Home Blog Page 1472

क्या होगा लालू का?

राजनीतिक तौर पर लालू प्रसाद के लिए अभी खुशी में मगन रहने जैसा माहौल था. कुछ माह पहले महाराजगंज में प्रभुनाथ सिंह की जीत के रूप में लगातार हताशा-निराशा के गर्त में जाने के बाद उन्हें और उनकी पार्टी को ऑक्सीजन जैसा कुछ मिला था. इस जीत के बाद हुए कुछ सर्वेक्षणों में उन्हें बढ़त मिलने की उम्मीद भी जतायी जा रही थी.  एक के बाद एक आ रही सुखद खबरों से लालू को नई ऊर्जा मिल रही थी. और वे इस ऊर्जा से लबलबाए हुए मीडिया के सामने बोलने-बतियाने भी लगे थे. बिहार में लगातार घट रही घटनाएं और नीतीश कुमार द्वारा समय पर सही कदम न उठा सकने से राज्य में बनता माहौल, उपजता आक्रोश भी उनके लिए एक राजनीतिक उम्मीद सरीखा ही था.

लेकिन 13 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने लालू प्रसाद को एक बार फिर निराशा-हताशा में ढकेल दिया है. चारा घोटाले की सुनवाई आखिरी दौर में है और लालू प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट में यह अर्जी लगा रखी थी कि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश को हटाया जाए, वे बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही के रिश्तेदार हैं, इसलिए फैसला आग्रहों-पूर्वाग्रहों से भरा हो सकता है. उच्चतम न्यायालय ने उनकी सिर्फ अर्जी ही खारिज नहीं की बल्कि अगले माह तक फैसले सुनाने का संकेत भी दे दिया. लालू प्रसाद और उनके समर्थक परेशान हैं.

अदालती और कानूनी पेंच में मामले को फंसाये जाने की कोशिशें जारी है विशेषज्ञ कह रहे हैं कि लालू प्रसाद को जेल हो सकती है. लालू प्रसाद और उनके समर्थकों को जेल जाने से डर नहीं, क्योंकि उससे तो एक माहौल ही बनेगा कि देश में कितने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं, होते रहे हैं, उसमें दोषियों का कुछ नहीं हो रहा लेकिन लालू प्रसाद को फंसाकर भेजा गया है. डर अब दूसरा है. एक बार सजा सुनायी गयी और लालू प्रसाद जेल गये तो फिर चुनाव लड़ने के अधिकारी नहीं रहेंगे. लालू प्रसाद यादव की मुश्किल यह है कि वो बाल ठाकरे की तरह अपने संगठन को नहीं चलाते कि चुनाव लड़े या नहीं लड़े, उनके राजनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ता. लालू प्रसाद को खुद चुनाव नहीं लड़ने की स्थिति में किसी को सामने करना होगा. दूसरे किसी नेता पर उनका भरोसा नहीं रहता, यह बिहार में बार-बार वे दिखा चुके हैं.

अपनी पत्नी, अपने दोनों सालों के बाद कुछ माह पहले अपने दोनों बेटों को राजनीति में उतारकर वे बताते रहे हैं कि वो पार्टी को घरेलू तरीके से चलाने में ज्यादा भरोसा रखते हैं. तेजप्रताप और तेजस्वी भले राजनीति में आ चुके हैं लेकिन इनके नेतृत्व में राजद के कई नेता चुनाव लड़ने को तैयार नहीं होंगे, ऐसी प्रबल संभावना है.  लालू की बेटी मीसा भारती भी आगामी लोकसभा चुनाव में दस्तक देनेवाली है लेकिन अब तक लालू प्रसाद ने मीसा को राजनीति में उताड़ने की घोषना नहीं की है,  इसलिए यह थोड़ा मुश्किल होगा कि कि बेटी को राजनीति में लाने की घोषणा करने के तुरंत बाद उसे पार्टी का नेतृत्व भी सौंप दें, रामकृपाल यादव, जयप्रकाश यादव जैसे लालू के खास सिपहसलार तो किसी भी नेतृत्व को स्वीकार कर लेंगे लेकिन रघुवंश प्रसाद सिंह, जगतानंद सिंह, राजद कोटे से नए-नए सांसद बने प्रभुनाथ सिंह जैसे नेता इसके लिए तैयार नहीं होंगे. लालू प्रसाद जानते हैं कि अगर वे अपने परिवार के ही सदस्य को अपनी जगह आगे नहीं लाएंगे तो उनका जो कोर वोट बैंक यादवों का है, दरक भी सकता है.

आखिरी में एक विकल्प राबड़ी देवी बचेंगी. राबड़ी देवी पिछले विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर परास्त हो चुकी हैं. सामने विधानसभा चुनाव का मामला होता तो राबड़ी को फिर भी आगे कर लालू प्रसाद यादव सब मैनेज कर सकते थे लेकिन सामने लोकसभा चुनाव है. और लोकसभा में राबड़ी देवी को नेतृत्व सौंपकर लालू कोई चांस नहीं लेना चाहेंगे. सूचनाएं दूसरे किस्म की बहुत दिनों से हवा में फैली हुई हैं. वे सूचनाएं पहले से ही रह-रहकर लालू प्रसाद यादव को परेशान करते रहती हैं. कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव के दल से कुछ वरिष्ठ नेता लोकसभा चुनाव आते-आते नीतीश के पाले में जा सकते हैं. लालू प्रसाद का साथ छोड़कर नीतीश के खेमे में जानेवाले नेताओं की फेहरिश्त काफी लंबी रही है, इसलिए इसे कोई अनहोनी भी नहीं माना जा सकता. लालू प्रसाद दुविधा में हैं. 13 अगस्त के फैसले से पटना के राजद कार्यालय में दूसरे किस्म का माहौल बना दिया है. बिहार सरकार की नाकामी पर राजनीति करने की तैयारी में लगी राष्ट्रीय जनतादल पार्टी का खुद का क्या भविष्य होगा? निश्चिततौर पर आज यह सवाल लालू प्रसाद यादव को परेशान कर रहा होगा.

छत्तीसगढ़: संकट में उद्योग

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'”]

इन दिनों छत्तीसगढ़ में मिनी स्टील प्लांट सरकार से जीवनदान की याचना कर रहे हैं. राज्य सरकार से विशेष राहत पैकेज की मांग कर रहे मिनी स्टील प्लांट दोहरे संकट से जूझ रहे हैं. लेकिन इनसे भी ज्यादा विकट स्थिति वर्षों से इन प्लाटों में काम करने वाले 50 हजार मजदूर और उन पर आश्रित परिवार की है. 3 अगस्त 2013 से राजधानी रायपुर के उरला और सिलतरा इंडस्ट्रियल इलाके के तकरीबन 80 मिनी स्टील प्लांट हड़ताल पर हैं. इससे इन प्लांटों में उत्पादन ठप हो गया है. प्लांटों में ताला लगने से वहां काम करने वाले मजदूरों के घरों में मातम सा छाया हुआ है. प्लांट के मालिकों की मांग सस्ती बिजली को लेकर है, लेकिन प्रदेश के मिनी स्टील प्लांट मंहगे स्पॉन्ज आयरन की मार भी झेल रहे हैं. प्लांट मालिकों का कहना है कि जब तक राज्य सरकार बिजली की दरों में कमी नहीं करती, तब तक मिनी स्टील प्लांट यूं ही बंद रखे जाएंगे. एमएसपी की हड़ताल से केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाला केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड भी परेशान है. इसका कारण मिनी स्टील प्लांट की हड़ताल से केंद्र को संभावित राजस्व की हानि है. छत्तीसगढ़ के लोहा उद्योग से केंद्र सरकार को सालाना छह हजार करोड़ का राजस्व मिलता है. इस साल राजस्व वसूली का लक्ष्य छह हजार आठ सौ करोड़ रुपए रखा गया था. लेकिन हड़ताल के बाद अनुमान है कि अब राजस्व के रूप में मिलने वाली सालाना राशि में दस से बीस फीसदी की कमी आएगी. ऐसे में केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड के अफसरों को ताकीद दी है कि वे उद्योगपतियों से बात कर हड़ताल खत्म करवाने में भूमिका निभाएं.

मिनी स्टील प्लांट चला रहे उद्योगपतियों का आरोप है कि राज्य में स्टील प्लांटों के लिए तीन तरह की विद्युत दर प्रचलित है. मिनी स्टील प्लांट एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक सुराना कहते हैं, ‘रायगढ़ में 2000 हेक्टेयर इलाके में फैले जिंदल पार्क में स्थापित मिनी स्टील प्लांटों को केवल 3.18 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है. (जिंदल पार्क में स्थित मिनी स्टील प्लांटों को जिंदल स्टील एंड पॉवर बिजली सप्लाई करता है). सिलतरा और बोरई के इंटीग्रेटेड स्टील प्लाटों को तीन रुपए से भी कम दर पर बिजली दी जा रही है. लेकिन उरला और सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र के 80 मिनी स्टील प्लांट बिजली के लिए छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल पर निर्भर हैं. विद्युत मंडल इन प्लांटों को 4.97 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली सप्लाई कर रहा है. इस दर में 360 रुपए प्रति केवीए पर लगने वाला डिमांड चार्ज और मिनी स्टील प्लाटों पर लगने वाला 6 प्रतिशत विद्युत शुल्क भी शामिल है.’ अब स्टील प्लांट एसोसिएसन राज्य सरकार से मांग कर रही है कि डिमांड चार्ज को घटाकर 360 रुपए प्रति केवीए से 180 रुपए किया जाए. मिनी स्टील प्लांटों पर लगने वाला छह प्रतिशत विद्युत शुल्क भी खत्म किया जाए. साथ ही रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक विद्युत दरों में 30 प्रतिशत की अतिरिक्त छूट दी जाए.

[box] ऐसे में मिनी स्टील प्लाटों में वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे श्रमिक एक झटके में सड़क पर आने की स्थिति में पहुंच गए हैं.[/box]

सरकार और उद्योगपतियों की इस लड़ाई में असल खामियाजा इन मिनी स्टील प्लांटों में काम करने वाले मजदूर भुगत रहे हैं. भले ही हड़ताल के बाद भी अभी इन मजदूरों को घर पर रहने को नहीं कहा गया है. लेकिन आने वाले दिनों को वे संकट के रूप में देख रहे हैं. हड़ताल पर चल रहे 80 मिनी प्लाटों में इस वक्त 50 हजार मजदूरों की रोजी रोटी निर्भर है. अगर समय रहते राज्य सरकार और उद्योगपतियों का झगड़ा नहीं सुलझ पाया तो इन मजदूरों के परिवार भूखों मरने पर मजबूर हो जाएंगे. दरअसल इन मजदूरों के लिए रोजगार के दूसरे विकल्प मौजूद नहीं है. ऐसे में मिनी स्टील प्लाटों में वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे श्रमिक एक झटके में सड़क पर आने की स्थिति में पहुंच गए हैं.

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के तहत काम कर रहे प्रगतिशील इंजीनियरिंग परमिट संघ के शेख अंसार बताते हैं, ‘ उद्योगपतियों की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता. मिनी स्टील प्लांटों की हड़ताल से उद्योगपतियों को भले ही ज्यादा फर्क ना पड़े. लेकिन मजदूरों की आफत हो जाएगी. प्लांटों में पहले भी हुई ऐसी हड़तालों का हवाला देते हुए अंसार कहते हैं कि मजदूरों को बगैर काम किए उनकी मजदूरी ना पहले कभी मिली है ना ही अभी मिलेगी. जितने दिन मिनी स्टील प्लांट बंद रहेंगे, उतने दिन की रोजी मारी जाएगी और अगर प्लांट पूरी तरह बंद हो गए तो भी मारा तो मजदूर ही जाएगा.’

मजदूरों की चिंता से दूर उद्योगपति अपनी मजबूरियों को ही गिनाने में लगे हुए हैं. सही मायने में मिनी स्टील प्लांट के सामने दूसरा गंभीर संकट मंहगे स्पॉन्ज आयरन का भी है. एसोसिएसन के उपाध्यक्ष रविंद्र जैन की मानें तो, ‘नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन यानि एनएमडीसी ने आयरन ओर की दरें 20 से 25 फीसदी कम कर दी हैं. पहले आयरन ओर की कीमत 6200 रुपए प्रति मीट्रिक टन थी. अब कीमत घटने के बाद ये 4600 रुपए प्रति मीट्रिक टन मिल रहा है. ऐसे में बड़े उद्योगों को सस्ता आयरन ओर मिलने लगा है. लेकिन इसके बावजूद स्पाँज आयरन की कीमतें कम नहीं हुई.’  इस वक्त प्रति मीट्रिक टन स्पॉन्ज आयरन की कीमत 18 हजार 700 रुपए है. जैन और दूसरे उद्योगपतियों की मानें तो स्पॉन्ज आयरन से उत्पाद बनाने में 10 हजार रुपए प्रति मीट्रिक टन लागत आती है.

ऐसे में स्पॉन्ज आयरन से बनने वाले उत्पाद में प्रति मीट्रिक टन तकरीबन 28 हजार 700 रुपया खर्च होता है. अब मिनी स्टील प्लांटों के सामने संकट ये है कि रोलिंग मिलों में लगने वाले इंगट की कीमत फिलहाल 26 हजार 700 रुपए प्रति मीट्रिक टन है. वहीं तैयार माल 31000 रुपए (प्रति मीट्रिक टन) की कीमत में बाजार में उपलब्ध है. बाजार में तय कीमतों के कारण मिनी स्टील प्लाटों को लागत से कम मूल्य पर माल बाजार को देना पड़ रहा है. दरअसल असल मुद्दा बड़े और छोटे उद्योगों की खींचतान का भी है. अधिकांश बड़े स्टील प्लांटों के पास खुद की आयरन ओर खदानें और पॉवर प्लांट हैं. ऐसे में उन्हें उत्पाद तैयार करने में अपेक्षाकृत कम लागत आती है. लेकिन मिनी स्टील प्लाटों को कच्चे माल और बिजली के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में मिनी स्टील प्लांट बाजार में बड़े उद्योगों का सामना नहीं कर पा रहे हैं. यही कारण है कि 2007 से 2013 तक करीब 85 मिनी स्टील प्लांट पूरी तरह बंद हो चुके हैं.

अब इस पूरे मामले में राज्य सरकार का नज़रिया बिलकुल अलग है. पहले बिजली की बात करें तो छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक सुबोध सिंह कहते हैं, ‘ एमएसपी (मिनी स्टील प्लांट) को हम दूसरे राज्यों की तुलना में सस्ती बिजली दे रहे हैं. अव्वल तो सिंह मानते ही नहीं कि एमएसपी हड़ताल पर हैं. वे कहते हैं कि जाकर देख लीजिए..कई प्लांट चल रहे हैं. सुबोध सिंह कहते हैं कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के असर के कारण मिनी स्टील प्लांटों को घाटा हो रहा है और उसका दोष विद्युत मंडल के सर मढ़ा जा रहा है. विशेष राहत पैकेज की मांग पर सिंह तर्क देते हैं कि राज्य सरकार अपनी तरफ से पहले से ही उन्हें राहत दे रही है. सरकार ने मिनी स्टील प्लांट पर लगने वाले 8 प्रतिशत विद्युत शुल्क घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. उद्योगों के आग्रह पर ही सरकार ने विद्युत की दरें नहीं बढ़ाई हैं. सिंह सवाल करते हैं कि हम इससे ज्यादा और क्या राहत दे सकते हैं.’

[box]बाजार में तय कीमतों के कारण मिनी स्टील प्लाटों को लागत से कम मूल्य पर माल बाजार को देना पड़ रहा है. दरअसल असल मुद्दा बड़े और छोटे उद्योगों की खींचतान का भी है.[/box]

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सत्यनारायण शर्मा कहते हैं, ‘मिनी स्टील प्लांट की मांगे जायज हैं. छत्तीसगढ़ सरकार सरप्लस बिजली का दावा करती है तो ऐसे में छोटे उद्योगों की मांग पर बिजली की दरें कम क्यों नहीं कर सकती. वे आगे कहते हैं कि इन उद्योंगों से ढाई लाख लोगों का रोजगार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुडा हुआ है. साथ ही मिनी स्टील प्लांट ही विद्युत मंडल के सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं. जो बिजली के बिल के रूप में लाखों रुपए चुकाकर सरकार का राजस्व बढ़ा रहे हैं. शर्मा आरोप लगाते हैं कि ऊर्जा और खनिज दोनों ही महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री रमन सिंह के पास हैं. ऐसे में उन्हें उद्योगपतियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.’

छत्तीसगढ़ में उद्योगपतियों पर लगने वाला डिमांड चार्ज की देश के दूसरे राज्यों से तुलना करें तो ये ज्यादा नज़र आता है. केवल एक मध्य प्रदेश को छोड़ दें (मप्र में भी ज्यादा डिमांड चार्ज वसूला जा रहा है. 380 रुपए प्रति केवीए) तो हरियाणा में 130 रुपए मांग प्रभार लिया जाता है तो ओडिशा में 250 रुपए डिमांड चार्ज लिया जा रहा है. आंध्रप्रदेश में 350, गुजरात में 270 और महाराष्ट्र में 190 रुपए प्रति केवीए डिमांड चार्ज वसूला जाता है. लेकिन इन राज्यों में बिजली की दर प्रति यूनिट महंगी है. मसलन हरियाणा में मिनी स्टील प्लांटों से 4.60 रुपए प्रति यूनिट बिजली बिल वसूला जाता है. डिमांड चार्ज जुड़ने के बाद ये 5.11 रुपए प्रति यूनिट हो जाता है. यही हाल दूसरे राज्यों का भी है. दरअसल सरकार एक और तो अन्य राज्यों की तुलना में सस्ती बिजली देने का दावा करती है लेकिन डिमांड चार्ज ज्यादा लगाती है.

