तहलका ब्यूरो।
नई दिल्ली/कोलकाता।पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक युगांतकारी परिवर्तन के साथ शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की है, जिसने राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पहले शासन की शुरुआत कर दी है। इस सत्ता परिवर्तन के बीच तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी का बयान राज्य की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला प्रतीत होता है।
बनर्जी ने न केवल चुनावी शुचिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, बल्कि चुनाव बाद हुई हिंसा को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताया है। उनका यह विश्लेषण चुनावी हार के बाद टीएमसी की उस रणनीति को स्पष्ट करता है, जहाँ वे सड़क से लेकर सदन तक एक आक्रामक विपक्ष के रूप में खुद को स्थापित करने की तैयारी में हैं।
अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग और सरकारी मशीनरी की निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा करते हुए दावा किया कि लगभग 30 लाख वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर रखा गया। ईवीएम मूवमेंट और कंट्रोल यूनिट्स में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए उन्होंने सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने और वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग को पुनः दोहराया है। उनका तर्क है कि जब तक यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती, तब तक जनता के वास्तविक जनादेश पर संदेह के बादल बने रहेंगे। सबसे गंभीर चिंता उन्होंने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर व्यक्त की है।
बहरहाल, भले ही आंकड़ों में भाजपा 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत में है और टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई है, लेकिन अभिषेक बनर्जी का यह रुख स्पष्ट करता है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी दिल्ली और बंगाल दोनों मोर्चों पर एक अडिग और मुखर विपक्ष की भूमिका निभाएगी। यह संघर्ष केवल सत्ता की वापसी का नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और जनता के अधिकारों की रक्षा का आह्वान है।




