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बिहार में शराबबंदी क़ानून हुआ नरम

बिहार विधानसभा के जारी मॉनसून सत्र के दौरान प्रदेश सरकार ने शराबबंदी कानून से संबंधित कुछ संशोधनों को सर्वसम्मति से पारित करा लिया है।

इन संशोधनों का मक़सद शराबबंदी कानून को पहले के मुकाबले नरम करना था। अब घर, वाहन और खेत से शराब जब्ती होने पर नरमी दिखाई जाएगी।

पहली बार शराब पीते हुए पकड़े जाने पर 50 हजार रुपये का जुर्माना या फिर तीन महीने जेल का प्रावधान किया जाएगा।

पहले इस कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए जमानत का प्रावधान नहीं था लेकिन अब इस कानून में जमानत का विकल्प जोड़ दिया गया है।

दूसरी बार इस कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए एक लाख रुपये के जुर्माने और पांच साल की सजा का प्रावधान किया गया है।

संशोधनों के तहत सामूहिक जुर्माना समाप्त करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी गई है।

शराबबंदी कानून में संशोधन के बारे में सदन में अपना पक्ष रखते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “शराबबंदी कानून गरीबों के हित को देखते हुए लाया गया था. इस कानून से ऐसे गरीबों को शराब पीने से रोकना था जो अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इस पर खर्च देते थे. शराब की वजह से घरेलू हिंसा के मामले भी बढ़ रहे थे. इस कानून की वजह से निर्दोष लोगों को सजा न भुगतनी पड़े इसीलिए इसमें संशोधन करते हुए कुछ प्रावधानों में ढील दी गई है.”

याद रहे कि बिहार में शराबबंदी कानून 5 अप्रैल 2016 से लागू है। जब बिहार सरकार ने पूर्ण शराबबंदी लागू किया था तो हर तरफ सरकार के इस कदम की काफी तारीफ हुई थी।

हालांकि शराबबंदी लागू होने के बाद भी गैरकानूनी रूप से शराब की तस्करी की घटनाएं आती रहती हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव ने सदन में आरोप लगाते हुए कहा है कि प्रदेश में अवैध शराब लाए जाने पर रोक लगाने में सरकार असफल रही है।

उन्होंने कहा, “प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद लोग शराब के नशे में पकड़े गए और अनेक जगहों से हजारों लीटर शराब बरामद भी हुई. ऐसे में सरकार को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि यह राज्य की सीमाओं पर शराब लाने ले जाने वालों की ठीक से निगरानी करने में नाकामयाब रही है।”

बिहार के शेल्‍टर होम में २१ बालिकाओं से रेप

एक बेहद चौंकाने वाले खुलासे में बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित एक शेल्‍टर होम में २१ बालिकाओं से रेप किए जाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में  इस मामले में १० लोगों को गिरफ्तार किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला सामने आने के बाद एक पीड़ित लड़की ने पुलिस को दिए बयान में आरोप लगाया है कि शेल्टर होम में उसके साथ रह रही एक लड़की की हत्या कर उसका शव छात्रावास  परिसर में ही दबा दिया गया था।

उसके इस खुलासे के बाद फॉरेंसिक टीम ने सोमवार यहां पहुंच कर खुदाई शुरू कर दी है। पुलिस के मुताबिक अभी तक कोइ शव वहां नहीं मिला है हालाँकि खुदाई का काम चला हुआ है।

सरकारी स्तर पर पीएमसीएच ने शेल्टर होम की २१ बालिकाओं के साथ रेप की पुष्टि कर दी है। इसके बाद इस मामले में अब बड़े खुलासे हो सकते हैं कि कौन कौन लोग इस घिनोने काम में शामिल है। पुलिस ने शेल्टर होम की गहन जांच शुरू करदी है ताकि सच सामने लाया जा सके।

मुजफ्फरपुर की एसएसपी हरप्रीत कौर ने मामले की पुष्टि की है है। उनके मुताबिक इस मामले में 10 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालांकि अभी तक की गई खुदाई में कुछ भी नहीं मिला है। ”जल्द ही इस मामले में चार्जशीट दायर की जाएगी। फिलहाल मामले की गहन जांच चल रही है।”

पुलिस की अब तक की गई जांच में यह बात समने आई है कि शेल्‍टर होम से छह लड़कियां गायब हुई हैं। यह जानकारी पुलिस को पीड़‍िता बालिकाओं ने पूछताछ के दौरान बताई  है। उनके मुताबिक़ यह बालिकाएं २०१३ से 2018 के बीच गायब हुई हैं। हैरानी की बात है कि शेल्टर होपम से गायब होने के बाबजूद इनका कोइ पुलिस रेकार्ड नहीं है जबकि गायब होने की स्थिति में पुलिस में रिपोर्ट की जानी चाहिए थी। इससे जाहिर होता है कि यह मामला बहुत ही गंभीर है और इसकी बड़े स्टार पर जांच से ही सच सामने आ सकेगा।

अलवर मॉब लिंचिंग मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

दो दिन पहले राजस्थान के अलवर में गौ तस्करी के नाम पर रकबार खान नामक व्यक्ति की लिंचिंग का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच में गया है। इस मामले में दायर की गयी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। याचिका में रकबार खान मामले में राजस्थान सरकार और अधिकारियों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई 20 अगस्त के लिए तय की है।

रकबार मामले को लेकर देश भर में नाराजगी है। अब सुप्रीम कोर्ट में तहसीन पूनावाला ने याचिका डाली है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने लिंचिंग को लेकर कई दिशा-निर्देश जारी करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देशों जारी कर सख्ती से उनका पालन करने को कहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी देश में इस प्रकार की घटनाएं नहीं रुकीं हैं।

