नई दिल्ली | तहेलका न्यूज | स्नेहलता
श्राद्ध आते ही लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं—क्या यह अशुभ समय है? क्या पितरों का श्राद्ध करने की वजह से इस दौरान शुभ काम रोक दिए जाते हैं? अगर पितर हमारे लिए पूजनीय हैं तो उनके सम्मान का यह समय अशुभ कैसे हो सकता है?
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ अंजलि सहानी के मुताबिक, श्राद्ध को सीधे तौर पर अशुभ मानना सही नहीं है। हिंदू परंपरा में यह समय पितरों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माना गया है। धर्मशास्त्रीय परंपरा में तर्पण और श्राद्ध को पितरों के सम्मान से जुड़े कर्म के रूप में बताया गया है। मनुस्मृति की व्याख्याओं में भी पितरों को श्राद्ध में विशेष सम्मान दिया गया है।
2026 में कब से कब तक पितृ पक्ष?
पंचांग के अनुसार 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। अलग-अलग तिथियों पर संबंधित मृत्यु-तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
तर्पण कब और कैसे?
परंपरा में पितृ तर्पण के लिए जल अर्पित किया जाता है। धर्मशास्त्रीय संदर्भों में तर्पण को देवताओं और पितरों को जल अर्पित करने की धार्मिक क्रिया बताया गया है।
अंजलि सहानी के अनुसार सामान्य रूप से स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, पितरों का स्मरण करते हुए जल में काले तिल मिलाकर अर्पित किया जाता है। जिन परिवारों में विशेष गोत्र या मंत्र की परंपरा है, उन्हें उसी पारिवारिक परंपरा के अनुसार विधि करनी चाहिए।
ऑफिस जाने वालों के लिए क्या करें?
हर व्यक्ति के लिए लंबी पूजा करना संभव नहीं है। ऐसे लोग सुबह स्नान के बाद थोड़े समय में श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण कर जल और तिल का तर्पण कर सकते हैं। यदि परिवार में पुरोहित द्वारा बताई गई कोई विशेष विधि है तो उसे प्राथमिकता देना उचित है।
यात्रा में हैं तो क्या तर्पण हो सकता है?
श्राद्ध के लिए हमेशा घर पर होना अनिवार्य नहीं माना जाता। यात्रा में रहने वाला व्यक्ति भी उपलब्ध स्वच्छ स्थान पर पितरों का स्मरण और जल अर्पण कर सकता है। हालांकि विस्तृत श्राद्ध, पिंडदान या विशेष अनुष्ठान के लिए स्थानीय पुरोहित से विधि और स्थान के अनुसार सलाह लेना बेहतर है।
फिर शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते?
सबसे बड़ी भ्रांति यही है कि श्राद्ध पक्ष को भगवान की नाराजगी या अशुभता का समय समझ लिया जाता है। दरअसल धार्मिक परंपराओं में इस अवधि का मुख्य उद्देश्य उत्सव और मांगलिक संस्कारों की बजाय पितरों के स्मरण और उनके प्रति कर्तव्य पर केंद्रित रहना है।
इसलिए विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को इस अवधि में टालने की परंपरा विकसित हुई। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान के दरवाजे बंद हो जाते हैं या भगवान छुट्टी पर चले जाते हैं। यह धार्मिक अनुशासन और प्राथमिकता से जुड़ी मान्यता है।
अंजलि सहानी कहती हैं कि श्राद्ध को डर या अशुभता से जोड़ने के बजाय इसे अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और परिवार की परंपरा से जुड़ने का अवसर समझना चाहिए।

