क्षतिपूर्ति से हितपूर्ति | Tehelka Hindi

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क्षतिपूर्ति से हितपूर्ति

हजारों करोड़ रु के जिस कैंपा फंड का मकसद उद्योगों के चलते जंगलों को हुए नुकसान की भरपाई करना है वह छत्तीसगढ़ में जेबें भरने का जरिया बन गया है

offबीती 10 जून को छत्तीसगढ़़ के मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात थी. इस मुलाकात के दौरान रमन सिंह ने प्रधानमंत्री से राज्य के पिछड़े इलाकों के विकास के लिए केंद्र से ‘विशेष आर्थिक पैकेज’ तो मांगा ही, राज्य में चल रही केंद्रीय योजनाओं पर भी चर्चा की. बताया जाता है कि इसी क्रम में उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की कि ‘कैंपा फंड’ के तहत छत्तीसगढ़़ को मिलने वाली बकाया राशि उन्हें एकमुश्त दे दी जाए.

‘कैंपा फंड’ वह कोष है जिसे साल 2009 में वनीकरण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा गठित किया गया था. रमन सिंह का तर्क था कि यह पूरी राशि एक साथ मिल जाने से उनकी सरकार इसके तहत होने वाले कामों को तेजी से अंजाम दे सकेगी. खबरों के मुताबिक उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने कैंपा के तहत राज्य सरकार द्वारा अब तक किए गए कामों का खूब बखान किया जिसके बाद प्रधानमंत्री ने उनकी इस मांग पर विचार करने की बात कही.

लेकिन इस मुलाकात के अगले ही दिन उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर हो गई. रमन सिंह के दावों के उलट याचिका में राज्य सरकार पर ‘कैंपा फंड’ के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाये गए थे. इस याचिका के मुताबिक छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों के दौरान कैंपा की राशि से बहुत सारे ऐसे काम किए गए जो नहीं किए जाने चाहिए थे. कैंपा के उद्देश्यों से इन कामों का न तो दूर-दूर तक कोई वास्ता था और न ही ये ऐसे थे कि आम लोगों को ही इनसे किसी तरह का लाभ पहुंच पाया. इस याचिका में आरोप लगाया गया कि राज्य के आला अधिकारियों तथा सरकार के नुमाइंदों ने मिलाभगत करके इस राशि का उपयोग अपने हित किया और खूब चांदी काटी. कैंपा कोष की निगरानी के लिए केंद्रीय स्तर पर गठित की गई सेंट्रल एंपावर्मेंट कमेटी को भी इसके दुरुपयोग की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद राज्य में कैंपा का पैसा गलत तरीके से खर्च किया जाता रहा. इस याचिका के जरिए यह भी अंदेशा जताया गया कि राज्य सरकार, केंद्र से ‘कैंपा कोष’ की राशि का एकमुश्त भुगतान इसलिए चाहती है ताकि वह इसका और भी दुरुपयोग करके लाभ कमा सके. बताया जा रहा है कि कैंपा फंड के तहत अगले पांच सालों में छत्तीसगढ़ को करीब 3000 करोड़ रु की धनराशि मिलनी है. याचिका के जरिए उच्चतम न्यायालय से मांग की गई है कि किसी स्वतंत्र एजेंसी से इस पूरे मामले की जांच की जाए और दोषी अधिकारियों से सारे धन की वसूली की जाए. मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्चतम न्यायालयने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है. इसके बाद से कैंपा फंड की राशि एक साथ दिए जाने की मुख्यमंत्री रमन सिंह की मांग सवालों के घेरे में आ गई है.

