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बीसीसीआई पर लोढ़ा का कोड़ा!

जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की सिफारिशें क्रांतिकारी हैं, अगर ये लागू होती हैं तो देश में क्रिकेट के प्रशासन से लेकर प्रसारण तक का ढांचा ही बदल जाएगा

‘किसी महिला के लिए अपने मन की बात रखना आसान नहीं होता’

सनी लियोन चर्चाओं में बनी रहती हैं. भले ही ये उनके पिछले करिअर की वजह से हो या फिर हाल में दिए गए टीवी इंटरव्यू के चलते. उनके पॉर्न स्टार होने के चलते उनकी छवि पर उठते सवाल कभी कम नहीं होते, न ही लोगों का उनके प्रति नजरिया बदलता है. अपनी हालिया रिलीज ‘मस्तीजादे’ के प्रमोशन के लिए दिल्ली आईं सनी ने अर्चना मिश्रा से बेबाक बातचीत की

वे कौन हैं जो मुस्लिम महिलाओं को लूट व अंधविश्वास के केंद्र- मजार और दरगाह में प्रवेश की लड़ाई को सशक्तिकरण का नाम दे रहे हैं?

सवाल पैदा होता है कि असल समस्याओं से जूझती मुस्लिम महिलाओं को इस नकली समस्या में क्यों घसीटा जा रहा है? वो कौन लोग हैं जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तीन-तलाक, भगोड़े पति, पति की दूसरी शादी से उत्पन्न अभाव, परिवार नियोजन का अभाव, जात-पात, दहेज, दंगों में सामूहिक बलात्कार जैसी भयानक समस्याओं के निराकरण के बजाए हाजी अली दरगाह के गर्भ-गृह में दाखिले को मुस्लिम महिलाओं का राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की सूझी है?



‘तहलका’ ने 2009 में ही इन तस्वीरों के जरिये किया था फर्जी मुठभेड़ का खुलासा

जुलाई, 2009 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक पूर्व आतंकी चोंग्खम संजीत मेइतेई को मणिपुर पुलिस के हेड कांस्टेबल हेरोजित सिंह ने मुठभेड़ के नाम पर मारा था. एक अंग्रेजी दैनिक की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक हेरोजित ने माना है कि ये मुठभेड़ नहीं थी बल्कि उन्होंने संजीत को अपने वरिष्ठ अधिकारी के कहने पर गोली मारी थी

 
‘डीडीसीए की कार्यकारी समिति के चुनावों में इतना कपट है, जितना अफ्रीकी देशों के तानाशाहों ने नहीं किया होगा’

'हम डीडीसीए में हो रही धोखाधड़ी की कई वर्षों से जांच कर रहे हैं और जिस बात ने हमें सबसे ज्यादा चौंकाया वो ये थी कि किस तरह बहुत आसानी से साल दर साल वही अधिकारी दफ्तरों में बने रहे'

 
‘रोहित ने आत्महत्या नहीं की, हमारी व्यवस्‍था ने उसे मार डाला’

रोहित को याद करने और उनकी स्मृति को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम इस खालीपन को भरने के लिए एक-दूसरे के करीब बने रहें. कमियों की अनदेखी करके संवाद बनाए रखने की कोशिश करें

 
‘मल्टीप्लेक्स पॉपकॉर्न बेचने के लिए खोले गए हैं, उनके लिए बाजीराव मस्तानी या चौरंगा कोई मतलब नहीं रखता’

फिल्मकार बिकास रंजन मिश्रा झारखंड के हजारीबाग जिले के एक गांव से हैं. फिल्मों से उनका मोह उन्हें मुंबई खींच लाया और पेशे से पत्रकार रहे बिकास फिल्मकार बन गए. एक दलित बच्चे की मासूम प्रेम कहानी के जरिये जाति व्यवस्था पर चोट करती उनकी पहली फिल्म ‘चौरंगा’ रिलीज हो चुकी है. फिल्म और फिल्मी दुनिया तक उनके सफर पर प्रशांत वर्मा ने उनसे बातचीत की

 

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  • चिराग तले अंधेरा
    चिराग तले  अंधेरा

    अमानवीय परिस्थितियों और तमाम तरह के दबावों के बीच काम कर रहे पत्रकारों से सच का झंडाबरदार बनने की उम्मीद कैसे की जा सकती है..? हाल ये है कि समाज को सच की नई रोशनी दिखाने वालों पत्रकारों की जिंदगी में ही भयावह अंधेरा पसरा हुआ है

     

  • लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर
    लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर

    लुगदी कहकर जिस साहित्य को अब तक खारिज किया जाता रहा, उसे मुख्यधारा में तवज्जो मिलने लगी है

     

  • ‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’
    ‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’

    लगभग 90 प्रतिशत विकलांग साईबाबा को नागपुर जेल के बदनाम ‘अंडा सेल’ में रखा गया. इस दौरान उचित देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं के बिना साईबाबा की तबीयत कई बार बिगड़ी. साईबाबा ने अपनी गिरफ्तारी और पुलिस प्रताड़ना के बारे में दीप्ति श्रीराम से बात की

