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एक और गुडि़या

पांच साल की खुशी अपने मम्मी और पापा के साथ; फोटो-विकास कुमार
पांच साल की खुशी अपने मम्मी और पापा के साथ; फोटो-विकास कुमार

दिसंबर, 2012 में हुए दिल्ली गैंग रेप के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन अभी थम ही रहे थे कि नए साल के चौथे ही महीने में दिल्ली में पांच साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार की बर्बरता ने पूरे देश को फिर से हिला दिया. जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के महीनों तक चले प्रदर्शन और जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में दर्ज सिफारिशों के आधार पर नए ‘आपराधिक संशोधन अधिनियम- 2013’ के पारित होने के बाद उम्मीद जगी थी कि बलात्कार के मामलों में दिल्ली पुलिस की कुख्यात संवेदनहीनता में कुछ सुधार तो होगा ही. लेकिन पांच साल की खुशी (बदला हुआ नाम) की यह कहानी एक तरफ जहां बलात्कार के मामलों में लगातार जारी दिल्ली पुलिस की आपराधिक लापरवाही और उदासीन रवैये को स्पष्ट करती है वहीं ‘महिलाओं के लिए सुरक्षित दिल्ली’ जैसे सरकारी दावों की पोल भी खोलती है.

हरियाणा बॉर्डर से सटा कापसहेड़ा दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के आखिरी छोर पर बसा अंतिम रिहायशी इलाका है. आलीशान बंगलों, बहु-मंजिला इमारतों और घने बाजारों वाले इस इलाके के सेक्टर 21 में बने अय्यप्पा मंदिर के पास इन बंगलों और इमारतों में काम करने वाले मजदूरों की एक बस्ती है. यहीं रहने वाले पप्पू कुमार को दिसंबर, 2012 के दिल्ली गैंग रेप और उसके बाद अप्रैल, 2013 में गुड़िया बलात्कार कांड का पूरा घटनाक्रम लगभग जबानी  याद है. अपनी पत्नी और छह बच्चों के साथ अपनी एक कमरे की खोली में बैठकर बात करते हुए वे हर दूसरी बात पर पूर्वी दिल्ली में हुए चर्चित गुड़िया बलात्कार कांड का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘मेरी खुशी भी तो गुड़िया की ही तरह सिर्फ पांच साल की ही है. लेकिन उसका केस मीडिया के सामने आ गया. हमें पुलिसवालों ने मीडियावालों से बात करने से सख्त मना कर दिया था. बस वाले मामले के साथ-साथ गुड़िया के मामले पर भी इतना हंगामा हुआ और सारे आरोपी तुरंत गिरफ्तार कर लिए गए. लेकिन मेरी बच्ची के साथ ऐसी घिनौनी हरकत करने वाले आजाद घूम रहे हैं. वह भी तब जब वह खुद उनके बारे में बता रही है.’

10 फरवरी, 2013 को पप्पू कुमार की पांच वर्षीया बेटी खुशी का बलात्कार हुआ था. अपराधियों ने खून से लथपथ और बेहोश खुशी को मरा हुआ समझ कर उसे कापसहेड़ा बॉर्डर के पास मौजूद सूर्या विहार के जंगलों में छोड़ दिया था. एक महीने के सघन इलाज और चौदह टांकों वाली सर्जरी के बाद अब खुशी घर तो वापस आ चुकी है, लेकिन खामोश है.  दुबली-पतली काया वाली करीब डेढ़ फुट की यह बच्ची अब अक्सर कमरे के किसी कोने में बैठकर एक दिशा में ताकती रहती है.

लेकिन खुशी की मां प्रीति बताती हैं कि वह हमेशा से ऐसी नहीं थी. तहलका से बातचीत में अपनी बेटी के साथ हुए आपराधिक घटनाक्रम को याद करते हुए वे कहती हैं, ‘मेरे पति तब स्कूल में चपरासी का काम करते थे और मैं पास की कोठियों में बर्तन धोने और खाना बनाने जाती थी. 10 फरवरी को भी रोज की ही तरह मैं शाम को सात बजे खाना बनाने गई. वापस आई तो खुशी घर पर नहीं थी. मैंने सोचा यहीं खेल रही होगी. मैं खाना बनाने लगी. खाना बनाकर मैंने रोज की तरह अपने सारे बच्चों को आवाज दी.  खुशी को छोड़कर सब आ गए. जब खुशी रात को आठ बजे तक नहीं लौटी तो हमने उसे ढूंढ़ना शुरू किया लेकिन वह कहीं नहीं मिली.’

प्रीति आगे बताती हैं कि पूरी रात बेटी को ढूंढ़ने के बाद उन्होंने कापसहेड़ा पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखवाई. वहीं उन्हें पता चला कि खुशी सफदरजंग अस्पताल में भर्ती है. अस्पताल में पता चला कि उसकी सर्जरी होने वाली है. प्रीति याद करती हैं, ‘उसकी हालत बहुत खराब थी. पिछली रात वह पुलिसवालों को सूर्या विहार के पास से मिली थी. बाद में पूछने पर उसने बताया कि हमारे घर के पास रहने वाला सुनील उसे ले गया था. उसे सब साफ याद है. उसने पुलिसवालों के सामने भी बताया कि सुनील ने उससे कहा कि तेरी मां कोठी पे बुला रही है. फिर वह उसे समोसे खिलाने के बहाने बस्ती से बाहर ले गया. चार महीने हो गए, मेरी लड़की आज भी साफ-साफ बताती है कि सुनील अंकल उसे सूर्या विहार के जंगल ले गए थे. फिर वह सो गई थी. उन लोगों ने मेरी लड़की का बलात्कार किया और फिर उसे मरा समझ कर छोड़ गए थे. लेकिन मेरी लड़की न जाने कैसे हिम्मत करके कुछ घंटों बाद उठी और रोती हुई सड़क तक आ गई. इतनी सर्दी में उसके पूरे कपड़े उतार लिए थे. ऊपर सिर्फ एक हाफ स्वेटर पहने थी और नीचे दोनों पैरों से खून लगातार बह रहा था.

‘आलोचक बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं’

इन दिनों क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?
संस्मरण लिख रहा हूं. इसके पहले अपनी ही कहानी मृगतृष्णा की स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त था. उस पर टेलीफिल्म बनाई जा रही है.

आपकी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है और अब आप हिंदी के चंद महंगे लेखकों में शामिल होने वाले हैं!
मेरी रचनाओं का अनुवाद तो पहले भी होता रहा है, अभी भी हो रहा है लेकिन मैं क्या महंगे लेखकों में शामिल होऊंगा. जर्मनी में जर्मन एकेडमी के जस्ट फिक्शन सीरिज में मेरे उपन्यास ‘नदी’ का अनुवाद ‘रिवर’ नाम से हुआ है. उसके एवज में करीब 25 हजार डॉलर की रॉयल्टी शायद मुझे मिलेगी. यह इतनी बड़ी राशि तो नहीं हुई कि मैं सबसे महंगा लेखक माना जाऊं.

कहानी और उपन्यास आपकी पहचान रहे हैं. संस्मरण लिखना अनायास शुरू किया आपने या यह ज्यादा महत्वपूर्ण विधा लगी?
सच कहूं तो इसकी प्रेरणा अपने युवा साहित्यकार मित्र अरुण नारायण से मिली. वैसे मुझे भी लगता रहा है कि किसी फनकार के जीवन में आवारापन बना रहना चाहिए. संस्मरण लिखना एक तरीके से आवारापन ही है. इससे आप यथास्थिति के खिलाफ खड़े होने की कोशिश करते हैं. अगर आप लेखन में ईमानदार हैं तो संस्मरण लिखने के लिए साहस चाहिए. लेखक को अपना आकलन करना चाहिए और संस्मरण लेखन एक तरीके से अपना आकलन करना भी है. इस विधा में आपको सब कुछ स्वीकार करना पड़ता है.

आप इंजीनियर रहे. बाद में कथाकार बने, उपन्यासकार हुए, ज्योतिष केंद्र भी चलाते रहे हैं और एक बड़ी पहचान एक साथ अनेक प्रेम करने वाले की भी रही. कौन-सी पहचान ज्यादा पसंद है?
पूरी दुनिया में सब कुछ खंडित हो रहा है तो एक पहचान के साथ क्यों रहा जाए? पहले कहानीकारों पर एक सामाजिक दायित्व व दबाव होता था, वह टूट गया. सबसे पहले गरीबी को अभिशाप माना गया, उसे हटाने का नारा चला, वह बीच में ही खंडित हो गया. समाजवाद का सपना दिखाया गया, वह सपना ही चोरी हो गया. धर्मनिरपेक्षता का सपना दिखाया जाता है, वह भी टूट चुका है. रही बात इंजीनियर और कथाकार बनने की तो मैं आपको एक बात बताता हूं. जब दस साल का था तो मेरी पहली कहानी अखबार में प्रकाशित हुई. इंजीनियरिंग की डिग्री मैंने ली तो इंजीनियर की नौकरी मैंने की और मुख्य अभियंता के पद तक पहुंचा लेकिन मैं ईमानदारी से कह रहा हूं, मैं कभी इंजीनियर था ही नहीं.

आपकी रचनाओं में सेक्सुअल फैंटेसी ज्यादा होती है, इसलिए कुछ लोग आपको सेक्स का लेखक भी कहते हैं.
अब लोगों का क्या? लोगों ने तो अपने स्तर से हरसंभव कोशिश की कि सेक्स को जहर देकर मार दिया जाए. सेक्स मरा तो नहीं लेकिन और जहरीला जरूर हो गया. इसलिए मैं अब ज्यादा लोगों की बातों पर ध्यान ही नहीं देता. हाल में मुझे फरोग-ए-उर्दू सम्मान मिला. नसीरुद्दीन शाह भी साथ में थे. मैं पटना लौटा तो फेसबुक पर मेरे खिलाफ एक अभियान चला. किसी ने ‘नगमा बानो’ नाम से फेक आईडी बनाकर लिखा कि शमोएल अहमद बेहद ही कमीना इंसान है, उसे कैसे इतना बड़ा सम्मान मिल गया. उस फेक आईडी ने लिखा कि उसके पति दुबई में रहते हैं, वह मेरे घर आया-जाया करता था. उसने मेरे साथ बदसलूकी की है, मेरा यौन शोषण किया है. इसके बाद तो मुझे गालियां ही गालियां दी जाती रहीं. मैं हैरत में था, मेरा ऐसी घटनाओं से कभी कोई वास्ता नहीं रहा लेकिन मैं बचाव की मुद्रा में नहीं आया. मैंने जवाब दिया- मोहतरमा, जो कह रही हैं, वह बिल्कुल सही है. सिर्फ हमारा संबंध ही नहीं बना है बल्कि उनके जो दो बच्चे हैं, उसमें एक मेरा है, यकीन न हो तो उस बच्चे का डीएनए टेस्ट करवा लिया जाए. इसके बाद वह अभियान बंद हुआ.

आप हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं में लिखते हैं. सेक्स को लेकर ज्यादा वर्जनाएं किस भाषा में हैं?
उर्दू में तो सेक्स तरक्की पसंद विषय माना जाने लगा है. इसके लिए मैं मंटो का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने समय में ही इसे आजादी दिला दी थी. कुछ उसी तरह से जैसे अंग्रेजी में डीएच लॉरेंस ने. हिंदी में यह आजादी अब तक नहीं मिल सकी है, हालांकि तेजी से बदलाव हुए हैं. करीब तीन दशक पहले मैंने राजेंद्र यादव के पास ‘हंस’ में छापने के लिए अपनी कहानी ‘बगोले’ भेजी थी. उस कहानी में एक ब्वॉय हंटर अभिजात महिला की कहानी है, जो अपने जाल में मर्दों को फांसती है. एक रोज वह एक 17 साल के लड़के को फांसती है और अपने पास लड़के के आने के पहले तमाम तरह की कल्पनाओं में डूबी रहती है. सोचती है कि वह उस लड़के को धीरे-धीरे सभी तरीके बताएगी लेकिन जब वह किशोर आता है तो महिला को ही कायदे समझाने-सिखाने लगता है. महिला को सदमा लगता है, वह उसे भगा देती है. राजेंद्र यादव ने जवाब में लिखा कि शमोएल, कहानी को नहीं छाप सकता, पाठक नाराज हो जाएंगे. उसके बाद इंटरनेट युग आया तो मैंने इस पर कहानी लिखने की सोची. मैंने चैटिंग को जाना. इंटरनेट पर बिखरे कई सेक्स ग्रुप से जुड़ा और बाद में ‘सेक्सुअल चैटिंग’ पर एक कहानी ‘अनकबूत’ लिखी. मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि अनकबूत में बगोले से ज्यादा सेक्सुअल फैंटेसी थी और तमाम तरह के वर्जित शब्द भी लेकिन राजेंद्र यादव ने उसे सहर्ष छापा और कहा भी कि मजेदार और बेजोड़ कहानी है. कहने का मतलब यह कि वक्त के बदलाव के साथ मन-मिजाज बदलता है.

हिंदीवाले अनुवाद में तो लॉरेंस की कृति  ‘लेडी चैटर्ली का प्रेमी’  ब्लादीमीर नाबाकोव की  ‘लोलिता’  पढ़ना चाहते हैं लेकिन कोई हिंदी लेखक ऐसा ही लिखे तो फिर हाय-तौबा क्यों?
दरअसल इसमें सबसे बड़ा पेंच तो आलोचक फंसाते हैं. दुर्भाग्य से हिंदी आलोचना में एक प्रेमचंदी घेरा बना हुआ है, उस घेरे से बाहर निकलने ही नहीं देना चाहते किसी को. हालांकि उदय प्रकाश, अखिलेश जैसे रचनाकारों ने उस घेरे को तोड़ा है. अब हिंदी के समाज को कौन समझाए कि अपने यहां जिन रचनाओं में हुस्न का बखान दिल खोलकर हुआ है उन्हें ही क्लासिकल माना जाता है. कुमार संभव, गीत गोविंद, अलिफ लैला आदि में क्या है. बेहद ही खूबसूरत तरीके से हुस्न का बखान.

आप आलोचकों को दोष दे रहे हैं. आपकी बातों से लगता है कि हिंदी साहित्य में आलोचक एक गैरजरूरी तत्व की तरह हैं.
बेशक. सच कहूं तो आलोचक बेपेंदी के लोटे होते हैं. आलोचक को माली की भूमिका में होना चाहिए लेकिन अधिकांश आलोचक लकड़हारे की भूमिका में रहना चाहते हैं. मेरे हिसाब से तो रचनाकारों को ही आलोचक भी होना चाहिए. अब बताइए कि राजेंद्र यादव कहानी की आलोचना करेंगे तो बेहतर होगा या नामवर सिंह कहानी की आलोचना करेंगे! वैसे मैं तो यही मानता हूं कि जिनकी रचनाओं में दम होता है, उन्हें आलोचक की दरकार नहीं.

भारत जैसे मुल्क में सबसे बड़ी समस्या रोटी की है लेकिन लेखक और कवि सबसे ज्यादा प्रेम के पीछे भागते हैं. आप जैसे लेखक प्रेम के साथ सेक्स के पीछे भी भागते हैं.
ऐसा नहीं है कि रोटी को महत्व नहीं मिला या नहीं मिल रहा. खूब लिखा गया है और लिखा भी जा रहा है लेकिन प्रेम की रचनाएं जल्दी लोकप्रिय हो जाती हैं. और वैसे भी प्रेम तो आत्मा की भूख है न, इस पर हमेशा ही लिखा जाता रहेगा. सेक्स के पीछे भागने का जो सवाल आप पूछ रहे हैं तो उसका जवाब यह है कि सेक्स तो प्रेम का एक जरिया भर होता है. शुरू में शरीर आता है, सेक्स आता है लेकिन प्रेम करने वाला बाद में उससे ऊपर उठ जाता है. जैसे अध्यात्म में आत्मा की परिकल्पना है लेकिन आत्मा को वास करने के लिए एक शरीर की जरूरत तो होती है न.

आपकी अपनी प्रिय रचना कौन-सी है और लेखकों में कौन पसंद हैं?
सिंगारदान. अपनी इस कहानी से मुझे बेपनाह मोहब्बत है. यह मेरे इलाके भागलपुर की कहानी है. भागलपुर दंगे के समय एक कैंप में मैं तवायफ से मिला था. दंगाइयों ने उसका सब कुछ लूट लिया था, इसका अफसोस नहीं था उसे, वह बार-बार मुझसे कह रही थी कि मेरा सिंगारदान भी ले गए सब. वह पीढ़ियों से मेरे पास था, मेरी पहचान था. मुझे तभी लगा था कि इस तवायफ की तरफ से मुझे भी एक विरोध दर्ज कराना चाहिए. विरासत को ही खत्म कर देने, पहचान पर ही प्रहार कर देने की जो परंपरा चली है, उसके खिलाफ. जहां तक पसंदीदा लेखकों की बात है तो हिंदी में उदय प्रकाश, अंग्रेजी में मिलान कुंदरा और उर्दू में इंतजार हुसैन मेरे प्रिय लेखक हैं.

ह्त्याग्रही गांधी!

फोटो- विजय पांडेय

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वरुण गांधी बीते दिनों दो कारणों से चर्चा में रहे. एक, उनके खिलाफ चल रहे भड़काऊ भाषण के मुकदमों में उन्हें बरी कर दिया गया और दूसरा उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिया गया. तहलका की इस रिपोर्ट में ऐसी तमाम सच्चाइयां सामने आई हैं जिनसे साफ होता है कि वरुण इन दोनों में से किसी के भी हकदार नहीं हैं. तहलका के खुफिया कैमरों और इन मामलों से जुड़े दस्तावेजों में कैद तथ्यों से साबित होता है कि वरुण ने असल में वे सारे अपराध किए थे जिनके आरोपों में उन पर मुकदमे चल रहे थे. इतना ही नहीं, इस पड़ताल से यह भी साफ होता है कि कैसे भड़काऊ भाषणों के इन आपराधिक मामलों को निपटाने के फेर में भी कई अपराध किए गए. तहलका की यह रिपोर्ट आपको यह भी बताएगी कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए वरुण गांधी क्यों इस पद के लायक नहीं हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी ही पार्टी के खिलाफ गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं.