उच्चतम न्यायालय में यह याचिका छत्तीसगढ़ के एक स्वतंत्र पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह चौहान ने दायर की है. चौहान ने इस याचिका मे  कैंपा के कोष का गलत उपयोग करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार की सभी करतूतों का सिलसिलेवार तरीके से जिक्र किया है. कैंपा कोष के दुरुपयोग की यह कहानी नियम विरुद्ध निर्माण कार्यों से लेकर आलीशान वाहनों की खरीद, इको टूरिज्म एक्टिविटी, संरक्षित वनों को काटने और आला अधिकारियों के सैर सपाटे तक फैली हुई है. याचिका के मुताबिक सरकार ने इन सभी कामों पर ‘कैंपा कोष’ से तकरीबन 100 करोड़ रुपये खर्च किए. चौहान का कहना है कि इस पूरे खेल में राज्य के आधा दर्जन से अधिक बड़े अधिकारी सीधे तौर पर शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘कैंपा कोष’ के गलत उपयोग की इस कथा का वर्णन करने से पहले एक नजर कैंपा के गठन के पीछे की वजहों और उसके उद्देश्यों पर डालते हैं.

दिशा-निर्देशों को ताक पर रखते हुए कैंपा की राशि का भयानक दुरुपयोग हुआ. बुनियादी सुविधाओं के नाम पर नौकरशाहों के लिए शानदार बंगले बनाए गए

कैंपा यानी कंपंसेटरी एफारेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथोरिटी का गठन 2009 में उच्चतम न्यायालय द्वारा एक जनहित याचिका पर दिए गए निर्णय के आधार पर किया गया था. इस याचिका के जरिए आधा दर्जन से अधिक सामाजिक संगठनों ने देश भर में होने वाली औद्योगिक गतिविधियों के चलते पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता जाहिर करते हुए शीर्ष अदालत का ध्यान इस ओर खींचा था. इन संगठनों की मांग थी कि विकास की कीमत पर पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई हर हाल में की जानी चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने इन चिंताओं से इत्तेफाक रखते हुए एक आदेश जारी किया ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ कदमताल मिला सकें. उसने केंद्र सरकार से देश के अलग-अलग हिस्सों में पूरी तरह उजड़ चुके वनों के साथ ही बिगड़े स्वरूप वाले वनों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैंपा) का गठन करने को कहा. केंद्र को 14 राज्यों के साथ मिल कर एक कोष बनाने को कहा गया. उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि इस कोष की मदद से वनीकरण और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से जरूरी समझी जाने वाली सभी गतिविधियों को अमली जामा पहनाया जाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण संबंधी क्रियाकलापों के चलते होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के असर को कम किया जा सके. यानी उद्योगों को दी गई भूमि के बदले पेड़ लगाने के लिए फंड इकट्ठा किया जाना था ताकि जितने वन क्षेत्र को उद्योगों के लिए दिया गया उतनी जमीन पर कहीं और पेड़ लगाए जाएं.

इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 28 अप्रैल 2009 को कैंपा के गठन का आदेश जारी किया, दो जुलाई 2009 को मंत्रालय ने इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए. इनमें उन सभी बातों को लेकर प्रावधान बनाए गए जिनके आधार पर कैंपा कोष का उपयोग किया जाना था. मंत्रालय ने उन सभी क्षेत्रों का जिक्र तो किया ही जिनमें इस कोष के तहत मिलने वाले धन का उपयोग किया जा सकता है, साथ ही उन क्षेत्रों को भी साफ-साफ चिन्हित किया जिनमें इस फंड का पैसा लगाने की मनाही है. उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार ‘कैंपा कोष’ में जमा राशि का 10 फीसदी हिस्सा हर साल संबंधित राज्यों के वन विभाग को दिया जाता है. इसी आधार पर 2009-10 से लेकर 2012-13 तक छत्तीसगढ़ को क्रमश: 123.21 करोड़, 134.11 करोड़, 99.54 करोड़ तथा 114.38 करोड़ रुपए दिए गए.

