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अच्छा डॉक्टर पहले एक अच्छा इंसान होता है

मैंने पिछली बार यह चर्चा शुरू की थी कि ‘अच्छे डॉक्टर’  कौन होते हैं. अच्छे डॉक्टर की जो फिलॉसफी हम मानते हैं वही डॉक्टरी की ABC भी है- अर्थात डॉक्टर की Availability (क्या वह सहजता से तथा नियमित रूप से उपलब्ध रहता है), उसका Behaviour (डॉक्टर किस तरह आपको सुनता- गुनता है, उसका व्यवहार मरीजों से कैसा है आदि) तथा Craft (उसे अपने विषय का ज्ञान है भी कि नहीं, या कि मात्र हमेशा उपलब्ध रह कर और मीठी-मीठी बातें करके ‘अच्छा डॉक्टर’ बना हुआ है).

हम अच्छे डॉक्टर की कुंडली में तनिक और गहरा उतरें. तो हम अच्छे डॉक्टर में ये बातें भी देखें- क्या वह चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं स्वीकार करता है? कहीं वह बड़े-बड़े दावे तो नहीं करता? वह आपका ऑपरेशन. एंजियोप्लास्टी या अन्य कोई भी इलाज करता है तो कहीं यह दावा तो नहीं करता कि इससे सब कुछ, ‘सौ प्रतिशत’ ठीक हो जाएगा? वह ऑपरेशन के विफल होने की संभावनाओं पर भी खुलकर बताता है कि नहीं? वह बीमारी के ठीक होने की संभावनाओं, और न ठीक होने के आपके डर को ठीक से स्पष्ट करता है कि नहीं?  एक डॉक्टर में यह सब जानना, देखना, समझना बेहद जरूरी है.

चिकित्सा विज्ञान लाख दावे कर ले, मीडिया के जरिये यह मायावी भ्रम तैयार कर डाले कि अब तो शरीर का हर विकार ठीक करने की क्षमता डॉक्टरों के हाथ में आ गई है, पर वास्तव में ऐसा है नहीं. अच्छा डॉक्टर कभी भी हवाई दावे नहीं करेगा. वह बताएगा कि ‘बाईपास सर्जरी’ से आपकी उम्र नहीं बढ़ने वाली, एंजियोप्लास्टी (सफल एंजियोप्लास्टी) भी कुछ महीनों बाद काम करना बंद कर सकती है और ऐसा ही अनेक अन्य दवाओं तथा सर्जरी आदि का हाल है. अच्छा डॉक्टर ऊलजुलूल दावे नहीं करता.

क्या वह आपको आशा देता है? 

चिकित्सा विज्ञान के विख्यात पूर्वज डा. विलियम ऑसलर का वह कथन उन डाक्टरों को चेतावनीनुमा सलाह है जो खुद को भगवान मानने लगते हैं. वे कहते हैं, ‘जज बनकर फांसी की टोपी मत पहनाओ- किसी भी मरीज से आशा छुड़ाने का अधिकार आपको नहीं है.’ मरीज अंतिम सांसें भी गिन रहा हो तब भी, डॉक्टर के प्रयास न केवल उसे बचाने के होने चाहिए, उसे आशा और सांत्वना का संदेश भी मिलना चाहिए.

एक अच्छा डॉक्टर उसी हद तक आशावादी होता है जितना स्वयं मरीज. वह मरीज से बीमारी की गंभीरता छिपाए बिना भी आशा का संदेश देता है. कैसी भी गंभीर बीमारी हो, वह मरीज में भरोसा तथा आशा जगाता है. वह कभी हाथ खड़े नहीं करता.  वह मरीज देखने आता है तो मरीज और उसके रिश्तेदार भरोसे से भर जाते हैं. वह कभी झूठी बातें, दावे नहीं करता. झूठी आशाएं न जगाकर भी आशा जगाता है. वह मरीज को मानवीय, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक धरातलों पर समझने-समझाने की कोशिश करता है.

क्या वह मरीज की निजता का सम्मान करता है? 

डॉक्टर ऐसा न हो कि सुबह आपको भगंदर की डायग्नोसिस करे और शाम तक सारे शहर को खबर हो जाए. डॉक्टर से उम्मीद की जाती है कि वह आपकी अनुमति के बिना बीमारी के विषय में एक शब्द भी किसी अन्य आदमी को नहीं बताएगा. डॉक्टर पर भरोसा करके अनेक निजी तथा गोपनीय बातें भी आप उससे शेयर कर डालते हैं. इसीलिए डॉक्टर को अफवाह में रुचि नहीं लेनीे चाहिए. डॉक्टर का कर्तव्य और आपका अधिकार है कि डॉक्टर आपको उचित एकांत में देखे. यदि आउटडोर में साथ-साथ दस अन्य अपरिचित खड़े हैं तो वहां मरीज कैसे अपने कष्ट बयान कर सकता है? अच्छा डॉक्टर अपने चैंबर में, एक बार में एक ही मरीज को देखता है.

वह रिपोर्टों का इलाज करता है या मरीज का?

अच्छा डॉक्टर मरीज को पहले ठीक से जांचता, परखता है- वह फिर जांचें लिखता है. वह आपको दो मिनट में देखकर 20 जांचें नहीं लिख देता. उससे इन जांचों की आवश्यकता पर प्रश्न करो तो वह उखड़ नहीं जाता- आपको स्पष्टीकरण देता है कि अमुक जांच वह क्यों करा रहा है. इन जांचों पर भी वह आंख मूंदकर भरोसा नहीं करता. आधुनिक विज्ञान ने बेहद तरक्की की है. खासकर सीटी स्कैन तथा अल्ट्रासाउंड आदि द्वारा आज डॉक्टर शरीर के अंदर तक की तस्वीरें ले पाता है. अच्छा डॉक्टर यह जानता है कि ये सब तस्वीरें ही हैं- इनकी असलियत समझने के लिए उसे मरीज को समझना होगा. अल्ट्रासाउंड में लीवर में दिख रही कोई गांठ कैंसर की है, इन्फेक्शन है या बस यूं ही है- इसके लिए डॉक्टर अनावश्यक जांचें नहीं कराता. हां, वह आवश्यक जांचें अवश्य कराता है. मरीज के लिए प्राय: यह तय करना कठिन हो जाता है कि आवश्यक क्या है और अनावश्यक क्या है. लेकिन एक-दो बार में ही डॉक्टर की यह आदत आप पकड़ सकते हैं.

क्या वह साफ-सुथरा रहता है? 

यह पक्ष किंचित विवादास्पद हो सकता है फिर भी मुझे लगता है कि एक अच्छे डॉक्टर को स्वयं सफाई रखनी चाहिए. साफ- सुथरा रहने वाला डॉक्टर न केवल भरोसा जगाता है, वह मरीज को भी साफ-सुथरा रहने का संदेश देता है.

क्या आपकी हर तकलीफ या शिकायत पर वह एक नई गोली लिख देता है?

आप दस शिकायतें बताते हो और वह ग्यारह दवाइयां लिख देता है. यदि परचा दो-तीन तरह के विटामिनों, टॉनिकों, एसिडिटी की दवाइयों, कई एंटीबायोटिक्स से भरा है तो वह डॉक्टर खतरनाक है. ऐसा डॉक्टर आपका नहीं, दवाई कंपनियों का भला चाहता है. अच्छे डॉक्टर का परचा प्राय: कम ही दवाइयों वाला होता है. दरअसल, अच्छे डॉक्टर की खोज एक अच्छे इंसान की भी खोज है. घटिया इंसान कभी भी अच्छा डॉक्टर सिद्ध नहीं होगा. l

‘सरकार’ के सहारे बेड़ा पार!

shibhu

झारखंड में शिबू सोरेन की हैसियत से हर कोई वाकिफ है. उनका दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) राज्य का प्रमुख दल है. पिछले कुछ समय से वह ढलती उम्र और पार्टी पर घटते नियंत्रण को लेकर चिंतित थे. इस बीच बेटे हेमंत सोरेन को राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी मिलने से उनकी चिंता कुछ हद तक दूर हुई है, लेकिन यह राहत अस्थायी भी हो सकती है. उसकी पर्याप्त वजहें मौजूद हैं.

शिबू एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं. हेमंत के मुख्यमंत्री बनने के बाद बंगाल के सिलिगुड़ी में एक सभा में उन्होंने कहा, ‘आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य चाहिए, वैसा राज्य, जो आदिवासी बहुल हो और इसमें बंगाल, झारखंड, उड़ीसा आदि के आदिवासी इलाके शामिल हों.’ विश्लेषकों के मुताबिक शिबू के बेटे के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी की साख दांव पर लग गई है और इसीलिए वह आदिवासी राज्य का अपना राजनीतिक हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि पार्टी के मूल मतदाताओं को जोड़े रख सकें.

अहम सवाल यह है कि क्या यह सरकार अपने कार्यकाल को पूरा करेगी. झामुमो के नेतृत्व में सरकार बनवाने और हेमंत को मुख्यमंत्री पद पर बिठाने के लिए कांग्रेस आगे आई है. उसका साथ लालू प्रसाद की पार्टी राजद और निर्दलीय विधायकों ने दिया है. सरकार को 43 विधायकों का समर्थन है. इसमें झामुमो के 18, कांग्रेस के 13, राजद के पांच, वाम विचारधारा आधारित पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति के एक और छह निर्दलीय विधायक हैं. राज्य में निर्दलीय विधायकों के नखरे और कारनामे किसी से छिपे हुए नहीं हैं. इस बार हेमंत को पूर्व मंत्री हरिनारायण राय, एनोस एक्का जैसे वे निर्दलीय विधायक भी समर्थन दे रहे हैं जो पहले से खासे चर्चित हैं. हेमंत ने सरकार बनाने के लिए अब तक पुलिस की नजर में फरार चल रहे विधायकों सीता सोरेन, नलिन सोरेन और हत्या के आरोप में जेल की सजा काट रहे कांग्रेसी विधायक सावना लकड़ा के वोट का भी बंदोबस्त किया.

हालांकि सरकार का कुछ दिन चलना तय है क्योंकि कांग्रेस की मंशा लोकसभा चुनाव तक सरकार चलाने की होगी. लेकिन इससे झामुमो को क्या हासिल होगा? जानकारी के अनुसार कांग्रेस ने सरकार बनवाने के लिए यह शर्त भी रखी है कि वह 14 में से 10 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इससे असंतोष पनपना तय है. हेमंत को उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव में वे कांग्रेस के छोटे भाई की भूमिका में होंगे तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उन्हें बड़े भाई की भूमिका में आने देगी. लेकिन यह सब तब होगा, जब लोकसभा चुनाव में झामुमो के सहयोग से कांग्रेस कोई करिश्मा कर पाएगी, वरना पहली गाज सरकार पर ही गिरनी है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रवींद्र राय कहते हैं, ‘हेमंत को सत्ता की भूख ज्यादा हो गई थी. इसका फायदा कांग्रेस ले रही है. पहली बार हो रहा है कि राष्ट्रपति शासन के बाद जोड़-तोड़ से सरकार बन रही है. कांग्रेस को लोकसभा तक जाना है. हेमंत मोहरा बने हैं, जिसका इस्तेमाल कांग्रेस करेगी लेकिन वह भी दस सीटों का सपना ही देख रही है’.

