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‘करतूत की सजा ज़रूर मिलेगी’

विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर ङ्क्षसह ने यह कहा था कि वे यदि जीते तो महीने भर में वे पंजाब में मादक द्रव्यों के फैलाव पर रोक लगा देंगे। लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बने पंद्रह महीने हो गए। पिछले ही महीने तीस लोगों की मौत ज्य़ादा मात्रा में मादक द्रव्य लेने से हो गई। इसके बाद पूरे राज्य मेें बेचैनी है।

मुख्यमंत्री और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और नौकरशाहों ने फौरन अपनी सक्रि यता दिखानी शुरू की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी सरकारी कर्मचारीयों, अधिकारियों को हर साल ‘डोप टेस्ट’ कराना होगा। साथ ही मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में केंद्र से यह सिफारिश भी की गई कि मादक द्रव्यों को बेचने वालों को सज़ा-ए-मौत दी जाए। तहलका प्रतिनिधि राजू विलियम की मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से बातचीत के मुख्य अंश!

              पंद्रह महीने पहले आपने मादक द्रव्यों के मुद्दे पर जो वायदा किया था, क्या आपके नजरिए में कोई बदलाव आया है।

              मुझे नहीं पता कि ‘नजरिए में बदलाव’ से आपका क्या तात्पर्य है। मैंने तब तय किया था कि मैं इस आतंक को खत्म करूंगा और प्रदेश में बच्चों को इससे निजात दिलवाऊंगा। मेरा यह प्रण आज और भी मज़बूत हुआ है। मादक द्रव्यों की तस्करी करने वालों और इसे बेचने वालों ने हमारे राज्य को बर्बाद कर दिया है। इतना ही नहीं, इन्होंने भावी पीढ़ी को भी बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। यह सब होता रहे, मैं नहीं चाहता। भले कुछ भी हो। यह एक वादा था जो मैंने खुद से विधानसभा चुनावों के भी पहले किया था। मैं इसे पूरा करूंगा।

              आरोप विपक्ष का है कि मादक द्रव्यों के बड़े व्यापारी तो आपकी पकड़ से भी काफी दूर है?

              कुछ ने ज़रूर देश छोड़ दिया होगा लेकिन वे भी हमारे राडार पर है। एसटीएफ और राज्य की पुलिस और केंद्र की दूसरी एजंसियां बाकायदा उन पर निगरानी रख रही हैं। मैंने उनसे साफ कह रखा है कि दुनिया के दूसरे कोने में भी यदि ये अपराधी हों तो उन्हें उनकी करतूत की सज़ा दी जाए। यदि ज़रूरत हो तो उन्हें वापस लाएं जिससे उन्हें सज़ा मिले। इस बात की हम उन्हें अनुमति नहीं देंगे कि वे उन्मुक्त रहें। यह न केवल हमारे लिए बल्कि हमारे बच्चों के लिए भी ज़रूरी है।

              यह भी आरोप है कि इस काम के लिए तैनात किए गए एटीएफ और राज्य पुलिस के पर कतर दिए गए हैं और उन्हें ड्रग व्यापार की तह तक भी नहीं पहुंचने दिया जा रहा है?

              कोई पर कतई कतरे नहीं गए हैं। मैंने एसटीएफ का गठन सिर्फ एक मकसद से किया था। वह था कि मादक द्रव्यों की रीढ़ की हड्डी तोडऩा। मैंने उन्हें पूरी खुली छूट दी और उन लोगों ने ड्रग माफिया लोगों को घुटनों के बल बिठाने में कामयाबी पाई। उन्होंने पूरी कोशिश की है कि हमारे युवा लोगों तक ऐसी मादक दवाएं न पहुंचे। अभी हाल हमने यह कोशिश की पंजाब पुलिस के दायरे में भी उन्हें रखा जाए जिससे कमी न पड़े  ताकत की और दूसरी सहूलियतों की। एक विषय था एजंसी के तौर पर काम करने में कोई बाधा न हो। वे अभी भी काम कर रहे हैं। मसलन जैसे सुरक्षा  या सतर्कता विभाग जिसके अपने ब्यूरो हर कहीं हों। इनका इरादा बेहद साफ हैं कि उन्हें किसी भी हालात में मादक द्रव्य व्यापार की तह तक पहुंचना है जिससे पंजाब मादक दवाओं से मुक्त हो, एक साथ हमेशा के लिए।

              पहली बार मादक द्रव्यों का कारोबार करने वालों को सज़ा-ए-मौत की सिफारिश और सरकारी कर्मचारीयों के लिए ‘डोप टेस्ट’ से कया कुछ असर होगा?

              बेशक। जो मादक द्रव्यों की बिक्री से रातों-रात रईस होना चाहते हैं वे शायद कुछ करें। उन्हें यह अहसास होगा कि उनकी एक गलती या मादक द्रव्यों की ओर बढ़े कदम से वे जेल जा सकते हैं। यह संदेश अब बहुत साफ तरीके से उन तक पहुंच चुका है जो इस धंधे में लगे हैं। यह एक ऐसा गंभीर अपराध है कि हम किसी भी हालात में ऐसा कोई कानून से नहीं बचा सकते। मुझे भरोसा है कि जो मादक द्रव्यों के अपराधी बनना चाहते हैं उनके दिमाग में डर तो होगा ही।

              जहां तक अनिवार्य ‘डोप टेस्ट’ की बात है कि इससे यह बात साफ हो जाएगी कि यदि किसी ने मौज-मस्ती के बहाने भी मादक द्रव्यों का सेवन किया है तो उसकी नौकरी तो जाएगी और उसे कोई और मिलेगी भी नहीं। मुझे पता है कि ये कड़े कदम हैं लेकिन आज जो हालत है इससे भी ज्य़ादा कड़े कदम मेरी राय में उठाए जाने चाहिए।

              यह माना जा रहा है कि आपकी सरकार जो कदम उठा रही है वे रक्षात्मक ज्य़ादा हैं क्योंकि अचानक राज्य में मौतों की खबरें आईं। क्या राजनीतिक तौर पर आपकी ज़मीन घातक रही है?

              क्या मौत की सज़ा देने की सिफारिश और अनिवार्य ‘डोप टेस्ट’ रक्षात्मक (डिफेंसिव) कदम है? यह ज़रूर है कि मादक द्रव्यों के कारण इधर जो मौतें हुई हैं उनसे हम कड़े फैसले लेने को बाध्य हुए हैं। लेकिन एक बात हमें बड़े साफ तौर पर बतानी चाहिए कि ये फैसले रक्षात्मक नहीं हैं। ये कड़े कदम हैं जो किसी भी सरकार को ऐसी क्रूर समस्या के निदान के लिहाज से उठाने ही पड़ते। कुछ देशों में तो जल्द से जल्द सुनवाई कर सज़ा देने का प्रावधान भी है।

              बताया जाता है कि आपकी सरकार जबसे सत्ता में आई है तो मादक द्रव्यों के 18 हज़ार विक्रेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं और दो लाख नशेडिय़ों का इलात हो चुका है। फिर भी आप क्या कमी देखते हैं?

              आपने खुद ही बता दिया कि संख्या क्या है। एक चीज़ तो तय है कि हम किसी भी तरह आतंक के इस साए को नष्ट करना चाहते हैं। एसटीएफ के सामने वित्तीय संकट हैं। हमारी जो वित्तीय स्थिति है उसमें ही हमने यह तय किया है जो भी जैसी भी स्थिति है हम मादक द्रव्यों का व्यापार और फैलाव रोकेंगे।

              आप किस आधार पर यह कह सकते है कि विपक्ष इस मुद्दे को हवा दे  उभार रहा है?

              कैसे वे हवा दे रहे हैं। यह कांग्रेस ही थी। राहुल गांधी के नेतृत्व में तीन साल पहले यह मुद्दा उभरा था। इस मसले को फैलाने के लिए विपक्ष ही जिम्मेदार है। अकालियों ने अपने राज में अपनी सुविधा के लिए ड्रग माफिया को दस साल तक फलने-फूलने दिया। जहां ‘आप’ की बात है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें आरोप है कि पंजाब में उनके चोटी के कई नेताओं का मादक द्रव्यों से जुड़ाव है। वे हाल-फिलहाल इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने की फिराक में हैं। यह दुख की बात है कि विपक्ष ऐसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर भी लाभ उठाने की सोच रहा है।

नीतीश ने मनवा ही लिया कि जद सबसे मज़बूत

जद (एकी) के सुप्रीमो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नेताओं को अपनी माया में मुग्ध करने में कामयाब हो गए हैं। अपने सूबे में उनकी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी और सबसे ज्यादा ताकतवर है, यह मनवा लिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी सबकी मंजूरी ले ली है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वे जो भी रणनीति तय करेंगे यानी भाजपा के साथ सीटों का तालमेल करेंगे, उसका कोई विरोध नहीं करेगा। राजद में भी ऐसे मौके पर उसके आला लालू प्रसाद को इसी तरह का अधिकार मिल जाता रहा है, जिस तरह नीतीश कुमार को पार्टी सुप्रीमो के चलते मिल गया है। इस मामले में जद (एकी) और राजद या नीतीश कुमार और लालू प्रसाद में कोई फर्क नहीं है।

सूबे में जद (एकी) किसी पार्टी से बड़ी और ताकतवर पार्टी है? राजद से या भाजपा से? राजद से तो नहीं है। राजद के विधायकों की संख्या ज्यादा है। वोट के हिसाब से राजद अव्वल है। यह बात जरूर है कि भाजपा के मुकाबले जद (एकी) बड़ी और ताकतवर है। आखिर नीतीश कुमार ने अपने नेताओं को अपनी पार्टी को सबसे बड़ा और ताकतवर बता कर क्या संकेत करना चाहा है? अपनी पार्टी के नेतों को आश्वस्त करने का उनका एक मकसद हो सकता है। दूसरा मकसद यह कि राजद अपने को बड़ी और ताकतवर पार्टी होने की भूल न करें।

