
आखिरकार सच सामने आ ही गया। सरकार भले ही किसानों के नाम पर आंसू बहाती हो और उनकी भलाई के लिए कोई न कोई योजना लाने के दावे करती हो, लेकिन आंकड़े तो पक्के होते हैं। और ये आंकड़े खुद सरकार ने ही जारी किए हैं।
वित्त मंत्रालय ने बताया कि पिछले 12 सालों (2014-15 से 2025-26) में बैंकों ने कॉरपोरेट और सर्विस सेक्टर की कंपनियों का लगभग 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया (यानी माफ कर दिया)। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने इस 12 साल की अवधि में किसानों का 1 पैसे का कर्ज माफ नहीं किया।
एक चौंकाने वाले खुलासे में सरकारी आंकड़ों से यह भी पता चला कि जहां 2014-15 में कृषि क्षेत्र को 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया था, वहीं उसी साल कॉरपोरेट और सर्विस सेक्टर की कंपनियों को 30 लाख करोड़ रुपये का कर्ज मिला। यह सिलसिला साल-दर-साल जारी रहा। यहां तक कि 2025-26 में भी कृषि क्षेत्र को 29.99 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया और कॉरपोरेट सेक्टर को 69 लाख करोड़ रुपये का कर्ज मिला।
सरकार ने राज्यसभा में माना कि ‘54% आबादी मुख्य रूप से कृषि गतिविधियों से अपनी आजीविका चलाती है।’ फिर भी कृषि क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार किया गया। ये आंकड़े सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 7 अगस्त, 2026 को राज्यसभा में पेश किए।
सरकार ने बताया कि मुश्किल में फंसे कर्जदारों को राहत देने के लिए, फइक ने ‘स्ट्रेस्ड एसेट्स (तनावग्रस्त संपत्तियों) के समाधान पर मास्टर डायरेक्शन, 2025’ जारी किया है (जो 28 नवंबर 2025 को जारी हुआ और 1 जुलाई 2026 को अपडेट किया गया)। यह निर्देश कर्ज देने वालों को यह अधिकार देता है कि वे अपने बोर्ड द्वारा मंजूर नीतियों और रेगुलेटरी गाइडलाइंस के आधार पर तनावग्रस्त कर्जदारों की वित्तीय रीस्ट्रक्चरिंग (पुनर्गठन) कर सकें।
किसानों और कॉरपोरेट्स को दिए गए कर्ज (राशि करोड़ रुपये में)
साल कृषि कॉरपोरेट
2014-15 8,45,727 30,64,670
2018-19 12,56,830 39,15,874
2024-25 28,64,870 63,19,057
2025-26 29,99,692 69,21,734
राघव चड्ढा की घर वापसी

पंजाब की वोटर लिस्ट से राघव चड्ढा का नाम हटने से राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया, जिसमें चड्ढा और भाजपा ने पंजाब सरकार पर निशाना साधा। हालांकि,तकनीकी तौर पर यह प्रक्रिया चुनाव आयोग चलाता है, जिसके पास योग्यता की शर्तें पूरी होने पर नाम बनाए रखने या उसे वापस जोड़ने का अधिकार है। यह बात इसलिए अहम है क्योंकि चड्ढा पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं और वहां रजिस्टर्ड वोटर भी रह चुके हैं। नाम हटने के बाद, उन्होंने पंजाब में दोबारा नाम जुड़वाने के बजाय दिल्ली में वोटर के तौर पर रजिस्टर कराने का फैसला किया। दिलचस्प सवाल यह है कि चड्ढा ने दिल्ली को क्यों चुना? आखिर चड्ढा ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत दिल्ली से ही की थी और वे राजेंद्र नगर सीट से विधायक भी रह चुके हैं। कुछ समय तक उन्हें पंजाब में आप के एक अहम गैर-सिख चेहरे के तौर पर भी पेश किया जा रहा था और कयास लगाए जा रहे थे कि वे अगले विधानसभा चुनाव में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद, चड्ढा को दिल्ली में अपनी भूमिका तलाशनी पड़ी। एकमात्र समस्या यह है कि दिल्ली में भाजपा के पास नेताओं की कोई कमी नहीं है, सिवाय इसके कि उन्हें कोई बड़ी भूमिका मिले।
महाराष्ट्र से आया तीसरा योद्धा
दिल्ली का इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि यहां अक्सर उन आंदोलनों से हलचल मचती है जिनकी शुरूआत सैकड़ों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में होती है। सबसे पहले 18वीं सदी में मराठा सेनाएं मुगल राजधानी की ओर बढ़ी थीं। सदियों बाद, अन्ना हजारे ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के साथ दिल्ली आए, जिससे ऐसी राजनीतिक उथल-पुथल मची जिसने आखिरकार देश की चुनावी तस्वीर ही बदल दी। इसी आंदोलन से निकली पार्टी, अअढ, अभी तक राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति में कोई खास छाप नहीं छोड़ पाई है।

