तहलका स्टिंग आॅपरेशन में खुलासा
स्नेहलता
राजधानी दिल्ली का मानसिक रोग अस्पताल (इबहास)। हमारी टीम सुबह करीब
आठ बजे इबहास पहुंची। समय बीतने के साथ पता चलता गया कि अस्पताल का पूरा सिस्टम ही बीमार है। यहां के ड्रग डी-एडिक्शन वार्ड में भर्ती एक मरीज ने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। गंभीर इमरजेंसी अलर्ट (कोल्ड ब्लू) जारी हुआ। न्यूरो टीम मौके पर पहुंची। मरीज की हालत इतनी गंभीर थी कि उसे कभी भी वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ सकती थी। अस्पताल की सबसे प्रमुख जिम्मेदारी उन मरीजों की देखभाल है जिनकी मानसिक ठीक नहीं। जिस अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों की निगरानी प्राथमिकता है वहां एक मरीज खुद को नुकसान पहुंचाने की स्थिति तक पहुंच गया।
इबहास ऐसा सरकारी अस्पताल है जहां देश भर से मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझते मरीज इलाज के लिए आते हैं। यहां विशेषज्ञ डॉक्टर हैं। साइकियाट्री, न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी और क्लिनिकल साइकोलॉजी जैसे विभाग हैं। रोज़ हजारों मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। दिल्ली सरकार हर साल करोड़ों रुपये का ग्रांट-इन-एड देती है। सिर्फ वित्त वर्ष 2025-26 में आईएचबीएएस के लिए करीब 159 करोड़ रुपये का ग्रांट-इन-एड रखा गया। लेकिन स्थिति क्या है? मरीजों को ज़रूरी जांच के लिए दूसरे अस्पताल भेजा जाता है। मरीज घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। अस्पताल की लाइब्रेरी में नर्सिंग स्टाफ के लिए नई किताबें तक नहीं हैं। कैमरे पर कैद हर दृश्य क्या कहता है चलिए जानते हैं।
दृश्य एक
इबहास का गेट नंबर एक। यहां मरीजों की लंबी कतार के बीच अपनी बारी का इंतजार करती भीड़। एंट्री के लिए आधार कार्ड ज़रूरी बताया गया। काफी देर लाइन में खड़े रहने के बाद आखिरकार हमारी बारी आती है। इसी इंतजार के दौरान हमारी टीम ने आसपास मौजूद मरीजों से बातचीत शुरू की। एक बात बार-बार सामने आई—कई मरीज सुबह ही नहीं, बल्कि रात से अस्पताल पहुंच जाते हैं, ताकि सुबह उनकी बारी जल्दी आ सके। कुछ मरीजों ने बताया कि ओपीडी में डॉक्टर करीब 9 बजे से पहुंचते हैं।
दृश्य 2
अब हमारी टीम ने अंदर जाकर व्यवस्था को मरीज की नज़र से देखा। हम एक मरीज बनकर अस्पताल के अंदर पहुंचे। डॉक्टर को हमने बीमार होने का बहाना बनाया और सीटी स्कैन कराने का निवेदन किया। हमें बताया गया कि सीटी स्कैन के लिए दूसरे अस्पताल जाना पड़ेगा। मतलब अस्पताल में सीटी स्कैन मशीन नहीं है? इहबास जैसे न्यूरोसाइंस और मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संस्थान में मरीजों को सीटी स्कैन के लिए बाहर क्यों जाना पड़ता है। पड़ताल करते हमारी टीम अस्पताल के उस हिस्से में पहुंची जहां सीटी स्कैन विभाग है। इमरजेंसी वार्ड के पास रेडियोलॉजी विभाग में सीटी स्कैन विभाग में दरवाजे पर ताला लटका मिला। हमने अपने छुपे कैमरे से वहां की स्थिति रिकॉर्ड की। स्टाफ से सीटी स्कैन सुविधा के बारे में पूछा। बताया गया कि चार साल से यहां सीटी स्कैन नहीं हो रहा है। मजबूरन मरीजों को राजीव गांधी अस्पताल भेजा जाता है।
आॅफ कैमरा अस्पताल के एक कमार्चारी कहता है कि यहां पिछले 13 साल से कोई सीटी स्कैन मशीन नहीं थी। अगर किसी मरीज को इमरजेंसी में सीटी स्कैन एमआरआई की ज़रूरत पड़े तो उसे हजारों रूपए खर्च कर बाहर से ही कराना पड़ेगा। राहत की बात है बीते अगस्त में सीटी स्कैन मशीन आ गई है पर अभी सुविधा शुरू नहीं हुई।
दृश्य तीन