नीतीश कुमार बहुत पहले से ही ऐसा रास्ता बना लेना चाहते हैं जिससे लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ तालमेल करने में सहूलियत हो। चुनाव में सीटों के बंटवारे के आधार में फेरबदल करना चाहते हैं। ऐसा होने पर ही वे ज्यादा सीटों की मांग कर सकेंगे। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने यह साफ कर दिया है कि वे भाजपा से ज्यादा सीटों की मांग करेंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें केवल दो ही सीट मिली थी लेकिन वोट का प्रतिशत कम नहीं था। फिर उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें ज्यादा सीटें भी मिली और वोट का प्रतिशत भी ज्यादा था। इस आधार पर सीटों की मांग करने पर उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। भाजपा के लिए इसका काट करना आसान नहीं होगा।

पिछला विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार की अगुवाई में लड़ा गया। अगला विधानसभा चुनाव भी उन्हीं की अगुवाई में लड़ा जाएगा। बैठक में इन दोनों बातों पर जोर देने की आखिर जरूरत ही क्यों पड़ी। दरअसल यह इशारा किया गया कि सूबे में नीतीश कुमार ही सबसे ज्यादा प्रभावशाली नेता है। उनकी अगुवाई में ही चुनाव लड़ा जा सकता है और जीता जा सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव को कुछ समय के लिए दरकिनार कर दें, तो भी उसके पहले जो लोकसभा चुनाव लड़ा गया, सूबे में नीतीश कुमार की अगुवाई में ही लड़ा गया और कामयाबी भी मिली। वैसी ही स्थिति अब भी है। भाजपा के लिए यह अस्वीकार करना आसान नहीं होगा।

जद (एकी) की ओर से भाजपा पर दबाव देने की रणनीति उस समय तक अख्तियार की जाती रहेगी, जब तक लोकसभा चुनाव में सीटों पर सम्मानजनक तालमेल नहीं हो जाता। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में यह भी स्पष्ट हो गया। बैठक में पार्टी ने यह भी साफ किया कि पार्टी सांप्रदायिकता पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। भाजपा पर दबाव देने और सांप्रदायिकता पर कोई समझौता नहीं करने को कहने के पीछे एक तीर से दो शिकार करने की चाल है। भाजपा को अपने वश में करना है ही, राजद की राजनीति को कुंद करना भी है।

राजद अपनी छवि को भाजपा की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी बनाने में सफल है। वह लगातार भाचपा को सांप्रदायिक पार्टी बता कर उसकी आलोचना करता रहा है। जद (एकी) भाजपा के साथ है, इसलिए वह उसे सांप्रदायिक तो नहीं बताती, लेकिन सांप्रदायिक पार्टी का सहयोगी बताती है। जद (एकी) को इसलिए यह जताने की मजबूरी है कि वह सांप्रदायिकता पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। राजद की तुलना में वह भी सांप्रदायिकता का विरोध करने में कम नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि राजद सेकुलर है तो वह भी उससे कम सेकुलर नहीं है। राजद सामाजिक न्याय की पार्टी है तो उससे बढ़-चढ़ कर वह सामाजिक न्याय की पार्टी है। कुल मिला कर यह कि जद (एकी) भाजपा के साथ रह कर भी सांप्रदायिकता विरोधी और सामाजिक न्याय की पार्टी है। जद (एकी) का मुकाबला किसी पार्टी से है तो वह है राजद।

जद (एकी) यह मान कर चल रही है कि भाजपा उस पर निर्भर है। वह अपने बलबूते पर कोई भी चुनाव लड़ कर ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर सकती। उसका अकेला होना अपने को हासिए पर लाना होगा। वह जद (एकी) पर ज्यादा निर्भर है, जद (एकी) भाजपा पर ज्यादा निर्भर नहीं है। गठबंधन की राजनीति और उसकी अनिवार्यता के मद्देनजर दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक दूसरे की दोस्ती पर राजग निर्भर है। जद (एकी) और भाजपा की दोस्ती से लोजपा और रालोसपा को भी फायदा है। लोजपा और रालोसपा भी  सामाजिक न्याय की  पार्टी मानी जाती हैं।

राजद यह समझ रहा है कि जद(एकी) ही उसका बड़ा दुश्मन है। भाजपा भी दुश्मन है। लेकिन जद (एकी) को कमजोर करने से भाजपा भी कमजोर होगी। भाजपा के कमजोर होने से जद (एकी) कमजोर नहीं भी हो सकती है। जद(एकी) और भाजपा की दोस्ती राजद के लिए बर्बादी है। वह अपनी स्थिति मजबूत करने या अपने समर्थकों व वोट को सुरक्षित करने के लिए यह प्रचार करता रहा है कि नीतीश कुमार इतने मजबूर हैं कि वे भाजपा को छोड़ कर जाएंगे कहां। जद (एकी) और भाजपा की दोस्ती को वह मजबूरी बता रहा है। जद (एकी) राजद के काट और उसके वोट आधार में घुसपैठ करने के लिए ही भाजपा से अपनी दोस्ती को स्थिर और टिकाऊ  बता रहा है। जद (एकी) की ओर से भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर राजद को घेरा जा रहा है। राजद के पास इसका कोई काट नहीं है। भ्रष्टाचार का मुद्दा जम गया तो राजद का नुकसान तय है। जद (एकी) भ्रष्टाचार के मुद्दे ्रकी आड़ में यह साबित करना चाहता है कि भाजपा के साथ जाना उसकी मजबूरी थी। नीतीश कुमार ने धोखा किया, राजद का यह आरोप अब आकर्षक नहीं रह गया।

जद (एकी) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और उसमें हुई चर्चा व किए गए फैसले से सूबे की राजनीतिक स्थिति में फर्क आने की संभावना है। पहले नीतीश कुमार के खिलाफ राजद मुखर था। लेकिन अब राजद को अपने बचाव में खड़ा होना पड़ रहा है। जद (एकी) और भाजपा के बीच लोकसभा चुनाव में सीट का बंटवारा कोई बड़ी समस्या नहीं है, इस पक्ष में हवा बनती दिखती है। केवल एक ही शुबहा है कि चुनाव में प्रथानमंत्री नरेंद्र मोदी की बनी छवि से होने वाले नुकसान को नीतीश कुमार की छवि का प्रभाव कितना पाट पाएगी या नहीं।

नशे की गिरफ्त में हिमाचल

अभी तक पर्यटन और सेब के लिए मशहूर रहे हिमाचल में नशे का कारोबार खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है। एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि हिमाचल नशे के लिए दर्ज मामलों में तीसरे स्थान पर है। यहाँ प्रति लाख आबादी के हिसाब से दजऱ् घटनाओं का आंकड़ा 13.1 है जो देश में तीसरा सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में एनडीपीएस अधिनियम 1985 में विशेष और स्थानीय कानूनों (एसएलएल) अपराधों के तहत पिछले साल संज्ञेय अपराधों के 929 मामले दर्ज किये गए जो बेहद डरावनी तस्वीर पेश करते हैं।

प्रदेश में नशे के इन आंकड़ों के प्रति सरकारें कितनी गंभीर हैं यह इस तथ्य से साबित हो जाता है कि प्रदेश की राजधानी शिमला में नशा निवारण मुक्ति का एक भी केंद्र नहीं। न सरकारी न निजी। ऊपर से तुर्रा यह है कि हिमाचल में नशे के व्यापार में पकड़े गए आरोपियों को सजा मिलने का आंकड़ा बहुत कमजोर रहा है।

इसी साल 31 मार्च को प्रदेश के ऊना जिले के डांगोली गांव के 17 साल के युवा सुभाष (परिवर्तित नाम) की चिट्टा (हेरोइन) की ओवरडोज से मृत्यु हो गई। स्थानीय लोगों ने मौत के खिलाफ सड़कों पर जोरदार प्रदर्शन किया और क्षेत्र में नशे के कारोबार के अपराधियों के खिलाफ पुलिस की निष्क्रियता पर गहरा रोष जताया। कुछ महीने पहले हारोली में भी एक युवा ने इसी कारण अपना जीवन खो दिया था। पिछले एक साल में राज्य में नशीले पदार्थों के सेवन के कारण कम से कम चार लोगों की जान गयी है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2003 में राज्य में एनडीपीएस के तहत केवल 310 मामले दर्ज किए गए थे जो 2014 में 644 पर जा पहुंचे। यही आंकड़ा नवीनतम रिपोर्ट में 929 पहुँच गया है। उमंग फॉउण्डेशन के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि प्रदेश में विभिन्न सरकारें नशे का कारोबार रोकने में नाकाम रहीं हैं। यहाँ नशे की धड़ल्ले से बिक्री होती है, स्कूलों के बाहर नशे की पुडिय़ाँ बिकती हैं और सरकारी तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। “सरकारों के अभियान भी कागज़ी साबित हुए हैं। इनमें गंभीरता और नीति की बेहद कमी दिखती है”।

हाल ही में एक पूर्व विधायक के नाबालिग बेटे को अपने तीन दोस्तों के साथ चरस के साथ हिरासत में लिया गया था। जिस वाहन में वे यात्रा कर रहे थे वह पूर्व विधायक के नाम पर थी

और उसमें ही 500 ग्राम चरस पकड़ी गयी थी। सभी चार को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें उनके माता-पिता को सौंप दिया गया।

