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‘यूपी में आम्बेडकर का प्रभाव रहा है, बिहार के दलित गांधी टोपी में ही फंसे रह गए’

bihar_dalitfffffयह पुराना सवाल है लेकिन जरूरी भी कि उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बिहार में दलित राजनीति अपने समूह के लिए अलग मजबूत नेतृत्व या राजनीति की तलाश क्यों पूरा नहीं कर सकी जबकि इसकी संभावनाओं के बीज मौजूद हैं. वैसे इसके ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारण रहे हैं. ऐतिहासिक कारण यह कि दलित राजनीति आम्बेडकर के विचारों से चल सकती है और बिहार में आम्बेडकर के विचारों को आने ही नहीं दिया गया. यहां के दलितों को शुरू से ही गांधी टोपी पहनाकर रखा गया, जिसका असर दिखता है. सामाजिक कारण यह है कि बिहार बंगाल के सूबे से निकला. यहां जमींदारी प्रथा लागू हुई थी. यानी किसानों को लगान जमींदारों को देना पड़ता था. जमींदार सामंत हो गए, सामंती प्रवृत्ति वाले हो गए. अधिकांश ऊंची जातियों के रहे. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में रैयतदारी की परंपरा आई थी. यानी लगान सीधे सरकार को देना पड़ता था. बीच में जमींदार नहीं थे. जमींदारी प्रथा ने बिहार को वर्षों जकड़े रखा. उसका असर अब भी है. इस परंपरा में दलितों का उभार इतना आसान नहीं था.

एक और कारण शैक्षणिक और आर्थिक है. 1924 में आम्बेडकर ने अंग्रेज गवर्नर जनरल से कहा था कि आप दो काम कर दीजिए. आप हमारे समाज के लोगों यानी अछूतों को जमीन दे दीजिए और अछूत पाठशाला खुलवा दीजिए. ऐसी पाठशाला, जो दलित बस्ती में हो, शिक्षक भी उसमें दलित ही हों. यह काम उत्तर प्रदेश में हुआ. उसी दलित पाठशाला से मैं पढ़ा और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए किया, एलएलबी का टॉपर बना. बिहार के लोग इससे वंचित रहे. या कहें उन्हें सिर्फ गांधी टोपी के जाल में फंसाकर रखा गया. तो इसका असर लंबे समय तक रहेगा. अब ऐसे समाज पर प्रभावी वर्ग आसानी से अपना अधिकार भी जमा लेता है और प्रभावी दल ऐसे लोगों को खरीद भी लेते हैं. बिहार में वही होता है. इसलिए दलित गुलामी वाली मानसिकता से अभी निकल नहीं सके हैं. दूसरी बात यह कही जाती है कि मंडल के तो 25 साल हो गए, इतने सालों में तो ऐसा होना चाहिए था. हां सही है कि मंडल के 25 साल हो गए लेकिन मंडल का क्रेडिट भी दूसरे को दे दिया गया था जबकि इसकी बुनियाद खुद आम्बेडकर साहब ने रखी थी. पिछड़ों को आरक्षण देने की बात पहली बार उन्होंने ही की थी. संविधान की धारा 340 से 342 तक में आरक्षण का प्रावधान किया. लेकिन उसी समय जब बाबा साहब ने यह बात कही तो पिछड़ा वर्ग के ही कुछ मशहूर नेताओं ने इसका विरोध किया. गांधीवाद को फैलाने के लिए तब पिछड़ी जाति के नेताओं में ही जनेऊ बांटने की शुरुआत हो गई या कहिए कि करवा दी गई. पिछड़ी जाति के लोग क्षत्रिय बनने को बेताब हो गए. मामला इधर से उधर हो गया. बात बदल गई. उसके बाद काका कालेलकर कमीशन बना. कमीशन ने भी अनुशंसाएं कीं, लेकिन तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने अफरातफरी मचने का तर्क देकर उसे दबा दिया. फिर मंडल कमीशन बना. कांशीराम समेत समान विचार वाले नेताओं के लंबे संघर्ष के बाद यह लागू हो सका. लेकिन तब भी यह राजनीतिक कारणों से लागू हुआ और मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने का श्रेय भी सीधे वीपी सिंह को दे दिया गया. सच यह है कि उन्होंने भी चौधरी देवीलाल के उभार को रोकने के लिए मंडल बम चलाया था. दिक्कत यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट अभी पूरी तरह से लागू नहीं हो सकी है और पिछड़े नेता भी उसके बारे में सही से नहीं जानते, इसलिए स्थिति ऐसी है.

यह सही है कि पहचान की राजनीति में चेहरे का महत्व होता है लेकिन अब स्थितियों ने एजेंडे को महत्वपूर्ण बना दिया है. अब इस बार के बिहार चुनाव की ही बात करें. एजेंडा महत्वपूर्ण हो गया. रामविलास पासवान की बात कीजिए या जीतन राम मांझी की, वे अपने को अंदर से आम्बेडकरवादी तो मानते हैं लेकिन ऊपरी तौर पर स्वार्थों में फंस जाते हैं. छोटे स्वार्थों को तो छोड़ना होगा. इस बार तो रामविलास पासवान की जाति के लोगों ने भी उन्हें वोट नहीं दिया. मांझीजी पढ़े-लिखे आदमी हैं. इतिहास के छात्र रहे हैं. थोड़ा भी पढ़ा लिखा आदमी चिंतक हो ही जाता है इसलिए जब वे सत्ता में आए तो उन्होंने आक्रामक तरीके से दलितों के सवाल खड़े किए. आर्य-अनार्य जैसी बात भी की. उसके इन बयानों से उनके लोग सचेत हुए, जागरूक हुए. उनके पक्ष में सोचा भी लेकिन वे फिर आरएसएस की दरी बिछाने लगे. वो आरएसएस, जो सामंतों और दलित नरसंहार में शामिल लोगों का संरक्षक रहा है. जो आरक्षण पर पुनर्विचार की बात कर रहा है. और फिर दरी बिछाने वाला आदमी अधिक से अधिक उस पर पालथी मारकर बैठ सकता है तो लोगों ने उन्हें सिर्फ दरी पर बैठने लायक छोड़ा. बिहार के दोनों नेताओं के लिए मौका है कि अभी चिंतन करें और आम्बेडकरवादी बनें. अगर ऐसा नहीं होता है, दलित नेता आम्बेडकरवादी नहीं बनते हैं तो यह सोचना सिर्फ सुखद एहसास देता रहेगा कि बिहार में भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर दलित राजनीति अलग हो जाएगी. इसके लिए सबसे पहले बिहार के दलित नेताओं को थोड़ा स्वार्थ से ऊपर उठना होगा. बहुत सारे लोग सवाल उठाते हैं कि मंडल युग के बाद नवसामंतवाद का उदय भी राजनीति में हुआ है, जो दलितों के लिए घातक है. मुझे लगता है कि यह सही हो सकता है लेकिन बिहार को तो अभी पुराने सामंतवादियों से ही निकलना है. सामाजिक बदलाव की गति शुरू हो चुकी है. जब पुराने सामंतवादियों की जकड़न से बिहार निकल जाएगा तभी नवसामंतों से भी निकलने का रास्ता निकलेगा.

(लेखक आम्बेडकर संस्थान पटना के प्रमुख हैं)

(निराला से बातचीत पर आधारित)

‘अगर आप वोट करने की उम्र से ऊपर हैं और राजनीति को संदेह से देखते हैं तो आपको बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहिए’

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‘अवॉर्ड वापसी’  के चलते आप चर्चा में हैं. लोगों का कहना है कि ऐसा तो हमेशा से होता आया है तो फिर अब ऐसी कौन सी बात हुई है जो एक फिल्मकार इस पर बात कर रहा है. आप इस पर क्या कहेंगे?

जब सिख विरोधी दंगे हुए तो उस समय मैं स्कूल में पढ़ रहा था. जब आडवाणी ने रथयात्रा निकाली थी तब मैंने रामायण देखने वाले दोस्तों से कहा था कि वे इस ‘बकवास’ से प्रभावित न हों. फिर जब मुंबई दंगों की आग भड़की तब मैंने इस बारे में लिखा भी था और ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच इसे साझा भी किया था. यहां तक कि मैंने अपनी एडवरटाइजिंग एजेंसी के न्यूज लेटर पर इसे प्रकाशित कराने की भी कोशिश की, लेकिन इसे हटा लिया गया क्योंकि मेरे मुस्लिम बॉस मेरे ये लिखने से सहज नहीं थे. इसके बावजूद अगर आप मानते हैं कि मैं पहले नहीं बोला तो मैं माफी चाहता हूं. दूसरी बात, अब मैं एक नई शुरुआत कर रहा हूं. अभी शुरुआत की है, तो आशीर्वाद दीजिए.

आप क्या सोचते हैं कि एक फिल्ममेकर को किस हद तक राजनीतिक होना चाहिए?

(हंसते हुए) ये बेकार का सवाल है! मैं आपका सवाल समझ रहा हूं. मुझे याद है एक एक्टिविस्ट ने कुछ पत्रकारों से कहा कि हर चीज पॉलीटिकल होती है तो उन सबने उसे हैरानी से देखा. तो जैसे ही आप कहते हो कि हर जगह राजनीति होती है तो इसे सीधे देश की राजनीति से जोड़कर देख लिया जाता है. लोग एकबारगी हैरान हो जाते हैं कि एक फिल्मकार भी राजनीतिक समझ रख सकता है. ये ठीक उसी तरह से है, जैसे जब मैंने अपनी मां को ‘लव सेक्स और धोखा’ फिल्म का नाम बताया तो वे चौंक गईं. तो इस माहौल में अगर आप वोट करने की उम्र से ऊपर हैं और राजनीति या राजनीति करने को संदेह से ही देखते हैं तो आपको बच्चों की किसी पेंटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहिए.

अब अापकी पिछली रिलीज फिल्म  ‘तितली’  की बात करते हैं. इस फिल्म पर शानदार प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और यह रणवीर शौरी के करिअर की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जा रही है. नकारात्मक माहौल वाले परिवार की यह कहानी जबर्दस्त तरीके से ध्यान खींचने वाली साबित हुई. ऐसा कैसे हुआ?

आपने सही कहा. ‘खोसला का घोंसला’ के बाद यह फिल्म रणवीर शौरी की अब तक की श्रेष्ठ फिल्म है. जहां तक नकारात्मक माहौल वाले परिवार की कहानी की बात है तो कनु बहल (फिल्म के निर्देशक) कार चोरी पर फिल्म बनाना चाहते थे. हालांकि आजकल नई तरह की कहानियों पर बात करने के लिए माहौल काफी अनुकूल है लेकिन किसी कहानी को लोगों तक पहुंचाने के लिए यह एकमात्र कसौटी नहीं है. मैं समझता हूं कि अपनी जिंदगी के कुछ मिलते-जुलते पहलुओं के कारण कनु इस तरह की कहानी के प्रति आकर्षित हुए. ऐसे में कहानी की पृष्ठभूमि में बदलाव आना शुरू हुआ. कार चोरी की कहानी से यह कार चोरों की कहानी बनी. इसके बाद कहानी ने फिर करवट बदली और एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार पर आ टिकी जो कार चोरी में लगा है. यह सब काफी महत्वपूर्ण ब्योरा था. इस तरह शुरुआत हुई और फिर ‘तितली’ पर काम हुआ. शुरुआत में यह कुछ और थी और विकसित होते-होते कुछ और हो गई.

‘मैंने पहले भी विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात रखी है, इसके बावजूद अगर आप मानते हैं कि मैं पहले नहीं बोला तो मैं माफी चाहता हूं. अब मैं एक नई शुरुआत कर रहा हूं, आशीर्वाद दीजिए’

यशराज फिल्म्स से आपका जुड़ना आप दोनों के लिए कैसा रहा?

यह दोनों के लिए ही मुश्किल था. यशराज के लिए अपने पुराने ढांचे से बाहर आकर जोखिम लेना निश्चय ही सीखने की राह पर उनके लिए एक नया मोड़ था. उन्होंने इससे पहले कभी कम बजट की फिल्म नहीं बनाई थी. यह हम दोनों के लिए ही अनूठा अनुभव था. हमने कभी किसी फिल्म को 60 लाख रुपये के कम बजट पर बाजार में नहीं उतारा था. किसी एक फिल्म का न्यूनतम मार्केटिंग बजट लगभग 3 करोड़ रुपये होता है. तो इस तरह ‘तितली’ केवल डिजिटल मार्केटिंग और जबानी प्रचार पर निर्भर थी.

आपने एक विज्ञापन कंपनी से करिअर की शुरुआत की. बाद में फिल्म निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में आए. जिस तरह की फिल्में आप बनाते हैं उससे एक फिल्ममेकर और प्रोड्यूसर के तौर पर काफी दिक्कतें आई होंगी. यह सफर कैसा रहा?

