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हम जानते कितना हैं बहादुर टीपू को

टीपू सुल्तान एक ऐसा शासक था जिसका नाम सुनते ही ब्रिटेन में कभी थरथराहट होने लगती थी। जब वह मरा तो ब्रिटेन में खुशी के दिए जगमगाने लगे। टीपू की राजधानी श्रीरंगपट्टनम पर कब्जा और लूटपाट तो मशहूर उपन्यास ‘द मूनस्टोन’ का शुरूआती दृश्य है।

टीपू अकेला ऐसा भारतीय शासक था जो यह समझता था कि भारत के लिए अंग्रेज क्या-क्या खतरे बढ़ा रहे हैं। भारत के लिए ब्रिटिश कितने खतरनाक हैं इस बात को वह अच्छी तरह जानता समझता था। उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए उसने चार लडाइयां लड़ीं। उसने इतनी वीरता से ये लड़ाइयां लड़ीं कि उसे भारतीय उपमहाद्वीप का पहला स्वतंत्रता सेनानी माना भी जाता है।

टीपू ने ओटोमन और फ्रांसीसी शासकों के पास मिशन भेजे। उनसे अनुरोध किया कि वे देश से अंग्रेजों को बाहर करने में सहयोग करें। पश्चिमी देशों में विज्ञान और तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से वह खासा प्रभावित था। उसने बंदूक बनाने वालों को, इंजीनियरों, घड़ीसाज और दूसरे विशेषज्ञों को मैसूर बुलाया। फिर उसने पीतल की अपनी तोपें बनवाई, गोला-बारूद और मस्कट पर ‘मेक इन मैसूर’ खुदवाया।

टीपू हमेशा बाघ की तस्वीर साथ रखता। यह जताने के लिए कि उसके पास अद्भुत ताकत है। टाइगर उसके स्वर्ण सिंहासन, उसके कपड़ों, सिक्कों, तलवारों और सिपाहियों की वर्दियों तक पर बना होता था। उसने सूर्य को भी अपना प्रतीक बनाया था जो यह बताता था कि मैसूर का यह शासक हिंदू और मुसलमान दोनों को एक नज़र से देखता है। टीपू ने सपनों पर एक किताब ‘बुक ऑफ ड्रीम’ भी लिखी थी। ‘ख्वाब नामा’ नाम की इस किताब में सपनों में हुई उसकी लड़ाइयों के संकेत हैं। टीपू बाहर से आया आक्रमणकारी नहीं था। वह इस देश की मिट्टी में पैदा हुआ था। उसकी परिवार की तीसरी पीढ़ी दक्षिण भारत में जन्मी और पली-बढ़ी। टीपू के मुख्यमंत्री पूरनैय्या थे जो हिंदू थे। वे उसके दरबार में मौजूद कई दरबारियों में एक थे। कई हिंदू मंदिरों के संरक्षक के तौर पर टीपू इतिहास प्रसिद्ध है। उसने श्री रंगनाथ मंदिर को वित्तीय मदद दी थी जो श्रीरगपहने से उसके अपने महल के पास है। उसने तंगेरी मठ को भी संरक्षण और वित्तीय सहयोग दिया। मठ के स्वामी को वह जगदगुरू कहता था।

टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली और फिर खुद टीपू तीस साल तक ब्रिटिश सत्ता और जनता के दिलो-दिमाग पर बतौर खतरा छाए रहे। ब्रिटिश सेनाओं पर अचानक हमले और फिर बस्तियों पर बातचीत। मसलन मद्रास पर बातचीत का सिलसिला खासा रोमांचक रहा था जो अंग्रेजों की धरती पर भी चर्चा में रहता।

दशकों चले चार मैसूर युद्ध का ब्यौरा जानने के लिए इंग्लैंड में काफी इंतजार रहता था। उन्हें आश्चर्य होता कि यह कथित तानाशाह किस तरह के अत्याचार अंग्रेजों पर कर रहा है। ब्रिटिश सेना के जो सिपाही सालों से मैसूर की जेल में रखे जाते थे वे लौट कर अपनी किताबों में कठिन जि़ंदगी और सेना के रवैए पर किताबें लिखते थे। उनके ब्यौरे उनके पाठक के लिए उतनी रुचि के नहीं होता थे जितनी रुचि टीपू के गौरव की बातों में होतीं। टीपू को जनरल हैरिस की सेनाओं ने घेर कर मारा था। 1799 में उसके द्वीप राजधानी को घेर लिया गया था। टीपू सुल्तान युद्ध पारंगत भारतीय योद्धा था जो खलनायक तो नहीं लेकिन गौरवशाली हिंदुस्तानी के तौर पर ब्रिटेन में जाना जाता था। इसी कारण टीपू सुल्तान ब्रिटेन के नाटककारों, लेखकों, कवियों और चित्रकारों की प्रेरणा का स्रोत बना रहा जो चित्रों में ब्रिटिश के उत्साह के साथ-साथ उसे भी महत्वपूर्ण स्थान देते।

आर्थर वेलेजली जो बाद में ड्यूक ऑफ वेलेंगिटन भी बने उन्हें वाटरल् की लड़ाई में नेपोलियन को परास्त करने के लिए जाना जाता है। उन्हें श्रीरंगपट्टन पर जीत की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बाद में 1803 में उन्होंने बैटल ऑफ ऐसाई में मराठों पर जीत हासिल की थी। भारत वेलेजली के लिए ऐसा चुनौतीपूर्ण देश था जहां उन्होंने अपनी बहादुरी के झंडे गाड़े।

गवर्नर जनरल लॉर्ड मोरिंगटन जो आर्थर के बड़े भाई रिचर्ड थे वे अपने काम में बढिय़ा प्रदर्शन नहीं दिखा पाए। ब्रिटेन से आए आदेशों के खिलाफ उन्होंने मैसूर पर हमला तो किया लेकिन उनके समर्थकों ने उन्हें सही ठहराने के तमाम प्रयास किए। लेकिन उनका सम्मान इतना नहीं रहा कि वे आयरिश अभिजात्य जीवन जीने और सेवानिवृत्ति पर भेज दिए जाते।

उन्नीसवीं सदी में टीपू सुल्तान की बदनाम तस्वीर ब्रिटिश जनता की दिमाग में कौंधती रही। 1868 में विल्की कालिंस ने श्रीरंगपट्टन के चारों और घेरा डाल दिया और लूटपाट शुरू की। यही वाक्या उनके लोकप्रिय उपन्यास ‘द मूनस्टोन’ की शुरूआत भी बना। टीपू सूल्तान की यह खासियत थी कि वह अपने दुश्मनों को भयग्रस्त रखने के लिए कल्पना और प्रतीकों का इस्तेमाल करता। इसमें उसे कामयाबी भी मिली। उसे यह अंदाज शायद नहीं था कि उसका बाघ को चुनना एक तरह से ब्रिटेन के प्रतीक शेर से मुकाबला था।

यह सहसा नहीं हुआ है कि जिन लोगों ने श्रीरंगपट्टनम को घेरा था उन्हें वह मेडल मिला जिसमें आक्रामक शेर एक बाघ को दबोचे हुए है। टीपू सुल्तान के दिमाग में यह बात साफ थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी की योजना इस उपमहाद्वीप के वासियों को पूरी तौर पर पराधीन बनाने की ही थी। टीपू की मौत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी और गहराई से भारतीय भूमि पर काबिज हुई।

साभार: केट ब्रिटलबैंक

: स्क्राल.इन

मध्यावधि चुनाव के नतीजों में घिरे ट्रंप

अमेरिका में छह नवंबर को मध्यावधि चुनाव हो गए। इस चुनाव से यह बात साफ हुई है कि अमेरिका में लोकतंत्र बहुत ही मज़बूत है। हालांकि एक-एक करके लोकतंत्र के तमाम प्रहरी संस्थानों को कमजोर करने की पुरजोर कोशिशें हुईं। ध्रुवीकरण की खूब चालें चली गई। दहशत फैलाई गई। यहां तक कि मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिए भी खूब पहल हुई। समाज में चूंकि इस बदलाव के समर्थक नहीं है इसलिए आम जनता ने इसे जबरदस्त तरीके से नकार दिया।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संवाददाता सम्मेलन में गुरुवार (8नवंबर) को कहा कि जिन रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने उनसे प्रचार के दौरान दूरी बनाए रखी वे अपनी ही सीट हार गए। उन्होंने मीडिया के उन संवाददाताओं का मज़ाक उड़ाया जिन्होंने उनकी बातों का उपहास किया। हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स में अब डेमोक्रेटस हावी हंै। हालांकि ट्रंप यह नही मानते। डेढ घंटे के अपने संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कुछ संवाददाताओं को अशिष्ट भी करार दिया। सीएनएन के व्हाइट हाउस संवाददाता जिम अकोस्टा का प्रेस पास भी निलंबित कर दिया गया।

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से आए नतीजों से यह साफ है कि 435 सीटों के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में डेमोक्रेट्स के पास फिलहाल 220 सीटें हैं। हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स की खसियत यह है कि राज्यों की जनसंख्या के अनुसार सीटें बढ़ती है। अब रिपब्लिकन पार्टी 51-49 की संख्या से सीनेट में 54-56 की स्थिति में है जो हर राज्य (बड़ा या छोटा) से दो प्रतिनिधि लेती है। दोनों ही पार्टियां अपनी जीत के दावे करने में जुटी हैं। हालांकि अब डेमोक्रेट्स के पास ज़्यादा अधिकार हैं। उन्होंने सदन में अपनी तादाद बढ़ा कर रिपब्लिकन को कमजोर किया है।

डेमोक्रेटस नेे भीड़ वाले तटीय इलाकों, शहरी, उदार, प्रगतिशील और आर्थिक तौर पर सक्रिय अमेरिकी क्षेत्रों से मत हासिल किए। जबकि राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पार्टी को कम आबादी क्षेत्र, अशिक्षित, गंवई, दकियानूसी, श्वेत और आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों ने मत दिए। राष्ट्रपति ट्रंप ने चाहा था कि ‘रिपब्लिकनस’ को सुनामी विजय हासिल होगी जो संभव नहीं हो सकी।

जो नतीजे आए हैं उससे ट्रंप की विदेश नीति प्रभावित नहीं होती। लेकिन डेमोक्रेटस अब ट्रंप की घरेलू नीतियों में ज़रूर दखल दे सकते हैं। रिपब्लिकन ने भी डेमोक्रेटस की नीली लहर का सामना किया। इस नीली लहर की खासियत थी कि यह लेफ्ट ऑफ सेंटर थी और इसमें समाजवादी हनक थी। यह बात भी साफ हुई कि अब 2020 के अगले आम चुनाव में डेमोक्रेटस को ऐसे नेता की ज़रूरत होगी जो ट्रंप के समर्थकों को अपनी ओर खींच सके।

कुल मिला कर मध्यावधि चुनाव की मिली-जुली इस प्रतिक्रिया से यह बात ज़रूर साफ हुई है कि जनता चाहती है कि ट्रंप सरकार पर रोक-टोक रहे। शायद लोकतांत्रिक अमेरिका के लिए यह बेहतर हैं।

बर्फबारी में दफन बागबानों के सपने

कश्मीर और हिमाचल के सेब उत्पादन क्षेत्रों में नवम्बर में ही हो गयी बर्फबारी ने भले ही पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों और सैलानियों को भरपूर खुशी दे दी हो, लेकिन सेब उत्पादकों की इस बर्फबारी में कमर टूट गयी है। करीब नौ साल बाद ऐसा हुआ कि कश्मीर में नवम्बर में ही बर्फबारी हो गयी हो। कश्मीर में इस बर्फबारी से करीब 650 करोड़ का सेब तबाह हो गया है। हिमाचल में जल्दी बर्फबारी से नुकसान का आकलन अभी नहीं किया गया है लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक 80 से 120 करोड़ के बीच नुकसान यहाँ भी हुआ है।

कश्मीर में नौ साल के बाद नवम्बर के पहले ही हफ्ते में बर्फ पड़ गयी। सेब ज्यादातर उन्हीं इलाकों में होता है जहाँ ठण्ड होती है और बर्फ पड़ती है। आमतौर पर हिमाचल और कश्मीर में बर्फबारी से पहले सेब को उत्पादन क्षेत्रों से निचले इलाकों में ले जाने की तैयारी होती है। आमतौर पर इन इलाकों में नवम्बर के आखिर में या दिसंबर में बर्फबारी होती है लेकिन इस बार जल्दी बर्फ पड़ गयी। कश्मीर में तो इस बर्फबारी से बागीचे-के-बागीचे तबाह हो गए। सेब पेड़ों पर था और भारी बर्फबारी से पेड़ टूट गए या इससे सेब का बड़ा नुकसान हुआ। पेड़ टूटने से आने वाले सालों में भी सेब उत्पादकों को नुकसान झेलना पड़ेगा। दक्षिण से उत्तरी कश्मीर तक बर्फबारी ने सेब पर जबरदस्त मार की है। दक्षिण कश्मीर के शोपियां, पुलवामा, अनंतनाग जबकि उत्तरी कश्मीर के  सोपोर, बारामूला, कुपवाड़ा में सेब बागान तबाह हो गए हैं।