अस्पताल के लाइब्रेरी सेक्शन में सूत्रों से जानकारी मिली कि नर्सिंग स्टाफ के लिए ज़रूरी किताबें नहीं हैं। लाइब्रेरी के स्टाफ ने बताया कि यहां तो कई सालों से नई किताबें आई ही नहीं हैं। स्टाफ का कहना है ह्लचार साल पहले किताबें आई थीं उसके बाद नई किताबें नहीं आईं।ह्व मतलब नर्सिंग स्टाफ के लिए अपडेटेड मेडिकल लिटरेचर उपलब्ध ही नहीं है।
दृश्य चार
ओपीडी में सुबह से ही मरीजों की भीड़ है। कई मरीज जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। मरीजों से बातचीत में मिलीजुली प्रतिक्रिया है। वह डॉक्टरों के इलाज से संतुष्ट तो हैं लेकिन कुव्यवस्था ने उनके इलाज प्रक्रिया को नरक बना दी है।
दृश्य पांच शौचालय
अस्पताल के एडमिन विभाग की स्थिति ही बेहद खराब है। यहां शौचालय तो है पर पानी और साबुन नदारद। बाहर वाटर कूलर कम क्यों रहे। मशीन है लेकिन पानी नहीं।
दृश्य छह
गंभीर बीमारी से जूझ रहा एक मरीज स्ट्रेचर पर काफी देर पड़ा रहा लेकिन किसी ने उसकी सुध नहीं ली। जिम्मेदारी किसकी? सवाल का उत्तर नहीं मिला, न ही किसी पर इसकी जिम्मेदारी तय हुई। सवाल लेकर हम पहुंचे अस्पताल के निदेशक प्रोफेसर डॉक्टर राजेंद्र धमीजा के आॅफ़िस में। निदेशक की निजी सचिव ने इंतजार करने को कहा। हमारी टीम को निदेशक से मिलने के लिए 40 मिनट इंतजार कराया गया। इसके बाद पूछा गया कि सवाल क्या पूछेंगे? हमने साफ कहा—हम आईएचबीएएस की व्यवस्थाओं पर सवाल पूछना चाहते हैं। इसके बाद इंतजार करते तीन घंटे बीत गए। आखिरकार निदेशक साहब अपने कमरे से निकलते हुए प्रकट हुए। हमने सवाल पूछा अस्तपाल की इस स्थिति के बारे में। निदेशक साहब का दो टूक उत्तर आया ह्लवह अथॉराइज्ड नहीं हैं पीआरओ से बात करेंह्व। जब मीडिया से बात करने के लिए निदेशक अथॉराइज्ड नहीं हैं तो घंटों इंतजार क्यूं ? खैर, हम जा पहुंचे पीआरओ के पास। लेकिन उनके पास एक फोन आया और वह भी बिना उत्तर दिए चलती बनी। खैर निदेशक कुछ न बोले लेकिन हमने कहानी की और परत खोली। पता चला कि सितंबर 2025 में इहबास में भर्ती एक महिला ने अस्पताल के वाशरूम में बच्चे को जन्म दिया और नवजात की मौत हो गई। मामला इतना गंभीर था कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी एनएचआरसी ने खुद संज्ञान लिया। 23 सितंबर 2025 को जारी एनएचआरसी की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक महिला को 7 सितंबर को कोर्ट आॅर्डर के तहत इहबास में भर्ती कराया गया था। एनएचआरसी ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट माँगी थी। एनएचआरसी ने मामले को रिपोर्ट किए गए आरोपों के आधार पर लिया और इसे प्रथम दृष्टया गंभीर मानवाधिकार मुद्दा माना था।
इबहास की इस दुर्गति को बताना ज़रूरी इसलिए है क्योंकि यह कोई सामान्य अस्पताल नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल केयर का महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान है। अस्पताल की आधिकारिक जानकारी में साइकियाट्री, न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, क्लिनिकल साइकोलॉजी और कई एलाइड सर्विस उपलब्ध हैं। अस्पताल के आधिकारिक डाटा में 317 बेड की वर्तमान संख्या भी दर्ज है और अगस्त 2026 की बेड-स्टेटस अपडेट में कुल 317 बेड बताए गए हैं। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 2,500 मरीज रोज़ ओपीडी में पहुंचते थे और मरीज सिर्फ दिल्ली से नहीं बल्कि आसपास के उत्तर भारतीय राज्यों से भी आते हैं। यानी इहबास पर भरोसा करने वाली आबादी बहुत बड़ी है। इसीलिए यहां सवाल भी बड़ा होना चाहिए। आखिरी सवाल—सरकार पैसा देती है। अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर हैं। मरीजों की संख्या हजारों में है। इमारतें हैं। विभाग हैं। मशीनों की खरीद के लिए प्रक्रिया है।फिर भी मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों संघर्ष करना पड़ता है।




