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दक्षिण में दलित दमन

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23 अक्टूबर की सुबह मध्य कर्नाटक के देवनगर में स्थित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हॉस्टल में पत्रकारिता के विद्यार्थी हुचंगी प्रसाद से मिलने एक अनजान आदमी पहुंचा.

उस अनजान आदमी ने प्रसाद को बताया कि उसकी मां को दिल का दौरा पड़ा है और उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है. अजनबी ने प्रसाद से कहा कि वह उसे मां के पास ले जाने के लिए आया है. लेकिन यह एक साजिश थी. उस आदमी के साथ जाने पर हुचंगी प्रसाद को 10-12 हुड़दंगियों की भीड़ ने रास्ते में रोका और धमकाया. प्रसाद का अपराध यह था कि उन्होंने एक वर्ष पहले जाति व्यवस्था के बारे में एक ‘विवादास्पद’ किताब लिखी थी जिस पर इन हिंदुत्ववादी हुड़दंगियों की नजर हाल ही में पड़ी.

प्रसाद बताते हैं, ‘हमला करने वाले मेरी किताब को हिंदू विरोधी कहते हुए मुझे धकिया रहे थे, क्योंकि मैंने किताब में देवनगर में जाति व्यवस्था के तहत हो रहे अन्याय के बारे में लिखा था. उन्होंने चाकू बाहर निकाल कर मुझे यह कहते हुए धमकाने लगे कि वे मेरी उंगलियां काट डालेंगे, ताकि मैं कभी न लिख सकूं.’ प्रसाद किसी तरह उन हमलावरों से बचकर जंगल की तरफ भाग निकले. बचते बचाते अपने हाॅस्टल पहुंचे और पुलिस में शिकायत दर्ज की.

यह घटना लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के तीन महीने बाद और उनके निवास स्थान से महज 100 किमी. की दूरी पर घटी. उत्तर भारत में दलितों पर लगातार बढ़ते हमलों की गूंज अब दक्षिण के कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी पहुंचने लगी है. कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे केंद्र में सत्ता बदलने के साथ राजनीतिक वातावरण बदलने के परिणाम के रूप में देखते हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराध की संख्या 39,408 थी जो वर्ष 2014 में 47,064 हो गई. जबकि वर्ष 2012 में यह संख्या 33,655 थी और वर्ष 2011 में भी लगभग यही थी. इसके अलावा वर्ष 2013 में जहां 676 दलितों की हत्या हुई वहीं पिछले वर्ष दलितों की हत्या की संख्या बढ़कर 744 हो गई. आंकड़ों की इस राष्ट्रीय तस्वीर में दक्षिण भारत का योगदान बढ़ता ही जा रहा है. जातिगत भेदभाव से संबंधित प्रथाओं के संदर्भ में तमिलनाडु और कर्नाटक की स्थिति एक जैसी है. कहीं खुले और कहीं दबे रूप में हाेटलों और चाय की दुकानों में अलग गिलास रखने से लेकर मंदिरों में प्रवेश पर पाबंदी और आॅनर किलिंग तक जातिगत भेदभाव काफी गहरा है. इन ‘छुपी हुई अस्पृश्य प्रथाओं’ के कारण दलित खुद को मुख्यधारा के सार्वजनिक जीवन से काट कर रखते हैं ताकि उन्हें अपमानित न होना पड़े.

दलितों को जमीन और रोजगार की गारंटी के संबंध में सरकारों द्वारा किए गए वादे अक्सर अधूरे ही रह जाते हैं. दलितों द्वारा जमीन के लिए या फिर अपने अधिकारों के लिए किए गए दावे का अर्थ आज भी दबंग जातियों की ओर से मुसीबत को बुलावा ही होता है. दबंग जातियों से संबंधित अपराधियों को सजा देने में प्रशासन अक्सर नाकाम रहता है, परिणामस्वरूप दबंग जातियों के हौसले बढ़ते जाते हैं और दलितों पर हमले तेज हो जाते हैं.

तमिलनाडु में दलित जब-तब उच्च जातियों के कोप का भाजन बनते रहते हैं. यह राज्य उन शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है, जहां बीते पांच वर्ष में ज्यादा जातीय हिंसा हुई

बंगलुरु के सामाजिक चिंतक मोहम्मद तहसिन बताते हैं, ‘दक्षिण कन्नड़, उडुपि, हासन, मंड्या और चित्रदुर्गा में ब्राह्मणवादी वर्चस्व ज्यादा है, परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था की जकड़न भी मजबूत है. सारे राज्य में आप देखेंगे कि दलित गांव से अलग एक बस्ती में बसे हैं.’

तमिलनाडु में दलित कुल जनसंख्या का 21 प्रतिशत हैं और जब तब उच्च जातियों के कोप का भाजन बनते रहते हैं. यह राज्य उन शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है, जहां बीते पांच वर्ष में सबसे ज्यादा जातीय हिंसा हुई है. द्रविड़ राजनीति न केवल दलितों के हितों की रक्षा करने में नाकाम रही है बल्कि इसने अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों के बीच भी गहरी खाई बना दी है. अतीत की ब्राह्मण विरोधी चेतना ने धीरे-धीरे दलित विरोधी चेतना को भी हवा दी है. वोट पर नजर गड़ाए द्रविड़ पार्टियों के जातिगत मुद्दों पर अपनी आवाज नर्म करने के साथ ही अनेक जातीय समूह कुकुरमुत्ते की तरह उग आए जिनका उद्देश्य ऊंची जातियों की तथाकथित ‘शुद्धता’ को बचाए रखना है.

दलितों के राजनीतिक और नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘एविडेंस’ के प्रबंधन निदेशक ने ‘तहलका’ को बताया, ‘तमिलनाडु में कम से कम 230 प्रकार की अस्पृश्यता प्रचलन में है. हैरानी की बात है कि सरकार इसे स्वीकार नहीं करती, जबकि पिछले तीन वर्ष में आॅनर किलिंग के 73 मामले दर्ज किए जा चुके हैं.’ तमिलनाडु अनटचेबिलिटी इरेडिकेशन फ्रंट के महासचिव सैमुअल राज कहते हैं, ‘राज्य में भाजपा जातिगत भेदभाव को बढ़ावा न देने को लेकर सावधान रहती है. लेकिन केंद्र में सत्ता में आते ही तस्वीर बदलने लगती है.’ हाल ही में मदुरै में एक सार्वजनिक सम्मेलन में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और स्वदेशी जागरण मंच के अध्यक्ष एस. गुरुमुर्ति ने खुल्लमखुल्ला जाति व्यवस्था को महिमामंडित किया. इस तरह प्रोत्साहन कट्टर जातीय समूहों के हौसले बढ़ाता है और उन्हें संरक्षण भी प्रदान करता है.

जाति व्यवस्था की लोकप्रियता पढ़े-लिखे मोबाइल इस्तेमाल करने वाले नौजवानों में भी अच्छी खासी है, जैसा कि जातिवादी समूहों की सदस्यता से से साफ जाहिर होता है. ऑनर किलिंग के आरोपी युवराज नाम के एक ऐसे ही युवक को पुलिस से घिरे होने के बावजूद भीड़ का जोरदार

स्वागत मिलता है. युवराज पर ऊंची जाति की लड़की से प्रेम करने वाले दलित गोकुल राज की हत्या करने का आरोप है. सैमुअल कहते हैं, ‘पहले सभी पार्टियां जातीय हिंसा की निंदा करती थी. पेरियार, सिंगारवेलार और जीवननांदम जैसे दिग्गज लोग जाति व्यवस्था के सामने चट्टान की तरह खड़े थे. लेकिन अब केवल वामपंथी और दलित आंदोलनों में ही ये मामले उठाए जाते हैं.’

मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ डेवलपमेंटल स्टडीज में कार्यरत एसोसिएट प्रोफेसर सी. लक्ष्मणन का कहना है कि चुनावी लाभ के लिए दबंग जातियों द्वारा दलित आंदोलन में पैदा कर दिए गए मतभेद के कारण भी दलित आंदोलन कमजोर पड़ा. ‘यह भी एक कमजोर कड़ी रही. गैर सरकारी संगठनों ने मुद्दों का वि-राजनीतिकरण किया और लोगों के रोष को ठंडा करने का काम किया. इस तरह जनता के मुद्दों का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए किया.’ लक्ष्मणन शिक्षित ‘असंवेदनशील’ मध्यवर्गीय दलित वर्ग की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, ‘मुफ्त चीजें बांटने की राजनीतिक संस्कृति ने मतदाताओं के सोचने के तरीके को बदला और उन्हें अदूरदर्शी जनता में तब्दील कर दिया.’

मई माह में चित्रलेखा नाम की दलित आॅटो रिक्शा ड्राइवर ने केरल में कन्नूर जिला कलेक्ट्रेट के सामने अपने धरने के 122 दिन पूरे किए. चित्रलेखा को एदत कस्बे में ऑटो स्टैंड को इस्तेमाल करने से रोका गया. चित्रलेखा कहती हैं, ‘उन्हें यह बात स्वीकार नहीं थी कि एक महिला, वो भी एक दलित महिला वही काम करे जो वे करते हैं. इसलिए वे मुझे तंग करते हैं.’

चित्रलेखा के साथ जहां अन्याय हुआ, ठीक वैसे ही एक अन्य दलित महिला उद्यमी सौम्या देवी को केरल के कोची गांव में उद्योग के लिए जगह देने से इंकार कर दिया गया. ऐसा तब है जब सामाजिक परिदृश्य के हिसाब से केरल में अपेक्षाकृत सकारात्मक तस्वीर दिखाई देती है, और जातिगत हिंसा गाहेबगाहे होती है. इसके बावजूद इस तरह की घटनाएं दिखाती हैं कि केरल भी जातिगत भेदभाव से आजाद नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ विद्वानों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में दलितों के विरुद्ध हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

जाने-माने लेखक और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर रूपेश कुमार बताते हैं कि हालांकि केरल को अन्य दक्षिण राज्यों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता लेकिन राज्य के सामाजिक ढांचे में जातीय भेदभाव और हिंसा काफी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है. कालीकट के पेरामब्रा गांव में गवर्नमेंट वेलफेयर लोअर प्राइमरी स्कूल नाम का एक स्कूल ‘केवल दलितों के लिए’ स्कूल में तब्दील हो चुका है, क्योंकि ऊंची जातियों ने अपने बच्चों को इस स्कूल में दाखिला दिलाना बंद कर दिया है. जब ‘तहलका’ ने इस बारे में खोजबीन की तो पाया कि पिछले 10 वर्ष से परया समुदाय के अलावा किसी अन्य समुदाय के एक भी विद्यार्थी ने इस स्कूल में दाखिला नहीं लिया है.

वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक टिप्पणीकार बीआरपी भास्कर के अनुसार, ‘केरल में वर्तमान में अस्पृश्यता के मामले की शायद ही कोई शिकायत आती हो लेकिन अन्य राज्यों के मुकाबले जातीय भेदभाव अत्यंत परिष्कृत रूप में यहां प्रचलित है. दलित जनसंख्या अनेक संगठनों और नेताओं की अनुयायी है और विभाजित है.  इस तरह वह मुख्यधारा के दलों की पिछलग्गू बनी हुई है. दलित ये महसूस तो करते हैं कि वामपंथी पार्टियों ने उनके हितों की रक्षा नहीं की है, इसके बावजूद अधिकांश अब भी उन्हें ही वोट देते हैं. मुस्लिम नेतृत्व में चल रहीं वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया दलितों को अपनी ओर खींचने की पुरजोर कोशिश में हैं.’ बहरहाल, राज्य के सत्ता ढांचे में दलितों का प्रतिनिधित्व काफी कम है. वाम तथा अन्य प्रगतिशील संगठनों पर दलित अस्मिता के मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप जाता है जिसे अंततः वे एक खतरे के रूप में देखते हैं.

‘99 फीसदी लोगों को मालूम ही नहीं कि संविधान किस चिड़िया का नाम है’

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देश के संविधान ने नागरिकों से जो वादे किए थे, जो लक्ष्य रखे थे, उनमें से बहुत सारे पूरे हुए हैं, बहुत कुछ नहीं पूरे हुए. यह बड़ा सवाल है कि उनका विश्लेषण करके देखा जाए कि क्या पूरा हुआ है और क्या नहीं. मोटी सी बात है कि एक पहला वादा यह था कि गरीबी दूर होगी, अशिक्षा दूर होगी, सबको बराबरी का हिस्सा मिलेगा, लेकिन यह सब पूरा नहीं हुआ है. न गरीबी दूर हुई, न अशिक्षा दूर हुई. यह लक्ष्य अभी बहुत दूर हैं. बहुत सारी चीजें हैं जो अभी नहीं पूरी नहीं हो सकी हैं. अगर संविधान और वर्तमान परिस्थितियों का ढंग से विश्लेषण किया जाए तो स्थितियां साफ होंगी.

संविधानसभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि जो संविधान हम बनाने जा रहे हैं, हमें ये आशा है कि उसके सहारे गरीबी दूर होगी, पिछड़ापन दूर होगा, हर एक भारतीय के सर पर छत पर होगी, सबके तन पर कपड़ा होगा. अगर संविधान ये सब नहीं कर सका तो संविधान मेरे लिए कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं होगा. उस आधार पर अगर जांचें तो असफलता ही असफलता नजर आएगी. लेकिन इस संविधान के अंतर्गत हमारी उपलब्धियां भी बहुत हैं. दोनों ही पक्ष हैं, उपलब्धियां भी हैं, असफलताएं भी हैं.