इस कहानी की शुरुआत साल 2009 से होती है. उस साल हुए लोकसभा के आम चुनावों ने गांधी परिवार के एक और सदस्य वरुण गांधी को राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर ला खड़ा किया था. इससे पहले वरुण की पहचान सामान्य ज्ञान के उस प्रश्न से ज्यादा नहीं थी कि ‘इंदिरा गांधी के दूसरे पोते का नाम क्या है’? उनके चचेरे भाई-बहन राहुल-प्रियंका सालों पहले देश भर में चर्चित हो चुके थे, जबकि वरुण को उस वक्त लोग ठीक से जानते तक नहीं थे. सालों से गुमनामी में रहे वरुण अचानक ही मार्च 2009 में सारे देश में चर्चा का केंद्र बन गए. वह नाम और चर्चा, जो हमारे देश में नेहरू-गांधी परिवार के ज्यादातर वारिसों को एक प्रकार से मुफ्त में मिलती रही है, वह उन्होंने भी एक झटके में हासिल कर ली. लेकिन वरुण का यह रूप नया था. गांधी-नेहरू परिवार की परंपरा के विपरीत. इन सबसे ज्यादा भारत के उस विचार के तो बिल्कुल ही उलट जिसे स्थापित करने में उनके परनाना जवाहरलाल नेहरू की भूमिका बहुत बड़ी थी.

फोटो- विजय पांडेय
फोटो- विजय पांडेय

वरुण अपने चुनावी मंच से मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे थे और सारा देश स्तब्ध था. कई दिनों तक उनके भड़काऊ भाषण टीवी पर छाए रहे. उनकी अलग-अलग सभाओं की नई-नई सीडी सामने आती गईं और वे हर बार पहले से भी ज्यादा जहर बुझे नजर आए. गांधी उपनाम वाले किसी शख्स को इस रूप में देखना सारे देश के लिए ही चौंकाने वाला था. उन पर एक समुदाय के खिलाफ नफरत से भरे भाषण देने और सांप्रदायिक हिंसा का माहौल तैयार करने के आरोप में दो मुकदमे दर्ज किए गए. उन्हें बीस दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा. मगर पीलीभीत में विवादों से वरुण का यह कोई पहला सामना नहीं था और न ही आखिरी. अगस्त, 2008 में अपनी पीलीभीत यात्रा के दौरान ही उन पर मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का एक मुकदमा दर्ज हो चुका था. और वरुण गांधी ने जब पीलीभीत की अदालत में अपने भड़काऊ भाषणों के मामले में आत्मसमर्पण किया था उस वक्त वहां हुई हिंसा के चलते भी उन पर एक और मामला दर्ज किया गया था. इसमें उन पर दंगा-फसाद करवाने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोप थे.

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      एक नजर में

  • 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान वरुण गांधी पीलीभीत में अपनी चुनावी रैली के दौरान मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण देते हुए कैमरे पर कैद हुए.
  • उनके खिलाफ कुल तीन मामले दर्ज हुए. बरखेड़ा और डालचंद में भड़काऊ भाषण देने के दो मामले और पीलीभीत कोर्ट मंे समर्पण के दौरान दंगा भड़काने, पुलिस पर हमला करने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का एक मामला दर्ज हुआ.
  • इस साल चार मई तक वरुण गांधी इन सभी मामलों से बरी हो गए. चमत्कारिक रूप से इन मामलों में गवाह बनाए गए सभी 88 गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गए. शायद यह आपराधिक मामलों के इतिहास में पहला मामला होगा जिसमें इतनी बड़ी संख्या में गवाह पक्षद्रोही सिद्ध हुए.
  • तहलका की तहकीकात में कई विस्फोटक सच्चाइयां सामने आई हैं. न्यायिक प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा गया. खोजबीन करने पर गवाह, पुलिस, अभियोजन, जज, समेत हर व्यक्ति की भूमिका संदेह के घेरे में दिखी.
  • गवाही बदलने के लिए पुलिस द्वारा कुछ गवाहों को धमकाया गया, वरुण गांधी द्वारा कुछ गवाहों को रिश्वत दी गई. इसके अलावा जज की अनुपस्थिति में ही गवाहों की गवाही हो गई. उनके अंगूठे के निशान  लेकर उन्हें वापस भेज दिया गया. अभियोजन पक्ष ने फोरेंसिक विशेषज्ञ जैसे कई अहम गवाहों को गवाही के लिए समन तक जारी नहीं किया. कईयों से सवाल जवाब तक नहीं किया गया. ये बातें गवाहों ने तहलका के खुफिया कैमरे पर स्वीकार की हैं.
  • वरुण गांधी को हाल ही में भाजपा का महासचिव बनाया गया है. लेकिन तहलका की तहकीकात इस बात को भी साबित करती है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को चुनाव में हरवाने का काम किया. उन्होंने अपने उम्मीदवार को हराकर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रियाज अहमद को जिताने के निर्देश दिए. बदले में रियाज अहमद ने मुस्लिम गवाहों के बयान बदलवाने में मदद की.
  • तहलका के पास पीलीभीत भाजपा के दो महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की बातचीत का ऑडियो मौजूद है जिसमें वे इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि वरुण गांधी ने उनसे कहा है कि विधान सभा चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी सतपाल गंगवार को हराना है. सतपाल गंगवार भी तहलका के सामने यह स्वीकार करते हैं कि वरुण गांधी ने ही उन्हें विधानसभा चुनाव हरवाने का निर्देश दिया.
  • वरुण गांधी के काफी करीबी और पीलीभीत जिले के भाजपा उपाध्यक्ष परमेश्वरी गंगवार ने तहलका के खुफिया कैमरे पर कुछ बेहद चिंताजनक और गंभीर राज उगले. उन्होने विस्तार से बताया कि वरुण गांधी ने वे सारे नफरत से भरे भाषण दिए थे जिनकी चर्चा हुई थी. उन्होंने समाजवादी पार्टी के विधायक रियाज अहमद के बारे में भी बताया कि मुस्लिम गवाहों के बयान बदलने में उन्होंने भूमिका निभाई. इसके अलावा गवाहों को धमकाने और उनके बयान बदलवाने में तत्कालीन एसपी अमित वर्मा की सबसे बड़ी भूमिका सामने आ रही है.
  • वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण को रिकॉर्ड करने वाले और इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे तीन मीडियाकर्मी. ये तीनों भी अपनी गवाही के दौरान मुकर गए. तारिक अहमद ने कहा कि उन्होंने भाषण रिकॉर्ड जरूर किया था लेकिन उन्होंने वरुण गांधी का भाषण नहीं सुना था. कोर्ट ने इस हास्यास्पद बयान पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया. रामवीर सिंह ने स्वीकार किया कि उसने और तारिक दोनों ने वह भाषण सुना था और उन्होंने तहलका को बताया, ‘इस मामले में अभियोजन पक्ष समेत हर कोई बिका हुआ था.’ तीसरे मीडियाकर्मी शारिक परवेज ने इसकी पुष्टि करते हुए यह भी कहा कि रामवीर और तारिक भी इस मामले में बिके हुए थे.
  • पीलीभीत से विधायक और सपा सरकार में मंत्री रियाज अहमद के वरुण गांधी की मां मेनका गांधी के साथ पुराने राजनीतिक रिश्ते हैं. रियाज अहमद ने भी तहलका के कैमरे पर इस बात की पुष्टि की है कि इस मामले में नियम-कानूनों को जमकर तोड़ा-मरोड़ा गया और वरुण गांधी को लाभ पहुंचाया गया.
  • महज अपने राजनीतिक फायदे के लिए और भड़काऊ भाषण के अपराध से बचने के फेर में वरुण गांधी ने शर्मनाक तरीके से तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को ध्वस्त किया.

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वरुण गांधी अब एक बार फिर से चर्चा में हैं . इस बार मामला और भी ज्यादा चौंकाने वाला है. जिन वरुण गांधी को सारे देश ने टीवी चैनलों पर सांप्रदायिक और भड़काऊ भाषण देते सुना था, उन्हें एक-एक कर सभी मामलों में दोषमुक्त किया जा चुका है. हज़ारों की भीड़ के सामने उन्होंने जो भड़काऊ भाषण दिए थे और जिन्हें करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा था उनसे जुड़े दोनों मामलों में वे इसलिए बरी कर दिए गए कि कोर्ट को उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले. मारपीट का मुकदमा कहां गायब हो गया इसकी किसी को खबर भी नहीं हुई. वरुण के आत्मसमर्पण के वक्त हुई हिंसा के मामले में भी चार मई को पीलीभीत की सत्र अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया.

तहलका ने जब वरुण को दोषमुक्त करने वाले न्यायालय के फैसलों और अन्य दस्तावेजों पर नजर डाली तो उनमें कई ऐसी खामियां सामने आईं जिनसे यह साफ था कि वरुण को एकतरफा फायदा पहुंचाया गया है. वरुण गांधी के भाषण और आत्मसमर्पण से जुड़े तीन मामले शायद भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक रिकॉर्ड होंगे जिनमें कुल मिलाकर सभी 88 गवाह पक्षद्रोही हो गए. वरुण से जुड़े एक मामले में दो ही दिन में अदालत में 18 गवाहों को पेश किया गया और इन गवाहों के विरोधाभासी बयानों पर सरकारी वकील और कोर्ट ने कोई सवाल खड़ा नहीं किया. इस मामले की जांच के दौरान वरुण गांधी ने अपनी आवाज का नमूना देने से ही इनकार कर दिया और अभियोजन पक्ष ने बिना किसी विरोध के इस बात को स्वीकार कर लिया. मामले के ट्रायल के दौरान कई अहम गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया और इसकी अर्जी खुद सरकारी वकील ने यह कहकर दी कि उन गवाहों को कोर्ट में बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है. ऊपरी तौर पर मुआयना करने से ही पता चल जाता है कि वरुण गांधी से जुड़े मामलों को कदम-कदम पर कमजोर करने का प्रयास सिर्फ बचाव पक्ष ने ही नहीं किया, बल्कि अभियोजन ने भी इसमें उसका पूरा साथ दिया.

इसके बाद जब तहलका ने वरुण गांधी से जुड़े मामलों की तहकीकात शुरू की तो परत दर परत ऐसी सच्चाइयां सामने आईं जिनमें पीलीभीत के वर्तमान एसपी अमित वर्मा, सरकारी वकील, भाजपा के नेता और प्रदेश सरकार सबके हाथ रंगे मिले. इन मामलों में गवाह बनाए गए लोगों और खुद जिले के भाजपा उपाध्यक्ष परमेश्वरी गंगवार ने तहलका को बताया कि किस तरह से पीलीभीत के पुलिस अधीक्षक और अन्य पुलिस अधिकारियों ने गवाहों को धमकाया और कम से कम एक गवाह के यहां स्वयं वरुण गांधी के यहां से गवाही बदलने के लिए फोन किया गया. इसके अलावा इन गवाहों ने जो सनसनीखेज सच उजागर किया उसके मुताबिक कोर्ट में न्यायिक प्रक्रियाओं का जमकर मखौल उड़ाया गया, जज की नामौजूदगी में ही उन सबकी गवाहियां हो गईं, उनके बयान खुद वकील ने लिखे और उनसे सिर्फ अंगूठा लगवाया गया या दस्तखत करवाए गए. इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और उनके एक मंत्री तक ने वरुण को बरी करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई.

पहले शुरुआत वहां से जहां से वरुण की विवादित राजनीतिक यात्रा शुरू हुई.

वरुण गांधी का राजनीतिक सफर साल 2008 में शुरू हुआ. अपने पहले चुनाव के लिए उन्होंने पीलीभीत संसदीय सीट को चुना जहां से पिछली कई लोकसभाओं में उनकी मां मेनका गांधी सांसद रही थीं. जब उन्होंने अपने होने वाले चुनाव क्षेत्र का भ्रमण शुरू किया तो शुरू में उनके साथ उनके दिल्ली के ही ज्यादातर साथी होते थे. एक अगस्त, 2008 को वरुण अपने इन्ही साथियों के साथ पीलीभीत से 22 किलोमीटर दूर बरखेड़ा नाम के कस्बे की ओर जा रहे थे. इसी रास्ते पर एक गांव पड़ता है ज्योरह कल्यानपुर. इस गांव की सड़क उस वक्त काफी खराब थी जिस कारण वरुण की गाड़ी एक गड्ढे में फंस गई. वरुण अपने साथियों के साथ गाड़ी से उतर गए और उन्होंने लोगों से बात करनी चाही. इस गांव में ज्यादातर स्थानों पर किसान मजदूर संगठन एवं कांग्रेस पार्टी के झंडे लगे थे. यह बात वरुण को पसंद नहीं आई. उन्होंने गांववालों से पूछा कि यहां ये झंडे क्यों लगे हैं? भरतवीर गंगवार नाम के एक स्थानीय दुकानदार ने जवाब में कहा कि ‘किसान मजदूर संगठन ने यहां के किसानों के लिए काम किया है इसलिए उनके झंडे लगे हैं.’

भरतवीर के गांव के निवासी और इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी फूल चंद ‘आचार्य जी’ यह पूरा किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, ‘वरुण ने भरतवीर से गुस्से में कहा कि यहां किसानों के लिए जो कुछ भी किया है वह मेरी मां ने किया है. भरतवीर ने उन्हें जवाब दिया कि किसान नेता वीएम सिंह ने गन्ना किसानों के हितों की लड़ाई लड़ी है इसलिए यहां लोग उनका समर्थन करते हैं. यह बात वरुण को नागवार गुजरी और उन्होंने भरतवीर को थप्पड़ मार दिया. बस, वरुण के हाथ छोड़ते ही उनके अन्य साथी भी भरतवीर को पीटने लगे. गांव के लोगों ने छुड़ाने की कोशिश की लेकिन उन लोगों के पास हथियार भी थे और वरुण गांधी के सामने किसी की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी.’

एक अगस्त को ही शाम 6.30 बजे भरतवीर ने थाना बरखेड़ा में वरुण गांधी और उनके सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई जिसमें फूल चंद का नाम भी बतौर गवाह दर्ज था. उधर, वरुण की ओर से भी तत्कालीन भाजपा जिलाध्यक्ष योगेंद्र गंगवार ने रात को लगभग 9.10 बजे एक एफआईआर दर्ज करवा दी. जहां पहली रिपोर्ट में वही लिखा था जो फूलचंद ने हमें बताया था, दूसरी रिपोर्ट में कहा गया था कि भरतवीर ने देसी तमंचे से वरुण गांधी पर गोली चलाई, उनसे दस हजार रुपये लूट लिए और अपने साथियों के साथ तमंचे लहराता हुआ फरार हो गया. पुलिस ने दोनों मामलों की जांच की, भरतवीर के खिलाफ दर्ज किए गए मामले को झूठा पाया और 22 अक्टूबर, 2008 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए इसे बंद कर दिया. वहीं वरुण गांधी के खिलाफ दर्ज हुए मामले को पुलिस जांच में सही पाया गया और 24 दिसंबर को पुलिस ने इस मामले में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. केस नंबर 2362/08 के रूप में दर्ज हुआ यह मामला पीलीभीत जिले में वरुण गांधी के खिलाफ दर्ज हुआ पहला आपराधिक मामला था.

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अब तक वरुण अपने संभावित संसदीय क्षेत्र में अपना जनाधार देख चुके थे. उन्हें अंदाजा हो चुका था कि इस क्षेत्र में सिर्फ गांधी परिवार का नाम उनकी जीत सुनिश्चित नहीं करवा सकता. ऐसा सोचने के उनके पास और भी कारण थे. हाल ही में हुए परिसीमन के चलते इस संसदीय क्षेत्र से कुछ ऐसे इलाके बाहर हो गए थे जहां से मेनका गांधी को एकतरफा वोट पड़ा करते थे. इसके अलावा हिंदू-मुसलमानों की मिली-जुली आबादी वाला बहेड़ी अब पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में आ चुका था. पीलीभीत संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभाओं में से तीन पर मुस्लिम विधायक थे जबकि क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 35 प्रतिशत ही थी. वरुण गांधी को इन्हीं समीकरणों में अपनी जीत का रास्ता नजर आया और उन्होंने पूरे चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील कर दिया.

चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने का उनका यह खेल शुरू हुआ फरवरी, 2009 से. स्थानीय लोगों के मुताबिक सबसे पहले 22 फरवरी को उन्होंने पीलीभीत के ललोरी खेडा इलाके के ‘राम मनोहर लोहिया बालिका इंटर कॉलेज’ में खुद को देश का एकमात्र हिंदुओं का रखवाला घोषित किया और मुसलमानों के खिलाफ बोलना शुरू किया. ललोरी खेड़ा में हुई वरुण की इस सभा में भड़काऊ भाषण दिए जाने का जिक्र उस चुनाव याचिका में भी किया गया है जो वरुण के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी. पिछले करीब डेढ़ महीने के दौरान तहलका ने पीलीभीत जिले में जिनसे भी बात की उनमें से ज्यादातर लोगों ने हमें यह बताया कि 2009 के आम चुनावों से पहले वरुण जहां भी सभाएं कर रहे थे,  हर जगह गीता की कसमें खाते हुए मुसलमानों के हाथ और गले काटने की बातें कर रहे थे.

