तहलका इंटरव्यू / कअर डॉक्टर हरिओम
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अमेठी जिले के कटारी गांव निवासी डाक्टर हरिओम उत्तर प्रदेश सरकार के कौशल विकास एवं उद्यमशीलता विभाग के प्रमुख सचिव हैं। प्रशासनिक पहलू के अलावा उनके व्यक्तित्व के दूसरे अनछुए पहलुओं पर कअर डॉ. हरिओम से खास बातचीत की ‘तहलका’ के डिजिटल हेड राघवेंद्र द्विवेदी ने। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश
प्रशासनिक सेवा में जाने का विचार कब आया? फैसला खुद का था या किसी ने मशवरा दिया था?
- पिता कहते थे कि कलक्टर जिले का मुखिया होता है, तुम खूब पढ़ना और कलक्टर बनना। कुछ गुरुओं ने भी 12वीं में आईएएस पीसीएस का जिक्र करते हुए कहा कि तुम मेधावी हो इन परीक्षाओं में किस्मत आजमाना।
जेएनयू में आप ने पढ़ाई की है। कैसा रहा कैंपस का अनुभव? क्या सीखा आप ने?
- जेएनयू अंग्रेजी और हिन्दी बोलने वालों में भाषाई स्तर पर अंतर नहीं करता। लोग कंटेंट और आइडियॉलजी देखते हैं। देश दुनिया के छात्र वहाँ पढ़ते हैं तो यूनिवर्सिटी का असली फील मुझे खठव में आया। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में जो देखा था वो सब खठव में धुआँ धुआँ हो गया था। सीखने को बहुत कुछ मिला। गंगा ढाबा जेएनयू के स्मृति-लोक का अभिन्न हिस्सा है। जेएनयू ने मुझे एक नई दुनिया से परिचय कराया।
कअर में सेलेक्शन होने के बाद जिंदगी कैसे और कितनी बदली? साथ पढ़ने वाले यार दोस्तों का नजरिया कितना बदला?
- सेलेक्शन बहुत बड़े सपने के साकार होने जैसा था। रातों रात सब कुछ बदल गया। मैं हिन्दी मीडियम से परीक्षा देने वालों में आॅल इंडिया टॉपर था। कैम्पस में सभी का नजरिया बदल गया था। सब मुझे एक विजेता की तरह देख रहे थे।
ट्रेनिंग के बाद आप की पहली पोस्टिंग कहाँ हुई? पहली पोस्टिंग के कार्यकाल को कैसे याद करते हैं?
- बतौर मजिस्ट्रेट मेरी पहली पोस्टिंग रुद्रप्रयाग हुई। अलकनंदा की ठंडी हवाएं थीं। पहाड़ियाँ थीं। बाबा केदारनाथ की सीढ़ियाँ चढ़ीं। जीवन शैली में ठहराव था। मैदानी इलाके जैसी व्यस्तता नहीं थी। पहाड़ों में जिंदगी धीरे चलती है लेकिन शांति मिलती है।
आप कई जिलों में बतौर डीएम रहे। सबसे अच्छा और संतोषजनक कार्यकाल किस जिले में रहा?
- मैं 11 जिलों में डीएम रहा। अगर संतुष्टि की बात करें तो गोरखपुर में बिताए सवा दो साल सबसे अच्छे रहे। कानपुर का कार्यकाल भी अच्छा रहा। इलाहाबाद जहाँ मैंने पढ़ाई की और जब डीएम आवास के सामने से गुजरता था तो डीएम की नाम पट्टिका को देख कर सोचता था कि इस पर कभी मेरा भी नाम लिखा होगा। जब मैं तैनात हुआ तो बहुत अलग तरह की खुशी मुझे मिली।
आप अधिकारी होने के साथ–साथ शायर, लेखक और गायक भी हैं। अपने अंदर के अधिकारी और आर्टिस्ट के बीच कैसे तालमेल बिठाते हैं? क्या कभी दोनों में टकराव होता है?
- हाँ ये बात सच है कि अधिकारी होने के साथ-साथ मेरे अंदर शायरी और संगीत की रचनात्मकता है। संवेदनशील हृदय होने से आप अच्छे इंसान बनते हैं और तब बतौर अधिकारी आपको अच्छे और सही फैसले लेने में आसानी रहती है। फैसलों में न्याय होता है। लोगों से मिलने में मधुरता रहती है। अकड़ अहंकार नहीं होता। मुझे बेहतर इंसान बनाने में मेरी रचनात्मकता की बड़ी भूमिका रही। मुझे लेखन और गायन में बहुत सुख मिलता है। मेरे अंदर के अधिकारी और आर्टिस्ट में टकराव नहीं होता। बस एहतियात बरतना जरूरी है।
शायरी ने आप की जिंदगी में दस्तक कब दी? किन शायरों को पढ़ना और सुनना पसंद करते हैं?