उन सारे लक्ष्यों को पाने के प्रयास चल रहे हैं. हर सरकार अपने हिसाब से प्रयास करती है. मौजूदा सरकार भी प्रयास कर रही है. और हमें आशा करनी चाहिए कि वह अच्छा कर पाएगी. हमारा देश बहुत बड़ा है, बहुत बड़ी आबादी है, विविधताएं हैं, हितों के संघर्ष हैं, सबको देखते हुए समय लग सकता है लेकिन जो वर्तमान सरकारें हैं, उनकी दिशा ठीक है. देर जरूर लग रही हैं. वर्तमान सरकार से जनता में इतनी आशाएं पैदा हो गई हैं कि सबको लगता है कि देर हो रही है, जल्दी होना चाहिए, बहुत कुछ और होना चाहिए.

संविधान दिवस या आम्बेडकर दिवस मनाया जा रहा है लेकिन केवल दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं है. हमारे देश में उत्सव मनाने की, भाषण देने की और जलसे करने की प्रवृत्ति बहुत बलवती है लेकिन जब जमीन पर काम करने की बात आती है, वहां हम लोग पिछड़ जाते हैं

लोकतंत्र एक सतत प्रक्रिया है. इसमें ऐसा नहीं कह सकते कि यात्रा का अंत हो गया, ऐसा नहीं हो सकता. यह यात्रा ऐसी है कि चलती रहती है, जब तक लोकतंत्र सुरक्षित है, तब तक हमें आशावान रहना चाहिए.

यह जो सेक्युलरिज्म या समाजवाद जैसे शब्दों को संविधान की प्रस्तावना से हटाने की बातें उठ रही हैं, मैं समझता हूं कि यह कोई मुद्दा नहीं है. इन शब्दों को हटा देने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. पूरे संविधान की मूल भावना ये है कि किसी भी नागरिक के साथ जाति के आधार पर या मजहब के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं कहा जा सकता. वर्तमान सरकार की जो नीतियां हैं, वे समाजवादी तो किसी तरह से नहीं हैं. तो उन शब्दों को हटाएं या न हटाएं उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता. सवाल यह है कि अगर समाजवाद को आप बेसिक फीचर मानते हैं तो समाजवादी नीतियां होनी चाहिए. समाजवादी नीतियों को तो गुडबाय कह दिया गया है. तो ये शब्द संविधान में पड़े रहें या हटा दिए जाएं, कोई अर्थ नहीं हैं.

संविधान दिवस या आम्बेडकर दिवस मनाया जा रहा है लेकिन केवल दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं है. हमारे देश में उत्सव मनाने की, भाषण देने की और जलसे करने की प्रवृत्ति बहुत बलवती है लेकिन जब जमीन पर काम करने की बात आती है, वहां हम लोग पिछड़ जाते हैं. आप संविधान की बात कर रहे हैं, संविधान में एक भाग है नागरिकों के मूल कर्तव्य. सबसे पहला मूल कर्तव्य है कि प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य होगा कि वह संविधान का अनुसरण करे और संविधान के आदर्शों और संविधान की संस्थाओं का आदर करे. लेकिन हमारे देश में 99 फीसदी लोगों को मालूम ही नहीं है कि संविधान किस चिड़िया का नाम है. क्या संविधान है भारत का, क्या नागरिकों के अधिकार हैं, क्या मूल कर्तव्य हैं. भयंकर सांविधानिक निरक्षरता है. जो पढ़े लिखे लोग हैं, उनमें भी सांविधानिक निरक्षरता है. सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि बजाय जलसे करने और भाषण देने के, कोई ऐसी योजना सामने आनी चाहिए कि जिसके द्वारा देश के हर गांव में, हर घर में, हर व्यक्ति को संविधान के बारे में जागरूक किया जाए. सांविधानिक साक्षरता दिवस के रूप में व्यापक आंदोलन चलाया जाना चाहिए.

(लेखक लोकसभा के पूर्व महासचिव व संविधान विशेषज्ञ हैं )

राजनीतिक दलों में दलितों के लिए प्रतिबद्धता की कमी

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दलितों पर लगातार हमलों के कारण सामाजिक संरचना में ही मौजूद हैं. निचली जातियां जैसे-जैसे बेहतर स्थिति में पहुंचती हैं, जैसे-जैसे उनका सामाजिक-राजनीतिक उभार होता है तो दबंग जातियां सोचती हैं कि निचली जातियां सिर उठा रही हैं इसलिए वे हिंसक प्रतिक्रियाएं देती हैं. ऐसी घटनाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप न के बराबर है. दलित जब भी अपने अधिकार को मनवाने का साहस करता है, उस पर हमला होता है. हालांकि, यूपी में यह कम हुआ है. जहां पर राजनीतिक सशक्तिकरण कम है, वहां पर हमले ज्यादा देखने में आते हैं. हरियाणा से दलितों पर हमले की ज्यादा घटनाएं रिपोर्ट होती हैं क्योंकि हरियाणा में गैरबराबरी ज्यादा है. बराबरी के प्रयासों से सवर्ण जातियों को असुविधा होती है, इसलिए वहां ऐसा ज्यादा होता है.

दलितों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर तो बढ़ रही हैं और बढ़ती जाएंगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसमें कमी देखी जा रही है. जैसे उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाओं में कमी आई है. दलितों पर हमले की प्रवृत्ति बढ़ेगी या घटेगी, यह राजनीतिक प्रतिबद्धता से तय होता है. इस दिशा में राजनीतिक इरादे बहुत अहम हैं, जो कि फिलहाल कमजोर दिख रहे हैं. कोई भी पार्टी दलितों की स्थिति को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं. दलितों पर कहीं भी हमला होता है तो राजनीतिक पार्टियां लगभग न के बराबर प्रतिक्रिया देती हैं. कई बार तो राजनीतिक दल ऐसे हमलों को प्रोत्साहित करके और बढ़ाने की कोशिश करते हैं. जातिवाद को राजनीतिक दल वोट बैंक के चक्कर में और मजबूती देने की कोशिश करते हैं, जो जगह-जगह दलितों पर हमले और उनके खिलाफ संगठित हिंसा के रूप में दिखता है.

हाल के वर्षों में जनतंत्र ने सत्ता एवं सामाजिक संरचना के पिरामिड में उथल-पुथल मचाई है. जो सामाजिक समूह नीचे रहे हैं, वे ऊपर आए और जो ऊपर रहे हैं वे नीचे गए. हालांकि, ‘भारतीय जनतंत्र’ से ऊंच और नीच को समाप्त कर समानता लाने की अपेक्षा अब भी दूर की कौड़ी ही है. भारतीय समाज एवं राजसत्ता के शीर्ष पर ब्राह्मण और ठाकुर जैसी जातियां लंबे समय से रही हैं. शिक्षा, विकास एवं नेतृत्व से उसका एक तबका आजादी के पहले से ही जुड़ा रहा है. राममनोहर लोहिया की समाजवादी राजनीति के उभार के बाद यादव और कुर्मी जैसी मध्य जातियां एवं उत्तर प्रदेश में कांशीराम की बहुजन राजनीति के उभार के बाद दलित जातियां उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सत्ता के शीर्ष तक पहुंची हैं.

अस्सी के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उभरी राजनीति से आया सामाजिक जलजला समाज के पारंपरिक ढांचे में गुणात्मक परिवर्तन ला चुका है. दलित जातियों का उभार होने की वजह से ऊंची जातियां उनके प्रति आक्रामक होती हैं. ये हमले उसी आक्रामकता का परिणाम हैं. हालांकि, निचली जातियां जहां मजबूत हुई हैं, वहां यह प्रवृत्ति कम हुई है. उत्तर प्रदेश में अब पहले जैसे हालात नहीं हैं. अब वहां अगर दलितों पर हमले होते हैं तो निचली जातियां भी एक हद तक प्रतिक्रिया देती हैं. राजनीतिक और सामाजिक मजबूती ही दलितों के विरूद्ध हिंसा पर अंकुश लगाएगी.

(मेकिंग ऑफ दलित रिपब्लिक के लेखक )

हमारे सामाजिक ढांचे में ही खराबी है

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हर दिन कहीं न कहीं ​दलितों पर क्रूरतापूर्ण हमलों की खबरें आती हैं. आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल, हमारे पूरे समाज की संरचना ही ऐसी है कि यहां दलितों पर हमले कोई हैरानी की बात नहीं है. यह होना ही है. सत्ता में भागीदारी बढ़ने के साथ-साथ दलितों पर हमले भी बढ़े हैं. असल में हमने दलितों के सशक्तिकरण की बात तो की, लेकिन जाति को खत्म करने की जगह​ जिंदा रखा. संविधान में भी यह खेल किया गया कि आरक्षण तो मिले लेकिन जाति जिंदा रहे. जाति और धर्म की संरचना को संवैधानिक ढंग से जिंदा रखा गया है. इस पर कोई सवाल नहीं करता. जैसे आजकल कोई गाय की राजनीति पर सवाल नहीं करता, उसका अपने फायदे में कितना भी खतरनाक इस्तेमाल हो. उसी तरह संविधान की संरचना अगर जातिगत व्यवस्था को बनाए रख रही है तो कोई सवाल नहीं उठाता. यह सब ऊंंची जाति के लोगों की चाल थी कि जाति व्यवस्था जिंदा रहे. जाति जब तक जिंदा है, तब तक दलितों के साथ छुआछूत, भेदभाव और हिंसक हमले होते रहेंगे.

आम्बेडकर का मिशन जाति का जड़ से खात्मा था ताकि एक ऐसा समाज बनाया जा सके जो आजादी, बराबरी और भाईचारे पर आधारित हो. लेकिन आम्बेडकर के लिए जितने प्यार का दिखावा किया जाता है, उतनी ही हिकारत उनके सपनों को लेकर बनी हुई है. जातियों को भूल जाइए, जिन्हें संविधान में जज्ब कर दिया गया था और जिन्हें ऊपर से लेकर नीचे तक पूरे समाज को अपनी चपेट में लेना था; छुआछूत जिसको असल में गैरकानूनी करार दिया गया था, अब भी अपने सबसे क्रूर शक्ल में मौजूद है. हाल में कई सर्वे रिपोर्ट में छुआछूत की दहला देने वाली घटनाएं उजागर हुई हैं. असल में छुआछूत जाति का महज एक पहलू है और जातियां बनी रहीं तो छुआछूत भी कभी खत्म नहीं होगी. आम्बेडकर का आजादी, बराबरी और भाईचारे का आदर्श बहुत दूर है और हरेक गुजरते हुए दिन के साथ यह और भी दूर होता जा रहा है. आज भारत की गिनती दुनिया के सबसे गैरबराबरी वाले समाज में होती है! एक जातीय समाज में भाईचारा वैसे भी कल्पना से बाहर की बात है, 1991 के बाद के नए जातीय भारत में तो और भी कल्पनातीत हो गया है.

विकास का ऐसा कोई पैमाना नहीं है, जिसमें दलितों और गैरदलितों (बदकिस्मती से इसमें मुसलमान भी शामिल हैं, जिनकी दशा दलितों जितनी ही खराब है) के बीच की खाई बढ़ी नहीं है. इस खाई की सबसे चिंताजनक विशेषता यह है कि यह पहले चार दशकों के दौरान घटती हुई नजर आई, जबकि नवउदारवादी सुधारों को अपनाने के बाद से यह बड़ी तेज गति से और चौड़ी हुई है. इन नीतियों ने दलितों को कड़ी चोट पहुंचाई है और उन्हें हर मुमकिन मोर्चे पर हाशिये पर धकेला है. अगर उत्पीड़नों को जातीय चेतना के प्रतिनिधि के रूप में लिया जाए तो कोई भी इस नतीजे पर पहुंचने से नहीं बच सकता कि पिछले नवउदारवादी दशकों में जातीय चेतना अभूतपूर्व गति और तेजी से बढ़ रही है.

1968 में तमिलनाडु के किल्वेनमनी में, जहां 44 दलित औरतों और बच्चों को जिंदा जला दिया गया था, वहां दलित हिंसा अपनी नई शक्ल में सामने है. आंध्र प्रदेश (करमचेडु, चुंदरू) के बदनाम अत्याचारों, बिहार के दलित जनसंहारों ने यह साफ है कि राज्य दलितों के खिलाफ जातिवादी अपराधियों को शह दे रहा है. 1996 में बथानी टोला जहां 21 दलितों की हत्या कर दी गई, 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे जहां 61 लोगों को काट डाला गया, 2000 में मियांपुर जहां 32 लोग मारे गए, नगरी बाजार जहां 10 लोगों की 1998 में हत्या कर दी गई और शंकर बिगहा जहां 1999 में 22 दलितों का जनसंहार किया गया था. हरियाणा दलितों पर अत्याचार के लिए बदनाम है जहां मिर्चपुर जैसी भयावह घटनाएं हुईं.

ज्यादातर लोग इन समस्याओं का सतही ढंग से आकलन करते हैं, जबकि सतह पर देखने से चीजें साफ नहीं होंगी न ही उनके उपाय हो सकेंगे. हमारे सामाजिक ढांचे में ही खराबी है. संविधान कहता है कि छुआछूत नहीं होनी चाहिए, लेकिन समाज में आज भी छुआछूत जारी है. उसे खत्म नहीं किया जा सका क्योंकि जाति के उन्मूलन की बात ही नहीं हुई. जो उपाय किए गए, वे जाति को जिंदा रखकर किए गए और वही आज भी हो रहा है.

