जैसे  मामले शामिल थे.

पांच मार्च, 2013  को भाटी आयोग ने तराई बीज विकास निगम की जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री बहुगुणा को सौंप दी. उस समय बजट सत्र और जल्दी होने वाले शहरी निकाय चुनावों को देखते हुए भाजपा राज्य की कांग्रेस सरकार पर खासी आक्रामक थी. सड़कों पर और मीडिया में गरीब मजदूरों के घरों के लिए आरक्षित सिडकुल की जमीन बिल्डरों को देने और टिहरी बांध के विस्थापितों को आवंटित जमीन में हुए खेल की गूंज थी. कैबिनेट में भू-कानून की कुछ धाराओं में बदलाव करने के मुद्दे पर भी इतना बवाल हो रहा था कि मुख्यमंत्री को खुद सफाई देने के लिए प्रेस के सामने आना पड़ रहा था.

भाटी आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने से पहले लीक हो गई. साथ ही इस जांच में एक पूर्व मुख्यमंत्री के दोषी पाए जाने की अफवाह उड़ गई. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रिपोर्ट के अंश लीक करके कांग्रेस सरकार भाजपा को डराना चाहती थी.

[box]भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट से उपजा विवाद उत्तराखंड के कृषि मंत्री हरक सिंह की विधानसभा सदस्यता के लिए भी खतरा बन गया है[/box]

लेकिन बात नहीं बनी. बजट सत्र में भाजपा के आक्रामक तेवरों में कोई कमी नहीं आई. उधर, कांग्रेस भी पीछे हटने को तैयार नहीं थी. सत्र के दौरान ही कृषि मंत्री हरक सिंह ने भाटी द्वारा सौंपी गई तराई बीज विकास निगम की जांच रिपोर्ट विधानसभा में रखने का ऐलान कर दिया और सरकार ने लीक होकर सभी महत्वपूर्ण हाथों तक पहुंच चुकी आयोग की रिपोर्ट को रस्मी तौर पर बजट सत्र में रखकर सार्वजनिक कर दिया.

तहलका ने 15 अप्रैल, 2011 के अंक में तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की अनुचित नियुक्ति, बोरों की खरीद में धांधली, बिना प्रमाणीकरण के कहीं से भी बीज खरीद कर निगम के प्रतिष्ठित बीज ब्रांड को समाप्त करने के षड्यंत्र जैसी अनियमितताएं उजागर की थीं. भाटी आयोग ने भी इन्हीं बिंदुओं को जांच का आधार बनाया. तहलका ने उस समय उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के तथ्यों से जिन गड़बड़ियों का खुलासा किया था उन सभी की भाटी आयोग की जांच में पुष्टि हो गई. आयोग की रिपोर्ट पर मंत्रिमंडल के निर्णय को आगे बढ़ाते हुए कृषि मंत्री हरक सिंह ने इन सभी मामलों में ‘निहित आपराधिक कृत्यों’ के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने का निर्णय ले लिया.

दरअसल भाटी आयोग ने इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी और कुछ आईएएस अधिकारियों को दोषी पाया है. कृषि मंत्री हरक सिंह ने एक ओर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करके पूर्व मुख्यमंत्री निशंक और हेमंत द्विवेदी के लिए परेशानी खड़ी कर दी है तो दूसरी ओर उनके आदेश में तराई बीज विकास निगम के निर्णयों में शामिल अधिकारियों के संबंध में आयोग की सिफारिशों के अनुसार शासन स्तर पर कार्रवाई की बात है. सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी दर्शन भारती कहते हैं, ‘इससे सिद्ध हो जाता है कि उत्तराखंड में भले ही नेताओं को उनके असंवैधानिक कार्यों के लिए घेरा जा सकता हो, लेकिन दागी अधिकारियों पर उंगली उठाने की हिम्मत यहां के राजनेताओं में नहीं है.’

उधर, भाजपा ने भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट को एकतरफा बताया. पूर्व मुख्यमंत्री निशंक ने आरोप लगाया कि उनके बयान तक नहीं लिए गए तो हेमंत द्विवेदी ने उच्च न्यायालय की शरण ली. रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद सरकार की विपक्ष को बैकफुट पर लाने की रणनीति कामयाब होती नजर आ रही थी. इस बीच पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत ने भाटी और मुख्यमंत्री के करीबी कांग्रेस विधायक के नजदीकी संबंधों की बात सार्वजनिक कर दी. भाजपा के आक्रामक रुख को देखते हुए केआर भाटी ने जांच आयोग से इस्तीफा दे दिया. सरकार ने भी सुशील त्रिपाठी को जांच आयोग का अध्यक्ष बना दिया. साथ ही उसने भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट के आधार पर आनन-फानन में प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज करा दी.

लेकिन पुख्ता तथ्यों के बावजूद यह रिपोर्ट भाजपा के बजाय उल्टे सरकार पर भारी पड़ने लगी. तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने इस पर सवाल उठाया. उनका कहना था, ‘यदि तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष पद पर हेमंत द्विवेदी की नियुक्ति असंवैधानिक थी तो फिर मुख्यमंत्री बहुगुणा ने कृषि मंत्री हरक सिंह को कैसे इस पद पर नियुक्त किया है?’ दरअसल निगम के आर्टिकिल ऑफ एसोसिएशन की धारा 111, धारा 147 और पूर्व बैठकों में पारित निर्णयों के अनुसार इस संस्था के अध्यक्ष पद पर किसी  गैरसरकारी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हो सकती. ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के फंसने का आधार बनने वाली धारा 147 से कांग्रेस भी घिर रही थी. उधर, सरकार का यह तर्क था कि मंत्री अपने अधीन किसी भी विभाग या निगम का मुखिया हो सकता है. यह तर्क किसी को पचा नहीं.

भाटी आयोग की रिपोर्ट से उपजा विवाद हरक सिंह की विधानसभा सदस्यता के लिए भी खतरा बन गया है. भाजपा ने अप्रैल के पहले सप्ताह में राज्यपाल से मुलाकात करके उनसे कृषि मंत्री की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखने की मांग की. भाजपा नेताओं ने राज्यपाल को दिए ज्ञापन में आरोप लगाया है कि हरक सिंह को कृषि मंत्री के साथ-साथ तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष पद पर नामित किया गया है. साथ ही वे सैनिक कल्याण मंत्री के साथ उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (उपनल) के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं.

भाजपा नेताओं ने राज्यपाल से मांग की कि ये दोनों पद लाभ के पदों के दायरे में आते हैं. इसलिए संविधान के अनुसार हरक सिंह रावत की विधानसभा सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए. इसके जवाब में हरक सिंह और सरकार ने कई तर्क दिए. लेकिन जानकारों की मानें तो संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार इस मामले में सरकार का पक्ष कमजोर और संविधान के  विपरीत था. ऐसे में कल तक भाजपा नेताओं के बयानों को भाटी आयोग की रिपोर्ट से उपजी बौखलाहट बताने वाली सरकार ने डैमेज कंट्रोल के लिए तुरत-फुरत एक नया उपाय ढूंढ़ने की कोशिश की. उसने तराई बीज विकास निगम और उपनल के अध्यक्ष पदों को पूर्व तिथि से लाभ के पदों के दायरे से बाहर निकालने का अध्यादेश राज्यपाल को भेज दिया.

[box]भाजपा ने अप्रैल के पहले सप्ताह में राज्यपाल से मुलाकात करके उनसे कृषि मंत्री की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखने की मांग की.[/box]

लेकिन भाजपा इस मामले में चुप बैठने को तैयार नहीं है. भाजपा नेताओं के प्रतिनिधि मंडल ने राज्यपाल से फिर मिलकर मांग रख दी है कि सरकार द्वारा पूर्व तिथि से इन दोनों पदों को लाभ के पदों के दायरे से बाहर रखने का अध्यादेश नियम और संसदीय परंपरा के विरुद्ध है. उनका कहना है कि पूर्व तिथि या आगे की तारीखों से प्रभावी होने वाले अध्यादेश राज्य हित में लाए जाने की परंपरा है इसलिए व्यक्ति हित में  अध्यादेश लाने की अनुमति राज्यपाल को नहीं देनी चाहिए. राज्यपाल द्वारा यह अध्यादेश लाने की अनुमति देने की स्थिति में भाजपा राज्यपाल का विरोध करने के मूड में भी दिख रही है.

उत्तराखंड में ताकतवर लोगों के लिए जमीन के सौदे जल्द कमाई का सबसे बड़ा साधन हैं. जमीन के हर विवादित सौदे में लाभ पाने वालों में सत्ता-विपक्ष के ताकतवर लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहते हैं. इन सौदों का अच्छा लाभ नौकरशाह और जांच का मौका हाथ में आने पर पुलिस अधिकारी भी लेते ही रहते हैं. यह विवाद भी सरकार द्वारा जमीन को औने-पौने दामों में दिए जाने से शुरू हुआ था. तहलका ने मई, 2011 के अंक में हल्द्वानी में 300 करोड़ रुपये की लगभग 99 एकड़ जमीन के एक सौदे का खुलासा किया था. अब इस जमीन का बाजार भाव 700 करोड़ रुपये बताया जाता है. इस सौदे का सीधा संबध हेमंत द्विवेदी से था. यदि कांग्रेस सरकार चाहती तो कायदे और नियमों से यह जमीन राज्य सरकार में समाहित हो जानी चाहिए थी. लेकिन सरकार बनने के एक साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ. सामाजिक संगठन कुमाऊं न्याय मंच के बलवंत सिंह कहते हैं, ‘इस तरह के सौदों से लाभ लेने वालों में सभी दलों के प्रमुख नेता होते हैं, इसलिए सरकार ऐसे मामलों की प्रभावी जांच नहीं करती.’ उनका आरोप है कि सभी सरकारें या दलों के नेता नूरा-कुश्ती करके जनता को भरमाने में लगे हैं और उत्तराखंड की बेशकीमती जमीनों का सौदा कर रहे हैं.