गौरतलब है कि कथित गौरक्षकों ने अलवर में मॉब लिंचिंग में रकबार खान की मौत के मामले में राज्य पुलिस पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। यह भी आरोप लगा है की पुलिस ने खान को अस्पताल पहुंचाने से पहले घटना स्थल पर बरामद गायों को गौशाला पहुंचाने को तरजीह दी। यह भी आरोप है कि पुलिस ने भी रकबर की पिटाई की। कहा यह भी गया है है कि रक़बार को अस्पताल पहुंचाने में तीन घंटे की देरी हुई जिससे उसकी मौत हो गई। अन्यथा उसे बचाया जा सकता था।

हिमाचल के नेर चौक में ५ ज़िंदा जले

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के नेर चौक कस्बे में सोमवार सुबह एक घर में आग लगने से एक ही परिवार के पांच सदस्य जिंदा जल गए। यह घटना सुबह करीब 4 बजे की बताई गयी है। जिस घर में आग लगी वहां शादी समारोह चल रहा था और रिश्तेदार दुल्हन को लेकर घर पहुंचे थे। सोमवार दोपहर इस घर में रिसेप्शन का कार्यक्रम होना था, लेकिन उससे पहले ही मातम छा गया। आगजनी की इस घटना को लेकर मंडी के डीसी ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं।

मिली जानकारी के मुताबिक घर के सभी सदस्य बारात वापस लेकर आराम कर रहे थे तभी घर में अचानक आग की लपटें उठनी शुरू हो गईं। देखते ही देखते पूरा घर राख के ढेर में तब्दील हो गया। आगजनी के दौरान घर में रखे सिलेंडर में भी ब्लास्ट हुआ जिससे आग ज्यादा भड़क गई। पुलिस ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि हादसे में ५ लोग जिन्दा जल गए हैं।

आग की खबर फैलते ही आस पास के लोगों ने अपने स्तर पर आग पर काबू पाने की पूरी कोशिश की और फायर ब्रिगेड सहित पुलिस को इसकी सूचना दी। लोगों का ने आरोप है कि फायर ब्रिगेड की गाड़ियां घटनास्थल पर काफी देर से पहुंची जिस कारण पूरा घर जलकर राख हो गया। आगजनी की इस घटना में परिवार के पांच सदस्यों की मौत हो गई है।

मिली जानकारी के मुताबिक मृतकों में नरेंद्र कुमार सोनी (६६), बीना सोनी (६०), सुदेश सोहल (७५), मोना (४५) और साहिल (८) शामिल हैं। यह दो परिवारों के सदस्य बताए जा रहे हैं। जिस घर में आग लगी वो घर नरेंद्र कुमार सोनी का था और इनके साथ लगते घर में छोटे भाई के बेटे की शादी समारोह चला हुआ था।

वहीं, प्रशासन ने सभी शवों को पोस्टमार्टम के लिए जोनल हास्पिटल मंडी भेज दिया है। इस हादसे के दौरान प्रभावित परिवार का गुस्सा उन लोगों पर भी फूटा जो इनके वीडियो और फोटो बना रहे थे। इस कारण मीडिया को भी कवरेज नहीं करने दी गई।

जांच का जिम्मा एडीएम मंडी को सौंपा है। उन्हें एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपने को कहा है। उन्होंने कहा कि पूरे हादसे को गहनता से जांच होगी। इसके अलावा फायर ब्रिगेड के देरी से आने के आरोप की भी जांच की जाएगी।

सूचना मिलते ही स्थानीय विधायक इंद्र सिंह गांधी, पूर्व मंत्री प्रकाश चौधरी और डीसी मंडी ऋग्वेद ठाकुर घटनास्थल पर पहुंचे। डीसी मंडी ने पीड़ित परिजनों से मुलाकात की और ढांढस बंधाया। परिजनों ने भी डीसी को फायर ब्रिगेड की लेटलतीफी के बारे में बताया। डीसी मंडी ऋग्वेद ठाकुर ने घटना पर दुख जताते हुए कहा कि इस पूरे मामले की जांच करवाई जाएगी। उन्होंने कहा कि फायर ब्रिगेड देरी से क्यों आई इसकी भी जांच करवाई जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रशासन की तरफ से प्रभावित परिवारों को हर संभव मदद मुहैया करवाई जाएगी। प्रारंभिक दृष्टि में आगजनी का कारण शॉर्ट सर्किट माना जा रहा है।

शाहबाज़ शरीफ ने किया पाकिस्तान को भारत से बेहतर बनाने का वादा

पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) के अध्यक्ष शहबाज शरीफ ने देश की जनता से वादा किया है कि सत्ता में आने के बाद वह पाकिस्तान को अपने भारत से बेहतर मुल्क बनायेंगे ।

इसका मतलब ये भी हुआ कि उन्होंने ये माना है कि भारत पाकिस्तान से बेहतर है।

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा जिले में एक रैली को संबोधित करते हुए शरीफ ने कहा कि सत्ता में आने के बाद अगर वह पाकिस्तान को भारत से आगे नहीं ले जाते हैं तो आवाम उनके देशवासी उनका नाम बदल सकती है।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुतबिक शहबाज ने कहा है , ‘‘ वे (भारतीय) बाघा सीमा पर आयेंगे और पाकिस्तानियों को अपना आका बतायेंगे । ’’

पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके शहबाज ने यह भी दावा किया है कि वह पाकिस्तान को मलेशिया और तुर्की से भी आगे ले जायेंगे ।

उन्होने कहा कि वह मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद तथा तुर्की के राष्ट्रपति तायिप एर्दोआन से मिल कर ‘‘ उनसे सीखेंगे और पाकिस्तान को फिर से एक महान देश बनायेंगे । ’’

शहबाज ने पाकिस्तान तहरीके इन्साफ के नेता इमरान खान के खिलाफ चुटकी लेते हुए कहा कि सड़कों से यू टर्न के संकेतक हटा कर वहां इमरान की तस्वीर चस्पां की जानी चाहिए , क्योंकि पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के प्रमुख की राजनीति आधारहीन आरोपों और झूठे वादों पर आधारित है ।

पीएमएल – एन प्रमुख ने कहा , ‘‘ खान ने पंजाब सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था लेकिन मेरे खिलाफ कुछ भी साबित नहीं हुआ । ’’

