
स्नेहल चौरसिया |
कश्मीर घाटी में 1990 के दशक के दौरान हुई कश्मीरी पंडितों की हत्याओं से जुड़े पुराने और अनसुलझे मामलों की फाइलें अब दोबारा खोली जा रही हैं। जम्मू-कश्मीर प्रशासन और जांच एजेंसियों ने आतंकवाद से जुड़े पुराने मामलों की नए सिरे से जांच शुरू की है। इसी क्रम में वंधामा नरसंहार मामले की करीब 28 साल बाद आधिकारिक तौर पर दोबारा जांच शुरू की गई है।
23 कश्मीरी पंडितों की हुई थी हत्या
वंधामा गांव में 25 जनवरी 1998 की रात आतंकियों ने कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया था। रिपोर्ट के मुताबिक, सेना की वर्दी में आए हथियारबंद आतंकियों ने चार परिवारों के सदस्यों को एक जगह इकट्ठा किया और गोलीबारी कर दी। इस हमले में 9 महिलाओं और 4 बच्चों समेत 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी। मृतकों में जम्मू से अपने रिश्तेदारों से मिलने आए पांच लोग भी शामिल थे। घटना के बाद देशभर में भारी आक्रोश देखने को मिला था, लेकिन मामला लंबे समय तक जांच के स्तर पर आगे नहीं बढ़ सका।
SIA ने शुरू की पुराने मामलों की पड़ताल
अब स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने वंधामा नरसंहार और पुराने टारगेट किलिंग मामलों को लेकर कार्रवाई शुरू की है। जांच एजेंसी की टीमों ने कश्मीर घाटी में कई संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की है। जांच का उद्देश्य उन आतंकियों के साथ-साथ उनके कथित मददगारों और ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) की पहचान करना है, जिन्होंने आतंकियों को हथियार, रसद या पनाह उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई हो सकती है।
कई पुराने हत्याकांड भी जांच के दायरे में
पुराने मामलों की जांच में कई चर्चित हत्याकांड शामिल हैं। जस्टिस नीलकंठ गंजू हत्याकांड (1989): जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस नीलकंठ गंजू ने जेकेएलएफ संस्थापक मकबूल भट को मौत की सजा सुनाई थी। 1989 में श्रीनगर में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। टीका लाल टपलू हत्याकांड (1989): वरिष्ठ वकील, भाजपा नेता और कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रमुख चेहरे टीका लाल टपलू की श्रीनगर में उनके घर के पास हत्या कर दी गई थी। सरला भट हत्याकांड (1990): नर्स सरला भट की हत्या के मामले में भी जांच आगे बढ़ाई गई है। एसआईए ने इस मामले में हाल ही में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल किए जाने की जानकारी दी है।
सर्वानंद कौल प्रेमी हत्याकांड (1990): कश्मीरी पंडित लेखक सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल का अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी नए सिरे से कार्रवाई की जा रही है तीन दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद अब इन मामलों की दोबारा जांच से पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद जगी है। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इतने वर्षों बाद नए सबूत, गवाह और पुराने आतंकी नेटवर्क से जुड़े लोगों तक जांच एजेंसियां किस तरह पहुंचती हैं।