अचानक ज्य़ादा बर्फबारी का नुकसान यह भी हुआ कि इससे हाईवे बंद हो गए। जिससे बड़ी मात्रा में सेब खराब हो रहा है।

कश्मीर घाटी में फल उत्पादक इस नुकसान से सड़क पर आ गए हैं। घाटी में 80 फीसद बागवानों के ऊपर लाखों का कज़ऱ् है। सेब और अन्य फलों की फसल की फसल तबाह होने से उन के सामने बैंकों के कज़ऱ् उतारने की विकराल समस्या आ खड़ी हुई है। यह बागवान अब सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं। किसानों का कहना है अगर वक्त पर राहत राशि नहीं मिली तो बेहद मुश्किल वक्त  देखना पड़ सकता है।

बेवक्त बर्फबारी से नुकसान महसूस करते ही कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (केसीसीआई) ने भी एक बयान जारी किया। इसमें चैंबर ने कहा – ”अनंतनाग समेत विभिन्न इलाकों से मिली प्रारंभिक  रिपोर्टों से पता चलता है कि 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। हम पूरे समुदाय से अपील करते हैं कि संकट में हमारे किसान-बागवान  भाइयों के साथ खड़े रहें और जो भी संभव हो, मदद करे।’’

कश्मीर के बागवानों का कहना है कि इतनी जल्दी बर्फ पड़ जाएगी इसका ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं था। बर्फबारी भी तब हुई जब घाटी के उत्पादक सेब दिल्ली की मंडियों में ले जाने की तैयारी में थे। शोपियां के इलाके में सेब उत्पादन करने वाले ज़हूर अहमद ने ‘तहलका’ को बताया कि दिवाली में दिल्ली मंडी में सेब बेचने की तैयारी की थी लेकिन बर्फबारी ने सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया। ”दिवाली में दिल्ली में सेब के अच्छे भाव मिल जाते हैं। पिछले कई साल से हम ऐसा कर रहे थे लेकिन इस बार मेरे बगीचे में सेब के पेड़ बर्फबारी से टूट कर ज़मीन पर आ गिरे हैं।  यह पेड़ अब कभी फल नहीं दे पाएंगे।’’

शोपियां के ही इरफ़ान ने अपना दूसरा काम बंद करके सेब उत्पादन शुरू किया था। इस बार सेब की बम्पर फसल थी और वे उम्मीद कर रहे थे कि अच्छे आमदन कर लेंगे। हमने सोचा भी नहीं था कि नवंबर के पहले हफ्ते ही बर्फ पड़ जाएगी। इस बर्फबारी में मेरा 12 कनाल का सेब बगीचा तबाह हो गया है। अगर बर्फ नहीं पड़ती तो  इस बाग़ से मुझे करीब 19-20 लाख की फसल मिलती।’’

कश्मीर घाटी में बागवानों को इसी सीजन का सब से नुकसान हुआ होता तब भी कम चिंता की बात होती। उनकी सबसे बड़ी चिंता सेब के पेड़ों के ही टूट जाने से है। सेब का व्यापार करने वाले मोहम्मद यासीन के मुताबिक सेब की बड़ी फसल अभी पेड़ों पर थी जब बर्फ पड़ी। कुछ किस्में देरी से पकती हैं। पेड़ भी गिर गए और जो सेब ज़मीन पर गिरा वो तो दागी हो ही गया।

जब बर्फबारी हुई तो हज़ारों ट्रक दिल्ली जाने के लिए तैयार थे। बर्फ से राजमार्ग बंद हो गए और 6500 के करीब ट्रक फंस गए। इससे सेब का नुकसान तो हुआ ही बागवानों को ट्रक मालिकों को भी पेमेंट्स करनी पड़ीं।

बागवानों के इस नुकसान से सूबे की सरकार भी सक्रिय हुई। राज्यपाल सत्य पाल मलिक ने अधिकारियों की बैठक तलब की और मामले को गंभीरता से लेते हुए नुकसान के जल्द आकलन के निर्देश जारी किये। वैसे तो राज्यपाल की तरफ से बागवानों को राहत का भरोसा दिया गया है लेकिन देखना होगा कि यह कब तक मिल पाता है। मालिक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि सरकार उन किसानों को मुआवजा देगी जिन्होंने कश्मीर में बर्फबारी के कारण अपनी फसलों को खो दिया है। वैसे अभी तक सेब और दूसरे फलों को बेवक्त हुई बर्फबारी से हुए नुकसान का आकलन अभी करना है। इसके बाद रिपोर्ट सरकार तक पहुंचेंगी और उसके बाद जाकर मुआवजे की बात होगी। वैसे घाटी के बागवान कृषि बीमा की मांग भी कर रहे हैं।

कश्मीर में नौ साल के बाद नवंबर में बर्फ पडी है हालाँकि नवम्बर के पहले हफ्ते में तो ऐसा 13 साल के बाद हुआ है। जाहिर है पर्यटन उद्योग में इससे जबरदस्त उत्साह है। कश्मीर में सैलानियों की संख्या इसके बाद बढ़ी है। हालाँकि घाटी में अर्थव्यवस्था की रीढ़ तो सेब को ही माना जाता है। दूसरे फल भी बर्फ से नुकसान झेल रहे हैं। नवम्बर के दूसरे हफ्ते में भी बर्फबारी हुई है जिससे कई जगह बिजली की लाइनें ठप्प पड़ गयी हैं।

खरीददार का भी घाटा

कश्मीरी सेब देश के कोने-कोने तक तो पहुँचता ही है, विदेश में भी जाता है। लिहाजा सेब तबाह होने से उत्पादक ही नहीं खरीददार का भी नुकसान हुआ है। इस बार कश्मीर में बम्पर सेब फसल थी लेकिन बर्फ ने उसे तबाह कर दिया। अब जो बचा हुआ सेब देश भर में जाएगा उसकी कीमत स्वाभाविक रूप से ज्यादा होगी। यानी खरीददार को कश्मीरी सेब महंगा खरीदना पड़ेगा। दिल्ली की आज़ाद मंडी के आढ़ती प्रदीप चोपड़ा ने बताया कि कश्मीर के सेब का भाव इस बार ज्य़ादा हो गया है और इसमें 50 से 75 प्रतिशत तक का उछाल है।

हिमाचल में भी मार

हिमाचल में अमेरिका का सेब पहले से ही बागवानों पर मार कर रहा था कि इस बार मौसम की मार से बागवान बेहाल हैं। सेब की जुलाई-अगस्त की फसल पहले ही मौसम की मार झेल चुकी है और अब  ओलों और नबंवर के पहले ही हफ्ते हो गयी बर्फबारी ने बागवानों की नींद हराम कर दी है। हिमाचल में इस बार अगेती फसल के सेब का उत्पादन पिछले 12 साल में सबसे कम हुआ है।

वैसे भी हिमाचल में करीब 4,200 करोड़ रुपए की सेब अर्थव्यवस्था उत्पादन में भारी गिरावट की मार झेल रही है। हिमाचल में सेब का ज्यादा सीजन गर्मी के मौसम में होता है। लेकिन किन्नौर और लाहौल स्पीति  जैसे कबाइली इलाकों में ‘विंटर’ वैरायटी का सेब होता है जिसे इस बार जल्दी बर्फबारी से मार पड़ी है। इसके अलावा ओलों ने भी बहुत नुकसान किया है।

हाल की भारी बर्फबारी से किन्नौर जिले में सेब की फसल को पहुंचा नुकसान पहुंचा है। जिले में सेब के पेड़ों को काफी नुकसान पहुंचा है।

उधर दूसरे कबाइली जिले लाहौल स्पीति के मुख्यालय केलांग में तो सेब को हुए नुकसान का मुआवजा न मिलने से खफा किसान प्रदर्शन तक कर रहे हैं। वहां किसानों-बागवानों ने ”लाहौल घाटी किसान मंच’’ के बैनर तले प्रदेश सरकार के खिलाफ जन चेतना रैली का आयोजन किया।

मंच के अध्यक्ष सुर्दशन जस्पा ने प्रदेश सरकार पर आरोप लगाया कि लाहौल घाटी में हुए सेब के नुकसान का मुआवजा नहीं दिया जा रहा है। ”घाटी में बिजली व्यवस्था चरमरा गई है, दूरसंचार और इंटरनेट व्यवस्था का खस्ता हाल है और सब्जी मंडियों का निर्माण भी घाटी में नहीं किया जा रहा है।’’

जस्पा ने कहा कि बार-बार इन समस्याओं को सरकार के ध्यान में लाने के बावजूद इनका समाधान नहीं किया जा रहा है। ”हार मानकर लाहौल घाटी के किसानों और बागवानों के हितों के सरंक्षण के लिए जन चेतना रैली का आयोजन किया। हमारी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मांग है कि घाटी की इन समस्याओं का समाधान जल्द से जल्द किया जाए, नहीं तो किसान मंच घाटी में बड़ा आंदोलन करेगा।’’

हिमाचल के बागवानी और वानिकी विभाग के सर्वे के मुताबिक राज्य में इस साल करीब 1.56 लाख  पेटी ही सेब उत्पादन हुआ है, जोकि लगातार दूसरे साल औसत उत्पादन 2.5 करोड़ पेटी से बहुत कम है। गौरतलब है कि 2017-18 में प्रदेश में 2.23 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन हुआ था। विभाग के निदेशक एमएल धीमान के मुताबिक इस सेब सीजन में पूरे प्रदेश में  फसल खराब है और पैदावार घटने की मुख्य वजह मौसम है।

प्रदेश में 2010 में सबसे ज्यादा 4.46 करोड़ पेटी सेब उत्पादन हुआ था। साल 2007 में सेब के अधीन मात्र 87,202  हैक्टेयर क्षेत्र था। अब यह 1,21,896 हैक्टेयर क्षेत्र तक फ़ैल चूका है लेकिन अफसोस की बात यह है कि उत्पादन बहुत घट गया है। साल में जो उत्पादन 2.96 करोड़ पेटी था वो अब दो करोड़ पेटी से भी कम तक सिमट कम रहा है। मार्च और अप्रैल में ”फ्लावरिंग’’ के दौरान अचानक मौसम खराब हुआ और ऊंचे क्षेत्रों में बर्फबारी के कारण ठंड बढ़ गई जिससे ”फ्लावरिंग’’ पर विपरीत असर पड़ा। इसके बाद जमकर ओले पड़े जिसने बागवानों का नुकसान कर दिया। ओलावृष्टि से कुछ इलाकों में तो एंटी हेल नेट भी क्षतिग्रस्त हो गए। मई-जून में तेज गर्मी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। जमीन में नमी सूख जाने की वजह से सेब का अच्छा आकार नहीं बन पाया। इस वजह से भी उत्पादन में कमी दर्ज की गई है।

अमेरिकी सेब की मार

वैसे तो विदेशी सेब देश की तमाम बड़ी मंडियों में पहुँचता है, अमेरिका सेब ने इस बार हिमाचल के सेब के रेट गिरा दिए। इंपोर्ट ड्यूटी बढऩे से पहले ही अमेरिका से हजारों मीट्रिक टन सेब आयात होकर  भारत पहुंच गया था। अमेरिकी सेब सस्ता बिकने के कारण हिमाचली सेब की डिमांड घट गई। एक समय जो सेब पेटी 2700 से 2900 बिक रही थी वह 1700 से 1900 तक बिकी। केंद्र में मोदी सरकार ने हिमाचली सेब को बढिय़ा दाम दिलवाने के नाम पर कुछ महीने पहले विदेशी सेब पर आयात शुल्क  50 से 75  फीसदी करने का ऐलान किया था लेकिन यह समय पर लागू न होने से अमेरिका के सेब ने मार्किट पर कब्ज़ा जमा लिया। अमेरिका से भारत में कारोबारियों ने हजारों मीट्रिक टन सेब आयात किया। इससे हिमाचली सेब की डिमांड घट गई।

क्या बचेंगी उत्तराखंड की परंपरागत फसलें

उत्तराखंड की 30 तरह की फसलें प्रभावित हो गई हैं। या कहें समाप्ति के कगार पर हैं।

देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एक सर्वेक्षण में पाया कि पिथौरागढ़ जिले में पिछले एक दशक में 30 पारंपरिक फसलें प्रभावित हो चुकी हैं। इसका मुख्य कारण है- मौसम परिवर्तन से पलायन तेजी से हुआ, और उसका सीधा असर इन तीस फसलों पर पड़ा है। जिसका उत्पादन समाप्ति की ओर है।

अध्ययन से यह भी पता चला कि खेती करने वाली भूमि का 19 फीसदी उपयोग घटा है। पूरे पिथौरागढ़ जिले की 28 फीसदी खेती योग्य भूमि 10 वर्षों में घटी है।