संविधान बनने के बाद शुरुआत में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए नहीं की गई थी कि लोग जातीय रूप से पिछड़े हैं, ​बल्कि इसलिए ​की गई ​थी कि वे सामाजिक-आर्थिक ढांचे से बाहर हैं. वे वंचित हैं इसलिए आरक्षण दिया गया था. आम्बेडकर ने जाति उन्मूलन की बात की थी, लेकिन वे असफल रहे. देखिए, आरक्षण दलित-वंचित तबके को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक तो है लेकिन वह कोई पैनाशिया (रामबाण) नहीं है कि सारी समस्याएं उसी से ठीक हो जाएंगी.

संविधान कहता है कि छुआछूत नहीं होनी चाहिए, लेकिन समाज में आज भी छुआछूत जारी है. क्योंकि जाति के उन्मूलन की बात ही नहीं हुई

दलितों की स्थिति सुधारने की दिशा में आरक्षण कोई खास मदद नहीं कर पाया है. आप जायजा लेकर तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं. दलित समुदाय के लोग जहां थे, वे वहीं हैं. आरक्षण की नूराकुश्ती से उन्हें कोई लाभ नहीं मिला, क्योंकि इस तंत्र की संरचना में खराबी है, जो वंचितों को आगे नहीं आने देती. पहले यह था कि लोग वर्ण व्यवस्था के मुताबिक रहते थे, उनमें छुआछूत आदि तो थी, लेकिन शोषणकारी व्यवस्था के बावजूद समाज एक-दूसरे की मदद पर निर्भर था. जबसे वंचित-दलित तबके पावर शेयरिंग में शामिल होने लगे, ऊंची जातियां आक्रामक होने लगीं. शहरों में हालत उतनी बुरी नहीं है, जितनी गांवों में है. ऊंची जातियों के लोग लगातार दलितों पर हमले कर रहे हैं और राजनीति इसमें कोई अंतर नहीं ला पा रही है. आज के दलित नेता और दलितों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टियां बिचौलिया बनकर रह गए हैं. ​दलितों के नाम पर कई पार्टियां बनीं, कई नेता सक्रिय हैं, लेकिन उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं दिखती. उत्तर प्रदेश में मायावती और कांशीराम ने अच्छी मंशा के साथ काम किया लेकिन यह तंत्र ऐसा है कि वे लोग कुछ नहीं कर सके. मायावती भी कांग्रेस और भाजपा के बीच उलझकर रह गईं. ​दलित राजनीति भी अभी संघर्ष की हालत में है. उसे तमाम चालबाजियों से निपटना है.

दलित समुदाय के लिए फिलहाल कोई राष्ट्रीय आवाज नहीं है. क्योंकि जब आप कहते हैं दलित तो इसका मतलब कोई एक ​जाति नहीं है. जाति तो चमार है, पासी है, कोयरी है. दलित शब्द उस पूरे समुदाय को संबोधित है जिसके तहत तमाम वंचित जातियां हैं. उनको एकत्र करने की ​आवश्यकता है. एक ऐसा केंद्रबिंदु तैयार किया जाना चाहिए जहां पर दलित समुदाय को मोबलाइज किया जा सके. जहां तक हालात में बदलाव का सवाल है तो हमारा ऐसा मानना है कि बदलाव आएगा. लेकिन वह किसी की वजह से नहीं आएगा. बदलाव समय की मांग है. इसलिए आएगा. नई पीढ़ी ज्यादा प्रगतिशील है और वह तमाम पुराने ढांचों को तोड़ रही है. इसलिए आशा की जानी चाहिए कि समय के हिसाब से जाति खत्म होगी.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

संघ के गले में अटक जाएंगे आम्बेडकर

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राष्ट्र निर्माता के रूप में बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर की विधिवत स्थापना का कार्य 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की राजपत्र में की गई घोषणा के साथ संपन्न हुआ. संविधान दिवस संबंधी भारत सरकार के गजट में सिर्फ एक ही शख्सियत का नाम है और वह नाम स्वाभाविक रूप से बाबा साहेब का है. बाबा साहेब को अपनाने की भाजपा और संघ की कोशिशों का भी यह चरम रूप है लेकिन क्या इस तरह के अगरबत्तीवाद के जरिए बाबा साहेब को कोई संगठन आत्मसात कर सकता है? मुझे संदेह है.

इस संदेह का कारण मुझे आम्बेडकरी विचारों और उनके साहित्य में नजर आता है.

इस बात की पुष्टि के लिए मैं बाबा साहेब की सिर्फ एक किताब ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ का संदर्भ ले रहा हूं. याद रहे कि यह सिर्फ एक किताब है. पूरा आम्बेडकरी साहित्य ऐसे लेखन से भरा पड़ा है, जो संघ को लगातार असहज बनाएगा. ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ पहली बार 1936 में छपी थी. दरअसल, यह एक भाषण है, जिसे बाबा साहेब ने लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के 1936 के सालाना अधिवेशन के लिए तैयार किया था. लेकिन इस लिखे भाषण को पढ़कर जात-पात तोड़क मंडल ने पहले तो कई आपत्तियां जताईं और फिर कार्यक्रम ही रद्द कर दिया. इस भाषण को ही बाद में ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ नाम से छापा गया.

दूसरे संस्करण की भूमिका में बाबा साहेब इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा.

जाहिर है कि बाबा साहेब के लिए यह किताब एक डॉक्टर और मरीज यानी हिंदुओं के बीच का संवाद है. इसमें ध्यान रखने की बात है कि जो मरीज है, यानी जो भारत का हिंदू है, उसे या तो मालूम ही नहीं है कि वह बीमार है या फिर वह स्वस्थ होने का नाटक कर रहा है और किसी भी हालत में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि वह बीमार है. बाबा साहेब की चिंता यह है कि वह बीमार आदमी दूसरे लोगों के लिए खतरा बना हुआ है. संघ उसी बीमार आदमी का प्रतिनिधि संगठन होने का दावा करता है. वैसे यह बीमार आदमी कहीं भी हो सकता है. कांग्रेस से लेकर समाजवादी और वामपंथी तक उसके कई रूप हो सकते हैं लेकिन वह जहां भी है, बीमार है और बाकियों के लिए दुख का कारण है.

बीमार न होने का बहाना करता हुआ हिंदू कहता है कि वह जात-पात नहीं मानता. लेकिन बाबा साहेब की नजर में ऐसा कहना नाकाफी है. वे इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं कि भारत में कभी क्रांति क्यों नहीं हुई. वे बताते हैं कि कोई भी आदमी आर्थिक बराबरी लाने की क्रांति में तब तक शामिल नहीं होगा, जब तक उसे यकीन न हो जाए कि क्रांति के बाद उसके साथ बराबरी का व्यवहार होगा और जाति के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं होगा. इस भेदभाव के रहते भारत के गरीब कभी एकजुट नहीं हो सकते.

वे कहते हैं कि आप चाहे जो भी करें, जिस भी दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश करें, जातिवाद का दैत्य आपका रास्ता रोके खड़ा मिलेगा. इस राक्षस को मारे बिना आप राजनीतिक या आर्थिक सुधार नहीं कर सकते. डॉक्टर आम्बेडकर की यह पहली दवा है. क्या संघ इस कड़वी दवा को पीने के लिए तैयार है? जातिवाद के खात्मे की दिशा में संघ ने पहला कदम नहीं बढ़ाया है. क्या वह आगे ऐसा करेगा? मुझे संदेह है.

डॉ. आम्बेडकर के मुताबिक जाति ने भारतीयों की आर्थिक क्षमता को कुंद किया है. इससे नस्ल बेहतर होने की बात भी फर्जी सिद्ध हुई है क्योंकि नस्लीय गुणों के लिहाज से भारतीय लोग सी3 श्रेणी के हैं और 95 प्रतिशत भारतीय लोगों की शारीरिक योग्यता ऐसी नहीं है कि वे ब्रिटिश फौज में भर्ती हो सकें. बाबा साहेब आगे लिखते हैं कि हिंदू समाज जैसी कोई चीज है ही नहीं. हिंदू मतलब दरअसल जातियों का जमावड़ा है. इसके बाद वे एक बेहद गंभीर बात बोलते हैं कि एक जाति को दूसरी जाति से जुड़ाव का संबंध तभी महसूस होता है, जब हिंदू-मुसलमान दंगे हों. संघ के मुस्लिम विरोध के सूत्र बाबा साहेब की इस बात में छिपे हैं. वह जाति को बनाए रखते हुए हिंदुओं को एकजुट देखना चाहता है, इसलिए हमेशा मुसलमानों का विरोध करता रहता है. दंगों को छोड़कर बाकी समय में हिंदू अपनी जाति के साथ खाता है और जाति में ही शादी करता है.

डॉ. आम्बेडकर बीमार हिंदू की नब्ज पर हाथ रखकर कहते हैं कि आदर्श हिंदू उस चूहे की तरह है, जो अपने बिल में ही रहता है और दूसरों के संपर्क में आने से इंकार करता है. इस किताब में बाबा साहेब साफ शब्दों में कहते हैं कि हिंदू एक राष्ट्र नहीं हो सकते. क्या संघ के लिए ऐसे आम्बेडकर को आत्मसात कर पाना मुमकिन होगा. मुझे संदेह है.

बाबा साहेब यह भी कहते हैं कि ब्राह्मण अपने अंदर भी जातिवाद पर सख्ती से अमल करते हैं. वे महाराष्ट्र के गोलक ब्राह्मण, देवरूखा ब्राह्मण, चितपावन ब्राह्मण और भी तरह के ब्राह्मणों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उनमें असामाजिक भावना उतनी ही है, जितनी कि ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच है. वे मरीज की पड़ताल करके बताते हैं कि जातियां एक-दूसरे से संघर्षरत समूह हैं, जो सिर्फ अपने लिए और अपने स्वार्थ के लिए जीती हैं. वे यह भी बताते है कि जातियों ने अपने पुराने झगड़े अब तक नहीं भुलाए हैं. गैर-ब्राह्मण इस बात को याद रखता है कि किस तरह ब्राह्मणों के पूर्वजों ने शिवाजी का अपमान किया था. आज का कायस्थ यह नहीं भूलता कि आज के ब्राह्मणों के पूर्वजों ने उनके पूर्वजों को किस तरह नीचा दिखाया था.

संघ के संगठन शुद्धि का अभियान चला रहे हैं. बाबा साहेब का मानना था कि हिंदुओं के लिए यह करना संभव नहीं है. जाति और शुद्धिकरण अभियान साथ-साथ नहीं चल सकते. इसका कारण वे यह मानते हैं कि शुद्धि के बाद बाहर से आए व्यक्ति को किस जाति में रखा जाएगा, इसका जवाब किसी हिंदू के पास नहीं है. जाति में होने के लिए जाति में पैदा होना जरूरी है. यह क्लब नहीं है कि कोई भी मेंबर बन जाए. वे स्पष्ट कहते हैं कि धर्म परिवर्तन करके हिंदू बनना संभव नहीं है क्योंकि ऐसे लोगों के लिए हिंदू धर्म में कोई जगह नहीं है. क्या भारत का बीमार यानी हिंदू और कथित रूप से उनका संगठन आरएसएस, बाबा साहेब की बात मानकर शुद्धिकरण की बेतुका कोशिशों को रोक देगा? मुझे संदेह है.

अगर कोई हिंदू जाति से लड़ना चाहता है तो उसे अपने धार्मिक ग्रंथों से टकराना होगा. बाबा साहेब कहते हैं कि शास्त्रों और वेदों की सत्ता को नष्ट करो

हिंदू के नाम पर राजनीति करने वाले संगठन यह कहते नहीं थकते कि हिंदू उदार होते हैं. बाबा साहेब इस पाखंड को नहीं मानते. उनकी राय में, मौका मिलने पर वे बेहद अनुदार हो सकते हैं और अगर वे किसी खास मौके पर उदार नजर आते हैं, तो इसकी वजह यह होती है कि या तो वे इतने कमजोर होते हैं कि विरोध नहीं कर सकते या फिर वे विरोध करने की जरूरत महसूस नहीं करते.

बाबा साहेब इस किताब में गैर-हिंदुओं के जातिवाद की भी चर्चा करते हैं, लेकिन इसे वे हिंदुओं के जातिवाद से अलग मानते हैं. वे लिखते हैं कि गैर-हिंदुओं के जातिवाद को धार्मिक मान्यता नहीं है. लेकिन हिंदुओं के जातिवाद को धार्मिक मान्यता है. गैर-हिंदुओं का जातिवाद एक सामाजिक व्यवहार है, कोई पवित्र विचार नहीं है. उन्होंने जाति को पैदा नहीं किया. अगर हिंदू अपनी जाति को छोड़ने की कोशिश करेगा तो उनका धर्म उसे ऐसा करने नहीं देगा. वे हिंदुओं से कहते हैं कि इस भ्रम में न रहें कि दूसरे धर्मों में भी जातिवाद है. वे हिंदू श्रेष्ठता के राधाकृष्णन के तर्क को खारिज करते हुए कहते हैं कि हिंदू धर्म बेशक टिका रहा, लेकिन उसका जीवन लगातार हारने की कहानी है. वे कहते हैं कि अगर आप जाति की बुनियाद पर कुछ भी खड़ा करने की कोशिश करेंगे तो उसमें दरार आना तय है.