‘हिमाचल वॉचर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल में पिछले दस साल में एनडीपीएस मामले तीन गुना बढ़ गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘हिमाचल में बढ़ते नशीले पदार्थों के व्यापार का सबसे बड़े केंद्र कुल्लू, मनाली, मंडी, सिरमौर और शिमला हैं जहाँ बड़ी संख्या में युवा इसकी जकड़ में हैं। चरस का व्यापार कुल्लू में एक भयानक आकार ग्रहण कर रहा है जहां पर्यटकों की बड़ी संख्या रहती है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक विदेशियों में ज़्यादातर इज़राइली नागरिक इस धंधे से जुड़े हैं। नशे की खेती के जरिये स्थानीय किसानों को त्वरित कमाई के लिए “प्रेरित” किया जाता है।

“तहलका” की छानबीन के मुताबिक कुल्लू जिलों में मनाली, कासोल, मालाणा अभी भी नशीले पदार्थों के व्यापार के केंद्र हैं। विदेशी नागरिकों और स्थानीय निवासियों की तरफ से मलाणा और आसपास रेव पार्टियां आयोजित करना आम बात है। यहां तक आरोप हैं कि कुछ विदेशी नागरिक अवैध रूप (भारत सरकार से वैध अनुमति के बिना) मालाणा क्षेत्र में रह रहे हैं और वे स्थानीय लोगों की मदद से नशा व्यापार में शामिल हैं। पिछले सात सालों में 82 से अधिक विदेशी नागरिक, मुख्य रूप से ब्रिटिश, इस्राईली, डच, जर्मन, जापानी और इटालियन राज्य में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गए हैं।

कुल्लू जिला नशे से सर्वाधिक प्रभावित है। एक अनुमान के अनुसार, यहां सालाना 2000 करोड़ के नशे का कारोबार होता है। इसके अलावा हिमाचली युवाओं में रासायनिक पदार्थों से बनाए गए नशे के उपयोग की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (आईजीएमसी) की एक अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ साल पहले न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की अध्यक्षता वाली हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की एक खंड पीठ ने एक फैसले में कहा था कि राज्य में 40 प्रतिशत युवा नशीली दवाओं के जाल में फंसे हैं। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मुद्दे पर राज्य सरकार की खिंचाई की थी। राज्य के डीजीपी के अदालत में यह बताने पर कि सरकार ने बड़े पैमाने पर भांग उखाड़ो अभियान चलाया है, कोर्ट ने इसे कागजों तक सीमित बताया था। पुलिस अधिकारी ने बताया था कि राज्य के करीब 400 गांव में भांग की खेती होती हैं। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक अकेली कुल्लू घाटी में 51,500 एकड़ जमीन में भांग की खेती की जाती और इस जिले में सालाना 2000 करोड़ रूपये के नशे का कारोबार होता है।

राज्य के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने स्वीकार किया कि हिमाचल प्रदेश में लगभग 27 प्रतिशत युवा नशीली दवाओं की गिरफ्त में हैं। उन्होंने कहा – ‘नशा एक सामाजिक समस्या है जिसे लोगों की भागीदारी के साथ ही रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि दवाइयों के खिलाफ प्रभावी ढंग से अभियान के लिए एक विशेष टास्क फोर्स (एसटीएफ) गठित की गयी है और शिमला, कांगड़ा और कुल्लू में तीन राज्य मादक पदार्थ अपराध नियंत्रण इकाइयां स्थापित की गई हैं।

लोगों का मानना है कि पड़ोसी राज्य (पंजाब) नशे से बुरी तरह प्रभावित है और हमारे राज्य में भी इसका खतरा एक गंभीर चुनौती है। मनाली निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य केबिनेट मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा, ‘हमारी सरकार ने नशीले पदार्थों के प्रति शून्य सहनशीलता अपनाई है। चाहे वह मलाणा हो या कोई अन्य क्षेत्र। जय राम सरकार वर्तमान में नशे की खेती को नष्ट कर रही है।’ राज्य पुलिस अभियान के दौरान 19 जनवरी से 1 फरवरी तक, 27.515 किलोग्राम चरस, 215 ग्राम अफीम, 55.868 किलोग्राम गांजा, 37.175 ग्राम हेरोइन और 19 .83 ग्राम कोकीन पुलिस ने पकड़ी और 66 भारतीय और 7 नेपाली पुलिस ने गिरफ्तार किये थे।

यह भी एक चौंकाने वाला तथ्य है कि हिमाचल में नशे का बढ़ता खतरा विधानसभा चुनावों में कभी भी प्रमुख और गंभीर मुद्दा नहीं बना। राजनेता इस मुद्दे को विधानसभा में और बाहर कभी गंभीर रूप से नहीं उठाते हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और इंजीनियरिंग स्नातक राजेश धर्मानी इस बात से सहमत हैं कि राजनेताओं द्वारा उनके भाषणों में इस मुद्दे को शामिल करने की अत्यधिक आवश्यकता है। ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह का मुद्दा गंभीरता से नहीं लिया जाता है। समय आ गया है कि हमें अपने युवाओं को इस खतरे से बचाने के लिए बड़ी और गंभीर पहल करें।’

पश्चिमी हिमालय में दूरस्थ घाटियां और ऊंचे पर्वत भांग और अफीम की खेती के बड़े क्षेत्र हैं। यहाँ का नशा बड़ी मात्रा में यूरोप पहुंच रहा है। दवाओं और एकदम पैसा कमाने की लालसा भी इन क्षेत्रों में विदेशियों को आकर्षित करती है जहां वे असंगठित दवा खेती का हिस्सा बन गए हैं। यह आरोप है कि उनमें से कुछ कभी भी अपने घरों को वापस नहीं लौटते और वहीं रह रहे हैं। कुछ ने तो स्थानीय औरतों से “विवाह” तक कर लिए हैं। कुल्लू, चंबा, मंडी, शिमला और सिरमौर जिलों में दुर्गम क्षेत्र के 2,480 से अधिक गांवों में भांग और अफीम की खेती का धंधा फैला हुआ है।

पंजाब और हरियाणा की सीमा के साथ लगते राज्य के क्षेत्र नशीली दवाओं के केंद्र बन गए हैं। नशा व्यापार के खतरे ने धार्मिक तीर्थ केंद्रों और पर्यटन स्थलों में भी खतरनाक अनुपात में अपने पाँव पसार लिए हैं। पूर्व एडीजीपी केसी सड्याल ने इस संवाददाता से बात करते हुए खुलासा किया कि हिमाचल प्रदेश में 58 प्रतिशत से ज़्यादा नशे का उत्पादन इज़रायल, इटली, हॉलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में तस्करी के जरिये पहुँच रहा है। ‘बाकी नेपाल, गोवा, पंजाब और दिल्ली, नेपाल या अन्य भारतीय राज्यों में पहुँच जाता है।’

काँगड़ा जिले में मैक्लोडगंज और आसपास के इलाके भी अवैध नशीले पदार्थों के केंद्र हैं। सड्याल ने कहा – ‘वैकल्पिक खेती (सब्जियों और फूलों की खेती) ही अफीम और भांग की खेती को नियंत्रित करने का एकमात्र तरीका है’।

हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘राज्य पहले भांग के लिए जाना जाता था जो पहाडिय़ों में उगाया जाता था और विदेशियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अब सिंथेटिक नशा दवाओं की उपलब्धता और कुख्यात चिट्टा (हेरोइन) आ चुके हैं। युवाओं में खांसी सिरप, एंटी-ड्रिंपेंट्स और नींद वाली गोलियों का भी इस्तेमाल होता है जो सस्ती हैं”। ड्रग तस्करी अब राज्य में विदेशी, स्थानीय और देश के अन्य राज्यों के तस्करी करने वालों के रूप में राज्य में बहु-आयामी समस्या बन गई है। यह अब रहस्य की बात नहीं रही भांग और हशीश दशकों से हिमाचल में उगाए जाती रहे हैं और उपभोग के अलावा तस्करी में इस्तेमाल की जाती रही है।

हालिया रिपोर्ट में राज्य में काम कर रहे एक एनजीओ “हिमाचल वॉचर” ने बताया है कि बॉम्बे हेम्प कंपनी के प्रतिनिधियों ने अक्टूबर 2017 में राजभवन में गवर्नर देवव्रत से मुलाकात की और औद्योगिक हेमप को कृषि के सुधार के लिए समर्पित सामरिक संपत्ति के रूप में उपयोग करने और स्थानीय किसानों के सामाजिक-आर्थिक मानकों को ऊपर उठाने के साथ अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को बढ़ावा देने के लिए एक प्रस्तुति दी। । ‘आनुवांशिक रूप से संशोधित भांग में .3 से 1 की ही मारक क्षमता होगी जो वर्तमान में उगा कर इस्तेमाल की जाने वाली भांग के 3 से 4 फीसद से कहीं कम है। “लिहाजा नशा करने वालों के लिए इसका उपयोग एक तरह से बेकार की चीज़ हो जाएगा”।

सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार ने हाल ही में राज्य में नशे के बढ़ते खतरे के बारे में राज्य के मुख्यमंत्री को चेताया है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस समय प्रभावी उपाय नहीं करती है तो राज्य की युवा पीढ़ी गंभीर परेशानी में फंसने वाली है। उन्होंने कहा कि राज्य में बेरोज़गारी की बढ़ती संख्या नशे के खतरे में योगदान देने के प्रमुख कारणों में से एक है। उन्होंने कहा, ‘हमारे युवाओं में निराशा बढ़ रही है और वे नशीले पदार्थों की ओर जा रहे हैं।’