याद रहे कि शाहबाज़ के बड़े भाई पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम नवाज को गिरफ्तार कर लिया गया ।

दोनों को भ्रष्टाचार के मामले में एक अदालत ने दस और सात साल की सजा सुनाई है ।

गए थे बारिश से बचने मगर इमारत गिरने से हुई मौत

नोएडा के शाहबेरी में दो इमारतों के ढहने के बाद अब गाजियाबाद में रविवार को एक पांच मंजिली इमारत जमींदोज हो गई।

इसमें आठ साल के एक बच्चा समेत दो लोगों की मौत हो गई, जबकि छह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

बच्चे को पहले मलबे से निकाल लिया गया था मगर बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

इमारत में कई मजदूरों के दबे होने की भी आशंका जताई जा रही है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ काम की तलाश में आये ये लोग निर्माणाधीन इमारत के पास रह रहे थे।

रविवार को रहने वाली जगह में बारिश का पानी भर गया तो सभी इमारत में चले गए। इसी दौरान हादसा हो गया।

यह भी बताया जा रहा है कि इन मजदूरों में से किसी का श्रम विभाग में रजिस्ट्रेशन नहीं है और न ही किसी सरकारी योजना का लाभ मिलता है।

यूपी सरकार ने मृतक के परिजन को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।

मामले में कमिश्नर स्तर की जांच के निर्देश भी दिए गए हैं। पुलिस ने बिल्डिंग हादसे में मनीष गोयल नाम के बिल्डर, प्रसनजीत गौतम नाम के प्लॉट मालिक समेत 6 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

खबर लिखने तक सभी आरोपी फरार थे। आरोपियों पर एनएसए के तहत कार्रवाई हो सकती है।

आरोपियों का पता लगाने के लिए पुलिस ने उनके करीबियों को हिरासत में ले लिया है।

नशे की गिरफ्त में फिर आया पंजाब

पंजाब में नशे का मुद्दा फिर उभरा है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। तब इस सीमाई राज्य के इतिहास में यह चुनावी मुद्दा खासा गंभीर था।

एक राजनीतिक के तौर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2015 में चुनावी रैली में पवित्र सिख पुस्तक (गुटका साहिब) की शपथ खाई थी कि यदि वे सत्ता में आए तो चार सप्ताह में नशे के इस व्यापार को खत्म कर देंगे। पंजाब की जनता ने कांग्रेस को 75 सीटें दिला कर कैप्टन की इच्छा पूरी की।

अपने चुनावी वायदे को ध्यान में रखते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पंजाब की समस्या पर ध्यान दिया और वे कदम उठाए जो पिछली अकाली-भाजपा सरकार नहीं ले सकी थी। सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने भी खुलकर सहयोग करके आदर्श नशा निवारण केंद्रों का निर्माण किया और जो पुराने केंद्र थे उन्हेंं मजबूत किया। कुछ ऐसे लोग जो राज्य पुलिस में अच्छे पदों पर थे और जिन पर दवाओं के कारोबार में सहयोग देने का शक था, उनके भी सबूत जुटाए गए।

तकरीबन पंद्रह महीने यह मुद्दा दबा रहा। अचानक एक महीने में यह मामला उछला और विपक्षी-आप और अकाली-भाजपा गंठजोड़ ने सरकार पर हल्ला बोल दिया। मीडिया में राज्य में नशे के चलते तीस लोगों के मरने की बात कही। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ब्रहम मोहिंदर ने इस तादाद को चुनौती दी। उन्होंने बताया कि जीरा और नवांशहर इलाकों में चार लोगों की मौत होने की बात कही। संबंधित स्वास्थ्य क्षेत्र और पुलिस अधिकारियों को मौत की असल वजह पता करने के निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री ने इन सभी मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटने का निर्देश दिया।

आश्चर्य इस बात पर है कि इन मौतों को लेकर जो राजनीतिक तूफान मचा उस पर किसी ने भी यह सोचने की कोशिश नहीं की आस-पड़ोस, परिवार, पुलिस, स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता, और दूसरे लोग क्यों नहीं इस सच की छानबीन कर पाए कि जब ये जिंदा थे तो ये आतंक के साए में थे। शोर सिर्फ मृत देहों पर मचाया जा रहा था। सत्ता पार्टी और सरकार को जिम्मेदार बताने में कोई पीछे नहीं था।

आज जो मसला दिख रहा है उसकी जड़ें वैयक्तिक व्यवहार, सामाजिक संपर्क और आर्थिक हालात पर है। यानी बात समाज की जिम्मेदारी और सुशासन की इस की अपनी विविधता पर थी। इसकी जिम्मेदारी उस समाज पर थी जिससे सीधा मुकाबला संभव था। लेकिन राजनीति अगली कतार में होती है। जिसे मुकाबले में सीधे-सीधे उतरना ही है अभी हाल, अकाली दल ने एक मिली जुली रणनीति तैयार की थी जिसे सरकार ने पूरी तौर पर नकार दिया था। दूसरी ओर चुने हुए जन प्रतिनिधि नशा लेने की जांच खुद ही करा कर अपनी प्रशंसा खुद कर रहे है।

सामुदायिक भागीदारी ज़रूरी है इस तरह की खतरनाक समस्या पर जो आज भी बरकरार है। लुुधियाना में रह रहे अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक एसएस जोशी यही कहते हैं। वे उस सिविल सोसाइटी समूह से जुड़े हैं जिसने जुलाई के पहले सप्ताह में अभी हाल में हुई मौतों के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। हमारी भूमिका सरकार के साथ सहयोग की है। हम लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, उत्साहित कर रहे हैं जिससे वे नशीले पदार्थों के खिलाफ आवाज उठाएं न कि सरकार के खिलाफ यह सरकार इसे खत्म कर सकती है। उन्होंने बताया एक चीज तो यह है कि पुलिस और विशेषज्ञ अब यह बता रहे हैं कि मौतें नशीले पदार्थों की सप्लाई पर रोक लगाने के बाद हुई। यह एसटीएफ की मुहिम की बदौलत हुआ जिससे विपक्ष की अपनी असहमतियां हैं। ज़मीनी स्तर पर लोग नशा विरोधी केंद्र और पुनर्वास केंद्रों का उपयोग कर रहे हैं। जो नई पहल हैं वह है ड्रग एब्यूज प्रिवेंशन ऑफिसर्स (डीएपीओ) और नेबरहुड बड़ी जिससे मरीज़ों को मनौवैज्ञानिक तौर पर नशीले पदार्थों से मुक्त होने में मदद मिलती है। जागरूकता फैलाने के लिए राज्य के शिक्षा संस्थाओं की जोड़ दिया गया है। फिर भी राजनीतिक उठापटक से जनहित को चोट पहुंचती है।

