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फर्जी एनकाउंटर का खेल जनता को स्वीकार नहीं करना चाहिए

आप एक सामान्य चोरी के आरोपी को थाने में ले आइए तो लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि साहब देखिए, थाने में बैठाए हुए हैं, अब तक इसे उल्टा लटकाया नहीं गया, इसे पीटा नहीं गया.

तुम्हारे धर्म की क्षय

हिंदी को खड़ी बोली का नाम देने वाले राहुल सांकृत्यायन जीवन की गतिशीलता में विश्वास करते थे. इस गतिशीलता का अर्थ केवल घूमना या यायावरी नहीं बल्कि मानसिक जड़ता से निकलना भी था. समाज में फैले धर्म-जाति आधारित भेदभाव से ऊपर वे मानवता को रखते थे. उनकी ‘तुम्हारी क्षय’ नाम की किताब से लिए इस लेख में वे धर्म को इंसानियत से ऊपर रखने पर समाज को धिक्कारते हुए कहते हैं कि जो मजहब अपने नाम पर भाई का खून करने के लिए प्रेरित करता है उस मजहब पर लानत!

राजनीति का नया कलाम, ‘जय भीम – लाल सलाम’

हाल में विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़े वैचारिक टकराव और पुलिस कार्रवाइयों ने कई नए समीकरण पैदा किए हैं. संघर्ष की इस स्थिति में एक नए नारे की गूंज सुनाई देनी शुरू हुई है, ‘जय भीम, लाल सलाम’. सत्ताधारी दल और सरकार की ओर से राष्ट्रविरोधियों को चिह्नित करने का अभियान चला तो इसकी गाज छात्रों पर भी गिरी. प्रतिक्रिया में वामपंथी और दलित छात्र संगठनों के राजनीतिक गठजोड़ की कोशिश शुरू हुई और ‘जय भीम, लाल सलाम’ ने एक आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर ली है.



क्या घाटी में आईएस के झंडे लहराना आतंक की नई आहट है?

कश्मीर में सरकार के खिलाफ होने वाले विरोध-प्रदर्शनों में आए दिन आतंकी संगठन आईएस के झंडों का लहराया जाना बताता है कि घाटी के युवाओं का एक वर्ग इस संगठन के प्रति आकर्षित है. घाटी में एक समय विरोध-प्रदर्शन पत्थर फेंककर किए जाते थे, लेकिन अब प्रदर्शनों में इन झंडों का लहराया जाना भयावह स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है.

 
मै नास्तिक क्यों हूं?

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था. 27 सितंबर, 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल’ में यह लेख प्रकाशित हुआ. इसमें भगत सिंह ने ईश्वर के अस्तित्व पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ-साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है. स्वतंत्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31 के बीच लाहौर के सेंट्रल जेल में थे. उन्हें यह जानकर बहुत कष्ट हुआ कि भगत सिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है. वे किसी तरह भगत सिंह की कोठरी में पहुंचे और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की. असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, ‘प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे की तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है.’ इस टिप्पणी के जवाब में ही भगत सिंह ने यह लेख लिखा था.

 
बच्चों को हथियार बनाते माओवादी!

झारखंड में माओवादी संगठनों की जड़ें कमजोर हो रही हैं. ऐसे में वे अपने दायरे को बढ़ाने के लिए संगठन में बच्चों को जबरिया शामिल कर रहे हैं. हाल में गोमिया में पुलिस की गिरफ्त में आए दो बच्चों से यह सवाल उठा है कि क्या नक्सल आंदोलन की धारा पहले से विकृत हुई है?

 
ग्वालियर : कागजों में बसा सपनों का शहर

राजधानी दिल्ली से आबादी का दबाव कम करने के लिए लाई गई काउंटर मैग्नेट सिटी परियोजना में मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर को भी शामिल किया गया था. 30 हजार हेक्टेयर जमीन पर नया शहर बसाना था. पर आज ढाई दशक बाद भी ग्वालियर के पश्चिम क्षेत्र की उस जमीन पर नए शहर के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा तक खड़ा नहीं हो सका है.

 

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  • चिराग तले अंधेरा
    चिराग तले  अंधेरा

    अमानवीय परिस्थितियों और तमाम तरह के दबावों के बीच काम कर रहे पत्रकारों से सच का झंडाबरदार बनने की उम्मीद कैसे की जा सकती है..? हाल ये है कि समाज को सच की नई रोशनी दिखाने वालों पत्रकारों की जिंदगी में ही भयावह अंधेरा पसरा हुआ है

     

  • लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर
    लुगदी या लोकप्रिय : मुख्यधारा के मुहाने पर

    लुगदी कहकर जिस साहित्य को अब तक खारिज किया जाता रहा, उसे मुख्यधारा में तवज्जो मिलने लगी है

     

  • ‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’
    ‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’