अब, एक ‘तीसरा हमला’ हो रहा है। मीम्स और व्यंग्यात्मक पोस्ट में युवा एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके को दिल्ली को हिलाने वाला महाराष्ट्र का नया चेहरा बताया जा रहा है। उनकी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (उखढ) ने परीक्षा घोटालों को लेकर 37 दिनों तक आंदोलन चलाया था। इस विरोध प्रदर्शन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा, जिससे इस नए-नवेले आंदोलन को एक ऐसी प्रतीकात्मक जीत मिली जिसकी उम्मीद बहुत कम लोगों को थी।
हालांकि, यह तुलना ऐतिहासिक सच्चाई से ज्यादा इंटरनेट का मजाक है। दिपके न तो दिल्ली की ओर कोई सेना लेकर आ रहे हैं और न ही उन्होंने राजनीतिक सत्ता के गलियारों पर कब्जा करने की कोई योजना बनाई है। उखढ खुद को मुद्दों पर आधारित नागरिकों का आंदोलन बताती है, जो सरकारों को मुश्किल सवालों के जवाब देने के लिए मजबूर करने के वास्ते व्यंग्य, सोशल मीडिया और लोगों को सड़कों पर उतारने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करती है।
यहां तक कि दिपके का यह बार-बार कहा जाने वाला बयान कि ‘बड़े-बड़े सिंहासन हिलेंगे’, किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का ऐलान नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था को दी गई चेतावनी है। फिर भी, राजनीति हर सफल आंदोलन की परीक्षा लेती है। एक मंत्री को पद छोड़ने पर मजबूर करने के बाद, दिपके चुपचाप महाराष्ट्र लौट गए थे। अब उन्होंने उएउ ज्ञानेंद्र कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए ‘जंतर-मंतर 2.0’ शुरू किया है। साथ ही, वे राजनीतिक दलों से कह रहे हैं कि अगर उन्हें लगता है कि सिस्टम में धांधली होती है, तो उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने देशव्यापी अभियान शुरू कर दिए हैं। महाराष्ट्र और असम में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारें उखढ को कोई रियायत नहीं दे रही हैं और उसके वॉलंटियर्स पर शिकंजा कस रही हैं। लेकिन मुंबई में उखढ के विरोध प्रदर्शन असली हैं। दिल्ली अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या इतिहास एक बार फिर किसी आंदोलनकारी को राजनीतिक गुमनामी में धकेल देगा या फिर दिल्ली के मामले में इतिहास की धारा बदल जाएगी।
प्रियंका की नई भूमिका को लेकर सस्पेंस
अकउउ में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि प्रियंका गांधी वाड्रा को जल्द ही कांग्रेस संगठन में कोई बड़ी और साफ-तौर पर तय भूमिका दी जा सकती है। यह अटकलें तब और तेज हो गईं जब हाल ही में उन्होंने अकउउ सचिवों के साथ ग्रुप डिस्कशन में राहुल गांधी का साथ दिया, ताकि उनके काम की समीक्षा की जा सके और पार्टी के जमीनी स्तर के फीडबैक सिस्टम का आकलन किया जा सके।

आमतौर पर, संगठन से जुड़ी ऐसी समीक्षाएं राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे मिलकर करते थे। इसलिए, इस बार प्रियंका के शामिल होने से पार्टी के भीतर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। खबरों के अनुसार, राहुल और प्रियंका ने पदाधिकारियों से संगठन के अहम मुद्दों पर विस्तृत फीडबैक मांगा, खासकर जमीनी स्तर से जानकारी के प्रवाह को तेज करने और पार्टी के रिस्पॉन्स सिस्टम को बेहतर बनाने के तरीकों पर।
प्रियंका लगभग चार साल से अकउउ की महासचिव हैं, लेकिन उनके पास कोई खास पोर्टफोलियो नहीं रहा है। संगठन में उनकी पिछली बड़ी जिÞम्मेदारी 2022 में उत्तर प्रदेश की थी।
ताजा चचार्एं 5 सितंबर को अकउउ महासचिवों में हुए फेरबदल के बाद शुरू हुईं, जिसके तहत सभी महासचिवों को जिम्मेदारियां सौंपी गईं- सिवाय प्रियंका और मुकुल वासनिक के; वासनिक को गुजरात का प्रभार छिनने के बाद बिना किसी पोर्टफोलियो के बनाए रखा गया है।
