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राष्ट्रीय मीडिया नीतीश कुमार को बदलाव का हरकारा बता रहा है. सच्चाई क्या है, करीब से जानने का प्रयास कर रहे हैं विजय सिम्हा. सभी फोटो: विजय पांडेय
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‘मेरे पास कोई बटन नहीं है जिसे दबाकर चीजें तुरंत बदल दूं’

बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव हैं, लेकिन लगता नहीं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस चुनौती की ज्यादा फिक्र है. विजय सिम्हा से बातचीत ...
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‘क्या मैं कोई दीमक हूं जिसने बिहार को खा लिया?’

यह उतरती ठंड का मौसम है, लेकिन पटना में चल रही सर्द हवा से इसका एहसास नहीं हो रहा. हम बिहार विधानसभा में विपक्ष की ...
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भाभी हुई किताबी

घर में रोक लगी तो क्या हुआ? देश की बहुचर्चित भाभी बरास्ते फ्रांस देश-दुनिया के दरवाजे पर फिर से दस्तक दे रही है. एडलिन बर्टिन की रिपोर्ट...
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बड़े सपनों की पाठशाला का नन्हा हेडमास्टर

16 साल के बाबर अली का स्कूल बताता है कि बड़े काम बड़ी उम्र के मोहताज नहीं होते. सम्राट चक्रबर्ती की रिपोर्ट...
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‘बाजार जाति को बरकरार रखेगा और उसे बेचेगा’

 ‘उचक्का’ नाम से आई अपनी आत्मकथा के जरिए मराठी लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ ने हिंदी पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाई. फिलहाल वे खानाबदोशों के अधिकारों ...
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'बहुत सारी बातें समझना चाहता हूं'

आरा में जन्मे और पटना में पले-बढ़े अमिताभ कुमार 1986 से न्यूयॉर्क में रह रहे हैं. हसबैंड ऑफ ए फैनेटिक, होम प्रोडक्ट्स, पासपोर्ट फोटोज और ...
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    कर्मन की गति न्यारी

    कर्ज की हमको दवा बताई  कर्ज ही थी बीमारी,  साधो!कर्मन की गति न्यारी.गेहूं उगे शेयर नगरी में खेतों में बस भूख उग रही मूल्य सूचकांक
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    खुशी प्रायोजित की जाएगी

    खुशी प्रायोजित की जाएगी ठंडे चूल्हे के पास बैठी हुई एक बीमार औरत मुस्कराएगी लंबी गाड़ी से उतरेगी एक गदराई हुई औरत और बनावटी फूल
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    झूठ पर सच का कब्जा

    पिछले 60 साल से गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है. गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम कभी भी कुछ ऐसा कहता-सुनता-समझता नजर नहीं आता जो पहले न
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    नौटंकियां सरकारी, पात्र हम

    दादाजी को जब रिटायरमेंट के बाद नगर पालिका से अपना हिसाब-किताब निपटाने के लिए अपनी दो-तीन चप्पलें-सैंडिल कम पड़ रही थीं तो वे अक्सर कहा
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    मातृभाषा

    जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के पास वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक लाल आसमान में डैने पसारे हुए हवाई अड्डे की ओर ओ मेरी भाषा मैं
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    मैं बहुत खुश थी अम्मा ! - अंशु मालवीय

    ये कविता, तहलका के एक पाठक कुमार मुकेश ने गुजरात पर तहलका के विशेष अंक में लिखे तरुण जी के संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए
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