अनुच्छेद 371 : लद्दाख के लिए नया संवैधानिक मॉडल आकार ले रहा है

रियाज वानी
लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 के तहत एक नए संवैधानिक ढांचे पर काम चल रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य केंद्रशासित प्रदेश में भूमि, रोजगार, संस्कृति, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लिए सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के साथ-साथ एक निर्वाचित केंद्रशासित प्रदेश-

स्तरीय शासी निकाय का गठन करना है। लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने हाल में यह जानकारी दी।

कुंद्रा का बयान केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) और लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के प्रतिनिधियों के बीच चल रही बातचीत में एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। एलएबी और केडीए लंबे समय से लद्दाख के लिए अधिक मजबूत संवैधानिक और राजनीतिक सुरक्षा उपायों की मांग करते रहे हैं।

प्रमुख नागरिक समाज प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कुंद्रा ने कहा, ‘लद्दाख की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप संवैधानिक सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने के लिए अनुच्छेद 371 के तहत एक नया ढांचा तैयार किया जा रहा है। लद्दाख के लोगों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए एक नया मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिसका देश में कहीं और कोई उदाहरण नहीं है।’

उन्होंने कहा कि लद्दाख को संवैधानिक संरक्षण दिए जाने की जरूरत पर व्यापक सहमति है और यह संरक्षण ‘हमारी भूमि, रोजगार, संस्कृति, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों’ तक होना चाहिए।

मुख्य सचिव ने यह भी बताया कि प्रस्तावित केंद्रशासित प्रदेश-स्तरीय निकाय के लिए प्रत्यक्ष चुनाव बातचीत में सामने आए प्रमुख सुझावों में शामिल है। उन्होंने कहा कि ढांचे पर सहमति बनने के बाद संसद द्वारा संवैधानिक संशोधन पर विचार सहित आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

लेह एपेक्स बॉडी के अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाक्रुक ने कहा कि नई दिल्ली ने लद्दाख को अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा देने का लिखित आश्वासन दिया है और यह आश्वासन पिछली बैठकों के कार्यवृत्त में भी दर्ज है।

लाक्रुक ने तेहलका से कहा, ‘उन्होंने कहा है कि वे यह देंगे। उन्होंने हमें यह लिखित रूप में भी दिया है। यह बैठकों के कार्यवृत्त में भी दर्ज है।’

उन्होंने कहा कि बातचीत का अगला दौर इस महीने लेह या कारगिल में होने की उम्मीद है, लेकिन इस स्तर पर किसी औपचारिक घोषणा की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

उन्होंने कहा, ‘घोषणा की बात करना अभी जल्दबाजी होगी। देखते हैं कि बातचीत के दौरान कितनी प्रगति होती है।’

कुंद्रा ने उभरती व्यवस्था को एक ‘सुई जेनेरिस’ मॉडल बताया—अर्थात ऐसा मॉडल जो विशेष रूप से लद्दाख के लिए तैयार किया जा रहा है और देश में मौजूद किसी मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की हूबहू नकल नहीं है।

लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ हुई बातचीत में सामने आए ढांचे के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था न तो केंद्रशासित प्रदेश को राज्य का दर्जा देगी और न ही लद्दाख को विधानसभा वाले पारंपरिक केंद्रशासित प्रदेश में बदलेगी। इसके बजाय मौजूदा केंद्रशासित प्रदेश की व्यवस्था के भीतर एक अलग निर्वाचित संस्था बनाई जाएगी, जिसके पास विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और योजना संबंधी शक्तियों का संयोजन होगा।

प्रस्तावित संस्था की विस्तृत शक्तियों, कार्यों और संस्थागत व्यवस्था को तय करने के लिए बाद में एक अलग कानून की आवश्यकता होगी।

क्या प्रस्तावित किया गया है

प्रस्ताव की रूपरेखा 9 सितंबर को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय और एलएबी तथा केडीए के नेताओं के बीच उप-समिति स्तर की बातचीत के दौरान सामने आई।

