पंजाब में नशा विरोधी मुहिम के अगुआ परमिंदर सिंह झोटा की गोली मारकर हत्या

मेडिकल स्टोर पर टकराव से पहले के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल; भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल ने नशे के खिलाफ अभियान तथा कानून-व्यवस्था पर उठाए सवाल

पंजाब के मानसा जिले में मंगलवार को नशे के खिलाफ मुहिम चलाने वाले प्रमुख कार्यकर्ता परमिंदर सिंह झोटा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। बताया जा रहा है कि नशीली दवाओं की कथित अवैध बिक्री को लेकर एक मेडिकल स्टोर संचालक के साथ हुए विवाद के दौरान उन्हें गोली मारी गई। इस वारदात ने राज्य में व्यापक आक्रोश पैदा कर दिया है और मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार के कानून-व्यवस्था संबंधी रिकॉर्ड तथा नशे के खिलाफ अभियान को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है।

घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। इनमें कथित तौर पर झोटा और उनके साथी मेडिकल स्टोर संचालक के साथ बहस करते दिखाई देते हैं। इसके बाद गोलियां चलने की आवाज सुनाई देती है। पुलिस ने बताया कि मामले में आरोपी को गिरफ्तार करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मानसा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक वैभव चौधरी ने कहा कि हत्या के मामले में आरोपी की तलाश जारी है। पुलिस के अनुसार, झोटा को गंभीर रूप से घायल अवस्था में पास की एक दुकान में पाया गया था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

लगभग छह मिनट के एक वीडियो में झोटा को यह कहते सुना जा सकता है कि दुकान संचालक ने पिस्तौल निकाल ली है। वह अपने मोबाइल फोन से पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड कर रहे थे। वीडियो में वह दुकानदार को पंजाबी में चुनौती देते सुनाई देते हैं, “मार, मार, तूं साडे फायर मार” यानी गोली चलाओ, हम पर गोली चलाओ। इसके कुछ ही क्षण बाद कथित तौर पर गोलियां चलती हैं और झोटा तथा उनके साथी दुकान से बाहर भागने लगते हैं।

एक अन्य वीडियो में कथित तौर पर मेडिकल स्टोर संचालक हथियार लेकर दुकान से बाहर निकलता और भाग रहे झोटा का पीछा करता दिखाई देता है। हथियारबंद व्यक्ति को देखकर आसपास मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आते हैं।

इस हत्या ने पंजाब के उन इलाकों में नशा विरोधी कार्यकर्ताओं और मेडिकल स्टोर संचालकों के बीच बढ़ते तनाव को फिर उजागर कर दिया है, जहां कुछ दुकानदारों पर बिना वैध पर्चे के नशीली दवाएं बेचने के आरोप लगते रहे हैं। साथ ही, इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि जब नागरिक समूह कानून लागू करने के लिए सीधे टकराव का रास्ता अपनाते हैं, तो ऐसी मुहिम कितनी जोखिमपूर्ण हो सकती है।

नशे की लत से उबरकर बने नशा विरोधी योद्धा

परमिंदर सिंह झोटा मालवा क्षेत्र में जमीनी स्तर पर चलने वाली नशा विरोधी मुहिम का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे थे। वह पहले शौकिया मुक्केबाज थे। अपने शुरुआती जीवन में नशे की गंभीर लत से जूझने के बाद उन्होंने इस पर काबू पाया और कथित तौर पर लगभग एक दशक तक नशे से दूर रहे।

नशे की लत से लड़ने का उनका निजी अनुभव ही नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ अभियान चलाने की प्रेरणा बना। ग्रामीण युवाओं और नशे की समस्या से प्रभावित परिवारों के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। संदिग्ध नशा तस्करों और दवाइयों की दुकानों के खिलाफ उनके हस्तक्षेप के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होते रहे।

फेसबुक पर उनके 24,000 से अधिक फॉलोअर थे। वह सोशल मीडिया के जरिए नशीली दवाओं की कथित अवैध बिक्री और संदिग्ध नशा कारोबारियों के साथ अपने टकराव को सार्वजनिक करते थे।

2023 की शुरुआत में उन्होंने किसान संगठनों के कुछ वर्गों और ग्रामीण युवा संगठनों के सहयोग से ‘नशा रोको, रोजगार दो’ अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य नशीली दवाओं और चिट्टे की आपूर्ति पर रोक लगाने के लिए दबाव बनाना था। चिट्टा पंजाब में हेरोइन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आम शब्द है।

झोटा और उनके समर्थकों ने सीधे कार्रवाई का रास्ता अपनाया। वे नशे का सेवन करने वाले संदिग्ध युवाओं और कथित विक्रेताओं का पता लगाते, उन मेडिकल स्टोरों पर पहुंचते जिन पर बिना वैध पर्चे के नियंत्रित दवाएं बेचने के आरोप थे और पूरे घटनाक्रम को कैमरे में रिकॉर्ड करते थे। कुछ मामलों में वे कथित अवैध खरीद के लिए दी गई रकम वापस करने की मांग भी करते थे।

इस मुहिम को उन परिवारों का व्यापक समर्थन मिला, जिन्हें लगता था कि प्रशासन नशे की समस्या पर प्रभावी अंकुश लगाने में नाकाम रहा है। मानसा, बठिंडा और फरीदकोट के कुछ इलाकों में स्थानीय समूहों ने भी इसी तरह की गतिविधियां शुरू कीं।

झोटा के समर्थकों के लिए वह ऐसे व्यक्ति थे, जिसने खुद नशे की लत पर विजय पाई और पंजाब के युवाओं को तबाह करने वाले नेटवर्क को चुनौती देने का साहस दिखाया। हालांकि, उनके आलोचकों ने इन तरीकों पर सवाल उठाए। मेडिकल स्टोर संचालकों के कुछ संगठनों ने उनके समूहों पर कानून अपने हाथ में लेने, व्यापारियों को डराने और बिना अधिकार के छापेमारी करने जैसे आरोप लगाए।

