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मानव तस्करी एक विकृति

30 जुलाई संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की तरफ़ से मानव तस्करी के ख़िलाफ़ विश्व दिवस के रूप में नामित किया गया है। इस दिन को चिह्नित करने और तस्करी के शिकार लोगों की दुर्दशा की याद दिलाने के लिए ‘तहलका’ की विशेष जाँच टीम (एसआईटी) इस बार आवरण कथा ‘बेबसी की दास्तान’ लेकर आयी है। रिपोर्ट इस सच को उजागर करती है कि कैसे बच्चों को उनकी शुरुआती अवस्था से किशोरावस्था तक, जिसे मासूमियत और आज़ादी के स्वर्ण युग में परिभाषित किया जाता है; देश के विभिन्न हिस्सों में निर्दयता से तस्करी करके लाया जाता है।

विशेष जाँच टीम के छिपे कैमरे ने सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल के एक मानव तस्कर को जीवन के जोखिम वाले दवा परीक्षण के लिए काम के झूठे वादे पर पैसे के बदले में प्रदान करने की पेशकश करते हुए रिकॉर्ड किया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा ग़ायब हो जाता है। कुछ समय पहले ‘ओरिएंट लॉन्गमैन’ द्वारा प्रकाशित, ‘एनएचआरसी एक्शन रिसर्च ऑन ट्रैफिकिंग’ से ज़ाहिर होता है कि किसी एक साल में औसतन 44,000 बच्चों के लापता होने की सूचना है और उनमें से 11,000 से अधिक का पता नहीं चला है। अकसर बच्चे और उनके ग़रीब माता-पिता, जिन्हें हरे नोट देने का वादा किया जाता है; अन्त में सम्पन्न लोगों के शहरी घरों में बहुत कम भुगतान, दुव्र्यवहार और कभी-कभी यौन उत्पीडऩ के साथ काम करने को मजबूर होते हैं। जैसा कि निजी घरों के अन्दर होता है; अकेले बच्चे पीडि़त होते हैं।

रिपोट्र्स से पता चलता है कि 2020 में तस्करी किये गये 2,222 बच्चों में से सबसे अधिक 815 (36.6 फ़ीसदी) राजस्थान से थे। इसके बाद केरल (184) और ओडिशा (159) थे। इसके बाद बिहार था, जहाँ 123 बच्चों और झारखण्ड से 114 बच्चों की तस्करी की गयी। भारत इस मामले में विशेष रूप से संवेदनशील है और ग़ैर-सरकारी संगठनों के अनुसार प्रतिदिन 21 बच्चों की तस्करी यहाँ की जाती है। चाइल्डलाइन इंडिया हेल्पलाइन को केवल एक वर्ष में 50 लाख इमरजेंसी कॉल प्राप्त हुए। एनजीओ का अनुमान है कि भारत में क़रीब 3,00,000 (तीन लाख) बाल भिखारी हैं और हर साल 44,000 बच्चे इससे जुड़े गिरोहों के चंगुल में फँसते हैं। वेश्यावृति में क़रीब 40 फ़ीसदी बच्चे हैं। ऐसा अनुमान है कि भारत में रेड-लाइट ज़िलों में 20 लाख से अधिक महिलाओं और बच्चों का यौन सम्बन्ध बनाने के लिए तस्करी की जाती है।

प्रौद्योगिकी के आगमन के बावजूद, जिसने सूचना और ज्ञान की उपलब्धता को सरल किया है; बुनियादी शिक्षा की कमी, बेरोज़गारी और ग़रीबी के परिणामस्वरूप मानव तस्करी, यौन शोषण, जबरन श्रम, भीख माँगना और बच्चों के शोषण के मामले बढ़े हैं। निस्संदेह दुनिया भर में मानव तस्करी को ड्रग्स और हथियारों के बाद तीसरा सबसे आकर्षक अवैध व्यापार माना जाता है। हालाँकि यह अपराध है। ‘तहलका’ की जाँच से यह भी पता चला है कि नेपाली बच्चों को भी विभिन्न क्षेत्रों में जबरन मजदूरी के लिए भारत लाया जाता है। भारतीय महिलाओं को पैसे और यौन शोषण के लिए मध्य पूर्व में तस्करी कर लाया जाता है।

भारत में मानव तस्करी को संविधान में दिये गये मौलिक अधिकार के रूप में प्रतिबन्धित किया गया है; लेकिन एक संगठित अपराध के रूप में मानव तस्करी जारी है। मानव तस्करी एक ऐसा अपराध है, जिसे ज़्यादातर पुलिस में कम रिपोर्ट किया जाता है। आज इसे रोकने और पीडि़तों के पुनर्वास के लिए गम्भीर नीतिगत पहल की आवश्यकता है। भारत की नयी शिक्षा नीति की प्रशंसा की गयी है। लेकिन तस्करी की जाँच के लिए मानव अधिकारों का पाठ्यक्रम अभी भी हमारी शिक्षा में शामिल किया जाना बाक़ी है।

असंगठित विपक्ष से सत्ता पक्ष मज़बूत

एनडीए पक्ष की द्रोपदी मुर्मू के राष्ट्रपति चुने जाने से खुली विपक्षी दलों की एकता की पोल

सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू देश की 15वीं राष्ट्रपति बन गयीं। वह दूसरी महिला और पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। मुर्मू ने काफ़ी विपरीत परिस्थितियों का जीवन में सामना किया और जीवटता का परिचय दिया। निश्चित ही मुर्मू का राष्ट्रपति बनना देश के लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत है।
विपक्ष इस चुनाव में बिखरा-बिखरा सा दिखा और कभी भी नहीं लगा कि वह अपने उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को जिताने के लिए गम्भीर है। इसके विपरीत एनडीए, ख़ासकर भाजपा ने सारा गुणा, भाग, जोड़ करके काम किया और अपनी उम्मीदवार को बड़े अन्तर से जीत दिलायी।

बेशक लोकसभा और राष्ट्रपति के चुनाव में अन्तर है। लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव में एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की बड़ी जीत इस बात का साफ़ संकेत है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दल मानसिक रूप से एक साथ आने के लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस ने भले टीएमसी के नेता यशवंत सिन्हा का खुलकर समर्थन किया; लेकिन इसके बाद जब उप राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की मार्गरेट अल्वा को विपक्ष ने अपना साझा उम्मीदवार घोषित किया, तो टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने यह कहकर इस चुनाव में मत (वोट) न देने का ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी को भरोसे में लिए बिना यह फ़ैसला हुआ। इससे ज़ाहिर होता है कि विपक्षी एकता का राग वास्तव में कितना बेसुरा है।

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार की जीत तभी सुनिश्चित हो गयी थी, जब उसने द्रोपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। विपक्ष अपने उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के पक्ष में मत जुटाने में तो नाकाम रहा ही, उलटा उसके अपने 17 सांसदों और 110 विधायकों ने ही मुर्मू के पक्ष में मतदान कर दिया। बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, अकाली दल, शिवसेना, तेलगू देशम पार्टी एनडीए का हिस्सा नहीं थे; लेकिन विपक्ष इनमें से एक को भी अपने साथ नहीं जोड़ पाया। उलटे उसके अपने सहयोगी मुर्मू के साथ जा खड़े हुए। विपक्षी एकता में दरार का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता है?

मुर्मू के पक्ष में नतीजे आने के साथ ही विपक्षी नेताओं में एकता के दावे तब हवा हो गये। ख़ूब प्रति मतदान (क्रॉस वोटिंग) हुई। इसके विपरीत भाजपा ने मुर्मू के बहाने आदिवासी समाज में बड़ी सेंध लगा दी है, जो भविष्य के चुनावों में उसके काम आएगी। विपक्ष लाख कोशिश के बावजूद अपनी एकता बरक़रार नहीं रख पाया। उदाहरण के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी पार्टी है; लेकिन उसने मुर्मू को समर्थन दिया।

विपक्ष को तो तभी झटका लग गया था, जब राष्ट्रपति चुनाव से कुछ दिन पहले टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने कह दिया कि अगर भाजपा उनसे द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने के लिए कहती, तो वह मान जातीं। दिलचस्प यह है कि ममता ने ही विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए यशवंत सिन्हा के नाम का प्रस्ताव रखा था और वह थे भी उनकी ही पार्टी के नेता।

बहरहाल यशवंत सिन्हा अब इस बात से सन्तुष्टि कर सकते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में देश के इतिहास में वह तीसरे सबसे ज़्यादा मत हासिल करने वाले विपक्ष के प्रत्याशी बन गये। उन्हें 36 फ़ीसदी मत हासिल हुए। मुर्मू ने विपक्ष के साझे उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को हराया भी बड़े अन्तर से। मुर्मू को 2,824 मत मिले, जिनका मत-मूल्य (वोट वैल्यू) 6,76,803 है; जबकि सिन्हा को महज़ 1877 मत मिले, जिनका मूल्य 3,80,177 है। चौथे चरण में सिन्हा को मुर्मू से ज़्यादा मत मिले। हालाँकि मुर्मू की पहले के तीन चरण की बढ़त इतनी ज़्यादा थी कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा।

लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर 776 सांसदों के मत मान्य थे, जिनमें 15 मत रद्द हो गये। कुछ सांसदों ने मत नहीं डाले। इस तरह कुल 748 सांसदों के 5,23,600 मूल्य के मत पड़े। मुर्मू को 72 फ़ीसदी सांसदों का समर्थन मिला और वह कुल मतों में से 64.03 फ़ीसदी मत हासिल कर विजयी घोषित हुई हैं। इधर यशवंत सिन्हा को देश के तीन राज्यों में एक भी मत नहीं मिला; जबकि देश का कोई ऐसा राज्य नहीं रहा, जहाँ से मुर्मू को मत न मिले हों। केरल में बेशक कुल 140 विधायकों में से मुर्मू को सि$र्फ एक मत मिला।

आंध्र प्रदेश में जिन 173 विधायकों ने मत डाले उन सभी ने मुर्मू को मत दिये। नागालैंड में सभी 59 और सिक्किम के सारे 32 विधायकों ने भी मुर्मू को मत डाले। सिन्हा को विपक्ष के ही कई मतों के क्रॉस होने से नुक़सान उठाना पड़ा।