राजनीतिक उठापटक के दौर में विशेषज्ञ दीर्घकालिक समाधान ठहर जाते हैं। समस्या का कोई जल्द समाधान संभव नहीं है। क्योंकि यह समस्या रातों-रात नहीं उपजी है। तकरीबन तीस साल पहले पंजाब के गांव-गांव में अफीम का प्रचलन था वह भी रईस परिवारों में। पॉपी हस्क इसका एक सस्ता विकल्प होता है और इसे लेने वालों को कोई खास नुकसान भी नहीं होता।

नशीली पीढ़ी का दूसरा दौर तकरीबन बीस साल बाद शुरू होता है जब किशोर इलाज के बहाने नशा लेने लगते हंै। वे बड़ी मात्रा में खासी की दवा, और गोलियां लेने लगते है। जिसका उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

हैरोइन या सफेद पाउडर (चिट्टा) का निर्माण एक प्रयोगशाला में तकरीबन पंद्रह साल पहले हुआ। उस समय तक पंजाब में खेती से अच्छा पैसा आने लगा था और तभी यहां मकान, इमारतें बननी शुरू हुईं। खेती की ज़मीनों की कीमतें भी बढ़ीं। शहरों के पास की ज़मीनें और महंगी हो गई और कस्बों में भी अच्छी कीमत लगने लगी।

इसके चलते ‘चिट्टा’ एक महंगा नशीला पदार्थं बन गया। लेकिन समय गुजरा और बाज़ार ठहर गया। जो चिट्टा लेते हुए नशेड़ी बन गए थे उन्हें अब एक ग्राम और पांच ग्राम सें गुज़ारा करना पड़ता था। इन्हें बेचने वाले गांव-गांव फैल गए थे। पंजाब में करीब ऐसे 18,000 छोटे विक्रेताओं की गिरफ्तारी हुई।

विशेषज्ञ मानते हैं सरकार और समाज को यह देखना चाहिए कि नशा कोई आज की समस्या नहीं है बल्कि सनातन है। इसे रोकने का अब समय आ गया है। लेकिन नशीली वस्तुओं को लेने का समय और तरीका समय के अनुसार बदलना चाहिए।

कर्मचारियों का ‘डोप टेस्ट’ और विक्रेताओं को मौत की सिफारिश!

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को नशीली दवाओं के खिलाफ अपनी जंग छेडऩे के ऐलान पर अमल करने में 18 महीने लग गए। उन्होंने यह पहल तब की जब नशीली दवाओं की ज़्यादा मात्रा में लेने से हुई मौतों से पूरा प्रदेश हिल उठा।

उन्होंने राज्य के सवा तीन लाख सरकारी कर्मचारियों में ‘नशे की लत’ (डोप टेस्ट) की जांच के आदेश भी फौरन जारी कर दिए। मंत्रिमंडल ने एनडीपीएस एक्ट में संशोधन भी कर दिया। इसके तहत नशे के सौदागरों और छोटे विक्रेताओं को मौत की सज़ा की सिफारिश की गई है।

यह सभी जानते हैं कि पंजाब में मादक पदार्थों की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय सीमा (ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान) से होती है। इसे सुनहरा अर्ध चंद्र भी कहते हैं। पंजाब की 553 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा इस तस्करी में उपयोग में आती है। आज न केवल यह राष्ट्रीय समस्या है बल्कि देश की सुरक्षा को भी खतरा हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि मादक दवाओं के खिलाफ गंभीर तौर पर युद्ध छेड़ा जाए और जनता का पूरा सहयोग लिया जाए। इससे पता लगेगा कि समस्या की असल जड़ कहां है।

अनिवार्य तौर पर नशे की लत की जांच और मादक द्रव्य बेचने वालों के लिए सज़ा-ए-मौत की सिफारिश की घोषणा से कुछ रोक तो लगेगी, लेकिन इससे मादक द्रव्यों की बिक्री पर जीत हासिल नहीं होगी।

पूरी दुनिया में मौत की सज़ा लगभग खत्म हो गई है और इसे अब दुर्लभ से दुर्लभ अपराधों के लिए ही सुरक्षित रखा गया है। ऐसे कदमों से यही जान पड़ता है कि समस्या के निदान की बजाए सिर्फ बलाए नाम कार्रवाई की जा रही है। नशे की समस्या कितनी विकराल है उसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि पंजाब के दो तिहाई घरों में कम से कम एक तो नशे का आदी है ही।

ऐसा नहीं है कि पहले नशे की लत से परेशान लोग और उन्हें नशा बेचने वाले गिरफ्तार नहीं किए जाते थे। पिछले ही साल 18,977 छोटे व्यवसाई इन मामलों में पकड़े गए और जेलों में बंद कर दिए गए। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार नॉरकाटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्स्टैंसेज से मिली जानकारी बताती है कि पूरे देश में ऐसे मामलों में तीस फीसद मामले अकेले पंजाब में हैं।