अपने न दिए गए भाषण के आखिरी हिस्से में बाबा साहेब बताते हैं कि हिंदू व्यक्ति जाति को इसलिए नहीं मानता कि वह अमानवीय है या उसका दिमाग खराब है. वह जाति को इसलिए मानता है कि वह बेहद धार्मिक है. जाति को मान कर वे गलती नहीं कर रहे हैं. उनके धर्म ने उन्हें यही सिखाया है. उनका धर्म गलत है, जहां से जाति का विचार आता है. इसलिए अगर कोई हिंदू जाति से लड़ना चाहता है तो उसे अपने धार्मिक ग्रंथों से टकराना होगा. बाबा साहेब भारत के मरीज को उपचार बताते हैं कि शास्त्रों और वेदों की सत्ता को नष्ट करो. यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि शास्त्रों का मतलब वह नहीं है, जो लोग समझ रहे हैं. दरअसल शास्त्रों का वही मतलब है जो लोग समझ रहे हैं और जिस पर वे अमल कर रहे हैं. क्या संघ हिंदू धर्म शास्त्रों और वेदों को नष्ट करने के लिए तैयार है? मुझे शक है.

इस भाषण में वे पहली बार बताते हैं कि वे हिंदू बने रहना नहीं चाहते. संघ को बाबा साहेब को अपनाने का पाखंड करते हुए, यह सब ध्यान में रखना होगा. क्या राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ बाबा साहेब को अपना सकता है? बेशक. लेकिन ऐसा करने के बाद फिर वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं रह जाएगा.

सामाजिक प्रगतिशीलता के बहुत से प्रश्नों पर संघ और बाबा साहेब में समानता रही है

Rakesh Sinha Article web

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आजादी से पहले मुख्य प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र में था और सामाजिक रूढ़िवादिता के बीच में संघ ने प्रतिक्रियावादी सामाजिक प्रथाओं का जमकर विरोध किया. उसके दो उदाहरण हैं. पहला, जब महात्मा गांधी कौतूहलवश 1934 में संघ के शिविर में आए तो उन्होंने पाया कि ब्राह्मण और महार जाति के स्वयंसेवक एक साथ सहजता के साथ शिविर में रह रहे हैं. बाबा साहेब इसी महार जाति से थे. इसी कारण से बाबा साहेब का भी संघ के प्रति आकर्षण हुआ और वे 1938 में पुणे में संघ के शिविर में आए भी थे. उनके सामाजिक प्रगतिशीलता के बहुत से प्रश्नों पर संघ और बाबा साहेब में समानता रही है. इसी कारण संघ ने बाबा साहेब को साठ के दशक में ही महापुरुषों के प्रातः स्मरणीय नामों में जोड़ा है. जब उन पर अरुण शौरी ने ‘वर्शिपिंग फॉल्स गॉड’ नामक पुस्तक लिखी तो संघ के बड़े सिद्धांतकार दत्तोपंत ठेंगड़ी ने ‘डॉ. आम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ नामक पुस्तक लिखी. इसी प्रकार जब बाबा साहेब की 125वीं जयंती आई तो संघ ने उसे बड़े पैमाने पर मनाने का निर्णय लिया. सामाजिक अंतर्विरोधों और प्रतिक्रियावाद का विरोध संघ के सामाजिक दर्शन का अंग रहा है. यही कारण है कि संघ अंतरजातीय विवाहों और जातिविहीन समाज के लक्ष्य के प्रति हमेशा सकारात्मक रहा है. बाबा साहेब की विचारधारा में अनेक ऐसी बातें हैं जो उन्होंने तात्कालिक राजनीति और समकालीन सामाजिक प्रतिक्रियावाद के प्रत्योत्तर में कहा था. लेकिन उनमें जो मूलदृष्टि है उसकी दीर्घकालिक उपयोगिता है और उसके भाव से संघ की विचारधारा की निकटता है.

इसका दूसरा उदाहरण संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कथन है जिसमें उन्होंने कहा था कि धार्मिक शास्त्रों को वैज्ञानिक मूल्यों और मापदंड के आधार पर देखा जाना चाहिए. संघ की सामाजिक प्रगतिशीलता का एक और उदाहरण है. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों के साथ जाकर एक शादी के मंडप में हो रहे बेमेल विवाह को रोका और लड़की को मंडप से उठाकर बाल विवाह से बचा लिया था. संघ महापुरुषों को जाति या राजनीति की सीमा में नहीं देखकर उनके मूल्यों का उपयोग सामाजिक समरसता के लिए करता है. फिर चाहे वे आम्बेडकर हों, गांधी हों या नारायण गुरु.

(लेखक संघ विचारक हैं)

आम्बेडकर की डगर पर दलित राजनीति का सफर

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Photo- Pramod Singh

‘राजनीतिक सत्ता सभी समस्याओं के समाधान की चाबी है’

-डॉ. भीमराव आम्बेडकर

बदलाव राजनीति की सबसे बड़ी खूबी है. वोट बैंक के लिए यहां समय-समय पर नायक भी बदले जाते हैं. राजनीतिक दल अपनी सुविधा के हिसाब से देश के नायकों पर अपनी दावेदारी जताते रहते हैं. संविधान दिवस के मौके पर सदन में हुई बहस को देखकर लगता है भीमराव आम्बेडकर सभी राजनीतिक दलों की जरूरत बन गए हैं. वैसे ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है. आम्बेडकर ने खुद भी राजनीतिक दल बनाए थे और बहुत सारे राजनीतिक दलों ने उनके नाम पर अपनी रोटियां भी सेंकी हैं. भारत में आम्बेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं. उन्होंने ही सबसे पहले वर्ष 1936 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनाई. वर्ष 1942 में उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की स्थापना की.

उन्होंने 1956 में फेडरेशन को भंग करके रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की घोषणा की जो तीन अक्टूबर, 1957 को अस्तित्व में आई. इस पार्टी ने 1957 में चुनाव लड़ा और इसे सफलता मिली. लेकिन 1970 तक आते आते यह पार्टी कई गुटों में बंट गई. वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक अरुण कुमार त्रिपाठी कहते है, ‘आम्बेडकर अपने जीवन में राजनीतिक रूप से बेहद असफल रहे. राजनीति में वे कांग्रेस के सामने कभी चल नहीं पाए लेकिन एक समय के बाद जब कांग्रेस से दलितों का मोहभंग हुआ, तब से उनके अनुयायियों ने उनके नाम पर बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की. वह वैचारिक रूप से बहुत ही ज्यादा सफल रहे और आज देश के सबसे बडे़ हिस्से के मसीहा के रूप में हमारे सामने हैं. अब वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमने वाली चुनावी राजनीति ने धीरे-धीरे आम्बेडकर को एक प्रतीक बना दिया.’

आम्बेडकर के नाम पर राजनीति की शुरुआत

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के पतन के बाद महाराष्ट्र में दलित पैंथर और उत्तर भारत के कई इलाकों में अपने सम्मान के लिए दलित संगठनों का उग्र आंदोलन शुरू हुआ. इसी दौर में दलित राजनीति में कांशीराम ने काम शुरू किया. उन्होंने सबसे पहले बामसेफ, बाद में डीएस फोर तथा अंत में 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के नाम से एक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की और आम्बेडकर के नाम पर राजनीति करनी शुरू की. आज जितनी भी दलित राजनीतिक पार्टियां हमारे सामने मौजूद हैं, उनमें बहुजन समाज पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है. कांशीराम को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी और दलित पैंथर के बाद मृतप्राय दलित राजनीति में प्रेरणा शक्ति का संचार किया. बसपा के अलावा बिहार में रामविलास पासवान के नेतृत्व में दलित एकजुट हुए. इसी दौरान और भी कई दलित पार्टियां जैसे बाल कृष्ण सेवक की यूनाइटेड सिटीजन और उदित राज की जस्टिस पार्टी आदि के अलावा दक्षिण की कई पार्टियों ने आम्बेडकर के नाम पर जमकर राजनीति की.

इन सारे नेताओं ने अपनी राजनीति का आधार ही डॉक्टर आम्बेडकर  को बनाया. मायावती ने आम्बेडकर के नाम पर स्मारकों की लाइन लगा दी. देश में आम्बेडकर जयंती को जश्न की तरह मनाने की परंपरा शुरू हो गई. इन नेताओं ने आम्बेडकर के नाम पर खुद को दलितों का शुभचिंतक बताने की कोशिश की गई और उन्हें इसका फायदा भी मिला. हालांकि इन सारे दलों द्वारा की राजनीति से दलितों का भला होने की बात पर लेखक और जेएनयू में प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं, ‘आम्बेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने दलितों को उतना फायदा नहीं पहुंचाया है, जितने के वे हकदार थे.’ वैसे डॉ. आम्बेडकर  ने 1952 में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की मीटिंग में राजनीतिक पार्टी की भूमिका की व्याख्या करते हुए कहा था, ‘राजनीतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता, बल्कि यह लोगों को शिक्षित करने, उद्वेलित करने और संगठित करने का होता है.’

किस ठौर पहुंची दलित राजनीति

अपने उदय के साथ ही दलित राजनीतिक दलों ने दूसरे दलों के साथ गठजोड़ करने से कभी गुरेज नहीं किया. बहुजन समाज पार्टी ने समाजवादी पार्टी के अलावा भाजपा से तीन बार गठजोड़ किया. आज पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी है तो लोकसभा में उसका कोई भी सांसद नहीं है. एक दूसरे दलित नेता रामविलास पासवान ने भाजपा के साथ गठबंधन किया है. इसके अलावा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास अठावले हैं जिन्होंने भीमशक्ति और शिवशक्ति को मिलाने की चाह में पहले तो शिवसेना से गठजोड़ किया और अब शिवसेना-भाजपा के सहारे अपने लिए राज्यसभा में सीट पा ली है. वहीं दलित नेता उदित राज भाजपा में शामिल हो गए हैं. इन दलों की आलोचना करने वालों का कहना है कि भारत में दलित राजनीति जातिवाद, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार और दिशाहीनता का शिकार हो गई है.

लेखक और विचारक कंवल भारती कहते है, ‘इन दलों और नेताओं के लिए आम्बेडकर ऐसे चेक बन गए हैं, जिसे वे जब चाहें भुना सकते हैं. इन दलों को आम्बेडकर के विचारों से कुछ लेना-देना नहीं है या यूं कहें इन्हें आम्बेडकर की विचारधारा की एबीसी भी नहीं पता है. यह किसी भी तरह से आंबडेकर और दलितों के हित में नहीं है. उन्होंने हमेशा दलित वर्ग की बात की, लेकिन आज के दौर में सारे राजनीतिक दल जातियों की बात कर रहे हैं और हर दल किसी जाति का प्रतिनिधित्व कर रहा है. आम्बेडकर ने खुद ही कहा था जाति के नाम पर आप कोई भी निर्माण अखंड नहीं रख पाएंगे. देश को हिंदू राष्ट्र बनाने से आम्बेडकर ने आपत्ति जताई थी, ये दल उसी हिंदू राष्ट्र की वकालत करने वाली विचारधारा से गठजोड़ कर रहे हैं, यह आम्बेडकर के विचारों की हत्या है. इन दलों के नेता अपने निजी स्वार्थ के चलते ऐसा कर रहे हैं.’

‘आम्बेडकर सत्ता से तो जुड़े, लेकिन एक बड़े मकसद के लिए. वे सत्ता में रहे, तो पूरे दलित समुदाय को मजबूत किया. कांशीराम भी सत्ता से जुड़े, लेकिन दलाली के लिए’

हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे इससे इतर राय रखते हैं, ‘जो आम्बेडकर की राजनीति और विचारों में अपनी जरूरत के हिसाब से संशोधन करने में सफल रहा वह दलित राजनीति में आगे गया. वहीं जो आम्बेडकर के किताबी ज्ञान में उलझा रहा वह असफल हो गया. कांशीराम जो मायावती के गुरु थे, उन्होंने आम्बेडकर के विचारों में अपने हिसाब से बदलाव किया. आम्बेडकर ने कहा था जाति को तोड़ देना चाहिए, तो कांशीराम ने कहा कि जातियों को मजबूत किया जाना चाहिए, क्योंकि हमें जातियों के जरिये ही नुमाइंदगी मिलती है. इस वजह से ही बहुजन समाज पार्टी आगे बढ़ी. जहां तक सवाल दलित दलों द्वारा सत्ता के लिए किए जाने वाले गठजोड़ का है तो आम्बेडकर ने खुद ही कहा था कि राजसत्ता मास्टर चाबी है, उसे प्राप्त करना है. इसी को कांशीराम ने कहा कि राजसत्ता मास्टर चाबी है. उन्होंने उसी को ध्यान में रखा. बहुजन समाज पार्टी ने इसी को ध्यान में रखा. वह हमेशा चुनाव के समय सक्रिय होती है. आम्बेडकर खुद हमेशा सत्ता के साथ रहे. जब अंग्रेजों की सत्ता थी तो वह उनके साथ रहे और जब कांग्रेस की सत्ता आई तो वह उसके कैबिनेट में शामिल हो गए. वे जानते थे कि राजसत्ता के साथ ही रहकर वे दलितों का उद्धार कर सकते हैं. वर्तमान दौर में भी दलित राजनीति बहुत ही कामयाब है. इसने भारतीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता सिद्ध कर दी है. आज दलित राजनीतिक दलों से दूसरे बड़े दलों को गठबंधन करना पड़ रहा है. उन्हें पूरी भागीदारी देनी पड़ रही है.’