उप राष्ट्रपति चुनाव : धनखड़ बनाम अल्वा
उप राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए ने किसान पृष्ठभूमि वाले जगदीप धनखड़ को उम्मीदवार बनाकर किसानों को लेकर ख़राब हुई अपनी छवि को सुधारने की कोशिश की है। इससे यह तो ज़ाहिर हो ही गया कि उत्तर प्रदेश का चुनौतीपूर्ण विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा में किसान समर्थक को लेकर आशंका रही है। भले धनखड़ किसानों के कोई बड़े नेता न हों, भाजपा उनके नाम पर किसान समर्थक होने का दावा करेगी ही। उप राष्ट्रपति चुनाव के लिए 6 अगस्त को चुनाव होना है, उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा पूरी ताक़त से मैदान में जुटी हुई है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने साझे रूप से पूर्व केंद्रीय मंत्री मार्गरेट अल्वा को मैदान में उतारा है, जो राज्यपाल भी रही हैं। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव की ही तरह विपक्ष बिखरा-बिखरा दिख रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी अल्वा को समर्थन नहीं देने की बात कह चुकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, अकाली दल, शिवसेना, तेलगु देशम पार्टी जैसे गैर-एनडीए दलों का समर्थन हासिल कर पाते हैं या नहीं। मुर्मू को इन दलों के समर्थन का कारण उनका आदिवासी होना था। देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सभी दल फिर एनडीए के साथ जाते हैं या मार्गरेट अल्वा को समर्थन देते हैं? ऐसा होता है, तो धनखड़ के लिए मुकाबला मुश्किल हो जाएगा।

भारत को चीन से कितना ख़तरा!

सीमा पर चीन करता जा रहा निर्माण, लड़ाकू विमान लगातार भर रहे उड़ानें

क्या साल के आख़िर में तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद शी जिनपिंग भारत के साथ युद्ध की तैयारी कर रहे हैं? पूर्वी लद्दाख़ के ग़ैर-विवादित क्षेत्र में नो फ्लाई ज़ोन में चीन के लड़ाकू विमानों ने हाल के दो हफ़्तों में एक से ज़्यादा बार भारतीय क्षेत्र के ऊपर उड़ानें भरी हैं। इसके अलावा भूटान के रास्ते भारत को घेरने के इरादे से चीन डोकलाम से नौ किलोमीटर दूर भूटान की अमो चू नदी घाटी में पिछले साल जो गाँव बसाना शुरू किया था, अब वहाँ पूरा गाँव बस गया है। चीन ने इसके अलावा सीमा पर कई निर्माण किये हैं, जिन्हें उसकी भविष्य की तैयारियों के रूप में देखा जा रहा है। यह सब घटनाएँ तब हो रही हैं, जब चीन भारत के साथ कोर कमांडर स्तर की बातचीत के 16 दौर हो चुके हैं।

चीनी सेना अपनी पहुँच डोकलाम पठार की रणनीतिक लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण चोटी तक बनाना चाहती है। जुलाई के मध्य में भारत ने भूटान को डोकलाम पठार के पास विवादित त्रि-जंक्शन क्षेत्र में चीन के कार्यों को लेकर सचेत किया था। दरअसल चीन का बड़ा उद्देश्य दबाव की स्थिति बनाकर भारत के साथ 3,488 किलोमीटर की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) और थिंपू के साथ 477 किलोमीटर की विवादित सीमा के साथ दशकों से उठाये जा रहे अपने सीमा दावों को ताक़त देना है।

चीन की गतिविधियों को लेकर चिन्ता केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी जता रहे हैं। सीमा के भीतर चीन के लड़ाकू जहाज़ों के उड़ान भरने की रिपोट्र्स के बीच सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट करके कहा- ‘चीन की सेना भारतीय सीमा में घुस चुकी है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। क्या आप (मोदी) इसका परिणाम समझते हैं?’

सन् 2017 में सिक्किम के पास डोकलाम पठार पर भारत और चीन की सेना का आमना-सामना हुआ था। सैटेलाइट से हाल में ली गयी जो तस्वीरें सामने आयी हैं, उनसे ज़ाहिर होता है कि एलएसी के पास भूटान के साथ विवादित क्षेत्र में चीन ने पिछले साल जो निर्माण शुरू किया था, वहाँ अब पूरा गाँव बस गया है और वहाँ उसने बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों को बसाया है। तस्वीरों में दिखता है कि वहाँ काफ़ी घरों के आगे कारें और अन्य वाहन खड़े हैं। दरअसल चीन रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण डोकलाम पठार को वैकल्पिक मार्ग के रूप में तैयार कर रहा है।

अब ये रिपोट्र्स पुख़्ता हो चुकी हैं कि चीन अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है। भारतीय सेना की पूर्वी कमान के जीओसी-इन-सी, लेफ्टिनेंट जनरल आर.पी. कलिता का कहना है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) अरुणाचल प्रदेश सीमा पर बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ अपनी क्षमताओं को बढ़ा रही है।

लेफ्टिनेंट जनरल आर.पी. कलिता कहते हैं- ‘तिब्बत में भी एलएसी के पार बुनियादी ढाँचे में बहुत विकास हुआ है और हो रहा है। दूसरी ओर सडक़ों और पटरियों, कनेक्टिविटी और नये हवाई अड्डों और हेलीपैडों का निर्माण कार्य हो रहा है। सशस्त्र बलों सहित हमारी सभी एजेंसियाँ लगातार इन हालात की निगरानी कर रही हैं।’
उनका कहना है कि चीन की इन गतिविधियों को देखते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑपरेशनल मामलों में हम भी अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं। तकनीक (टेक्नोलॉजी) के तेज़ी से विकास के साथ ही वेलफेयर की प्रकृति बदल रही है, इसलिए तकनीक के साथ तालमेल रखने के लिए हमें अपनी ख़ुद की कार्यप्रणाली और विभिन्न चुनौतियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया विकसित करने की भी ज़रूरत है।’