छह मार्च, 2009 को वरुण को पीलीभीत के देशनगर मोहल्ले में एक सभा को संबोधित करना था. तब तक पीलीभीत में ज्यादातर लोगों को यह मालूम हो गया था कि वरुण गांधी के भाषणों का विषय क्या होता है. वरुण के समर्थक सभा में आए किसी भी व्यक्ति को वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं देते थे और इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाता था कि कोई भी वीडियो कैमरा लेकर सभा में न पहुंच पाए. रात को लगभग नौ बजे वरुण देशनगर में सभा को संबोधित करने पहुंचे. स्थानीय पत्रकार शारिक परवेज के मुताबिक जब उन्होंने इस सभा की वीडियो रिकॉर्डिंग करनी चाही तो वरुण के समर्थकों ने उनका कैमरा बंद करवा दिया. शारिक सिर्फ कुछ मिनट ही वरुण के भाषण को रिकॉर्ड कर पाए. वरुण देशनगर के निवासियों को हिंदू धर्म का वास्ता देते हुए चेतावनी दे रहे थे कि ‘यदि हिंदू धर्म को बचाना है तो मुझे वोट देने जरूर जाना और जो हिंदू वोट नहीं डालेगा वो अपने धर्म से गद्दारी कर रहा होगा.’ वरुण इस भाषण में लोगों को यह भी चेतावनी दे रहे थे, ‘देखिए! ये मुसलमान चाहें जो भी बोलें .. उनका एक-एक वोट जाना है उस कटुवे के लिए .. समझे? तो आपका एक-एक वोट जाना चाहिए हिंदुस्तान के लिए…’

इस बीच इस मोहल्ले के ही एक स्थानीय युवा शैलेंद्र सिंह ने वरुण गांधी का यह पूरा भाषण अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया. शैलेंद्र बताते हैं, ‘मैं कई लोगों से ये बात सुन चुका था कि वरुण गांधी सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वाले भाषण लगातार दिए जा रहे हैं. इसलिए मैं सोच कर गया था कि उनका भाषण रिकॉर्ड कर लूंगा. वीडियो तो वहां कोई भी बना नहीं पा रहा था लेकिन मैंने अपने फोन की रिकॉर्डिंग ऑन करके उसे अपनी जेब में रख लिया और उनका पूरा ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया.’ (लगभग 28 मिनट का यह ऑडियो और बाकी ज्यादातर वीडियो जिनका जिक्र इस स्टोरी में किया गया है, तहलका के पास हैं).

अगले दिन यानी सात मार्च को वरुण पहुंचे पीलीभीत के मोहल्ला डालचंद में और यहां भी उन्होंने उसी तरह के मुस्लिम विरोधी भाषण दिए. वरुण अपने इन भाषणों में कई ऐसे आंकड़े भी लोगों को बताते थे जिनका हकीकत से तो कोई भी वास्ता नहीं था लेकिन इनसे जनता का ध्रुवीकरण आसानी से हो जाता था. उदाहरण के तौर पर, उन्होंने लोगों से कहा कि ‘पिछले कुछ समय में 13 हिंदू औरतों का बलात्कार हुआ और जिन मुसलमानों ने ये बलात्कार किए वो आज भी खुले घूम रहे हैं.’ तहलका ने इन तथाकथित बलात्कारों के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की मगर उसे ऐसा कोई मामला थाने में दर्ज नहीं मिला. मगर चुनाव के दौरान इस तरह की अफवाहें जंगल की आग की तरह फैलकर दो समुदायों के बीच गहरे तनाव की वजह बन रही थीं.

अब तक उनके भड़काऊ भाषणों की चर्चा सारे पीलीभीत में हो चुकी थी. आठ मार्च को जब वे बरखेड़ा नाम के कस्बे पहुंचे तो वहां कुछ पत्रकार उनका वीडियो बनाने में सफल हो गए. उनकी यही सभा थी जिसमें दिया हुआ उनका जहर बुझा भाषण सबसे पहले सारे देश ने 2009 में देखा था. बरखेड़ा के इस मंच पर कई साधु भी बैठाए गए थे. चूंकि उनकी यह सभा दोपहर में आयोजित की गई थी, इसलिए पत्रकारों को उनका वीडियो बनाने में उस तरह की परेशानी नहीं हुई जैसी कि इससे पहले की सभाओं में हो रही थी. इसके बाद वरुण गांधी के पहले बरखेड़ा और बाद में डालचंद में दिए भड़काऊ भाषण सभी राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर प्रसारित होने लगे. वरुण के सांप्रदायिक चेहरे को सारे देश ने देखा. मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग ने तत्कालीन एसपी और जिलाधिकारी पीलीभीत का तबादला कर दिया और जिला प्रशासन को वरुण के खिलाफ सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए.

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17 तथा 18 मार्च को वरुण गांधी के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में दो आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए. इनमें से एक डालचंद मुहल्ले से संबंधित था और दूसरा बरखेड़ा से. हालांकि वरुण के खिलाफ चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी और रिश्ते में उनके दूर के मामा वीएम सिंह ने देशनगर वाला ऑडियो चुनाव आयोग को भेजा था. साथ ही सिंह ने 16 अप्रैल, 2009 को घटना के चार प्रत्यक्षदर्शियों – प्रशांत कुमार रवि, मुख्तार अहमद, कादिर अहमद एवं शैलेंद्र सिंह – के शपथपत्र भी चुनाव आयोग को भेजे थे जिनमें इन चारों ने कहा था कि वरुण गांधी ने देशनगर में भी मुस्लिम समुदाय के विरोध में अपशब्द कहे थे और वे घटना की गवाही देने को तैयार हैं, लेकिन इस मामले को पुलिस द्वारा दर्ज नहीं किया गया.

कई दिनों तक राष्ट्रीय चैनलों पर वरुण के सांप्रदायिक भाषण ही चुनावी कवरेज का मुख्य मुद्दा बने रहे . उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त सहित तीनों चुनाव आयुक्तों ने बरखेड़ा की सीडी को देखने के बाद 22 मार्च को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश में आयोग द्वारा कहा गया था, ‘आयोग ने एक बार नहीं बल्कि कई बार इस सीडी को देखा है. हम इस तथ्य से पूरी तरह सहमत और आश्वस्त हैं कि इस सीडी से कोई भी छेड़छाड़ नहीं की गई है.’ चुनाव में वरुण गांधी को किसी अदालत द्वारा प्रतिबंधित किए जाने से पहले ऐसा न कर पाने की मजबूरी तो आयोग ने इस आदेश में जताई मगर यह भी कहा, ‘आयोग की सुविचारित राय में प्रतिवादी मौजूदा चुनाव में प्रत्याशी बनने के योग्य नहीं है…’

आरटीआई के दायरे में होंगी राजनैतिक पार्टियां

क्या है सूचना आयोग का फैसला ?
केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को सार्वजनिक संस्था मानते हुए उन्हे सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की घोषणा की है. अपने फैसले में सूचना आयोग ने छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को छह सप्ताह के अंदर जन सूचना अधिकारी नियुक्त करने और सूचना मांगे जाने पर चार सप्ताह के भीतर जानकारी उपलब्ध करवाने को कहा है. इस फैसले से पार्टियों के खर्च और चंदे आदि के हिसाब-किताब में पारदर्शिता आएगी. सूचना आयोग ने इस आधार पर फैसला दिया है कि राजनीतिक दल सरकार से वित्तीय मदद और रियायती दर पर भूमि आदि लेते रहते हैं लिहाजा वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं. फिलहाल राजनीतिक दलों के अंदरूनी लेन-देन की जानकारी सिर्फ उनके द्वारा भरे जाने वाले आयकर रिटर्न के आधार पर ही मिल पाती है.

सूचना आयोग में क्या अपील की गई थी ?
आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल और अनिल बैरवाल ने सूचना आयोग के समक्ष सभी राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार में लाने की मांग की थी. अपनी शिकायत में सुभाष अग्रवाल का कहना था कि कांग्रेस और भाजपा को दिल्ली में बेहद रियायती दर पर सरकारी जमीन मुहैया कराई गई है इसलिए ये दल जनता के प्रति जवाबदेह हैं. वहीं अनिल बैरवाल का तर्क था कि माकपा, भाकपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और बसपा जैसे दलों पर जनता का पैसा खर्च होता है लिहाजा ये आरटीआई की धारा 2 (एच) के तहत आते हैं. दोनों शिकायतों पर सुनवाई करते हुए तीन सदस्यों की पीठ ने तीन जून, 2013 को यह फैसला दिया.

फैसले पर राजनीतिक पार्टियों की प्रतिक्रिया क्या है ?
राजनीतिक दलों को सूचना आयोग का यह फरमान गले नहीं उतर रहा है. कांग्रेस, भाजपा और वाम पार्टियों समेत अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी खुद को आरटीआई कानून के दायरे में लाने का विरोध किया है. लगभग सभी दलों की एक ही राय है कि वे सरकारी संस्था नहीं हैं. कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी का तर्क है कि पार्टियां किसी कानून से नहीं बनी हैं और वे सरकारी धन पर नहीं चलतीं. सीपीएम का भी कहना है कि वह इस आदेश को नहीं मान सकती. इस हिसाब से तमाम गैरसरकारी संस्थाओं को भी आरटीआई के तहत लाना चाहिए, वे भी सरकार से रियायत पाते हैं.
-प्रदीप सती

बुजुर्ग का बाल हठ

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  • मैं छठी यात्रा पर निकला हूं. रामरथ यात्रा मेरी पहली यात्रा थी. उसका मेरे राजनीतिक जीवन में सबसे अहम स्थान है. इस हिन्दुस्थान में रामरथ यात्रा का आध्यात्मिक महत्व था.
  •  जयप्रकाश नारायण जी से हमारे बेहद आत्मीय संबंध थे. वे जनसंघ के अधिवेशन में गए थे. तब कई लोगों ने कहा था कि जनसंघ फासीवादी पार्टी है, उसके सम्मेलन में नहीं जाइए. जयप्रकाश जी ने कहा कि जिन्हें यह लगता है कि ‘जनसंघ फासीवादी पार्टी है उन्हें यह भी मानना चाहिए कि जयप्रकाश फासीवादी है.’
  • यह एक विशुद्ध राजनीतिक यात्रा है, जिसमें मैं भ्रष्टाचार की बात करूंगा. सभी जगह एक ही बात कहूंगा कि भ्रष्टाचार को हर स्तर पर देखिए. सिर्फ राजनीति का भ्रष्टाचार नहीं दिखे. सबको अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए.
  • डॉ राममनोहर लोहिया ने जनसंघ के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अखंड भारत की कल्पना का जोरदार समर्थन किया था. डॉ लोहिया और जयप्रकाश, दो ही नेता हुए जिन्होंने जनसंघ को पहचाना.
  •  1990 में इसी बिहार में मेरी रामरथ यात्रा रोकी गई थी. 21 साल बाद अब 2011 का समय है, जब उसी बिहार में एक मुख्यमंत्री मेरी यात्रा को हरी झंडी दिखा रहे हैं. यह बड़ा बदलाव है.
  •  दो साल पहले मैंने काले धन के मामले पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी. भ्रष्टाचार का मसला उठाया था. आज साफ दिख रहा है. यूपीए-2 का भ्रष्टाचार सामने आ रहा है.
  • हम केंद्र सरकार से मांग करते हैं कि वह काले धन के मामले पर आगामी शीतकालीन सत्र में श्वेतपत्र जारी करे और मजबूत लोकपाल बिल लाए.
  •  प्रधानमंत्री कौन होगा, यह पार्टी तय करेगी. मैंने 2009 में भी अपना नाम खुद से तय नहीं किया था. नीतीश कुमार पीएम बनेंगे या नहीं, यह एनडीए के साथी आपस में तय करेंगे. नरेंद्र मोदी ने बिहार से यात्रा शुरू करने पर बधाई दी है और अपने ब्लॉग पर मोदी ने लिखा है कि वे गुजरात में यात्रा का स्वागत करेंगे. वैसे नरेंद्र मोदी का कुछ कहना या लिखना इतना जरूरी क्यों है?

11 अक्तूबर को बिहार के सिताबदियारा से चलकर उसी शाम पटना पहुंचने और 12 अक्तूबर को पटना से रवाना होने के पहले करीबन 24 घंटे के अंदर लालकृष्ण आडवाणी द्वारा अलग-अलग सभाओं व सम्मेलनों में दिए गए बयान कुछ ऐसे ही थे. आडवाणी अपनी तरह से अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग बातें कहने की कोशिश करते रहे. कभी अभिभावक की भूमिका में भ्रष्टाचार पर पाठ पढ़ाते दिखे तो कभी रामदेव और अन्ना के आंदोलन में उठे मसलों को मिलाकर कॉकटेल बनाते. लेकिन भ्रष्टाचार पर भाषण देते हुए गलती से भी अन्ना हजारे का नाम लेने की गलती उन्होंने नहीं की. न ही काला धन वापसी के प्रसंग में रामदेव के आंदोलन की चर्चा की. हां, इस एक बात पर बार-बार जोर देते रहे कि दो साल पहले हमने काला धन और भ्रष्टाचार के सवाल पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी. शायद यह बताने की जुगत में कि रामदेव और अन्ना के आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठाने की कोशिश में मैं नहीं हूं बल्कि पहले मैंने ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला था. भ्रष्टाचार की मुखालफत का नायक मैं ही हूं, कोई और नहीं.

आडवाणी यह सब बताकर यह समझाने की कोशिश करते हैं कि वक्त के प्रवाह में सब बदल रहा है. मैं बदल गया हूं

आडवाणी अपने भाषणों में कभी सत्ता परिवर्तन, कभी व्यवस्था परिवर्तन तो कभी-कभी सत्ता परिवर्तन के जरिए व्यवस्था परिवर्तन का पाठ पढ़ाते हैं लेकिन कर्नाटक और उत्तराखंड में भाजपाई मुख्यमंत्री बदल दिए जाने के सवाल पर कुछ नहीं कहते. वे नीतीश कुमार के विकास की जमकर तारीफ करते हैं, उनके साथी अनंत कुमार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के विकास मॉडल को भी रखते हैं. मगर नरेंद्र मोदी का नाम गलती से एक बार भी नहीं लिया जाता. नीतीश की प्रशंसा करने के साथ ही वे यह भी जरूर बताते हैं कि दो दशक पहले इसी बिहार में सांप्रदायिक कहकर मुझे जेपी के ही एक शिष्य ने गिरफ्तार किया था. आज उसी बिहार में जेपी के ही दूसरे शिष्य मुझे गले लगा रहे हैं. आडवाणी यह सब बताकर यह समझाने की कोशिश करते हैं कि वक्त के प्रवाह में सब बदल रहा है. मैं बदल गया हूं. मेरी छवि ग्राह्य हो गई है. कुछ-कुछ धर्मनिरपेक्ष जैसी.

वे अलग-अलग सभाओं में अलग-अलग बातें बोलते हैं. कभी भटकाव, द्वंद्व और दुविधा जैसी स्थिति के साथ तो कई बार सामान्य भारतीय बुजुर्ग की तरह एकरागी हो जाते हैं. जैसे कि 11 अक्टूबर की शाम पटना की सभा में हुए. बचपन से फिल्म देखने का जो उनका शौक रहा है, उसे साझा करते रहे और फिर एक फिल्म और एक गीत पर ही आधा घंटा बोल गए. आडवाणी उस समय भी एकरागी बुजुर्ग से हो जाते हैं जब पहले संवाददाता सम्मेलन में ग्लोबल फाइनैंशियल इंटेग्रिटी रिपोर्ट व एक किताब को हाथ में लेकर अपनी धुन में बोलते जाते हैं. वे और बोलते लेकिन बीच में ही रविशंकर प्रसाद इशारे में रोकते हैं कि बस, हो गया, अब बात बदलिए. लेकिन तमाम भटकाव-द्वंद्व-दुविधा और एकरागी होने के बावजूद सभी सभाओं में आडवाणी 90 के दशक की अपनी रामरथ यात्रा का स्मरण जरूर करते हैं. गर्व के साथ.

कांग्रेस, लोजपा, राजद जैसी पार्टियां भी आडवाणी की इस यात्रा में अपने लिए संभावना के सूत्र तलाशने में लगी हुई हैं

आडवाणी के बोलने से पहले इस जनचेतना यात्रा की कमान संभाल रहे यात्रा संयोजक व भाजपा के महामंत्री अनंत कुमार सभी जगह विस्तार से बताते हैं कि यह यात्रा 38 दिनों की है. 23 प्रांतों से गुजरेगी. 7600 किलोमीटर का सफर होगा. आडवाणी सभी जगह जनचेतना फैलाएंगे और फिर दिल्ली में संसद के शीतकालीन सत्र से पहले विराट सभा करेंगे. अनंत कुमार साफ-साफ कहते हैं कि दिल्ली में सत्ता बदलना जरूरी है. अलग-अलग सभाओं में पहुंच रहे दूसरे भाजपा नेता भी खुलकर इस यात्रा का मकसद सत्ता परिवर्तन बताते हैं, लेकिन आडवाणी खुद ऐसा नहीं कहते. आडवाणी खुद स्पष्ट नहीं कर रहे कि 84 साल की उम्र में 7600 किलोमीटर की यात्रा पर वे क्यों निकले हैं. अपनी पत्नी कमला आडवाणी, बेटी प्रतिभा आडवाणी के साथ इस यात्रा में ही आठ नवंबर को वे अपना जन्मदिन मनाएंगे, उम्र के 85वें साल में प्रवेश करेंगे. परिवार के सभी सदस्यों को साथ लेकर बुजुर्ग आडवाणी किससे लड़ने निकले हैं, यह भी नहीं बता रहे. क्या खुद की उम्र को चुनौती देने और उसके जरिए यह दिखाने-बताने कि अभी वे अपनी पारी जारी रखने में सक्षम हैं! पहले पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने, फिर प्रतिपक्ष के नेता का पद भी ले लिए जाने के बाद वे भाजपा के अंतर्द्वंद्व से निपटने, संघ की छाया से बाहर निकलकर आखिरी पारी में अपनी ताकत दिखाने के अभियान में निकले हैं. या फिर सीधे-सरल शब्दों में वही एक बात कि वे अपनी चिरप्रतीक्षित मुराद को पूरा करने यानी एक बार किसी तरह से प्रधानमंत्री बनने के लिए माहौल तैयार करने निकले हैं.