गृह मंत्रालय ने एक सीधे निर्वाचित केंद्रशासित प्रदेश-स्तरीय निकाय का प्रस्ताव रखा है, जिसे भूमि, संस्कृति और भाषा, वन, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ अनुच्छेद 240 के तहत केंद्रशासित प्रदेश के लिए आरक्षित अन्य विषयों पर विधायी अधिकार प्राप्त होंगे।

प्रस्तावित संस्था को कार्यकारी, बजटीय, योजना और वित्तीय शक्तियां भी दी जानी हैं।

लाक्रुक ने कहा कि केंद्र ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि विधानसभा और अनुच्छेद 371 दोनों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने कहा कि लद्दाख के प्रतिनिधि प्रस्तावित संस्था और उपराज्यपाल को दी जाने वाली शक्तियों सहित पूरे अधिकार-वितरण की जांच करने के बाद ही किसी व्यवस्था को स्वीकार करेंगे।

उन्होंने कहा, ‘उन्होंने दो बातें स्पष्ट रूप से कही हैं—एक विधानसभा और दूसरा अनुच्छेद 371। अगर कोई संदेह या कमी हुई तो हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। अगर सब ठीक रहा तो करेंगे।’

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 371 भूमि, रोजगार और संस्कृति के लिए सुरक्षा देगा और लद्दाख को इस समय जो भी सुरक्षा हासिल हो सकती है, उसे सुनिश्चित करना जरूरी है।

लाक्रुक ने तेहलका से कहा, ‘इस समय हमें जो कुछ भी मिल सकता है, हमें उसे अभी सुरक्षित करना होगा।’

यह लद्दाख की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था से एक महत्त्वपूर्ण बदलाव होगा। 2019 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था।

इसके बाद से एलएबी और केडीए संवैधानिक सुरक्षा, राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग करते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि भूमि, रोजगार, संसाधनों और विकास पर स्थानीय लोगों का अधिक नियंत्रण होना चाहिए।

हालांकि मौजूदा प्रस्ताव एक अलग संवैधानिक रास्ता अपनाता दिखाई देता है। इसमें राज्य का दर्जा बहाल करने या पारंपरिक विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेश का गठन करने के बजाय मौजूदा केंद्रशासित प्रदेश की व्यवस्था के भीतर एक विशेष रूप से सशक्त निर्वाचित निकाय बनाने की बात है। प्रस्तावित अनुच्छेद 371 के महत्व को समझने के लिए यही अंतर सबसे महत्त्वपूर्ण है।

अनुच्छेद 371 क्या है?

अनुच्छेद 371 कोई एक समान संवैधानिक सुरक्षा नहीं है। यह अनुच्छेद 371 और 371अ से 371ख तक के प्रावधानों की एक श्रृंखला का हिस्सा है, जो अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं उपलब्ध कराते हैं। इनका उद्देश्य उन क्षेत्रों की विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना है।

अनुच्छेद 371 और इससे जुड़े प्रावधान ऐसे क्षेत्रों को संवैधानिक व्यवस्था में विशेष स्थान देने के लिए बनाए गए, जिनकी ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सामान्य संवैधानिक ढांचे से अलग व्यवस्था की आवश्यकता थी।

समय के साथ इन प्रावधानों का इस्तेमाल प्रथागत कानूनों और भूमि अधिकारों की रक्षा, जनजातीय और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा, शिक्षा और सरकारी रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करने तथा विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनाने के लिए किया गया है।

अनुच्छेद 371 और इसके विभिन्न उप-अनुच्छेदों के तहत 11 राज्यों—नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक—को विशेष संवैधानिक प्रावधान प्राप्त हैं। हालांकि इन सभी प्रावधानों की प्रकृति और दायरा संबंधित राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक और विकास संबंधी परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग है।