मेरी फिल्में ‘ओए लक्की! लक्की ओए!’ और ‘खोसला का घोंसला’ जबानी प्रचार पर ही चलीं. खोसला… जैसी फिल्म के साथ क्या किया जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा था. फिर यूटीवी ने इसे कॉमेडी फिल्म के तौर पर प्रचारित करने का प्रस्ताव रखा लेकिन सच कहूं तो एक नए फिल्मकार के रूप में मुझे यह प्रस्ताव भयभीत करने वाला लगा, क्योंकि यह असल में एक कॉमेडी फिल्म नहीं थी. लेकिन यूटीवी के रॉनी स्क्रूवाला मुझे यह यकीन दिलाने में सफल रहे कि दर्शकों में यह एक कॉमेडी की तरह हिट रहेगी, क्योंकि उन्हें व्यंग्य व नाटक के बीच का अंतर पता नहीं होता. अगर दोनों फिल्मों को देखें तो मेरी बाद की फिल्मों की अपेक्षा ये दोनों ही अपनी बनावट और मार्केटिंग में महज ‘भीड़ को खींचने वाली फिल्म’ से कहीं बढ़कर थीं. मैंने यह सुनिश्चित किया कि इन फिल्मों में गाने जरूर हों. ‘लव सेक्स और धोखा’ (एलएसडी) और ‘शंघाई’ जैसी फिल्मों में भी गाने थे. असल में ये सब ध्यान आकर्षित करने के पैंतरे हैं. ये पैंतरे ऐसे माहौल में बने रहने के लिए जरूरी हो जाते हैं, जहां दर्शक शतुरमुर्ग के स्वभाव (वास्तविकता से इंकार करने वाले) और परंपरागत खयालात वाले हों. ऐसे में ऐसी फिल्मों के लिए बीच का रास्ता अपनाना पड़ता है लेकिन ‘तितली’ के साथ ऐसा नहीं है. इस फिल्म के बारे में किसी भी तरह का समझौता नहीं किया गया है. मेरे उलट कनु फिल्म में गाने रखने और खासतौर से किरदारों को गाते हुए दिखाने को लेकर सहज नहीं थे.

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बॉलीवुड में हमेशा गानों, ड्रामा और परिवार की परंपरा रही है. क्या आप सोचते हैं कि अकेले इंडस्ट्री ही इस तरह की फिल्में बनाने में दिलचस्पी लेती है या दर्शकों की भी दिलचस्पी होती है?

मैं समझता हूं कि भारत में एक बड़ा दर्शक वर्ग परिवार, ड्रामा और गानों से भरपूर फिल्में देखना पसंद करता है. इन्हें ‘दर्दनिवारक फिल्में’ कहा जा सकता है, जिन्हें देखते हुए वे अपना गम कम होता महसूस करते हैं. बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इसके इतर फिल्मों को देखना पसंद करते हैं. मैं समझ सकता हूं जब कोई स्टूडियो कहता है कि नॉन स्टार वाली फिल्म बनाकर खुदकुशी क्यों करना! वैसी फिल्म बनाएं जो इस तरह के दर्शकों को खींचती हों. तब डिस्ट्रीब्यूटर भी पूछते हैं कि ‘आप खोसला का घोंसला जैसी फिल्म क्यों नहीं बनाते?’ ‘खोसला का घोंसला’ से ‘तितली’ तक के सफर के दौरान हिंदी सिनेेमा में हुए विकास को वे कभी नहीं समझ पाएंगे.

संक्षेप में कहूं तो यह काफी कठिन काम है और इस तरह का काम करने का साहस बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. आदि (यशराज फिल्म्स के आदित्य चोपड़ा) जैसे शख्स का सपना है कि मुख्यधारा के सिनेमा के साथ ही वह इस तरह की फिल्में भी बनाए.

‘मैं समझता हूं कि एक बड़ा दर्शक वर्ग परिवार, ड्रामा और गानों से भरपूर फिल्मों को देखना पसंद करता है. इन्हें ‘दर्दनिवारक फिल्में’ कहा जा सकता है, जिन्हें देखते हुए वे अपना गम कम होता महसूस करते हैं’

अभय देओल और इमरान हाशमी अलग तरह की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेता हैं. दोनों में कोई मेल नहीं. ऐसे में  ‘शंघाई’  फिल्म में इमरान हाशमी की भूमिका ने सबको चौंका दिया, क्योंकि आमतौर पर हम भट्ट कैंप के साथ उन्हें बिल्कुल अलग तरह की फिल्मों में देखने के आदी हैं. ऐसे अभिनेताओं से चरित्र अभिनय कराने की कैसे सूझी?

ये लोग अपनी पुरानी छवियों से खुद तंग आ चुके थे. अब तक मैंने जितने अभिनेता देखे हैं उनमें इमरान हाशमी सबसे बुद्धिमान, सुलझे और प्रोफेशनल अभिनेताओं में से एक हैं. इमरान पुरानी छवि में कैद महसूस कर रहे थे और उससे मुक्त होना चाहते थे. हालांकि ऐसा कहने वाले बहुत लोग हैं कि ‘शंघाई’ जैसी फिल्म क्यों बनाई जाए जो 50 करोड़ रुपये नहीं कमा सकती. इमरान और अभय देओल जैसे अभिनेता बहुत दबाव में थे और हर दिन अपनी पुरानी छवि से बाहर आने की कोशिश कर रहे थे.

मैं बता नहीं सकता कि किस तरह बुद्धिजीवी पत्रकार इमरान हाशमी की निंदा उनके किसिंग सीन की वजह से करते थे. तो इस तरह आप देख सकते हैं कि अभिजात्य वर्ग के लोग भी प्रचलित छवियों से प्रभावित हो जाते हैं. अगर आप अब भी इमरान के अभिनय की क्षमता नहीं देख पा रहे हैं तो मैं कहूंगा आप अंधे हैं. मैं ऐसा कोई डॉक्टर नहीं जिसने उन दोनों अभिनेताओं को अभिनय की घुट्टी पिलाई है. इमरान ने ‘गैंगस्टर’ और कुछ दूसरी फिल्मों में बेहतरीन काम किया है. इसके बावजूद उनकी आलोचना इस ओर भी संकेत करती है कि अब भी समाज के एक वर्ग में संकीर्णता है और जब आप कोई नई राह चुनते हैं तो कहीं से भी आपको सहयोग नहीं मिलता.

बिहार में दलित राजनीति को नेतृत्व की दरकार

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रमाशंकर आर्य पटना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. वे दलित मसलों के जानकार हैं. बिहार के चुनाव परिणाम से खुश दिखते हैं. उनकी खुशी का राज भाजपा की हार में छिपा है. कहते हैं, ‘चलिए यह अच्छा हुआ कि रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की हार हुई. यह उनके लिए जरूरी था. इस चुनाव परिणाम ने हम सबको खुशी तो दी है. इसकी वजह भी है. लालू प्रसाद दलितों को वोट दिलवाने की स्थिति में लाए, वरना बिहार में दलित वोट के अधिकार से ही वंचित रहते थे. उनके बाद नीतीश ने दलितों को नई शक्ति दी. आज पंचायत और निकाय में 16 प्रतिशत दलित हैं तो यह नीतीश कुमार की ही देन है. अब मंत्रिमंडल में भी करीब 18 प्रतिशत दलितों को जगह मिल गई है.’

हालांकि प्रो. आर्य समेत बिहार से ताल्लुक रखने वाले दूसरे दलित चिंतकों को एक विश्वसनीय दलित नेता की कमी भी खलती है. उनका कहना है कि बिहार में कोई दलित नेता स्वतंत्र रूप से, विश्वसनीयता के साथ, दलितों के बीच में अपनी साख बनाते हुए क्यों खड़ा नहीं हो पा रहा. प्रो. आर्य कहते हैं, ‘एक सर्वमान्य और बड़ी सोच वाले दलित नेता का उभार नहीं हो पाना चिंता का विषय है. इस पर चर्चा के लिए जल्द ही पटना में दलित रिसर्च स्कॉलरों का जमावड़ा होने वाला है.’ मंडल के 25 साल गुजर जाने और कथित तौर पर मंडल पार्ट टू की शुरुआत होने के बाद भी अपनी जमात से एक मजबूत व विश्वसनीय नेतृत्व को विकसित नहीं कर पाने की दलितों की चिंता राजनीतिक तौर पर वाजिब भी है. साथ ही पड़ोस के उत्तर प्रदेश की तरह पिछड़ों के राज से अलग दलित राज की संभावना न बन पाने की कसमसाहट भी कइयों में है.

 दो दलित दिग्गजों की चिंता

ऐसा नहीं है कि इस बार के बिहार चुनाव परिणाम को लेकर दलित राजनीति या दलित वोट बैंक के नजरिये से चिंता में कोई एक नेता या राजनीतिक खेमा है. सभी खेमों में एक जैसी बेचैनी है. हालांकि कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव इससे बाहर हैं. कांग्रेस इसलिए बेचैन नहीं है, क्योंकि इस बार के बिहार चुनाव में उसके पास खोने को कुछ नहीं था और जो पाने को था, उसे उससे बहुत ज्यादा हासिल हो गया. लालू प्रसाद के माथे पर चिंता की लकीरें इसलिए नहीं हैं, क्योंकि वे फिर से अपने बिखरते वोटों को सहेजने में सफल हो गए हैं. साथ ही सही समय पर अपनी सत्ता और राजनीति भी अपने उत्तराधिकारियों को सौंप चुके हैं. वह बहुत चतुराई से नीतीश कुमार की बिछाई बिसात अतिपिछड़ा, महादलित, पसमांदा आदि को भी खत्म करने की राह पर बढ़ चुके हैं.

दलित चिंतकों को एक विश्वसनीय दलित नेता की कमी भी खलती है. उनका कहना है कि बिहार में कोई दलित नेता अपनी साख बनाते हुए क्यों खड़ा नहीं हो पा रहा

दलित वोटों को लेकर सबसे बड़ी चिंता में रामविलास पासवान हैं. उनका एक मशहूर जुमला रहा है. ‘हम हालात बदलने पर किसी के साथ नहीं जाते बल्कि हम जिधर जाते हैं, उधर अच्छे दिन आ जाते हैं, हालात बदल जाते हैं.’ यह जुमला इस बार कारगर तो नहीं ही हुआ साथ ही उनकी पूरी राजनीति का मिथ भी इस बार करवट लेते दिखा. उनकी पार्टी को 4.8 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिलीं. उनके तमाम रिश्तेदार हार गए. पहली बार ऐसा हुआ जब उन्हें अपनी जाति का भी वोट नहीं मिला और न ही ये वोट वे राजग को ट्रांसफर करवा पाए. रामविलास पासवान को पार्टी बनाने के बाद 29 सीटें मिली थीं, फिर धीरे-धीरे वह इकलौते विधायक वाली राष्ट्रीय पार्टी के नेता भर बनकर रह गए. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ होने के चलते उन्हें संजीवनी मिल गई. अब सवाल ये है कि जिस भाजपा के साथ वे पुनर्जीवन पाकर बड़ा उभार पाने में सफल हुए थे, उसी के साथ रहने पर पहली बार उनकी जाति के वोटरों ने भी उनका साथ क्यों छोड़ दिया? अपने गढ़ और सुरक्षित सीटों पर दलितों ने भी उन्हें क्यों नकार दिया? उनका वोट बैंक पहली बार क्यों खिसक गया?

बिहार की राजनीति में तेजी से उभरकर दलित राजनीति की आकांक्षा और उम्मीदों के स्वर बने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के माथे पर भी चिंता की लकीरें हैं. इमामगंज सीट पर दिग्गज दलित नेता व राज्य के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और नीतीश कुमार के प्रिय उदयनारायण चौधरी को हराने का सुख तो उन्हें है लेकिन अपनी अलग पार्टी बनाने, भाजपा से सहयोग लेने के बावजूद इकलौती सीट पर जीत दर्ज करा पाने की कसक उनके मन में है. उन्हें 2.3 प्रतिशत वोट और एक सीट मिली. सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ?

रामविलास पासवान की बात करें तो जानकार बताते हैं कि उन्होंने परिवारवाद को इतनी तरजीह दी है कि उनकी जाति के लोग ही उनसे बिदक रहे हैं. यह शायद पासवान की पार्टी के हार का कारण बताने में जल्दबाजी जैसा है, क्योंकि उन्होंने पहली बार परिवारवाद नहीं किया. वे इसके लिए जाने जाते रहे हैं और अपने दोनों भाइयों, बेटों को पहले ही राजनीति में सेट कर चुके हैं. इस बार वे अपने दामाद और भतीजे को लेकर आए थे, जो नहीं चल सके. कुछ जानकार बताते हैं कि रामविलास पासवान को पिछली बार तक ऊर्जा इसलिए मिली थी क्योंकि नीतीश कुमार ने उन्हें खत्म हो जाने के बाद फिर से बढ़ जाने का एक मौका उपलब्ध करा दिया था. नीतीश कुमार ने 18 जातियों को लेकर जब महादलित नाम से दलितों की एक अलग श्रेणी बनाई थी तो उसमें पासवान को छोड़ दिया गया था. तब रामविलास पासवान के समर्थकों ने पासवानों के बीच यह बात फैला दी थी कि पासवानों को इसलिए नीतीश कुमार ने अलग-थलग छोड़ दिया है, क्योंकि वे रामविलास पासवान को वोट देते हैं. पूरे पासवान रामविलास के पीछे गोलबंद हो गए थे और अगड़ी जातियों के साथ गोलबंदी कर लोजपा के लिए जीत की राह को आसान बना दिया था. लेकिन इस बार ऐसा नहीं था. हो सकता है कि दोनों कारण सही हों. इस बार पासवान ने परिवारवाद को लेकर थोड़ा अलग किस्म का वातावरण बनाया भी था. बोचहा जैसी सीट से पहले उन्होंने एक महिला उम्मीदवार को प्रत्याशी बनाया. फिर अपने नाराज दामाद अनिल साधु को मनाने के लिए महिला प्रत्याशी को हटाकर दामाद को मैदान में उतार दिया था. हालांकि जीत उसी महिला प्रत्याशी की हुई. हो सकता है कि महादलित का मसला इस बार चुनावी मैदान में नहीं रहने के कारण भी पासवान वोटों का बंटवारा हो गया हो.