‘लौह पुरुष’ का दुविधाग्रस्त मौन

सिताबदियारा हो, छपरा या बिहार की राजधानी पटना, आम जनों के बीच संदेश स्पष्ट है कि यह अभियान भ्रष्टाचार के खिलाफ जनचेतना तो नहीं ही है क्योंकि अगर ऐसा होता तो यह बिहार की बजाय कहीं और से शुरू होना चाहिए था. बिहार में तो आडवाणी खुद बता रहे हैं कि यहां सुशासन है, भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने की कोशिश एनडीए की सरकार कर रही है. तो फिर यहां अलग से जनचेतना की क्या जरूरत थी? यह यात्रा कर्नाटक से शुरू होती तो भ्रष्टाचार के मसले पर जनचेतना जैसी बात हजम होती. पड़ोस के झारखंड से शुरू होती तो भी बात हजम होती. उत्तर प्रदेश से भी शुरू होती तो बात हजम होती.

कभी अपने दम पर पार्टी को खड़ा कर चुके आडवाणी में यह साहस नहीं कि वे अपनी खुली मंशा भी खुलकर बता सकें

सिताबदियारा, जहां से यह यात्रा शुरू हुई, वहां जनता दल यूनाइटेड के उपाध्यक्ष विकल जैसे कुछ नेताओं ने मंच से गला फाड़-फाड़कर कहा कि आडवाणी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार को बदलने की जरूरत है, लेकिन सिताबदियारा में विकल जैसे नेताओं की बात दबकर रह गई. सिताबदियारा से हवाई मार्ग से छपरा पहुंचने पर आडवाणी के सामने ही भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढ़ी जैसे नेता खुलकर बोलते रहे कि केंद्र की सरकार बदलने के लिए यह यात्रा है. पटना की सभा में शत्रुघ्न सिन्हा भी आडवाणी के सामने ही हुंकार भरने वाली आवाज में सबको सुनाते रहे कि उम्र पर मत जाइए, जेपी भी बुजुर्ग ही थे, जब उन्होंने युवाओं के आंदोलन की अगुवाई की और बाबू कुंवर सिंह भी 80 पार के ही थे, जब अंग्रेजों से लड़ने निकल पड़े थे. शत्रुघ्न सिन्हा आरएसएस के नागपुर मुख्यालय तक अपनी बात पहुंचाना चाह रहे थे या पटना के गांधी मैदान में उपस्थित जनता को सुनाना चाहते थे, लेकिन वे खुलकर कह रहे थे कि आडवाणी के नेतृत्व में ही सत्ता परिवर्तन होगा और फिर व्यवस्था परिवर्तन. और फिर इतने के बाद जब आडवाणी से भी पूछा जाता है तो वे साफ-साफ कहने की बजाय बात घुमाते हैं. यह पूछने पर कि आप पीएम बनना चाहते हैं- आडवाणी साफ-साफ ना या हां कहने की बजाय यह कहते हैं कि यह पार्टी तय करेगी. आडवाणी पीएम पद के लिए ना नहीं कह रहे इससे यह साफ है कि उनकी उम्मीदें अभी टूटी नहीं हैं, लेकिन यह जनचेतना यात्रा उन्हीं उम्मीदों को पंख लगाने के लिए है यह बताने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे. कभी अपने दम पर पार्टी को खड़ा करने और सत्ता तक पहुंचाने वाले आडवाणी में यह साहस नहीं है कि वे अपनी एक खुली मंशा को भी खुलकर बता सकें. या ये एक बुजुर्ग नेता के पारंपरिक मूल्य हैं, उस नेता के जो खुद के बारे में खुद कहने की बजाय दूसरों से कहलवाना-सुनना चाहता है.

किसके आडवाणी

पटना के मौर्य होटल में प्रेसवार्ता के दौरान एक दृश्य देखने लायक था. आडवाणी के पास एक सवाल गया कि आपके दायें-बायें प्रधानमंत्री पद के दोनों उम्मीदवार बैठे हुए हैं…अभी सवाल पूरा होता कि बायीं ओर बैठी लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज किसी शरमाती हुई गंवई महिला की तरह मुंह पर हाथ रखकर इशारे में कहती रहीं, क्या कह रहे हैं, मैं नहीं हूं उम्मीदवार. उस समय आडवाणी की दायीं ओर बैठे राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेतली मौन साधकर मंद-मंद मुस्कुराते रहे. उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. जेतली के मौन और सुषमा के दबे हुए इनकार के अपने-अपने मायने हैं.

आडवाणी की यात्रा के आरंभ में, आडवाणी के बाद इन्हीं दोनों वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति थी. रविशंकर प्रसाद भी थे, शाहनवाज हुसैन भी थे, राजीव प्रताप रूढ़ी भी थे लेकिन ये तीनों बिहार के ही हैं, इसलिए इनका होना कोई बहुत अहम नहीं है. अनंत कुमार यात्रा के संयोजक हैं, इसलिए उनका रहना स्वाभाविक माना गया. सिताबदियारा में, जहां से आडवाणी की यात्रा की शुरुआत हुई, वह बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर है. वहां बिहार के भाजपाइयों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कुछ नेता ही दिखे जिनमें मिर्जापुर के पूर्व सांसद बिरेंद्र सिंह मस्त, उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री भरत सिंह और प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ही थे. राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के हैं, उनका नहीं रहना सवाल बना रहा. कलराज मिश्र सिताबदियारा में नहीं थे, यह भी सवाल बना रहा. भाजपा के मुख्यमंत्री कई प्रदेशों में है. पास के झारखंड में, मध्य प्रदेश में, छत्तीसगढ़ में, कर्नाटक में, उत्तराखंड में. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नहीं आने का कारण तो साफ है कि तब नीतीश कुमार यात्रा का स्वागत करने और हरी झंडी दिखाने को नहीं रहते और शायद यह यात्रा भी बिहार से शुरू नहीं हो पाती. छोटे मोदी यानी बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी सांकेतिक तौर पर यह कहकर नरेंद्र मोदी को चुनौती देते हैं कि विकसित प्रदेश की कमान संभालकर उसे विकसित बनाने का दावा करना कोई उपलब्धि नहीं होती, बिहार जैसे राज्य में कोई कुछ करके दिखाए, उसका महत्व ज्यादा है. लेकिन मोदी के अलावा दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्री क्यों आडवाणी की इस संभावित आखिरी राजनीतिक यात्रा में नहीं पहुंच सके? जबकि नरेंद्र मोदी ने सिर्फ उपवास किया तो वहां हाजिरी लगाने पहुंचे नेताओं की फौज थी. और तो और, पड़ोसी राज्य झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तक इसमें शामिल हुए थे. मगर वे आडवाणी की यात्रा के शुरुआती उत्सव में शामिल नहीं हुए. इन सबके बीच सवालों का सवाल यह रहा कि इस यात्रा के आरंभ में ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी उपस्थिति से लेकर औपचारिक चर्चा तक में क्यों गायब किए जा रहे हैं. यदि यह भाजपा के पवित्र उद्देश्यों को लेकर की जा रही राष्ट्रव्यापी यात्रा है तो इस आयोजन के आरंभ में पार्टी अध्यक्ष गडकरी आखिर कुछ देर के लिए भी क्यों नहीं आ सके? उत्तर प्रदेश की सीमा से भी यात्रा की शुरुआत होने के बावजूद राजनाथ सिंह क्यों नहीं दिखे? दिखने के लिए भी दिखते तो ये सवाल नहीं उठते. एक भाजपा नेता कहते हैं, ‘राजनाथ सिंह कभी नहीं चाहते कि आडवाणी का कद बढ़े और गडकरी पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि यह यात्रा प्रधानमंत्री पद के लिए नहीं है.’

उत्तराधिकार अभियान वाया प्रतिभा की प्रतिभा

मंच पर बैठे-बैठे आडवाणी जब पसीने से तर-ब-तर हो जाते हैं तो बगैर मांगे ही पीछे से उन्हें नैपकिन पकड़ाया जाता है. आडवाणी चेहरे को पोंछते हैं और फिर पीछे हाथ बढ़ा देते हैं. उनके हाथ से नैपकिन ले लिया जाता है. आडवाणी सिर्फ पीछे मुड़कर देखते भर हैं, बगैर उनके कुछ बोले ही समझ लिया जाता है कि उन्हें पानी चाहिए. उनके हाथों में पानी का ग्लास दे दिया जाता है. आडवाणी की दैहिक भाषा से ही उनकी जरूरतों को समझने की समझ कोई अर्दली नहीं बल्कि उनकी 33 वर्षीया बेटी प्रतिभा आडवाणी रखती हैं. प्रतिभा इस यात्रा में अपने पिता के साथ परछाईं की तरह दिख रही हैं. यात्रा के पहले दिन से ही. खुद कहीं कुछ नहीं बोलतीं लेकिन उनके बारे में हर सभा में बोला जाता है. सिताबदियारा के मंच पर आडवाणी के आगमन के पहले मंच से उद्घोषक बार-बार बताते रहे कि आज लालकृष्ण आडवाणी की धर्मपत्नी कमला आडवाणी और पुत्री प्रतिभा आडवाणी भी यहां आ रही हैं. कमला आडवाणी नहीं आ सकीं, 33 वर्षीय प्रतिभा जरूर दिखीं. सिताबदियारा में प्रतिभा सिर्फ दिखीं, थोड़ी देर बार छपरा पहुंची तो जनचेतना यात्रा के लिए तैयार थीम साॅन्ग ‘अब बस…’ को सुनाने-बजाने के पहले प्रतिभा को दिखाया गया. छपरा में मंच का संचालन कर रहे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढ़ी ने प्रतिभा से आग्रह किया कि वे खड़ी होकर सबका अभिवादन स्वीकार करें. और फिर छपरा से पटना आते-आते यात्रा के पहले दिन की आखिरी सभा में आडवाणी ने खुद अपनी बेटी के बारे में बोला-बताया. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपनी बेटी प्रतिभा के साथ मिलकर अपनी यात्रा का यह थीम सॉन्ग तैयार किया है.

प्रतिभा अपने पिता की सभाओं और यात्राओं में पहले भी जाती रही हैं लेकिन टीवी एेंकरिंग से अपनी पहचान बनाने के बावजूद इनमें मौन गुड़िया की तरह ही दिखती रही हैं. इस बार भी मौन ही साधे हुए हैं लेकिन हर सभा में उनके नाम की चर्चा जरूर हो रही है. सभा-सम्मेलन क्या, संवाददाता सम्मेलन में भी एक बार वे जरूर दिखती हैं. कुछ बोलती नहीं, कभी-कभी तसवीर लेती हैं, वीडियो रिकाॅर्डिंग करती हैं और फिर आडवाणी की कुरसी के पीछे बैठी रहती हैं. कहा जा रहा है कि आडवाणी संभवतः अपनी आखिरी राजनीतिक यात्रा में निकले हैं तो उनके साथ उनकी पत्नी और बेटी का होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं क्योंकि वे लगभग 40 दिन तक यात्रा में रहेंगे. यात्रा के दौरान ही आडवाणी का जन्मदिन भी आएगा. उम्र के हिसाब से यात्रा में आडवाणी का खयाल रखने वाला कोई अपना उनके साथ जरूर चाहिए. लेकिन जिस तरह से प्रतिभा मंचों पर दिख रही हैं, उनकी उपस्थिति दर्ज करवाई जा रही है, उससे यह सुगबुगाहट भी हो रही है कि कहीं आडवाणी आखिरी जोर लगाकर अपनी बेटी को राजनीति का पाठ तो नहीं पढ़ा रहे. भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन कहते हैं, ‘प्रतिभा पहले भी कई यात्राओं में हमेशा साथ रही हैं इसलिए इसके राजनीतिक मायने नहीं निकाले जाने चाहिए.’ लेकिन भाजपा के ही एक दूसरे नेता कहते हैं, ‘हो सकता है, आडवाणी जी की यह कामना भी हो. ‘

और अंत में, संभावनाओं के सूत्र की तलाश

आडवाणी की यह यात्रा अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी भाजपा की है या आडवाणी में आस्था रखने वाले और आडवाणी से राजनीतिक ककहरा सीखने वाले चंद भाजपाइयों की, यह देखा जाना अभी बाकी है. इस यात्रा के परोक्ष और प्रत्यक्ष एजेंडे का आकलन शुरू हो गया है और बाद में भी होगा. लेकिन इस यात्रा के आरंभ से ही इसमें संभावनाओं के सूत्र भी तलाशे जाने लगे हैं. पहली संभावना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मजबूत होने की देखी जा रही है. आडवाणी की इस यात्रा के आरंभ में सिताबदियारा में नीतीश कुमार मौजूद रहे. वे छपरा में भी थे. उन्होंने ही हरी झंडी भी दिखाई. पटना की सभा में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी मौजूद रहे. नीतीश की मौजूदगी और सहयोग का आडवाणी ने जमकर बखान किया. सहयोग के लिए तहेदिल से धन्यवाद दिया. शरद यादव पटना की सभा में बोलकर जब निकल गए तो मंच से सफाई भी दी गई कि शरद जी को कहीं जाना था इसलिए चले गए.

कांग्रेस, लोजपा, राजद जैसी पार्टियां भी आडवाणी की इस यात्रा में अपने लिए संभावना के सूत्र तलाशने में लगी हुई हैं. राजद के लालू प्रसाद यादव अचानक से अपनी ताकत बढ़ी हुई महसूस कर रहे हैं. लालू आडवाणी की यात्रा को 21 साल पुरानी यात्रा से जोड़कर खुद को फिर से सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति का केंद्र बताने-बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. रामविलास पासवान भी अपना राग अलाप रहे हैं. आडवाणी की यात्रा का विरोध कर रहे ये दोनों नेता आडवाणी के खिलाफ बोलकर तुरंत केंद्र की ओर टकटकी लगा देते हैं. किसी बच्चे की तरह कि देखो हमने आज यह कोशिश की है, अब तो एक चॉकलेट का हक बनता है. हिंदी प्रदेशों में संभावनाओं की तलाश में लगी कांग्रेस भी अपनी संभावना तलाशने में लगी हुई है. पटना में यात्रा के पहले ही कांग्रेस के तेजतर्रार नेता संजय निरूपम यहां पहुंचे और काला झंडा वगैरह दिखाने की बात मीडिया में कहते रहे. आडवाणी की यात्रा से किस-किसको फायदा होगा, यह देखा जाना अभी बाकी है. आडवाणी को, भाजपा को, विरोधियों को या सब कुछ टांय-टांय फिस्स हो जाएगा.

जब कलंकित हुआ क्रिकेट

मैच फिक्सिंग कांड (1999-2000)
पिछले कुछ सालों में क्रिकेट की छवि को सबसे ज्यादा धक्का मैच-फिक्सिंग कांडों का खुलासा होने से ही लगा है. 1999-2000 में मैच फिक्सिंग के खुलासे ने विश्व क्रिकेट को हिलाकर रख दिया था. इस कांड का खुलासा होने के बाद पूर्व कप्तान अजहरुद्दीन, अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर आदि पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इसके बाद भारत में क्रिकेट-प्रेम कुछ समय के लिए मृतप्राय-सा हो गया था.

गांगुली-चैपल विवाद (2005-2006)
पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल के बीच अहं और वर्चस्व की लड़ाई ने भी भारतीय क्रिकेट को शर्मसार किया. 2005 में जिम्बाब्वे दौरे के वक्त चैपल ने मीडिया से कहा कि गांगुली खेलने से बचने के लिए इंजरी का बहाना करते हैं. जवाब में गांगुली ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि चैपल समेत टीम प्रबंधन उनपर कप्तानी और टीम छोड़ने का दबाव बना रहा है. इसके बाद चैपल ने गांगुली की जबरदस्त आलोचना करने वाला ईमेल बीसीसीआई को भेजा जो लीक हो गया. इस विवाद ने चैपल की विदाई करवाई तो गांगुली के करियर के अंत की शुरूआत भी की.

स्लेजिंग विवाद (2007-2008)
क्रिकेट जिसे भद्रजनों का खेल कहा जाता है 2007-08 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर तब शर्मसार हो गया जब भारतीय स्पिनर हरभजन सिंह पर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज एंड्रयू साइमंड्स को जातिसूचक अपशब्द कहने का आरोप लगा. इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए आईसीसी मैच रेफरी माइक प्रॉक्टर ने हरभजन पर तीन टेस्ट मैचों की पाबंदी लगा दी साथ ही उन्हें कड़ी फटकार भी लगाई.

श्रीसंत-हरभजन थप्पड़ कांड (2008)
अप्रैल, 2008 में पहले आईपीएल में ही खेल भावना तब कलंकित हुई जब मोहाली में एक मैच के दौरान हरभजन सिंह ने साथी खिलाड़ी एस श्रीसंत को थप्पड़ रसीद कर दिया. इसके बाद पूरे देश में एक बखेड़ा खड़ा हो गया था जिसके बाद बीसीसीआई ने हरभजन सिंह पर आईपीएल के बाकी बचे 11 मैचों के लिए प्रतिबंध लगा दिया था.

