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मौत पर सियासत

उल जेहाद अल इस्लामी (हुजी) के कथित आतंकवादी खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में मौत हो गई है.
उल जेहाद अल इस्लामी (हुजी) के कथित आतंकवादी खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में मौत हो गई है.

उत्तर प्रदेश में हरकत उल जेहाद अल इस्लामी (हुजी) के कथित आतंकवादी खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में हुई मौत के बाद एक तरफ अनसुलझे सवाल हैं और दूसरी तरफ अनवरत राजनीति. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी खालिद की मौत की कोई साफ वजह पता नहीं चल पाई है. उधर, प्रदेश की कमान संभाल रही समाजवादी सरकार ने खालिद के परिजनों की छह लाख रु. की आर्थिक सहायता का एलान किया है तो भारतीय जनता पार्टी ने इस कदम को आतंक का सरकारी महिमामंडन बताते हुए इसका विरोध किया है.

खालिद की मौत ऐसे समय पर हुई है जब प्रदेश सरकार उसके मुकदमों की वापसी की प्रक्रिया शुरू कर चुकी थी. लोकसभा चुनाव भी सिर पर हैं. सपा सरकार मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है. खालिद आतंकी था कि नहीं, उसकी गिरफ्तारी सही थी कि नहीं, इन मुद्दों पर भी शुरू से ही विवाद था. लिहाजा पुलिस हिरासत में उसकी मौत ने प्रदेश सरकार को राजनीतिक तौर पर एक झटका जरूर दिया है. सरकार ने भी अपने बचाव में आनन-फानन में खालिद की गिरफ्तारी के समय उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे विक्रम सिंह, एडीजी ब्रज लाल सहित 42 पुलिस कर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश देते हुए मामले की सीबीआई जांच का आदेश देकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है.

2007 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ, फैजाबाद व गोरखपुर कोर्ट में हुए धमाकों के मामले में खालिद मुजाहिद लखनऊ जेल में बंद था. उसके तीन अन्य साथी तारिक कासमी, सज्जादुर्र-हमान तथा अख्तर भी इसी जेल में हैं. 18 मई, 2013 को चारों आरोपितों की फैजाबाद जिला जेल में पेशी थी. इसके लिए लखनऊ पुलिस की निगरानी में चारों को सरकारी वाहन से फैजाबाद भेजा गया था. जिला जेल फैजाबाद में ही मामले की सुनवाई के बाद शाम करीब पौने चार बजे चारों आरोपितों को लेकर पुलिस वैन लखनऊ जेल के लिए निकली थी.

खालिद की मौत के बाद लखनऊ जेल में बंद उसके साथी तारिक कासमी से मिलकर आए उनके वकील मोहम्मद शुएब बताते हैं, ‘फैजाबाद की जिला जेल से निकलने के बाद वाहन रामसनेही घाट पहुंचने ही वाला था कि खालिद के पड़ोस में बैठे तारिक को अपने शरीर पर किसी भार का अहसास हुआ. उसने पलट कर देखा कि खालिद उसके कंधे पर झुका हुआ है.’ शुएब आगे बताते हैं, ‘तारिक को पहले लगा कि खालिद सो गया है लिहाजा उसने उसे हिलाकर जगाने की कोशिश की. लेकिन खालिद का शरीर ढीला पड़ गया था और उसकी आंखें चढ़ने लगी थीं. इस पर तारिक और उसके साथियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. शोर सुन कर पुलिस ने वाहन रुकवाया.’ इसके बाद शाम करीब सवा पांच बजे पुलिस वाहन खालिद को लेकर बाराबंकी के जिला अस्पताल पहुंचा. शुएब के मुताबिक तारिक ने उन्हें बताया कि छह पुलिसकर्मी खालिद को स्टेचर पर लाद कर अस्पताल के भीतर ले गए जबकि तारिक व तीन अन्य आरोपितों को वैन में ही बंद करके दो पुलिसकर्मी उनकी सुरक्षा में बाहर ही रहे.

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करीब 15-20 मिनट बाद बाहर आए पुलिसवालों से जब तारिक ने खालिद का हाल-चाल जानना चाहा तो बताया गया कि आईसीयू में डॉक्टर उपचार कर रहे हैं. इसके बाद तारिक सहित तीनों आरोपितों को लखनऊ जेल रवाना कर दिया गया. उसके बाद क्या हुआ तारिक और उसके साथियों को कुछ भी नहीं पता चल पाया. बाराबंकी की अदालत में खालिद और उसके साथियों का मामला देख रहे वकील रणधीर सिंह सुमन बताते हैं, ‘सूचना मिलते ही जब जिला अस्पताल पहुंचा तो मालूम हुआ कि खालिद का शव मोर्चरी में भेज दिया गया है. वहां जाकर देखा तो खालिद के शरीर पर टी शर्ट तथा लोअर था. लखनऊ जेल से फैजाबाद पेशी के दौरान और पेशी से वापस आते समय तक खालिद कुर्ता-पायजामा व टोपी पहने था. आखिर खालिद के कपड़े क्यों बदल दिए गए?’

खालिद की मौत पर बवाल खड़ा होते ही सरकार तुरंत हरकत में आ गई. मौत की सूचना पर खालिद के चाचा जहीर आलम फलाही भी जौनपुर के मड़ियाहू स्थित पैतृक आवास से 18 मई की रात बाराबंकी पहुंच गए थे. भारी आक्रोश को देखते हुए प्रदेश सरकार ने फलाही के प्रार्थना पत्र के आधार पर खालिद की गिरफ्तारी के समय उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे विक्रम सिंह, एडीजी ब्रज लाल, एएसपी मनोज कुमार झा, डिप्टी एसपी चिरंजीव नाथ सिन्हा तथा आईबी के अज्ञात लोगों सहित 42 लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. फलाही ने  कोतवाली बाराबंकी के प्रभारी निरीक्षक को दिए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया है कि 16 दिसंबर, 2007 को उनके भतीजे का स्पेशल टास्क फोर्स उत्तर प्रदेश द्वारा जौनपुर के मड़ियाहू बाजार से अपहरण कर लिया गया था और बाद में एक साजिश के तहत 22 दिसंबर, 2007 को रेलवे स्टेशन बाराबंकी पर फर्जी विस्फोटकों की बरामदगी के साथ उसकी गिरफ्तारी दिखा दी गई. वे कहते हैं कि सोची समझी रणनीति के तहत एटीएस के गठन के बाद फर्जी जांच करके  इस मामले में आरोप पत्र दाखिल कर दिया गया. प्रार्थना पत्र में फलाही ने यह भी लिखा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने  इस गिरफ्तारी व फर्जी बरामदगी को लेकर आरडी निमेश आयोग गठित किया था. आयोग ने जांच करके अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त, 2012 को उत्तर प्रदेश सरकार को दे दी थी. सरकार ने राज्यपाल की आज्ञा के बाद मुकदमा वापसी का प्रार्थना पत्र भी न्यायालय में दिया था. फलाही ने अपने प्रार्थना पत्र में लिखा है, ‘यदि मुकदमा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कायम होता तो उस मुकदमे का मुख्य गवाह मेरा भतीजा खालिद मुजाहिद होता जिससे पुलिस के उच्च अधिकारियों को सजा होती. इसलिए सोची-समझी रणनीति के तहत उसकी हत्या कर दी गई.’

पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा कायम करवाने के बाद सरकार की ओर से पोस्टमार्टम के लिए एक पैनल का गठन किया गया था. लेकिन इसमें मौत का कोई निश्चित कारण नहीं निकला लिहाजा पैनल ने हृदय और दोनों फेफड़ों के हिस्से बिसरा जांच के लिए भेजे हैं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण भले ही साफ न हुआ हो लेकिन खालिद के वकील रणधीर सिंह सुमन व मोहम्मद शुएब शव की स्थिति को देख कर कोई जहरीला पदार्थ खिलाए जाने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं. शुएब कहते हैं, ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही यह बताती है कि खालिद की नाक से खून आया था. शरीर का ऊपरी हिस्सा भी नीला पड़ गया था, कार्निया भी धुंधला था. ये सारे लक्षण जहरीले पदार्थ के सेवन के बाद होने वाली मौत के ही हैं.’

[box]लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे में पुलिस हिरासत में खालिद की मौत ने मुस्लिमों को रिझाने की कवायद में लगी सपा सरकार को झटका देने का काम किया है[/box]

दिसंबर, 2007 में हुई खालिद की गिरफ्तारी शुरू से ही विवादों में घिरी रही. गिरफ्तारी के विरोध में जौनपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए थे. लिहाजा तत्कालीन बसपा सरकार ने 2008 में रिटायर जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरडी निमेश की अगुवाई में एकल सदस्यीय जांच आयोग का गठन कर दिया था. जांच रिपोर्ट 31 अगस्त, 2012 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार को सौंपी गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिद मुजाहिद को 16 दिसंबर, 2007 को कस्बा मड़ियाहू जिला जौनपुर से उठाने की खबर दूसरे दिन यानी 17 दिसंबर, 2007 के अखबारों में छपी है. रिपोर्ट में पूछा गया है कि सूचना का संज्ञान क्यों नहीं लिया गया और उस पर कार्यवाई क्यों नहीं की गई. रिपोर्ट आगे कहती है कि इसी तरह 20 दिसंबर, 2007 को खबर छपी कि एसटीएफ ने युवक को उठाया, उक्त सूचना पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं की गई और यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि उसे किस तरह और किसने उठाया और यह सूचना गलत छपी है या सत्य. रिपोर्ट यह भी कहती है, ‘18 दिसंबर, 2007 को अखबार में यह छपा कि एसटीएफ ने पूर्वांचल के जौनपुर व इलाहाबाद में छापा मार कर हुजी के दो सदस्यों को हिरासत में लिया है व मड़ियाहू में भी छापा मारने वाली बात छपी है. इसी तरह 21 दिसंबर, 2007 को एक अखबार में ‘मड़ियाहू का खालिद जा चुका है तीन बार पाक’ इस शीर्षक के साथ खबर छपी. यदि खालिद पुलिस अभिरक्षा में नहीं था तो ऐसी खबरें कहां से छपीं? इस पर भी न कोई संज्ञान लिया गया और न ही कोई कार्यवाई की गई.’ आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सभी तथ्यों से आरोपित खालिद मुजाहिद की दिनांक 22 दिसंबर, 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है.

दूसरी ओर खालिद की गिरफ्तारी के बाद एसटीएफ ने उसका जो बयान दर्ज किया वह चौंकाने वाला है. इसके मुताबिक खालिद ने कहा था, ‘मैं 2001 में अमरोहा से आलिम की पढ़ाई कर रहा था, वहीं मेरी अब्दुल रकीब से मुलाकात हुई जो असम का रहने वाला था. उसने मुझे जेहाद के बारे में काफी समझाया और 2003 में मुझे प्रशिक्षण के लिए जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ ले गया जहां हुजी के कैंप में मैंने 15 दिन का प्रशिक्षण लिया.’ बयान के मुताबिक खालिद ने खुद को तंजीम के फौजी दस्ते का कमांडर बताया है. निमेश आयोग की रिपोर्ट में खालिद की गिरफ्तारी पर जहां संदेह जताया गया है वहीं एसटीएफ व एटीएस का खुलासा कुछ और ही कहानी बयान करता है. इस पर जस्टिस आरडी निमेश तहलका से बात करते हुए कहते हैं, ‘मैंने सिर्फ खालिद की गिरफ्तारी वाले मामले की जांच की है क्योंकि इसको लेकर काफी विवाद हुआ था जिस पर सरकार ने आयोग का गठन किया था. खालिद का हाथ दूसरी घटनाओं में था या नहीं इस मामले की जांच मेरी ओर से नहीं की गई है.’

उधर, पुलिसकर्मियों पर मुकदमा लिखे जाने से नाराज पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, ‘मेरी टीम ने एक आतंकी को गिरफ्तार किया था, जिसका कोई पछतावा नहीं है. यह देश का दुर्भाग्य है कि एक आतंकी के मरने पर पुलिसवालों के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है.’ सिंह के मुताबिक पुलिस के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए खालिद के पास हवाला के जरिए धन आता था.
फिलहाल खालिद की मौत के साथ ही एसटीएफ व एटीएस के सारे दावे भी दफन हो गए हैं जो उसे आतंकी बताते थे क्योंकि मौत के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की जो सिफारिश की है वह सिर्फ इसलिए है कि खालिद की मौत आखिर हुई कैसे.

मासूम गिरोहों की दिल्ली

गर्मियों की एक दोपहर. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन. नई-दिल्ली-गुवाहाटी राजधानी एक्सप्रेस अपनी यात्रा पूरी कर चुकी है. यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर उतारने के बाद खाली हो चुकी ट्रेन धुलाई-सफाई के लिए रेलवे स्टेशन के पीछे बने यार्ड की तरफ बढ़ रही है. अचानक एक कोच के दरवाजे पर 14-15 साल का एक लड़का लटकता नजर आता है. हमें देखते ही वह जोर से हाथ हिलाता है और लहराते हुए चलती ट्रेन से उतर जाता है. उसके हाथ में फटी पन्नियों और प्लास्टिक की बोतलों से भरा एक मटमैला बोरा है. बुरी तरह घिस चुकी हाफ पैंट और लगभग चीथड़ों में तब्दील एक बदरंग टी-शर्ट पहने इस लड़के के शरीर के लगभग हर हिस्से पर चोटों के निशान दिखते हैं. खास चमड़ी के कटने से बनने वाले ये निशान उसके शरीर पर जमी मिट्टी, धूल और गंदगी की परतों को चीरते हुए बाहर झांक रहे हैं. अपने कान पर जमे खून के ताजा थक्कों से बेखबर वह लड़का मुस्कुराते हुए हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है. थोड़ी कोशिशों के बाद वह थोड़ा और सहज होता है और सबसे पहले अपना मौजूदा नाम रोहन बताता है.

रोहन से यह हमारी दूसरी मुलाकात है. पहली मुलाकात बस नाम के लिए हुई थी. हमें देखते ही वह भागने लगा था. फिर जब हमने उसे आश्वस्त करते हुए बुलाया तो वह आया तो जरूर, लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी हमसे बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ. इस बार लगता है कि उसका हम पर कुछ भरोसा जमा है. साथ-साथ लोहे की पटरियां पार करते हुए हम स्टेशन के आखिरी छोर पर बने प्लेटफॉर्म पर बैठ जाते हैं. अपने बारे में बताते हुए रोहन कहता है, ‘मुझे नहीं पता मेरा घर कहां है. मुझे नहीं मालूम मैं कहां से आया हूं. पहले तो मेरा कोई नाम भी नहीं था. स्टेशन पर लोग मुझे लूला, पगला या गंजा कहते थे. ये नाम तो स्टेशन पर काम करने आने वाले भैया ने दिया है. मुझे आज तक घर से कभी कोई लेने नहीं आया. जब से याद पड़ता है, तब से मैं स्टेशन पर ही रहता हूं.’

रोहन बताता है कि वह नशा करता है, उसने कई चोरियां भी की हैं और गाहे-बगाहे लोगों को ब्लेड या चाकू भी मार चुका है. अपराध की दुनिया में अपने सफर के बारे में वह कहता है, ‘सब सीख जाते हैं, दीदी. जब मैं छोटा था तो बड़े लड़कों ने सिखाया. चलती ट्रेन में चढ़ना, पॉकेट मारना, पर्स उड़ाना, चाकू मारना सब. यहां के गैंगों में बड़े लड़के छोटे बच्चों को सब सिखाते हैं. मैं तो फिर भी ठीक हूं. स्टेशन के दूसरे लड़कों और कबाड़ी वालों ने तो काम के टाइम कइयों को निपटाया है. फिर यही नए बच्चे भी सीख जाते हैं.’ आती गर्मियों के आसमान में धूप ढलान की ओर बढ़ती है. शाम होने तक रोहन हमें अपनी रहस्यमयी दुनिया के कई किस्से सुनाता है. बातचीत के दौरान साफ होता है कि अनजाने में यह मासूम बच्चा लगभग संगठित तरीके से चलने वाले बच्चों के एक ऐसे आपराधिक गिरोह का हिस्सा बन चुका है जिसकी कमान वयस्क अपराधियों के हाथों में है. इस कहानी का सबसे स्याह पहलू यह है कि वह अकेला नहीं है. अपराध के जाल में फंस कर अपना बचपन गंवा रहे रोहन जैसे सैकड़ों अन्य बच्चों की कहानियां दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में बिखरी पड़ी हैं.

अपनी दो महीने लंबी तहकीकात के दौरान तहलका ने इस मसले से जुड़ी कई छोटी-बड़ी जानकारियों और उलझे हुए बिंदुओं को जोड़ा. इससे अलग-अलग जगह, परिस्थितियों आदि में काम करने वाले बच्चों के करीब पांच प्रमुख आपराधिक गैंगों की एक चौंकाने वाली तस्वीर उभरी. दिल्ली में एक तरफ जहां तमाम बच्चे रेलवे स्टेशनों पर होने वाली लूटपाट और चाकूबाजी में शामिल, आपस में होड़ करते समूहों के तौर पर मौजूद हैं, वहीं शहर की लाल बत्तियों पर कार पंक्चर करके सामान चुराने वाले गिरोहों के रूप में भी इनकी सक्रियता देखी जा सकती है. एक तरफ राजधानी के सभी प्रमुख कबाड़ बाजारों में कबाड़ व्यापारियों की शह और मुश्किल परिस्थितियों का गठजोड़ कबाड़ बीनने वाले ज्यादातर बच्चों को अपराध के अंध-कूप में धकेल रहा है, तो बीड़ी और सिगरेट से शुरू होने वाले नशे को स्मैक और कोकीन तक पहुंचा कर बच्चों से चोरियां, डकैतियां और हत्याएं तक करवाने वाले अपराधियों का भी एक पूरा नेटवर्क शहर में सक्रिय है. नशा और चोरी-चकारी करते-करते कई बच्चे खुद भी मासूम बच्चों को नशे का आदी और अपराधी बनाने वाले कारोबार का हिस्सा बन जाते हैं.

मासूम बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने वाले अपराधी घर से भाग कर आने वाले और गुमशुदा बच्चों के साथ-साथ तस्करी के शिकार बच्चों को अपना पहला शिकार बनाते हैं. साथ ही, काम की तलाश में छोटे शहरों और कस्बों से पलायन करके दिल्ली का रुख करने वाले मजदूरों के बच्चे भी जाने-अनजाने इन गिरोहों के जाल में फंस रहे हैं. बच्चों के नियोजित अपराधीकरण को लेकर अगस्त, 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करने वाले युवा अधिवक्ता अनंत अस्थाना कहते हैं, ‘बात चाहे किसी भी तरह के अपराध में शामिल बच्चों की हो, वयस्क अपराधी अपने फायदे के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं. धीरे-धीरे ये बच्चे भी अपराध की अंधेरी दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं. हालांकि इन बच्चों को अपराध में झोंकने वाले वयस्क अपराधियों के साथ-साथ तेजी से पनप रहे बच्चों के इन आपराधिक गिरोहों के बारे में जानकारी अभी भी सीमित ही है.’ आगे दिल्ली में सक्रिय संगठित अपराधियों के जाल में फंसे उन बच्चों की कहानियां हैं जिन्हें इन अपराधियों के लालच और सभ्य समाज व व्यवस्था की आपराधिक उदासीनता ने अपराध की अंधेरी गलियों में धकेल कर उनके वापस आने वाले रास्ते बंद कर दिए हैं. बिना एक बार भी यह सोचे कि इस प्रक्रिया में हम भविष्य में उनके बड़े खूंखार अपराधियों में तब्दील होने की पूरी पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं. और उसके बाद शायद उनसे पीड़ित होने की भी.

