
अरविंन्द चतुर्वेदी–
राम मंदिर ट्रस्ट के हर फ़ैसले में शामिल रहे हैं नृपेन्द्र मिश्रा
मंदिर में चढ़ावा चोरी होने के बाद राम मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख के तौर पर नृपेन्द्र मिश्रा ने बहुत नाराज़गी जताई थी उन्होंने कहा कि इस घटना से हम सब बहुत छोटापन महसूस कर रहे हैं, क्योंकि लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए हैं।उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए मंदिर की व्यवस्थाओं और दान प्रक्रिया में आवश्यक व कड़े सुधार किए जाएंगे।मंदिर के संचालन और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है, जो मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में योग्य उम्मीदवारों के नामों पर विचार कर रही है।इसके बाद राम मंदिर से जुड़े
चंपत राय के पत्र में नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका का उल्लेख
चंपत राय को लेकर ढेरों आरोप लगे इन सबके बीच चंपत राय ने इन मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी पर चंपत राय ने पहली बार एक पत्र के माध्यम से ये बताया कि राम मंदिर से जुड़े किसी मामले में नृपेन्द्र मिश्रा के बिना कोई फ़ैसला नहीं होता ।
चंपत राय की तरफ भेजे गए पत्र कुछ इस तरह से है ।
राम जन्मभूमि आंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया का विवरण
01 ई. सन् 1528 में बाबर की सेनाओं द्वारा श्री राम जन्मभूमि मंदिर तोड़ दिए जाने के पश्चात अयोध्या एवं स्थानीय सन्तों, आस-पास के राजाओं रियासतों एवं गृहस्थ समाज द्वारा मंदिर की भूमि प्राप्त करने के लिए सभी राज सत्ताओं के विरोध के बावजूद संघर्ष सदैव चलता रहा, जो ई. सन् 1949 में स्थानीय समाज द्वारा उस स्थान पर कब्जा कर लेने के बाद ही बन्द हुआ।
02 सन् 1950 से लेकर 1989 ई. तक चार वाद स्थानीय अदालत में दायर हुए, सभी वादों को वादकर्ताओं ने लड़ा, शासन ने नहीं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 15 वर्षों तक मुकदमा सुना, तीनों न्यायाधीशों ने अपना-अपना निर्णय स्वतंत्र लिखा, कुल निर्णय लगभग 8,500 पृष्ठों में हैं, जो न्यायालय ने तीन भागों में प्रकाशित किया है, बाजारों में उपलब्ध है, यह निर्णय रडार तरंगों द्वारा भूमि के नीचे की फोटोग्राफी, पुरातात्विक उत्खनन, विदेशी विद्वानों द्वारा लिखे गये प्राचीन ग्रन्थों, प्राचीन भारतीय इतिहास, मध्य कालीन इतिहास एवं आधुनिक इतिहास तथा गवाहों के बयानों के आधार पर आधारित है, जिज्ञासुओं को पढ़ना चाहिए।
03 सर्वोच्च न्यायालय ने सभी पक्षों के बीच बातचीत के आधार पर समाधान का मार्ग खोजा था, तीन व्यक्तियों की मध्यस्थता टोली बनाई थी, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्ति न्यायाधीश श्री कलिफुल्ला जी, सीनियर एडवोकेट चेन्नई उच्च न्यायालय श्री श्रीराम पंचु एवं पूज्य श्री श्री रविशंकर जी इस टोली के सदस्य थे, मार्च 2019 से जुलाई 2019 तक अनेक बार बैठकें हुई, परिणाम कुछ नहीं निकला, 06 अगस्त 2019 से सर्वोच्च न्यायालय की 5 न्यायाधीशों की पीठ ने नियमित सुनवाई प्रारम्भ की 40 दिन तक निरन्तर लगभग 175 घण्टे अधिवक्ताओं के विचार सुने गए, 09 नवम्बर 2019 को सर्व सम्मत निर्णय हिन्दू समाज के पक्ष में हुआ, इस प्रकार मंदिर निर्माण का मार्ग खुल गया।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन
04 सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर ही भारत सरकार ने “श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र” नाम से स्वतंत्र ट्रस्ट बनाया, कुल 15 ट्रस्टी लिखे गए। एक ट्रस्टी निर्मोही अखाड़ा की अयोध्या बैठक के लिए सुरक्षित रखा, एक ट्रस्टी अनुसूचित जाति जनजाति के लिए सुरक्षित रखा। स्थानीय जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश सरकार एवं भारत सरकार के एक-एक प्रतिनिधि जो आई.ए.एस. अधिकारी है, पदेन न्यासी बनाये गए, भारत सरकार के सुझाव पर एक पदेन न्यासी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ट्रस्टी बनाये गए, इनको मंदिर निर्माण समिति तथा मंदिर संबन्धि सभी कार्यों के प्रबंधन की समिति का अध्यक्ष लिखा गया, आज इसी स्थान पर श्री नृपेन्द्र मिश्रा हैं। इसके अतिरिक्त वरिष्ठ अधिवक्ता श्री केशव पारासरन जी संस्थापक न्यासी हैं, उडुपी, पुणे, प्रयागराज, हरिद्वार से एक-एक सन्त, अयोध्या से एक सन्त तथा अन्य 3 न्यासी बनाये।
