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‘बिहार में लालू-नीतीश से ही पिछड़ों-दलितों की राजनीति की शुरुआत नहीं होती. मैं पिछड़े जमात से बना पहला मुख्यमंत्री था’

आप तो बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. राज्य में अधिकांश लोग जानते तक नहीं कि मांझी, लालू, राबड़ी, जगन्नाथ मिश्र के अलावा आप भी यहां के मुख्यमंत्री रहे हैं. जो आपको जानते हैं वे कहते हैं कि आप तो दो से तीन दिन के मुख्यमंत्री थे. चलिए कोई दो दिन  

नीतीश कुमार : आधी छोड़, पूरी को धावे

  पटना कुछ मायने में जानदार शहर है. जानदार होने का एक नमूना इस शहर में लगने वाली चौपालों में जाकर समझ सकते हैं. रोजाना बारहों मास यहां कई चौपालें लगती हैं. रोजाना गपबाजी पसंद करने वाले लोग बतकही के अड्डों पर जाना कभी भी नहीं भूलते. बतकही का विषय  

सीवान : बिहार सरकार की सीमा समाप्त

हाल ही में सीवान जाना हुआ. मशहूर मोदियाइन की दुकान पर लिट्टी-चोखा खाया और लोगों से बतकही हुई. मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर बबुनिया रोड पर भी चहलकदमी हुई. मिट्टी के बर्तन की दुकानों पर आने वाले लोगों से मुलाकात होती है. सब जगह एक ही सवाल होता है-  

चंपारण सत्याग्रह के 100 साल

न जाने कितनी बार चंपारण जाना हुआ है. दोनों चंपारण. यानी पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण. हमेशा से आकर्षित करता रहा है चंपारण. संघर्ष और सृजन, दोनों एक साथ करने की जो अद्भुत क्षमता है चंपारण में, वही आकर्षण का कारण है. पहली बार फूलकली देवी का काम सुनकर यहां  

समाज के तानों के खिलाफ महादलित महिलाओं की तान

सोना देवी आज भी याद करके सिहर जाती हैं कि कैसे उनके पति ने दाहिने गाल पर बेरहमी से थप्पड़ मारा था, जब उनको पता चला कि उनकी बीवी महादलित बैंड पार्टी में शामिल होकर बाजा बजा रही है. उस थप्पड़ की गूंज आज भी सोना देवी के कानों में  

झारखंड को लगा हिंसा का रोग

जब इस लेख को लिखा जा रहा है, तब हाल और हालात ऐसे हैं कि झारखंड की राजधानी भय और आतंक के माहौल में है. अनहोनी की आशंका से उपजा एक अनजाना सा डर राजधानीवासियों को अपने आगोश में लिए हुए है. राजधानी पुलिस छावनी में बदल चुकी है. राजधानी  

सत्ता का इकबाल खत्म?

दशहरे की शाम पटना के गांधी मैदान में भगदड़ से 33 लोगों की मौत के बाद जो हो रहा है उससे संकेत मिलता है कि बिहार मेंशासन और सत्ता का इकबाल खत्म हो चुका है.  

‘कोई स्त्री को कमजोर कहता है तो मुझे आंटी का वह चेहरा याद आता है’

पटना की यह मेरी दूसरी यात्रा थी. तब मैं रांची के सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ता था. मुझे जानकारी मिली थी कि मशहूर आलोचक नामवर सिंह व्याख्यान देने पटना आने वाले हैं. उन दिनों साहित्य और नामवर सिंह मुझ पर नशे की तरह सवार थे. मैं नामवर सिंह को दूरदर्शन