1. कबाड़ी गैंग
दिल्ली के ओल्ड-सीमापुरी इलाके में बसी एफ ब्लाक झुग्गी बस्ती से लगभग 100 मीटर पहले ही रिक्शावाला हमें उतार देता है. पूछने पर बताया जाता है कि आगे दिल्ली की सबसे बड़ी और आपराधिक गतिविधियों के लिए बदनाम कबाड़ी बस्ती है. ज्यादातर रिक्शेवाले वहां तक सीधे जाना पसंद नहीं करते. मोहल्ले की ओर जाती सड़क पर आगे बढ़ते ही धूप और धूल भरी जमीन पर मुर्गों के कटे हुए लहूलुहान पंख, जहां-तहां पड़े बालों के गुच्छे और कतार में रखी कबाड़े से भरी बड़ी-बड़ी बदरंग बोरियां नजर आती हैं. जिंदा तत्वों के धीरे-धीरे नष्ट होने से पैदा होने वाली एक तीखी सड़ांध हमें झकझोरते हुए बताती है कि हम दिल्ली की सबसे पुरानी कबाड़ी बस्ती में दाखिल होने वाले हैं. अंदर छोटी-छोटी गलियों के किनारे बनी दड़बेनुमा खोलियों में बच्चे कभी कबाड़ साफ करते हुए तो कभी नशे के इंजेक्शन लेते नजर आते हैं. सिर्फ छह-सात फुट लंबे-चौड़े कमरे में छज्जा-सा डालकर उसमें 6-7 लोगों का परिवार गुजारा करता है. आगे बढ़कर जब हम पहला दरवाजा खटखटाते हैं तो पीली रोशनी में डूबे हुए कमरे में दो लड़के ड्रग्स का इंजेक्शन लगाते हुए दिखते हैं. उनके पीछे बैठी दो लड़कियां अपना नाम रजिया और फरहा बताती हैं. अपने हाथों में खाने की जूठी थालियां उठाए वे यह भी बताती हैं कि आज का कबाड़ साफ करने के बाद उन्होंने अभी-अभी अपना खाना खत्म किया है. रजिया और फरहा एक कमरे के अपने इसी घर में खाना खाती हैं, नशे में डूबे अपने भाइयों की लाल आंखों को बर्दाश्त करती हैं और सारी दिल्ली से आए कबाड़ को इसी के एक कोने में बैठकर साफ भी करती हैं.

कुछ दूर और आगे बढ़ने पर गली में हमें कबाड़ बीनने वाले बच्चों का एक झुंड ताश खेलता हुआ नज़र आता है.  झुंड में लगभग 15 साल का एक लड़का सफेदी (स्याही मिटाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला व्हाइटनर) में भीगा रूमाल सूंघ रहा है, जबकि बाकी पत्ते बांटने में व्यस्त हैं. हमें देखते ही सब पहले कुछ फुसफुसाते हैं, फिर हंसने लगते हैं. कुछ देर की कोशिशों के बाद वे बातचीत के लिए राजी हो जाते हैं. ताश खेल रहे ये सभी बच्चे 12-16 वर्ष के हैं और इन सभी ने छोटी उम्र से ही कबाड़ बीनने का काम शुरू कर दिया था. नशे और मारपीट की आदतों के बारे में बताते हुए 16 साल का रफीक कहता है, ‘हम सभी नशा करते हैं, इंजेक्शन, दारू, फ्लूइड, गांजा, पाउडर…सब कुछ. सबसे पहले तो नशा कबाड़ी वाले ही देना शुरू करते हैं.’ तभी अचानक 14 साल का रवि बीच में ही चिल्लाते हुए कहता हैं, “अरे मैं बताऊं, जब हम कबाड़ बीनने जाते हैं तो थकान होती है. फिर वहां गुटका खाना तो अपने आप सीख जाते हैं. फिर सिगरेट की हुड़क लगती है. सिगरेट से दारू, दारू से गांजा और गांजे से फ्लूइड. जब कबाड़ बेचने जाते हैं तो वहां सेठ फ्लूइड देता है. फिर पाउडर…सुई. यही है एक कबाड़ी बच्चे की सच्चाई! जान ली, अब जाओ यहां से.’

अपनी बात खत्म करते हुए रवि लगभग हमें गली के बाहर धक्का देने लगता है. हमें बताया जाता है कि फिलहाल ये बच्चे नशे में हैं और कुछ भी कर सकते हैं. वहां से निकलते ही बस्ती के दूसरे छोर पर हमारी मुलाकात 12-13 साल के अफजल और सुरेश से होती है. दोनों सुबह-शाम कबाड़ बीनने जाते हैं. अपने काम में नशे और अपराध की मिलावट के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, ‘सबसे पहले तो कबाड़ीवाले खुद ही हम लोगों को फ्लूइड दे देते हैं. वे हम लोगों से चोरियां करवाते हैं और फिर हमें पुलिस से भी बचाते हैं. कबाड़ीवाले हमारे लिए सब कुछ करते हैं इसलिए मेरे साथ के सारे बच्चे उनकी बात मानते हैं. फिर छिनैती, लड़ाई, चाकूबाजी और चोरी-चकारी…यहां कुछ सब चलता है.’

सीमापुरी की कबाड़ी बस्ती से निकलते-निकलते यह साफ हो जाता है कि कबाड़ बीनने वाले बच्चे अपने आस-पास के माहौल और अपने कबाड़ी सेठों के संरक्षण में अपराध और नशे की कभी न खत्म होने वाली अंधी गलियों में विचर रहे हैं. इस बस्ती के बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास के लिए काम कर रही गैरसरकारी संस्था आशादीप फाउंडेशन से जुड़े एचके चेट्टी बताते हैं, ‘यहां कबाड़ा बीनने वाले लगभग 2,500 परिवार रहते हैं. ज्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हैं, लेकिन इन्हें शरणार्थी होने तक का दर्जा हासिल नहीं है. पहचान नहीं होने की वजह से इन्हें कोई काम नहीं देता. इसलिए सबने कबाड़ा चुनना शुरू कर दिया. लेकिन ये लोग अपने बच्चों को कबाड़ मालिकों के यहां पनपने वाले नशे और अपराध की संस्कृति से बचा नहीं पाए.’

सीमापुरी की ही तरह दिल्ली के जहांगीरपुरी और सराय काले खां इलाकों में ऐसी ही कहानियों से पटी हुईं राजधानी की सबसे बड़ी कबाड़ी बस्तियां मौजूद हैं. इस स्टोरी के दौरान तहलका ने शहर के अगल-अलग हिस्सों में मौजूद इन कबाड़ा बस्तियों के बच्चों और कबाड़ा व्यापारियों से बात की तो अपने मुनाफे के लिए बच्चों को अपराध की दुनियां में धकेल रहे अपराधियों की तस्वीर और पुख्ता होने लगी. निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पीछे बसी सराय काले खां झुग्गी बस्ती में मौजूद कबाड़ा व्यापारियों के यहां काम कर चुका 17 वर्षीय विवेक बताता है, ‘सराय काले खां की झुग्गी बस्तियों में तकरीबन सात कबाड़ा व्यापारी हैं, लेकिन फारूख, खाला और शाहिद ही बड़े कबाड़ी वाले हैं. कभी कबाड़ के बदले पैसा मिलता है तो कभी नशा. फिर धीरे-धीरे हम खुद ही खरीदने लगते हैं. निजामुद्दीन दरगाह के पीछे और भोगल में सड़कों पर ही मिल जाता ह.ै’ विवेक आगे कहता है, ‘यहां बच्चों को सबसे ज्यादा फ्लूइड की लत है. कुछ महीने पहले तक मैं खुद लगभग 20 डबल रोज पी जाता था. एक सेट में फ्लूइड की दो बोतल होती हैं इसलिए उसे डबल कहते हैं. कबाड़ीवाले हमें नशे के लिए चोरियां करने को भी कहते हैं. मेरे कई दोस्तों ने तो इनके कहने पर स्टेशन से बाइक चुराई और दरगाह से कितनों के पर्स उड़ाये. अगर पुलिस का मामला होता है तो कबाड़ी-वाले ही हमें बचाते हैं.’

बच्चों की इन बातों को अपने मामले में खारिज और दूसरों के मामले में स्वीकार करती, सराय काले खां की प्रमुख कबाड़ा व्यापारी रीना उर्फ खाला कहती हैं, ‘यह सब मेरे यहां नहीं होता. बाजू में वे दूसरे कबाड़ीवाले हैं न, वे सब बच्चों से चोरियां करवाते हैं और उन्हें ब्लेडबाजी, चाकूबाजी सब सिखाते हैं. उनके बच्चे सब नशा करते हैं. वे खुद उन्हें नशा देते हैं और फिर उन्हीं से बाकी बच्चे भी सीख जाते हैं.’ कबाड़ा बीनने वाले बच्चों और कबाड़ा व्यापारियों के साथ लंबे समय से काम रही गैर सरकारी संस्था चेतना से जुड़े डॉ संजय गुप्ता बताते हैं कि पहले कबाड़ा व्यापारी बच्चों को एक सुरक्षा घेरा देते हैं और फिर उनका शोषण करते हैं. वे कहते हैं, ‘पहले ये लोग सड़क पर रहने वाले बच्चों को काम देते हैं, रहने की जगह और नशा भी देते हैं. इससे बच्चों को इन पर विश्वास हो जाता है. बच्चे इनके लिए सबसे अच्छे होते हैं. वे अपनी मेहनत का पूरा पैसा नहीं मांगते, वफादार होते हैं और नशे की लत की वजह से इनके कहने पर धीरे-धीरे चोरियां भी करने लगते हैं.’

ऐसा नहीं है कि इन बच्चों के लिए कुछ कर सकने वाले लोगों को इनके साथ और इनके द्वारा जो कुछ हो रहा है उसके बारे में पता नहीं. 20 अगस्त, 2010 को किंग्सवे कैंप स्थित जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड (बाल न्यायालय) के एक आदेश में प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट अनुराधा शुक्ल भारद्वाज का कहना था कि राजधानी के कबाड़ा व्यापारी अपने मुनाफे के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों में फंसे बच्चों का शोषण कर रहे हैं. किशोर मामलों के अधिवक्ता अनंत अस्थाना की एक विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर दिए गए इस फैसले में ऐसे बच्चों के लिए एक नई बाल कल्याण समिति बनाने का आदेश देते हुए उनका कहना था, ‘…यह देखा जा रहा है कि इन कबाड़ा व्यापारियों की वजह से सड़कों पर रहने वाले बच्चों, झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चों या फिर गरीबी, असाक्षरता या किसी प्राकृतिक प्रकोप की वजह से पोषण और देखभाल से दूर रहे बच्चों में नशे और अपराध की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. ये कबाड़ीवाले बहुत सुनियोजित तरीके से छोटे बच्चों को कबाड़ा बीनने का काम देते हैं, फिर उनसे चोरियां और डकैतियां करवाई जाती हैं. यह सब बच्चों को ड्रग्स, शराब और फ्लूइड के नशे का आदी बनवाकर करवाया जाता है जो उन्हें सबसे पहले इन्हीं कबाड़ा व्यापारियों के पास से मिलता है. यह पूरा माहौल भविष्य में बच्चों के एक खूंखार अपराधी बनने का रास्ता साफ कर देता है…’

अपने फैसले में बोर्ड ने पुलिस और संबंधित संस्थाओं को बच्चों के इस सुनियोजित अपराधीकरण पर तुरंत कार्रवाई करने और इस चुनौती से निपटने के लिए सख्त निर्देश तो जारी कर दिए लेकिन जमीन स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी. आज भी सैकड़ों असहाय बच्चे कबाड़ा व्यापारियों में अपने जिंदा रहने की आस देखकर कबाड़ बीनने का काम करते हुए नशे और अपराध के बीच झूल रहे हैं.

2. ठक-ठक और टायर ‘पंचर’ गैंग
15 फरवरी, 2013 को दिल्ली पुलिस ने राजधानी के पुष्प विहार इलाके में बने दिल्ली विकास प्राधिकरण के एक पार्क में छापा मारकर तीन लोगों को गिरफ्तार किया था. प्राथमिक पड़ताल के बाद ही यह पता चल गया कि ये तीनों आरोपित नाबालिग हैं और शहर के अलग-अलग इलाकों में सक्रिय ‘टायर पंचर गैंग’ के सदस्य हैं. मुखबिरों से मिली सूचना के आधार पर दिल्ली पुलिस के सहायक पुलिस आयुक्त (ऑपरेशंस) कुलवंत सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम ने इन किशोरों को अपने संरक्षण में लेकर उनसे लगभग एक करोड़ रुपये के गहने बरामद किए. तहलका से बातचीत के दौरान नाबालिग बच्चों के इस आपराधिक गैंग के बारे में जानकारी देते हुए कुलवंत सिंह कहते हैं, ‘किशोर बच्चों का यह गिरोह रेड लाइट पर खड़ी कारों के टायरों में सुआ (लोहे की बड़ी सुई) घुसाकर उनके टायर पंक्चर कर देता है. कुछ दूर जाने पर जब टायर में से हवा निकलने लगती है तो वे गाड़ी चालक को उसकी गाड़ी के टायर के बारे में बताते हैं. जब गाड़ी चालक अपने पंक्चर हो चुके टायर को देखने या बदलने में व्यस्त हो जाता है तब ये बच्चे गाड़ी से सामान चुराकर भाग जाते हैं. इन चोरियों को अंजाम देने के लिए ये बच्चे स्कूटरों और मोटर-बाइकों का भी इस्तेमाल करते हैं. यह गिरोह लैपटॉप और मोबाइल के साथ-साथ नगदी, सोने के बिस्कुट और गहनों की बड़ी चोरियां भी करता है. अक्टूबर, 2012 में भी हमने चांदनी चौक के एक व्यापारी से साढ़े तीन किलो सोना चुराने वाले इसी गिरोह के बच्चों को पकड़ा था.’

किशोरों के संगठित गिरोहों द्वारा लाल बत्तियों पर गाड़ियां लूटने के मामले 2009 से ही सामने आने लगे थे. शुरुआत में बच्चे लाल बत्तियों पर खड़ी गाडि़यों के शीशों पर हाथ मारकर ठक-ठक की आवाज करते और गाड़ी चालक के शीशा नीचे करते ही उसका ध्यान बंटाकर गाड़ी में रखा सामान लेकर चंपत हो जाते. दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में हो रही ऐसी तमाम घटनाओं में मौजूद समानता की वजह से इन सभी बच्चों को सामूहिक तौर पर ‘ठक-ठक गिरोह’ के तौर पर पहचाना जाने लगा. इसके बाद इन बच्चों ने गाड़ी के टायर पंक्चर करके गाड़ी चालकों को लूटना शुरू किया और एक नया टायर पंक्चर गैंग सामने आया.

बच्चों के संगठित अपराधीकरण के इन लगातार बढ़ रहे मामलों को देखते हुए किशोर मामलों के सरकारी वकील भूपेश समद द्वारा अदालत के आदेश पर एक रिपोर्ट तैयार की गई. 20 नवंबर, 2010 को सेवा कुटीर किंग्सवे कैंप स्थित बाल न्यायालय को सौंपी गई इस रिपोर्ट में भूपेश लिखते हैं, ‘…ये बच्चे सीधे-सीधे अपराध में शामिल नहीं हैं बल्कि वयस्क अपराधियों का एक समूह इनको बहला-फुसला कर इन्हें अपराध की दुनिया में धकेल रहा है. ये बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं और इन्हें बचाना राज्य की जिम्मेदारी है. ये बच्चे गिरोहों में शामिल अपराधी नहीं बल्कि स्वयं मुश्किल परिस्थितियों के शिकार हैं. तहकीकात करने पर यह साफ़ हो जाता है कि अपराध का स्वभाव संगठित है और इन अपराधों के पीछे छिपे मुख्य वयस्क अपराधी अपने फायदे के लिए बच्चों का दुरुपयोग कर रहे है.’

अदालती दस्तावेजों, थानों में दर्ज विवरणों और कानूनी आवेदनों को खंगालने पर तहलका को ठक-ठक गिरोह में शामिल रहे कुछ बच्चों की महत्वपूर्ण कहानियां मिलती हैं. बच्चों की पारिवारिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनके इस आपराधिक दुश्चक्र में फंसने का विस्तृत विवरण देती ये कहानियां ऊपर की पंक्तियों में दर्ज भूपेश समद के आकलन को और पुख्ता करती हैं.

उदाहरण के लिए, नौ सितंबर 2010 को सेवा कुटीर किंग्सवे कैंप स्थित जुविनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश होने वाले रोहन और सुमित भी कुछ वयस्क अपराधियों की वजह से ठक-ठक गिरोह का हिस्सा बन गए थे. वे लाल बत्ती पर खड़े कार चालकों से कहते कि उनकी गाड़ी से पेट्रोल निकल रहा है और गाड़ी चालक का ध्यान बंटते ही उनकी गाड़ी में रखा सामान लेकर चंपत हो जाते. पुलिस द्वारा पकड़े जाने और उन्हें अपने संरक्षण में लेने के बाद भी बच्चे अपना पता और पहचान बताने से लगातार इनकार करते रहे. ठीक इसी तरह 11 नवंबर,  2010 को विजय का मामला बाल न्यायालय के सामने आया. विजय को लाल बत्ती पर खड़ी एक कार के शीशे तोड़कर उसमें रखा एक बैग चुराने की वजह से पकड़ा गया था. लेकिन जांच अधिकारी विजय से कोई बैग बरामद नहीं कर पाए. इस मामले में भी बच्चे ने अपना पता और परिवार की सही जानकारी नहीं बताई.

अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट में किशोर पुलिस अधिकारी बताते हैं कि कैसे बैग चुराते ही बच्चे का एक पहले से छिपा हुआ साथी बड़ी फुर्ती से उससे चोरी का सामान लेकर भाग जाता है. बच्चे के पकड़े जाते ही उसका वकील जांच अधिकारी से संपर्क करता है और उसकी ज़मानत की अर्जी तुरंत आगे बढ़ा दी जाती है. बच्चे की मां यह नहीं बता पाती कि उसकी अपने वकील से मुलाकात कैसे हुई थी. रोहन और सुमित की मां की तरह विजय की मां भी बार-बार यही कहती रही कि उसे कुछ नहीं पता. और मजे की बात तो यह है कि रोहन और सुमित की जमानती अर्जी देने वाले वकील ही विजय के बचाव के लिए भी आगे आते हैं. इन दोनों ही मामलों में महिलाओं ने अपने असली पते छिपाते हुए बोर्ड के सामने एक ही तरह के बयान दिए और इन बच्चों के परिवार का कोई पुरुष सदस्य कभी सामने नहीं आया.

ठीक इसी तरह तीन जनवरी, 2011 को बोर्ड के सामने हाजिर हुए नौ साल के कमल और 10 साल के वसीम के मामलों में भी उनके पकड़े जाते ही उनके वकीलों ने उनकी जमानत के लिए जांच अधिकारियों को फोन करना शुरू कर दिया था. बच्चों के अभिभावक के नाम पर आए व्यक्ति ने फर्जी कागज़ात दिखाकर अपनी और बच्चों की पहचान छिपाने का भरसक प्रयास किया. जांच अधिकारियों द्वारा पूछने पर दोनों बच्चे और उनका तथाकथित अभिभावक अपने पते-ठिकाने और वकील के बारे में पूछे गए आसान सवालों के जवाब तक नहीं दे सके.