छत्तीसगढ़ सरकार के ऊर्जा सचिव अमन कुमार कहते हैं, ‘राज्य सरकार हर स्तर पर उद्योगों को राहत देने का काम कर रही है. चाहे बिजली की बात हो या स्पॉन्ज आयरन की. एनएमडीसी से मिनी स्टील प्लांटों को सस्ता स्पाँज आयरन मिल सके, इसके लिए खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह कई बार केंद्रीय इस्पात मंत्रालय को पत्र लिख चुके हैं. इसमें राज्य की भूमिका बेहद सीमित है. हम सिवाए केंद्र सरकार से गुहार लगाने के और कुछ नहीं कर सकते.’ अब स्थानीय उद्योगपतियों और सरकार की खींचतान में नुकसान आखिरकार प्रदेश का ही हो रहा है. तेजी से औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरते छत्तीसगढ़ के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं. वो भी ऐसे समय जब राज्य सरकार देश-विदेश के बड़े उद्योगपतियों को प्रदेश में निवेश के लिए बार-बार न्यौता भेज रही हो.

जनता का जायका

मनीषा यादव
मनीषा यादव

इस बार भी वही हुआ! देखा गया, उठाया गया, छुआ गया, फिर रख दिया गया. अब उसका धैर्य जवाब दे चुका था. वह बोला, ‘हे ईश्वर, और कितना अपमानित करवाएगा!’ सुनकर आलू कसमसाया. अभी-अभी जिसने ऊपर वाले से फरियाद की वह टमाटर है. आलू शांत था, जबकि ऐसा ही व्यवहार उसके साथ भी हो रहा था. कारण यह कि वह अनुभवी है. उसे लोगों के व्यवहार का भलीभांति ज्ञान हो चुका है. पहले-पहल उसे भी अखरा था लेकिन अब यह सब सामान्य-सी बात है.

लेकिन ऐसा हो क्यों रहा है, भाई साहब? सारा किया-धरा निगोड़े मौसम का है. उसने जरा-सी करवट क्या ली, दोनों की नींदें उड़ गईं. चलिए, सब्जीमंडी चल कर देखते हैं कि आगे क्या हुआ!

टमाटर के बार-बार अपमानित होने का एक कारण और भी है. जब-जब लाल टमाटर की अवहेलना होती, लाल टमाटर गुस्से से लाल हो जाता. लिहाजा लोग उसके प्रति और आकर्षित होते. मगर पास जाकर जब देखते कि वह दागी है, तो उनका आकर्षण उंहू… कहते हुए तिरस्कार में बदल जाता.

मगर आलू का क्या हाल है, भाई साहब! अनुभवी आलू! मस्त, मंलग है. उसने तो खुद को समझा-बहला लिया था मगर टमाटर को कैसे समझाया जाए. वह मन ही मन टमाटर की तबीयत हरी करने की युक्ति सोचने लगा. कुछ देर बाद वह बोला, ‘मेरे प्यारे टमाटर, ताजी-ताजी एक गजल सुन- दियासलाई और पानी साथ-साथ रखते हैं/ सियासत में वे ऊंचा मुकाम रखते हैं. कैसा लगा!’ ‘सुनकर मतली आ रही है.’ टमाटर मुंह बनाकर बोला. आलू जारी रहा, ‘लंबी होती ही जा रही है यहां पतझड़ों की मियाद/ हमारी खाली सुबहों में वे अपनी रंगीन शाम रखते हैं.’ अब बोल!’, आलू बोला. ‘यह शेर नहीं चूहा है.’ टमाटर ने कहा. ‘अबे! सब्जीधर्म निभाते हुए कम से कम सियार कह देता, निर्दयी.’ यह कहकर आलू एक सांस में अपनी तथाकथित अधूरी गजल को पूरी सुनाने लगा, ‘फासला हो गया कितना अमीरी और गरीबी में/ अपने काम से वे बस अपना काम रखते हैं/सूखे में उजड़ गए गांव कई सारे/ तकिये के पास वे छलकता जाम रखते हैं/ बिलबिला कर भूख से मर गया किसान कोई/ मरने वाले का वे अन्नदाता नाम रखते हैं.’ लेकिन टमाटर पर कोई असर नहीं.

अब आलू क्या करेगा, भाई साहब! आलू ने एक बार फिर टमाटर की टीस कम करने की कोशिश की. ‘अच्छा हमारे यहां का सबसे बड़ा लतीफा कौन-सा है?’ टमाटर चुप. आलू ने कहा, ‘जब कोई नेता नैतिकता के नाम पर दूसरे नेता का इस्तीफा मांगता है’. फिर भी टमाटर पर कोई असर न हुआ. आगे आलू ने कहा, ‘दुनिया का सबसे बड़ा अचरज- जब कोई भारतीय नेता नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे.’ मगर टमाटर का मूड अब भी उखड़ा रहा. उसके मूड को ठीक करने की कोई तरकीब नहीं बैठ रही थी.

इसी बीच एक बात हुई. टमाटर बस चुने जाने वाला ही था कि उसके दागी होने का पता चल गया, और एक झटके से उसे बाहर पटक दिया गया. वह दोबारा वहीं आ गिरा, जहां से उठा था.

अरे..रेरे… बहुत बुरा हुआ. मगर अब टमाटर क्या करेगा, भाई साहब! इस बार आलू ने सोचा दो टूक बात करते हैं भले ही टमाटर का दिल टूट जाए, घुट-घुट के जीने से तो अच्छा ही होगा.

आलू ने हौल जमाते हुए टमाटर से कहा, ‘देख, ये न चुने जाने की अपनी टेक छोड़! जो हमें-तुम्हें चुनने में सौ नखरे कर रहे हैं न, इनकी सच्चाई मैं बताता हूं. जो जनता घंटों बाद भी अपने लिए दागी फल-सब्जी तक नहीं चुनती, वही जनता यहां अपने और अपने देश के लिए झट से दागी प्रतिनिधि चुन लेती है. और तू इनसे अपने चुने जाने की उम्मीद कर रहा है, बेवकूफ!’

अनूप मणि त्रिपाठी

एक सीडी की एबीसीडी

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'” info=”true” ]

रायपुर के इंदिरा प्रियदर्शिनी सहकारी बैंक में छह साल पहले हुए घोटाले की जांच से जुड़ी एक सीडी सार्वजनिक होने के बाद छत्तीसगढ़ में चुनावी सरगर्मियां अचानक बढ़ गई हैं. यह सीडी बैंक के पूर्व मैनेजर उमेश सिन्हा के नार्को टेस्ट की है. रायपुर के जिला सत्र न्यायालय ने 2007 में उमेश के नार्को टेस्ट का आदेश दिया था. हालांकि सीडी कभी अदालत में पेश नहीं की गई. तब से राज्य में इस बात की चर्चा थी कि इसमें कुछ प्रभावशाली लोगों के नाम हैं इसलिए इसे दबा दिया गया. यह बात बीती 20 जुलाई को उस समय साबित हो गई जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल और प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी ने राजधानी स्थित पार्टी कार्यालय में यह सीडी सार्वजनिक की. इसमें उमेश को यह कहते हुए देखा जा सकता है कि उसने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह और उनकी कैबिनेट के चार मंत्रियों ब्रजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और रामविचार नेताम को एक-एक करोड़ रुपये की घूस दी है. साथ में उमेश ने राज्य के पूर्व डीजीपी को भी एक करोड़ रुपये देने की बात कबूली है.

सीडी उजागर होने के बाद कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और संबंधित चार मंत्रियों के इस्तीफे की मांग को लेकर राज्य भर में आक्रामक प्रदर्शन शुरू कर दिया. लेकिन उस प्रदर्शन की धमक उस समय कुछ कम हो गई जब सीडी खुलासे के दो दिन बाद ही बैंक की पूर्व अध्यक्ष रीता तिवारी खुद सरकार के बचाव में आ गईं. उन्होंने मीडिया में जारी अपने बयान में दावा किया कि नार्को टेस्ट में उमेश ने फर्जी बयान दिया है. यह बयान आने के बाद कांग्रेस और आक्रामक हो गई. शैलेष कहते हैं, ‘ यह तो हद हो गई कि अब सरकार खुद को बचाने के लिए घोटाले की प्रमुख सूत्रधार से प्रमाणपत्र ले रही है.’ इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है घोटाले में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों पर भले ही आरोप लग रहे हों लेकिन इस सहकारी बैंक के सभी प्रमुख पदों पर कांग्रेस से संबंधित व्यक्ति काबिज थे और सभी आरोपित पार्टी से जुड़े हुए हैं. कांग्रेस की खीज की एक बड़ी वजह यह है कि बैंक की पूर्व अध्यक्ष रीता तिवारी भी पार्टी से ही संबंधित हैं. उनके ससुर पूर्व सांसद रामगोपाल तिवारी एक समय राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे हैं. कहा जा रहा है कि रीता तिवारी के पति हर्षवर्धन तिवारी को सरकार ने किसी सरकारी विभाग के प्रमुख का पद देने का वादा किया है और इसी वजह से वे भाजपा के पाले में आ गई हैं.

इस मामले में चूंकि पूर्व डीजीपी का नाम भी आया था इसलिए पुलिस ने भी तुरत-फुरत सफाई दे दी. छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रवक्ता जीपी सिंह कहते हैं कि मामले में गिरफ्तार 13 अभियुक्तों में से किसी ने उमेश की बात की पुष्टि नहीं की थी इसलिए सीडी को अदालत में बतौर सबूत पेश नहीं किया गया. इधर सीडी मसले पर राज्य के शिक्षा मंत्री ब्रजमोहन अग्रवाल कहते हैं,  ‘यह सीडी फर्जी है. चुनावी साल में कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं है इसलिए वह झूठे मामले उठा रही है.’

रीता तिवारी के सरकार के बचाव में आने के बाद भी इस पूरे मामले में कांग्रेस का पलड़ा कुछ भारी है. उसके नेताओं का दावा है कि झीरम घाटी में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर हमले की संभावित वजह भी यह खुलासा हो सकता है. पार्टी नेताओं का कहना है कि परिवर्तन यात्रा में शामिल कुछ वरिष्ठ नेता इस मामले से जुड़े खुलासे करने वाले थे इसलिए एक साजिश के तहत उनकी हत्या करवा दी गई. शैलेष बताते हैं, ‘झीरम घाटी में कांग्रेस के काफिले पर नक्सली हमले के दो दिन पहले हमारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के बेटे दिनेश ने मुझे एसएमएस करके बताया था कि वे 15 जून को एक बड़ा खुलासा करने वाले हैं. वे यही खुलासा करने वाले थे लेकिन एक साजिश के तहत उनकी हत्या कर दी गई.’ यह मामला इस समय राजनीतिक दांवपेचों के कारण दोबारा से चर्चा में आ गया है लेकिन बीते सालों में हुई इसकी जांच अपने आप में कई सवालों के घेरे में है.

घोटाला और मनमर्जी की पुलिस जांच

महिलाओं की सहकारी समिति द्वारा संचालित इंदिरा प्रियदर्शिनी सहकारी बैंक के संचालक मंडल में 12 महिलाएं थीं.  2003 से 2005 के दौरान यह बैंक रायपुर में सहकारी क्षेत्र का सबसे बढ़िया बैंक माना जाता था. 2003 में ही उमेश सिन्हा बैंक का मैनेजर बना. इस समय तक बैंक की अध्यक्ष लीला पारेख थीं. वे अकाउंटिंग जानती थीं इसलिए गड़बड़ियों की गुंजाइश नहीं थी. पारेख के निधन के बाद उसी साल रीता तिवारी अध्यक्ष बनीं. बैंक घोटाले के एक आरोपित नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘ रीता तिवारी को बैंक के कामकाज के बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए उनके अध्यक्ष बनते ही लूट का सिलसिला शुरू हो गया. उमेश उनसे जहां दस्तखत करने को कहता वे कर देतीं.’ कहा जाता है कि रीता तिवारी सहित संचालक मंडल के बाकी सदस्यों के लिए उमेश अपनी तरफ से यहां-वहां आने जाने के लिए अपनी तरफ से एयर टिकट और होटल का किराया आदि देने लगा. इसके एवज में उसने एक तरह से बैंक पर पूरी तरह कब्जा कर लिया. उसने कई एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रिसीप्ट), पे ऑर्डर और डिमांड ड्राफ्ट जारी किए साथ ही कई कंपनियों को बिना सिक्युरिटी के कैश क्रेडिट लिमिट दे दी. इस पूरी प्रक्रिया में उमेश ने बैंक के रिकॉर्ड में पैसों की कहीं एंट्री नहीं की.

[box]सबसे दिलचस्प बात है कि कांग्रेस भाजपा सरकार पर बैंक घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा रही है लेकिन इस सहकारी बैंक पर कांग्रेस का ही कब्जा था[/box]

इस तरह से उसने बैंक को तकरीबन 13 करोड़ रुपये की चपत लगा दी. यह घोटाला अगस्त, 2006 में तब सामने आया जब अचानक एक दिन ग्राहकों को कहा गया कि बैंक में पैसा खत्म हो गया है और उन्हें भुगतान नहीं किया जा सकता. इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच शुरू हुई. लेकिन इस मामले में पुलिस की भूमिका पर पहले दिन से ही सवाल उठने शुरू हो गए थे. संचालक मंडल में शामिल रीता तिवारी जैसी कांग्रेस से जुड़ी महिलाओं को पुलिस गिरफ्तार करने से बचती रही. रीता तिवारी को जहां 2009 में हिरासत में लिया गया वहीं संचालक मंडल की एक और सदस्य सविता शुक्ला की गिरफ्तारी 2010  में हो पाई. उमेश सिन्हा की गिरफ्तारी इस मामले में दस दिन बाद हो गई थी. 2007 में इस मामले में एक और एफआईआर दर्ज हुई. यह एफआईआर बैंक के सीईओ चंदूलाल ठाकुर ने करवाई थी. इसी के बाद अदालत ने उमेश के नार्को टेस्ट के आदेश दिए थे.

इस मामले में पुलिस ने पहले 19 लोगों को संलिप्त मानकर उनके खिलाफ मामला बनाया था लेकिन बाद में पांच लोगों को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें अपने आप ही छोड़ दिया. इन पांच लोगों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल न करने की वजह से पुलिस जांच पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इन लोगों में सहकारिता विभाग के वे तीन ऑडिटर शामिल थे जिन पर बैंक के कामकाज के देखरेख की जिम्मेदारी थी. तहलका के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि इस मामले में पुलिस ने सहकारिता विभाग के ऑडिटरों आनंद मुखर्जी, कैलाश नाथ और पुष्पा शर्मा को हिरासत में लिया था. इनके अलावा एक सीए मनीष अग्रवाल और व्यवसायी प्रमोद कापसे को भी गिरफ्तार किया गया था पर इन्हें बिना अदालत में पेश किए पुलिस ने अपनी मर्जी से छोड़ दिया.

प्रमोद कापसे के पास से 1 करोड़ 86 लाख रुपये की एफडीआर जब्त की गई थी जो उसने उमेश सिन्हा से सांठ-गांठ करके जारी करवाई थीं. इसी तरह मनीष अग्रवाल के पास से 15 लाख रुपये की एफडीआर जब्त की गई थीं. इस मामले में सहअभियुक्त नीरज जैन के वकील राजेश भदौरिया कहते हैं, ‘ किसी भी मामले में पुलिस को यह अधिकार नहीं होता कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को खुद ही केस से बरी कर दे लेकिन यहां तो पुलिस खुद जज की तरह काम कर रही थी.’ जगदलपुर के व्यवसायी नीरज जैन पर फर्जी कंपनियां बनाकर बिना सिक्युरिटी के लगभग तीन करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट लेने का आरोप है.

पुलिस ने नीरज के खिलाफ मामला उन 13 कंपनियों के निदेशकों के बयान के आधार पर बनाया है जिसमें उन्होंने बैंक के पैसे का गबन नीरज के कहने पर करने की बात कही है. नीरज अपनी सफाई में कहते हैं कि एफडीआर निदेशकों के पास से ही बरामद हुई हैं और सभी वाउचरों में उन्हीं के दस्तखत हैं. लेकिन पुलिस ने उन्हें गवाह बना दिया. पुलिस पर अपनी मर्जी से कुछ और लोगों को भी गवाह बनाने के आरोप लग रहे हैं. राजेश भदौरिया बताते हैं, ‘  इस मामले में बैंक के कर्मचारियों को पुलिस ने आरोपित नहीं बल्कि गवाह बनाया है जबकि कैश रजिस्टर में उनके दस्तखत हैं. ‘ यह भी बड़ी विचित्र बात है कि पुलिस ने उमेश सिन्हा के ड्राइवर और उसके एक दोस्त को आरोपित बना दिया है. इस समय चुनावी माहौल में सीडी कांड का राजनीति पर क्या असर होगा इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन जहां तक इस मामले की जांच की बात है इस पर उठ रहे सवाल अब-भी अनुत्तरित ही हैं.

दुराग्रह के दुश्चक्र में?

