मेडिकल कॉलेजों को हर महीने देना होगा आत्महत्या का हिसाब, 4 महीने में भरने होंगे पद
नई दिल्ली, 24 अगस्त:| M. Riyaz Hashmi
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में एनएमसी ने मांगी ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’, आत्महत्या से लेकर एफआईआर, संस्थागत जांच, 24×7 चिकित्सा सहायता, फैकल्टी और प्रशासनिक पदों की स्थिति तक की निगरानी
नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) ने देश के सभी मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों से छात्र आत्महत्या और अप्राकृतिक मौत की घटनाओं, फैकल्टी की कमी, प्रमुख प्रशासनिक पदों और छात्रों को मिलने वाली जरूरी सहायता की स्थिति पर समयबद्ध ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ मांगी है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में लागू की जा रही है। एनएमसी ने कॉलेजों को अपनी स्थिति का प्रमाणित ब्योरा देने के लिए निर्धारित प्रारूप भी जारी किया है।
रिपोर्टिंग फॉर्म में पूछी गई विस्तृत जानकारी: घटना की तारीख, एफआईआर, जांच समिति, 24×7 चिकित्सा सहायता की स्थिति
एनएमसी के नए रिपोर्टिंग प्रारूप में मेडिकल कॉलेजों से पूछा गया है कि रिपोर्टिंग अवधि में कोई छात्र आत्महत्या या अप्राकृतिक मौत हुई या नहीं। यदि ऐसा मामला हुआ है तो कॉलेज को मामलों की संख्या, छात्र का नाम, पाठ्यक्रम और वर्ष, घटना की तारीख और स्थान जैसी जानकारी देनी होगी। इसके साथ यह भी बताना होगा कि परिवार को सूचना दी गई या नहीं, पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई या नहीं, संस्थागत जांच समिति बनाई गई या नहीं और जांच की मौजूदा स्थिति क्या है? अब संस्थान केवल यह बताकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकेगा कि परिसर में किसी छात्र की मौत हुई थी। उसे यह भी दर्ज करना होगा कि घटना के बाद पुलिस और संस्थागत स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और जांच कहां तक पहुंची?
10 तारीख तक भेजनी होगी मासिक रिपोर्ट, एनएमसी बनाएगा समेकित रिकॉर्ड, शिक्षा मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट को भेजा जाएगा
रिपोर्टिंग फॉर्म में परिसर में या उसके एक किलोमीटर के दायरे में 24×7 योग्य चिकित्सा सहायता उपलब्ध होने की स्थिति भी मांगी गई है। यह व्यवस्था खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया में छात्र मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम को संस्थागत जिम्मेदारी के हिस्से के रूप में देखा गया है। एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिया है कि प्रत्येक महीने की 10 तारीख तक प्रमाणित एक्शन टेकन रिपोर्ट आयोग को भेजी जाए। आयोग इन रिपोर्टों को समेकित करके केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय को भेजेगा और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट के सामने भी प्रस्तुत किया जा सकेगा।
चार महीने की डेडलाइन: खाली फैकल्टी पद, प्रमुख प्रशासनिक पद, लंबित छात्रवृत्ति भुगतान का बैकलॉग खत्म करना होगा
मेडिकल कॉलेजों की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था से जुड़े खाली फैकल्टी पद चार महीने के भीतर भरने के लिए समयबद्ध कदम उठाने होंगे। आरक्षित पद खाली हैं तो उनके लिए विशेष भर्ती अभियान चलाना होगा। प्रमुख प्रशासनिक पदों के मामले में भी चार महीने की समयसीमा तय की गई है। कॉलेजों को यह बताना होगा कि कौन सा पद खाली है, उसे भरने की प्रक्रिया शुरू हुई या नहीं और पद खाली रहने का कारण क्या है? इसमें मेडिकल कॉलेजों के डीन, निदेशक, प्राचार्य, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, वाइस चांसलर, रजिस्ट्रार, हॉस्टल वार्डन और काउंसलर जैसे प्रमुख पदों की स्थिति भी दर्ज करने का प्रावधान है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि निगरानी केवल आत्महत्या और स्टाफ तक सीमित नहीं है। लंबित छात्रवृत्ति भुगतान का बैकलॉग भी चार महीने के भीतर खत्म करना होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो दो महीने के भीतर कारण बताते हुए नोटिस जारी करना होगा।
यूजीसी, एआईसीटीई, डेंटल काउंसिल, नर्सिंग काउंसिल, बार काउंसिल, आयुष समेत कई नियामकों को जोड़ा गया, 1 सितंबर तक भेजनी होगी अनुपालन रिपोर्ट
यह पूरी प्रक्रिया केवल मेडिकल शिक्षा तक सीमित नहीं है। शिक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन के लिए यूजीसी, एआईसीटीई, डेंटल काउंसिल, भारतीय नर्सिंग परिषद, बार काउंसिल और अन्य नियामक संस्थाओं को भी प्रक्रिया में शामिल किया है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी अनुपालन रिपोर्ट 1 सितंबर 2026 तक भेजने के लिए कहा गया है और मामले को ‘टॉप प्रायोरिटी’ तथा ‘टाइम-बाउंड’ बताया गया है। इसका मतलब साफ है—अब मेडिकल कॉलेजों में छात्र सुरक्षा, स्टाफ की उपलब्धता और संस्थागत जवाबदेही पर कागजी दावों के बजाय रिकॉर्ड आधारित निगरानी की व्यवस्था बन रही है। असली परीक्षा अब इस बात की होगी कि कॉलेज इन रिपोर्टों में क्या आंकड़े देते हैं और एनएमसी उन आंकड़ों के आधार पर कितनी सख्त कार्रवाई करता है।