ठक-ठक गैंग के मामले में वयस्कों के एक पूरे नेटवर्क की मौजूदगी पर अब तक की एकमात्र रिपोर्ट तैयार करने वाले भूपेश समद तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘एक 9-10 साल का बच्चा, जिसे पढ़ना-लिखना तक नहीं आता, लैपटॉप या गहने चुराकर क्या करेगा? अगर कोई तुरंत उससे उसका चोरी किया माल ले जाता है, कोई उसे बचाने के लिए मां-बाप बनकर आ जाता है और सभी मामलों में एक ही वकील बेल करवाने आ रहा है तो इससे साफ जाहिर है कि इस लूटपाट में बच्चों का कोई दोष नहीं है. वयस्क अपराधियों का एक बड़ा नेटवर्क है जो जल्दी और आसानी से पैसा कमाने के लिए बच्चों का इस्तेमाल कर रहा है.’

चोरी करने वाले बच्चे के पकड़े जाते ही उसका वकील जांच अधिकारी से संपर्क करता है और इसके बाद उसकी ज़मानत की अर्जी तुरंत आगे बढ़ा दी जाती हैभूपेश समद की इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए किंग्सवे कैंप स्थित बाल न्यायालय की प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट अनुराधा शुक्ला ने 25 जनवरी, 2011 को एक आदेश जारी करते हुए कहा, ‘…बोर्ड ने सभी मामलों में बहुत-सी समानताएं देखी हैं. जैसे बोर्ड के सामने लाया गया हर बच्चा कहता है कि उसकी मां ने उसकी पिटाई की इसलिए उसने घर छोड़ दिया, जबकि किसी भी मां ने अपने बच्चे के गुमशुदा होने की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई. अपने सही नाम और पते के साथ-साथ बच्चे यह भी नहीं बता पा रहे थे कि पेट्रोल की टंकी खोलने का, ड्राइवर को पेट्रोल लीक होने की सूचना देने और फिर चोरी करने का विचार उनके दिमाग में कैसे आया. ये सभी समानताएं स्पष्ट तौर पर यह बताती हैं कि कुछ संगठित आपराधिक गिरोह इन बच्चों का कितने सुनियोजित तरीके से दुरूपयोग और शोषण कर रहे हैं. इस बात की भी पूरी संभावना है कि यह सब बच्चों के माता-पिता की सहमति से हो रहा है.’

ठक-ठक गैंग के सभी मामलों में दिल्ली पुलिस को विशेष पड़ताल शुरू करने के निर्देश देते हुए बोर्ड ने आगे कहा, ‘इन गिरोहों में शामिल सभी वयस्कों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र के मामले दर्ज होने चाहिए क्योंकि ये लोग अपने आर्थिक फायदे के लिए बच्चों को उन आपराधिक गतिविधियों में शामिल कर रहे हैं जिनके दूरगामी परिणाम समझ पाने की भी उनमें क्षमता नहीं. बच्चों से अपराध करवाकर ये लोग उनके भागने और पकड़े जाने पर उनकी कानूनी सहायता की भी व्यवस्था कर रहे हैं. इससे भी बड़ा षड्यंत्र अपने फायदे के लिए बच्चों को लगातार इस्तेमाल करते रहने की मानसिकता है. यह बच्चों के बचपन के खिलाफ एक षड्यंत्र है. इसलिए इन मामलों में वयस्कों के साथ-साथ बच्चों के माता-पिता पर भी मामले दर्ज होने चाहिए…’

लेकिन इन तमाम कड़े अदालती निर्देशों के बावजूद ठक-ठक गिरोह आज भी टायर पंक्चर गिरोह जैसे अपने नए रूपों में दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में सक्रिय है. दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के सहायक निदेशक पी खाखा इस मामले में पुलिसिया लापरवाही की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘जब तक पुलिस इन बच्चों का शोषण करने वाले असली अपराधियों को नहीं पकड़ेगी, तब तक इन गिरोहों का खत्म होना मुश्किल है.’

3. रेलवे स्टेशन गैंग
सिर्फ कबाड़ के व्यापार में लगे अपराधी और शहर के लाल-बत्ती चौराहों पर चोरियां कराने वाला आपराधिक नेटवर्क ही राजधानी के बच्चों को अपराध के दुश्चक्र में धकेलने के लिए जिम्मेदार है. दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर रोजाना उतरने वाले दर्जनों मासूम बच्चे कब और कैसे यहां रोज पनपने और टूटने वाले आपराधिक गिरोहों का हिस्सा बन जाते हैं, उन्हें भी पता नहीं चल पाता. राजधानी के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगियों में फैले अपराध की जड़ें टटोलने के लिए जब तहलका ने ऐसे तमाम बच्चों से बात की तो अंदर तक झकझोर देने वाली एक बेहद स्याह तस्वीर उभर कर सामने आई.

एक उमस भरी दोपहर को हमारी मुलाकात शादाब से होती है. 14 साल का शादाब राजधानी के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पीछे मौजूद निजामुद्दीन दरगाह के सामने बने फुटपाथ पर बैठा है. वह अपने कान, नाक और होठों पर मौजूद मवाद भरे घावों को खुजाकर खुद को थोड़ा आराम देने की कोशिश कर रहा है. कुछ देर कोशिश करने के बाद वह हमसे बात करने को राजी हो जाता है. शादाब सात साल की उम्र में पश्चिम बंगाल के 24 परगना क्षेत्र से दिल्ली आया था. अपने घर से दिल्ली आने और नशाखोरी, ब्लेडबाजी और चोरियों में शामिल एक आपराधिक गिरोह का हिस्सा बनने तक की यात्रा के बारे में वह कहता है ,”हम अपने मामा के संग गांव से पढ़ने दिल्ली आए थे. लेकिन मामा ने पंचर बनाने की दुकान पर लगवा दिया. कुछ दिन वहां काम किया फिर दिल नहीं लगा तो भाग के स्टेशन आ गया. फिर यहां दूसरे लड़के मिल गए और मैं यहीं रहने लगा. हम फेरी मारकर और चोरी करके अपना काम निकालते और पैसा मिलते ही नशा खरीदते. फिर यहां से मैं बटरफ्लाई (स्टेशन पर रहने वाले बच्चों पर काम करने वाली एक सामाजिक संस्था) गया. वहां कुछ दिन रहा लेकिन अच्छा नहीं लगा तो वापस भाग कर स्टेशन आ गया.’ अपने आपराधिक गिरोहों के बारे में बताते हुए वह आगे जोड़ता हैं, ‘दीदी, स्टेशन पर हम किसी का पर्स मार लेते हैं, सामान छीन कर भाग जाते हैं और कभी-कभी मोबाइल, गहने या छोटी गाडि़यां भी चुराते हैं. बाकी लड़के इस पैसे से नशा करते हैं. मैं तो सिर्फ फ्लूइड पीता हूं, बाकी सब मैंने छोड़ दिया.’

शादाब आगे बताता है कि स्टेशन पर मौजूद आपराधिक गिरोह बच्चों का यौन शोषण भी करते हैं. ‘यहां पर बड़े लड़के, जो पहले से स्टेशन पर रहते हैं वो छोटी लड़कियों और लड़कों के साथ भी गलत काम करते हैं. कई बार पीछे आखिर में खड़ी ट्रेनों के खाली डब्बों में बने टॉयलेट्स में ले जाकर ये लड़के छोटे बच्चों के साथ गलत काम करते हैं. कई बार तो गुम होकर स्टेशन पर भटक जाने वाले छोटे-छोटे लड़कों के साथ पहले ही दिन बड़े लड़के गलत काम करते हैं. फिर वे छोटे बच्चे उन्ही लड़कों की गैंग में शामिल हो जाते हैं. स्टेशन पर लड़कों के गैंग बंटे होते हैं न. हर गैंग का चोरी करने और बोतल बीनने का एरिया अलग होता है और नए बच्चों को किसी न किसी गैंग का हिस्सा तो बनना ही पड़ता है वर्ना वो यहां नहीं रह सकता.’ फिर अपने दोस्तों के साथ स्टेशन वापस जाने की जल्दी में हमसे विदा लेते हुए शादाब सिर्फ इतना कहता है, ‘मेरे घरवालों ने इतने सालों मेरे कोई पूछ-परख नहीं ली. तो अब स्टेशन पर ही अच्छा लगने लगा है. यहीं रहता हूं और सोचता हूं शायद यहीं रह जाऊंगा.’

‘कई बार गुम होकर स्टेशन पर भटक जाने वाले छोटे-छोटे लड़कों के साथ पहले ही दिन बड़े लड़के गलत काम करते हैं. फिर वे बच्चे उन्हीं लड़कों की गैंग में शामिल हो जाते हैं’नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर छह और सात के आखिरी छोर से लगभग 50 मीटर की दूरी पर लोहे की एक जालीनुमा दीवार के दूसरी तरफ स्टेशन पर रहने वाले लगभग 10 बच्चों से हमारी मुलाकात होती है. फरीदाबाद, लखनऊ, पश्चिम बंगाल, मुजफ्फरनगर से लेकर बिहार के मोतिहारी और दरभंगा जिले से दिल्ली आए ये बच्चे 12 से 17 साल की उम्र के हैं. इनमें से ज्यादातर गरीबी, भुखमरी और परिवारवालों की पिटाई के चलते अपने-अपने घरों से भाग कर दिल्ली आए थे. कुछ को उनके रिश्तेदार बहला-फुसला कर मजदूरी करवाने दिल्ली लाए थे तो कुछ अपने ही परिचितों के हाथों बेचे गए थे. मजदूरी करवाने वाले दुकानदारों और अपनी गिरफ्त में रखने वाले तस्करों के चंगुल से भागकर जब बच्चे स्टेशन पहुंचते तो यहां पहले से मौजूद आपराधिक गिरोह उन्हें अपने अपराध के दलदल में धकेल देते.

तहलका से विस्तृत बातचीत के दौरान 14 वर्षीय किशन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मौजूद आपराधिक गिरोहों के बारे में जानकारी देते हुए कहता है, ‘दीदी, छुटुआ के जाने के बाद यहां रंजीत और सोनू बिहारी के गिरोह काम करते हैं. यही लोग नए और छोटे बच्चों को चोरी-चकारी सिखाते हैं. चलती ट्रेन पर चढ़ना, सामान उड़ाना और फिर बड़ी चोरियां करना भी. सोनू बिहारी वाले बड़े बच्चों का गिरोह शीलापुल के नीचे रहता है और उसके पीछे वाले एरिया में ही चोरी करता है. जबकि दूसरा ग्रुप 13-14 और 6-7 नंबर पर रहकर काम करता है.’ लगभग दो घंटे की बातचीत के बाद बच्चे धीरे से शादाब की तरह ही हमें यह भी बताते हैं कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रहने वाले बड़े उम्र के बच्चे छोटे बच्चों का शारीरिक शोषण भी करते हैं. 11 साल का धीरज और 16 वर्षीय जतिन बताते हैं, ‘यहां बच्चों के साथ बहुत गलत काम भी होता है. बड़े बच्चे छोटे बच्चों के साथ करते हैं. लड़के और लड़कियों दोनों के साथ. वहीं उन्हें अपने साथ रखते हैं. उन्हें बोतल बीनना और चोरी करना सिखाते हैं, उनसे भीख भी मंगवाते हैं और उनकी कमाई भी रख लेते हैं. अभी भी स्टेशन पर जो मेंटल नाम का आदमी रहता है, वह अपने साथ रहने वाले दो छोटे लड़कों के साथ रोज गलत काम करता है.’

अगर निजामुद्दीन स्टेशन की बात करें तो स्टेशन पर लंबे समय तक रहने के बाद अभी एक सामाजिक संस्था से जुड़े अंकित के शब्दों में, ‘यहां एक गैंग सूर्या और उसके लड़कों का है जो स्टेशन के पीछे बनी पानी की टंकी के पास रहता है. उसके गिरोह में लगभग 20 लड़के हैं. वो बच्चों को बोतल बीनने के साथ-साथ लोहा, कबाड़ी और यात्रियों के सामान चोरी करना भी सिखाता है. जो नए बच्चे जरा भी समझदार या तेज होते हैं, उन्हें वह अपने साथ ही रखता है. दूसरा गिरोह गोलू और अनिल का है. ये लोग सराय काले खां से सटे प्लेटफार्मों के आखिरी छोर पर रहते हैं. अनिल और गोलू के लड़के 7, 8 और 5 नंबर प्लेटफार्म के साथ-साथ सराय काले खां की बस्ती में सक्रिय रहते हैं जबकि 4, 3, 2 और 1 नंबर सूर्या का इलाका है. इसके साथ ही सूर्या का गैंग दरगाह और टैक्सी स्टैंड के पूरे क्षेत्र में भी सक्रिय रहता है. साथ ही इन बच्चों के लिए यहां सराय काले खां के पीछे बने बाजार में छोटी-छोटी चाय की दुकानें हैं. रेलवे पुलिस को भी सब पता है लेकिन कोई कुछ नहीं करता.’

‘यहां भी जो सबसे शक्तिशाली है वही जीवित रह सकता है. ऐसे में छोटे और नए बच्चे यहां पहले से सक्रिय गिरोहों को अपने सुरक्षा तंत्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं’दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले बच्चों के साथ लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संजय गुप्ता राजधानी के स्टेशनों पर सक्रिय बच्चों के गिरोहों को स्टेशन के जीवन का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहते हैं, ‘बच्चे अक्सर रेलवे स्टेशनों पर इसलिए रुक जाते हैं क्योंकि यह शहर का सबसे जीवंत स्थान होता है जहां बच्चों को पीने का पानी, सोने की जगह और बचा-खुचा खाना मिल जाता है. लेकिन जाहिर है, यहां भी जो सबसे शक्तिशाली है वही जीवित रह सकता है. ऐसे में छोटे और नए बच्चे यहां पहले से सक्रिय गिरोहों को अपने सुरक्षा तंत्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. आप इन स्टेशनों पर वहां पहले से स्थापित और सक्रिय गिरोहों को नकार कर रह ही नहीं सकते. इसलिए छोटे बच्चे वयस्कों के इन आपराधिक गिरोहों में शामिल हो जाते हैं. फिर यहीं उन्हें चोरी करना, बोतल बीनना, ब्लेडबाजी करना और नशा करना सिखाया जाता है. इन गिरोहों में छोटे लड़कों का बहुत व्यापक स्तर पर शारीरिक शोषण होता है. बड़े लड़के छोटे लड़के-लड़कियों का लगातार शारीरिक शोषण करते हैं, उन्हें खाना और नशा भी देते हैं, अपने साथ रखते हैं और पुलिस से भी बचाते हैं. जब वो बड़े हो जाते हैं तो वो भी नए बच्चों के साथ वही सब कुछ दोहराते हैं जो उनके साथ हुआ था.’

स्टेशन पर रहने वाले सैकड़ों मासूम बच्चों का बचपन इन आपराधिक गिरोहों के कभी न खत्म होने वाले दुश्चक्र में तो खत्म होता ही है कभी-कभी तेज रफ्तार ट्रेनों से कटकर भी खत्म हो जाता है. 11 अप्रैल, 2011 को 10 वर्षीय पेटू पटरियों पर बोतलें बीनते-बीनते अचानक एक ट्रेन के नीचे आ गया था. स्टेशन पर रहने वाले बच्चों के योजनाबद्ध पुनर्वास के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने वाली समाजशास्त्री खुशबू जैन बच्चों के साथ जारी सख्त पुलिसिया रवैये को खारिज करते हुए कहती हैं, ‘इस मामले को जब भी उठाया जाता है पुलिस तुरंत अपनी ताकत का इस्तेमाल करके बच्चों को स्टेशनों से मारकर भगा देती है. यह तरीका बिल्कुल गलत है क्योंकि पहले तो बच्चों के साथ किसी भी तरह की हिंसक जोर-जबरदस्ती कानून के खिलाफ है. दूसरी बात बच्चों को स्टेशनों से भगाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि वे कुछ दिनों बाद यहां वापस आ जाते हैं. उनको धीरे-धीरे स्टेशनों के आस-पास ही पुनर्वासित करना होगा. उन्हें आसपास ही रोज़गार और शिक्षा के विकल्प देकर धीरे-धीरे मुख्यधारा में लाना होगा.’

4. कड़िया सांसी गैंग
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले से दिल्ली, मथुरा और आगरा जैसे उत्तर भारतीय शहरों में छोटे बच्चों को चोरियां करने के लिए भेजने वाला एक अंतरराज्जीय आपराधिक गिरोह सक्रिय है. राजगढ़ के नरसिंहगढ़ ब्लाक की कड़िया चौरसिया ग्राम पंचायत का एक गांव है कड़िया सांसी. इस गांव के कई बच्चे दिल्ली के संभ्रांत इलाकों में होने वाली शादियों और अन्य पारिवारिक समारोहों में चोरियां करते पाए गए हैं. नवंबर, 2012 में यहीं के दो बच्चे अशोक और वरुण दिल्ली में एक निजी समारोह में चोरी करने के बाद पकड़े गए थे. फरवरी, 2013 में कड़िया सांसी के नजदीकी गांव जतखेरी के दो बच्चों-सावन और फूलन–को भी पुलिस ने पकड़ा था. ये बच्चे राजधानी के केशवपुरम इलाके में चल रहे एक विवाह समारोह से लगभग 50 लाख रुपये के गहने और नकदी चुराते पकड़े गए थे. इन बच्चों से संबंधित दस्तावेज तहलका के पास मौजूद हैं.

सात जुलाई, 2012 को परमजीत सिंह दिल्ली के लारेंस रोड स्थित सेवन बैंक्वेट हाल में अपनी बेटी का जन्मदिन मना रहे थे. रात के लगभग 12 बजे केक कटने के बाद सोने के जेवरों और तोहफों से भरा एक बैग वहां से गायब हो गया. पार्टी के दौरान खींची गई तस्वीरों की मदद से शुरुआती तहकीकात के बाद केशवपुरम पुलिस ने वरुण और अशोक को उनकी मां के साथ पकड़ लिया. कड़िया सांसी गांव के मकान नंबर 81 में रहने वाले इन बच्चों ने पूछताछ के दौरान बताया कि समारोह के दौरान उन्होंने तोहफों के बैग के पास बैठी एक महिला की साड़ी पर चटनी गिरा दी. जैसे ही वह महिला अपनी साड़ी साफ करने में व्यस्त हुई, बच्चे बैग लेकर वहां से चंपत हो गए. बच्चों को सुधार गृह भेजने के निर्देश देते हुए दिल्ली गेट स्थित बाल न्यायालय की प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट गीतांजली गोयल का कहना था, ‘…परिवारवालों की मदद से चोरियां करने वाले छोटे बच्चों से जुड़े कई मामले सामने आ रहे हैं. ज्यादातर घटनाओं में बच्चे मध्य प्रदेश के राजगढ़ या खंडवा जिले से हैं. सभी मामलों में बच्चे अपनी मांओं के साथ दिल्ली कपड़े बेचने आते हैं और बाद में बड़े समारोहों में चोरियां करते हुए पकड़े जाते हैं.’