पुलिस की कार्य योजना

नशे, खासकर भांग की खेती के खिलाफ एक व्यापक अभियान 15 अप्रैल से राज्य के सभी जिलों में शुरू किया गया था। अभियान के दौरान किए जा रहे कार्य का विवरण देते हुए, पुलिस महानिदेशक, सीता राम मढऱ्ी ने बताया कि पुलिस, एनसीबी, एसएनसीबी, सीआईडी और वन, राजस्व, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों जैसे प्रवर्तन एजेंसियों को शामिल करके ऐसी खेती को नष्ट करने के लिए एक संयुक्त अभियान शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘ये एजेंसियां 15 अगस्त, 2018 से पहले अफीम, अफीम और भांग विनाश पर प्रगति रिपोर्ट जमा करेंगी। सभी एसपी, महिला मंडल, युवक मंडल और अन्य गैर सरकारी संगठनों को जोड़ देंगे जबकि अफीम पोस्त और भांग की फसलों का विनाश किया जा रहा है।Ó उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास विभाग के समन्वय में कृषि और बागवानी विभाग संयुक्त रूप से अफीम पोस्त और भांग की खेती वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक नकद फसलों को अपनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करेंगे। नशीली दवाओं के दुरुपयोग पर छात्रों को संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा विभाग के नोडल प्रशिक्षण अधिकारी के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया जाएगा। पीटीए और एसएमसी बैठकों के दौरान, छात्रों के माता-पिता भी इस मुद्दे पर चर्चा में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि दवाओं के दुरुपयोग पर शैक्षणिक संस्थानों में एक सप्ताह में परामर्श सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं। ‘इस तरह के परामर्श का मुख्य उद्देश्य छात्रों के माध्यम से दवाओं के आपूर्तिकर्ता तक पहुंचना है।’

राज्य पुलिस प्रमुख ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों के पास स्थित सभी दुकानों, ढाबों में सख्त निगरानी में रखी जा रही हैं और उनका निरीक्षण समय-समय पर किया जाता है और इन संस्थानों के आसपास संदिग्ध गतिविधियों को पुलिस को सूचित किया जाएगा। जनसंपर्क विभाग नशीली दवाओं के दुरुपयोग के दुष्प्रभावों पर नुक्कड़ नाटकों समेत विभिन्न तरीकों से बड़े पैमाने पर जागरूकता कार्यक्रम चलाएगा। हालांकि, आईएसटी, आईआरबीएन बनगढ़, ऊना की सड़क प्ले टीम पहले से ही कार्रवाई कर चुकी है। स्वास्थ्य विभाग जनता के बीच अपने प्रसार के लिए शिक्षा और जनसंपर्क विभागों के साथ 104 हेल्पलाइनों पर नशीली दवाओं के दुरुपयोग की प्रचार सामग्री साझा करेगा।

महिलाओं का योगदान

हिमाचल में महिलाओं ने भांग उखाड़ो अभियान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अभियान में राज्य में 80 से ज्यादा माहिला मंडल शामिल हैं। कुल्लू जिले में माहिला मंडल की सदस्य कमला देवी ने कहा कि पुरुषों और युवाओं में नशीले पदार्थों की आदत से महिलाएं ही सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि एक बार नशे की चपेट में आये पुरुष अपने परिवार की जि़क्र करना बंद कर देते हैं और नशे के जुगाड़ में रहते हैं और परिवारों की देखभाल करना बंद कर देते हैं। ” नशे से उनकी सेहत का भी सत्यानाश हो गया है और घर चलाने का जिम्मा भी हम महिलाओं पर आन पड़ा है”। सिरमौर जिले के एक ऐसी ही सदस्य सत्यवती ने कहा कि महिलाएं सक्रिय रूप से भांग उखाडो का अभियान में प्रशासन और पुलिस की मदद कर रही हैं। कुल्लू और सिरमौर में बहुत से इतने दुर्गम इलाके हैं जहाँ पुलिस की भी पहुँच नहीं हो पाती। युवक मंडल भी इस काम में हाथ बटा रहे हैं।

भाजपा: भीतर पकती गुटबाजी

कांग्रेस के विपरीत प्रदेश भाजपा में खुले में कोर्ई लड़ाई नहीं दिखती। न तो एक दूसरे के खिलाफ कोई बयानबाजी होती है न संगठन और सरकार के बीच वर्चस्व की खींचतान दिखती है। फिर भी 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले भाजपा के बड़े नेताओं में अस्तित्व की जंग भीतर ही भीतर जारी है।

भाजपा के बीच गुट होने के बावजूद लड़ाई का कांग्रेस की तरह खुले में न आ पाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि सात महीने पहले मुख्यमंत्री बने जय राम ठाकुर ने न तो खुद अपना कोई गुट बनाने का प्रयास किया न प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार जैसे अपने वरिष्ठों की हैसियत को चुनौती देने की कोशिश की। जय राम अपनी सीमायें जानते हैं और उन्हें इस बात का एहसास है कि सरकार चलाने के लिए उन्हें इन नेताओं की मदद की ज़रुरत रहेगी। पार्टी के कई बड़े नेता स्वीकार करते हैं कि जय राम

धूमल और शांता कुमार के मुकाबले अफसरशाही पर कम पकड़ रखने वाले मुख्यमंत्री हैं और सरकार पर अभी वे धूमल और शांता जैसा दबदबा नहीं बना पाए हैं।

प्रदेश भाजपा में अभी भी सबसे ताकतवर खेमा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का है। धूमल भले सत्ता से बाहर हैं लेकिन संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी पैठ है। कारण है इतने सालों में उनके समर्थकों की लम्बी जमात का तैयार होना। पिछले साल दिसंबर में जब धूमल की विधानसभा चुनाव में हार के बाद अचानक जय राम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया था तो धूमल परदे से गायब से हो गए थे। लेकिन नए मुख्यमंत्री जय राम की उनसे लगातार मुलाकातों से जाहिर हो गया कि धूमल भाजपा की राजनीति में हाशिये पर नहीं गए हैं।

चर्चा यह भी है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में धूमल को हमीरपुर से उनके बेटे अनुराग ठाकुर की जगह टिकट दिया जा सकता है, हालांकि यह अभी चर्चा तक सीमित है। दरअसल प्रदेश भाजपा में धूमल का मजबूत खेमा अपने नेता को राजनीति के बियाबान में नहीं देखना चाहता।

उनके हलके सुजानपुर में नगर परिषद् के अध्यक्ष और भाजपा नेता रमन भटनागर कहते हैं – ”उनका चुनाव हारना एक दुर्भाग्य पूर्ण अध्याय था जो पीछे छूट चुका है। वे अभी भी पार्टी के लिए वोट ले सकने वाले सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। अगले लोक सभा चुनाव में उनकी उपयोगिता साबित हो जाएगी।”

जाहिर है भाजपा में उनके समर्थक धूमल को कमजोर होता नहीं देखना चाहते। बहुत से नेता यह मानते हैं कि भले प्रदेश में जय राम की सरकार है, समर्थकों के लिए धूमल ही मुख्यमंत्री हैं। एक कार्यकर्ता ने कहा – हम अपने काम के लिए ठाकुर साब (धूमल) को ही कहते हैं और हमारे काम भी होते हैं। धूमल खुद राजनीति में सक्रिय हैं जिससे यह तो जाहिर हो ही जाता है कि वे अपने प्रभावशाली गुट को कमजोर नहीं होने देना चाहते।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती के नेतृत्व में विधानसभा के चुनाव हुए थे और पार्टी ने 44 सीटें जीती थीं। लेकिन सत्ती खुद अपना चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद वे अपने पद पर मजबूती से जमे हुए हैं। उनका अपना कोई मजबूत गुट नहीं हालांकि उन्हें धूमल के करीब ज़रूर माना जाता है। सत्ती की राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षाएं रही हैं। वे युवा हैं और संगठन के व्यक्ति रहे हैं। यह माना जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का खेमा चुनाव के बाद सत्ती को पद से हटाकर नया अध्यक्ष चाहता था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

सत्ती को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में धूमल का बड़ा रोल रहा था। धूमल खुद सत्ती को हटाए जाने के पक्ष में नहीं, ऐसा माना जाता है। संगठन पर भले सत्ती की धूमल जैसी पकड़ नहीं, वे विवादास्पद भी नहीं रहे हैं। इस तरह सत्ती भी प्रदेश भाजपा में भविष्य की दौड़ में शामिल हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार इस समय काँगड़ा से सांसद हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते वहां घटी कुछ घटनाओं को लेकर तल्ख रहे शांता कुमार को अगले लोक सभा चुनाव में पार्टी टिकट की सम्भावना न के बराबर है। इसका कारण शांता की उम्र भी है। वे 2019 में 84 साल के होंगे जबकि उनके विपरीत उनके विरोधी माने जाने वाले धूमल 74 के आसपास होंगे। लिहाजा धूमल को टिकट मिलने की सम्भावना पार्टी के नेता जताते हैं। इस तरह भाजपा को काँगड़ा में नया उम्मीदवार ढूंढना होगा।

प्रदेश भाजपा और मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के लिए 2019 के लोक सभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौती हैं। भले प्रदेश से लोक सभा की चार ही सीटें हैं, भाजपा की सरकार होने से नतीजे उसके प्रदर्शन के आधार से देखे जाएंगे। हो सकता है जय राम ठाकुर लोक सभा चुनाव के बाद खुद की नई इमेज बनाने के लिए कुछ करें ताकि यह प्रभाव खत्म हो कि वे धूमल जैसे वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव में नहीं।