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वहीं बद्री नारायण कहते हैं, ‘भीमराव आम्बेडकर सत्ता के साथ तो जुड़े, लेकिन वह एक बड़े मकसद के लिए था. वह सत्ता में रहे, तो पूरे दलित समुदाय को मजबूत बनाया. कांशीराम भी सत्ता के साथ जुड़े, लेकिन वह दलाली के लिए था.’

कुछ ऐसी ही राय कंवल भारती की भी है. वे कहते हैं, ‘जब आम्बेडकर ने राजनीति की, उस समय दलित चेतना-शून्य थे, उनकी कोई राजनीतिक समझ नहीं थी और हिंदू समाज उन्हें कोई भी अधिकार देने को तैयार नहीं था. ऐसे समय में जब आम्बेडकर अंग्रेजों से मिले, तो वह मंत्रिपद या अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं गए थे, वे पूरे समुदाय के हित के लिए गए थे. लेकिन आज के हालात दूसरे हैं. आज के नेता अपने हितों के चलते दलितों के हितों को ताक पर रख देते हैं.’

हालांकि अरुण कुमार त्रिपाठी दलित राजनीतिक दलों की सत्ता में हिस्सेदारी को गलत नहीं मानते हैं. उनका कहना है, ‘जब तक आप सत्ता में नहीं आएंगे, तब तक आप सामाजिक बदलाव नहीं ला पाएंगे. दलितों के लिए स्थितियां देश में आज भी बहुत ही अच्छी नहीं है. उत्तर प्रदेश को छोड़कर दलित राजनीतिक दल अपने दम से सत्ता में आने की स्थिति में कहीं नहीं आए हैं. ऐसे में उन्हें गठबंधन का सहारा लेना पड़ता है. गठबंधन बनाने पर दूसरे दल भी फायदा ले जाते हैं. दलित दलों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है. वैसे भी सत्ता में आने से दलितों में स्वाभिमान का विकास होता है, मुझे नहीं लगता कि सत्ता के लिए गठबंधन करने वाले दलित दलों को गलत कहना सही होगा.’

गठबंधन और दलित राजनीति से जुड़े सवाल पर भाजपा के सांसद उदित राज कहते हैं, ‘आम्बेडकर के नाम पर की गई दलित राजनीति अभी अधूरी है. अभी हमें लंबी लड़ाई लड़नी है. वैसे भी जातिवादी समाज में अपनी पार्टी खड़ी करना मुश्किल काम है. ऐसी परिस्थिति में यदि हम लोकसभा में जाने और अपने लोगों की आवाज उठाने के लिए दूसरी पार्टियों का सहारा ले रहे हैं, तो कोई बुराई नहीं है. मैंने भाजपा का दामन अपने लोगों की भलाई के लिए ही थामा है.’

संघ के ‘साहेब’

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भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने और मनुस्मृति को संविधान बनाने के उद्देश्यों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले केशव बलिराम हेडगेवार ने कभी सोचा नहीं होगा कि एक दिन उन्हीं की विचारधारा का वाहक प्रधानमंत्री मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन करने वाले डॉ. आम्बेडकर को महानायक बताएगा. जो वर्ण व्यवस्था संघ के सपनों के हिंदू राष्ट्र का खाद पानी है, उसकी जड़ों पर प्रहार करने वाले आम्बेडकर अगर संघ के लिए सम्माननीय हो गए हैं तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह परिवर्तन कैसे हुआ? जिस वक्त गुरु गोलवलकर मनु को ‘दुनिया का पहला कानून बनाने वाला’ घोषित कर रहे थे, उस समय आम्बेडकर उसी वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने वाले कानून के खिलाफ जंग छेड़े हुए थे. जब संघ आजाद भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली, तिरंगे और संविधान तक को खारिज कर रहा था, तब संविधान लागू हो चुका था और आम्बेडकर सभी नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को भारतीय संविधान की मूल आत्मा बता रहे थे. जो आम्बेडकर पूरे जीवन हिंदू धर्म में व्याप्त जाति, वर्ण, छुआछूत और असमानता के खिलाफ लड़ते रहे, अंतत: उस धर्म का ही त्याग कर दिया, उन्हें अब हिंदू राष्ट्र के अलंबरदारों द्वारा अपने नायक के रूप में पेश करना अजूबे से कम नहीं है.

यह अजूबा उस राजनीतिक होड़ का हिस्सा है जिसके तहत सभी दल खुद को आम्बेडकर का असली वारिस साबित करने में जुटे हैं. संविधान दिवस मनाने की नई-नवेली रवायत के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में जब संविधान की महत्ता और डॉ. आम्बेडकर की तारीफ में पुल बांध रहे थे, तब यह सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति या संविधान की शपथ लेने वाले सांसद जब-तब किस हैसियत से भारतीय गणतंत्र को हिंदू राष्ट्र घोषित करते रहते हैं? क्या हमारा संविधान हिंदू राष्ट्र, मुस्लिम राष्ट्र आदि बनाने की इजाजत देता है?

आम्बेडकर का 125वां जयंती वर्ष इस मायने में अभूतपूर्व रहा कि आम्बेडकर के घोर वैचारिक विरोधी भी उनकी जय-जयकार करते दिख रहे हैं. अगर आम्बेडकर की सामाजिक लोकतंत्र की विचारधारा को भारतीय राजनीति में उनकी जयंती और नारों की तरह जगह मिल जाए तो देश में जातिगत भेदभाव और आर्थिक विषमता मिट जाएगी. इसके अलावा आम्बेडकर की स्वीकार्यता से संविधान में विशेष रूप से ​उल्लिखित स्वाधीनता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को भी मजबूती मिलेगी, लेकिन क्या यह होड़ असल में आम्बेडकर के मूल्यों और सामाजिक न्याय की लड़ाई के लिए है जिसके लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया?

आम्बेडकर के कट्टर विरोधी रहे संघ, उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा और उन्हें हाशिये पर डाल देने वाली कांग्रेस भी उन्हें अपनाने की प्रतियोगिता में शामिल हैं

आम्बेडकर के समानता और न्याय के प्रयासों के कट्टर विरोधी रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा, उनसे टकराने, फिर अपनाने और फिर हाशिये पर डाल देने वाली कांग्रेस भी उन्हें अपना बनाने की दौड़ में शामिल हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि दलित-पिछड़ी जातियों के ‘मसीहा’ कहे जाने वाले आम्बेडकर जो अब तक दो बड़े दलों में उपेक्षित थे, अचानक उन्हें गांधी-नेहरू के बराबर स्थापित करने की कोशिश क्यों की जा रही है? क्या गांधी-नेहरू की विरासत पर सवार कांग्रेस को नए नायक की जरूरत है? क्या वीर सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी का नायकत्व भाजपा के लिए बौना साबित हो रहा है? या फिर सरदार पटेल और गांधी को अपनाने वाली भाजपा के ‘नायक हड़प अभियान’ का अगला निशाना आम्बेडकर हैं?

कांग्रेस की एक परिवार से नेतृत्व आपूर्ति की परियोजना फेल हो चुकी है. उसकी तो हालत यह है कि वह अपने पुरखे पंडित नेहरू तक को नहीं बचा पा रही है. नेहरू की 125वीं जयंती वर्ष में भाजपा की सरकार ने सुभाष चंद्र बोस के परिवार की जासूसी के बहाने नेहरू पर जोरदार हमला बोला. केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक संकट से जूझ रही कांग्रेस आम्बेडकर से नजदीकी बढ़ाने का प्रयत्न करते हुए संविधान में बदलाव की सूरत में ‘रक्तपात’ की धमकी दे रही है तो दूसरी ओर संघ परिवार और भाजपा अपने लाव-लश्कर के साथ आम्बेडकर पर कब्जा करने में लगी है.

आम्बेडकर की 125वीं जयंती पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से उन पर अब तक का सबसे बड़ा आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा, ‘आम्बेडकर और हेडगेवार दोनों ने समाज के रोगों का निदान करने का काम किया.’ इस दौरान संघ के मुखपत्रों- ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गनाइजर’ ने आम्बेडकर विशेषांक निकाले और उन्हें नायक के तौर पर पेश करने की कोशिश की. इस आयोजन में संघ ने आम्बेडकर को मुसलमानों के खिलाफ, घर वापसी का समर्थक और राष्ट्रवादी साबित करने की कोशिश की. संघ की पत्रिकाओं में छपे लेखों में कहा गया कि आम्बेडकर राष्ट्रवादी थे और उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि वह देश को सबसे पहले ध्यान में रखें. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा, ‘डॉक्टर आम्बेडकर युगपुरुष हैं जो करोड़ों भारतीयों के दिलों में वास करते हैं. आइए हम सब देश को आम्बेडकर के सपनों का भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध करें. एक ऐसा भारत जिस पर उन्हें गर्व हो.’ हालांकि, यूपी में दलितों का प्रतिनिधित्व करने वाली मायावती ने कहा, ‘भाजपा और कांग्रेस का आम्बेडकर-प्रेम नाटक है. हमारे मतदाताओं को इनसे सावधान रहना चाहिए.’

भाजपा के आम्बेडकर प्रेम को नाटक क्यों माना जाए? लेखक सुभाष गाताडे अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘हेडगेवार, गोलवलकर बनाम डॉ. आम्बेडकर’ में लिखते हैं, ‘जिन्होंने जीते जी आम्बेडकर का मखौल बनाया, उनसे दूरी बनाए रखी और उनके विचारों के प्रतिकूल काम करते रहे, अब उनकी बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने और दलित-शोषित अवाम के बीच पैठ बनाने के लिए उनके मुरीद बनते दिख रहे हैं. ऐसी ताकतों में सबसे आगे है हिंदुत्व ब्रिगेड के संगठन, जो डॉ. आम्बेडकर को- जिन्होंने हिंदू धर्म की आंतरिक बर्बरताओं के खिलाफ वैचारिक संघर्ष एवं व्यापक जनांदोलनों की पहल की, जिन्होंने 1935 में येवला के सम्मेलन में ऐलान किया कि मैं भले ही हिंदू पैदा हुआ, मगर हिंदू के तौर पर मरूंगा नहीं और अपनी मौत के कुछ समय पहले बौद्ध धर्म का स्वीकार किया (1956) और जो ‘हिंदू राज’ के खतरे के प्रति अपने अनुयायियों एवं अन्य जनता को बार-बार आगाह करते रहे, उन्हें हिंदू समाज सुधारक के रूप में गढ़ने में लगे हैं.’

भीमराव आम्बेडकर की विचारधारा के आधार पर काम करने वाली तमाम पार्टियां और संस्थाएं हैं. इस दावेदारी में नए दलों का प्रवेश आम्बेडकर की बढ़ती प्रासंगिकता का स्पष्ट संकेत है

इन आयोजनों के दिनों में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कानपुर में एक सभा में दावा किया कि वे ‘संघ की विचारधारा में यकीन रखते थे’ और हिंदू धर्म को चाहते थे. हाल में संघ और भाजपा की ओर से इस तरह की तमाम बातें कही गईं. सुभाष गाताडे कहते हैं, ‘इनकी कोशिश यह भी है कि तमाम दलित जातियां- जिन्हें मनुवाद की व्यवस्था में मानवीय हकों से भी वंचित रखा गया- उन्हें यह कहकर अपने में मिला लिया जाए कि उनकी मौजूदा स्थितियों के लिए ‘बाहरी आक्रमण’ यानी इस्लाम जिम्मेदार है.’

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तथ्य यही बताते हैं कि आम्बेडकर के जीते जी हिंदुत्ववादी संगठनों से उनके संबंध कभी सामान्य नहीं थे, यहां तक कि बंटवारे के उन दिनों में जब डॉ. आम्बेडकर बार-बार जनता को ‘हिंदू राज के खतरे के बारे में आगाह कर रहे थे’, वहीं गोलवलकर-सावरकर और उनके अनुयायियों का लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना था. जब स्वतंत्र भारत के लिए संविधान-निर्माण की प्रक्रिया जोरों पर थी, तब डॉ. आम्बेडकर के नेतृत्व में जारी इस प्रक्रिया का संघ ने विरोध किया था और अपने मुखपत्रों में मनुस्मृति को ही आजाद भारत का संविधान बनाने की हिमायत की थी, संघ के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर से लेकर सावरकर, सभी उसी पर जोर दे रहे थे.

उन दिनों जब डॉ. आम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल के माध्यम से हिंदू स्त्रियों को पहली दफा सम्पत्ति और तलाक के मामले में अधिकार दिलाने की बात की थी, तब कांग्रेस के रूढ़िवादी धड़े से लेकर हिंदूवादी संगठनों ने  इसे हिंदू संस्कृति पर हमला बताया था. उनके घर तक जुलूस निकाले गए थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक, उन दिनों संघ की अगुवाई में आम्बेडकर का जबरदस्त विरोध किया गया था. अकेले दिल्ली में ही 79 रैलियों-सभाओं का आयोजन हुआ था और नेहरू-आम्बेडकर के पुतले जलाए गए थे.

