एसआईआर नोटिस पर घर आएंगे बीएलओ, ईसीआईनेट की समीक्षा होगी; दिल्ली-महाराष्ट्र में दावे-आपत्तियों की समयसीमा बढ़ी

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चुनाव आयोग ने एसआईआर नोटिस से जुड़ी प्रक्रिया और दिल्ली-महाराष्ट्र में दावे-आपत्तियों की समयसीमा में बदलाव की घोषणा की। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

बैठक के बाद आयोग की ब्रीफिंग- नोटिस वाले मतदाताओं को सामान्यतः सुनवाई के लिए दफ्तर नहीं बुलाया जाएगा, दिल्ली-महाराष्ट्र में दावे-आपत्तियों की समयसीमा बढ़ी; आयोग ने एसआईआर के फैसलों को सर्वसम्मत बताया, लेकिन आंतरिक असहमतियों और आईटी विभाग की निगरानी पर भी दी सफाई

एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली

चुनाव आयोग की तीनों आयुक्तों की शनिवार को हुई बैठक के बाद मीडिया ब्रीफिंग में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से लेकर डिजिटल व्यवस्था और आयोग के भीतर फैसलों की प्रक्रिया तक कई अहम घोषणाएं की गई हैं। आयोग ने फैसला किया है कि एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं को नाम का पुराने रिकॉर्ड से मिलान नहीं होने या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया गया है, उन्हें सामान्यतः सुनवाई के लिए निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर नहीं बुलाया जाएगा। बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) उनके घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर सहित उसके सभी निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। साथ ही, ईसीआईनेट की समीक्षा के लिए स्वतंत्र आईटी विशेषज्ञ को शामिल करने और अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर भी निर्देश जारी किए गए हैं।

1. एसआईआर नोटिस मिला है? बीएलओ आपके घर आएंगे

आयोग के मुताबिक, एसआईआर के दौरान जिन लोगों को पुराने रिकॉर्ड से नाम का मिलान नहीं होने या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया गया है, उनके दस्तावेज बीएलओ घर जाकर जुटाएंगे। इसके बाद दस्तावेज ईसीआईनेट पर अपलोड किए जाएंगे और निर्णय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) करेंगे। ऐसे मतदाताओं को सामान्य परिस्थितियों में ईआरओ या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) के कार्यालय में सुनवाई के लिए नहीं बुलाया जाएगा। अपवादस्वरूप, यदि ईआरओ आवश्यक समझेंगे तो सुनवाई होगी, जिसे प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन कराने की बात कही गई है। मतदाता जरूरत पड़ने पर अपने परिवार के किसी वयस्क सदस्य को भी सुनवाई में शामिल होने के लिए अधिकृत कर सकेंगे। यह व्यवस्था उन मतदाताओं के लिए राहत का कदम है, जिन्हें नोटिस मिलने के बाद दस्तावेज जुटाने और सुनवाई केंद्र तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है।

2. बेघर, गरीब और श्रमिक मतदाताओं को विशेष सहायता देंगे

आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) को निर्देश दिया है कि रैन बसेरों, श्रमिकों, गरीबों और बेघर लोगों सहित जरूरतमंद समूहों के लिए पर्याप्त सहायता डेस्क और विशेष शिविर लगाए जाएं। इसका उद्देश्य ऐसे पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया में सहायता देना है, जिनके पास स्थायी निवास, जरूरी दस्तावेज या ऑनलाइन आवेदन की सुविधा नहीं है। आयोग ने यह भी दोहराया कि एसआईआर पूरा हो जाने के बाद भी किसी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जुड़ सकता है। नए मतदाता और वे लोग, जिनका नाम पुनरीक्षण के दौरान छूट गया है, संबंधित ईआरओ के पास सतत अद्यतन प्रक्रिया के तहत आवेदन कर सकते हैं।

3. दिल्ली में 30 अक्टूबर तक दावे-आपत्तियां, महाराष्ट्र को भी राहत

दिल्ली और महाराष्ट्र के लिए दावे तथा आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने का फैसला भी लिया गया है।

दिल्लीः 30 अक्टूबर 2026 तक दावे और आपत्तियों को लेकर आवेदन; नोटिस और दावे-आपत्तियों के निस्तारण की समयसीमा 30 नवंबर 2026 तक बढ़ाई गई।

