तहलका डेस्क।
चंडीगढ़। पंजाब में बीते दस दिनों के भीतर हुए सिलसिलेवार धमाकों ने राज्य की सुरक्षा और सियासत में जबरदस्त उबाल पैदा कर दिया है। जालंधर में बीएसएफ मुख्यालय और अमृतसर में सैन्य छावनी जैसे संवेदनशील प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर डाल दिया है।
हालांकि इन विस्फोटों में कोई जानमाल का नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की बरसी पर हुए ये धमाके और खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (KLF) द्वारा इसकी जिम्मेदारी लेना एक गहरे संकट की ओर इशारा कर रहा है। पंजाब पुलिस के डीजीपी गौरव यादव ने इन घटनाओं के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सीमा पार बैठे तत्वों के सक्रिय स्लीपर सेल्स की संलिप्तता की आशंका जताई है, जो पंजाब को एक बार फिर अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं।
इन धमाकों पर मचे सियासी घमासान के बीच मुख्यमंत्री भगवंत मान ने एक बेहद विवादित रुख अपनाते हुए इन घटनाओं को ‘मामूली’ करार दिया और इसका सीधा आरोप भारतीय जनता पार्टी पर मढ़ दिया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि ये धमाके आगामी विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी की तैयारी का हिस्सा हैं और वह पंजाब में डर का माहौल बनाकर वोट हासिल करने की कोशिश कर रही है। मान ने तर्क दिया कि बीजेपी को उन राज्यों में अशांति फैलाने की आदत है जहां वह चुनाव लड़ रही होती है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए इसे राज्य के खुफिया तंत्र की विफलता कहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमावर्ती राज्य में सैन्य दीवारों तक बारूद का पहुंचना एक गंभीर सुरक्षा चूक है, जिसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तकनीक और बेहतर समन्वय से हल करने की जरूरत है। पंजाब इस समय न केवल आंतरिक अपराध से जूझ रहा है, बल्कि पाकिस्तान के खिलाफ एक ‘परोक्ष युद्ध’ की अग्रिम पंक्ति पर खड़ा है, जहां जरा सी लापरवाही भारी पड़ सकती है।




