पुरुषोत्तम कुमार
मोकामा की धरती पर एक बार फिर भूचाल है।जिस नाम का डंका पूरे मगध में बजता है, जिन्हें लोग प्यार से छोटे सरकार कहते हैं, जिनके बयान हमेशा वायरल होते है,काला चश्मा, बड़ी मूंछें और बेबाक अंदाज़। मोकामा के बाहुबली अनंत सिंह, जो बोलते हैं डंके की चोट पर बोलते हैं। आज वही बेबाकी उन पर भारी पड़ती दिख रही है। ख़बरों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर एक दिसंबर तक सरेंडर करने को कहा है। सवाल ये है कि इस फ़ैसले तक पहुँचने का रास्ता किसने बिछाया, और किसने ठान लिया है कि इस बाहुबली को कूटनीति से किनारे लगाना है?
हत्या, गिरफ़्तारी, जमानत: एक साल में कितना बदल गया मोकामा
30 अक्टूबर 2025 को मोकामा में दुलारचंद यादव की हत्या हुई। दुलारचंद जन सुराज उम्मीदवार का समर्थन कर रहे थे और अनंत सिंह से उनकी करीब दो दशक पुरानी अदावत बताई जाती है। अनंत सिंह की गिरफ़्तारी हुई और निचली अदालत से जमानत अर्ज़ी ख़ारिज हो गई।
फिर 19 मार्च 2026 को पटना हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। जेल से बाहर आते ही समर्थकों ने फूल बरसाए और आतिशबाज़ी की। तस्वीरें ऐसी थीं मानो कोई सम्राट लौट आया हो। लेकिन जब मोकामा जश्न मना रहा था, उसी वक़्त दिल्ली में एक नई फ़ाइल खुल रही थी।
जब मोकामा झूम रहा था, दिल्ली में खुल रही थी नई फ़ाइल
दुलारचंद यादव के पोते नीरज हाईकोर्ट की जमानत के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। क़ानूनी तौर पर बाज़ी उन्हीं के नाम रही। पर अनंत सिंह खेमे का दावा कुछ और कहता है।
इस खेमे के मुताबिक जेडीयू एमएलसी नीरज कुमार अपने बेटी से मिलने के बहाने दिल्ली गए, जबकि असल मक़सद सुप्रीम कोर्ट के रास्ते अनंत सिंह को घेरना था। दावा है कि इस खेल में कुछ बड़े नामों का साथ मिला, कहा ये भी जा रहा है कि नीरज कुमार की बेटी वकील हैं जो दिल्ली में प्रैक्टिस करती हैं। तो क्या ये सिर्फ़ इंसाफ़ की लड़ाई थी, या इंसाफ़ की आड़ में कोई और कहानी लिखी जा रही थी?
एक बयान, जिसने बड़े सरकार तक पहुँचा दी आँच
अक्टूबर 2026 में विधान परिषद चुनाव के दौरान जदयू ने अनंत सिंह के पुराने सियासी प्रतिद्वंद्वी नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया। अनंत नाराज़ हुए और जन सुराज के अनुज सिंह के प्रचार में उतर गए। तभी उनका वो बयान सामने आया, जिसमें कथित तौर पर उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के साथ रहकर उन्होंने नौ लोगों की हत्या कराई।
इस दावे से बिहार में सियासी भूचाल आ गया। विपक्ष ने सत्ता और अपराध के रिश्ते पर सवाल उठाए, और छींटे सीधे नीतीश कुमार तक पहुँचे, जिनकी पूरी राजनीतिक पहचान साफ़ छवि पर टिकी है। ऐसा हल्का-फुल्का दाग भी उन्हें कबूल नहीं हो सकता। हालाँकि अनंत सिंह ने बाद में कहा कि उनके बयान को ग़लत ढंग से पेश किया गया।
बीस मिनट की बैठक और छह साल का निष्कासन
जदयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया और विधानसभा सदस्यता ख़त्म करने के लिए स्पीकर को पत्र भी लिखा। पार्टी के मुताबिक कारण थे बार-बार निर्देशों का उल्लंघन, शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ अपमानजनक भाषा और जदयू उम्मीदवार के ख़िलाफ़ प्रचार।
निष्कासन से पहले नीतीश कुमार ने ललन सिंह के आवास पर क़रीब बीस मिनट की अहम बैठक की, और जदयू उम्मीदवार नीरज कुमार की तबीयत बिगड़ने पर उनसे मिलने भी पहुँचे।
शतरंज की बिसात, प्यादा कौन और खिलाड़ी कौन?
अब वो सवाल, जो सियासी गलियारों में फुसफुसाहट बनकर घूम रहे हैं।
क्या एक भूमिहार नेता के बढ़ते कद से किसी को बेचैनी है? मोकामा से मगध तक अनंत सिंह की पकड़ किसकी राह का काँटा बन रही थी?
क्या ललन सिंह का नाम सिर्फ़ अनंत खेमे का सियासी शक है, या बात इससे आगे की है? क्या संजय झा का नाम इसलिए चर्चा में है कि कोई और चाल चल रहा है? और संजय झा की बेटियों के सुप्रीम कोर्ट में वकील होने की चर्चा महज़ संयोग है या संयोग के पीछे कुछ और?
अब तक कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि ललन सिंह, संजय झा या नीरज कुमार का इस मामले में कोई हाथ है। ये अनंत सिंह खेमे के दावे और सियासी चर्चाएँ हैं। जदयू का कहना है कि कार्रवाई अनुशासनहीनता पर हुई।
बड़े सरकार की छाँव गई, अब छोटे सरकार किसके भरोसे?
अनंत सिंह की सियासत की जड़ें जिस नीतीश कुमार की छाँव में पनपीं, आज वही छाँव उनके सिर से हट चुकी है। छोटे सरकार की कहानी बड़े सरकार के बिना अधूरी थी, और यही अधूरापन उनकी सबसे बड़ी चुनौती है।
एक दिसंबर की तारीख़ क़रीब है। सरेंडर होगा, या सुप्रीम कोर्ट में कोई नया दाँव? क्या कोई और दल उन्हें गले लगाएगा, या छोटे सरकार ख़ुद मोर्चा सँभालकर इस चक्रव्यूह को तोड़ेंगे?
सस्पेंस बरकरार है। देखिए आगे-आगे होता है क्या।