बहुगुणा सरकार ने भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करके यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि सरकार में जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और उस पर कार्रवाई करने की पूरी हिम्मत है. लेकिन रिपोर्ट को सामने लाने का समय और तरीका उसे सवालों के कटघरे में खड़ा कर रहा है. वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जोशी कहते हैं, ‘ऐसे उदाहरण लोकतंत्र की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं.’

कुछ साल पहले सपा सांसद जया बच्चन ने लाभ के पद से जुड़े विवाद के चलते अपनी राज्य सभा सदस्यता गंवाई थी. इससे उपजे विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी उस समय लोकसभा से इस्तीफा देना पड़ा था. भाटी आयोग से स्वयं को सुरक्षित करने की कोशिश करती दिखने वाली उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के सामने भी अब बड़ा संकट खड़ा हो गया है कि वह भाजपा द्वारा इस मुद्दे पर छोड़े जा रहे तीखे तीरों से अपने मंत्री हरक सिंह रावत की विधानसभा सदस्यता कैसे बचाए.

बेकाबू बेनी बाबू

मुलायम सिंह यादव के खिलाफ हाल ही में दिए अपने बयानों से फिर चर्चा में आए केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के लिए विवाद कोई नई बात नहीं है. बेनी के राजनीतिक जीवन के कैसेट को अगर हम थोड़ा रिवाइंड करें तो पाएंगे कि बेनी बाबू अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन काफी पहले से करते आए हैं.
जिन मुलायम को बेनी ने हाल ही में आतंकवादियों का साथी, भ्रष्टाचारी, गुंडा और बदमाश जैसे विशेषणों से नवाजा है, उन्हीं के साथ उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के तीन दशक गुजारे हैं. बेनी न सिर्फ समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे बल्कि वे लंबे समय तक सपा में नंबर दो की हैसियत भी रखते थे.
कुछ समय तक आर्य समाज और गन्ना संगठनों से जुड़े रहने वाले बेनी को जाने-माने समाजवादी नेता रामसेवक यादव राजनीति में लाए. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर उन्होंने पहली बार 1974 में बारांबकी के दरियाबाद से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते. बाद में मुलायम सिंह यादव के साथ चौधरी चरण सिंह के संरक्षण में कुर्मी समुदाय से आने वाले बेनी ने अपनी पहचान एक मजबूत और जुझारु नेता के रूप बना ली.

इंदिरा गांधी ने सन 1975 में जब आपातकाल लगाया तो कहा जाता है कि उस समय बेनी ही एकमात्र समाजवादी नेता थे जिन्हें जेल नहीं हुई. वरिष्ठ समाजवादी चिंतक और बेनी के करीबी रहे राजनाथ शर्मा कहते हैं, ‘ये आदमी छल-कपट की राजनीति में पारंगत रहा है. आपातकाल के समय इसने कांग्रेस से भी हाथ मिला लिया था. यही कारण है कि जब 77 में रामनरेश यादव की सरकार बनी तब इसे मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया.’

खैर उत्तर प्रदेश में समाजवादी छतरी के तले बेनी और मुलायम कंधे से कंधा मिलाकर काम करते रहे. दोनों के बीच बेहद मधुर और करीबी संबंध थे, जिसकी झलक उस समय भी दिखी जब 89 में प्रदेश में जनता दल की सरकार बनने का मौका आया. मुख्यमंत्री पद के लिए अजीत सिंह और मुलायम दोनों ने अपनी दावेदारी ठोकी. कोई हल निकलता न देख विधायकों की वोटिंग कराई गई जिसमें बेनी ने मुलायम के समर्थन में बड़ी संख्या में विधायकों को लामबंद किया. इंडियन एक्सप्रेस के फैसल फरीद कहते हैं, ‘उस समय मुलायम बिना बेनी के समर्थन के सीएम नहीं बन सकते थे. अजीत के लिए यह बड़ा झटका था, जिसके बाद वे फिर कभी पनप ही नहीं पाए.’

रायबरेली में प्रचार करते हुए मुसलमानों से उन्होंने कहा कि उनका एक ईसाई को वोट देना इस्लाम की परंपरा के खिलाफ है

बेनी और मुलायम के मधुर संबंधों पर तनाव के बादल उस समय उमड़ते दिखाई दिए जब 1992 में मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी नामक एक नए दल के गठन की बात की. बेनी का मानना था कि एक नई पार्टी के लिए राज्य में कोई जगह नहीं है इसलिए उन्हें कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए. मगर मुलायम अडिग रहे. उनके इस निर्णय से बेनी कितने नाराज थे यह तब दिखा जब पार्टी का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ. चार दिन के उस अधिवेशन में बेनी तीन दिन तक पहुंचे ही नहीं. काफी मान-मनौव्वल के बाद वे अंतिम दिन समारोह में पहुंचे.

राजनीतिक हैसियत के मामले में खुद को मुलायम से कमतर नहीं आंकने वाले बेनी के राजनीतिक जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार में मुलायम के साथ उन्हें भी केंद्र में मंत्री बनने का मौका मिला. देवगौड़ा के नेतृत्व वाली उस सरकार में मुलायम रक्षा मंत्री बने तो बेनी संचार राज्य मंत्री थे. बाद में आईके गुजराल की सरकार में बेनी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं, ‘बेनी अपने आप को हमेशा मुलायम सिंह के बराबर ही समझते रहे लेकिन मुलायम ने कभी उन्हें अपने बराबरी का नहीं समझा.’ इस संदर्भ में 1997 का वाकया बहुत दिलचस्प है जब विधानसभा चुनाव के वक्त दोनों ने अपना पर्चा दाखिल किया था. उस समय एक अखबार की खबर थी कि दोनों दिग्गज नेता अब विधानसभा जाने की तैयारी में हैं. मुलायम इस खबर को लिखने वाले पत्रकार से बेहद नाराज हुए. उन्होंने कहा, ‘बेनी कब से दिग्गज नेता हो गए.’

समय के साथ मुलायम की नजर में बेनी की पहचान राजनीतिक साथी से ज्यादा उस कुर्मी नेता की बनती गई जिसके सहारे वे अपनी राजनीतिक जीत सुनिश्चित कर सकते थे. प्रदेश में संख्या बल के हिसाब से पिछड़ी जातियों में यादवों के बाद आने वाली कुर्मी जाति का यह नेता उनके बहुत काम का था.
दोनों के बीच सत्ता संघर्ष भले ही बहुत पहले से चलता रहा हो लेकिन न तो बेनी ने मुलायम के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कभी ज्यादा कुछ कहा और न ही मुलायम ने. सब कुछ तब बदल गया जब 1996 में अमर सिंह का सपा में प्रवेश हुआ. अमर सिंह के तौर-तरीकों से बेनी न सिर्फ असहमत थे बल्कि बेहद चिढ़ते भी थे. सपा में आने के बाद सिंह जिस तेजी से मुलायम के नजदीकी होते गए उसी अनुपात में बेनी और अन्य पुराने नेता पार्टी में हाशिये की तरफ खिसकते चले गए.

2003 में जब राज्य में सपा की सरकार बनी उस समय बेनी सांसद थे. तब तक प्रदेश, पार्टी और सरकार में बेनी का प्रभाव बेहद सीमित हो गया था. बेटा राकेश भले ही सरकार में जेल मंत्री था लेकिन इससे बेनी संतुष्ट नहीं थे. मुलायम सिंह को इस बात का आभास हो गया था कि वे देर-सबेर कांग्रेस की तरफ हाथ बढ़ा सकते हैं. 2006 में सोनिया गांधी ने अपनी संसदीय सीट रायबरेली से इस्तीफा दे दिया था और वहां से उपचुनाव होने वाला था. सपा ने सोनिया गांधी के खिलाफ वर्मा के भाई के दामाद राजकुमार चौधरी को टिकट दे दिया. अब बेनी भी दामाद के पक्ष में प्रचार करने पर मजबूर हो गए. उस वक्त प्रचार करते हुए मुसलमानों से उन्होंने कहा कि उनका एक ईसाई को वोट देना इस्लाम की परंपरा के खिलाफ है.

सपा को लगा कि बेनी के ये बोल भविष्य में कांग्रेस और उनके बीच किसी तरह के मधुर संबंधों की संभावना पर पूर्ण विराम लगा देंगे. मगर 2006 का अंत आते-आते बेनी ने मुलायम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बेनी समर्थक उस समय मुलायम को एहसानफरामोश ठहराते हुए यह उदाहरण दिया करते थे कि कैसे उनके लिए बेनी ने 1993 में भाजपा के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसमें उन्हें मुख्यमंत्री पद की पेशकश की गई थी. 2007 में बेनी सपा से अलग हो गए और समाजवादी क्रांति दल नामक एक पार्टी बनाई. चुनाव में गए. लेकिन अपने प्रत्याशियों को वे क्या जिताते, पिता और पुत्र खुद चुनाव हार गए. राजनीतिक अप्रासंगिकता और अंधकारमय भविष्य की तरफ बढ़ रहे बेनी के लिए कांग्रेस संजीवनी बन कर आई. वे 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस में शामिल हो गए.