अब सवाल है कि जिस संघ के सामने हिंदू राष्ट्र का स्पष्ट एजेंडा है, उसे हिंदू व्यवस्था के घोर विरोधी आम्बेडकर की जरूरत क्यों है? आम्बेडकर के नाम पर पहले से राजनीति करने वाली कई पार्टियां हैं और उनकी विचारधारा के आधार पर काम करने वाली सैकड़ों संस्थाएं हैं. इस दावेदारी में नए दलों का प्रवेश आम्बेडकर की बढ़ती प्रासंगिकता का स्पष्ट संकेत है. सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक आनंद तेलतुम्बड़े कहते हैं, ‘अगर मूर्तियां, निशानियां, तस्वीरें, पोस्टर, गीत और गाथाएं, किताबें और पर्चे या फिर स्मृति में बसे जलसों का आकार किसी की महानता को मापने के पैमाने होते तो शायद इतिहास में ऐसा कोई नहीं मिले जो बाबा साहेब आम्बेडकर की बराबरी कर सके. उनके स्मारकों की फेहरिस्त में नई जगहें और आयोजन जुड़ते जा रहे हैं. वे ऐसी परिघटना बन गए हैं कि कुछ वक्त बाद लोगों के लिए यकीन करना मुश्किल हो जाएगा कि ऐसा एक इंसान कभी धरती पर चला भी था, जिसे जानवरों तक के लिए पानी के सार्वजनिक स्रोत से पानी पीने के लिए संघर्ष करना पड़ा था. आज उनको अपनाने की होड़ है. संघ परिवार ने हाल में आम्बेडकर को जिस तरह से हथियाने की मंशा जाहिर की हैं, वे इतनी खुली है कि दलितों को उनकी भीतरी चालों को समझने में देर नहीं लगी है.’Dr Ambedkar Statue Damaged (1)hhhh

यह सच है कि गांधी के बाद आम्बेडकर भारत के निःसंदेह सबसे पूजनीय नेता हैं. छोटे-छोटे कस्बों, गांव, शहर, चौराहे और पार्कों में जगह-जगह उनकी मूर्तियां लगी हैं. हालांकि, गांधी समेत समूची कांग्रेस से आम्बेडकर का हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा क्योंकि राजनीतिक हिंदू की नुमाइंदगी करने वाली कांग्रेस आम्बेडकर की मुख्य विरोधी थी. 1932 में गोलमेज सम्मेलन के दौरान आम्बेडकर ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग रखी, लेकिन महात्मा गांधी ने इसका तीखा विरोध किया और आखिर में उन पर दबाव डालकर पूना समझौते पर दस्तखत करवा लिए गए. जानकारों का एक तबका मानता है कि इससे दलितों के एक आजाद राजनीतिक अस्तित्व की गुंजाइश को जड़ से खत्म कर दिया. आजादी के बाद कांग्रेस की यह पूरी कोशिश थी कि आम्बेडकर संविधान सभा में न रहें. गांधी जी के प्रयासों की वजह से आम्बेडकर को संविधान सभा में चुना गया. हिंदू कोड बिल के मसले पर पीछे हटने के मामले को लेकर आम्बेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. इस मसले पर आम्बेडकर के घोर विरोधी हिंदूवादी ही थे. आनंद तेलतुम्बड़े के मुताबिक, बाद में आम्बेडकर ने संविधान को नकारते हुए यह तक क​हा था, ‘उन्हें नौकर की तरह इस्तेमाल किया गया. यह किसी के भी काम का नहीं है और इसको जलाने वाला मैं पहला इंसान होऊंगा. उन्होंने कांग्रेस को ‘दहकता हुआ घर’ कहा था जिसमें दलितों के लिए खतरा ही खतरा है.’

आधुनिक भारत में आम्बेडकर अकेले ऐसे नेता थे जिन्होंने दलितों और अछूतों के मसले काे प्रमुखता से उठाया और हिंदू धर्म में व्याप्त संस्थानिक अमानवीयता की धज्जियां उड़ाकर रख दीं. वे समाज के सभी वर्गों को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में समान स्थान दिए जाने के पक्षधर थे. इसके लिए उन्होंने समान अवसर की लड़ाई छेड़ी. उनके प्रत्येक सामाजिक संघर्ष के पीछे यही मौलिक भावनाएं थीं. बंबई विधान परिषद में एसके बोले प्रस्ताव हो, महाड बावड़ी सत्याग्रह हो (जिसमें 10,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था) मंदिर प्रवेश आंदोलन हो, महार वतन आंदोलन, जाति को समूल नष्ट करने के लिए संघर्ष या मनुस्मृति दहन हो, इन सबके पीछे आम्बेडकर की यही मंशा थी कि समाज में किसी के साथ जन्म आधारित भेदभाव न करके सबको समान अवसर दिए जाएं.

जाति और वर्ण व्यवस्था को ‘दैवीय’ बताने वाले जिस ग्रंथ की आम्बेडकर होलिका जला रहे थे, संघ उसे पूरे देश में लागू करने का पक्षधर था. जाहिर है कि आम्बेडकर के इस संघर्ष के कारण उनका कट्टर विरोधी संघ ही था. यह देखना मजेदार है कि है कि आम्बेडकर द्वारा 1927 में ‘मनुस्मृति’ जलाने और ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ और ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ जैसे ग्रंथों को भूलकर संघ उनके ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया’ जैसे ग्रंथ को प्रचारित करता है. इसके अलावा उनके हिंदू धर्म से विद्रोह कर बौद्ध धर्म अपनाने को हिंदू धर्म से बाहर निकलने की बजाय ‘धर्म की आध्यात्मिक ऊंचाई’ छूने के तौर पर पेश करता है.

‘संघ राष्ट्रीय बहस में से गांधी-नेहरू को हटाना चाहता है. इससे सेक्युलरिज्म की बहस समाप्त हो जाएगी. ये आम्बेडकर को गांधी-नेहरू का प्रतिद्वंद्वी बनाने की चाल है’

यह मजबूरी ही है कि अब उसी संघ को जागरूक होती दलित और पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने के लिए आम्बेडकर का सहारा लेना पड़ रहा है. जीबी पंत संस्थान, इलाहाबाद के शोधार्थी रमाशंकर कहते हैं, ‘आम्बेडकर के व्यक्तित्व में सहज ज्ञान, 20वीं शताब्दी के इतिहास की समझ और नेतृत्व की क्षमता का गजब मेल था. वे उन लोगों की आवाज थे जिन्हें अमेरिका, आयरलैंड या भारत में ऐतिहासिक रूप से पीछे धकेल दिया गया था. जब भी सामाजिक न्याय की बात होगी या सबको आर्थिक रूप से सक्षम बनाए जाने की कोई परियोजना अमल में लाने की बात की जाएगी, आम्बेडकर संदर्भवान हो उठेंगे. आज पूरी दुनिया को न्यायपूर्ण होने के साथ एक लोकतांत्रिक व्यवस्था होने का वादा पूरा करना है. स्त्रियों के लिए एक ऐसी दुनिया बनानी है जिसमें पुरुष वर्चस्व को कानूनी रूप से तोड़ा जा सके. एक करुणा आधारित समाज बनाया जा सके जिसमें हिंसा न हो. आम्बेडकर इसके लिए बेहतरीन नायक हैं. यह बात नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, मायावती के साथ भारत के नौजवानों को पता है.’

नई सदी में दलित जातियां मजबूत हुई हैं. अब वे शिक्षा तक पहुंच ​बना रही हैं और अपने एक स्वायत्त नायक के रूप में आम्बेडकर को चिह्नित कर रही हैं, जिसमें उन्हें जाति की गलीज बंदिशें और धर्म की अमानवीय यातना से मुक्ति दिलाने वाला नायक दिखता है. आम्बेडकर जयंती पर देश भर में दिवाली जैसा आयोजन अब आम बात है. दलित जातियों के लिए आम्बेडकर एक ऐसे नायक हैं जो पूरी तरह उसे अपने लगते हैं. हिंदू देवी-देवताओं के शोषणकारी महात्म्य के उलट आम्बेडकर के पास दलित जातियों की मुक्ति की चाबी है. डीयू की शोधछात्रा चंद्रकला प्रजापति कहती हैं, ‘जिनका इस समाज में कोई अधिकार नहीं था, उनके लिए आम्बेडकर का बहुत महत्व है. मेरे परिवार में भी ऐसा है. अब जो लोग पढ़ लिख रहे हैं, वे समझते हैं कि आम्बेडकर उनके लिए क्या हैं. हमारे आसपास के परिवारों में आम्बेडकर के लिए ईश्वर जैसा सम्मान है और यह किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है, यह उस विचार की पूजा है, जो उनके अधिकारों और उनकी मुक्ति की बात करता है.’

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लेखिका अनीता भारती कहती हैं, ‘आम्बेडकर शुरू से ही दलितों के नायक रहे हैं, लेकिन अब गैर-दलित तबके में भी उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है. पहले शिक्षा व्यवस्था में दलितों के लिए जगह नहीं थी. अंग्रेजों के कारण खिड़की खुली और बाद में हमारे संविधान ने समान अवसर का अधिकार दिया. शिक्षा और जागरूकता बढ़ने के साथ लोगों काे यह अच्छे से समझ में आया कि अशिक्षित होना ही गुलामी की जड़ है. जागरूकता बढ़ने के साथ आम्बेडकर की ताकत को अब पहचाना गया है. जातिवाद अपने बदले हुए रूप में अभी भी जिंदा है. जो पीड़ित हैं उनके लिए आम्बेडकर मुक्ति के प्रतीक हैं.’ जो समुदाय अपने इस नायक को भावनात्मक जुड़ाव और आस्था के साथ पूजता है, उसे रिझाने के लिए सियासी दलों को आम्बेडकर का जयकारा जरूरी लगता है.

दिल्ली विवि के प्रोफेसर व लेखक अपूर्वानंद कहते हैं, ‘आम्बेडकर का नायकत्व पिछले 25 वर्षों से स्थापित हो चुका है, जब दलित-पिछड़ी राजनीति का उभार हुआ. तब से आम्बेडकर केंद्रीय भूमिका में हैं. राजनीति में अलग-अलग वर्ग से ऊर्जा आती है. आजकल यह ऊर्जा सबसे ज्यादा दलित पिछड़ी जातियों से आ रही है. अब ये जातियां दावेदारी पेश कर रही हैं. आम्बेडकर ने कहा था कि हम बंजर जमीन पर फूल रोपने की कोशिश कर रहे हैं. वह बंजर जमीन अब जाकर टूटी है और आम्बेडकर की प्रासंगिकता और भी बढ़ी है. इसलिए इन जातियों में पैठ बनाने के लिए संघ ने अपनी रणनीति बदल ली है. दूसरे, संघ राष्ट्रीय बहस में से गांधी-नेहरू को हटाना चाहता है. ये दोनों हट जाएंगे तो सेक्युलरिज्म की बहस समाप्त हो जाएगी. वे आम्बेडकर को गांधी-नेहरू का प्रतिद्वंद्वी बनाने की चाल के तहत भी ऐसा कर रहे हैं.’

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संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. आम्बेडकर (बाएं) डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान का पहला मसौदा सौंपते हुए (फरवरी, 1948)

हालांकि, संघ आम्बेडकर को उस रूप में अपनाने को राजी नहीं है, जिस रूप में वे संघर्षरत रहे. संघ दलितों के इस अखिल भारतीय प्रतीक को संदर्भों से काटकर और  ‘गोएबलीय’ (गोएबल- हिटलर का प्रचार मंत्री था) प्रचारतंत्र में लपेटकर पेश कर रहा है. उसने आम्बेडकर के भगवाकरण पर काम करना शुरू कर दिया है. हेडगेवार के साथ आम्बेडकर की तुलना, उनको मुसलमान विरोधी और ‘घर वापसी’ समर्थक बताना या राष्ट्रवादी हिंदू बताना इसी झूठे प्रचारतंत्र की एक कड़ी है. संघ परिवार की देश व समाज की जो कल्पना है, आम्बेडकर उसके ठीक विपरीत खड़े हैं. इसलिए सामाजिक न्याय के पक्षधर, धर्म और जातीय जकड़बंदी से मुक्त होने को छटपटाते आम्बेडकर को संघ परिवार भगवाधारी राष्ट्रवादी बनाकर पेश करता है. जिन आम्बेडकर ने चेताया था कि ‘हिंदू राष्ट्र तबाही लाने वाला होगा’, जिन आम्बेडकर ने शपथ ली थी कि वे एक हिंदू के रूप में नहीं मरेंगे, उन्हीं आम्बेडकर को संघ परिवार ‘एक महान हिंदू’ के रूप में पेश करता है. हिंदू धर्म से विद्रोह करते हुए आम्बेडकर ने जिस बौद्ध धर्म को अपनाया था, संघ उसे हिंदू धर्म का ही एक संप्रदाय कहता है. जानकार कहते हैं कि स्वतंत्रता संघर्ष के वर्षों में उपेक्षित आम्बेडकर तब अचानक महत्वपूर्ण हो उठे जब 1960 के दशक के मध्य में दलित और पिछड़ों की नुमाइंदगी करने वाले क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ. कांग्रेस ने दलितों को अपनाने, साथ मिलाने की रणनीति पर काम करना शुरू किया. दलितों का वोट पाने के लिए उनकी गोलबंदी जरूरी थी और आम्बेडकर अकेले ऐसे नेता रहे जिनका दलितों पर प्रभाव है. लोकसभा में 84 सीटें आरक्षित होने और अन्य जातियों की तुलना में ज्यादा संगठित होने के चलते दलित समुदाय पर सभी पार्टियों की नजर है. राज्यों की विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में आरक्षित सीटों के लिए भी पार्टियां ऐसा कर रही हैं.