पासवान की तरह ही जीतन राम मांझी की हार की कहानी भी अलग है. उन्होंने नीतीश कुमार से अलग होकर नेतृत्व को चुनौती दी. कुछ लोगों ने मांझी को अवसरवादी कहा लेकिन मांझी को साहसी कहने वाले भी बहुतेरे रहे. अब सवाल उठ रहा है कि आगे मांझी क्या करेंगे? क्या वे फिर से दलितों में विश्वास जगा पाएंगे? मांझी को जानने वाले कहते हैं कि वे कभी बहुत मुश्किल और चुनौती की राजनीति नहीं करते. अभी उनके पास तीन विकल्प हैं. पहला, वह अगले चुनाव तक दलितों की राजनीति को मजबूत करें और जो 2.3 प्रतिशत वोट उन्हें मिला है, उसे और आगे बढ़ाने की कोशिश करें. दूसरा, वह राजग के साथ बने रहें. केंद्र में राजग की सरकार है तो उन्हें कोई अच्छी जिम्मेदारी मिल जाए. तीसरा, वह महागठबंधन में वापसी कर जाएं, क्योंकि महागठबंधन में अभी जो तीन दल हैं, उनके साथ मांझी रह चुके हैं और सबके बुरे दिन के संकेत मिलने पर साथ छोड़ते गए हैं. मांझी इस मसले पर बात नहीं करते हैं. उनके करीबी बताते हैं कि अभी वे चिंतन कर रहे हैं और हार की समीक्षा के बाद ही कुछ तय करेंगे.

प्रो. आर्य कहते हैं, ‘मांझीजी को जब सत्ता मिली थी तो पूरे बिहार में दलितों के बीच उम्मीद जगी और अगर वे अलग लड़ते तो बिना संदेह आज बहुत अच्छी स्थिति में होते और पूरे बिहार से दलितों का समर्थन उन्हें मिलता.’ राजनीतिक कार्यकर्ता और बामसेफ से जुड़े मनीष रंजन कहते हैं, ‘मांझी फैक्टर का जो असर बिहार के चुनाव में होना था वह हुआ है. भाजपा की दो भूल, एक तो टिकट वितरण में अगड़ों का वर्चस्व और दूसरा आरक्षण वाला विवादित बयान, अगर नहीं आया होता तो मांझी भाजपा की नैया बहुत मजबूती से पार करवा देते, क्योंकि उनकी बात दलितों तक पहुंच चुकी थी.’ ये बातें सही हैं, लेकिन मांझी के वोट बिखराव और पूरे दलित समुदाय पर पकड़ नहीं बन पाने की एक वजह उनके और पासवान के बीच का टकराव भी रही. पासवान ने मांझी को छोटा नेता कहा तो मांझी ने जवाब में उन्हें परिवार का नेता कहा. दोनों नेताओं की आपसी जंग की वजह से भी दलित वोट एक समूह की तरह नहीं बन सका.

महागठबंधन के नेताओं की चिंता गैरवाजिब नहीं है, क्योंकि चुनाव परिणाम ने ये साफ कर दिया कि भाजपा ने दलितों-अतिपिछड़ों में अपना आधार बढ़ा लिया है

इसके अलावा चुनाव परिणाम ने नीतीश-लालू को भारी जीत दिलाने के बावजूद दलित राजनीति के नजरिये से कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं दिया है. यह अलग बात है कि राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 40 सीटों में से 35 पर महागठबंधन का ही कब्जा हुआ. फिर भी चुनाव परिणाम कुछ अलग संकेत देते हैं. मनीष कहते हैं, ‘भाजपा नेता सुशील मोदी जो लगातार कह रहे थे कि मंडल और कमंडल, दोनों उनके पास हैं, इससे भाजपा ने संकेत दे दिए हैं कि कमंडल के साथ मंडल पर भी उसने डोरे डाले हैं और इस बार किसी कारण गड़बड़ी हो गई लेकिन भविष्य में वह दूसरी राह भी अपना सकती है.’ इन बातों की पड़ताल करें तो यह संकेत मिलते भी हैं.

 गणित के संकेत

चुनाव परिणाम ने सिर्फ दलित वोट या राजनीति के नजरिये से पासवान और मांझी को ही चिंतित नहीं किया है बल्कि दूसरे और कई दल भी परेशान हैं. बिहार में 2011 की जनगणना के अनुसार दलित आबादी करीब 16 प्रतिशत है. हालांकि मांझी जैसे नेता इसे 23 प्रतिशत मानते रहे हैं और कई विश्लेषक भी इसे 20 प्रतिशत से कम नहीं मानते. इनका मानना है कि दलित आबादी में एक बड़ा हिस्सा ऐसा होता है जो इधर से उधर पलायन करता रहता है, इसलिए वह जनगणना में शामिल नहीं हो पाता. यह बात सही भी है. खैर अगर उस पक्ष को छोड़ भी दें तो दलितों की बड़ी आबादी बिहार में है. नीतीश कुमार ने इसी दलित वोट को अपने पाले में और लालू से अलग करने के लिए एक समय में महादलित कार्ड खेला था. उसका लाभ भी उन्हें मिला था. इस बार के चुनाव में भाजपा ने भी दो दिग्गज दलित नेताओं को अपने पाले में इसी वोट को साधने के लिए किया था. हालांकि वह कुछ करिश्मा नहीं कर सके. लेकिन इन सबके बाद भारी जीत हासिल करने वाले नीतीश-लालू की जोड़ी को भी दलित राजनीति के नजरिये से चुनाव परिणाम ने कोई कम चिंतित नहीं किया है. विजयी होने के बावजूद चिंतित होने की वजहें भी ठोस हैं. इस बार के चुनाव में भाजपा को 24 प्रतिशत वोट मिले हैं और अगर उसके सहयोगियों को मिला दें तो राजग को कुल करीब 34.1 प्रतिशत वोट मिले हैं. महागठबंधन के नेताओं की चिंता यह है कि वोटों की प्रतिशतता के बावजूद भाजपा का खेल गड़बड़ा गया या िफर मोहन भागवत के आरक्षण वाले विवादित बयान के बाद दलित और पिछड़े उससे नाराज हो गए. इसके इतर चिंता ये भी है कि वह कौन सा समूह है, जिसने भाजपा के वोट प्रतिशत को इस बार बढ़ाकर 24 प्रतिशत कर दिया. पिछली बार नीतीश के साथ रहने और उनके जरिये महादलित-अतिपिछड़ों का भी वोट पाने के बावजूद 17-18 प्रतिशत के बीच ही रह गया था. हालांकि एक तर्क यह दिया जा रहा है कि भाजपा अधिक सीटों पर लड़ी इसलिए उसका वोट प्रतिशत ज्यादा है, पर महागठबंधन के नेताओं की यह चिंता गैरवाजिब नहीं है. क्योंकि भाजपा इस बार भले ही पिछड़ गई लेकिन चुनाव परिणाम ने यह साफ कर दिया कि उसने दलितों और अतिपिछड़ों में अपने आधार का विस्तार कर लिया है. यह आनेवाले दिनों में चुनौती की तरह ही होगा.

इस बात की पुष्टि सिर्फ मतदान में मिले कुल प्रतिशत वाले वोट ही नहीं करते बल्कि चुनाव के बाद सीएसडीएस जैसी संस्था ने भी अपनी अध्ययन रिपोर्ट के जरिए यह साफ किया कि इस बार चुनाव परिणाम में अतिपिछड़ों ने 35 प्रतिशत वोट महागठबंधन को किया तो 43 प्रतिशत वोट राजग को. पासवानों में 19 प्रतिशत वोट महागठबंधन को गया तो 54 प्रतिशत राजग को और महादलितों में 25 प्रतिशत वोट महागठबंधन को गया तो 30 प्रतिशत राजग को. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘ये आंकड़े भविष्य की राजनीति के संकेत दे रहे हैं. संकेत साफ हैं कि भाजपा ने इस बार अतिपिछड़े और दलितों में सेंधमारी की है क्योंकि उसके सहयोगियों के वोटों को अलग कर दें तो वह अलग 10 प्रतिशत होता है और भाजपा का अपना 24 प्रतिशत है. वोटों के प्रतिशत और सीटों के बीच संख्या के अनुपात में अचानक ही उतार-चढ़ाव होता है. लालू जब अपने सबसे अच्छे दिनों में थे तो 29 प्रतिशत वोट पाकर ही 164 विधायकों के साथ सरकार बना ली थी.

इस बार के चुनाव में भाकपा माले सिर्फ डेढ़ प्रतिशत वोट पाकर ही तीन सीटें अपने पाले में करने में सफल रही है. इस लिहाज से राजग का 34 प्रतिशत वोट और उसमें दलितों व अतिपिछड़े वोटों का भी ठीक ठाक सामंजस्य हो जाना आगे के लिए चुनौती है. यह चुनौती लालू के लिए कम और नीतीश के लिए ज्यादा है. लालू ने अपने पुराने समीकरण का फिर से रिवाइवल कर लिया है लेकिन इस चुनाव में वे सारे कोर वोट बैंक समूह, जिसे नीतीश कुमार ने अपने लिए या अपनी राजनीति के लिए खड़ा किया था, एक हो गए हैं. बिहार के अब सारे दलित महादलित हो चुके हैं. लालू प्रसाद ने इसकी घोषणा भी कर दी है कि बिहार के सारे दलित अब महादलित की सुविधा लेंगे. सिर्फ दलित-महादलित ही नहीं, अतिपिछड़ा और पिछड़ा मिलकर एक हो गए हैं और राजनीति मंडल की ओर मुखातिब हो गई है. मुसलमानों में नीतीश ने पसमांदा और अशराफ मुसलमानों का बंटवारा किया था, वे दोनों भी एक होकर मुसलमान वोट बैंक जैसे हो गए हैं.’ सवाल यह उठता है कि अगर किसी राजनीतिक कारण से लालू और नीतीश का अलगाव होता है तो क्या अपने बने बनाए सारे वोट बैंक को खत्म कर नीतीश, लालू का मुकाबला कर पाएंगे?

प्रो. आर्य कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने पंचायत चुनाव में दलितों को आरक्षण दिया, उसका असर रहा है और रहेगा. यह सही है लेकिन उसका विस्तारित सवाल यह है कि जब 16 प्रतिशत दलित आज पंचायती व्यवस्था में प्रधान सरपंच, पार्षद आदि बनकर सक्रिय राजनीति में दखल दे चुके हैं तो फिर आने वाले दिनों में वे अपने लिए भी रास्ता तलाशेंगे और वह रास्ता उस ओर जाएगा, जिधर दलित राजनीति की गुंजाइश होगी.’ ये बात भी सही लगती है कि नीतीश कुमार ने दलितों को पंचायत में आरक्षण देकर एक बड़ा काम किया है, जिसका असर रहेगा लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद और इस बार के विधानसभा चुनाव के पहले बिहार में विधान परिषद चुनाव भी हुआ था. उसमें वोट डालने वाले निर्वाचित निकाय प्रतिनिधि ही थे. अधिकांश दलित और अतिपिछड़े प्रतिनिधियों ने इसमें भी भाजपा का साथ ज्यादा दे दिया था. यानी कुल मिलाकर संकेत यह मिल रहे हैं कि दलित और अतिपिछड़े, जो बिहार की राजनीति में एक समूह की तरह बनाए गए थे, अब भी हिचकोले खा रहे हैं और एक ठोस नेतृत्व की तलाश में कभी भाजपा की ओर तो कभी लालू-नीतीश की ओर तो कभी रामविलास पासवान-जीतन राम मांझी की ओर आ-जा रहे हैं.