हेमंत की सरकार बनवाने में वाम विचारधारा की पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति यानी मासस के इकलौते विधायक अरूप चटर्जी भी समर्थन कर रहे हैं. मासस धाकड़ वामपंथी एके राय द्वारा स्थापित पार्टी है. राय एक समय में शिबू के मार्गदर्शक हुआ करते थे और मूल्यों की राजनीति के लिए जाने जाते हैं. सूत्रों के मुताबिक राय सरकार को समर्थन देने के लिए कतई तैयार नहीं थे लेकिन अरूप इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए. अरूप तर्क गढ़ते हैं कि लाल और हरे झंडे का झारखंड में पुराना इतिहास है तथा एके राय और शिबू सोरेन साथ-साथ ही राजनीति करते रहे हैं. हालांकि इसी सवाल पर भाकपा माले के विधायक विनोद सिंह कहते हैं कि यह सरकार अनैतिक तरीके से बन रही है और हमारी पार्टी इसके पक्ष में नहीं है.

इस बीच राज्य में सरकार बनने के दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं. साफ संकेत हैं कि कांग्रेस हेमंत को मुख्यमंत्री बनाकर दिल्ली से झारखंड की सत्ता चलाएगी और जो शेष हिस्सा झारखंड से संचालित होगा उसमें कई सुपर सीएम होंगे. निर्दलीय हमेशा सत्ता के केंद्र बनते हैं, इस बार नहीं बनेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता. कांग्रेस नेता राजेंद्र सिंह के पुत्र अनूप सिंह महत्वाकांक्षी हैं और हालिया दिनों में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में लाठी-डंडा चलाने की वजह से चर्चित रहे हैं. जाहिर है कि जब इन सबका वर्चस्व रहेगा तो झामुमो में बेचैनी बढ़ना तय है.

‘दीवानी’ हुई सियासत

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मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में अब लगभग सौ दिन शेष हैं. उम्मीद के मुताबिक चुनाव के ठीक पहले यहां सत्तासीन भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज हो चुकी है. किंतु जुबानी जंग से शुरू हुआ यह मुकाबला जिस तरीके से अब मुकदमेबाजी में तब्दील हो गया है उससे राज्य की राजनीति का रंग और ढंग बदला-बदला नजर आ रहा है. मध्य प्रदेश के लिए चुनाव की बेला में चला मुकदमेबाजी का यह खेल बिलकुल नया है. और पहली बार में ही यह इस हद तक परवान भी चढ़ा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह, नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के अजय सिंह, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया, भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा से लेकर मौजूदा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर सरीखे तमाम बड़े नेता अपना-अपना दांव आजमा रहे हैं. और तो और, आप मप्र की सियासत के इस मुकदमा युग का प्रभाव देखिए कि अब यहां छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी भी अपनी ताल ठोक रहे हैं.

आरोप-प्रत्यारोप से बढ़ी तल्खी के बीच इन दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और श्रीमती साधना सिंह का नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह पर मुकदमा ठोकने का मामला गर्माया हुआ है. चौहान का आरोप है कि अजय सिंह ने मई में आयोजित अपनी परिवर्तन यात्रा के दौरान उनके और उनकी पत्नी के बारे में झूठे आरोप लगाए. इन आरोपों के बदले में बीती 12 जून को चौहान दंपति ने मुख्य जिला मजिस्ट्रेट, भोपाल की अदालत में एक करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति मांगी है. वहीं अजय सिंह का कहना है कि उन्होंने इसके पहले दो पत्र लिखकर मुख्यमंत्री से 2003 से लेकर अब तक उनके परिजनों द्वारा अर्जित संपत्ति का ब्योरा मांगा था. लेकिन जवाब देने के बजाय मुख्यमंत्री ने उन्हें मानहानि का नोटिस थमा दिया. बकौल सिंह, ‘मुख्यमंत्री जी ने मानहानि के नोटिस में जिन आरोपों का जिक्र किया है वैसा मैंने कुछ नहीं कहा.’ किंतु मुख्यमंत्री चौहान के वकील दीपक जोशी ने सिंह के खिलाफ अदालत में एक सीडी और अखबारों की कुछ कतरनें पेश की हैं. जोशी का दावा है कि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बीती 9 मई को सागर की जनसभा में कहा था कि पहले गुटखे के पाउच दस रुपये में 6 आते थे, अब तीन आते हैं. इसमें करोड़ों रुपये की कालाबाजारी चल रही है. और ये रुपये साधना सिंह की नोट गिनने की मशीन में गिने जा रहे हैं. जोशी का यह भी दावा है कि अजय सिंह ने चार जून को खरगौन की जनसभा में कहा था कि जिन शिवराज ने राजनीति की शुरुआत में अविवाहित रहने की कसम खाई थी वे ही राजनीति में चमकने के बाद साधना सिंह के रूप में नोट गिनने की मशीन लाए हैं.

भोपाल में चौहान दंपति ने जिस दिन नेता प्रतिपक्ष सिंह पर मानहानि का मामला दाखिल किया ठीक उसी दिन यानी 12 जून को इंदौर की विशेष अदालत में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केके मिश्रा ने मुख्यमंत्री सहित 17 लोगों पर कथित मैगनीज खनन घोटाले को लेकर याचिका दर्ज करके मुकदमे की सियासत को हवा दे दी. मिश्रा का आरोप है कि सूबे के विवादास्पद उद्योगपति सुधीर शर्मा और उनके भाई ब्रजेंद्र शर्मा का शिवराज सरकार से नजदीकी रिश्ता है. और इसी के चलते शर्मा बंधुओं की भागीदारी वाली एक फर्म को फर्जी दस्तावेजों के हवाले से बेशकीमती मैगनीज खदान का हस्तांतरण किया गया है. मिश्रा के मुताबिक शिवराज सरकार की मिलीभगत से ही शर्मा बंधुओं ने काजरी डोंगरी (झाबुआ) में फैली 30 हेक्टेयर की खदान को गैरकानूनी तरीके से अगस्त, 2018 तक के लिए हथिया लिया है. मिश्रा का दावा है कि इस फर्म द्वारा काजरी डोंगरी में सौ करोड़ से अधिक का अवैध उत्खनन किया जा चुका है. हालांकि इस याचिका के दाखिल होने के बाद मुख्यमंत्री चौहान की तरफ से कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इसके ठीक दो दिन बाद उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र बुदनी में एक कार्यक्रम के दौरान विरोधियों को चुनौती देते हुए यह जरूर कहा, ‘मुझे बदनाम करने वालों में यदि दम है तो वे आरोपों को अदालत में सिद्ध करें.’

[box]इस समय ज्यादातर मुकदमों का निशाना नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के अजय सिंह रहे हैं और भाजपा ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा किया है[/box]

बीती 25 मई को छत्तीसगढ़ के सुकमा पहाड़ी (बस्तर) इलाके में नक्सलियों के सबसे बड़े हमले में जब छत्तीसगढ़ के कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित पार्टी के कई बड़े नेता मारे गए तब उससे भड़की सियासी आग में मप्र के नेताओं ने करीब सवा महीने तक रोटियां सेंकीं. इस दर्दनाक हादसे के फौरन बाद मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया. इसी के साथ उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को आड़े हाथों लेते हुए यहां तक कह डाला कि इस नक्सली हमले की जानकारी रमन सिंह को पहले से ही थी और इस साजिश में वे भी शामिल हैं. वहीं भूरिया के इस बयान पर पलटवार करते हुए मप्र भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने इस हादसे को छत्तीसगढ़ कांग्रेस में चल रही गुटबाजी का नतीजा बताया. इतना ही नहीं तोमर ने दो कदम आगे जाकर यह सनसनीखेज बयान भी दे डाला कि इस घटना के बाद जोगी का रुदन देखकर लगता है इसके पीछे जोगी का ही हाथ है. नतीजा यह कि इस बयान से उठे बवाल के बाद गुस्साए जोगी ने 11 जून को रायपुर में तोमर पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा ठोक दिया. और इसके चंद रोज बाद ही छत्तीसगढ़ में भाजपा प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव ने रमन सिंह के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी को लेकर भूरिया को भी उनके भोपाल के पते पर मानहानि का नोटिस पहुंचा दिया.

चुनावी समर में मची इस उथल-पुथल के बीच 21 जून को मानहानि का ही एक और नोटिस हरदा के भाजपा विधायक और पूर्व राजस्व मंत्री कमल पटेल ने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को थमाया. दरअसल 15 मार्च को सिंह ने हरदा जिले के एक किसान सम्मेलन में पटेल पर बेहिसाब संपत्ति बटोरने और इंदौर में आलीशान होटल खरीदने का आरोप लगाया था. पटेल के वकील प्रवीण सोनी के मुताबिक, ‘अजय सिंह ने कहा था कि मप्र का बजट यदि छह गुना बढ़ा है तो पटेल की माली हैसियत सौ गुना सुधरी है. हरदा से लेकर भोपाल तक पटेल की हजार एकड़ से कम जमीन नहीं है. सिंह ने यहां तक कहा था कि पटेल ने चंडीगढ़ में जमीन ले ली है और रिटायरमेंट के बाद वे वहीं रहेंगे.’ वहीं सिंह के आरोपों को लेकर पटेल का मानना है कि इससे जनता के बीच उनकी बड़ी किरकिरी हुई है.

मप्र में चल रही मानहानि की इस सियासी बिसात पर गौर करें तो अब तक मुख्य रुप से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ही निशाने पर रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में ऐसा इसलिए है कि चुनाव नजदीक देख सिंह ने सत्ता विरोधी हवा बढ़ाने के लिए बीते साल से ही हमलावर रुख अख्तियार कर लिया था. लिहाजा सत्तारूढ़ भाजपा ने उन पर चौतरफा हमले करके लगाम कसने की कवायद शुरू कर दी और सिंह के ही बयानों के आधार पर उन्हें घेरने की यह रणनीति अपनाई है.

काबिले गौर है कि मप्र में भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष पदों पर बैठे नेता अब तक पत्रकार वार्ताओं, बयानों और पत्रों के जरिए एक-दूसरे को घेरते रहे हैं. लेकिन प्रदेश की सियासत में इन दिनों जारी मुकदमेबाजी का यह दौर नया है. शीर्ष नेताओं के स्तर पर इसकी शुरुआत आज से ठीक एक साल पहले तब हुई थी जब नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा पर मानहानि का मुकदमा ठोका था. दरअसल तब झा ने अजय सिंह पर उनके राजनीतिक क्षेत्र चुरहट में आदिवासियों की जमीन हथियाने का आरोप लगाया था. इसके बाद 5 जून, 2012 को सिंह ने झूठे कागजात पेश करने के मामले में झा सहित चार लोगों के खिलाफ प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी, भोपाल के सामने आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिया था. हालांकि अब यह मामला ठंडा पड़ गया है. लेकिन इसके साथ शुरू हुआ मुकदमेबाजी का सिलसिला हाल-फिलहाल मप्र की सियासत का तापमान बढ़ा रहा है.

