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संघ की सूचना, मना है पूछना!

I30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस प्रतिबंध  के पीछे कोई और नहीं बल्कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल थे. वही सरदार पटेल, जिनके गौरवगान में आज संघ परिवार कोई कसर नहीं छोड़ता और सरकार भी उनके सम्मान में गुजरात में सरदार सरोवर बांध पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा बनवा रही है.

प्रतिबंध के बाद आरएसएस ने पटेल को लिखित रूप में यह आश्वासन दिया था कि वे अपना एक संविधान बनाएंगे जिसमें खास तौर पर ये दर्ज होगा कि आरएसएस का राजनीति से कोई संबंध नहीं होगा और ये सिर्फ सांस्कृतिक कार्यों से जुड़ी संस्था होगी. इस मामले को और स्पष्ट रूप से जानने के लिए आरएसएस पर लगे प्रतिबंध से जुड़ीं फाइलें मददगार साबित हो सकती थीं, जो न सिर्फ आरएसएस के इतिहास के इस काले पन्ने को दिखातीं बल्कि वर्तमान में इस ‘संस्था के प्रिय’ बनते जा रहे पटेल का आरएसएस के प्रति नजरिया भी दर्शातीं. हालांकि ‘तहलका’ को मिली जानकारी के अनुसार गृह मंत्रालय की  ‘आरटीआई’ विंग केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) के पास भी आरएसएस पर लगे प्रतिबंध के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

पीपी कपूर नाम के शख्स द्वारा गृह मंत्रालय में इस विषय से जुड़ी जानकारी के लिए दायर आरटीआई याचिका के जवाब में सीपीआईओ ने बताया, ‘यह दोहराया जाता है कि सीपीआईओ के अंतर्गत उपलब्ध किसी भी दस्तावेज या फाइल में महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर जानकारी नहीं है.’ सीपीआईओ ने ये भी कहा कि जानकारी जुटाने के लिए समुचित प्रयास भी किए गए हैं.

आरटीआई के नियमों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति उसकी याचिका को मिले जवाब से संतुष्ट न हो तो वह गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव के पास अपील कर सकता है. जब ‘तहलका’ ने इस बारे में संयुक्त सचिव रश्मि गोयल से संपर्क किया तब उन्होंने कहा, ‘मैं इस पर जवाब देने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं.’

केंद्र की भाजपा सरकार के ‘पटेल एजेंडा’ के चलते गुजरात के सरदार सरोवर बांध पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से पटेल की प्रतिमा लगवाई जा रही है

ऐसे जवाब से कई संभावनाएं उठती हैं. क्या गृह मंत्रालय ऐसी कोई जानकारी छिपा रहा है? या फाइलें सचमुच खो गईं हैं? अगर ऐसा हुआ है तो इसका जिम्मेदार कौन है? भाजपा या कांग्रेस?

हरियाणा के आरटीआई कार्यकर्ता पीपी कपूर ने गृह मंत्रालय को पहली बार जनवरी 2014 में लिखा था, फिर जनवरी 2015 में, फिर अगस्त 2015 में. हालांकि जवाब हर बार एक ही रहा कि उनके पास उपलब्ध दस्तावेजों में इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. कपूर का कहना है, ‘सरकार अपने पटेल एजेंडे और ब्रांड को बचाने के लिए जानकारी छुपा रही है, क्योंकि अगर पटेल के समय में आरएसएस पर लगे प्रतिबंध के बारे में कोई बात सामने आती है तो उनके लिए पटेल को सामने रखकर प्रचार करना शर्म की बात होगी.’

वैसे केंद्र की भाजपा सरकार के ‘पटेल एजेंडा’ के चलते गुजरात के सरदार सरोवर बांध पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से सरदार पटेल की प्रतिमा बनवाई जा रही है. विश्व की इस सबसे बड़ी प्रतिमा की लंबाई लगभग 182 मीटर होगी. इसके अलावा पिछले आम चुनावों के समय जनसभाओं में प्रधानमंत्री मोदी भी ‘लौह पुरुष’ की तारीफ करते नजर आते थे.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में  कार्यरत आदित्य मुखर्जी उन लोगों में से हैं जो यह मानते हैं कि सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस को कभी किसी तरह की क्लीनचिट नहीं दी. उनका कहना है, ‘अगर ऐसा हुआ है तो सरदार पटेल ने गांधी की हत्या के बाद 25 हजार आरएसएस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी कैसे होने दी?’

ऐसा ही सवाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद उठाते हैं, ‘अगर आरएसएस को क्लीनचिट मिली थी तो वे क्यों उन दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं कर देते?’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘दरअसल भाजपा और आरएसएस के पास आजादी की लड़ाई से जुड़ा कोई ऐतिहासिक चरित्र नहीं है. ऐसे में वो इस शून्य को पाटने के लिए कांग्रेस के नेताओं को शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा हो सकता है कि भाजपा और आरएसएस ने ही सीपीआईओ को इस मुद्दे से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने से रोका हो क्योंकि इससे उनका ‘पटेल एजेंडा’ खतरे में आ जाएगा. वैसे जब पटेल गृहमंत्री थे और संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब भाजपा अस्तित्व में ही नहीं थी. पटेल कांग्रेस के नेता थे और अगर कोई उन्हें उन्हीं की पार्टी के प्रतिरोधी के बतौर पेश करता है तो उसके उद्देश्यों पर संदेह होना लाजमी है.’

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दूसरे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर कहते हैं, ‘मुझे दस्तावेजों के बारे में तो नहीं पता पर मैं ये जरूर कहूंगा कि 1925 में आरएसएस के गठन के बाद से पटेल के पास उससे जुड़ने के लिए लगभग 22 सालों का समय था पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. उस समय लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय जैसे कई कांग्रेसी नेता हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे पर पटेल उनमें कभी शामिल नहीं थे. इससे ये तो समझ ही सकते हैं कि पटेल की आरएसएस से जुड़ने की कभी कोई मंशा नहीं थी.’ वे ये भी जोड़ते हैं, ‘भाजपा को किसी दूसरे के इतिहास में ‘नायक’ खोजने के बजाय अपने ही इतिहास में किसी ऐसे नायक को तलाशना चाहिए.’

दूसरी ओर भाजपा नेता इस बात पर अड़े हैं कि स्वतंत्रता सेनानी सिर्फ कांग्रेस की बपौती नहीं हैं बल्कि वे पूरे देश के नायक हैं. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव कहते हैं, ‘मैं कांग्रेस को याद दिलाना चाहूंगा कि आजादी की लड़ाई के समय कांग्रेस कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक आंदोलन था. राजनीतिक दल ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना आजादी के बाद हुई है.’ ऐसा ही भाजपा उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद प्रभात झा का मानना है. वे कहते हैं, ‘सरदार पटेल का ताल्लुक देश के 125 करोड़ लोगों से है. वे ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने (हैदराबाद के) निजाम को हराया था.’ उन्होंने इस मामले पर ‘तहलका’ के बाकी सवालों का जवाब देने से मना कर दिया.

‘20 दिसंबर 1948 को जयपुर में पटेल ने एक भाषण दिया था, जहां उन्होंने साफ कहा था कि वे किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता को स्वीकार नहीं करेंगे’

इतिहास से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सरदार पटेल ने ही आरएसएस कोे तिरंगा फहराने पर जोर दिया था. हालांकि आरएसएस द्वारा तिरंगा कुछ मौकों पर ही फहराया गया. पहली बार आजादी के समय 1947 में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा फहराया गया, दूसरी बार 26 जनवरी 1950 में और फिर दशकों के बाद 2002 में. सितंबर में हुए एक सेमिनार में आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनोहर वैद्य ने कहा था कि झंडे का रंग भगवा होना चाहिए क्योंकि तिरंगा सांप्रदायिक है. हालांकि इतिहास की इन बातों का सामने आना मुश्किल ही लगता है. आदित्य मुखर्जी बताते हैं, ‘यूपीए सरकार ने ‘इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च’ को एक प्रोजेक्ट दिया था जिसके अंतर्गत उसे 1947 से 1950 तक के दस्तावेज इकट्ठे करने थे पर जब भाजपा सरकार सत्ता में आई तब इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च के अध्यक्ष बदल गए और बिना कोई कारण बताए इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया.’

इतिहासकार और ‘पटेल, प्रसाद एंड राजाजी: मिथ ऑफ द इंडियन राइट’ और ‘नेहरू-पटेल : अग्रीमेंट विदइन डिफरेंस’ जैसी किताबों को लिखने वाली नीरजा सिंह बताती हैं, ‘20 दिसंबर 1948 को जयपुर में सरदार पटेल ने एक भाषण दिया था, जहां उन्होंने साफ कहा था कि वे देश में किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता को स्वीकार नहीं करेंगे. भले ही वो किसी भी संस्था द्वारा फैलाई जाए. उन्होंने तो हिंदू महासभा से जुड़े महंत दिग्विजय नाथ, प्रोफेसर राम सिंह और देश पांडेय के कामों की भी आलोचना की थी.’ वे आगे कहती हैं, ‘भाजपा का पटेल एजेंडा फेल हो चुका है. पहले उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया के तहत सरदार पटेल की सबसे बड़ी प्रतिमा लगाई जाएगी पर अब ये मेड इन चाइना होगी. भाजपा को परिपक्व राजनीति करनी चाहिए. साथ ही राजनीतिक लाभ लेने के लिए मशहूर व्यक्तियों को हथियाने की आदत छोड़ देनी चाहिए.’

सुनहरे सपनों की फीकी चमक

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लखनऊ की रहने वाली शिक्षिका पुष्पा की रुचि सरकार की नई योजनाओं में खूब रहती है. वह बहुत सारी योजनाओं को लेकर आस-पास के लोगों को जागरूक भी करती रहती हैं. जब उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार की सोने पर ब्याज मिलने की योजना के बारे में सुना, तो खासी उत्साहित हो गईं और इसके बारे में जानकारी जुटाने लगीं. लेकिन जब उन्हें यह पता चला कि उन्हें अपने सोने के आभूषण को सरकार द्वारा बनाए गए शुद्धता जांच केंद्र पर ले जाकर गलवाना होगा और तब उन्हें सोने पर ब्याज मिलेगा तो उनकी सारी खुशी काफूर हो गई.

पुष्पा बताती हैं कि उनके पास सोने के जो आभूषण हैं, उनसे ढेरों यादें जुड़ी हैं. कुछ गहने उनके पति ने बनवाए पर ज्यादातर उन्हें घर के बड़े-बूढ़ों ने दिए हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उसी रूप में हस्तांतरित होने चाहिए. उन्हें गलाने के बारे में वह सोच भी नहीं सकतीं. भले ही इनसे उन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा है, पर उन्हें गहनों को देखकर संतुष्टि मिलती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धनतेरस से पहले स्वर्ण मौद्रीकरण योजना 2015, सार्वभौमिक स्वर्ण बॉन्ड योजना और अशोक चक्र के निशान वाले सोने के सिक्के जारी करने की तीन योजनाओं की शुरुआत की थी. इनका मकसद सोने को बैंकिंग प्रणाली में लाना व इसके बढ़ते आयात पर रोक लगाना था. बढ़ते आयात के चलते भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जो सोने के सबसे बड़े खरीददार हैं. भारत सालाना 1000 टन सोने का आयात करता है जिससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर चली जाती है. इससे राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ता है. अनुमान है कि देश में लोगों के पास और मंदिरों में कुल मिलाकर करीब 20 हजार टन सोना पड़ा है, जिसकी अनुमानित कीमत 52 लाख करोड़ रुपये होती है.

 सोने से बड़ी हैं उम्मीदें

योजनाओं की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जिस देश के पास घर-परिवार और संस्थानों में 20 हजार टन सोना बेकार रखा हो, ऐसे देश के गरीब रहने की कोई वजह नहीं है. भारत कुछ नई पहलों और सही नीतियों के साथ आगे बढ़ते हुए गरीब देश के तौर पर अपनी पहचान को खत्म कर सकता है. स्वर्ण मौद्रीकरण योजना 2015 के तहत लोग अपने पास उपलब्ध सोने को जमा कर सकेंगे जिस पर उन्हें 2.5 प्रतिशत सालाना ब्याज मिलेगा. जबकि सार्वभौमिक स्वर्ण बॉन्ड योजना के तहत आपको सोना खरीदने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि सोने के नाम पर आपको बॉन्ड पत्र मिलेगा. निवेशक बॉन्ड पत्र खरीदकर सालाना 2.75 प्रतिशत तक ब्याज प्राप्त कर सकेंगे. बॉन्ड पांच ग्राम से 100 ग्राम सोने तक के होंगे और 500 ग्राम से ज्यादा खरीदने की छूट नहीं होगी. लेकिन अगर जरूरत है तो समय से पहले भी पैसे निकालने की छूट मिलेगी. ये बॉन्ड बैंक और पोस्ट ऑफिस से खरीद जा सकेंगे. स्वर्ण बॉन्ड की अवधि पूरी होने पर आपको सोना नहीं मिलेगा बल्कि ब्याज के साथ सोने की उतनी कीमत (जो उस समय होगी) नकद मिल जाएगी. अगर सोने की कीमत गिर जाती है तो सरकार विकल्प देगी कि आप तीन साल या फिर उससे ज्यादा वक्त के लिए बॉन्ड आगे बढ़ा दें मतलब उस वक्त न भुनाएं. इसके साथ ही सरकार ने अशोक चक्र और महात्मा गांधी के चित्र वाले पांच ग्राम तथा दस ग्राम के सोने के सिक्के चलाकर लोगों को निवेश का एक और विकल्प दिया. वैसे सोने को हमारे देश में एक वैकल्पिक और सुरक्षित निवेश के तौर पर देखा जाता है लेकिन अधिकांश सोना घरों की तिजोरियों और बैंकों के लॉकर में बंद है, इसलिए इसे रखने वाले को इससे किसी भी तरह का फायदा नहीं होता. सिर्फ इस धातु की कीमत बढ़ने पर ही पूंजी बढ़ने की उम्मीद होती है. ऐसे में अगर लोग सरकार की योजनाओं का हिस्सा बनते हैं तो वे इससे कुछ आय भी अर्जित कर सकते हैं.