     

  • संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल
    संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल

    नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) की उम्र तीस साल हो गई है. इस सफर में जहां एक पीढ़ी अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर तो दूसरी प्रौढ़ हो चुकी है, बावजूद इसके सरदार सरोवर बांध बनने से विस्थापित हुए लोगों को अब तक न्याय का इंतजार है. अहिंसक और सत्याग्रह के रास्ते पर चलते रहना इस आंदोलन की रीढ़ है. तमाम उतार-चढ़ावों के बीच भी आंदोलन और इससे जुड़े लोगों का उत्साह कभी कम नहीं हुआ. ये आंदोलन भीमकाय सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में रह रहे सैकड़ों गांवों के लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है

     

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  • बिहार
    किस हाल में ‘माई’ के लाल
    किस हाल में ‘माई’ के लाल

    लालू के कोर वोट बैंक में यादव (वाई) और मुसलमान (एम) रहे हैं, जिसे बिहार में ‘माई (एमवाई)’ समीकरण कहा जाता रहा है. इन्हीं को साधकर लंबे समय तक वह बिहार में प्रभावी रहे हैं पर अब परिस्थितियां बदल रहीं हैं. यादव बहुल होने के बावजूद एक-एक कर ये इलाके उनके हाथों से निकल चुके हैं. यादवों के गढ़ में लगातार हार के बाद उनकी चिंता वाजिब ही है.

     

  • मध्यप्रदेश
    दान की आंखें कूड़ेदान में
    दान की  आंखें  कूड़ेदान में

    मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में दान में मिली आंखों के कूड़ेदान में मिलने से प्रबंधन सवालों के घेरे में है

     

  • जम्मू-कश्मीर
    आतंक का ऑनलाइन चेहरा
    आतंक का ऑनलाइन चेहरा

    घाटी के युवा तेजी से आतंकी संगठनों से जुड़ रहे हैं. सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ खुलेआम तस्वीरें और वीडियो अपलोड करने से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है

     

  • उत्तर प्रदेश
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस

    सोनभद्र में बन रहा कनहर बांध विवादों के केंद्र में है. आंबेडकर जयंती पर इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर गोलीबारी कई तरह के सवाल उठा रही है

     

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  • ‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’
    ‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

    शैवाल हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. उनकी ‘कालसूत्र’ कहानी पर चर्चित फिल्म ‘दामुल’ का निर्माण हुआ. उन्होंने इस फिल्म के लिए कथा, पटकथा और संवाद लिखे. इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार स्वर्ण कमल मिला. प्रसिद्घ फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने दामुल के बाद उनसे मृत्यदंड फिल्म की पटकथा लिखवाई. उन्हाेंने नई फिल्म ‘दास कैपिटल’ के लिए कथा, पटकथा और संवाद लिखे हैं. हाल ही में आई फिल्म ‘मांझी- द माउंटेनमैन’ में वे संवाद सलाहकार हैं. उनसे निराला की बातचीत

     

  • जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…
    जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

    साल 2014 जिन शख्सियतों की जिंदगी का अहम पड़ाव है, उनमें ग़ज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्त़र का नाम भी शामिल है. बेगम की याद में पूरे साल देशभर में जलसे और संगीत कार्यक्रम होते रहे, क्योंकि यह उनकी पैदाइश का सौंवा साल था. अगर सितारों के बीच कहीं से बेगम देख रही होंगी, तो फख्र कर रही होंगी कि जिस माटी से उन्होंने मुहब्बत की थी, उसने उन्हें भुलाया नहीं है

     

  • ‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’
    ‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’

    आदित्य मांडी संथाली भाषा के चर्चित कवि हैं. औपचारिक शिक्षा के तौर पर उन्होंने बांकुड़ा जिले के बारूघुटू गांव के स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई की. वे आगे पढ़ नहीं सके क्योंकि परिवार की आर्थिक हालत उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रही थी. उन्हें पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी. वे सीआइएसएफ में कांस्टेबल हैं और समय निकालकर कविता रचते हैं. उनका कविता संग्रह ‘बांचाव लड़हाई’ को साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया. उनसे निराला की बातचीत

     

  • चला गया समाजवादी आंदोलन का सिपाही
    चला गया समाजवादी आंदोलन का सिपाही

    समाजवादी चिंतक, विचारक, लेखक प्रो. कृष्णनाथ शर्मा नहीं रहे. 70 के दशक के आरंभिक सालों में उन्होंने साफ-साफ कह दिया था कि भारत में शीघ्र ही राजनीति हाजीपुर के मेले का रूप लेने वाली है. गठबंधन सरकार का दौर आने वाला है. सभी अपनी-अपनी सीटों के साथ दुकान लगाएंगे और बेचेंगे. उस समय उनकी इस बात पर काफी हंगामा भी हुआ था, लेकिन बाद में भारत की राजनीति उसी रास्ते पर चली.

     

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