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मुजफ्फरनगर दंगों 2013: नफरत खेल

नाम का इकबाल

filesराजस्थान के एक छोटे-से कस्बे फलोदी में इकबाल नाम के एक आदमी को बैंक खाता खुलवाने के लिए अपना नाम बदलना पड़ा. बैंक वालों का आग्रह था कि सिर्फ इकबाल नहीं चलेगा, आगे मोहम्मद या पीछे खान होना जरूरी है. इकबाल ने स्कूल का प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र सब कुछ दिखाया, लेकिन बैंक के किसी दिशा-निर्देश के आगे कुछ काम न आया. अंततः वे इकबाल खान हो गए.

यह किस्सा पढ़ते हुए ख्याल आया कि मुझे भी इंटरनेट साइटों पर रजिस्ट्रेशन कराते हुए कई बार एक और नाम खोजना-जोड़ना पड़ता है. फेसबुक पर ही मैं प्रियदर्शन नहीं, प्रिय दर्शन हूं, जो अंग्रेजी हिज्जे की गफलत और कुछ नादानों की खुशफहमी की वजह से कभी-कभी प्रिया दर्शन मान लिया जाता है.

लेकिन मेरा मामला इंटरनेट की बेचेहरा दुनिया में एक ऐसा यांत्रिक फॉर्म भरने से जुड़ा है जिसके साथ मासूम-सा लगने वाला यह सामाजिक पूर्वग्रह नत्थी है कि नाम है तो कोई उपनाम भी होगा. इकबाल का मामला सार्वजनिक दुनिया के ऐसे कारोबार का है जिसमें आमने-सामने होने, अपनी बात रखने और अपने मूल नाम को बचाए रखने की काफी गुंजाइश है. इस गुंजाइश के सिमटने की एक बड़ी वजह यह समझ में आती है कि आम तौर पर सरकारी कर्मचारी कायदे-कानूनों के नाम पर लिखे हुए शब्दों की परवाह करते हैं, उसके पीछे की जरूरत या सोच पर नहीं. लेकिन क्या इसकी और भी वजहें हो सकती हैं? बहुत हल्का-सा यह संदेह और सवाल सिर उठाता है कि कहीं इकबाल की मुश्किल का वास्ता उसकी धार्मिक पहचान से भी तो नहीं है. क्या वह हिंदू होता और इकबाल की जगह प्रेमचंद होता तो भी उसका फॉर्म खारिज हो जाता? या मेरा यह संदेह हर मामले में एक सांप्रदायिक कोण खोज निकालने के एक दूसरे पूर्वग्रह का नतीजा है?

समस्या बहुत छोटी-सी है लेकिन जटिल है. इसे छोड़कर आगे बढ़ सकते हैं, ज्यादा बड़े सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में लग सकते हैं. लेकिन जैसे वीरेन डंगवाल की एक कविता के मुताबिक तलवे में चावल का दाना लग जाए तो उसकी चिपचिपाहट ध्यान खींचती रहती है और तब तक बड़ी समस्याएं स्थगित हो जाती हैं, कुछ उसी तरह पहचान का यह पका-अधपका चावल मेरे तलवे में लग गया है. शायद इसलिए भी कि कहीं यह एहसास है कि नाम और पहचान की इस शिनाख्त के पीछे यांत्रिकता हो, सांप्रदायिकता हो, अनमनापन हो, पूर्वग्रह हो, जो कुछ भी हो, लेकिन कुछ ऐसा भी है जो मानवीय नहीं है- या कम से कम मानवीय रिश्तों के प्रति उदार नहीं है. वह चीज क्या है?  इस सवाल के जवाब में एक दूसरी खबर मेरे सामने खड़ी हो जाती है. यह बताती है कि मुंबई हवाई अड्डे पर 37 साल की एक महिला को जांच के लिए अपने कृत्रिम पांव हटाने पड़े. यह उसके लिए बहुत अपमानजनक था- अपने अपाहिजपन से लड़ने की उसकी कोशिश के विरुद्ध व्यवस्था के एक हंटर जैसा.

[box]नाम और पहचान की इस शिनाख्त के पीछे यांत्रिकता हो, सांप्रदायिकता हो, जो कुछ भी हो, लेकिन कुछ ऐसा भी है जो मानवीय नहीं है[/box]

एक तरह से देखें तो हमारी पूरी सुरक्षा की यह एक जरूरी शर्त है. आखिर सड़क पर, बैंक में, ट्रेन में, हवाई जहाज में, हर जगह डर, दहशत और अविश्वास का एक वास्तविक माहौल तो है ही. अगर कोई धोखा हो, अगर कोई धमाका हो, अगर कोई हमला हो तो क्या हम उन जांच एजेंसियों को जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे जिन्होंने सुरक्षा में चूक की, हमारे नाम के साथ छेड़छाड़ नहीं की, हमारे कृत्रिम पांव हटाकर नहीं देखे? आखिर बोधगया में यह सवाल उठ ही रहा है कि वहां रात भर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था. लेकिन बोधगया में तो सदियों से यह इंतजाम नहीं था, वहां 2013 में जाकर धमाके क्यों हुए?

सवाल यहीं से पैदा होता है. हमारी सुरक्षा पर इतने खतरों, हमारी स्वतंत्रता पर इतने पहरों और हमारी पहचान के साथ जुड़ी इतनी सारी शर्तों की नौबत कहां से आई? हमारे चारों तरफ इतने संदेह के घेरे हमेशा से तो नहीं थे? जैसे-जैसे हम विकसित होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे असुरक्षित क्यों होते जा रहे हैं?  क्या इसलिए कि हम घर को खोकर मकान बना रहे हैं, समाज को खोकर कॉलोनी बसा रहे हैं और मनुष्य को खोकर व्यवस्था बना रहे हैं?

कई बरस पहले, दिल्ली के किसी अपार्टमेंट में दाखिल होने से पहले, रजिस्टर पर पहली बार नाम-पता भरते हुए मुझे कुछ अजीब लगा था. जैसे इस प्रक्रिया ने ही मुझे कुछ छोटा, कुछ अजनबी, कुछ बाहरी बना डाला हो. अब भी गांवों-कस्बों से आए लोगों को मैं कई बार दरबानों से उलझता देखता हूं कि वे रजिस्टर क्यों भरें तो मुझे लगता है कि वे अपने खुलूस से उलझ रहे हैं, अपने आत्मसम्मान की बची हुई गांठ बचाए रखने की कोशिश में उलझ रहे हैं.

आज एक रजिस्टर हमारे अपार्टमेंट के गेट पर है, गेट से बाहर जो नई बस्तियां हैं वहां पीली सलाखों वाले बड़े-बड़े फाटक हैं जहां चौकीदार आने-जाने वालों पर नजर रखते हैं. क्या हमें कभी याद आता है कि ये बस्तियां हम उन मुहल्लों को छोड़ और तोड़कर बसा रहे हैं जहां हर घर अपना लगता था, जहां आने-जाने वालों को पहचान दर्ज नहीं करानी पड़ती थी?