फ्लॉप हो गईं योजनाएं

उद्योग निकाय रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के अनुसार स्वर्ण मौद्रीकरण योजना का पहला पखवाड़ा निराशाजनक रहा. इस दौरान महज 400 ग्राम सोना ही जमा कराया गया. इसी तरह सरकार की बहु-प्रचारित स्वर्ण बॉन्ड खरीद योजना से प्राप्त अंतिम राशि पर अगर नजर डालें तो एक तरह से यह योजना भी लोगों को आकर्षित करने में विफल रही है. इस योजना से मात्र 150 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके. वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक भरत झुनझुनवाला इन योजनाओं की विफलता का कारण भरोसे की कमी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘लोगों का सोना खरीदने का मकसद उसे बेचकर पैसा कमाना नहीं होता है. वे अपनी सुरक्षा के लिए सोना खरीदते हैं. अगर लोगों को सरकार और बैंकों पर भरोसा होता, तो वे सोना खरीदते ही नहीं. ऐसे में सोना खरीदकर सरकार या बैंकों के हाथ में देने की कोई भी योजना सफल ही नहीं हो सकती है.’

भारत में सोने की चाहत बहुत प्रबल है. यह अचल पूंजी के साथ-साथ पारिवारिक विरासत की निशानी भी होती है. पुश्तों से ये बचत की पूंजी जमा करने और सुरक्षित निवेश का आसान जरिया माना जाता रहा है. ऐसे में इन योजनाओं की शुरुआत से ही यह सवाल उठाया जा रहा था कि कितने लोग अपने ‘खानदानी’ सोने की पहचान मिटने यानी आभूषणों को गलाने की इजाजत देंगे. ढाई प्रतिशत तक ब्याज की सुविधा और फिर एक निश्चित समय के बाद जमा सोने को उतनी ही मात्रा में वापस पाने जैसे प्रावधानों से उम्मीदें बढ़ी थी, लेकिन लोगों ने इसमें रुचि नहीं दिखाई.

दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. आसमी रजा सोने से जुड़े भावानात्मक लगाव और योजनाओं को लाने के गलत समय को इस तात्कालिक विफलता की बड़ी वजह बताते हैं. उनके अनुसार, ‘भारतीय महिलाओं का सोने के साथ बहुत गहरा लगाव है. वे लंबे समय से इसी के जरिये उपहारों का आदान-प्रदान करती आ रही हैं. ऐसे में लोगों से निवेश के लिए सोना निकलवाने के लिए हमें बढ़िया ऑफर देना होगा. अभी हमारी वित्तीय व्यवस्था में सोना गिरवी रखने पर बहुत अच्छा रिटर्न नहीं मिलता है. इन योजनाओं की विफलता के लिए हमारा अंडरसाइज फाइनेंशियल सिस्टम जिम्मेदार है. अंडरसाइज सिस्टम का मतलब पारदर्शिता से है. भारत इतना बड़ा देश है और हमने सोने की शुद्धता की जांच के लिए बहुत कम ही केंद्र बनाए. सरकार का फोकस तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों पर रहा. यह योजना बहुत ही कम समयावधि के लिए लोगों के सामने आई है और इसमें निरंतरता की जरूरत है. इसके अलावा सरकार ने एक तय मात्रा से अधिक सोना जमा करने पर उसके स्रोत के बारे में जानकारी देने की अनिवार्यता तय कर दी. इससे भी लोगों ने इस योजना में रुचि नहीं दिखाई. सबसे बड़ी बात योजना को लाने के समय को लेकर है. इस समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने का दाम पांच साल के सबसे निचले स्तर पर है. इसके अलावा पिछले करीब तीन सालों में भारत के इक्विटी मार्केट और सोने के दामों में विपरीत संबंध दिखाई पड़ रहा है. इसके चलते भी निवेशक अभी पैसा लगाने को तैयार नहीं हैं.’ फिलहाल सोने की जांच के लिए कम केंद्र होने की बात सरकार भी मान रही है. देशभर में योजना के लिए महज 29 जांच केंद्र और चार रिफाइनरी हैं. लोगों से मिली ठंडी प्रतिक्रिया को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने योजनाओं को लेकर 15 दिन के भीतर 19 नवंबर को तीसरी बार बैठक की. इसमें भारतीय मानक ब्यूरो, हॉलमार्क एसोसिएशन, बैंकों सहित सभी पक्ष शामिल हुए. इस दौरान साल के अंत तक सोना जांच केंद्र और रिफाइनरी की संख्या बढ़ाकर क्रमश: 55 और 20 करने का लक्ष्य रखा गया. इसके अलावा वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार अब भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) से प्रमाणित ज्वेलर्स को सोने की शुद्धता की जांच का जिम्मा सौंपने पर भी विचार कर रही है. बीआईएस से प्रमाणित देशभर में कुल 13,000 ज्वेलर्स हैं.

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नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव्स के चेयरमैन मोहन गुरुस्वामी का कहना है, ‘इस योजना की शुरुआत करने का मकसद लॉकरों में बेकार पड़े सोने को वित्तीय उपयोग में लाने का है. यह सोच सही है, लेकिन सरकार को यह बात समझनी होगी कि इस पर लोगों का क्या सोचना है. जैसे कि यदि कोई अपने घर पर कई पीढ़ियों से पड़े सोने को लेकर बैंक के पास जाएगा तो उससे सवाल-जवाब शुरू हो जाएगा. यह सोना आपको कहां से मिला? आपने आयकर भरा है या नहीं? इसके लिए पैसा कहां से आया? सोने को लोगों के घरों से बाहर निकालने के लिए सरकार को ऐसी लुभावनी नीति बनानी चाहिए, जिससे इन सवालों से गुजरना ही नहीं पड़े. सरकार ने इस बारे में सोचा ही नहीं जिससे योजना फ्लॉप हुई.’

‘सरकार को इस योजना को जनसुलभ बनाने के साथ ही इस बात का ध्यान रखना होगा कि काले धन वाले इसे अपने हित में इस्तेमाल न कर पाएं’

विशेषज्ञ सोना जमा करने की एक थकाऊ प्रक्रिया को भी योजना सफल न होने का कारण बता रहे हैं. यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. इसके लिए आपको सरकार से मान्यता प्राप्त केंद्र पर अपने आभूषणों ले जाकर उसकी शुद्धता की जांच करानी होगी. यहां आपको गहनों की शुद्धता के बारे में जानकारी दी जाएगी. यानी सोना 22 कैरेट है, 24 कैरेट है, 18 कैरेट या इससे कम का है. अगर दी गई जानकारी के बाद ग्राहक अपने सोने को जमा कराने पर राजी होता है तो आगे की प्रक्रिया शुरू होगी और अगर राजी नहीं होता है तो उसे गहने वापस कर दिए जाएंगे. इस प्रक्रिया में करीब 45 मिनट का समय लगेगा और ग्राहक को सोने की जांच के लिए 300 रुपये चुकाने होंगे. जांच केंद्र की ओर से दी गई जानकारी के बाद अगर ग्राहक सोने के गहनों को बैंक में जमा कराने पर राजी होता है तो उसे उन्हें पिघलाने के लिए एक फॉर्म भरना होगा. पिघलाने के पहले उनकी सफाई की जाएगी. फिर उनको तौल कर पिघलाया जाएगा. इसके बाद उसे छड़ों में तब्दील कर दिया जाएगा. इसमें 3-4 घंटे लग सकते हैं. ग्राहक चाहे तो इसके बाद भी सोने को बैंक में जमा करने से मना कर सकता है, अगर वह मना करता है तो उसे प्रति 100 ग्राम सोने को पिघलाने पर 500 रुपये फीस चुकानी होगी और सोने की छड़ उसे सौंप दी जाएगी. अगर ग्राहक सोने को बैंक में जमा कराने पर राजी होता है तो कलेक्शन सेंटर से उसको सोने की शुद्धता और मात्रा के बारे में एक सर्टिफिकेट दिया जाएगा. उसे बैंक में दिखाने पर ग्राहक का गोल्ड सेविंग अकाउंट शुरू कर दिया जाएगा. इसके लिए कम से कम 30 ग्राम सोने की अनिवार्यता है. ग्राहक और जांच केंद्र जितने सोने की जानकारी देंगे, बैंक उतना ही सोना ग्राहक के अकाउंट में दर्शाएगा. इस पर मिलने वाला ब्याज बैंक तय करेगा. साथ में ग्राहक चाहे तो ब्याज को सोने के तौर पर भी ले सकता है या फिर उसे कैश करा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती दौर में जांच केंद्र, बैंक और सरकार के समन्वय में कमी इस योजना के फ्लॉप होने का कारण हैं.

वहीं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार, ‘सरकार ने खुद को सक्रिय दिखाने के लिए बगैर तैयारी के ही इस योजना की शुरुआत कर दी है. सरकार ने जल्दबाजी में रोडमैप तैयार नहीं किया है. ऐसा सिर्फ इस योजना के ही साथ नहीं है. स्वच्छ भारत अभियान और गुड गवर्नेंस जैसी योजनाओं में भी यही कमी सामने आई थी. वैसे इस योजना के बारे में जैसे-जैसे लोगों को पता चलेगा, यह लोगों को आकर्षित करेगी. बस एक अंदेशा है कि कहीं यह काले धन को सफेद करने का जरिया न बन जाए. सरकार को इस योजना को जनसुलभ बनाने के साथ ही इस बात का ध्यान रखना होगा कि काला धन रखने वाले इसे अपने हित में इस्तेमाल न कर पाएं.’ वित्त मंत्रालय द्वारा इन योजनाओं को लेकर 15 दिन के भीतर तीन बार बुलाई गई बैठक इस बात की पुष्टि करती है कि सरकार ने एक अच्छी पहल जरूर की, लेकिन इसकी शुरुआत बहुत ही हड़बड़ी में की.

नगालैंड में कलम पर लगाम!

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संपादकीय पेज की जगह खाली थी. नगालैंड के अखबारों- नगालैंड पेज, ईस्टर्न मिरर और मोरंग एक्सप्रेस के पाठक हैरान थे. राष्ट्रीय प्रेस दिवस, जो भारत में स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस के प्रतीक दिवस के रूप में मनाया जाता है, पर इन अखबारों ने संपादकीय पेज को कोरा छोड़ दिया था.

देश में आपातकाल के बाद प्रिंट मीडिया द्वारा विरोध करने का यह सबसे मजबूत तरीका इसलिए अपनाया गया क्योंकि असम राइफल्स के एक कर्नल ने मीडिया को धमकी भरा पत्र लिखा था. 25 अक्टूबर को सामने आए इस पत्र में इन अखबारों पर एक प्रतिबंधित संगठन की गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था.

मोरंग एक्सप्रेस ने संपादकीय पेज खाली रखने का कारण बताते हुए लिखा, ‘सत्ता द्वारा स्वतंत्र प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, उसके खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए हम संपादकीय पेज खाली छोड़ने का विकल्प चुन रहे हैं.’

असम राइफल्स ने इन अखबारों के अलावा ‘नगालैंड पोस्ट’ और ‘कैपी’ को भी उग्रवादी संगठनों के बयान न छापने के लिए कहा है. ‘कोई भी लेख जो उग्रवादी संगठन  ‘नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (खापलंग)’ (एनएससीएन-के) की मांगें छापता है और उन्हें प्रचारित करता है वह गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1957 का उल्लंघन है और इसलिए आपके अखबार को ये सब नहीं छापना चाहिए.’ पत्र में आगे लिखा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनएससीएन (के) को गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया है. अधिसूचना की एक प्रति और उन लेखों को भी पत्र के साथ संलग्न किया गया है.

इस औपचारिक फरमान का उद्देश्य, जिसकी विषय-वस्तु में ‘गैर-कानूनी संगठनों को मीडिया का समर्थन’ लिखा है, नगा मीडिया को उग्रवादी संगठनों के विचारों को लिखने से रोकना है. इसके चलते मीडिया बिरादरी और दूसरे लोगों में गुस्सा है. नगालैंड पेज की मोनालिसा चंगकीजा मानती हैं, ‘असम राइफल्स ये सब नगालैंड में हथियारबंद संगठनों पर लगाम लगाने की अपनी असफलता से ध्यान भटकाने के लिए कर रही है.’