शशि थरूर-ललित मोदी विवाद (2010)
अप्रैल 2010 में तत्कालीन आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी ने खुलासा किया कि कोच्चि टीम के मालिकों को लेकर स्थिति साफ नहीं है, ऐसा लगता है कि इसमें एक से ज्यादा लोगों ने गलत तरीके से पैसा लगाया है. इसके मालिकों में एक शशि थरूर (तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री) की दोस्त सुनंदा पुष्कर भी हैं जिन्हें टीम में 70 करोड़ रूपए के शेयर मुफ्त दिए गए हैं. मोदी ने कहा कि इस टीम को लेकर शशि थरूर लगातार उनपर दबाव बना कर उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं. इसके बाद थरूर ने मोदी पर वित्तीय घोटालों का आरोप लगाया साथ ही सुनंदा ने अपनी हिस्सेदारी छोड़ने की पेशकश की. लेकिन यह विवाद थरूर और मोदी दोनों की कुर्सी जाने के बाद ही थमा.

देहव्यापार, छेड़-छाड़ और रेव पार्टी (2012)
2012 में पुणे वारियर्स के दो खिलाड़ी राहुल शर्मा और वेन पार्नेल मुम्बई में हुई एक रेव पार्टी में आपत्तिजनक हालत में गिरफ्तार किए गए. इसी साल आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ल्यूक पाम्शबाक पर एक अमेरिकी महिला जोहल हमीद ने छेड़छाड़ और उनके मंगेतर से मारपीट करने का आरोप लगाया. 2012 में ही पुणे क्राइमब्रांच ने दो आईपीएल चीयरलीडर्स को छापा मारकर देह व्यापार के आरोप में गिरफ्तार किया.

स्पॉट फिक्सिंग(2012)
आईपीएल-5 के दौरान एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन में स्पॉट फिक्सिंग का खुलासा हुआ. इसके बाद मोहनीश मिश्र, शलभ श्रीवास्तव, टीपी सुधीन्द्र, अभिनव बाली और अमित यादव को फिक्सिंग के आरोप में निलंबित कर दिया गया. इसके अलावा पाकिस्तान के नदीम गौरी समेत कुछ अन्य अंपायर भी फिक्सिंग के आरोप में निलंबित हुए.

स्पॉट फिक्सिंग(2013)
इसी साल यानी आईपीएल-6 में स्पॉट फिक्सिंग को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ. 16 मई को दिल्ली पुलिस ने राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों श्रीसंत, अजीत चंदीला और अंकित चव्हाण को स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया. साथ ही पुलिस ने अलग-अलग जगहों से दस से ज्यादा सटोरियों, अभिनेता विंदू दारा सिंह और बीसीसीआई प्रमुख श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन को फिक्सिंग  के आरोप में गिरफ्तार किया.

मोहभंग की ओर

दशकों तक भारत में यह लगभग सर्वमान्य तथ्य रहा है कि यहां क्रिकेट धर्म की तरह है और सचिन तेंदुलकर इस धर्म के आराध्य. लेकिन पिछले दिनों घटी एक घटना हमें इस बात का इशारा देती है कि अब हमें सालों पुराने इस तथ्य को फिर से जांचना होगा. दिसंबर के आखिरी दिन थे. दिल्ली बलात्कार कांड से पूरा देश आहत और आक्रोशित था. ऐसे माहौल में यकायक खबर आती है कि क्रिकेट के खुदा सचिन तेंदुलकर ने वन-डे से संन्यास ले लिया है, खबरों को थोड़ा भी करीब से समझने वाला जानता है कि यह कितनी बड़ी खबर थी.

इसलिए यह अंदेशा जताया जाने लगा कि मीडिया अब रेप-कांड की खबर को किनारे कर देगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सभी चैनलों ने सचिन के संन्यास की खबर को तरजीह ही नहीं दी. यह दिखाता है कि क्रिकेट अब धर्म नहीं रह गया है और सचिन के देवत्व का मोह भी कम हुआ है. मशहूर खेल पत्रकार दारेन शाहिदी तहलका से बातचीत में कहते हैं- ‘पिछले कुछ सालों से इस मुल्क में क्रिकेट तभी खबर है जब रियल न्यूज का अभाव है. अब जनता असल खबरों के स्थान पर क्रिकेट नहीं देखना चाहती. हाल में छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला होने के ठीक पहले तक मीडिया आईपीएल से जुड़ी खबरें दिखा रहा था लेकिन इस हमले के बाद चैनल्स से आईपीएल मुकाबले किनारे हो गए. अगर क्रिकेट की खबरें थीं भी तो इसके भ्रष्टाचार से जुड़ी हुई थीं. साफ है कि जनता के लिए क्रिकेट अब इतनी अहमियत नहीं रखता कि सब कुछ भूल-भाल कर उसे देखा जाए. हालिया मैच-फिक्सिंग कांड क्रिकेट की लोकप्रियता को और कम करेगा.’

दारेन की बात में सच्चाई है. 18 मई को मैच फिक्सिंग के खुलासे के दूसरे ही दिन बीसीसीआई प्रमुख श्रीनिवासन ने एक बयान जारी किया- ‘मै विश्वास दिलाता हूं, आईपीएल फिक्स बिल्कुल नहीं है, दोषी खिलाड़ियों को सज़ा मिलेगी.’ साफ है कि श्रीनिवासन को चिंता थी कि जनता में आईपीएल के फिक्स होने की धारणा बनने से इसकी लोकप्रियता पर असर पड़ रहा है. कई शहरों में आईपीएल के खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे थे. फिक्सिंग वैसे भी क्रिकेट की लोकप्रियता में हमेशा ग्रहण लगाती रही है. सन 2000 में भी मैच-फिक्सिंग के खुलासों के बाद लंबे वक्त तक क्रिकेट प्रेमियों का भरोसा इस खेल पर से उठ गया था और इसके मुकाबलों को को दर्शक ढूंढ़े नहीं मिल रहे थे. खेल पत्रकार हेमंत सिंह फिक्सिंग के प्रभाव को एक नई तरह से समझाते हुए कहते हैं, ‘नब्बे के दशक में डब्ल्यूडब्ल्यूई की फाइट बेहद पॉपुलर थी लेकिन जैसे ही यह खुलासा हुआ कि ये कुश्तियां न केवल फिक्स होती हैं बल्कि झूठी भी होती हैं तो यकायक इन कुश्तियों का ग्राफ जमीन पर आ गया. अगर आईपीएल के हर सीजन में ऐसे ही फिक्सिंग के खुलासे होते रहे तो इसका हश्र भी रेसलिंग जैसा हो सकता है.’

क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो रही है, यह सिर्फ खेल विशेषज्ञ या चंद घटनाएं ही नहीं कह रहीं. बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद भी इसे मानती है. 2011 में आईसीसी के एक अध्ययन की रिपोर्ट में यह बात साफ शब्दों में कही गई थी कि भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता लगातार घट रही है, खासकर वनडे और टेस्ट क्रिकेट को लोकप्रिय बनाए रखने के लिए खास कोशिशों की जरूरत है. यह सच है कि टी-ट्वेंटी के तमाशे वाले इस दौर में टेस्ट और वनडे के दर्शक सबसे ज्यादा कम हुए हैं. लेकिन गहरी बात यह है कि टी-ट्वेंटी की लोकप्रियता भी लगातार गिर रही है.

खासकर आईपीएल की. टैम के मुताबिक आईपीएल की टीआरपी लगातार कम होती जा रही है. 2008 में पहले आईपीएल की टीआरपी सबसे ज्यादा 5.59 रही थी तो पिछले यानी आईपीएल-5 और हाल ही में समाप्त हुए आईपीएल-6 की टीआरपी सबसे कम क्रमश: 3.9 और 3.8 रही. आईपीएल-6 के पहले हफ्ते की टीआरपी 3.8 थी जो कि आपीएल पांच की पहले हफ्ते की टीआरपी से एक अंक कम थी. आईपीएल-5 के ओपनिंग मैच की टीआरपी 5.5 थी जो कि आईपीएल-6 के ओपनिंग मैच में घटकर सिर्फ 4.1 रह गई. टीआरपी के इन आंकड़ों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आईपीएल की लोकप्रियता लगातार घट रही है. वह भी तब जबकि यह क्रिकेट का सबसे तेज़ मायावी और चमकीला स्वरूप है. निश्चित तौर पर लोगों का धर्म और उसके खुदाओं पर से भरोसा उठ रहा है.

-हिमांशु बाजपेयी

धर्म नहीं है खेल!

cricket15 मई को इंडियन प्रीमियर लीग में मुंबई इंडियंस और राजस्थान रॉयल्स के बीच मैच था. पहले मुंबई इंडियंस ने बैटिंग की और मैच के तीसरे ही ओवर में मैक्सवेल ने अंकित चव्हाण की गेंदों पर दो छक्के जड़ दिए. राजस्थान की दमदार गेंदबाज़ी और सचिन तेंदुलकर की अनुपस्थिति के बावजूद मुंबई इंडियंस 166 रन बनाने में कामयाब रहा और स्टुअर्ट बिन्नी और ब्रैड हॉज के संघर्ष के बाद भी राजस्थान मैच हार गया.

अगली सुबह देश का स्वागत चौंकाने वाली ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टियों ने किया. दिल्ली पुलिस ने राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों, श्रीसंत, अजीत चंदीला और अंकित चव्हाण को मुंबई से गिरफ़्तार किया था. इन पर स्पॉट फिक्सिंग, यानी सटोरियों के इशारों पर किन्हीं खास ओवरों में खास रन देने का आरोप था. शाम को जब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तब तस्वीर और साफ हो गई. पता चला कि मुंबई इंडियंस की पारी के तीसरे ओवर के जिन छक्कों को सभी मैक्सवेल की शानदार बैटिंग मान रहे थे, वे सटोरियों के इशारे पर की गई स्पॉट फिक्सिंग का नतीजा थे. इस एक ओवर की कीमत सटोरियों ने 60 लाख रुपये लगाई थी. क्रिकेट से प्यार करने वालों में से कई मानते हैं कि अगर अंकित चव्हाण ने जान-बूझ कर 15 रन वाला यह महंगा ओवर न फेंका होता तो मैच का नतीजा राजस्थान रॉयल्स के हक में भी जा सकता था. आखिर राजस्थान रॉयल्स की टीम 14 रन से ही तो यह मैच हारी थी.

लेकिन स्पॉट फिक्सिंग का यह खेल इसी मैच और ओवर तक सीमित नहीं था. दिल्ली पुलिस ने बाकायदा सटोरियों और खिलाड़ियों की बातचीत सुनाते हुए और मैच के फुटेज दिखाते हुए साबित किया कि टूर्नामेंट के दो और मैच फिक्स थे. पांच मई को पुणे वॉरियर्स और राजस्थान रॉयल्स के मैच में अजीत चंदीला ने 20 लाख की पेशगी लेकर और कुल 40 लाख का सौदा करके एक ख़राब ओवर फेंका था और नौ मई के मैच में श्रीसंत ने पैसे लेकर ख़राब गेंदबाज़ी की थी. दिल्ली पुलिस का दावा है कि सटोरियों ने श्रीसंत से एक करोड़ का सौदा किया था. क्रिकेट का दीवाना देश माय़ूस था. जिन चौकों-छक्कों के लिए, क्रिकेट के जिस रोमांच के लिए लोग देर रात तक अपनी आंखें फोड़ा करते थे, उनके पीछे खेल का हुनर नहीं, तौलियों और रिस्ट बैंड के इशारे थे, यह खयाल अपने आप में काफी चोट पहुंचाने वाला था.

धीरे-धीरे दिल तोड़ने वाले और भी ख़ुलासे सामने आए. पता चला कि मामला सिर्फ तीन खिलाडि़यों और उनके साथ गिरफ्तार किए गए सात सटोरियों का नहीं है, इसमें दूसरे खिलाड़ी भी शामिल हैं और इनकी जद में पुराने मुक़ाबले भी आते हैं. दिल्ली पुलिस ने यहां तक दावा किया कि सटोरियों के चार अलग-अलग गैंग इस खेल में शामिल थे और अजीत चंदीला उनकी तरफ से काम कर रहा था. सटोरियों और अजीत चंदीला की बातचीत से यह भी शक होता रहा कि आईपीएल-5 के मुकाबलों में भी स्पॉट फिक्सिंग चल रही थी. धीरे-धीरे और नाम भी सामने आने लगे. राजस्थान रॉयल्स के ही एक और पुराने खिलाड़ी अमित सिंह को पुलिस ने गिरफ़्तार किया. रेलवे का एक और क्रिकेटर बाबूराव यादव पकड़ा गया. उसके बयान से यह बात सामने आई कि सिर्फ आईपीएल नहीं, बल्कि आईसीएल, यानी इंडियन क्रिकेट लीग पर भी सटोरियों की नज़र थी और आईसीएल बंद होने के बाद उन्होंने बांग्लादेश प्रीमियर लीग की तरफ रुख़ करने की कोशिश की थी. वहां भ्रष्टाचार निरोधी ब्यूरो ने उन्हें पहचान लिया तो भागना पड़ा.

यहां तक गनीमत बस इतनी थी कि इसमें श्रीसंत को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाला कोई दूसरा खिलाड़ी शामिल नहीं था. किसी कप्तान या टीम के प्रबंधन के भी शामिल होने की ख़बर नहीं थी. लेकिन सटोरियों की सांठगांठ की एक अलग जांच में जुटी मुंबई पुलिस ने दारा सिंह के बेटे विंदू दारा सिंह को गिरफ़्तार करके पूछताछ शुरू की तो यह दिलासा भी हाथ से निकल गई. अगली गिरफ़्तारी सट्टा लगाने और सटोरियों से रिश्ते रखने के मामले में सीधे चेन्नई सुपरकिंग्स के टीम प्रिंसिपल और सीईओ माने जाते रहे गुरुनाथ मयप्पन की हुई.

मयप्पन बीसीसीआई प्रमुख और चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन के दामाद हैं और अपनी  गिरफ्तारी से पहले श्रीनिवासन के कुडईकनाल वाले रेस्ट हाउस में उनके साथ ही ठहरे हुए थे. अब श्रीनिवासन अपना और अपनी टीम का बचाव यह कहते हुए कर रहे हैं कि मयप्पन का कभी उनकी टीम से रिश्ता ही नहीं रहा. इस पूरे मामले में श्रीनिवासन, चेन्नई सुपरकिंग्स और बीसीसीआई की जबर्दस्त किरकिरी हो रही है, मगर श्रीनिवासन अपना पद छोड़ने को तैयार ही नहीं. सच तो यह है कि वे अगर बचे हुए हैं तो बीसीसीआई के कुछ बेशर्म नियमों और अपनी रणनीतिक ताकत के दम पर, किसी नैतिक साख के सहारे नहीं. आईपीएल पर यह एक बड़ी चोट इसलिए भी है कि आरोपों की धूल सीधे आईपीएल की सबसे कामयाब टीम चेन्नई सुपरकिंग्स पर है और उसके कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट टीम के भी कप्तान हैं.

क्या इतना सबकुछ होने के बाद भी किसी का क्रिकेट देखने का मन करेगा?  क्रिकेट की लोकप्रियता, और उसको लेकर दीवानगी ने इसे भारत का दूसरा धर्म बना डाला था और क्रिकेटर बिल्कुल भगवान की तरह पूजे जा रहे थे. क्या खंड-खंड हो रहे इन देवताओं की पूजा जारी रहेगी और पाखंड-पाखंड हो रहा यह धर्म बचा रहेगा? बहरहाल, इस मामले को स्प़ॉट फिक्सिंग या सट्टेबाज़ी तक सीमित रखेंगे तो वह जटिल और उलझी हुई सच्चाई ठीक से समझ में नहीं आएगी, जिसके एक सिरे पर यह राय­­ है कि क्रिकेट इस देश में धर्म जैसी हैसियत हासिल कर चुका है और दूसरे पर यह तथ्य कि आईपीएल ने इस धर्म को धंधे में बदल डाला है.

सबसे पहले यह समझने की कोशिश करें कि वह कौन सी चीज़ है जिसने क्रिकेट को लेकर भारत में इस क़दर दीवानगी पैदा की है और क्रिकेटरों को देवता बना दिया है. 1983 में जब भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीता, तब तक सार्वजनिक उपलब्धियों के नाम पर गर्व करने लायक चीज़ें या तो बेहद कम बची थीं या तिरोहित हो रही थीं. हॉकी का बेहतरीन दौर बीत चुका था और बदतरीन शुरू हो चुका था. 1980 में बैडमिंटन के शिखर पर पहुंचे प्रकाश पादुकोन ढलान पर थे. टेनिस में विजय अमृतराज काफी उम्मीद पैदा करने के बाद थके हुए दिख रहे थे. शतरंज के चैंपियन विश्वनाथन आनंद का तब तक उदय नहीं हुआ था. ऐसे में क्रिकेट ने हमें विश्व विजेता बनाया. आने वाले वर्षों में हमें फिर से चैंपियन बनने में काफी वक़्त लगा, लेकिन यह इकलौता खेल रहा जिसमें भारत को कामयाबी की उम्मीद बनी रही. सुनील गावसकर और कपिलदेव के बाद अजहरुद्दीन, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले, युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण और महेंद्र सिंह धोनी वे सितारे थे जिनके आगे दुनिया नतमस्तक हो रही थी.