देखा गया कि 70 फीसदी किसानों ने स्थानीय भाषा में कौणी कही जानेवाली फसल को बोना भूल चुके हंै। कौणी की फसल पूरे प्रदेश में सामान्य बर्षात होने पर भी खूब पैदा होती थी। इसी तरह 27 फीसदी किसानों ने अलसी और  26 फीसदी कृषकों ने मंडुआ को बोना छोड़ दिया है। यह अध्ययन चार ब्लाकों के 31 गांवों के सर्वे से सामने आया है।

किसानों की सोच है कि इन पारंपरिक फसलों को पैदा करना घाटे का सौदा है। क्योंकि लोगों का इन फसलों से अब परिचय समय के साथ नहीं हो पा रहा है। ये फसलें अब व्यापारिक स्तर पर फायदा नहीं दे पा रही हैं। मौसम बदलना इसका मुख्य कारण रहा है, जैसे समय पर बारिश नहीे होना, और बारिश अगर होती भी है तो वह खेती के लिए पर्याप्त नहीं होती। इसी तरह बर्फबारी भी सामान्य से कम होती है। इन कारणों से फसलों का उत्पादन घटा। किसानों को अपना मेहनताना भी नहीं मिल पा रहा था। इस कारण उन स्थानों से रोजी रोटी की व्यवस्था में लोग पलायन कर गये हैं और अभी कर रहे हैं। इन एक दो दशकों में तो बहुत सारे गांव सूने पड़ गये है। लोगों के घरों में ताले लग गये हैं। मिट्टी और लकड़ी के बने घर उजाड़ हो गये हैं। उन घरों का कोई रखवाला भी नहीं रहा है। लोग अपने बच्चों सहित शहरों की ओर कूच कर गये हैं। उन्हें अब इस बात की चिंतां रहती है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा अच्छे प्राइबेट स्कूलों में करायें, ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके।

पहाड़ों के प्रइमरी स्कूलों की शिक्षा का स्तर अब बहुत गिर चुका है। किसी जमाने में पुराने तरीकों से पढाई करने में उनकी गणित मजबूत होती थी। 20 तक के पहाड़े बच्चों को कंठस्थ होते थे। उन्हें किसी कैल्कुलेटर की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन अब पढ़ाई के स्तर में आये बदलाव से सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के लिए ऐसे कोई रिफ्रेशर कोर्स नहीं हैं, जिससे वे बच्चों को सही तालीम की ओर रुझान पैदा करवा सकें। बच्चों की पढाई भी मां-बाप की चिंता का विषय है इसलिए पहले की तरह पत्नियों को घर पर गांव में छोडऩे का रिवाज भी समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव की चहल पहल भी जाती रही।

फसलों की पैदावार में मौसम की मार से आई गिरावट ने लोगों को घर छोडऩे के लिए मजबूर कर रखा है।

इसमें सबसे बड़ा कारण सरकारी व्यवस्था में आई निरंतर नीतियों के अभाव में पहाड़ हर तरह से नंगे हो रहे हैं। मौसम की लुका छिपी से वर्ष भर का अन्न न मिल पाना, और पशुओं के लिए चारे का अभाव होना है। पशुओं के अभाव से खेती के लिए कंपोस्ट खाद भी समाप्त हो गई है। एक दशक पहले भी हर घर के पास एक या दो भैंसे और जिनके पास भैंसे नहीं होती थी, वे गाय को पालते थे। पर्याप्त मात्रा में हर घर के पास दूध होता था। बाहर से खरीदने की ज़रूरत नहीं होती थी। आज इन सबके अभाव से पहाड़ के गांव भी खेतों की तरह बंजर हो रखे हैं। हर परिवार में गाय भैंस के अलावा भेड़ें भी होती थीं जिससे हर घर में कुटीर उद्योग के तौर पर कताई की तकली भी दिखती थी, वे अपनी मेहनत के बल पर कंबल, पश्मिना आदि भी बुनवा लेते थे। एक नेट वर्क था, जिसका फैलाव पूरे क्षेत्र में था। बुनकर से लेकर कुम्हार तक अपने कामों में व्यस्त रह कर एक दूसरे के पूरक थे।

पहाड़ का यह सह जीवन टूट गया है। हमारे नेताओं की सोच में वह ठोस बुनियादी योजना नहीं दिख रही है। अभी भी समय है कि वे अपने उन राजनीतिक पार्टी घोसलों से बाहर आ कर उस क्षेत्र की रक्षा में हाथ बंटायें न कि सीमित अपने स्वार्थ में लिप्त रहें। समाज का यदि भला करना है तो मिल जुल कर इस बंजर होती भूमि को उपजाऊ बनाने का प्रयास करें।

इसके लिए मुख्य कार्य है कि जमीन को पानी देने की कोशिश करें। पानी के निरंतर उस बहाव को रोक कर खेतों की ओर मोड़ें। यह हो सकता है। जैसे टिहरी के पर्वतीय क्ष्ेात्र में टिहरी बांध के पानी को लिफ्टिंग के जरिये खेतों को सिंचित करने की तरकीब निकाली जा सकती है। पहाड़ों तक मोटरों के जरिए पानी पहुंचाया जा सकता है। जब आपके पास पर्याप्त पावर है, तब क्यों न उसका उपयोग खेतों को फसलों से लहराने के लिए किया जा सकता है।

यह मैं सिर्फ टिहरी की ही बात नहीं कर रहा हूं। पूरे पर्वतीय क्षेत्र में नाले और झरने हैं उनके बहते हुए पानी को रोक कर उपयोग में लाया जा सकता है।

अब प्रश्न उठता है कि किसी भी प्रादेशिक और केंद्रीय सरकार ने कोई ठोस नीति किसी क्षेत्र विशेष के लिए नहीं बनाई है। खाली चुनावी स्टंट से विकास नहीं हो सकता।

इसी तरह से मानसून का समय पर न आना और आता भी है तो जमीन उससे पूरी तरह सिंचित नहीं पाती। इस वजह से किसानों ने खिन्न हो कर इन फसलों से नाता ही तोड़ दिया है।

पिथौरागढ़ जिले की सीमाएं दो देशों नेपाल और चीन से लगी है। यहां की कृषि बर्षा होने पर ही निर्भर करती है।

इस कारण इस क्षेत्र का युवा काम की तलाश में बाहर निकल रहा है, इसी वजह से गांवों में काम करने वालों की निरंतर कमी हो रही है। यही कारण पूरे उत्तराखंड का है जो पलायन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। दूसरी ओर जो बीज यहां के मौसम के हिसाब से उपजते थे उनको न बोने की वजह से पैदावार भी नहीं हो पा रही है।

एक और मुख्य कारण खेती के बदलाव में लोगों का खान पान की आदतों में बदलाव का आना है।

अनाज और दालों की पैदावार को दूसरे खद्यानों ने बदल दिया है। इसकी जगह चावल और गेहूं आज भोजन की आदतों में आ गया है, हालांकि यह पहले भी था, पर लोग अन्य फसलों को भी अपने नित भेाजन में तरजीह देते थे, वहां पैदा होने वाली फसलों का अपना महत्व था। इस कोशिश में मुख्य पारंपरिक फसलों का विस्थापन हो चुका है।

पहले की हिमालय क्षेत्र में रहने वाली पीढिय़ां विभिन्न प्रकार के अनाजों को पैदा करते थे और वे फसलें उनके जीवन को चलाने का जरिया होता था। वे चाव से उन स्थानीय उत्पादों को अपने भोजन का हिस्सा बनाते रहे हैं।

जैसे एक समय में पर्वतीय क्षेत्रों में मंडुवे की रोटी हर घर में खाई जाती थी, वह धीरे-धीरे स्थानीय लोगों की डाइट से बाहर निकलती जा रही है। जबकि पौष्टिकता में वह अन्य अनाजों से बेहतर भोजन था। इस कारण बहुत सारी फसलें जो पहाड़ों में उगती थी समाप्त होती जा रही है। यहां तक कि जब किसी के घर में कोई मेहमान आता था तो उसे मंडुवा और झंगोरा नहीं खिलाया जाता था। क्योंकि इसे मोटे अनाज के तौर पर माना जाता था। लोग शर्म करते थे इसे अपने मेहमानों को परोशने में। आज यही मोटा अनाज वैज्ञानिक विश्लेषणों में सबसे पौष्टिक भोजन है।

बीजों को संरक्षण देने के लिए ‘नवदान्या बायोडायवरसिटी कंजरवेशन फार्मÓ को विकसित किया गया है। यह हिमालय और शिवालिक रेंज में गंगा और यमुना नदियों के बीच 47 एकड़ की भूमि पर विकसित किया गया है। इस क्षेत्र में 1500 प्रकार के बीजों को संरक्षित किया जा रहा है। यहां पर और जीवों को भी जीवनदान मिल रहा है। जैसे मधुमक्खियां, पक्षी, इंसेक्टस यानि कीट और अन्य माइक्रोजीव हैं।

इस नवदान्या फार्म की शुरुआत 1995 में की गई, उस वक्त मिट्टी एकदम उपजाऊ नहीं थी। भूमि बंजर हो गई थी। क्योंकि सफेदे के पेड़ों ने जमीन को खेती योग्य नहीं छोड़ा था। ऐसे ही गन्ने की खेती करने के बाद भूमि की सारी उर्वरता समाप्त हो गई थी। तब से मिट्टी को उर्वरक बनाने के प्रयास चलते रहे। इस प्रयास के फलस्वरूप धान की 690 किस्में जो बढ़ ही रही हैं, विकसित की जा चुकी हैं। इसी तरह 200 प्रकार के गेहूं, 60 प्रकार का ज्वार और बाजरा, मसूर, सब्जियां, तेल निकालने वाले बीज और मिर्च और कई चीजों को संरक्षित किया गया है।

इस स्थान पर खेती करने के तरीकों पर भी सिखाया जा रहा है। इनका सबसे सराहनीय प्रयास नष्ट होते बीजों की नस्ल को फिर से खेती योग्य बनाने का है।

उत्तराखंड के पास 2011 की जनगणना के अनुसार कुल भूमि 53 लाख हेक्टियर है। इसमें से 93 फीसदी पहाड़ी क्षेत्र है और 64 फीसदी भू भाग जंगलों से ढ़का है और एक करोड़ से अधिक की जनसंख्या है। यहां जनसंख्या के घनत्व में एक वर्ग किलो मीटर में 189 लोग रहते हैं। 2001 से 2011 के दशक में 19.17 फीसदी जनसंख्या में इजाफा हुआ है। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में कृषि का विशेष स्थान रहा है। किसी समय में देहरादून की बास्मति चावल का अपना ही स्थान था। गेहूं, सोयाबीन, मूंगफली और दालें, अनाज यहां खूब उगते थे। तेल निकालने वालें बीजों में तिल और सरसों काफी मात्रा में उगाया जाता था। स्थानीय भाषा में तिल के तेल को मीठा तेल और सरसों के तेल को कड़ुवा तेल से पुकारा जाता है।

उत्तराखंड में कई धान की प्रजाति ऐसी हैं जिसे सिर्फ कम पानी यानी बरसार के पानी पर ही पैदा कर लेते हैं। उसे अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। उसे स्थानीय भाषा में उखड़ी चावल के नाम से जाना जाता है। एक अनाज है-चिंणा, इसकी पैदावार भी कहीं खो गई है। इसको भून कर बुखणा बनाया जाता था। स्थानीय भाषा में चिंणा के बीजों को भून कर उसे कूट कर भुने दाने को बुखणा कहा जाता है। इन भुने दानों को वर्ष भर रखा जा सकता है। और उसको चबाने में विशेष स्वाद आता है। ऐसी सारी परंपरायें लुप्त हो रही हैं।

भारतीय हाकी टीम की कमान मनप्रीत के हाथ

भुवनेश्वर में 28 नवंबर से 16 दिसंबर तक खेले जाने वाले विश्वकप हाकी टूर्नामेंट में भाग लेने वाली 18 सदस्यीय टीम की कमान मिड फील्डर मनप्रीत सिंह को सौंपी गई है। चिंगलिंगसाना सिंह कंगुजम को उपकप्तान बनाया गया है। पीआर श्रीजेश और कृष्ण बहादुर पाठक को गोलरक्षक तौर पर रखा गया है। टीम में रूपिंदरपाल सिंह और एसवी सुनील को स्थान नहीं मिला है। रूपिंदरपाल सिंह को नहीं चुना गया जब कि सुनील अभी अपनी चोट से नहीं उबरे हैं।

भारत को मूल ‘सी’ में दक्षिण अफ्रीका, बेल्जियम और कनाडा के साथ रखा गया है। ट्रर्नामेंट में कुल 16 टीमें चार पूलों पर रखी गई है। पूल ‘ए’ में ओलपिंक चैंपियन अर्जेंटीना, स्पेन, न्यूजीलैंड और फ्रांस की टीमें है जबकि विश्वकप चैंपियन आस्ट्रेलिया, आयरलैंड, इंग्लैंड और चीन की टीमें पूल बी में हैं। पूल ‘डी’ में नीदरलैंड्स, जर्मनी, पाकिस्तान और मलेशिया की टीमें है। नए ‘फारमेट’ के हिसाब में प्रत्येक पूल में शीर्ष पर रहने वाली टीम सीधे क्र्वाटर फाइनल में प्रवेश कर जाएगी और सबसे नीचे रहने वाली टीम मुकाबले से बाहर हो जाएगी। दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाली आठ टीमें प्रीक्र्वाटर फाइनल खेल कर क्र्वाटर फाइनल में प्रवेश करेगी।

