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‘कर्म कर वेतन की चिंता छोड़ दे’
गीताप्रेस मामला
वेतन विसंगति को लेकर गोरखपुर स्थित गीताप्रेस इन दिनों विवादों के केंद्र में है. पिछले कुछ महीनों में तमाम मांगों को लेकर कर्मचारी कई बार हंगामा कर चुके हैं. प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. विवाद और इससे जुड़े विभिन्न...
पत्रकारिता : प्रतिनिधित्व का पाखंड
मीडिया के भीतर जब एक साथ धर्म, जाति और लैंगिक आधार पर भेदभाव और उनके प्रतिनिधित्व के अभाव को...
हिंदी बनाम अंग्रेजी : पत्रकारिता के दो रंग
अपने एक कमरे के छोटे-से किराये के ‘घर’ के दरवाजे पर ताला मारकर मैं दौड़ी-दौड़ी घर के सामने वाले...


कभी रवीश कुमार मत बनना

अपने आप को नौजवानों की आंखों में चमकते देखना किसे नहीं अच्छा लगता होगा. कोई आप से मिलकर इतना हैरान हो जाए कि उसे सबकुछ सपने जैसा लगने लगे तो आप भी मान लेंगे कि मुझे भी अच्छा लगता होगा. कोई सेल्फी खींचा रहा है कोई ऑटोग्राफ ले रहा है.  

जन मीडिया नहीं अभिजन मीडिया कहें

अपने एक लेख ‘मीडिया एंड गवर्नेंस’ की शुरुआत करते हुए पत्रकार मुकुल शर्मा आधुनिक राजनीति के बारे में दिलचस्प बातें कहते हैं. उनका कहना है कि आधुनिक राजनीति एक मध्यस्थता करने वाली राजनीति है, जो ज्यादातर नागरिकों द्वारा ब्रॉडकास्ट और प्रिंट मीडिया के जरिए अनुभव की जाती है. जाहिर सी  

फिल्म पत्रकारिता : पैसा दो, प्रशंसा लो

भारतीय सिनेमा बाजार पर अमेरिकी फिल्मों के बढ़ते वर्चस्व की समस्या का निदान निकालने हेतु अंग्रेजों ने 1927-28 में टी. रंगाचारियार की अध्यक्षता में एक सिनेमेटोग्राफ इंक्वायरी कमेटी गठित की. कमेटी का उद्देश्य अमेरिकी फिल्मों के बरक्स ब्रिटिश फिल्मों को बढ़ावा देने पर विचार करना था. इस कमेटी का महत्व  

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ज्यादा वक्त नहीं बीता जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने सोशल मीडिया पर फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को लेकर कामुक टिप्पणी की और वीडियो अपलोड किया. इसे ‘ओह माय गॉड! दीपिका’ज़ क्लीवेज शो’ जैसे घटिया शीर्षक के साथ लगाया गया था, जिसके बाद इस हरकत की आलोचना का दौर शुरू हुआ  

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  • लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर
    लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर

    लुगदी कहकर जिस साहित्य को अब तक खारिज किया जाता रहा, उसे मुख्यधारा में तवज्जो मिलने लगी है  

  • मारुति के मारे, व्यवस्था से हारे
    मारुति के मारे, व्यवस्था से हारे

    तकरीबन तीन साल पहले मारुति के मानेसर प्लांट में प्रबंधन से विवाद के बाद गिरफ्तार हुए मजदूरों के साथ जो हुआ और जो हो रहा है, क्या उसे किसी भी तरह मानवीय और न्यायोचित ठहराया जा सकता है?  

  • स्वार्थ का संगम!
    स्वार्थ का संगम!

    जब तक यह रिपोर्ट प्रकाशित होगी और आप इससे गुजर रहे होंगे, पूरी संभावना है तब तक दिल्ली में मुलायम सिंह के आवास से जनता परिवार के विलय की घोषणा हो चुकी होगी या उसकी आखिरी प्रक्रिया चल रही होगी. मुलायम सिंह यानी नेताजी के नेतृत्व में लालू प्रसाद यादव,  

  • शादी या बलात्कार का अधिकार
    शादी या बलात्कार का अधिकार

    आश्रय संबंधी सामान्य नियमों के अनुसार, कहा गया है कि विवाह के साथ ही स्त्री, अपने पति को यह अधिकार दे देती है कि वो जब चाहे अपनी इच्छानुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकता है और इस नियम में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हो सकता. हालांकि कनाडा, दक्षिण  

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  • बिहार
    उत्तराधिकार या पुत्राधिकार
    उत्तराधिकार या पुत्राधिकार

    महाभारत में एक कहानी है. यह है या नहीं, न मालूम लेकिन कई बार प्रसंगों व संदर्भों के साथ इसे सुनाया जाता है. जब कुरूक्षेत्र में युद्ध समाप्त हो जाता है तो धृतराष्ट्र और कृष्ण आमने-सामने होते हैं. धृतराष्ट्र कृष्ण से पूछते हैं कि तुम्हारा क्या लेना-देना था? तुमने क्यों   