साल के आख़िर में चीन में अपने नेता (राष्ट्रपति) पद का चुनाव वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी को करना है। ज़्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि शी जिन पिंग तीसरी बार राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। उसके बाद वह अपनी कुछ योजनाओं को अमलीजामा पहनाना चाहते हैं। क्या इसमें भारत के ख़िलाफ़ युद्ध करना भी शामिल है? यह एक जटिल सवाल है, क्योंकि भारत की पिछले दशकों में बढ़ती ताक़त से भी चीनी नेतृत्व बेचैनी महसूस करता है। ख़ुद चीन के ख़राब आर्थिक हालात की रिपोट्र्स अब आने लगी हैं।

यह कहा जाता है कि जिनजिंग अपने लोगों का ध्यान भटकाने के लिए सीमा पर विवाद खड़े करते हैं। हालाँकि बहुत-से रक्षा विशेषज्ञ चेताते हैं कि चीन की गतिविधियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। तनाव वाली तमाम गतिविधियों के बावजूद एक सच यह भी है कि चीन के साथ भारत का व्यापार आज भी जारी है। यूक्रेन में युद्ध के चलते हाल में भारत ने चीन की एक निजी कम्पनी ताइयुआन को 500 करोड़ के रेल पहियों का ऑर्डर दिया है। वैसे यूक्रेन की कम्पनी को यह ठेका इससे कहीं कम क़ीमत पर दिया गया था।

लिहाज़ा चीन के सीमा पर तनाव बढ़ाने के बावजूद कुछ विशेषज्ञ उसके व्यापारिक हितों का हवाला देते हुए मानते हैं कि वह युद्ध की सीमा तक शायद ही जाए। दूसरा भारत की सैन्य क्षमताओं को कम करके नहीं आँका जा सकता। वैसे भी चीन के भीतर ही शी जिनपिंग के लिए चुनौतियाँ कम नहीं हैं। इनमें आर्थिक चुनौतियाँ भी शामिल हैं। यह कुछ ऐसे बिन्दु हैं, जो उनके लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बनने की राह में रोड़ा भी बन सकते हैं। क्योंकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में उनके विरोधी कम नहीं हैं; ख़ासकर उनकी आर्थिक नीतियों के। हाल में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से बड़ी संख्या में व्यापारियों का दूसरे देशों को पलायन हुआ है।

पश्चिम भी चिन्तित
पश्चिमी देशों का रुख़ भी चीन के प्रति अविश्वास भरा है। हाल में अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी एफबीआई और ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई-5 के प्रमुखों ने एक बैठक के दौरान चीन को पश्चिमी देशों के लिए लम्बे समय का और सबसे बड़ा ख़तरा बताया था। उनका मानना था कि चीन पश्चिम देशों की गोपनीयता हासिल करने में जुटा है और उसकी विभिन्न तकनीकों को चुराने की फ़िराक़ में रहता है। दोनों देशों के ख़ुफ़िया विशेषज्ञों का मानना था कि चीन दुनिया को अपने पक्ष में बदलने की चालें चल रहा है और इसके लिए दमन का सहारा लेने से भी नहीं कतरा रहा। वे (प्रमुख) दुनिया को इसके प्रति आगाह करते हुए कहते हैं कि इन ख़तरों से निपटने की तैयारी ज़रूरी है।
चीन की ये गतिविधियाँ एशियाई देशों में भी उतनी ही हैं। स्थिति कितनी गम्भीर है इसका अंदाज़ा एफबीआई के प्रमुख क्रिस्‍टोफर रे की बातों से लगाया जा सकता है, जिनका कहना है कि एफबीआई प्रत्येक 24 घंटे में चीन से जुड़े एक मामले की जाँच करती है। क्रिस्टोफर का तो यह तक कहना है कि चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ नज़दीकी सम्बन्ध बनाने से कोई बदलाव आएगा, यह सोचना एक भूल ही होगी। एफबीआई प्रमुख चीनी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के निरंकुश एकाधिकार की तरफ़ जाने को सबसे बड़ी चिन्ता मानते हैं।

इस बैठक का लब्बोलुआब यह रहा कि चीन की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ख़ामोशी से पूरे विश्‍व में दबाव की नीति बनाने की योजना पर काम कर रही है। दो देशों के ख़ुफ़िया प्रमुख मानते हैं कि इस दबाव का मुक़ाबला करने के लिए चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की ज़रूरत है। उन्हें यह भी लगता है कि रूस के यूक्रेन पर हमले की तर्ज पर चीन ताइवान पर कार्रवाई करके उसे जबरन अपने क़ब्ज़े में करने की कोशिश कर सकता है।

ख़ुफ़िया विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन ने जासूसों का विशाल नेटवर्क बना लिया है और वह पश्चिम सहित देश के अन्य हिस्सों, जिनमें भारत भी शामिल है; में बड़े पैमाने पर अपनी गतिविधियाँ जारी रखे हुए है। इनमें हैकिंग उसका सबसे बड़ा हथियार है। चीन आर्थिक लाभ उठाने के लिए लम्बे समय से हैकिंग और सूचनाओं को चोरी की गतिविधियों में लिप्‍त है। एफबीआई और एमआई-5 दूसरे देशों की एजेंसियों के साथ एक टीम बनाकर चीन को लेकर काम कर रहे हैं।

रिपोट्र्स से पता चलता है कि चीन दुनिया भर की तमाम बड़ी कम्पनियों में अपने एक इंटरनल सेल के ज़रिये काम करता है, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को रिपोर्ट करता है। यह सेल न सिर्फ़ राजनीतिक एजेंडा चलाता है, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि कम्पनी राजनीतिक दिशा-निर्देशों का पालन करे। ख़ुद चीन के विशेषज्ञ यह स्वीकार करते रहे हैं कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया के कई देशों में बिजनेस के ज़रिये सक्रिय है। इनमें कई गोपनीय तरीक़े से काम करते हैं।