पूछने पर जय राम ठाकुर कहते हैं कि उनके लिए सत्ता जन सेवा की चीज है। जय राम ने तहलका से बातचीत में कहा – मुझे जब मुख्यमंत्री चुना गया खुद मेरे लिए यह हैरानी भरा फैसला था। मैंने आलाकमान और विधायक दल के फैसले को सर माथे पर लेते हुए खुद को पूरी तरह सरकार के काम में लगा दिया। प्रदेश के सामने चुनौतियों का सामना करते हुए कुछ फैसले किये हैं और यह काम आगे भी जारी रहेगा। मैं 14 साल पहले प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना था और उस पद पर रहते हुए संगठन को मजबूत करने का काम किया। अब सरकार का जिम्मा मिला है और नम्रता से अपना जिम्मा निभा रहा हूँ। मुझे खुशी है कि मुझे अपने वरिष्ठ नेताओं का पूरा समर्थन मिला है। इस समय सरकार और संगठन मिलकर प्रदेश के विकास में जुटे हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि 2019 में पार्टी सभी चार सीटें जीतेगी। मैं इस बात पर फक्र महसूस करता हूँ कि हमारे विपक्षी दल के विपरीत हमारे (सरकार और संगठन) के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध हैं। मेरा सौभाग्य है की देश में मोदी जैसा श्रेष्ठ व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर है और हमें और पार्टी को उनके और अमित शाह के नेतृत्व में काम का अवसर मिला है।

पार्टी में इसके बावजूद भीतर कहीं यह तो माना ही जाता है कि बड़े नेता खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए इतनी जल्दी अपनी सक्रियता नहीं छोड़ेंगे। सक्रिय रहेंगे तो गुटों का प्रभाव भी रहेगा। तहलका ने इस मसले पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल से भी बातचीत की। धूमल का कहना है कि जनता से जो वादे किये गए थे यह सरकार उस दिशा में काम कर रही है। प्रत्येक कार्यकर्ता पूरी ताकत से 2019 की तैयारी में जुटा है। यह पूछने पर कि क्या वे 2019 के लोक सभा चुनाव में उतरेंगे, धूमल ने कहा कि यह सोचना उनका काम नहीं। ”कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला आलाकमान और पार्लियामेंट्री बोर्ड करता है। मुझे आज तक पार्टी ने जो भी जिम्मा सौंपा मैंने उसे निभाया। मेरे लिए पार्टी अहम् है पद नहीं।”

इस मसले पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती का कहना है कि प्रदेश में संगठन और सरकार में गज़ब का तालमेल है और कार्यकर्ताओं की आवाज सरकार तक पहुँचती है। ‘जनता के बड़े मसलों पर हम सरकार से लगातार संपर्क रखते हैं।’ उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकारें अपनी महत्वकाँक्षाओं नहीं जनता की उम्मीदों के लिए काम करती हैं।

हिमाचल कांग्रेस की जंग

हिमाचल में विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश कांग्रेस में जंग अभी तक के सबसे खतरनाक मोड़ पर है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पूरी ताकत से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू को हटाने में जुट गए हैं वहीं सुक्खू Óअभी नहीं तो कभी नहीं’ की तर्ज पर वीरभद्र सिंह के मुकाबला कर रहे हैं। सुक्खू पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं जो इतनी मजबूती से वीरभद्र सिंह से टक्कर ले रहे हैं जबकि पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष भले कोई रहा हो, चलती वीरभद्र सिंह की रही है।

सुक्खू समर्थकों का कहना है कि यह आर-पार की लड़ाई है और वे 85 साल के हो चुके वीरभद्र सिंह के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। इन समर्थकों का आरोप है वीरभद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस को अपना जेबी संगठन बनाकर रखना चाहते है लेकिन वे ऐसा नहीं होने देंगे। उनके मुताबिक पार्टी आलाकमान ने सुक्खू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा है और वे पूरी ताकत से राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को प्रदेश में मजबूत करते रहेंगे।

उधर वीरभद्र सिंह खेमे का कहना है कि सुक्खू अप्रभावी प्रदेश अध्यक्ष हैं और उनके नेतृत्व में प्रदेश में कांग्रेस का भ_ा बैठ रहा है। समर्थकों के मुताबिक सुक्खू का कोई जनाधार नहीं और वे संगठन को गति नहीं दे पा रहे जिसकी हार के बाद सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

प्रदेश कांग्रेस की नई प्रभारी रजनी पाटील पार्टी में इस गुटबाजी से बहुत परेशान हैं। वे लगातार प्रदेश के दौरे कर रही हैं लेकिन हर एक बैठक में उन्हें पार्टी को मजबूत करने से ज़्यादा गुटबाजी पर फोकस करना पड़ रहा है। कमोवेश हर बैठक में उन्होंने पार्टी जनों को गुटबाजी से बचने की सलाह दी है, लेकिन नेता हैं कि पूरी शिद्दत से अपने ÓकामÓ में जुटे हैं। बड़े नेताओं के खुले रूप से एक दूसरे के खिलाफ आ जाने से छोटे कार्यकर्ता भी जमकर बयानबाजियां कर रहे हैं इससे पार्टी की जमकर भद्द पिट रही है।

प्रदेश कांग्रेस की लड़ाई देखने से लगता ही नहीं कि बड़े नेताओं का लक्ष्य 2019 के लोक सभा चुनाव जीतना और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है। इसे देखकर तो लगता है कि वे अपनी मनमर्जी करके अपने स्कोर सेटल करने में जुटे हैं।

प्रदेश कांग्रेस के सबसे बड़ी खामी यही है कि वे पिछले तीन दशक से पूरी तरह वीरभद्र सिंह पर निर्भर रही है। आलाकमान ने भी इस पर कभी चिंतन नहीं किया की प्रदेश में नेतृत्व के गुणों वाले दूसरे नेता भी पैदा किये जाएं। बस वीरभद्र सिंह के सहारे चुनाव जीतने का लक्ष्य ही हावी रहा। एकाध बार जब कोशिश भी हुई या वीरभद्र सिंह की मर्जी के बाहर के नेता को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गयी तो वीरभद्र सिंह समर्थकों ने उस नेता को विफल करने में कसर नहीं छोड़ी। इसका नतीजा यह हुआ है कि पार्टी के पास जनाधार वाले नेताओं की ही कमी हो गई।

सुखविंदर सुक्खू जैसे पार्टी के हर स्तर पर काम कर चुके नेता को जब अध्यक्ष चुना गया तो वीरभद्र सिंह खेमे ने पहले ही दिन से उनकी मुखालफत शुरू कर दी। आज हालत यह है कि सुक्खू को काम ही नहीं करने दिया जा रहा। प्रदेश कांग्रेस में सुक्खू एक तरह से सुख राम और सत महाजन के बाद ऐसे पहले नेता हैं जिन्होंने वीरभद्र सिंह के सामने रीढ़ दिखाई है अन्यथा अन्य तो तिनके की तरह ही उड़ गए।

सुक्खू को कमजोर करने के लिए वीरभद्र सिंह उनके गृह जिले हमीरपुर में कुछ साल पहले ही भाजपा से कांग्रेस में आये राजेंद्र राणा को मजबूत कर रहे हैं। राणा सुक्खू की ही तरह राजपूत हैं, भले पार्टी में उन्हें ज्यादा लोगों का समर्थन हासिल न हो।

दो बड़े नेताओं की इस जंग के चलते पार्टी दोफाड़ होने जैसी हालत में है। वीरभद्र सिंह किसी भी सूरत में सुक्खू को अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं। यह माना जाता है कि वे इस पद पर अपने समर्थक को बैठना चाहते हैं। यह भी चर्चा है कि वे अपनी पत्नी प्रतिभा सिंह को महिला और राजपूत होने के नाते अध्यक्ष पद पर बैठाना चाहते हैं। प्रतिभा दो बार मंडी सीट से सांसद रह चुकी हैं। ऐसा होने के स्थिति में संगठन पर भी वीरभद्र सिंह गुट का कब्ज़ा हो जाएगा जबकि कांग्रेस विधायक दल के पद पर वीरभद्र सिंह के ही कट्टर समर्थक ब्राह्मण नेता मुकेश अग्निहोत्री बैठे हैं।

वीरभद्र सिंह विरोधियों का कहना है यदि सुक्खू को उनके पद से हटाया जाता है तो इसका कार्यकर्ताओं में बड़ा गलत सन्देश जाएगा। जबकि वीरभद्र सिंह समर्थकों का आरोप है कि यदि सुक्खू को अध्यक्ष बनाकर रखा गया तो लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के जीतने की कोई गारंटी नहीं होगी। हालाँकि सुक्खू समर्थक कहते हैं कि वीरभद्र सिंह के जिस जनाधार का ढिंढोरा उनके समर्थक पीटते हैं वह 2017 के विधानसभा चुनाव में कहाँ था जबकि वीरभद्र सिंह को ही मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाकर चुनाव लड़े गए थे।

ख्बाहिशों की कतार

प्रदेश कांग्रेस में मुखर भले दो गुट – वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सुक्खू – के हों, परदे के पीछे पांच और बड़े नेता मुख्यमंत्री बनने की ख्बाहिश रखते हैं। इनमें सबसे पहला नाम आशा कुमारी है जो एआईसीसी की सचिव और पंजाब की प्रभारी हैं। कांग्रेस सरकारों में मंत्री रह चुकी हैं। उन्हें आलाकमान के भी नजदीक माना जाता है और चम्बा के डलहौजी से चार बार विधायक बन चुकी हैं और प्रदेश में पहचान रखती हैं। कौल सिंह तो 2012 में मुख्यमंत्री के पद के पास पहुंचकर भी चूक गए। आठ बार के विधायक कौल सिंह कई बार मंत्री रहे हैं और मंडी जिले से ताल्लुक रखते हैं। लगातार आठ बार जीतने के बाद इस बार चुनाव हार गए हालाँकि प्रदेश में पहचान रखते हैं। जीएस बाली काँगड़ा जिले के हैं और इस बार अपना चुनाव हार गए। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं हालाँकि अपना कोई मजबूत समर्थक वर्ग नहीं। दिल्ली में कुछ बड़े नेताओं से पहचान रखते हैं। इसी जिले के सुधीर शर्मा भी इस बार अपना चुनाव हार गए। सुधीर को पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीब माना जाता है। सुधीर की गिनती प्रदेश कांग्रेस के भविष्य के नेताओं में की जाती है। मुकेश अग्निहोत्री ऊना जि़ले के हरोली से चौथी बार विधायक बने हैं। वीरभद्र सिंह के करीबी मुकेश कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं और पार्टी में उनके मुरीद उन्हें भविष्य का मुख्यमंत्री बताते हैं। आलाकमान के कई बड़े नेताओं के करीबी हैं जिनमें सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल भी शामिल हैं।