बेनी को पार्टी से जोड़ने का फैसला खुद राहुल गांधी का था जिनका आकलन था कि यह आदमी यूपी में मरणासन्न कांग्रेस में जान फूंकने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेनी को गोंडा से टिकट दिया. बेनी जीतकर लोकसभा पहुंच गए. पहले राज्य मंत्री और बाद में केंद्रीय मंत्री बने. कांग्रेस को भी उस चुनाव में उसके अपने आकलन से बहुत अधिक -21- सीटें हासिल हुईं. कांग्रेस और राहुल गांधी को यूपी में अब बड़ी उम्मीदें दिखने लगीं. बस राहुल गांधी के यूपी प्लान में बेनी उनके खास सिपहसालार बन गए.

बाहर से आए बेनी को इतना महत्व मिलता देख कांग्रेस के अपने नेता नाराज हो गए. लेकिन इसके बाद भी राहुल गांधी ने उनके प्रति अपना ‘प्रेम’ बनाए रखा. एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए राहुल ने बेनी को अपना राजनीतिक गुरु तक कह डाला. अब उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत कौन कर सकता था? राहुल गांधी से मिली शायद इसी राजनीतिक ताकत की खुराक ने बेनी के भीतर एक ऐसे नेता को जन्म दिया जो कभी भी, किसी के भी खिलाफ, कुछ भी बोल सकता है. 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी भले ही बुरी तरह हार गई हो लेकिन उससे बेनी के कद पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा. वे दिन प्रति दिन और बेकाबू होते चले गए.

बेनी के जुबानी हमले का राष्ट्रीय स्तर पर संभवतः सबसे पहला शिकार अटल बिहारी बाजपेयी हुए थे. आठ दिसंबर, 2009 को संसद में लिब्राहन आयोग पर चर्चा के दौरान तब हंगामा मच गया जब बेनी ने  बाजपेयी पर टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘नीच’ कह डाला. बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इसके लिए माफी मांगनी पड़ी. पिछले साल जब अन्ना आंदोलन चरम पर था और कांग्रेस अन्ना नामक समस्या का राजनीतिक हल ढूंढ़ने की दिमागी कसरत कर रही थी उस समय बेनी का बयान आया कि ‘अन्ना सन 1965 के भारत-पाक युद्ध का भगोड़ा सिपाही है. इसके गांव रालेगण सिद्धि में सरपंच इसके खिलाफ जीता है. अपने घर में इस आदमी का कोई वजूद नहीं है और दिल्ली आकर नौटंकी करता रहता है.’ बेनी की अर्थशास्त्रीय समझ ने उस समय भी हंगामा मचाया जब महंगाई को बेनी ने किसानों के लिए फायदेमंद बता दिया. विभिन्न हलकों में उनके इस बयान की तीखी आलोचना हुई, लेकिन इसका बेनी बाबू पर कोई असर नहीं हुआ. उल्टे कांग्रेस के नेता बेनी के बयान में छिपी गहरी बात को लोगों को समझाते नजर आए.

जब कांग्रेस के राजनीतिक विरोधियों पर बेनी बाबू हमला करने के लिए पूरी तरह कमर कस चुके हों तो फिर भला नरेंद्र मोदी उनसे कैसे बच पाते. एक प्रश्न के जवाब में मोदी को राज्य का एक अदना-सा नेता बताते हुए बेनी ने कहा, ‘यूपी आएं तो हम उनको बताते हैं. बाप हैं हम मोदी के’. सलमान खुर्शीद पर 71 लाख रुपये के घपले के आरोप का यह कहते हुए बेनी ने बचाव किया कि इतनी कम रकम के लिए कोई केंद्रीय मंत्री भ्रष्टाचार नहीं कर सकता. संसद पर हमले के दोषी अफजल को फांसी की जगह उम्रकैद देने की उनकी मांग पर भी काफी बवाल हुआ.

बेनी के ये बोल भले ही लोगों को अजीबोगरीब लगें लेकिन राकेश वर्मा इसे अपने पिता की विशेषता मानते हैं. वे कहते हैं, ‘हमारे पिता जी कभी झूठ नहीं  बोलते और न ही किसी से वो डरते हैं. वो जो भी कहते हैं उस पर अडिग रहते हैं.’ ऐसा नहीं है कि बेनी की बेलगाम जुबान की जद में सिर्फ कांग्रेस के विरोधी आए हैं. कभी-कभी ऐसे मौके भी आए जब बेनी की जुबानी तोप ने पीएल पुनिया, रीता बहुगुणा जोशी और श्री प्रकाश जायसवाल को भी अपने निशाने पर ले लिया. हाल ही में जब केंद्र सरकार के लिए पहले से ही महत्वपूर्ण मुलायम सिंह और भी महत्वपूर्ण होने जा रहे थे तो बेनी ने मुलायम सिंह को जो जमकर खरी-खोटी सुनाई उससे कांग्रेस को बेहद फजीहत का सामना करना पड़ा. बेनी राहुल को यूपी की राजनीति के लिए जरूरी लगते हैं यह सही है लेकिन वे भी राहुल गांधी को लगातार खुश करने का आक्रामक प्रयास करते दिखाई देते हैं. राहुल को खुश करने की इससे बड़ी कोशिश क्या हो सकती है जब बेनी कहते है, ‘अभी मैं 20 साल और जिंदा रहूंगा और राहुल गांधी को देश की बागडोर सौंपे बिना दुनिया से नहीं जाऊंगा.’

बेनी की इस रणनीति पर शरत कहते हैं, ‘बेनी ने चाटुकारिता को एक नया आयाम दिया है. राहुल को खुश करने के लिए वो लगातार इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं.’ लेकिन क्या सिर्फ चाटुकारिता के दम पर बेनी राहुल या कहें कांग्रेस हाईकमान के प्रिय बने हुए हैं? शरत कहते हैं, ‘राहुल गांधी ने बेनी प्रसाद वर्मा को बहुत बड़ा नेता समझ लिया है. उन्हें लगता है कि यूपी में बेनी से उन्हें बहुत फायदा हो सकता है.’ प्रधान की बात का समर्थन करते हुए राजनाथ शर्मा भी कहते हैं, ‘राहुल गांधी अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण बेनी प्रसाद वर्मा को बड़ा नेता समझ बैठे हैं.’ लेकिन क्या राहुल को नहीं पता कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बेनी के कहने पर लगभग 150 लोगों को टिकट दिया गया था और उनमें से एक भी नहीं जीत सका. फैसल के मुताबिक यह सही है कि बेनी के चुने हुए लोग चुनाव हार गए लेकिन जिन सीटों पर ये लोग हारे वहां पहले कांग्रेस को मात्र 1,000-1,500 वोट मिलते थे जबकि पिछले चुनाव में उसे 25 से 30 हजार तक वोट मिले.

सिनेमा के शौकीन बेनी के हालिया बयानों के पीछे आगामी लोकसभा चुनाव को भी एक प्रमुख कारण के तौर पर देखा जा रहा है. जानकार बताते हैं कि इसी वजह से बेनी मुलायम को लेकर सख्त हुए जा रहे हैं. वे इस तरह के बयान इसलिए दे रहे हैं ताकि यादव बनाम कुर्मी का माहौल बन सके.­

रिश्तेदारों और दागियों के सहारे

बात कोई पांच महीने पुरानी है. अक्टूबर, 2012 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने लखनऊ में एक रैली की थी. रमाबाई मैदान में हुई इस रैली में देश भर से पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ा. विशाल भीड़ देखकर मायावती उत्साहित हो गईं और उन्होंने कार्यकर्ताओं से 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारी शुरू करने को कहा. इस मायने में बसपा के लिए यह रैली एक तरह से चुनावी शंखनाद थी. मायावती ने अपने भाषण में दो और बातों पर जोर दिया था. उनका कहना था कि पार्टी के किसी भी नेता के रिश्तेदार को चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं मिलेगा चाहे वह खुद उनका सगा-संबंधी क्यों न हो. उनका दूसरा एलान यह था कि बाहुबलियों और दागी छवि के लोगों के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है, उनका चुनाव लड़ना तो दूर की बात है.

वैसे यह पहला मौका नहीं था जब मायावती ने सार्वजनिक रूप से ये दो बातें कही हों. 2010 में हुए पंचायत चुनाव के पहले भी उन्होंने यह कहा था. फिर भी पार्टी के छोटे-बड़े सभी नेताओं ने अपने-अपने रिश्तेदारों को पंचायत चुनाव के मैदान में उतारा और कई ने जीत भी हासिल की. बाहुबली भी मैदान में पीछे नहीं थे. अब लोकसभा चुनाव के लिए उनके शंखनाद के पांच महीने के भीतर ही एक बार फिर यह समझ में आने लगा है कि बसपा अपने नेताओं के रिश्तेदारों, बाहुबलियों और दागी छवि के लोगों से पीछा नहीं छुड़ा पा रही. मौका कोई भी हो, समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाने वाली बसपा भी परिवारवाद का लबादा ओढ़े नजर आ रही है. आधिकारिक तौर पर पार्टी की ओर से भले ही अभी तक प्रत्याशियों की कोई सूची जारी न की गई हो लेकिन पार्टी हाईकमान की ओर से लोकसभा प्रभारी बना कर प्रत्याशियों को उनके क्षेत्रों में भेज दिया गया है. जो लोग ताल ठोककर लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हैं, उनमें से करीब आधा दर्जन ऐसे नाम हैं जो किसी न किसी बड़े नेता के परिजन हैं या उनके करीबी रिश्तेदार.