‘पकड़े जाने पर ये सिर्फ यही कहते हैं कि ये तो खाना खाने के लिए शादी में आ गए थे.   इन्हें लेने भी हमेशा इनके मामा, चाची, मौसी या कोई दूसरा रिश्तेदार ही आता है’इस अंतरराज्यीय नेटवर्क पर काम कर रही सामाजिक संस्था हक से जुड़े शाबाज खान बताते हैं, ‘इन गांवों की सारी आबादी कंजर बंजारों की है. इनके छोटे-छोटे बच्चे दिल्ली के संभ्रांत इलाकों में होने वाली शादियों में तैयार होकर पहुंच जाते हैं और मौका मिलते ही लाखों के जेवर लेकर फरार हो जाते हैं. आम तौर पर शादियों में दुल्हन या कुछ खास लोगों के कमरों में काफी सामान रखा रहता है जिसे ये बच्चे आसानी से चुरा लेते हैं. बाहर इन्हें ले जाने या भगाने के पूरे इंतजाम होते हैं. पकड़े जाने पर ये सिर्फ यही कहते हैं कि ये तो खाना खाने के लिए शादी में आ गए थे. ये बच्चे कभी भी अपने माता-पिता या घर का पता नहीं बताते और इन्हें लेने भी हमेशा इनके मामा, चाची, मौसी या कोई दूसरा रिश्तेदार ही आता है.’

‘सांसियों का यह गिरोह पुश्तैनी तौर पर अपने ही परिवार के बच्चों को अपराध में धकेलता है. ये लोग बहुत छोटी उम्र से ही अपने बच्चों को चोरियां करने का प्रशिक्षण देने लगते हैं’ सांसी समुदाय के बारे में बताते हुए राजगढ़ जिले की पुलिस अधीक्षक रुचि वर्धन मिश्रा कहती हैं, ‘हम लोग इस विषय पर पिछले दो सालों से काम कर रहे हैं और कई कैंप लगवाने के बाद भी आज तक सांसियों को पुनर्वासित नहीं कर पाए हैं. क्योंकि ये लोग अपनी आसान कमाई के रास्ते को नहीं छोड़ना चाहते. एक शादी में की गई चोरी ही इन्हें कई महीनों के लिए भरपूर पैसा दे देती है. मेरे पास दिल्ली, आगरा और मथुरा के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों से भी शिकायत के फोन आते हैं. लेकिन जब माता-पिता ही बच्चों को सुनियोजित चोरियों में धकेल रहे हों तो उन्हें बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है. हमारे पास जिस भी राज्य से फोन आता है, हम संबंधित बाल सुधार गृहों या स्पेशल होम वालों को इस बात के सख्त निर्देश दे देते हैं कि वे किसी भी कीमत पर बच्चों को उनके परिवारएवालों को न सौंपें वर्ना वो बहुत जल्दी किसी दूसरी शादी में चोरी करते नजर आएंगे.’

5. ड्रग पैडलर्स गैंग
नशा बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने का सबसे आसान तरीका रहा है. अपनी तहकीकात के दौरान तहलका की टीम ऐसे दर्जनों बच्चों से मिली जो नशे के लिए चोरी और डकैती से लेकर हत्या तक की कोशिशों को अंजाम दे चुके हैं. हम इस दौरान 17 वर्षीय सौरभ से मिले जो अभी एक नशा मुक्ति केंद्र में है. सौरभ एक आपराधिक गिरोह और नशे के चंगुल में फंसकर पैसे और नशे के लिए हिंसा की हर सीमा लांघ जाता था. 16 वर्षीय शाहबाज नशे में और नशे के लिए अपने और दूसरों के घरों में चोरियां करता था.

दिल्ली के तमाम इलाके ऐसे अपराधियों से पटे पड़े हैं जो पहले तो मुफ्त का नशा मुहैया कराते हैं और फिर मासूम बच्चों को इसकी लत लगवाकर उसी नशे के लिए उनसे अपराध करवाते हैं. एक बार नशे की लत लग जाने के बाद ये बच्चे नशे की खुराक के लिए खुद ही चोरियां करना शुरू कर देते हैं. इसके बाद इनमें से कई बच्चे खुद भी नशा बेचने वाले नेटवर्क में शामिल होकर वही सब करने लग जाते हैं जो उनके साथ किया गया था. सड़कों, चौराहों और स्टेशनों पर रहने वाले बेघर बच्चों के साथ-साथ नशे के व्यवसाय में शामिल आपराधिक गिरोहों ने कई सामान्य परिवारों के स्कूल जाने वाले बच्चों की भी जिंदगियां चौपट की हैं.

राजधानी के किशनगढ़ इलाके में स्थित एक नशा मुक्ति केंद्र में हमारी मुलाकात सौरभ से होती है. सौरभ उन बच्चों में से नहीं है जो गरीबी, भुखमरी और पारिवारिक समस्याओं के चलते नशे के दुश्चक्र में फंस जाते हैं. वह माता-पिता के साथ जहांगीरपुरी के अपने छोटे-से घर में रहता था और रोज स्कूल भी जाता था. लेकिन उसके मोहल्ले में ड्रग्स का धंधा करने वाले अपराधियों ने उसे चोरी, डकैती और हिंसा के दलदल में धकेल दिया. तहलका से बातचीत में वह बताता है, ‘मुझे सबसे पहले नशा मेरे स्कूल के ही लड़कों ने दिया था. पहले हम लोग गुटका और सिगरेट ही लेते थे.

फिर उन्होंने मुझे स्मैक दिया. कुछ ही दिनों में मुझे इतनी आदत हो गई कि मैं सबसे ज्यादा स्मैक लेने लगा. फिर धीरे-धीरे उस गिरोह तक पहुंच गया जो हमारे एरिया में स्मैक बंटवाता था. पहले तो उन्होंने फ्री में दिया बाद में घर से पैसे चोरी करके नशा खरीदना पड़ा. फिर जब घर में सबको पता चल गया तो मैंने घर ही छोड़ दिया और बाहर चोरियां करने लगा.’ वह आगे कहता है, ‘मैं उन्हें चोरियां करके सामान देता और वे मुझे नशा देते. फिर धीरे-धीरे मैंने इंजेक्शन लेना भी शुरू कर दिया. नशे के लिए मैं इतना पागल हो जाता था कि कई बार फ्लाई-ओवर पर गाड़ियों को रोककर उनका सामान चुरा लेता. कई बार मैंने लोगों को फ्लाई-ओवर से नीचे भी फेंका है. मैं नशे के लिए कुछ भी कर सकता था.’

सौरभ की ही तरह मध्यवर्गीय परिवारों के स्कूल जाने वाले विनय और योगेंद्र  भी अपने मोहल्लों में मौजूद स्थानीय गिरोहों के संपर्क में आकर चोरियां और मारपीट करने लगे थे. ‘मैं सुबह उठता था और नशा ढ़ूंढ़ने लगता था. अगर स्मैक या सुई नहीं होती तो कहीं से भी पैसे का जुगाड़ करके अपने गिरोह के लड़कों के पास जाता और खरीदता. मुझे हर रोज़ 400-400 रुपये की तीन खुराकें चाहिए होती थीं. यानी एक दिन में कुल 1200 रुपये का नशा. हमारे मोहल्ले में लड़कों का एक गिरोह था जो नशा करता और बेचता भी था. शुरू में उन्होंने मुझे मुफ्त में नशा दिया फिर बाद में मुझसे अपने फायदे के लिए चोरियां करवाने लगे. इसके बाद मैंने उनका साथ छोड़ दिया और खुद ही चोरी करके नशा खरीदने लगा. मैंने नशे के लिए अपने घर का गैस का सिलेंडर तक बेच दिया था जिसके बाद मेरे घरवालों ने मुझे घर से निकाल दिया. मैं सड़क पर रहकर ही चोरियां करता और नशा खरीदता.’

मुफ्त में नशा बांटकर छोटे बच्चों को अपने आपराधिक गिरोहों में शामिल करने वाले अपराधी गिरोहों के लिए सड़कों पर रहने वाले बेघर बच्चों को अपना निशाना बनाना बेहद आसान होता है. राजधानी के चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन के पीछे हमारी मुलाकात नशे के इस गोरखधंधे में फंसे लगभग दर्जन भर बच्चों से होती है. चांदनी चौक के मुख्य बाजारों की सड़कों पर रहने वाले ये बच्चे तहलका को नशे के इस व्यापार की बारीकियां तफसील से बताते हैं. 15 वर्षीय असलम पिछले चार साल से लगातार नशा करने की वजह से 12 साल के एक कमजोर और कुपोषित बच्चे की तरह दिखाई देता है. अपनी नशे की आदतों और इलाके में नशे के व्यवसाय के बारे में बताते हुए कहता है, ‘मैं एक दिन में लगभग 20 फ्लूइड पी जाता हूं. यहां पर रहने वाले सारे बच्चे नशा करते हैं, लड़के-लड़कियां सब. नशा हमें सड़कों पर ही रहने वाले बड़े लड़कों ने दिया था. पहले तो ऐसे ही, बिना पैसे के दे देते थे. फिर हमें नशे के लिए चोरियां करनी पड़ती थी. कभी-कभी हम पुराना सामान बेच कर भी पैसे इकठ्ठा करते और फिर अपने यहां के गैंग वाले लड़कों से नशा मांगते. यमुना मार्केट के पेटी बाजार से, निजामुद्दीन की दरगाह से और लाल किले के पीछे वाले मीना बाज़ार से भी आसानी से नशा मिल जाता है. वहां लड़के होते हैं हमारी पहचान के.’

नशे की लत लगवाकर बच्चों को अपराध में घसीट रहे इन आपराधिक गिरोहों और नशे की लत से जूझ रहे बच्चों के साथ लंबे समय से काम कर रहे सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस के निदेशक डॉ राजेश कुमार इन गिरोहों को सरकारी व्यवस्था के पूरी तरह असफल होने का नतीजा बताते हुए कहते हैं, ‘अगर 14 साल से कम उम्र के इतने सारे बच्चे सड़कों पर नशा कर रहे हैं तो इससे साफ समझ में आता है कि हमारा शिक्षा के अधिकार से जुड़ा कानून कितनी बुरी तरह असफल है. हम इतनी कोशिश करते हैं, लेकिन स्कूल इन बच्चों को लेना ही नहीं चाहते. कोई सड़कों पर नशे में धुत बच्चों के लिए कुछ नहीं करना चाहता और देखते ही देखते वे कब बड़े अपराधी बन जाते हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता. जब तक हम उन्हें मुख्यधारा से नहीं जोड़ेंगे तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा. और कोई भी उन्हें मुख्यधारा में नहीं देखना चाहता. प्रशासन, पुलिस और सरकार सबको यही अच्छा लगता है कि सड़क के बच्चे सड़कों पर ही रहें.’

‘अगर हम अपराध की दुनिया का हिस्सा बन चुके बच्चों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो इन गिरोहों के अस्तित्व को स्वीकारने से ही हमें शुरुआत करनी होगीदिल्ली की बाल कल्याण समिति के पूर्व अध्यक्ष राज मंगल प्रसाद का मानना है कि अगर हम अपराध की दुनिया का हिस्सा बन चुके या बनने जा रहे बच्चों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो किशोरों के इन गिरोहों के अस्तित्व को स्वीकारने से ही हमें शुरुआत करनी होगी. वे कहते हैं, ‘दिक्कत यह है कि पुलिस यह मानती ही नहीं कि वयस्क अपराधी बच्चों को बहला-फुसला कर उन्हें अपराध की दुनिया में धकेल रहे हैं . इस प्रक्रिया में बच्चों के कुछ नए गिरोह पनप रहे हैं और राजधानी में सक्रिय हैं. अपने कार्यकाल के दौरान मुझे तो यहां तक पता चला कि खुद माता-पिता भी अपने बच्चों को चोरी-डकैती जैसे अपराधों में धकेल रहे हैं. अपराध के दंगल में फंस रहे इन सैकड़ों बच्चों के जीवन को बचाने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले पुलिस इन्हें सड़क पर घूम रहे बच्चों के बजाय आपराधिक गिरोहों में फंसे बच्चों के तौर पर स्वीकार करे और इनका जीवन बर्बाद कर रहे वयस्कों को पकड़े.’

किशोरों के लिए बनाई गई दिल्ली पुलिस की विशेष इकाई का लंबे समय तक नेतृत्व करने वाले राजधानी के वर्तमान विशेष आयुक्त सुधीर यादव से बात करने पर राज मंगल प्रसाद की बात सही लगने लगती है. वे बच्चों के ऐसे आपराधिक गिरोहों के संगठित अस्तित्व को नकारते हुए से कहते हैं, ‘यह बात सही है कि बच्चों के ऐसे कुछ गिरोह सक्रिय हैं, लेकिन इस अवस्था में उन्हें संगठित नहीं कहा जा सकता. इनकी गतिविधियां छिटपुट और बिखरी हुई हैं.  क्षेत्र में पहले से सक्रिय वयस्क अपराधी इन बच्चों को सिर्फ अपने प्यादों की तरह इस्तेमाल करते हैं. उन्हें भी यह मालूम होता है कि अगर ये बच्चे पकड़े भी गए तो भी किशोर न्याय अधिनियम की वजह से आसानी से छूट जाएंगे. इसलिए वयस्क गिरोह और कई मामलों में तो माता-पिता भी बच्चों को अपराधों में धकेल देते हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बच्चों के इस बढ़ते अपराधीकरण को संज्ञान में लेते हुए निर्देश जारी किए थे और हमने भी इस दिशा में प्रयास करना शुरू कर दिया है. हम ‘युवा’ नामक योजना के तहत ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में फंसे बच्चों को बचाने और उनके पुनर्वास के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं.’

दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग के सहायक निदेशक पी खाखा कहते हैं, ‘यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद भी पुलिस इस मामले में गंभीर नहीं है और ऐसे मामलों की गहन पड़ताल कर बच्चों को अपराध में धकेल रहे वयस्क अपराधियों की धर-पकड़ पर ध्यान नहीं दे रही है. जब तक हम बच्चों के खो जाने की स्थिति में उन्हें शुरुआती 24 घंटे में ही बरामद कर सुरक्षित होम में नहीं डालेंगे, दूसरे राज्यों से आने वाले बच्चों का सही-सही आंकड़ा इकठ्ठा कर प्रतिकूल परिस्थितियों में फंसे बच्चों का पुर्नवास नहीं करेंगे तब तक शहरों में पहले से मौजूद अपराधी उन्हें ऐसे ही अपना निशाना बनाते रहेंगे और इस तरह खुद हिंसा और शोषण के शिकार इन बच्चों के नए आपराधिक गिरोह पनपते रहेंगे.’

(सभी बच्चों के नाम बदल दिए गए हैं)   

दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम विवाद

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क्या है चार वर्षीय ग्रैजुएशन पाठ्यक्रम?
दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तावित चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को उसकी अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद से हरी झंडी मिल जाने के बाद जुलाई से शुरू हो रहे नए सत्र में इसके लागू होने का रास्ता लगभग साफ हो गया है. इस योजना के लागू होने के बाद डीयू में स्नातक पाठ्यक्रम चार वर्ष का हो जाएगा. विश्वविद्यालय ने इस चार वर्षीय पाठ्यक्रम को कई हिस्सों में बांटा है.  इस चार वर्षीय कोर्स में दो साल की पढ़ाई करने पर डिप्लोमा, तीन साल की पढ़ाई पर बैचलर डिग्री और चार साल पूरे करने पर बैचलर विद ऑनर्स की डिग्री दी जाएगी. जो छात्र चार वर्षीय पाठ्यक्रम के तहत स्नातक करेंगे, उन्हें परास्तनातक की डिग्री सिर्फ एक वर्ष में मिल जाएगी.

नए पाठ्यक्रम को लेकर मुख्य आपत्तियां क्या हैं? 
डीयू के इस फैसले से शिक्षकों के समूह और विद्यार्थियों के एक बड़े तबके में नराजगी है. विरोधियों की प्रमुख आपत्ति फाउंडेशन कोर्सों को लेकर है. नए प्रावधान के तहत गणितीय क्षमता, विज्ञान तथा मानविकी समेत दर्जन भर ऐसे पाठ्यक्रम हैं जिन्हें विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले हर विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से पढ़ना होगा. दृष्टिहीन छात्रों को इससे सबसे अधिक आपत्ति थी. इन छात्रों को आठवीं या दसवीं के बाद से ही गणित और विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ने से छूट दी जाती है. इसकी वजह से दृष्टिहीन छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. इसके अलावा अधिकांश अभिभावक अपने ऊपर बढ़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर भी नाखुश हैं. लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू इस व्यवस्था के पक्ष में हैं.

दृष्टिहीन छात्रों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?
दृष्टिहीन छात्रों की ओर से दायर की गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लिखित सुझाव मांगा है. इसके अलावा शीर्ष कोर्ट ने उन्हें विश्वविद्यालय की समिति के समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज करवाने की छूट भी दे दी है. इस सबके बीच केंद्र सरकार ने यह कहकर इस विवाद से पल्ला झाड़ लिया कि वह बीच में नहीं आएगी क्योंकि डीयू एक स्वायत्त संस्थान है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दृष्टिहीन छात्रों को राहत जरूर मिली है.
-प्रदीप सती

सबै भूमि ‘सरकार’ की

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के मकान भी एकरंग रेवेरा टाउन में हैं.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के मकान भी एकरंग रेवेरा टाउन में हैं.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के मकान भी एकरंग रेवेरा टाउन में हैं.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के मकान भी एकरंग रेवेरा टाउन में हैं.

आपने जिंदगी भर हाड़तोड़ मेहनत करके एक मकान बनाने के लिए पूंजी जमा की है. जाहिर है आप इस पैसे से मकान खरीदने में काफी सावधानी बरतेंगे. निजी बिल्डरों से यदि आप मकान खरीद रहे हैं और वह कुछ गड़बड़ करता है तो आप अपने हक और गड़बड़ी के विरुद्ध हर स्तर तक लड़ने को तैयार रहेंगे. पर यही काम कम कीमत पर मकान उपलब्ध कराने वाली सरकारी संस्थाएं करने लगें तो आप क्या करेंगे? और खास तौर पर जब आम लोगों के हिस्से के मकान मुख्यमंत्री और उनकी राजनीतिक बिरादरी को परोस दिए जाएं तो आप कहां जाएंगे?

मध्य प्रदेश में पिछले कई सालों से ऐसा ही चल रहा है. यहां सरकारी संस्था मध्य प्रदेश गृहनिर्माण मंडल आम आदमी के बजाय राजनीतिक रसूखदारों के लिए माटी मोल जमीन तो बांट ही रहा है, औने-पौने भाव में आलीशान बंगले भी बना रहा है. 1972 में बनी इस सरकारी संस्था का पहला मकसद ही यही था कि संस्था आम लोगों को कम कीमत पर आवास उपलब्ध कराएगी. लेकिन बीते सालों में इसके काम-काज पर नजर डालें तो पता चलता है कि क्या सत्ता पक्ष, क्या विपक्ष, दोनों तरफ से लोगों ने मंडल की योजनाओं से भरपूर फायदा उठाया है. इनमें खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, आवास मंत्री नरोत्तम मिश्र, गृहनिर्माण मंडल के अध्यक्ष रामपाल सिंह राजपूत और विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी जैसे कई नेता शामिल हैं.