इस व्यापक आकार की समस्या के निदान के लिए ज़रूरी है कि इस आतंक के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ा जाए। देश में ड्रग माफिया इसलिए पनपता रहा है क्योंकि इसे राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और बड़ी संख्या में इसमें पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों का सहयोग रहा है। एनडीपीएस कानून के तहत जो लोग गिरफ्तार किए गए हैं उनके पास से इस मादक द्रव्य की छोटी-छोटी पुडिय़ा ही मिली है। जहां बड़े-बड़े ड्रग माफिया हों वहां से यह बरामदगी महज रेहन जैसी ही है।

आज ज़रूरत है कि नशे की लत के कारणों को ठीक तरह से जाना-समझा जाए। यह जानकारी ली जाए कि कैसे नौजवान लोग इसमें कैसे फंसते हैं और कैसे नशा लेते-लेते इसके आदी हो जाते हैं। क्या कानून का पालन करने वाली एजेसियां अपनी पूरी ताकत से देश के तमाम ड्रग माफिया को नष्ट नहीं कर सकतीं। इस समस्या से जुड़े सभी लोगों को इस संबंध में विचार करना चाहिए। इन्हें यह जानकारी भी लेनी चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था जो भविष्य से नाउम्मीद है और इसकी रोज़गार के मामलों में भी भयावह है। यह सब नए सिरे से देखा जाना चाहिए। अधिकारियों को यह अध्ययन भी करना चाहिए कि कहीं निराश होकर तो नहीं, नौजवान मादक द्रव्यों का सेवन करने लगे हैं। कुछ ग्रामीणों ने खुद फैसला लिया है कि वे नशे के धंधे में लगे छोटे-बड़े व्यवसाइयों को धर दबोचेंगे और उन्हें पुलिस के हवाले कर देंगे। देखना है कि यह जागरूकता कहीं घातक जागरूकता का एक और रूप तो नहीं ले लेती।

पंजाब में फिर फैला नशा न जाने कितने मर गए

पंजाब में जून का महीना बेहद क्रूर महीना रहा। इस महीने में मादक द्रव्यों के अधिक उपयोग से 25 से ज्य़ादा मौतें हुई। यह एक सरकारी आंकड़ा है, इतना बड़ा है कि हो सकता है मरने वालों की गिनती इससे कहीं ज्य़ादा हो। यह बहुत बड़ा मुद्दा है। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने राज्य में राज कर रहे शिरोमणि अकाली दल को इसी मसले पर सत्ता से बेदखल कर दिया। यह इतनी जबरदस्त लड़ाई थी कि अपने चुनाव प्रचार में और राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यह वादा किया कि साल भर के अंदर वे पंजाब से मादक द्रव्यों का प्रसार बंद कराने की कोशिश करेंगे।

 मंत्री के कथन का मुकाबला

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रहम मोहिन्दर मौतों के आंकड़ें को गलत बताते हैं। वे कहते हैं कि यह आंकड़ा बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है कि ड्रग को ज्य़ादा मात्रा में लेने से ये मौतें हुई हैं। यानी दो सप्ताह में 17 मौतों का नशे से हो जाना वाकई तकलीफ देह है। इससे अधिकारियों में नाराज़गी है।

आइए कुछ तथ्यों पर हम ध्यान दें। लुधियाना के जगरांव उप संभाग के सवादी कलां गांव में कुलजीत सिंह की मौत 29 जून को दवा की ज्य़ादा मात्रा लेने से हुई। उसका अंतिम संस्कार दो जुलाई को हुआ, जब उसका भाई आस्ट्रेलिया से आया। पुलिस ने मृत देह के पास से एक चम्मच, सिगरेट लाइटर और सिरिंज बरामद की थी। इससे यह बात प्रमाणित होती है कि उसकी मौत मादक पदार्थ लेने के कारण हुई।

उसकी पत्नी हरप्रीत ने पुलिस को जानकारी दी कि उसका पति खन्ना के रसूलड़ा गांव के निजी नशा मुक्ति (डी-एडीक्शिन) केंद्र में दो महीने से था। उसको 21 जून को वहां से मुक्ति दी गई। उसकी मां हरदीप कौर ने बताया केंद्र से बाहर आकर पहली बार उसने ‘चिट्टा’ (सफेद पाउडर) का इस्तेमाल किया। अमृतसर के गुमलता के जॉन की भी मौत नशे की लत के चलते हई। उसके पिता अमर सिंह ने पुलिस को बताया कि गांव में नशे की दवाएं बेचने वाले सौदागर बहुत दिनों से सक्रिय थे, लेकिन कोई सुनता थोड़े है। मुझे यह तो पता था कि उसे शराब पीने की लत है लेकिन मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह मादक द्रव्य भी लेता है।’ तरनतारन जि़ले के गांव ढोतियान के गुरमेज सिंह की भी मौत 25 जून को हुई। उसकी मां सविन्दर कौर ने कहा कि उसका बेटा नशेड़ी था। मादक द्रव्यों ने उसे हम से हमेशा के लिए छीन लिया। जब वह मरा तो मैंने उसकी नस के पास दवा भरी एक सीरिंज देखी।

बठिंडा में तलवंडी साबो के लवप्रीत की मौत 30 जून को हुई। उसके पिता जीवन खन्ना ने इस बात की पुष्टि की,’लवप्रीत की मादक द्रव्यों के प्रति रुचि दो साल पहले कुछ खराब लोगों की संगत में हुई’।

इसके बाद वह (स्मैक- हेरोइन) लेने लगा। फरीदकोट के कोटकपुरा में बलविंद्र सिंह की मौत 22जून को हुई उसकी लाश खेतों में मिली। उसके हाथ में सुई थी।

‘कट्स’ से हुई मौतें

पुलिस की जांच पड़ताल से बात साफ हुई है कि एडल्टरेटेड हेरोइन को कुछ दूसरे तत्वों के साथ मिला कर एक ऐसा कॉकटेल बनाया जाता है जो परमानंद की अनुभूति देता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘कट’ कहते हैं। यह नशीला पदार्थ पंजाब के नशेडिय़ों में इस समय अच्छा लोकप्रिय है। परिवारों में इस कट से भय है। यह कोई नया मादक पदार्थ नहीं है। यह हेरोइन का ही एक एडल्टरेटेड रूप है। इसे शरीर में सुई के जरिए लेते हैं। यह एहसास होता है मानो देह में सीमेंट लग रहा हो। इसकी प्रतिक्रिया यह होती है कि सुई लगी रह जाती है और आदमी की तत्काल मौत हो जाती है।