उदाहरण के लिए, पार्टी की पहली पंक्ति के नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजल को हाईकमान की ओर से चुनाव लड़ने का संकेत हो गया है. अफजल ने फतेहपुर सीट से अपनी तैयारी भी शुरू कर दी है.  सिद्दीकी तो सिर्फ अपने बेटे को ही टिकट दिलाने में सफल हुए हैं लेकिन बसपा सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे रामवीर उपाध्याय ने अपनी सांसद पत्नी के साथ छोटे भाई को भी टिकट दिलवाने में कामयाबी पाई है.  उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय ने 2009 के चुनाव में फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ा और सांसद बनीं. निवर्तमान सांसद होने के कारण उनके टिकट को काटना असंभव था लिहाजा 2014 के लिए उनके टिकट पर तो मुहर लगी ही, उपाध्याय के छोटे भाई मुकुल उपाध्याय ने भी गाजियाबाद से चुनावी तैयारी शुरू कर दी है. पार्टी सूत्र बताते हैं कि हाथरस जिले के निवासी पूर्व मंत्री उपाध्याय ने सियासी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पहले से ही आस-पास के जिलों में राजनीतिक गतिविधियां शुरू कर दी थीं ताकि मौका पड़ने पर सियासी फसल काटी जा सके.

[box]नेताओं के रिश्तेदारों और दागियों पर दांव लगाने के अलावा बसपा 2007 के विधानसभा चुनाव में प्रयोग की गई सोशल इंजीनियरिंग भी फिर से आजमाने जा रही है[/box]

परिवार में अधिक से अधिक लाल बत्तियों का मोह पार्टी के दूसरे बड़े नेता स्वामी प्रसाद मौर्य भी नहीं छोड़ पा रहे. मौर्य की अपनी बेटी संघमित्रा को मैनपुरी से चुनाव लड़वाने की योजना है. हालांकि पार्टी के सूत्र बताते हैं कि उनके चुनावी क्षेत्र में अभी बदलाव किया जा सकता है क्योंकि मैनपुरी सपा का गढ़ माना जाता है और इसलिए चुनाव में कोई गड़बड़ न हो, यह बात ध्यान में रखते हुए संघमित्रा को किसी ऐसी सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है जहां से उनकी जीत आसानी से हो सके. लेकिन इतना जरूर तय है कि मौर्या अपनी बेटी को लोकसभा चुनाव जरूर लड़ाएंगे. पार्टी का ब्राह्मण चेहरा कहे जाने वाले सतीश चंद्र मिश्रा के करीबी रिश्तेदार रमेश शर्मा भी झांसी से चुनाव मैदान में हैं. रमेश शर्मा मिश्रा के समधी हैं. कभी बसपा सुप्रीमो मायावती का चुनावी क्षेत्र रहे अंबेडकर नगर से बसपा सांसद राकेश पांडे भी अपने छोटे भाई पवन पांडे को चुनावी मैदान में उतार चुके हैं. उन्होंने अपने छोटे भाई के लिए अंबेडकर नगर से सटी सुल्तानपुर लोकसभा सीट को चुना है. पवन ने कुछ माह पूर्व सुल्तानपुर से अपना प्रचार भी शुरू कर दिया है. पवन इससे पहले भी सुल्तानपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं.

रामवीर उपाध्याय के पैतृक जिले हाथरस से सटी अलीगढ़ लोकसभा सीट पर पार्टी ने वर्तमान सांसद राजकुमारी सिंह के पति जयवीर सिंह को टिकट दिया है. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब राजकुमारी सांसद बनी थीं उस समय जयवीर सिंह बसपा सरकार में मंत्री थे. 2012 के विधानसभा चुनाव में जयवीर सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा. मायावती के साथ हर मंच पर दिखने वाले सिंह को पार्टी ने ठाकुर चेहरा होने का लाभ दिया और चुनाव हारने के बाद भी एमएलसी बना दिया. सूत्रों के मुताबिक वे एमएलसी बनने भर से नहीं माने हैं इसलिए उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दी है. पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भले ही मंचों से पार्टी में परिवारवाद न होने का दम भरती हों लेकिन ये चंद आंकड़े बताते हैं कि किस तरह पार्टी का हर बड़ा नेता अपने भाई, पत्नी या बेटे के मोह में फंसा हुआ है.

अब यदि पार्टी में बाहुबलियों की बात करें तो सबसे पहला नाम सांसद धनंजय सिंह और सांसद प्रत्याशी बबलू सिंह का आता है. जौनपुर से सांसद धनंजय सिंह पर बसपा के शासनकाल में ही प्रदेश में हुए एनआरएचएम घोटाले के साथ सीएमओ की हत्या का आरोप लग चुका है. इन आरोपों से घिरे धनंजय सिंह को पार्टी ने विधानसभा चुनाव से पहले इसलिए बाहर निकाल दिया था कि उन्होंने बिना पार्टी अनुमति के अमर सिंह से मुलाकात कर ली थी. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि अमर सिंह से मुलाकात के बाद धनंजय को पार्टी से निकाला जाना महज दिखावा था और ऐसा सीएमओ मर्डर केस और एनआरएचएम के आरोप के कारण किया गया था. विधानसभा चुनाव की वजह से मायावती कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थीं. पार्टी से निकाले जाने के बाद धनंजय सिंह पर मायावती की सख्ती का आलम यह था कि अमर सिंह से मुलाकात के बाद जब धनंजय वापस हवाई जहाज से बनारस आए तो उनके सैकड़ों समर्थक वाहनों से उनको लेने गए थे. इन वाहनों को पुलिस ने सूजे से पंचर करने के साथ ही समर्थकों को लाठी मार कर खदेड़ दिया था. मायावती और धनंजय सिंह के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई थी कि सिंह के पिता का जौनपुर से विधानसभा का टिकट भी कट गया था. लेकिन मायावती की यह सख्ती विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद गायब हो गई. अक्टूबर में राजधानी में बसपा की हुई विशाल रैली के दौरान कई जगह होर्डिंगों पर मायावती की फोटो के साथ सिंह की भी फोटो दिखी. रैली स्थल पर भी सिंह सिर पर पगड़ी बांधे अपने समर्थकों के साथ पार्टी के बड़े नेताओं से मिलते-जुलते रहे. धीरे-धीरे स्थितियां सुधरीं और धनंजय को पार्टी ने फिर जौनपुर से अपना प्रत्याशी बना दिया.

ऐसा ही फैजाबाद के पूर्व विधायक बबलू सिंह के मामले में भी हुआ. दबंग विधायक बबलू सिंह पर 2009 में कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का घर जलाने का आरोप है. इसके अतिरिक्त बसपा के कार्यकाल में ही राजधानी लखनऊ में जमीन हड़पने और अवैध रूप से कॉम्पलेक्स बनवाने का भी आरोप उन पर लग चुका है. 2012 के विधानसभा चुनाव से पूर्व पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप लगाते हुए मायावती ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इसके बाद बबलू ने पीस पार्टी का दामन थाम लिया और बीकापुर से चुनाव लड़ा. लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. मार्च, 2012 में सत्ता से बाहर जाने के बाद बसपा को एक बार फिर बबलू सिंह की याद आई और वे कब पार्टी में आ गए किसी को खबर तक नहीं हुई. सार्वजनिक तौर पर लोगों को इसका पता तब चला जब पार्टी ने उन्हें फैजाबाद से लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया.

दागियों की इस लिस्ट में बसपा के पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू का नाम भी शामिल है. फूलबाबू पर लैकफेड के लाखों रुपये के घोटाले का आरोप तो है ही, आम जनता के लिए सरकार की ओर से मिलने वाली विधायक निधि को निकाल कर अपने ही शिक्षण संस्थान को दिए जाने का आरोप भी है. इस आरोप के चलते बसपा ने अनीस का विधानसभा टिकट काट दिया था. इससे नाराज अनीस ने विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा, लेकिन हार गए. अनीस के साथ भी वही हुआ जो धनंजय सिंह और बबलू सिंह के साथ हुआ था. विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद अनीस की भी कमियां बसपा को दिखना बंद हो गया और पार्टी ने 2014 के लिए उन्हें पीलीभीत से उम्मीदवार घोषित कर दिया. नेताओं के रिश्तेदारों और दागियों पर लोकसभा चुनाव में दांव लगाए जाने के बारे में पार्टी कोऑर्डिनेटर त्रिभुवन दत्त कहते हैं, ‘टिकट किसको देना है किसको नहीं यह पालिसी मैटर है, जिसका निर्धारण खुद बहन जी करती हैं. नेताओं के रिश्तेदारों और दागियों को टिकट कैसे मिल गया हम लोगों का इससे कोई मतलब नहीं है.’