इन प्रावधानों को व्यापक रूप से असममित संघवाद (ं२८ेी३१्रू ाीीि१ं’्र२े) के उदाहरण के रूप में देखा जाता है। इसका अर्थ है कि संविधान विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें अलग-अलग प्रकार की सुरक्षा और शासन व्यवस्था की अनुमति देता है। लद्दाख के लिए प्रस्तावित अनुच्छेद 371 इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाएगा।

लद्दाख का प्रस्ताव अलग क्यों है

प्रस्तावित लद्दाख मॉडल अधिकांश मौजूदा अनुच्छेद 371 व्यवस्थाओं से अलग है क्योंकि यह ऐसे केंद्रशासित प्रदेश में लागू होगा, जहां फिलहाल कोई विधानसभा नहीं है।

इसलिए प्रस्ताव एक नई संस्थागत श्रेणी बनाने की कोशिश करता है—एक सीधे निर्वाचित निकाय, जिसके पास विधायी और कार्यकारी अधिकार हों, लेकिन लद्दाख को न तो राज्य बनाया जाए और न ही विधानसभा वाले पारंपरिक केंद्रशासित प्रदेश में बदला जाए।

इस निकाय के अधिकारों की वास्तविक सीमा सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल बनी हुई है।

22 मई को हुई बातचीत और जुलाई में बाद में उसकी पुष्टि से संबंधित कार्यवृत्त में संकेत दिया गया था कि प्रस्तावित निर्वाचित निकाय के अधिकार क्षेत्र में भूमि, संस्कृति और भाषा, वन, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन शामिल हो सकते हैं। प्रस्ताव में कार्यकारी, वित्तीय, बजटीय और योजना संबंधी शक्तियों की भी परिकल्पना की गई है।

बातचीत में यह भी संकेत दिया गया कि प्रस्तावित निर्वाचित निकाय के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों के लिए सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण और निगरानी, जिसमें उनकी वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट भी शामिल है, निर्वाचित कार्यकारी निकाय के पास हो सकती है।

हालांकि कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में बनी हुई है, जहां लद्दाख के प्रतिनिधियों ने अब तक प्रस्तावित व्यवस्था से अधिक मजबूत अधिकारों की मांग की है।

लद्दाख के नेताओं ने पुलिस और नौकरशाही पर नियंत्रण की मांग की है। 9 सितंबर की बैठक में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार, गृह मंत्रालय ने कानून-व्यवस्था और नौकरशाही पर नियंत्रण की मांग पर विचार करने की बात कही, लेकिन कोई आश्वासन नहीं दिया।

यह मुद्दा बताता है कि अनुच्छेद 371ङ की अंतिम भाषा प्रस्तावित संस्था के वास्तविक अधिकार क्षेत्र को किस तरह निर्धारित कर सकती है।

अंतिम मसौदा क्यों महत्त्वपूर्ण है

मौजूदा अनुच्छेद 371 के प्रावधानों का अनुभव यह भी दिखाता है कि केवल किसी संवैधानिक प्रावधान का अस्तित्व ही यह तय नहीं करता कि किसी क्षेत्र को कितनी स्वायत्तता मिलेगी।

यदि कोई प्रावधान केवल एक निर्वाचित निकाय की स्थापना करता है और उन क्षेत्रों की पहचान करता है जिन पर वह कानून बना सकता है, तो उससे एक स्तर की सुरक्षा मिलेगी। लेकिन यदि संविधान भूमि, प्राकृतिक संसाधनों, भर्ती और प्रशासन पर उस निकाय के नियंत्रण की गारंटी देता है, तो उसकी स्वायत्तता कहीं अधिक मजबूत होगी।

इससे भी मजबूत व्यवस्था में यह प्रावधान किया जा सकता है कि संरक्षित विषयों से संबंधित कुछ केंद्रीय कानून लद्दाख में उसके निर्वाचित निकाय की मंजूरी के बिना स्वत: लागू न हों। ऐसी व्यवस्था अनुच्छेद 371अ और 371ॠ के तहत उपलब्ध कुछ सुरक्षा उपायों के अधिक करीब होगी।