दागियों से दोस्ती

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ

उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती बसपा सरकार में मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या व भाई शिवसरन कुशवाहा ने हाल ही में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया. कुशवाहा नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में हुए सैकड़ों करोड़ रुपये के घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और फिलहाल गाजियाबाद की डासना जेल में बंद हैं. कुशवाहा परिवार की ताजपोशी गुपचुप तरीके से नहीं बल्कि सपा के प्रदेश मुख्यालय में कार्यक्रम आयोजित करके की गई. इस पर विपक्ष ने पार्टी पर हमला बोल दिया लेकिन चुनावी साल में जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सपा ने विपक्ष के हमलों को नजरंदाज कर दिया. दरअसल लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सपा ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टियां भी दागी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को अपने पास बैठाने से परहेज नहीं कर रही हैं.

सबसे पहले बात सत्तासीन समाजवादी पार्टी की. करीब डेढ़ साल पहले 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए थे. उस समय वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से बाहुबली डीपी यादव सहित कई ऐसे लोगों का टिकट यह कहते हुए काट दिया था कि सपा में दागी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन डेढ़ साल का समय बीतते-बीतते ही लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी सब भूल गई. अब पार्टी में दागी और आपराधिक छवि वाले लोगों का स्वागत है. जब ऐसे लोगों ने सत्ता का दामन थामा है तो उनके उपर सत्ता का करम होना भी लाजिमी है. जेल में बंद बाबू सिंह कुशवाहा को ही लीजिए.

कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या व भाई शिवसरन ने जैसे ही सत्ता का दामन थामा वैसे ही जेल प्रशासन ने उन्हें गाजियाबाद की डासना जेल से बाहर निकालकर उन्हें उपचार के लिए लखनऊ के पीजीआई में भर्ती करवा दिया. वे कार्डियालोजी विभाग के प्राइवेट वार्ड में भर्ती हुए. डाक्टरों ने जांच के बाद उनको स्वस्थ बताया और उन्हें अस्पताल छुट्टी दे दी. लेकिन कुशवाहा ने अपना प्राइवेट वार्ड नहीं छोड़ा. सूत्र बताते हैं कि पीजीआई के रवैये को देखते हुए शासन की ओर से मामले में हस्तक्षेप किया गया. कुछ घंटे में ही स्थितियां फिर से कुशवाहा के पक्ष में हो गईं और डाक्टरों ने उन्हें कार्डियालॉजी से यूरोलॉजी विभाग में कर दिया. सपा के कई नेता पीजीआई में कुशवाहा से मिलने भी गए. परिवार की सत्ता में घुसपैठ का लाभ यहीं नहीं थमा. सरकार की ओर से कुशवाहा के खिलाफ कथित घोटालों की जांच का जो शिकंजा लगातार कसता जा रहा था वह भी थोड़ा कमजोर हुआ है. पुलिस विभाग के एक बड़े अधिकारी बताते हैं, ‘कुशवाहा के खिलाफ झांसी व इलाहाबाद में दर्ज मामलों की जांच विजिलेंस से कराए जाने की मांग की गई थी जिसे अब वापस लेकर उन्हें कुछ राहत दी गई है.’

बसपा से निकाले जाने के बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब कुशवाहा ने भाजपा का दामन थामा तो इसी सपा ने काफी शोर-शराबा करते हुए इसे बड़ी डील करार दिया था. आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसी कुशवाहा के परिजनों को सपा ने अपना दामन ही नहीं पकड़ाया बल्कि बाबू सिंह की पत्नी शिवकन्या को पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी जिले से टिकट देने की बात तक अंदर खाने चल रही है? दरअसल यह सारी कवायद एक दिन की नहीं है. तीन-चार माह पूर्व सपा के एक बड़े नेता ने डासना जेल जाकर कुशवाहा से भेंट की थी. उसके बाद से ही ये समीकरण बनने लगे थे. सपा के बड़े नेता की कुशवाहा से मुलाकात की बात जेल प्रशासन ने भी गोपनीय रखी. सवाल उठता है कि जब सपा दागियों व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से चुनाव में दूरी की बात करती आ रही थी तो अचानक ऐसी कौन सी मजबूरी बन गई कि बाबू सिंह कुशवाहा के परिवार को पार्टी में शामिल किया गया. इस पर सपा के ही एक नेता कहते हैं, ‘जैसे बसपा ब्राह्मणों और दलितों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है उसी तरह सपा भी अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में अपनी पैठ मजबूत करने के इरादे से ऐसा कर रही है. बाबू सिंह कुशवाहा अभी जेल में हैं, ऐसे में सपा के टिकट पर यदि उनकी पत्नी किसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ती हैं तो कुशवाहा की सिंपैथी में एक सीट निकलना कोई बड़ी बात नहीं है. क्योंकि लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट काफी मायने रखती है.’

दागी कुशवाहा ही नहीं, कई संगीन मामलों में आरोपी गुड्डू पंडित को बसपा ने जब विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया तो सपा ने उन्हें अपना सहारा दिया. सपा के टिकट पर गुड्डू बुलंदशहर जिले से विधायक ही नहीं बने बल्कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी पत्नी को पड़ोसी जिले अलीगढ़ से टिकट दिलवाने में भी सफल रहे. लेकिन अलीगढ़ में सपा की जिला कार्यकारिणी के सदस्यों का खुलकर विरोध देखते हुए टिकट कुछ दिन पहले काट दिया गया. बसपा के मंत्री रहे नंद गोपाल नंदी पर इलाहाबाद में हुए बमों से हमले के आरोपी सपा विधायक विजय मिश्र की बेटी सीमा मिश्र को भी सपा ने भदोही से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है.

यदि बात बसपा की करें तो आम दिनों में उसे भले ही दागियों और दबंगों से पहरेज हो लेकिन चुनाव में इन सब को मिला कर चलना ही उसकी भी आदत में शुमार है. कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का घर जलाए जाने  सहित कई मामलों के आरोपी फैजाबाद के बाहुबली नेता बबलू सिंह को विधानसभा चुनाव से पहले बसपा ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इसके बाद बबलू पीस पार्टी के बैनर तले विधानसभा का चुनाव लड़े और हार गए. लेकिन चुनाव बाद स्थितियां बदली और बसपा ने बबलू को फिर से घर वापसी का मौका ही नहीं दिया बल्कि फैजाबाद लोकसभा सीट से उन्हें प्रत्याशी भी बनाया है. इसी तरह जौनपुर के बाहुबली सांसद धनंजय सिंह पर एनआरएचएम की आंच आई तो विधानसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमो मायावती ने उनके पिता का टिकट ही नहीं काटा बल्कि धनंजय को भी कुछ दिनों बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया. बसपा प्रमुख की यह सख्ती दागियों और दबंगों के लिए कुछ दिन ही रही. कुछ माह पूर्व धनंजय भी धीरे से बसपा में फिर से सक्रिय हो गए. धनंजय को फिर से जौनपुर लोकसभा सीट से पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया है.

नैतिकता व आदर्श की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी इस चुनावी मौसम में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रेम से अछूती नहीं है. वरूण गांधी की नई लोकसभा सीट सुल्तानपुर जिले की इसौली विधानसभा से पूर्व विधायक सोनू सिंह ने भाजपा का दामन थामा है. 2010 के पंचायत चुनाव के समय सोनू सिंह बसपा के विधायक थे. उसी समय उनके गांव मायंग निवासी लेखपाल की हत्या हो गई थी. लेखपाल के परिजनों ने सोनू सिंह व उनके ब्लाक प्रमुख भाई मोनू सिंह को नामजद किया था. सोनू सिंह पर लेखपाल की हत्या सहित कई अन्य संगीन मामले भी हैं. हत्या में अपने विधायक का नाम आने पर बसपा ने सोनू सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. 2012 का विधानसभा चुनाव सोनू सिंह पीस पार्टी से लड़े और हार गए. सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर जातीय समीकरणों को देखते हुए सोनू सिंह पर लगने वाले सभी आरोपों को दर किनार करते हुए भाजपा ने उन्हें शरण दे दी है. ऐसा नहीं कि सोनू सिंह भाजपा में गुपचुप तरीके से षामिल हुए हैं. वरूण की सुल्तानपुर में हुई रैली में पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी की उपस्थिति में सोनू सिंह ने भाजपा का दामन थामा.

दागियों और दबंगों की इस फेहरिस्त में शामिल जेल में बंद माफिया बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी और मुख्तार अंसारी भी लोकसभा चुनाव में ताल ठोकने की तैयारी कर रहे हैं. इनमें से मुख्तार अंसारी 2009 का लोकसभा चुनाव बनारस से बीएसपी के टिकट पर लड़ चुके हैं. मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी 2004 का लोकसभा चुनाव सपा के टिकट पर लड़े और जीते भी. लेकिन अंसारी भाइयों ने अब अपनी पार्टी कौमी एकता दल बनाया है. बृजेश और मुन्ना को चुनाव से पहले किस पार्टी का दामन मिलेगा, अब यह देखना बाकी है. फिलहाल दोनों ही जेल से राजनीति का आनंद लेने के लिए तैयार हैं.

जातिवाद का विषविद्यालय!

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की कल्पना इसके संस्थापक मदन मोहन मालवीय ने कभी शिक्षा के उत्कृष्ट केंद्र के रूप में की होगी लेकिन बीते कुछ समय से यह शिक्षा के इतर कारणों से चर्चा में रहा है. नया मामला विश्वविद्यालय के कुलपति लालजी सिंह और एक असिस्टेंट प्रोफेसर के बीच चल रहे टकराव का है  जिससे अनुसूचित जाति आयोग के तार भी जुड़ गए हैं. दरअसल सिंह पर अनुसूचित जाति (एससी) आयोग में कुल पांच मामले लंबित हैं. आयोग एक साल के भीतर उन्हें नौ समन भेज चुका है. ये मामले बीएचयू के अंग्रेजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर इंदु चौधरी और कुछ अन्य लोगों की शिकायत पर दर्ज हुए हैं. इन सभी का आरोप है कि दलित होने की वजह से कुलपति द्वारा उनका उत्पीड़न किया जा रहा है. इस पूरे मामले को एससी आयोग और उसके चेयरमैन कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया की भूमिका और ज्यादा जटिल बनाती है जिसमें हितों का टकराव साफ दिखता है.