चीन पश्चिम ही नहीं एशिया में अपने विस्तार पर तेज़ी से काम कर रहा है। भारत से चीन का सीमा पर सीधा टकराव है। अपने हितों को देखते हुए अमेरिका भी एशिया में चीन को लेकर सक्रिय है। वह चीन को एशिया में रोकना चाहता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान एशिया के काफ़ी देश रूस के साथ खड़े दिखे हैं। चीन तो ख़ैर है ही। लिहाज़ा अमेरिका एशिया में चीन का विस्तार रोकने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है। वह किसी सूरत में चीन के किसी नये क्षेत्र में क़ब्ज़े को रोकना चाहता है। इनमें भारत के लिए बहुत महत्त्वपूर्व पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाला बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जहाँ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विद्रोह जैसे हालात हैं।


“जब भी हम पाते हैं कि चीनी विमान या रिमोट से पायलट एयरक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएस) वास्तविक नियंत्रण रेखा के थोड़ा बहुत क़रीब आ रहे हैं, तो हम अपने लड़ाकू विमानों के ज़रिये उचित उपाय करते हैं। हमने हमारे सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखा है। इसने उन्हें काफ़ी हद तक बाधित किया है।’’
विवेक राम चौधरी
एयर चीफ मार्शल


“चीन की सेना भारतीय सीमा में घुस चुकी है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। मैं किसी ऐसे व्यक्ति से मिला, जिसका भाई भारतीय सेना में है और लद्दाख़ में सेवारत है। उनके भाई के अनुसार, चीनी पीएलए (चीन की सेना) एलएसी (भारत-चीन की सीमा रेखा) के पार ग़ैर-विवादित भारतीय क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। अभी भी कोई आया नहीं? क्या मोदी इसका परिणाम समझते हैं?’’
सुब्रमण्यम स्वामी
भाजपा सांसद


“सशस्त्र बलों सहित हमारी सभी एजेंसियाँ लगातार वर्तमान हालात की निगरानी कर रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑपरेशनल मामलों में हम भी अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं। टेक्नोलॉजी के तेज़ी से विकास के साथ ही वेलफेयर की प्रकृति बदल रही है। इसलिए टेक्नोलॉजी के साथ तालमेल रखने के लिए हमें अपनी ख़ुद की कार्यप्रणाली और विभिन्न चुनौतियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया विकसित करने की भी ज़रूरत है।’’
लेफ्टिनेंट जनरल आर.पी. कलिता
जीओसी-इन-सी,
पूर्वी कमान

कमज़ोर नहीं भारत
सीमा पर चीन भारत को उकसाने की कोशिशों के तहत उसके लड़ाकू विमान पूर्वी लद्दाख़ में लगातार उड़ान भर रहे हैं। उसके लड़ाकू जेट पूर्वी लद्दाख़ में तैनात भारतीय बलों को भडक़ाने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। जे-11 सहित चीनी लड़ाकू विमान वास्तविक नियंत्रण रेखा के क़रीब उड़ान भर रहे हैं। हाल के दिनों में इस क्षेत्र में 10 किलोमीटर के कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स (सीबीएम) लाइन के उल्लंघन के मामले सामने आये हैं।

विशेषज्ञ इसे क्षेत्र में भारतीय रक्षा तंत्र पर नज़र रखने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने इसका जवाब देने के लिए कड़े क़दम उठाये हैं और उसने मिग-29 और मिराज़-2000 सहित अपने सबसे शक्तिशाली लड़ाकू विमानों को उन्नत ठिकानों पर आगे बढ़ा दिया है, जहाँ से वे मिनटों में चीनी हरकतों का जवाब दे सकते हैं। इसके अलावा एलएसी पर तैनात सैनिकों को चीनी भाषा मैंडेरिन सिखाने पर भारतीय सेना का फोकस बढ़ रहा है। आईटीबीपी (इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस) ने इस दिशा में ज़्यादा तेज़ी से काम किया है।

भारत के पास रफाल और एस-400 मिसाइल प्रणाली है। बता दें कि वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट (डब्ल्यूडीएमएमए) ने अपनी ग्लोबल एयर पॉवर्स रैंकिंग-2022 की रिपोर्ट में भारतीय वायु सेना को चीन की एयरफोर्स के मुक़ाबले बेहतर रैंकिंग दी है। डब्ल्यूडीएमएमए की रिपोर्ट में 98 देशों की एयर फोर्स पॉवर का मूल्यांकन किया जाता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने हाल में भारत को रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीदने के लिए काटसा (काउंटरिंग अमेरिकन एडवरसरीज थ्रू सैंक्शन एक्ट) प्रतिबंधों से छूट दिलाने वाले एक संशोधित विधेयक पारित कर दिया। एस-400 रक्षा मिसाइल सिर्फ़ पाँच मिनट में युद्ध के लिए तैयार हो सकती है। सीमा पर मिग-29 और मिराज़-2000 जैसे शक्तिशाली लड़ाकू विमान तैनात हैं।

