पंजाब इस समय असामान्य राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है। राज्य में लंबे समय से जारी नशे की समस्या, प्रशासनिक विफलता के आरोप और जनता में बढ़ता आक्रोश अगले विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले एक साथ सामने आ रहे हैं। ऐसे माहौल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का 20 अक्टूबर को पंजाब का संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण दौरा राज्य सरकार की नशे से जुड़ी मौतों और कानून-व्यवस्था से निपटने की कार्यप्रणाली के साथ-साथ जवाबदेही के व्यापक सवाल पर भी ध्यान केंद्रित कर सकता है।
शाह का मानसा और संगरूर जाने का कार्यक्रम है। दौरे की शुरुआत मानसा से होगी, जहां नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले परमिंदर सिंह झोटा की हत्या जनता के आक्रोश का प्रमुख केंद्र बन गई है। आरोप है कि झोटा ने एक केमिस्ट से कथित तौर पर नशीले पदार्थों की बिक्री को लेकर सवाल किया था, जिसके बाद उस केमिस्ट ने दिनदहाड़े गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इस घटना ने नशे के कारोबार को चुनौती देने वालों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं और राज्य में नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की प्रभावशीलता पर असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
झोटा के परिवार द्वारा पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की अनुमति देने से लगातार इनकार, जो अब कई दिनों से जारी है, उनके गहरे दुख और इस मामले को लेकर व्याप्त अविश्वास को और उजागर करता है। यह गतिरोध अब केवल एक परिवार की न्याय की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह उस व्यापक जनभावना को दर्शाता है कि नशे से जुड़ी त्रासदियों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
नशे से होने वाली मौतें बनीं राजनीतिक टकराव का मुद्दा
नशे का संकट लंबे समय से पंजाब के सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों में से एक रहा है। लगातार सत्ता में आने वाली सरकारों ने नशे के नेटवर्क को खत्म करने, नशीले पदार्थों की आपूर्ति पर रोक लगाने और नशे की लत से जूझ रहे लोगों के पुनर्वास के वादे किए हैं। इसके बावजूद नशे से जुड़ी मौतों की बार-बार सामने आने वाली खबरें इन आश्वासनों पर जनता के भरोसे को कमजोर करती रही हैं।
झोटा की हत्या ने इस संकट को एक अलग और विशेष रूप से चिंताजनक आयाम दिया है। यह मामला केवल नशे की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उन नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते हैं जो कथित नशा तस्करी का विरोध करते हैं। साथ ही, यह भी सवाल है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां ऐसी चुनौतियों से कितनी प्रभावी ढंग से निपट पा रही हैं।
इसलिए शाह के दौरे को केवल एक राजनीतिक यात्रा के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि इसे इस संकेत के तौर पर भी परखा जाएगा कि केंद्र सरकार जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कितनी गंभीर है। विशेष रूप से नशीले पदार्थों की कथित बिक्री से जुड़े मामलों में पुलिस और नागरिक प्रशासन की भूमिका पर करीबी नजर रहेगी।
कई दबाव समूहों ने पंजाब में काला दिवस मनाने की चेतावनी दी है। यह इस संभावना को दर्शाता है कि नशे से जुड़ी मौतों को लेकर उपजा आक्रोश व्यापक विरोध आंदोलन का रूप ले सकता है। यदि ये समूह बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद करने में सफल होते हैं, तो यह मुद्दा सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
मान की गैरमौजूदगी ने बढ़ाया दौरे का राजनीतिक महत्व
शाह के दौरे का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान फिलहाल फ्रांस के दौरे पर हैं। ऐसे समय में, जब जनता की चिंता और आक्रोश बढ़ा हुआ है, राज्य के मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी इस दौरे की राजनीतिक संवेदनशीलता को और बढ़ा सकती है। हालांकि, इसके वास्तविक राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि राज्य प्रशासन उभरती स्थिति से किस तरह निपटता है।
भाजपा के लिए शाह की मौजूदगी आम आदमी पार्टी सरकार के कानून-व्यवस्था संबंधी रिकॉर्ड और नशामुक्त पंजाब का वादा पूरा करने की उसकी क्षमता पर सवाल उठाने का अवसर है। वहीं, राज्य सरकार के सामने यह साबित करने की चुनौती होगी कि प्रशासन जनता की शिकायतों पर निर्णायक कार्रवाई कर रहा है और इस संकट को केवल राजनीतिक टकराव के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।
केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में शाह के पद और कद से इस दौरे का महत्व और बढ़ जाता है। उनका कोई भी सार्वजनिक बयान, प्रभावित परिवारों के साथ मुलाकात या वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत राज्य सरकार के साथ-साथ पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के लिए भी संदेश दे सकती है। इस लिहाज से यह दौरा इस बात की परीक्षा बन सकता है कि राजनीतिक स्तर पर मिला ध्यान वास्तविक और मापने योग्य कार्रवाई में बदलता है या नहीं।