यह विकास के साथ बदलते समय और समाज की सूरत है. अपार्टमेंट बड़े होते जा रहे हैं, रिश्ते छोटे होते जा रहे हैं, सुरक्षा कड़ी होती जा रही है, असुरक्षा बड़ी होती जा रही है, संदेह स्वभाव बनता जा रहा है, अविश्वास नियम बनता जा रहा है. इसकी ज्यादा कीमत उन्हें अदा करनी पड़ रही है जो तथाकथित मुख्यधारा वाली पहचानों में शामिल नहीं हैं. इस व्यवस्था में हमारा नाम- जो हमारी पहली पहचान है- तक भी महफूज नहीं है. लेकिन बड़े और ठोस सवालों के बीच इस बारीक और सूक्ष्म बदलाव पर नजर कौन रखे?

सियासत और नर्मदा की आफत

29 नवंबर, 2012 का दिन और स्थान था इंदौर जिले का उज्जैनी गांव. मध्य प्रदेश में यह आगामी नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले का समय था. तब इस गांव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ नर्मदा नदी को क्षिप्रा नदी से जोड़ने की एक बड़ी योजना का धूमधाम से शिलान्यास किया था. इसी दिन यहां चौहान ने नर्मदा नदी से क्षिप्रा नदी की पुरानी रवानी लौटाने की घोषणा की थी और जल संकट से घिरे सूबे के पश्चिमी अंचल मालवा को हरा-भरा बनाने का भी सपना दिखाया था. उनका दावा था कि मालवा के सैकड़ों गांवों को रेगिस्तान बनने से बचाने के लिए उन्होंने योजना को तेजी से अमली जामा पहनाना शुरू भी कर दिया है. और इसी के चलते अगले एक साल में ‘नर्मदा मैया’ ‘क्षिप्रा मैया’ से मिलने आ जाएंगी. किंतु हकीकत यह है कि बताई गई मियाद खत्म होने के कगार पर होने के बावजूद योजना के पहले चरण का काम ठप पड़ा है. अभी तक योजना की डीपीआर यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तक नहीं बनी है. लेकिन इसके इतर एक बड़ी बात यह है कि  पूरी योजना में ऐसी कई खामियां हैं जिससे अब यह योजना महज चुनावी हथकंडा नजर आने लगी है.

देश में बीते कई सालों से नदियों को जोड़ने की परियोजना पर बहस चल रही है. इस मुद्दे पर एक वर्ग का मानना है कि यह विचार न केवल पर्यावरण के विरुद्ध है बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर फिजूलखर्ची भी जुड़ी हुई है. वहीं दूसरा तबका इसे जल संकट से निजात पाने के स्थायी उपाय के तौर पर देखता है. लेकिन जब इसी कड़ी में नर्मदा को क्षिप्रा से जोड़ने का मामला सामने आया है तो नदी-जोड़ परियोजनाओं का समर्थन करने वाले कई विशेषज्ञ भी इसके पक्ष में नहीं दिखते. इस बारे में उनकी साफ राय है कि भौगोलिक नजरिये से नर्मदा को क्षिप्रा से जोड़ना एकदम उल्टी कवायद है. इसमें इस्तेमाल तकनीक ही इतनी खर्चीली साबित होने वाली है कि योजना घाटे का सौदा बन जाएगी. काबिलेगौर है कि मप्र में नर्मदा जहां सतपुड़ा पर्वतमाला की घाटियों में बहने वाली नदी है तो वहीं क्षिप्रा मालवा के पठार पर स्थित है. योजना के मुताबिक क्षिप्रा को सदानीरा बनाए रखने के लिए उससे काफी नीचे स्थित नर्मदा के पानी को काफी ऊंचाई पर चढ़ाया और फिर उसे क्षिप्रा में डाला जाता रहेगा. इस ढंग से क्षिप्रा को चौबीस घंटे जिंदा रखने के लिए भारी मात्रा में नर्मदा का पानी डालते रहना अपने आप ही दर्शाता है कि यह योजना कितनी जटिल और खर्चीली है. वहीं विशेषज्ञों का विश्लेषण हमें यह सोचने में मदद करता है कि राज्य सरकार की यह अनोखी तरकीब किस तरह से एक ऐसी नादानी है जो राज्य की जनता के लिए बेहद महंगी साबित होने जा रही है.

यदि इस पूरी योजना के तकनीकी पक्षों पर जाएं तो नर्मदा नदी को क्षिप्रा से जोड़ने के लिए बनाई जाने वाली पचास किलोमीटर लंबी पाइपलाइन इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. योजना के तहत नर्मदा के पानी को नर्मदा घाटी से मालवा के पठार तक ले जाने के लिए तकरीबन पांच सौ मीटर यानी आधा किलोमीटर की ऊंचाई तक चढ़ाया जाएगा. तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक एक नदी के बहाव को इस ऊंचाई तक खींचने के मामले में यह एक बहुत बड़ा फासला है. सीधी बात है कि इतने ऊंचे फासले को पाटने के लिए इस योजना में कई मेगावॉट बिजली इस्तेमाल की जाएगी. इसके लिए चार स्थानों पर न केवल पंपिंग स्टेशन बनाए जाएंगे बल्कि नर्मदा की धारा को अनवरत पठार तक पहुंचाने के लिए इन स्टेशनों को हमेशा चालू हालत में भी रखना पड़ेगा. इस योजना के निर्माण से जुड़े कामों के लिए जिम्मेदार नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी इसे काफी खर्चीली कवायद मान रहे हैं. एक अधिकारी  जानकारी देते हैं, ‘ पानी को पठार तक पहुंचाने में कुल 22 रुपये प्रति हजार लीटर का खर्च आएगा. दूसरी तरफ, मप्र के नगर निगमों पर निगाह डाली जाए तो छोटी नदियों या तालाबों से पानी लेकर घरों तक  आपूर्ति की उनकी लागत महज दो रुपये प्रति हजार लीटर होती है.’
[box]वाशिंगटन डीसी के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक नर्मदा  दुनिया की छह सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल है[/box]

इस योजना के अंतर्गत हर दिन तीन लाख 60 हजार घनमीटर पानी नर्मदा से क्षिप्रा में डालकर बहाया जाना है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस पूरी कवायद में रोजाना किस हद तक बिजली फूंकी जाएगी. जानकारों की राय में आगे जाकर बिजली की कीमत बढ़ेगी और इस नजरिये से योजना ठीक नहीं कही जा सकती. वहीं जल क्षेत्र में शोध से जुड़ी संस्था मंथन अध्ययन केंद्र, बड़वानी के रहमत के मुताबिक, ‘क्षिप्रा सहित मालवा की तमाम नदियां यदि सूखीं तो इसलिए कि औद्योगीकरण के नाम पर इस इलाके में जंगलों की सबसे ज्यादा कटाई हुई और उसके चलते नदियों में पानी की आवक कम होती गई. कायदे से मालवा की नदियों को जिंदा करने के लिए उनके जलग्रहण क्षेत्र में सुधार लाने की जरूरत थी. लेकिन इसके उलट अब दूसरे अंचल की नदी का पानी उधार लेकर यहां की नदियों को जीवनदायिनी ठहराने की परिपाटी डाली जा रही है.’