महाराष्ट्रः 12अक्टूबर 2026 तक दावे और आपत्तियों पर आवेदन; नोटिस और दावे-आपत्तियों के निस्तारण की समयसीमा 10 नवंबर 2026 तक बढ़ाई गई। ये विस्तार संबंधित राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के अनुरोध पर किए गए हैं।

4. ईसीआईनेट की आईटी विशेष करेंगे स्वतंत्र समीक्षा, जांच समिति बनी

ईसीआईनेट को लेकर आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त की अध्यक्षता में गठित समिति में आईआईटी या आईटी क्षेत्र का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होगा। समिति यह जांच करेगी कि ईसीआईनेट कानूनों और नियमों के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं और अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपेगी। आयोग ने कहा है कि पिछले कुछ महीनों में राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से मिले सुझावों के आधार पर पोर्टल में कई बदलाव किए गए हैं। यदि फील्ड अधिकारियों को आगे भी अतिरिक्त सुविधाओं की जरूरत होगी तो उन्हें लागू किया जाएगा। इसके साथ ही आईटी मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़े नए प्रस्ताव पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा के लिए रखे जाएंगे। आयोग की मंजूरी के बाद ही उन्हें लागू किया जाएगा।

5. आयोग ने फिर कहा- एसआईआर समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से

आयोग ने एसआईआर को लेकर उठे सवालों पर अपना पक्ष दोहराया है। उसके मुताबिक, 24 जून 2025 को बिहार से शुरू हुए एसआईआर और अन्य राज्यों में इसके विस्तार का निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिया गया था। आयोग ने कहा कि 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी 24 जून 2025 के आदेश को बरकरार रखा था। आयोग के अनुसार, 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए एसआईआर का कार्यक्रम 27 अक्टूबर 2025 को और 19 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 14 मई 2026 को पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से जारी किया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि पहले दो चरणों में 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर पूरा हो चुका है। तीसरे चरण के शेष 12 राज्यों में अंतिम प्रकाशन के बाद ही मतदाताओं की कुल संख्या का आंकड़ा स्पष्ट होगा।

6. आंतरिक असहमतियों और आईटी विभाग पर भी सफाई

आयोग ने कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र का भी जिक्र किया है। आयोग के अनुसार, यह पत्र किसी नीतिगत मुद्दे या आईटी विभाग से संबंधित नहीं था, बल्कि चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्त एक अधिकारी के कार्य से जुड़ा था। आयोग का दावा है कि संबंधित अधिकारी के काम का पुनर्वितरण करने के आदेश दो आयुक्तों के निर्देशों के बाद भी लागू नहीं किए गए थे और आईटी विभाग पर उप निर्वाचन आयुक्त की निगरानी कभी वापस नहीं ली गई थी।

साथ ही आयोग ने निर्देश दिया है कि प्रत्येक बैठक का एजेंडा पहले प्रसारित किया जाए और कार्यवृत्त जारी किया जाए। अधिकारियों की वार्षिक कार्य निष्पादन रिपोर्ट (एपीएआर) हर वर्ष 31 दिसंबर तक पूरी होनी चाहिए। अधिकारियों के विदेश दौरों के लिए आयोग की मंजूरी और आयोग के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को भी कहा गया है।

7. तस्वीर में एकजुटता, प्रेस नोट में सर्वसम्मति—लेकिन सवाल अभी बाकी

26 सितंबर की बैठक के बाद आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर समेत उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। नोटिस वाले मतदाताओं के लिए घर पर दस्तावेज जुटाने की व्यवस्था, ईसीआईनेट की स्वतंत्र समीक्षा और दिल्ली-महाराष्ट्र में समयसीमा बढ़ाने जैसे फैसले तत्काल व्यावहारिक महत्व रखते हैं। लेकिन आयोग की सफाई और नए प्रशासनिक निर्देश अपने आप उन सभी सवालों का उत्तर नहीं हैं, जो उसकी निर्णय प्रक्रिया, आंतरिक असहमतियों और डिजिटल प्रणाली की पारदर्शिता को लेकर उठे हैं। अब निगाह इस पर रहेगी कि बीएलओ के घर जाकर दस्तावेज जुटाने की व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी होती है, ईसीआईनेट समीक्षा की रिपोर्ट में क्या निकलता है और मतदाता सूची से छूटे पात्र लोगों के नाम जोड़ने की प्रक्रिया कितनी सुगम बनती है।