अस्सी और नब्बे के दशकों में भारत के दूर-दराज के शहरों में बड़ी हो रही पीढ़ी को कायदे से या तो बॉलीवुड के हीरो मिले या फिर यही नायक मिले. राजनीति भरोसा खो चुकी थी, साहित्य-कला और संगीत-नृत्य लोकप्रिय विमर्श से बाहर थे और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में भारतीय मेधा का कोई बड़ा दखल नहीं दिख रहा था. ऐसे में ये क्रिकेटर ही थे जिन्होंने इस पीढ़ी को अंतरराष्ट्रीय पहचान का भरोसा दिलाया.

शायद इन्हीं वजहों से क्रिकेट अचानक मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे बड़े केंद्रों तक सीमित न रह कर छोटे शहरों और कस्बों तक फैल गया. भद्रजन अंग्रेजों का खेल रातों-रात भारतीय मध्यवर्ग के खेल में बदल चुका था. इक्कीसवीं सदी आते-आते दूर-दराज के शहरों और कस्बों से खिलाड़ी आने लगे. रांची से महेंद्र सिंह धोनी, गाज़ियाबाद से सुरेश रैना, मुरादाबाद से पीयुष चावला, केरल से श्रीसंत, जालंधर से हरभजन सिंह, बड़ौदा से इरफ़ान पठान, भड़ूच से मुनाफ पटेल और ऐसे ढेर सारे दूसरे नामों ने एक नई पहचान बनाई. ये भारतीय मध्य वर्ग के नए देवता थे जो सफलता और पराक्रम के नए मिथ रच रहे थे.

इत्तेफाक से यह वही दौर था जब भारतीय बाज़ार अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुल रहा था और उन्हें यहां पैठ और पहचान बनाने के लिए अपने नायक और प्रतीक चाहिए था. बाज़ार ने क्रिकेट को हाथों-हाथ लिया और उसे अपनी जरूरतों के हिसाब से बदला भी. टेस्ट मैचों की ऊब कम करने के लिए वनडे मैचों की शुरुआत हुई और वनडे मैचों में भी नई रफ़्तार भरने के लिए 20-20 के ओवरों का मुकाबला सामने आया. यह एक नई शुरुआत थी जिसने खेल और खिलाड़ियों दोनों को बदला. क्रिकेट का व्याकरण कहीं पीछे छूट गया. खिलाडि़यों ने स्ट्रोक प्ले के नए अंदाज़ विकसित किए. एक इंटरव्यू में राहुल द्रविड़ ने कहा भी कि जिन स्ट्रोक्स के लिए कभी उन्हें डांट पड़ती थी, आज वे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले शॉट हैं. बल्लेबाज़ बाहर जाती गेंदों को मारने लगे. उछल कर शॉट लगाने की नई तकनीकें दिखने लगीं. पुरानी शास्त्रीयता की जगह दुस्साहस और जोखिम का एक नया तत्व दाखिल हो गया. इन सबके बीच रनों की बरसात होने लगी और विकेटों का पतझर भी दिखने लगा. क्रिकेट अचानक नया हो उठा. 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप में भारत की जीत के साथ जैसे भारतीय क्रिकेट का एक नया अध्याय शुरू हुआ.

दरअसल बाज़ार के लिए यह एक आदर्श घड़ी थी जब वह क्रिकेट को लगभग गोद ले लेता. 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग शुरू हुई. अचानक आठ नई टीमें वजूद में आ गईं. भारत के शहरों और राज्यों के साथ डेयरडेविल्स, चार्जर्स, सुपरकिंग्स, रॉयल्स, चैलेंजर्स जैसे शब्द जोड़े गए और उन्हें बड़े पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया गया. इसके बाद ज़्यादा हैरान करने वाले दृश्य आए. क्रिकेट के देवता पहली बार नीलाम होते देखे गए. तेंदुलकर, द्रविड़, गांगुली जैसे कुछ सीनियर खिलाडि़यों को आइकॉन बताकर कहा गया कि ये नीलाम नहीं होंगे, लेकिन आने वाले दौर में सचिन को छोड़कर बाकी सभी महानायकों को अपनी टीमें छोड़नी पडीं और कप्तानी भी. यह भारतीय क्रिकेट में एक बड़े बदलाव की सूचना थी जो बताती थी कि क्रिकेटर अब सिर्फ देश के लिए नहीं, पैसे वालों के इशारों पर भी खेलते हैं. यह सत्तर के दशक से ठीक उलट स्थिति थी जब भारतीय क्रिकेटरों ने कैरी पैकर के पैसे को ठोकर मार दी थी और पैकर सर्कस में जाने से इनकार कर दिया था. चाहें तो याद कर सकते हैं कि यह वह दौर था जब भारतीय क्रिकेट में बहुत पैसा नहीं था और क्रिकेटरों को भविष्य के लिए अलग से सोचना पड़ता था. लेकिन जो स्वाभिमान तब भारतीय खिलाड़ियों ने दिखाया था, वह अब पहले से ही करोड़ों में खेल रहे क्रिकेटर नहीं दिखा सके – किसी एक क्रिकेटर ने भी अपवाद के तौर पर नहीं कहा कि वह अपनी बोली लगवाने से इनकार करता है, कि उसे ऐसा पैसा, ऐसा खेल नहीं चाहिए.

लेकिन शायद इस पूरी प्रक्रिया में इस तरह की बहस की गुंजाइश नहीं थी. यह पूंजी का खेल था जो क्रिकेट के रनों के साथ-साथ पैसा बरसने का भी इंतज़ाम कर रहा था. इसलिए क्रिकेट की रंगीनी में नया ताम-झाम जोड़ने, नई उत्तेजना पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. इसके लिए रंग-बिरंगे स्टेडियम तैयार किए गए, मैचों के भव्य प्रसारण की व्यवस्था हुई और हर चौके-छक्के या विकेट पर थिरकने वाली चीयरलीडर्स जुटाई गईं. क्रिकेट का रोमांच अब झागदार मादकता वाले नशे में तब्दील हो रहा था. ध्यान से देखें तो यह क्रिकेट को बिल्कुल तीन घंटे के फिल्मी शो में बदलने का उद्यम था. पहले सिर्फ बॉलीवुड की मार्फत दिखने वाली चालू किस्म की मनोरंजन संस्कृति को अब एक नया वाहन मिल गया था. क्रिकेट अब पूंजीवालों का खेल है जिसमें हजारों के टिकट हुआ करते हैं, देर रात की पार्टियां हुआ करती हैं. ग्लैमर की छौंक हुआ करती है और इन सबके पीछे खड़ा संदिग्ध पैसा भी.

आईपीएल को नापसंद करने वालों के लिए नए-नए तर्क भी जुटाए जाते रहे. पहले आईपीएल में जब दुनिया भर के खिलाड़ी जुटे तो कहा गया कि यह राष्ट्रवादी संकीर्णताओं पर क्रिकेट की जीत है. एक हद तक यह बात सही थी कि आईपीएल ने नकली राष्ट्रवाद की सरहदों को मिटाया. आईपीएल में हरभजन और रिकी प़ॉन्टिंग एक साथ खेलते दिखे और माइकल हसी और शेन वाटसन आमने-सामने नज़र आए. कोलकाता सौरव गांगुली के लिए नहीं, शोएब अख़्तर के लिए तालियां बजाता नज़र आया.

लेकिन यह राष्ट्रवाद पर क्रिकेट की नहीं, बाजार की, पैसे की जीत थी- इस बाज़ार के लिए मलिंगा ने श्रीलंका के लिए खेलना छोड़ दिया, लेकिन आईपीएल के लिए खेलना जारी रखा. क्रिस गेल बीच के दौर में वेस्ट इंडीज़ की टीम से बाहर रहे, लेकिन आईपीएल खेलते रहे. कई दूसरे खिलाड़ियों ने अपने मुल्कों की जगह आईपीएल को तरजीह दी. कई भारतीय खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में चोटिल हो जाने पर या होने के डर से नहीं खेले, लेकिन आईपीएल में खेलने के लिए हमेशा तैयार दिखे. वीरेंद्र सहवाग ने मार्च 2012 में राष्ट्रीय टीम से अपना नाम वापस ले लिया था. लेकिन पूरी तरह ठीक न होने के बावजूद आईपीएल में खेलने से वे खुद को नहीं रोक पाए. इससे उनकी चोट इतनी गंभीर हो गई कि बाद में उन्हें तीन महीने तक आराम करना पड़ा.

एक उदाहरण सचिन तेंदुलकर का भी है. वे कभी देश की तरफ से 20-20 के वर्ल्ड कप तक के लिए नहीं खेले, पिछले कुछ सालों से वनडे मैच भी गिने-चुने ही खेल रहे थे और छह महीने हुए उससे भी संन्यास ले चुके हैं मगर आईपीएल में लगातार डेढ़ महीने तक खेलने के लिए जहां तक संभव हो वे तैयार दिखते रहे. राष्ट्रवाद की चमक फीकी पड़ने के बाद कुछ दूसरे पूर्वाग्रह सर उठाने लगे. दूसरे आईपीएल में कोलकाता की टीम के भीतर नस्लवाद से जुड़े आरोप लगे. तीसरे आईपीएल में पाकिस्तान के खिलाड़ियों को अपमानित होना पड़ा. धीरे-धीरे घरेलू टीमों को मिलने वाले फायदों का सवाल भी खड़ा हो गया और एक दौर में इस पर भी विचार हुआ कि मैच तटस्थ जगहों पर कराए जाएं.

लेकिन अंतत: सारा कुछ इस बात से तय होता रहा कि किस फैसले से कितना पैसा आना है. जब पैसा इतना अहम हो जाए तो खेल पीछे छूट जाता है या उसके भीतर और भी खेल चलने लगते हैं. ऐसा नहीं कि इस तरह के खेलों की भनक लोगों को बाहर नहीं थी. उल्टे, बिल्कुल पहले ही आईपीएल से टीमों का और उनके मुनाफ़े का सवाल खड़ा हो गया था और यह इल्ज़ाम लगने लगा था कि आईपीएल के कामकाज में बहुत कुछ ऐसा है जो पारदर्शी नहीं है. दूसरा आईपीएल देश से बाहर हुआ और इस पर फेमा के उल्लंघन और मनी लान्डरिंग के गंभीर आरोप लगे. यह साफ नज़र आता रहा कि आईपीएल पूंजी, ग्लैमर और सत्ता के गठजोड़ से तैयार हो रहा एक ऐसा आयोजन है जो कानूनों की ज्यादा परवाह नहीं करता. इस आयोजन में और इससे जुड़ी टीमों में किस-किस का पैसा किन-किन जरियों से लगा है, इसको लेकर कयास चलते रहते हैं. एक दौर में आयकर महकमे के सूत्र कहा करते थे कि तीन टीमों में आईपीएल के कमिश्नर रहे ललित मोदी का पैसा लगा है. 2010 में जब आईपीएल की दो नई टीमें तैयार हो रही थीं, तभी कोच्चि की टीम की नीलामी को लेकर ललित मोदी के एक ट्वीट से पैदा हुए बवंडर ने उन दिनों विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर को इस्तीफा देने पर मजबूर किया. इसकी क़ीमत ललित मोदी को भी चुकानी पड़ी- अचानक उनकी कारस्तानियां खुलने लगीं और उन पर तरह-तरह के इल्ज़ाम लगे. आखिरकार उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा.

जहां तक सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग का सवाल है, पहले ही आईपीएल से इस तरह के झूठे-सच्चे आरोप चलने लगे थे. ललित मोदी ने ही एक ट्वीट करके न्यूजीलैंड के खिलाड़ी क्रिस केंस पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया था. केंस ने इसके ख़िलाफ़ अदालत की शरण ली और फ़ैसला मोदी के ख़िलाफ़ आया. दूसरे और खिलाड़ियों पर भी आईपीएल के मैचों में फिक्सिग के आरोप लगे, वे आईपीएल से निलंबित हुए. यहां तक कि कुछ अंपायरों पर भी इस तरह की उंगलियां उठती रहीं.

दरअसल यह साफ़ दिखता है कि आईपीएल भारतीय खेल और मनोरंजन की दुनिया में जिस तरह की संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है, सट्टेबाज़ी या फिक्सिंग उसकी सहज परिणतियां हैं. यह अलग बात है कि यह अदालत में साबित हो पाएगा या नहीं. लेकिन सवाल अदालत का नहीं, उस जनता की अदालत का है जो क्रिकेट को अपना धर्म और क्रिकेटरों को अपना ख़ुदा मानती है. बेशक, धर्म भी हमारे यहां धंधे में बदल चुका है और देवताओं के नाम पर बड़े-बड़े फ़र्जी कारोबार होते हैं, लेकिन क्या क्रिकेट के भक्त क्रिकेट के नाम पर ख़ुद को छला जाना इतनी आसानी से गवारा कर लेंगे?

कल्पना या कामना की जा सकती है कि शायद ऐसा न हो. स्पॉट फिक्सिंग के इस आरोप के बाद शायद लोगों को आईपीएल का गोरखधंधा ज़्यादा समझ में आए. हालांकि अभी तो ऐसा नहीं लगता. स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों के बावजूद कोलकाता में मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच खेले गए फाइनल के सारे टिकट बिक गए और स्टेडियम खचाखच भरा नज़र आया. इससे हम क्या नतीजा निकालें? क्या क्रिकेट नाम का धर्म अब वह अफीम हो चुका है जिसे चाटकर बेसुध लोग बाकी सब भूल मैच देखते रहते हैं? क्या जैसे नशे की लत बची रहती है, वैसे ही यह आईपीएल बचा रहेगा?

इन सवालों के जवाब खोजते हुए एक नई तरह की दुविधा से हमारा सामना होता है. अचानक हम पाते हैं कि लोग क्रिकेट को खेल की तरह नहीं, तमाशे की तरह देख रहे हैं, किसी सर्कस की तरह देख रहे हैं. उन्हें जैसे बस कुछ ओवरों की सनसनी से मतलब है, रोमांच के झाग से मतलब है, आइटम गर्ल्स की तरह आने-जाने वाली चीयरलीडर्स से मतलब है, क्रिकेट के खेल से नहीं, उसकी शास्त्रीयता से नहीं, उसकी नैतिकता से नहीं. हालांकि पूंजीवाद का एक पहलू यह भी है कि चूंकि यहां पैसा इकलौता तर्क हुआ करता है. इसलिए यहां जिस चीज से नुकसान हो सकता है वह नाजायज़ होती है. बाज़ार को मालूम है कि आईपीएल के नाम पर जो कीचड़ उछली है, वह आईपीएल की साख और खुद उसके लिए नुकसानदेह है. इसलिए वह कुछ ऐसा करने की कोशिश जरूर करेगा जिससे कि उसके हितों को नुकसान नहीं पहुंचे.

खैर आईपीएल का जो भी हो, इससे क्रिकेट का और वास्तविक क्रिकेट प्रेमियों का नुकसान होगा. उन खिलाड़ियों का भी, जो फिलहाल बड़े नायकों की तरह दिखाई पड़ रहे है. सच तो यह है कि अभी ही उनके नायकत्व में काफी दरार आ गई है. आइकॉन खिलाड़ियों की ऐसी-तैसी हो चुकी है. करीब दो साल पहले नीलामी के दौरान मोहम्मद कैफ़ को लेकर ठहाकों के बीच जिस तरह 10,000 की बोली बढ़ाई जा रही थी, उससे पता चल रहा था कि मालिकान अब खिलाड़ियों को अपना जरख़रीद गुलाम समझने लगे हैं. अगर लोगों के दिमाग में एक बार बैठ गया कि ये गेंद और बल्ले की कविता लिखने वाले, क्रिकेट का जादू रचने वाले देवता नहीं, महज पैसे के पीछे भागने वाले खिलाड़ी हैं तो शायद क्रिकेट का वह मिथ टूट जाएगा जो इसे जुनून और धर्म में बदलता है. भारतीय जनता अपने देवताओं से एक तरह के शील, एक तरह की संपूर्णता की अपेक्षा करती है, वह खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करती, यह बात याद रखनी होगी.


क्या करेगा कानून ?
आईपीएल का फाइनल खेले जाने से पहले एन श्रीनिवासन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो-टूक कह दिया कि उनके इस्तीफे का सवाल ही पैदा नहीं होता. सूत्रों के मुताबिक उन्हें नहीं लगता कि उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन के ख़िलाफ़ मामला अदालत में टिकेगा. यही नहीं, फ्रेंचाइज़ी सीएसके पर भी आईपीएल का कोई क़ायदा तोड़ने का आरोप साबित करना आसान नहीं होगा. उधर दिल्ली में श्रीसंत ने जेल से ही प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि उन्हें अपने बेगुनाह छूट आने का पूरा भरोसा है. उनके वकील ने याद दिलाया कि पुलिस के पास न तो श्रीसंत की आवाज़ का कोई टेप है, न ही श्रीसंत और सटोरियों के बीच सांठगांठ के सबूत और न ही पैसे के लेन-देन  का कोई दस्तावेज़ जिससे वह मामला अदालत में साबित कर सके. इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ आया है. वह खिलाड़ियों और सटोरियों की पूछताछ से ही सामने आया है. यह पूछताछ अदालत में सबूत की तरह नहीं टिकेगी. साथ ही फोन के ब्योरे भी सबूत के तौर पर पर्याप्त नहीं हैं.

कानून के जानकार बताते हैं कि सट्टेबाज़ी या स्पॉट फिक्सिंग को लेकर भारत में कोई विशेष कानून भी नहीं है जो इन खिलाडि़यों पर लगाया जाए. ऐसे में धारा 420 या 409 के सहारे पुलिस कहां तक जा पाएगी, कहना मुश्किल है. इन धाराओं की परिभाषाएं सीमित हैं और उनमें स्पॉट फिक्सिंग जैसे अपराध को साबित करना बहुत ही मुश्किल है. यहां याद किया जा सकता है कि करीब 13 साल पहले मैच फिक्सिंग की जो बड़ी कालिख भारतीय क्रिकेट पर लगी थी, उसका अब तक कानूनी निपटारा नहीं हुआ है.