नदी-जोड़ योजना का एक आम सिद्धांत है कि किसी दानदाता नदी का पानी ग्रहणदाता नदी में तभी डाला जा सकता है जब दानदाता नदी में अपने इलाके के लोगों की आवश्यकताओं से ज्यादा पानी उपलब्ध हो. सवाल है कि क्या नर्मदा में पेयजल, खेती और उद्योगों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता से ज्यादा पानी उपलब्ध हैं? गौर करने लायक तथ्य है कि वाशिंगटन डीसी के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक नर्मदा दुनिया की छह सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल है. केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक 2005 से 2010 तक आते-आते नर्मदा में पानी की आपूर्ति आधी रह गई है. जबकि एक अनुमान के मुताबिक 2026 तक नर्मदा घाटी की आबादी पांच करोड़ हो जाएगी. ऐसे में यहां पानी जैसे संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा. इस योजना को लेकर जल वैज्ञानिक केजी व्यास का मानना है, ‘नर्मदा का पानी जिस जगह से उठाया जाएगा उसके बारे में यह नहीं बताया गया है कि वहां लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उससे अधिक पानी उपलब्ध है भी या नहीं.’ इसी तरह, इस नदी-जोड़ योजना में करीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपये आधारभूत ढांचा खड़ा करने में खर्च किए जाएंगे. लिहाजा खर्च के अनुपात में समस्या के निराकरण की तुलना होनी चाहिए. लेकिन यहां भी यह नहीं बताया गया है कि इस लेन-देन में नर्मदा घाटी को कितना घाटा और सूबे को कुल कितना मुनाफा होने वाला है. दरअसल यह पूरी योजना न केवल महंगी बल्कि जटिल भी है, इसलिए इसका संचालन और रखरखाव भी उतना ही खर्चीला रहेगा. ऐसे में जितना खर्च आएगा उससे पड़ने वाले कर का बोझ भी राज्य के लोगों पर पड़ेगा.

नर्मदा नदी को मालवा की जीवनरेखा बनाने की पहल नई नहीं है. किंतु 2002 में सूबे की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने जरूरत से ज्यादा बिजली खर्च होने की दलील देकर ऐसी योजना को खारिज कर दिया था. 2002 को विधानसभा में सिंह ने इस योजना से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि इसके लिए पैसा जुटाना बड़ी चुनौती है. लेकिन मौजूदा सरकार ने अब इसी योजना को जनता के बीच आकर्षण का मुद्दा बना दिया है. वहीं अनौपचारिक चर्चा के दौरान प्राधिकरण के एक आला अधिकारी का कहना है, ‘अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि नर्मदा से क्षिप्रा को जोड़ने के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये की रकम कहां से जुटाई जाएगी.’ दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री चौहान का कहना है, ‘मालवा में नर्मदा का पानी लाने के लिए एक लाख करोड़ रुपये भी खर्च करने पड़े तो हंसते-हंसते खर्च किए जाएंगे.’ साथ ही चौहान ने दोनों नदियों के बीच एक भव्य मंदिर बनाने की घोषणा भी की है.

जाहिर है मामला चुनावी है और इस योजना को पीने के पानी के निराकरण के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है, इसलिए राज्य की सरकार जहां किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है वहीं विरोधी दल कांग्रेस विरोध दिखाने की हालत में नहीं है. नर्मदा-क्षिप्रा योजना पर संभलकर आगे बढ़ने की सलाह देते हुए जल नीतियों पर अध्ययन करने वाली संस्था सैंड्रप, दिल्ली के हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘पानी से उठने वाले विवादों के हल बाद में ढूंढ़ना काफी मुश्किल हो जाता है. जैसे कि दक्षिण भारत में कावेरी नदी के विवाद के बाद कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों के बीच पनपी पानी की लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं लेती. ऐसा इस योजना के साथ भी हो सकता है.’

तजुर्बे बताता है कि भले ही पानी आग ठंडा करने के काम आता हो लेकिन सियासत में यह आग लगाने के काम आ रहा है. लिहाजा मप्र के निमाड़ और मालवा इलाके की नदियों के पानी के साथ ऐसा कोई खेल न खेलने की कोशिश होनी चाहिए थी. लेकिन मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नर्मदा को क्षिप्रा से जोड़ने का दावा यहीं नहीं थमता. वे नर्मदा के पानी से मालवा की कई बड़ी नदियों को जोड़ने का राग भी आलाप रहे हैं. इस तरह चौहान इन दिनों नर्मदा के पानी से मालवा के तीन हजार गांवों और दस शहरों की प्यास बुझाने का सपना दिखा रहे हैं. यही नहीं वे नर्मदा के ही पानी से मालवा के 18 लाख हेक्टेयर खेतों को सींचने की उम्मीद भी जगा रहे है. गौर करें तो मालवा में क्षिप्रा के अलावा खान, गंभीर, चंबल, कालीसिंध और पार्वती सरीखी बड़ी नदियां हैं. जाहिर है कि अकेले नर्मदा नदी के दम पर सभी नदियों को जिंदा रखने का दावा किया जा रहा है. इस पूरी परियोजना से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस कवायद में जब नर्मदा सूख जाएगी तब उसे कौन-सी नदी से जिंदा किया जाएगा.

‘झारखंड को सिर्फ दुहते रहने से स्थिति ऐसी भयावह और अराजक होगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा’

झारखंड के सामने चुनौतियों का ढेर है और आपके पास उससे निपटने के लिए युवा मन की ऊर्जा. आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
मैं पहले भी सरकार में रहा हूं. मैंने यह महसूस किया है कि झारखंड में जो व्यवस्था है वह खुद को ही संभालने और संचालित करने में पूरी ऊर्जा को लगाए रहती है. इसका असर यह होता है कि शासन का लाभ आम आदमी तक पहुंच ही नहीं पाता. मेरे सामने सबसे बड़ी और पहली चुनौती है इस व्यवस्था को दुरुस्त करना. यही मेरी पहली प्राथमिकता भी होगी.

गठबंधन सरकार चलाने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय हुआ है. आपने कहा है कि उसके अलावा भी आपकी प्राथमिकताएं हैं. इसका क्या आशय है?
आशय कुछ खास नहीं. यह जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना है, वह तो महज एक रूपरेखा है लेकिन उसमें कई चीजें अनछुई रह गई हैं, उन्हें भी हम प्राथमिकता देंगे.

मसलन!
कोई खास एक-दो काम बता पाना अभी तो संभव नहीं लेकिन समय के साथ जो भी समस्याएं सामने आएंगी, उनको भी हम देखेंगे.

पिछले 13 साल में झारखंड के सामने सबसे बड़ी दिक्कत क्या रही, जिसकी वजह से झारखंड प्रहसन वाला एक नमूना राज्य बन गया?
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता. पीछे देखेंगे तो कई खामियां दिखती हैं. मैं आगे देखना चाहता हूं. अतीत की गलतियों को तो ठीक करना ही है. उम्मीद करता हूं कि समय के साथ सब ठीक होगा.

फिर भी इन खामियों की कोई तो वजह होगी? नौकरशाही का रवैया, राजनेताओं की अदूरदर्शिता या जनता से मिला खंडित जनादेश, किसे प्रमुख मानते हैं?
मैं कह रहा हूं कि मुझे पीछे देखने को मत कहिए. वैसे आम तौर पर तो यही कहा जाता है कि राजनीतिक खामियों का नतीजा है लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. मुझे लगता है कि यदि शासन व्यवस्था दुरुस्त रहे तो इसका बहुत असर नहीं पड़ता. एक पाइप लाइन से पानी किसी सही जगह पर पहुंचाना है, और पाइप में सौ छेद कर दिए गए हैं तो कितनी भी ताकत से पानी डालेंगे वह जगह तक पहुंचेगा क्या? वही होता रहा है झारखंड में. यही वजह है कि मैं बार-बार कह रहा हूं कि व्यवस्था को सुधारना हमारी पहली प्राथमिकता है. थोड़ा वक्त दीजिए, ऐसे सवाल फिर नहीं रहेंगे.