देश के दूसरे हिस्सों में भी गूंज रहे ताजा घटनाक्रम में कई पेंचिदा मुद्दे शामिल हैं. नगा संपादक इस घटनाक्रम को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति की आजादी और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार पर घोषणा के उल्लंघन के रूप में देखते हैं. ये घटनाक्रम आपातकाल के दिनों में प्रेस सेंसरशिप के फरमानों की याद दिलाता है जब इंडियन एक्सप्रेस अखबार और नई दुनिया जैसे कुछ अखबारों ने अपने संपादकीय पेज खाली छोड़े थे.

नगालैंड का गठन 1963 में अशांत परिस्थितियों में हुआ था इस वजह से सामाजिक और राजनीतिक विरोधाभास इसे विरासत में मिले हैं. संपादक कहते हैं कि ऐसी स्थिति में सभी पक्षों की राय और स्थिति को रिपोर्ट करना जरूरी हो जाता है. नगालैंड के 6 अखबारों के संपादकों ने एक संयुक्त बयान में कहा है, ‘राज्य, गैर-राज्य और काॅरपोरेट से प्रभावित हुए बिना हम अपनी संपादकीय स्वतंत्रता को निभाते समय निष्पक्ष और गैर-पक्षपातपूर्ण रहेंगे.’

संपादकों के संयुक्त बयान पर असम राइफल्स ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, ‘मीडिया को स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट करने के लिए कभी मना नहीं किया गया. हालांकि प्रतिबंधित संगठन के द्वारा व्यावसायिक अधिष्ठानों को भेजे जबरन वसूली के नोटिस को छापना उस संगठन को फंड इकट्ठा करने के लिए उकसाने जैसा है, जिससे उगाही हुई रकम का इस्तेमाल सरकारी एजेंसियों और सुरक्षा बलों के खिलाफ विनाशकारी गतिविधियों में किया जा सके.’

राज्य में हालांकि चुनी हुई सरकार है लेकिन आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (आफ्स्पा) के निरंतर विस्तार के कारण सेना को अधिक शक्तियां मिली हुई हैं. असम राइफल्स ने कई मौकों पर उन संवाददाताओं पर आर्मी विरोधी होने का आरोप लगाया है जिन्होंने उनके आचरण पर सवाल उठाए. लेकिन सीधे तौर पर आरोप लगाने का सिलसिला इस वर्ष संघर्षविराम के उल्लंघन के बाद शुरू हुआ है. मोरंग एक्सप्रेस के एक प्रतिनिधि ने ‘तहलका’ को बताया, ‘जुलाई में जब हमारे एक रिपोर्टर ने तथाकथित रूप से असम राइफल्स द्वारा मारे गए दो बच्चों के बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने हमें आर्मी विरोधी और प्रतिबंधित संगठन का समर्थक करार दे दिया.’

गौर करने लायक बात ये भी है कि जब संघर्ष क्षेत्र में रिपोर्टिंग की बात आती है तो सभी पक्षों की बात सुनना राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता दोनों के लिए एक सामान्य प्रथा है. नगालैंड पोस्ट के संपादक इस सेंसरशिप को असम राइफल्स द्वारा दी गई एक ढकी-छिपी हुई धमकी मानते हैं.

इसके अलावा, राज्य के प्रशासनिक और नागरिक मुद्दे असम राइफल्स के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते. यहां के अखबार खुद को भारतीय प्रेस काउंसिल के प्रति जवाबदेह मानने के लिए तैयार हैं. वे ऐसे मुद्दों पर राज्य सरकार के चुने हुए सदस्यों से मिलने के लिए भी स्वतंत्र हैं.

हैप्पी टू ब्लीड : मेरी माहवारी तेरी मानसिक बीमारी

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13 नवंबर को केरल के प्रसिद्ध ‘सबरीमाला मंदिर’ के त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के नवनिर्वाचित अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने मीडिया से बात करते हुए कथित तौर पर ये कहा कि जब तक एअरपोर्ट पर हथियार चेक करने जैसी कोई स्कैन मशीन महिलाओं की ‘पवित्रता’ जांचने के लिए उपलब्ध नहीं होती, तब तक महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित रहेगा. केरल के इस प्रसिद्ध तीर्थस्थल पर 10 साल से 50 साल की उम्र तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर में प्रतिष्ठित देव अयप्पा ब्रह्मचारी थे और इसलिए महिलाएं (जिन्हें मासिक स्राव होता है) मंदिर में नहीं जा सकतीं.

बहरहाल, प्रयार गोपालकृष्णन के इस कथित बयान के बाद पटियाला से स्नातक कर रहीं 20 साल की निकिता आजाद ने एक ऑनलाइन यूथ मंच पर प्रयार गोपालकृष्णन के नाम एक खुला खत लिखा, जिसमें सालों से मासिक स्राव के नाम पर महिलाओं के साथ हो रहे भेदभावों, इससे फैलने वाली भ्रांतियों और तमाम तरह की सामाजिक वर्जनाओं का विरोध किया गया. इसमें उन्होंने महिलाओं से इस तरह के सामाजिक टैबू को तोड़कर सामने आने की बात भी कही, साथ ही ‘हैप्पी टू ब्लीड’ लिखे सेनेटरी नैपकिन के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट करते हुए लोगों से इस तरह के पितृसत्तात्मक रवैये के खिलाफ खड़े होने को भी कहा. सोशल मीडिया पर ‘हैप्पी टू ब्लीड’ मुहिम को लोगों ने हाथोंहाथ लिया. निकिता बताती हैं, ‘हमें लगा नहीं था कि इस मुहिम को इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलेगी. देश भर से हजारों लोग सामने आए और इस अभियान से जुड़े. सबसे खुशी की बात ये है कि इसमें पुरुषों का भी एक बड़ा वर्ग है. हमारा उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय विशेष का विरोध नहीं है, बल्कि हम महिलाओं के जीवन में होने वाली इस कुदरती घटना को समाज में स्वीकार्यता दिलाना चाहते हैं.’

निकिता की ये मुहिम एक जरूरी बड़े मुद्दे को सामने लाकर उस पर बात करने की शुरुआत भर है. समस्या सिर्फ मासिक स्राव को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाला नजरिया नहीं है बल्कि इसके परिणाम हैं.

‘मैं 12 साल की थी और मुझे पता ही नहीं था ये (स्राव) क्या है. मेरी मां की मौत कैंसर से हुई थी. तब मुझे लगा मुझे भी कैंसर हो गया है’

भारतीय समाज की बनावट ऐसी है कि महिलाओं के मुद्दे हमेशा गैरजरूरी समझे गए. उनकी शिक्षा, जरूरतें,  स्वास्थ्य आदि हमेशा से समाज में चल रहे सुधारों से दूर ही रहे. ऐसे में मासिक स्राव, रिप्रोडक्टिव हेल्थ यानी प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं तो सामने ही नहीं आईं. इनके बारे में बात करना ही वर्जित है. हालत ये है कि आज 21वीं सदी में भी ऐसे मामले सामने आते हैं जहां इसे असामान्य माना जाता है और उन पांच-सात दिनों में उस महिला को अपवित्र. इस ‘अपवित्रता’ का आलम ये है कि उन कुछ दिनों में महिलाओं को तमाम तरह के प्रतिबंधों में रहना होता है, जैसे वे रसोई, पूजाघर या मंदिर में नहीं जा सकतीं, तुलसी का पौधा या कोई पूजन की वस्तु नहीं छू सकतीं. उनका बिस्तर अलग कर दिया जाता है. वे किसी पुरुष के पास नहीं बैठ सकतीं, बाहर नहीं जा सकतीं आदि. ये हाल किसी क्षेत्र विशेष का नहीं है बल्कि देश के कमोबेश हर गांव-शहर, चाहे वो दक्षिण का हो या उत्तर-पूर्व का, में इस तरह की कई वर्जनाएं देखने को मिल जाएंगी. निकिता कहती हैं, ‘प्राइवेट डोमेन यानी घरों में ये बातें होती रहती हैं पर जब कोई सार्वजनिक तौर पर ये निर्णय ले कि पीरियड्स के दौरान महिला को कहां आना-जाना चाहिए तो मुद्दा भेदभाव और लैंगिक समानता की जरूरत पर आ जाता है और हमें इससे लड़ना है. हमारे अभियान को मिली प्रतिक्रियाएं देख कर लगता है कि इस पर बोलना तो सब चाहते थे पर बोलने के लिए कोई मंच नहीं था. कई लोग जो इस क्षेत्र में काम कर रहे थे, उन्होंने भी हमें सपोर्ट किया. ये एक सकारात्मक बदलाव है जो किसी भी समाज के विकास के लिए सहायक होगा.’

फेसबुक पर शुरू हुई इस मुहिम को इवेंट के रूप में 21 से 27 नवंबर तक रखा गया था पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखते हुए इसकी अवधि एक हफ्ते और बढ़ाकर 4 दिसंबर तक कर दी गई है. निकिता के साथ इस मुहिम को शुरू करने में उनके दोस्तों की भूमिका रही है. दो हफ्तों के बाद सोशल मीडिया पर मिली प्रतिक्रिया के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कर के राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजी जाएगी और एक याचिका भी दायर की जाएगी जिसके अनुसार देश में कहीं भी मासिक स्राव के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए न ही ऐसी रीतियों को बल मिले जो इससे जुड़ी रूढ़ियों को मजबूत कर रही हैं. इसी उद्देश्य से निकिता और उनके दोस्त ऑनलाइन जनमत जुटाने वाली वेबसाइट ‘चेंज डॉट ओआरजी’ पर भी याचिका डाल चुके हैं.

 ‘मैं मासिक स्राव के समय बेवकूफों की तरह एक मोजे में बालू भर के प्रयोग करती थी. इससे मेरे शरीर में संक्रमण हो गया था’

मासिक स्राव से जुड़े मुद्दों को लेकर होने वाले इस दुराव-छिपाव का सबसे खराब असर ये है कि महिलाएं अपने शरीर के प्रति, उसमें होने वाले कुदरती बदलावों के प्रति एक अपराधबोध महसूस करती हैं और दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये अपराधबोध पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता जाता है. दिल्ली डायलॉग कमीशन से जुड़ी डॉक्टर निम्मी रस्तोगी बताती हैं, ‘ये किसी भी और बायोलॉजिकल फंक्शन जैसी प्रक्रिया है, उतनी ही सामान्य जितना भोजन का पचना और ऐसे समय में महिलाएं उतनी ही सामान्य होती हैं जितना कोई और आम इंसान. पर समाज में सालों से लगातार होते आ रहे ये भेदभाव और वर्जनाएं लड़कियों को एक अजीब सी हीनभावना से भर देते हैं, जिस कारण वे अपने ही शरीर को लेकर सहज नहीं हो पातीं.’

वैसे समाज में महिलाओं से जुड़े मजाक सभी को पता होते हैं. पुरुषों में ‘पीएमएस जोक्स’ के प्रति खासी दिलचस्पी देखी जाती है. (प्री-मेन्स्ट्रूअल सिंड्रोम, माहवारी से कुछ समय पूर्व की अवस्था है, जिसमें अक्सर महिलाएं चिड़चिड़ी हो जाती हैं.) पर उस अवस्था के दौरान वे किन परेशानियों से गुजर रही हैं, पुरुष इसके प्रति असंवेदनशील ही नजर आते हैं. इस असंवेदनशीलता के लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहरा देना सही नहीं है. एक लंबे समय से ‘छुपाने’ की प्रवृत्ति ने ही आधी समस्याओं को जन्म दिया है. अगर घर में बेटी मासिक स्राव से गुजर रही है तो उससे उम्मीद की जाती है कि इस बारे में किसी को पता न चले, खासकर घर के पुरुषों को. यदि वो मेन्स्ट्रूअल क्रेम्प्स से जूझ रही है तो सिर दर्द या मोच के बहाने उसे स्कूल या कॉलेज नहीं जाने दिया जाता. यानी कहीं से भी पुरुष उस पीड़ा के आसपास से भी नहीं गुजरते जो वो महसूस कर रही होती है. परिणामस्वरूप ये असंवेदनशीलता असामान्य रूप से सामने आती है. बंगलुरु में रहने वाली एक शिक्षिका बताती हैं, ‘मेरे पति मेरे मासिक स्राव के दिनों में भी संबंध बनाने की जिद करते हैं, बिना ये सोचे कि ये मेरे लिए कितना पीड़ादायी है. वे ये भी जानते हैं कि इससे मुझे कई तरह के इन्फेक्शन हो सकते हैं, पर उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.’

पुरुषों में मासिक धर्म को लेकर तमाम तरह के सवाल उठते हैं, जो सहज भी हैं पर समाज का माहौल इस बात की इजाजत ही नहीं देता कि वे इस तरह के सवाल पूछ सकें. स्कूल या घर में ऐसे सवाल पूछना उन्हें सीधे ‘उद्दंड’ या ‘अभद्र’ की श्रेणी में ला देता है. यौन शिक्षा की जरूरत को न समझना भी एक बड़ी समस्या है. शहरों में तो स्थिति फिर भी ठीक है पर नवीं कक्षा की स्कूली किताबों में ‘प्रजनन तंत्र’ का पाठ शायद ही देश के किसी छोटे शहर के स्कूल में पढ़ाया गया हो. वैसे मासिक स्राव से जुड़ी ‘छुपाने’ की प्रवृत्ति को प्रश्रय देने में बाजार भी पीछे नहीं है.