नेताओं के रिश्तेदारों और दागियों पर दांव लगाने के अलावा बसपा 2007 के विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल की गई सोशल इंजीनियरिंग भी फिर से आजमाने जा रही है. एक बार फिर ब्राह्मण और दलित वोटों के सियासी गठजोड़ के लिए पार्टी ने तैयारी भी शुरू कर दी है. पार्टी के एक सांसद बताते हैं, ‘2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने जहां 15 ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट दिया था वहीं इस बार यह आंकड़ा 20 के करीब पहुंच रहा है.’ मतलब साफ है. 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बसपा 20 ब्राह्मणों और 17 रिजर्व सीटों पर दलितों को टिकट देकर आधी के करीब सीटों पर ब्राह्मण व दलित गठजोड़ आजमाना चाह रही है. सांसद बताते हैं, ‘ब्राह्मण व दलित गठजोड़ को हर सीट पर मजबूत करने के लिए ब्राह्मण भाईचारा कमेटी को सक्रिय कर दिया गया है. इसके लिए हर बूथ स्तर पर नौ ब्राह्मण कार्यकर्ताओं व एक दलित कार्यकर्ता की नियुक्ति की जा रही है.’ 2007 के चुनाव के बाद ब्राह्मणों पर अचानक मायावती की खास मेहरबानी की वजह पार्टी नेता सपा सरकार से ब्राह्मणों की नाराजगी बता रहे हैं. बसपा नेताओं का तर्क है कि सपा ने ब्राह्मणों को दरकिनार कर दिया है. जिन लोगों को मंत्री बनाया भी है, उन्हें महत्वहीन विभाग दे दिया गया है जिसके चलते ब्राह्मणों में खासी नाराजगी है. वे बताते हैं कि इटावा में ब्राह्मण परिवार के लोगों को यादवों ने हाल ही में निर्वस्त्र करके पीटा जो ब्राह्मणों की उपेक्षा का जीता-जागता प्रमाण है. बसपा के एक एमएलसी कहते हैं, ‘दलितों की स्थिति भी सपा सरकार में गई-गुजरी हो गई है, जिससे दलितों में नाराजगी है. इस नाराजगी का फायदा पार्टी को लोकसभा चुनाव में मिलेगा.’ उनका तर्क है कि 85 सुरक्षित विधानसभा सीटों में से 58 दलित विधायक सपा में जीते हैं. इसके बाद भी मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या मात्र छह है. जबकि मुस्लिम विधायकों की संख्या सपा में मात्र 39 है इसके बावजूद 10 मुस्लिम विधायकों को सरकार ने मंत्रिमंडल में शामिल किया है.

यानी बसपा लोकसभा चुनाव के लिए हर वह सियासी तिकड़म आजमाने जा रही है जिससे उसे ज्यादा से ज्यादा सीटें मिल सकें. इसके लिए उसे न तो दागियों से परहेज है और न ही जाति आधारित राजनीति से.

यह फिल्म समीक्षा नहीं है

himmatwala

कभी-कभी मैं चाहता हूं कि किसी शाम आपको चाय पर बुलाऊं और हम किस्लोस्की की कोई फिल्म देखें. शायद ‘अ शॉर्ट फिल्म अबाउट किलिंग’. हम देखें कि खामोशी में कैसे जीवन बसता है,और कैसे मृत्यु. मुझे ‘द रिटर्न’ अक्सर याद आती है, एक रूसी फिल्म, जिसकी ‘घटनाविहीनता’ से ऊबकर मैं उसे बीच में ही छोड़ देने वाला था मगर वह कोई अच्छा दिन था कि मैंने ऐसा नहीं किया. एक पिता, बरसों से छूटे हुए दो बेटे. वह लौटता है एक दिन और उन्हें घुमाने ले जाता है, और जीवन सिखाने. वह सख्त दिखता है और दोनों बच्चे नहीं जाना चाहते. वह उनका पिता है, यह एक सूचना जैसा है उनके लिए. लेकिन फिल्म के उन एक सौ पांच मिनटों के बाद नहीं.

जापानी फिल्म ‘स्टिल वॉकिंग’ में ऐसे ही अपनी पत्नी के साथ एक जवान बेटा लौटता है कस्बे में माता-पिता के पास. और एक दिन बिताता है. उस एक दिन में आपकी आत्मा की कुछ बूंदें छूट जाती हैं. वे जो रंग होते हैं फिल्म के परदे पर, या समंदर की लहरें बस. या बस, उसमें से पीछे झांकते दो लोग या ना भी झांकते, क्या फर्क पड़ता है.

ईरानी फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म ‘दायरे’ बहती हुई एक औरत से दूसरी औरत तक जाती है,इस्लामिक शासन वाले ईरान में उन्हें दिखाती हुई. कोई बड़े शब्दों वाली बौद्धिकता नहीं, लेकिन बात बड़ी. यही’क्रिमसन गोल्ड’ करती है जब उसका मुख्य पात्र शुरुआत में ही खुद को गोली मार लेता है. जफर को ईरान सरकार ने छह साल की सजा सुनाई है, सरकार विरोधी फिल्में बनाने के जुर्म में. और बीस साल तक कुछ भी लिखने या फिल्म बनाने पर प्रतिबंध भी लगाया है. कोई इंटरव्यू देने पर भी.

साजिद खान जब किसी इंटरव्यू में ‘फिल्म’ शब्द बोलते हैं तो क्या उसका वही अर्थ होता है, जो जफर पनाही बोलते तो होता, अगर उन्हें बोलने दिया जाता? कभी साजिद खान और जफर पनाही कहीं मिले तो क्या बातें करेंगे? और अजय देवगन और ‘रेजिंग बुल’ के रॉबर्ट डी नीरो? नहीं, नहीं, वह दूर की बात है. अजय देवगन मनोज वाजपेयी या नवजुद्दीन सिद्दीकी से मिलेंगे, तो? या खुद से भी. जख्म और ओमकारा वाले खुद से.’हिम्मतवाला’ का शेर कभी ‘लाइफ ऑफ पाई’ के शेर से मिलेगा तो शेरांवाली मां और गुलशन कुमार के बारे में बात करेगा क्या?

एक सुंदर स्पैनिश प्रेमकहानी है, ‘लवर्स ऑफ द आर्कटिक सर्कल’. संयोगों और दुर्योगों के बीच, याद में कल्पना के रास्ते घुसते दो प्रेमी. उसे हम रात के खाने के वक्त देखेंगे. कभी हम ‘अबाउट ऐली’ के असगर फरहदी की सी बेचैनी से अपनी दुनिया की किसी ऐली को जाते देखेंगे और कोई बच्चा उसे ऐसे खोजेगा जैसे’बाल (शहद)’ नाम की एक तुर्की फिल्म में एक गांव का बच्चा अपने पिता को जंगल में खोजता है. एक-एक पत्ती की आवाज वहां आप साफ सुन सकते हैं.

दुनिया अच्छी है. नहीं है तो हमें उसे अच्छा बनाना है. पर इसके लिए जरूरी है कि हम ‘हिम्मतवाला’ के बारे में कोई बात ना करें.

– गौरव सोलंकी

प्रतिरोध का प्रारब्ध

बात कुछ माह पहले की है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे. पाकिस्तान में उनकी गतिविधियां अखबारों में छप रही थीं. वैसे नीतीश के जाने के पहले और बिहार से पाकिस्तान के लिए रवाना होते ही हवा में बात तैरने लगी थी कि बिहार की मुस्लिम राजनीति साधने वे पाकिस्तान गए हैं. मीडिया की छौंक ने इसे थोड़ा बल दिया. खबरें छपीं कि नीतीश को इस दौरे से बिहार में अपने मुस्लिम वोट बैंक के मजबूत होने की उम्मीद है और शायद यही वजह है कि वे गृह सचिव आमिर सुब्हानी और राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष नौशाद अहमद को भी साथ ले जा रहे हैं. खबरें यह भी छपीं कि नीतीश पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हैं. फिर जिस दिन नीतीश की भारत वापसी थी उस दिन पाकिस्तान की संसद में लालू प्रसाद यादव का नाम उछल गया. वहां एक सांसद ने कहा कि पाकिस्तान में रेल की हालत खराब है और अगर यह नहीं संभल पा रही तो दुरुस्त करने के लिए लालू प्रसाद यादव को बुलाकर इसे सौंप देना चाहिए. फिर क्या था- राजद और जदयू के छुटभैये नेता आपस में भिड़ंत करने लगे. जदयू नेताओं ने कहा, ‘देखिए हमारे नीतीश पाकिस्तान में कितने लोकप्रिय हैं.’ राजद की ओर से महासचिव व राज्यसभा सांसद रामकृपाल यादव जैसे नेता बोले, ‘यह तो पता ही चल गया कि नीतीश के वहां रहते ही हमारे नेता लालू प्रसाद की जयकार हुई.’

पता नहीं पाकिस्तान में बिहार के इन दोनों दिग्गज नेताओं में कौन ज्यादा लोकप्रिय है, वहां किसकी ज्यादा मांग है, कोई मांग है भी या नहीं, लेकिन बिहार के राजनीतिक अखाड़े में इस बात पर भी बे-सिर-पैर वाली बहस संकेत देती है कि मुस्लिम राजनीति को लेकर द्वंद्व के दौर से गुजर रहे बिहार के नेता 16.5 प्रतिशत वाले गणित को जितना संभव हो अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हुए हैं.