सियासत का ‘सरकारी रंग’

यह आधा सच और आधा झूठ है।Ó जयपुर में शनिवार 7 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जनसभा में एक नया सियासी इतिहास रचा गया और लोगों ने सियासत के नए ‘सरकारी रंगÓ को अस्तित्व में आते देखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तारीफों के पुल बांधते नजर आए तो वसुंधरा राजे प्रसन्नता से फूलती नजर आई। लेकिन मोदी ने राजे की तारीफों में इजाफा करते हुए जब अंदेशों की स्लेट को साफ किया कि, ‘भाजपा अगला चुनाव वसुंधरा राजे के चेहरे के साथ ही लड़ेगी तो उनकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रही, लेकिन यह आधा सच था। मोदी ज्यों-ज्यों बोलते गए चुनावी सुगंध फैलती चली गई लेकिन चतुराई भरे नए ‘सरकारी रंगÓ के साथ। इसके साथ ही बाकी आधा सच नई उत्कंठा के साथ तब समझ में आया, जब मोदी ने एक बार भी वसुंधरा सरकार को ‘भाजपाÓ से जोड़कर संबोधित नहीं किया। क्या यह आधा झूठ था कि, ‘सरकारी रैली में मोदी ने चुनाव का आगाज कर दिया और जनता की तो छोडि़ए मंच पर मौजूद राज्यपाल कल्याण सिंह भी देखते रह गए।

कांग्रेस पर हमलावर होते हुए मोदी ने एक नया चुनावी जुमला फेंक दिया कि, ‘कांग्रेस के कई नेता अब ‘बेलÓ(जमानत) पर है, लिहाजा यह पार्टी बेलगाड़ी की तरह है। लेकिन कांग्रेस ने इस ‘तंजÓ को हाथों हाथ लिया और उसी शाम मोदी पर पलटवार करते हुए कहा, ‘मोदी तैयार रहें, जनता आगामी चुनावों में जब उन्हें सत्ता से बाहर खदेड़ेगी तो भाजपा के बहुत से नेता ‘बेलÓ पर नहीं ‘जेलÓ में होंगे। वरिष्ठ पत्रकार रमण स्वामी का कहना है कि, ‘दरअसल अगले लोकसभा चुनावों में किसी ना किसी थीम की जबरदस्त जरूरत थी, इस लिहाज से राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी यह जुमला दोहराया जा सकता है। इस स्थिति में ‘बेलÓ और ‘जेलÓ मुख्य चुनावी नारों का गौरव पाने के प्रबल दावेदार बन सकते हैं। स्वामी कहते हैं ‘बेल और जेल की ध्वनि और खनक, पहले के नारों जैसे बोफोर्स, गरीबी हटाओ, शाइनिंग इंडिया की अपेक्षा ज्य़ादा अच्छी है। हाल ही में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बने मदनलाल सैनी का राजनीतिक मर्तबा बढ़ाने के लिए मोदी ने मंच पर पीछे की कतार में बैठे सैनी के अपने करीब बिठाया, और उनके साथ पुरानी नजदीकियों का भी जिक्र किया। प्रसन्नता के आवेग में भले ही वसुंधरा राजे इस परिदृश्य का गहन अर्थ नहीं समझ पाई, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि, ‘जब मोदी ने प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए नकार दिए गए मंच पर बैठे गजेन्द्र सिंह शेखावत का खास तौर से जिक्र किया, तब मंच पर पांच केन्द्रीय मंत्री और भी बैठे थे लेकिन उन्हें काबिले जिक्र नहीं समझा गया। विश्लेषकों का कहना है कि, ‘मंच पर केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री राघवेन्द्र सिह राठौर भी बैठे थे, लेकिन उनकी चर्चा को नकार कर मोदी ने इन कयासों पर भी फुलस्टाप लगा दिया कि, ‘राठौर आज नही ंतो कल राजस्थान में भाजपा के नए चेहरे हो सकते हैं।

मोदी ने प्रदेश के किसानों की नाराजी के मुद्दे को भांपते हुए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफे का जिक्र करते हुए फसल खरीद के भव्य आंकड़े गिनाए। वरिष्ठ पत्रकार कल्पेश याग्निक कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने डेढ़ गुना समर्थन मूल्य घोषित कर दिया तो नीति नीयत और निर्णय के रूप में बहुत अच्छा और आवश्यक कार्य किया, लेकिन हकीकत समझे ंतो वास्तविकता, व्यवस्था और व्यवहारिक रूप से बहुत कम किसानों को लाभ मिल सकेगा। क्योंकि स्वयं कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट कह रही है कि आधे से ज्यादा किसान तो ‘समर्थन मूल्यÓ के बारे में जानते तक नहीं? स्पष्ट है कि, जब जानेंगे ही नहीं तो मूल्य पाएंगे कैसे? याग्निक कहते है कि, ‘अंधेर, अनर्थ और आत्महत्या से घिरे किसान परिवारों को दोगुनी आमदनी का जो वचन दिया था, अभी तो उसका ही पालन होता कहीं दिखाई नहीं दे रहा। उनका कहना है, इस बार भी धान के समर्थन मूल्य को लें तो यह बढ़कर 1750 रुपए हुआ है जबकि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के मुताबिक यह प्रति क्विंटल 2340 रुपए होना चाहिए था तो कैसे खुश होगा किसान?

प्रधानमंत्री मोदी की राजस्थान यात्रा को देखते हुए उम्मीद की गई थी कि, राजस्थान में चल रही जल परियोजनाओं को गति देने के लिए विशेष पैकेज की घोषणा कर सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जबकि बीते साल केन्द्रीय जल आयोग द्वारा स्वीकृत की गई इस योजना के पूरा हो जाने पर झालावाड़, बारां, कोटा, जयपुर तथा सवाई माधोपुर समेत तेरह सूखाग्रस्त जिलों में सिंचाई तथा पीने के पानी की आपूर्ति हो सकेगी।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है, ना कोई सौगात और ना विकास बस मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाकर लौट गए प्रधानमंत्री। पायलट कहते हैं, ‘जब लाभार्थियों से प्रधानमंत्री की बात ही नहीं करवाई गई तो ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी-‘जनसंवाद सभाÓ का क्या मतलब हुआ? लेकिन चुनावी इम्तहान के लिए तो उन्हें पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से ही रूबरू होना पड़ेगा। फिलहाल तो शाह ने वसुंधरा राजे से अपनी चुनावी तैयारियों की रिपोर्ट तलब कर ली है।

सूत्रों का कहना है कि उसके बाद ही भाजपा अध्यक्ष राजस्थान समेत चुनावी राज्यों का दौरा करेंगे। सूत्रों का कहना है कि शाह ने चुनावी राज्यों में कांग्रेस को घेरने के लिए क्या क्या मुद्दे हो सकते हैं? इसकी भी रिपोर्ट भेजने के कहा है। इसके साथ ही राज्य सरकार की क्या उपलब्धियां रही, जनता के हितार्थ कौन कौन से फैसले लिए गए है, इसकी भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।

उधर वसुंधरा राजे ने अपने विधायकों के काम-काज का फीड बैक लेने के लिए प्रदेश के दौ सौ विधानसभा क्षेत्रों में विस्तारकों की तैनाती कर दी है। उनसे कहा गया है कि वे निडर होकर उनके काम-काज का बेबाकी से खुलासा करें। इसलिए शाह की जवाब तलबी का असर हो रहा है, इस बात में दम तो है।

मध्य प्रदेश में होंगे कांगे्रस और बसपा एक?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2019 के आम चुनाव में पूरी सूझबूझ और तैयारी से चुनावी तालमेल कर रहे हैं। इसी साल के अंत में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने को हैं। उसके मद्दे नज़र कांगे्रस और बीएसपी का साथ होना आपस में तालमेल रखने की दिशा में एक बड़ी पहल है।

बसपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के नेताओं की विभिन्न मुद्दों पर बातचीत अर्से से चल रही है। दोनों पक्षों में एक ऊपरी सहमति तो बन गई है लेकिन दोनों ही पार्टियों के नेता पूरा ब्यौरा देने पर फिलहाल राजी नहीं हैं।

मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया का कहना है कि राज्य में साथ मिल कर चुनाव लडऩे की योजना पर चल रहा राय-मश्विरा अब भी जारी है। हालांकि तालमेल पर सहमति बन चली है। सहयोग के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत का सिलसिला विभिन्न स्तरों पर जारी है। उन्होंने कहा कि सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर दोनों पक्षों में बातचीत का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। लेकिन फार्मूला क्या है और सीटों का अनुपात कितना रखा जाएगा इसके बारे में फैसले तक अभी कई और बैठकें होंगी। तब कहीं सहमति के आसार बनेंगे।

मध्यप्रदेश में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में बीएसपी को चार सीटें मिली थी। राज्य की एक दर्जन सीटों पर यह दूसरे स्थान पर थी। इस दौरान राज्य में बीएसपी की ताकत और प्रभाव में बढ़ोतरी हुई है। कंाग्रेस ने बीएसपी की क्षमता और राज्य में संभावनाओं का आकलन करते हुए बसपा को अपना सहयोगी दल माना है।