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'” lightbox=”true”]

इन दिनों उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद स्थित एक सीबीआई अदालत में जो हो रहा है वह हो सकता है कि भारत के कानूनी इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक के रूप में याद किया जाए. यह एक ऐसी कहानी है जिससे हर एक को डर लगना चाहिए. एक ऐसी कहानी जिसमें भयानक अक्षमता और पूर्वाग्रह दिखता है. जिसमें जान-बूझकर न्याय की धज्जियां उड़ाई जाती नजर आती हैं. यह एक ऐसी कहानी है जिसका केंद्रीय पात्र इस देश में कोई भी हो सकता है.

15 जून, 2008 की रात तक राजेश और नूपुर तलवार एक आम मध्यवर्गीय दंपत्ति थे. वे दोनों ही दांतों के डॉक्टर थे और 13 साल की अपनी बेटी आरुषि के साथ नोएडा में रहते थे. दिल्ली पब्लिक स्कूल, नोएडा में नवीं क्लास में पढ़ने वाली आरुषि अपनी उम्र की बाकी लड़कियों की तरह ही थी. प्यारी और नटखट. रिश्तों में मजबूती से गुंथा यह परिवार हर तरह से खुशहाल था. 15 मई को डॉ राजेश तलवार ने अपनी बेटी के लिए एक कैमरा खरीदा था. 24 तारीख को उसका जन्मदिन आने वाला था. दोस्तों के साथ इसका जश्न मनाने के लिए एक आयोजन स्थल भी बुक कर लिया गया था. तोहफे के रूप में मिले कैमरे से खुश आरुषि ने इससे अपनी और मम्मी-पापा की ढेर सारी तस्वीरें खींचीं.

अगली सुबह, यानी 16 मई तक खुशहाली की यह तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी थी. आरुषि की खून से लथपथ लाश उसके बिस्तर पर मिली. उसके सिर पर भयानक वार किया गया था और उसका गला रेत दिया गया था. पहले-पहल शक तलवार के घरेलू नौकर हेमराज की तरफ गया जो घर से गायब था. लेकिन एक दिन बाद ही 17 मई को हेमराज की लाश छत पर मिली. उसके सिर पर भी वार हुआ था और गला रेत दिया गया था.

तब से लेकर आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस की कई बातें सबको जुबानी याद हो चुकी हैं. सभी को इसके बारे में मालूम है और सभी का इसके बारे में कोई-न-कोई मत है. स्थिति कुछ ऐसी है कि जो धारणाएं बन गई हैं उन पर तथ्यों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता.

हेमराज की लाश मिलने का इस मामले पर एक और असर पड़ा.  जल्द ही नोएडा पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इसमें एक कहानी पेश की. गौर करें कि तब तक पड़ताल खत्म नहीं हुई थी. यह कहानी विस्तार पाती गई. इतना कि आज इसे खारिज करना नामुमकिन लगता है. अखबारों और टीवी पर यह कहानी छा गई और ऐसा करने में पत्रकारीय मर्यादा और तथ्यों की पड़ताल जैसी चीजें किनारे कर दी गईं.

[box]नई सीबीआई टीम के आने के बाद जहां एक पक्ष के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में चली गई वहीं तलवार दंपति के खिलाफ इसने तेज रफ्तार अख्तियार कर ली हेमराज की लाश मिलने के बाद तलवार दंपति स्वाभाविक रूप से शक के घेरे में आ गया क्योंकि घर में जबरन घुसने का कोई संकेत नहीं था[/box]

अचानक ही राजेश और नूपुर तलवार इंसान नहीं रह गए. वे ऐसे माता-पिता नहीं रह गए जिन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा झेला था. तथ्यों की पड़ताल के बिना ही वे अपनी बेटी के कातिल हो गए. पिछले पांच साल में उनके बारे में मीडिया में हर तरह की खबरें आई हैं. अब उनकी हालत यह है कि उन पर कोई भी खबर चलाई जा सकती है. इसके लिए किसी तथ्य, तर्क और पड़ताल की जरूरत नहीं: वे अपनी ही बेटी के हत्यारे हैं. वे बीवियों की अदला-बदली वाले नेटवर्क का हिस्सा हैं. बेटी की मौत का गम उनके चेहरे पर नहीं दिखा. उन्होंने अपराध स्थल को साफ कर दिया था. आवेश में आकर उन्होंने अपनी बेटी को मारा. उनकी 13 साल की बेटी 45 साल के नौकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पाई गई थी. गर्दन पर चोट के निशान सर्जरी में काम आने वाले चाकू के हैं और बहुत नफासत से गला रेता गया है. राजेश तलवार ने अपनी बेटी और नौकर के सिर पर गोल्फ क्लब से वार किया. उस रात घर में और कोई नहीं था. घर में किसी के जबरन घुसने के प्रमाण नहीं मिले हैं. पुलिस आई तो राजेश तलवार छत का दरवाजा नहीं खोलना चाह रहे थे. उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गड़बड़ी करवाई है.

समाचार चैनलों पर चीखती हेडलाइनें, नाटकीय रूपांतरण और पुलिस व सीबीआई के हवाले से आई तरह-तरह की खबरों ने अपना काम कर दिया. राजेश और नूपुर तलवार अदालत में दोषी साबित होने से पहले ही लोगों की निगाह में दोषी हो गए.

इस मामले में परिजनों और मित्रों में से कई बताते हैं कि कैसे इस हादसे के बाद दुख के मारे राजेश अपना सिर दीवारों पर पटकते थे और नूपुर फोन पर बात करते हुए पागलों की तरह रोने लगती थीं. उन्हें जानने वाले यह भी बताते हैं कि उन अभागे दिनों में कैसे उनके चारों तरफ रहने वाले लोग ही उनसे जुड़े सारे फैसले कर रहे थे. लेकिन मीडिया की शिकायत थी कि उनका यह रोना और सिर पटकना कैमरों के आगे और बयान देते हुए क्यों नहीं हुआ. वे हमेशा इतने शांत कैसे दिखते हैं?

फिर भी यह सार्वजनिक मुकदमा अप्रासंगिक होता अगर न्यायिक प्रक्रिया पटरी पर चलती रहती. लेकिन इससे पहले कि आप यह जानें कि गाजियाबाद स्थित ट्रायल कोर्ट में क्या हो रहा है, और यह जानें कि तलवार दंपति के खिलाफ या समर्थन में क्या सबूत हैं, कुछ और बातें जानना जरूरी है.

हेमराज की लाश मिलने के बाद थोड़े समय के लिए शक की सुई हेमराज के दोस्तों की तरफ घूमी. कृष्णा, जो राजेश तलवार के क्लीनिक में हेल्पर था. राजकुमार, जो तलवार दंपति के मित्रों डॉ प्रफुल्ल और अनीता दुर्रानी के यहां नौकर था और एक पड़ोसी के घर में काम करने वाला विजय मंडल. इस दौरान तलवार दंपति और इन तीनों लोगों के पॉलीग्राफ, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट हुए. एक नहीं दो-दो बार.

और सच यह है कि राजेश और नूपुर तलवार, दोनों ही इन जांचों में साफ पाए गए. बाकी तीनों लोग, खासकर कृष्णा और राजकुमार, लाई डिटेक्टर टेस्ट में झूठ बोलते पाए गए. इससे भी अहम यह है कि नार्को टेस्ट से ये संकेत मिले कि अपराध में उनकी भागीदारी थी. इसमें उन्होंने माना कि वे उस रात घर में थे, उन्होंने अपराध कैसे हुआ, यह भी बताया. हत्या किस हथियार से की गई, इसके बारे में भी जानकारी दी और यह भी कि कैसे आरुषि और हेमराज के फोन ठिकाने लगाए गए. इस मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम के तत्कालीन मुखिया अरुण कुमार ने 11 जुलाई, 2008 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मीडिया के साथ इन परीक्षणों की जानकारी साझा की. हालांकि ये परीक्षण अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं, लेकिन उस ओर इशारा तो करते ही हैं जिधर जांच को जाना चाहिए. भारतीय साक्ष्य कानून की धारा 27 के मुताबिक अगर नार्को टेस्ट के आधार पर कोई खोज होती है तो वह कानूनन-सम्मत साक्ष्य है. जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, कृष्णा के नार्को टेस्ट से दो बड़ी अहम जानकारियां मिलीं. इनमें से एक तो विस्फोटक थी. लेकिन इनकी चर्चा बाद में.

इसके बावजूद आरुषि मर्डर केस की जांच किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सकी. सितंबर, 2009 में जांच अधिकारी अरुण कुमार को इस मामले से हटा दिया गया. अब जिम्मा सीबीआई की एक नई टीम ने संभाला. इसकी कमान एजीएल कौल के हाथ में थी. इस बदलाव के साथ ही मामले ने अचानक एक नया और दुर्भावनापूर्ण मोड़ ले लिया. निष्पक्ष जांच का तरीका यह होना चाहिए था कि शक के दायरे में आए दोनों पक्षों, तलवार दंपति और घरेलू नौकरों, के खिलाफ जांच जारी रखी जाती. नई टीम के आने के बाद जहां एक पक्ष के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में चली गई वहीं तलवार दंपत्ति के खिलाफ इसने तेज रफ्तार अख्तियार कर ली.

इसके बावजूद दिसंबर, 2010 में सीबीआई को मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी. इसमें उसका कहना था कि तलवार दंपति के खिलाफ सबूतों में कई अहम और पर्याप्त झोल हैं. उसका यह भी कहना था कि उसे आरुषि की हत्या का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं मिला और यह भी कि घटनाएं जिस क्रम में घटीं उसे वह पूरी तरह से नहीं समझ सकी है.

कोई साधारण आदमी भी सोच सकता है कि पर्याप्त सबूतों और उद्देश्य—जो हत्या के मामले के दो अहम पहलू होते हैं—का अभाव राजेश और नूपुर तलवार को अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप से मुक्ति देने के लिए पर्याप्त होता. इसके बावजूद नौकरों को क्लीन चिट देते हुए सीबीआई का कहना था कि उसे शक मुख्य तौर पर तलवार दंपति पर ही है. क्लोजर रिपोर्ट में हेमराज और आरुषि के अनैतिक संबंध की बात भी थी. राजेश और नूपुर तलवार इससे भौचक्के थे. यह उनकी बेटी की स्मृति के खिलाफ शब्दों से की गई हिंसा थी. उन्हें लग रहा था कि दोषी अब कभी पकड़े नहीं जाएंगे. वे इससे भी हैरान थे कि उन पर अपनी बेटी के संभावित हत्यारे जैसा लेबल चिपका दिया गया था. उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करते हुए इस मामले की जांच फिर से करने की मांग की.  जिसने अपराध किया हो, वह स्वाभाविक रूप से ऐसा नहीं करता. लेकिन हैरानी की बात है कि जिला मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने उनकी याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया कि सीबीआई द्वारा दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर ही सुनवाई शुरू की जाए. वही रिपोर्ट जो कहती थी कि तलवार दंपति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल पाए. अब तलवार दंपति संदिग्ध से मुख्य आरोपित बन गए. दूसरे संदिग्ध मामले के दायरे से ही बाहर हो गए. सीबीआई अदालत में क्या हो रहा है यह जानने से पहले जरा इस तथ्य पर गौर करें और फिर खुद फैसला करें कि क्या यह सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो रही है.

अब तक सीबीआई 39 गवाह पेश कर चुकी है. उनमें से कुछ तलवार दंपति के हिसाब से बेहद लचर और गलत थे, इसलिए वे चाहते थे कि अभियोजन पक्ष 14 अन्य गवाह भी पेश करे जिनसे वे भी सवाल-जवाब (क्रॉस इग्जामिन) कर सकें और घटना का सही सिलसिला स्थापित करने के अलावा सीबीआई की दूसरी टीम की दुर्भावना भी साबित कर सकें. इन 14 संभावित गवाहों में से अधिकतर गवाह सीबीआई की पहली टीम में शामिल अरुण कुमार जैसे अहम अधिकारी थे. नोएडा पुलिस के भी कुछ अधिकारी. अदालत ने इसकी इजाजत नहीं दी. तलवार दंपति इलाहाबाद उच्च न्यायालय गया. वहां भी उन्हें यह इजाजत नहीं मिली. इसके बाद वे सर्वोच्च न्यायालय गए. यहां भी नतीजा वही रहा.

इसके बाद तलवार दंपति ने अपने यानी बचाव पक्ष के 13 गवाहों को पेश करने की इजाजत मांगी. उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि इस मामले से जुड़े अहम दस्तावेजों तक उनकी भी पहुंच हो. इनमें उनके और घरेलू नौकरों के नार्को टेस्ट, कॉल रिकॉर्ड, पोस्टमॉर्टम रिपोर्टें आदि शामिल थे जिनकी वे भी पड़ताल कर सकें. इसके खिलाफ दलील देते हुए अभियोजन पक्ष के वकील आरके सैनी ने कहा कि उन्हें किसी भी गवाह को पेश करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए. सैनी का कहना था तलवार दंपति सिर्फ अदालत का वक्त बर्बाद करने की कोशिश कर रहे है.

इस तरह दो व्यक्तियों को – जिनका गुस्से में पागल होकर किसी तरह का अपराध करने का कोई इतिहास नहीं है -अपनी इकलौती संतान की गुस्से में बर्बर हत्या का आरोपि बना दिया गया. उनके खिलाफ कोई मजबूत साक्ष्य नहीं है. फिर भी अभियोजन पक्ष को 39 गवाह बुलाने की इजाजत मिलती है. तलवार दंपति को एक भी गवाह बुलाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.

क्या यह सुनवाई निष्पक्ष लगती है? ये वही आरके सैनी हैं जिन्होंने जुलाई, 2008 में यह दलील देते हुए राजेश तलवार को जमानत पर छोड़ने की गुजारिश की थी कि अपराध में उनकी भूमिका की पूरी तरह जांच कर ली गई है और उनके टेस्ट में कुछ भी असामान्य नहीं पाया गया है. यह भी कि अपराध स्थल पर जो भी संकेत मिले हैं वे उनकी तरफ इशारा नहीं करते और न्याय के हित में उन्हें हिरासत में रखना जरूरी नहीं है.

पिछले महीने इस स्टोरी के लिखे जाने के वक्त अदालत का एक फैसला आया था जिसमें तलवार दंपति को मामले से संबंधित और कागजात देने से मना किया गया था और 13 के बजाय केवल सात लोगों को गवाह बनाने की इजाजत दी गई थी. इनमें परिवार के सदस्य और मित्र थे, केस से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं. तलवार दंपति कितने भयानक पूर्वाग्रह का सामना कर रहा है यह जानना तब तक संभव नहीं जब तक आप इस मामले के विस्तार में न जाएं. प्राकृतिक न्याय का बुनियादी तकाजा होता है कि आरोपित को ठीक से अपना बचाव करने की इजाजत मिलनी चाहिए. लेकिन यहां वह तक नहीं हो रहा. और यह तो इस पूर्वाग्रह का एक छोटा-सा हिस्सा भर है.

इस सबके केंद्र में एक सवाल है जिसका जवाब देने में सबको मुश्किल हो रही है. आखिर क्यों सीबीआई तलवार दंपति को फंसाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है?  न तो उन्हें और न ही दूसरे पक्ष यानी घरेलू नौकरों को ‘बड़े लोग’ कहा जा सकता है. तो ऐसा क्यों है कि एक के पीछे वह हाथ धोकर पड़ी है जबकि दूसरे की तरफ देख तक नहीं रही. आखिर न्याय की तलाश में वह निष्पक्ष दिखने वाले रास्ते पर क्यों नहीं बढ़ रही?

इसके जवाब में बस कुछ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं. अभी तक जो कुछ भी हुआ है उससे दो चीजें साफ होती हैं. पहली तो यह कि पुलिस और सीबीआई दोनों की ही जांच शुरुआत से ही भयावह रूप से घटिया रही है. दूसरा यह कि ऐसा लगता है जैसे सीबीआई की दूसरी टीम के मुखिया एजीएल कौल तलवार दंपति के खिलाफ लगने वाले आरोपों पर बहुत गहराई और उत्साह से यकीन कर चुके हैं. यही मानकर यह बात समझी जा सकती है कि क्यों उनकी क्लोजर रिपोर्ट खामियों से भरी पड़ी है.

और मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने जब इसी रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई का आदेश दिया तो चीजें और भी जटिल हो गईं. इस सुनवाई में नियमित रूप से जाने वाले और मुंबई मिरर से जुड़े पत्रकार अविरुक सेन कहते हैं, ‘सीबीआई नहीं चाहती थी कि मामला सुनवाई तक जाए. लेकिन जब इसी रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई का आदेश हो गया तो उन पर उसी तरह के सबूत जुटाने का दबाव बढ़ गया. अब कोर्ट में हर सुनवाई के बाद उन्हें अपनी ही कहानी में और गहरे जाना पड़ रहा है.’

[box]कृष्णा के कमरे से बरामद इस कवर पर हेमराज का खून होने का एक ही मतलब था और वह यह कि कृष्णा उस रात हेमराज के कमरे में मौजूद था[/box]

जावेद अहमद सीबीआई में संयुक्त निदेशक हैं और कौल व उनकी टीम अहमद के तहत ही अपना काम कर रही है. जब हम उनसे पूछते हैं कि आखिर तलवार दंपति द्वारा अपने बचाव के लिए गवाह पेश करने का सीबीआई क्यों विरोध कर रही है तो वे कहते हैं, ‘ऐसा हम अपने अधिकारों के तहत ही कर रहे हैं. इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘यह आरोप गलत है कि हम उनके खिलाफ जान बूझकर निष्पक्षता से हट रहे हैं. वे जितने चाहें उतने गवाहों को बुलाने की इजाजत मांग सकते हैं. हम इस पर अपना एतराज जता सकते हैं. इसके बाद तो फैसला कोर्ट को करना है. हमारा फर्ज यह है कि सुनवाई तेजी से हो और कोई भी इसे लंबा खींचने की कोशिश न करे.’ इसके बाद अहमद हैरानी में डालने वाली एक बात कहते हैं, ‘अगर तलवार दंपति ने अपने बचाव में 2,432 गवाह पेश करने की इजाजत मांगी होती तो आप क्या कहतीं?’ हम उन्हें याद दिलाते हैं कि उन्होंने दो हजार नहीं 13 गवाह पेश करने की इजाजत मांगी थी. उनका जवाब आता है, ‘मैं तो बस उदाहरण दे रहा था.’