‘इस बार के बिहार के चुनाव परिणाम ने साफ कर दिया कि जो भी एक ठोस एजेंडे के साथ दलितों को साधकर काम करेगा, वह भविष्य में चैंपियन होगा’

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‘दलित नेता ही दलितों का आत्मबल मारते हैं,

इसलिए कोई विश्वसनीय दलित नेतृत्व उभर नहीं पाया’

इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में तीन अशोक की खूब चर्चा हुई. एक चक्रवर्ती सम्राट अशोक, जिनकी जाति का निर्धारण चुनाव के पहले जोर-शोर से हुआ और भाजपा ने उनका स्वरूप बदला. दूसरे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी थे. कांग्रेस की जीत चाहे जिन वजहों से हुई, जैसे हुई हो लेकिन अशोक कुमार चौधरी का नाम चमका, अब वे राज्य के शिक्षा मंत्री हैं. तीसरे अशोक का नाम भी अशोक कुमार चौधरी है. इन्होंने नया इतिहास रचा. अशोक ने मुजफ्फरपुर जिले के कांटी विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की है. कांटी बिहार में थर्मल पावर प्लांट के लिए ख्यात है. यह विधानसभा क्षेत्र सामान्य श्रेणी का है. अशोक चौधरी, जो दलित जाति से आते हैं, उन्होंने इस सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपना नामांकन किया और अजीत कुमार जैसे पुराने नेता को परास्त किया. यहां राजद तीसरे नंबर पर चली गई. अजीत कुमार, जीतन राम मांझी की पार्टी ‘हम’ से उम्मीदवार थे. वे पहले नीतीश कुमार के साथ थे. बाद में मांझी के साथ हो गए थे. कांटी में सामान्य सीट पर एक दलित का जीतना बिहार में यूं ही बड़ी परिघटना के तौर पर माना जा सकता था और उसमें भी निर्दलीय का जीत जाना ऐतिहासिक है. इसके पहले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास सामान्य सीट से जीतते रहे थे लेकिन अशोक चौधरी का निर्दलीय जीतना एक बड़ी राजनीतिक संभावना की ओर भी संकेत है. कांटी से जीत हासिल करने वाले अशोक चौधरी ने दलित राजनीति पर निराला से बातचीत की

ashok kati vidhayakggggआपने तो इस लहर में मिथक ही बदल दिया. दलित जाति से होकर सामान्य सीट से लड़ने का साहस जुटाया और निर्दलीय जीत भी गए. ये सब कैसे हुआ?

आप डंड़ेरा जानते हैं. खेत में बांधा जाता है. आरी जैसा. उसका काम होता है कि वह पानी की धार को रोके रहे. पानी इधर से उधर न जाए. मैंने बस एक ही फॉर्मूला रखा था. वह यह कि हमारी जाति या समूह के लोग अगर आजादी के बाद से दूसरों को विजयी बनाते रहे हैं तो हमें क्यों नहीं बनाएंगे. इसी आधार पर मिथक बदल गया.

जब आप इतने संभावनाशील नेता थे तो आपको टिकट देने के लिए किसी पार्टी ने आपसे या आपने किसी पार्टी से संपर्क क्यों नहीं किया?

कौन देता टिकट और क्यों देता. चुनाव के किसी समीकरण में मैं फिट नहीं बैठ रहा था. आजादी के बाद से इस सीट पर एक जाति समूह का वर्चस्व था. लालू प्रसाद यादव ने इस पर अल्पसंख्यक उम्मीदवार को खड़ा कर उस वर्चस्व को तोड़ा लेकिन यहां दलितों को लेकर कभी किसी ने संभावना की तलाश ही नहीं की. फिर भला हमें क्यों कोई दल टिकट देता. तब मैंने तय किया कि निर्दलीय चुनाव लड़ूंगा और अपने लोगों के साथ ही दूसरे समूह के लोगों से अपने पक्ष में अपील करूंगा. इसका असर भी हुआ. इस फॉर्मूले ने डंड़ेरा की तरह काम किया. दलित एकतरफ एकजुट हो गए और आप यकीन कीजिए कि यह समूह जहां, जिसके पक्ष में हो जाए, वहां किसी लहर और प्रचार का असर नहीं होना है. आजादी के बाद से पहली बार इस सीट को आजादी मिली और समीकरण बदल गया.

रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी जैसे दो दलित नेता भी तो थे भाजपा के साथ. बिहार में दोनों अपने लोगों को क्यों नहीं बांध पाए, जबकि वे तो सामर्थ्यवान नेता भी रहे हैं?

मैं एक बात बताऊं. पूरे बिहार का नहीं जानता लेकिन जितना जानता हूं उसके आधार पर कह सकता हूं कि दलितों या वंचितों के समूह में साहस या प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन जो लोग उनकी रहनुमाई करते हैं वे उनके नाम पर तो सामने आते हैं लेकिन बाद में अपने परिवार और परिजनों के अलावा ज्यादा कुछ सोच नहीं पाते, इसलिए बड़े से बड़े नाम के नाम पर भी दलित समूह एकजुट नहीं रह पाता, बिखर जाता है.

दलितों की आबादी इतनी बड़ी है, फिर भी एक मुकम्मल दलित नेतृत्व न उभर पाने की राह में आप किस तरह की बाधा देखते हैं? बिहार में दलित राजनीति के सामने चुनौती क्या है?

दलित नेता ही यहां के दलितों का आत्मबल मार देते हैं. और जो बड़े क्षेत्रीय या राष्ट्रीय दल हैं, वे बस किसी एक नेता को आगे बढ़ाकर अपने को दलित हितैषी बताने लगते हैं. ऐसे में दलितों में से एक नेता का उभार हो जाता है और बाकी 99 फीसदी दलित परिवार किस हाल में रह रहे हैं, उसकी खबर नहीं ली जाती. और जो एक नेता बनाया जाता है, वह भी 99 फीसदी की रोजी-रोटी की चिंता की बजाय अपने कुनबे के विस्तार में लग जाता है. यही बिहार में होता रहा है और उसका असर यह रहा है कि बिहार में दलित वोट बैंक या तो किसी दल के राजनीतिक हित साधने का औजार है या फिर किसी नेता के कुनबे के विस्तार का माध्यम. और दलित नेता इस्तेमाल होते रहे हैं.

तो क्या आपसे उम्मीद की जाए कि आप जब इस लहर में एक अलग पहचान के साथ उभरे हैं तो आप पूरे बिहार में अलग किस्म की दलित राजनीति के एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे?

अभी पूरे बिहार का क्या कहूं. मैं तो कांटी से जीता हूं. कांटी की ही जनता ने इतना भरोसा कर आजादी के बाद से नया इतिहास रचा है. पुराने मिथक को तोड़ा है तो मेरी पूरी कोशिश होगी कि कांटी को ही अपना पूरा समय दूं. कांटी में बदलाव की बुनियाद रखू. अभी तो इतना ही सोचता हूं.

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बिहार के समाजवादी नेता धनिकलाल मंडल के बेटे भरत मंडल कहते हैं, ‘इस बार के चुनाव परिणाम ने साफ कर दिया कि जो भी एक ठोस एजेंडे के साथ दलितों को साधकर काम करेगा, वह भविष्य में चैंपियन होगा. दलित वोट बैंक छटपटाहट में है, बिखराव की स्थिति में है, उसे सहेजने वाला एक नेता चाहिए.’ लेकिन क्या वाकई बिहार की राजनीति में कोई ऐसा दलित नेता गोलबंदी करने की स्थिति में आता हुआ दिखता है. अब तक का इतिहास बताता है कि बिहार में जो भी दलित नेता रहे हैं, चाहे वे जगजीवन राम, भोला पासवान शास्त्री, रमई राम, रामसुंदर दास, रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी रहे हों, सब एक बड़े नेता के तौर पर तो दिखे लेकिन कोई भी अपने ही समुदाय को एक समूह की तरह विकसित नहीं कर सका. तब सवाल यह उठता है कि बिहार में दलित राजनीति अब क्या करवट लेगी? और दूसरा सवाल उठता है कि आखिर क्यों बिहार में दलित राजनीति अब भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर पिछड़ी राजनीति से अलग पहचान बनाने की स्थिति में नहीं आ सकी, अपना एक मजबूत नेता नहीं बना सकी, एक मजबूत नेतृत्व को जन्म नहीं दे सकी, जबकि उनकी आबादी भी कम नहीं है.

बाधाएं और संभावनाएं

आखिर क्यों बिहार की दलित राजनीति में तनी छटपटाहट दिखने के बावजूद उत्तर प्रदेश की तरह दलित अपना मजबूत नेतृत्व नहीं बना पा रहे हैं? राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘किसी भी समूह से सत्ता में स्वतंत्र व मजबूत नेतृत्व के उभार के लिए आबादी में बड़े स्तर पर मध्यवर्ग का होना जरूरी होता है. बिहार में दलितों की आबादी तो बड़ी है लेकिन इसमें मध्यवर्ग की कमी है, इसलिए अभी यह संभव नहीं दिखता.’ प्रो. आर्य इस बारे में कहते हैं, ‘1998 में दलित हिस्ट्री कांग्रेस हुआ था. उसमें कांशीराम शामिल हुए थे. मैं भी गया था. कांशीराम जी ने तब कहा था, अभी से ही लगना होगा. कम से कम 40-50 अपने लोग संसद में होने चाहिए. तब बाबा साहब की जयंती मनाने का मतलब होगा. उसके बाद वे इस काम में लग गए थे.’ प्रो. आर्य कहते हैं, ‘इतनी बड़ी योजना और फिर धैर्यपूर्वक उस योजना पर काम करने वाला बिहार में कोई दिखता ही नहीं, तो यह संभव होगा, ऐसा नहीं लगता.’

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘इसके पीछे कई कारण हैं कि बिहार की दलित राजनीति उत्तर प्रदेश की तरह अभी आगे नहीं बढ़ सकी है. इसके लिए आपको अभी का समय नहीं देखना होगा. पिछड़ों की गोलबंदी 30 के दशक में त्रिवेणी संघ के जरिए ही शुरू हो गई थी. आजादी के बाद कांग्रेस का राज आया. दलित कांग्रेस के साथ चले गए. बीच में लोहिया ने ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ का नारा चलाया. पिछड़े लोहिया के इस नारे के साथ हो गए, दलित समाजवादी आंदोलन से नहीं जुड़े. वे कांग्रेस के साथ ही रह गए. लालू का उभार हुआ तब दलितों ने कांग्रेस का साथ छोड़ा. इसलिए दलितों में बेचैनी और अपना एक अलग ठांव तलाशने के बावजूद वह नेतृत्व नहीं मिल पा रहा, जिस तरह से पिछड़ों को बिहार में मिल रहा है. लेकिन इस बार के चुनाव ने ये संकेत दिए हैं कि तमाम लहर वगैरह के बावजूद दलितों ने भाजपा का साथ दिया. यह एक किस्म की बेचैनी ही है कि इतने आंधी-तूफान के बावजूद दलित वोट इधर-उधर हुआ. पासवान-मांझी को मिलाकर तकरीबन 7.5 प्रतिशत वोट मिले हैं. ये कम नहीं है. बस, देखना यह होगा कि मांझी कहीं फिर से लालू-नीतीश के साथ न चले जाएं. अगर ऐसा नहीं होता है और मांझी कोई दीर्घकालिक राजनीति का रास्ता अपनाते हैं तो बिहार की राजनीति में बहुत कुछ बदलेगा.’

ये बात सही भी लगती है. ऐसे कई कारण रहे हैं, जिसकी वजह से बिहार में दलित राजनीति स्वतंत्र रूप से परवान नहीं चढ़ सकी. उत्तर प्रदेश में इसकी बढ़त का एक दूसरा कारण यह भी रहा कि वहां वाम दलों का कभी प्रभाव नहीं रहा जबकि बिहार में वाम दल शुरू से ही सक्रिय रहे और दलितों के बीच उनकी पकड़ भी रही. यह भी सही है कि लालू पहले भी चाहते थे, अब भी चाहेंगे कि मांझी उनके खेमे में आएं. लालू को भी पता है कि इस बार के चुनाव में दलितों ने या अतिपिछड़ों ने गोलबंदी कर एक तरीके से उस पुराने ऋण को भी चुकाया है, जो लालू का एक तरीके से बकाया-सा भी था. लेकिन दलितों या अतिपिछड़ों ने तब यह ऋण चुकाया है, जब लालू प्रसाद सबसे मुश्किल दिनों में राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे थे. बिहार की राजनीति अनिश्चित है. ऐसे में यहां की दलित राजनीति किसी करवट बैठेगी और क्या इस समुदाय से कोई बड़ा नेता उभरेगा? इसके जवाब में अब भी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है.

‘मेेरी कहानियां भारत-पाक के बीच की नफरत को चुनौती देती हैं’

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ओरल हिस्ट्री प्रोजेक्ट के तहत आपकी किताब  ‘द फुटप्रिंट्स ऑफ पार्टीशन’  आई है. इस प्रोजेक्ट के तहत आपने 600 लोगों के साक्षात्कार लिए. इतने सारे लोगों से मिलकर बातचीत करने का अनुभव कैसा रहा?