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‘द कचरा प्रोजेक्ट’ एक ऑनलाइन मंच है, जो समाज, पर्यावरण, महिलाओं आदि के मुद्दों से जुड़े सुधारों के लिए काम करता है. द कचरा प्रोजेक्ट ने 28 मई 2014 (जिसे मेन्स्ट्रूअल हाइजीन डे के रूप में मनाया जाता है) से एक कैंपेन ‘पीरियड फॉर चेंज’ चलाया, जिसका उद्देश्य लोगों (महिला और पुरुष दोनों) को समान रूप से पीरियड्स और सेनेटरी कचरे के बारे में जागरूक करना है. प्रोजेक्ट की फाउंडर अर्पिता भगत कहती हैं, ‘सेनेटरी नैपकिन बनाने वाली कंपनियों के नाम हमेशा एक गलत आइडियोलॉजी लेकर चल रहे हैं. ‘व्हिस्पर’ मतलब फुसफुसाना, यानी कहीं न कहीं आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ये बात सबके सामने नहीं बल्कि फुसफुसा के ही करनी है. ये गलत है. ऐसा नहीं होना चाहिए.’

इन उत्पादों के विज्ञापन ‘सोच बदलने’ की बात करते हैं पर वे उसी दकियानूसी सोच को और मजबूत करते आ रहे हैं जो समाज में चली आ रही है.

निकिता आजाद द्वारा शुरू किए गए ‘हैप्पी टू ब्लीड’ अभियान के दो मुख्य उद्देश्य हैं. पहला तो मासिक स्राव से जुड़े सामाजिक टैबू तोड़ना और दूसरा सब्सिडाइज्ड मेन्स्ट्रूअल केयर यानी पीरियड्स के दौरान सस्ती और अच्छी देखभाल जैसे मेन्स्ट्रूअल कप का प्रयोग, सस्ते सेनेटरी नैपकिन्स, टैम्पून आदि की जानकारी. सेनेटरी नैपकिन्स का प्रयोग सुविधाजनक होता है पर मासिक स्राव से जुड़ी ‘शर्म’ के चलते महिलाएं दुकान पर जाकर इसे खरीदने में झिझकती हैं और कपड़े का प्रयोग करती हैं, जिसमें कई तरह के इन्फेक्शन होने का खतरा बना रहता है.

वैसे अगर सेनेटरी नैपकिन के प्रयोग से जुड़े आंकड़े देखें तो ये काफी निराशाजनक हैं. मुंबई का दासरा फाउंडेशन जन-कल्याण से जुड़े मसलों पर काम करता है. जून 2014 में दासरा द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार देश की लगभग 70 फीसदी महिलाओं की सेनेटरी उत्पादों तक पहुंच ही नहीं है. अज्ञानता, झिझक के अलावा एक बड़ा कारण गरीबी भी है. एक पत्रकार सेनेटरी हाइजीन के मुद्दे और निचले तबके में महिलाओं के गिरते स्वास्थ्य का हाल परखने के लिए जब दिल्ली की एक बस्ती में पहुंचीं तब उन्हें जवाब मिला कि या तो हम सेनेटरी नैपकिन खरीद सकते हैं या खाना! बहरहाल कई सामाजिक संस्थाएं सस्ते और अच्छी गुणवत्ता के सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए आगे आई हैं, जिससे संभव है कि गरीब तबके की महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ सुधारने की दिशा में कदम उठाए जा सकेंगे. साथ ही सरकारों द्वारा भी भी बच्चियों को स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन्स बांटे जा रहे हैं.

पर यहां भी सवाल ये उठता है  कि क्या सेनेटरी नैपकिन दे देने भर से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? जिस समाज में सालों से महिलाएं अखबार में छुपाकर, काली पॉलीथिन में रखकर सेनेटरी नैपकिन प्रयोग करती आई हैं, क्या वो झिझक यूं खुल पाएगी? अर्पिता बताती है, ‘हां, पिछले कुछ समय में पीरियड्स से जुड़ी बातों को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है पर उतनी नहीं, जितने की जरूरत है. लड़कियां समझती हैं कि ये छुपाने की बात नहीं है पर फिर भी वो इस पर बात करने में सहज नहीं हो पातीं. हमें उस आजादी की जरूरत है, जहां बिना किसी झिझक के अपनी बात कही जा सके. बच्चियों को नैपकिन्स देना अच्छा कदम है पर इसका क्या फायदा अगर उन्हें ये ही न पता हो कि इसे कैसे प्रयोग करना है? इसके लिए  लंबा सफर तय करना अभी बाकी है.’

देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिला स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का समाधान तब तक नहीं होता जब तक महिला की स्थिति बिल्कुल ही खराब न हो जाए. मासिक स्राव के दिनों में महिलाओं का शरीर ज्यादा संवेदनशील हो जाता है और ऐसे में अगर उन्हें कोई समस्या हो, जिसके बारे में वे खुलकर न कह पाएं तो हालत खराब ही होती चली जाती है. इस ‘झिझक’ से जुड़ा सबसे खराब पहलू यही है. कहीं न कहीं देश में हर साल बढ़ती मातृ-शिशु मृत्यु दर का बीज रिप्रोडक्टिव हेल्थ को लेकर बरती जाने वाली इसी लापरवाही से पड़ जाता है. बात अगर ग्रामीण क्षेत्रों की करें तो पता चलता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी सिर्फ अज्ञानता आगे बढ़ रही है. महिलाओं को अपने शरीर के बारे में ही अधकचरी जानकारी होती है जो तमाम संक्रमणों और बीमारियों को न्योता देती है. दासरा फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘स्पॉट ऑन- इम्प्रूविंग मेनस्ट्रुअल हाइजीन इन इंडिया’ में बताया गया है कि कैसे गांवों में आज भी महिलाएं कपड़े या सेनेटरी नैपकिन के विकल्प के रूप में राख, बालू, अखबार या फूस का प्रयोग करती हैं. और ये सब उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है, यही वो तरीका है, जो वे सालों से प्रयोग होता देखती आई हैं. इस हाल में कैसे उम्मीद की जाए कि उन्हें प्रजनन से संबंधी बीमारियां नहीं होंगी. ये रिपोर्ट ये भी बताती है कि किस तरह देश में इस मुद्दे को कोई जगह नहीं मिलती जबकि ये स्वास्थ्य, पर्यावरण और शिक्षा से सीधे जुड़ता है.

दसरा की रिपोर्ट के अनुसार:

• जो महिलाएं मासिक स्राव के समय अनहाइजिनिक तरीके अपनाती हैं, उनमें रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन (प्रजनन अंग संबंधी संक्रमण) आम महिलाओं से 70 प्रतिशत ज्यादा देखे गए हैं.

• एक महिला द्वारा साल भर में लगभग 125-150 किलो नॉन-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी कचरा फेंका जाता है जिससे पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचता है.

• स्कूलों में शौचालय और पानी के उचित इंतजाम न होने के चलते 23 फीसदी बच्चियां स्कूल छोड़ देती हैं.

इसके इतर भी कुछ आंकड़ें बताते हैं कि मासिक स्राव से जुड़े मिथकों के चलते इसके शुरू हो जाने के बाद लड़कियों का स्कूल जाना बंद करवा दिया जाता है. देश में जोर-शोर से चल रहे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे उस वक्त बेमानी हो जाते हैं जब मिथकों, स्कूलों में शौचालय और पानी की कमी के चलते लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं.

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समस्या सिर्फ स्कूलों में शौचालयों की कमी से जुड़ी नहीं है. कामकाजी महिलाओं की समस्या इससे भी बड़ी है. कचरा प्रोजेक्ट द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार देश के बड़े शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति भी खराब है. 2013-14 में किए गए इस सर्वे में दिल्ली में पुरुषों के लिए 4000 सार्वजनिक शौचालय थे जबकि महिलाओं के लिए सिर्फ 300. मुंबई के लगभग 2,849 सार्वजनिक शौचालयों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है. कोलकाता में 300 सार्वजनिक शौचालय हैं, जिनका प्रयोग महिला-पुरुष दोनों ही करते हैं. सिर्फ शौचालयों की संख्या ही नहीं यहां साफ-सफाई की कोई ढंग की व्यवस्था न होने से होने वाली परेशानियों की फेहरिस्त भी लंबी है. कई कामकाजी महिलाएं बताती हैं कि काम पर जाने के दौरान वे कहीं भी बाथरूम का प्रयोग नहीं करतीं. अव्वल तो उन्हें पेशाब करने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो वहां सफाई न होने से कई तरह के संक्रमण होने की आशंका रहती है. मासिक स्राव के दिनों में ये दिक्कत और बढ़ जाती है. आदर्श रूप से सेनेटरी नैपकिन या टैम्पून चार से छह घंटों के बाद बदलना चाहिए पर ऐसे माहौल में ये संभव नहीं हो पाता. लंबे समय तक एक ही नैपकिन या टैम्पून के उपयोग से संक्रमण होने के खतरे बढ़ जाते हैं. डॉ. रस्तोगी बताती हैं, ‘वैसे भी लंबे समय तक पेशाब रोकने से आपके ब्लैडर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और मासिक स्राव के समय तो अंग ज्यादा संवेदनशील हो जाते है. ऐसे में स्राव के समय एक ही नैपकिन का प्रयोग खुजली, जलन जैसी समस्याओं को जन्म देता है.’

देश में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है पर काम करने के माहौल को उनके अनुकूल बनाने की ओर किसी का ध्यान नहीं है. आज भी कई ऑफिस ऐसे हैं जहां महिलाओं के लिए बाथरूम की व्यवस्था नहीं है या महिला-पुरुष के लिए कॉमन बाथरूम है. जयपुर में कार्यरत एक मीडियाकर्मी बताती हैं, ‘हमारे स्टाफ में दो-तीन महिलाएं ही थीं तो अलग बाथरूम की जरूरत नहीं समझी गई. आम दिनों में तो चल जाता था पर मासिक स्राव के समय नैपकिन को फेंकने की कोई व्यवस्था न होने से अजीब स्थिति हो जाती थी, जिसका हल सिर्फ उन दिनों में छुट्टी लेना ही लगता था. क्योंकि ये औरतों से जुड़ा मसला है तो आप इस पर दफ्तर में खुलकर बात ही नहीं कर सकते.’

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ये स्थिति कहीं न कहीं उस चुप्पी की वजह से आती है जो मासिक स्राव जैसी सहज प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए ओढ़ ली जाती है. गांवों में साक्षरता का स्तर शहरों की अपेक्षा कम होता है, पर हिचकिचाहट वहां भी है. जेएनयू की एक शोधार्थी शिवानी इससे जुड़ा अपना अनुभव बताती हैं. ‘मुझे पिछले कुछ सालों से पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) है. शुरू में जब मैंने खुद में आ रहे बदलाव देखे तब मैं कुछ समझ नहीं पाई. कुछ महीनों तक मैं ये बात किसी से भी नहीं कह पाई कि मुझे पीरियड्स से संबंधी कोई परेशानी हो रही है. मुझे लगता था कि पता नहीं कोई इस पर क्या कहेगा! पर फिर उस झिझक को तोड़ते हुए मैं डॉक्टर के पास गई और इलाज शुरू किया. आज मैं इस बारे में आसानी से बात कर सकती हूं. आपके पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं उतनी ही सामान्य हैं, जितनी शरीर की कोई और तकलीफ.’ इस मामले में डॉ. निम्मी का भी यही कहना है, ‘पीसीओएस दो तरह के होते हैं, जिनमें एक ज्यादा खतरनाक होता है. पर फिर भी बीमारी कितनी भी छोटी क्यों न हो, उसका समाधान करना जरूरी है. यही पीसीओएस लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने पर किसी यूटराइन (गर्भाशय संबंधी) संक्रमण या किसी भी प्रकार के कैंसर का रूप ले सकता है.’

‘मेरे स्कूल के शौचालय में न पानी था न कूड़ेदान. अगर मैं नैपकिन बाहर फेंकती तो लड़के जान जाते कि मुझे स्राव हो रहा है और चिढ़ाते’

अगर सोचें कि हिचक सिर्फ मासिक स्राव से जुड़ी हुई है तो ऐसा नहीं है. शिवानी बताती हैं, ‘बहुत सी लड़कियां आज पीसीओएस से जूझ रही हैं, पर फिर भी वे इस बारे में बात नहीं करतीं. बहुतों को इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं है वहीं कुछ इस ‘प्राइवेट’ मामले पर बात करना नहीं चाहतीं. यहां समाज में बांझपन से जुड़ा लांछन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अधूरी जानकारी के चलते ऐसा समझ लिया जाता है कि अगर महिला को पीरियड्स से संबंधी कोई परेशानी है तो वो मां नहीं बन पाएंगी. यहां शर्म छोड़कर अपने शरीर के प्रति अन्याय न करते हुए आगे आने की जरूरत है.’