कोई तीन साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजधानी भोपाल की बैरसिया रोड पर बने हाउसिंग पार्क का शिलान्यास करते हुए घोषणा की थी कि महंगाई के इस जमाने में वे गरीबों के लिए उचित मूल्य के घर बनाएंगे. किंतु भोपाल की ही रिवेरा टाउन जैसी विशेष कॉलोनियां उनकी अपनी ही घोषणा को पलीता लगाती दिख रही हैं. यदि हमें ऐसी कॉलोनियों के पीछे छिपे राजनेताओं के गोरखधंधे को समझना है तो इसकी बुनियाद में जाना पड़ेगा. गौर करने लायक बात यह है कि मध्य प्रदेश में सभी विधायकों और सांसदों को सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले भूखंडों और मकानों में 20 प्रतिशत का आरक्षण पहले ही मिला हुआ है. उन्हें सरकारी आवास भी मिलता है. इसके बावजूद राज्य की भाजपा सरकार आम आदमी के नुमाइंदों के लिए अलग से और जगह-जगह कई लंबी-चौड़ी कॉलोनियां और गगनचुंबी इमारतें बनवा रही है. इसी कड़ी में उसने राजधानी भोपाल के बीचोबीच और शहर के पॉश इलाके न्यू मार्केट के पास 14 एकड़ की रिवेरा टाउन कॉलोनी में 146 बंगले बनवाए हैं. रिवेरा टाउन 2003 में मध्य प्रदेश गृहनिर्माण मंडल की बनी ऐसी कॉलोनी है जिसकी शुरुआत सरकारी कर्मचारियों और आम आदमियों को मकान देने से हुई थी. लेकिन 2006 में राज्य की शिवराज सरकार ने इसके दूसरे हिस्से को सिर्फ विधायकों और सांसदों के लिए तैयार करवाया. साथ ही उसने इसे गृहनिर्माण मंडल के सभी कायदे-कानूनों से अलग रखते हुए कई तरह की छूट भी ले लीं.

लेकिन प्रदेश की राजनीतिक बिरादरी की भूख यहीं शांत होती तो क्या बात थी. इन दिनों राजधानी भोपाल के दूसरे पॉश इलाके महाराणा प्रताप नगर से सटे रचना नगर में भी राज्य के ही विधायक और सांसदों के लिए गृहनिर्माण मंडल और एक ग्यारह मंजिला इमारत बना रहा है. एक तरह से यह कॉलोनियां बना-बनाकर मनमर्जी की जगह और मनमर्जी की कीमतों पर आवास हथियाने का खेल है. विडंबना यह है कि इस खेल में कोई विरोधी टीम भी नहीं है. विधानसभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और उनकी मित्र मंडली भी इसी खेल का हिस्सा है. (देखें बॉक्स)

दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट का साफ आदेश है कि सरकार किसी भी सरकारी योजना में भूखंड और मकान पाने के लिए 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दे सकती. मध्य प्रदेश में विभिन्न वर्गों (अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा, विकलांग आदि) के लिए 50 प्रतिशत का आरक्षण पहले से ही था. बावजूद इसके मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है जहां सरकार ने आरक्षण की सीमा बढ़ाते हुए विधायकों और सांसदों को 20 प्रतिशत आरक्षण दिया है. यानी आरक्षण की सीमा 70 प्रतिशत तक बढ़ना जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है वहीं इतना अधिक आरक्षण देने से सामान्य लोगों के पास सरकारी लाभ उठाने का मौका घटकर एक तिहाई से भी कम रह गया है.

रिवेरा टाउन का दूसरा बड़ा गड़बड़झाला यह है कि एक ही कॉलोनी में विधायकों और सांसदों को दिए जाने वाले मकानों की कीमत सरकारी कर्मचारियों और सामान्य लोगों को दिए गए मकानों की कीमत से कई गुना कम रखी गई है. यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और राज्य की सियासी मंडली को महज 28 लाख रु. में मकान बांटे गए. इनमें से ऐसों को भी मकान बांटे गए जिनके पास पहले ही एक से लेकर पांच-पांच मकान और अकूत संपत्ति है. वहीं सरकारी कर्मचारियों के लिए इन मकानों की कीमत 90 लाख रु. से एक करोड़ 20 लाख रु. तक रखी गई. सवाल है कि इस कीमत का मकान किस स्तर का सरकारी कर्मचारी खरीद सकता है. राज्य के एक प्रमुख सचिव का वेतन भी इतना नहीं होता कि वह एक करोड़ रुपये से अधिक का लोन ले सके. सवाल यह भी है कि जब गृहनिर्माण मंडल सरकार की ही संस्था है और यह गरीबों को आवास देने के नाम पर सस्ते दाम पर सरकार से जमीन खरीदता है तो कैसे सत्ता के शीर्ष पर बैठे चंद लोगों को सस्ती और सामान्य लोगों को उससे कई गुना महंगी जमीन बेच सकता है.

रिवेरा 36 आवंटी वेलफेयर सोसाइटी उन लोगों को संगठन है जिन्हें रिवेरा टाउन में लॉटरी के जरिए एक तयशुदा कीमत पर मकान आवंटित हुआ था लेकिन स्वामित्व के लिए सोसाइटी अधिक कीमत मांग रही है. इसके अध्यक्ष जयंत यादव के मुताबिक, ‘ऐसा संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. जिस तरह मंडल ने सरकार से रियायती दर पर जमीन का लाभ लिया और विधायक व सांसदों को दिया है, उसी तरह यह लाभ सरकारी कर्मचारियों और आम जनता को पाने का हक है.’ सोसाइटी के तीन अलग-अलग समूहों ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ इसी साल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका लगाई है.

filesइस तरह की ज्यादती रिवेरा टाउन के सामान्य लोगों के साथ ही नहीं हुई. मध्य प्रदेश में 30 कॉलोनियां हैं जिनमें गृहनिर्माण मंडल ने भूखंड की रजिस्ट्री के समय बताई गई मकान की कीमत आखिरी मूल्य निर्धारण से कई गुना बढ़ाई है. इस ज्यादती के खिलाफ कई लोग अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं और यही वजह है कि मंडल को अपनी आमदनी का एक तिहाई हिस्सा अदालती केसों और वकीलों पर खर्च करना पड़ रहा है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के वकील हेमंत श्रीवास्तव के मुताबिक, ‘यही काम यदि किसी बिल्डर ने किया होता तो वह जेल में होता. लेकिन सरकार में होने से कई अधिकारी बचे हुए हैं.’

जब तहलका ने रिवेरा टाउन के मामले में सरकार से जवाब जानना चाहा तो सभी से परस्पर विरोधी और गोलमोल बातें सुनने को मिलीं. गृहनिर्माण मंडल के आयुक्त मुकेश गुप्ता ने इस मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि केस हाई कोर्ट में है और इसलिए उनका कुछ बोलना ठीक नहीं. वहीं आवास विभाग के प्रमुख सचिव इकबाल सिंह बैंस का कहना था कि यह योजना गृहनिर्माण मंडल की है ही नहीं. उनके मुताबिक, ‘विधानसभा कमेटी के निर्देश पर मंडल ने यह कॉलोनी विधायक और सांसदों के लिए बनाई थी.’ लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या ऐसा कोई प्रस्ताव विधानसभा की कमेटी ने पास किया था तो उन्होंने कहा कि उनके पास विधानसभा कमेटी की बैठक के मिनिट्स (बिंदुवार चर्चा) ही हैं. इस बारे में मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के सचिव एसके मिश्र ने बताया कि विधानसभा को इतनी छूट है कि वह किसी भी सरकारी नियम के ऊपर अपना आदेश जारी कर सकता है. बकौल मिश्र, ‘मुझे नहीं लगता कि एक विशेष वर्ग के लिए रिवेरा टाउन कॉलोनी जैसा बड़ा प्रस्ताव विधानसभा कैबिनेट की मंजूरी के बिना संभव है.’ मगर जब उनसे कैबिनेट के इस निर्णय की लिखित जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है. बाद में मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश श्रीवास्तव ने आश्वासन दिया कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव कैबिनेट ने पास किया है तो वे इसकी एक कॉपी तहलका को उपलब्ध कराएंगे. किंतु एक हफ्ते की खोजबीन के बाद उन्हें भी विधानसभा से ऐसा कोई कागज नहीं मिला.

गृहनिर्माण मंडल की उद्देशिका में साफ लिखा है कि इसका उद्देश्य राज्य के आवासहीनों को आवास मुहैया कराना है. जबकि उसने रिवेरा टाउन में विधानसभा के निर्देश पर राजनेताओं के लिए जो कॉलोनी बनाई है उसमें लगभग सभी के पास एक से अधिक आवास हैं. मंडल की उद्देशिका में कहीं नहीं लिखा कि उसका काम मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, विधायक और सांसद के लिए विशेष कॉलोनियां बनाना भी है. इस बारे में मंडल के अध्यक्ष रामपाल सिंह राजपूत का कहना है, ‘व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए हमने नियमों में कई फेरबदल किए हैं. रिवेरा को इन्हीं नियमों के तहत बनाया गया है.’

[box]तहलका ने जब रिवेरा टाउन के निर्माण से जुड़े फैसले का कथित दस्तावेज जनसंपर्क विभाग से मांगा तो हमें एक हफ्ते के बाद भी उसकी कोई प्रति नहीं दी गई[/box]

रिवेरा कॉलोनी प्रदेश में अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है जहां रसूखदार नेताओं ने आरक्षण के तहत मिलने वाले मकानों को भी हथियाने के लिए मनमुताबिक नियमों को बदलवाया हो. 2011 में भी ऐसा मामला सामने आया था जिसमें इन माननीयों ने एक से अधिक मकान होने पर भी आरक्षण के नियमों को ताक पर रखा और भोपाल के महादेव और कीलनदेवी अपार्टमेंट में सरकारी आवास हथियाए थे. इस सूची में भाजपा सांसद सुमित्रा महाजन, राज्यसभा सांसद अनुसुईया उईके और विधायक अरविंद भदौरिया के नाम हैं. वहीं कांग्रेस विधायक सुनील जायसवाल और एनपी प्रजापति ने भी मकान होने के बावजूद आवास लिए. इस पर कांग्रेस विधायक एनपी प्रजापति ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे के अंदाज में हमसे बात करते हुए कहा, ‘आजकल पत्रकारों के लिए राजनेता सबसे आसान निशाना हो गए हैं. क्या किसी पत्रकार ने कभी अन्य आरक्षित वर्गों को मिलने वाले मकानों से जुड़ी अनियमितताओं की पड़ताल की है?’

वहीं दिल्ली से कांग्रेस के सांसद संदीप दीक्षित ने भी सांसद कोटे से भोपाल के ग्रीन मैडोस कॉलोनी में सात साल पहले एक बंगला लिया था. नियम के मुताबिक केवल मध्य प्रदेश के विधायक या सांसद को ही मध्य प्रदेश गृहनिर्माण मंडल की कॉलोनी में कोटे से आवास मिल सकता है. लेकिन दीक्षित की दलील है, ‘विधायक प्रदेश का हो सकता है लेकिन सांसद तो पूरे देश का होता है.’ आखिर में सरकार, नेताओं और प्रशासन के स्पष्टीकरण के बाद हम घूम-फिरकर फिर उसी सवाल पर पहुंचते हैं कि जब आम लोगों के कोटे के मकान माननीयों के हिस्से में आने लगेंगे तो उनकी सुनवाई कहां होगी.

चरखे से चर-खा तक

इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

राजनीति में कई लोग इन्हें दिग्गज मानते हैं, मगर मेरे लिए वे मात्र गज हैं. नापने वाला नहीं चरने वाला गज. उन्हें अपनी तरफ देखते हुए मैंने एक सवाल फेंका, ‘आखिर कितना खाएंगे?’ वे मुस्कुराए. बोले, ‘यह सवाल ही अप्रासंगिक है. जिसका जो काम है, वो तो करेगा ही. यह तुम जैसों की अज्ञानता है कि इसे स्वाभाविक नहीं मानते. और जब अस्वाभाविक लगेगा, तो हो-हल्ला मचाओगे ही.’

‘तो आपका दिन-रात चरते रहना अस्वाभाविक नहीं है? आपके चरने की कोई सीमा है कि नहीं!’ ‘चरना! खाने से तुम चरने पर आ गए! बहुत खूब! यह शब्द मुझे व्यक्तिगत रूप से भी पसंद है. देखो तो सृष्टि में मानव की उत्पत्ति ही चरने के लिए हुई है. श्रेष्ठ मानव वही है, जो भी मिले उसे झट कचर-कचर चर जाए.’ यह कहते हुए उन्होंने कचौड़ी की दुकान की तरफ देखा. ‘अब ऐसा भी क्या चरना कि हाजमे के साथ पूरा सिस्टम ही चरमरा जाए!’ ‘तुम्हारे अंदर अज्ञानता का सिंधु जान पड़ता है! चलो, आज तुम्हारी अज्ञानता दूर करता हूं.’ ‘लगता है चर चुके हैं… आज का कोटा पूरा हो गया!’ वे ठठाकर हंसे. ‘ठीक पकड़ा, अभी चर के ही आ रहा हूं. सृष्टि इसलिए ही है कि चरा जाए. वरना चराचर जगत नहीं कहा जाता. चराचर मतलब चरा कर… चर… चर… पगले! पूरे जगत को चर.’

‘अपने खेत को छोड़कर दूसरों की फसल चर जाना क्या अत्याचार नहीं है? इसे क्या कहेंगे आप?’ ‘इसे भी तुम्हारी अज्ञानता कहूंगा. थलचर, जलचर, नभचर, उभयचर, निशाचर… इनके बाद में यह चर क्यों लगा है! कहने का मतलब है कि जो जहां हो वहीं चरे.’ उनके चर… चर… से मेरा भेजा पंच्चर हो गया. मन में आया कि उन्हें सनीचर! से संबोधित करूं. इस बीच वे कुछ सोचने लगे. ‘क्या सोच रहे हैं? क्या कभी चरते वक्त या चरने से पहले सोचा है आपने? कभी आप और आपके सहचर-अनुचर बंधुओं ने सोचा है कि इस देश को आप सबने चरखा से चर-खा तक पहुंचा दिया है!’ वे बोले, ‘चरने के लिए क्या सोचना! चरो! कचर-कचर! पचर-पचर! जो लचर होते है, वे ही चर नहीं पाते, उनके घर में फर्नीचर तक नहीं होता और वे ही तुम्हारे चरखे वाले देश में फटीचर कहलाते हैं.’ मुझे लगा कि ‘चर’ को लेकर मैं जीत नहीं पाऊंगा. मुझे ‘चर’ छोड़कर ‘खाना’ पर भी आना होगा.

‘आप सब कुछ खाते है!’ मैं उन्हें बाड़े में लाने के लिए कुछ नए सवाल सोचने लगा. वे बोले, ‘अबोध हो. भारतीय राजनीति का इतिहास देखो. अगर इतिहास नहीं तो वर्तमान देखो. सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे.’
‘आपकी भूख असीमित क्यों है? जीने के लिए खाइए न! मगर आप इतना खाते हैं कि विदेशी बैंकों तक में आपके खाते हैं!’ ‘देखो मंगलग्रह के प्राणी! आमजन जीने के लिए खाता है, मगर हम जीतने के लिए खाते हैं. हमें चुनाव जीतना होता है इसलिए जो मिल जाता है, खाते हैं. बिना खाए, बिना खिलाए चुनाव नहीं जीते जाते. हमारा खाना प्राकृतिक है… वोट मांगा तो कसमें खाईं, जब भाषण दिया, तो भेजा खाया, कुर्सी मिली तो शपथ खाई, कुर्सी पर बैठे तो घूस खाई, कुर्सी से उतरे तो फिर सिर खाने आ गए…

तुम बस यह समझ लो कि हमारा खाने से रिश्ता कुछ ऐसा है जैसे कि सरकारी विभाग का एप्लीकेशन से और चापलूसी का प्रमोशन से.’ मैं मुंह की खा चुका था. अब उनसे शास्त्रार्थ करने की शक्ति शेष नहीं थी. मैंने अपनी बची-खुची शक्तियों को समेटा और पूछा, ‘भगवान के लिए आप यह बताइए, आप क्या नहीं खाते?’ ‘तरस’, यह कहकर वे पान चबाते आगे बढ़ लिए और मैं अपने साथ-साथ भारतीय वोटरों पर तरस खाने लगा.

-अनूप मणि त्रिपाठी

गोडसेवादी गांधी

पीलीभीत शहर एक दौर में ‘बांसुरी नगरी’ के नाम से भी जाना जाता था. एक अनुमान के अनुसार देश में बनने वाली कुल बांसुरियों का लगभग 95 प्रतिशत निर्माण इसी शहर में हुआ करता था. इस उपलब्धि के बावजूद पीलीभीत को कभी राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास पहचान नहीं मिली. रोनू मजूमदार और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गज भी पीलीभीत की बनी बांसुरी बजाते रहे लेकिन इस शहर का नाम हमेशा गुमनाम ही रहा. यह शहर चर्चा में तब आया जब 2009 में वरुण गांधी यहां से चुनाव लड़ने पहुंचे. भड़काऊ भाषण देकर उन्होंने यहां नफरत की ऐसी बांसुरी बजाई कि उसकी बेसुरी गूंज ने एक ही दिन में पीलीभीत को देश भर में चर्चा का केंद्र बना दिया.

2009 के लोकसभा चुनाव में वरुण गांधी ने अपने भाषणों से पीलीभीत के पूरे माहौल को सांप्रदायिक रंग दे दिया था. इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में उनकी पार्टी भाजपा ने भी अपना हरसंभव समर्थन दिया था. भड़काऊ भाषणों के आरोप में वरुण गांधी पर दो मुकदमे दर्ज किए गए थे. इन मुकदमों के चलते वरुण 28 मार्च, 2009 को पीलीभीत कोर्ट में आत्मसमर्पण करने पहुंचे. उस दिन सुबह से ही पीलीभीत कोर्ट के बाहर लोग हाथों में भगवा झंडे और त्रिशूल लिए पहुंचने लगे थे. वरुण गांधी के कोर्ट पहुंचने तक यहां हजारों लोग इक्ट्ठा हो गए. भाजपा के स्टार प्रचारक और 2009  में प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी की उस दिन उत्तर प्रदेश में दो-दो जनसभाएं थीं. इसके बावजूद भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी कलराज मिश्र, आडवाणी की सभाओं में जाने के बजाय वरुण गांधी के साथ पीलीभीत पहुंचे. आत्मसमर्पण के दौरान वरुण गांधी के समर्थक हिंसा पर उतर आए. कई गाडि़यों को तोड़ दिया गया, भवनों की दीवारें गिरा दी गईं और ईंट-पत्थरों की ऐसी बरसात हुई कि कई पुलिसकर्मी एवं अन्य लोग घायल हो गए.

राजनीतिक फायदे के लिए आत्मसमर्पण का यह खेल कैसे सुनियोजित तरीके से खेला गया था इसका जिक्र हम ‘हत्याग्रही गांधी!’ में भी कर चुके हैं. स्वयं पीलीभीत के भाजपा उपाध्यक्ष और वरुण गांधी के बेहद करीबी परमेश्वरी गंगवार ने तहलका के स्टिंग में बताया था कि वरुण के आत्मसमर्पण वाले दिन उन्हें ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के आदेश दिए गए थे. इसके अलावा कोर्ट द्वारा उन्हें गिरफ्तार करने से इनकार करने पर एक हलफनामा दायर करके वरुण ने अपनी गिरफ्तारी सुनिश्चित कराई ताकि इससे उपजी सहानुभूति और भड़की भावनाओं का वे आगामी चुनाव में फायदा उठा सकें. आत्मसमर्पण के दिन हुए उपद्रव के आरोप में वरुण गांधी पर कई गंभीर आपराधिक धाराओं के अंतर्गत एक और मुकदमा दर्ज किया गया था.