भारतीय वायु सेना के पास 632 लड़ाकू विमान सहित 1645 विमान हैं। इनमें रफाल, सुकोई, मिग-21 बीआईएस, जगुआर, मिग-29 यूपीजी (मल्टीरोल) और तेज़स शामिल हैं। वायु सेना में एमआई-17/171 (मध्यम-लिफ्ट)-223, एचएएल ध्रुव (मल्टीरोल)-91, एसए 316/एसए319 (उपयोगिता)-77, एमआई-25/25/35 (गनशिप/परिवहन)-15, एएच-64ई (हमला)-8, सीएच-47एफ (मध्यम लिफ्ट)-6, एमआई-26 (भारी लिफ्ट)-1 व एसए 315 (लाइट यूटिलिटी)-17 जैसे हेलीकॉप्टर भी मौज़ूद हैं। वायु सेना के बेड़े में एएन-32 (सामरिक)-104, एचएस 748 (उपयोगिता)-57, डोर्नियर 228 (यूटिलिटी)-50, आईएल-76 एमडी/एमकेआई (रणनीतिक)-17 और सी-17 (रणनीतिक/सामरिक)-11 सहित सी-130जे (सामरिक)-11 ट्रांसपोर्टर जहाज़ भी शामिल हैं। ग्लोबल एयरपॉवर रिपोर्ट में इंडियन एयरफोर्स का छठा स्थान है।

गिलगित-बाल्टिस्तान पर नज़र
चीन भारत को घेरने और एशिया क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और मज़बूत करने के लिए पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका पर आर्थिक दबाव बनाकर उसकी ज़मीन हड़पने की साज़िश रच रहा है। बहुत-से जानकार श्रीलंका में वर्तमान आर्थिक तंगहाली का कारण चीन को मानते हैं। नेपाल की ज़मीन पर कई वर्षों में क़ब्ज़ा किया है। पाकिस्तान ने तो सन् 1963 में पीओके के तहत पडऩे वाला 5,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शक्सगाम वैली चीन को भेंट में दे दिया था। अब जो रिपोर्ट सामने आयी हैं, वह भारत के लिए और चिन्ताजनक है। रिपोर्ट यह है कि चीन के 20,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ में फँसा पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान चीन को बेच सकता है।
‘तहलका’ की जुटाई जानकारी के मुताबिक, चीन से पाकिस्तान को मिले क़र्ज़ की शर्तों के मुताबिक पहले कुछ साल तक यह इलाक़ा पट्टे (लीज) पर दिया जाएगा। यदि पाकिस्तान क़र्ज़ नहीं चुका पाता है, तो ऐसी स्थिति में यह इलाक़ा चीन के क़ब्ज़े में चला जाएगा। गिलगित-बाल्टिस्तान के इन इलाक़ों में इलाक़ों में पाकिस्तान के अवैध क़ब्ज़े वाला पीओके शामिल है, जिसके बारे में रिपोट्र्स हैं कि चीन वहाँ पहले ही कुछ निर्माण गतिविधियों में शामिल है। साथ ही उसकी सेना की उपस्थिति भी वहाँ है।

काराकोरम नेशनल मूवमेंट के अध्यक्ष मुमताज़ नागरी ने भी हाल में यह आशंका ज़ाहिर की थी कि पाकिस्तान अपने क़र्ज़ के बोझ से छुटकारा पाने के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र चीन को पट्टे पर दे सकता है। अल अरबिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गिलगित-बाल्टिस्तान आने वाले समय में वैश्विक शक्तियों के लिए प्रतिस्पर्धा का केंद्र और दुनिया के ताक़तवर देशों के बीच जंग का मैदान बन सकता है।’

भारत के लिए चीन की यह कोशिश दो-तरफ़ा चिन्ता का विषय है। इसके कारण भी दो हैं। पहला यह कि सामरिक दृष्टि से यह चीन को बहुत मज़बूत कर देगा। दूसरा, भारत का इस इलाक़े पर स्वाभाविक और ऐतिहासिक दावा रहा है। भारत कहता रहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न हिस्सा है। आज़ादी के बाद से जम्मू-कश्मीर का यह इलाक़ा पाकिस्तान के क़ब्ज़े में है। उपेक्षित अलग-थलग और लगभग अविकसित इस क्षेत्र को पाकिस्तानी संविधान में राज्य के तौर पर मान्यता नहीं दी गयी है। हालाँकि पाकिस्तान वहाँ चुनाव कराने की कोशिश करता रहा है।
पीओके के संविधान में भी यह हिस्सा शामिल नहीं है। इमरान ख़ान सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का पाँचवाँ प्रान्त बनाने के लिए बहुत कोशिश की थी, जिसका भारत ने काफ़ी विरोध किया था। स्थानीय लोग भी इसके सख़्त ख़िलाफ़ रहे हैं। इमरान अपनी कोशिशों में सफल नहीं रहे थे। बता दें सात ज़िलों गान्चे, स्कर्दू, गिलगित, दिआमेर, गिजर, अस्तोर और हुंजा वाले इस इलाक़े (गिलगित-बाल्टिस्तान) की राजधानी गिलगित में है।

भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ समय पहले कहा था कि सन् 1962, 1966, 1972 और 1973 में पाकिस्तान का जो संविधान बनाया गया, उसमें कभी गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तानी का हिस्सा नहीं रहा। हमारे संविधान में पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया गया है। संसद में इसे लेकर बाक़ायदा प्रस्ताव पास हुए हैं।