सियासत हासिल करने की कोशिश में झामुमो खुद को भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के साथ आजमाती रही है?
कांग्रेस के साथ हम पहले भी गठबंधन में रहे हैं लेकिन साथ में सरकार चलाने का यह पहला अनुभव होगा. उम्मीद है कि ठीक होगा. किसी भी दल के साथ जब मामला व्यक्तिगत राजनीति पर आ जाता है तभी दिक्कत आती है. भाजपा के साथ का अनुभव तो बताने की जरूरत नहीं है, अभी हाल ही में तो उससे अलग हुए हैं. इस राज्य के निर्माण में राजग की भी भूमिका रही है और संप्रग का भी सहयोग मिला है. हमने हमेशा राज्य की जनता के भले के लिए ही इस दल या उस दल से गठबंधन किया है. इसकी वजह से हमारी पार्टी को काफी उतार-चढ़ाव भी देखने पड़े हैं.

भाजपा के साथ सरकार चलाने में दिक्कत किस बात पर हुई, यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है.
भाजपा राज्यहित के मसले को तरजीह नहीं दे रही थी. बस यही.

सरकार बनाने के एवज में बने गठबंधन में आपकी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में 14 में से दस सीटें कांग्रेस को देने को राजी हो गई है. यह बड़ा दांव खेला है आपने. आपने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय राजनीति आपकी रुचि का विषय नहीं.
ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति हमारी रुचि का विषय नहीं. हम उसमें अपनी सहभागिता निभाते रहे हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता राज्य है इसलिए हमने कांग्रेस को इतनी सीटें दी हैं. हम राज्य को ही ठीक करेंगे. राज्य ठीक रहेंगे, दुरुस्त होंगे तो देश अपने आप मजबूत होगा.

वैसे यह देखा गया है कि जो आदिवासी नेता रहे हैं वे राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा दिनों तक रुचि नहीं रख पाते. जयपाल सिंह मुंडा से लेकर शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी तक. क्या उन्हें टिकने नहीं दिया जाता या अपनी जमीन का लगाव उन्हें वहां रहने नहीं देता?
हमें नहीं लगता कि ऐसा है. हमारी सहभागिता तो रही ही है. वैसे इस सवाल पर गौर करूंगा. अभी जवाब नहीं दूंगा.

आपकी पार्टी एक बार फिर से बृहत झारखंड की मांग उठा रही है. झारखंड के साथ-साथ बंगाल, उड़ीसा आदि निकटवर्ती राज्यों के आदिवासी इलाकों को मिलाकर एक बृहत झारखंड. आप क्या कहेंगे इस पर?
यह हमारी पुरानी मांग रही है. अलग-अलग राज्यों में रहने वाले लोगों की भी ऐसी इच्छा और आकांक्षा है तो यह हमारी पार्टी के एजेंडे में आगे भी रहेगा.

देश के मानचित्र पर तेलंगाना भी अब एक नए राज्य के रूप में सामने आने वाला है. छोटे राज्यों के निर्माण से विकास होता है या…!
बड़े राज्य जो हैं, वे कौन सा विकसित हो गए हैं. वैसे यह हमेशा चर्चा होती है कि छोटे राज्यों के निर्माण से कोई फायदा है या नहीं. छोटे राज्य भी विकसित हुए हैं. हम तो झारखंड के लिए प्रयास करेंगे. छोटे राज्यों के निर्माण से कितना भला होता है, कितना नहीं, इस विषय पर अभी चर्चा करना ठीक नहीं.

झारखंड के खान-खनिज से देश को बहुत फायदा होता है, लेकिन उसका उचित राजस्व राज्य को नहीं मिल पाता. क्या इसके लिए अलग से आवाज उठाएंगे?
अब तो संप्रग के साथ हैं तो आवाज क्या उठानी है, हम नीति बनवाएंगे. राजस्व को लेकर अपना अधिकार चाहिए. चाहे वह भागीदारी के रूप में हो, हिस्सेदारी के रूप में हो या दोनों ही रूपों में हो. हमें जमीन का जो नुकसान हो रहा है उसकी कीमत तो चाहिए न. उपजाऊ जमीन के भीतर से जब खनिज निकाला जाता है, फिर वह जमीन उपजाऊ नहीं रह जाती. पूरी दुनिया में जमीन और मिट्टी की ही तो लड़ाई चल रही है. हम भी अपना उचित अधिकार लेंगे.

झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग आपके पूर्ववर्ती अर्जुन मुंडा ने उठाई थी. बगल के बिहार में यह सबसे बड़ी राजनीतिक मांग है. आप भी क्या इस मांग को जारी रखेंगे?
विशेष राज्य का दर्जा मतलब क्या? विशेष आर्थिक सहायता ही न. वह तो हमें चाहिए ही, चाहे विशेष पैकेज के रूप में हो या विशेष दर्जे के रूप में.

[box]हमारी प्राथमिकता राज्य है, इसलिए हमने कांग्रेस को इतनी सीटें दी हैं. हम राज्य को ही ठीक करेंगे. राज्य ठीक रहेंगे तो देश अपने आप मजबूत होगा[/box]

दोनों में फर्क है, आप किसके पक्षधर होंगे?
विशेष राज्य दर्जे की मांग तो जारी रखनी ही चाहिए. झारखंड से सबसे ज्यादा संसाधन देश को जाता है. उसमें केवल उचित हिस्सेदारी ही हमें शुरू से मिली होती तो यह सब मांग उठाने की आज नौबत ही नहीं आती. लेकिन झारखंड से सिर्फ लेने की परंपरा बनी रही. यह तो सामान्य तौर पर समझना चाहिए. किसी गाय को पालते हैं तो उसे सही मात्रा में चारा देंगे, दाना-पानी देंगे तभी दूध दुहने के भी हकदार होंगे, वह दूध भी देगी लेकिन झारखंड को सिर्फ दुहा जाता रहा है. झारखंड को अगर उचित खाना-दाना-पानी नहीं मिला और दुहते रहने की कोशिश जारी रही तो भविष्य में स्थिति इस तरह भयावह और अराजक होगी कि उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा.

झारखंड की राजनीति में स्थानीयता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं. आप भी कभी 1932 के खतियान के आधार पर बात कहते हैं तो कभी उससे पलट जाते हैं. साफ-साफ बताएं कि आखिर स्थानीय होने का आधार क्या होना चाहिए.
मैं तो साफ मानता हूं कि जो झारखंडी हैं उनकी कोई विशिष्ट पहचान तो होनी ही चाहिए न. ताकि वे अपना विशेष हक जता सकें और उन्हें सुविधा भी दी जा सके. उसके लिए तो जमीन का खतियान (मालिकाना हक) एक सबसे मजबूत और कारगर आधार है. मैं यह नहीं कह रहा कि 1932 का ही खतियान हो, 2000 का भी हो लेकिन खतियान जरूर हो.