उचित जानकारी का अभाव भ्रांतियों को जन्म देता है और ऐसा समाज जहां पहले से ही मिथकों की कोई कमी न हो वहां भ्रांतियों की फसल खड़ी हो जाती है. इस मुद्दे पर महिलाओं से बात करने पर ये भी सामने आया कि कई जगहों पर टैम्पून या मेनस्ट्रुअल कप के उपयोग को कौमार्य से जोड़ कर देखा जाता है. ऐसा समझा जाता है कि टैम्पून का प्रयोग कौमार्य भंग कर देता है.

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घूम-फिरकर बात एक ही जगह आती है कि यदि स्त्री सशक्तिकरण पर इतनी बात हो रही है, महिला आरक्षण का मुद्दा हर बार सुर्खियां बन रहा है तो इतनी आधारभूत बात को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? कैसे उन्हें किसी समय विशेष पर ‘अपवित्र’ माना जा सकता है? देश के कुछ हिस्सों में स्त्री को धरती के समान सृजन का पर्याय मानकर उसके पहले मासिक स्राव को उत्सव की तरह मनाया जाता है. जरूरत जागरूकता की है. इसे सिर्फ महिलाओं का मुद्दा मानना गलत है. बंगलुरु की सोशल एक्टिविस्ट सोनम का कहना है, ‘इस तरह के मिथक समाज से निकलने चाहिए. ये 16वीं सदी नहीं है. महिलाओं के शरीर से जुड़ी बातों को धर्म-समुदाय-राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. मुझे खुशी है कि ‘हैप्पी टू ब्लीड’ जैसी मुहिम इन मुद्दों को मुख्यधारा में ला रही है, इससे इन मुद्दों से जुड़ी शर्म और झिझक कम होगी.’

‘जब न्याय मिलेगा तभी भाइयों के शव दफनाएंगे’

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कौन: मणिपुर के आदिवासी

कब: नवंबर, 2015 से

कहां: जंतर मंतर, दिल्ली

क्यों

जंतर मंतर पर बने एक अस्थायी टेंट के पास खड़े सैम नगैहते चिल्लाते हैं, ‘हमें गरीब आदिवासियों के लिए न्याय चाहिए.’ सैम ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रहे है. उनके साथ मणिपुर से आए कई सामाजिक कार्यकर्ता दिल्ली के प्रसिद्ध धरनास्थल जंतर-मंतर पर नवंबर की शुरुआत से ही डटे हुए हैं. ये लोग मणिपुर के चूराचांदपुर कस्बे में 1 सितंबर को पुलिस की गोलियों का शिकार हुए 9 युवा आदिवासियों के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं. मणिपुर विधानसभा द्वारा पारित तीन ‘आदिवासी विरोधी’ बिलों का विरोध करने के लिए एक प्रदर्शन हुआ था, जिसमें ये 9 युवा भी शामिल थे.

दिल्ली में इस प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे मणिपुर आदिवासी फोरम, दिल्ली (एमटीएफडी) ने टेंट के अंदर 9 प्रतीकात्मक ताबूत रखे हुए हैं.

घटना के विरोध में मृतकों के परिवारों ने शव लेने और दफनाने से मना कर दिया है. उनकी मांग है कि मणिपुर सरकार आरोपी स्पेशल पुलिस कमांडो के खिलाफ कार्रवाई करे, जिन्होंने कथित तौर पर फायरिंग की, जिससे प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों की मौत हो गई.

मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई है. 31 अगस्त को बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में पास किए गए विवादित विधेयकों के कारण हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों ने कथित तौर पर एक सांसद और पांच विधायकों के घरों में आग लगा दी, जिसमें राज्य के स्वास्थ्य मंत्री फुंगजथंग तोनसिंग का घर भी शामिल था. प्रदर्शनकारियों ने विधायकों पर आरोप लगाया कि विधायकों ने उनके हितों का ध्यान नहीं रखा और जब विधेयक पास किए जा रहे थे तब वे मूकदर्शक बने रहे.

पुलिस का दावा है कि जब भीड़ ने आग बुझाने के लिए जा रही अग्निशमन की गाड़ियों को रोका गया तब उन्हें उग्र भीड़ पर फायरिंग करनी पड़ी. इस फायरिंग में 11 साल के बच्चे समेत कुल आठ लोगों की मौत हो हुई थी.

आदिवासी संगठनों के मुताबिक संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए तीन बिलों- प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल बिल, मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स (सातवां संशोधन) बिल, (एमएलआर एंड एलआर) मणिपुर शॉप्स एंड इस्टेब्लिशमेंट (द्वितीय संशोधन) बिल पास कर दिए गए. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री लैम खान पिअांग के मुताबिक, ‘संविधान के अनुच्छेद 371 सी में वर्णित ‘प्रेसीडेंट मणिपुर विधानसभा आदेश, 1972’ के मुताबिक, जो कानून आदिवासियों की आजीविका और जमीन को प्रभावित करे उसे बनाने से पहले ‘हिल एरिया कमेटी’ (एचएसी) की सहमति लेनी जरूरी है जो सभी आदिवासी विधायकों की आधिकारिक संस्था है. लेकिन कई मौकों पर अपने बहुमत के कारण हिल एरिया कमेटी के निर्णयों को सत्तारूढ़ पार्टियों ने प्रभावित किया है. लेकिन इस मामले में तो इन बिलों पर कमेटी से चर्चा भी नहीं की गई.’

‘अभी तक मणिपुर सरकार ने उन पुलिस कमांडो को तलाशकर उनके खिलाफ कार्रवाई भी शुरू नहीं की है जिन्होंने हमारे लोगों को मारा’

यहां ये जानना महत्वपूर्ण है कि मणिपुर के आदिवासी क्षेत्र देश के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों की तरह संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं. संविधान का अनुच्छेद 371 सी ही इनका एकमात्र संरक्षक है.

पिअांग कहते हैं, ‘संघर्ष की शुरुआत गैर-आदिवासी बहुसंख्यक मेइतेई समुदाय द्वारा ज्वाइंट कमेटी फॉर इनर लाइन परमिट (जेसीएफआईएलपी) स्थापित करने के बाद हुई, जिसे बाहरी लोगों के मणिपुर राज्य में प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था. इस कदम के पीछे गैर-आदिवासियों की मंशा आदिवासियों के निवास पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन के लेन-देन को सुगम बनाना था. लेकिन वे राज्य में मणिपुरी और गैर-मणिपुरी की कल्पना में आदिवासियों और उनकी जमीन के हस्तांतरण जैसे गंभीर सवालों को दरकिनार कर रहे थे. जेसीएफआईएलपी आंदोलन के जवाब में राज्य सरकार तीन बिल ले आई, जिससे जमीन के हस्तांतरण में तेजी और आदिवासियों के वजूद पर ही संकट मंडरा सकता है.’

एमटीएफडी के संयोजक रोमियो हमर के मुताबिक, ‘मेइतेई समुदाय बहुल कांग्रेस सरकार के गंदे खेल का खुलासा मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफाॅर्म्स बिल के विश्लेषण से हो जाता है. बहुसंख्यक समुदाय के निवास मणिपुर घाटी में जमीन को लेकर बढ़ता दबाव संशोधन के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है. संशोधित बिल में भ्रमित करने वाले कई वाक्य हैं, जिन्हें आदिवासियों के खिलाफ तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, ‘मणिपुर के मूल निवासी’ को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है. इन भ्रमों को असंवेदनशील नौकरशाही द्वारा अपने तरीके से इस्तेमाल करने के चलते पारंपरिक आदिवासी भूमि प्रशासन के तरीके पर गंभीर संकट आ जाएगा. इन सबसे सरकार की सच्ची मंशा जमीन हड़पने की लगती है.’ हालांकि मणिपुर सरकार ने कई प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से सफाई देकर जमीन हड़पने के आरोपों का खंडन किया है.

हालिया विवादों पर अगर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि ये विधेयक पहाड़ी क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ गहरे संरचनात्मक भेदभाव के प्रतीक हैं. घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में सरकार के खर्च में स्पष्ट अंतर है. एमटीएफडी के सह-संयोजक मैवियो जे. वोबा कहते हैं, ‘महत्वपूर्ण सामाजिक ढांचे जैसे कृषि विश्वविद्यालय, मणिपुर विश्वविद्यालय, दो मेडिकल इंस्टीट्यूट, आईआईटी, नेशनल गेम्स काॅम्प्लेक्स और राज्य स्तरीय प्रशासनिक भवन सभी घाटी में स्थित हैं. यहां तक कि प्रस्तावित खेल विश्वविद्यालय भी घाटी में ही बनेगा.’

इसके अलावा राज्य की विधानसभा में प्रतिनिधित्व का मामला भी विवादास्पद है. वर्तमान में राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 20 ही आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. वोबा कहते हैं, ‘राज्य की जनसंख्या में आदिवासी 40 से 45 प्रतिशत हैं. औसतन हर आदिवासी विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या 37 हजार है लेकिन मेइतेई बहुल घाटी में ये 27 हजार है. परिसीमन आयोग ने आदिवासी क्षेत्रों में विधानसभा सीटें बढ़ाने का सुझाव दिया था लेकिन निहित स्वार्थों के चलते उस पर अमल नहीं हुआ.’

जंतर मंतर पर मृतकों की याद में मोमबत्ती जलाते हुए सैम नगैहते कहते हैं, ‘हमारी आदिवासी संस्कृति में हम उन लोगों को बहुत आदर देते हैं जो मर चुके हैं. लेकिन इस मामले में हमने अपने मर चुके भाइयों को अभी तक दफनाया भी नहीं है जो तकरीबन तीन महीने पहले मारे गए थे. उनके शव चूराचांदपुर जिला अस्पताल के मुर्दाघर में सड़ रहे हैं, जहां शवों को रखने के लिए एक फ्रीजर तक का प्रबंध नहीं है. हम उन शवों को तब तक नहीं लेंगे जब तक हमें न्याय नहीं मिल जाता. हमें उम्मीद है कि एक दिन केंद्र सरकार हमारे इस दुख भरे विरोध को जरूर सुनेगी.’

यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि विभिन्न आदिवासी समुदायों में व्याप्त असंतोष को देखते हुए मणिपुर सरकार ने 2 नवंबर को ‘हियाम खम’ (आदिवासी प्रथागत कानून में हियाम खम का मतलब आरोपी द्वारा गलती को स्वीकार कर लेना होता है) की तामील की यानी इस तरह राज्य सरकार ने स्वीकारा कि हत्याएं अन्यायपूर्ण थीं.

सैम के मुताबिक, ‘सरकार द्वारा किया गया हियाम खम सच्चा नहीं था. प्रथागत कानून के तहत एक सच्चे हियाम खम का मतलब उन अपराधियों द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगना होता है लेकिन अभी तक राज्य सरकार ने उन पुलिस कमांडो को तलाशकर उनके खिलाफ कार्रवाई भी शुरू नहीं की है जिन्होंने हमारे लोगों को मारा.’

आदिवासी इस ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि मणिपुर में अब आदिवासियों द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के दौरान भी उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाई जाती हैं. सैम कहते हैं, ‘अगर बहुसंख्यक समुदाय प्रदर्शन कर रहा है तो उत्पात चरम पर पहुंचने पर भी पुलिसवाले गोली नहीं चलाते. वे सिर्फ आंसू गैस और रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए हमारा ये संघर्ष राज्य में बढ़ते क्रूर नस्लवाद के खिलाफ भी है.’

टीपू सुल्तान विवाद

TIPU-SULTAN-facebookggggक्या है मामला?

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इस साल पहली बार टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का फैसला किया, जिसका भाजपा व विहिप समेत अन्य संगठनों ने विरोध किया. इनका कहना है कि टीपू एक असहिष्णु और क्रूर शासक थे जिन्होंने हिंदुओं पर घोर अत्याचार किए. उन पर मंदिरों व गिरजाघरों को तोड़ने का भी आरोप है. हालांकि इतिहास में टीपू सुल्तान को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले एक शक्तिशाली राजा के तौर पर जाना जाता है. 10 नवंबर को कोडागू जिले के मदीकेरी कस्बे में जयंती मनाने का विरोध कर रहे विहिप कार्यकर्ता उग्र हो गए जिसकी वजह से पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. इस दौरान एक कार्यकर्ता की मौत हो गई. इस घटना के बाद हुई हिंसा में राज्य में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है. मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की है.

गिरीश कर्नाड को क्यों मिली धमकी?

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित नाटककार और अभिनेता गिरीश कर्नाड ने टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के फैसले का स्वागत किया. उनका मानना है, ‘टीपू असहिष्णु नहीं था ये गलतफहमी अंग्रेजों के लिखे इतिहास के कारण हुई है जिसने उनकी छवि एक कट्टर शासक के तौर पर पेश की. टीपू सुल्तान अगर हिंदू होते तो उन्हें मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के समान दर्जा मिलता.’ इसके बाद से गिरीश को टि्वटर पर जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. हालांकि गिरीश इन्हें मजाक की तरह ले रहे हैं.

क्यों हो रहा है रजनीकांत का विरोध?