मस्कट में खेली गई एशियाई चैंपियन ट्राफी से बाहर रहने के बाद अनुभवी रक्षक वीरेंद्र लाकड़ा को फिर से टीम में बुला लिया गया है। उनके साथ अमित रोहीदास, सुरिंदर कुमार, कोथाजीत सिंह, युवा खिलाड़ी हरमनप्रीत सिंह और वरु ण कुमार रक्षा पक्ंित को मजबूती देंगे। इसके साथ सुमित, निलकांत शर्मा, हार्दिक सिंह भी टीम में रखे गए हैं। हार्दिक ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच पिछले महीने ही खेला है।

अग्रिम पंक्ति के अकाशदीप सिंह, दिलप्रीत सिंह, ललित उपाध्य और जूनियर विश्वकप जीतने वाले मंदीप सिंह और सिमरनजीत सिंह को रखा गया है।

टीम के मुख्य प्रशिक्षक हरेंद्र सिंह ने बताया कि विश्व कप के लिए मौजूदा सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए हैं। इनका तालमेल लाजवाब है। उन्होंने कहा कि 34 में से 18 खिलाड़ी चुनना आसान नहीं था। इसके लिए हमें काफी कठोर फैसले लेने पड़े। इन 18 में अनुभवी और युवा दोनों ही तरह के खिलाड़ी हैं। इनका चयन इनकी मौजूदा फार्म और ‘फिटनेस’ के आधार पर किया गया है। पूरी टीम इस प्रकार है –

गोलरक्षक : पीआर श्रीजेश, कृष्ण बहादुर पाठक

रक्षक: हरमनप्रीत ङ्क्षसह, वीरेंद्र लाकड़ा, वरूण कुमार, कोथाजीत ङ्क्षसह, सुरिंदर कुमार, अमित रोहिदास

मध्य पंक्ति: मनप्रीत सिंह (कप्तान), चिंगलिनसाना सिंह कंगुजाम (उप-कप्तान), नीलकांत शर्मा, हार्दिक सिंह, सुमित

अग्रिम पंक्ति: आकाशदीप सिंह, मनदीप सिंह, दिलप्रीत सिंह, ललित कुमार उपाध्या, सिमरनजीत ङ्क्षसह

क्या 1975 को दोहरा पाएगा भारत

आठ साल के बाद पुरुषों की हॉकी का विश्वकप एक बार फिर भारत में आयोजित किया जा रहा है। यह टूर्नामेंट 28 नवंबर 16 दिसंबर तक भुवनेश्वर में खेला जाएगा। इससे पूर्व

1982 में मुंबई और 2010 में दिल्ली में विश्वकप का आयोजन किया जा चुका है। पर भारत के मैदान अब उसके लिए भाग्यशाली नहीं रहे।

1982 में वह पांचवे और 2010 में आठवें स्थान पर रहा। मेजवानी करते हुए नीदरलैंड्स ने दो बार (1973 और 1998) यह कप जीता और यही कारनामा जर्मनी ने 2006 में किया। देखना है कि क्या भारत इस बार वह करके दिखा सकता है जो उसने 1975 में किया था।

पुरुषों के विश्व कप हाकी शुरूआत 1971 में हुई। महिला विश्व कप हाकी 1974 में शुरू हुआ। पुरुष विश्व कप के इतिहास में पांच टीमों का दबदबा नज़र आता है। पिछले 13 विश्व कप मुकाबलों में से सबसे ज्य़ादा चार पाकिस्तान ने जीते हैं। नीदरलैंड्स और आस्ट्रेलिया तीन-तीन बार यह कप अपने देश ले जा चुके है। इनके अलावा जर्मनी ने इसे दो बार जीता और भारत इसे एक बार 1975 में जीत सका। उस समय टूर्नामेंट कुआलालंपुर (मलेशिया) में खेला गया था और भारतीय टीम ने कप्तान अजीत पाल सिंह थे।

इस विश्व कप की शुरूआत पाकिस्तान के एयर मार्शल नूर खान के प्रयासों से हुई। उन्होंने इसका पूरा मसौदा पैट्रिक रॉली के द्वारा एफआईएच को भेजा। पैट्रिक ‘वल्र्ड हाकीÓ पात्रिका के संपादक थे। इस मसौदे को 26 अक्तूबर 1969 को मान्यता मिल गई। इसके बाद 12 अप्रैल 1970 को ब्रसल्स में एफआईएच की बैठक में इसे अपना लिया गया। फैसला हुआ कि पहला विश्व कप अक्तूबर 1971 में पाकिस्तान में ही खेला जाए। पर राजनीतिक कारणों से ऐसा हो नहीं सका। अंत में यह टूर्नामेंट बर्सिलोना (स्पेन) में खेला गया। 1971 में विश्वकप में 10 टीमों ने हिस्सा लिया था। 1978 में यह संख्या 14 हो गई थी। 2002 में विश्वकप में 16 टीमों ने भाग लेने की अनुमति मिल गई। इनके अलावा जो नौ और विश्व कप खेले गए उनमें 12-12 टीमों ने हिस्सा लिया।

पहले तीन टूर्नामेंट दो-दो साल के अंतराल के बाद खेले गए। 1978 का विश्व कप ऐसा था जो तीन साल के अंतराल के बाद खेला गया। विश्व कप की ट्राफी का ‘डिज़ाइनÓ 27 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना के बशीर मूजिद ने तैयार किया था। इस ट्राफी की उंचाई 26 इंच (650 मिलीमीटर) और वज़न 11,560 ग्राम है। इसमें 895 ग्राम सोना लगा है।

1971 में खेले गए पहले विश्व कप में 10 टीमों ने हिस्सा लिया। इसमें कुल 30 मैच खेले गए 66 गोल हुए। इस टूर्नामेंट में भारत ने पूल ‘एÓ में अपने सभी मैच जीते। उसने फ्रांस को 1-0 से अर्जेटीना को 1-0 से केन्या को 2-0 में और पश्चिम जर्मनी को 1-0 से पराजित किया। इस प्रकार पूल स्तर पर भारत ने पांच गोल किए जब कि उसके खिलाफ कोई गोल नहीं हुआ। दूसरी ओर पाकिस्तान ने चार में से दो मैच जीते एक हारा और एक बराबर रहा। उसने आस्ट्रेलिया को 5-2 से, जापान को 1-0 से, हराया जबकि नीदरलैंड्स के साथ उसका मैच 3-3 की बराबरी पर छूटा। आखिरी मैच में वह स्पेन से 2-3 से हार गया।

इस प्रकार पूल ‘एÓ  में भारत टॉप पर और पश्चिम जर्मनी दूसरे स्थान पर रहा। जबकि पूल ‘बीÓ मे स्पेन शीर्ष पर और पाकिस्तान नंबर दो पर रहा। सेमीफाइनल में पाकिस्तान ने भारत को 2-1 से हराया और स्पेन ने केन्या पर 1-0 जीत दर्ज की यह एक मात्र गोल भी अतिरिक्त समय में आया। फाइनल में पाकिस्तान ने स्पेन को 1-0 से हरा कर पहला विश्व कप जीत लिया। भारत को तीसरा स्थान मिला। उसने अतिरिक्त समय पर चले मैच में केन्या को 2-1 से परास्त किया।

दूसरा विश्वकप 1973 में एमस्टले वीन (नीदरलैंड्स) में खेला गया। इसमें 12 टीमों ने हिस्सा लिया। यहां कुल 42 मैच खेले गए और कुल 124 गोल हुए। इसमें पश्चिम जर्मनी, स्पेन-न्यूजीलैंड केन्या और जापान के साथ भारत को पूल ए मेें रखा गया था। भारत ने खेले पांच मैचों में तीन जीते और दो बराबर रख कर पूल में दूसरा स्थान पाया। पश्चिम जर्मनी पांच में चार मैच जीत और एक बराबर रख कर पूल के शीर्ष पर रहा। भारत ने पहले मैच में जापान को 5-0 से और फिर केन्या को 4-0 से परास्त किया। अगले मैच में वह न्यूज़ीलैंड के साथ 1-1 की बराबरी पर खेला और फिर उसने पिछले उप विजेता स्पेना को 2-0 से परास्त किया।

दूसरी ओर पूल बी में पाकिस्तान ने चार मैच जीत और एक ड्रा खेल कर पूल  में शीर्ष स्थान पाया। मेजनान नीदरलैंड्स की टीम दूसरे स्थान पर रही। पाकिस्तान ने अपने पहले मुकाबले में मलेशिया को 4-0 से हरा कर पूरे अंक बटोरे। पाक का दूसरा मैच इंग्लैंड के साथ 2-2 से बराबर रहा। फिर उसने बेल्जियम को 2-0 से और अर्जेटीना को 6-0 से पराजित किया।

सेमीफाइनल में नीदरलैंड्स ने पश्चिम जर्मनी को अतिरिक्त समय में 4-2 से और भारत ने पाकिस्तान को 1-0 से पराजित किया। पर फाइनल मेें भारत 2-0 की बढ़त लेने के बाद और ‘सडनडेथÓ में पेनाल्टी स्ट्रोक चूकने के बाद पेनाल्टी स्ट्रोस में मेजबान नीदरलैंड्स से 2-4 से हार गया।

भारत की एक मात्र सफलता

अब तक खेले गए 13 विश्वकप मुकाबलों में भारत की एक मात्र सफलता 1975 के कुआलालांपुर (मलेशिया) में अंकित की गई। इसमें कुल 12 टीमों ने हिस्सा लिया। कुल 42 मैच खेले गए और 175 गोल हुए। यहां भारत को पूल बी में रखा गया था। उसके साथ पश्चिम जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अर्जेटीना और घाना की टीमें भी थी। भारत ने शुरूआत इंग्लैंड के खिलाफ 2-1 की जीत से की। भारत के लिए दोनों गोल वीजे फिलिप ने किए। भारत का दूसरा मैच आस्ट्रेलिया के साथ 1-1 से बराबरी पर छूटा। भारत ने तीसरे मिनट में ही गोबिंदा के गोल से बढ़त बना ली थी जिसे नौ मिनट बाद इरविन ने बराबर कर दिया। घाना की टीम भारत के आगे टिक नहीं पाई और भारत ने यह मुकाबला 7-0 से जीत लिया। लेकिन अर्जेटीना ने भारत की 1-2 से हरा कर सभी को हैरान कर दिया। पर भारत ने जर्मनी को 3-1 से परास्त कर इस नुकसान की भरपाई कर ली। भारत के लिए हरचरण, मोहिंदर और पवार ने गोल किए।

सेमीफाइनल में पाकिस्तान ने पश्चिम जर्मनी को 5-1 से हराया। जबकि भारत और मलेशिया का मैच अत्यंत रोमांच रहा। इस मैच में मलेशिया ने शानदार खेल दिखाया को लोके ने हाफ टाइम से तीन मिनट पहले गोल दाग कर उन्हें 1-0 की बढ़त दिला दी। भारत ने 40वें मिनट में शिवानी पवार के गोल से बराबरी हासिल कर ली (1-1)। शंबुगननाथन ने 42वें मिनट में शानदार गोल कर भारत पर संकट की काली घटाएं डाल दीं। मैच में पूरी कोशिश के बाद भी भारत गोल नहीं उतार पा रहा था। खेल खत्म होने से कोई सात-आठ मिनट पहले भारत ने असलम शेर खान को मैदान पर उतारा और 51वें मिनट में उन्होंने पेनाल्टी कार्नर को गोल में बदल कर भारत को 2-2 की बराबरी पर ला दिया। भारत के लिए विजयी गोल अतिरिक्त समय के नौवें मिनट में लैफ्ट आऊट हरचरण सिंह ने किया। इस प्रकार भारत 3-2 से विजय प्राप्त कर फाइनल में पहुंच गया।

फाइनल में भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। इस मैच में पाकिस्तान की शुरूआत अच्छी थी। मोहम्मद ज़ाहिद ने 17वें मिनट में एक फील्ड से पाकिस्तान को बढ़त दिला दीं(1-0) आधे समय तक पाकिस्तान इस बढ़त को बनाए रखने में सफल रहा। हाफ टाइम के बाद 44वें मिनट में सुरजीत सिंह ने पेनाल्टी कार्नर को गोल में बदल कर बराबरी हासिल कर ली (1-1)। भारत के लिए विजयी गोल हाकी के जादूगर ध्यान चंद के बेटे अशोक कुमार ने 51वें मिनट में किया।  इस गोल पर काफी विवाद हुआ। पाकिस्तानी खिलाडिय़ों का कहना था कि गेंद गोल पोस्ट से टकरा कर आई है जबकि भारत का दावा था कि गेंद भीतर बोर्ड से टकरा कर लौटी है। पर अम्पायर जी विजयनाथन (मलेशिया) पाकिस्तान की गोल पोस्ट के काफी निकट थे उन्होंने बेझिझक गोल दे दिया। पाकिस्तान इस गोल को नहीं उतार सका और भारत ने विश्व कप जीत लिया।