हम सीबीआई के संयुक्त निदेशक से पूछते हैं कि क्या यह अजीब नहीं कि सीबीआई अपनी आखिरी रिपोर्ट में यह कहे कि उसके पास किसी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, फिर सुझाव दे कि केस बंद कर दिया जाना चाहिए और फिर उसे उसी रिपोर्ट के आधार पर किसी के खिलाफ मुकदमा लड़ना पड़ेे.

अहमद कहते हैं, ‘आपकी बात बिल्कुल सही है. यह तो रिकॉर्ड में है कि हमारे पास पूरे सबूत नहीं थे. लेकिन जब एक बार जज ने सुनवाई का आदेश दे दिया तो इस फैसले का विरोध करने वाला मैं कौन होता हूं? इसके बाद तो हमारा कर्तव्य है कि हम अदालत की मदद करें और हमें जिस तरह से भी हो सके अपना काम करना होता है.’

दुर्भाग्य से, आगे हम देखेंगे कि ‘अदालत की इस मदद’ में सबूतों के साथ छेड़छाड़ और फर्जी सबूत गढ़ना भी शामिल है.

जज का विरोध करने वाला मैं कौन होता हूं, सुनकर भी निराशा होती है. आप खुद को देश की शीर्ष जांच एजेंसी बताते हैं और आप जानते हैं कि आपके पास सबूत नहीं हैं. न्याय के हित में क्या यह ठीक नहीं होता कि आप कम से कम जज से क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई के बजाय आगे और जांच की मांग करते?

अब राजेश और नूपुर तलवार की स्थिति देखिए. वे एक ऐसे मामले में अकेले आरोपित हैं जिसमें उनके खिलाफ कोई वास्तविक सबूत नहीं है. इसके बावजूद जब वे यह अपील करते हुए उच्च और सर्वोच्च न्यायालय गए कि इस मामले की गहराई से पड़ताल हो जो किसी बाहरी व्यक्ति की संभावित भूमिका का पता लगा सके और साथ ही टच डीएनए (जिसमें उनका खुद का दोष भी साबित हो सकता है) जैसी आधुनिक फॉरेंसिक जांचों का आदेश दिया जाए तो दोनों ही जगह उनकी याचिका ठुकरा दी गई. सर्वोच्च न्यायालय ने तो उनकी इस कोशिश को अपने बचने की आखिरी कोशिश करार दिया और नूपुर तलवार से कहा कि अगर वे ट्रायल कोर्ट के हर आदेश से असहमति जताते हुए शीर्ष अदालत आएंगी तो उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी.

कानून कहता है कि जब तक दोष साबित नहीं होता, तब तक व्यक्ति निर्दोष माना जाए. इस मामले में तो तलवार दंपति के लिए ऊंची अदालतों में जाने का संवैधानिक अधिकार तक खत्म कर दिया गया है. जावेद अहमद और आरके सैनी इस मामले से सीधे जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार करते हैं. अहमद कहते हैं, ‘आप मेरी स्थिति समझेंगी.’ आरुषि-हेमराज की हत्या के इस मामले की पड़ताल दो दिशाओं की तरफ जाती है. एक, यह माना जाए कि इसके तार हेमराज के दोस्तों और घरेलू नौकरों से जुड़ते हैं. दूसरा, यह माना जाए कि इसमें राजेश और नूपुर तलवार की भूमिका थी. अब एक-एक कर इस मामले की पड़ताल की दोनों दिशाओं और सीबीआई ने इनमें क्या किया और क्या नहीं, के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

हेमराज की लाश मिलने के बाद तलवार दंपति स्वाभाविक रूप से शक के घेरे में आ गया क्योंकि घर में जबरन घुसने का कोई संकेत नहीं था. तो धारणा यह बनी कि घर में चार लोग थे. दो की हत्या हो गई. बाहर से कोई आया नहीं तो जो दो लोग बचे उन्हें यह साबित करना होगा कि वे बेकसूर हैं.

लेकिन अगर उस रात घर में इन चार के अलावा भी कुछ लोग रहे हों जिन्हें घर में जबरन घुसने की जरूरत नहीं थी तो? सीबीआई अधिकारी अरुण कुमार की प्रेस कॉन्फ्रेंस के मुताबिक कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल ने नार्को टेस्ट में और सीबीआई के सामने पूछताछ में माना था कि उस रात हेमराज ने उन्हें बुलाया था और वे देर रात उसके कमरे में इकट्ठा हुए थे. कृष्णा (जिसकी हाल ही में तलवार दंपति से तकरार हुई थी) पहले आया और उसने शराब पी. उसके बाद राजकुमार और विजय मंडल आए और सबने शराब का सेवन किया. इसके बाद आरुषि की चर्चा हुई. ये लोग उसके कमरे में घुसे. आरुषि ने चिल्लाने की कोशिश की लेकिन उसका मुंह बंद कर दिया गया और उसके सिर पर किसी कठोर चीज से वार किया गया. इसके बाद उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश की गई जिसके चलते इन सबमें झगड़ा हुआ. झगड़े के बाद ये लोग छत पर गए और काफी संघर्ष के बाद हेमराज की हत्या कर दी गई. इसके बाद उन्होंने छत पर ताला लगाया, आरुषि के कमरे में वापस आए (शायद यह देखने के लिए कि वह जिंदा तो नहीं) और भाग गए.

नार्को टेस्ट और पुलिस को दिए गए बयान भले ही कानूनी रूप से सबूत न माने जाएं लेकिन इसका समर्थन करते दूसरे सबूत हैं जो तहकीकात की एक तार्किक दिशा बनाते हैं. जैसे हेमराज के कमरे में तीन बोतलें पाई गई थीं. एक स्प्राइट, दूसरी किंगफिशर बीयर और तीसरी सुला वाइन की. हेमराज खुद शराब नहीं पीता था. यह साफ तौर पर संकेत है कि उस रात उसके कमरे में दो या इससे ज्यादा लोग मौजूद थे. घर की चाबियां उसके पास रहती थीं और उसका खुद का कमरा घर में खुलता था. तो घर में बेरोक-टोक प्रवेश पूरी तरह से संभव था.

इन लोगों द्वारा बताया गया घटनाओं का क्रम आरुषि और हेमराज की शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्टों से भी मेल खाता था. रिपोर्टों के मुताबिक शायद आरुषि और हेमराज दोनों ही सिर पर हुए पहले वार से खत्म हो गए थे. उनका गला बाद में रेता गया. वैज्ञानिकों और दिल्ली स्थित एम्स के डॉक्टरों से बनी सात सदस्यीय समिति जिसने अपराध स्थल का विश्लेषण किया था, उसका भी यह निष्कर्ष था कि आरुषि को उसके बेड पर ही मारा गया जबकि हेमराज की हत्या छत पर की गई.

इसके अलावा कृष्णा की स्वीकारोक्ति और नार्को टेस्ट के बाद उसके कमरे से एक खुखरी बरामद की गई. उस पर खून के बारीक धब्बे जैसे कुछ निशान भी थे. 31 अगस्त, 2008 को पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने कहा कि निश्चित रूप से यह वह हथियार हो सकता है जिससे हमला करके घातक चोट पहुंचाई गई. उनके मुताबिक यह भी संभव था कि गर्दन पर मिले घाव भी खुखरी की धार से हुए हों और यह भी हो सकता है कि ऐसा किसी और ज्यादा धारदार हथियार से किया गया हो. एम्स की समिति ने भी इस बात का समर्थन किया. सीबीआई सूत्र बताते हैं कि राजकुमार ने एक दूसरी खुखरी का भी जिक्र किया था जो उसने नोएडा के एक मॉल के पास फेंक दी थी. हालांकि इस दिशा में कभी आगे नहीं बढ़ा गया.

नार्को टेस्ट के दौरान तीनों ने यह भी बताया कि उस समय हेमराज के कमरे में मौजूद टीवी सेट पर चल रहे नेपाली भाषा के चैनल पर कौन-से गाने चल रहे थे. सीबीआई ने यह चैनल चलाने वालीं पत्रकार और निर्माता नलिनी सिंह सहित अन्य स्रोतों से इसकी पुष्टि के लिए पूछताछ की और पाया कि चैनल पर उस समय वही गाने चल रहे थे.

हालांकि सबसे अहम सबूत तो वह तकिया था जो 14 जून, 2008 को कृष्णा के कमरे से बरामद किया गया. बैंगनी रंग के इस तकिये पर खून जैसे कुछ धब्बे थे. इस अहम सबूत के साथ जो हुआ वह न सिर्फ डरावना है बल्कि इस मामले की सुनवाई का एक और स्याह पहलू भी है. यह हमारी जांच और फॉरेंसिक संस्थाओं की कुव्यवस्था तो दिखाता ही है, साथ यह भी बताता है कि वे किसी को फंसाने या अपनी गर्दन बचाने के लिए किस हद तक जा सकती हैं.

[box]सामान्य स्थिति में इस रिपोर्ट से हंगामा मच जाना चाहिए था. यह इस केस के रहस्य पर से पर्दा उठाती दिखती थी[/box]

लेकिन पहले यह जानते हैं कि खुखरी के साथ क्या हुआ. 17 जून, 2008 को दिल्ली स्थित सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (सीएफएसएल) में सेरोलॉजिस्ट एसके सिंघला ने कहा कि वे खुखरी पर मानव रक्त की पहचान करने में असमर्थ रहे हैं. इसके बाद यह हथियार सीएफएसएल में डीएनए विशेषज्ञ बीके महापात्र के पास भेजा गया. महापात्र ने कहा कि वे इससे किसी भी डीएनए तक नहीं पहुंच सके. प्राथमिक रूप से इसी खुखरी को कत्ल का हथियार माना जा रहा था. इसके बावजूद सीबीआई ने इस सबूत को और भी पड़ताल के लिए हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग ऐंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) नहीं भेजा. सुनवाई के दौरान जब तलवार के वकील ने सिंघला से खुखरी पर मौजूद खून के निशानों पर सवाल किए तो सिंघला ने फिर कहा कि यह इंसान का खून नहीं था. जब उनसे और सवाल किए गए तो उन्होंने कहा कि यह मुर्गे, कुत्ते, गाय या भैंस का भी खून नहीं था. वे खून के धब्बों का कोई और संभावित स्रोत भी नहीं बता पाए और खुखरी की कहानी तब से वहीं पर अटकी पड़ी है.

अब यह जानते हैं कि बैंगनी रंग के उस तकिये के कवर का क्या हुआ. यह बेहद डरावना है. कृष्णा के कमरे से बरामद यह कवर सीडीएफडी, हैदराबाद भेजा गया. छह नवंबर, 2008 को वहां से जो रिपोर्ट आई उसमें एक विस्फोटक जानकारी थी. इस पर लगा खून हेमराज के खून से मेल खाता था.

सामान्य स्थिति में इस रिपोर्ट से हंगामा मच जाना चाहिए था. यह इस केस के रहस्य पर से पर्दा उठाती दिखती थी. तार्किक रूप से देखें तो कृष्णा के कमरे से बरामद इस कवर पर हेमराज का खून होने का एक ही मतलब था और वह यह था कि कृष्णा उस रात हेमराज के कमरे में मौजूद था. इसे खुखरी की बरामदगी, नार्को टेस्ट की स्वीकारोक्तियों,  हेमराज के कमरे में मिली शराब की बोतलों के साथ जोड़कर देखें तो निश्चित रूप से मामला कुछ आकार लेता सा लगता है.

लेकिन सावधानी को हैरतअंगेज रूप से ताक पर रखते हुए करीब ढाई साल तक सीबीआई की इस रिपोर्ट पर नजर नहीं गई. तब भी जब इस केस का जिम्मा अरुण कुमार वाली टीम के पास था. हैरानी की बात यह भी है कि जब सुनवाई के दौरान सितंबर, 2008 से लेकर मार्च, 2009 तक जांच अधिकारी रहे एमएस फर्त्याल से इस बारे में सवाल किया गया तो उनका कहना था, ‘मैंने यह रिपोर्ट नहीं देखी क्योंकि मैं जांच में व्यस्त था.’

इस जानकारी के साथ कि कृष्णा के तकिये का अब तक पता नहीं चला है, दिसंबर, 2010 में सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. इस तरह उसने कृष्णा और अन्य को दोषमुक्ति दे दी. उसकी यह चूक तो बुरी थी ही, लेकिन जब उसे इस अहम सबूत के बारे में पता भी चला तो भी उसकी जो प्रतिक्रिया थी उसे सुनकर कोई भी सिहर जाए.

लेकिन उससे पहले क्लोजर रिपोर्ट अपनी कहानी कहती है. एजीएल कौल के नेतृत्व में सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कई कारणों का जिक्र किया जिनके चलते कृष्णा आदि को इस मामले का संदिग्ध नहीं माना जा सकता. कृष्णा और अन्य को भी दोषी साबित न होने तक निर्दोष कहलाने का अधिकार है. लेकिन अक्सर गंभीर तर्कों के खिलाफ तलवार दंपति के पीछे पड़ जाने वाली सीबीआई क्लोजर रिपोर्ट में कृष्णा और अन्य की दोषमुक्ति कितनी आसानी से मनवाना चाहती है, यह देखना दिलचस्प हैः

सीबीआई की दलील नौकरों के नार्को टेस्ट अविश्वसनीय थे

जवाबी दलील– रिपोर्ट बता ही चुकी है कि क्यों उन्हें भी उतना ही विश्वसनीय माना जा सकता था.

सीबीआई की दलील कृष्णा और राजकुमार की नार्को रिपोर्ट में जिक्र किया गया था कि आरुषि का मोबाइल नेपाल भेजा गया था जबकि हेमराज का फोन तोड़ दिया गया था. लेकिन ये बातें सही नहीं पाई गईं क्योंकि आरुषि का मोबाइल नोएडा से बरामद हुआ जबकि हेमराज का फोन पंजाब में सक्रिय था.

जवाबी दलील यह हैरत की बात है कि दो इतने अहम सबूतों की सीबीआई ने पूरी तरह से जांच नहीं की है. क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान अभियोजन पक्ष के एक गवाह और टाटा टेल्कॉम से जुड़े एमएन विजयन का कहना था कि उन्हें याद नहीं कि सीबीआई द्वारा कभी हेमराज का नंबर निगरानी पर लगाया भी गया था. अगर यह सही है तो जांच अधिकारी एजीएल कौल को कैसे पता चला कि यह फोन पंजाब में इस्तेमाल किया जा रहा था? अगर यह सही है भी तो इस बात की जांच क्यों नहीं की गई कि उस फोन को वहां कौन इस्तेमाल कर रहा है?

यही बात आरुषि के फोन के बारे में कही जा सकती है. कुसुम नाम की एक घरेलू नौकरानी का दावा था कि यह फोन उसे फुटपाथ पर पड़ा मिला जिसे उसने अपने एक रिश्तेदार रामभूल को दे दिया. कौल के जांच का जिम्मा संभालने के बाद ही सीबीआई को यह फोन मिला. कौल का दावा है कि फोन के डाटा कार्ड की मेमोरी फॉर्मैट कर दी गई और वे इसका आरोप तलवार दंपति पर लगाते हैं. हालांकि उन्होंने रामभूल को कभी अदालत में पेश नहीं किया. कौल ने यह भी माना कि उन्होंने उस पुलिस अधिकारी से कोई बयान नहीं लिया था जिसने यह फोन उन्हें दिया था. वे यह भी नहीं बता पाए कि अपराध के बाद आरुषि का फोन पहली बार कब और कहां इस्तेमाल हुआ.

अपराध की अगली सुबह कृष्णा को गैराज के कमरे में उसके परिवार के साथ पाया गया, इसलिए वह संदिग्ध नहीं हो सकता. उसके परिवार का कहना है कि वह पूरी रात उनके साथ ही था. न तो उसके पास कोई फोन आया और न ही उस दिन किसी अन्य नौकर ने उससे संपर्क किया.

जवाबी दलील– केवल घर पर होने से ही यह तय नहीं हो जाता है कि वह संदिग्ध नहीं हो सकता. दिल्ली के कुख्यात गैंगरेप मामले में भी कई संदिग्धों को उनके घरों से गिरफ्तार किया गया. परिवार का यह दावा जिसमें कहा गया है कि कृष्णा सारी रात घर पर ही था, उसके बचाव की कोशिश भी हो सकता है. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि घटना के दिन उसकी फोन पर किसी से बात नहीं हुई. दरअसल तलवार दंपति ने अपनी हालिया याचिका में यह अनुरोध भी किया है कि उन्हें नौकरों के उस दिन के कॉल रिकॉर्ड मुहैया कराए जाएं.

सीबीआई की दलील नौकरों में इतना  ‘साहस’ नहीं हो सकता है कि वे उस समय घर में घुसें जबकि तलवार दंपति घर पर मौजूद हों.