टीपू सुल्तान पर फिल्म बनाने को लेकर भी बवाल मचा हुआ है. कुछ दिन पहले कन्नड़ फिल्म निर्माता अशोक खेनी ने इस फिल्म के बारे में रजनीकांत से बात की थी. अशोक का कहना है, ‘एक समारोह के दौरान फिल्म के बारे में रजनीकांत से बात की गई थी मगर उन्होंने फिल्म के लिए हामी नहीं भरी. हां, इस प्रोजेक्ट में उनकी रुचि जरूर है.’ लेकिन भाजपा और तमिलनाडु के हिंदू संगठनों ने रजनीकांत को चेताया है कि वे टीपू सुल्तान पर बनने वाली फिल्म में काम न करें. इसी कड़ी में हिंदू मुन्नानी नेता रामगोपालन ने यह कहते हुए रजनीकांत का विरोध किया कि टीपू सुल्तान ने अपने शासन के दौरान तमिलों पर बहुत जुल्म किए थे और उनको एक तमिल नागरिक होने के नाते यह फिल्म नहीं करनी चाहिए.

जीएसटी पर गतिरोध

GST-2015gggggक्या है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)?

वस्तु एवं सेवा कर एक अप्रत्यक्ष कर है यानी ऐसा कर जो सीधे ग्राहकों से नहीं वसूला जाता लेकिन जिसकी कीमत अंत में ग्राहक से ही ली जाती है. इसे आजादी के बाद टैक्स प्रणाली में सुधार का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है. जीएसटी लागू होने पर देश के राज्यों में सभी चीजों पर टैक्स की दर एक समान रहेगी. मौजूदा कर व्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं पर अलग-अलग दर से टैक्स लिया जाता है. जीएसटी लागू होने के बाद केवल तीन टैक्स वसूले जाएंगे. पहला सीजीएसटी जिसे केंद्र सरकार वसूल करेगी. दूसरा एसजीएसटी यानी स्टेट जीएसटी जिसे राज्य सरकार वसूल करेगी. यह टैक्स राज्य के कारोबारियों से वसूला जाएगा. लेकिन यदि दो राज्यों के बीच कारोबार होता है तो उस पर आईजीएसटी (इंटीग्रेटेड जीएसटी) लिया जाएगा. इसे केंद्र वसूल करके दोनों राज्यों में समान रूप से बांट देगा.

जीएसटी पर कांग्रेस को क्यों है आपत्ति?

जीएसटी के मुद्दे पर 27 नवंबर को प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से मुलाकात की. जीएसटी लागू करने को लेकर कांग्रेस ने तीन शर्तें रखी हैं. पहली, जीएसटी की दर को 18 प्रतिशत रखा जाए. दूसरी, जीएसटी डिसप्यूट सेटलमेंट अथॉरिटी का गठन किया जाए. तीसरा, उत्पादक राज्यों के लिए एक फीसदी लेवी यानी कर के प्रावधान को हटाया जाए. मगर मोदी सरकार जीएसटी की दर 20 से 22 प्रतिशत तक रखना चाहती है. कांग्रेस का कहना है कि सरकार को इन मांगों पर ध्यान देना चाहिए और हड़बड़ी में संवैधानिक संशोधन नहीं करना चाहिए.

जीएसटी लागू होने से क्या फायदा होगा?

फिलहाल एक ही चीज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दाम पर बिकती है क्योंकि सब राज्यों में अलग कर प्रणाली है. अब हर चीज पर जहां उसका निर्माण हो रहा है, वहीं जीएसटी वसूल लिया जाएगा. उसके बाद उसके लिए आगे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा. इससे पूरे देश में वह चीज एक ही दाम पर मिलेगी. कई राज्यों में टैक्स की दर बहुत ज्यादा है. ऐसे राज्यों में वो चीजें सस्ती होंगी. जीएसटी के जरिये सिंगल टैक्स स्ट्रक्चर होगा, कागजी कार्यवाही में कमी होगी और इसे समझना आसान होगा. इससे टैक्स जमा करना  आसान होगा, कारोबारी टैक्स भरने में रुचि दिखाएंगे जिससे रेवेन्यू में बढ़ोतरी होगी. जीएसटी लागू होने के बाद जीडीपी ग्रोथ में करीब दो फीसदी उछाल का अनुमान है.

‘जब पोखरण परीक्षण की जगह गांव में बम गिराए जाने की अफवाह उड़ गई’

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यह घटना वर्ष 1974 की है. उस समय देश की सरकार ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण किया था. उस वक्त टोंक जिले के ‘माता का भुरटिया’ नाम के हमारे गांव में अफवाह फैली कि आज हमारे देश में बम गिरने वाला है. अब गांव के उन नासमझों और अशिक्षितों को कौन समझाता कि हमारे देश की सरकार परमाणु बम का परीक्षण कर रही है. हम भी उस वक्त बच्चे ही थे. गांव के उन भोले-भाले लोगों ने न जाने कहां से यह अफवाह सुन ली कि आज कोई दूसरा देश परमाणु बम गिराने वाला है. उस दिन गांव में ऐसी दहशत फैली कि लोग दोपहर से पहले ही खेतों का काम निपटाकर घरों की ओर दौड़ने लगे. गांव के बड़े-बूढ़े कहने लगे कि आज कोई बाजार-वाजार नहीं जाएगा क्योंकि सभी बाजार घर से तीन से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर पड़ते थे.

गांव पर बम गिराए जाने की खबर पर सबको इतना पक्का यकीन था कि मौत आंखों के आगे दिखाई दे रही थी. तय हुआ कि सब अपने घर में रहें. अच्छे-अच्छे पकवान बनाएं और प्रेम से खाएं, आखिरी वक्त में एक साथ रहें या यूं कहें कि साथ-साथ मरें. संयोग से उस दिन जबरदस्त आंधी व बरसात भी शुरू हो गई, जिससे दहशत और भी ज्यादा गहरा गई. सबने इसे विनाश के लिए दिया गया प्रकृति का संकेत माना. उस रोज सब लोग अपने-अपने परिवार के साथ घरों में दुबके हुए थे. गांव की गलियां वीरान थीं.

मुझे याद है ठीक इसी तरह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में जब इमरजेंसी लगाई थी तब भी ऐसा ही नजारा और दहशत लोगों पर हावी था, क्योंकि उस वक्त घर के मर्दों को जबरदस्ती पकड़कर नसबंदी कराई जा रही थी. उस वक्त इतनी दहशत थी कि एक किलोमीटर दूर से पुलिस की जीप देखते ही घर के मर्द खेतों में जाकर छिप जाते थे. खेतों की सिंचाई की नहरों में उल्टे लेट जाते थे. हम बच्चे भी पड़ोस की चाची-ताई के साथ चारे की कुट्टी (एक त्रिशंकु आकार का चारा भरने का स्थान जिसकों राजस्थानी में ‘कंसारी’ कहते हैं) में बंद हो जाते थे. फिर शाम को ही सब लोग छिपते-छिपाते अपने घरों की ओर लौटते. ये सिलसिला कई दिनों तक चला, लोगों का जीना मुहाल हो गया था. बाद में लोगों ने अपना ये गुस्सा आम चुनावों में उतारा और इंदिरा जी चुनाव हार गईं.

खैर, मूल घटना पर लौटते हैं, जब पूरी रात भय और दहशत के साये में गुजरी. सवेरा हुआ तो लोग अनमने ढंग से उठे. जान चले जाने की रात भर की दहशत और अब जिंदा होने की पुष्टि. लोगों को भरोसा नहीं हो पा रहा था कि वे जिंदा हैं. न तो वे खुश हो पा रहे थे और न ही दुखी. फिर जब रेडियो के समाचारों से पता लगा कि हमारे देश में परमाणु बम बनाकर उसका परीक्षण किया गया है तब लोगों की जान में जान आई. हालांकि मानसिक रूप से उस रात हम सब मौत के डर के साये में थे और वो रात आज भी भुलाए नहीं भूलती.

दुखद है कि संवाद की नित नई तकनीक विकसित होने के बावजूद लोगों में विवेक और जागरूकता का विकास नहीं हो पा रहा है

यह तो सिर्फ हमारे गांव की घटना थी लेकिन मुझे याद है एक बार ऐसी ही झूठी अफवाह के चलते देश के अधिकांश शहरों में लोग पत्थर के गणेश को दूध पिलाने के लिए मंदिरों पर टूट पड़े थे. अब इसे श्रद्धा कहें या अंधविश्वास मगर सब लोगों का यही मानना था कि गणेश की मूर्तियां सचमुच दूध पी रही हैं. इन घटनाओं को कितने दशक बीत गए हैं. वैज्ञानिक प्रगति में तब से अब तक हमारे देश ने नित नए सोपान गढ़े. हम चांद और मंगल तक की दूरी नाप आए लेकिन अंधविश्वासों और अफवाहों से हमारा देश अब तक पीछा नहीं छुड़ा पाया है. अभी जुलाई में ही उत्तर प्रदेश के कई गांवों में सिल-बट्टे के खुद-ब-खुद छेदे जाने की अफवाह ने जोर पकड़ा था. अफवाहें जान-बूझकर फैलाई जाती हैं और इसका परिणाम काफी घातक होता है. दुखद है कि संवाद की नित नई तकनीक विकसित होने के बावजूद लोगों में वैज्ञानिक चेतना, विवेक और जागरूकता का विकास नहीं हो पा रहा. कई बार इन घटनाओं को याद कर जेहन में बार-बार सवाल उठता है कि क्या वाकई हम तरक्की कर रहे हैं या फिर देश में अब भी 40 साल पहले जैसे हालात जस के तस बने हुए हैं.

(लेखक राजस्थान के निवासी हैं)

उद्योग से मरता जीवन

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फोटोः मनप्रीत सिंह

तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ता है और प्रदूषण के रूप में इसके खतरे लोगों को झेलने पड़ते हैं. जमशेदपुर के लोगों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. विकास के नाम पर सालों पहले इस शहर को कल-कारखानों से पाट दिया गया और अब इनसे निकल रहा कचरा उनके स्वास्थ्य से लेकर उनकी खेती-किसानी पर बुरे असर छोड़ रहा है.

जमशेदपुर में टाटा पावर लिमिटेड के जोजोबेड़ा थर्मल पावर प्लांट और टाटा स्टील से रोजाना निकलने वाले हजारों टन राख और स्लैग (धातुमल) से शहर और आसपास की खेती योग्य जमीन बंजर होने लगी है. जल, जमीन और हवा प्रदूषण की चपेट में है. इसका सीधा असर पर्यावरण संतुलन और किसानों की कमाई पर पड़ा है. साथ ही लोगों को दमा जैसी बीमारियों से भी जूझना पड़ रहा है.

जोजोबेड़ा थर्मल पावर प्लांट से रोजाना लगभग 2,500 टन राख निकलती है, जिसे जमशेदपुर शहर के बाहरी इलाकों और इसके आसपास के गांवों में खपाया जाता है. कंपनी ठेकेदारों की मदद से राख और स्लैग से गांवों को पाट रही है. जमशेदपुर के बाहरी इलाके सुंदर नगर के हितकू गांव निवासी सोमनाथ सिंह की केडो गांव में जमीन है. इस जमीन पर हजारों टन राख गिराई गई है. इसके मुआवजे के नाम पर ठेकेदार ने कुछ रकम सोमनाथ को दी और कुछ बकाया कर दिया. इसके बाद सोमनाथ ने अपनी जमीन पर राख गिरवाना ही बंद करा दिया. उस राख को दबाने के लिए उपर से मिट्टी की परत भी डाली गई. अब इस जमीन में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं. बारिश के बाद यह राख पानी के साथ आसपास के खेतों में फैल गई और कुछ हिस्सा पास के पहाड़ी नाले ‘लेदाघड़ा’ में बह गया. नाले से होकर राख जहां-जहां फैली वहां के खेत अब बंजर हो गए हैं. इन खेतों में एक समय जहां भरपूर अनाज उपजता था वहीं अब सिर्फ कुछ खरपतवार उगे हुए नजर आते हैं. केडो गांव के निवासी दारा साहू बताते हैं, ‘जब से राख गिराई गई है, तब से आसपास के गांववालों का जीना हराम हो गया है. यहां के ग्रामीण परेशान हैं. वे लेदाघड़ा में स्नान करते थे, जानवरों को पानी पिलाते थे और खेतों को सींचते थे, मगर नाले में राख आने से पानी गंदा हो गया है और उसका बहाव भी कम हो गया है.’

स्लैगयुक्त पानी की चपेट में आकर फसल खराब हो रही है और मछली व अन्य जलीय जीव-जंतुओं की भी मौत हो रही है. इस वजह से दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा मंडराने लगा है. वहीं पानी के संपर्क में आने वालों को त्वचा संबंधी रोग भी हो रहे हैं

इस तरह गर्मी के दिनों में जमीन में दबी राख हवा के साथ पूरे गांव को अपने कब्जे में लिए रहती है.  इसी तरह टाटा स्टील से निकलने वाले स्लैग को गड्ढा भरने के नाम पर जहां-तहां फेंका जा रहा है. विशेषज्ञ बताते हैं कि इस स्लैग में सल्फर की भारी मात्रा रहती है, जो बारिश के पानी में घुलकर नदी, तालाब आदि के पानी को प्रदूषित कर देती है. फिर इस पानी को न तो पिया जा सकता है और न ही यह खेती करने योग्य होता है. पूर्वी सिंहभूम के सिविल सर्जन डॉ. श्याम कुमार झा बताते हैं, ‘विभिन्न उद्योगों के कारण प्रदूषण बढ़ा है. लोग अनेकों बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. उनमें सबसे अधिक संख्या दमा के रोगियों की है. प्रदूषण की चपेट में मनुष्य के साथ जानवर भी हैं.’ टाटा कंपनी पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर जहरीले सल्फरयुक्त स्लैग परिष्कृत किए बगैर जमशेदपुर के लगभग 40 किलोमीटर के दायरे में गिरवा रही है. इतना ही नहीं पूर्वी एशिया में हाथियों के सबसे बड़े अभ्यारण्य दलमा के इको सेंसिटिव जोन की भी अनदेखी की जा रही है, जो इसकी चपेट में है. स्लैगयुक्त पानी की चपेट में आकर फसल खराब हो रही है और मछली व अन्य जलीय जीव-जंतुओं की भी मौत हो रही है. इस वजह से दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा मंडराने लगा है. वहीं पानी के संपर्क में आने वालों को त्वचा संबंधी रोग भी हो रहे हैं.