कानून-व्यवस्था का सवाल भी लद्दाख के निर्वाचित प्रतिनिधियों और केंद्र द्वारा नियुक्त प्रशासन के बीच शक्ति-संतुलन तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यही कारण है कि लद्दाख के प्रतिनिधि केवल प्रस्तावित व्यवस्था के व्यापक विवरण पर निर्भर रहने के बजाय विस्तृत संवैधानिक मसौदा देखना चाहते हैं।

लाक्रुक ने कहा कि एलएबी प्रस्तावित संस्था और उपराज्यपाल को दी जाने वाली शक्तियों सहित अधिकारों के वितरण की जांच करेगा और उसके बाद ही व्यवस्था को स्वीकार करने पर फैसला करेगा।

लाक्रुक के अनुसार, 9 सितंबर की बैठक में एलएबी इस बात से ‘निराश’ था कि उसे अध्याय ङ का उल्लेख करने वाली प्रस्तुति तो दिखाई गई, लेकिन विस्तृत प्रस्ताव का मसौदा उपलब्ध नहीं कराया गया।

नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने यह भी मांग की है कि प्रस्तावित सुरक्षा उपायों को अंतिम रूप दिए जाने तक उपराज्यपाल प्रशासन, नौकरशाही और भूमि से जुड़े बड़े फैसले लेने से परहेज करें।

उन्होंने संसद के शीतकालीन सत्र में कानून पारित किए जाने की मांग की है। केडीए प्रतिनिधि सज्जाद कारगिली ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने इस बात पर जोर दिया है कि इसे दो-तिहाई बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।

उन्होंने तेहलका से कहा, ‘हमने सैद्धांतिक रूप से इस शासन मॉडल पर चर्चा के लिए सहमति दी है। अगर यह संतोषजनक हुआ तो हम इसे स्वीकार करेंगे। लेकिन राज्य का दर्जा हमारी दीर्घकालिक आकांक्षा बनी रहेगी, जो गृह मंत्रालय के साथ हाल की बैठक के कार्यवृत्त में भी दर्ज है।’

उन्होंने कहा, ‘हम सरकार से मसौदा देने का आग्रह कर रहे हैं। अगर हमें लगता है कि केंद्रशासित प्रदेश-स्तरीय निर्वाचित निकाय संतोषजनक है तो हम इसे स्वीकार करेंगे। अगर यह लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है तो हम राज्य के दर्जे के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।’

फिलहाल प्रक्रिया ढांचा तैयार करने के चरण में है। कुंद्रा के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधि केंद्रशासित प्रदेश के लिए उसकी विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप संवैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता पर व्यापक सहमति की ओर बढ़ रहे हैं।

लाक्रुक के बयान से संकेत मिलता है कि एलएबी अनुच्छेद 371 पर लिखित आश्वासन को एक महत्त्वपूर्ण कदम मानता है, लेकिन प्रस्तावित संस्था की वास्तविक शक्तियों को लेकर उसने अपना अंतिम रुख सुरक्षित रखा है। लेकिन इस व्यवस्था का संवैधानिक महत्व अंतत: उसके लिखित स्वरूप पर निर्भर करेगा।

अगर लागू होता है, तो अनुच्छेद 371 भारत में असीमित संघवाद के लंबे इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ देगा। मौजूदा प्रावधानों से अलग, इसमें ऐसे केंद्रशासित प्रदेश को, जहां विधानसभा नहीं है, एक ऐसी सीधे निर्वाचित संस्था देने का प्रयास होगा जिसके पास स्पष्ट विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और योजना संबंधी शक्तियां हों।

इसलिए केंद्रीय सवाल अब केवल यह नहीं है कि लद्दाख को अनुच्छेद 371 के तहत प्रावधान मिलेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि उसमें कौन-सी शक्तियां, सुरक्षा और सीमाएं लिखी जाएंगी—और ये प्रावधान लद्दाख के निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा केंद्र द्वारा नियुक्त प्रशासन के बीच अधिकारों का बंटवारा किस तरह करेंगे।