सिर्फ 2000 तक. उसके बाद के लोगों के लिए…
आज का भी खतियान हो तो माना जाएगा लेकिन वही आधार होगा.

चलिए, झारखंड से इतर दूसरे सवालों पर बात करते हैं. हाल ही में कोर्ट का एक आदेश आया है कि जो सजायफ्ता होंगे वे चुनाव लड़ने के अधिकारी नहीं होंगे. क्या सोचते हैं आप इस पर?
इसका मतलब तो यही हुआ कि जो गुनहगार है उसे समाज से भी बहिष्कृत कर देना चाहिए. इससे तो आम आदमी भी प्रभावित होगा. इससे तो व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होगा. आज हमारे देश का सामाजिक ढांचा ही चरमराया हुआ है. बिना उसे ठीक किए, ऐसी बातों पर सिर्फ चर्चा भर ही होती रहेगी.

राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने पर भी विवाद हो रहा है. पार्टियां तैयार नहीं हो रहीं. आपकी राय?
दुनिया भर के कानून बना देना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. वैसे कोई भी कानून हो, वह सब पर समान रूप से ही लागू होना चाहिए. चाहे वह नागरिक समूह हो, राजनीतिक समूह अथवा अराजनीतिक समूह. मैं तो यह मानता हूं कि पहले से ही जितने कानून हैं, अगर उनका सही ढंग से पालन हो तो सूचना के अधिकार की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

आजकल पीएम पद पर रोज बात होती है. कोई नरेंद्र मोदी में पीएम की संभावनाएं तलाश रहा है तो कोई नीतीश कुमार में. आपको किसमें ज्यादा संभावना दिखती है?
मीडिया पीएम मैटेरियल की तलाश में अपनी ऊर्जा लगाए हुए है तो वही बताता रहे. हम तो एक सामान्य राजनीतिक योद्धा हैं. कल कौन जीतेगा, कौन हारेगा, तब आगे की बात आगे देखी जाएगी.

रीढ पर चोट

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एक-हरिद्वार में गंगोत्री टूर ऐंड ट्रैवल्स के नाम से कंपनी चलाने वाले अर्जुन सैनी ने लोन पर खरीदी गई अपनी तीन गाड़ियां सरेंडर कर दी हैं. चार धाम यात्रा बंद है और काम बस नाम भर का ही बचा है. जब खाने के ही लाले हों तो गाड़ियों की किस्त चुकाना तो दूर की बात है. लगातार बढ़ते कारोबार के बाद सैनी ने इस साल गाड़ियों की संख्या बढ़ा कर 12 कर ली थी जिनकी अक्टूबर तक की एडवास बुकिंग भी हो चुकी थी. लेकिन 18 जून को एक ही दिन उनकी सात गाड़ियों की बुकिंग कैंसिल हो गई. तब से शुरू हुआ यह सिलसिला रुका नहीं है.

दो- टूरिस्ट गाइड प्रकाश इन दिनों ऋषिकेश स्थित अपने दफ्तर में खाली बैठे रहते हैं. दो साल से इस कारोबार में सक्रिय 29 साल के इस युवक के पास अब कोई काम नहीं है. केदारनाथ में आपदा के बाद उन्हें दिल्ली के एक 40 सदस्यीय पर्यटक दल के साथ रुद्रप्रयाग से वापस ऋषिकेश लौटना पड़ा था. इस अंतिम टूर के जरिए उन्होंने सात हजार रुपये कमाए. पिछले सीजन में  डेढ़ लाख रुपये की कमाई से उत्साहित होकर इस बार उन्होंने चार धाम यात्रा मार्ग पर बने कुछ छोटे होटलों के साथ पार्टनरशिप करते हुए 50 हजार रुपये का निवेश किया था. लेकिन इस रकम के साथ प्रकाश की आगे की योजनाएं भी आपदा के सैलाब में डूब गई हैं.

तीन- चमोली जिले के सुदूरवर्ती गांव माणा के लोग पारंपरिक तौर पर भेड़ की ऊन से गर्म कपड़े, चटाइयां और कालीन बुनने का काम करते हैं. ये लोग चारधाम यात्रा शुरू होते ही बदरीनाथ और आस-पास के इलाकों में इनकी बिक्री करते थे. छह महीने के दौरान यहां का हर परिवार हर महीने 15 से 20 हजार रु तक कमा लेता था. इससे लोगों की साल भर की रोटी का इंतजाम हो जाता था. लेकिन अब यह आमदनी लगभग ठप है.

चार- मसूरी की माल रोड पर रिक्शा चलाने वाले 45साल के जयलाल सवारी के इंतजार में टकटकी लगाए बैठे हैं. यहां कुल 125 रिक्शा चालक हैं. यात्रियों की बेहद कम आवाजाही से इस बार बमुश्किल तीन दिन बाद उनका नंबर लग पा रहा है. पिछले साल इन दिनों एक ही दिन में वे कई-कई चक्कर लगा लेते थे और शाम तक पांच से छह सौ रुपये तक की कमाई कर लेते थे. लेकिन इस बार स्थिति इतनी खराब है कि हफ्ते भर के बाद तीन-चार सौ रुपये से अधिक आमदनी नहीं हो पा रही है.

जून के दूसरे पखवाड़े उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा ने सैकड़ों मकानों,  दुकानों, सड़कों और पुलों को बहा कर पहाड़ का भूगोल ही नहीं बदला बल्कि यहां रहने वाले तमाम लोगों के वर्तमान को बदहाली और भविष्य को अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है. वर्षों से राज्य के लोगों के लिए रोजगार का सबसे बड़ा जरिया रही चार धाम यात्रा आपदा के बाद से पूरी तरह बंद है. इसके चलते बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, और यमुनोत्री जाने वाले राजमार्गों पर बसे उन कस्बों की जैसे रौनक ही खत्म हो गई है जो साल के इस समय यात्रियों और पर्यटकों से गुलजार रहते थे. सड़क किनारे बने ढाबों में खाना बनाने, गाड़ियों में पंक्चर लगाने और पालकियों और खच्चरों पर यात्रियों को ढोने वाले हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं. आपदा से बने डर के माहौल ने राज्य के बाकी हिस्सों को भी नहीं छोड़ा जबकि वहां तबाही का कोई असर नहीं था. जानकार बताते हैं कि आपदा के बाद से अब तक मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे पर्यटन एबं तीर्थ स्थलों में सैलानियों की संख्या पिछले सीजन के मुकाबले 70 फीसदी तक गिर चुकी है. नतीजतन होटल व्यवसाय से लेकर टूर ब ट्रैवल समेत दूसरे कारोबारों में भी जबरदस्त गिरावट आई है.