सन् 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तो गिलगित-बाल्टिस्तान किसी देश का हिस्सा नहीं था। कारण यह था कि ब्रिटेन ने सन् 1935 में गिलगित एजेंसी को यह क्षेत्र 60 साल के लिए पट्टे पर दिया था। पहली अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने पट्टे को ख़त्म करके इस इलाक़े को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को लौटा दिया। इसके बाद 31 अक्टूबर, 1947 को राजा हरि सिंह ने पाकिस्तान के हमले के बाद जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। हालाँकि गिलगित-बाल्टिस्तान का मामला तमाम घटनाओं के बावजूद अनसुलझा ही रहा।
यह आरोप रहे हैं कि पाकिस्तान सेना और एजेंसियाँ इलाक़े में जनता पर बहुत ज़ुल्म करती हैं। बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों का पलायन हुआ है, जिससे गिलगित-बाल्टिस्तान की आबादी काफ़ी कम हुई है। हाल में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आयी थी, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान में होने वाली आत्महत्याओं में नौ फ़ीसदी अकेले गिलगित-बाल्टिस्तान में होती हैं। वहाँ जनता पर ज़ुल्म की इंतिहा है और उन्हें दिनभर में महज़ दो घंटे बिजली उपलब्ध करवायी जाती है। पाकिस्तान ने कभी इस इलाक़े को अपने नेशनल ग्रिड से नहीं जोड़ा। यहाँ तक कि स्थानीय लोगों को पन बिजली और अन्य विशाल संसाधनों पर अधिकार नहीं दिया है।
हाल के वर्षों में स्थानीय लोगों और पाकिस्तानी सेना के लोगों के बीच झड़पों की दर्ज़नों रिपोर्ट आयी हैं। पाकिस्तान विरोधी आन्दोलन के नेताओं का आरोप है कि सैनिक उनके लोगों को पीटते हैं। हाल में पाकिस्तानी सैनिकों के गिलगित-बाल्टिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री राजा नासिर अली ख़ान को बुरी तरह पीटने की ख़बरें सामने आयी थीं, क्योंकि वह स्कर्दू मार्ग पर सेना के अधिग्रहण का कड़ा विरोध कर रहे थे। नासिर इमरान ख़ान के समर्थक माने जाते हैं।

रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि गिलगित-बाल्टिस्तान यदि चीन को मिल जाता है, तो उसे चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के विस्तार में बड़ी मदद मिल जाएगी। उनके मुताबिक, भले इससे पाकिस्तान को अपने आर्थिक संकट से निपटने में मदद मिल जाए, इससे असली फ़ायदा चीन को होगा। हाँ, पाकिस्तान को अमेरिका की तरफ़ से इसका विरोध होने की आशंका है।

पाकिस्तान इस समय अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहता; क्योंकि वह आईएमएफ से बेलआउट पैकेज की कोशिश में है। अमेरिका इसमें फच्चर (फाँस) लगा सकता है। अमेरिकी कांग्रेस की सदस्य बॉब लैंसिया ने हाल में कहा था कि यदि गिलगित-बाल्टिस्तान भारत में होता और बलूचिस्तान स्वतंत्र होता, तो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की इतनी ख़राब हालत नहीं होती।

अपराध नहीं जनहित की पत्रकारिता

आजकल लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के कमज़ोर होने का रोना पूरे देश में रोया जा रहा है। लेकिन जनकल्याण और देशहित की पत्रकारिता करने वाले तीन-चार फ़ीसदी लोग भी नहीं हैं। जनकल्याण की पत्रकारिता करने वाले लोगों पर हमले होते हैं। उन्हें अच्छी तनख़्वाह नहीं मिलती। सरकारी एजेंसियाँ और पुलिस उनके ख़िलाफ़ झूठे मुक़दमे बनाते हैं। तब कोई उन पत्रकारों के पक्ष में खड़ा नहीं दिखता। लेकिन कहते सभी हैं कि पत्रकारिता का स्तर गिर गया है। हाल ही में ऑल्ट न्यूज के को-फाउंडर और फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर के साथ यही हुआ। पुलिस ने उन्हें जेल में डाल दिया था। लेकिन कई न्यायाधीश आज भी न्यायप्रिय हैं। जुबैर को भी सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम जमानत देकर साबित कर दिया कि क़ानून में अभी न्याय ज़िन्दा है।

मोहम्मद जुबैर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उनके ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश में दर्ज सभी मामलों में राहत देते हुए 20,000 के जमानत बांड पर अंतरिम जमानत दी और पुलिस से उन्हें रिहा करने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एफआईआर ट्रांसफर सम्बन्धी आदेश सभी मौज़ूद एफआईआर और भविष्य में दर्ज होने वाली सभी एफआईआर पर लागू होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने जुबैर को अपने ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय जाने को कहा और जुबैर के ख़िलाफ़ एक के बाद एक मुक़दमा दर्ज होने को परेशान करने वाला क़रार दिया था। अब जुबैर पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन जुबैर की ओर से दायर नयी याचिका में छ: मामलों की जाँच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ़ से विशेष जाँच दल के गठन को भी चुनौती दी गयी है।

बता दें कि फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर को दिल्ली पुलिस ने 2018 में किये गये एक ट्वीट को लेकर दर्ज शिकायत के बाद जून में गिरफ़्तार किया था। पुलिस ने जुबैर पर धार्मिक भावना भडक़ाने का आरोप लगाया है। जुबैर के ख़िलाफ़ हाथरस में दो और ग़ाज़ियाबाद, मुज़फ़्फ़रनगर, सीतापुर, लखीमपुर खीरी में एक-एक एफआईआर दर्ज की गयी है।