उस मामले में अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर जैसे बड़े खिलाड़ी घिरे थे, हैंसी क्रोनिए जैसे कप्तान ने माना था कि वे फिक्सिंग में शामिल रहे. इन लोगों के ख़िलाफ़ क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने कार्रवाई की, लेकिन जिस दिल्ली पुलिस ने यह मामला उजागर किया था, वह इस मामले में अब तक चार्जशीट तक पेश नहीं कर पाई. अब सरकार बता रही है कि स्पॉट फिक्सिंग के ख़िलाफ ब्रिटेन के बेटिंग लॉ या न्यूजीलैंड के ऐसे ही मिलते-जुलते कानून की तर्ज पर यहां भी कानून बनाया जाएगा. लेकिन जब तक वह बनेगा, क्या इन खिलाडियों और सट्टेबाज़ों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हो पाएगी?

सट्टे का सवाल
इस पूरे मामले में सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग को जैसे बिल्कुल एक कर दिया गया है, जबकि दोनों दो अलग-अलग चीज़ें हैं. कई लोग मानते हैं कि सट्टेबाज़ी को भारत में जायज बना देना चाहिए. इस पक्ष में सबसे अहम दलील यह दी जाती है कि इससे कम से कम सट्टेबाज़ी पर नज़र रखी जा सकेगी. फिलहाल सट्टे का सारा खेल काले पैसे का खेल है जो परदे के पीछे छिप कर चलाया जाता है. इस वजह से इसमें अंडरवर्ल्ड की भूमिका बहुत बड़ी है. चूंकि ऐसे कुछ गिने-चुने लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपया दांव पर लगे होते हैं इसलिए खेल में मैच फिक्सिंग या स्पॉट फिक्सिंग जैसी चीजों की गुंजाइशें ज्यादा होती हैं.

अगर भारत में बेटिंग को वैध बना दिया जाए तो कम से कम यह ज़रूर होगा कि सट्टे का नेटवर्क सरकार की नज़र में रहेगा और इसमें काले पैसे और मनी लांडरिंग की भूमिका कम होगी. यही नहीं, सट्टेबाज़ी को वैध बनाते हुए मिलीभगत और फिक्सिंग के ख़िलाफ़ सज़ाएं भी तय की जा सकेंगी. लेकिन क्या इससे वाकई समस्या हल हो जाएगी? 15 बरस पहले संयुक्त मोर्चा सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने काले पैसे को सफेद बनाने की एक बड़ी योजना पेश की थी जिससे शायद 10,000 करोड़ रुपये आए भी थे. तब से अब तक काला पैसा ख़त्म नहीं हुआ, बढ़ ही गया है. जब खेलों पर इतनी बड़ी रकम दांव पर होगी तो कानूनी सट्टा भी गैरकानूनी राह पकड़ कर आगे बढ़ सकता है.

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Pandukeshwarउत्तराखंड में इन दिनों चार धाम यात्रा चरम पर है. हर साल गर्मियां शुरू होते ही लाखों श्रद्धालु सपरिवार बद्रीनाथ, केदारनाथ,गंगोत्री एवं यमुनोत्री की यात्रा पर निकल पड़ते हैं, वहीं ठंड के दिनों में ये धाम सूने पड़े रहते हैं. यहां मौजूद ज्यादातर मंदिरों की व्यवस्था पीढ़ियों से कुछ खास पुजारी और पुरोहित आदि देख रहे हैं. लेकिन वे कौन लोग हैं जिनकी बदौलत ये स्थान इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को संभाल पाते हैं?

बद्रीनाथ में मुख्य पुजारी दक्षिण के नंबूदरीपाद ब्राह्मण हैं जो सुदूर केरल से आकर यहां पूजा-अर्चना करते हैं तो केदारनाथ में भोले-भंडारी के पुजारी कर्नाटक-महाराष्ट्र तथा उसके आस-पास के राज्यों के रहने वाले हैं. गंगोत्री और यमुनोत्री में भी उत्तरकाशी के निचले इलाकों से पुरोहित पूजा के लिए जाते हैं. इन तीर्थों से जुड़ा एक वर्ग ऐसा भी है जिसके बिना इन स्थानों पर एक पल के लिए रहना मुश्किल होगा. लेकिन उनकी उपेक्षा का आलम यह है कि कोई इनको न तो याद करता है न ही जानता है. अस्तित्वहीन-से ये अपने काम में लगे रहते हैं. यह वर्ग है हर साल यात्रा के समय आने वाले सफाई कर्मचारियों का. तीर्थयात्रा के दौरान हजारों लोग रास्ते के तमाम गांवों और कस्बों से गुजरते हैं. इन स्थानों को साफ-सुथरा रखने के लिए यात्रा काल में अस्थायी सफाईकर्मी नियुक्त किए जाते हैं. ये कर्मी प्राय: उत्तर प्रदेश के बिजनौर, मुरादाबाद और बरेली आदि जिलों से आते हैं. दुखद बात यह है कि इतना महत्वपूर्ण काम करने वाले लोगों को न तो सामाजिक मान्यता हासिल है और न ही स्थायी रोजगार.

राज्य सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष भगवत प्रसाद मकवाना बताते हैं, ‘पुजारियों, तीर्थ पुरोहितों और अन्य सभी वर्गों को भले ही बदलती जा रही हर व्यवस्था में बेहतर सुविधाएं, वेतन व स्थायित्व मिला और सम्मान बढ़ा, लेकिन सबकी गंदगी साफ कर देव-भूमि को निर्मल और पवित्र रखने वाले ये सफाई कर्मी हर साल काम  मिलने की अनिश्चितता में समय काट रहे हैं. अल्प काल के लिए यात्रा पर आने वाले यात्रियों का सामूहिक बीमा हो रहा है, लेकिन विकट भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले सफाई कर्मियों को यह सुविधा नहीं मिल रही है.’ इसके चलते दुर्घटना या ठंड के कारण जान गंवाने वाले अस्थायी सफाई कर्मियों को कुछ भी नहीं मिल पाता है.

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उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नगीना तहसील के हकीकतपुर गांव के 62 साल के महावीर सिंह बद्रीनाथ से 20 किमी पहले स्थित यात्रा पड़ाव, पांडुकेश्वर में मुख्य सफाई कर्मी हैं. वे 12 सफाई कर्मियों के मुखिया हैं जो गोविंदघाट से लेकर देश के अंतिम गांव माणा तक छोटे-छोटे पांच स्थानों पर सफाई के लिए तैनात किए गए हैं. पांडुकेश्वर की आबादी तकरीबन 1,000 है, लेकिन यात्रा के दिनों में हर दिन यहां से लगभग 20 हजार यात्री गुजरते और ठहरते हैं. इन यात्रियों द्वारा फैलाई जाने वाली गंदगी साफ करने का जिम्मा महावीर सिंह और उनके पांच साथियों पर है. उनका 22 साल का बेटा सुनील भी इस साल मुख्य सफाई कर्मी के रूप में पांडुकेश्वर के पास के पड़ाव गोविंदघाट में अपनी सेवाएं देगा. गोविंदघाट से सिखो के प्रसिद्ध गुरुद्वारे हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी का पैदल मार्ग शुरू होता है. महावीर बताते हैं कि उनके पिता के अलावा दादा कन्हैया लाल और परदादा ने भी पूरी उम्र यही काम करते बिता दी. यह लगभग 150 साल का इतिहास है. यात्रा में लगे अभिजात वर्गों और पेशों का भी इतना ही लंबा इतिहास उपलब्ध और ज्ञात है. 300 रुपये महीने के वेतन पर काम शुरू करने वाले महावीर का वेतन पिछले साल जाकर 3,000 रुपये हुआ है. यह राशि राज्य में दैनिक मजदूरों के तय वेतन से भी कम है. मकवाना बताते हैं, ‘प्रदेश में मजदूरों की मजदूरी 210 रुपये प्रतिदिन तय की गई है,परंतु इन सफाई कर्मियों को 100 रुपये प्रतिदिन में टरका दिया जा रहा है.’

आजादी के पहले तक ऋषिकेश से ऊपर सारी यात्रा पैदल होती थी. यात्री खुले में ही शौच आदि करते थे. उस दौर में गर्मियों में गंदगी से हैजा आदि बीमारियां फैल जाती थीं. आए दिन यात्रियों तथा स्थानीय लोगों के मरने की खबरें आती थीं. सन 1901 में चमोली के डॉ. पातीराम इंग्लैंड में भारतीय उपमहाद्वीप के चिकित्सा अधीक्षक बने. स्थानीय होने के कारण वे इन सब समस्याओं से परिचित थे. इतिहासकार योगंबर बत्र्वाल‘तुंगनाथी’ बताते हैं, ‘उन्होंने टिहरी रियासत और ब्रिटिश गढ़वाल के अधिकारियों को स्वच्छता समितियों के गठन की सलाह दी थी.’ बाद में जब डॉ. पातीराम पौड़ी के जिला परिषद अध्यक्ष बने तो उन्होंने हर नौ मील पर एक डिस्पेंसरी बनाई और जिले की स्वच्छता समितियां सुचारू रूप से सफाई का काम करने लगीं. इन समितियों के निर्माण के बाद यात्रा मार्ग पर शौचालयों का प्रचलन हुआ और मैदानी क्षेत्रों से सफाईकर्मी वहां आने लगे.

जनसंख्या बढ़ी और यात्रा से जुड़े चार जिलों चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और टिहरी के कई कस्बों में 1970 के बाद नगरपालिकाएं या पंचायतें बनने लगीं. इन नगरपालिकाओं या नगर पंचायतों में भले ही सफाई के व्यवस्थित इंतजाम हो गए हों, लेकिन यात्रा के अधिकांश छोटे स्थानों और पैदल मार्गों पर हर दिन पहुंचने वाले हजारों यात्रियों द्वारा पैदा की गई गंदगी और कूड़े के निस्तारण का जिम्मा उत्तर प्रदेश से आने वाले तकरीबन एक हजार सफाई कर्मियों पर ही रहा. आज भी मोटर मार्ग के इन छोटे स्थानों के अलावा केदारनाथ और यमुनोत्री के पैदल मार्ग में हर दिन चलने वाले हजारों यात्रियों द्वारा फैलाई गई गंदगी को साफ रखना एक चुनौती पूर्ण कार्य है.

[box]प्रदेश में मजदूरों की मजदूरी 210 रुपये प्रतिदिन तय की गई है, परंतु चार धाम यात्रा में लगे सफाई कर्मियों को 100 रुपये में टरका दिया जाता है[/box]

यात्रा मार्ग में तमाम कस्बों या पड़ावों मसलन पीपलकोटी,पांडुकेश्वर, पातालगंगा, गुप्तकाशी, रामपुर, सीतापुर टिहरी का नैनबाग, नौगांव, ब्रह्मखाल, डामटा जैसे स्थानों में अब भी नगर पंचायतें नहीं हैं. इन जगहों पर सफाई का जिम्मा इन्हीं सफाई कर्मियों पर रहता है. रुद्रप्रयाग जिले के स्वच्छता निरीक्षक बृजेश नैथानी बताते हैं, ‘पिछले कई सालों से यात्रा मार्ग पर कहीं महामारी का प्रकोप नहीं फैला है जो यह सिद्ध करता है कि सीमित संसाधनों के बाद भी इन सफाई कर्मियों की मदद से चलाई जा रही व्यवस्था ने सुचारू काम किया है.’ इस साल उत्तरकाशी में ये अस्थायी कर्मी जिला पंचायत के अधीन, रुद्रप्रयाग में स्वास्थ्य विभाग, जिला पंचायत और सुलभ इंटरनेशनल के साथ और चमोली में स्वास्थ्य विभाग व ईको विकास समिति के माध्यम से काम कर रहे हैं. इस व्यवस्था में ऊपर पर्यवेक्षण करने वाला चाहे कोई भी हो लेकिन सफाई का काम करने वाले घूम-फिर कर वही लोग होते हैं.

अन्य वर्गों की तरह मंदिरों के कपाट बंद होने के बाद यात्रा समाप्त होने पर ये सफाई कर्मी भी वापस अपने-अपने गांव चले जाते हैं. ये सफाई कर्मी भूमिहीन और गरीब हैं. इनमें से कोई भी 8वीं से अधिक नहीं पढ़ा है. जाड़ों में महावीर अपने गांव जाकर सूअर पालने का काम करता है जिससे उसे हजार-दो हजार रुपये महीने की आमदनी हो जाती है. कुछ सफाई कर्मी मजदूरी करके पेट पालते हैं. हर साल उत्तराखंड आने वाले एक हजार सफाई कर्मियों में से केवल दो सफाई कर्मियों को उत्तरकाशी जिला पंचायत में अस्थायी रूप से साल भर की नौकरी पर रखा जाता है, इनके अलावा किसी भी कर्मचारी को स्थायी रोजगार नहीं मिला है.

बिजनौर जिले की धामपुर तहसील के ताइड़ापुर ग्राम पंचायत के 62 साल के प्रधान भट्टल 30 साल तक केदारनाथ यात्रा मार्गों पर अनेक स्थानों पर सफाई कर्मी और उनके हेड के पद पर रहे हैं. बाबा केदारनाथ के भक्त भट्टल से ‘तहलका’ के यह पूछने पर कि भगवान ने उन पर क्या कृपा की है, वे खुद के प्रधान बनने का श्रेय भगवान को देते हैं. बहरहाल, भट्टल पर बाबा की इस कृपा के बाद भी उनकी परेशानियां कम नहीं हुईं. भट्टल के तीनों बेटे बेरोजगार हैं. गांव की राजनीतिक हस्ती और जाना-माना नाम होने के बाद भी बेरोजगारी और गरीबी की मार इतनी है कि भट्टल अपने तीनों बेटों को खुशी-खुशी सफाई कर्मी के रूप में भेजना चाहते हैं. पूरी कोशिश के बाद भी इस साल उनका एक भी बेटा इस काम के लिए नहीं लिया गया. वे कहते हैं, ‘अब इस  काम पर लगाने के भी सरकारी कर्मचारी पैसे मांगते हैं.’ दिक्कतें केवल इतनी नहीं हैं. महावीर बताते हैं, ‘सवर्ण तो छोड़िए पहाड़ों के अनुसूचित जाति के लोग भी हमें रहने के लिए घर नहीं देते हैं. मजबूरन हमें झोपड़े बना कर कस्बे या पहाड़ों के कोनों में दिन काटने पड़ते हैं.’ केदारनाथ, हेमकुंड साहिब और यमुनोत्री मार्ग की ठंडक में यह खासे जोखिम का काम है. यात्रा मार्गों पर अधिकांश जगहों पर कच्चे शौचालय बने हैं,जिन्हें सफाई कर्मियों को हाथ से ही साफ करना पड़ता है. मकवाना बताते हैं, ‘देश में मैला हाथ से साफ करने से रोकने के लिए भले ही कानून बन गए हों लेकिन यात्रा मार्ग की व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया है,जबकि इस काम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं.’

सफाई कर्मियों का वेतन और सुविधाएं भले ही बेहद कम हों लेकिन यात्रा काल में सफाई के नाम पर पर्यटन,स्वास्थ्य विभाग व जिला पंचायत हर साल करोड़ों के वारे-न्यारे कर देते हैं.  कुछ साल पहले सुलभ इंटरनेशनल को जिस पर्यटन विभाग ने करोड़ों की अनियमितता करने के कारण काली सूची में डाल दिया था इस साल उसी संस्था को पर्यटन विभाग ने चार धामों की सफाई का काम देने का निर्णय लिया है. यह संस्था चार साल पहले केदारनाथ यात्रा मार्ग से अस्थायी सफाई कर्मियों के भुगतान के लाखों रुपये लेकर चंपत हो गई थी. तमाम परेशानियों के बावजूद भट्टल और महावीर के बेटे उनकी ही तरह यात्रा काल में सफाई कर्मी के रूप में आते रहेंगे. भट्टल का कहना है, ‘भले ही पुजारी, तीर्थ पुरोहित और अन्य लोग पीढ़ियों से समाज में मिल रही इज्जत के कारण यहां आते हों परंतु हम तो गरीबी और भूख के कारण इस काम को करते हैं.’सफाई कर्मचारी इस निचले दर्जे के काम को भगवान का आशीर्वाद मानकर कर रहे हैं क्योंकि यही उनका पेट पाल रहा है.

पत्रकारिता का जंतर-मंतर

001-Sapreक्या कोई कार्टून इतना कहर ढा सकता है कि अखबार का समूचा संपादक मंडल जेल में डाल दिया जाए और मुद्रक से लेकर हॉकरों तक को न बख्शा जाए? जवाब है-हां. भोपाल से शाकिर अली खां के संपादन में निकलने वाले उर्दू साप्ताहिक सुबहे वतन में एक कार्टून छपने के बाद ऐसा ही हुआ. यह घटना कोई किंवदंती नहीं बल्कि ऐसी सच्चाई है जो जिसका प्रमाण भोपाल के माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय में रखी है. वाकया 1934 का है जब भोपाल कौंसिल के चुनाव में निजाम के उम्मीदवार को आवाम के उम्मीदवार ने हराया था. और उसके बाद एम इरफान ने ऐसा कार्टून बनाया जिसमें इकहरी हड्डी का एक आदमी मस्तमौला पहलवान को धोबी पछाड़ लगाते हुए दिखाया गया था.