पिछले बारह साल में पहली बार ऐसा हुआ कि पहाड़ों की रानी कहलाने वाली मसूरी और सरोवर नगरी के नाम से प्रसिद्ध  नैनीताल के कुछ  होटलों में सोलह जून के बाद तीन-चार दिन तक एक भी पर्यटक नहीं ठहरा. इसका सीधा फर्क आमदनी पर पड़ा जिससे छोटे होटलों को अपने यहां काम करने वालों की संख्या में कटौती करनी पड़ी. उत्तराखंड होटल ऐसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष एसके कोचर  कहते हैं, ‘बड़े होटल तो फिर भी कुछ वक्त तक अपने कर्मचारियों को वेतन दे सकते हैं, लेकिन छोटे होटलों की आमदनी हैंड टू माउथ जैसी होती है लिहाजा कटौती करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता है.’ अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि राज्य के मसूरी, नैनीताल, रामनगर जैसे शहरों के अलावा बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धार्मिक स्थलों और इन तक पहुंचने वाले हाइवे पर बने छोटे-बड़े होटलों की कुल संख्या तकरीबन पांच हजार  है. इनके अलावा 20 हजार ढाबे और अन्य दुकानें भी इन जगहों पर हैं. इस आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा होगा. ऋषिकेश में होटल व्यवसायी बचन पोखरियाल कहते हैं, ’आपदा के बाद ऋषिकेश-हरिद्वार आने वाले पर्यटकों की संख्या आधी से भी कम रह गई है. अधिकांश होटलों की बुकिंग रद्द हो चुकी है.’ उनके मुताबिक अकेले ऋषिकेश में ही टूर ब ट्रैवल से लेकर गाइड का काम करने वाले लोगों की संख्या सैकड़ों में है ज आपदा के बाद पूरी तरह बेकार हो चुके हैं. चारधाम यात्रा मार्गों पर बस सेवा देने वाली कंपनी गढ़वाल मोटर्स आनर्स यूनियन का भी यही हाल है. कंपनी में पंजीकृत लगभग साढ़े छह सौ बसों में से फिलहाल पचास-साठ ही चल रही हैं. अब तक मुनाफे में चल रही कंपनी घाटे में आने के कगार पर पहुंच चुकी है. दूसरे क्षेत्रों के लोगों का भी यही दुखड़ा है. खुद सरकार भी पर्यटन उद्योग को हुए भारी-भरकम नुकसान की बात स्वीकार कर चुकी है. अब तक हुए नुकसान का साफ-साफ आंकड़ा अब तक उसके पास भी नहीं है, लेकिन इतना तय है कि इसकी भरपाई होने में लंबा वक्त लगेगा. हालांकि सरकार 30 सितंबर तक यात्रा मार्गों को खोल देने का दावा करते हुए केदारनाथ को छोड़ कर बाकी तीनों तीर्थ स्थलों की यात्रा जल्द शुरू करने की बात कह चुकी है, मगर तब तक यात्रा पर आधारित कारोबार की संभावनाएं कितनी बची रह पाएंगी, कहना मुश्किल है.

उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद अलग-अलग सरकारों ने राजस्व जुटाने के लिए यहां तीन प्रमुख क्षेत्रों उद्योग, पनबिजली परियोजना और पर्यटन इंडस्ट्री पर विशेष ध्यान देने की बात कही थी. लेकिन 15-16 जून की आपदा इन तीनों क्षेत्रों पर बिजली की तरह गिरी है. भारी  बारिश से प्रदेश की दर्जन भर पनबिजली परियोजनाओं को बड़ा नुकसान होने से बिजली का उत्पादन न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया. बिजली संकट गहराने से मैदानी इलाकों में लगे उद्योगों के उत्पादन में भी गिरावट आई. इस तरह देखें तो आमदनी के दो प्रमुख जरिये सीधे-सीधे आपदा की चपेट में आ गए.

लेकिन हजारों जिंदगियां लीलने वाली इस आपदा ने सबसे बड़ी चोट राज्य के पर्यटन और तीर्थाटन को पहुंचाई है.  उत्तराखंड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मुताबिक आपदा के बाद प्रदेश में पंजीकृत लगभग 19 हजार छोटे उद्यमों मंे काम करने वाले 40 हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो चुके हैं. इनमें वे असंगठित कामगार शामिल नहीं हैं जो पीपलकोटी, तिलवाड़ा, जोशीमठ और गौरीकुंड जैसी जगहों पर बने होटलों और ढाबों में नौकरी करने, चाय की दुकान चलाने, फूल मालाएं बनाने, गाड़ियों में हवा भरने और भुट्टा बेचने जैसे छुटपुट काम के जरिए गुजारा करते हैं. इन लोगों को भी जोड़ देने के बाद प्रभावितों का आंकड़ा एक लाख से ऊपर पहुंच जाता है.

तहलका से बात करते हुए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कहते हैं, ‘बेरोजगार हो चुके इन लोगों को सरकार बेरोजगारी भत्ते से इतर हर माह पांच सौ से लेकर एक हजार रुपये की मदद देगी.’ लेकिन ऊंट के मुंह में जीरे जैसी यह मदद भी सही हाथों तक कैसे पहुंचेगी, यह एक अहम सवाल है. दरअसल सरकार ने आपदा प्रभावितों के चिह्नीकरण की प्रक्रिया में इन लोगों के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बनाया है. वह प्रभावितों के हितों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध होने की बात भले ही कहती रहे, लेकिन चार धाम यात्रा पर आने वाले यात्रियों की तरह इन कामगारों का भी उसके पास कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है.

जानकारों के मुताबिक बेहतर तो यह होता कि इन लोगों के लिए रोजगार के नए विकल्प तलाशने की दिशा में प्रयास होते. लेकिन राहत और पुनर्वास कार्यों को लेकर पहले दिन से ही किरकिरी झेल रही सरकार ने पूरा ध्यान आपदाग्रस्त इलाकों में ही लगा दिया और इस तरह एक बड़ा तबका राहत के एजेंडे से ही बाहर हो गया. विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार का ध्यान खींचने की कोई प्रभावी कोशिश नहीं की, जबकि नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट और पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी समेत भाजपा के कई नेता इस दौरान आपदाग्रस्त इलाकों का दौरा भी कर चुके हैं. वैसे आपदाग्रस्त इलाकों में राहत अभियान पर पूरा ध्यान लगाने का सरकार क दावा भी खोखला नजर आता है. खुद मुख्यमंत्री बहुगुणा का चमोली जिले के सुदूरवर्ती विकासखंड नारायणबगड़ के आपदा प्रभाविक इलाकों का दौरा पांच बार रद्द हो चुका है. दूसरे प्रभावित इलाकों में भी सरकारी राहत अभियान की असफलताएं आए दिन सामने आ रही हैं और यही वजह है कि सामाजिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक राहत कार्यों को लेकर सरकार की खूब खिंचाई हो रही है.

यह पूरी स्थिति एक दूसरे पहलू की तरफ भी ध्यान खींचती है. राज्य बनने के 13 साल बाद भी इतनी बड़ी आबादी का आमदनी के लिए चार धाम यात्रा पर ही निर्भर रहना बताता है कि पर्यटन की असीम संभावनाओं वाले प्रदेश में रोजगार सृजन के लिए सरकारों ने किस तरह के प्रयास किए हैं. सरकारों द्वारा वैकल्पिक रोजगार की दिशा में रत्ती भर भी नहीं सोच पाने की अदूरदर्शिता का दंश झेलने को मजबूर प्रदेश के लगभग हर हिस्से में रहने वाले बेरोजगार चार-धाम यात्रा के दौरान यात्रा मार्गों से जुड़े छोटे-बड़े रोजगार से ही अपनी आमदनी चलाते रहे हैं. राज्य के पर्यटन उद्योग की रीढ़ मानी जाने वाली इस यात्रा के दौरान होने वाले कारोबार ने राज्य निर्माण के बाद तेजी से तरक्की भी की है. जनगणना विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के दौरान राज्य में 31.8 फीसदी सालाना की दर से नए भवनों का निर्माण हुआ. इन भवनों में 70 फीसदी होटल थे. हालिया आपदा के दौरान जो इमारतें ध्वस्त या क्षतिग्रस्त हुईं उनमें एक बड़ी संख्या होटलों और ढाबों की ही थी. ऐसे भवनों के मालिकों के लिए पचास हजार से लेकर एक लाख तक का मुआवजा घोषित करते हुए सरकार ने इन्हें कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन माना जा रहा है कि जब तक चार धाम यात्रा बहाल नहीं होती या फिर आमदनी के दूसरे विकल्प नहीं ढूंढे जाते तब तक लोगों की असल मुश्किलें दूर नहीं होने वाली हैं.