विश्व कप में भारत की यह एक मात्र सफलता है। उसके बाद खेले गए 10 टूर्नामेंटस भारतीय टीम कभी अंतिम चार में भी नहीं पहुंची, हालांकि पाकिस्तान ने 1978 में न्यून आयर्स (अर्जेटीना) में आयोजित टूर्नामेंट के फाइनल में नीदरलैंड्स को 3-2 से हरा कर यह खिताब दूसरी बार में जीत लिया। यहां भारत को छठा स्थान मिला। 1982 के मुंबई में खेले गए विश्व कप में भारत पांचवा, 1986 के विश्व कप में भारत पूल स्तर पर ही पिछड़ गया और पांच में से तीन मैच हार और एक जीत व एक ड्रा के सहारे अपने मूल में पांचवे स्थान पर आया। उसे स्पेन ने 2-1  से, आस्ट्रेलिया ने 6-0 से, और पोलैंड ने 1-0 से हराया। पश्चिम जर्मनी के साथ वह 2-2 से बराबर खेले। भारत को एक मात्र जीत कनाडा के खिलाफ मिली जिसे उसने 2-0 से परास्त किया। उधर पाकिस्तान भी केवल एक ही मैच जीत पाया और चार हारा। उसे नीदरलैंड्स ने 2-1 से, अर्जेटीना ने 3-1 से, सोवियत यूनियन ने 2-0 से और इंग्लैंड ने 3-1 से पराजित किया। उसे एक मात्र जीत न्यूज़ीलैंड के खिलाफ मिली जिसे उसने 5-3 से मात दी। इस टूर्नामेंट की सबसे नीचे 11वें स्थान के लिए भारत और पाकिस्तान की टक्कर हुई जिस में पाकिस्तान ने अतिरिक्त समय में 3-2 से हराया। भारत को 12 टीमों में 12वें स्थान मिला। यह टूर्नामेंट आस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 2-1 से हरा कर जीता।

1990 में भारत को 10वां, 1994 में पांचवां, 1998 में नौंवा, 2002 में 10वां, 2006 में 11वां, 2010 में आठवां और 2014 में नौवां स्थान ही हासिल हुआ।

स्ंगीत ईश्वर की साधना है

पंडित जी बनारस का संगीत से क्या संबंध है?

बनारस का संगीत से सब प्रकार का संबंध है। काशी भगवान शंकर की नगरी है और भगवान शंकर ने ही संगीत की रचना की। शिव ने काशी के जिस मूल संगीत की रचना की थी उसे पहचानना ज़रूरी है तभी काशी के संगीत की सनातन परम्परा कायम रहेगी।

बनारस के संगीत की क्या विशेषताएं हैं?

पूर्व में बनारस में हर प्रकार का संगीत था। अध्यात्म के साथ यह संगीत की भी नगरी थी। विश्व भर से लोग यहां संगीत सीखने आते थे। बनारस का टप्पा, ठुमरी, दादरा, चैती, खयाल, कजरी और होली का जादू दुनिया भर में फैला था। परंतु अब ऐसे संगीत साधक बहुत कम रह गए हैं। पहले ठुमरी बहुत गाई जाती थी। दस प्रकार की ठुमरियां गाई जाती थीं, सबका भाव और गाने का तरीका अलग-अलग था।16,15,14,12 मात्रा में ठुमरियां गाई जाती थी अब सबका लोप हो गया है।

अपने बारे में और अपनी कला साधना के बारे में कुछ बताएं?

15 अगस्त 1936 को हरिहरपुर (आजमगढ़) में मेरा जन्म हुआ। मेरे प्रथम गुरु मेरे पिताजी पं. बद्री महाराज रहे जो मशहूर तबला वादक और संगीतज्ञ थे। पांच साल की उम्र से ही पिताजी मुझे भोर में चार बजे उठाकर हरमोनियम पर रियाज कराते थे। वे कहते थे संगीत सीखने के लिए तपस्या ज़रूरी है।

हमने बचपन में बहुत गरीबी देखी है, हमारे पास दाल खरीदने के पैसे नहीं होते थे। हम रोटी और इमली की चटनी खाकर रियाज किया करते थे। जब इमली खरीदने के पैसे खत्म हो जाते थे तो खेतों से चकवड़ का साग लाकर भी हमने गुजारा किया लेकिन संगीत साधना में रुकावट नहीं आने दी। मेरे तीन गुरु थे- आध्यात्मिक गुरु मौनी बाबा, खयाल के गुरु कैराना घराने के अब्दुल गनी खां और शास्त्र के गुरु जयदेव सिंह जी।

आपका जन्म एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था अपने पूर्वजों को आप किस तरह याद करते हैं?

हमारे परदादा प. जगदीप महाराज जी ठुमरी के बहुत बड़े गायक थे। वे हरिहरपुर आजमगढ़ में रहते थे। जब वे बनारस आए तो यहां के लोगों ने उनके गायन से प्रभावित होकर उन्हें यहीं रोक लिया। उनके जैसी अनूठी बंदिशें अब कहाँ? उन दिनों लखनऊ के ठुमरी गायक मौजुद्दीन खाँ साहब को जब हमारे परदादा के बारे में पता चला तो उन्होंने बनारस आकर हमारे परदादा से गंडा बंधवा कर बनारस घराने का ठुमरी गायन सीखा। मेरी माता जी एक गृहणी और आध्यात्मिक महिला थी। उन्होंने मुझे सुंदरकांड का पाठ करना सिखाया। सुुंदरकंाड को मैंने 11 रागों तथा 12 पारंपरिक धुनों में गाया। 11वे रूद्र हनुमान जी तथा 12 कलाओं में सम्पन्न सूर्य जिसमें भगवान राम का जन्म हुआ था उनको प्रणाम किया है मंैने इस पद्धति के गायन से।

आपने अपने पूर्वजों की धरोहर को कठिन तपस्या तथा साधना से बचा कर रखा है क्या आपने इसे आगे भी संजोकर रखने के लिए नई पीढ़ी तैयार की है?

हां, मेरी पुत्री नम्रता, पुत्र रामकुमार मिश्र, पोता राहुल मेरी धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं। वे इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। ये सब बनारस घराने के हिसाब से बजाते हैं और हमारी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।

बनारस आपको क्यों प्रिय है?

बनारस मुझ में रचा-बसा है और मैं बनारस में रचा बसा हूं। बहुत से कलाकार बनारस छोड़ कर चले गए लेकिन हम काशी कभी न छोड़ेगें:-

‘चना चबेना गंग जल, जो पुरवे करतार।

काशी कभी न छोडिये, विश्वनाथ दरबार।।

 मैं 45 साल से बनारस में रह रहा हूं।

जीवन के हर क्षेत्र को आधुनिकता की आंधी ने प्रभावित किया है। क्या बनारस का संगीत इससे अछूता रहा है?

आज संगीत को भी लोगों ने धनोपार्जन का जरिया बना लिया है। फ्यूजन के सहारे लोग गा-बजा रहे हैं। फ्यूजन को मैं कन्फ्यूजन मानता हूं। इससे जीवन चलाया जा सकता हैं परंतु यह संगीत आत्मिक संतुष्टि और आध्यात्मिक ऊर्जा नहीं दे सकता हैं। आज गीतों में शब्दों का अपभ्रंश हो रहा है-‘झूठ बोले कौव्वा काटे’ ‘सरकाये लेव खटिया’ जैसे फूहड़ गानों ने संगीत का सत्यानाश किया है।

संगीत की आत्मा को छूने के लिए शास्त्रों का अध्ययन बहुत आवश्यक है। नए साधकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

बनारस हमेशा बनारस बना रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

बनारस, यानी जो रस से बना है। इसके रस और मिठास को कभी नहीं भूलना चाहिए। भगवान शिव ने काशी को रचा है। काशी,बनारस और वाराणसी इसके तीन नाम हैं। वरुणा से अस्सी तक इसका विस्तार है और इसका महत्व क्या है- जहां का रस कभी बिगड़ता नहीं है , हमेशा बना रहता है। उसका नाम बनारस है। अगर उस रस को भूल गए तो बनारसी कहां रहा? यहां के संगीत में ऐसी मिठास है कि लोग खिंचे चले आए। अगर कर्कश हो गया तो बनारस का संगीत नहीं है। यह विश्व का प्राचीनतम शहर है । इस शहर की हर बात निराली है। यह मात्र एक शहर नहीं अपितु हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति, आस्था, शिक्षा , ज्योतिष, शास्त्र, संगीत की पुरातन धरोहर का शहर है। इसकी मर्यादाओं को सभी को सदैव याद रखना चाहिए। इस शहर का फक्कड़पन और जिंदादिली जब तक रहेगी तब तक बनारस, बनारस रहेगा।

 नई पीढ़ी के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?

 नए साधक संगीत साधना को तपस्या के रुप में अपनाएं। मिठास का ध्यान रखें, बनारस के रस का ध्यान रखें। स्वर और लय की साधना करें अपने संगीत में विविधता लाने के लिए। यह सरस्वती माँ के आशीर्वाद से ही हो सकता है। जब तक आध्यात्म का अध्ययन नहीं करेंगे संगीत का रस नहीं समझेंगे। यह विद्या शार्टकट से प्राप्त नहीं की जा सकती है। संगीत का कनेक्शन सीधे ईश्वर से है। अध्यात्मिक संगीत ही भव सागर से पार लगाने वाला है। यह ईश्वर प्राप्ति का सुगम साधन है। संगीत को समझने के लिए शास्त्रों का अध्ययन तथा आध्यात्मिक चेतना का होना आवश्यक है। उन्हें लय और स्वर का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। संगीत का मुख्य लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है। आज की पीढ़ी सिर्फ पैसे के पीछे न भागे।

काशी को मोक्ष की नगरी कहते हैं? आप मोक्ष की कामना करते हैं अथवा दोबारा काशी की धरती में आकर संगीत साधना करना चाहेंगे?

शास्त्रों में लिखा है कि चार प्रकार से मोक्ष प्राप्ति हो सकती है – नाम, रूप, लीला, धाम लेकिन कब? अगर गूंगा है तब वह नाम नहीं ले सकता, तो रूप देखे पर मन फिर भी राम के नाम का मनन करे। अगर आंख भी मुंद जाए तो लीला सुने और जब कान भी बंद हो जाए तो धाम में जाके बैठ जाए पर मन में राम नाम हमेशा चलता रहे-

जग में सब काम झूठ, राम नाम सत्य है।

आवागमन का चक्कर बड़ा कष्टदायी होता है मैं मोक्ष की कामना करता हूं बाकी ईश्वर के हाथ में है वह क्या करेगा।

आपको विभिन्न सरकारों तथा राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा है। पुरस्कारों को आप किस रूप में लेते हैं?

पुरस्कार प्राप्ति को मैं अपना नहीं अपने गुरुओं के सम्मान के रूप में लेता हूं। इसे मैं उनका आशीर्वाद मानता हूं।

पंडित जी यदि आप संगीत के क्षेत्र में न आते तो जीवन में क्या कर रहे होते?

तब मैं रिक्शा चला रहा होता, पेट के लिए कुछ तो करना पड़ता। मैं संगीत के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था। संगीत ही मेरा जीवन था और है।

दारू की गंध

झोंटा पकड़के निकाल ई हरजाई को….दारू गारती है कि कोठा खोला है… रात-रात भर भतार लोग आते रहते हैं…।’’ दादी हलक फाड़-फाडकर चीख़ रही थी। समूचा वजूद काँप रहा था मानो बूढ़ी देह में कोई शक्ति सवार हो गई हो।

‘काकी जानती हो,कल मैंने….कल नहीं परसों इसको पचास टक्का दिया…और आज कहती है कि सब वसूल हो गया। पचास टक्का में पाँच बोतल दारू मिलती है-दस टक्के बोतल…!’ झबरू तुरी लडख़ड़ाता हुआ दादी के सामने आया। मुँह से अधजले मुर्दे की गंध आ रही थी। दादी नाक सिकोड़कर उस पर तुनक पड़ी, ‘झबरू चल फूट यहाँ से वरना एक डाँग दूँगी…चल रास्ता नाप यहाँ से …चल पर्र…!’