यदि संग्रहालय किसी शहर की खिड़की है तो यकीन मानिए भोपाल का सप्रे संग्रहालय ऐसा दरवाजा है जिससे होकर आप एक सौ पचास वर्ष की भारतीय पत्रकारिता के ऐसे ही कई रोचक किस्सों के बीच टहलकदमी कर सकते हैं. कहने को भारत सरकार के दिल्ली सहित कई नामी शहरों में आलीशान अभिलेखागार हैं. लेकिन जहां तक समाचार पत्रों के संग्रहालय की बात है तो गैरसरकारी स्तर पर चलने वाला सप्रे संग्रहालय देश में अपनी तरह का एकमात्र संग्रहालय है. यहां भारत के पहले अखबार से लेकर अब तक की सभी मुख्य पत्र-पत्रिकाओं को पूरी शिद्दत के साथ फाइलों में दर्ज किया जाता है. संग्रहालय की 29 साल की इस अनथक यात्रा से जुड़ी एक अच्छी खबर यह है कि यहां बीस हजार पत्र-पत्रिकाओं की फाइलों सहित गजेटियरों, जांच प्रतिवेदनों, हस्तलिखित पांडुलिपियों और कई दस्तावेजों को मिलाकर अब तक 27 लाख पन्नों की संदर्भ सामग्री तैयार की जा चुकी है.
भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन से न्यू मार्केट की ओर जाने वाले लिंक नंबर-3 पर बना माधवराव सप्रे संग्रहालय बाहर से जितना साधारण दिखता है भीतर से उतना ही अनूठा है.

इसका एहसास संग्रहालय में प्रवेश करते ही तब होता है जब तमाम अखबारों के पीले पन्नों में से कहीं आपको ऐसी इबारत पढ़ने को मिल जाती है जिसके किस्से आपने अकादमिक संस्थानों में सुने थे या फिर जिनका जिक्र किसी किताब में मिला था. और फिर आप बीते काल खंडों में जाए बिना रह नहीं पाते. भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में जिस हिकीज गजट (1780 में प्रकाशित हुआ भारत का पहला अखबार) के बारे में हम सबने पढ़ा-सुना है उसे चाहें तो आप छूकर देख सकते हैं. इक्कीसवीं सदी के सेल्फ पर खड़े झांक सकते हैं कि हिंदी का पहला अखबार उदंत मार्तंड (1826) आखिर दिखता कैसा था. यहीं रखा है लंदन का सबसे पुराना अखबार स्फियर (1764) और इसी के साथ आपको मध्य प्रदेश का प्राचीन मालवा अखबार (1849) भी मिल जाएगा. अगली कड़ी में देहली उर्दू अखबार (1836), मराठी भाषा के प्रभाकर (1841) और पहले दैनिक अखबार सुधा वर्षण जैसे कई अखबारों को जब आप उनके पहले अंकों के साथ पलटेंगे तो जानेंगे कि लिथो प्रिंटिंग के जमाने में आखिर अखबार कैसे निकलता था. इसी खजाने में भारतेंदु हरिश्चंद्र की हरिशचंद्र पत्रिका, बालकृष्ण भट्ट की हिंदी प्रदीप के अलावा नागरी प्रचारणी सभा, सरस्वती स्वराज्य और कर्मवीर को पढ़ते हुए आप पाएंगे कि उन दिनों उनकी विषय-वस्तु और भाषा-शैली कैसी हुआ करती थी.

[box]‘यदि इस छत के नीचे पांच सौ साल का इतिहास आ गया है तो इसलिए कि कई परिवारों ने इसे बचाने के लिए हम पर भरोसा किया’[/box]

समाचार पत्रों के झरोखे में आजादी की लड़ाई (1857-1947) की ऐसी आंखों देखी झांकी भी नजर आती है जिसमें किसी जगह तात्या टोपे जैसे किसी आदमी के दिखाई पड़ने की अफवाह भी है तो भगत सिंह की फांसी की खबर भी. हालांकि इतिहास की कई बड़ी घटनाओं को हम इतनी दफा सुन चुके हैं कि उन्हें सुनकर रूखापन छा जाता है. मगर अब आप द्वितीय विश्वयुद्ध, देश विभाजन, भारत की आजादी, और गांधीजी की हत्या की तारीख वाली सुर्खियों के सामने आइए. यहां 15 अगस्त, 1947 को हिंदुस्तान की आजादी का जीवंत इतिहास पढ़कर कौन रोमांचित नहीं हो जाएगा. या ‘मां की छाती पर घोर वज्रघात’ (भारत अखबार) गांधीजी की हत्या के दिन बनी यह खबर आपके भीतर वह तड़प भरती है जो 30 जनवरी, 1948 को 35 करोड़ भारतीयों को हुई होगी. अखबार इतिहास को दर्ज करते हैं. मगर सप्रे संग्रहालय में समाचार-पत्रों का इतिहास दर्ज है और इसी के साथ मीडिया का विकासक्रम भी. आजकल अखबार में आठ कॉलम का चलन है.

एक जमाना था जब नौ कॉलम वाला लंबा-चौड़ा अखबार छपता था. 1905 में छपा नौ कॉलम वाला श्रीवेंकटेश्वर अखबार संग्रहालय में सुरक्षित रखा है. वहीं 1894 में छपा 74×54 सेंटीमीटर के आकार का टाइम्स ऑफ इंडिया (आज के अखबारों से लगभग दोगुना) भी आकर्षण का केंद्र है. दूसरी तरफ, 1884 में छपा पोस्टकार्ड साइज का मौजे नरबदा भी आप देख सकते हैं. मौजे नरबदा हुकूमत के दमन का शिकार होने वाला मप्र का पहला अखबार है. सदाकत अखबार के संपादक अब्दुल करीम को भोपाल रियासत के खिलाफ टिप्पणी करने के बाद रियासत से बाहर निकाला गया था. इसके बाद उन्होंने होशंगाबाद से मौजे नरबदा निकालना शुरू कर दिया. भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली आवाज कोलकाता के अंग्रेजी अखबार हिकीज गजट ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ उठाई थी. तब संपादक जेम्स आगस्टस हिकी को अपने इस दुस्साहस का अंजाम भारत छोड़ने के फरमान के तौर पर भुगतना पड़ा था. और इंग्लैंड पहुंचने से पहले ही उनकी मौत की खबर मिली थी. जाहिर है यहां रखे अखबार इस बात के गवाह हैं कि हमारी समकालीन समस्याएं नई नहीं हैं और न ही मीडिया के सामने चुनौतियां ही.

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भले ही अखबार की जिंदगी को सुबह की चाय की चुस्कियों के साथ खत्म मान लिया जाए और अगले रोज वह रद्दी की टोकरी में नजर आए. यहां ऐसे ही रद्दी समझे जाने वाले कई टुकड़े अब इतिहास की धरोहर बन गए हैं. इन्हीं में नील आर्मस्ट्रांग के चंद्रमा पर पहुंचने के बाद जुलाई, 1969 के अखबार की एक कतरन का शीर्षक है- ‘मानव ने चांद पर कदम रखा.’ या 16 दिसंबर, 1971 के अखबार की सुर्खी ‘जनरल नियाजी ने लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के सामने घुटने टेके’.

यह संयोग है कि जिस वर्ष भोपाल गैस कांड हुआ था उसी साल यानी 1984 में माधवराव सप्रे संग्रहालय भी वजूद में आया. यहां इस त्रासदी की खबरों से जुड़े कई पृष्ठ भी आप देख सकते हैं. उस समय के कई अखबारों के कार्यालयों में भी इस कांड पर प्रकाशित खबरों के पृष्ठ नहीं हैं लिहाजा कई पत्रकार इस हादसे से जुड़ी खबरों को देखने के लिए यहां आते रहते हैं. दरअसल संग्रहालय में हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की कई पत्र-पत्रिकाओं की फाइलें अपने पहले अंक के साथ सहेजी जाती हैं. कुछेक अखबारों के तो ऐसे अंक भी हैं जो अब उनके प्रकाशकों के पास भी नहीं हैं. जैसे, मराठी भाषा के अखबार विदूषक और सकाल के कई दुर्लभ अंक महाराष्ट्र में भी नहीं मिलेंगे. 19 जून, 1984 को हिंदी के पत्रकार माधवराव सप्रे के नाम पर स्थापित इस अभिलेखागार की स्थापना के समय से इससे जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संपादक विजयदत्त श्रीधर बताते हैं कि 1982-83 में मप्र पत्रकारिता के इतिहास पर किताब लिखने के लिए जब जगह-जगह जाना हुआ तो यह चिंता हुई कि जर्जर पृष्ठों में पड़ी बुजुर्गों की यह जायदाद कहीं नष्ट न हो जाए. इसके बाद श्रीधर ने पुराने अखबारों को घर-घर जाकर तलाशना शुरू किया. श्रीधर ने समाचार पत्रों के इतिहास को न केवल समेटा बल्कि लिखा भी है. और उन्होंने इतिहास के महत्वपूर्ण लेखों को एक किताब के तौर पर तीन खंडों (1780-1947) में शामिल किया है. श्रीधर के मुताबिक, ‘यदि इस छत के नीचे पांच सौ साल का इतिहास आ गया है तो इसलिए कि कई परिवारों ने इसे बचाने के लिए हम पर भरोसा किया.’ माखनलाल चतुर्वेदी और धर्मवीर भारती के परिवार के सदस्यों ने निजी पुस्तकालय ससम्मान सप्रे संग्रहालय को सौंप दिए. संग्रहालय ने भी दानदाताओं की सामग्री को उनके नाम के साथ प्रदर्शित करने में जरा भी संकोच नहीं किया. शायद यही वे खूबियां हैं जिनकी वजह से सप्रे संग्रहालय की रजत जयंती (2008) पर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी तारीफ की थी.

इतिहास के सूत्र
सुर्खियों में केवल समाचार भर नहीं होते. ये उस कालखंड की समाज-संस्कृति का जीवंत दृश्य भी होती हैं. इसी कड़ी में यहां महत्वपूर्ण साक्ष्यों के तौर पर माने जाने वाले अंग्रेजी और हिंदी के कई गजेटियर हैं. 1905 में अंग्रेजी का पहला गजेटियर बना था और उसके एक दशक बाद राय बहादुर हीरालाल ने हिंदी वालों के लिए छोटे-छोटे और जिलावार गजेटियर शुरू किए. उन्हें अनुप्रास अलंकार में नाम दिए गए. जैसे, नरसिंहपुर जिले के गजेटियर का नाम रखा- नरसिंह नयन. इसी तरह, जबलपुर ज्योति, होशंगाबाद हुंकार, सागर सरोज और रायपुर रश्मि आदि चलन में आए. इनमें आप अपने समय के सूखे और अकाल के ब्यौरे सहित कई प्रसंग खंगाल सकते हैं.

संग्रहालय का दूसरा बड़ा काम 1509 से 1925 तक की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज है. यहां मनुस्मृति से लेकर झांसी की रासो तक की हजारों पांडुलिपियां हैं. हाल ही में संग्रहालय को गोस्वामी तुलसीदास की श्री रामविवाह की हस्तलिखित पांडुलिपि मिली है. इसके अलावा हिंदी के ख्यातिनाम साहित्यकार सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, हजारी प्रसाद द्विवेदी और भवानी प्रसाद मिश्र के पत्राचार संकलन संग्रहालय की नई उपलब्धि हैं. इन पत्रों में अपने समय के अहम मुद्दों पर चला विमर्श है. यही वजह है कि पटना से प्रकाशित होने वाले अखबार के प्रभात खबर के संपादक हरिवंश सप्रे संग्रहालय को शब्दों और विचारों की विपुल संपदा का रक्षक बताते हैं. वे कहते हैं, ‘हिंदी में ऐसी दूसरी संस्था नहीं. हिंदी इलाकों में संस्थाओं के क्षय का रोना चलता रहता है पर विपरीत परिस्थितियों में ऐतिहासिक महत्व की संस्था बनाना कोई यहां से सीखे.’ 25-30 साल का अरसा कुछ नहीं होता. मगर इतने कम समय में ही यह शोधार्थियों का नया ठिकाना बन गया है. सप्रे संग्रहालय में देश के कई विश्वविद्यालयों के हजारों शोधार्थियों ने शोध पूरे किए हैं. वहीं कई साहित्यकारों को जब कोई जरूरी दस्तावेज कहीं नहीं मिला तो उन्हें यहां आकर कामयाबी मिली. इन्हीं में अपनी मौत से ठीक पहले यहां आए कमलेश्वर भी हैं. वे हिंदी-उर्दू पर काम करने वाले थे और यहां आकर उन्हें उनके काम की किताब मिल गई. संग्रहालय में हिंदी के बाद सबसे बड़ा जखीरा उर्दू का दिखता है. यहां भोपाल सहित, लाहौर, हैदराबाद, लखनऊ, बरेली और दिल्ली के कई पुराने अखबार हैं.

[box]यहां मनुस्मृति सहित हजारों पांडुलिपियां हैं. हाल ही में संग्रहालय को गोस्वामी तुलसीदास की श्री रामविवाह की हस्तलिखित पांडुलिपि मिली है[/box]

देश के विभाजन से पहले भोपाल उर्दू का बड़ा गढ़ था और इसलिए पाकिस्तान के कौकब जमील जैसे मशहूर पत्रकार-लेखक अपने शोध के लिए भोपाल आते हैं. संग्रहालय की निदेशक मंगला अनुजा बताती हैं, ‘जब दुनिया भर की खाक छानकर कोई यहां आए और उन्हें उनके काम की सामग्री मिल जाए तो आत्मसंतुष्टि मिलती है.’ अनुजा विदेश के अनेक शोधार्थियों के लिए कई बार दुर्लभ सामग्री जुटा चुकी हैं. जापान की शोधार्थी हिसाए कोमात्सु का ही किस्सा लें. वे चार साल पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘हिंदी क्षेत्र में स्त्री का स्त्री विमर्श’ विषय पर शोध कर रही थीं. और उन्हें 1857 से 1947 के अखबारों की तलाश थी. कोमात्सु ने एक दिन कहीं सप्रे संग्रहालय से जुड़ी खबर पढ़ी और भोपाल आ गईं. तीन साल दिल्ली में भटकने के बाद आखिर उन्हें यहां अपने शोध के लिए जरूरी जानकारी का भंडार मिल गया.

इन दिनों यहां पहले दिन से आज तक उपयोग में लाए गए कैमरों और रेडियो को खोजने का काम चल रहा है. फिलहाल यदि आपको देखना है तो द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने में सेना के उपयोग के लिए लाया गया ट्रांसमीटर देख सकते हैं. आप चाहें तो यहां 1948 में बापू की हत्या का समाचार सुनाने वाले रेडियो की तस्वीर भी खींच सकते हैं. भारतीय पत्रकारिता की तकरीबन डेढ़ सौ साल की झलकियां देखकर जब आप फिर से संग्रहालय के प्रवेशद्वार पर आते हैं तो यहां रखी तोप आपको चौंकाती नहीं है.  इस तोप के नीचे अकबर इलाहाबादी का सबसे ज्यादा दोहराया जाने वाला वह शेर लिखा है, ‘…जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो.’  इसे देखकर सहसा आप महसूस करते हैं कि प्रतीक के तौर पर ही सही भेलसा (विदिशा) से आई 17वीं सदी की तोप शायद पत्रकारिता के इतिहास की रक्षा के लिए ही यहां तैनात है.

पत्रकार और सूत्रधार
‘जाके पांव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई.’ मध्य प्रदेश में यह कहावत खूब कही-सुनी जाती है. और नरसिंहपुर जिले के बोहानी गांव से मीडिया की दुनिया के संवेदनशील रिपोर्टर, संपादक, पत्रकारिता के उम्दा लेखक तथा सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय की नींव डालने वाले विजयदत्त श्रीधर पर तो यह सटीक बैठती है. दरअसल अस्सी के दशक में मप्र की पत्रकारिता के इतिहास पर किताब लिखने के लिए जब श्रीधर को इधर से उधर भटकना पड़ा तो उन्हें लगा कि लेखकों के लिए संदर्भ सामग्री को एक छत पर लाना कितना जरूरी है. उन्हें यह एहसास भी हुआ कि समाचार पत्र-पत्रिकाएं केवल पत्रकारों और प्रकाशकों का ब्योरा ही नहीं देतीं बल्कि उनमें समसामयिक घटनाक्रम के साक्ष्य भी होते हैं और इसीलिए राष्ट्र की इस बौद्धिक धरोहर को बचाना चाहिए. मगर सामग्री संकलन का काम कोई आसान नहीं होता.

श्रीधर बताते हैं कि जब तक सामग्रीदाता को यह भरोसा न हो जाए कि आप उनकी अमानत को बचाकर रख पाएंगे तब तक कोई आपके हाथों कुछ सौंपता भी नहीं है. ऐसा कई बार हुआ कि किन्हीं ने पहले सामग्री देने के लिए हां कह दी और बाद में वहां से खाली हाथ ही लौटना पड़ा. लेकिन बुजुर्गों ने हमेशा समझाया कि जब झोली फैलाई है तो अहं को सिर नहीं उठाने देना. बकौल श्रीधर, ‘जबलपुर में सामग्री संकलन अभियान के अहम सहयोगी शंकर भाई ने हमारे लिए एक संबोधन गढ़ा- ‘कबाड़ी.’ जब कभी जबलपुर जाना होता, वे संदर्भ सामग्री देने वालों से कहते भोपाल से कबाड़ी आएं हैं, अपना कबाड़ खाली कर दो. जिस अदांज में शंकर भाई कबाड़ी कहते वह किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था.’ दरअसल ऐसी सामग्री श्रीधर को हमेशा अपने कंधों पर ढोनी पड़ी है. ऐसी ही मशक्कत के चलते सबका उन पर भरोसा बढ़ता गया. वहीं सप्रे संग्रहालय ने अपने पहले पड़ाव से ‘मैं’ की जगह ‘हम’ को अपनाया और इसीलिए पहले प्रदेश और फिर देश भर में संग्रहालय का एक कुटुंब बन गया.