परंपरागत ढर्रे पर चल रहे पर्यटन व्यवसाय से इतर रोजगार के दूसरे विकल्प ढूंढ़ने में राज्य सरकारें तेरह साल बाद भी नाकाम क्यों रही हैं, यह सवाल इसलिए भी अहम है कि सरकारें उत्तराखंड को हमेशा से पर्यटन प्रदेश बताती रही हैं. राज्य बनने के बाद से लगभग हर साल प्रदेश के पर्यटन मंत्री और अधिकारी पर्यटन विकास के गुर सीखने के नाम पर कई विदेश यात्राएं कर चुके हैं. बर्लिन में प्रतिवर्ष होने वाले टूरिज्म मार्ट में हिस्सा लेने के नाम पर तो प्रदेश के नेता और नौकरशाह अब तक लाखों रुपये भी फूंक चुके हैं. लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई खर्च करके हासिल किए गए ऐसे तजुर्बों से राज्य को क्या फायदा हुआ यह कोई नहीं जानता. पर्यटन रोजगार को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना को भले ही सरकारों की तरफ से एक कारगर प्रयास बताया जाता रहा है, लेकिन इस योजना के तहत लोन लेकर होटल, ढाबे खोलने और गाड़ियां खरीदने वाले अधिकांश लोग यात्रा ठप होने के बाद किस्त चुकाने तक के मोहताज रह गए हैं. पर्यटन से जुड़े सवालों को लेकर तहलका ने जब वर्तमान पर्यटन मंत्री अमृता रावत से संपर्क करने की कोशिश की तो बताया गया कि वे ‘आउट ऑफ स्टेशन’ हैं.

इस बार की आपदा ने तो प्रदेश के प्रति पर्यटकों के विमोह के लिए सरकारी उदासीनता का बड़ा प्रमाण सामने रखा है. लंबे समय तक देश भर का मीडिया समूचे उत्तराखंड में भयंकर तबाही की खबरें दे रहा था, लेकिन इस दौरान कई दिनों तक सरकार की तरफ से एक भी बयान ऐसा नहीं आया जो यह बताता कि मसूरी, नैनीताल जैसे हिल स्टेशन पूरी तरह सुरक्षित हैं. जहां एक तरफ मुख्यमंत्री कहते रहे कि आपदा से सेना ही निपट सकती है वहीं कुछ जनप्रतिनिधि टीवी चैलनों पर दहाड़ें मार कर रोते दिखे और आपदा को नियंत्रण से बाहर बताते रहे. ऐसे में पर्यटकों का प्रदेश की तरफ रुख न करना कहीं से भी अप्रत्याशित नजर नहीं आता. हालांकि देर से जागी सरकार ने कुछ दिन पहले विज्ञापन जारी करके पर्यटकों को लुभाने की कोशिश जरूर की है जिसके परिणाम अब थोड़ा-बहुत दिखने भी लगे हैं. मसूरी और नैनीताल में हफ्ते भर से पर्यटकों की आवाजाही में कुछ बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

आपदा के बाद सरकार के इस रवैये को लेकर नाराजगी भी अब खुल कर सामने आने लगी है. मसूरी स्थित होटल पैराडाइस कौंटिनेंटल के मैनेजर सूरज थपलियाल कहते हैं, ‘मीडिया और सरकार ने इस आपदा को इस तरह से दिखाया कि पर्यटकों को केदारनाथ और मसूरी के हालात एक जैसे लगे.’ वे शिकायती लहजे में कहते हैं, ’क्या सरकार के नुमाइंदों को आपदा के बाद मसूरी नैनीताल जैसे शहरों के सुरक्षित होने की बात नहीं कहनी चाहिए थी ?’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘सरकार अब भले ही कितने भी विज्ञापन जारी कर पर्यटकों को मसूरी, नैनीताल बुला ले लेकिन जो नुकसान हो चुका है उसकी पूर्ति नहीं हो सकती.’ एक अनुमान के मुताबिक  मसूरी के पर्यटन व्यवसाय को अब तक लगभग 50 करोड़ रु की चपत लग चुकी है. उत्तराखंड होटल एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष एसके कोचर भी थपलियाल की बातों से  सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘राज्य गठन के बाद पर्यटन और होटल इंडस्ट्री ने तेजी से तरक्की की और इसकी विकास दर 30 फीसदी सालाना से भी ज्यादा थी. लेकिन इस बार आपदा की भयावहता व्यापक तौर पर इस कदर प्रचारित हुई कि लोगों ने करोड़ों रुपये की बुकिंग एक ही झटके में कैंसिल कर दी. इससे कारोबार में अब तक 80 से 90 फीसदी की गिरावट आ चुकी है.’

कोचर की बातों में एकबारगी दम भी नजर आता है क्योंकि आपदा के बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मीडिया के जरिए लोगों से उत्तराखंड का रुख न करने की अपील की थी. हालांकि जब तहलका ने उनसे इस अपील का कारण पूछा तो उनका कहना था, ‘उस वक्त सरकार का पूरा ध्यान आपदाग्रस्त इलाकों में राहत पहुंचाने पर था. हम कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे.’

दो महीने बाद भी उत्तराखंड में हाल यह है कि इस असाधारण आपदा के वास्तविक कारणों तक की पड़ताल नहीं हो सकी है. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कहते हैं कि ऐसा अप्रत्याशित बारिश के चलते हुआ जो बहुत आम-सी बात है. उधर राहत और पुनर्वास के काम पर भी आरोप लग रहे हैं कि वह ढंग से नहीं चल रहा है. चार धाम यात्रा और आमदनी के दूसरे विकल्पों को लेकर सरकार के रवैये का जिक्र पहले ही किया जा चुका है. ऐसे में सबसे तगड़ी चोट प्रदेश की रीढ़ मानी जाने वाली जिस पर्यटन इंडस्ट्री के हिस्से में आई है उस पर सरकार पर्याप्त ध्यान दे पा रही होगी, इस पर यकीन करना मुश्किल नजर आता है.

