कॉलेजियम व्यवस्था पर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के सवाल, बोले- वजह बताए बिना नियुक्ति से पारदर्शिता प्रभावित होती है

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों में पारदर्शिता की कमी पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि हाल के समय में कॉलेजियम की सिफारिशों में कारण (Reasons) देना लगभग बंद हो गया है। उन्होंने पूछा कि क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने जैसा नहीं है।

नई दिल्ली में विदि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से आयोजित Judicial Transparency Index रिपोर्ट के विमोचन कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने कहा कि पहले कॉलेजियम की सिफारिशों में प्रत्येक नाम के साथ संक्षिप्त कारण दर्ज किए जाते थे, लेकिन हाल की तीन कॉलेजियम बैठकों के प्रस्तावों में किसी भी नियुक्ति के पीछे कोई कारण नहीं बताया गया। उनके मुताबिक, भले ही पहले दिए गए कारण संक्षिप्त या औपचारिक होते थे, लेकिन कम से कम निर्णय का आधार सामने आता था।

उन्होंने कहा कि बिना कारण बताए नियुक्तियां करने से संस्था योग्य न्यायाधीशों के साथ भी अन्याय करती है, क्योंकि उत्कृष्ट कार्य करने वाले न्यायाधीशों की योग्यता सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ पाती। साथ ही इससे ऐसे लोगों के न्यायपालिका में आने की भी गुंजाइश बन जाती है, जो बाद में संविधान के मूल्यों के विपरीत या आपत्तिजनक टिप्पणियां करें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भविष्य में ऐसे लोगों की नियुक्ति रोकने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में चर्चा और कारण दोनों सार्वजनिक होने चाहिए। हालांकि उन्होंने किसी न्यायाधीश का नाम नहीं लिया।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके संवैधानिक न्यायालयों में कौन न्यायाधीश नियुक्त हो रहे हैं और किन आधारों पर उनकी सिफारिश की गई है। उन्होंने सवाल किया कि यदि इन फैसलों पर तथ्यों के आधार पर सार्वजनिक बहस हो, तो इससे न्यायपालिका को नुकसान कैसे हो सकता है। उनके अनुसार, पारदर्शिता से न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनविश्वास ही मजबूत होगा।

उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल के मामले का भी उल्लेख किया और कहा कि उस समय कॉलेजियम ने अपनी सिफारिश के समर्थन में विस्तृत कारण दिए थे, जो उन्हें तार्किक और संतोषजनक लगे। उन्होंने यह भी कहा कि उस सिफारिश पर वर्षों बाद भी निर्णय लंबित है, हालांकि वह अलग बहस का विषय है।

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने न्यायिक पारदर्शिता के दूसरे पहलुओं पर भी बात की। उन्होंने अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग को पिछले दशक का सबसे बड़ा पारदर्शिता सुधार बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अदालत में हुई मौखिक टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर सनसनीखेज तरीके से पेश करना न्यायाधीशों, वकीलों और पक्षकारों—सभी के लिए नुकसानदेह है। इसलिए पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।