मंदिर निर्माण के लिए L&T और TCE का चयन
05 स्वर्गीय अशोक सिंहल जी के प्रयासों-सुझावों को श्री नृपेन्द्र मिश्रा जी को बताया गया, उन्हीं सुझावों के आधार पर लार्सन एण्ड ट्यूब्रों को मंदिर निर्माण के लिए चुना गया तथा समकक्ष स्तर की संस्था प्रोजेक्ट सलाहकार (पी.एम.सी.) होनी चाहिए, इस कारण टाटा (टी.सी.ई.) को चुना गया।
वास्तुकार और डिजाइन फर्म के चयन का उल्लेख
06 मंदिर वास्तुकार अहमदाबाद निवासी श्री चन्द्रकान्त भाई सोमपुरा का चयन स्वर्गीय अशोक सिंहल जी ने वर्ष 1986 में किया था, उन्हीं को रखा गया, अन्य भवनों के निर्माण के लिए नोएडा की फर्म डिजाईन एसोसिएट (फर्म प्रमुख जय काकतीकर) को श्री नृपेन्द्र जी ने चुना।
निर्माण समिति की बैठकों और फैसलों का दावा
07 श्री नृपेन्द्र जी ने अपनी सहायता के लिए मंदिर निर्माण समिति में अपनी रुचि के कुछ व्यक्तियों को जोड़ा, जिनमे से एक विगत 6 वर्षों में एक अथवा दो बार ही अयोध्या बुलाए गए, एक अन्य से सुरक्षा कार्यों से सम्बन्धित सुझाव लिए गए, एक तीसरे सदस्य श्री अनूप मित्तल (पूर्व चेयरमैन एन.बी.सी.सी.) सदैव नृपेन्द्र जी के साथ मंदिर निर्माण समिति की बैठक में आते थे, यह बैठक प्रतिमास होती थी, कुछ काल तक 15 दिन में एक बार हुई। प्रत्येक निर्णय इसी समिति में होता था, ऐसा एक भी कार्य नहीं हुआ, जो समिति में निर्णय न हुआ हो, यदि निर्णय कर भी लिया तो वह मान्य नहीं किया गया, यदि कुछ कर भी दिया तो उसे हटा दिया गया, मंदिर निर्माण के सभी निर्णयों के लिए श्री नृपेन्द्र मिश्रा जी ने सदैव अपने को ही प्रमुख कहा।
नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका की प्रशंसा
08 यह भी सत्य है, कि श्री नृपेन्द्र मिश्रा जी के कारण पत्थरों से बना इतना विशाल मंदिर जून 2020 कोरोना काल से प्रारम्भ होकर जून 2026 तक पूर्ण रूप से समाज को समर्पित हो गया, यह केवल नृपेन्द्र जी के प्रयत्नों का परिणाम है। जब कभी कोई बाधा आई तत्काल संबंधित विषय के भारत के योग्यतम व्यक्तियों को उन्होंने निवेदन करके अयोध्या बुला लिया, और उनके परामर्श के आधार पर वह बाधा दूर हो गई। यह भी सत्य है कि अधिकांश विद्वानों ने यहाँ सेवाभाव से सुझाव दिए अर्थात कोई पारिश्रमिक श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से नहीं लिया।
अनूप मित्तल की सलाहकार भूमिका
09 श्री अनूप मित्तल जी जो कभी NBCC के चेयरमैन रहे, वे मंदिर निर्माण समिति के सदस्य भी हैं, सिविल इंजीनियर हैं, सदैव इंजीनियरिंग विषय पर नृपेन्द्र जी के सलाहकार रहे, नृपेन्द्र जी के सभी लिखित कार्य अनूप जी ही करते थे, उदाहरण के लिए निर्माण समिति बैठकों के विवरण तैयार करना, संबंधित व्यक्तियों को भेजना आदि, अनूप जी के साथ एक तरुण सिविल इंजीनियर यश मित्तल सदैव आये, वे तत्काल अपने लैपटॉप पर हर विषय को टाईप करते थे, उसी के आधार पर सब कार्य होते थे, यह प्रशंसनीय है, कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय से जुड़ा प्रस्ताव
10 अन्तर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय उत्तर प्रदेश सरकार की सम्पत्ति है, श्री नृपेन्द्र जी ने सोचा कि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को भी एक संग्रहालय बनाना हैं, छोटे से कस्बे में दो संग्रहालय व्यावहारिक नहीं है, उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारियों से वार्ता की, उन्होंने स्वीकार कर लिया,
चंपत राय के इस पत्र के बाद राम मंदिर पर चल रहा विवाद को नई हवा मिल गई है ।चंपत राय ने भी वक्त का इंतजार किया और बड़े विस्तार से उनके खिलाफ चल रहे सवालों के जबाब सबके सामने रखे ।