इस मामले में कई पेंच हैं, इसलिए इसे समझने के लिए इसकी शुरुआत में जाना होगा. मई, 2007 में इंदु चौधरी की बीएचयू के अंग्रेजी विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति हुई. उस समय उनके पास परिसर में रहने के लिए कोई आवास नहीं था लिहाजा उन्होंने कुछ दिनों के लिए फैकल्टी गेस्ट हाउस में रहने की अनुमति मांगी. उन्हें यह मिल गई. फैकल्टी गेस्ट हाउस ट्रांजिट व्यवस्था के तहत मिलता है. यह अवधि एक से लेकर छह महीने तक कुछ भी हो सकती है. इसे बीएचयू प्रशासन आगे भी बढ़ा सकता है, लेकिन विश्वविद्यालय का कोई कर्मचारी आजीवन यहां नहीं रह सकता. कर्मचारियों के  लिए परिसर के भीतर ही आवास बने हुए हैं. समस्या तब शुरू हुई जब इंदु चौधरी ने अलग-अलग कारणों से गेस्ट हाउस खाली करने से इनकार करना शुरू किया. विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें बार-बार गेस्ट हाउस खाली करने का नोटिस भेजता रहा पर गेस्ट हाउस खाली नहीं हुआ. इस बीच दिसंबर 2009 में विश्वविद्यालय प्रशासन त्यागराज कॉलोनी में इंदु चौधरी को आवास आवंटित कर चुका था. लेकिन चौधरी फैकल्टी गेस्ट हाउस में जमी रहीं और खुद ही मामला हाई कोर्ट में लेकर चली गईं. लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी. मार्च, 2010 में हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, ‘याचिकाकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं दिया जिससे माना जा सके कि फैकल्टी गेस्ट हाउस में उनका रहना जायज है. फैकल्टी की सुविधा किसी का अधिकार नहीं है. याचिकाकर्ता को एक महीने में आवंटित आवास में जाने का आदेश दिया जाता है और यह याचिका निरस्त की जाती है.’

इसके बावजूद चौधरी गेस्ट हाउस में डटी रहीं और उन्होंने हाई कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर कर दी. विश्वविद्यालय उन्हें इस बीच बार-बार गेस्ट हाउस खाली करने का नोटिस भेजता रहा. अंतत: जून, 2011 में प्रशासन ने उनके वेतन से गेस्ट हाउस का किराया काट लिया. यह रकम 27 हजार रु थी. दिसंबर, 2011 में चौधरी ने गेस्ट हाउस खुद ही खाली कर दिया. वे कहती हैं, ‘मुझे इस दौरान विश्वविद्यालय ने न तो वेतन काटे जाने का कोई नोटिस दिया न ही गेस्ट हाउस खाली करने का.’ हालांकि इस बयान पर यकीन कर पाना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि तहलका के पास विश्वविद्यालय द्वारा अप्रैल, 2010 से जनवरी, 2011 के बीच जारी किए गए कुल चार नोटिस हैं. चौधरी कहती हैं, ‘विश्वविद्यालय दलितों के उत्पीड़न का केंद्र है. जिस फैकल्टी गेस्ट हाउस में मैं रहती थी, वहां का किराया 50 रुपया प्रतिदिन का तय है जबकि मुझसे प्रशासन ने शुरुआत के नौ महीने 100 रुपये प्रतिमाह वसूला और उसके बाद किराया बढ़ाकर 200 रुपये प्रतिमाह कर दिया.’ हालांकि प्रशासन का कहना है कि किराया 200 रुपया प्रतिदिन ही है. उसके मुताबिक चौधरी को शुरुआत में रियायत दी गई थी लेकिन जब वे तय समय से अधिक वहां रुकीं तो उनसे वास्तविक किराया वसूला गया.

खैर, यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई. इंदु चौधरी ने अपने आवास का मामला इतना बड़ा बना दिया कि वे इसे लेकर अनुसूचित जाति आयोग के पास पहुंच गईं. यहां से इस मामले में कांग्रेस सांसद और एससी आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया की भूमिका शुरू होती है. दिसंबर, 2011 में गेस्ट हाउस खाली करते हुए चौधरी ने कुलपति के खिलाफ आयोग में शिकायत कर दी. अपने उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए यह शिकायत उन्होंने अपने पति महेंद्र प्रताप सिंह की एक गैरसरकारी संस्था के जरिए की थी. इस मामले में कुलपति ने अपना पक्ष आयोग के सामने रखवा दिया था.

[box]इस पूरे विवाद का विश्वविद्यालय के अकादमिक माहौल पर काफी नकारात्मक असर पड़ा है[/box]

मई, 2012 में इंदु चौधरी ने एक और काम किया. उन्होंने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कर्मचारी कल्याण समिति, बीएचयू, वाराणसी के नाम से एक संस्था का पंजीकरण करवाया. यह संस्था बीएचयू परिसर के भीतर स्थित एल-27, तुलसीदास कॉलोनी से चलती है. संस्था के लेटरहेड पर भी यही पता दर्ज है. लालजी सिंह कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय के भीतर इस तरह की कोई समानांतर संस्था संचालित नहीं हो सकती. यह भारत सरकार द्वारा संचालित संस्थान है, यहां पहले से ही एसटी-एससी ग्रीवांस रिड्रेसल सेल है. इसके समांतर कोई दूसरी संस्था काम नहीं कर सकती.’ उधर, चौधरी अपनी संस्था के पक्ष में कुछ दूसरे तर्क और प्रमाण रखती हैं. वे कहती हैं, ‘परिसर के भीतर कुल पांच समितियां रजिस्टर्ड हैं. इनमें दुर्गोत्सव समिति भी है जो हर साल परिसर के भीतर दुर्गा पूजा करवाती है. एक सरकारी संस्थान किस अधिकार से परिसर के भीतर सालों से धार्मिक आयोजन करवा रहा है? कुलपति को सिर्फ दलितों की समिति से ही दिक्कत है.’ विश्वविद्यालय प्रशासन के पास इसका सिर्फ इतना-सा जवाब है कि वह दुर्गोत्सव समिति का पंजीकरण रद्द कर रहा है, बाकी समितियों के लिए उसके पास कोई योजना नहीं है.

बहरहाल इस समिति के गठन के बाद अगले कुछ दिनों के दौरान कुलपति लालजी सिंह के खिलाफ कुल पांच शिकायतें एससी आयोग में दर्ज करवाई गईं. हर मामले में आयोग ने सीधे कुलपति को आयोग के सामने प्रस्तुत होने का समन जारी किया. उनके खिलाफ आयोग ने कुल आठ समन जारी किए जिसमें हर तारीख पर विश्वविद्यालय की तरफ से रजिस्ट्रार अपना पक्ष रखने के लिए आयोग के समझ प्रस्तुत हुए. रजिस्ट्रार जीएस यादव कहते हैं, ‘हर बार पुनिया विवाद के बारे में बात करने के बजाय यही पूछते हैं कि वीसी क्यों नहीं आए और फिर वे अगली तारीख तय कर देते हैं. पिछली बार तो पुनिया जी ने यहां तक कह दिया कि तुमसे तो बात करना भी तौहीन है.’ आयोग और कुलपति की रस्साकशी यहां तक पहुंच गई कि आयोग ने 19 जून, 2013 को लालजी सिंह को गिरफ्तार करके आयोग के सामने प्रस्तुत करने का आदेश जारी कर दिया. यह वारंट इंदु चौधरी और उनके पति महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा दायर की गई शिकायत के संदर्भ में जारी हुआ था.

इसमें जमानत का भी प्रावधान नहीं था लिहाजा लालजी सिंह ने हाई कोर्ट में इस वारंट को खारिज करने की याचिका दायर की. कोर्ट ने वारंट पर रोक लगाते हुए लालजी सिंह को सुनवाई में खुद उपस्थित होने से यह कहकर मुक्त कर दिया कि आयोग प्रारंभिक जांच पूरी कर ले इसके बाद उपयुक्त समय पर कुलपति आयोग के सामने अपना पक्ष रखने के लिए प्रस्तुत होंगे. खुद लालजी सिंह कहते हैं, ‘किसी ने भी शिकायत की और पुनिया सीधे मुझे हाजिर होने का समन जारी कर देते हैं. मामलों की जांच किए बिना ही. हमने हर समन का पूरा जवाब रजिस्ट्रार के माध्यम से हर सुनवाई के दौरान आयोग के सामने रखा है.’ लालजी सिंह का यह भी कहना है कि जो मामला हाई कोर्ट में लंबित है उसमें एससी आयोग को कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है. उधर, पुनिया कहते हैं, ‘लालजी सिंह हर बार सुनवाई से बचते हंै और सिर्फ यही बताते रहते हैं कि वे क्यों नहीं आ सकते. आयोग के सामने आने से उन्हें डर क्यों लगता है?’

एससी आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया इस मामले का बेहद दिलचस्प पहलू हैं. इंदु चौधरी ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति नामक जो संस्था बीएचयू में पंजीकृत करवा रखी है उसकी महासचिव चौधरी खुद हैं और पुनिया दो महीने पहले यानी 16 मई, 2013 तक उसके चीफ पैट्रन (मुख्य संरक्षक) हुआ करते थे. एससी आयोग के समक्ष की गई सारी शिकायतें इसी संस्था के लेटरहेड पर आयोग को भेजी गईं और पीएल पुनिया का नाम इस पर मुख्य संरक्षक के तौर पर अंकित है. उनके मुख्य संरक्षक रहते हुए ही सारी शिकायतें आयोग में आई हैं. लालजी सिंह को पुनिया की तरफ से सम्मन भी इन्हीं शिकायतों के आधार पर भेजा गया. पहली नजर में ही यह हितों के टकराव का मामला नजर आता है. तहलका ने जब पुनिया के सामने यह बात रखी तो उनका कहना था, ‘मुझे इस संबंध में और कुछ नहीं कहना है, फिलहाल मैं इसका संरक्षक नहीं हूं.’ इतना कहने के बाद उन्होंने फोन काट दिया.

चौधरी और पुनिया की मिलीभगत का इशारा एक दस्तावेज भी करता है. इंदु चौधरी ने 30 मार्च, 2013 को अपनी संस्था के माध्यम से एक शिकायत (संख्या 2013/SEWA /03/05)  आयोग के पास भेजी थी. एक अप्रैल, 2013 को इसे संज्ञान में लेते हुए आयोग ने इस मामले में 15 अप्रैल की तारीख तय करते हुए आरोपितों को नोटिस भेजने की नोटिंग इसी शिकायत पत्र में लिखी है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आयोग के अध्यक्ष के कार्यालय में इस शिकायत की रिसीविंग तारीख दो अप्रैल दर्ज  है. सवाल उठता है कि आयोग को शिकायत दो अप्रैल को मिली तो उसने एक अप्रैल को ही इस पर अपना फैसला कैसे ले लिया.

सवाल यह भी है कि इंदु चौधरी या उनकी संस्था के माध्यम से बाकियों ने अपनी शिकायतें विश्वविद्यालय के एससी-एसटी सेल के माध्यम से क्यों नहीं उठाईं या उन्हें आयोग के पास विश्वविद्यालय के माध्यम से क्यों नहीं भेजा. विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और वरिष्ठ दलित अध्यापक महेश प्रसाद अहिरवार कहते हैं, ‘अपने राजनीतिक मकसद के लिए इंदु चौधरी ने विश्वविद्यालय के एससी-एसटी कर्मचारियों के व्यापक हितों को दांव पर लगा दिया है. अव्वल तो जब मामला हाई कोर्ट में था तो पीएल पुनिया को इसमें पड़ना ही नहीं चाहिए था क्योंकि यह आयोग के दायरे में ही नहीं आता. चौधरी ने विश्वविद्यालय के एससी-एसटी कर्मियों को बांट कर उन्हें कमजोर करने का काम किया है. जो संस्था उन्होंने बनाई है, वह कर्मचारियों के बजाय उनके हित पूरे कर रही है. साल भर में एससी-एसटी सेल विश्वविद्यालय में आठ कार्यक्रम करवाती है. इतने सालों में आज तक चौधरी किसी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आई हैं. उन्हें अपनी राजनीति से फुर्सत नहीं है और वे पूरे समाज के हित की बात कर रही हैं.’