जमशेदपुर से 25-30 किलोमीटर दूर स्थित गालूडीह के उलदा गांव के ग्रामीण भी इसी समस्या से परेशान हैं. टाटा स्टील कंपनी की ओर से गांव में स्लैग डालने के लिए बनाए गए तालाब से बहकर आए जहरीले पानी की चपेट में आकर उनकी फसल नष्ट हो रही है, छोटे तालाबों में पाली जाने वाली मछलियां भी मर रही हैं. ये ग्रामीण टाटा स्टील कंपनी से अपने नुकसान की भरपाई की मांग कर रहे है. गांववालों ने मांगें पूरी न होने की दशा में आंदोलन की भी चेतावनी दी है. उलदा गांव में लगभग चार वर्ष पहले टाटा स्टील ने सल्फरयुक्त स्लैग डंप करने के लिए तालाब बनवाया था. अब यह तालाब पिछले चार वर्ष में लगभग 50 एकड़ जमीन पर 50 फीट ऊंचा हो गया है. इसके निर्माण के समय स्लैग से निकलने वाले जहरीले पदार्थ से होने वाले परिणाम को समझने के बाद गालूडीह पंचायत के युवा मुखिया वकील हेमब्रम ने इसका विरोध किया था. तब उनका साथ बड़ाखुशी पंचायत के मुखिया बंसत प्रसाद सिंह, ग्रामीण उपेन मांझी, जमनीकांत महतो ने दिया था, लेकिन आसपास के गांववालों को अपने साथ लाने में ये असफल रहे और इस खतरनाक तालाब का निर्माण हो गया.

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हेमब्रम बताते हैं, ‘ग्रामीण भोलेभाले हैं उनको स्लैग डंप से होने वाले प्रदूषण और नुकसान का अनुमान नहीं था. उन्हें धन का लालच देकर भटका दिया गया और वे टाटा स्टील का सहयोग करने लगे.’ जबकि हेमब्रम के साथ वाले चाहते थे कि मामले को लेकर तीनपक्षीय वार्ता हो. टाटा स्टील, जिला प्रशासन और ग्राम पंचायत के बीच अनुबंध हो, जिसमें लिखा हो कि कचरा डंप करने से किसी भी प्रकार का जल, जमीन और वायु प्रदूषण न हो और गांववालों का नुकसान होने की दशा में उचित मुआवजा मिले.’

पर अब चार साल बाद हाल ये है कि स्लैग से बहकर आए जहरीले पानी ने ग्रामीणों की जमीनों को बंजर बना दिया है. खेत में लगी फसल जलकर नष्ट होने लगी है. इस तालाब से कुछ दूरी पर स्थित बिरसा अनुसंधान केंद्र के निदेशक जे. टोपनो ने बताया, ‘स्लैग से निकला पानी जमीन की उर्वर क्षमता को नष्ट कर रहा है. इससे जमीन में फसल नहीं लग पाती है. साथ ही इस पानी के संपर्क में आने वाले किसानों को बीमारियां भी हो रही हैं.’ हालांकि अब तक कितनी जमीन बंजर हुई है, इसके बारे में विभाग से  कोई जानकारी नहीं मिल पाई है.

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रीय कार्यालय सह प्रयोगशाला की ओर से टाटा पावर लिमिटेड को जल नियंत्रण अधिनियम 1974 व वायु नियंत्रण अधिनियम 1981 के उल्लंघन के लिए नोटिस भेजकर चेताया भी गया है, मगर इसका असर होता नहीं दिख रहा है

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रीय कार्यालय सह प्रयोगशाला की ओर से टाटा पावर लिमिटेड को जल नियंत्रण अधिनियम 1974 व वायु नियंत्रण अधिनियम 1981 के उल्लंघन के लिए नोटिस भेज कर चेताया भी गया है, मगर इस नोटिस का कुछ खास असर होता नहीं दिख रहा है. उधर, कृषि, पशुपालन व सहकारिता मंत्री रणधीर सिंह ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है. उन्होंने कहा है, ‘खेती योग्य जमीन का बंजर होना और जहरीले पानी से जीवों की मौत होना गंभीर बात है. पूरे मामले की जांच करने के बाद दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी.

उलदा पंचायत प्रधान छोटू सिंह बताते हैं, ‘टाटा स्टील के स्लैग डंप करने वाले  तालाब की चपेट में आकर उनकी तीन एकड़ जमीन बंजर हो गई है. हर साल लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है.’ छोटू हर साल एक एकड़ जमीन पर 50 से 60 हजार रुपये तक का धान उपजाने के साथ मछली भी पालते थे. इससे उनको 10 से 12 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई हो जाती थी. अब वे अपने खेत से एक रुपया भी नहीं कमा पा रहे हैं. उनके परिवार में सात सदस्य हैं. उनके साथ ही गांव के 40 अन्य किसान भी अपनी उपजाऊ जमीन से हाथ धो बैठे हैं. किसानों ने इसके लिए टाटा स्टील से मुआवजे की भी मांग की थी. पिछले साल उनकी तीन एकड़ जमीन के लिए महज 34 हजार रुपये मुआवजे के रूप में दिए गए. गांव के लाल मोहन सिंह बताते हैं, ‘मेरी सात एकड़ जमीन है, जो बंजर हो चुकी है. मेरी जमीन के अलावा 40 किसानों की सैकड़ों एकड़ जमीन तालाब के जहरीले पानी की चपेट में आकर अपनी उर्वर क्षमता खो चुकी है. हमें परिवार पालने में तकलीफ उठानी पड़ रही है. हमारी मांग है कि टाटा स्टील हमें स्थायी नौकरी या रोजगार उपलब्ध कराए, वरना हम आंदोलन के लिए सड़क पर उतरेंगे.’ इस संबंध में पक्ष जानने के लिए टाटा स्टील प्रबंधन को पत्र लिखा गया, पर प्रबंधन की ओर से किसी भी तरह का जवाब नहीं दिया गया.

कठिन है डगर स्मार्ट सिटी की

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अगर कहा जाए कि दुनिया के सबसे स्मार्ट शहरों के बारे में सोचिए तो जाहिर तौर पर लंदन, न्यूयॉर्क, मेक्सिको और सिंगापुर (हालांकि ये एक देश है) का नाम ही जेहन में आता है. मगर आपको ये जानकर हैरानी होगी कि न्यूयॉर्क स्थित एक थिंक टैंक ‘इंटरनेशनल कम्युनिटी फोरम’ (आईसीएफ) द्वारा 2015 में जारी दुनिया के सर्वोत्तम 7 शहरों की सूची में इनमें से एक भी नहीं है. रियो डी जेनेरो (ब्राजील) को छोड़ दें तो सभी अनजान नामों के छोटे शहर हैं जैसे कोलंबस (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका), इप्स्विच (ऑस्ट्रेलिया) और न्यू ताइपे सिटी (ताइवान).

आने वाले दिनों में जब शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू 98 प्रस्तावित स्मार्ट शहरों की सूची में से पहले 20 शहरों को चुनेंगे तो जाहिर है उसकी तारीफ ही की जाएगी पर समस्या उसके बाद शुरू होगी. दरअसल इस योजना को लागू करने की जल्दी में नायडू ने इसकी प्रक्रिया को इच्छानुसार छोटा कर लिया है. इस योजना में एक स्मार्ट सिटी की परिभाषा, उसकी परिकल्पना और उसकी व्यापकता अब भी अस्पष्ट है. इसके उद्देश्यों को पाने में लगने वाली समयावधि भी बिना कारण ही कम कर दी गई है. एक कंसल्टेंसी फर्म, जिसने इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने से मना कर दिया था, कहती है, ‘अगर शहरों के तैयार किए गए फाइनल खाकों और योजनाओं के बारे में बात करें तो ये योजना विश्व के किसी भी शहर की नकल-भर ही होगी. आपको इसमें बहुत कम या न के बराबर ही नयापन मिलेगा.’

सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना की वेबसाइट (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट स्मार्ट सिटीज डॉट जीओवी डॉट इन)  के अनुसार, ऐसी योजनाओं की परिकल्पना देश व शहर के लिहाज से बदलती रहती है और ये कई बार उस स्थान विशेष के रहवासी और नीति निर्माताओं पर निर्भर करती है. यानी ये साफ है कि यूरोप या अमेरिका का कोई भी स्मार्ट शहर भारत से बिल्कुल अलग होगा, यहां तक कि भारत में ही अलग-अलग शहरों को स्मार्ट सिटी में विकसित करने के लिए अलग योजनाओं की जरूरत होगी. सभी शहरों के लिए एक ही जैसी योजना बना देने से काम नहीं चलेगा. ये एक सामान्य-सी बात है जो हम सभी के शहरों और नगरों के अनुभवों पर आधारित है.

‘किसी शहर को ‘स्मार्ट’ बनाने की पहली शर्त ‘स्मार्ट’ नागरिक हैं. अगर नागरिक ही स्मार्ट नहीं होंगे तो स्मार्ट सिटी बनाने के उद्देश्य बेमानी हो जाएंगे’

दुर्भाग्य से शहरी विकास मंत्रालय कुछ और ही चाहता है. उसका जोर इस बात पर है कि उनकी स्मार्ट सिटी की परिकल्पना का केंद्र सतत विकास था, जिसका उद्देश्य आसपास के सघन क्षेत्रों को विकसित करते हुए एक दोहराया जा सकने वाला मॉडल बनाया जाए, जिससे अन्य नगरों को स्मार्ट सिटी बनने की राह मिल सके. यहां मंत्रालय ने ये नोट भी जोड़ा कि योजना यह भी थी कि स्मार्ट बनाए जा रहे शहरों के अंदर ही इन मॉडलों को दोहराया जा सके और इन्हें देश के विभिन्न क्षेत्रों और भागों में प्रेरणास्वरूप देखा जाए. यहां साफ तौर पर इस योजना के पीछे छुपे विरोधाभास देखे जा सकते हैं.

मंत्रालय ने अपनी रणनीति में ‘पैन-सिटी डेवलपमेंट’ (संपूर्ण शहरी विकास) को भी शामिल किया है. इसका उद्देश्य मौजूदा शहरी संरचना को बेहतर बनाने के लिए कुछ आम समस्याओं का कुछ चुनिंदा ‘स्मार्ट’ समाधान देना है. उदाहरण के लिए परिवहन के लिए बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट की व्यवस्था लाई जा सकती है, अशुद्ध पानी को वापस प्रयोग में लाने योग्य बनाया जा सकता है आदि. ‘पैन-सिटी’ यानी संपूर्ण शहर को किसी भी प्रस्ताव में शामिल करना जरूरी-सा हो गया है, जिसके पीछे विचार ये है, ‘स्मार्ट सिटी योजना एक सघन क्षेत्र में काम करेगी इसलिए जरूरी है कि वहां के रहवासियों को लगे कि इसमें उनके लिए भी कुछ है.’

इसी कारण वहां एक या अधिक ‘स्मार्ट’ समाधान होने चाहिए, जिससे इस योजना के ‘सहभागिता’ का सिद्धांत अपना महत्व साबित कर पाए. पर आने वाले कुछ सालों में ‘पैन-सिटी-सॉल्यूशन’ कई बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है. पहला तो यही कि अपना लक्ष्य पाने की होड़ में काम करने वाली एजेंसियां कई शाॅर्ट-कट अपनाएंगी, जिससे इसके अधूरे क्रियान्वयन की संभावना रहेगी. दूसरा, भ्रष्टाचार की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता. एजेंसियां नगर निकायों को इन समाधानों को शहर-भर में लागू करने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा ले सकती हैं और अंतिम ये कि बाहरी योजनाकार कुछ नया सोचने की बजाय आसान समाधानों को इन योजनाओं में शामिल करेंगे.

स्मार्ट सिटी योजना से जुड़े दस्तावेज पढ़ने पर एक दूसरा पहलू भी सामने आता है. इस योजना का दायरा अस्पष्ट और अस्वाभाविक रूप से विस्तृत है. उदाहरण के लिए, इस योजना के बुनियादी ढांचे में पानी की समुचित सप्लाई, निश्चित बिजली आपूर्ति, कारगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था, सस्ते वाजिब दाम में घर, सुचारु आईटी व्यवस्थाएं, सुशासन, सुरक्षा और सतत विकास जैसी बातें कही गई हैं. ये तो स्पष्ट है कि अकेले नगर पालिकाओं द्वारा इतनी सुविधाएं दे पाना संभव नहीं है, न ही राज्य सरकारें ऐसा कर सकती हैं जब तक उनमें और विभिन्न मंत्रालयों और उनके विभागों में ऐसा समन्वय हो जैसा अब तक न देखा गया हो.