संघ आम्बेडकर को अपनाने के हास्यास्पद प्रयास में तो है, लेकिन साथ में हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर भी काम कर रहा है. अब देखना है कि एक तरफ आम्बेडकर के ‘सामाजिक न्याय’ से परिपूर्ण ‘समतामूलक लोकतंत्र’ और ‘धर्मनिरपेक्ष संविधान’ की विरासत है तो दूसरी ओर संघ का मुसलमान मुक्त भारत का सपना है. अपूर्वानंद कहते हैं, ‘याद रहे कि भाजपा की ही सरकार ने राजस्थान में उच्च न्यायालय के सामने हिंदुओं के आदि विधिवेत्ता मनु की प्रतिमा भी लगवा दी है. एक है वर्तमान की मजबूरी यानी संविधान की रक्षा के लिए बना न्यायालय और दूसरा है भविष्य का लक्ष्य यानी मनुस्मृति का भारत.’ समय साबित करेगा कि भाजपा और कांग्रेस का आम्बेडकर प्रेम लोकतांत्रिक भारत में उनकी जरूरत के चलते है या फिर वोटबैंक पर कब्जे के लिए रचा जा रहा सियासी प्रपंच? यह सवाल दीगर है कि जिस छुआछूत के विरुद्ध आम्बेडकर आजीवन संघर्षरत रहे, दलितों के मंदिर में प्रवेश न पाने के रूप में वह व्यवस्था अब तक जिंदा है. प्रधानमंत्री मोदी समेत संघ-भाजपा और कांग्रेस के आम्बेडकर-प्रेम में इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को खत्म करने का कोई जिक्र अब तक नहीं सुनने को मिला है.

‌बारिश से तमिलनाडु में 15 हजार करोड़ का नुकसान

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विनाशकारी बारिश से तमिलनाडु में अब तक तकरीबन 269 लोगों की मौत हो चुकी है. इस बीच एक और दर्दनाक हादसा चेन्नई के एक अस्पताल में घटा. शुक्रवार को इस अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखे गए 18 लोगों की मौत बिजली कटने और ऑक्सीजन की सप्लाई न मिलने की वजह से हो गई. यह हादसा अड्यार नदी के पास स्‍थित मद्रास इंस्‍टिट्यूट ऑफ ऑर्थोपेडिक्स एंड ट्रॉमेटोलॉजी अस्पताल (एमआईओटी) में हुआ. हादसे के वक्त 75 मरीज अस्पताल में भर्ती थे. इनमें से 57 मरीजों को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती करा दिया गया था, लेकिन 18 मरीजों को बचाया नहीं जा सका. अस्पताल में जब बाढ़ को पानी भरना शुरू हुआ था तब वहां 575 मरीज भर्ती थे.

उद्योग संगठन एसोचेम ने बारिश से अब तक तकरीबन 15 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया है. आने वाले दिनों में इसके और बढ़ने की भी आशंका है. देश में ऑटोमोबाइल उद्योग के दूसरे बड़े केंद्र चेन्नई में विभिन्न वाहन कंपनियों ने भी अपने निर्माण प्लांट पर उत्पादन रोक दिया है. ह्यूंडई, रेनॉल्ट, बीएमडब्‍ल्यू, फोर्ड, रॉयल एनफील्ड और यामाहा प्लांट पर काम ठप है. ह्यूंडई के प्लांट से 6.8 लाख कारों का सालाना निर्माण किया जाता है. कंपनी में बीते बुधवार से काम रुका हुआ है. इसके अलावा फोर्ड के चेन्नई स्‍थित प्लांट से सालाना 3.4 लाख इंजन और दो लाख कारों का सालाना उत्पादन है. रॉयल इनफील्ड भी नवंबर में चार हजार मोटरसाइकिलों को निर्माण बारिश की वजह से नहीं कर सकी. इन दोनों कंपनियों के प्लांट में भी काम रुका हुआ है. इसके अलावा देश के सबसे पुराने अखबारों में से एक ‘द हिंदू’ अखबार भी 137 साल में पहली बार दो दिसंबर को नहीं प्रकाशित हो सका. अखबार के प्रिंटिंग प्लांट में पानी भरने से प्रकाशन नहीं हो सका.

राज्यभर में लगातार हो रही बारिश से जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है. राज्य में बारिश ने पिछले 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. बाढ़ के चलते राज्य में रेल, विमान व बस सेवा प्रभावित लगभग ठप पड़ चुकी है. चेन्नई के निचले इलाकों में बारिश की वजह से भारी तबाही मची हुई है. भारी बारिश के चलते राज्य की झीलें भी पानी से लबालब भरी हुई हैं. हजारों लोग बिना खाने और बिजली के अलग-अलग हिस्सों में फंसे हुए हैं. कई क्षेत्रों में फोन सेवा भी शुरू नहीं हो पाई है. मौसम विभाग ने आने वाले दो-तीन दिनों में भारी बारिश की आशंका जताई है. ऐसे में राज्य के हालात और खराब हो सकते हैं. हालांकि शुक्र की बात ये है कि शुक्रवार को बारिश से लोगों को थोड़ी सी राहत मिली है. निचले इलाकों से पानी उतरना शुरू हो गया है. अड्यार और कुंभ नदी का जलस्तर भी कम हो रहा है. सेना और एनडीआरएफ की टीमें इलाके में फंसे लोगों को बचाने के लिए युद्धस्तर पर राहत और बचाव के काम में लगी हुई हैं.

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तमिलनाडु में अब तक तकरीबन 269 लोगों की मौत हो चुकी है वहीं आंध्र प्रदेश में भी 54 लोग मारे गए हैं. ये जानकारी लोकसभा में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहत पैकेज के रूप में तमिलनाडु को एक हजार करोड़ रुपये की घोषणा की है. गुरुवार को उन्होंने बाढ़ प्रभावित हिस्सों का दौरा भी किया. राज्य की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद केंद्र सरकार से पांच हजार करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की थी.

पिच फिक्सिंग

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मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेली गई पांच एकदिवसीय मैचों की सीरीज के अंतिम और निर्णायक मुकाबले के लिए तैयार था. इससे पहले खेले चार मुकाबलों में दो-दो जीत के साथ दोनों टीमें बराबरी पर थीं. इसलिए निर्णायक मुकाबले में कांटे की टक्कर होने की पूरी उम्मीद थी. दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया और साधारण स्तर की भारतीय गेंदबाजी का लाभ उठाकर 438 रनों का पहाड़ सा ऐसा स्कोर खड़ा कर दिया, जिसकी कल्पना उस दिन शायद किसी ने नहीं की थी.

यहीं से इस मैच में भारत की जीत की संभावनाएं लगभग समाप्त सी हो गई थीं. भारत की पारी शुरू होती, उससे पहले ही भारतीय टीम निदेशक रवि शास्त्री ने एक नया बवाल खड़ा कर दिया. वह पिच क्यूरेटर सुधीर नाईक पर भड़क उठे और भारत की संभावित हार का ठीकरा उन पर फोड़ अपशब्द कहना शुरू कर दिया.

रवि शास्त्री का आरोप था कि भारतीय गेंदबाजों को पिच से कोई मदद नहीं मिली. पिच घरेलू टीम के पक्ष में व्यवहार नहीं कर रही थी. इस विवाद ने खासा तूल पकड़ा. सुधीर नाईक ने बोर्ड से शास्त्री की शिकायत की तो सुनील गावस्कर और कपिल देव जैसे दिग्गज शास्त्री के पक्ष में इस तर्क के साथ आ खड़े हुए कि घरेलू टीम को घरेलू परिस्थितियों का लाभ तो मिलना ही चाहिए. यहां से यह बात तय हो गई थी कि दोनों टीमों के बीच खेली जाने वाली आगामी चार टेस्ट मैचों की गांधी-मंडेला सीरीज में पिच की भूमिका सबसे अहम रहेगी. हुआ भी यही, टी-20 और एकदिवसीय सीरीज में मेहमान दक्षिण अफ्रीकी टीम से करारी शिकस्त झेलने के बाद भारतीय टेस्ट कप्तान विराट कोहली और टीम प्रबंधन को भली-भांति समझ आ गया था कि टेस्ट में विश्व नं. 1 और पिछले नौ साल से विदेशी दौरों पर अजेय दक्षिण अफ्रीकी टीम को हराना लोहे के चने चबाने जैसा है. केवल स्पिनर और स्पिन विकेट के सहारे भारतीय परिस्थितियों में खुद को ढाल चुके मजबूत दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाजी क्रम पर काबू नहीं पाया जा सकता. साथ ही डेल स्टेन, मोर्ने मोर्केल और वरनॉन फिलेंडर में वो क्षमता है कि वह किसी भी विकेट पर अपनी तेज रफ्तार गेंदों से विपक्षी खेमे को तहस-नहस कर सकें.

कप्तानों के सुझाव पर रणजी मैचों के दौरान टीम हित में पिच बनवाई जा रही हैं, जिसे भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए सकारात्मक नहीं कहा जा सकता

यही सब दिमाग में रख कोहली जब मोहाली पहुंचे तो सबसे पहले पिच क्यूरेटर दलजीत सिंह से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया. वानखेड़े में हुई गलती शास्त्री और कोहली दोहराना नहीं चाहते थे. साथ ही इस सीरीज में जीत-हार के दोनों के लिए ही बहुत अधिक मायने थे. लंबे समय से भारतीय कप्तानी को लेकर चल रहे शीत युद्ध के कारण इन दोनों की साख भी दांव पर लगी थी. हार का मतलब होता कोहली की कप्तानी पर सवाल और धोनी के पक्ष में माहौल. इन सभी पक्षों को ध्यान में रख स्वाभाविक था कि बैकफुट पर आई भारतीय टीम मोहाली में घरेलू परिस्थितियों का भरपूर लाभ उठाना चाहेगी और इस मैच का मैन ऑफ द मैच पिच रहेगी. यानी कि वानखेड़े से शुरू हुआ पिच विवाद आगे भी थमने वाला नहीं था लेकिन इस बार पिच के पेंच में दक्षिण अफ्रीकी उलझने वाले थे. मैच से पहले मोहाली की पिच देखने के बाद दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज फाफ डू प्लेसिस यह भांप भी गए और मीडिया में बोले, ‘मैं बस यही कह सकता हूं कि यह पिच सामान्य से भी अधिक सूखी नजर आ रही है.’

हुआ भी वही जिसकी उम्मीद थी. मोहाली के विकेट पर पहले ही दिन से स्पिनरों को वह घुमाव मिलने लगा जिसकी अपेक्षा एक स्पिनिंग ट्रैक पर तीसरे दिन की जाती है. विकेट कितना सूखा था यह इस बात से समझा जा सकता है कि पहले ही दिन डीन एल्गर जैसा पार्ट टाइम स्पिनर भारतीय बल्लेबाजों को अपने घुमाव से छका रहा था. यह देख अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि आगे आर. अश्विन, रविंद्र जडेजा और अमित मिश्रा की तिकड़ी क्या कमाल दिखाने वाली है. मैच तीन दिन में खत्म हो गया. पूरे मैच के दौरान स्पिनर्स ने 35 विकेट निकाले. जिसमें भारतीयों का योगदान 19 विकेट का रहा. बल्लेबाज एक-एक रन के लिए जूझते नजर आए और तेज गेंदबाज विकेट के लिए. पिच और इस भारतीय रणनीति की चौतरफा आलोचना की गई लेकिन स्थितियां बदली नहीं, बंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में भी लगभग समान ही विकेट था. वहीं तीसरे टेस्ट की नागपुर की पिच का मिजाज पढ़कर गावस्कर बोले, ‘यहां पहली पारी में बल्लेबाजी बहुत मुश्किल होगी और आखिरी पारी में लगभग असंभव.’ उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और तीसरे दिन चाय के बाद मैच खत्म हो गया. पिच के मिजाज को समझने के लिए इतना ही काफी है कि दक्षिण अफ्रीका का मजबूत बल्लेबाजी क्रम पहली पारी में 79 रनों पर ढेर हो गया और मैच के दूसरे दिन कुल 20 विकेट गिरे.

माइकल वान, मैथ्यू हेडन, डेविड लॉयड, वसीम अकरम सहित कई पूर्व दिग्गज अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी इस पिच विवाद का हिस्सा बन चुके हैं. वह ऐसी पिचों को क्रिकेट खेलने के लिहाज से अनुपयुक्त करार दे रहे हैं और घरेलू परिस्थितियों का जरूरत से अधिक लाभ उठाने के लिए भारतीय टीम द्वारा अपनाई जा रही इस रणनीति की कड़ी आलोचना कर रहे हैं. वहीं गावस्कर इस पूरे विवाद में कोहली और रवि शास्त्री का पक्ष लेते हुए एक चैनल से बात करते हुए कहते हैं, ‘घरेलू टीम के अनुकूल पिच बनाने में गलत क्या है. जब आपको आपकी पसंद की पिच नहीं मिलती तो हताशा होती है और व्यंग्यात्मक टिप्पणी की जाती है. लेकिन अपनी भाषा पर नियंत्रण होना चाहिए. जब निराशा होती है तो ऐसे शब्द कहे जाते हैं जो शास्त्री ने कहे लेकिन बाद में खेद होता है’. कपिल देव कहते हैं, ‘सीरीज का नतीजा काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि पिच कैसी बनती है. अगर दक्षिण अफ्रीका के मुताबिक पिच बनती है तो भारत को मुश्किल होगी. लेकिन अगर भारतीय टीम के हिसाब से पिच बनेगी तो हम जीत सकते हैं.’