भड़काऊ भाषण के दोनों मुकदमों की तरह वरुण गांधी बीती तीन मई को आत्मसमर्पण वाले मामले में भी बरी हो गए. हमने पिछले अंक में उन तमाम बातों का खुलासा किया था जिनके चलते वरुण गांधी को पीलीभीत के बरखेड़ा कस्बे और डालचंद मोहल्ले में दिए भड़काऊ भाषण के आरोपों से मुक्त कर दिया गया. तहलका की तहकीकात में सामने आया था कि कैसे पुलिस ने इन मामलों में जांच के नाम पर कुछ भी वैसा नहीं किया जैसा होना चाहिए था, कैसे गवाहों को पैसों के दम पर या डरा-धमका कर पक्षद्रोही बना दिया गया, कैसे अभियोजन पक्ष ने ही वरुण को बचाने के लिए हर मर्यादा का उल्लंघन किया, कैसे उत्तर प्रदेश के एक मंत्री को गवाहों के बयान बदलवाने का जिम्मा सौंपा गया, कैसे न्यायपालिका में न्याय का मखौल उड़ाया गया और कैसे एक प्रकार से पीलीभीत जिले का समूचा प्रशासन ही वरुण को बचाने में लगा रहा. इन सबके चलते भड़काऊ भाषण के मुकदमों के सारे गवाह अपने बयानों से मुकर गए.

आत्मसमर्पण के दिन हुए उपद्रव वाले मामले का फैसला आने तक हमारी पिछले अंक की रिपोर्ट लिखी जा चुकी थी. बाद में तहलका को मिले अदालती दस्तावेज बताते हैं कि इस मामले में भी बाकी दोनों मामलों की तरह ही पैतरे अपनाकर वरुण को दोषमुक्त किया गया. बल्कि इस बार तो गड़बड़ियों का स्तर और भी ऊंचा नजर आता है. वरुण गांधी के खिलाफ सबसे ज्यादा गवाह – 39 – इसी मामले में थे और सभी कोर्ट में अपने बयानों से पलट गए. संबंधित दस्तावेजों से यह साफ हो जाता है कि कैसे इस केस के दौरान भी पीलीभीत में कानून का तराजू एकतरफा वरुण की तरफ झुका हुआ था.

28 मार्च, 2009 को दर्ज हुए इस मामले में वरुण गांधी सहित कुल 13 लोगों को आरोपित बनाया गया था. लेकिन आश्चर्य की बात है कि वरुण का मामला बाकी आरोपितों से अलग करके सिर्फ उन्हीं को दोषमुक्त किया गया है. अन्य आरोपितों पर अभी मुकदमा चलाया जाना है. कानून के जानकार बताते हैं कि ऐसा सिर्फ तभी किया जाता है जब अन्य आरोपित फरार हों और कई प्रयत्नों के बाद भी कोर्ट में उपस्थित न हो रहे हों. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता कामिनी जायसवाल बताती हैं, ‘यदि अन्य आरोपित कोर्ट में पेश न हो रहे हों तो उनके खिलाफ वारंट जारी किए जाते हैं. तब भी यदि आरोपित फरार रहें तो उनकी कुर्की के आदेश दिए जा सकते हैं या फिर उनके जमानतियों को भी नोटिस जारी किए जा सकते हैं. इसके बावजूद जब आरोपित कोर्ट में न आएं तब ही उनके मुकदमे को अन्य आरोपितों से अलग किया जाता है.’

मगर वरुण की दोषमुक्ति के इस तीसरे मामले में कोई भी आरोपित फरार नहीं था. इन 13 आरोपितों में से अधिकतर पीलीभीत के ही रहने वाले हैं और स्थानीय लोगों के अनुसार ये सभी आरोपित वरुण के साथ ही कोर्ट में भी उपस्थित रहते थे. इसलिए वरुण गांधी का मामला अन्य आरोपितों से अलग करने का कोई भी वाजिब कारण नहीं था. लेकिन वरुण गांधी ने कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दाखिल करके अपना मुकदमा अलग किए जाने की प्रार्थना की. इस प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अब्दुल कय्यूम ने वरुण का केस अलग करके इसी साल फरवरी में सत्र न्यायाधीश के पास भेज दिया. वरुण को जिन अन्य दो मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका था उन पर फैसला देने वाले जज भी अब्दुल कय्यूम ही थे. उन्होंने इस मामले को सत्र अदालत में इसलिए भेजा कि आम तौर पर सात साल से ज्यादा की सजा वाले मामलों का ट्रायल वहीं होता है.

कोडनानी-बजरंगी को फांसी पर गुजरात सरकार का यू-टर्न

क्या है सरकार का निर्णय?
2002 में हुए गुजरात दंगों के नरोदा पाटिया मामले में गुजरात की पूर्व मंत्री मायाबेन कोडनानी और बाबू बजरंगी के लिए एक महीने पहले तक फांसी चाहने वाली गुजरात सरकार ने यू-टर्न ले लिया है. उसने इनकी फांसी की मांग को लेकर ऊपरी अदालत में अपील करने संबंधी एसआईटी को दी गई इजाजत रद्द कर दी है. राज्य के विधि विभाग ने मुख्य सरकारी वकील को इस बाबत पत्र लिख कर सूचित किया है. राज्य के वित्त मंत्री नितिन पटेल का कहना है कि इस बाबत आगे कोई भी फैसला महाधिवक्ता की राय लेने के बाद किया जाएगा.

क्या रहा पूरा घटनाक्रम?
गुजरात दंगों के दौरान मोदी सरकार में मंत्री रही माया कोडनानी को विशेष अदालत ने नरोदा पाटिया दंगों के लिए दोषी मानते हुए अगस्त, 2012 में 28 साल कैद की सजा सुनाई थी. दंगों की जांच को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने गुजरात सरकार से  कोडनानी समेत दस दोषियों की सजा बढ़ा कर फांसी की मांग के लिए ऊपरी अदालत में अपील करने की इजाजत मांगी थी. 16 अप्रैल को उसे इसकी इजाजत मिल भी गई. लेकिन अब सरकार इस फैसले से पीछे हट गई है. बताया जा रहा है कि उस पर हिंदूवादी संगठनों का जबरदस्त दबाव था. गौरतलब है कि 27 फरवरी, 2002 को हुए गोधरा कांड के अगले दिन नरोदा पाटिया इलाके में हुई हिंसा में 97 लोग मारे गए थे. अगस्त, 2009 में इस मामले में मुकदमा शुरू हुआ था.

अब क्या करेगी एसआईटी?
अचानक हुए इस घटनाक्रम से एसआईटी अधिकारी असमंजस में हैं. बताते हैं कि एसआईटी ने अपील को लेकर तैयारियां शुरू कर दी थीं, लेकिन अब सरकार के फैसले ने उसे परेशानी में डाल दिया है. सूत्रों के मुताबिक जांच दल के अधिकारी गुजरात सरकार के इस कदम को कानूनी दायरे से बाहर का बता रहे हैं और इसका विरोध करने का मन बना चुके हैं. संभावना है कि गुजरात सरकार के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है.
-प्रदीप सती

दुर्गति न कर दे यह ‘गति’

इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

यह कैसी बयार बह रही है! किस दिशा से बह रही है! वह उतावली है या हम! वह उड़ा रही है हमें या हम स्वयं उड़ रहे हैं! देश का कारवां किस भरोसे बढ़ रहा है! कहां से चले थे, कहां पहुंचे ! न ठहर रहे हैं, न स्वयं को टटोल रहे. बस आगे (!) बढ़ने की धुन, मगर दिशा क्या हो, पता नहीं. पहले चिंता सताए जाती थी कि चुनरी में लगे दाग को छुड़ाया कैसे जाए, फिर होड़ पैदा हुई कि उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे. आगे बढ़े, दाग ढ़ूंढ़ते रह जाओगे, तक पहुंचे. और आगे बढ़े, दाग अच्छे हैं, तक आ पहुंचे. कल को अगर दागपना ही उम्मीदवारी की एकमात्र योग्यता-पात्रता बने तो अचरज कैसा. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, पुराने जमाने की बात हो गई.

(कुछ कहेंगे कि घिसी-पिटी बात हो गई.)

जिस ढंग से हम आगे बढ़ रहे हैं उसमें कथनी-करनी, कार्य-कारण परस्पर समानांतर नजर आते हैं. जो आजीवन स्वदेशी की बात करते रहे, सुना है कि कल वो विदेशी जब्तशुदा दुकान में नजर आए. ऐसा भक्तिपूर्ण माहौल बना कि श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी, मगर दयालु कम हो गए. जो मानवीय नहीं थे, वे माननीय हो गए. रंगदारी वसूलने वाला रंगबाजी में जीने लगा और शरीफ आदमी सिर झुकाए. जिन्हें शिकायत थी कि सामूहिकता-सामाजिकता समाज से रीत रही है उन्हें सामूहिक बलात्कार की घटनाओं ने गलत साबित किया. जहां आंदोलन चलना चाहिए था, वहां बैठक चली. और जहां बैठक होनी चाहिए थी, वहां ताले लटके रहे. जहां हल चलना चाहिए था वहां कारें चल रही हैं. हरित क्रांति के बाद भी कुपोषण को भगा नहीं पाए हम, हां मगर यह जरूर है कि सोना आयातक देशों में पहले नंबर पर आ गए (हथियारों की खरीद में भी).

आम आदमी का नारा लगा, जो राजनीति के घाट उतरे, वे कुबेर बन अंगरक्षकों के घेरे में रहने लगे और आम आदमी के बदन से कपड़ा उतरता गया. देश के भाल पर तिरंगे से ज्यादा राजनीतिक दलों के झंडे दिखने लगे. जिनके हवाले वतन किया, वे हवाला कर बैठे. आने-जाने वाली सरकारें किसान की बात करती रहीं और बिल्डर पनपते रहे. संसद, विधानसभा की शुचिता गिरती गई और हमारे प्रतिनिधियों का जीवन स्तर ऊंचा होता गया. ‘विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र’ का दंभ हम भरते रहे और मानवाधिकारों की कसौटी पर बार-बार फेल होते रहे.

हम आगे बढ़े, विचार कपड़ों में कैद होकर रह गए. हमारा सौंदर्य बोध-संस्कार खूब विकसित हुआ. हमें काली त्वचा से परेशानी हुई, मगर काले धन का दोनों हाथों से स्वागत किया. गरीब को हिकारत से देखा और रिश्वतखोर को इज्जत बख्शी. शुचिता की दुहाई देने वालों के खाते विदेशों में खुल गए. जिनके पास ईमान नहीं था, वे विमान से सैर करने लगे. समाज सेवा करने वालों का परिवार संपन्न हुआ. देश को पिछड़ा कहने वाले खुद विकसित हो गए. ईमानदारों की हालत अनाथों जैसी हो गई. नए घोटाले अपने जन्मते ही बूढ़े होने लगे. इतने वर्षों में तिहाड़ देश की आधुनिक पहचान बन गई (किसी विदेशी को देश घूमना है, तो केवल तिहाड़ जेल घूमना ही सुभीता होगा. कम पैसे में, कम मेहनत से, कम परेशान होकर वह अच्छे से एकबारगी ही पूरा देश जान जाएगा).

जब-जब दंगे-जातिगत उत्पीड़न हुए, तो जिम्मेदारों ने इसे कानून-व्यवस्था से जोड़कर देखा और मानस परिवर्तन, समाज सुधार का जिम्मा एनजीओ से जोड़ दिया. इत्ते दिनों में खादी-खाकी इन दो शब्दों को सुनते ही मुंह का स्वत: बिचकना इस बात का प्रमाण है कि हमारे आगे बढ़ने की रफ्तार बहुत ज्यादा (पढ़ें बेलगाम) है. अब तक की हमारे आगे बढ़ने की दिशा दर्शाती है कि आर्थिक प्रगति को ही सभी दर्दों का बाम समझ हम बमबम हैं. हम कब रुक कर सांस लेंगे कहना मुश्किल है. फिलहाल तो हम बढ़े जा रहे हैं… बढ़े जा रहे हैं…

-अनूप मणि त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश: एक शहर का कहर

रसूखदार और ताकतवर के लिए उत्तर प्रदेश में नियम-कानून कोई मायने नहीं रखते, यह हाल के समय में कई बार दिखा है. इस सिलसिले में नई कड़ी है राज्य की राजधानी लखनऊ में हाईटेक टाउनशिप बनाने में हो रहा गड़बड़झाला. यह टाउनशिप बना रही रियल एस्टेट क्षेत्र की चर्चित कंपनी अंसल एपीआई कई अनियमितताओं को लेकर सवालों के घेरे में है. तहलका की पड़ताल बताती है कि 3,530 एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस विशाल टाउनशिप के बीच में जो भी जमीन आई उस पर अंसल एपीआई का कब्जा हो गया चाहे वह कब्रिस्तान की जमीन रही हो या तालाब-पोखर की. नियमों के अनुसार ऐसी जमीनों को बिल्डर के नाम हस्तांतरित करने का अधिकार सरकार के पास भी नहीं है. फिर भी टाउनशिप के बीच में आने वाले गांवों के तालाब और पोखर पाट कर कहीं गगनचुंबी इमारतें बन रही हैं तो कहीं सड़क और गोल्फ क्लब. कहीं जमीन पर जबरन कब्जा करने के उदाहरण हैं तो कहीं फर्जी रजिस्ट्री करके जमीन हड़पने के. इस सबके चलते टाउनशिप के बीच में आने वाले गांवों के हजारों किसान परेशान हैं. नियम-कानून तोड़ने का यह खेल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, दोनों के कार्यकाल में हुआ है. ये दोनों ही पार्टियां खुद को दलितों, पिछड़ों और किसानों की हितैषी कहती हैं. लेकिन इस मुद्दे पर वे खामोश ही रहीं, जबकि यह गड़बड़ी प्रदेश के किसी दूर-दराज के इलाके में नहीं बल्कि राजधानी लखनऊ में हो रही थी. ठीक उनकी नाक के नीचे.

अंसल हाईटेक टाउनशिप की आड़ में यह भ्रष्टाचार कैसे हुआ यह समझने के लिए करीब 13 साल पीछे जाना पड़ेगा. साल 2000 में उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने सुल्तानपुर रोड पर 2,700 एकड़ जमीन पर आवास बनाने के लिए कई गांवों की जमीन अधिग्रहण करने के लिए नोटिस जारी किया था. इसका मकसद था राजधानी में बढ़ रही जनसंख्या को देखते हुए लोगों को सस्ते व सुलभ आवास मुहैया कराना. आवास विकास परिषद इन गांवों की जमीनों का अधिग्रहण करके अपनी योजना को अमली जामा पहनाती इससे पहले ही इसमें से 1,527 एकड़ जमीन हाईटेक टाउनशिप के नाम पर अंसल एपीआई को दे दी गई. यह 2004 की बात है. तब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. अब आवास विकास परिषद के पास करीब 1200 एकड़ जमीन ही बची थी. इसके बाद उसने अपनी इस योजना से हाथ खींच लिया. 1,200 एकड़ बेशकीमती जमीन कई सालों तक ऐसे ही पड़ी रही. मार्च, 2012 में समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद आवास विकास परिषद को अपनी इस जमीन की याद आई और 26 जनवरी, 2013 को  इस 1,200 एकड़ जमीन पर अवध विहार नाम की एक योजना शुरू कर दी गई.

सवाल उठता है कि आम लोगों को सस्ते एवं सुलभ आवास देने के लिए सन 2000 में जिस जमीन के अधिग्रहण का नोटिस जारी कर दिया गया था वह जमीन सरकार ने निजी बिल्डर को क्यों दे दी. वह भी यह जानते हुए कि आवास विकास परिषद जितनी सस्ती दरों पर आवास उपलब्ध करा सकती है निजी बिल्डर उससे कहीं ज्यादा मूल्य वसूलेगा. सूत्रों की मानें तो सरकार और अंसल एपीआई के बीच तालमेल बैठाने में एक रिटायर आईएएस रमेश यादव की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही. यादव को अंसल एपीआई ने अपने यहां अधिशासी निदेशक (ऑपरेशंस) के पद पर रखा है. सपा सरकार के ही एक करीबी आईएएस बताते हैं कि रमेश यादव सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के काफी करीबी हैं.

[box]‘बिल्डर की यह मनमानी प्रशासन की उदासीनता का नतीजा है. यदि वह नियमों को अमल में लाने का प्रयास करता तो हजारों परिवारों की बदतर स्थिति न होती’[/box]

जिस विक्रमादित्य मार्ग पर सपा का प्रदेश कार्यालय और मुलायम सिंह सहित उनके परिवार के अन्य लोगों की कोठियां हैं, उसी विक्रमादित्य मार्ग पर सपा कार्यालय के सामने रमेश यादव की भी विशाल कोठी है. उक्त आईएएस कहते हैं, ‘रमेश यादव जैसे रिटायर अधिकारियों को बड़े बिल्डर अपने यहां मोटी पगार पर इसीलिए रखते हैं कि सरकार चाहे जिसकी हो, ये अधिकारी सरकार में नीतिगत निर्णय लेने की क्षमता रखने वाले पदों पर बैठे दूसरे अधिकारियों से कंपनी प्रबंधन का काम आसानी से करा लेते हैं. आज जो आईएएस अधिकारी नीतिगत निर्णय लेने वाले पद पर बैठा होगा वह कभी न कभी रिटायर आईएएस अधिकारी के साथ या उसके अंडर में काम जरूर कर चुका होगा, जिसके चलते अपने निजी संबंधों का फायदा उठा कर रमेश यादव जैसे रिटायर आईएएस अधिकारी कंपनी के पक्ष में हर तरह का काम कराने में सक्षम होते हैं.’

अंसल की इस हाईटेक टाउनशिप की शुरुआत भले ही समाजवादी पार्टी के शासनकाल में हुई हो लेकिन इसके विस्तार का क्रम बसपा सरकार में भी लगातार जारी रहा. 2004 में सपा सरकार की ओर से हाईटेक टाउनशिप के लिए 1,527 एकड़ जमीन दी गई थी. मई, 2007 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और सपा की सरकार चली गई. सूबे में बहुजन समाज पार्टी की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी. बसपा सरकार में भी जल्द ही कंपनी की घुसपैठ हो गई और योजना 1,527 एकड़ से बढ़ते हुए धीरे- धीरे 3,530 एकड़ की हो गई. यानी योजना के विस्तार के लिए राजधानी से सटी किसानों की कृषि योग्य बेशकीमती जमीन निजी बिल्डर को देने में खूब दरियादिली दिखाई गई. सूत्र बताते हैं कि अंसल पर सरकार की दरियादिली थी लिहाजा जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भी उसके सभी कामों की ओर से आंखें मूंदे रखीं.

