बृज खंडेलवाल

ढोलक की थाप, रंग-बिरंगी राखियां और मिठाइयों की खुशबू से बाजार गुलजार हैं। दुकानों पर बहनें राखियां चुन रही हैं, बच्चे उत्साह में हैं और भाई भी इस बार कलाई पर सिर्फ प्यार नहीं, देशभक्ति का धागा बांधने को तैयार हैं। 28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस बार राखी का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मनिर्भर भारत के संदेश का भी वाहक बनता दिख रहा है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के मुताबिक, इस साल राखी से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 25 हजार करोड़ रुपये है। पिछले साल यह आंकड़ा करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। मिठाई, कपड़े, उपहार और पैकेजिंग को जोड़ दें तो त्योहार का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है।
राखी में ‘विकसित भारत’ का संदेश
बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ कई थीम आधारित राखियां भी खूब पसंद की जा रही हैं। इनमें ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘भारत गौरव’, ‘ब्रह्मोस’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ और ‘अमृत काल’ जैसी राखियां शामिल हैं। ‘नारी वंदन’, ‘लखपति दीदी’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी राखियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बच्चों और युवाओं में खास तौर पर ब्रह्मोस, राष्ट्र रक्षा सूत्र और विकसित भारत वाली राखियों को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है।
CAIT के महासचिव और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ और आत्मनिर्भर भारत की सोच ने ग्राहकों का भरोसा बढ़ाया है। उनके अनुसार, स्वदेशी राखी अब सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि देश के प्रति गर्व का प्रतीक बन रही है। CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया का कहना है कि इन राखियों के जरिए बहनें केवल कलाई पर पवित्र धागा नहीं बांध रहीं। वे राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश भी दे रही हैं।
राखी में भारत की कारीगरी
इस बार राखियों का बाजार सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की विविध लोक कला और कारीगरी भी खूब नजर आ रही है। नागपुर की खादी राखियां, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज राखियां और असम की चाय-पत्ती से बनी राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। कोलकाता की जूट, मुंबई की रेशम, बिहार की मधुबनी कला और बेंगलुरु की फूलों वाली राखियां भी खूब बिक रही हैं। आदिवासी कारीगरों की बांस से बनी राखियों और कानपुर की मोती राखियों की भी मांग बढ़ी है। इन राखियों ने छोटे कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों के लिए कमाई के नए दरवाजे खोले हैं। CAIT के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने व्यापारियों और ग्राहकों से त्योहारों में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका संदेश है—‘स्वदेशी अपनाएं, भारत मजबूत बनाएं।’
चीनी राखियां बाजार से बाहर
पिछले कुछ वर्षों में जिस बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब बाजार में साफ दिखाई दे रही है। चीनी राखियों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है और दुकानों पर भारतीय राखियों ने उनकी जगह ले ली है। CAIT अब देश के अलग-अलग शहरों में विशेष स्वदेशी मेले लगाने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को अपने हाथ से बनाए उत्पाद बेचने का मौका मिलेगा। इस बदलाव का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों और कुटीर उद्योगों को मिल रहा है। राखी का छोटा-सा धागा अब रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।
वृंदावन की विधवाओं की खास राखियां
इस साल एक भावुक पहल ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। वृंदावन की विधवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 1,100 से अधिक विशेष राखियां तैयार की हैं। इन राखियों में सिर्फ धागा नहीं, बल्कि अपनापन, उम्मीद और सामाजिक जुड़ाव का संदेश भी है। यह परंपरा कई वर्षों से स्नेह और एकजुटता की मिसाल बनी हुई है। राखी भेजने के लिए डाक विभाग ने भी बड़े शहरों में विशेष काउंटर लगाए हैं, ताकि दूर रहने वाले भाइयों तक समय पर राखियां पहुंच सकें। रक्षाबंधन अभी एक सप्ताह से अधिक दूर है, लेकिन बाजारों में त्योहार का रंग चढ़ चुका है। इस बार राखी की कलाई पर प्यार के साथ स्वदेशी, कारीगरी, रोजगार और राष्ट्र गौरव का धागा भी बंधता नजर आ रहा है। कहने को राखी कुछ इंच का धागा है, लेकिन इस बार उसका संदेश काफी लंबा है—अपना खरीदिए, स्थानीय को बढ़ाइए और भारत को आत्मनिर्भर बनाइए।