लेकिन इस बीच सवाल यह है कि आदर्श पिच कैसी हो? जिस पिच पर तीन दिन में नतीजा निकल आए और एक-एक रन को बल्लेबाज जूझें, क्या उसे खेल के लिहाज से आदर्श विकेट कहा जा सकता है? कई विशेषज्ञ इसे बेवजह का तूल करार दे रहे हैं. उनका कहना है कि दूसरे देशों में भी तीन दिन में मैच खत्म होते हैं, इसमें कौन सी नई बात है? लेकिन भारतीय पिचों के आंकड़े एक नई ही कहानी कह रहे हैं. 2013 से अब तक भारत ने अपने मैदानों पर कुल नौ टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें से 5 तीन दिन में खत्म हुए हैं, दो मैच चार दिन में जबकि वर्तमान सीरीज का ही बंगलुरु मैच ड्रॉ रहा जिसके भी तीन दिनों में खत्म होने की संभावना थी. इस दौरान केवल एक ही मैच रहा जो कि पांच दिन तक चल सका. इन सभी में भारत को जीत मिली. तीन दिन में खत्म होने वाले मैचों का ऐसा प्रतिशत इस दौरान किसी और देश में नहीं देखा गया. जो साबित करता है कि भारत में घरेलू परिस्थितियों का लाभ लेने के लिए पिछले कुछ समय से अपने विकेटों के साथ कुछ ज्यादा ही प्रयोग किया जा रहा है.

इस समयांतराल में भारतीय पिचों में आए इस बदलाव की पटकथा के पीछे भारतीय टीम की असुरक्षा की वह भावना भी हो सकती है, जब 2012 में इंग्लैंड, भारत के दौरे पर आया था और ग्रीम स्वान-मोंटी पनेसर की जोड़ी ने भारत की घरेलू परिस्थितियों का फायदा बखूबी उठा भारत का दांव उसी पर चल उसे चारों खाने चित कर दिया था. उसके  बाद से ही भारतीय पिचों का स्तर इतना गिरा दिया गया कि केवल घरेलू स्पिन गेंदबाज ही घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठा सकें.

पूर्व भारतीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर मनिंदर सिंह कहते हैं, ‘इस तरह की पिचें विश्व में कहीं नहीं मिल सकतीं. ये तो विकेट ही नहीं बनीं. आप अपनी घरेलू परिस्थितियों का लाभ उठाना चाहते हैं तो ऐसे विकेट तो बनाएं कि मैच चौथे दिन तक जाए. ये कुछ ज्यादा हो रहा है.’ वह आगे कहते हैं, ‘आप घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठाइए. टर्निंग ट्रैक बनाइए, इसमें कुछ गलत नहीं है. लेकिन ऐसी पिचें बनाइए जो कि संभवत: दूसरे दिन से टर्न लेना शुरू करें. कुछ तो क्रिकेट देखने को मिले. कुछ तो खेल हो. ऐसी पिच कि कोई बल्लेबाज अर्द्धशतक भी नहीं लगा सका, जबकि विश्व की चोटी की टीम खेल रही हो. यह सवाल खड़े करता है. और ऐसे विकेट से आखिर लाभ किसे हो रहा है? जीतने के बाद हमें लग रहा है कि इससे भारतीय टीम का विश्वास बढ़ रहा है तो यह गलत है. मेरे मुताबिक विश्वास बढ़ नहीं रहा होगा. ये हम अपने ही विश्वास को जबरदस्ती धक्का मार रहे हैं. हमें विश्वास ये रखना चाहिए कि हम सामान्य घरेलू परिस्थितियों में भी जीत सकते हैं. मुझे ये यकीन है कि हमारे पास इतना टैलेंट है कि दक्षिण अफ्रीका की इस टीम को हम सामान्य परिस्थितियां रखते तो भी हरा देते.’

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पिचों पर मचे बवाल को देखने और उसकी तुलना अन्य देशों की पिच बनाने की परंपरा से करने से पहले यह देखना भी जरूरी है कि घरेलू स्तर के क्रिकेट में भी भारत में यही परिपाटी चल पड़ी है कि प्रदर्शन से ज्यादा पिच के मिजाज को महत्व दिया जा रहा है. राज्य क्रिकेट संघ अपने कप्तान के सुझाव पर रणजी मैचों के दौरान अपनी टीम के हित में ऐसी पिच बना रहे हैं जिन पर मुकाबला दो ही दिन में खत्म हो रहा है. यह एक डरावनी तस्वीर है जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिहाज से कतई सकारात्मक नहीं कही जा सकती. मनिंदर सिंह कहते हैं, ‘आप अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में घरेलू परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए ऐसी पिच बनाते हैं तो माना जा सकता है कि आप अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में बढ़त कायम करना चाहते हैं. लेकिन यह तो रणजी ट्रॉफी में भी हो रहा है कि पांच-पांच दिन के मैच दो-दो दिन में खत्म हो रहे हैं. और जिन क्रिकेट संघ में ऐसा हो रहा है वे कह रहे हैं कि दोनों टीमों के लिए तो पिच एक ही जैसी थी. ये तर्क बिल्कुल गलत है. क्योंकि इस तरह हम न तो आगे जा रहे हैं और न पीछे जा रहे हैं, हम नीचे जा रहे हैं. इस तरह तो भविष्य में हमें कोई अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेटर मिलेगा ही नहीं. ऐसी ही पिच बनाते रहिए, दो स्पिनर खिलाइए और दो दिन में जीत जाइए. खिलाड़ियों की मैच प्रैक्टिस हो ही नहीं पाएगी. टैलेंट को आप कैसे खोजोगे? विकेट ही इस कदर खराब होगा कि उस पर पैर जमाना भी मुश्किल हो तो एक बल्लेबाज अपनी तकनीक को सुधारे भी तो कैसे? ये शह कहां से मिल रही है कि मेजबान टीम है, जैसी मर्जी वैसी पिच बना सकते हैं? भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की जिम्मेदारी बनती है कि इस पर विचार करे. अंतर्राष्ट्रीय मैच में तो आपने बना दिए ऐसे विकेट पर प्रथम श्रेणी क्रिकेट में तो सही बनाइए. वरना भस्मासुर वाली स्थिति बनते देर नहीं लगेगी.’

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मनिंदर की बात सही भी जान पड़ती है. अगर पिछले छह सालों के भारत के अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड पर नजर डालें तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं. इस अवधि में भारत ने घरेलू सरजमीं पर खेले कुल 25 मुकाबलों में से 17 जीते, तीन हारे हैं और बाकी ड्रॉ रहे हैं. वहीं भारतीय उपमहाद्वीप में खेले 9 मुकाबलों में से 5 में जीत दर्ज की, दो हारे और बाकी ड्रॉ रहे. लेकिन जब टीम उपमहाद्वीप के बाहर गई तब उसकी क्षमताओं का सही आकलन हुआ. उपमहाद्वीप के बाहर खेले गए 27 में से केवल तीन मुकाबले वह जीत सकी जबकि 17 में हार मिली और पांच ड्रॉ रहे. वहीं 2011 से उपमहाद्वीप के बाहर खेले गए 21 मैचों में से महज एक मैच में ही उसने जीत का स्वाद चखा है और 16 में हार मिली है.

विशेषज्ञों की राय है कि इसके पीछे यही कारण है कि सबसे पहले तो हम घरेलू स्तर पर ही ऐसी पिचें तैयार कर रहे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर खरी नहीं उतरती, विश्व क्रिकेट के लिहाज से अल्पमत में हैं. जिसका नुकसान हमें यह उठाना पड़ता है कि खिलाड़ियों की प्रैक्टिस नहीं हो पाती. जब स्पिन फ्रेंडली विकेट पर स्पिनर मैच जिता रहे हैं तो क्यों एक रणजी टीम तेज गेंदबाज पर दांव लगाए. इसका नुकसान यह है कि न तो तेज गेंदबाजी को बढ़ावा मिल रहा है और न बल्लेबाज तेज गेंदबाजी झेलने के अभ्यस्त हो पा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर पिछले कुछ सालों से विदेशी टीमों के भारत दौरे पर जैसे विकेट बनाए जा रहे हैं उससे हमारे खिलाड़ी जीत तो रहे हैं पर उनमें मुकाबला करने का जुझारूपन पैदा नहीं हो पा रहा है. घरेलू परिस्थितियों का अनुचित लाभ लेकर आसानी से मिली जीत संतोष तो दे सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में लड़ने का जुझारूपन नहीं दे सकती. हमें महीने भर बाद ही ऑस्ट्रेलिया का दौरा करना है, अगर यहां हम विकेट में अधिक छेड़छाड़ न कर उसे सामान्य भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक ही रखते तो हमारे बल्लेबाजों को स्टेन, मोर्केल, फिलेंडर जैसे विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजों की गेंदों पर अधिक खेलने का मौका मिलता, जो कि ऑस्ट्रेलियन परिस्थितियों में हमारे लिए लाभदायक होता. हमारे पास मैच प्रैक्टिस के लिए ढंग के तेज गेंदबाज हैं नहीं और विदेशी टीमों के गेंदबाज जब हमारी जमीन पर आते हैं तो हम उन्हें अपनी घरेलू परिस्थितियों में भी खेलना नहीं चाहते. इसलिए जब विदेशी दौरों पर जाते हैं और अचानक उनके तेज गेंदबाजों का सामना करते हैं तो ताश के पत्ते की तरह हमारी बल्लेबाजी बिखर जाती है.

पूर्व भारतीय बल्लेबाज और वर्तमान में दिल्ली क्रिकेट संघ के उपाध्यक्ष चेतन चौहान भी नागपुर और मोहाली की पिच को क्रिकेट के लिहाज से आदर्श नहीं मानते. लेकिन साथ ही कहते हैं, ‘दोनों ही टीम के बल्लेबाजों ने तकनीकी तौर पर दृढ़ता का परिचय नहीं दिया.’ तीन दिन में खत्म हो रहे मुकाबलों के पीछे वह पिच को तो दोष देते ही हैं, साथ ही कहते हैं, ‘इसके लिए टी-20 और एकदिवसीय भी जिम्मेदार हैं. बल्लेबाजों में न तो अब राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, जैक कैलिस, शिवनारायण चंद्रपॉल की तरह विकेट पर जमे रहने का धैर्य रहा है और न ही टेस्ट मैचों के लिए आवश्यक तकनीक.’

इस बीच अपने बचाव में मोहाली टेस्ट के बाद दिया कोहली का यह तर्क कि ये नतीजा देने वाली पिचें हैं, जो टेस्ट प्रारूप में कम होते दर्शकों को दोबारा मैदान पर खींचकर लाएंगी, गले नहीं उतरता. अगर ऐसा होता तो नागपुर मैच के दौरान स्टेडियम खचाखच भरा होता. दर्शक नतीजा नहीं, क्रिकेट का रोमांच देखना चाहते हैं. तभी तो दो साल पहले भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच जोहानिसबर्ग में खेले गए ड्रॉ टेस्ट में भी दर्शकों का उत्साह चरम पर था क्योंकि वहां नतीजा न आकर भी नतीजा निकला था. दक्षिण अफ्रीकी दर्शकों के लिए यह जीतने सरीखा था कि पहली पारी में पिछड़ने के बाद चौथी पारी में 458 रनों के असंभव से लक्ष्य के आगे भी उनकी टीम ने घुटने नहीं टेके और मैच के ड्रॉ होने से पहले महज सात रन जीत से दूर थे, वहीं भारतीय समर्थकों के लिए यह जीत से कमतर नहीं था कि अंतिम क्षणों में उनकी टीम ने हार को ड्रॉ में बदल डाला.  यहां जीत न भारत की हुई और न दक्षिण अफ्रीका की, यहां जीत क्रिकेट की हुई. कोहली समय के साथ यह सीखेंगे.

‘तीन दिन में खत्म हो रहे मुकाबलों के लिए पिच तो दोषी हैं ही, साथ ही इसके लिए टी-20 और एकदिवसीय फॉर्मेट भी जिम्मेदार हैं’

टेस्ट क्रिकेट का इतिहास गवाह रहा है कि मेजबान टीमें अपने मनमाफिक पिचें तैयार कराती रही हैं. ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड जैसे देशों में तेज और हरी विकेट मिलती हैं तो दक्षिण अफ्रीका की उछाल भरी पिचें मेहमानों की नाक में दम करती हैं. ऐसी ही मनमाफिक पिचों की परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की भी रही है. श्रीलंका और भारत में स्पिन ट्रैक ही बनाए जाते रहे हैं. यही कारण है कि टेस्ट क्रिकेट को इम्तिहान के नजरिये से देखा जाता है, जब बल्लेबाज को अलग-अलग विकेट के हिसाब से खुद को ढालना पड़ता है, रन बनाने के लिए जूझना पड़ता है. लेकिन मनमाफिक पिच बनाने की परंपरा जब बेकाबू हो जाए, तो वह क्रिकेट समर्थकों को दुखी करती है. इस जीत का एक पहलू यह भी है कि आने वाले समय में कुछ ऐसी ही हालत भारतीय सूरमाओं की विदेशी पिचों पर होगी, जब गेंद छाती तक आएगी और गेंद की स्विंग और सीम का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा. लिहाजा दक्षिण अफ्रीका पर भारत की इस जीत का मजा उठाते वक्त यह ध्यान रखना होगा कि न तो यह असली जीत है, न ही असली टेस्ट क्रिकेट. शायद इसीलिए विश्व क्रिकेट के कई दिग्गज समय-समय पर यह आवाज उठाते रहे हैं कि टेस्ट मैचों के विकेट बनाने का काम आईसीसी को अपने हाथों में ले लेना चाहिए.