विश्वविद्यालय के अकादमिक माहौल पर इस विवाद का बुरा असर पड़ा है. दलित और गैरदलित कर्मचारियों के बीच पूरे परिसर में एक गांठ-सी बंध गई है. इससे परेशान कुलपति ने विश्वविद्यालय के एससी और एसटी कर्मचारियों के साथ खुली बातचीत की पहल की. इससे दोनों पक्षों के बीच समझ विकसित हुई है और एससी-एसटी कर्मचारियों की सुनवाई कुछ हद तक बढ़ी है. लेकिन सारी समस्याएं सुलझ गई हों ऐसा नहीं है. अहिरवार बताते हैं, ‘समस्याएं तो हैं ही लेकिन इंदू चौधरी की तरह हम अपनी जायज लड़ाई गलत हथियार से नहीं लड़ेंगे. टीचिंग सेक्टर में यूनिवर्सिटी आरक्षण मानकों की अनदेखी अभी भी कर रही है लेकिन नान टीचिंग में स्थिति सुधरी है. हमने वीसी से सीधे संवाद में एससी-एसटी समुदाय की ओर से पंद्रह सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है जिनमें से अधिकतर मांगें उन्होंने मान ली हैं. इसके अलावा एससी एसटी ग्रीवांस रिड्रेसल सेल को मजबूत करने के लिए इसे तीन स्तरीय बनाया गया है.’

चुनौती और चुप्पी

फोटो: प्रशांत रवि

देश के देहात में एक किस्सा सुनाया जाता है. एक पंडित के घर अमावस की रात चोर आए. पंडिताइन ने उन्हें देख लिया. उसने पंडित को जगाया. बताया कि घर में चोर घुस आए हैं. पंडित ने दबी से आंख चोर को देखा और बोला कि अभी चिल्लाना नहीं,  चोर आराम से चोरी करके चलते बने. सारा गांव जान गया कि पंडित के यहां चोरी हुई है लेकिन पंडित ने चुप्पी साधे रखी. कुछ दिनों बाद पूर्णिमा की रात आई. अचानक पंडित-पंडिताइन चोर-चोर का शोर मचाने लगे. गांववाले पंडित के घर दौड़े. पंडित ने कहा-अभी थोड़े न आए हैं चोर! वे तो अमावस की रात ही चोरी कर गए थे. आज तो शोर मचाने का साइत बन रहा था.

नहीं मालूम कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह किस्सा सुना है या नहीं. साइत-संजोग को वे मानते हैं या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. लेकिन कभी-कभी वे इस किस्से वाले पंडित की राह जरूर पकड़ लेते हैं. सब कुछ देखने और उस पर चहुंओर शोर मचने के बाद भी चुप्पी साध लेते हैं. वे चुप होते हैं तो पंडिताइन की तर्ज पर उनके सिपहसालार भी मौन साध लेते हैं और तब तक कुछ नहीं बोलते जब तक स्थिति अनुकूल न दिखे.

दो साल पहले फारबिसगंज में पुलिस गोलीकांड में पांच अल्पसंख्यकों के मारे जाने के बाद भी नीतीश ने ऐसी ही चुप्पी साधी थी. हाल के समय में बिहार में लगातार संघ परिवार की बढ़ती गतिविधियों पर भी उनकी रहस्यमयी चुप्पी नहीं टूटी. करीब एक साल पहले रणबीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पटना की सड़कों पर मची गुंडागर्दी पर भी वे कई दिनों तक मौन ही साधे रहे थे और तीन महीने पहले पूर्णिया में आदिवासियों के मार दिए जाने पर भी वे चुप्पी धारण किए रहे. फिलहाल उनकी चर्चित चुप्पी छपरा के धर्मासती गांव में मिड डे मील कांड के बाद की है. इस हृदयविदारक घटना के बाद देश भर में शोर मचता रहा,  लेकिन नीतीश कुमार ने चुप्पी नहीं तोड़ी. विरोधी कहते रह गए कि मुख्यमंत्री पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर धर्मासती जाने की बात छोड़िए, अपने सरकारी आवास से कुछ किलोमीटर ही दूर बने पटना मेडिकल कॉलेज तक नहीं गए जहां उस गांव से आए कई बच्चों का इलाज चल रहा था.

घटना के नौवें दिन नीतीश की यह चुप्पी टूटी. उन्होंने कहा कि छपरा की यह घटना महज इत्तेफाक या हादसा नहीं बल्कि विरोधियों की सोची-समझी साजिश का परिणाम थी. यानी नौवें दिन भी उन्होंने वही बात दोहराई जो राज्य के शिक्षा मंत्री पीके शाही घटना वाले दिन ही कह चुके थे. नीतीश के चुप्पी तोड़ने के बाद आगे की कमान उनके सिपहसालारों ने थाम ली है. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं, ‘धर्मासती कांड विरोधियों की साजिश का हिस्सा है. राजद और भाजपा के लोग आपस में तालमेल बिठाकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. बोधगया बम ब्लास्ट के बाद एक ही दिन दोनों दलों द्वारा बंदी का आह्वान कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता.’

जदयू के कई नेता इसी तरह नीतीश के कहे को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं. लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि मुख्यमंत्री इतने दिनों तक चुप क्यों रहे. वे छपरा या  पटना मेडिकल कॉलेज क्यों नहीं गए? जदयू नेताओं के पास फिलहाल इस सवाल का जवाब नहीं. कुछ कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री के पांव में मोच थी. वे चल नहीं सकते थे,  सो नहीं गए. कुछ का जवाब है कि नीतीश अपने दौरे से इलाज के काम में बाधा नहीं डालना चाहते थे. आलोचकों का तर्क है कि पांव में मोच के बावजूद नीतीश कुमार अपने सरकारी आवास पर लगातार मिलने-जुलने से लेकर दूसरे काम करते रहे. मोच के तीसरे दिन वे अपने लोकप्रिय कार्यक्रम जनता दरबार में शामिल हुए. चौथे दिन कैबिनेट की बैठक में शामिल हुए. शिक्षा मंत्री पीके शाही के साथ अलग से बैठक भी की. पांचवें दिन यूनिसेफ के कंट्री डायरेक्टर लुईस जॉर्ज से भी मिले और स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में भी हिस्सा लिया. लेकिन धर्मासती कांड को लेकर वे न बोलने का समय निकाल सके और न ही कहीं निकलने का.

जदयू के विधानपार्षद देवेशचंद्र ठाकुर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार धर्मासती कांड से बेहद दुखी थे और परेशान भी लेकिन वे जांच रिपोर्ट आने के पहले कुछ नहीं बोलना चाहते थे, इसलिए चुप रहे.’ नीतीश कुमार या उनकी जगह कोई भी मुख्यमंत्री होता तो इतने बड़े हादसे से दुखी तो जरूर होता, लेकिन जानकारों के मुताबिक इसके पीछे एक दूसरी बात भी है. मुख्यमंत्री के सामने हाल में इतनी तेजी से एक के बाद एक लगातार चुनौतियां पैदा हो रही हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया की जाए. बीते जून के पहले पखवाड़े जब भाजपा और जदयू के बीच अलगाव की प्रक्रिया चल रही थी तो बिहार के जमुई इलाके में नक्सलियों ने दिन-दहाड़े एक ट्रेन को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की और तीन लोगों की हत्या करने के साथ-साथ रेलवे पुलिस बल के जवानों से हथियार लूट लिए. उसके कुछ दिनों बाद ही पश्चिम चंपारण के बगहा में पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें छह थारू आदिवासियों की मौत हो गई. भाजपा ताजा-ताजा विपक्ष में गई थी, लालू प्रसाद सक्रिय थे ही, यह गोलीकांड भी नीतीश के लिए परेशानी का सबब बना. उन्होंने जांच का आदेश देकर मौन साध लिया. कुछ ही दिन बीते थे कि बोधगया बम ब्लास्ट की घटना हो गई.

इस पर चाहकर भी नीतीश न तो मौन साध सकते थे, न टालू रवैया अपना सकते थे. उन्हें आनन-फानन में सुबह ही बोधगया निकलना पड़ा. लेकिन मामला शांत नहीं हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली बोधगया पहुंचकर मुद्दे की गरमी बढ़ाते रहे. कुछ दिनों पहले तक जो शिंदे नीतीश कुमार के लिए कसीदे पढ़कर गए थे वे बोधगया से राज्य सरकार को निकम्मा बता कर निकल लिए. ये सब परेशानियां एक-एक कर इतनी तेजी से आती रहीं कि नीतीश को सोचने का वक्त तक नहीं मिला. और ऊपर से मिड डे मील हादसे ने तो बिहार की पूरे देश में किरकिरी कर दी. राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई. उसी दरमियान औरंगाबाद में माओवादियों ने पांच हत्याएं करके अलग परेशानी खड़ी कर दी. जदयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘किस-किस मामले को संभालते नीतीश कुमार. किस-किस पर बोलते!’

बात सही है. पिछले साढ़े सात साल के राज-काज चलाने के अनुभव में एक साथ नीतीश कुमार इतनी परेशानियों से कभी घिरे भी नहीं थे. और बात इतने पर खत्म भी तो नहीं होती. इन सभी घटनाओं के बीच ही कांग्रेस ने पड़ोसी राज्य झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ सरकार बनाने के लिए बने गठबंधन में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को खासी तवज्जो देकर नीतीश को अलग से मायूसी का संदेश दे दिया.