डीजीपी सुरेश अरोड़ा कहते हैं सभी आईजी, डीआईजी और सीपी को अभी हाल में हुई एक बैठक में कहा गया है कि पिछले दिनों हुए इन तमाम मामलों में हर एक की जांच वे बारीकी से करें। पुलिस स्वास्थ्य विभाग और समाज की सिविल सोसायटी से भी संपर्क में रहेगी। ये सभी मिल कर मादक द्रव्यों के नशेडिय़ों का पुनर्वास करेंगे और इनके जरिए यह भी पता लगाएंगें कि मादक द्रव्य की तस्करी (स्मगलिंग) का क्या नेटवर्क है।

मादक द्रव्यों का व्यापार करने वालों को मौत की सज़ा

राज्य में मादक द्रव्यों में हुई बढ़ोतरी के कारण हुई मौतों के चलते पंजाब मंत्रिमंडल ने मादक द्रव्यों के मामले में जुड़े तमाम विक्रेताओं और तस्करों को सजा-ए-मौत देने पर गौर करने का अनुरोध किया है। मंत्रिमंडल की पिछले दिनों हुई एक बैठक में यह फैसला लिया गया। इसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने की। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर बात करने के लिए यह बैठक बुलाई थी। मंत्रिमंडल ने इस तथ्य पर फैसला लिया कि अभी पिछले दिनों राज्य में जो मौतें हुई हैं वे मादक द्रव्यों के अत्याधिक सेवन से और एडल्टरेटेड मादक द्रव्यों के चलते हुई हैं। मंत्रिमंडल ने यह भी तय किया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) एनएस कल्सी रोज़-व-रोज़ इस पूरे मामले की समीक्षा करेगे। उनके नेतृत्व में बना कार्यकारी समूह यह भी ध्यान रखेगा कि मादक द्रव्यों का उपयोग कहां-कहां हो रहा है और उस पर कैसे काबू पाया जा सकता है। इस समूह में एसीएस(स्वास्थ्य), डीजीपी (लॉ एंड आर्डर), डीजीपी (इंटेलिजंस), और एडीजीपी (एसटीएफ) बतौर सदस्य होंगे।

मंत्रिमंडल की भी एक उप समिति गठित की गई है, जो सप्ताह में एक बार मिलकर पूरे हालात का जायजा लेगी और सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा करेंगी। इसकी बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह करेंगे। इस बैठक में स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा मंत्री भी होंगे। आप और शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना की है कि पार्टी ने चुनाव पूर्व यह कहा था कि यह राज्य में बढ़ते मादक द्रव्यों के प्रसार को सत्ता में आने के चार सप्ताह में रोकेंगे। लेकिन वैसा यह सरकार नही कर सकी। पंजाब के मुख्यमंत्री ने राज्य में हुई मौतों पर जांच का आदेश दिया है और कहा है कि अपराधियों के खिलाफ अधिकारी सख्त कार्रवाई करें।

मुख्यमंत्री ने ये निर्देश भी दिए हैं कि राज्य के सभी कर्मचारियों को साल भर में एक बार जांच करानी चाहिए जिससे यह पता लगे कि वे नशा करते हैं या नहीं। उनके इस फैसले पर पंजाब की प्रमुख विपक्षी पार्टी आप ने एक पत्र भेजकर मुख्यमंत्री को सलाह दी है कि वे इस फैसले पर फिर विचार करें क्योंकि पुलिस-ड्रग माफिया गठजोड़ पर राजनीति होने लगेगी और मुद्दा भटक जाएगा। उधर सरकारी कर्मचारियों की विभिन्न यूनियनों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया। उनकी मांग है कि राजनीतिक हस्तियों को भी अपना टेस्ट कराना चाहिए जिससे यह साफ हो कि ऐसी समस्या से हमारे विधायक और सांसद भी अछूते हैं या नहीं। कई नेताओं, विधायकों और सांसदों ने तो यह टेस्ट भी कराना शुरू कर दिया है जिससे जनता में भरोसा जम सके।

यह ज़रूर कहा जाता है कि राज्य के पुलिस अधिकारियों और मादक द्रव्यों के तस्करों में काफी गहरे संबंध हैं और उसकी जांच ज़रूरी है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट किया है कि ‘मैंने यह आदेश दे दिया है कि पंजाब पुलिस के डीजीपी मादक द्रव्यों के कारण अभी हाल हुई तमाम मौतों के कारणों का जायजा लें और बेगुनाह युवकों की मौत के जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कार्रवाई करें जिससे दूसरों को भी लगे कि यह कितना बड़ा अपराध है। सरकार मादक द्रव्यों के आदी हो रहे युवाओं और परिवारों के इलाज और पुनर्वास पर पूरा ध्यान देगी। हमें उम्मीद है पंजाब जिसने राज्य में हरित क्रांति की, आतंकवाद का मुकाबला किया वह मादक द्रव्यों के खिलाफ चल रही जंग में भी कामयाब होगा।

कड़ी सजा न होने से पनप रहा नशे का व्यापार

मादक द्रव्यों की लत के चलते पिछले दो महीनों में पंजाब के युवाओं की मौत के सरकारी आंकड़ें जो हों लेकिन अब राज्य की जनता तो यही मानती है कि न जाने कितने मर गए। लोक लाज की वजह से ही कई मौतें पुलिस रिकार्ड में नहीं आ पातीं। इसी कारण इस समस्या से सख्ती से निपटने के लिए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने उन्हें भी सजा-ए-मौत देने की सिफारिश की है जो पहली बार इस अपराध में पकड़े गए हैं।