बिहार की राजनीति में यह 16.5 प्रतिशत वाला गणित मुस्लिम आबादी का है जिसे लेकर इन दिनों क्या नीतीश, क्या लालू, क्या भाजपा और क्या दूसरे दल, तरह-तरह के खेल खेलने की कोशिश में लगे दिखते हैं. लालू प्रसाद मुस्लिम-यादव यानी माई समीकरण को साधकर राजनीति करने वाले सबसे चतुर नेता माने जाते थे लेकिन पिछले दो चुनावों से नीतीश कुमार ने इस समीकरण को दरकाकर मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफलता पाई है. नीतीश ने मुस्लिमों में से भी पसमांदा राजनीति को थोड़ा खाद-पानी देकर एक बड़े हिस्से को साधा और दो चुनावों में भाजपा के साथ रहते हुए भी मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहे. लालू अब दुविधा में हैं कि वे क्या करें. वे जानते हैं कि अगर वे पसमांदा मुस्लिमों के पक्ष में बात करेंगे तो माना जाएगा कि वे नीतीश की नकल कर रहे हैं और यदि वे इस राजनीति को खारिज करेंगे तो एक बड़े समूह का एक बड़ा हिस्सा उनसे छिटका रह सकता है क्योंकि मुस्लिमों में भी पसमांदा समूह की आबादी करीब 80 प्रतिशत है. यह समूह अब अपने हक की बात करता है और उसके मन में यह चेतना विकसित हो चुकी है कि मुसलमानों के नाम पर अब तक हुई राजनीति का सारा फायदा अगड़े मुसलमानों को मिला. दुविधा के दौर से गुजर रहे लालू प्रसाद इसलिए बार-बार नीतीश कुमार की तुलना संघ परिवार और भाजपा की गोद में खेलने वाले बच्चे से करते हैं और जब पसमांदा का सवाल आता है तो धीरे से यह कहकर निकल जाना चाहते हैं कि मुस्लिम एक हैं.

लेकिन यह दुविधा अकेले लालू की नहीं है. नीतीश कुमार खुद भी मुस्लिम राजनीति को लेकर अपने ही बुने ताने-बाने में फंसते दिखते हैं. बिहार में नीतीश ने मुस्लिम समुदाय को सत्ता में जो हिस्सेदारी दी है उसमें से अधिकांश अब भी अगड़े मुसलमानों के हाथों में ही है. नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में दो मंत्री परवीन अमानुल्लाह और शाहीद अली खान मुस्लिम कोटे से हैं और दोनों ही अगड़े समूह से आते हैं. इसी तरह हज कमिटी का चेयरमैन भी इमारत-ए-शरिया के सचिव मौलाना अनिसुर रहमान कासमी को बनाया गया जो अगड़े समूह से ही आते हैं. और भी कई पद हैं जिन पर अगड़े मुसलमानों का ही प्रतिनिधित्व है. हालांकि इसकी भरपाई के लिए नीतीश ने दूसरे पासे भी फेंके हैं. उनकी पार्टी में राज्यसभा से दो मुस्लिम सांसद अली अनवर और साबिर अली हैं जो पिछड़े समूह से आते हैं. लेकिन जानकारों के मुताबिक यह काफी नहीं और इनका असर विधानसभा चुनावों में नहीं होगा, यह नीतीश भी जानते हैं और उनके दल के दूसरे नेता भी.

[box]नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक में हर बार नीतीश कुमार से हाथ मिलाते हुए तस्वीर खिंचवाने वाले मोदी ने इस बार नीतीश से दूरी बनाकर ही रखी[/box]

इसके लिए नीतीश कुमार ने पिछले कुछ सालों से एक तीसरा रास्ता भी तलाश लिया है. यह रास्ता है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध का. इससे गाहे-बगाहे ऐसी स्थिति भी बनती है जिससे लगता है कि अब भाजपा-जदयू की यारी ही टूट जाएगी और नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश सच में अलग राह अपना लेंगे. अब सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार को यह भरोसा है कि यदि वे नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से अलग होने तक का दांव खेलें तो वे मुस्लिम राजनीति को पूरी तरह साध लेने में सफल हो जाएंगे. और यह भी कि भाजपा से अलग होने पर उनका जो नुकसान होगा उसकी भरपाई उनके इस दांव से हो जाएगी?

यह खुद नीतीश कुमार और उनके संगी-साथी भी जानते हैं कि यह इतना आसान नहीं कि सिर्फ मोदी के नाम पर भाजपा से कुट्टी कर लेने से पूरा मुस्लिम मत उनके पाले में आ जाए. इसकी वजह यह है कि तमाम विडंबनाओं के बावजूद लालू प्रसाद मुस्लिमों के एक हिस्से के लिए संभावनाओं का केंद्र बने हुए हैं. तो सवाल उठता है कि आखिर क्यों नीतीश कुमार अपने ही राजनीतिक समूह के एक नेता नरेंद्र मोदी से इस कदर भड़के नजर आते हैं. क्यों वे उनके नाम पर भाजपा से नाता तोड़ देने तक का संकेत बार-बार देते रहते हैं? क्या इसलिए कि मोदी पर गुजरात दंगे का दाग है? अगर एक बड़ी वजह यह है तो नीतीश कुमार का यह तर्क सबको सीधे-सीधे हजम नहीं होता. नीतीश कुमार के संगी साथी प्रेम कुमार मणि समेत कई नेता पूछते हैं कि जब गुजरात दंगा हुआ था तो केंद्र में नीतीश कुमार ही रेल मंत्री थे. गुजरात का दंगा रेल के जरिए ही भड़का था. लेकिन तब नीतीश कुमार न तो गुजरात झांकने गए थे और न ही उन्होंने खुलकर नरेंद्र मोदी की आलोचना की थी. कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि यदि मोदी ने एक बार भी गुजरात दंगों के लिए आज तक माफी भी नहीं मांगी तो नीतीश कुमार भी क्यों उसी राह के राही बने.

2011 में फारबिसगंज में पुलिस फायरिंग में पांच अल्पसंख्यकों के मारे जाने की घटना के बाद वे भी एक बार भी वहां झांकने तक नहीं गए और न कभी किसी ठोस कार्रवाई की कोशिश करते हुए दिखे. वरिष्ठ पत्रकार सरूर अली कहते हैं, ‘ नीतीश  को न तो भाजपा से परहेज रहा है, न ही उन्हें अकाली दल, शिव सेना जैसे दलों के साथ गठबंधन बनाने में कभी कोई हिचक रही है और वे खुद को धर्मनिरपेक्ष नेता भी बनाए रखने की जिद में लगे हुए हैं, यह बात किसे समझ में नहीं आती.’ नीतीश कुमार जब-जब नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं, एक खेमे से ये सवाल उठते हैं और जवाब जदयू के नेता भी नहीं दे पाते.

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तब सवाल घूम-फिरकर फिर वहीं आ जाता है कि आखिर क्यों नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी को राजनीतिक तौर पर दुश्मन नंबर एक बनाए रखना चाहते हैं. नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की समानता गिनाते हुए पूर्व सांसद व वरिष्ठ समाजवादी नेता डॉ रामजी सिंह कहते हैं, ‘दोनों पिछड़े वर्ग से आते हैं, दोनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की छतरी तले ही राजनीति कर रहे हैं, दोनों अपने-अपने राज्य में विकास पुरुष के रूप में जाने जाते हैं. फिर क्यों दोनों में इस कदर दूरी बरतने की राजनीति होती है, समझ में नहीं आता.’

दूरी बरतने की राजनीति पर जो बात डॉ रामजी सिंह कहते हैं लोग उसका नमूना बार-बार देख चुके हैं. चुनाव प्रचार के लिए भी नरेंद्र मोदी को बिहार न आने देने की जिद, नरेंद्र मोदी के साथ वाला पोस्टर लगने पर भाजपा नेताओं के साथ प्रस्तावित भोज टाल देना या कोसी राहत कोष में गुजरात से मिले पैसे को लौटा देने वाली बात तो पुरानी हो चली है. हाल ही में जब नरेंद्र मोदी गुजरात में फिर से विजयी हुए तो देश भर के नेताओं ने औपचारिकता निभाते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं, लेकिन नीतीश कुमार ने खुद को इस औपचारिकता से दूर रखा. हालांकि इसका बदला मोदी ने भी लगे हाथ ही लिया. बीते महीने जब दिल्ली में नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक हुई तो नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों ही वहां पहुंचे, लेकिन हर बार नीतीश कुमार से हाथ मिलाते हुए तसवीर खिंचवाने वाले नरेंद्र मोदी ने इस बार उनसे दूरी बनाकर ही रखी. बात यहीं खत्म नहीं हुई. जब नीतीश ने बहुत पहले से ही 17 मार्च को दिल्ली में अधिकार रैली की घोषणा कर रखी थी तो मोदी ने भी उसी रोज मुंबई में युवाओं की एक रैली रख दी है. जानकार बताते हैं कि यह मीडिया स्पेस मारने की कोशिश है. मोदी मीडिया के लिए ज्यादा आकर्षण का केंद्र होते हैं. जाहिर-सी बात है कि जब दोनों नेताओं का संबोधन एक ही दिन, दो बड़े शहरों में होगा तो एक हद तक मीडिया में कवरेज से भी तय होगा कि राजनीतिक हस्ती के तौर पर किसका वजन ज्यादा है. हालांकि खबर लिखे जाने तक मोदी की मुंबई रैली रद्द हो चुकी थी. इसके पीछे की वजह बताई गई कि महाराष्ट्र सूखे की चपेट में है इसलिए पार्टी ने रैली रद्द करने का फैसला लिया गया है. लेकिन खबरें आईं कि नीतीश ने इसके लिए आग्रह किया था ताकि जदयू की रैली का रंग फीका न पड़े.