अंसल एपीआई पर सरकारी मेहरबानी के बाद बात उसके कारनामों की. कुछ समय पहले तक राजधानी से निकल रहे हाइवे शहीद पथ के किनारे मकदूमपुर ग्राम सभा के भुसवल गांव का कब्रिस्तान होता था. पिछले साल जैसे ही सपा की सरकार बनी, टाउनशिप के पास बने इस कब्रिस्तान पर अंसल एपीआई का कब्जा हो गया. गांववालों के विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ा. कंपनी ने डेढ़ बीघा (करीब 4,000 वर्ग फुट) कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा करके वहां चौड़ी सड़क बना दी. इतना ही नहीं, कब्रिस्तान के पास ही अस्पताल बनाने का एक बोर्ड भी लगा दिया गया. मौके पर कोई कब्रिस्तान भी था इसके सारे सबूत मिटा दिए गए. बस तीन पक्की कब्र हैं जो अब बची हैं. भारतीय किसान यूनियन के जिला अध्यक्ष हरनाम सिंह कहते हैं, ‘ग्राम सभा के नक्शे पर वह जमीन आज भी कब्रिस्तान के रूप में ही दर्ज हैं.

मकदूमपुर ग्राम सभा के अंतर्गत ही 10 बीघे का एक श्मशान भी है. इस जमीन पर भी अंसल एपीआई की ओर से कब्जे का प्रयास शुरू किया गया. जमीन पर निर्माण कार्य कराने के लिए बिल्डर की ओर से उसे समतल करके मिट्टी डलवाने का काम किया जाने लगा. जब गांववालों को इसकी भनक लगी तो उनका सब्र जवाब दे गया. जिला प्रशासन में सुनवाई न होते देख गांववाले खुद ही लाठी-डंडा लेकर मौके पर डट गए तब कहीं जाकर बिल्डर ने काम रुकवाया. बीती मार्च में बिल्डर की करतूत से तंग आकर आत्महत्या करने वाले दलित किसान नौमी लाल का भी अंतिम संस्कार गांववालों ने इसी जमीन पर किया है.

कब्रिस्तान और श्मशान की जमीन कब्जा करने के बाद बिल्डर का अगला निशाना तालाब व पोखर हैं. गांव मुजफ्फरनगर के किसानों के लिए अपने पशुओं को चराने और पानी पिलाने का एक आसरा गांव के बाहर स्थित करीब चार बीघे का तालाब था. लेकिन अंसल एपीआई ने तालाब का अधिकांश हिस्सा पाट दिया है. इस पूरे तालाब की जमीन में से एक बड़े हिस्से पर तीन बहुमंजिला इमारतें बनाई जा रही हैं. इसी तालाब के एक हिस्से को सड़क बनाने के लिए पाटा जा रहा है और जो भाग बचा हुआ है उसमें गोल्फ क्लब का विस्तार किया जा रहा है. बिल्डर ने अपनी ओर से तालाब का अस्तित्व मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इसके बावजूद एक ओर तालाब का कुछ भाग बचा हुआ है जिसमें पानी होने के कारण बड़ी-बड़ी जलकुंभी उगी हुई हैं. गांव के अजय यादव बताते हैं कि यदि कभी वे अपने जानवरों को पानी पिलाने के लिए तालाब के बचे हिस्से की तरफ ले जाएं तो बिल्डर की ओर से लगाए गए गार्ड भगा देते हैं. उनके मुताबिक गार्ड कहते हैं कि जानवरों को पानी पिलाने की आड़ में गांववाले यहां चोरी करने आते हैं. अजय कहते हैं, ‘आज हम अपने ही गांव के तालाब पर जाते हैं तो चोर कहलाते हैं.’ पोखर-तालाब  व कब्रिस्तान के लिए सख्त नियम है कि विकास के नाम पर ऐसी जमीनों पर कब्जा नहीं किया जा सकता. यदि टाउनशिप के बीच में तालाब या पोखर आते हैं तो इन्हें पाटने के बजाय इनका सौंदर्यकरण कर विकसित किया जाएगा. इसी तरह कब्रिस्तान के संबंध में नियम है कि उस पर निर्माण करने की बजाय उसके चारों ओर दीवार बनाकर छोड़ दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा.

ग्रामीणों की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. 3,530 एकड़ क्षेत्रफल में फैली हाईटेक टाउनशिप के बीच में बसे कई गांवों के किसान आज भी अपनी आजीविका खेतीबाड़ी करके चलाते हैं. लेकिन उनका दुर्भाग्य है कि खेती की सिंचाई के लिए उनके खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए जो नहर बनी हुई थी उसे बिल्डर ने पाट दिया है. किसान आशीष यादव बताते हैं कि निजामपुर, महमूदपुर  घुसवल, मजगंवा, बगियामउ, अहमामउ, हसनपुर खेवली आदि गांवों को पानी पहुंचाने के लिए सरकार की ओर से नहर खुदवाई गई थी जिससे किसान अपनी फसलों की सिंचाई करते थे. यह नहर अब समाप्त हो गई है. वे कहते हैं, ‘नहर को पाट कर कहीं टाउनशिप की सड़क बन गई है तो कहीं उसकी शोभा बढ़ाने के लिए पार्क. नहर पाट दिए जाने के कारण किसानों के खेत तो बीच-बीच में बचे हैं लेकिन उसमें लहलहाती फसलें अब नहीं दिखाई देतीं. लिहाजा किसान दो जून की रोटी को भी मोहताज हो गए हैं.’

गड़बड़ी की झड़ी

  • हाईटेक टाउनशिप के निर्माण के दौरान कब्रिस्तान, श्मशान या तालाब की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है जो गैरकानूनी है
  • हाईटेक टाउनशिप नीति के अनुसार बिल्डर को योजना के बीच में आने वाले गांवों का विकास भी करना होता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है
  • अपनी जमीन पर बिल्डर द्वारा कब्जा किए जाने और इसकी कहीं सुनवाई न होने से व्यथित एक दलित किसान ने हाल ही में आत्मदाह कर लिया
  • ऐसे भी मामले हैं जहां जमीन का भूउपयोग बदलवाए बिना ही बिल्डर ने जमीन बेच दी है और उस पर निर्माण कार्य भी हो चुका है
  • फर्जीवाड़े से एक ऐसे आदमी की जमीन की भी अंसल एपीआई के नाम रजिस्ट्री हो गई जो 1997 से ही लापता है
  • एक मामले में तो बिल्डर ने वह 150 एकड़ जमीन भी गांववालों से खरीद ली जिसके अधिग्रहण का नोटिस सरकार दे चुकी थी

हाईटेक टाउनशिप नीति के अनुसार बिल्डर को योजना के बीच में आने वाले गांवों का विकास भी करना होता है. लेकिन यहां भी रसूखदार बिल्डर ने किसानों के साथ छलावा ही किया है. महमूदपुर गांव में अंसल एपीआई की ओर से कई जगह बोर्ड लगाया गया है जिस पर लिखा है कि ग्राम सभा महमूदपुर की पेयजल व्यवस्था हेतु इंडियामार्का  हैंडपंप के अधिष्ठापन का कार्य चार मई, 2008 को आरंभ किया गया है. बोर्ड के अनुसार पांच साल पूर्व गांव में साफ पानी मुहैया कराने के लिए हैंडपंप लगा दिए गए हैं. लेकिन जहां बोर्ड लगा है वहां एक भी हैंडपंप दिखाई नहीं देता. इसी तरह का एक बोर्ड खुशीराम यादव के घर के बाहर भी लगा हुआ है. यादव परिवार की एक महिला बताती हैं कि नल लगवाने के लिए कंपनी की ओर से एक दिन बोरिंग करने के लिए सामान तो लाया गया लेकिन अगले ही दिन सारा सामान चला गया. उसके बाद किसी ने खबर नहीं ली. नतीजा यह है कि आज भी पूरा गांव कुएं का गंदा पानी पीने को मजबूर है. ऐसा हाल किसी एक गांव का नहीं बल्कि योजना के अंतर्गत आने वाले हर एक गांव का है. किसानों की बदतर स्थिति का आलम यह है कि गांवों को कंटीले तारों या पक्की दीवारों से घेर दिया गया है. गांवों के एकदम बाहर से ही बिल्डर अपनी योजना को अमली जामा पहना रहा है जिसके कारण गांवों के पानी की ठीक से निकासी तक नहीं हो पा रही है.

भारतीय किसान यूनियन के जिला अध्यक्ष हरनाम सिंह कहते हैं, ‘बिल्डर की यह मनमानी प्रशासन की उदासीनता का नतीजा है. यदि जिला प्रशासन हाईटेक टाउनशिप के नियमों को जरा भी अमल में लाने का प्रयास करता तो गांव में रहने वाले हजारों परिवारों की बदतर स्थिति न होती. यह किसानों का दुर्भाग्य है कि उनकी ही जमीन पर हाईटेक टाउनशिप बन रही है जहां उनकी चारदीवारी के बाहर चौबीसों घंटे बिजली-पानी की सुविधा सरकार की ओर से मुहैया कराई जा रही है वहीं उनके गांवों में कुल छह से सात घंटे ही बिजली मिल रही है.’

अंसल एपीआई की सरकार में पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह जब चाहे जहां चाहे अपनी योजना के आस-पास की सरकारी जमीनों पर भी कब्जे से नहीं हिचकता. इसका उदाहरण हाईटेक टाउनशिप के पास ही स्थित बरौना गांव में देखने को मिला. गांव के खसरा संख्या एक से 116 तक की करीब 150 एकड़ जमीन आवास विकास परिषद की ओर से अंसल एपीआई को स्थानांतरित नहीं की गई थी. इस जमीन के अपने पक्ष में अधिग्रहण के लिए आवास विकास परिषद साल 2000 में ही नोटिस जारी कर चुकी थी. इसके बावजूद बिल्डर ने आवास विकास परिषद की अनुमति के बगैर बरौना गांव की करीब 80 प्रतिशत जमीन किसानों से सीधे खरीद ली. आवास विकास परिषद को जब इसकी भनक लगी तो आनन-फानन में अधिकारी अपने बचाव के लिए हाई कोर्ट गए. कोर्ट ने कुछ समय पूर्व अपने निर्णय में खसरा संख्या एक से 116 तक की जमीन का फैसला आवास विकास परिषद के पक्ष में सुनाया. उधर, अंसल एपीआई किसानों को मुआवजा दे चुका है लिहाजा पूरा मामला फंस चुका है. गौरतलब है कि 2004 में अंसल को जो 1,527 एकड़ जमीन सरकार की ओर से दी गई थी वह भी आवास विकास परिषद की ही थी. बरौना गांव की जमीन भी आवास विकास परिषद के पास ही थी जो अंसल एपीआई को नहीं दी गई थी.

अंसल एपीआई के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो अधिकारी इसकी योजना के बीच में आता है उसका तबादला होने में भी देर नहीं लगती. इसका ताजा उदाहरण लखनऊ के पूर्व कमिश्नर संजीव दुबे हैं. सूत्र बताते हैं कि अप्रैल महीने में लखनऊ विकास प्राधिकरण बोर्ड की बैठक होनी थी, जिसमें कुछ ऐसे प्रस्तावों को भी मंजूरी दिलाए जाने की बात थी जो अंसल एपीआई को सीधे लाभ पहुंचा रहे थे. इसमें बरौना गांव की जमीन से जुड़ा मामला भी था. सूत्रों के मुताबिक यह जानकारी जब कमिश्नर को हुई तो उन्होंने मना कर दिया. जिसका नतीजा यह रहा कि दुबे का तत्काल तबादला कर दिया गया. इसके बाद इलाहाबाद के कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी को लखनऊ का कमिश्नर बनाया गया. चतुर्वेदी को जब पूरा प्रकरण पता चला तो उन्होंने भी इस पद पर आने से मना कर दिया. लिहाजा थक-हार कर शासन को चतुर्वेदी का स्थानांतरण आदेश निरस्त करना पड़ा. सीनियर आईएएस अधिकारियों के बीच अब इस बात की चर्चा जोरों पर है कि सरकार एक ऐसे आईएएस अधिकारी की खोज कर रही है जो आसानी से अंसल के सारे फंसे हुए पेंच निकाल सके.

इस काम के लिए कोई अधिकारी तैयार नहीं हो रहा लिहाजा पिछले करीब डेढ़ सप्ताह से लखनऊ कमिश्नर का पद रिक्त चल रहा है. सूत्र बताते हैं कि बोर्ड की बैठक में जो निर्णय होने थे उनमें से कुछ भूउपयोग परिवर्तन किए जाने के बारे में भी थे. सूत्रों के मुताबिक दरअसल बिल्डर ने कुछ मामलों में जमीन का भू-उपयोग बदलवाए बिना ही उसे बेच दिया है. इसमें से एक बड़ी जमीन पर वॉलमार्ट का स्टोर काफी दिनों से चल रहा है तो उससे कुछ ही दूरी पर एक पांच सितारा होटल भी बन रहा है. कागजों में जिस जमीन का बिना भूउपयोग बदलवाए निर्माण कार्य हो गया है उसमें से 15.071 हेक्टेयर जमीन वाहन क्रय विक्रय केंद्र एवं 87.47 हेक्टेयर जमीन सामाजिक शोध संस्थाओं एवं सेवाओं के नाम दर्ज है. ऐसे में जो अधिकारी इस काम को अंजाम देता, आज नहीं तो कल जांच में उसकी गर्दन फंसना तय है.

उधर, इस पूरे मामले में किसान हर कदम पर अपने आप को छला महसूस कर रहा है. बिल्डर की कारगुजारी से तंग आकर इसी साल 21 मार्च को दलित किसान नौमीलाल ने आत्मदाह कर लिया. नौमीलाल की पत्नी सुंदरा देवी बताती हैं कि नौ मार्च को उनकी जमीन पर कब्जा करके अंसल ने सड़क बनाने का काम शुरू किया. नौमीलाल ने पहले अंसल एपीआई के अधिकारियों से मिल कर इसकी शिकायत करने का प्रयास किया लेकिन सुनवाई नहीं हुई तो 11 मार्च को नौमीलाल की ओर से पीजीआई थाने में एक लिखित शिकायत की गई. थाने वालों ने भी प्रार्थना पत्र तो रख लिया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की. 14 मार्च को भाकियू कार्यकर्ताओं ने नौमीलाल के समर्थन में अंसल के कार्यालय के बाहर धरना भी दिया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. हर जगह से निराशा मिलते देख नौमीलाल ने 21 मार्च की सुबह खुद को आग के हवाले कर दिया. राजधानी में ही बिल्डर के उत्पीड़न से त्रस्त किसान द्वारा अत्महत्या किए जाने की घटना से प्रशासन का चिंतित होना स्वाभाविक  स्वाभाविक था.  इसके बाद कार्रवाई के नाम पर अंसल प्रबंधन पर गोसाईगंज थाने में मुकदमा लिखा गया. नौमीलाल छह दिन जिंदगी और मौत से जूझते रहे. अंत में 26 मार्च को उनकी मृत्यु हो गई. नौमीलाल की मृत्यु के बाद अंसल एपीआई ने जिला प्रशासन के माध्यम से उसके परिजनों को 15 लाख का मुआवजा दिया.

उधर, कंपनी के अधिशासी निदेशक (ऑपरेशंस) रमेश यादव कहते हैं, ‘नौमीलाल की जिस जमीन पर सड़क बनाई जा रही थी उसका मुआवजा उसे 2004 में ही दिया जा चुका था.’  लेकिन नौमी के परिजन इस बात को सिरे से नकारते हैं. नौमी की बेटी संगीता बताती है, ‘पिता जी के नाम एक ही एकाउंट था. उसमें यदि कोई रकम 2004 में आई होती तो उसका रिकार्ड जरूर होता.’ भाकियू नेता हरनाम सिंह कहते हैं, ‘अंसल एक बार नौमी की जमीन का मुआवजा दे चुका था तो उसने नौमीलाल की मौत के बाद 15 लाख रुपये क्यों दिए. कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है जिसके कारण कंपनी प्रबंधन को खुद के फंसने का डर सता रहा था. परिवार शांत हो जाए और मामला दब जाए, इसीलिए 15 लाख रुपये दिए गए.’

[box]150 एकड़ जमीन के लिए आवास विकास परिषद साल 2000 में ही नोटिस दे चुकी थी. इसके बावजूद बिल्डर ने  इसमें से 80 फीसदी जमीन किसानों से सीधे खरीद ली[/box]

उदाहरण जमीन पर कब्जा करने के ही नहीं फर्जी तरीके से जमीन की रजिस्ट्री करने के भी हैं. बगियामउ गांव का किसान राम सागर यादव जुलाई, 1997 में घर से बाजार दवा लेने के लिए निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. परिजनों ने काफी दिनों तक उसकी खोजबीन की. जब कहीं भी उसका पता नहीं चला तो छह अगस्त, 1997 को गोसाईगंज थाने में राम सागर के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. राम सागर के भाई राम रूप बताते हैं कि तीन भाइयों के पास 10 बीघा जमीन थी. पूरी जमीन की रजिस्ट्री तीन जून, 2006 को अंसल एपीआई के नाम हो गई. हैरानी की बात यह है कि रजिस्ट्री में तीनों भाइयों राम सागर, राम रूप और रामदेव की फोटो लगी हुईं हैं.

सवाल उठता है कि जो राम सागर 1997 से अब तक गायब है उसके हिस्से की भी जमीन अंसल एपीआई के नाम कैसे रजिस्ट्री हो गई. राम रूप बताते हैं, ‘जिस समय रजिस्ट्री हुई उस समय मेरी और मेरे भाई रामदेव की ही फोटो कागज पर लगी थी. राम सागर की फोटो उस पर नहीं थी. लिहाजा हम दो भाइयों के हिस्से की ही जमीन अंसल को बेची जानी थी लेकिन बाद में पता चला कि अंसल ने पूरी दस बीघा जमीन ले ली है. जब दौड़-भाग कर तहसील से कागजात निकलवाए गए तो सभी अवाक रह गए. दो भाइयों के साथ-साथ राम सागर के हिस्से की जमीन भी अंसल के नाम दर्ज हो चुकी थी और कागजों में दो के स्थान पर तीन फोटो लगी थीं. जिस तीसरे व्यक्ति की फोटो लगी थी उसे राम सागर बना कर जमीन ली गई है. रजिस्ट्री में राम सागर के स्थान पर जिस व्यक्ति की फोटो लगी है उसकी उम्र 50 से 55 साल के बीच की मालूम होती है, जबकि राम सागर की उम्र महज 30 साल थी. ‘

और उदाहरण सिर्फ बड़ी जमीनों के ही नहीं हैं. मेहनत-मजदूरी करके परिवार का पेट पालने वाले ग्रामीणों की छोटी-छोटी जमीनें भी उनसे छिन गईं. राम गोपाल लोधी बताते हैं कि उनके पास कुछ 13 बिस्वा (20 बिस्वा में एक बीघा होता है) जमीन थी. वे कहते हैं, ‘आठ बिस्वा जमीन पर दो भाई मकान बनाकर रहते हैं, पांच बिस्वा जमीन घर के एकदम बाहर तीसरे भाई के हिस्से की बची थी. अंसल एपीआई ने पांच बिस्वा जमीन पर कंटीला तार लगा कर उसे टाउनशिप में ले लिया.’ इस जमीन का न तो राम गोपाल के परिजनों को मुआवजा मिला और न ही कोई लिखा पढ़ी हुई. अकेले राम गोपाल ही नहीं बल्कि मदन, जानकी, प्रेम कुमार, अशोक सहित दर्जनों ऐसे ग्रामीण हैं जिनकी घर के बाहर जो थोड़ी-बहुत जमीन थी उस पर आज बिल्डर का कब्जा हो चुका है.