पंजाब में मादक द्रव्यों की लत से निजात दिलाने वाले पुनर्वास केंद्रों और वहां के अधिकारियों-कर्मचारियों और पुलिस की मिलीभगत के चलते राज्य में फिर मादक द्रव्यों का काला जाल फैल रहा है। इस अवैध कारोबार में लगे लोगों पर सख्ती से सज़ा की कोई व्यवस्था न होने से यह धंधा फ ल-फूल रहा है। ज्य़ादातर पुनर्वास केंद्रों में मरीज़ों के लिए उपयुक्त साजो-सामान मसलन पलंग, बिस्तर, डाक्टरी उपकरण आदि का अभाव है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब में इलाज के लिए जो मरीज़ आते हैं वे 2016 में सरकारी और निजी अस्पतालों में 1.49 लाख थे। जबकि 2017 में यह तदाद 1.08 ही रही। इस साल के आंकड़े अभी तैयार हो रहे हैं। राज्य में 37 नशामुक्ति केंद्र और 22 पुनर्वास केंद्र हैं। गैर अधिकारिक तौर पर राज्य में तीन लाख से ज्य़ादा मरीज़ नशा लेने की प्रवृति के हैं। राज्य में हमने नशाखोरों की देखभाल के लिए महज 96 नशा मुक्ति निवारण केंद्र और 77 निजी पुनर्वास केंद्र हैं जो अपर्याप्त हैं।

चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन और रिसर्च (पीजीआई) में मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर और मादक द्रव्यों के निवारण व इलाज केंद्र के भी प्रमुख डा. देवाशीष वसु ने बताया कि पीजीआई के नशा निवारण केंद्र में सिर्फ बीस ही बिस्तर हंै और फिलहाल अठारह मरीज़ हैं। हर साल दो हज़ार नए मरीज़ पीजीआई में इलाज के लिए आते हैं और तकरीबन आठ हज़ार मरीज़ जो नशे की अपनी लत छुड़ाना चाहते हैं वे अपनी जांच कराने आते हैं।

डा. बसु का कहना है कि मादक द्रव्यों की लत के शिकार मरीज़ों का इलाज कितना प्रभावी रहा वह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कामयाबी को किस तरह लेते हैं। यदि तीन साल से यह लत पूरी तौर पर छूट जाए तो इसका फीसद महज बीस या तीस फीसद है। यदि बीच-बीच में तलब उठे या मरीज़ दवा लेना बंद कर दे और परिवार में ठीक-ठाक रहे तो यह भी कामयाबी है। यदि समाज में और काम की जगह भी लत की इच्छा न जगे तो यह फीसद चालीस से साठ फीसद भी हो सकता है। लेकिन ये सारी बातें दवाओं के प्रयोग और इससे संबंधित बातों पर मरीज़ की इच्छाशक्ति पर निर्भर करती हैं।

मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यह तय किया था कि सत्ता में आने के महीने भर में वे राज्य को मादक द्रव्यों के सेवन की आदत से मुक्त कराएंगे। लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। तकरीबन डेढ़ साल बाद भी यही लगता है कि समस्या का तो अभी तरीके से पूरा आकलन भी नहीं हुआ है। हल करने की बात तो बाद में आएगी। सरकार के मादक द्रव्यों के प्रसार की रोकथाम के लिए कुछ कदम तो उठाए हैं लेकिन इसके नतीजे उत्साहवर्धक नहीं हैं। पिछले दिनों इस मादक द्रव्यों के धंधा चलाने वालों और समग्लरों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई। इस साल पंजाब में ‘हेरोइन’ की जो मात्रा पकड़ी गई वह दूसरे प्रदेशों की तुलना में सबसे ज्य़ादा है।

चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले दो सालों में पकड़े गए समग्लरों में बहुत कम को सज़ा मिली। पिछले छह महीनों में इस साल पंजाब में पुलिस, बीएसएफ, एनसीबी और दूसरी एजंसियों से 215 किलोग्राम हेरोइन पकड़ी गई। यह एक रिकार्ड है। जबकि पंजाब पुलिस ने पिछले साल सिर्फ 193 किलोग्राम हेरोइन जब्त की थी। पिछले साल 1,915.7 किलो गांजा भी पुलिस ने पकड़ा था। इस साल के पिछले छह महीनों में 1,817.06 किलोग्राम गांजा पकड़ा जा चुका है।

पंजाब में नशे की लत में जो मरीज़ हैं उनकी खासी बड़ी ताताद है। पिछले कुछ वर्षों में मादक द्रव्यों के सेवियों की तादाद खासी बढ़ गई है। ज़ाहिर हैं इनमें कई तो इससे निजात पाने कें लिए बेताब भी होंगे। इसी कारण इतनी बड़ तादाद में नशेडिय़ों का इलाज खासा कठिन है। तकरीबन चौदह सौ मरीज़ों को विभिन्न नशा निवारण केंद्रों में दाखिल भी कराया गया। ज्य़ादातर निजी तौर पर बने हुए जो नशा प्राथमिकता देते हैं। मोहाली के बाहर खरड़ में गुलमोहर कांपलैक्स में बने आकाश अस्पताल में तो मरीज़ों की लंबी कतार है। यहां दस बिस्तरों की व्यवस्था है। अस्पताल के मेडिकल-इन-चार्ज डा. जीवन बाबू ने बताया।

डा.बाबू के अनुसार जब मरीज़ खासी गंभीर अवस्था में होते हैं तभी उन्हें एडमिट करते हैं। उनका घर से भी ठीक इलाज हो सकता है। इलाज के दौरान जब मरीज़ अपनी लत के बारे में बताए और प्रयास करे तो उसकी वजह यही है कि घर पर उसे ठीक तरह से संभाला नहीं जा पा रहा है। ‘मरीज़ों में आत्म बल की बहुत ज़रूरत होती है। दुर्भाग्य से मरीज़ जब अपने रिश्तेदारों और दास्तों के पास पहुंचता है तो लत फिर लग जाती है। मरीज़ जब फिर व्यसनी होता है तो हमें फिर पुरानी दवाएं शुरू करनी पड़ती हंै।’