पुराने टकराव और कानूनी विवाद

झोटा के काम करने के तरीके ने उन्हें मेडिकल स्टोर संचालकों और पुलिस के साथ बार-बार टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया था।

2023 में एक नाबालिग के माध्यम से कथित तौर पर प्रेगाबालिन की गोलियां खरीदने की घटना के बाद मानसा पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। इस प्रकरण में 400 रुपये की रकम की बरामदगी का भी उल्लेख किया गया और उन पर जबरन वसूली के आरोप लगे। बाद के टकरावों से जुड़े अन्य आपराधिक आरोपों का भी उन्हें सामना करना पड़ा, जिनमें एक कथित आपूर्तिकर्ता के यहां छापेमारी से संबंधित हत्या के प्रयास का मामला भी शामिल था।

उनकी गिरफ्तारी के बाद मानसा में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। किसान संगठनों, नागरिक अधिकार समूहों और गांवों की पंचायतों ने उनकी रिहाई की मांग की। समर्थक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे और पुलिस तथा प्रशासन पर मामलों की समीक्षा करने का दबाव बनाया।

इस घटनाक्रम के विवरणों के अनुसार, शिकायतकर्ता मेडिकल स्टोर संचालक ने बाद में आरोप वापस ले लिए थे। हत्या के प्रयास के मामले को लेकर भी सवाल उठे। अंततः झोटा जेल से बाहर आए और समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया।

कानूनी विवादों और व्यापारियों के एक वर्ग के विरोध के बावजूद उन्होंने नशीली दवाओं की कथित अवैध बिक्री के खिलाफ अपनी मुहिम जारी रखी।

मंगलवार को हुई गोलीबारी ने लंबे समय से चले आ रहे इस टकराव को एक बड़े कानून-व्यवस्था के मुद्दे में बदल दिया है। अब पुलिस पर आरोपी को जल्द गिरफ्तार करने का दबाव बढ़ रहा है।

विपक्ष ने मान सरकार को घेरा

हत्या के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। भाजपा, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने नशे की समस्या से निपटने के तरीके और आम आदमी पार्टी सरकार के प्रमुख अभियान ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ पर सवाल उठाए।

पंजाब भाजपा अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कहा कि इस हत्या ने सरकार के नशा विरोधी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है। नशीली दवाओं की कथित अवैध बिक्री पर प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा कि ऐसी बिक्री रोकना क्या ड्रग इंस्पेक्टरों की जिम्मेदारी नहीं है?

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने भी राज्य सरकार को निशाने पर लिया। उन्होंने झोटा की हत्या को कानून-व्यवस्था और सरकार के नशा विरोधी अभियान की कथित विफलता का परिणाम बताया।

वड़िंग ने कहा, “परमिंदर पंजाब में नशे के संकट के खिलाफ खड़े हुए, लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार ने उनकी पहलों का कभी समर्थन नहीं किया।”

शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी सरकार के नशा विरोधी अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की ओर से फार्मास्यूटिकल नशीली दवाओं की बढ़ती समस्या को लेकर जताई गई कथित चिंता का हवाला देते हुए उन्होंने पूछा कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने कौन-से ठोस कदम उठाए हैं और अवैध रूप से बेची जा रही कितनी दवाएं जब्त की गई हैं।

मजीठिया ने ड्रग इंस्पेक्टरों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि नशीली दवाओं की अनधिकृत बिक्री रोकना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

विपक्ष के इन आरोपों पर आम आदमी पार्टी के नेताओं की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

नशे का मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में

झोटा की हत्या ने पंजाब में नशीली दवाओं और नशे की लत पैदा करने वाली दवाइयों की कथित अवैध उपलब्धता को लेकर चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं। इस घटना ने राज्य के नशा विरोधी अभियान की प्रभावशीलता और उसकी सीमाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं।

यह वारदात सरकार के सामने एक कठिन चुनौती भी रखती है—समुदायों को नशे के खिलाफ लामबंद करना, लेकिन इस प्रक्रिया में नागरिकों को कानून अपने हाथ में लेने और हिंसक टकराव की स्थिति तक पहुंचने से रोकना।

झोटा के समर्थक उनकी गतिविधियों को सरकारी तंत्र की कथित निष्क्रियता के खिलाफ जनप्रतिरोध मानते थे। दूसरी ओर, उनके खिलाफ दर्ज पुराने मामलों ने कानून की प्रक्रिया और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े सवाल भी खड़े किए थे।

फिलहाल पुलिस की प्राथमिकता आरोपी को गिरफ्तार करना और गोलीबारी तक पहुंचने वाली घटनाओं की पूरी कड़ी का पता लगाना है। जांचकर्ताओं को वीडियो फुटेज तथा अन्य सबूतों की पड़ताल कर विवाद और हत्या की परिस्थितियों को स्पष्ट करना होगा।

पंजाब में आगामी चुनावी मुकाबले की पृष्ठभूमि में यह हत्या भगवंत मान सरकार के नशा नियंत्रण और सार्वजनिक सुरक्षा संबंधी दावों की जांच-पड़ताल को और तेज कर सकती है।

नशे की समस्या से जूझ रहे परिवारों के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि क्या राज्य प्रभावी कार्रवाई, जवाबदेही और नशामुक्ति के उपायों के जरिए नशीले पदार्थों तथा नशीली दवाओं की आपूर्ति पर अंकुश लगा पाएगा—ताकि नागरिकों को संदिग्ध कारोबारियों से खुद भिड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े।