नई दिल्ली | तहलका न्यूज | स्नेहलता
नई दिल्ली। नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना, व्रत और भक्ति के बाद आज, 19 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि की महानवमी मनाई जा रही है। घरों से लेकर मंदिरों तक मां के जयकारे गूंज रहे हैं। कहीं हवन की तैयारी है, तो कहीं छोटी-छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा निभाई जा रही है। इस बार खास बात यह है कि महाअष्टमी और महानवमी दोनों का संयोग आज बन रहा है। ऐसे में श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा और कन्या पूजन कर रहे हैं।
मां सिद्धिदात्री की पूजा से जुड़ी है खास मान्यता
नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सिद्धि, ज्ञान और विवेक का आशीर्वाद देती हैं। देवी को कमल पर विराजमान और चार भुजाओं वाली माता के रूप में दर्शाया जाता है।
मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से जीवन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति आती है। इस दिन श्रद्धालु फूल, फल, धूप-दीप और मिठाई अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में की गई साधना का समापन भी विशेष पूजा, हवन और आरती के साथ किया जाता है।
आज अष्टमी और नवमी दोनों का संयोग क्यों?
इस बार तिथियों की गणना के कारण 19 अक्टूबर को महाअष्टमी और महानवमी दोनों मनाई जा रही हैं। दिल्ली के पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि आज सुबह लगभग 10:51 बजे तक रही, इसके बाद नवमी तिथि शुरू हो गई। नवमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर तक रहने की गणना है।
इसी वजह से अष्टमी की परंपरा मानने वाले श्रद्धालु सुबह कन्या पूजन कर रहे हैं, जबकि नवमी के अनुसार पूजा करने वाले भक्त अपनी परंपरा के मुताबिक अनुष्ठान कर रहे हैं। पूजा के समय में स्थान और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।
कन्या पूजन में हलवा-पूरी और काले चने का क्यों है महत्व?
महानवमी और महाअष्टमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इस परंपरा में छोटी बच्चियों को मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है। कई परिवार नौ कन्याओं को आमंत्रित करते हैं और उनके साथ एक बालक को भी भोजन कराते हैं, जिसे कुछ परंपराओं में भैरव का स्वरूप माना जाता है।
कन्याओं के पैर धोकर, माथे पर तिलक लगाकर और उन्हें आसन पर बैठाकर भोजन कराया जाता है। हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद तैयार किया जाता है। भोजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा, फल या उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
इस परंपरा का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह बेटियों के सम्मान और नारी शक्ति के महत्व को भी याद दिलाती है।
हवन और व्रत का पारण, कैसे पूरी होती है नौ दिन की साधना?
नवरात्रि के अंतिम चरण में कई श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ, हवन और आरती करते हैं। इसके बाद कन्या पूजन कर व्रत खोलने की परंपरा निभाई जाती है। कुछ परिवार नवमी को ही पारण करते हैं, जबकि कुछ लोग दशमी के दिन व्रत खोलते हैं। यह परिवार की धार्मिक परंपरा और पूजा-विधि पर निर्भर करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हवन में आहुति देकर मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। नौ दिनों तक उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह दिन साधना के समापन और नई शुरुआत का प्रतीक है।
मां की पूजा के साथ बेटियों के सम्मान का संकल्प भी जरूरी
नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। मां को शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। कन्या पूजन इसी शक्ति को बालिकाओं के रूप में सम्मान देने की परंपरा है।
आज जब देश में बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और समान अवसरों पर चर्चा होती है, तब इस परंपरा का सामाजिक संदेश भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मंदिरों में देवी की पूजा के साथ घर, स्कूल और समाज में भी बेटियों को सम्मान और सुरक्षित माहौल देना जरूरी है।