    लगभग 90 प्रतिशत विकलांग साईबाबा को नागपुर जेल के बदनाम ‘अंडा सेल’ में रखा गया. इस दौरान उचित देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं के बिना साईबाबा की तबीयत कई बार बिगड़ी. साईबाबा ने अपनी गिरफ्तारी और पुलिस प्रताड़ना के बारे में बात की

     

  • संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल
    संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल

    नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) की उम्र तीस साल हो गई है. इस सफर में जहां एक पीढ़ी अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर तो दूसरी प्रौढ़ हो चुकी है, बावजूद इसके सरदार सरोवर बांध बनने से विस्थापित हुए लोगों को अब तक न्याय का इंतजार है. अहिंसक और सत्याग्रह के रास्ते पर चलते रहना इस आंदोलन की रीढ़ है. तमाम उतार-चढ़ावों के बीच भी आंदोलन और इससे जुड़े लोगों का उत्साह कभी कम नहीं हुआ. ये आंदोलन भीमकाय सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में रह रहे सैकड़ों गांवों के लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है

     

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  • बिहार
    किस हाल में ‘माई’ के लाल
    किस हाल में ‘माई’ के लाल

    लालू के कोर वोट बैंक में यादव (वाई) और मुसलमान (एम) रहे हैं, जिसे बिहार में ‘माई (एमवाई)’ समीकरण कहा जाता रहा है. इन्हीं को साधकर लंबे समय तक वह बिहार में प्रभावी रहे हैं पर अब परिस्थितियां बदल रहीं हैं. यादव बहुल होने के बावजूद एक-एक कर ये इलाके उनके हाथों से निकल चुके हैं. यादवों के गढ़ में लगातार हार के बाद उनकी चिंता वाजिब ही है.

     

  • मध्यप्रदेश
    दान की आंखें कूड़ेदान में
    दान की  आंखें  कूड़ेदान में

    मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में दान में मिली आंखों के कूड़ेदान में मिलने से प्रबंधन सवालों के घेरे में है

     

  • उत्तर प्रदेश
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस
    कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस

    सोनभद्र में बन रहा कनहर बांध विवादों के केंद्र में है. आंबेडकर जयंती पर इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर गोलीबारी कई तरह के सवाल उठा रही है

     

  • बिहार
    उत्तराधिकार या पुत्राधिकार
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  • वाहियात चीजों से अच्छा है, कुछ ऐसा करूं जो एक कलाकार के तौर पर मुझे खुशी दे: मानव कौल
    वाहियात चीजों से अच्छा है, कुछ ऐसा करूं जो एक कलाकार के तौर पर मुझे खुशी दे: मानव कौल

    प्रयोगवादी लेखक, मंजे हुए अभिनेता और निर्देशक के तौर पर मानव कौल ने रंगमंच और फिल्म इंडस्ट्री में एक अलहदा छवि बनाई है.

     

  • ‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’
    ‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

    शैवाल हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. उनकी ‘कालसूत्र’ कहानी पर चर्चित फिल्म ‘दामुल’ का निर्माण हुआ. उन्होंने इस फिल्म के लिए कथा, पटकथा और संवाद लिखे. इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार स्वर्ण कमल मिला. प्रसिद्घ फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने दामुल के बाद उनसे मृत्यदंड फिल्म की पटकथा लिखवाई. उन्हाेंने नई फिल्म ‘दास कैपिटल’ के लिए कथा, पटकथा और संवाद लिखे हैं. हाल ही में आई फिल्म ‘मांझी- द माउंटेनमैन’ में वे संवाद सलाहकार हैं. उनसे निराला की बातचीत

     

  • ‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’
    ‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’

    आदित्य मांडी संथाली भाषा के चर्चित कवि हैं. औपचारिक शिक्षा के तौर पर उन्होंने बांकुड़ा जिले के बारूघुटू गांव के स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई की. वे आगे पढ़ नहीं सके क्योंकि परिवार की आर्थिक हालत उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रही थी. उन्हें पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी. वे सीआइएसएफ में कांस्टेबल हैं और समय निकालकर कविता रचते हैं. उनका कविता संग्रह ‘बांचाव लड़हाई’ को साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया. उनसे निराला की बातचीत

     

  • जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…
    जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

    साल 2014 जिन शख्सियतों की जिंदगी का अहम पड़ाव है, उनमें ग़ज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्त़र का नाम भी शामिल है. बेगम की याद में पूरे साल देशभर में जलसे और संगीत कार्यक्रम होते रहे, क्योंकि यह उनकी पैदाइश का सौंवा साल था. अगर सितारों के बीच कहीं से बेगम देख रही होंगी, तो फख्र कर रही होंगी कि जिस माटी से उन्होंने मुहब्बत की थी, उसने उन्हें भुलाया नहीं है

     

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