यहीं से इस कोष के दुरुपयोग की कहानी भी शुरू होती है. उच्चतम न्यायालय में दायर की गई याचिका में इस कहानी का विस्तार से वर्णन किया गया है. यह याचिका बताती है कि वन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को ताक पर रखते हुए छत्तीसगढ़ में कैंपा की राशि का भयानक दुरुपयोग किया गया है. जो पैसा नए जंगल लगाने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए था उससे अधिकारियों और मंत्रियों के लिए महंगी गाड़ियां खरीदी गईं,  इंन्फ्रास्टक्चर यानी बुनियादी सुविधाओं के नाम पर नौकरशाहों के लिए शानदार बंगले और हॉस्टल बनवाए गए. दुरुपयोग की यह सूची लंबी है.

2010-11 तथा 2011-12 में आई कैग की रिपोर्टों में भी कैंपा कोष के दुरुपयोग की बातें उजागर हुई थी. इसके अलावा आरटीआई तथा अन्य स्रोतों से प्राप्त दस्तावेज भी इस याचिका में लगाए गए आरोपों की सत्यता को साबित करते हैं. ये सभी दस्तावेज बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में कम से कम आधा दर्जन ऐसे क्षेत्रों में ‘कैंपा कोष’ का पैसा खर्च किया गया जिनमें इसे खर्च नहीं किया जाना चाहिए था.

इन सभी क्षेत्रों मे हुए कैंपा राशि के दुरुपयोग को लेकर नारायण सिंह चौहान ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से लेकर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा लोक आयोग (लोकायुक्त) तक से शिकायत की थी. लेकिन सभी मोर्चों से उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. इसके बाद अब वे इस मामले को न्यायालय में ले गए हैं.

राज्य सरकार द्वारा कैंपा मद के दुरुपयोग के मामले कई तरह के हैं. सबसे पहले अधिकारियों के लिए महंगी गाड़ियों की खरीद संबंधी मामले का जिक्र करते हैं. आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि 2009 से लेकर 2013 तक छत्तीसगढ़ में कैंपा की राशि से तकरीबन 20 करोड़ रुपये सिर्फ गाड़ियों की खरीद पर ही खर्च कर दिए गए. केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की गाइड लाइन के मुताबिक कैंपा राशि से केवल बेहद जरूरी परिस्थितियों में ही से रेंज आफिसर (रेंजर) तथा इससे निचले स्तर के कर्मचारियों के लिए ही वाहन खरीदे जा सकते थे. लेकिन इस कोष से खरीदी गई अधिकतर गाड़ियों को रेंजर स्तर से उपर के अधिकारियों को आवंटित किया गया. इन गाड़ियों में टाटा सफारी, टाटा मांजा, टोयटा तथा एंबेसडर जैसी गाड़ियां शामिल हैं जबकि कैंपा की राशि से महंगे वाहनों की खरीद की मनाही थी. कैंपा के दिशानिर्देशों के विपरीत जाकर वाहनों की खरीद का मामला 2011-12 की कैग रिपोर्ट में भी सामने आया था. इस रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने उस साल कैंपा कोष से 23 वाहन खरीदे. रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के वन मंत्री तथा प्रमुख सचिव (वन) के लिए ही तकरीबन 20 लाख रुपये खर्च करके कैंपा की राशि से दो टाटा सफारी खरीदी गईं.

रामपुर गांव जिसे श्रीरामपुर के नाम से एक दूसरी जगह पर बसाया गया है.

नारायण सिंह चौहान कहते हैं, ‘यह पूरी तरह से कैंपा के पैसों का खुला दुरुपयोग है. कैंपा के दिशानिर्देशों के मुताबिक रेंजर स्तर से ऊपर के अधिकारियों के लिए कोई भी वाहन नहीं खरीदा जाना चाहिए था, लेकिन यहां जितने भी वाहन खरीदे गए उनमें से अधिकांश वाहनों को बड़े अधिकारियों को ही दिया गया.’

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  • अच्छी और कई तथ्यों को उजागर करती हुई रिपोर्ट.