भ्रष्टाचार के आरोपों ने जोड़ा एक और राजनीतिक आयाम
राजनीतिक परिदृश्य केवल नशे के संकट तक सीमित नहीं है। कथित भ्रष्टाचार के मामलों के सिलसिले में पंजाब सरकार के कार्यालयों, जिनमें पंजाब शहरी विकास प्राधिकरण (पुडा) और ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (गमाडा) शामिल हैं, पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कथित तलाशी की कार्रवाई ने राज्य सरकार पर दबाव बढ़ाया है। भ्रष्टाचार के एक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा मुख्यमंत्री के एक विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) को तलब किए जाने से भी राजनीतिक टकराव और तेज हुआ है।
ये घटनाक्रम झोटा की हत्या से जुड़ी परिस्थितियों से अलग हैं और इनका मूल्यांकन अपने-अपने तथ्यों और आधार पर किया जाना चाहिए। फिर भी, इन सभी घटनाओं को एक साथ देखें तो ऐसा व्यापक माहौल बनता दिखाई देता है, जिसमें शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल राजनीतिक बहस में प्रमुखता से उठ सकते हैं।
भाजपा शाह के दौरे का इस्तेमाल यह रेखांकित करने के लिए कर सकती है कि आम आदमी पार्टी सरकार कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गृह मंत्री के दौरे को चुनावों से पहले की राजनीतिक रूप से प्रेरित दखलअंदाजी के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है।
हालांकि, इन दोनों में से किस राजनीतिक दलील को जनता का समर्थन मिलता है, यह काफी हद तक उपलब्ध साक्ष्यों, सरकार की प्रतिक्रिया और आगे सामने आने वाले नतीजों पर निर्भर करेगा।
पंजाब की चिंता या राजनीतिक रणनीति?
शाह के दौरे से जुड़ा सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इससे उन मुद्दों पर लगातार और ठोस हस्तक्षेप देखने को मिलेगा, जिन्होंने जनता को परेशान कर रखा है, या फिर यह विधानसभा चुनावों से पहले मुख्य रूप से एक राजनीतिक संदेश बनकर रह जाएगा।
प्रभावी कार्रवाई के लिए केवल चिंता जताना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए नशे से जुड़ी संदिग्ध मौतों की विश्वसनीय जांच, जहां लापरवाही या गलत काम साबित हो वहां जवाबदेही तय करना, नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई और शिकायत करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
झोटा के मामले में तत्काल प्राथमिकता ऐसा समाधान निकालने की होनी चाहिए, जिससे परिवार की चिंताओं का उचित समाधान हो और साथ ही जांच कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़े।
केंद्र सरकार के पास यह स्पष्ट करने का भी अवसर है कि संगठित नशा नेटवर्क को खत्म करने, उनके वित्तीय संबंधों का पता लगाने और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की क्षमता मजबूत करने के लिए वह पंजाब को किस तरह की विशिष्ट सहायता या समन्वय उपलब्ध कराने को तैयार है।
इसके साथ ही, पंजाब के भीतर पुलिस व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के रोजमर्रा के प्रशासन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की ही बनी रहती है।
दौरे के राजनीतिक महत्व के कारण अलग-अलग मामलों में तथ्यों को स्थापित करने की जरूरत नजरअंदाज नहीं होनी चाहिए। इसी तरह, जहां साक्ष्य गलत काम या लापरवाही की पुष्टि करते हों, वहां जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया को केवल राजनीतिक मंशा के आरोपों के सहारे टाला भी नहीं जाना चाहिए।
असली परीक्षा दौरे के बाद होगी
अमित शाह का 20 अक्टूबर का दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब नशे को लेकर जनता का आक्रोश, नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक कार्यकर्ता की हत्या और भ्रष्टाचार के आरोप मिलकर पंजाब में शासन व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस का रूप ले चुके हैं। दबाव समूहों की ओर से विरोध प्रदर्शन की चेतावनी और नजदीक आते विधानसभा चुनावों के बीच इस दौरे पर उनके निर्धारित कार्यक्रम से कहीं अधिक व्यापक स्तर पर नजर रखी जाएगी।
अंततः इस दौरे का महत्व उससे पैदा होने वाली राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाली कार्रवाई से तय होगा। क्या इससे नशे के कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएंगे? क्या कथित प्रशासनिक लापरवाही के मामलों में जवाबदेही तय होगी? क्या प्रभावित परिवारों की शिकायतों का विश्वसनीय समाधान निकलेगा? या फिर यह दौरा भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच तेज होते राजनीतिक संघर्ष का एक और अध्याय बनकर रह जाएगा?
पंजाब की जनता, विशेषकर उन परिवारों के लिए जिन्होंने नशे के कारण अपने प्रियजनों को खोया है, यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। उन्हें एक-दूसरे पर आरोप लगाने वाले राजनीतिक दावों के बजाय जवाब, न्याय और ठोस कार्रवाई चाहिए।
शाह का दौरा केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है। लेकिन यह संकेत निरंतर कार्रवाई में बदलता है या फिर इसे मुख्य रूप से चुनावी मौसम में किए गए राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में याद किया जाता है, यह आने वाले दिनों और हफ्तों में स्पष्ट होगा।