तिस पर परेशानियां घर के भीतर भी हैं. आम तौर पर नीतीश के संकटमोचक बनकर उभरने वाले और भाजपा से अलगाव करवाने में दिन-रात बोल-बोलकर माहौल तैयार करवाने वाले राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी भी इस पूरे मामले में अलग रहकर लगभग चुप्पी ही साधे रहे. दूसरों की बात कौन कहे, जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी मिड डे मील मसले पर या समानांतर रूप से हुई कई घटनाओं पर नीतीश के बचाव में बयान देते नजर नहीं आए. सूत्र बता रहे हैं कि जदयू में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. यही वजह है कि भाजपा से अलगाव के बाद डेढ़ माह से भी ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद नीतीश कुमार चाहकर भी मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे. पार्टी के अंदर एक चिंगारी है जो कभी भी आग का रूप ले सकती है. सूत्र बताते हैं कि जदयू के 20 में से करीब एक दर्जन सांसद ऐसे हैं जो भाजपा से अलगाव की वजह से नाखुश हैं. वे अपनी सीट भाजपा के सहयोग के बगैर निकाल पाएंगे इसे लेकर आश्वस्त नहीं. उधर, बताया जा रहा है कि भाजपा से अलगाव के बाद शरद यादव अलग नाराज चल रहे हैं, क्योंकि अब राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी पार्टी में उनकी हैसियत शो-पीस की हो गई है. जब तक राजग के संयोजक थे तब तक सक्रियता और कुछ बोलने की वजह भी बनी रहती थी. अब वे जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भर हैं और पार्टी के विधायक और सांसद नीतीश कुमार का कहा मानते हैं. शरद को सुनने वालों की संख्या कम है. आगे क्या होगा, अभी से कहना जल्दबाजी है लेकिन फिलहाल यह साफ दिख रहा है कि मुश्किल में चल रहे नीतीश कुमार बाहरी और आंतरिक, दोनों किस्म की परेशानियों में घिरकर अकेले-से पड़ गए हैं.
लेकिन जानकारों के मुताबिक नीतीश के घिरते जाने या अकेले और अलग-थलग पड़ जाने का मतलब यह भी नहीं कि इसमें लालू प्रसाद को संजीवनी मिलने या भाजपा के मजबूत होने के संकेत हैं. प्रदेश में भाजपा खुद बगावत का दंश झेल रही है और डेढ़ माह में सरकार के राज-काज और उपलब्धियों पर सवाल उठाकर खुद को हास्यास्पद बनाने में लगी हुई है. और रही बात लालू प्रसाद की तो वे चारा घोटाले के आखिरी फैसले में जेल जाने से बचने के लिए आरजू-मिन्नत और भक्ति-भाव के साथ बिहार छोड़कर उत्तर प्रदेश में विंध्याचल के आस-पास बाबाओं से आशीर्वाद लेने में मशगूल हैं.    l

साफ दिख रहा है कि मुश्किल में चल रहे नीतीश कुमार बाहरी और आंतरिक, दोनों किस्म की परेशानियों में घिरकर अकेले-से पड़ गए हैं

बुनियाद तो बुनियादी ही बदल दे, बशर्ते…!

फोटो:विकास कुमार
फोटो:विकास कुमार

वृंदावन का नाम लेते ही स्वाभाविक तौर पर उत्तर प्रदेश में बसा राधा-कृष्ण वाले वृंदावन का ही नजारा सामने होता है. लेकिन एक वृंदावन बिहार में भी है.  पश्चिमी चंपारण के चनपटिया ब्लॉक में. यह वृंदावन भी कुछ मंदिरों की वजह से खास है. शिक्षा के वे मंदिर जो आजादी के पहले ही एक नायाब प्रयोग के तौर पर यहां बने थे. महात्मा गांधी की प्रेरणा से दो दर्जन से अधिक बुनियादी विद्यालय यहां खोले गए थे. 1917 के बाद 1939 में जब गांधी दोबारा बिहार आये थे तो इसी इलाके में पांच दिनों तक रुके थे. बुनियादी विद्यालय यानी ज्ञान और कर्म,  श्रम और विद्यार्जन के बीच के भेद को मिटानेवाला संस्थान. ऐसा स्कूल, जहां बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ ही बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, किसानी, सब्जी खेती, डेयरी आदि विषयों का भी प्रशिक्षण मिले. जहां बच्चे किताबी पढ़ाई के बाद अपना हुनर भी विकसित करते रहें, जो कमाई हो उससे वे अपने स्लेट-पेंसिल-कॉपी खरीद सकें.

1935 में वर्धा में हुए कांग्रेस सम्मेलन में जब इस तरह के स्कूल की परिकल्पना उभरी थी तो बिहार के लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया था. बिहार के ग्रामीणों ने भू और श्रमदान करके ऐसे स्कूल खुलवाए. चंपारण के वृंदावन में ऐसे 28 स्कूल खुले और पूरे बिहार में 391 ऐसे बुनियादी विद्यालय अब भी मौजूद हैं. ज्ञान, कर्म और श्रम का सामंजस्य बिठाने के लिए खोले जा रहे इन स्कूलों के लिए दी गयी अच्छी-खासी जमीनें भी हैं,  लेकिन स्कूल बेहाल हैं.

इन स्कूलों के जरिये ज्ञान के साथ ही स्वावलंबन को बढ़ाने के उद्देश्य 60 के दशक में ही दफन होने शुरू हो गये थे. अब ये विद्यालय भी एक सामान्य विद्यालय भर बनकर रह गये हैं. नाम के आगे पीछे अब भी बुनियादी जरूर दिखता है लेकिन न उस तरह की शिक्षा देनेवाले या उसमें रुचि रखनेवाले शिक्षक हैं और न व्यवस्था. जमीनों पर अवैध कब्जा हो रहा है. इन बुनियादी विद्यालयों वाले गांव में ही सरकार ने सामान्य प्राथमिक, माध्यमिक विद्यालय खोल दिये हैं, जहां स्लेट की जगह प्लेट उठाए बच्चों की फौज जुटती है.

चंपारण के सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता पंकज कहते हैं, ‘उम्मीदें अब भी मरी नहीं है. वृंदावन इलाके के एक गांव में आज भी एक बुनियादी विद्यालय का संचालन गांव वाले करवा रहे हैं, जहां 900 बच्चे पढ़ते हैं. गांव वाले ही चंदा जुटाकर चलाते हैं. उस स्कूल में हेडमास्टर भी है और आठ शिक्षक भी. गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली से भी वित्तीय मदद मिलती है.’

पंकज जिस एक स्कूल का हवाला देते हैं, वह एक उम्मीद की लौ की तरह जला हुआ है. लेकिन उसकी एक सीमा है. बिहार के सब गांव इतने संपन्न नहीं कि खुद के बूते इस तरह के स्कूल चला लें. पंकज कहते हैं, ‘सपना तो यह था कि बाद में बुनियादी विश्वविद्यालय भी स्थापित होगा. ठोस खाका भी तैयार हुआ था लेकिन अब तो स्वेच्छा से जो जमीनें बुनियादी विद्यालय के लिए ही दान में मिली थी, उन जमीनों पर कहीं नवोदय विद्यालय खुल चुका है तो कहीं सामान्य विद्यालय और कहीं कुछ और.’

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए तमाम किस्म की कवायदों में लगी बिहार सरकार के सामने बुनियादी विद्यालयों को जिंदा करके शिक्षा को पटरी पर लाने का एक बेहतर विकल्प है. संयोग से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसमें रुचि भी दिखायी थी. लेकिन 2010 से शुरु हुई यह पहल बैठकों, सेमिनारों और फाइलों से आगे नहीं बढ़ पा रही. गांधीवादी शिक्षा के दर्शन पर आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए मई 2009 में नई तालीम केंद्र की स्थापना हुई थी. 2010  में दिल्ली में नई तालीम की बैठक हुई. अगली बैठक 2011 में बिहार में हुई. देश भर से 500 के करीब प्रतिनिधि आये. नीतीश भी इस बैठक में पहुंचे. प्रयोग के तौर पर कुछ बुनियादी विद्यालयों को फिर से शुरू करने की सलाह दी गई. उत्साहित नीतीश ने सभी 391 विद्यालयों को वापस पटरी पर लाने का ऐलान किया. मुख्यमंत्री के आदेश से तीन वरिष्ठ आइएएस अधिकारियों अंजनी कुमार सिंह, अमरजीत सिन्हा और व्यासजी की कमिटी बनी कि वे आज की स्थिति और भावी योजनाओं की रिपोर्ट दिसंबर 2012 तक दें. दिसंबर 2012 तक तो नहीं, लेकिन इससे दो-तीन माह के विलंब से एक रिपोर्ट तैयार हो गई. जो रिपोर्ट आई है वह घालमेल के पुलिंदे जैसी है. कमिटी की रिपोर्ट में सभी 391 बुनियादी विद्यालयों को सुदृढ़ करने, सभी जिलों में एक बुनियादी विद्यालय को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित करने, बुनियादी विद्यालयों के शिक्षकों का मानदेय अन्य सरकारी विद्यालयों के बराबर करने, बुनियादी विद्यालय की डिग्री को सरकारी मान्यता देने, विद्यालयों को आवासीय बनाने, शिल्पी एवं कलाकारों को भी शिक्षक बनाने, बुनियादी शिक्षा बोर्ड का पुनर्गठन करने आदि जैसी बातें कही गई हैं.

एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डीएम दिवाकर का मानना है कि बुनियादी शिक्षा बोर्ड को अलग करने की जरूरत है. वे यह भी मानते हैं कि शिक्षकों की बहाली में प्रमुखता से ध्यान दिया जाए तो तभी बात बनेगी. वे कहते हैं, ‘फिलहाल जो स्कूल चल रहे हैं, वे माइग्रेटरी बर्ड पैदा कर रहे हैं. जो गांव छोड़ दे, वह होशियार, जो जिला और राज्य छोड़ दे वह थोड़ा और ज्यादा होशियार और जो देश ही छोड़ दे, वह सबसे काबिल माना जाता है. बुनियादी विद्यालयों को ऐसी शिक्षा प्रणाली की परछाईं से भी बचाकर रखना होगा.’ उनके मुताबिक शिक्षकों की बहाली में सिर्फ शैक्षणिक योग्यता को आधार बनाने से बात नहीं बनेगी. इन विद्यालयों में जो शिक्षक बहाल हों, उनके प्रशिक्षण के पहले केरल के ज्ञानशाला, गुजरात विद्यापीठ, उदयपुर के सेवा मंदिर आदि में जाकर देख लेने की जरूरत है. उससे सहूलियत होगी. बुनियादी विद्यालय कैसे विकसित होंगे, होंगे भी या नहीं, यह देखा जाना अभी बाकी है.

तीन सदस्यीय कमिटी में शामिल रहे आइएएस अधिकारी व फिलवक्त मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह कहते हैं, ‘हमारी कोशिश होगी कि जल्द से जल्द इस पर काम आगे बढ़े और हम इन विद्यालयों में आज की जरूरत के अनुरूप कौशल को बढ़ायेंगे. मोबाइल, कंप्यूटर, आइटी आदि का भी प्रशिक्षण देंगे.’ कमिटी के दूसरे सदस्य व्यासजी कहते हैं, ‘आज के समय के अनुसार तो शिक्षण-प्रशिक्षण तो हो ही लेकिन सबसे पहली जरूरत यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे के बीच जो हीन भावना आयी है, उसे दूर किया जाए. योग्य शिक्षकों की बहाली जरूरी होगी, जिनमें एक नैतिकता हो और समाज जिनका मान-सम्मान करने को तैयार हो.’ उनका मानना है कि जहां बुनियादी विद्यालय चलेंगे, वहां अगर दूसरे स्कूल भी रहेंगे तो फिर बुनियादी विद्यालय हाशिये की जातियों और समुदायों का स्कूल बनकर रह जाएगा, इसे भी ध्यान में रखने की जरूरत है.

सबके अपने सुझाव हैं, अपनी सहमति-असहमति है. सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कहते हैं, ‘बुनियादी विद्यालय केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंस गया है. केंद्र सरकार ने 300 करोड़ रुपये इसके नाम पर देकर कह दिया कि यह आपकी जिम्मेवारी है, राज्य सरकार कहती है कि उनकी जिम्मेवारी. नीयत और नीति साफ नहीं लेकिन देर-सबेर ही सही, इसे चलाना तो होगा ही, क्योंकि केंद्र से पैसा मिल चुका है और जो जमीन इन विद्यालयों के नाम पर है, उसके एग्रीमेंट में यह साफ लिखा हुआ है कि अगर बुनियादी विद्यालय नहीं चल सकेंगे तो जमीनें रैयतों को वापस मिल जाएगी. अब अगर राज्य सरकार नहीं चला सकेगी तो उन जमीनों को वापस लेने की मुहिम भी शुरू होगी.’