अद्भुत! जिस किसी से भी मैंने बात की, उस ही के पास बहुत सशक्त कहानियां थीं. कई बार मुझे खुद को यकीन दिलाना पड़ता था कि ये कहानियां सच्ची हैं क्योंकि वे काफी अवास्तविक लगती थीं. मुझे ये यकीन करना मुश्किल लगता था कि सचमुच वैसी परिस्थितियों से कोई गुजरा होगा. निश्चय ही हिंसा भरी कहानियों को सुनना काफी मुश्किल था. अतीत की यादों में ऐसी ही कहानियां भरी पड़ी थीं, जो दिल दहलाने वाली भी थीं. बातचीत के कई दिनों बाद तक भी मैं उन लोगों की बातों को भूल नहीं पाती थी. उनकी आवाजें मेरे कानों में गूंजती रहती थीं. जिन लोगों से बातचीत हुई वे काफी दिलचस्प थे. कई बार उनकी बातें मेरे अपने देश के अतीत के बारे में मेरी समझ को चुनौती देती थीं. वे मेरे सामने एकदम दूसरी तरह की कहानियां पेश कर रहे थे जिसकी वजह से मैं जो जानती थी मुझे उसे भुलाना पड़ा और नई बातें जानने के लिए एक नई प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी.

क्या इन साक्षात्कारों में वर्तमान समय की छाप महसूस की? या फिर उन्होंने कुछ अलग तरह की कहानियां बताईं, जिन्हें आप मेटा-नेरेटिव (विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं और अनुभवों को व्यापकता के साथ बताना) कहती हैं और जिनसे अतीत के पुनर्लेखन में मदद मिली?

मुझे लगता है समय के साथ अतीत से जुड़ी यादों में एक बदलाव आ जाता है और वे वर्तमान में प्रचलित हिंसा और दुश्मनी की कहानियों से प्रभावित हो जाती हैं. जिनसे मैंने बात की उनमें से बहुत से लोग ऐसे थे जिन्होंने हिंसा और सदमों की सामान्य कहानियों का एक प्रकार से व्यक्तिगत बना लिया था. इस तरह कुछ हद तक मैं कह सकती हूं कि इन साक्षात्कारों पर हमारे वर्तमान समय की छाप है. बहरहाल, जब आप बातचीत में कुछ और गहरे उतरते हैं तो पाते हैं कि कहानियों और अनुभवों की बहुत सी परतें उनके अंदर हैं, जिन्हें उन्होंने वर्षों से अपने भीतर दबाकर रखा है.

कई वर्षों तक मेरी नानी लाहौर के शरणार्थी कैंप में देखे गए खून-खराबे के अनुभव सुनाती थीं. जब मैंने यह किताब लिखनी शुरू की तब मैं फिर से उनके पास गई और उनसे अलग-अलग तरह के सवाल किए. हमारी बातचीत के दौरान अचानक ही उनकी सहेली उमा और राजेश्वरी की कहानियां निकलकर आईं. इसी बातचीत के दौरान पहली बार पता चला कि विभाजन के समय हुए दंगों के दौरान उनकी बहन को एक सिख परिवार ने बचाया था. अन्य लोगों ने भी इसी तरह की कहानियां सुनाईं, जो मुख्यधारा में होने वाली एकपक्षीय चर्चा (भारत और पाकिस्तान के बीच नफरत से जुड़ी बहस) को कड़ी चुनौती देती हैं.

Book Review-1लेकिन आपने इसके लिए केवल पाकिस्तान के लोगों के साक्षात्कार लिए हैं. दो अलग राजनीतिक और वैचारिक धुरियों वाले देशों में और भी अलग तरह की कहानियां हैं या नहीं, ये देखने के लिए भारत की यात्रा क्यों नहीं की?

मैंने भारत से भी कुछ कहानियां इकट्ठी की हैं. मैं मानती हूं कि सीमा पार भी कुछ व्यापक शोध किया जा सकता था, लेकिन वीजा की समस्या, फंड की कमी और किताब लिखते और शोध करते समय नौकरी करने के कारण यह संभव नहीं हो पाया. फिर भी, अपनी छोटी-सी भारत यात्रा में मैंने जिससे भी बात की, मैंने पाया कि इतने सारे मतभेदों के बावजूद उनकी भावनाएं पाकिस्तान के लोगों जैसी ही थीं. पुरानी यादों के प्रति लगाव, अपने पुराने घरों को देखने और पड़ोसियों से मिलने और उनके साथ इतने समय में क्या हुआ, ये जानने की चाहत भारत और पाकिस्तान के बहुत से लोगों में आज भी बरकरार है.

किताब में कहा गया है कि विभाजन के समय  धार्मिक और सांस्कृतिक पहचानों को लेकर पनपी कट्टरता समय के साथ कम हो गई है. यह निष्कर्ष कैसे निकाला?

साक्षात्कारों से! मैं मुख्यधारा में प्रचलित ऐसे विमर्श के साथ बड़ी हुई हूं, जहां कहीं भी यह जिक्र नहीं मिलता कि हिंदू, मुस्लिम और सिख एक साथ इबादत कर सकते हैं और एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल हो सकते हैं या फिर शांति से एक साथ रह सकते हैं. जब मैंने ये कहानियां सुनीं तो पाया कि एक ओर अलगाव की कहानियां तो हैं लेकिन ईद, लोहड़ी, दिवाली और दशहरा एक साथ मिलकर मनाए जाने की कहानियां भी हैं. शोध के दौरान मैंने यह भी पाया कि पाकिस्तान में (विभाजित होने वाली सीमा के आसपास भी) आज की तारीख में भी ऐसा माहौल है, लेकिन एक आम पाकिस्तानी के लिए ये कल्पना से  परे की बात है.

मैंने जिन लोगों से बात की, उनमें ऐसे बहुत से लोग हैं जो आज, बंटवारे के 68 साल बीत जाने के बावजूद तथाकथित ‘गैरोंं’ से अपने सदियों से चले आ रहे संबंध खत्म नहीं करना चाहते. एक का जिक्र मैंने अपनी किताब में भी किया है कि विभाजन से पहले किस तरह एक सिख परिवार ने पिता के रूप में एक मुस्लिम को अपनाया. उनके लिए यह कोई अजीब बात नहीं थी लेकिन हम जैसे लोग, जो 1980 के दशक के आखिरी सालों में जन्मे हों, (जब दोनों मुल्कों के बीच तनाव चरम पर था) के लिए यह हैरानी की बात है .

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भारतीय इतिहासकार उर्वशी बुटालिया के साथ लाहौर के ‘द लास्ट वर्ड’ बुकस्टोर में अनम

किताब को पाकिस्तान में कैसी प्रतिक्रिया मिली? अतीत को अलग तरह से देखने की जो कोशिश आपने इस किताब में की है, क्या आज के दौर में संभव है? क्या इससे दोनों मुल्कों के रिश्ते में कोई सुधार आएगा?

अब तक तो किताब को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. इससे मैं काफी खुश हूं क्योंकि इसका मतलब है अतीत को अलग तरह से देखे जाने का माहौल बाकी बचा है, जिसे  मैं सामने लाने की कोशिश कर रही हूं. दोनों  मुल्कों के बीच वर्तमान माहौल सचमुच काफी तनाव भरा है. यह देखना काफी दुखद है कि किस तरह उच्च स्तरीय नीतियां जमीनी स्तर पर लोगों के संबंधों को प्रभावित करती हैं. मुझे नहीं पता कि मेरी किताब इन नीतियों पर कितना प्रभाव डाल पाएगी लेकिन मुझे यह उम्मीद है कि यह किताब इस बात को जरूर सामने रखेगी कि सीमा के दोनों ओर राजनीतिक मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ है. सरकारी नीतियां अक्सर आम जनता की राय को प्रभावित करती हैं, मुझे उम्मीद है कि मैंने जिन कहानियों को सामने रखा है, वे कोई पारंपरिक राय बनाने के संदर्भ में एक नम्र चुनौती का काम करेंगी.

‘सुषमा स्वराज कहीं बेहतर कर सकती थीं, लेकिन उनके पूरे काम पर प्रधानमंत्री कार्यालय का ग्रहण लगा हुआ है’

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मोदी की विदेश नीति के बारे में आप क्या सोचते हैं?

यह काफी निराशाजनक है! उन्हें विदेश नीति की समझ नहीं है. भारत दुनिया का कोई पुलिसमैन नहीं है और उसे वैसा होने की इच्छा भी नहीं रखनी चाहिए. आपको अच्छा संवाद आना चाहिए. आप एकतरफा बात नहीं कर सकते. हर नेता अपने देश के बारे में कोई न कोई सपना बेचता है. उदाहरण के लिए मलेशिया का नारा है, ‘मलेशिया! आपका दूसरा घर!’ हम भी दूसरे शब्दों में यही बात कह रहे हैं, ‘आइए! ‘मेक इन इंडिया’ आइए! भारत में निवेश कीजिए लेकिन साफ ढंग से कहा जाए तो इस एकतरफा संवाद के तरीके से कोई क्यों प्रभावित होगा और दिलचस्पी लेगा?

लोग दिलचस्पी ले रहे हैं क्योंकि वे भारत को एक बाजार के रूप में देखते हैं. यही हमारी ताकत भी है. किसी और चीज में उनकी दिलचस्पी नहीं है. आपको उन्हें बताना चाहिए कि वे भारत किसलिए आएं. उन्हें बताना चाहिए कि भारत से निर्यात करने के लिए या फिर भारत में निवेश करने के लिए भारत आएं. जब मोदी कहते हैं ‘मेक इन इंडिया’ तो अभी तक यह साफ नहीं है कि उसका ठीक-ठीक क्या मतलब है. वे भी भारतीय बाजार को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं, लेकिन यह पिछले दो दशक से हो रहा है.

कांग्रेस के पुराने आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस की अपेक्षा मोदी पश्चिम के देशों के साथ ज्यादा मजबूती से पेश आ रहे हैं. उनका कहना है कि यूपीए सरकार चीन और रूस से डरती थी.

लेकिन क्या सचमुच आप रूस की उपेक्षा कर सकते हैं? अमेरिका भी ऐसा नहीं कर सकता. क्या आप चीन और जापान को नजरअंदाज कर सकते हैं? क्या आप चीन जाकर ये जता सकते हैं कि जापान है ही नहीं? क्या आप वियतनाम जाकर यह सोच सकते हैं कि चीन है ही नहीं.

पूरी दुनिया आज काफी जटिल हो चुकी है. लेकिन मोदी इस सबको सरलीकरण में देखते हैं. मुझे लगता है कि सिर्फ ‘मैं,’ ‘मेरा’ और ‘जो मैं सोचता हूं’ की बात की जा रही है. दुनिया से आप इस तरह पेश नहीं आ सकते. दुनिया के साथ काफी समझदारी से सौदे करने होते हैं. दुनिया से सौदे करने का मतलब है बड़ी मात्रा में लेन-देन करना. लेकिन मोदी का ध्यान दूसरी ओर है. अभी तक वे यह देख पाने में नाकाम रहे हैं कि जिस तरह से पश्चिम भारत को एक बाजार के रूप में देखता है वैसे ही भारत अफ्रीकी महाद्वीप को एक बाजार के रूप में देखता है. लेकिन अफ्रीका के बाजारों पर हम अभी तक ध्यान नहीं दे रहे हैं. जबकि हमारी स्थिति अफ्रीका में चीन की अपेक्षा कहीं ज्यादा मजबूत हैं. अफ्रीकी महाद्वीप के साथ हमारा ऐतिहासिक जुड़ाव है. मध्यपूर्व में भी हमारी स्थिति मजबूत है. लेकिन आप मध्यपूर्व में भारतीयों से मिलने नहीं जाते. आपको वहां जाकर सरकारों से भी बात करनी चाहिए. लेकिन मोदी सिर्फ भारतीयों से बात करते हैं. मध्य पूर्व जानना चाहता है कि ईरान और सऊदी अरब में क्या हो रहा है? तुर्की और मिस्र का क्या भविष्य है? आईएसआईएस की समस्या से कैसे पेश आया जाए? वे जानना चाहते हैं कि फलस्तीन कब एक वास्तविकता बनेगा? क्या मोदी ने कभी इन विषयों पर बोला है? फिर कौन सी विदेश नीति है उनकी?

विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी की सबसे बड़ी नाकामी क्या है?

दुनिया को समझने की उनकी नाकामी. गुजरात से आगे उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता. यहां वे भारत को भी नहीं समझते. बिहार के चुनाव परिणाम ने यह साफ तौर पर बता दिया है. वे दुनिया के बारे में क्या जानेंगे, जब वे भारत के बारे में ही कुछ नहीं जानते?

नेपाल से कमजोर होते संबंधों को किस प्रकार देखते हैं?

फिर से यही कहूंगा कि नेपाल कोई अनुयायी नहीं है. नेपाल मित्र है. हम चाहते हैं कि नेपाल शक्तिशाली देश बने. जब मोदी यह कहते हैं कि वहां का संविधान मधेसी समुदाय के हितों के लिहाज से अधिक समावेशी होना चाहिए तो उनकी इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता. लेकिन अगर यह मुद्दा हमारी चिंता में था तो इस पर हमें गंभीरता से काम करना चाहिए था. हमें इस पर मनन करना चाहिए कि हमारी निगरानी के बावजूद ऐसा कैसे हो गया. और अब जब ऐसा हो ही चुका है तो हमें इस समस्या को सुलझाने के बारे में सोचना चाहिए.

चीन के साथ संबंधों के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको लगता है कि मोदी शक्ति संतुलन बनाने में सफल होंगे?