जवाबी दलील अजीब बात है. एक तरफ सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा था कि हेमराज ने आरुषि की सहमति से उसके साथ तब यौन संबंध बनाए जबकि ठीक बगल के कमरे में उसके मां-बाप सो रहे थे. दूसरी तरफ वह कह रही है कि नौकरों में इतना साहस नहीं था कि तलवार दंपति की मौजूदगी में वे हेमराज के कमरे में भी एकत्रित हो पाते.

सीबीआई की दलील राजकुमार प्रफुल्ल दुर्रानी के साथ उनकी पत्नी अनीता को लेने रेलवे स्टेशन गया हुआ था. वे रात तकरीबन 10.30 बजे घर पहुंचे जिसके बाद राजकुमार ने अनीता के लिए खाना पकाया. अनीता ने रात तकरीबन 12 बजे खाना खाया. करीब साढ़े बारह बजे दुर्रानी दंपति सोने चला गया. दुर्रानी के घर से तलवार के घर तक साइकिल से जाने में करीब 20 मिनट लगते हैं. सीबीआई का कहना है कि ऐसे में राजकुमार का घटना के वक्त तक तलवार दंपति के घर पहुंच पाना असंभव है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक आरुषि की हत्या रात 12 से एक बजे के बीच हुई. डॉ दुर्रानी ने भी अपना घर भीतर से बंद कर दिया था, इसलिए राजकुमार के लिए बाहर निकल पाना आसान नहीं था.

जवाबी दलील इस दलील में उस शाम घटी हर घटना को घड़ी की सुइयों के सहारे आंका गया है. इस मामले में फोरेंसिक्स की हालत जितनी खस्ता रही है उसके आधार पर यह कल्पना करना गलत नहीं होगा कि आरुषि की हत्या रात एक बजे के कुछ देर बाद भी की गई हो सकती है या फिर दुर्रानी परिवार के आने-खाने और सोने को लेकर सीबीआई ने जिस समय का अनुमान जताया है उसमें कुछ हेरफेर संभव है. राजकुमार के पास घर की चाबी थी, इसलिए वह दुर्रानी दंपति के सोने के बाद घर से बाहर जा सकता था.

जब मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने जांच का आदेश दिया था तब नूपुर तलवार को अचानक राजेश तलवार के साथ सहअभियुक्त बना दिया गया. फरवरी, 2011 में नूपुर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी. अभी यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि तलवार दंपति को छह नवंबर, 2008 की रिपोर्ट केस की सामग्री के रूप में दी गई. इसमें कृष्णा के तकिये पर हेमराज के खून के निशान मिलने की सनसनीखेज जानकारी थी. इसे पढ़कर नूपुर ने अनुपूरक याचिका दायर करते हुए दलील दी कि यह नया प्रमाण स्पष्ट संकेत करता है कि अपराध में कोई अन्य व्यक्ति शरीक था, ऐसे में मामले की नए सिरे से जांच की जाए.

सीबीआई अगर निष्पक्ष थी तो उसे नए और मजबूत सबूतों का स्वागत करना चाहिए था. इसके बजाय 8 मार्च, 2011 को जांच अधिकारी एजीएल कौल ने उच्च न्यायालय में कहा कि कृष्णा के तकिये के बारे में जो तथ्य दिए गए हैं वे दरअसल हैदराबाद के सीडीएफडी विशेषज्ञ द्वारा की गई ‘टाइपिंग की त्रुटि’ थी. उनके मुताबिक हेमराज के तकिये और कृष्णा के तकिये का ब्योरा आपस में बदल गया था. 18 मार्च को उच्च न्यायालय ने नूपुर की याचिका खारिज कर दी.

कोई भी यदि छह नवंबर की रिपोर्ट पढे़ तो उसे पता चलेगा कि कृष्णा के तकिये के बारे में लिखे विवरण में ‘टाइपिंग की गलती’ की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है. तकिये का विवरण इस रिपोर्ट में लगातार कई पृष्ठों में आता है. हर बार इसका जिक्र सबूत संख्या की तरह किया गया है और उसके आगे कोष्ठक में दर्ज है कि यह बैंगनी कवर वाला तकिया है. इस बात पर कोई असहमति नहीं है कि बैंगनी तकिया कृष्णा का है. इसे कौल भी मानते हैं. इसके बाद भी सबसे विचित्र बात है कि कौल के मुताबिक विशेषज्ञ जब यह कह रहे थे कि हेमराज का खून कृष्णा के तकिये के कवर पर पाया गया है तब असल में वे हेमराज के तकिये का जिक्र कर रहे थे.

एक बार के लिए हम यह मान लेते हैं कि कौल की बात सही है. पर एक अनुत्तरित सवाल यह है कि कैसे सिर्फ रिपोर्ट पढ़कर और बिना सीडीएफडी अधिकारियों से बात किए कौल रिपोर्ट में ‘टाइपिंग की गलती’ वाले निष्कर्ष पर पहुंच गए? क्या इसलिए कि रिपोर्ट को सही मानने पर तलवार दंपति को हत्यारा मानने वाली उनकी धारणा गलत साबित हो जाती. सीडीएफडी विशेषज्ञ एसपीआर प्रसाद से जिरह के दौरान मिली जानकारी साफ तौर पर कौल के दुराग्रह को उजागर करती है. प्रसाद के मुताबिक सीडीएफडी को इस बाबत कौल का एक पत्र 17 मार्च को मिला था. यानी उस तारीख के ठीक दस दिन बाद जब वे उच्च न्यायालय में ‘टाइपिंग की गलती’ वाला तर्क दे चुके थे. पत्र की भाषा भी अपने आप में संदेह पैदा करती है. प्रसाद के मुताबिक कौल ने पत्र में लिखा था कि तकिये के विवरण में कुछ गलती प्रतीत होती है इसलिए सीडीएफडी अपने दस्तावेजों में जांच करे कि क्या ऐसी गलती है.

प्रसाद यह भी मानते हैं कि कौल का पत्र मिलने के ढाई साल पहले तक सीडीएफडी में किसी को पता नहीं था कि इस तरह की कोई गलती है. उन्होंने न्यायालय में एक और चौंकाने वाली बात मानी. जब प्रसाद ने सीबीआई को तकियों के कवर दिए थे तो उन पर सीडीएफडी की मोहर थी और वे सीलबंद थे. लेकिन जब वे वापस किए गए तब सील टूटी हुई थी. प्रसाद को नहीं पता कि सील कब व क्यों तोड़ी गई और यह काम किसका था. कौल के पत्र के जवाब में 28 मार्च, 2011 को सीडीएफडी ने सीबीआई को जवाबी पत्र लिखा था. इसमें कहा गया था कि विवरण में टाइपिंग संबंधी गलती की गई है.

पत्र मिलने के बाद कौल ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र के साथ तकियों के कवर के ऐसे फोटो जमा किए थे जिन पर इस तरह के लेबल लगे थे जिनसे सीबीआई का  पक्ष मजबूत होता था. यहां तलवार दंपति की अपील फिर खारिज हो गई. इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि कौल ट्रायल कोर्ट में लगातार इन तस्वीरों को जमा करने और इन पर जिरह से बचते रहे. यहां तक कि जब बचाव पक्ष के वकील ने उनके सर्वोच्च न्यायालय में तस्वीरों के बारे में जमा किए गए शपथ पत्र की प्रमाणित कॉपी पेश की तो उन्होंने उसे पहचानने तक से इनकार कर दिया. ‘यह मेरा नहीं है’, कौल ने अपने शपथ पत्र से मुकरते हुए कहा, ‘मैं इस विषय पर कुछ नहीं कह सकता.’ इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ट्रायल जज ने भी इस एफिडेविट का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया.

इस दौरान ट्रायल कोर्ट में कौल ने कई बेतुके तर्क दिए. टाइपिंग की गलती के बारे में उनका कहना था कि 2009 में जैसे ही उन्हें इस मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया था, टाइपिंग की गलती वाली बात उनकी पकड़ में आ गई थी. मगर ढाई साल के दौरान उन्होंने इसका जिक्र न तो केस डायरी में किया न ही सीडीएफडी से इस बारे में जानकारी लेने की कोशिश की. उन्होंने अपने साथियों से भी इस बात की चर्चा करना जरूरी नहीं समझा और न ही क्लोजर रिपोर्ट में इसका जिक्र किया. इसकी वजह पूछने पर वे कहते हैं कि उन्होंने सोचा कि जब जरूरत होगी या कभी मामला ट्रायल के लिए आएगा तब वे विशेषज्ञों को इस बारे में बताएंगे.

रिपोर्ट के अगले भाग में: आरुषि मामले में जहां नौकरों की भूमिका की जांच में सीबीआई ने बेहद लापरवाही बरती वहीं तलवार दंपति की भूमिका की जांच और सुनवाई के दौरान वह संतुलन की हर सीमा लांघती नजर आई

परंपरा का पुन: प्रयोग

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'”]

किस्सा 17वीं शताब्दी का है. बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल के बेटे जगतराज को एक गड़े हुए खजाने की खबर मिली. जगतराज ने यह खजाना खुदवा कर निकाल लिया. छत्रसाल इस पर बहुत नाराज हुए और उन्होंने इस खजाने को जन हित में खर्च करने के आदेश दिए. जगतराज को आदेश मिला कि इस खजाने से पुराने तालाबों की मरम्मत की जाए और नए तालाब बनवाए जाएं. उस दौर में बनाए गए कई विशालकाय तालाब आज भी बुंदेलखंड में मौजूद हैं. सदियों तक ये तालाब किसानों के साथी रहे. कहा जाता है कि बुंदेलखंड में जातीय पंचायतें भी अपने किसी सदस्य को गलती करने पर दंड के रूप में तालाब बनाने को ही कहती थीं. सिंचाई से लेकर पानी की हर आवश्यकता को पूरा करने की जिम्मेदारी तालाबों की होती थी. तालाबों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सभी की होती थी.

समय और शासन बदला तो खेती और सिंचाई के तरीके भी बदल गए. पानी की पूर्ति बांधों और नहरों से होने लगी. बुंदेलखंड के अधिकतर तालाब या तो सूख गए या फिर उन्हें भर कर निर्माण कार्य किए जाने लगे. किसान भी इस नई व्यवस्था पर आश्रित होते गए. तालाब बीते जमाने की बात हो गया.

लेकिन जहां तालाब हर क्षेत्र की जरूरतें पूरी करते थे वहीं बांधों और नहरों का दायरा सीमित था. इसलिए कई किसान सिर्फ बारिश के पानी पर निर्भर हो गए. जिन किसानों तक नहरों से पानी पहुंच रहा था, वे भी ज्यादा समय तक खुशहाल नहीं रहे. बांधों और नहरों में गाद भरने के कारण सिंचाई का दायरा सिकुड़ता गया और खेती का रकबा भी धीरे-धीरे कम होता गया. बुंदेलखंड के लगभग सभी किसान अब पूरी तरह से सिर्फ बरसात के भरोसे रह गए. लेकिन वह भी धोखा देने लगी. 1999 के बाद से यहां होने वाली वार्षिक बरसात के औसत दिन 52 से घटकर 21 रह गए. जिस क्षेत्र के लगभग 86 प्रतिशत लोग सीधे तौर से खेती पर और खेती के लिए सिर्फ बरसात पर निर्भर हों, उस क्षेत्र के लिए यह स्थिति भयावह साबित हुई. नतीजा यह हुआ कि पिछले दस साल के दौरान तीन हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और लगभग 40 प्रतिशत किसान खेती और बुंदेलखंड छोड़ कर पलायन कर गए. गांव के गांव खाली पड़ने लगे. सैकड़ों एकड़ जमीन बंजर हो गई.

पानी की समस्या सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही. यहां सूखे का ऐसा प्रभाव हुआ कि पीने और घर की अन्य जरूरतों के लिए भी पानी मिलना बंद हो गया. बुंदेलखंड के लोग पानी की समस्या के विकल्प तलाश रहे थे. तभी 2008 में यहां के स्थानीय अखबार में एक खबर छपी. इस खबर के अनुसार महोबा जिले के एक गांव की महिला को पानी के लिए अपनी आबरू का सौदा करना पड़ रहा था. ‘आबरू के मोल पानी’  नाम से छपी इस खबर ने सभी को झकझोर दिया. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेंद्र भाई ने इस खबर के बाद अपने कुछ साथियों को जोड़ा और पानी की इस विकराल होती समस्या से निपटने की ठानी. 21 युवाओं ने मिलकर महोबा के सदियों पुराने तालाब को पुनर्जीवित करने का फैसला किया.

[box]फायदा सिर्फ खेती में नहीं हुआ. तालाब बनने से असिंचित जमीन सिंचित हो गई. उसके दाम बढ़ गए. पलायन पर रोक लग गई[/box]

लोगों से इस अभियान में शामिल होने की अपील की गई. ‘इत सूखत जल स्रोत सब, बूंद चली पाताल. पानी मोले आबरू उठो बुंदेली लाल’ का नारा दिया गया और लगभग चार हजार लोग फावड़ों और कुदालों के साथ खुद ही तालाब की सफाई के लिए कूद पड़े. इतने लोगों ने मिलकर सिर्फ दो घंटे में ही तालाब की अच्छी-खासी खुदाई कर डाली. यह देख कर सभी के हौसले और मजबूत हुए. पूरे 46 दिन तक काम चला जिसमें सैकड़ों लोग रोज शामिल हुए और आखिरकार लगभग हजार एकड़ का जयसागर तालाब फिर से जीवित हो उठा. इस पूरे अभियान में सिर्फ 30-35 हजार रु नकद खर्च हुए. यह खर्च स्थानीय नगर पालिका अध्यक्ष ने उठाया. इस पूरे काम का जब सरकारी आकलन किया गया तो पता चला कि लगभग 80 लाख रु का काम लोगों ने खुद ही कर दिया था.

इसके बाद बुंदेलखंड के लोग तालाबों की अहमियत समझने लगे थे. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता इस पर विचार कर रहे थे कि कैसे जन-जन को तालाबों से जोड़ा जाए. बड़े तालाब बनाने के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत थी और इसके लिए कोई सरकारी योजना भी नहीं थी.

फिर एक दिन उन्हें मध्य प्रदेश के देवास जिले में हुए एक सफल प्रयोग की जानकारी मिली. दरअसल मालवा क्षेत्र का देवास जिला भी एक समय में पानी की समस्या से त्रस्त था. 60 -70 के दशक से ही यहां नलकूपों और पानी खींचने की मोटरों के लिए लोन की व्यवस्था कर दी गई थी. इसके चलते देवास और आस-पास के सभी इलाकों में किसानों ने कई नलकूप खोद दिए. शुरुआती दौर में तो नलकूपों से मिले पानी के कारण खेती में बढ़ोतरी भी हुई लेकिन ज्यादा नलकूप लग जाने से कुछ ही सालों में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया. जहां पहले 60-70 फुट पर ही पानी मिल जाया करता था, वहीं अब पानी 400-500 फुट पर जा पहुंचा. इतने गहरे नलकूप खोदने पर पानी में खनिज आने लगे और खेती बर्बाद होने लगी. साथ ही इन नलकूपों का खर्च भी बहुत बढ़ गया और किसान लगातार कर्ज में डूबते चले गए. जलस्तर भी धीरे-धीरे इतना कम हो गया कि सात इंच के नलकूप में मुश्किल से एक इंच की धार का पानी निकलता था. इतने कम पानी से खेती संभव नहीं थी. लिहाजा कई किसान अपनी खेती छोड़ कर जमीन बेचने को मजबूर हो गए. 90 के दशक तक आते-आते स्थिति इतनी विकट हो गई कि देवास में पानी की पूर्ति के लिए ट्रेन लगानी पड़ी. पानी का स्थायी उपाय खोजने के बजाय यहां 25 अप्रैल, 1990 को पहली बार 50 टैंकर पानी लेकर इंदौर से ट्रेन आई. कई सालों तक देवास में इसी तरह से पानी पहुंचाया गया.

फिर 2006 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकांत उमराव देवास के कलेक्टर नियुक्त हुए. उन्होंने यहां आते ही पानी की समस्या का हल तलाशने की कोशिशें शुरू कीं. पानी और बरसात के पिछले दस साल के रिकॉर्ड जांचकर उन्होंने पाया कि यहां इतना पानी तो हर साल बरसता है कि उसे संरक्षित करने पर पानी की समस्या खत्म की जा सकती है. उन्होंने एक बैठक बुलवाई और देवास के सहायक संचालक (कृषि) मोहम्मद अब्बास को जिले के बड़े किसानों की सूची बनाने को कहा. वे बताते हैं, ‘शुरुआत में बड़े किसानों को ही जोड़ने के दो कारण थे. छोटे किसान अक्सर बड़े किसानों की ही राह पर चलते हैं. अगर बड़े किसान तालाब बना लेते तो छोटे किसान भी देखा-देखी वही करते. बड़े किसान इतने संपन्न भी थे कि एक ऐसी योजना पर पैसा लगाने का जोखिम उठा सकें जिसके परिणाम अभी किसी ने नहीं देखे थे. दूसरा कारण यह था कि भूमिगत पानी का सबसे ज्यादा दोहन बड़े किसानों ने ही किया था जिस कारण जलस्तर इतना नीचे जा पहुंचा था इसलिए इसकी भरपाई भी उन्हीं को करनी थी.’