यहां स्मार्ट सिटी योजना में ‘आवश्यक सुविधा’ में सुचारु रूप से बिजली आपूर्ति की बात की गई है, जहां ऊर्जा की आवश्यकता का दस फीसदी सौर ऊर्जा से पूरा किया जाना चाहिए, ऐसा कहा गया है. कारगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के लिए ‘नॉन-मोटर ट्रांसपोर्ट’ यानी पैदल या साइकिल पर चलने को प्रोत्साहन देना होगा. अगर ‘ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट’ की बात करें तो पुनर्निर्मित या पुनर्विकसित

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इमारतों को छोड़कर सभी बिल्डिंगों का हरा-भरा होना और ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना जरूरी होगा. ये केवल कुछ आंकड़े हैं, जिन्हें निश्चित रूप से कार्यान्वयन करने वाली एजेंसियों द्वारा तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाएगा.

स्मार्ट सिटी योजना का जब टेंडर निकालेगा तब सबसे कम बोली लगाने वाला ही जीतेगा और ऐसे में रिसर्च पर होने वाला खर्च अपने आप ही कम हो जाएगा

दुनिया भर में स्मार्ट शहरों का एक निश्चित लक्ष्य है. जैसे अमेरिका का अर्लिंग्टन कंट्री शहर. अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन से नजदीक होने के कारण यहां अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसियां हैं. इस शहर का उद्देश्य साफ है कि संघीय निर्णयों से शहर को प्रभावित नहीं होने देना है. आईसीएफ की सात सबसे स्मार्ट शहरों की सूची में से ये भी एक है. इन्होंने अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ‘द अर्लिंग्टन वॉल’ नाम की रणनीति बनाई है, जिसमें शहर के 40 के लगभग नागरिक संगठन शहर में विभिन्न मुद्दों के लिए होने वाले फैसलों के संदर्भ में अपनी राय देंगे.

दूसरा उदाहरण न्यू ताइपे सिटी का है, इनका फोकस ब्रॉडबैंड सुविधा पर है. पिछले 5 सालों में इस शहर में इंटरनेट प्रयोग की दर 91 फीसदी रही है, जिसमें 100 एमबीपीएस की स्पीड से इंटरनेट सेवा दी गई थी. इस इंटरनेट सेवा का लाभ 300 से अधिक स्कूलों को भी मिला है. इस ब्रॉडबैंड प्रोजेक्ट को एक और योजना ‘नॉलेज ब्रिज’ से जोड़ा गया है, जिससे उद्योगों और विश्वविद्यालयों के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके, जिससे कौशल और रोजगार के अवसर बढ़ सकें.

स्मार्ट सिटी बनाने के साथ वहां रहने वाले लोगों को भी ‘स्मार्ट’ बनाना जरूरी है. एक कंसल्टेंंट के मुताबिक किसी शहर को ‘स्मार्ट’ बनाने की पहली शर्त ही ‘स्मार्ट’ नागरिक हैं. अगर नागरिक ही स्मार्ट नहीं होंगे तो स्मार्ट सिटी बनाने के उद्देश्य कुछ ही समय में बेमानी हो जाएंगे. हमारे सामने दिल्ली और मुंबई के उदाहरण हैं. कॉमनवेल्थ खेलों के समय देश की राजधानी में ढेरों फ्लाईओवर, सब-वे, ओवरहेड ब्रिज बनाए गए, सड़कें चौड़ी की गईं. नतीजा, आज वो सब या तो जाम से भरे हुए हैं या उनका बहुत कम प्रयोग हो रहा है.

इसीलिए स्मार्ट शहरों के साथ जरूरी है संचार की ऐसी रणनीति जो नागरिकों को स्मार्ट बनाने में सहयोगी हो. हालांकि वर्तमान सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’, ‘सेल्फी विद डॉटर’ जैसी योजनाओं के प्रचार के लिए देशव्यापी विज्ञापन अभियान चलाया हुआ है, पर विशेषज्ञों का मानना है कि ॒इससे कोई परिणाम नहीं निकलेंगे. कारण- विभिन्न शोधों के अनुसार भारत में किसी भी समुदाय की विशेष जरूरतों को पूरा करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत ‘सहभागिता और स्थानीय रूप में अपनी बात पहुंचाने’ की होती है. तो ऐसे में स्थानीय लोगों को स्मार्ट सिटी की जरूरत समझाने के लिए उनकी इन्हीं जरूरतों को पूरा करते हुए कोई रास्ता ईजाद करना होगा. विशेषज्ञों के अनुसार नीति-निर्माताआें को स्मार्ट सिटी की योजना में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, जिसमें स्थानीय समुदायों को भी बात रखने का मौका मिले.

ऐसा उदाहरण सरे (कनाडा) में देखा गया. आईसीएफ की सात सबसे स्मार्ट शहरों की सूची में ये भी शामिल है. इस शहर में ‘मेयर्स हेल्थ टेक्नोलॉजी वर्किंग ग्रुप’ बनाया गया है, जिसमें 50 विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि, स्वास्थ्य अधिकारी, एनजीओ, व्यापारिक संघ और सरकार जुड़े हैं. इस ग्रुप का उद्देश्य स्थानीय रोजगार को 50 फीसदी तक बढ़ाना है.

स्मार्ट बनने की दौड़

देखा जाए तो शहरी विकास मंत्री द्वारा की गई सबसे बड़ी गलती 98 शहरों के नाम चुनने में हुई जल्दबाजी है. शुरुआती रूप में सलाहकारों के पास स्मार्ट सिटी योजना बनाने के लिए सौ दिन का समय था, पर विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अवधि काफी कम है. उनमें से एक बताते हैं, ‘इससे पहले हम कई शहरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य की योजनाओं पर काम कर चुके हैं और ऐसे प्रयोगों में एक साल या उससे ज्यादा का समय लगता है. यहां तक कि जब राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन ने हमें जानकारियों और पूर्व में हुए प्रोजेक्ट से अवगत कराया हुआ था, तब भी जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली. आधिकारिक जानकारी पुरानी थी और योजनाओं की उपलब्धियों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था. और सबसे जरूरी, लोगों के इन योजनाओं के बारे में विचार योजनाकारों के बिल्कुल उलट है.’

ऐसी स्थिति में स्मार्ट सिटी की योजना में इन कंसल्टेंट्स के पास एक ही रास्ता बचता है कि वे विभिन्न शहरों के लिए बनी योजनाओं में से ही कुछ तथ्य उधार ले लें. ऐसा करना महज नकल करना ही होगा, जिसमें स्थानीय जरूरतों और शहर विशेष की असल स्थितियों की कोई जानकारी नहीं होगी. यानी बिना किसी जानकारी के आधार पर ये सलाहकार इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का काम शुरू कर देंगे भले ही आगे वह स्थानीय आबादी द्वारा इस्तेमाल किया जाए या नहीं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली का ‘बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम’ (बीआरटी) है, जिसकी शुरुआत से ही आलोचना हुई और फिर इसे बंद कर दिया गया.

स्मार्ट सिटी योजना अपरिपक्व है इसलिए जब इसका टेंडर निकाला जाएगा तब सबसे कम बोली लगाने वाला ही जीतेगा और ऐसे में रिसर्च पर होने वाला खर्च अपने आप ही कम हो जाएगा. यहां उन्हें ये भी संदेह रहेगा कि ये सलाहकार कहीं नगर पालिका के साथ कोई मिलीभगत न कर रहे हों. मान लेते हैं अगर स्मार्ट सिटी की योजना का ठेका लेने भर के लिए कोई व्यक्ति 5 लाख रुपये की बोली लगाता है और योजना को क्रियान्वित करने के समय सलाहकार के हिस्से में कटौती कर देता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि पहले कुछ मामलों में ऐसा हो चुका है. उनमें से एक ने बताया, ‘कोई भी सलाहकार कुछ लाख रुपयों में स्मार्ट सिटी का प्लान नहीं बना सकता, इसके लिए ऑनलाइन शोध निहायत ही जरूरी है.’

 भारी-भरकम राशि का निवेश

सरकारी आंकड़ों के अनुसार केंद्र आने वाले 5 सालों में 98 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने पर 48 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगा यानी औसतन हर शहर पर प्रतिवर्ष लगभग सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे. लगभग उतना ही खर्च संबंधित राज्य या नगर निकाय को भी देना होगा. यानी अगले 5 सालों के लिए कुल एक लाख करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध होगी. तो ऐसे में क्या एक स्मार्ट सिटी बनाने के लिए प्रतिवर्ष 200 करोड़ रुपये या पांच सालों के लिए 1 हजार करोड़ रुपये पर्याप्त होंगे? स्पष्ट रूप से नहीं! इसे भी एक उदाहरण से ही समझते हैं. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन से पहले दिल्ली को बेहतर बनाने के प्रयास में 66,550 करोड़ रुपये लगे थे, जहां 5,700 करोड़ रुपये सिर्फ फ्लाईओवर और पैदल पुलों के निर्माण में खर्च हुए. दिल्ली मेट्रो के विस्तार के लिए 16,887 करोड़ रुपयों की जरूरत पड़ी, वहीं बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए बनाए गए बिजली के नए प्लांटों पर 35 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए.

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अगर ये भी मान लिया जाए कि ये आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं, तब भी ये तो साफ है कि कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान पैसों का बड़ा हेर-फेर हुआ है. ऐसे में वर्तमान सरकार की इस स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए तो एक लंबी समयावधि के लिए दसियों हजार करोड़ रुपयों की जरूरत होगी.

केंद्र भी इस तथ्य से वाकिफ है. स्मार्ट सिटी के फाइनेंस से जुड़े एक दस्तावेज में कहा गया है, ‘ऐसा अनुमान है कि योजना के लिए लगातार पूंजी लगाने की जरूरत होगी.’ केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाला अनुदान तो प्रोजेक्ट की लागत का अंश-भर होंगे, इसलिए इन अनुदानों को आंतरिक और बाहरी स्रोतों से आर्थिक मदद के लिए बढ़ाना होगा. यहां हो सकता है कि आंतरिक स्रोत यूजर फीस और बेनेफिशरी (लाभार्थी) शुल्क बढ़ा दें और बाहरी स्रोत म्युनिसिपल बॉन्ड्स, वित्त संस्थानों से मदद या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप जैसे माध्यमों की मदद ले सकते हैं.

हालांकि ये सब भी खासी परेशानियों से भरा है. ज्यादातर नगर निगम आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं. दिल्ली के ही तीनों नगर निगमों पूर्वी दिल्ली नगर निगम, उत्तरी दिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगर निगम को ले लीजिए, इनमें से केवल एक ही को आय मिलती है. पूर्वी और उत्तरी दिल्ली नगर निगम क्रमशः 500 करोड़ और 1 हजार करोड़ के वार्षिक घाटे में चल रहे हैं, वहीं, नई दिल्ली नगर निगम ने वर्ष 2013-14 में 335 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया है.

योजना के लिए लगातार पूंजी लगाने की जरूरत होगी. केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाला अनुदान तो प्रोजेक्ट की लागत का अंश-भर होगा

अगर स्थानीय निकाय सेवाओं के बदले टैक्स बढ़ा देते हैं तो जाहिर है उपभोक्ताओं में गुस्सा बढ़ेगा, जिससे स्मार्ट सिटी योजना में कही गई ‘सिटीजन-फ्रेंडली’ बात सीधे खत्म हो जाएगी.

जैसे वित्तीय संकट का सामना नगर निकाय कर रहे हैं, उसमें बॉन्ड्स या बाहर से ऋण लेकर धन नहीं जुटाया जा सकता. पिछले कुछ समय में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप भी इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में सक्षम साबित नहीं हुआ है. इस प्रकार स्थानीय निकायों के पास धन जुटाने का जो विकल्प बचता है वह ये कि वे दोतरफा या बहुपक्षीय संस्थाओं के अनुदान के सहारे अतिरिक्त रकम जुटाएं.

स्मार्ट सिटी बनाने की योजना तो अच्छी है पर वर्तमान स्थितियों को देखकर लगता है कि कहीं ये बेवकूफी भरा और सिटीजन- ‘अनफ्रेंडली’ (लोगों के लिए प्रतिकूल) न साबित हो. सरकार को इसी अवधारणा पर रहने की बजाय इससे बेहतर योजना, जो ज्यादा उपयोगी हो, को सोचकर उस पर काम करने की जरूरत है. स्मार्ट सिटी सिर्फ जमीन पर या भौतिक रूप से नहीं बनती, बल्कि लोगों के दिमागों में बनती है. यहां समझने वाली बात ये है कि रोम जैसे बड़े शहर को बनने में पांच या दस साल नहीं लगे थे! अगर वैश्विक रूप से देखा जाए तो अधिकतर स्मार्ट शहरों को बनने में बीस से तीस साल का समय लगा है.