नवादा के निहितार्थ

वैसे तो बिहार में घटनाओं के घटित होने का सिलसिला पिछले डेढ़-दो माह से अनवरत जारी है लेकिन पिछले एक सप्ताह के अंदर हुई घटनाओं ने पूरी राजनीति को दूसरी दिशा में मोड़कर रख दिया है. एक घटना नवादा की और दूसरी पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया की. दोनों जगहों पर मामला एक जैसा. दो समुदाय के लोगों का आपस में टकरा जाना. बेतिया में अखाड़ा जुलूस पर पत्थरबाजी करने के बाद दोनों ओर से ईंट-रोड़े चलाने, गाली देने, कुछ गाड़ियों को आग के हवाले करने, एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देने और पुलिस-प्रशासन को कुछ देर तक दुबक जाने को मजबूर करने के बाद बात आयी-गयी होने की राह पर है. नवादा ने दो हत्याओं, दो-तीन दिनों के कर्फ्यू, दर्जन भर दुकानों की लूट और आगजनी-फायरिंग में कुछ के घायल होने के रूप में कीमत चुकायी है. दोनों शहर अब भी भय के माहौल में है, नवादा में भय की परछाईं ज्यादा गहरी है. ईद के दिन मामला एक ढाबा मालिक और कुछ नवयुवकों के बीच पैसे के लेन-देन को लेकर गाली-गलौज, हाथापाई और तोड़-फोड़ से शुरू हुई थी और अब बात नेताओं की मिलीभगत तक पहुंच गयी.

पिछली घटनाओं में जाने के पहले इस बार ईद के दिन से मचे बवाल की वजह को ही जानते हैं. बताया जा रहा है कि ईद के दिन पांच लड़के नवादा के बाबा ढाबा में पहुंचे. खाने-पीने के बाद होटल मालिक ने पैसे मांगे. नशे में धुत लड़के पैसे देने को राजी नहीं हुए. दोनों ओर से बकझक हुई, हाथापाई हुई. लड़के वहां से भाग गये. अगले दिन 20-25  लड़के होटल पर फिर पहुंचे. तोड़फोड़-मारपीट की शुरुआत हुई. ढाबा के सामने गोंदापुर नामक एक बस्ती है. वहां के लोग होटलवाले के पक्ष में आ गये. फिर जमकर मारपीट हुई. लपट नवादा शहर तक पहुंची. रोड जाम  हुआ. नारेबाजी शुरु हुई. तीन दुकानों में आग लगी, एक दुकान की लूट हुई. पुलिस ने गोली चलायी. कुंदन रजक, रामवृक्ष, मनोज, अतुल नामक चार नौजवानों को गोली लगी.

थोड़ी देर के लिए नवादा में कफ्र्यू का एलान हुआ. फिर कफ्र्यू खत्म. कुंदन की हालत गंभीर थी. उसे पटना लाया गया, नहीं बचाया जा सका. अगले दिन शाम छह बजे कुंदन की लाश नवादा पहुंची. नवादा फिर से उसी आग में समाने लगा. थोड़ा बदलाव हुआ. इस बार कहीं-कहीं नीतीश कुमार मुर्दाबाद- नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे भी लगने लगे. अगले दिन तक खबर फैली कि मो. इकबाल नामक युवक की हत्या हो गयी. नवादा फिर से कफ्र्यू के आगोश में गया. पुलिस हवाई फायरिंग कर लोगों को चैकन्ना करती रही. हवाई फायरिंग में ही वकील श्रीकांत सिंह को गोली लग गयी. लेकिन कर्फ्यू होने की वजह से कोई सड़क पर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा सका. खबरें उड़ती रही, अफवाहें टकराती रही. बयान भी आते रहे. सरकार की ओर से सीआईडी जांच के आदेश दिये गये. सूत्र बता रहे हैं कि दो नेताओं की मिलीभगत इसमें हो सकती है.

क्या होगा, क्या नहीं, यह आगे की बात है लेकिन नवादा की पड़ताल करने पर यह साफ पता चलता है कि न तो यह एक दिन में उपजी स्थितियों से उभरा आक्रोश और उसका परिणाम है न ही अब सिर्फ दो समुदायों के आपस में टकरा जाने भर का मामला रह गया है. इसके सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं, जिसकी पृष्ठभूमि लगभग एक साल पहले से नवादा में लिखी जा रही थी.

नवादा में एक साल पहले अप्रैल माह में एक ही दिन दो हत्याएं हुई थी. तौफिक इकबाल और छोटे यादव की. मामला रामनवमी के चंदे से जोड़कर बताया जाता है. करीब डेढ़ माह पहले नवादा के ही मस्तानगंज में अफजल अंसारी की हत्या भी रहस्यों के घेरे में आयी थी. उसके बाद मेस्कोर प्रखंड के अकरी गांव में एक कब्रिस्तान में झंडा गाड़ देने की खबर आई, जिसे प्रशासन ने हटाया. लेकिन आग सुलगती रही. 22 जुलाई को पकरी बरामा के कब्रिस्तान के दायरे में वर्षों पहले से स्थिच एक हिंदू आराधना स्थल को तोड़ देने की बात हवा में फैली और तनाव बढ़ता गया. बहुत दिनों में यह मामला सुलझ सका. अभी वह मामला सुलझा ही था कि ईद के बाद से नवादा भय-दहशत-जान लेने-देने की जिद और आगोश में समाया हुआ है.

कुछ दिनों में नवादा भी उपरी तौर पर शांत हो जाएगा. लेकिन कुछ सवालों को छोड़ते हुए. पहला सवाल तो यही कि नवादा जैसे छोटे से शहर को संभालने में भी क्या बिहार की पुलिस सक्षम नहीं है. क्या कभी किसी बड़े हादसे को टालने-संभालने की क्षमता नहीं है. आखिर क्यों इतने दिनों से तैयार पृष्ठभूमि के बाद एक चिंगारी से भड़की आग को प्रशासन संभाल नहीं सका. जब मामला बिगड़ा ही हुआ था तो पहली बार कर्फ्यू लगाने के बाद तुरंत हटा लेने का निर्णय क्यों लिया गया था. क्या इस वजह से कि कहीं देश-दुनिया में यह बात न फैले कि बिहार की स्थिति इतनी नाजुक है कि वहां कर्फ्यू लगाना पड़ा है. नवादा जिला सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष इकबाल हैदर खान मेजर कहते हैं- कर्फ्यू को हटा लेना बड़ी भूल थी और अब यह राजनीतिक रंग ले चुका है. वरना सिर्फ दो संप्रदायों के टकराने का मामला भर रहता तो नेताओं के नाम से नारेबाजी इतनी जल्दी क्यों होती? जदयू के नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि पिछले सात साल से जब सब ठीक चल रहा था तो डेढ़ माह बाद भाजपा के अलग होने के बाद से ही सब जगह स्थिति क्यों गड़बड़ानी शुरू हुई है.

सबके अपने बयान हैं. इसमें किसी दल की भूमिका रही है या नहीं, यह जांच के बाद साफ होगा लेकिन विपक्षियों की चटकारेबाजी वाली राजनीति और सत्ता पक्ष का लगातार चूकना, बिहार के लिए खतरनाक संकेत दे रहा है. विश्लेषक बता रहे हैं कि पिछले सात सालों में बिहार में शासन-प्रशासन पर जदयू से ज्यादा भाजपा की पकड़ मजबूत होने का भी नतीजा है कि शासन उतनी चुस्ती नहीं दिखा रहा. वैसे नवादा में यह चर्चा भी है कि वहां के स्थानीय सांसद, जो भाजपा से हैं, वे इस अराजक माहौल के बीच में भी नवादा के दायरे में आये, एक उद्घाटन समारोह में भाग लेकर वापस भी चले गये. उधर, चर्चा यह भी हो रही है कि कहीं यह अब हिंदू-मुसलमान की बजाय यादव-मुसलमान का संघर्ष न बन जाये.