महमूदपुर निवासी राजपती की तीन बीघा जमीन अंसल एपीआई ने ले तो 2006 में ली थी लेकिन उसका जो चेक दिया गया वह बाउंस हो गया. राजपती बताती हैं कि जमीन उनके पति केसन के नाम थी. तीन बीघा जमीन के बदले उन्हें 3,86, 545 रुपये का बैंक ऑफ इंडिया का चेक दिया गया. चेक पर किसी संजीव नाम के व्यक्ति के हस्ताक्षर थे. राजपती के परिजनों ने जब चेक को गोसाईगंज स्थित विजया बैंक में लगाया तो वह बाउंस हो कर वापस आ गया. राजपती बताती हैं, ‘चेक को लेकर काफी भागदौड़ की गई लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.’ परिवार के लोग आज भी चेक को संभाल कर रखे हुए हैं.

नौमीलाल, रामगोपाल, राम सागर और राजपती तो एक उदाहरण भर हैं. हाईटेक टाउनशिप के बीच में आने वाले दर्जनों गांवों के सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जिनकी गिनती कल तक अच्छे किसानों में होती थी लेकिन बिल्डर की कारगुजारी के चलते आज वे परिवार का पेट पालने को भी मोहताज हैं. राजपती, राम सागर और राम गोपाल के मामलों में अंसल के अधिशासी निदेशक (ऑपरेशंस) रमेश यादव कहते हैं कि उन्हें इस तरह की कोई जानकारी ही नहीं है. धन-बल के आगे राजधानी लखनऊ में जब किसानों का यह हाल है तो दूर-दराज के इलाकों में विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण के चलते किसानों की क्या दशा होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं.

मध्यप्रदेश:आधी आबादी, पूरी दावेदारी

धारणाएं बनने में, खास तौर पर जब वे नकारात्मक और महिलाओं से जुड़ी हों, ज्यादा वक्त नहीं लगता. आज से दो दशक पहले जब मध्य प्रदेश में पंचायती राज के चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी दी गई तब कई तरह की बातें कही गई थीं. इनमें से ज्यादातर का लब्बोलुआब था कि यह महिलाओं को आरक्षण देने के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से पंचायतों पर पुरुषों का कब्जा बरकरार रखने की ही कोशिश है. उसी समय यह बताने के लिए कि महिलाएं राजनीति नहीं कर सकतीं ‘सरपंच पति’ जैसे जुमले गढ़े गए. इस बीच पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण भी दे दिया गया. ऐसे में इस धारणा की पड़ताल जरूरी है कि क्या सच में ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के बीच से नेतृत्व उभारने की कोशिश कहीं पहुंची है?

मप्र में पंचायत का चुनाव हुए दो साल से भी अधिक का वक्त गुजर चुका है. मगर पंचायत चुनाव के आंकड़े एक जगह नहीं मिलने से राजनीति में महिलाओं की वजनदारी का पता नहीं चल पाता है. लिहाजा यह जानने के लिए तहलका ने पंचायती राज विभाग और चुनाव आयोग से मिले आंकड़ों को इकट्ठा करके जब छानबीन शुरू की तो कई चौंकानेवाले नतीजे सामने आए. सबसे पहला और सुखद निष्कर्ष तो यही मिला कि सालों से पंचायती राज में नेतृत्व की एक प्रभावशाली कड़ी बनी रही इन महिला सरपंचों और पंचों ने सियासत के कई पुरुषों व प्रतीकों को बदल दिया है. कई जगहों पर वे नेता बनने की परिभाषा और भाषा भी बदल रही हैं. यदि 1993 से लेकर अब तक की उनकी इस राजनीतिक यात्रा में जाएं तो उन्होंने इस बीच दो बड़ी पारियां खेली हैं. एक तो मप्र की इन महिलाओं ने सामान्य सीटों पर भी खासी संख्या में मर्दों को पटकनी देकर उनके भीतर से राजनीतिक श्रेष्ठता का भ्रम तोड़ा है.

उनकी दूसरी बड़ी उपलब्धि यह रही कि आरक्षित सीटों पर भी चुनाव दर चुनाव महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ती रही. कम उम्र और अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाएं मैदान में उतरीं, सामान्य महिला सीटों पर दलित या आदिवासी महिला सरपंच बनीं, उनमें से कई दूसरी और तीसरी बार जीतीं और उनमें भी कई जनपद सदस्य और जिला अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचीं. इससे जहां काफी हद तक सूबे का सियासी परिदृश्य बदला, काम-काज के तौर-तरीके भी बदले और कई जगह वे आम लोगों को यह एहसास दिलाने में कामयाब रहीं कि उनका नेतृत्व मर्दों से बेहतर हो सकता है.

गौर करने लायक तथ्य यह है कि राजनीति की पहली सीढ़ी कहे जाने वाले पंचायती चुनाव में कुल 3 लाख 96 हजार जन प्रतिनिधि चुने गए और जिनमें से 2 लाख 5 हजार महिलाएं हैं. इनमें भी आधे से अधिक महिलाएं या तो आदिवासी तबके की हैं या दलित और पिछड़े वर्ग की. मप्र में एक सरपंच 1,695 लोगों का प्रतिनिधित्व करता है और इस लिहाज से यहां की करीब 12 हजार महिला सरपंच पौने तीन करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं. इसका प्रभाव पंचायत के ऊपरी स्तर पर पड़ा है और पचास जिला पंचायत अध्यक्षों में से 30 यानी 60 फीसदी महिलाएं हैं. लेकिन इससे भी अधिक सुखद बात यह है कि यहां छह हजार से अधिक महिला जनप्रतिनिधि ऐसी हैं जिन्होंने सामान्य सीट पर मर्दों को मात दी. यह हाल तब है जब सामान्य सीट को पुरुष आरक्षित सीट बताकर गलत तरीके से महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश की जाती है.

वहीं महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के आंकड़े गवाह हैं कि चुनाव में महिला भागीदारिता का ग्राफ तेजी से बढ़ा है. यह सच है कि प्रदेश में जब पंचायती राज कायम हुआ था तब प्रभावशाली लोगों को महिला आरक्षण से काफी खुशी हुई. उन्होंने अपने घर या अपने खेतों में काम करने वाले मजदूर के घर की महिला को आगे करके न केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी की बल्कि उनके नाम पर विकास का पैसा भी हड़पा. हालांकि एक तबका मानता है कि ऐसी बात केवल महिलाओं पर ही नहीं बल्कि उन मर्दों पर भी लागू होती हैं जिनके पद का फायदा कोई दूसरा उठाता है.

बावजूद इसके राज्य की महिलाओं में घूंघट खोलने की राजनीति का चलन बढ़ा है और चुनाव आयोग के कागजात देखें तो पहले सरपंच के चुनाव में महिला आरक्षित सीट पर महिला उम्मीदवार ढूंढ़े से नहीं मिलती थीं और 2010 के चुनाव में सरपंच के एक पद के लिए औसतन दस महिलाएं मैदान में उतरीं. तहलका ने दस जिलों की 1,760 महिला जनप्रतिनिधियों की पड़ताल की तो पाया कि इनमें से आठ सौ से अधिक महिलाओं की उम्र 35 साल से कम है. इनमें गैर आदिवासी इलाके के निजी स्कूलों और अस्पतालों में नौकरी करने वाली कई महिलाएं भी हैं. वहीं इस चुनाव में विदिशा की हिनौतिया और नरसिंहपुर की मड़ेसुर ऐसी पंचायतें हैं जिनमें सभी पदों के लिए महिलाओं को सर्वसम्मति से चुना गया है.

आम तौर पर महिला पंच-सरपंचों को यह कहकर खारिज कर दिया जाता है कि उन्हें राजनीति का तजुर्बा नहीं होता. लेकिन जो जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं वे जानते हैं कि राजनीति में महिलाओं का काम करना कितना मुश्किल है. मप्र के बुंदेलखंड और बघेलखंड जैसे महिला हिंसा के लिए बदनाम इलाकों में पंचायती राज के बाद खास तौर से महिला सरपंचों पर जानलेवा हमलों और यौन हिंसा की वारदातों में इजाफा हुआ है. बीते कुछ सालों की वारदातों पर नजर दौड़ाएं तो बुंदेलखंड के छतरपुर जिले की महोई कला पंचायत की दलित महिला सरपंच ने जब विकास के लिए आया पैसा दबंगों को देने से मना किया तो उन्हें निर्वस्त्र कर गांव में दौड़ाया और पीटा गया. इसी तरह, शिवपुरी जिले की सिनावल कला की दलित महिला सरपंच के साथ कई दबंगों ने सामूहिक बलात्कार किया.

[box]जहां दलित या आदिवासी महिलाएं सरपंच बनीं, उन्होंने चुनावी राजनीति समझते हुए क्षेत्र की मतदाता सूची में अपने वर्ग के मतदाताओं के नाम जुड़वाए[/box]

वहीं टीकमगढ़ के पीपराबिलारी की सरपंच गुदीया बाई को दलित होने के चलते स्वतंत्रता दिवस के मौके पर झंडा नहीं फहराने दिया गया. हालांकि ऐसा ही सलूक होशांगाबाद की जिला पंचायत अध्यक्ष उमा आरसे के साथ भी हुआ लेकिन उन्होंने गणतंत्र दिवस पर झंडा फहरा ही दिया. वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर के मुताबिक, ‘ऐसे माहौल में सरकार को चाहिए कि वह विपरीत स्थितियों में काम करने वाली इन जनप्रतिनिधियों के लिए सहयोग और सुरक्षा का एक ढांचा बनाए.’

जाहिर है ऐसी चुनौतियों के बीच यदि कोई वंचित तबके की महिला कामयाब होती है तो उसके नेतृत्व की कीमत का कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए सागर जिले की पथरिया की दलित फूल बाई सामान्य महिला सीट पर दो सवर्ण महिला उम्मीदवारों को हराकर सरपंच बनीं और उसके बाद उन्होंने न केवल पुलिस के भ्रष्टाचार का एक मामला उजागर किया बल्कि पुलिस से पैसा और अनाज भी वापस लिया. इसी तरह विदिशा जिले के गंजबासौदा की दलित सरपंच नब्बी बाई ने दबंगों से पंचायत की जमीन खाली कराई और वहां दाह संस्कार का बंदोबस्त किया. इसी कड़ी में इन महिला पंच-सरपंचों ने अपने संगठन बनाकर कई सामूहिक लड़ाइयां भी लड़ीं और कानूनों को बदलवाने के साथ ही उन्होंने व्यवस्था को दुरुस्त बनाया. जैसे कि 2010 के चुनाव में महिलाओं के लिए आधा आरक्षण तय करने के बाद बड़े पैमाने पर उन पर हिंसा की आशंका जताई गई थी. ऐसे में महिला जनप्रतिनिधियों के सामूहिक दबाव के चलते राज्य सरकार ने 24 घंटे की ऐसी हेल्पलाइन सेवा शुरू की जिसमें चुनाव के दौरान कोई भी महिला शिकायत कर सकती थी.

इसी तरह, पंचायती राज का एक नियम यह था कि जिनके दो से अधिक बच्चे हैं वे पंचायत का चुनाव नहीं लड़ सकते. इसका सबसे बुरा असर महिलाओं पर ही पड़ा. कई महिलाओं के गर्भपात कराए जाने से उनके शरीर पर इसके दुष्प्रभाव पड़े. साथ ही इस नियम के चलते कई महिलाओं के लिए आरक्षण का कोई मतलब नहीं रह गया. लिहाजा महिला जनप्रतिनिधियों ने जब विरोध किया तो बीते चुनाव में सरकार को यह नियम हटाना पड़ा. जानकारों की राय में मप्र सरकार इन महिला सरपंचों को इसलिए अनदेखा नहीं कर सकती है कि गांव में रहने वाली 70 फीसदी आबादी की दुख और तकलीफों से वे रोज ही दो-चार हो रही हैं. लिहाजा सियासी समीकरणों के चलते राज्य सरकार की नजर में इनकी अहमियत बढ़ गई है.

घर से लेकर सरकारी दफ्तरों की अड़चनों के बीच यदि इन नई सरपंचों ने अपनी मंजिल तय की है तो इसलिए कि इस दौरान उन्हें चुनाव जीतना ही नहीं बल्कि अपनी तरह से पंचायत चलाना भी आ गया. राज्य सरकार में पंचायत एवं सामाजिक न्याय की प्रमुख शासन सचिव अरुणा शर्मा को इन महिला पंच-सरपंचों में जो खास बात नजर आती है वह है पर्यावरण और विकास के प्रति उनका नजरिया. शर्मा के मुताबिक, ‘स्वच्छता के बिना विकास अधूरा है और जिन पंचायतों में सफाई दिखाई देती है वहां पारदर्शिता भी दिखाई देती है.’ तहलका ने जब कई पंचायतों का मुआयना किया तो पाया कि पुरुष सरपंचों ने जहां निर्माण कार्यों को वरीयता दी है वहीं महिला पंच-सरपंचों ने मानवीय मुद्दों को अपने विकास का एजेंडा बनाया है. आम तौर पर शराबबंदी, बालिका शिक्षा, पानी, वृद्धावस्था पेंशन और राशन वितरण पर महिलाओं का अधिक ध्यान होता है और यही वजह है कि उन्होंने ऐसे कामों को सलीके से करते हुए यह साबित किया है कि वे किसी से कम नहीं. इस पूरी जद्दोजहद में जहां महिलाओं के भीतर मौजूद गुणों के चलते उनमें एक नई तरह का नेतृत्व  उभरा है वहीं जिस शैली में उन्होंने वंचितों के विकास की राजनीति की है उससे एक नया रुझान भी आया है.

[box]महिला सरपंच बताती हैं कि वे सरकारी कर्मचारियों से बात करती हैं तो अकेली नहीं बल्कि औरतों के समूह के साथ जाती हैं ताकि सामने वाला उन्हें कमजोर न समझे[/box]

सतना जिले में मिरौवा पंचायत की सरपंच मुन्नी साकेत बताती हैं, ‘पंचायत में ऊंची जाति के लोगों का कब्जा होने के चलते हम लोगों की बात ही नहीं सुनी जाती थी. एक बार मेरा राशन कार्ड बनाने से मना कर दिया गया तब मैंने सरपंच बनने के बारे में सोचा. फिर जब चुनाव की तैयारी की तो पता चला मेरे साथ बहुत लोग हैं. सो आखिर मैं जीत ही गई.’ मुन्नी साकेत का नेतृत्व  इसलिए अहम है कि जिस व्यवस्था में एक दलित महिला का राजनीति में प्रवेश वर्जित है वहां उनके वर्ग के लोगों ने उनके संघर्षों को सफलता दिलाई. यदि मुन्नी साकेत जैसी महिलाएं बदल रही हैं तो इसलिए कि उन्होंने चुनाव की मुहिम में भागीदारी से लेकर जीत की माला पहनने तक यह जान लिया है कि उनमें कुछ है जो उनके लोगों ने उन्हें चुना है. सरपंच बनने के बाद मुन्नी साकेत ने मतदाता सूची में कई दलित मतदाताओं के नाम जुड़वाकर अपने चुनावी क्षेत्र को और मजबूत बनाया है. वहीं पंच से सरपंच की कुर्सी तक पहुंचने वाली रीवा जिले की मउहरा पंचायत की कुसुमकली को वोटों का खेल समझ में आ गया है. वे बताती हैं कि किस तरह से जब इस पंचायत में 16 पंचों में से 9 महिलाएं जीतीं तो उन्होंने आपस में तय करके एक महिला को ही उपसरपंच बनाया.

सीधी जिले में पोस्ता पंचायत की आदिवासी महिला श्याम बाई का मामला दिलचस्प इसलिए है कि उन्हें जैसे ही पता चला कि पंचायत चुनाव की घोषणा हो चुकी है उन्होंने अपनी बकरियां बेचीं और प्रचार के पर्चे बंटवा दिए. उन्होंने तीन ट्रैक्ट्ररों से सैकड़ों लोगों को लेकर सरपंच पद के लिए अपना नामांकन दाखिल किया. इससे पूरे क्षेत्र में चुनावी माहौल गर्माया और श्याम बाई ने इस सामान्य महिला आरक्षित सीट पर भारी बहुमत से जीत हासिल की. पंचायत के चुनाव को लेकर श्यामबाई जैसी आदिवासी महिलाओं का जोश महिला नेतृत्व के नजरिये से एक शुभ संकेत है. वहीं रीवा जिले में देवगांव कला की सरपंच बेटी चौधरी ने रोजाना आठ घंटे पंचायत कार्यालय खोलकर जहां लोगों के सामने अपनी सहज हाजिरी दर्ज कराई है वहीं ग्राम सभा में सभी वंचित वर्गों की सुनवाई सबसे पहले करने की परंपरा शुरू की और राजनीतिक पकड़ बनाई. बेटी चौधरी की रणनीति बताती है कि वे हाशिये की राजनीति करके वापस लौटना चाहती हैं. यही नहीं जिस तरीके से झाबुआ जिले के बीस वार्डों वाली सारंगी पंचायत में आदिवासी महिला फुंदीबाई बीते डेढ़ दशक में तीन चुनाव लड़कर दो बार सरपंच बनीं और जिस शान से मंडला जिले की खापा पंचायत की सरपंच शिवकली बाई ने चौथी बार पंचायत का चुनाव जीतीं और जिला पंचायत सदस्य बनीं उसने जता दिया कि बात चाहे विकास के नारे की हो या सियासत में नाम कमाने की,  वंचित तबके की महिलाएं किसी भी मामले में कमजोर नहीं हैं.

दरअसल इस तबके की महिलाएं काम-काज के चलते खेत-खलिहान से लेकर हाट-बाजारों तक खुली घूमती हैं और उनके सामने घूंघट, पर्दा या चारदीवारी नहीं है. ऐसी स्थिति में मौका मिलने के बाद जब  सवर्णों द्वारा उन्हें जितना दबाया जा रहा है वे उतनी ही मुखर होकर उभर रही हैं. तहलका ने ऐसी कई महिला सरपंचों से बात की तो उन्होंने बताया कि जब वे दबंगों या सरकारी कर्मचारी से बात करती हैं तो अकेली नहीं बल्कि औरतों के समूह के साथ जाती हैं. इससे जहां सबको यह पता लगता है कि वे अकेली नहीं हैं वहीं उनके आसपास भी सुरक्षा का घेरा बना रहता है. वहीं कुछ महिला सरपंचों ने बताया कि वे ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए अपने साथ महिला पंचों और सरपंचों को जोड़कर एक निकाय की तरह काम करती हैं. जाहिर है यदि पंचायत राजनीति की बुनियाद है तो मप्र में महिलाएं पंचायत का चेहरा-मोहरा बन रही हैं. और नेतृत्व  की लगाम जैसे-जैसे मर्दों से महिलाओं के हाथों में आ रही है वैसे-वैसे यहां नेतृत्व  के मायने बदल रहे हैं. खुशी की बात यह है कि इस बदलाव की कड़ी में मर्दों का अहम ही नहीं टूट रहा है बल्कि कई जगहों पर वे उदार भी बन रहे हैं.

भले ही प्रेमचंद की मशहूर कहानी ‘पंच परमेश्वर’ के जरिए हमारी आंखों के सामने न्याय की बेदी पर अलगू चौधरी के रूप में एक पुरुष ही विराजता है. किंतु मप्र में पंचायत की इस आदर्श अवधारणा की पीठ पर आधे से अधिक महिलाओं के सवार होने के साथ ही तस्वीर बदलती हुई नजर आ रही है.