
तहलका ब्यूरो।
चेन्नई। तमिलनाडु की सियासत में बुधवार का सूरज एक ऐसे युग परिवर्तन का गवाह बना, जिसने दशकों पुराने गठबंधन के किलों को ढहा दिया है। सुपरस्टार थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) को समर्थन देने के कांग्रेस के फैसले ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
यह केवल एक सरकार बनाने का गणित नहीं है, बल्कि द्रमुक (DMK) के साथ कांग्रेस के 22 साल पुराने प्रगाढ़ और ऐतिहासिक संबंधों का विधिवत अंत है। 234 सदस्यीय सदन में 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी टीवीके के लिए कांग्रेस के 5 विधायकों का साथ वह ‘जादुई संजीवनी’ है, जिसने विजय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का रास्ता साफ कर दिया है।
कांग्रेस ने यह रणनीतिक जोखिम विजय द्वारा मल्लिकार्जुन खड़गे को लिखे पत्र और रात भर चले गहन मंथन के बाद उठाया है। हालांकि, इस ‘हाथ’ की कीमत द्रमुक के साथ कड़वाहट के रूप में चुकानी पड़ी है, जिसने इसे ‘पीठ में छूरा घोंपना’ करार दिया है। विश्लेषण बताता है कि राहुल गांधी और विजय की यह जुगलबंदी केवल तात्कालिक नहीं, बल्कि भविष्य के निकाय और लोकसभा चुनावों के लिए एक दूरगामी ब्लूप्रिंट है। कांग्रेस ने समर्थन के बदले कैबिनेट में हिस्सेदारी और बोर्डों की अध्यक्षता जैसे कड़े सौदे किए हैं, लेकिन सबसे बड़ी शर्त ‘सांप्रदायिक ताकतों’ यानी भाजपा को सत्ता की परिधि से बाहर रखने की है।
सत्यमूर्ति भवन में गूंजते पटाखों और कार्यकर्ताओं के जश्न के बीच यह स्पष्ट है कि तमिलनाडु अब करुणानिधि और जयललिता की विरासत वाले द्विध्रुवीय संघर्ष से निकलकर एक नए ‘त्रिकोणीय युग’ में प्रवेश कर चुका है। कांग्रेस का यह दांव पेरियार के सामाजिक न्याय और कामराज के स्वर्णिम काल को पुनर्जीवित करने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है।
वामपंथियों और अन्य सहयोगियों को भी साथ लाने का आश्वासन देकर कांग्रेस ने न केवल विजय का राजतिलक सुनिश्चित किया है, बल्कि खुद को एक बार फिर दक्षिण के निर्णायक ‘किंगमेकर’ के रूप में स्थापित कर लिया है।