दादी का रौद्र रूप देखकर झबरू ने रास्ता लिया। कै…कै…करके पेट का कचरा दो-तीन बार उगला और थोड़ी दूर चलकर भाँजने लगा, ‘ई साली हमरा ठगती है…पचास टक्का मुफ्त में आता है क्या…? मजा चखा दूँगा…धर-पकड़ कर दँूगा न सब वसूल हो जाएगा… कौन क्या बिगाड़ लेगा हमरा…!’ झबरू की कर्कश आवाज़ रात की छाती भेदती हुई दूर जाकर गुम हो रही थी। शराबी लोग भी पर्यावरण को दूषित करने में कम नहीं होते। एक तो भोंभें की तरह चिल्लाते हैं। दूसरे जहाँ-तहाँ पेट का कचरा उगल देते हैं, सो अलग।

‘ई हरजाई ने हमरा कुल-खानदान बदनाम करके रख दिया है…तुरी-महरा सबको पिलाती है और रात भर मजा मारती है…! जीना हराम कर रखा है कुलछनी ने…!’ दादी तमतमाती हुई आई और माँ को दो-तीन डाँग जड़ दिया। माँ तनिक हिली-डुली भी नहीं। बर्फ़ की तरह जमी रही वह। जिसकी शीतलता से दादी के अंदर की उफनती ज्वाला शांत हो गई। वह अंटशंट बड़बड़ाती हुई चली गई। उसके पीछे बाबू जी, भैया और भाभी भी हो लिए। भाभी ने बाहर का दरवाज़ा धडा़म से बंद कर दिया।

चारों तरफ सन्नाटा परसने लगा था। माँ के अंदर अब तक जमी ब$र्फ का बाँध वेदना व ग्लानि के ताप से पिघलने लगा। आँसू रिसने लगे और बाँघ टूट गया। वह फफक पडी़। दीवार से टिक कर बैठ गई और आँचल से मँुह छुपाकर हिचक-हिचककर रोने लगी। मैं बरामदे में ही चुपचाप ब$र्फ-सा होकर बैठ गया था। दीरखे पर ढिबरी की लौ केंचुए की तरह रेंग-सी रही थी- अपनी संपूर्ण शक्ति बटोरकर। धीरे-धीरे सन्नाटा साँप की तरह रेंगने लगा था मानो घर से कोई मुर्दा निकला हो। आकाश से चाँद विलुप्त था जैसे मुँह पर कालिख पोतकर छूप गया हो। ठंडी रात में नक्षत्र ठिठुर रहे थे- अपने अस्तित्व को स्थापित रखने के लिए संघर्ष कर रहे थे-मेरी माँ की तरह…!

ढिबरी का मद्धिम प्रकाश अँधेरे को पीते-पीते थकने लगा था। माँ के आँसुओं का सोता सूख गया था। सूजे गालों में आँसुओं की पपडिय़ाँ जम गई थीं। वह दीवार से सटी हुई पलकें बंद कर बैठी थीं जैसे नींद में हों।

माँ के बारे में सोचते-सोचते मेरा मन आद्र्र और बोझिल होने लगा था। मन में आया माँ को उठाकर भीतर ले चलूँ तभी माँ की आर्त आवाज ने मेरी तंद्रा भंग की, ‘अरे! तू इस तरह मेरे साथ तिल-तिल क्यों गलता है…? और तू मुझे भी इस तरह क्यों गलाता हैं…? क्या सोच रहा है तू इतनी रात तक…?’ माँ उठकर मेरे सामने आ गई थी,क्या तू भी अपनी माँ को वही समझता है…वेश्या?’ माँ…! ‘मेरे मुख से अस्फुट स्वर निकला और मैं माँ की छाती में दुबक गया था। आसमान में एक तारा टूटा। उसकी क्षीण प्रभा क्षण में विलुप्त हो गई,। किंतु मेरी तंद्रा भंग कर गई। मैंने एक दीर्घ श्वास लिया और छत पर टहलने लगा। फिर रेलिंग से सटकर आसमान की ओर देखा तो मन में एक टीस-सी उठी-आह !अपने अस्तित्व को स्थापित रखने के लिए संघर्ष करते-करते टूट जाते हैं ये तारे भी आदमी की तरह …! बिलकुल मेरी माँ की तरह …!

मेरी माँ ने भी जीवन भर संघर्ष किया था। वह सारी उम्र दारू गारती रही। दारू से ही हम दोनों माँ-बेटे का गुजर-बसर होता था। तब बाबू जी,दादी और भैया -भाभी एक साथ रहते। केवल हम माँ बेटे अलग ! उस समय मैं पंद्रह-सोलह साल का था। बाबू जी को टी.बी.हो गई थी। वे एक प्राइमरी स्कुल में शिक्षक थे। महीना में दस-बारह दिन ही ड्यूटी करते थे। वेतन के जो भी पैसे मिलते सब दादी और भैया को लाकर देते। दादी घर चलाती थी और भैया-भाभी खेती-बारी सँभालते। एक नौकर भी होता था।

दादी, भैया को बहुत लाड़ करती। मै तो उसे फूटी आँख भी नहीं सुहाता। मेरे लिए कर्मजला और मुँहजला जैसे विशेषणों का प्रयोग करती। मेरा बदन कृश था और रंग तो काला था ही-बिलकुल मिरियल-सा चलता-फिरता कंकाल।

ठीक विपरीत भैया का रंग गोरा और हृष्ट-पुष्ट खूब सुंदर शरीर,घोड़े जैसा। भाभी भी थी-टमाटर की तरह गोल-मटोल लाल। वह पेट से थी सो चेहरा सरसों के फूल-सा खिला रहता। भैया हमसे पंद्रह- सोलह साल बड़े थे। बी.ए. के बाद खेती करने लगे थे। खेती बडी़ लगन से करते।

दरअसल भैया मेरे सौतेले भाई थे। पहली माँ का बेटा। जब पहली माँ का देहांत हुआ उस समय भैया चौदह-पंद्रह साल के थे। बाबू जी की उम्र चालीस के आसपास थी। शिक्षक तो थे लेकिन थे बड़े कामुक! विधुर का जीवन उन्हें नरक लग रहा था। चार-पाँच महीने मे ही कई कारनामे कर दिए। आफत मचा दी थी। वैसे शुरू से ही कई औरतों से उनका प्रेम-प्रसंग चर्चित रहा था। लोग-बाग परदे पीछे विरोध करते थे। लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कहते थे। गाँव के इकलौते मास्टर जो थे। एक साठ साल की विधवा के साथ रंगे हाथों पकड़े गए। लोगों ने विरोध नहीं, जी भर विनोद किया। कुछेक सुझाव आए,” शादी कर लो, अभी उम्र बहुत है… कितना भटकते फिरोगे… किस-किस गड्ढे का पानी पिओगे?’’

तब मेरी माँ को ब्याह कर लाए। उस समय मेरी माँ सोलह साल की थी। सुंदर-छरहरी। सुख के दिन शुरू हुए ही थे कि भाग्य में वज्र आ गिरा। मेरे नाना बहुत गऱीब थे। बूढ़े बाप की छाती में जवान हो रही बेटी नासूर की तरह चुभ रही थी। तिलक-दहेज कहाँ से जुगाड़ करते जो जोडी का लडका ढूँढते। सो ढाई गुना बड़े वर के साथ बेटी को ठेल दिया।

जब शादी की चर्चा चल रही थी तो माँ पिता की उम्र के वर को देखकर ख़ूब रोई थी कई दिनों तक । तब मेरी नानी ने माँ को समझाते हुए लाड़ से कहा था,’’ पगली तू रोती क्यों रे… तेरे भाग्य में सुख लिखा है… तेरा भाग्य अच्छा है जो ऐसा रिश्ता आ रहा है! तू राज करेगी … मास्टर की बहू कहलाएगी…मास्टरनी।’’

विवाहोपरांत गाँव के लोगों ने खूब खिल्ली उडा़ई। व्यंग्य-बाण छोडे,’’ मास्टर साहब जोरू ब्याह कर लाया है या पतोहू… अरे ये तो उनकी बेटी बराबर है,इससे तो बेटे का ब्याह कर देते। बुढापे में कली का मजा़ लूट रहे हैं… धन्य हो मास्टर जी!’’

औंरतें भी पीछे न थीं। माँ को देखकर तानें कसतीं,’’ बुढऊ के पेटवा के तरे दुबक जाती होगी… ओह दईया…हाय राम !’’

फूल-सी मेरी माँ ने वज्रघात को कैसे सहा होगा? क्या अपना यौवन उसे कभी रास आया होगा? अपने रंग-रूप से वह कभी रिझी होगी.. या फिर पति को रिझाने लिए कभी सजी-सँवरी होगी…। शारीरिक यातनाएँ माँ को सदा उद्वेलित करती रहीं! क्या औरत की यही नियति है? यह कैसी बिडंबना है!

नशे में धुत्त होकर बाबू जी आए और माँ को धड़ाम से खाट पर पटक दिया…। कुछ देर बाद वे उल्टी करने लगे। माँ के कपडों में कचडा़ लग गया था। माँ मुश्किल से बाबू जी के चंगुल से छूटी और वह भी उल्टी करने लगी। पूरे कमरे में दारू की दुर्गंध फैल गई थी। मैं डर से एक कोने में चिपका रहा। बाबू जी सँभलते हुए खाट से उठे और माँ को झाड़ू से मारने लगे। उस दिन बाबूजी ने माँ को मारते-मारते अधमरा कर दिया था। समूचे शरीर में झाड़ू के निसान उग आए थे। कुछ निशान माँ के शरीर में सदा मौजूद रहे अपनी मूक व्यथा कहते हुए।

जब मेरा जन्म हुआ माँ काफी दुबली हो गई थी। विवाह के डेढ़-दो साल बाद ही मेरा जन्म हुआ था। मेरी माँ दादी को कभी सुहाई नहीं, भला मैं क्यों सुहाता? दादी कुढ़कर कहती,’’ पिल्लू जैसा बैटा जना है… जाके किसी गड्ढें में फेंक आ… नमक चटाकर मार डाल ई पिल्लू को….!’’

दादी बाबू जी के दूसरे ब्याह के विरूद्ध थी। घर का काम-काज सँभालने के लिए वह भैया का विवाह करना चाहती थी। दादी की नजरों में भैया जवान हो गए थे। बाबू जी की काली करतूतों के कारण वह भैया से भी भय खाने लगी थी।

लेकिन भैया का चरित्र अच्छा था। मेरे जन्म के दो साल बाद भैया का विवाह हुआ। जब मुझे कुछ बुद्धि आई तो मैं माँ के दुख को कुछ-कुछ समझने लगा था। बाबू जी माँ को प्रताडि़त करते तो मैं उन पर झपट पड़ता। वे मुझे एक और धकेल देते। मैं अपनी पराजय पर हाथ पैर छींटता रहता,आसूँ बहाता रहता। बाबू जी की यातनाओं से मुक्ति पातें ही माँ मुझे अपने आँचल में छुपा लेती और मैं छाती से चिपटकर भींगता रहता …।

भाभी दादी की लाड़ली थी। दादी ने उसे सर पर चढ़ा रखा था। वह माँ को कुछ गिनती नहीं थी। यदि माँ भाभी को थोड़ा-सा कुछ कहती तो दादी चील की भाँति झपट पड़ती। माँ को गरियाने और कोसने लगती। एक दिन माँ आँगन में झाडू लगा रही थी। भाभी ऐंठकर बोली,’’सूझता नहीं सब सरकार-पतार छोड़े जा रही हो…! माँ को बुरा लगा। बोली, ”ऐ बहू-ठीक से बोल,सूझने की बात काहे करती है… तू हमसे छोटी है…।’’ प्रत्युत्तर में भाभी के शब्द बाण चलते कि उससे पहले ही दादी माँ पर टूट पड़ी। झाडू छीनकर माँ को बुरी तरह पीटने लगी। माँ पिटती जा रही थी, चीखती जा रही थी। आह ! कैसी हृदय विदारक थी माँ की चीख़ें, कितना भयावह दृश्य था? मैं दादी पर झपट पडा़ था। उसने मुझे भी दो-तीन झाड़ू लगा दी थी। उसी दिन दादी ने माँ के सारे कपड़े-लत्ते निकालकर फेंक दिए और कुछ बर्तन जो माँ विवाह के समय लाई थी। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं मिला। फटे पुराने कपडें, मैले- मटमैले बर्तन और नंग धडंग़ मुझे आँचल में समेटकर बरामदे की टूटी-फूटी कोठरी में सिमट गई थी माँ! कोठरी की दीवारें दरकी हुई थीं-माँ के हृदय की तरह…।

इसी बीच बाबू जी को टीबी हो गई थी। चेहरा अधमरा-सा हो गया। उन पर भैया और दादी का शासन चलने लगा था। इलाज चल रहा था। उनकी कामना और वासना सब विलुप्त हो गई थी। शबाब व शराब दोनों छूट गए। माँ के साथ उनका शारीरिक संबंध भी छूट गया…कदाचित् आत्मिक संबंध तो कभी रहा ही नहीं..।

इधर-उधर करके माँ अपना और मेरा गुजाऱा करने लगी थी। कुछ दिनों बाद माँ ने दारू बनानी शुरू की। मेरी नानी दारू गाऱती थी। माँ ने उसी से सीखा था। दारू गारने से स्थिति में सुधार आने लगा। अच्छी आमदनी होने लगी। मैं स्कूल जाने लगा। अलग हो जाने से अब दादी के जोर-जुल्म कम हुए। माँ की सेहत में सुधार हुआ। चेहरे में लावण्य और लालित्य फूटने लगा। आदमी अपने मन को कब तक कचोंटकर रख सकता है? और मेरी माँ तो अभी जवान थी…।

