बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि लोग चंद्रशेखर को देखने जाते हैं। “उन्होंने दलितों के लिए कुछ नहीं किया है।”

विश्वनाथ पाल (प्रदेश अध्यक्ष, यूपी) ने आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद की प्रस्तावित रैली और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की 6 दिसंबर की रैली पर इसके प्रभाव को लेकर चंद्राणी बनर्जी से लंबी बातचीत की।

प्रश्न: आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और बसपा दोनों लखनऊ में रैलियां करने जा रही हैं। दोनों की तिथियां बेहद महत्वपूर्ण हैं – 26 नवंबर (संविधान दिवस) और 6 दिसंबर (भीमराव आंबेडकर की पुण्यतिथि)। क्या आप इस बात से सहमत हैं कि यह एक तरह से ‘दलित बनाम दलित’ वाला कदम है?

उत्तर: मैं इससे पूरी तरह असहमत हूँ। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप यही सवाल किसी उच्च जाति की पार्टी से क्यों नहीं पूछते? क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उच्च जाति के वोटों पर चलने वाली पार्टियों में कभी कोई बागी/अलग हुए गुट (Breakaway groups) नहीं बने? गूगल करके देख लीजिए कि चुनाव मैदान में ऐसे कितने गुट मौजूद हैं। ये बागी गुट चुनाव जीतते हैं और फिर सरकार बनाने के लिए मुख्य पार्टियों के साथ मोलभाव करके उनका विलय कर लेते हैं।

प्रश्न: क्या इसका मतलब यह है कि जब आपके अपने ही बागी गुट से आमना-सामना होगा, तो दलित वोट शेयर का कोई नुकसान नहीं होगा?

उत्तर: मैं इस बात से भी असहमत हूँ। यह एक राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है कि दूसरी पार्टी बहनजी (यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती) का विकल्प है। सिर्फ इसलिए कि कोई रैली कर रहा है और वहाँ कुछ दलित भीड़ जुट रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई ऐसा विकल्प बन गया है जो वोट शेयर काट देगा।

प्रश्न: अगर आज़ाद कुछ भी नहीं हैं, तो उन्होंने नगीना सीट कैसे जीती? (चंद्रशेखर आज़ाद नगीना, सहारनपुर से सांसद हैं)

उत्तर: “वो जीता नहीं है, जिताया गया है।” यह सभी उच्च जाति की पार्टियों की एक योजना थी कि उन्हें जिताने में मदद की जाए ताकि वे बहनजी का एक विकल्प खड़ा कर सकें। लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि वे सभी इसमें पूरी तरह नाकाम रहे।

प्रश्न: तो क्या आज़ाद की रैली मतदाताओं को भ्रमित करने का एक जानबूझकर उठाया गया कदम था?

उत्तर: मतदाता बिल्कुल भी भ्रमित नहीं हैं, वे बहनजी को जानते हैं और निश्चित रूप से उन्हीं को वोट देंगे। ऐसी कई पार्टियाँ हो सकती हैं जो यह दावा कर रही हैं कि उन्होंने प्रसिद्ध दलित नेता मायावती का विकल्प तैयार कर लिया है, लेकिन यह एक झूठा नैरेटिव (आख्यान) है। बहनजी के समर्थक केवल दलितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी जातियों में हैं। उनके अनुयायी जाति और धर्म से ऊपर हैं। वे बस उनकी विचारधारा और उनके सरकार चलाने के तरीके पर विश्वास करते हैं।

प्रश्न: क्या इसका मतलब यह है कि बसपा का अपना एक तय जनाधार है और उसमें कोई सेंध नहीं लगा सकता?

उत्तर: बिल्कुल सही। हमने यह जनाधार अपनी कड़ी मेहनत के दम पर बनाया है। हमने स्कूल, कॉलेज बनाए, नौकरियां दीं और बेहतरीन कानून-व्यवस्था के साथ एक अच्छा, भयमुक्त समाज सुनिश्चित किया। कौन सी राजनीतिक पार्टी हमारी बराबरी करना चाहती है? वे आगे आएं और बात करें। 2017 के बाद से शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कितना काम हुआ है? वे दावा करेंगे कि उन्होंने बहुत काम किया है, लेकिन वह सब सिर्फ कागजों पर है।

प्रश्न: अगर ऐसा है, तो दलित मतदाता चंद्रशेखर आज़ाद की रैली में क्यों जाते हैं?

उत्तर: आप उनसे बात कीजिए – वे आपको साफ-साफ बताएंगे कि “भाई है तो देखने आ जाते हैं।” उनके कोई अनुयायी (Followers) नहीं हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हम रैली में आए हैं, लेकिन वोट बहनजी को ही देंगे। हम हमेशा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ रहेंगे। बसपा के प्रति यह लगाव इसलिए है क्योंकि हमने उनके लिए काम किया है। इसलिए इन सभी रैलियों से हमारे वोट शेयर को कोई खतरा नहीं है।

प्रश्न: यह मानने का क्या आधार है कि वोट शेयर में कोई कटौती नहीं होगी?

उत्तर: मिल्कीपुर, अयोध्या की सीट है – 2025 के उपचुनाव के दौरान बहनजी या बसपा ने चुनाव नहीं लड़ा था। तब उन्हें (चंद्रशेखर को) कितने वोट मिले थे? अगर वह बसपा या बहनजी का असली विकल्प हैं, तो चुनावी मैदान में बसपा की अनुपस्थिति में उन्हें वोटों का अच्छा खासा हिस्सा मिलना चाहिए था। अफसोस की बात है कि उन्हें ऐसा नहीं मिला। बसपा को आमतौर पर मिल्कीपुर सीट से 46,000 वोट मिलते हैं। कम से कम बात करें तो उन्हें 25,000 वोट तो मिलने ही चाहिए थे, अगर इससे ज्यादा नहीं। उन्हें सिर्फ 5,000 वोट मिले और वे दावा करते हैं कि वे एक विकल्प हैं।

प्रश्न: क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की कोई मौजूदगी नहीं है और एक बागी गुट के रूप में बसपा के लिए कोई खतरा नहीं है?

उत्तर: बिल्कुल। मीडिया में से कोई भी भारतीय जनता पार्टी या समाजवादी पार्टी से उनके अपने बागी गुटों और उनसे होने वाले वोट शेयर के नुकसान के प्रतिशत के बारे में सवाल नहीं पूछता।