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केशव के हाथ कमल

कहते हैं कि राजनीति में टोटके खूब चलते हैं. ऐसा ही एक टोटका सत्तारूढ़ भाजपा में चल रहा है. यह टोटका हिंदुत्व, पिछड़ा और चायवाला कंबिनेशन का है. लोकसभा चुनाव में ऐसे ही उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने बड़ी जीत दर्ज की तो अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐसे ही  

भगत सिंह, शहादत और संघ

  बीते 23 मार्च को क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 85वीं वर्षगांठ थी, जिन्हें अंग्रेज सरकार ने लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ाया था. अंग्रेज हुक्मरानों को लगा था कि क्रांतिकारियों को मार देने से उनके, भारत को एक आजाद धर्मनिरपेक्ष और समतावादी देश बनाने के  

भगत के सियासी भगत

‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी  

मोदी की शह पर फिर भाजपा के शाह

सोमवार, 25 जनवरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पश्चिम बंगाल में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान आत्मविश्वास से लबरेज शाह ने ममता सरकार की जमकर बखिया उधेड़ी. उन्होंने कहा कि ममता ने परिवर्तन नहीं सिर्फ पतन किया है. रैली की खासियत यह थी कि  

‘समाज व संगठनों का भी पतन हुआ, छात्र राजनीति इससे अलग नहीं’

यह सही है कि छात्र राजनीति की पहली प्राथमिकता अध्ययन है, लेकिन जो सामाजिक-राजनीतिक समस्याएं हैं, उन पर भी निगाह रखनी चाहिए और सभी विचारधाराओं से परिचित होना चाहिए. छात्रों के अपने कर्तव्य और अधिकार हैं. राष्ट्र या समाज के समक्ष कोई गंभीर समस्या आने पर छात्रों को देश सेवा  

शिवसेना को गुस्सा क्यों आता है?

हाल ही में पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली ने भारत में प्रस्तावित अपने सभी संगीत कार्यक्रम रद्द कर दिए. उन्होंने कहा कि वह भारत तब तक नहीं आएंगे, जब तक स्थितियां अनुकूल नहीं हो जातीं. गौरतलब है कि शिवसेना के विरोध के चलते ही मुंबई और पुणे में गुलाम अली  

सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज

भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है. यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें.  

हुर्रियत: प्रासंगिकता पर प्रश्न

पिछले साल जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली अप्रत्याशित जीत के बाद से घाटी में अलगाववादियों के हौसले पस्त हैं. हर बार की तरह इस बार भी हुर्रियत ने चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान सुनाया था. हालांकि चुनाव के बाद बदले राजनीतिक परिदृश्य में इस बात की अटकलें तेज हैं कि अलगाववादी चुनाव में हिस्सा लेने के मुद्दे पर अब सोचने को विवश हो रहे हैं, जो उनकी प्रकृति और रणनीति दोनों के खिलाफ है....  

जारी रहेगी प्रफुल्ल बिदवई की लड़ाई

प्रफुल्ल जी के लिए ऐसे अचानक श्रद्धांजलि लिखनी पड़ेगी, कभी सोचा न था. मैं 1990 के शुरुआती वर्षों में अर्थनीति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर उनके लेख पढ़ते हुए बड़ा हुआ. तब के अखबारी लेखक पीछे छूटते गए, लेकिन बाद में नई दिल्ली स्थित जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करते  

भंवर में भाजपा

बिहार विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने को बेताब भाजपा की राह में मुश्किलें हजार हैं. राज्य में नेतृत्व के सवाल से लेकर सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने में पार्टी के पसीने छूट रहे हैं