इन दो खाली जगहों ने इस अटकल को हवा दी है कि प्रियंका के लिए शायद कुछ खास योजना बनाई जा रही है। वह पर्दे के पीछे रहकर रणनीतिकार और मुश्किलों को सुलझाने वाली (ट्रबलशूटर) के तौर पर ज्यादा सक्रिय रही हैं।
चर्चा है कि लंबे समय से लंबित ‘चुनाव प्रबंधन विभाग’ आखिरकार अगले महीने आकार ले सकता है, जिसमें प्रियंका के संभावित प्रमुख और वासनिक के डिप्टी या संयोजक बनने की बात चल रही है। अगर ऐसा होता है, तो प्रियंका का ‘बिना पोर्टफोलियो’ वाला स्टेटस असल में कोई कमी नहीं, बल्कि एक ‘वेटिंग रूम’ (इंतजार का समय) साबित हो सकता है।
मोदी का ‘जेन–जी‘ अंदाज
ऐसा लगता है कि भाजपा को एक नया पॉलिटिकल मंत्र मिल गया है : अगर आप समय नहीं बदल सकते, तो अपनी प्लेलिस्ट बदल लीजिए। हाल ही में दिल्ली में दीन दयाल उपाध्याय की जयंती के मौके पर फरर से जुड़ी एक संस्था ने युवाओं के लिए ‘भजन-क्लबिंग’ इवेंट आयोजित किया था। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शामिल होना सिर्फ भक्ति-भाव वाला कार्यक्रम नहीं था। भजन के शौकीन युवाओं के बीच बैठे प्रधानमंत्री ने ‘झंकार’ (म्यूजिÞकल इंस्ट्रूमेंट) उठाई और गाने में साथ दिया।
इससे संदेश देने की कोशिश थी कि मोदी अपने आम राजनीतिक साथियों के बीच नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के बीच हैं जो उन्हें सिर्फ प्रधानमंत्री के तौर पर जानती है, जो हमेशा बड़े-बुजुर्गों से घिरे रहते हैं और देश को भाषण देते रहते हैं। और युवाओं (जेन-जी) तक पहुंचने की इस कोशिश के साथ एक साउंडट्रैक भी जुड़ा है। वड़ोदरा में युवाओं के एक कार्यक्रम में मोदी ने जबरदस्त एंट्री की थी, जब बैकग्राउंड में क्वीन बैंड का गाना ‘वी विल रॉक यू’ बज रहा था। साफ है कि भाजपा पारंपरिक राजनीतिक भाषा से हटकर कुछ नया करने की कोशिश कर रही है।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस कोशिश को एक कदम और आगे बढ़ाया है। उन्होंने हाल ही में 44 युवा नेताओं और मंत्रियों के साथ 4 घंटे का मंथन सत्र किया कि छात्रों और युवाओं से कैसे जुड़ा जाए। इस बैठक में भाजयुमो प्रमुख हेमांग जोशी और पूर्व प्रमुख तेजस्वी सूर्या, पूनम महाजन और अनुराग ठाकुर के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया और दीया कुमारी भी शामिल थे।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ध्यान से नोट्स लेते दिखे ताकि युवा टीम के फीडबैक का कोई भी अहम हिस्सा छूट न जाए। दिलचस्प बात यह है कि एक शब्द पर पूरी तरह रोक थी : ‘जेन-जी’। इसके बजाय ‘छात्रों’ और ‘युवाओं’ जैसे शब्दों को प्राथमिकता दी गई। शायद भाजपा भी जानती है कि कभी-कभी जेन-जी को लुभाने का सबसे सुरक्षित तरीका उन्हें ‘जेन-जी’ न कहना ही होता है।
बाट जोहत बीते न रतिया
मोदी सरकार में फेरबदल होगा। यह चर्चा सुनते ही भाजपा कई ऐसा सांसद और गैर सांसद हैं जिन्हे अपनी संभावना प्रबल दिखती है। जो कद्दावर हैं वह अपनी टैलेंट का गुणा-भाग कर रहे हैं।

जो कद्दावर नहीं हैं वह उस फॉमूर्ले में अपनी संभावना देखते हैं जिसके तहत कम चर्चित लोगों को संगठन और सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। ऐसे लोगों से कभी भी मिलो बातचीत में परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से यह चर्चा जरूर चाहते हैं कि फेरबदल कब हो रहा है। हां एक सावधानी सभी जरूर रख रहे हैं कि,कोई भी सूट आदि सिलाने से अभी परहेज कर रहा है। एक नेता कहते हैं कि जरूरत है एक नए सूट का लेकिन डरते हैं कहीं किसी को पता चल गया कि नया सूट बनवाया है तो कहीं इसे शपथ की तैयारी से जोड़ कर न देखा जाने लगे। फिलहाल हो जो भी जो संभावना देख रहें है उन्हे एक एक रात बिताना मुश्किल हो रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि रात उन्ही की खराब हो रही है जो फेरबदल में अपनी संभावना देख रहे हैं। कई ऐसे भी हैं जिन्हे रात को यह टेंशन होती है कि कहीं उनका पट्टा तो नहीं कट जाएगा।