- जेएनयू में मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत सिंह को मैं बतौर गायक सुनता रहा। उसमें शायरी भी थी। इन सब को सुन कर दिलचस्पी जागी। फैज, मीर, गालिब, जोश, इकबाल को पढ़ना शुरू किया। बाद में निदा फाजली से लेकर बशीर बद्र और अन्य तमाम शायरों को पढ़ा।
मैं कहानियाँ, कविताएँ भी लिखता हूँ लेकिन मुझे दो लाइनों में गहरी बात कहना पसंद है। इसीलिए शायरी का सलीका बहुत अच्छा लगता है।
हर लिखने वाले के जीवन में ऐसे कई मौके आते हैं जब वो ‘क्रिएटिव ब्लॉक’ में फंस जाता है। शायरी लिखने वाले के साथ ये ज्यादा होता है। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ जब आप चाह कर भी ना लिख पाए हों?
- कई बार ऐसा हुआ कि बहुत समय तक कोई नई गजल नहीं हुई। कई बार दो एक शेर हुए लेकिन गजल पूरी नहीं हो पाई। उदाहरण के लिए ये शेर देखिए।
उन्हें लगा था कि मिट्टी में मिल चुका हूँ मैं
मुझे यकीन था मैं बन के शजर निकलूंगा
- ये शेर मैंने सबसे पहले कहा लेकिन गजल पूरी होने में 6-7 महीने लग के बाद गजल मुकम्मल हुई।
इधर जो डूब गया तो मैं उधर निकलूंगा
खिलूंगा धूप की मानिंद जिधर निकलूंगा
मुझे न गाँव गली शहर में ढूंढा करिए
दिलों में ढूंढिए अपने मैं उधर निकलूंगा
क्या आप मुशायरों के मंचों पर जाते हैं? मौजूदा दौर में मुशायरों के मंचों का मेयार गिरा है। शायरी का स्तर गिरा है। इस गिरावट को कैसे देखते हैं?
- जी मुशायरों में मेरी शिरकत रहती है। शायरी का स्तर इसलिए गिरा है क्योंकि शायर का जोर तालियाँ बजवाने पर ज्यादा रहता है। तालियाँ हल्की बातों पर ज्यादा बजती हैं। गहरी बात को समझने वाला मन, दिमाग और चेतना का स्तर भी गहरा होना चाहिए।
आप की पत्नी मालविका जी भी शायरा और गायिका हैं। क्या घर में शायरी और संगीत की जुगलबंदी होती है या कम्पटीशन का भाव रहता है कि कौन किस से बेहतर लिखे और गाए?
- मालविका भी लिखती हैं, गाती हैं। घर में शायरी संगीत का माहौल है। जुगलबंदी तो नहीं होती लेकिन शौक सभी को है। बेटियों को भी गाने का शौक है। बेटियाँ अंग्रेजी गाने गाती हैं लेकिन सुर में गाती हैं और अच्छा गाती हैं।
आज कल एक ट्रेंड ये भी देखा गया है कि लिखने वाले को छपने की बहुत जल्दबाजी रहती है। नया लेखक पढ़ता कम है, लिखने की कोशिश ज्यादा करता है। अपनी किताब जल्द से जल्द छपवा कर नाम के आगे ‘आॅथर’ लिखने की ललक होती है। नए लिखने वालों को क्या मशवरा देना चाहेंगे?
- नई जेनरेशन में बहुत जल्दबाजी है। सब कुछ तुरंत चाहिए। लेखन में भी यही दिखता है। जबकि सृजन परम सत्ता है। सोशल मीडिया ने आप को प्लेटफॉर्म दिया है, ये अच्छी बात है। आप अच्छा लिख रहे हैं तो वो दूर तक जा सकता है। अच्छा लिखने के लिए लिखते रहना चाहिए। आत्ममुग्धता से बचना चाहिए।
हर जिले में राजनैतिक दलों के नेता तरह तरह के दबाव डाल कर अपना काम कराना चाहते हैं। सबसे ज्यादा पॉलिटिकल प्रेशर का सामना आप को किस जिले में करना पड़ा?
- लोकतंत्र में चुने हुए जनप्रतिनिधियों का अधिकार है पब्लिक सर्वेंट के सामने जनता की समस्याओं को लाना। ये सच है कई बार निर्णय लेने में समस्याएं आती हैं। अनावश्यक दखल भी होता है। नेताओं के अपने ईगो होते हैं।
आप उत्तर प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं उद्यमशीलता विभाग में प्रमुख सचिव हैं। काम करने का आप का क्या अप्रोच रहता है जिससे योजना ठीक तरह से जमीन पर उतर सके?
- मेरे विभाग के तहत कळक के कामकाज का बड़ा काम है। 325 सरकारी और निजी क्षेत्र में करीब 3 हजार कळक हैं। कौशल विकास विभाग लाखों लोगों को प्रशिक्षण देता है। रोजगार मेले लगते हैं। मेरा अप्रोच जनता से मिलने, संवाद करने और उनसे फीडबैक लेने वाला रहता है।
दफ़्तर में अपने अधीनस्थों के साथ आप का रवैया और व्यवहार कैसा रहता है? कड़क अधिकारी वाला या नाजुक शायर–दिल इंसान वाला?
- एक शायर और संगीतकार होने के नाते मेरा हृदय उदार है। सती, नाराजगी, अकड़ या कड़कपन मेरे हाव-भाव व्यवहार में नहीं दिखता। अपने साथ काम करने वालों को डरा कर रखने से कभी अच्छा काम नहीं होता।