मेरी माँ को कई नामों से जोड़ा जाने लगा। हमारे समाज में पति से अलग रह रही औरत को कई तरह की उपाधियों से अंलकृत किया जाता है- हरजाई-छिनाल-वेश्या।

मेरे गाँव वाले भी मेरी माँ को अंलकारो से विभूषित करने लगे। लोग चटखारे लेते, ‘‘मास्टरनी शराब में शबाब का नशा डालती हैं, एक बार जो उसकी पी लेगा, वह दूसरे की क्या पीएगा? इसीलिए तो रात-रातभर धंधा चलता है… कोठा खुला रहता है… ढिबरी जली रहती है ..!’’  कुछ लोग मुझे भी हेय दृष्टि से देखते। मैं किशोर हो चला था। सब कुछ समझने लगा था। मै विचलित हो जाता तिलमिला उठता। माँ पर लगाए गए आक्षेप सत्य प्रतीत होने लगते थे। मेरी नजरो मे खीरू चाचा कौंधने लगतें। खीरू चाचा से माँ का लगाव काफी अधिक था वह खीरू चाचा को रोज दारू देती थी। लेकिन मैंने उनसें कभी पैसे लेते नही देखा। झबरू तुरी रोज आता था और बराबर उधार ही पीता था। कभी-कभार ही वह पैसे देता था।

मेरे मन मेे माँ के प्रति शंका व घृणा के कीडे रेंगनें लगते थे। लेकिन अब तक मुझे कोई पुख्ता सबूत न मिला था। सो अपना शेष माँ पर प्रकट न कर पाता। घुट-घुटकर रह जाता। माँ मेरी घुटन को समझती थी। फिर भी मूक बनी रहती थी। वह मेरी शंका से भय खाने लगती थी। शायद माँ सोचती कि जवान हो रहें बेटे को क्या समझाए? क्या बेटे के सामने सतीत्व की परीक्षा देनी पडेगी? और वह घुट कर रह जाती। हम दोनो माँ-बेटे के बीच एक खाई बढ़ती जा रही थी। माँ अपने बेटे से नजरें नहीें मिला पा रहीं थी। वह अपनी नजरों में ही गिरती जा रही थी।

कभी-कभी मेरे मन में आक्रोश की ज्वाला धधक उठती। उस समय समस्त वर्जनाओं और नियंत्रण के बावजूद जी करता, माँ को भला-बुरा कह दूँ..! दारू की हंडिया-चूल्हा-बोतल सब तोड़ दूँ…। खीरू चाचा का सिर फोड़ दूँ और झाबरू को ख़ूब लताड़ू…। पढऩा-लिखना छोड़कर कहीं भाग जाऊँ या माँ को घसीट-घसीटकर खूब पीटूँ और घर से निकाल दूँ…। मन में तरह-तरह की दुर्भावनाएं उठतीं-गिरतीं। दारू की बू से मेरे मन-प्राण मिचलने लगते।

पंरतु माँ के व्यवहार में कही ऐसा भी था जो मन के उमडते उफानों कों बिलकुल शांत कर देता। उस समय मैं उससें नजरों नहीं मिला पाता। तब लगता कहीं से दोषी मैं हूँ। मन के किसी कोने में यह विचार भी कौंधता की माँ को मेरे ही कारण सब सहना पड़ रहा हैं और मैं माँ के चेहरे से टपकती सादगी व शालीनता को अपलक देखता रहता…। माँ के प्रति ऐसा सोचना पाप है-महापाप! और मैं तड़प उठता-फिर माँ दारू क्यों पीती है? इस विष का पान क्यों करती हैं…?

दस-बारह साल की आयु तक मैं माँ के साथ ही सोता था। एक बार आधी रात को माँ ने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और इधर-उधर अविरत चूमने लगी। मेरी नींद उचट गई। मैं घबरा गया, ”माँ-माँ, क्या हुआ? यह क्या कर रही हो…?’’ माँ हड़बडा़कर उठ बैठी, साँसें भांथी-सी चल रही थीं। मैंने उठकर ढिबरी जला दी और सहमे-सहमे पूछा, ”क्या हुआ माँ?’’

”कुछ नहीं बेटा, एक बुरा सपना देख रही थी…!’’ यकायक उसके मोटे-मोटे आँसू लुढ़क आए। वातावरण बोझिल हो गया। सहसा माँ उठी और बोतल से एक गिलास दारू ढालकर गटागट पी गई…! माँ की इन अप्रत्याशित हरकतों को मैं निर्वाक् देखता रह गया! फिर माँ जमीन पर गेंदरा बिछाकर सो गई और उस दिन से माँ जमींन पर ही सोने लगी और रोज रात को सोते समय एक गिलास दारू पी लिया करती थी…।

तब मैं कुछ न समझ पाता था। परंतु आज समझता हूँ तो मन तड़प उठता है- और मेरा पूरा अस्तित्व उस दारू की गंध से सुवासित होने लगता है…!

शंकरानंद की कविताएँ

कमाया हुआ पैसा

इन दिनों सबसे ज्यादा कठिन है उस पैसे को बचाना

जो बहुत मुश्किल और मेहनत के बाद जेब में आता है

पहले तो उसे पाने के लिए दिन रात सोचना पड़ता है

कि पता नहीं कब आएगा

आएगा भी कि नहीं इसका भी डर बना रहता है हमेशा

क्योंकि वैसे लोग कम नहीं हैं जो दूसरों के पैसे हड़प लिया करते हैं

और भनक तक नहीं लगने देते

जो रोज कमाते हैं वे इसके शिकार सबसे ज्यादा हैं

क्योंकि उन्हें इस खेल के बारे में कुछ नहीं पता

कि जो पैसा उन्होंने बचत के लिए खाते में रखा था कुछ दिन पहले

वह शून्य पर कैसे पहुंच गया है जबकि उन्होंने एक पैसा नहीं निकाला था बैंक से

जब वह पता करना चाहता है तो हर आदमी समय नहीं होने का बहाना करके

उसे भेज देता है दूसरे के पास और कोई जवाब नहीं देता

खीझ कर जब वह पूछता है कि मेरा पैसा कहाँ गया तो

उसे बता दिया जाता है कि बैंक का नया नियम है उसके अनुसार

आपके खातें में जो राशि थी वह रखे जाने की न्यूनतम राशि से बहुत कम थी

इसीलिए वह पैसा आपके खाते से काट लिया गया

आगे से इस बात का ध्यान रखिएगा तभी बच पाएगा आपका पैसा

पसीना पोंछते हुए वह ये सोचकर निकल गया बाहर कि

आखिर वह जो कमाता है तो किसके लिए कमाता है

खुद जिन्दा रहने के लिए कि दिवालिया होते बैंक को जिन्दा रखने के लिए!

 

पिता का दु:ख

कितना अजीब लगता है बात करने पर

जब वे एक पिता कहते हैं कि किसी रात जब सोएंगे तो

नहीं जागेंगे अगली सुबह फिर से जीने के लिए

हो सकता है कि वे मुश्किल में हों ऐसा कहते समय

पर अगर आंखों के उनके स्वप्न सूख गए तो ये उनका गुनाह नहीं है

गुनाह उसका है जिसने छीन ली उनकी आँखों की शांति

और जीना दूभर कर दिया है नाउम्मीद होने की हद तक

हो सकता है कि ये छीनने वाला कोई और नहीं

उनका सबसे प्यारा बच्चा हो!

 

अंधेरे में बैठने वाले लोग

वे किस मिट्टी के बने लोग हैं जो अंधेरे में बैठना चाहते हैं हमेशा

अगर बत्ती जलती है तो लौ एकदम कम कर देते हैं

बल्व जलता है तो बुझा देते हैं इस तरह कि

बाहर से देखने वाला कोई भी यही सोचेगा कि घर में बिजली नहीं है

वे उसी अंधेरे में बैठते हैं हमेशा और जरा भी अजीब नहीं लगता

उसी में खाते हैं चाय पीते हैं हाथ धोते हैं खाने के बाद और

तौलिए से पोंछ लेते हैं उस उस जगह

जहाँ उन्हें लगता है कि पानी अब भी लगा हुआ है हाथ में

ये उनकी बीमारी नहीं है या उन्हें रोशनी से डर नहीं लगता

बस यह एक आदत है जो बिगड़ती जा रही है लगातार

मैं यह सोचकर कांप उठता हूँ कि

आज जो एक मामूली वजह से कि उन्हे अंधेरे में रहना अच्छा लगता है

वे जहाँ बैठते हैं वहीं अंधेरा कर लेते हैं

कहीं यह उनकी कमजोरी न बन जाए इस तरह कि

वे रोशनी देखकर भय से सिहर जाएं!

 

थकान

मैं दस कदम तेज चलता हूँ और थक जाता हूँ

बोलता हूँ थोड़ी देर जोर से तो कंठ में फंसने लगती है आवाज

एक घड़ी बीज रोंपता हूँ तो दर्द करता है घुटना

न देर तक सो पाता हूँ न बैठ पाता हूँ एक ही जगह जमकर

देर तक लिखता हूँ तो दुखती हैं उंगलियां

पढ़ता हूँ तो आँखें परेशान हो जाती हैं

कमीज की सिलवट ठीक करने के लिए इस्त्री करता हूँ तो दुखती है कमर

हर बार सोचता हूँ कि अब आज निपटा दूंगा सारे काम

तभी जवाब देने लगती है देह

फिर सोचता हूँ कि ये एक दिन का काम तो है नहीं कि

किसी तरह खत्म कर दिया जाए

ऐसे में कुछ भी करता हूँ तो यही लगता है कि अधूरा रह गया

अभी और करना बाकी है जिसे पूरा

और थकान है कि वह जाती ही नहीं एक पल दूर

जब मैं परेशान रहता हूँ रोज रोज की थकान से तो यही सोचता हूँ कि

आखिर हत्यारों को क्यों नहीं सताती है ये थकान!

 

दीवाल का होना

मेरे दादा के बनाए घर अब उतने ही पुराने हैं जितने कि वे

और उनकी बनवाई खिड़कियां और दरवाजे तो उनसे भी पहले के

जबकि वे लकडिय़ां नहीं किसी जंगल में पेड़ हुआ करती होंगी

तब से अब तक न जाने कितने साल बीत गए और

दादा की तरह ही कमजोर और जर्जर होता गया उनका बनाया घर

जिसमें रहना दिनोंदिन और मुश्किल होता गया

मैंने सोचा उस घर को तोड़ कर बनाया जाए नए तरीके से

जब तोड़ा जाने लगा घर तो वह और जगह से तो टूट गया आसानी से

पर दीवाल उसकी टूट नहीं पा रही थी जो हद से ज्यादा मोटी थी

लोगों ने कहना शुरु किया कि जब इतना मजबूत था तो

घर तोडऩे की क्या जरूरत थी

मैंने उन्हें तब समझाया कि घर तो यह इतना कमजोर है

कि इससे चूता है पानी झड़ता है पलस्तर गिरता है चूने का भुरभुरा रंग

बस इसकी दीवाल दुनिया की तमाम दीवालों की तरह मजबूत है

जो गिरना नहीं चाहती मैं उसे किसी भी हाल में गिरा देना चाहता हूँ

फिर से दीवार खड़ी करने के लिए नहीं

उस दीवार की जगह घर बनाने के लिए जहाँ सुकून के साथ मिलकर रहा जाए।

 

पानी के बाद

कल एक स्त्री अपने बच्चे के बारे में बता रही थी कि

चाहे कुछ भी हो जाए इसकी आँख में आँसू नहीं आते हैं

अगर कोई मर भी जाए तो देखता रहता है बस एकटक

मुझे लगा वो झूठ बोल रही होगी

पर कुछ ही देर उसके साथ सफर करने के बाद पता चल गया कि

अगर आँख का पानी सूख जाए तो मनुष्य के पास कुछ नहीं बचता

वह स्त्री कह रही थी कि एक दिन उसका बेटा उसे छोड़ कर चला जाएगा

भूल जाएगा उसे हमेशा के लिए जैसे थी ही नहीं

कभी नहीं आएगा वापस जैसे दूसरी माँओं के बेटे मिलने आते हैं

उस स्त्री का सबसे बड़ा डर उसके जीने को लेकर था कि पता नहीं

कैसे बीतेगा उसका जीवन आँख के पानी के सूख जाने के बाद

वह किस हद तक बर्बर हो जाएगा कोई नहीं जानता!