बड़े किसानों की सूची तैयार की गई. अधिकारियों ने उनके साथ एक सभा आयोजित की. इनमें से कुछ किसान ऐसे भी मिल गए जो पहले ही तालाब बना चुके थे और इसके लाभ जानते थे. इन्ही में से एक थे हरनावदा गांव के किसान रघुनाथ सिंह तोमर. तोमर 2005 में ही तालाब बना चुके थे. उमराव ऐसे ही किसी किसान की तलाश में थे जिसे उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सके. किसान ही किसान को बेहतर तरीके से समझा सकते थे, इसलिए ऐसे ही कुछ अनुभवी किसानों को मास्टर ट्रेनर बनाया गया और अभियान की शुरुआत हुई. उमाकांत उमराव और मोहम्मद अब्बास जैसे अधिकारियों ने भी गांव-गांव जाकर लोगों को अपनी जमीन के दसवें हिस्से में तालाब बनाने के लाभ बताए. लेकिन किसानों के मन में अब भी यह संदेह था कि दसवें हिस्से में तालाब बनाने का मतलब है इतनी जमीन का कम हो जाना. किसानों के इस संदेह को दूर करने के लिए उमराव ने उनसे बस एक सवाल किया. यह सवाल था, ‘मान लो तुम्हारे पास कुल दस बीघा जमीन है.

तुम अपने बच्चों को ये दस बीघा असिंचित जमीन सौंपना पसंद करोगे या फिर नौ बीघा सिंचित जमीन?’ पानी के अर्थशास्त्र की यह बात किसानों को समझ में आ गई. उमराव ने खुद किसानों के खेत में तालाब खोदने के लिए फावड़ा चलाया. जहां आम तौर पर कलेक्टर से मिल पाना भी किसानों के लिए मुश्किल रहता हो, वहां एक कलेक्टर का किसान के खेत में फावड़ा चलाना उन्हें प्रेरित करने के लिए काफी था. कुछ ही महीनों में सैकड़ों तालाब बन कर तैयार हो गए. इन तालाबों को ‘रेवा सागर’ नाम दिया गया और तालाब बनाने वाले किसान को ‘भागीरथ कृषक’ कहा गया. 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस अभियान की सफलता को देखते हुए ‘बलराम तालाब योजना’ भी बना दी. इसके तहत किसानों को तालाब बनाने के लिए 80 हजार से एक लाख रु तक का अनुदान दिया जाता है. फिर तो देवास की किस्मत ही बदल गई .

आज देवास जिले में कुल दस हजार से भी ज्यादा तालाब बन चुके हैं. धतूरिया, टोंककला, गोरवा, हरनावदा और चिडावत जैसे कई गांव तो ऐसे हैं जहां 100 से भी ज्यादा तालाब हैं. लोगों ने कुछ साल पहले नलकूपों की अरथी निकलकर कभी नलकूप न खोदने का भी प्रण कर लिया है.

निपनिया गांव के पोप सिंह राजपूत को तालाब बनाने के लिए उमराव ने अपनी व्यक्तिगत गारंटी पर 14 लाख रु का लोन दिलवाया था. लोन मिलने के बाद पोप सिंह ने 10 बीघे का विशाल तालाब बनवाया. पोप सिंह बताते हैं, ‘पहले तो साल में बस एक ही फसल हो पाती थी. वो भी सोयाबीन जैसी जिसमें पानी कम लगता है. आज हम साल में दो फसल कर लेते हैं. तालाब का पानी नलकूपों की तुलना में ज्यादा उपजाऊ भी है, इसलिए फसल भी अच्छी होती है.’ बैंक से लिए गए लोन के बारे में वे बताते हैं, ‘लोन तो मैंने दो साल पहले ही चुका दिया है. उसके बाद तो मैं 10 बीघा जमीन और खरीद चुका हूं. जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है.’

[box]‘जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है[/box]

इस अभियान से शुरुआत से जुड़े रहे कृषि विभाग के मोहम्मद अब्बास बताते हैं कि तालाबों से किसानों को खेती के अलावा कई फायदे हुए. असिंचित जमीन अब सिंचित हो गई है और उसकी कीमत लगभग डेढ़ गुना तक बढ़ गई है. साथ ही यहां पलायन पर भी रोक लगी है.

टोंक कला में हमारी मुलाकात देवेंद्र सिंह खिंची से होती है.वे कुछ साल पहले इंदौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके लौटे हैं और अब पूरा समय खेती को देते हैं. वे बताते हैं, ‘अगर अच्छा पानी मिले तो किसानी से बढ़कर कोई अन्य व्यवसाय हो ही नहीं सकता.’ देवेंद्र हमें अपना खूबसूरत तालाब दिखाते हैं. इस तालाब की पाल पर चारों तरफ पेड़ लगे हैं और कुछ ही दूरी पर कई गायें बंधी हैं. वे अपनी जैविक खेती के बारे में बताते हैं, ‘बरसात में खेतों की उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बह जाती है. यह सारा पानी बहकर तालाब में आता है तो तालाब उस मिट्टी को रोक लेते हैं. साथ ही हम इन गायों का गोबर भी तालाब में डाल देते हैं. इस कारण तालाब का पानी अपने आप में बहुत उपजाऊ हो जाता है और गोबर मछलियों के लिए चारे का काम करता है. इसके बाद जब फरवरी-मार्च में हम तालाब का सारा पानी निकाल लेते हैं तो इसकी सफाई करते हैं. इसमें जो खेतों से बहकर आई मिट्टी और गोबर जमा हुआ होता है उसे हम वापस खेतों में डाल देते हैं. यह जमीन के लिए बेहतरीन खाद का काम करता है.’ अब्बास कहते हैं, ‘यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है कि आज किसान खुद आपको तालाबों के फायदे अपने अनुभव के साथ बता रहे हैं.’ देवेंद्र लगभग 75 बीघा जमीन पर खेती करते हैं. इसमें से काफी जमीन पर उन्होंने मिर्च की खेती की है जिसके बारे में वे बताते हैं कि इससे एक ही मौसम में लगभग डेढ़ लाख रु प्रति बीघे का मुनाफा हो जाता है. तालाबों में पाली गई मछलियों से भी देवेंद्र साल भर में लगभग दो लाख रु कमा रहे हैं.

अब हम चिड़ावद गांव की तरफ बढ़ते हैं. यहां हमारी मुलाकात विक्रम सिंह पटेल से होती है. उन्होंने अपने घर से लगभग चार सौ फुट दूर एक गोबर गैस प्लांट भी लगाया है. वे बताते हैं कि उनके परिवार को साल भर इसी प्लांट से गैस मिल जाता है और उन्हें बाजार से गैस नहीं खरीदना पड़ता. गोबर गैस अकसर सर्दियों में जम जाया करता है. लेकिन पटेल ने अपने प्लांट के ऊपर ही गोबर से खाद बनाने के लिए ‘चार-चकरी’ बनाई है. इस कारण नीचे प्लांट में इतनी गर्मी रहती है कि सर्दियों में भी गैस जमता नहीं.

देवास के हर गांव में आज सफलताओं की ऐसी कई छोटी-बड़ी कहानियां मौजूद हैं. पानी और चारा होने के कारण लोगों ने दोबारा गाय-भैंस पालना शुरू कर दिया है और अकेले धतूरिया गांव से ही एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जा रहा है. पर्यावरण पर भी इन तालाबों का सकारात्मक असर हुआ है. आज विदेशी पक्षियों और हिरनों के झुंड इन तालाबों के पास आसानी से देखे जा सकते हैं. किसानों ने भी पक्षियों की चिंता करते हुए अपने तालाबों के बीच में टापू बनाए हैं. इन टापुओं पर पक्षी अपने घोंसलें बनाते हैं और चारों तरफ से पानी से घिरे रहने के कारण अन्य जानवर इन घोंसलों को नुकसान भी नहीं पहुंचा पाते. यहां के विजयपुर गांव में तो एक किसान ने सेब के पेड़ तक उगाए हैं. सिर्फ ठंडी जगहों पर उगने वाले सेब के पेड़ को मालवा के इस क्षेत्र में हरा-भरा देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं.

जो देवास कभी इसलिए चर्चित था कि वहां रोज ट्रेन से पानी पहुंचाया जाता है आज वही देवास पानी से सराबोर है और देश भर से लोग यहां पानी सहेजने के तरीके सीखने आ रहे हैं. यह सफल मॉडल अब महोबा में भी तैयार हो रहा है. इसकी शुरुआत तब हुई जब पुष्पेन्द्र भाई, इंडियावॉटरपोर्टल के सिराज केसर और गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रभात झा अपने कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर महोबा के जिलाधिकारी के पास पहुंचे. युवा जिलाधिकारी अनुज झा खुद भी पानी की समस्या का हल तलाश रहे थे. देवास के प्रयोग से उत्साहित झा ने इस काम में हर संभव मदद करने का वादा किया. इसके बाद उन्होंने किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल महोबा से देवास भेजा. वहां से किसान बस इसी संकल्प के साथ लौटे कि कुछ ही सालों में महोबा को भी देवास बनाना है.

पुष्पेन्द्र भाई और उनके साथियों ने मिलकर जिलाधिकारी अनुज झा की सहायता से यहां एक कृषक गोष्ठी आयोजित की. देवास में तालाबों की नींव रखने वाले उमाकांत उमराव को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया और महोबा में भी तालाब बनाने का अभियान चल पड़ा. एक ही महीने के भीतर महोबा में लगभग 40 तालाब बन चुके हैं. बरबई गांव के किसान देवेंद्र शुक्ला ने लगभग एक लाख रु से आधे बीघे का तालाब बनवाया है. तालाब को खोद कर निकाली गई मिट्टी बेचकर उन्हें 30 हजार रुपये तो तालाब बनने के दौरान ही वापस भी मिल गए हैं. महोबा के जिलाधिकारी कहते हैं, ‘अभी तो हम बहुत शुरुआती दौर में हैं. लेकिन देवास की सफलता देखते हुए हम निश्चिन्त हैं कि यह महज एक प्रयोग नहीं बल्कि पानी का सबसे सटीक उपाय है.’ बुंदेलखंड का जो महोबा जिला कभी किसान आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा था आज वहां उम्मीद और उत्साह की एक लहर दौड़ पड़ी है.

बटला हाउस मुठभेड़ में शहजाद को उम्रकैद

batala_house_269302522क्या है अदालत का फैसला?

बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ मामले में दोषी ठहराए गए शहजाद अहमद को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है. दिल्ली के साकेत कोर्ट ने यह फैसला देते हुए उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है. कोर्ट ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर न मानते हुए शहजाद को मृत्युदंड देने से इनकार कर दिया. अदालत ने 25 जुलाई को इस मामले में शहजाद अहमद को इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या का दोषी माना था. इसके साथ ही उसे दो अन्य पुलिसकर्मियों की हत्या के प्रयास का दोषी भी करार दिया गया था.

क्या था बाटला हाउस एनकाउंटर का पूरा मामला ?

19 सितंबर, 2008 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल 13 सितंबर को दिल्ली में हुए धमाकों के सिलसिले में दक्षिणी दिल्ली के बटला हाउस इलाके में दबिश देने पहुंची थी. इन धमाकों में 26 लोगों की जान गई थी. पुलिस को खुफिया सूचना मिली थी कि इलाके की एल-18 बिल्डिंग में धमाके के आरोपित छिपे हुए हैं. दबिश के दौरान हुई मुठभेड़ में इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा शहीद हो गए थे. इस दौरान साजिद व आतिफ नाम के दो आतंकी भी मारे गए थे जबकि शहजाद और जुनैद नाम के दो आतंकी अफरातफरी का फायदा उठाकर फरार हो गए थे. बाद में शहजाद को पुलिस ने आजमगढ़ से गिरफ्तार किया, जबकि जुनैद अभी फरार चल रहा है.

मुठभेड़ पर  क्यों उठा विवाद ?

इस मुठभेड़ पर शुरू से ही सियासत होने लगी थी. पहले सपा नेता अमर सिंह और मुलायम सिंह ने मुठभेेड़ की सत्यता पर सवाल खड़े किए और न्यायिक जांच की मांग की. बाद में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी आजमगढ़ जाकर बटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी करार दिया. हालांकि उनकी सरकार इसे नकारती रही. खुद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि मुठभेड़ वास्तविक थी और कोई जांच नहीं होगी. 2009 में मानवाधिकार आयोग ने भी मुठभेड़ की सत्यता पर मुहर लगाई थी. इस घटना के बाद आजमगढ़, जहां से सारे आरोपित ताल्लुक रखते थे, में विरोध की लहर फैल गई. अल्पसंख्यकों के एक गुट ने वहां उलेमा काउंसिल नाम से एक राजनीतिक मंच का गठन किया, लेकिन चुनावों में यह प्रयोग असफल रहा.

– प्रदीप सती

जीवन की पाठशाला

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'” info=”true”]

दृश्य -1: कॉलेज के मेन गेट पर खड़ी एक लड़की. उम्र करीब 18-19 साल. कॉलेज की ड्रेस पहने यह लड़की हाथों में किताब लिए हुए है. बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है. वह गेट के झरोखे से आने वाले का परिचय और

कॉलेज आने का कारण पूछती है? जवाबों से संतुष्ट होने के बाद वह लोहे का विशाल गेट खोलती है. व्यक्ति कॉलेज में प्रवेश करता है. लड़की फिर गेट बंद करके पास में लगी हुई कुर्सी पर बैठ जाती है. उसकी आंखें फिर से किताब के पन्नों में डूब जाती हैं.

दृश्य -2: लड़कों के हॉस्टल के ठीक सामने स्थित तबेले में करीब 20 गाय-भैंसें हैं. शाम के छह बज रहे हैं. हॉस्टल से पांच लड़कों का समूह बाहर आता है. सबके हाथ में एक बाल्टी है. सब दूध देने वाली गायों और भैंसों को तबेले के दूसरे हिस्से में ले जाकर बांधते हैं. वहां बांधकर उनके सामने चारा डालते हैं. फिर अपनी-अपनी बाल्टियों में दूध दुहने की शुरुआत करते हैं.

दृश्य –3:  बीए तृतीय वर्ष की राजनीति विज्ञान की क्लास चल रही है. सिमरनजीत कौर तल्लीनता से सामने पढ़ा रही अपनी हमउम्र शिक्षक को सुन रही हैं. क्लास खत्म होने की घंटी बजती है. सिमरनजीत फटाफट कक्षा से बाहर निकलकर पास ही स्थित बीए द्वितीय वर्ष की क्लास में दाखिल होती हैं. वहां पहुंचते ही वे छात्रा से शिक्षिका बन जाती हैं. सामने बैठी लड़कियां उनके कहे अनुसार अपनी राजनीति विज्ञान की किताबें निकालती हैं. कौर उन्हें पढ़ाना शुरू कर देती हैं.

दृश्य -4: पिछले साल कक्षा 12 में पंजाब बोर्ड की मेरिट लिस्ट में आई बीए प्रथम वर्ष की छात्रा गगनदीप गिल आज कोई क्लास नहीं करेंगी. लेकिन हॉस्टल की अन्य लड़कियों की तरह ही वे अलसुबह उठ कर कॉलेज ड्रेस पहनकर तैयार हो चुकी हैं. गगन के साथ 11 और लड़कियां भी हैं. वे भी आज कोई क्लास नहीं लेंगी. आज उनकी खाना बनाने की ड्यूटी है. हॉस्टल में रहने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए ये 12 छात्राएं सुबह के नाश्ते से लेकर रात तक का खाना बनाएंगी.

ये सारे दृश्य उस बड़ी तस्वीर का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा भर हैं, जो पंजाब में गुरदासपुर जिले के तुगलवाला गांव स्थित बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज में जाने पर दिखती है. एक ऐसे समय में जब शिक्षा कारोबार बनकर साधारण आदमी की पहुंच से दूर निकल गई है, यह एक ऐसा अनोखा शिक्षण संस्थान है जो बताता है कि शिक्षा कारोबार नहीं बल्कि सरोकार है जिसका उद्देश्य एक नया मनुष्य रचना है.

बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज की कहानी 1975 से शुरू होती है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया था. संयोग देखिए कि जिस समय एक महिला प्रधानमंत्री ने देश में आपातकाल लगाया वह साल महिला वर्ष के रूप में मनाया जा रहा था. देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं पर केंद्रित कई कार्यक्रम हो रहे थे. एक ऐसा ही कार्यक्रम पंजाब के गुरदासपुर में भी हो रहा था. उस सभा में कई नेता मौजूद थे. उसी सभा के एक श्रोता स्वर्ण सिंह विर्क भी थे. वक्ताओं द्वारा महिलाओं के लिए ये करेंगे, वो करेंगे जैसे दावे किए जा रहे थे. अचानक विर्क की सहनशीलता जवाब दे गई. वे खड़े हुए और भरी सभा में नेताओं की तरफ इशारा करके कहा ‘ क्यों इतना झूठ बोल रहे हो. मुझे पता है तुम लोग कुछ नहीं करोगे. ’

उनका यह कहना था कि जवाब के रूप में उन पर तंज होने लगे जिनका लब्बोलुआब यह था कि अगर हम नहीं कर सकते तो तुम ही करके दिखाओ तो जानें. यही वह क्षण था जब विर्क ने एक ऐसा शिक्षण संस्थान बनाने की ठान ली जो आने वाले समय में पूरे देश के लिए एक आदर्श बनने वाला था.