कांग्रेस फिलहाल राजस्थान, और छत्तीसगढ़ में भी ऐसे दूसरे राजनीतिक दलों की तलाश में है जिनकी चुनावों में बढ़ी क्षमता का उपयोग करते हुए चुनावी रणक्षेत्र में मजबूती से उतर कर भाजपा को पराजित किया जा सके। हालांकि राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायल का मानना है कि राज्य में सभी सीटों पर कांग्रेस फिलहाल जीतने में सक्षम है। इसी कारण किसी और दल के साथ कोई बातचीत भी नहीं की गई है। वहां की सभी सीटों के आकलन की रपट कांग्रेस हाईकमान के पास है। उनके इशारे पर ही अगली कार्रवाई होगी।

 छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का पलड़ा कुछ इलाकों में मजबूत हैं लेकिन दूसरे कुछ कमज़ोर क्षेत्रों में कोई और एसी पार्टी दिख नहीं रही है जो आगे निकले। जानकारों के अनुसार राज्य भाजपा को पूरा भरोसा है कि इस बार भी रमन सिंह के ही नेतृत्व में छत्तीसगढ़ केसरिया ही बना रहेगा।

दुर्गम कंदरा में फंसे 12 बच्चों को बाहर निकालने का कीर्तिमान

यह जबरदस्त कहानी है विश्व बंधुत्व की। आपसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की यह एक मिसाल है जिसके चलते फुटबाल खेलने वाले 12 बच्चों और एक कोच को तंग दुर्गम कंदरा से बाहर निकालने में कामयाबी मिली। यह हौसला ही था बच्चों में जिसके चलते वे तकरीबन 20 दिन तक बिना पानी- भोजन के अंधेरे में रह सके।

 जीवन की यह असली कहानी है जो थाइलैंड में घटित हुई। लगभग सांस रोक कर पूरी दुनिया ने टीवी चैनेलों पर उस जटिलता को भांपा जिसमें 11 से 16 साल के 12 बच्चे और एक कोच 23 जून से फंस हुए थे, अनजाने में। इन बच्चों को निकालने में जुटे थाई नौसेना की एसईएएल टीम के जवान और ब्रिटेन के विशेषज्ञ, अमेरिका की इंडो पेसिफिक कमांड के पैरा-रिस्क टीम के लोग, आस्टेऊलिया, चीन, जापान के भूगर्भ विशेषज्ञ और एक अमेरिकी करोड़पति एलन मस्क। इन सबके संयुक्त प्रयास से मिली सफलता।

 उत्तरी थाईलैंड के चियांग रे की थाम लुआंग नांग नान गुफाओं में ये सभी बच्चे अपने कोच के साथ 23 जून को फुटबाल खेल की अपनी प्रैक्टिस के बाद लौटते हुए अंधेरे में खो गए। उसके बाद मानसून की हुई बारिश से गुफाओं में अंदर भी खासा पानी भर गया। गुफा के अंदर भी कई ऊंचे और निचले स्तर थे।ये बच्चे ऊँचाई की ओर ही ठिठके रहे। तकरीबन दो सप्ताह से भी ज़्यादा समय तक वहां फसे रहे। प्यास लगने पर ये गुफा में ऊपर पत्थरों से आते जल को पीते। लेकिन गुफा में निचली ऊबड़-खाबड़ तलहटी में कीचड वाला बारिश का पानी भरता जा रहा था। ऑक्सीजन भी घटती जा रही थी। बच्चों ने इंतजार किया राहत का, सहयोग का, हिम्मत नहीं छोड़ी । वे एक दूसरे का हौसला बंधाते रहे।

दो सप्ताह के निर्जन प्रवास, और तमाम मानसिक तनाव, शारीरिक कमजोरियों की देख-भाल के लिए सभी बच्चों को निकाल लिया गया। उन्हें फौरन एंबुलेसं से अस्पताल भिजवाया गया। जहां उनके तमाम परीक्षणों और उनके ‘नार्मलÓ होने पर अब उनके परिवारों में भेजा जाएगा।

उस शिक्षिका से क्यों खीझे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ?

काफी भव्य सुरक्षा व्यवस्था में अपना दरबार सजाए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खुद शिक्षिका के पति त्रिवेंद्र सिंह रावत से उनके दरबार में जब एक दूसरी अध्यापिका ने तबादले की गुहार लगाई तो वे भड़क उठे। यह शिक्षक महिला थीं उत्तरा।

उनके पति की मौत हो चुकी है और वे बच्चों की देखभाल की भी पूरी जिम्मेदारी उनकी है। वे चाहती थी कि संवेदनशीलता के आधार पर उनका तबादला सुगम स्थल में कर दिया जाए। उत्तरकाशी के नौ गांव में जेष्टवाड़ी प्राथमिक स्कूल में दो जुलाई 2015 से वे समायोजित की गई थीं। पति के निधन के बाद बच्चों की देखरेख और घर-बार संभालने के चलते वे तीन अगस्त से दस मई 2017 तक स्कूल नहीं जा सकीं। बाद में उन्हें 16 जुलाई 2017 से आकस्मिक अवकाश लेना पड़ा और तब से अवैतनिक अवकाश पर रहीं।

अपनी गुहार उन्होंने गुरूवार को भव्य मुख्यमंत्री दरबार में लगाई। इस दरबार में गुहार लगाने वाले खड़े होकर याचना करते हैं और मुख्यमंत्री और उनके दूसरे मंत्री और नौकरशाह आसनों पर विराजमान रहते हैं। महिला शिक्षिका अपनी बात पूरी करती उसके पहले ही मुख्यमंत्री भड़क उठते हैं। तुरंत उनके सुरक्षाकर्मी सतर्क होते हैं और शिक्षक महिला को गलत तरीके से दरबार से बाहर निकालते हंैं। सोशल मीडिया पर वायरल यह वीडियो मुख्यमंत्री का स्वभाव और झुंझलाहट बताता है।

एक लंबे अर्से से तबादले की मांग कर रही बेवा और उम्रदराज उत्तरा जोशी का मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखती हैं। खासे असरदार तरीके से वे अपना निवेदन करती हैं। उस शिक्षिका के कुछ ही ओज भरे वाक्यों पर मुख्यमंत्री खीझ उठते हैं। वे उसे झिड़कते हैं। वहां मौजूद अधिकारियों और मीडिया के लोगों को भी मुख्यमंत्री के इस रवैए पर खासा आश्चर्य हुआ। आखिरकार वहां मौजूद सुरक्षा दस्ते उस शिक्षक महिला को दरबार से बाहर ले गए। यह व्यवहार था खुद एक शिक्षिका के पति का जो अब मुख्यमंत्री हैं। शिक्षक संगठनों ने भी इस पर विरोध जताया है।

उत्तराखंड में शिक्षा की जो दुव्र्यव्यवस्था है उसे दूर करने में मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री और शिक्षा अधिकारियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। इस कारण गांव-गांव, जि़ले-जि़ले में पब्लिक अंग्रेजी निजी स्कूल खूब पनपे हैं, जिनमें समाज के मध्यम वर्ग और विभाग के बच्चे भी इममें पढ़ते हैं।

उत्तराखंड के शिक्षा सचिव और शिक्षा अधिकारी अब प्रदेश में शिक्षा का स्तर ऊंचा करने के लिहाज से दशकों से कतई नहीं सोच रहे हैं। इसी कारण हरिद्वार, विकास नगर और देहरादून के कुछ नामी बड़े पब्लिक स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की ही पूछ है।

तहलका ब्यूरो

 

 

वे भी भाजपा में कर्मी थे।

एक ज़माना था जब भाजपा के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और परस्पर सहयोग समाज में बेहतर तरीके से पहुंचाने के लिए याद किया जाता था। दौर था 1977 का। मध्यप्रदेश की जनता पार्टी सरकार में ओमप्रकाश रावल शिक्षा मंत्री थे। वे चाहते तो बडवानी में पढ़ाई की अपनी शिक्षक पत्नी का तबादला किसी अच्छे शहर भोपाल या इंदौर में करा सकते थे। लेकिन रावल ने ऐसा नहीं किया।

लेकिन जून महीने में जनता दरबार में पहुंचे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत लिखा हुआ आवेदन हाथ में लेकर पूछते हैं कि इसमें लिखा क्या है। शिक्षिका उससे कहती है कि यह तबादले का अनुरोध किया है वनवास का नहीं तो इतने पर मुख्यमंत्री तिलमिला उठते हैं। उनकी तिलमिलाहट देखकर उनके अधिकारी सतर्क हो जाते हैं। याचिक शिक्षिका के हाथ से फौरन छीन लिया जाता है। मुख्यमंत्री गुस्से में कहते हैं इसे बाहर निकालो। जेल भेजो।

 

‘कस्टडी में लोÓ इसे  गरजे मुख्यमंत्री

‘मुगले आजमÓ फिल्म में बादशाह -ए-हिंदुस्तान जिल्ले सुबहानी जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बने पृथ्वीराज कपूर ने भरे दरबार में जिस तरह अनारकली नाम की कनीज को दीवार में जिंदा चुनवा देने का हुक्म फरमाया था। लगभग उसी अंदाज में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक सरकारी अध्यापिका के लिए भरे दरबार में एलान किया- सस्पेंड करो इसे, कस्टडी में लो इसको।

दरबार

इस जनता दरबार में हुक्मरान और फरियादी रियाया के बीच का फासला किसी सामंत के दरबार जैसा ही था। दुनिया भर के खुले और लोकतांत्रिक समाज में जनता और उसके जन प्रतिनिधियों के बीच की नजदीकी और खुलापन वहां नहीं था। वहां काफी दूरी पर एक ओर फरियादी खडे थे, साथ ही खडा था मीडिया। सामने विराजमान थे राज्य के भाग्य विधाता, अपने मनसबदारों को साथ । यहीं फरियादियों में अपनी कहानी बताने आई थी उत्तरापंत बहुगुणा।