कैसा शक्ति संतुलन? चीन ने उन्हें घुमा दिया. हमें बिना कुछ दिए हमसे चीन काफी कुछ हासिल कर रहा है. चीन भारत में निवेश करना चाहता है इसलिए चीन भारत में निवेश करेगा ही. राजीव गांधी के समय से ही चीन के साथ एक संबंध विकसित हो रहा है. यह सारा काम हमारे द्वारा किया जा चुका है. लेकिन इस बारे में साफ तौर पर एक समझ रही है कि यह सब हड़बड़ी में नहीं किया जाना चाहिए. बहरहाल, यह बताइए कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के विषय में चीन ने मोदी की कौन-सी मदद की है? चीन ने भारत को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर समर्थन देने के लिए क्या किया है? हमें चीन को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है साथ ही हमें यह भी कोशिश करने की जरूरत हैै कि वो हमें बेहतर तरीके से समझे. आप चीन को किसी और से सामना करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते. आपको उनसे सीधे दिल का रिश्ता कायम करना होगा.

मुझे लगता है सुषमा कहीं बेहतर कर सकती थीं. वे काफी ऊर्जावान मंत्री हैं लेकिन उनके पूरे काम पर प्रधानमंत्री कार्यालय का ग्रहण लगा हुआ है. सुषमा की असहायता स्पष्ट तौर पर नजर आती है

क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध रखना महत्वपूर्ण है भारत के लिए?

कौन नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान के साथ संबंध अच्छे हों. लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि किसकी कथनी और करनी में अंतर है. पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध रखना बहुत ज्यादा आसान नहीं है. अगर कोई समस्या न हो तो पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध होना बड़ा मसला नहीं. लेकिन समस्याएं हैं और ये बहुत ही गंभीर हैं. हम न सिर्फ पूर्वी सीमा की तरफ से उसके लिए समस्या हैं बल्कि पश्चिम से भी समस्या ही हैं, क्योंकि अफगानिस्तान हमारा मित्र देश है.

विदेश मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज के बारे में क्या सोचते हैं?

सुषमा बेहतर हैं. मुझे लगता है वे कहीं बेहतर कर सकती थीं. वे काफी ऊर्जावान मंत्री हैं लेकिन उनके पूरे काम पर प्रधानमंत्री कार्यालय का ग्रहण लगा हुआ है. इसमें हैरानी की बात नहीं है, लेकिन सुषमा स्वराज की असहायता ज्यादा से ज्यादा स्पष्टतौर पर नजर आती है. वे काफी मुश्किल परिस्थितियों में काम कर रही हैं.

हालांकि भारत की विदेश नीति पर राष्ट्रीय राजनीति का असर कम ही पड़ता है लेकिन हाल ही के घटनाक्रम खासतौर से बिहार के चुनावी नतीजों का कुछ असर पड़ेगा?

सुधारों की स्वीकार्यता हमेशा काफी दिक्कत भरी होती है. अभी इस बारे में कोई टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी.

विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी की सबसे बड़ी सफलता क्या है?

वो जिस गति से अपनी पहुंच बना रहे हैं, उसे निश्चय ही सफलता मान सकते हैं. जिस ऊर्जा से वे आगे बढ़े हैं, उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते, भले ही उसका कोई परिणाम मिलता नजर नहीं आता.

दलित उत्पीड़न का वर्तमान

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फोटोः विजय पांडेय

जिस समाज में हम रहते हैं वह उत्सवप्रेमी है, कानूनप्रेमी नहीं. हम पूरे ताम-झाम से आम्बेडकर जयंती, संविधान दिवस तो मना लेते हैं लेकिन आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर रोज हो रहे हमलों को लेकर उदासीन बने रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी ‘आम नागरिकों’ को एक तराजू पर तौला जा सकता हो. इसे कई श्रेणियों में बांट कर देखना ही उचित है. जिस समूह के अधिकारों की जरा भी परवाह यह समाज नहीं करता, वह दलित समुदाय है. असल में, दलित समुदाय के संदर्भ में संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न बाद में आता है, प्राथमिक सवाल उनके जीवन और उनके अस्तित्व का है.

आजादी मिलने के बाद से दलित समुदाय अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए संघर्षरत है. अस्मिता का मुद्दा उनके लिए महत्वपूर्ण है जिनका वर्गांतरण हो चुका है या हो रहा है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है. कभी माना गया था कि जो दलित कस्बाई या शहरी हो गए हैं, जीवन की बुनियादी सुविधाएं जुटा चुके हैं, थोड़ी बहुत शिक्षा हासिल कर ली है, वे हिंसक जातिवादी हमलों की परिधि से बाहर आ चुके हैं. अब यह मान्यता बेतरह खंडित हो चुकी है. ऐसे साक्ष्यों का हमारे सामने अंबार लगा हुआ है जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि जातिवादी मानसिकता किसी भी श्रेणी के दलित को नहीं बख्शती. गांव से लेकर कस्बे तक, धुर देहात से लेकर महानगरों तक दलित हर जगह असुरक्षित हैं. वे हमेशा संकट के साये में जीते हैं. उनका घर-बार कभी भी लूटा जा सकता है. उनके पक्के मकानों से लेकर झुग्गियां तक कभी भी आग के हवाले की जा सकती हैं. दलित स्त्रियों के साथ कहीं भी और कभी भी बलात्कार हो सकता है. दुधमुंहे दलित बच्चों पर कभी भी पेट्रोल डालकर माचिस की तीली दिखाई जा सकती है. अपने दर्द का बयान करने वाले नवोदित दलित लेखकों को कभी भी घेरा जा सकता है. उनकी अंगुलियां काटी जा सकती जा सकती हैं या काटने की धमकी दी जा सकती है. आज जातिवादी हिंसा अपने उफान पर दिखाई दे रही है.

अब भी कुछ लोग यह कहते मिल जाएंगे कि जातिवाद गुजरे दिनों की हकीकत है. अब समाज बहुत आगे चला आया है. अब जाति की परवाह कौन करता है? ऐसे लोगों से सिर्फ इतना कहना चाहिए कि वे अखबारी रपटों पर एक नजर डाल लें. एक बार वैवाहिक विज्ञापनों पर सरसरी निगाह फेर लें. जाति व्यवस्था की विकट उपस्थिति जाहिर हो जाएगी. अंतरजातीय विवाह करने वालों के साथ जातिवादी समाज कितनी क्रूरता से पेश आता है, इसकी तमाम मिसालें आसपास मिल जाएंगी. पिछले डेढ़ दशक पर ही हम अपना ध्यान केंद्रित करें और जाति आधारित हिंसा की कुछ चुनिंदा घटनाओं को याद करें तो इस समाज की भयावह सच्चाई का कुछ अंदाज लग जाएगा. देश की राजधानी की नाक के ठीक नीचे महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर आर्थिक रूप से विकसित हरियाणा राज्य में जातिवादी हमलों का एक सिलसिला चल रहा है. अक्टूबर 2002 में झज्जर जिले के दुलीना पुलिस चौकी इलाके में 5 दलित युवकों को गाय मारने के शक की बिना पर पीट-पीट कर मार डाला गया. इसी राज्य के सोनीपत जिले की तहसील गोहाना में अगस्त 2005 में पूरी वाल्मीकि बस्ती लूट कर जला दी गई. सोनीपत के पड़ोसी जिले करनाल के महमूदपुर में फरवरी 2006 में जाटव मोहल्ले पर हमला हुआ. इसमें मोहल्ले के करीब दो दर्जन लोग घायल हुए. बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया. करनाल जिले के ही सालवन गांव में मार्च 2007 में लगभग 300 दलित घरों पर हमला हुआ. लूटने के बाद हमलावरों ने तमाम घरों में आग लगा दी. अप्रैल 2010 में हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में वाल्मीकि बस्ती पर हमला हुआ. हमलावरों ने दो दर्जन घरों को आग लगा दी, कई घरों में लूटपाट की और हमले के वक्त सुबह नौ बजे बस्ती में जो भी मिला, उन्हें बुरी तरह मारा पीटा. ताराचंद वाल्मीकि की बारहवीं दर्जे में पढ़ने वाली होनहार बेटी सुमन (18 वर्ष) पोलियोग्रस्त होने के कारण भाग न सकी. पिता भी उसी के साथ रुके रहे. हमलावरों ने बाप-बेटी दोनों को जला दिया. दलितों को जिंदा जलाने का यह क्रम अभी हाल में पुनः संपन्न किया गया.

20 अक्टूबर, 2015 को फरीदाबाद जिले के सुनपेड गांव में दो दलित बच्चों- दिव्या (10 माह) और वैभव (2 वर्ष) को पेट्रोल डालकर जला दिया गया. इन बच्चों की मां रेखा (22 वर्ष) भी आंशिक रूप से जल गईं. उनका इलाज चल रहा है. पिता जितेंद्र (26 वर्ष) तक हमलावर पहुंच नहीं सके. हरियाणा के ठीक बगल में राजस्थान का हाल भी दलित उत्पीड़न के मामले में बिगड़ता नजर आ रहा है. इसी साल मई महीने में जाटलैंड कहे जाने वाले नागौर जिले के डांगावास गांव में तकरीबन 300 दबंगों ने योजना बनाकर दलित मेघवाल परिवार पर हमला किया. उन्होंने गृहस्वामी रतनाराम (65) को बेहद क्रूरता से मार डाला. पहले उनके ऊपर ट्रैक्टर चलाया गया फिर आंखों में अंगारे डाल दिए गए. उनके साथ ही परिवार के पांचाराम (55) और निकट के रिश्तेदार पोखरराम को भी मौत के घाट उतार दिया गया. हमले के शिकार चौथे व्यक्ति गणपतराम (35) की मेड़ता के अस्पताल में मृत्यु हो गई. अजमेर अस्पताल में पांचवें व्यक्ति गणेशराम (21) की मौत हुई. घर की महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई. पप्पूड़ी देवी (32), बीदामी (60), सोनकी देवी (55), जसोदा (30), भंवरी (27) और शोभादेवी (25) के हाथ-पांव तोड़ दिए गए. उनके गुप्तांगों में लकड़ी डाली गई. इसके अलावा खेमाराम, मुन्नाराम, अर्जुनराम और किसनाराम को भी अपंग बनाने की कोशिश हुई. लोहे की रॉड से इनके हाथ-पांव तोड़े गए. ट्रैक्टर सहित घर का सारा सामान लूट लिया गया. 4 मोटर साइकिलें, ट्राली और अन्य वस्तुएं जला दी गईं. मेड़ता अस्पताल में भर्ती होने आए घायलों पर भी हमला हुआ. इस भीषण हत्याकांड के पीछे जमीन का मसला था.

किसी एक दलित व्यक्ति का झगड़ा अगर गैर दलित से होता है तो निशाने पर समूची दलित बस्ती ले ली जाती है. विवाद में शामिल दलित अपने पूरे जाति समुदाय का प्रतिनिधि मान लिया जाता है. बदला एक से न लेकर समूचे मोहल्ले से लिया जाता है

पिछली शताब्दी के सातवें दशक में गांव के दलित बस्ताराम मेघवाल ने 23 बीघे जमीन गांव के ही एक जाट परिवार को रेहन पर दी थी. बस्ताराम के वारिस रतनाराम ने जब यह जमीन वापस मांगी तो उन्हें दुत्कार दिया गया. बाध्य होकर उन्होंने अदालत की शरण ली. 1997 में दीवानी न्यायालय से पहली बार नोटिस जारी हुआ. फिर हाल ही में अदालत का फैसला रतनाराम के पक्ष में आया. यह दबंगों को नागवार गुजरा. उन्होंने दुस्साहसी दलित परिवार को सबक सिखाने के लिए ऐसी नृशंसता की. प्राप्त जानकारी के अनुसार इस गांव में दलितों की लगभग एक हजार बीघे जमीन दबंगों के कब्जे में है. दहशत का माहौल बनाने के लिए इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया. मकसद था कि एक परिवार का हश्र देखकर गांव के शेष दलित अपनी जमीन वापस मांगने की जुर्रत नहीं करेंगे. पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका अत्यंत संदिग्ध रही. वह साफ तौर से हमलावरों के पक्ष में खड़ी दिखी. हमले के दिन खबर मिलने के बावजूद थाने से 20 मिनट का रास्ता तय करने में उसने करीब दो घंटे लगाए. पहुंची तब जब हमलावर अपना काम करके जा चुके थे. अस्पताल में जब दलितों पर हमला हुआ तो पुलिस वहीं मौजूद थी, मगर मूकदर्शक बनी रही. पुलिस का यही रवैया दलित उत्पीड़न के हर मामले में दिखता है. गोहाना कांड में लूटपाट और आगजनी में हमलावरों को ढाई-तीन घंटे लगे. गोहाना से सोनीपत, पानीपत और रोहतक लगभग समान दूरी पर हैं. दमकल की गाड़ी को गोहाना तक पहुंचने में आधे से एक घंटे लगते हैं. मगर तीनों दमकल केंद्रों से गाड़ियां तब पहुंची जब लूटपाट हो चुकी थी और सारे मकान जल चुके थे. पुलिस को इस हमले के बारे में पहले से सूचना भी थी. मिर्चपुर कांड के दौरान पुलिस घटनास्थल पर ही तैनात थी. तब भी उसने कोई कार्यवाही नहीं की. सालवन में भी यही दोहराया गया. लगभग 300 झोपड़ियां और मकान लूटे गए, जलाए गए और प्रशासन देखता रहा.