लेकिन उस दौर में स्थितियां ऐसी थीं कि इलाके में कोई भी परिवार अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए आसानी से तैयार नहीं होता था. विर्क गांव-गांव घूमे. लड़कियों की शिक्षा क्यों परिवार और देश के भविष्य के लिए जरूरी है, यह बात उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को समझानी शुरू की. सैकड़ों गांवों की खाक छानने के बाद मात्र 34 लड़कियों के परिवारवाले अपनी बेटी को स्कूल भेजने के लिए राजी हुए. विर्क ने इन लड़कियों को लेकर 1976 में उस स्कूल की शुरुआत की जहां पढ़ने की कोई फीस नहीं थी. लेकिन कुछ समय बाद ही 20 लड़कियों के परिवारवालों ने अपनी बेटियों को स्कूल जाने से रोक दिया. अब स्कूल में केवल 14 लड़कियां बची रह गई थीं. विर्क अकेले शिक्षक थे. उस साल बोर्ड की परीक्षा में ये सभी लड़कियां प्रथम श्रेणी में पास हुईं. सिलसिला आगे बढ़ता गया. जिस स्कूल की शुरुआत 14 लड़कियों के एडमिशन से हुई थी, आज उसमें 3,500 विद्यार्थी पढ़ते हैं. इनमें 2,500 लड़कियां हैं. बिना किसी फीस के शुरू हुए इस स्कूल में आज फीस तो ली जाती है लेकिन उतनी ही जिससे कॉलेज का जरूरी खर्च निकल आए. पहली से लेकर एमए तक की यहां पढ़ाई होती है. अधिकतम ट्यूशन फीस 1,000 रुपये सालाना है तो हॉस्टल की सालाना फीस अधिकतम 7,500 रु  है.

कॉलेज के प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह विर्क कहते हैं, ‘ ‘हमने एक ऐसा सिस्टम अपने यहां विकसित कर रखा है जिसकी वजह से हमें पैसों की बेहद कम जरूरत पड़ती है. पढ़ाई से लेकर प्रशासन तक हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं.’

दरअसल 15 एकड़ में फैले इस कॉलेज का अनूठापन और उसकी शक्ति आत्मनिर्भरता में ही छिपी है. कॉलेज का सब काम कॉलेज की छात्राएं ही करती हैं. यहां शिक्षक लगभग न के बराबर हैं. जो छात्राएं हैं वे ही शिक्षिका भी हैं. व्यवस्था यह है कि जो सीनियर कक्षा के विद्यार्थी हैं वे अपने से निचली कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं. इस तरह बीए थर्ड ईयर की छात्रा बीए सेकंड ईयर वालों को पढ़ाती है. बीए सकेंड ईयर वाली बीए फर्स्ट ईयर वालों को. इस तरह यह व्यवस्था ऊपर से नीचे तक चलती जाती है. कॉलेज में ईच वन, टीच वन के नाम से एक और प्रयोग चलता है. इसके तहत हर छात्रा के ऊपर दूसरी छात्रा को पढ़ाने की जिम्मेदारी है. मान लीजिए एक लड़की अंग्रेजी में दूसरी लड़की से अच्छी है तो वह दूसरी लड़की की टीचर बन जाएगी और रोज एक घंटे उसे पढ़ाएगी.

कॉलेज के दूसरे काम भी विद्यार्थियों के ही जिम्मे हैं. हॉस्टल के सभी बच्चों के लिए तीनों समय का खाना छात्राएं ही बनाती हैं. इस काम के लिए 12 लड़कियों के कई ग्रुप हैं. हर लड़की किसी न किसी ग्रुप में शामिल है. हर ग्रुप का नंबर दो महीने के बाद आता है. कौन-सा ग्रुप किस दिन खाना बनाएगा, यह पहले से ही तय है. यही नहीं, खाना क्या बनेगा यह भी आम राय से ही तय होता है. विर्क कहते हैं, ‘छात्राएं मिलकर तय करती हैं. मेरी उसमें भी कोई भूमिका नहीं है.’

कॉलेज की अपनी खुद की खेती है. 15 एकड़ में फैले कॉलेज में 10 एकड़ में खेती होती है. अपनी जरूरत भर अनाज और सब्जियां कॉलेज अपने खेतों में ही उगा लेता है. खेती की भी लगभग पूरी जिम्मेदारी छात्राएं खुद संभालती हैं. सब्जी बोने से लेकर उन्हें खेत से लाने तक का पूरा काम उन्हीं के जिम्मे है.

अपनी ऊर्जा जरूरतों के मामले में भी संस्थान लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर है. कॉलेज का अपना सोलर पावर स्टेशन है, जिससे उसकी 90 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी हो जाती हैं. ईंधन के मामले में भी कॉलेज आत्मनिर्भर है. विर्क कहते हैं, ‘अपना गोबर गैस प्लांट है. इसी गैस पर पूरे कॉलेज का खाना और नाश्ता बनता है. गैस सिलेंडर और अन्य साधनों की हमें लगभग नाममात्र की जरूरत है.’ खाना बनाने के लिए सूखी हुई घास आदि का भी प्रयोग किया जाता है. विर्क कहते हैं, ‘छात्र-छात्राओं की सुबह घास काटने की भी 45 मिनट की क्लास लगती है. इस समय में जहां लड़के घास के साथ ही पशुओं के लिए चारा आदि काट लाते हैं वहीं लड़कियां भी कॉलेज कैंपस में घास काटती हैं. इसे सूखने के लिए डाल दिया जाता है और बाद में इसका प्रयोग जलावन के लिए किया जाता है.’ यही नहीं, कॉलेज के पास अपनी आटा चक्की, मसाला चक्की, तेल पिराई और गन्ने से रस निकालने की मशीन है. पूरे स्कूल में न कोई नौकर है, न चपरासी, न कपड़ा धोने वाला, न दरबान. विद्यार्थी अपना सारा काम खुद करते हैं. लड़कियां अपने हॉस्टल की वार्डन भी हैं और दरबान भी. यही नहीं, कॉलेज में जब भी कोई निर्माण कार्य चलता है तो लड़कियां बारी-बारी से मजदूरी का काम भी करती हैं.

कॉलेज में ही एक बड़ा-सा गोदाम भी है. यहां पंखे से लेकर चम्मच तक के कबाड़ रखे हुए हैं. हर साल कॉलेज साल भर के कबाड़ की बिक्री करके दो लाख रुपये करीब की आमदनी कर लेता है. विर्क कहते हैं, ‘हम इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि कुछ भी बेकार नहीं जाए. हर साल कबाड़ बेचकर ही लगभग दो लाख रुपये इकट्ठा कर लेते हैं. इन पैसों से हम हर साल 150 के करीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे पाते हैं.’

कॉलेज का पूरा प्रशासन भी छात्राओं के हाथ में ही है. किसी भी निर्णय के लिए कॉलेज की स्टूडेंट कमिटी यहां सर्वोच्च इकाई है. कमेटी में पांच सदस्य होते हैं जिनका चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से सभी छात्राओं के बीच से किया जाता है. ये पांच सदस्य अपने बीच से सचिव का चुनाव करते हैं. साल 2010-11 में कॉलेज की सचिव रही चनप्रीत कहती हैं, ‘सचिव का चुनाव होने के बाद हम 22 और समितियां बनाते हैं जिनमें एडमिशन कमिटी, गुरुद्वारा कमिटी, मेस कमिटी, लाइब्रेरी कमिटी, अनुशासन कमिटी आदि शामिल हैं.’ यानी कॉलेज में हर तरह के काम के लिए एक पांच सदस्यीय कमेटी है. यही संबंधित क्षेत्र से जुड़े सारे निर्णय करती है. कॉलेज की पूरी फीस इकट्ठा करने और उसका हिसाब रखने का पूरा काम भी छात्राओं की एक समिति ही करती है.

ऐसे में कॉलेज के प्रिंसिपल की क्या भूमिका है ?  विर्क कहते हैं, ‘मेरा कोई रोल नहीं है. पूरा कॉलेज छात्राएं खुद ही चलाती है. प्रिंसिपल भी वहीं है, प्यून भी वही. यह कॉलेज लड़कियों का, लड़कियों द्वारा, लड़कियों के लिए है. बच्चों पर भरोसा कीजिए, उन्हें प्रेरित कीजिए. वे सब कुछ कर सकते हैं.’

छात्राओं की यह कमेटी कितनी मजबूत है इसका अंदाजा इस बात से ही लगता है कि इसने एक बार प्रिंसिपल विर्क पर भी जुर्माना लगा दिया था. हुआ यूं था कि गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर कॉलेज आए थे. कॉलेज देखकर वे बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने विर्क से कहा कि वे कुछ सहयोग करना चाहते हैं. विर्क ने भी मांगों की एक लिस्ट कमिश्नर को सौंप दी. कुछ दिनों के बाद ही कॉलेज की स्टूडेंट कमेटी को इस बारे में पता चला. उसने विर्क के मदद मांगने की बात पर विरोध दर्ज कराया. विर्क कहते हैं, ‘स्टूडेंट कमेटी के सदस्य मेरे पास आए और उन्होंने मदद मांगने पर आपत्ति दर्ज की. मुझ पर उन्होंने न सिर्फ फाइन लगाया बल्कि भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी भी दी.’

पंजाब के शांति निकेतन नाम से चर्चित इस कॉलेज को सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था एसजीपीसी ने पहले सिख कॉलेज की संज्ञा दी है. कॉलेज में धर्म की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है. गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करने के लिए एक पूरा पीरियड है. लेकिन क्या इससे यह कॉलेज धार्मिक संस्थान के रूप में तब्दील नहीं हो गया है? विर्क कहते हैं, ‘हम बच्चों को धर्मग्रंथों में छिपी अच्छी बातों से रूबरू करवा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ सिख धर्म तक सीमित है. हम हर धर्म और उससे जुड़ी शिक्षा बच्चों तक पहुंचा रहे हैं. धर्म में जो अच्छा है उसे क्यों न स्वीकार किया जाए.’

कॉलेज पंजाब के गुरुनानक देव विश्वविद्यालय से जुड़ा है. अपनी तमाम विशेषताओं के साथ कॉलेज की यह भी खासियत है कि आज तक किसी ने यहां नकल नहीं की. यही कारण है कि गुरुनानक देव विश्वविद्यालय ने वार्षिक परीक्षाओं के लिए कॉलेज में ही परीक्षा केंद्र खोल दिया. परीक्षा के समय विश्वविद्यालय से कोई भी अधिकारी यहां नहीं आता. पूरी परीक्षा का संचालन कॉलेज की छात्राएं ही करती हैं. परीक्षा हॉल में कोई गार्ड नहीं रहता. प्रश्न पत्र बांटने से लेकर उत्तर पुस्तिका बांटने और उन्हें इकट्ठा करने का काम छात्राएं खुद करती हैं. विर्क कहते हैं,  ‘इस कॉलेज में आज तक किसी ने नकल नहीं की.’  परीक्षा हॉल की दीवार पर लिखा है, ‘जो कोई भी किसी को यहां नकल करते हुए पकड़ेगा, उसे 21 हजार रु का इनाम दिया जाएगा.’ आज तक यह इनाम किसी को नहीं मिला.

कॉलेज में कई ऐसी छात्राएं हैं जिनके परिवार के कई लोग पहले यहां पढ़ चुके हैं. ऐसी ही एक छात्रा है मनप्रीत कौर. मनप्रीत की बुआ ने यहां से पढ़ाई की उसके बाद तो परिवार की हर लड़की पढ़ने के लिए यहीं आती है. मनप्रीत अपने परिवार से पांचवीं ऐसी लड़की है. उसकी बहन भी यहां पढ़ाई कर रही है.

हरिंदर रियाड़ यहां से पढ़ी छात्राओं में से एक हैं. सन 76 से लेकर 94 तक वे यहां पढ़ाती भी रहीं. कुछ समय पहले तक वे अमृतसर के खालसा कॉलेज की प्रिंसिपल थीं. वे कहती हैं, ‘मैंने जो यहां सीखा उसे शब्दों में बयां कर पाना कठिन है. इस स्कूल ने अनगिनत छात्राओं को उस समय पढ़ाया जब उन्हें घर से बाहर निकलने की मनाही थी. स्कूल ने उन्हें अच्छा इंसान बनाया और अपने कदमों पर खड़ा होना भी सिखाया.’ गुरुनानक देव विश्वविद्यालय के शिक्षक जगरूप सिंह कहते हैं, ‘यह कॉलेज एक मॉडल है. नकल नहीं, अच्छी पढ़ाई, आत्मनिर्भरता जैसी चीजें इसे एक आदर्श बनाती हैं.’

कॉलेज सरकार से किसी तरह का आर्थिक सहयोग नहीं लेता. हम विर्क से इसकी वजह पूछते हैं. विर्क कहते हैं, ‘जिस दिन आप सरकार के सामने हाथ फैलाएंगे और जैसे ही उन्होंने आपको पैसा दिया, उसी दिन से वे कॉलेज में अपनी चलाने की शुरुआत कर देंगे. वह सब कुछ खत्म हो जाएगा जो सालों की कड़ी मेहनत से खड़ा हुआ है.’

युवाबल से युगपरिवर्तन

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'” ]

ताराबाई मारुति कभी दिहाड़ी मजदूर थीं. आज उनके पास 17 गायें हैं और वे ढाई सौ से तीन सौ लीटर दूध रोज बेचती हैं. वे बताती हैं, ‘पहले मजदूरी करते थे. पांच-दस रुपये रोज मिलते थे तो खाना मिलता था. आज आमदनी बढ़ गई है.’

हिवड़े बाजार नाम के जिस गांव में ताराबाई रहती हैं वहां के ज्यादातर लोगों का अतीत कभी उनके जैसा ही था. वर्तमान भी उनके जैसा ही है. आज राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में जिस युवा शक्ति को अवसर देने की बात हो रही है वह युवा शक्ति कैसे समाज की तस्वीर बदल सकती है, इसका उदाहरण है हिवड़े बाजार.

दो दशक पहले तक महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे इस गांव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी करने आस-पास के शहरों में चला जाता था. यानी उन साढ़े छह करोड़ लोगों में शामिल हो जाता था जो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 4000 शहरों और कस्बों में नारकीय हालात में जी रहे हैं. बहुत-से परिवार ऐसे भी थे जो पुणे या मुंबई जैसे शहरों में ही बस गए थे. जो गांव में बचे थे उनके लिए भी हालात विकट थे. जमीन पथरीली थी. बारिश काफी कम होती थी. सूखा सिर पर सवार रहता था. 90 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे. शराब का बोलबाला था. झगड़ा, मार-पिटाई आम बात थी. मोहन छत्तर बताते हैं, ‘कॉलेज में पढ़ते थे तो बताने में शर्म आती थी कि हम हिवड़े बाजार के हैं.’

लेकिन आज शर्म की जगह गर्व ने ले ली है. हिवड़े बाजार आज अपनी खुशहाली के लिए देश और दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है. पलायन तो रुक ही गया है, जो लोग हमेशा के लिए शहर चले गए थे वे भी वापस आकर गांव में बसने लगे हैं. आज गांव की प्रति व्यक्ति आय औसतन 30 हजार रु सालाना है. 1995 में यह महज 830 रु थी. गांव के उपसरपंच पोपट राव पवार कहते हैं, ‘तब ज्वार-बाजरा भी मुश्किल से होता था. आज हम हर साल एक करोड़ रुपये की नगदी फसल उगाते हैं. डेयरी का काम भी फैला है. गांव में रोज 4000 लीटर दूध का कलेक्शन हो रहा है.’

हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे. साफ और चौड़ी सड़कें भी. नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं. हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं. शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही. हर घर में पक्का शौचालय है. खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं. सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं. 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं.

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए 20 लोग नहीं चला सकते. वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए.’ हिवड़े बाजार ने यही कर दिखाया है. युवा शक्ति कैसे ग्राम स्वराज ला सकती है यह सिखाता है हिवड़े बाजार.

85 साल के रावसाहेब राऊजी पवार याद करते हैं, ‘हमारे गांव में गरीबी थी. हालांकि हम अपनी सीधी-सादी जिंदगी से खुश थे. लेकिन 1972 के अकाल ने हमारे गांव की शांति छीन ली. जमीन पथरीली थी. पानी न होने से हालात और खराब हो गए. वह सामाजिक ताना-बाना बिखर गया जो गरीबी के बावजूद लोगों को एक रखता था. लोग शराब के चक्कर में पड़ गए. जरा-सी बात पर झगड़ा हो जाता. जिंदगी चलाना मुश्किल हो गया सो गांव के कई लोग मजदूरी करने पास के शहरों में जाने लगे.’

फिर एक दिन गांव के कुछ नौजवानों ने सोचा कि क्यों न हालात बदलने की एक कोशिश की जाए. किसी ऐसे युवा को सरपंच बनाकर देखा जाए जो एक जोश और नई सोच लेकर आए. पोपटराव पवार तब हिवड़े बाजार के अकेले युवा थे जो पोस्टग्रैजुएट थे. नौजवानों ने उनसे आग्रह किया कि वे सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ें. यह 1989 की बात है. लेकिन पवार का परिवार यह मानने को तैयार नहीं था. उनके घरवाले चाहते थे कि वे शहर जाएं और कोई अच्छी नौकरी करें. पवार क्रिकेट के खिलाड़ी थे और वे इस खेल में करियर बनाना चाहते थे. लेकिन नौजवानों के बहुत आग्रह पर वे चुनाव लड़ने के लिए राजी हो गए. पहले तो बुजुर्गों का रवैया कुछ ऐसा रहा कि कल के लड़के हैं, ये क्या करेंगे. लेकिन फिर सहमति बनी कि चलो एक साल इन्हें भी देख लेते हैं. सरपंच पद पर पवार का चयन निर्विरोध हुआ. फिर शुरू हुआ बदलाव. पवार ने गांववालों से कहा कि अपना विकास उन्हें खुद करना होगा. गांव में शराब की 22 भट्टियां थीं. फसाद की यह जड़ खत्म की गई. पवार की कोशिशों से ग्राम सभा का बैंक ऑफ महाराष्ट्र के साथ तालमेल हुआ जिसने गरीब परिवारों को कर्ज देना शुरू किया. इनमें वे परिवार भी शामिल थे जो पहले शराब बना रहे थे. 71 साल के लक्ष्मण पवार कहते हैं, ‘पानी की कमी ने खेत बंजर कर दिए थे. हताश होकर लोगों ने शराब पीना, जुआ खेलना, लड़ना-झगड़ना शुरू कर दिया. शराब ने हमें बर्बाद कर दिया था, इसलिए जब भट्टियां बंद हुईं तो हमें लगा कि कुछ उम्मीद है.’