सम्पर्क-क्रांति भवन, कृष्णा नगर,खगडिय़ा

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे…

अजीब हलचल है सूरज के द्वार पर! हवाओं ने बोलना शुरू कर दिया है। बरसों बरस से चुप बैठी औरतें बोलने लगी हैं। इसलिए नहीं कि बोलना उन्हें पहले नहीं आता था या वे बोलना नहीं चाहती थीं पर कभी परम्परा के नाम पर तो कभी समाज की बेहतरी और उनके अपने आत्म सम्मान के शरीरीकरण के नाम पर उन्हें घेरघार कर चुप करा दिया जाता था । पर अब समय बदल रहा है । बदलते समय के साथ चैखटों-दहलीजों और आँगन के भीतर की दबी आवाजें भी बाहर आने की कोशिश कर रही हैं- पर दरवाजा बड़ा ताकतवर है – चैड़ा,महान और विस्तृत – अपने ही आतंक से आतंकित, चैड़े कंधे पर भीतर से डरा हुआ!

जब जब समाज में किसी भी वर्ग को उपेक्षित मानकर उसे दबाया, नकारा और शोषित किया, तब – तब आवाज उठती रही है पर स्त्रियाँ सदैव ही चुप रही है – कभी देवदासी बनकर सहने के लिए तो कभी चारदीवारी के भीतर के झूठे सम्मान की रक्षा के नाम पर । शोषण सदैव होता रहा पर आवाजें या तो दब गईं या सम्मान के नाम पर दबा दी गईं।

बचपन में सुना करती थी कि फैक्ट्री, कॉरपोरेट में काम करने वाली लडकियाँ अच्छी नहीं होती । न जाने क्या-क्या करती हैं आगे बढऩे के लिए! सुनकर सवाल तो मन में तब भी उठता था कि जो पुरुष उन्हें मजबूर करते हैं- उनके चरित्र पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं सुनाई देती? क्यों ये लडकियाँ यौन शोषण को समझौता मानकर सह लेती हैं? कुछ कहती क्यों नहीं । शायद सब सवाल ठीक ऐसे ही तो नहीं होते होंगे पर अहसास यही था। फिर फेक्ट्री या कॉरपोरेट ही क्यों आज फिल्म जगत से लेकर खेल और शिक्षा जगत भी इससे अछूता नहीं ।

फिर कुछ बड़े होने पर अनेक कहानियाँ और इतिहास के किस्से दिखाई और सुनाई दिए । देखा और समझा कि हर देश के किस्सों और इतिहास में शोषण-विशेषकर स्त्री शोषण के जटिल ताने-बने मौजूद हैं और इस इतिहास में गर्वीले तने पुरुष के रूप में अनेक राजे-महाराजे दिखाई देते हैं । पर उस युग में स्त्री की आवाज सुनाई नहीं देती बल्कि पश्चाताप और अपमान से दहित होते हुए भी मौन रहने का भार उसी पर लाद दिया जाता रहा – अहिल्या बनाकर! एक पुरुष द्वारा यौन अपमानित, दूसरे द्वारा परित्यक्त, तीसरे द्वारा उद्धार पर स्त्री के पक्ष में आया सिर्फ दीर्घ मौन।

शोषण का इतिहास बहुत पुराना है- कभी जाति तो कभी लिंग और वर्ग के आधार पर शोषण हर समाज में होता रहा है पर समाज के एक बड़े समूह की आवाज की अनदेखी सदैव ही होती रही । शोषण करने वाले महान और शोषण सहने वाले दब्बू बनते चले गए । हाल ही में एक मिथकीय कथा सुनी जिसके अनुसार चन्द्र एक स्त्री के सौन्दर्य से इतने प्रभावित हुए कि धरती पर उतर कर उसके साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर विवश हो गए! सुबह होने पर जब उस स्त्री ने चन्द्र से विवाह का अनुरोध किया तो चन्द्र ने अपनी विवशता जाहिर करते हुए इंकार कर दिया साथ ही उसे एक पुत्र का वरदान दिया। इस पुत्र के उत्पन्न होने पर स्त्री को जिस अपवाद का सामना करना पड़ेगा उसके बदले वह पुत्र बड़ा होकर कुछ ऐसे स्मारकों का निर्माण करेगा, जिससे उस स्त्री के पापों का प्रक्षालन हो सके! अजब-गजब कहानियाँ और अजब गजब निष्कर्ष! क्या इस स्त्री को यह अधिकार मिला होगा कि वह बरसों बरस बाद ही सही अपनी बात कह सके! यह तो फिर भी शोषण की ऐसी कथा कह कर नकारी जा सकती है जिसमें स्त्री की सहमति( भले ही मूक) ढूंढी जा सकती है पर उन कथाओं का क्या करेंगे, जिनके मूल में स्त्री की सहमति और असहमति का प्रश्न ही नहीं बल्कि शोषण को सहन करना अनिवार्यता मान ली गई हो?

मी टू एक ऐसे ही आन्दोलन के रूप में उभरा जिसने उन मूक दबी आवाजों में से कुछ ही सही पर उन आवाजों को कब्र के भीतर से बोलने का साहस दिया । आप इससे सहमत हो या असहमत पर यह तो मानना पड़ेगा कि अब उपेक्षित और सबाल्टर्न ने उस मुख्य धारा के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है ,जो जातीय शोषण के साथ लैंगिक शोषण को भी अपना अधिकार मानकर बैठा था । हलचल ज्यादा है और दबाने का प्रयास भी उतने ज्यादा! हो सकता है कि 100 में से दो चार मामले गलत भी साबित हो जाएँ पर क्या उससे बाकी मामलों को खारिज करने का अधिकार मिल जाता है? कतई नहीं। अब हम सब को अपने गिरेबाँ में झांककर देखना होगा कि कहीं वर्ग, जाति भेद इस लिंग भेद की तरह हमारे भीतर कुंडली मारकर तो नहीं बैठा! यदि बैठा है और अहसास हो चुका है, तो उससे अलग हो जाने में ही समझदारी है । कैसा वीभत्स, भयावह और क्रूर, पाशविक होगा कोई भी समाज जहाँ इन घटनाओं के सामने आने पर उसी व्यक्ति को ही दोषी मान लिया जाए जो अपने साथ हुए शोषण की बात करने का साहस न जाने कितनी यातनाओं से गुजर कर जुटा पाया हो!  तनुश्री दत्ता अथवा पल्लवी गोगोई कोई एक या दो नाम नहीं, न ही इस बात का ही महत्त्व है कि किस स्त्री ने किस पुरुष पर शोषण का आरोप लगाया क्योंकि बरसों- बरस बाद न तो इसका लाभ उस स्त्री को मिल सकता है न हीे न्याय, पर महत्त्व इस बात का है कि बरसों बाद ही सही पर उस सहमी कुचली स्त्री ने उस साहस को भी जुटा लिया जिसे आधार बनाकर उसका सर्वाधिक चरित्र हनन किया जाता रहा है । एक बड़े समूह द्वारा इस आन्दोलन को यह कहकर भी खत्म करने के कोशिश की गई कि यह केवल शहरी महिलाओं और सोशल मीडिया का झूठा फिनोमिना है गाँव और देहात के औरतों के लिए इस बात की कोई महत्ता नहीं! पर क्या यह कहने भर से इस बात से इंकार किया जा सकता है कि यौन शोषण की परम्परा नहीं रही है? क्या हमारे पितृसत्तावादी समाज में स्त्रियों का बाल विधवा, देवदासी होने के नाम पर शोषण की परम्परा नहीं रही?

एक बात और, हो सकता है कि शोषण करने वाले का इतिहास सचमुच इतना बड़ा हो और उसका योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कि उस पर लगने वाले आरोप से लोग सनाका रवा जाएँ पर इससे सही और गलत का निर्णय नहीं बदल जाता! उन अंधेरी और घुटन भरी रातों का क्या कोई हिसाब दे सकता है जिससे गुज़रकर इन स्त्रियों ने यह साहस जुटाया और सामने आकर खुद पर हुए शोषण पर बात करने की हिम्मत की । विदेश से शुरू हुई या देश से पर इस आवाज को नकारने वालों को एक बार ठहर कर सोचना अवश्य चाहिए कि जाने अनजाने वे दुष्कर्म को प्रोत्साहन ही दे रहे हैं जो किसी भी समाज के सकारात्मक निर्माण का चिह्न नहीं हो सकता ।

हम यह नहीं कहते कि इससे सारी मूक स्त्रियों को बोलने का साहस मिल जाएगा न ही इससे दुनिया के सभी दुष्कर्मियों को सामने ला पाना संभव होगा पर एक बारगी ही सही अब दुष्कर्म को अपनी बपौती मानने वालों के भीतर एक डर अवश्य पनपेगा । समाज के सामने चेहरे के पीछे के चेहरे को लाने का डर जरुर होगा । शायद न भी हो पर फिर भी यह सन्देश अत्यंत प्रबल है …सबाल्टर्न आवाजें बुलंद हुई हैं और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है ।

इसके इतिहास की बात की जाए तो सबसे पहले शायद लगभग दस बरस पहले तराना बुर्के जिसने अश्वेत स्त्रियों पर हो रहे शोषण के विरोध में आवाज बुलंद की । फिलाडेल्फिया अखबार ‘द इन्क्वायर’ से बातचीत के दौरान उन्होंने इस आन्दोलन के दो पक्षों पर खासकर बल दिया । पहला कि यह एक साहसिक कदम है जहाँ खुद पर हुए यौनिक अत्याचार को सार्वजनिक मंच पर स्वीकारा जा सके। दूसरा यह एक सामूहिकता में विश्वास भी जगाता है जिससे कहीं न कहीं आत्मविश्वास भी बढ़ता है और फिर से जीने का साहस भी मिलता है । इस आन्दोलन को गति तब मिली जब एलीज़ा मिलानो ने सार्वजनिक मंच ‘सोशल मीडिया’ पर उन स्त्रियों को सामने आने के लिए प्रेरित किया जो किसी भी प्रकार का यौन उत्पीडऩ सहने पर विवश हुई हों … किसी भी उम्र में, किसी भी दबाव में । तराना बुर्के ने जिस साहस का परिचय दिया वह अपने आप में सराहनीय है । 6 बरस की उम्र में यौन उत्पीडऩ सहने के बाद युवा होने पर भी आस पास के लडकों से भी उत्पीडि़त हुई पर उन्होंने हार नहीं मानी और अश्वेत स्त्रियों के पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ खड़ी हुई। आज समाज के हर क्षेत्र से स्त्रियाँ बाहर आकर उस क्षेत्र में हो रहे उत्पीडऩ पर बात कर रही हैं।

हमें अफ़सोस होना चाहिए कि हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जो अपने ही समाज के आधे हिस्से के प्रति सदस्य नहीं! पर नहीं, हम तो हिंसक होंगे, मानहानि का दावा करेंगे और अपनी गलती मानने के बजाय उन स्त्रियों को ही लांछित करेंगे ताकि शोषण- दर-शोषण की परम्परा कभी रुके नहीं बल्कि और शक्तिशाली होती चले जाए! बच्चियों के बढ़ते कदमों को रोकेंगे ताकि वे किसी हादसे का शिकार न हों और यदि हो जाएँ तो उन्हें घर के भीतर बांधकर रखेंगे ताकि कहीं कोई जान न ले। हर उस लड़की पर तोहमत लगाएँगे जो शोषण के खिलाफ बोलेगी, उसे शक की नजर से देखेंगे और जब जहाँ संभव होगा, खुद भीे शोषण करने से नहीं चूकेंगे! खतरनाक होगा ऐसा समाज। मी टू तो सिर्फ आहट है सुन सकें तो सुनिए इस आवाज को… शोषण की परम्परा लम्बी नहीं होती …उसके खिलाफ अब आहट सुनाई देने लगी है ।

चलते चलते एक बहुत पुरानी रानी भानुमती की कहानी याद आ गई। एक योगी जिस पर उसे गहरा विश्वास था, उसकी हत्या होने पर रानी ने हत्यारे को मृत्युदंड दिया। परन्तु रानी अपने न्याय से संतुष्ट न थी । उसे लगता था कि कोई कड़ी है जो उससे छूट रही है। किसी तरह दोनों को पुनर्जीवित करके वह सत्य को समझना चाहती थी । उसे यह अवसर मिला भी पर अब उसे दोनों में से किसी एक को दंड देना था । रानी में जब घटना के कारण की पड़ताल की तो पता चला कि योगी ने उस पुरुष की पत्नी का यौन उत्पीडऩ किया ,जिसके कारण उस पुरुष ने क्रोध में योगी की हत्या कर दी। न्याय तन्त्र कहता है कि मृत्यु दंड हत्यारे को जरुर मिलना चाहिए पर रानी योगी को दंड देती है और उसे मुक्त कर देती है। रानी के अंतिम शब्द ही यहाँ जरूरी है, बाकी तो कहानी है…मानो तो है ,वरना नहीं है । रानी कहती है कि कोई भी ऐसा समाज जहाँ किसी दुष्कर्म करने वाले को उसके महान सामजिक इतिहास के कारण छोड़ा जाए, वह समाज नैतिक दृष्टि से लगातार पतित होता चला जाता है । हम ऐसे ही समाज की ओर लगातार बढ़ रहे हैं …पूरे विश्व भर में । थोड़ा सोचिए जरुर । मैं ‘मी टू’ के साथ खड़ी हूँ।