क्या थी फरियाद

पिछले 25 बरस से उत्तराखंड के एक जिले उत्तरकाशी के दुर्गम क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हंै उत्तरापंत बहुगुणा। उनका तबादला कहीं और कभी नहीं हुआ। जब तक पति जीवित थे उन्होंने मांग भी नहीं की क्योंकि जब तक पति थे बच्चों की देखभाल अच्छी तरह हो जाती थी। उन्होंने अपना आवेदन पहले ही दे रखा था। जब विपदा सुनाने की आवाज लगी तो अपनी फरियाद सुनानी उन्होंने शुरू की।

पिछले साल उत्तरापंत के पति की मौत हो गई। शिक्षिका पर बच्चों की परवरिश और पढ़ाई लिखाई की चुनौती आ गई। उन्हें उम्मीद थी कि शिक्षा विभाग उनका तबादला देहरादून कर देगा। जिससे वे बच्चों की ठीक ठाक परवरिश कर सके। पर कौन सुनता है। लगभग साल भर से वे काम पर भी नहीं गई। मुख्यमंत्री के कान भर दिए गए।

कुछ यूं हुआ विवाद

वे पूरी बात कह पाती तभी दरबारी अफसरों से घिरे मुख्यमंत्री की आवाज़ गूंजी , ‘बोलिए मत सस्पेंड कर दूंगा। अभी यहीं पर, सस्पेंड कर दूंगा। अभी बता दिया मंैने तुम्हें, सुरक्षा कर्मी शिक्षिका को बाहर ले जाने के लिए आगे बढ़ते हैं। उसके हाथ से माइक छीन लिया जाता है। उसे घेरे में लेकर बाहर ले जाते हैं। फिर मुख्यमंत्री की तेज आवाज़ सुनाई देती है- ‘इसकों सस्पेंड कर दीजिए। इसको सस्पेंड करो आज ही। इसे ले जाओ बाहर। बंद करो इसको। कस्टडी में लो इसको।

इतना बड़ा क्या अपराध कर दिया था उस शिक्षिका ने। जिसके कारण मुख्यमंत्री ने उसकी बात भी नहीं सुनी और उसकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। और तब बिना किसी दबाव के शिक्षिका ने तब मुख्यमंत्री को जवाब दिया,’तुम क्या सस्पेंड करोगे। मैं खुद को सस्पेंड कर रही हॅंू। सुरक्षा घेरा उसे बाहर ले जाता है। वह कहती है,’ चोर, उचक्के कहीं केÓ।

‘असंवेदनशील’ व्यवस्था

‘पूरी व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो गई है कि एक शिक्षिका 25 साल से दुर्गम इलाके में नौकरी कर रही है। आज उसे ज़रूरत है तो उसकी फरियाद पर कोई कान ही नहीं देता।Ó

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड

राजेश जोशी

फिर किसके लिए लगा ही था यह अनोखा दरबार

पर्दा है तो खुला नहीं हो सकता और खुला है तो पर्दा नहीं हो सकता। हरियाणा के अति प्रतिभाशील मुख्यमंत्री ने जून के अंतिम सप्ताह में ऐसा ‘खुला दरबारÓ लगाया कि प्रदेश की जनता अब माथापच्ची कर रही है कि इसे खुला दरबार कहें या पर्दा नशीं दरबार।

इस अनोखे दरबार में मीडिया के चंद चेहरे और मुख्यमंत्री साहब की चिलम भरने वाले नेता, इतिहास रचने जा रहे अपने ‘माननीय मुख्यमंत्रीÓ के सामने बैठे थे।

उसके बाद विशाल पर्दा लगा दिया गया। उस पर्दे के पीछे ‘वोटोंÓ से कुछ घंटों के लिए इंसानों में तब्दील शख्सियत के लिए कुर्सियां लगा दी गई। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि खुला दरबार, दरबारी नेताओं और पत्रकारों के लिए है या फिर जनता के लिए।

मुख्यमंत्री के पीछे ‘खुले दरबारÓ का एक बड़ा बैनर लगा था इसलिए इसे ‘खुला दरबारÓ की संज्ञा दे सकते हैं। वरना किसी भी रूप में यह दरबार खुला तो नही थां। मुगलिया शैली में लगे इस दरबार से दो बातें ज़रूर साबित हुई कि – मुख्यमंत्री जनता से रूबरू नहीं होना चाहते। शायद वजह यह हो कि पौने चार साल के कार्यकाल में अपने वायदे तक पूरे नहीं किए।

असलियत क्या है यह मुख्यमंत्री और उनके दरबारी ही बता सकते हैं। लेकिन यह ज़रूर है कि न पहले कभी ऐसा दरबार लगा और न भविष्य में इसके लगने के ही आसार हैं। मुख्यमंत्री ने वाकई एक इतिहास तो रच ही दिया। इस खुले दरबार को देख वैसा ही हास्य बार-बार उभर रहा था जैसा फिल्म ‘शोलेÓ में दिखा था। इसमें हीरोइन से हीरो पूछता है – तुम्हारा नाम क्या है बसंती।

इस अनोखे दरबार की खबर आपके लिए है। आप भी ठीक वैसा ही आनंद लीजिए।

उमेश जोशी, शशि जोशी

सुप्रीम कोर्ट से आप को संरक्षण मिला फिर भी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यह साफ कह दिया कि दिल्ली के उपराज्यपाल के पास फैसला लेने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। असली अधिकार जनता और चुनी हुई सरकार का ही है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आम आदमी पार्टी (आप) को अदालत से ऐतिहासिक कानूनी जीत हासिल हुई है। यह तय हुआ कि देश की राजधानी दिल्ली में आखिरी फैसला लेने का अधिकार दिल्ली सरकार का है या दिल्ली के उपराज्यपाल का। इस फैसले पांडिचेरी को भी अब काफी राहत हुई होगी।

दिल्ली में कौन वाकई बड़ा अधिकारी है इस पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले से एक लंबे विवाद का समाधान हो गया। जब से आप सरकार सत्ता में आई है तब से केंद्र की ओर से भेजे गए उपराज्यपाल उसकी तमाम फाइलें मंगाकर राजभवन में रखते रहे हैं। जिसके कारण आप सरकार बमुश्किल शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुछ वाकई अच्छे काम कर सकी और बाकी व विवाद होता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्यों में केंद्र को अनचाही दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। जो लोकप्रिय इच्छा है उसे अमल में आने से कतई नही रोका जा सकता। अदालत ने कहा कि उपराज्यपाल को बाधक नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी जीत है। अरविंद केजरीवाल की सरकार के दिल्ली में तीन साल सिर्फ विरोधों और धरनों मे ही गुजरे। अभी पिछले महीने भी वे उपराज्यपाल अनिल बैजल के विजिटर्स रूम में सोफों पर अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ धरने पर ही थे। अदालत ने कहा कि पूर्णता और अधिनायकवाद अराजकतावाद के लिए कोई जगह नहीं हैं

अदालत के अनुसार

  1. मंत्रिमंडल को सारे फैसलों की जानकारी उपराज्यपाल को ज़रूर देनी चाहिए। लेकिन हर मामले में उनकी सहमति होनी अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह साफ किया कि उपराज्यपाल ‘बासÓ नहीं है।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भूमि, पुलिस और जनादेश में उपराज्यपाल की स्वतंत्र फैसला लेने की भूमिका संविधान में भी नहीं है।
  3. उपराज्यपाल सिर्फ एक प्रशासक हैं। उनकी भूमिका भी बहुत सीमित है वे राज्यपाल भी नहीं हैं। मंत्रिमंडल के ज़्यादातर परामर्श से वे बंधे हुए हैं।
  4. फैसला पढ़ते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने कहा कि उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार के साथ शांति के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
  5. आप सरकार ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ जिसके तहत उपराज्यपाल को दिल्ली के प्रशासनिक बॉस का दर्जा मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश से असहमत होते हुए कहा कि उपराज्यपाल को मशीनी तरीके से काम नहीं करना चाहिए और दिल्ली मंत्रिमंडल के फैसलों पर रोक नहीं लगानी चाहिए।
  6. सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला तब आया है जब पिछले ही महीने केजरीवाल ने उपराज्यपाल के घर के अतिथिगृह में नौ दिन विरोध करते हुए गुजारे थे।
  7. आप ने बैजल से अनुरोध किया था कि वे अधिकारियों का बॉयकॉट रद्द कराने के लिए उचित कदम उठाएं। यह बॉयकॉट तब शुरू हुआ जब मुख्य सचिव अंशुप्रकाश ने फरवरी में आप के दो विधायकों पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी में कथित हाथापाई का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि आप विधायकों ने केजरीवाल के घर पर उनके साथ हाथापाई की।
  8. जब अधिकारियों ने काम करने का फैसला लिया तो केजरीवाल ने आंदोलन खत्म किया लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को फिर ताजा कर दिया। मांग का विरोध भाजपा तब से कर रही है जब से यह केंद्र में आई है।
  9. मतभेदों की शुरूआत तो तब से ही हो गई जब से आप 2015 में दिल्ली में सत्ता में आई। इसे 70 में से 67 सीटें मिली थीं। विपक्ष में भाजपा को सिर्फ तीन सीटें मिली थी। आप का आारोप है कि केंद्र सरकार तब से ही बदले की भावना से काम करती रही है, और इसके लिए उपराज्यपाल का सहयोग लेकर केजरीवाल सरकार के हर फैसले पर रोकथाम लगा देती रही है।
  10. आप जब सत्ता में आई तो केंद्र ने एक नियम निकाला जिसके तहत चुनी हुई सराकर के हर फैसले चाहे वह पुलिस, जनादेश या नौकरशाही की नियुक्तियों का हो उस पर चुनी हुई सरकार से बातचीत करे।