फिर पानी सहेजने और बरतने की व्यवस्था बनाने का काम शुरू हुआ. पवार का मंत्र था कि यह सबका काम है इसलिए सबको इसमें जुटना होगा. जल्द ही गांव में चेक डैमों और तालाबों का जाल बिछ गया. पवार कहते हैं, ‘हमने सरकारी योजनाओं के पैसे का सही इस्तेमाल किया. लोगों ने खुद मेहनत की तो इसके दो फायदे हुए–मजदूरी बची और काम की क्वालिटी भी बढ़िया हुई. और हम भी तो यह सब अपने और अपने बच्चों के लिए ही कर रहे थे.’  मकसद यह था कि बरसने वाले पानी की एक-एक बूंद सहेजी जाए. हिवड़े बाजार जिस भौगोलिक क्षेत्र में है उसे वृष्टि छाया क्षेत्र यानी रेन शैडो जोन कहा जाता है. यहां साल भर में 15 इंच से ज्यादा बरसात नहीं होती. तालाब बने तो बारिश का पानी ठहरा. धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी. 1995 से पहले गांव में 90 खुले कुएं थे और पानी का स्तर 80-125 फुट नीचे था. आज गांव में 294 खुले कुएं हैं और पानी का स्तर 15-40 फुट तक आ गया है. इसी अहमदनगर जिले में दूसरे गांवों को पानी के लिए 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ती है. गांव के ही हबीब सैयद बताते हैं, ‘2010 में 190 मिमी ही बारिश हुई लेकिन पानी की व्यवस्था होने से हमें कोई दिक्कत नहीं हुई.’

पानी आया तो खुशहाली आने में ज्यादा देर नहीं लगी. पहले मानसून के बाद ही गांव में सिंचित क्षेत्र 20 हेक्टेयर से 70 हेक्टेयर हो गया. जहां ज्वार-बाजरा उगना भी मुश्किल था वहां कई फसलें होने लगीं. किसानी बढ़ी तो काम भी बढ़ा. मजदूरी महंगी थी तो पवार ने एक तरीका निकाला. उन्होंने सामूहिकता पर जोर देना शुरू किया. एक किसान की बुआई में पूरे गांव के लोग शामिल हो जाते. फिर मजदूरों की क्या जरूरत. मजदूरी तो बची ही, आपसदारी की भावना भी मजबूत हुई. पवार कहते हैं, ‘बदलाव पैसे से नहीं आया. यह आया क्योंकि लोग जाति और राजनीति की तमाम दीवारें तोड़कर एक साझा मकसद के लिए साथ आए.’

खेती के बाद पवार ने आजीविका के लिए एक और स्रोत पर ध्यान दिया. उन्होंने पशुओं की जंगल में मुक्त चराई बंद करवाई. क्योंकि इसका पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा था. उन्होंने किसानों को प्रोत्साहित किया कि वे चारे का उत्पादन बढ़ाएं. चारे का उत्पादन बढ़ा तो तो पशुओं की संख्या भी बढ़ी और धीरे-धीरे दुग्ध उत्पादन भी. 1990 में गांव में दुग्ध उत्पादन का आंकड़ा डेढ़ सौ लीटर प्रतिदिन था. आज यह चार हजार लीटर रोज पर पहुंच गया है. 1995 में गांव के 182 परिवारों में से 168 लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे. आज सरकारी रिकॉर्ड यह संख्या तीन बताते हैं. पवार कहते हैं, ‘गांव को बीपीएल फ्री बनाने के लिए हमें बस एक साल और चाहिए.’

तो आश्चर्य क्या कि देश के दूसरे गांवों में जहां लोग पलायन करके शहर जा रहे हैं वहीं हिवड़े बाजार में उल्टी बल्कि कहा जाए तो सीधी गंगा बहने लगी है. 1997 से लेकर आज तक 93 परिवार अलग-अलग शहरों से गांव वापस लौट चुके हैं. इस उल्टे पलायन ने उन्हें सुखी बनाया है. चर्चित पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं, ‘पलायन इसलिए हो कि अपने यहां कुछ नहीं बचा और इसलिए पेट पालने के लिए दिल्ली, मुंबई या जयपुर चले जाते हैं तो यह उस व्यक्ति और मिट्टी दोनों का अपमान है. हिवड़े बाजार ने इस अपमान का कलंक अपने माथे से हटा दिया है.’ यह खुशहाली आगे भी चलती रहे इसके लिए भी बीज बोए गए हैं. यहां प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए जल प्रबंधन का अनिवार्य कोर्स रखा गया है. पानी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न हो इसके लिए जल बजट बनाया जाता है. कितना पानी उपलब्ध है इसके लिए हर महीने रीडिंग ली जाती है. वॉटरशेड कमेटी के साथ काम करने वाले शिवाजी थांगे कहते हैं, ‘वॉटर ऑडिट के जरिए फैसला किया जाता है कि किस मौसम में कौन-सी फसल बोनी है.’

अच्छी चीजें कई मोर्चों पर आई हैं. ग्राम पंचायत ने अब फैसला किया है कि परिवार की दूसरी लड़की की शिक्षा और शादी का खर्च पूरा गांव उठाएगा. सात सदस्यों वाली पंचायत में तीन महिलाएं हैं. सुनीता शंकर इस साल सरपंच बनी हैं और पवार ने उपसरपंच की जिम्मेदारी संभाली है. गांव में दहेज नहीं लिया जाता. किसी भी तरह का नशा बंद है. गांव का स्कूल एक वक्त सिर्फ नाम के लिए रह गया था. आज यह अच्छे से चल रहा है. यहां बच्चों की एक संसद है जो इस पर निगाह रखती है कि शिक्षक नियमित रूप से आ रहे हैं या नहीं और यह भी कि छात्रों की क्या शिकायतें हैं. ग्राम संसद भी है जहां सब लोग मिलबैठकर चर्चा करते हैं. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने का सिलसिला भी मजबूत हुआ है. गांव के 32 विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. गांव में सिर्फ एक मुस्लिम परिवार है. उसके लिए कोई मस्जिद नहीं थी तो गांववालों ने खुद एक मस्जिद बना दी. परिवार के मुखिया बनाभाई सैयद अपने परिवार के साथ हिंदू त्योहारों में भी शामिल होते हैं और भजन गाते हैं.

भविष्य की सोचने में भी हिवड़े बाजार आगे रहा है. 2008 में ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पारित किया. इसके मुताबिक गांव के भीतर कार की जगह साइकिल के इस्तेमाल को कहा गया ताकि ईंधन की बचत हो सके. 17 किलोमीटर दूर अहमदनगर जाना हो तो गांव के लोग कारपूल कर लेते हैं.  पवार अब सौर ऊर्जा के इस्तेमाल की सोच रहे हैं. वे यह भी चाहते हैं कि गांव में पूरी तरह से जैविक खाद का इस्तेमाल हो. वे कहते हैं, ‘हालांकि अभी भी सिर्फ 20 फीसदी ही रासायनिक खाद का इस्तेमाल होता है. इसके बाद हम जैविक उत्पादों का अपना मार्केट बनाएंगे.’ युवा शक्ति से छह लाख गांवों या कहें तो देश की तस्वीर कैसे बदल सकती है, हिवड़े बाजार इसका सबक है.

-तहलका ब्यूरो 

लड़की है एक नाम रजिया है

दिल्ली से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित मेरठ जिले का नांगला कुंभा गांव कुछ समय पहले तक आसपास के गांवों के लिए भी अंजान सा ही था. लेकिन इन दिनों देश, दुनिया में इस गांव की बड़ी चर्चा है. इस चर्चा का कारण बनी हैं गरीब परिवारों के बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराकर उन्हें स्कूलों में दाखिला दिलवाने वाली रजिया सुल्ताना. 16 साल की रजिया को उनके इस काम के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने हाल ही में ‘प्रथम मलाला पुरस्कार’ ( यूएन स्पेशल एनवाय फार ग्लोबल एजुकेशंस यूथ करेज अवार्ड फार एजुकेशन) के लिए चुना है. ग्रामीण परिवेश की विषम परिस्थितियों में रह कर इतनी कम उम्र में रजिया ने जो कारनामा किया है वह किसी कमाल से कम नहीं. रजिया की कहानी उन्हीं की जुबानी जानने के लिए यह संवाददाता उनके गांव पहुंचा और जो कुछ लेकर लौटा, उसका सार यही है कि अगर लक्ष्य को लेकर थोड़ी भी समझ और खुद पर ईमानदारी भरा यकीन हो तो तमाम दुश्वारियों के बावजूद उसे हासिल किया जा सकता है.

आज से सात साल पहले की बात है, मेरठ जिले के कई गांवों में कम आमदनी वाले परिवार दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल की गेंदें सिलने का काम करते थे. एक गेंद के एवज में सात से दस रुपये पाने वाले इन लोगों ने अपने बच्चों को भी इस काम में लगा रखा था ताकि आमदनी में कुछ और इजाफा हो सके. पढाई लिखाई से दूर रहते हुए बच्चे लगातार इस काम में अपने परिजनों का हाथ बंटाते और स्कूल, कालेज जैसी बातें उनके हिस्से से गायब होती जाती. इसी दौर में बच्चों के लिए काम करने वाले स्वयं सेवी संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के कुछ लोग इन गांवों में आए और लोगों को शिक्षा का महत्व समझाने लगे. इस संगठन ने अलग-अलग गांवों में बाल पंचायतों का गठन किया जिसके तहत रजिया, नांगला कुंभा गांव की बाल पंचायत की अध्यक्ष चुनी गईं. इसके बाद से वे गांव-गांव घूमकर उन लोगों को बच्चों को पढ़ाने की बातें समझाने लगीं जो गरीबी के चलते उनसे बाल मजदूरी करा रहे थे. देखते ही देखते गांव के दूससे बच्चे भी रजिया के साथ जुड़ गए और फिर इनकी टोली ने इस जागरूकता अभियान को अपने जुनून में तब्दील कर दिया. इसी का परिणाम है कि अब तक रजिया और उनके साथी इलाके के करीब 50 बच्चों का दाखिला विभिन्न स्कूलों में करवा चुके हैं.

रजिया से बात करते हुए सफलता और संतुष्टि का समवेत भाव उनके चेहरे पर साफ दिखाई देता है. वे बताती हैं, ‘गरीबी के चलते मजबूरी में अपने बच्चों को काम पर भेजने वाले लोगों को समझाना बहुत कठिन था. एक तो वे खुद शिक्षा न होने के चलते इसके महत्व से उतने वाकिफ नहीं थे और दूसरा उन्हें लगता था कि बच्चे अगर काम नहीं करेंगे तो आमदनी कम होने से घर चलाने में हो रही मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.’ रजिया हमें बताती हैं कि धीरे-धीरे वे यह समझ गई थीं कि लोगों को जागरुक करने के लिए समस्या के साथ ही उन्हें इससे होने वाले नुकसान के बारे में समझाने की भी जरूरत है. उन्होंने लोगों को समझाया कि बाल श्रम करने वाले बच्चों को न पूरा पैसा मिलता है और न ही बड़े होने पर ये कुछ और करने के लायक रह जाते हैं. इसलिए उन्हें पढ़ाने में ही सबका भला छुपा हुआ है. धीरे-धीरे लोग उनकी बातों को समझने लगे और अपने बच्चों का दाखिला कराने को तैयार हो गए.

रजिया से बात करते वक्त कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि वे दूसरे बच्चों से बहुत अलग हैं. उनके हावभाव और पहनावे से लेकर उनमें तमाम बातें अन्य बच्चों जैसी ही हैं. लेकिन उनमें मौजूद गजब की विलक्षणता उस वक्त साफ-साफ महसूस की जा सकती है जब वे कहती हैं, ‘जिस फुटबाल को बनाने के एवज में एक बच्चा मुश्किल से पांच-सात रुपये कमाते हुए अपना पूरा भविष्य अंधेरे में धकेल रहा होता है, उसी फुटबाल पर एक किक मारने के बदले एक खिलाड़ी करोड़ों रुपये कमा कर अपनी आगे की कई पीढि़यों तक का भविष्य सुरक्षित कर देता है.’ बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली रजिया की ये बातें शिक्षा अभियानों की सफलता और असफलता की पड़ताल करने वाले उन शोधार्थियों के निष्कर्षों  को भी छोटा कर देने वाली प्रतीत होती हैं, जो अपने अध्ययन के जरिये दुनिया भर का दर्शन सामने लाकर रख देते हैं मगर बुनियादी बातों को समझ नहीं पाते.

पिछले छह-सात सालों से रजिया बाल मजदूरी के खिलाफ होने वाले जागरूकता अभियानों में लगातार भाग ले रही हैं. उनके घर की दीवारों पर मुस्कराती तस्वीरें, और मेज पर सजी ट्राफियां इसकी तस्दीक करती हैं. वे नेपाल में शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से निकाली गई रैली में भाग लेते हुए महेंद्रगढ़ से काठमांडू तक की यात्रा भी कर चुकी हैं. उनके साथ इस यात्रा पर गए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के मेरठ जिला प्रभारी शेर खान बताते हैं कि रजिया ने नेपाल में बच्चों की शिक्षा को जरूरी बताने को लेकर जिस तरह के तर्कों से लोगों को समझाया उसे सुन कर वहां के प्रधानमंत्री भी बहुत प्रभावित  हुए थे.

मलाला पुरस्कार के लिए रजिया का नाम संयुक्त राष्ट्र संघ में ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री गार्डन ब्राउन ने प्रस्तावित किया. उन्हें रजिया के बारे में तब पता चला जब बच्चों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वे आठ महीने पहले भारत आए थे. रजिया को मलाला पुरस्कार से सम्मानित होने के लिए संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में भाग लेने अमेरिका जाना था लेकिन वीजा नहीं मिल पाने के चलते वे इस अवसर से वंचित रह गईं. शुरुआती अफसोस के बाद रजिया अब इस बात को भूल चुकी हैं. उनका पूरा ध्यान अब आगे के अभियान पर केंद्रित है. मलाला के बारे में पूछे जाने पर रजिया उनके काम को बेहद बहादुरी भरा बताते हुए कहती हैं कि मलाला के बारे में उन्हें तब पता चला जब उन पर तालिबानी हमला हुआ था. रजिया कहती हैं कि देश दुनिया में जो भी लोग समाज सेवा के काम में लगे हैं उन सबसे वे कुछ न कुछ जरूर सीखना चाहती हैं. लेकिन अपना असल प्रेरणास्रोत वे खुद को ही बताती हैं. इस बात के पीछे रजिया का तर्क भी उनकी दूसरी बातों जितना ही सरल है. वे कहती हैं कि,’जब तक किसी काम को करने को लेकर हम मन से तैयार नहीं होते तब तक चाहे कितने ही उदाहरण हमारे सामने आ जाएं हम उनका अनुकरण नहीं कर सकते.’

ऐसा नहीं है कि रजिया के आज इस मुकाम तक पहुंचने के सफर में अड़चनें न आई हों. ईंट सप्लायर का काम करने वाले उनके पिता फरमान, खुद इस बारे में बताते हुए कहते हैं कि शुरुआत में वे रजिया के रवैये से बेहद परेशान हो गए थे. वे कहते हैं, ‘सुबह से लेकर शाम तक रजिया गांव के दूसरे बच्चों के साथ गली मुहल्लों में नारे लगाती फिरती रहती थी जो मुझे बेहद अटपटा लगता था. लड़की का इस तरह घूमना इसलिए भी अखरता था क्योंकि मुझे डर था कि नाते-रिश्तेदार और दूसरे लोग इस पर न जानें क्या-क्या बातें करेंगे. लेकिन रजिया की जिद और उसकी सच्चाई ने मेरा दिल इस कदर जीत लिया कि अब मैं उसे सब कुछ करने देना चाहता हूं.’

डॉक्टर बन कर गरीबों की सेवा करने का इरादा रखने वाली रजिया इस साल बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में बैठेगी. उनसे पूछने पर कि बोर्ड की तैयारी और बच्चों की शिक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाने जैसे दो-दो महत्वपूर्ण काम एक साथ करने में मुश्किल नहीं आएगी, रजिया का मुस्कराते हुए यही कहना था, ‘आपके लिए मुश्किल होगा लेकिन मेरे लिए बिल्कुल नहीं, मुझे सारी उम्र अब यही सब करना है और अगर मुश्किलों से डरने लगी तो कुछ नहीं कर पाऊंगी.’ उन्होंने लोगों को समझाया कि बाल श्रम करने वाले बच्चों को न पूरा पैसा मिलता है और न ही बड़े होने पर ये कुछ और करने के लायक रह जाते हैं.