बिहार में नीतीश कुमार सबसे बड़े नेता हैं इसमें संदेह नहीं, लेकिन हालिया दिनों में या यूं कहें कि वर्तमान सरकार की दूसरी पारी में जब से भाजपा पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरी है तब से नरेंद्र मोदी की उपस्थिति भी राज्य में तेजी से बढ़ती जा रही है. कुछ माह पहले वे वरिष्ठ भाजपाई नेता कैलाशपति मिश्र की मृत्यु के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने बिहार आए थे और उस मातमी माहौल में भी कुछ भाजपाइयों ने नारे लगा दिये थे कि देश का पीएम कैसा हो, नरेंद्र मोदी जैसा हो…! शोकपूर्ण आयोजन में कुछ भाजपाई नेताओं द्वारा छेड़े गए इस राग को खुराफाती मगज की उपज माना गया. लेकिन बिहार में रहने वाले लोग जानते हैं कि बिहार में कुछ भाजपाई नेताओं द्वारा नरेंद्र मोदी की जय-जयकार यदि खुराफाती मगज की उपज भर है तो इसे बार-बार दुहराया जा रहा है. और जो दुहराते रहे हैं वे सरकार में मजबूती से मंत्री के ओहदे के साथ विराजमान भी हैं. इससे साफ होता है कि यह सब भाजपा बहुत ही सोच-समझकर कर रही है.

नरेंद्र मोदी की उपस्थिति कुछ भाजपाई नेताओं की बयानबाजी के जरिए ही बिहार में नहीं दिखती बल्कि अब तो राजधानी पटना की सड़कों पर मोदी के पोस्टर भी मौके-बेमौके लगाए जाने लगे हैं. इस बार तो मोदी का जन्मदिन भी बिहार में सार्वजनिक समारोह करके मनाया गया. अब यह भी कहा जा रहा है कि अप्रैल में पटना में भाजपा की ओर से प्रस्तावित हुंकार रैली में भी मोदी आएंगे. हालांकि कुछ माह पहले जब बिहार में डॉ सीपी ठाकुर को हटाकर मंगल पांडेय को भाजपा अध्यक्ष के पद पर बिठाया गया तो कयास लगे कि इसमें नीतीश कुमार की भी भूमिका रही है, क्योंकि भाजपा अध्यक्ष रहते हुए ठाकुर जब-तब नीतीश पर वाक्प्रहार  करते रहते थे. और मोदी का गुणगान तो वे नियमित तौर पर करते ही रहते थे. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव कहते हैं, ‘नीतीश ने ही बदलवाया है भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को ताकि मोदी-मोदी का जाप न होता रहे. लेकिन एक मोदी से बचकर और संघ परिवार की गोदी में बैठकर नीतीश कुमार दोहरी राजनीति कर रहे हैं.’

कुछ लोग कह सकते हैं कि लालू प्रसाद यह बात विरोधी राजनीति के तहत कह रहे हैं, लेकिन इसमें एक हद तक सच्चाई भी है. जब से नीतीश नरेंद्र मोदी से नफरत की राजनीति कर रहे हैं तब से समानांतर रूप से संघ परिवार की बिहार में गतिविधियां भी बढ़ती जा रही हैं. जानकारों के मुताबिक भाजपा भी शातिर चाल चलते हुए नीतीश के दांव से ही उन्हें मात देने की तैयारी में लगी हुई है. छोटी-मोटी और जिला स्तरीय गतिविधियों को छोड़ भी दें तो संघ परिवार के कुछ बड़े और चर्चित आयोजन भी पिछले कुछ साल में बिहार में ही हुए. नागरिक अभिनंदन के तहत पटना के गांधी मैदान में संघ का बड़ा आयोजन हो चुका है. बीते साल राजगीर में संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो चुकी है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का 58वां राष्ट्रीय अधिवेशन भी पटना में ही हुआ. सिमरिया में अर्धकुंभ कराने में संघ परिवार की ही परोक्ष भूमिका रही. पिछले ही साल पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के सभागार में तीन दिन तक सांस्कृतिक सम्मेलन के नाम पर अशोक सिंघल, उमा भारती, सुब्रमण्यम स्वामी जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में नरेंद्रानंद जैसे संत पहुंचे और खुलेआम सांप्रदायिक और भड़काऊ भाषण देते रहे. कुछ समय पहले सूर्य नमस्कार का आयोजन भी पटना में डंके की चोट पर हुआ, जिस पर बाद में नीतीश कुमार यह दिखाने की कोशिश में लगे रहे कि इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी. ऐसे ही कई आयोजन संघ परिवार की ओर से निरंतर बिहार में हो रहे हैं और यह सब जानते हैं कि यह सब छिप-छिपाकर नहीं बल्कि सरेआम हो रहा है.

[box]पसमांदा मुस्लिमों के एक बड़े हिस्से को साधकर नीतीश दो चुनावों में भाजपा के साथ रहते हुए भी मुस्लिम मतदाताओं को खींचने में कामयाब रहे[/box]

यानी नीतीश कुमार भले ही नरेंद्र मोदी से परहेज करें लेकिन संघ परिवार की इन गतिविधियों से उन्हें कोई  परहेज नहीं. नीतीश के पुराने संगी रहे और पूर्व चर्चित सांसद डॉ एजाज अली कहते हैं, ‘भाजपा के साथ रहेंगे और कहेंगे  कि वे धर्मनिरपेक्ष हैं तो यह कैसे मानें. अब मुसलमान उनके साथ इतनी आसानी से नहीं जाने वाले. मसला एक मोदी का नहीं बल्कि और भी कई हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘संघ परिवार की इकाइयों को अपने आयोजन करने की छूट देकर उसकी भरपाई करने के लिए नीतीश इन दिनों खानकाहों (मुसलमान फकीरों या धर्म-प्रचारकों के ठहरने या रहने का स्थान) पर चादरपोशी करने और दरियादिली के साथ उन्हें पैसा बांटने में लगे हुए हैं. लेकिन इसके पीछे की सच्चाई सब जानने लगे हैं.’

यह सच भी है. नीतीश कुमार अलग-अलग तरीके से बिहार की मुस्लिम राजनीति को साधे रहने की जुगत में लगे हुए हैं जिनमें से एक प्रमुख अभियान नरेंद्र मोदी का विरोध है. लेकिन अब इस एक जरिए से पूरी राजनीति को साधना इतना आसान नहीं रह गया है. नीतीश, मोदी का जितना विरोध कर रहे हैं, मोदी बिहार के गैर मुस्लिम समूह में उतनी ही तेजी से मजबूत होते दिख रहे हैं. जानकारों के मुताबिक परोक्ष तौर पर ही सही, भाजपा इस तैयारी में भी है कि नरेंद्र मोदी को वह बार-बार पिछड़े-अतिपिछड़े समूह का नेता बनाकर भी पेश करे.

उधर, सस्ती लोकप्रियता की इस राजनीति के बीच बिहार के मुसलमानों के अपने सवाल हैं जिनके जवाब वे चाहते हैं. पसमांदा मुस्लिम महाज के महासचिव नूर हसन आजाद कहते हैं, ‘बिहार के मुस्लिम सिर्फ नरेंद्र मोदी के फेरे में फंसे हुए नहीं हैं. वे जानना चाहते हैं कि जिस बिहार में करीब सवा लाख करघे चला करते थे, उसमें अब 17 हजार ही क्यों चालू हालत में रह गए हैं. इस पेशे से सबसे ज्यादा तो मुसलमान ही जुड़े हुए थे. करघों के लिए जो सस्ती बिजली दिये जाने का वादा था वह क्यों पूरा नहीं हुआ. क्यों बच्चे-बच्चियों को प्रशिक्षित करने के लिए शुरू हुईं हुनर, औजार जैसी योजनाओं की दुर्गति हो रही है? मकतब खोले जाने का प्रस्ताव था, वह क्यों गति नहीं पकड़ पा रहा? कई जगहों पर मुस्लिमों की हत्या हो रही है. उस पर सरकार कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं कर रही? क्यों दरभंगा, मधुबनी से निर्दोष नौजवानों को आतंकवाद के नाम पर पकड़कर ले जाए जाने पर भी नीतीश वैसी उफानी राजनीति नहीं करते जैसी दूसरे मसलों पर करते हैं.’