शिप ऑफ थीसियस: पुर्जों के अलावा भी आदमी में कुछ है क्या

फिल्म समीक्षा

फिल्म » शिप ऑफ थीसियस   

निर्देशक»  आनंद गांधी    

लेखक » खुशबू रांका, पंकज कुमार, आनंद गांधी

कलाकार » आइदा-ऐल-कशेफ, नीरज कबी, सोहम शाह, फराज खान, विनय शुक्ला

कहानियां तीन हैं. तीसरी में एक मारवाड़ी लड़का, जो बकौल अपनी नानी बस पैसे के बारे में सोचता है, और बकौल खुद अच्छी जिंदगी जीता है क्योंकि अच्छा खाता-पीता है, दोस्तों के बीच उसकी इज्जत है और उसमें दया है, मानवता है. तो वह लड़का और उस जैसी पृष्ठभूमि वाला उसका दोस्त इस बारे में बात करते हैं कि एक आदमी के सारे पुर्जे दूसरे लोगों में लगा देते हैं तो फिर वह आदमी जिंदा है या मर गया, या वह कौन है. क्या आदमी में कुछ है उसके पुर्जों से अलग? और वह दोस्त, जो अब तक की फिल्म में ना सोचने वाला ही लगता आया है, कहता है कि कुछ तो होगा यार पुर्जों से अलग. यही थीसियस के जहाज की दुविधा है. और यहीं फिल्म वह बात कहती है जो उसका शीर्षक है. कि एक-एक कर एक जहाज के सारे पुर्जों की जगह दूसरे जहाज के सारे पुर्जे लगा दिए जाएं और उसी तरह एक-एक कर दूसरे जहाज में पहले के, तो कौनसा जहाज कौन-सा होगा?

फिल्म (या उसका अधिकांश) इस बारे में नहीं है. वह दार्शनिक सवालों पर बात करती है, कभी-कभी अपनी राय भी रखती है और कभी-कभी नहीं भी रखती. एक लड़की है, जो देख नहीं सकती और सुनकर तस्वीरें खींचती है. और अपने साथी से उसकी बहस का एक कमाल का किचन सीन है. वैसे तर्क जिनकी उम्मीद शायद मुझे पूरी फिल्म में थी लेकिन जो कम जगह आ सके. फिल्म विचार के स्तर पर दिलचस्प है, उसकी सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक कमाल है, उसके सभी ऐक्टर इतने नैचुरल हैं कि जैसे उनकी जिंदगियों पर कोई डॉक्युमेंट्री बन रही हो.

लेकिन अपने तर्कों में फिल्म उतनी नई, रोचक और उत्तेजक नहीं है जैसी आप दार्शनिक प्रश्नों के बीच में खड़ी किसी फिल्म से उम्मीद करते हैं. तीसरी कहानी में घटनाएं हैं, इसलिए वह ज्यादा जोड़ती भी है और जो कहती है, ज्यादा स्पष्टता से कहती है. पहली दोनों कहानियां सुंदर और कवितामयी लगती हैं और जिस स्टैंड पर वे खड़ी हैं, वहां से तर्क करना शुरू तो करती हैं लेकिन ज्यादा खुलने या स्वीकार करने को तैयार नहीं. पहली कहानी की नायिका की तरह किसी भीतरी परत में ही सही, फिल्म को अपनी राय के सही होने का गुमान बीच-बीच में दिखता है और यह अच्छी ही बात होती, अगर उसे भी फिल्म कह पाती. लेकिन उसका अनकहा बौद्धिक दिखता हिस्सा दिखावा ज्यादा लगता है.

स्क्रिप्ट में अपनी तीनों कहानियों के अंत में फिल्म शायद एक पैराडॉक्स (या सिर्फ सवाल) पर खड़ी है और मेरे खयाल से वह थीसियस का पैराडॉक्स नहीं है. पहली में शायद वह यह है कि कला क्या है और मैं उससे अलग हूं क्या (और उसकी मुख्य पात्र अच्छी फोटोग्राफर बताई जाती है लेकिन वह किसी एमच्योर की तरह आत्ममुग्ध और जिद्दी है), दूसरी में यह कि क्या मैं अपने विचार से अलग हूं और मेरा चुनाव कितना मेरा है, और तीसरी में यह कि कुछ करने की मेरी हद कितनी है. क्राफ्ट के लेवल पर कमाल की फिल्म होने के बावजूद शिप ऑफ थीसियस की कमी यह है कि उसे खुद के अपनी हद से आगे होने का भ्रम है.

-गौरव सोलंकी

दस्तखत फर्जी हुए तो राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा’

राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब
राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब

अलग-अलग राजनीतिक विचार के लोगों में विरोध हो सकता है. लेकिन अपने आंतरिक मामले को दूसरे देश की सरकार के सामने ले जाना क्या बाहरी दखल को आमंत्रित करना नहीं है?

हमने यह पत्र इस मकसद से नहीं लिखा. दरअसल, यह पत्र तब लिखा गया था जब गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहे थे. आपको याद होगा कि उस वक्त यूरोपीय संघ और अमेरिका के कुछ अधिकारी भी नरेंद्र मोदी से मिलने आए थे. इसके बाद मोदी, उनकी पीआर एजेंसी एप्को और अमेरिका ने मिलकर लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर मोदी एक बार फिर से चुनाव जीत जाते हैं तो उन्हें अमेरिका और यूरोप का पूरा समर्थन मिलेगा. इसलिए हमने पत्र के जरिए अमेरिका से स्पष्टीकरण मांगा था कि अगर आप अपनी वीजा नीति में कोई बदलाव कर रहे हैं तो यह काम पारदर्शी तरीके से होना चाहिए. भ्रम बनाकर लोगों को ठगा नहीं जाना चाहिए.

लेकिन आप लोगों ने जो पत्र लिखा है उसमें तो स्पष्ट मांग है कि अमेरिका मोदी को अमेरिकी वीजा न देने की नीति को कायम रखे.

देखिए, यह उनका मामला है कि वे किसे अपने यहां आने देना चाहते हैं और किसे नहीं. हमने तो सिर्फ अपनी स्थिति स्पष्ट की है. हमने उन्हें बताया है कि 2002 दंगों के दौरान स्थितियां काफी भयावह थीं. अब भी हालात अच्छे नहीं हैं. आज नरेंद्र मोदी के 14 पुलिस अधिकारी जेल में हैं.

मोदी लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री हैं. बतौर सांसद आपने भी संविधान की रक्षा की शपथ ली है. ऐसे में क्या संवैधानिक तौर पर चुने गए मुख्यमंत्री के खिलाफ विदेशी मंच पर मोर्चा खोलना संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है?

संवैधानिक तौर पर चुने जाने का मतलब यह नहीं है कि कोई लोगों को बांटने और नरसंहार की राजनीति करे. नरेंद्र मोदी को अगर इस देश के संविधान का खयाल होता तो वे अपनी सभाओं में मुसलमानों को मियां मुशर्रफ कहकर नहीं चिढ़ाते. वे ऐसा कहकर हमें पाकिस्तानियों के साथ खड़ा कर देते हैं. तो क्या देश में रहने वाले सभी मुसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करनी होगी. संवैधानिक व्यवस्था में किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा भारत के प्रति मुसलमानों की निष्ठा पर सवाल खड़ा किया जाना बेहद अपमानजनक है और इसका विरोध जताने का हक हमसे छीना नहीं जा सकता.

कुछ जानकारों का कहना है कि अपने आंतरिक मामले को दूसरे देश के सामने ले जाने से हमारी विदेश नीति को झटका लगेगा.

दुनिया में जहां भी नाइंसाफी हुई है, उसका विरोध मैंने किया है. दुनिया के अलग-अलग देशों में हो रहे अत्याचारों को लेकर मैंने संसद में कई बार बोला है. इसमें मैंने किसी खास मजहब के लोगों का खयाल नहीं रखा. ऐसे में अगर गुजरात में हुए अत्याचारों को मैं उठा रहा हूं तो इसमें गलत क्या है. मंच चाहे जो भी हो मेरी लड़ाई नाइंसाफी के खिलाफ है. नरेंद्र मोदी के बारे में खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 2002 में गुजरात में जो हुआ उसके बाद मैं दूसरे देशों में मुंह दिखाने लायक नहीं हूं. इसका मतलब तो यही हुआ न कि देश में जो होता है उसका विदेश नीति पर असर पड़ता है.

अमेरिका की छवि मु्स्लिम विरोधी देश की है और आप उसी के सामने भारत के एक तथाकथित मुस्लिम विरोधी नेता का विरोध जता रहे हैं. क्या यह दोहरापन नहीं है?

हमने कहीं भी यह नहीं कहा कि अमेरिका मानवाधिकारों का सबसे बड़ा हितैषी है. अपने पत्र में भी नहीं. हमारा तो यह मानना है कि पूरी दुनिया में जितना आतंकवाद है, उसका जिम्मेदार अमेरिका है. हमने इस पत्र के जरिए एक तरह से अमेरिका को आईना दिखाने की कोशिश की है. मोदी को वीजा का मामला अमेरिका से जुड़ा हुआ है. इसलिए स्वाभाविक है कि पत्र भी अमेरिका को ही लिखना पड़ा.

आपके पत्र में माकपा सांसद सीताराम येचुरी के दस्तखत भी हैं, लेकिन उन्होंने ऐसे किसी पत्र पर दस्तखत से इनकार किया है.

सीताराम येचुरी बेहत प्रतिष्ठित सांसद हैं और मेरे अच्छे मित्र भी हैं. इस बारे में मैंने पहले भी कहा था कि उन्होंने दस्तखत किए हैं. उन्होंने इस खत को कोई दूसरा खत समझ कर गलतफहमी में बयान दे दिया है.

क्या आपकी उनसे इस बारे में कोई बातचीत हुई?

वे अभी देश से बाहर हैं. जैसे ही वे लौटेंगे, मैं उनसे मिलूंगा और मुझे यकीन है कि वे इस पत्र और अपने दस्तखत को देखकर यथास्थिति लोगों के सामने रखेंगे.

भाजपा का भी आरोप है कि आपने सांसदों के फर्जी दस्तखत करवाए.

मैं इन आरोपों से आहत हूं. अमेरिका की एक फोरेंसिक लैब ने यह बात प्रमाणित कर दी है कि सारे दस्तखत असली हैं. मेरे ऊपर फर्जीवाड़े का आरोप लगाने वाले भाजपा प्रवक्ताओं को माफी मांगनी चाहिए. मैं अपने उस बयान पर कायम हूं कि अगर कोई यह साबित कर दे कि दस्तखत फर्जी हैं तो मैं राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा.

