सोन का समझौता

परिदृश्य/ झारखंड – बिहार

वर्ष 2000 की एक ठंडी नवंबरी शाम, जब झारखंड ने बिहार से अपनी अलग पहचान बनाई, तो दोनों के बीच बंटवारे में घर,

जमीन, खनिज और नौकरियां बंटीं  लेकिन एक चीज अधूरी रह गई: सोन नदी का पानी। अगले 25 साल तक यही अधूरापन दो भाई राज्यों के बीच की सबसे लंबी राजनीतिक खाई बना रहा था। फिर आया 31 अगस्त 2026 और एक दस्तखत ने उस खाई को भर दिया।

नई दिल्ली में उस शाम के मंच पर तीन कुर्सियां थीं। एक पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, दूसरी पर झारखंड के हेमंत सोरेन और बीच में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह। दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शाह की मौजूदगी में सोन नदी के जल बंटवारे का औपचारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षरों में जितना वक्त लगा, उससे कहीं ज्यादा वक्त उस इंतजार में लगा था जो दक्षिण बिहार के किसान और पलामू-गढ़वा के पठारी इलाकों ने किया था।

नदी का हिसाब–किताब

कहानी की जड़ें 1973 में हैं, जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच सोन के 14.25 एमएएफ जल का बंटवारा तय हुआ था  मध्य प्रदेश को 5.25, उत्तर प्रदेश को 1.25 और अविभाजित बिहार को 7.75 एमएएफ । मगर 2000 में झारखंड बनते ही यह 7.75 एमएएफ एक ऐसी धरोहर बन गया जिसका कोई उत्तराधिकारी तय नहीं था। बिहार कहता रहा  यह हिस्सा मेरा है, इतिहास गवाह है। झारखंड कहता रहा  नदी मेरी जमीन से निकलती है, मेरा हक भी बनता है। बीच में एक पीढ़ी बड़ी हो गई।

अब यह हिसाब सुलझ गया है : बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ मिलेंगे। फरवरी 2026 में बिहार के जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी विधानसभा में कह चुके थे कि सैद्धांतिक समझौता हो चुका है। अब वह सिद्धांत कागज पर उतर आया।

पानी से जुड़ी जिंदगी

मंत्रियों के भाषणों के पीछे करोड़ों की रोजमर्रा है। समझौते से बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जिलों के लाखों किसानों को सिंचाई का पानी मिलेगा और ग्रामीण आबादी को पेयजल। झारखंड की तरफ पलामू और गढ़वा जैसे सूखा-ग्रस्त जिलों को नदी पर पहली बार अपना गारंटीड हक मिला है  वह नदी जो सदियों से उनके सामने से बहती रही, मगर उनके खेतों तक कभी नहीं पहुंची। इस दस्तखत ने दशकों से ठप इंद्रपुरी जलाशय परियोजना का रास्ता भी खोल दिया है  रोहतास की वह सिंचाई-सपना जो दो राज्यों के झगड़े की भेंट चढ़ती रही ।

दस्तखत के बाद की सियासत

भारत में कोई भी जल-समझौता सिर्फ जल का नहीं होता। पटना में क्रेडिट की होड़ शुरू हो चुकी है  उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी ने आभार अमित शाह और नीतीश कुमार का जताया, न कि अपने ही सीएम सम्राट चौधरी का। अमित शाह के लिए यह इस साल राज्यों के बीच चौथा जल-बंटवारा समझौता है  केंद्र सरकार इसे सहकारी ाीीि१ं’्र२े की मिसाल के तौर पर पेश कर रही है। इसकी नींव जुलाई 2025 में रांची में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में पड़ थी, जहां बिहार-झारखंड-बंगाल के जल विवादों पर रास्ते खुले थे।

अंत नहीं, शुरूआत

गंगा की सबसे लंबी दक्षिणी सहायक नदियों में शुमार सोन अब सिर्फ बहेगी नहीं, बह-बांटेगी भी। विवाद 25 साल चला; उसे खत्म होने में महज एक शाम लगी। मगर असली कहानी अब शुरू होती है  नहरों के निर्माण की, जलाशयों के भरने की और उन खेतों की जो सालों से हरे होने का इंतजार कर रहे थे। सोन आखिरकार अपने दोनों बच्चों के लिए बहती है।