नूर हसन ऐसे ही कई सवाल करते हैं. ये सवाल बताते हैं कि नरेंद्र मोदी के विरोध की जो राजनीति नीतीश परवान चढ़ाने में लगे हुए हैं, वह शायद उनके लिए कारगर फॉर्मूला साबित न हो. मुस्लिम रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ फिरोज मंसूरी कहते हैं, ‘नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी का विरोध कर दिखावे की राजनीति करते हैं लेकिन उनके राज में मुसलमानों की जान, जबान और नान, तीनों पर हमला बढ़ा है. फारबिसगंज से लेकर तमाम घटनाएं इसकी गवाही दे चुकी हैं. उनकी नई नीति की वजह से उर्दू शिक्षकों का पद खाली रह गया.’ सामाजिक कार्यकर्ता नैयर फातमी के मुताबिक कुछ समय तक तो बिहार के मुसलमानों को मुगालता रहा कि नीतीश कुमार सच में नरेंद्र मोदी और सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी हैं लेकिन अब वह दूर हो गया है. वे कहते हैं, ‘नीतिगत स्तर पर भाजपा से ही शिकायत है तो उसके साथ सत्ता में रहकर और उसी दौरान मोदी विरोध की राजनीति कर वे क्या कहना चाहते हैं, समझ नहीं आता.’ उर्दू के प्राध्यापक प्रो. सफदर इमाम कहते हैं कि मुसलमान को सामाजिक-आर्थिक विकास में हिस्सेदारी चाहिए, लेकिन नीतीश कुमार के राज में मुसलमानों के साथ लोकप्रिय राजनीति की कवायद ज्यादा हो रही है.’ पटना में मोटरसाइकिल मैकेनिक व कारोबारी अब्दुल रशीद भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. संकेत साफ है कि सिर्फ मोदी विरोध का कार्ड खेलकर नीतीश मुस्लिम वोटों के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकते. बल्कि हो सकता है इससे उन्हें नुकसान ही हो जाए. पत्रकार सरूर अहमद कहते हैं, ‘मोदी विरोध से नीतीश का अपना भला हो न हो, भाजपा के पक्ष में गैर-मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण तेजी से होगा.’

किडनी फेल या पास

ज्ञान चतुर्वेदी; व्यंग्यकार व चिकित्सा विशेषज्ञ
ज्ञान चतुर्वेदी; व्यंग्यकार व चिकित्सा विशेषज्ञ

डॉक्टरी विज्ञान है तो विज्ञान ही परंतु इस मामले में वह रहस्यमय तथा जादुनुमा हो जाता है कि यहां दो और दो को जोड़ने पर प्राय: चार नहीं बनते. डॉक्टरी में प्राय: गणित गलत ही साबित होता है पर यह बात सामान्यजन के गले नहीं उतरती. वह मान तथा जान ही नहीं पाता है कि यदि डॉक्टर ने ईसीजी ठीक बताया था तो फिर मरीज एक घंटे बाद ही हार्ट अटैक से कैसे मर गया या कि यदि खून की रिपोर्ट में मलेरिया नेगेटिव बताया गया है तो फिर भी डॉक्टर ने मलेरिया का इलाज क्यों दिया. ऐसा तमाशा किडनी की बीमारियों के केस में सबसे ज्यादा है. विशेष तौर पर किडनी फेल्योर के मामले में. किडनी या गुर्दे के विषय में बताने को इतनी सारी बातें हैं कि एक कॉलम में तो नहीं समाई जा सकती. अगले एक-दो अंकों में हम इस विषय पर पूरी बातें करने का प्रयास करेंगे.

किडनी एक बेहद स्पेशियलाइज्ड अंग है. इसकी रचना में लगभग तीस तरह की विभिन्न कोशिकाएं लगती हैं. यह बेहद ही पतली नलियों का अत्यंत जटिल फिल्टर है जो हमारे रक्त से निरंतर ही पानी, सोडियम, पोटैशियम तथा ऐसे अनगिनत पदार्थों को साफ करके पेशाब के जरिए बाहर करता रहता है.

यह फिल्टर इस मामले में अद्भुत है कि यहां से जो भी छनकर नली में नीचे आता है उसे किडनी आवश्यकतानुसार वापस रक्त में खींचता भी रहता है, और ऐसी पतली फिल्ट्रेशन नलियों की तादाद होती है? एक गुर्दे में ढाई लाख से लगाकर नौ लाख तक नेफ्रान या नलियां रहती हैं. हर मिनट लगभग एक लीटर खून इनसे प्रभावित होता है ताकि किडनी इस खून को साफ कर सके. दिन में लगभग डेढ़ हजार लीटर खून की सफाई चल रही है. और गुर्दे केवल यही काम नहीं करते बल्कि यह तो उसके काम का केवल एक पक्ष है, जिसके बारे में थोड़ा-थोड़ा पता सामान्यजनों को भी है परंतु क्या आपको ज्ञात है कि किडनी का बहुत बड़ा रोल प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड (शक्कर आदि) तथा फैट (चर्बी) की मेटाबोलिज्म (पाचन/ चय-अपचय) में भी है. इसलिए किडनी खराब होने पर कुपोषण के लक्षण हो सकते हैं बल्कि वे ही प्रमुख लक्षण बनकर सामने आ सकते हैं. हार्मोंस के प्रभाव में भी गुर्दों का अहम रोल है. इंसुलिन, विटामिन डी, पेराथायरायड आदि के प्रभाव को गुर्दे की बीमारी बिगाड़ सकती है.

शरीर में रक्त बनाने की सारी प्रक्रिया में गुर्दों का बेहद अहम किरदार है. गुर्दे में बनने वाला इरिथ्रोपोइरिन नामक पदार्थ खून बनाने वाली बोनमैरो को (बोनमैरो को आप हड्डियों में खून पैदा करने वाली फैक्टरी कह सकते हैं) खून बनाने के लिए स्टीम्यूलेट करता है. यह न हो तो शरीर में खून बनना बंद या कम हो जाता है. इनमें बहुत-सी बातों से स्वयं डॉक्टर भी परिचित नहीं होंगे या उन्होंने कभी पढ़ा तो था पर अब याद नहीं. नतीजा कई डाक्टरों का भी इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान नहीं जाता है कि किडनी फेल होने वाला मरीज पेशाब की शिकायत या सूजन आदि के अलावा और भी कई तरह से सामने आ सकता है.

सवाल यह है कि हमें कब सतर्क होकर किडनी का टेस्ट कराना चाहिए. कौन-से लक्षण हैं जो किडनी फेल्योर की ओर इंगित कर सकते हैं?

निम्नलिखित स्थितियों में किडनी की बीमारी (क्रॉनिक किडनी डिजीज) या किडनी के ठीक से काम न करने (किडनी फेल्योर) की आशंका रहती है:

1. यदि शरीर में सूजन रहने लगे. विशेष तौर पर यह सूजन चेहरे से शुरू हो रही हो. आंखों के नीचे हल्की सूजन को भी नजरअंदाज न करें. यदि चेहरे पर न होकर मात्र पांवों पर हो या चेहरे और पांव दोनों पर हो तब भी तुरंत ही डॉक्टर से मिलकर अपना संदेह बताएं. खास तौर पर यदि आप पहले ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप, प्रोस्टेट आदि के रोगी हों या आपकी उम्र साठ-सत्तर वर्ष हो रही है तो सूजन होते ही जांच करा लें.

2. तो क्या सूजन न हो तो किडनी डिजीज की आशंका समाप्त हो जाती है? सूजन का न होना कोई गारंटी नहीं है. किडनी की बहुत-सी अन्य भूमिकाएं भी हैं. सो इनकी तकलीफें भी हो सकती हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है खून का बनना. यदि आपको खून की कमी (अनीमिया) के लक्षण हैं, जांच में हीमोग्लोबिन भी कम है तो सतर्क हो जाएं. विशेष तौर पर तब तो जरूर जब पूरे इलाज के बाद भी लौट-लौट कर पुन: अनीमिया हो जाता हो. ऐसे में किडनी की जांच की आवश्यकता है. कितने ही ऐसे मरीज आते हैं जो बड़ी कमजोरी लगती है डाक्टर साहब, मेहनत करने पर हांफ जाता हूंकहते हुए आते हैं और जब डॉक्टर जांच करके उनको बताता है कि यह सब आपकी किडनी खराब हो जाने के कारण हो रहा है तो मरीज को विश्वास ही नहीं होता.

3. यदि भूख खत्म हो गई हो, वजन गिर रहा हो, बेहद थकान लगी रहती हो तो यह किडनी फेल्योर से भी हो सकता है.

4. भूख एकदम गायब, बार-बार उल्टियां हो जाती हैं तो यह गैस्ट्रिक या पीलिया के कारण ही नहीं, गुर्दों की बीमारी से भी हो सकता है.

5. यदि आपको उच्च रक्तचाप की बीमारी हो, आजकल ब्लड प्रेशर भी बहुत बढ़ा रहता हो और डॉक्टर द्वारा दवाइयां बढ़ा-बढ़ा कर देने के बाद भी कंट्रोल न हो रहा हो तो ऐसा किडनी के काम न करने के कारण भी हो सकता है.

6. यदि बहुत छोटी-सी चोट या मामूली स्ट्रेस से ही आपकी हड्डी चटक या टूट जाए, यदि हड्डियों में बहुत दर्द रहता हो तो भी यह किडनी की बीमारी का लक्षण हो सकता है. किडनी विटामिन डी तथा कैल्शियम की मेटाबोलिज्म में महत्वपूर्ण रोल अदा करती है.

7. यदि पेशाब की मात्रा पानी पीने के बावजूद बहुत कम होने लगे तो भी जांच करा लें. पेशाब की मात्रा नापने का सीधा तरीका है पूरे चौबीस घंटे में पेशाब को किसी बर्तन में इकट्ठा करते जाना. यदि इसकी मात्रा आधा लीटर से कम हो तो जांच की जरूरत है. जब भी पेशाब का ऐसा हिसाब रखें तो उस दौरान पिए गए पानी, दूध, चाय आदि द्रव्य की मात्रा का भी हिसाब लिखकर डॉक्टर के पास ले जाएं, इससे बीमारी को समझने में मदद मिलेगी.

तो किडनी के फेल्योर की आशंका के प्रति हमेशा सतर्क रहें. जितनी जल्दी पता लगे उतना ही इसे बढ़ने से रोका जा सकता है.