दलित दमन की घटनाओं में एक और बात गौर करने लायक है. किसी एक दलित व्यक्ति का झगड़ा अगर गैर दलित से होता है तो निशाने पर पूरा दलित समुदाय, समूची दलित बस्ती ले ली जाती है. विवाद में शामिल दलित अपने पूरे जाति समुदाय का प्रतिनिधि मान लिया जाता है. बदला एक से न लेकर समूचे मोहल्ले को सबक सिखाया जाता है. जाति आधारित हिंसा के मामलों में पुलिस प्रशासन की भूमिका इतनी बार जाहिर हो चुकी है कि दलित आसान शिकार मान लिए गए हैं. पुलिस एफआईआर लिखने में आनाकानी करती है. रिपोर्ट लिखी भी तो तथ्यों और सूचनाओं को दबंगों के हित में यथासंभव तोड़-मरोड़ दिया जाता है. इससे आगे न्याय पाने का रास्ता अवरूद्ध रहता है. दलित उत्पीड़न के मामलों में दोषसिद्धि की दर चिंताजनक रूप से निम्न है.

एक और बात विचारणीय है. उत्पीड़न के तमाम मामलों का विश्लेषण करें और उत्पीड़कों की वास्तविक जाति की शिनाख्त करें तो पाएंगे कि इस समाज की प्रायः सभी जातियां दलितों के विरूद्ध हैं. शास्त्रीय शब्दावली में माना जाता रहा है कि दलितों के उत्पीड़क त्रैवर्णिक (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) हैं. इधर की घटनाएं साबित करती हैं कि जो जाति समुदाय चौथे वर्ण में आते हैं, वे भी दलितों पर हिंसा करने में पीछे नहीं हैं. ओडिशा के बालंगीर जिले के लाठोर कस्बे में जनवरी 2012 में दलित बस्ती पर हमला हुआ. लूटने के बाद बस्ती में आग लगा दी गई. गैस सिलेंडर में विस्फोट करके छत उड़ा दी गईं. लगभग 40 घर तबाह हो गए. यह दलित बस्ती सुना जाति की है. हमलावर मेहर जाति के लोग थे जो ओबीसी श्रेणी में आते हैं. झगड़ा बहुत मामूली बात पर शुरू हुआ. एक दलित लड़का मेहर जाति की दुकान पर शर्ट खरीदने गया. वहां दुकानदार से उसकी बक झक हो गई. उसी का बदला लेने के लिए इतना बड़ा हमला किया गया. इस हमले की भनक दलित बस्ती को लग गई थी, इसलिए इसमें हताहत तो कोई नहीं हुआ मगर आर्थिक तबाही ऐसी हुई कि वर्तमान स्थिति तक आते-आते दलितों को एक दशक से कम नहीं लगेगा. कुछ ऐसा ही खौफनाक मंजर तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में नजर आया. यहां नवंबर 2012 में नायकनकोट्टाइ के तीन गांवों पर एक साथ हमला किया गया. परैयार दलितों के लगभग 500 घर लूटे गए और करीब साढ़े तीन सौ मकानों को आग के हवाले कर दिया गया. यहां भी हमला तकनीकी रूप से अति पिछड़ी जाति (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट-एमबीसी) वन्नियार ने किया. मसला अंतरजातीय विवाह का था. दलित युवक इलावरासन और वन्नियार युवती दिव्या ने आपसी सहमति से शादी कर ली. यह बात वन्नियारों को सह्य नहीं थी. उन्होंने दलितों को सबक सिखाने के लिए ऐसी साजिश रची कि वे अगले दो दशकों तक शायद ही अपनी आर्थिक हालत ठीक कर सकें.

दलितों के उत्पीड़न की मीडिया में चर्चित ये कुछ-एक बानगियां थीं. छोटे-छोटे जातिवादी हमलों और वैयक्तिक हिंसा के मामले अखबारों के पन्ने पर रोज देखे जा सकते हैं. अगर हम सचमुच डॉ. आम्बेडकर और उनके रचे संविधान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहते हैं तो इस अनवरत क्रूरता को तत्काल रोकने के उपाय ढूंढने होंगे.

(लेखक वरिष्ठ आलोचक और चिंतक हैं)

हरियाणाः दलितों की कब्रगाह

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फोटोः विजय पांडेय

23 मार्च, 2014 को हरियाणा के हिसार जिले में भगाना गांव की चार दलित लड़कियों के साथ कथित रूप से गैंगरेप किया गया. लगभग डेढ़ साल बीत चुका है लेकिन कथित आरोपियों को सजा मिलनी अभी बाकी है. हिसार की स्थानीय अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है. गांव के दलित अपना विरोध जारी रखे हुए हैं लेकिन सरकार ने इस ओर से अपने कान बंद कर लिए हैं और न्याय तंत्र में भी उनके पक्ष की कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

हिसार शहर से 10 किमी. दूर स्थित भगाना हरियाणा का पारंपरिक बसावट वाला ऐसा गांव है जहां बड़ी संख्या में प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग रहते हैं. जाट समुदाय के लोग गांव के बीचोबीच में रहते हैं और सीमांत पर दलित समुदाय के लोग रहते हैं. वर्तमान सरकार और पिछली सरकारों की सारी योजनाओं में इन भेदभाव भरे जाति संबंधों को बदलने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. अब भगाना उस जाति आधारित हिंसा का केंद्र बन चुका है जो हरियाणा और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में उभर रही है.

भगाना गैंगरेप की पीड़िताएं और उनके परिवार अब खौफ के माहौल में जी रहे हैं क्योंकि कथित बलात्कारी खुलेआम घूम रहे हैं. पीड़ितों की न्याय की मांग को नकार कर व्यवस्था ने एक प्रकार से गांव में जातिगत भेद को और पुख्ता कर दिया है. गांव के दलितों के अनुसार उच्च जाति के लोग दलित लड़कियों को अब भी छेड़ते हैं. इस कारण से दलित लड़कियां दिन ढलने के बाद घर से निकलने का साहस नहीं कर पातीं. 14 वर्षीय शांति (बदला हुआ नाम) ने लंबे वक्त तक दोषियों को सजा मिलने का इंतजार किया लेकिन अब उन्हें न्याय की उम्मीद कम ही है. ‘शुरुआत में मैं लड़ने के लिए दृढ़ थी और मुझे लगता था कि मैं उन्हें (दोषियों को) जेल भेज कर रहूंगी. लेकिन अब मैं टूट चुकी हूं और उम्मीद खो चुकी हूं. बलात्कारी खुलेआम घूम रहे हैं और मेरी जिंदगी नरक बनकर रह गई है, क्यों? क्योंकि मेरा बलात्कार हुआ है?’ ये कहते हुए वह रो देती हैं. उनकी मां बताती हैं कि न्याय के लिए उन्होंने कितना संघर्ष किया. ‘जो कर सकते थे, हमने वह सब किया. हमने राष्ट्रीय महिला आयोग से भी संपर्क किया और सोनिया गांधी के पास भी गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. यहां तक कि राष्ट्रीय महिला आयोग ने तो हमारा मामला अपने पास लेने से ही इंकार कर दिया.’

दलितों की लड़ाई बराबरी और सम्मानजनक जीवन के लिए है. ऊंची जातियों के जानवर जिस तालाब से पानी पीते हैं, उसी से दलितों के जानवर भी पानी पी सकें, लड़ाई इस हक की है

शांति का परिवार अब उम्मीद खो चुका है. बहरहाल, कुछ अन्य दलितों ने संवेदनहीन और निष्ठुर व्यवस्था के खिलाफ लड़ने का निर्णय लिया है. गांव में दलितों के घरों की दीवारों पर आप डॉ. आम्बेडकर के चित्र लगे हुए देख सकते हैं. बच्चे नमस्ते नहीं बल्कि ‘जय भीम’ से आपका स्वागत करते हैं. बलात्कार के समय से ही गांव के दलित कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. जब न्यायतंत्र से निराशा हाथ लगी तो इन कार्यकर्ताओं ने सरकार और व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष के लिए विभिन्न मंचों का गठन किया. ऐसा ही एक मंच दिल्ली में है और एक हिसार में है. ऊंची जातियों की हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन के परिणाम गंभीर होते हैं. छोटे-छोटे आरोपों में दलित कार्यकर्ताओं को उठाकर जेल में बंद कर दिया जाता है. उन पर लकड़ी चुराने से लेकर देशद्रोह तक के मामले दर्ज कर दिए जाते हैं. यहां तक कि विरोध करने वाले परिवारों को गांव से बाहर भी खदेड़ दिया जाता है. इन दलित कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य और ऊंची जातियां उनके संघर्ष को खत्म करना चाहती हैं ताकि उन्हें हर रोज होने वाले शोषण का शिकार बनाया जा सके. कार्यकर्ताओं ने अपनी शिकायतें बहुत से मंत्रियों और राज्य अधिकारियों को भेजी हैं लेकिन उन्हें वादों के अलावा कुछ नहीं मिला है.

जब लगातार की जाने वाली अपील और प्रदर्शनों का कोई फायदा नहीं हुआ तो दलित कार्यकर्ताओं ने कुछ ऐसा किया जिससे जाति आधारित पूरी व्यवस्था के दोहरे चेहरे से नकाब उतर गया. अपने प्रदर्शन को अंतिम रूप देते हुए भगाना के दलित परिवारों ने नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना देने के दौरान घोषणा की कि वे सभी इस्लाम धर्म अपना रहे हैं. जो मामला पिछले दो वर्ष में लगभग भुलाया जा चुका था, इस घोषणा के साथ अचानक राजनीतिक संगठनों और मीडिया, दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया. धर्म परिवर्तन को जबरन रोकने के लिए एक ओर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता वहां पहुंच गए, दूसरी ओर खुद को पाक साफ बचाने के उद्देश्य से दिल्ली पुलिस भी वहां पहुंच गई और कार्यकर्ताओं को अपना प्रदर्शन खत्म करने के लिए कहा.

इन दलित परिवारों द्वारा धर्म परिवर्तन की घोषणा ने पूरी व्यवस्था के संवेदनहीन रुख को उजागर किया है. लेकिन पुलिस ने हिंदुत्व के स्वनियुक्त संरक्षक की तरह व्यवहार किया और उन लोगों पर झपट पड़ी जो एक दूसरे धर्म को चुनकर शोषक सामाजिक व्यवस्था की जकड़न से बाहर आना चाह रहे थे. पुलिस और धार्मिक संगठनों की ये आवाजें हालांकि तब आगे नहीं आईं जब भगाना में इन दलित परिवारों के साथ अमानवीय हिंसा की जा रही थी. यह सब कुछ लोकतंत्र के गढ़ राजधानी दिल्ली में हुआ. इस पूरे वाकये से एक सवाल उपजता है- क्या राज्य केवल एक मूकदर्शक है या फिर वह अब जातिवाद को पुष्ट करने की भूमिका में आ गया है?

सतीश, जो कि अब अब्दुल कलाम के नाम से जाने जाते हैं, न्याय की इस लड़ाई में लगातार आगे रहे हैं. उसका कहना हैं, ‘अपने समुदाय को ऊपर उठाने के संघर्ष के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है. मैंने हमारे महान नेता अाम्बेडकर के रास्ते पर चलने का फैसला किया है. मुझे उम्मीद है कि अगर हम लगातार संघर्ष करते रहे तो हमें इस व्यवस्था से एक दिन न्याय जरूर मिलेगा.’ अब्दुल कलाम की आंखों में एक गहरा निश्चय दिखाई देता है. उनका मानना है कि लगातार संघर्ष करते रहने के परिणामस्वरूप कुछ बदलाव आ रहे हैं. ‘मुझे पूरी उम्मीद है कि अगर हम अपनी लड़ाई बीच में न छोड़ें तो हमारी जीत होगी और दोषियों को सजा मिलेगी.’

भगाना के दलितों की लड़ाई सिर्फ बलात्कारियों को सजा दिलाने की लड़ाई तक सीमित नहीं है. लड़ाई में कहीं बड़े मुद्दे भी शामिल हैं. जैसे गांव की सामूहिक जमीन पर जाटों के कब्जे का मामला. शिकायत के बावजूद पुलिस ने इस बारे में कुछ भी नहीं किया. यह लड़ाई खाप पंचायतों द्वारा दलितों के सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ भी है. ऊंची जातियों के जानवर जिस तालाब से पानी पीते हैं, उसी तालाब से दलितों के जानवर भी पानी पी सकें, इस हक के लिए लड़ाई है. दूसरे शब्दों में दलितों की लड़ाई बराबरी और सम्मानजनक जीवन के लिए है.