एक मरीज़ के संबंधी कुराली के रहने वाले ही भूपिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उसके बड़े भाई कुछ साल पहले मादक द्रव्य लेने के कारण बीमार पड़े थे उनका परिवार कृषक है। पूरे परिवार की देखभाल भूपिंदर ही करता था। लेकिन कुछ महीने से उनका व्यवहार बदल गया। फिर पता लगा कि वह मादक द्रव्य लेने लगे हैं। उन्हें इलाज के लिए लाया गया। शुरू में तो उन्होंने सहयोग दिया लेकिन बाद में वे फिर मादक द्रव्य लेने लगे। समस्या और बढ़ गई। घर में इतना पैसा नहीं है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करा सकें। वे घर में रहते हैं और उनका इलाज ठीक ठाक तरीके से चल रहा है। लेकिन परिवार को डर है कि कहीं फिर उन्हें लत न लग जाए क्योंकि मादक द्रव्य आसपास यह आसानी से उपलब्ध है। जब तक मरीज़ में आत्मबल नहीं होगा कि उसे यह नशा छोडऩा ही है तब तक उसमें यह संभावना बनी रहेगी कि जैसे ही नशीली वस्तु मिले। उसे वह ले।

नशा निवारण केंद्रों के निजी क्लिनिक यह बताने से बचते हैं कि उन्होंने ने कितने मरीज़ देखे। उनके पास उसकी वजह कानूनी तौर पर है जिसे पंजाब सब्स्टैस यूज़ डिसार्डर ट्रीटमेंट एंड काउंसिलिंग, एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर रूल्स 2011 जाना जाता है। इसके तहत पेशेवर चिकित्सक मरीज़ों के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकते।

पीजीआई, चंडीगढ़ के एक डॉक्टर ने अपना नाम न छापने के अनुरोध के साथ बताया कि ‘नशा लेने वालों की जब हालत बिगड़ जाती है तो उसे संभाल पाना आज भी बहुत कठिन है। इसे संभाल पाना निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों, मरीज़ों और उनके परिवारों के प्रयास से ही संभव है।’ जिस तेजी से आज समाज में नशे की लत बढ़ रही है उसे देखते हुए सभी को सजग और हर पल सहयोगी बने रहना होगा।

आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो इस साल जलंधर सिविल अस्पताल और कम्मुनिटी हेल्थसेंटर नूरमहल में तीन हज़ार नशा लेने वाले मरीज़ों की चिकित्सा की गई। पिछले कुछ महीनों मे मरीज़ों की तादाद खासी बढ़ गई है। यह एक अच्छी शुरूआत इसलिए कहीं जाती है क्योंकि ज्य़ादा से ज्य़ादा मरीज़ इलाज के लिए तो आज आ रहे हैं। यानी उनमें जीवन के प्रति उम्मीद की लौ है।

यह पूछने पर कि क्या मादक द्रव्यों के व्यापार से जुड़े लोगों को सजा-ए-मौत देने से क्या इस मसले का हल हो जाएगा। डा. देवाशीष बसु ने कहा कि समाज में मादक द्रव्यों की मादकता का जो असर है उसे एकदम खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे-धीरे उस पर काबू ज़रूर पाया जा सकता है। कोशिश यही की जाती है कि उसका बढ़ाव न हो।

पंजाब सरकार ने नशा मुक्ति निवारण और पुनर्वास केंद्र मोहाली जाने पर पता चला कि मादक द्रव्यों के लती होकर आने वाले मरीज़ों की तादाद दुगुनी हो गई है। यहां ज्य़ादातर मरीज़ 20-30 आयु वर्ग के हंै। मरीज़ों से दो सौ रुपए लिए जाते हैं। जिसमें इलाज, ठहराव और आधार का पैसा लिया जाता है। कुछ दिन बाद जब मरीज़ खुद को स्वस्थ महसूस करने लगता है तो उस पुनर्वास केंद्र में 50 रुपए रोज़ पर दाखिल किया जाता है। यहां इलाज कम से कम एक महीना चलता है। फिर मरीज़ घर आ जाता है। पूरा इलाज छह महीने और जारी रहता है। बाज़ार में ऐसे ही इलाज की कीमत रुपए एक हज़ार मात्र से रुपए तीन हज़ार मात्र प्रतिदिन है।

‘ज्य़ादातर लोग निजी अस्पतालों में इसलिए जाना चाहते हैं’ क्योंकि एक तो उनका भरोसा सरकारी डाक्टरों पर नहीं होता और वहां जमी भीड़ और गंदगी से उन्हें काफी परेशानी होती है। बताती है डा. अंशु गर्ग जो पंजाब सरकार की डिस्ट्रिक्ट डिएडिक्शन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर, मोहाली की को-इंचार्ज हैं।

मरीज़ों से बातचीत में बताया कि उन्हें कारावास जैसी हालत में तालाबंद रखा जाता है। गेट पर एक सिपाही और गार्ड तैनात रहते हैं। किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर आने की मनाही होती है।’ हमें यह सावधानी इसलिए बरतनी पड़ती है जिससे मरीज़ों को दी जा रही दवाओं के बीच कोई मादक दवा कोई बाहरी तत्व इन्हें न दे। पहले कई ऐसी घटनाएं हुई हैं। मरीज़ों को तीसरी-चौथी बार भी इलाज के लिए आना पड़ा है। जीवन संदेश फाउंडेंशन खरड़ में नौ बिस्तर का अस्पताल है। इनका दूसरा केंद्र दिल्ली में है। ‘हम इलाज नहीं करते सिर्फ पुनर्वास केंद्र चलाते हैं’ जहां सलाह के जरिए मरीज़ों की देखभाल करते हैं।

‘गरीब और अमीर, दोनों ही वर्ग के लोग मरीज़ के तौर पर नशा मुक्ति केंद्र पर आते हैं। तीन से पांच साल में दिल्ली में हमने तकरीबन डेढ़ सौ लोगों को स्वस्थ किया है।’ बताते हैं रघुबीर सिंह।