  • उत्तर प्रदेश
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस

    इस साल अक्षय तृतीया पर जब देशभर में लगन चढ़ा हुआ था, बारातें निकल रही थीं और हिंदी अखबारों के स्थानीय संस्करण हीरे-जवाहरात के विज्ञापनों से पटे पड़े थे, तब बनारस से सटे सोनभद्र के दो गांवों में पहले से तय दो शादियां टल गईं. फौजदार (पुत्र केशवराम, निवासी भीसुर)  

  • झारखंड
    ‘मेरी लड़ाई किसी मजहब या मर्द जाति से नहीं, एक व्यक्ति से है’
    ‘मेरी लड़ाई किसी मजहब या मर्द जाति से नहीं, एक व्यक्ति से है’

    दो माह पहले तक आप इतने किस्म के लोगों से दिन-रात घिरी रहती थीं, अब अकेली हैं. पता नहीं कहां से इतने लोग इकट्ठा हो गए थे. संगठन वाले, मीडियावाले, राजनीतिवाले. लेकिन मैं जानती थी कि यह कुछ दिनों की ही बात है. फिर कोई नहीं आएगा. यानी आपको पहले  

  • उत्तराखंड
    गुरबत में गूजर
    गुरबत में गूजर

    सरकार की उपेक्षा के चलते उत्तराखंड में हजारों गूजर आदिम हालात में जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं.  

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  • बे‘पटरी’ जिंदगी
    बे‘पटरी’ जिंदगी

    कोई इन्हें कुत्ता कहे या कुछ और… फुटपाथ इनका बसेरा था, है और जो हालात नजर आ रहे हैं, ये आगे भी रहेगा. फुटपाथ पर कोई शौक से नहीं साेता, ये इनकी मजबूरी है. अकेले राजधानी में ही हजारों लोग फुटपाथ पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं. 2011 की जनगणना  

  • सड़क किनारे साहित्य
    सड़क किनारे साहित्य

    राजधानी दिल्ली का सांस्कृतिक केंद्र है मंडी हाउस और उसके आसपास का इलाका. शाम के वक्त यह इलाका एक साथ कई अलग-अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलजार रहता है. ऐसी ही एक शाम को मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर के बाहर काफी चहलपहल है. स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी  

  • किराए का कंधा
    किराए का कंधा

    शहरों में शादी-ब्याह और जन्मदिन के आयोजनों के लिए इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों की मदद लेना नई बात नहीं है. इससे पहले शादी-ब्याह और दूसरे आयोजन सामाजिक सहयोग से आसानी से हो जाते थे. लोगों के पास एक-दूसरे के लिए दिनोंदिन कम होते समय के कारण इन आयोजनों को सफलतापूर्वक पूरा कराने के लिए अब पेशवरों की मदद ली जा रही है. शहरों में अब एक नया चलन तेजी से विकसित हो रहा है. अब यहां ऐसी भी कई कंपनियां...  

  • सितारा देवी: ओझल सितारा…
    सितारा देवी: ओझल सितारा…

    94 की उम्र में अपने निधन से पहले वह लंबे समय से बीमारियों से जूझ रही थीं. सितारा देवी ने हिंदी सिने जगत में कथक का न केवल प्रवेश कराया बल्कि उसे एक अलग पहचान भी दिलाई. उनको याद करने के कई बहाने हैं. दिलों पर राज करना एक ऐसा  

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  • खेल का निकला तेल
    खेल का निकला तेल

    खेल का शास्त्रीय प्रारूप कहे जाने वाले टेस्ट क्रिकेट में भारत की दुर्गति कुछ तो खिलाड़ियों और खेल प्रशासकों के रवैय्ये का नतीजा है और कुछ इस संस्करण के वक्त से तालमेल न बिठा पाने का. इसका नुकसान आखिरकार खेल को ही होना है.  

  • भंवर में भाजपा
    भंवर में भाजपा

    बिहार विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने को बेताब भाजपा की राह में मुश्किलें हजार हैं. राज्य में नेतृत्व के सवाल से लेकर सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने में पार्टी के पसीने छूट रहे हैं  

  • बर्बर कानून को बेकरार सरकार
    बर्बर कानून को बेकरार सरकार

    गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम बिल को मानवाधिकार के खिलाफ माना जा रहा है  

  • शक्ति के पीछे की शख्सियत
    शक्ति के पीछे की शख्सियत

    नातजुर्बेकार लौंडे! एक दौर में इस विशेषण का प्रयोग कांग्रेस पार्टी के बुजुर्ग नेता अपने मन की भड़ास निकालने के लिए करते थे. चिढ़न से उपजे इन शब्दों का इस्तेमाल बुजुर्ग कांग्रेसी नेता उन युवाओं को कमतर ठहराने के लिए किया करते थे जिनको लेकर राजीव गांधी भविष्य की कांग्रेस