दिल्ली, जिसे प्रगति, विकास और आधुनिकता का गढ़ माना जाता है, वहां से भगाना गांव तक की दूरी तीन घंटे में तय की जा सकती है. हालांकि ग्रामीण हरियाणा की जातिगत हिंसा का यह किस्सा दिल्ली के सामान्य नागरिक को पिछड़े हुए समुदायों का बर्बर व्यवहार लगेगा. लेकिन हरियाणा में होने वाली यह एकमात्र घटना हो, ऐसा नहीं है. इस तरह की खबरें इफरात में सामने आ रही हैं. हाल ही में फरीदाबाद के सुनपेड गांव में दलित जाति के दो बच्चों को ऊंची जाति के लोगों द्वारा जिंदा जला दिया गया. इसी तरह हिसार के बाठला गांव में ऊंची जाति के लोगों ने एक दलित व्यक्ति को पेड़ से लटका कर मार दिया. दिल्ली से महज दो घंटे की दूरी पर सोनीपत के गोहाना गांव में 14 वर्ष का दलित लड़का रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया गया. पुलिस ने उसे कबूतर चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था. इस तरह की घटनाओं की सूची लंबी होती जा रही है.

जाति आधारित हिंसा की खबरें हर रोज आती हैं. कुछ सुर्खियां बनती हैं तो कुछ खो जाती हैं. हिसार से 20 किमी. दूर बाठला की घटना सुनपेड की घटना की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नहीं हो पाई

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले एक वर्ष में हरियाणा में जाति आधारित हिंसा तेजी से बढ़ी है. दो दलित बच्चों को जिंदा जलाए जाने की हाल की घटना हमें मिर्चपुर की दिल दहलाने वाली घटना की याद दिला देती है. 21 अप्रैल, 2010 को दलितों की पूरी बस्ती को ऊंची जाति के लोगों द्वारा आग के हवाले कर दिया गया था. इस घटना के बाद मिर्चपुर के दलित पलायन करके हिसार में आ गए. अधिकांश दलित परिवार दबंग जाट जाति के खेतों में काम करते थे. इस पलायन के परिणामस्वरूप इन दलित परिवारों का पूरा आर्थिक आधार ही चरमरा गया. अपनी जड़ें छोड़कर हिसार आ बसने पर इन्हें लंबे समय तक कोई काम नहीं मिला और इन्हें दूसरों से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर रहना पड़ा. दूसरी ओर जाटों को उत्तर प्रदेश और बिहार से आए सस्ते मजदूर मिल गए. मिर्चपुर में भी भगाना की तरह दलित परिवार की महिलाओं के साथ ऊंची जाति के लोगों द्वारा बदसलूकी की जा रही थी. जब दलित समुदाय ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनकी बस्ती को जला कर राख कर दी गई. मिर्चपुर के दलित अब एकदम जीर्ण-शीर्ण अस्थायी कैंप में रह रहे हैं. टेंटों में जगह-जगह पानी जमा हो जाने से बीमारियों का खतरा बना रहता है. हालांकि, इस बस्ती को पुलिस सुरक्षा दी गई है, क्योंकि हिसार के कामरी रोड पर बसी इस बस्ती में मिर्चपुर कांड के बहुत से चश्मदीद गवाह भी रहते हैं. 55 वर्ष के सत्यवान कहते हैं, ‘सवाल केवल यही नहीं है कि हम कभी अपने घरों को नहीं लौटेंगे, बल्कि मुद्दा यह है कि व्यवस्था से हमारा भरोसा उठ चुका है. हमने कितनी ही बार पुलिस से सहायता मांगी है, लेकिन कोई फायदा नहीं.’ अपने आंसू रोकते हुए वे कहते हैं, ‘अपनी जगह के साथ हमारी यादें जुड़ी हुई हैं, हम वहां बड़े हुए हैं..लेकिन आज हम भिखारियों की तरह रह रहे हैं.’

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कैंप में रहने वाली एक महिला बहुत आशंकित होकर यह सवाल करती है कि क्या इन अफवाहों में कोई सच्चाई है कि आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा. ऐसा प्रतीत होता है कि मोहन भागवत के हालिया बयान ने यहां हरियाणा के इस कैंप तक पर असर डाला है. इन लोगों की दुर्दशा बताती है कि मिर्चपुर हत्याकांड को भुला दिया गया है. जाति आधारित हिंसा की खबरें हर रोज आती हैं. कुछ सुर्खियां बनती हैं तो कुछ छोटी सी जगह में सिमट कर खो जाती हैं. हिसार से 20 किमी. दूर बाठला की घटना सुनपेड की घटना की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नहीं हो पाई. 8 अक्टूबर को इसी गांव के गुरुचरण को ऊंची जाति के लोगों ने पेड़ से लटका कर मार डाला.

स्थानीय दलित बताते हैं कि गुरुचरण की मौत के एक दिन पहले से कुछ ऊंची जाति के लोग उसका पीछा कर रहे थे. इस परिवार की त्रासदी यहीं नहीं रुकी. गुरुचरण के चाचा बदन सिंह जो इस मामले के चश्मदीद गवाह थे, उन्हें पुलिस स्टेशन बुलाया गया. गांव वाले बताते हैं कि एसीपी जसनदीप सिंह रंधावा द्वारा पूछताछ के बाद बदन सिंह काफी परेशान दिखाई दे रहे थे. गांव वालों का यह भी कहना है कि गुरुचरण के हत्यारों ने बदन सिंह को अपना बयान बदलने के लिए धमकाया था. एक दिन अचानक उन्होंने आत्महत्या कर ली. उसके पास से एक सुसाइड नोट मिला जिसमें लिखा था कि उस पर बयान बदलने के लिए दबाव बनाया गया था. हालांकि, इस सुसाइड नोट की विश्वसनीयता की पुष्टि नहीं हो पाई है.

गांव वालों ने यह भी बताया कि 24 अक्टूबर तक गुरुचरण की हत्या की एफआईआर भी दर्ज नहीं की गई थी. इस कारण उन्होंने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें वे आधे कपड़े पहने थे. इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज कर लिए गए. ‘तहलका’ ने जब जाटों और पुलिस से संपर्क साधना चाहा तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया.

सोनीपत के गोहाना गांव में 14 वर्षीय एक दलित लड़का कबूतर चोरी के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने के बाद रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया गया. हालांकि पुलिस का कहना है कि लड़का अपने घर में मृत पाया गया है और उनका इस मौत से कोई लेना-देना नहीं है. इस घटना से पुलिस और दलित समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया है. गोहाना की घटना के बाद यमुनानगर में 21 वर्षीय दलित युवक को कथित रूप से किसी पुरानी रंजिश के परिणामस्वरूप गांव के पूर्व प्रधान ने जिंदा जला दिया. पुलिस ने इसे प्रथमदृष्टया आत्महत्या का मामला बताया है लेकिन परिवार वालों ने पुलिस की इस कहानी को मानने से इंकार कर दिया है.

हरियाणा और उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों में दलितों को इस तरह से निशाना क्यों बनाया जा रहा है? राजनीतिक विज्ञानी रजनी कोठारी की किताब ‘कास्ट एंड इंडियन पॉलिटिक्स’ के प्राक्कथन में बताया गया है कि ‘जहां दलितों के पास जमीन नहीं है, वहां वे अधिक निशाना बनाए जाते हैं.’ भगाना के दलित, जिनके पास जमीन नहीं है, इस वक्तव्य के सटीक उदाहरण हैं. बहरहाल यह विडंबना ही है कि समाज में ऊंच-नीच को कायम रखने के लिए जाति के नाम पर किस तरह आदमी ही आदमी को मौत के घाट उतार रहा है.

‘मैं भी मरूंगा और भारत के भाग्य विधाता भी’

फाइल फोटो
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कविता और वास्तविक जीवन दोनों में समान रूप से ‘विद्रोही’ और जनपक्षधर आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई. 58 वर्षीय कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ ने 8 दिसंबर को इस दुनिया से अलविदा कह दिया. वे मंगलवार को पिछले डेढ़ माह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दफ्तर के सामने सरकार की शिक्षा नीतियों के विरोध में हो रहे धरना-प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे. दोपहर धरनास्थल पर अचानक उनके शरीर में कंपन हुआ और कुछ देर बाद उनकी सांसें थम गईं. डॉक्टरों ने मृत्यु का कारण ब्रेन डेथ (दिमाग का अचानक काम करना बंद कर देना) बताया है.

धरनास्थल पर मौजूद छात्रों के मुताबिक, कवि विद्रोही मंगलवार को छात्रों के सरकार विरोधी मार्च में शामिल होने पहुंचे थे लेकिन ​तबियत कुछ खराब लगी तो मार्च में शामिल न होकर धरनास्थल पर ही लेट गए. दोपहर दो बजे के आसपास उनके शरीर में अचानक कंपकंपी होने लगी. कुछ देर बाद ही उनकी नब्ज बंद हो गई. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की.

देर रात उनका शव एलएनजेपी अस्पताल के पीछे शवदाहगृह में रखवाया गया है. बुधवार को लोदी रोड​ स्थित शवदाहगृह में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. उनके परिजनों को सूचना दे दी गई है.
विद्रोही उपनाम से कविता लिखने वाले रमाशंकर यादव बीते दो दशकों से  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में ही रहते थे. जेएनयू के शोधार्थी ताराशंकर ने दुख व्यक्त करते हुए कहा, ‘विद्रोही हमारे समय के वास्तविक जनकवि थे. और देखिए ‘आसमान में धान बोने वाला’ ये निर्भीक कवि गया भी तो संघर्ष करते हुए.’
इस दौर में वे ऐसे कवि थे जो आजीवन सिर्फ कविता ‘कहता’ रहे. उन्होंने कभी अपनी कविताओं को लिपिबद्ध नहीं किया. अपनी सारी कविताएं उन्हें जुबानी याद थीं. यह फक्कड़ कवि जेएनयू के छात्रों और तमाम कविता प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे.
उनकी एक प्रसिद्ध कविता-
मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा’

‘मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं, मैं किसी से नहीं डरती’

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मामले में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने सोनिया और राहुल को निजी तौर पर पेशी के लिए समन भेजा था जिसे उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों को कोई राहत न देते हुए अदालत में पेश होना का आदेश दिया था. नेशनल हेराल्ड अखबार पर मालिकाना हक एसोसिएट्स जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) का है. कांग्रेस ने 26 फरवरी 2011 को एजेएल की 90 करोड़ रुपये की देनदारी का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया. जिसके बाद पार्टी ने एजेएल को 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया और फिर 5 लाख रुपये की पूंजी वाली यंग इंडियन कंपनी बनाई. इसमें सोनिया और राहुल की 38-38 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी. बाकी 24 फीसदी की हिस्सेदारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस के पास है.

बाद में एजेएल के 10-10 रुपये के 9 करोड़ शेयर यंग इंडियन कंपनी को दे दिए गए जिसके बदले उसे कांग्रेस का कर्ज चुकाना था. 9 करोड़ शेयर के साथ यंग इंडियन कंपनी की एजेएल में हिस्सेदारी 99 फीसदी हो गई. इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने टीजेएल का 90 करोड़ रुपये का लोन माफ कर दिया. ऐसा करने से यंग इंडियन कंपनी को मुफ्त में ही एजेएल का मालिकाना हक मिल गया. इसका मतलब ये हुआ कि मुफ्त में यंग इंडियन कंपनी को एजेएल का मालिकाना हक मिल गया. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इन 90 करोड़ रुपये के मामले में हवाला कारोबार का शक जताया है.

स्वामी ने आरोप लगाया है कि ये सब दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित हेराल्ड हाउस की 1600 करोड़ रुपये की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए किया गया है. स्वामी की याचिका के मुताबिक साजिश के तहत जानबूझकर यंग इंडियन कंपनी को एजेएल की संपत्ति पर मालिकाना हक दे दिया गया. उनका कहना है, ‘हेराल्ड हाउस को केंद्र सरकार ने अखबार चलाने के लिए संपत्ति दी थी इसलिए उसका व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.’ इस मामले पर मंगलवार को संसद में कांग्रेस सांसदों ने जमकर हंगामा किया. कांग्रेस और राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर बदले की राजनीति के तहत कार्रवाई करने का आरोप लगाया है. वहीं भाजपा का कहना है कि मामला कोर्ट में है और उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है.

नेहरू ने शुरू किया था नेशनल हेराल्ड

नेशनल हेराल्ड नाम के अंग्रेजी समाचार पत्र की स्थापना 9 सिंतबर 1938 को लखनऊ में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी. इसका मालिकाना हक एसोसिएट्स जर्नल्स लिमिटेड के पास था जो कौमी आवाज (उर्दू), नवजीवन (हिंदी) अखबार भी निकालती थी. आजादी के बाद नेशनल हेराल्ड कांग्रेस का मुखपत्र समझा जाता था जिसमें नेहरू संपादकीय लेख लिखा करते थे. शुरू से ही इस अखबार को वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ा और 1940 और 1970 में कुछ समय के लिए बंद भी करना पड़ा था. घटते सर्कुलेशन के कारण अंततः ये अखबार 2008 में बंद हो गया.