मुर्गा लड़ाई से अवैध कमाई

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झारखंड की राजधानी रांची के प्रसिद्ध जगन्नाथपुर मंदिर के पास मजमा जुटा हुआ है. दूर से यह नजारा देखकर कुतूहल होता है. ढेर सारे लोग गोल घेरे में बैठे हुए हैं और सीटी बजा रहे हैं. सीटियों के बजने की आवाज निरंतर तेज… होती जा रही है. इस बीच तालियों की गड़गड़ाहट शोर में बदलने लगती है. धीरे-धीरे रोमांच पर उन्माद का गाढ़ा रंग चढ़ने लगता है. नजदीक जाकर देखने पर पता चलता है कि 15-20 फुट के गोल घेरे में दो मुर्गों के बीच लड़ाई चल रही है. उनके पैरों में चाकू बंधे हैं और उनकी पैंतरेबाजी पहलवानों को मात दे रही है. बिजली की चमक जैसी तेजी से वे अपने दांव बदलते हैं और एक-दूसरे पर वार करते हैं. लेकिन किसी एक की हार तो होनी ही है. करीब सात-आठ मिनट बाद एक मुर्गा लहूलुहान होकर गिर जाता है. उसके पेट में चाकू लगा है. उसे इलाज के लिए बाहर ले जाया जाता है और विजेता मुर्गे को उस छोटे-से मैदान में इस अंदाज में घुमाया जाता है मानो वह मुर्गा न होकर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का कोई लड़ाका हो.

यहां आकर इस खेल में मुर्गों की भूमिका खत्म हो जाती है. इसके बाद शुरू होता है एक दूसरा खेल. यह पैसे का खेल है. पांच मिनट के भीतर ही यहां लाखों रुपये के वारे न्यारे हो जाते हैं. यह पैसा उस सट्टे का है जो मुर्गों पर लड़ाई के पहले लगाया गया था. इसके बाद फिर मुर्गों की लड़ाई चालू हो जाती है. पारंपरिक तौर पर आदिवासियों के मनोरंजन का यह खेल अब सट्टेबाजी का जरिया बन गया है.

यह खेल देखकर दो सवाल अपने आप ही मन में उठते हैं. पहला यह कि ये मुर्गे इतने खतरनाक खेल के लिए तैयार कैसे किए जाते होंगे, क्या इनकी कोई खास नस्ल होती है. दूसरा यह कि गरीब आदिवासियों के मनोरंजन का यह खेल पैसेवालों के शगल और सट्टे का खेल कैसे बन गया. यह जिज्ञासा भी सर उठाती है कि आखिर यह कितना बड़ा कारोबार है.

पहले सवाल का जवाब हम भोला महली से पूछते हैं. भोला पहले रांची स्थित हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड के कर्मी थे, लेकिन 1962 से मुर्गेबाज भी हैं यानी मुर्गा लड़ाने का काम भी करते हैं. भोला बताते हैं, ‘यह खेल झारखंड और दक्षिण भारत में पीढ़ियों से मशहूर रहा है. दक्षिण में इसे कुडू पूंजू और राज पूंजू भी कहते हैं. हालांकि वहां मुर्गे के पैर में हथियार बांधने की जगह दूसरा तरीका अपनाया जाता था. चाकू के बजाय मुर्गे के पांव को ही धारदार बनाया जाता था. मुर्गे के पांव के पिछले वाले हिस्से (पंजों के ऊपर का हिस्सा) में सुअर के मल और रीठे के छिलके को पीस कर उसे बांध दिया जाता था.

इसे लगातार सात दिन और 24 घंटे पानी डालकर भिगोया जाता था. एक सप्ताह बाद जब इसे खोला जाता तो मुर्गों के पैर में गांठें कांटे की तरह बाहर निकल आतीं और यही उनका हथियार होता.’ भोला कहते हैं कि लड़ाई के लिए तैयार किए जाने वाले मुर्गे को संतान की तरह पाला जाता है. बीमारी में उसका इलाज कराया जाता है और अंधेरे में रखकर उसे गुस्सैल और चिड़चिड़ा बनाया जाता है. उसे मुर्गियों से दूर रखा जाता है. इन मुर्गों को ताकतवर बनाने के लिए उन्हें सूखी मछली का घोल, किशमिश, उबला हुआ मक्का और विटामिन के इंजेक्शन तक दिए जाते हैं.

भोला बताते हैं, ‘अगर मुर्गा लड़ते-लड़ते घायल हो जाए तो इलाज के बाद वह लड़ाई के लिए दोबारा तैयार हो जाता है.’ उनके मुताबिक सुनहरे बालों वाले मुर्गे की लड़ाई में मांग ज्यादा होती है, क्योंकि वह ज्यादा मजबूत होता है और मुर्गा लड़वाने वाले लोग इसकी खरीदारी चटगांव और विजयनगरम से करते हैं. इन मुर्गों की कीमत कई बार एक लाख रुपये तक होती है.

[box]प्राय: जहां मुर्गा लड़ाई का खेल होता हैं वहां दारू के अड्डे भी चोरी-छिपे चलाए जाते हैं और मटके का खेल यानी लोकल लॉटरी (जुआ) भी जमकर होता है.[/box]

सुनकर बड़ी हैरत होती है कि आखिर एक मुर्गे के लिए इतनी बड़ी रकम कौन लगाता होगा और क्यों. जवाब तलाशने के लिए हम रांची के आस पास के इलाके में होने वाले मुर्गा लड़ाई में पहुंचते हैं. लड़ाई का दिन तय है. सोमवार और शुक्रवार को अनीटोला, बुधवार और गुरुवार को कटहल मोड़, शनिवार को रातू बगीचा… यहां और कई जानकारियां मिलती हैं. ओरमांझी के कुच्चू गांव के रहने वाले मनराज बताते हैं,  ‘मुर्गे के पैरों में जो अंग्रेजी के यू आकार का हथियार देख रही हैं, उसे चाकू-तलवार नहीं कत्थी कहा जाता है और उसे हर कोई भी नहीं बांध सकता. उसे बांधने की भी एक कला है. जो बांधना जानते हैं उन्हें कातकीर कहा जाता है. एक कातकीर एक मुर्गे के पैर में कत्थी बांधने का तीन सौ रुपये लेता है और अगर वह मुर्गा जीत गया तो दो सौ रुपये ऊपर  से भी उसे मिल जाते हैं.’ मनराज के मुताबिक कत्थी भी कई तरह की होती है.

वे बताते हैं, ‘बांकी, बांकड़ी, सुल्फी, छुरिया चार तरह के हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पांव में बांधने के लिए होता है, जिसमें बांकड़ी सबसे खतरनाक होती है. ये सब ठोस इस्पात के बने होते हैं, जिसे बनाने वाले कारीगर भी अलग होते हैं. अलग-अलग नामों वाले हथियारों का इस्तेमाल भी अलग-अलग मौके के हिसाब से किया जाता है. यानी खतरनाक तरीके से लड़ना है तो खतरनाक हथियार, सामान्य से लड़ना है तो सामान्य हथियार.’
यह जानकारी भी मिलती है कि यह खेल पूरे झारखंड में खेला जाता है. कटहल मोड़ पर मुर्गा लड़ाने वाले विजय बताते हैं कि यह खेल पहले राजा-महाराजाओं के सौजन्य से लगने वाले हाट-मेले में होता था जहां गांव के

आदिवासी लोग अपने-अपने मुर्गे को लेकर पहुंचते थे और फिर मनोरंजन के लिए ग्रामीण पसंद के मुर्गे पर कभी-कभार कुछ बोली भी लगा देते थे. लेकिन अधिकांशतः बार बाजी सिर्फ मुर्गे की जीत-हार पर लगती थी. यानी जो मुर्गा हार जाएगा उस मुर्गे को जीतने वाले मुर्गे का मालिक लेकर चला जाएगा. अब उसकी मर्जी पर है कि वह उस मुर्गे को पाले-पोसे या फिर खा जाए.

मुर्गा लड़ाई में दिलचस्पी रखने वाले विजय टेटे हमें इस लड़ाई के आर्थिक समीकरण समझाने की कोशिश करते हैं. विजय कहते हैं, ‘गांव से तो मुर्गा पालने वाले अब भी मुर्गा लड़ाई के दौरान अपने-अपने मुर्गे को लेकर आते हैं लेकिन मैदान में पहुंचने के पहले ही उस पर सट्टेबाजों का कब्जा हो जाता है. जिसके पास हाजरा मुर्गा (मुर्गे का एक प्रकार) होता है, उसके पीछे सट्टेबाज सबसे ज्यादा चलते हैं.’ टेटे आगे कहते हैं, ‘पहले हो सकता है यह खेल मनोरंजन के लिए होता होगा और घंटे-दो घंटे में सब समाप्त हो जाता होगा लेकिन अब तो सिर्फ रांची में ही हर रोज किसी न किसी इलाके में यह खेल होता है और एक-एक दिन में 40-50 लड़ाइयां हो जाती हैं. एक लड़ाई पर 20-25 हजार से लेकर लाख-दो लाख तक की बोली लगती है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ सट्टेबाज ही इसमें कमाई करते हैं.

सट्टेबाज तो खैर लाखों में खेलते हैं लेकिन मुर्गा लड़ाई का यह खेल एक धंधे की तरह होता है. आप सोचिए कि एक बार हथियार बांधने वाला कम से कम 300 रुपये लेता है. अगर उसने दिन भर में 20-30 के हथियार भी बांध दिए तो पांच-छह हजार तो उसकी जेब में आ ही जाते हैं.’ इसी तरह मुर्गों के डॉक्टर अलग होते हैं, जो मौके पर इलाज भी करते हैं. उनकी कमाई भी अलग होती है और गांव के जो लोग अपने घरों में मुर्गा पालते हैं उनकी आमदनी भी अब इतनी होने लगी है कि वे घर बना लें, गाड़ी खरीद लें. कई मुर्गेबाज अब इस स्थिति में दिखते हैं. मुर्गे के खेल का समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र कम लोग समझाते हैं, उसके अर्थशास्त्र को समझाने वाले बहुतेरे मिलते हैं. बहरहाल, हमें उसका एक अपराधशास्त्र भी दिखाई पड़ता है.

प्राय: जहां मुर्गा लड़ाई का खेल होता है वहां दारू के अड्डे भी चोरी-छिपे चलाए जाते हैं और मटके का खेल यानी लोकल लॉटरी (जुआ) भी जमकर होता है. मशहूर पत्रकार पी साईनाथ अपनी पुस्तक तीसरी फसल में मलकानगिरी की मुर्गे की लड़ाई पर लिखते हैं, ‘जब से हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पैर में होने लगा है, तब से यह परंपरागत खेल खतरनाक हो गया है और पहले जो खेल आनंद के लिए घंटों चलता था, वह चंद मिनटों में खत्म हो जाता है, क्योंकि इतनी ही देर में बिजली की तरह झपटकर एक-दूसरे पर वार करने वाले दो मुर्गों में से कोई एक घायल हो जाता है.’

साफ है कि हथियारों का चलन भी सट्टेबाजों ने ही बढ़ाया होगा क्योंकि मुर्गे हथियार से लड़ेंगे तो खेल जल्द खत्म होगा. अगर एक खेल जल्द खत्म होगा तब तो दूसरे, तीसरे, चौथे… यानी एक दिन में 40-50 लड़ाइयों की गुंजाइश बनेगी. और जितनी ज्यादा लड़ाइयां, उतना ही ज्यादा दांव पर लगने वाला पैसा.