वहीं पैगंबर के बारे में टिप्पणी करने से विवादों में घिरी भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा को पहले सर्वोच्च न्यायालय ने फटकारा और देश से माफ़ी माँगने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आपकी वजह से देश में हिंसा का माहौल पैदा हो रहा है। लेकिन दूसरी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने नूपुर शर्मा को राहत दी है। न्यायालय ने 10 अगस्त तक नूपुर की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी है। बता दें कि नूपुर शर्मा के समर्थन और विरोध में राजस्थान के उदयपुर में दो लोगों ने एक दर्ज़ी का सिर काट दिया था। इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय ने 8 राज्यों और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। नूपुर के वकील मानवेंद्र सिंह ने आर्टिकल-21 के आधार पर नूपुर को राहत देने की माँग की थी। वकील ने नूपुर को जान से मारने की धमकी और उन्हें मारने के लिए पाकिस्तान से आये शख़्स का ज़िक्र किया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि पूछा कि आप दिल्ली उच्च न्यायालय जाना चाहते हैं? वकील ने कहा कि हम यही चाहते हैं। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह तो हमारी मंशा है कि आप हर जगह नहीं जाएँ। हम देखेंगे कि आगे क्या विकल्प हो सकता है। इधर कोलकाता पुलिस नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ लुकआउट नोटिस जारी कर चुकी है।

यहाँ दो मामले हमारे सामने हैं। एक मामला जुबैर का है, जिसमें उन पर धार्मिक भावना भडक़ाने का आरोप है। वहीं दूसरी तरफ़ नूपुर शर्मा है, जिनके एक बयान से गला काटने का सिलसिला शुरू हो गया। अब तक कुछ लोगों को हत्या की धमकियाँ मिल रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों ही मामलों में अपना फ़ैसला देते हुए यह साबित कर दिया कि क़ानून ज़िन्दा है, न्याय ज़िन्दा है।

सच बोलने के लिए पत्रकारों से उम्मीद लगाने वालों को समझना होगा कि क्या वे सच साथ खड़े हैं? भारतीय संविधान में नागरिकों को भी बोलने की स्वतंत्रता देता है। कहीं कुछ ग़लत हो, तो उन्हें बोलना चाहिए। चाहे ग़लत लोगों के ख़िलाफ़ बोलना पड़े या शासन-प्रशासन के। संविधान का अनुच्छेद-19, 20, 21 और 22 देश के सभी नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19 में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। अनुच्छेद-19(क) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19(ख) शान्तिपूर्ण और निराययुद्ध सम्मेलन की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19(ग) संगम, संघ या सहकारी समिति बनाने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र कही भी बस जाने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-19(छ) कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार की स्वतंत्रता का अधिकार सभी को देता है।

पहले संविधान में कुल सात मौलिक अधिकार (संविधान के भाग 3 की अनुच्छेद-12 से 35 तक) लोगों को प्राप्त थे। लेकिन 1976 में 44वें संविधान संशोधन में मूल अधिकारों में संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया। इनमें अनुच्छेद-14 से 18 तक समता की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद-19 में स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद-23-24 में शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद-25-28 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद-29-30 में संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद-32-34 में संवैधानिक उपचारों के अधिकार का उल्लेख है।

हालाँकि संविधान में प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता का कहीं कोई सीधा-सीधा उल्लेख है। लेकिन अनुच्छेद-19 में दिये गये स्वतंत्रता के मूल अधिकार को प्रेस की स्वतंत्रता के समकक्ष माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संविधान के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता की व्याख्या की है। ब्रिटिश शासन में मीडिया को सामग्री के प्रचार-प्रसार के लिए रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस की सीमाओं में बाँध दिया गया।

आज प्रेस या मीडिया के पास सार्वजनिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से बहस और चर्चा करने का अधिकार के अलावा $खबरों का लेखों, किसी भी विचार या वैचारिक मत, किसी भी स्रोत से जनहित की सूचनाएँ और तथ्य एकत्रित करने का अधिकार है। सरकारी विभागों, सरकारी उपक्रमों सरकारी प्राधिकरणों और लोक सेवकों कार्यों व कार्यशैली की समीक्षा करने का अधिकार और उनकी आलोचना का अधिकार है। प्रकाशन या प्रकाशन सामग्री में चयन और मीडिया (माध्यम) का मूल्य या शुल्क निर्धारित करने का अधिकार है। प्रचार के माध्यम की नीति तय करने और अपनी योजनानुसार सरकारी दबाव से मुक्त रहकर प्रकाशन, प्रचार-प्रसार सम्बन्धी गतिविधियाँ चलाने का अधिकार है। लेकिन मीडिया को ध्यान रखना होगा कि अपने अधिकारों को वह निर्णय न समझ ले और क़लम की ताक़त का ग़लत इस्तेमाल न करे।

किसी भी नागरिक या मीडिया संस्थान को राष्ट्र की प्रभुता और अखंडता, राष्ट्र या राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी राष्ट्रों के साथ सम्बन्धों और व्यापार, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की मानना (फैसलों) के विमुख जाकर अराजकता फैलाने का अधिकार नहीं है। यदि ऐसा कोई करता है, तो वह क़ानूनी तौर पर अपराधी की श्रेणी में माना जाएगा। भारत में इन्हीं नियम-क़ायदों पर 1780 में पत्रकारिता की नींव रखी गयी थी। इसमें वर्षों सुधार होते रहे, तब कहीं जाकर एक परिपक्व देश और जनहित की पत्रकारिता का पैमाना बना। लेकिन अब कुछ लोग मीडिया का सहारा लेकर पैसा कमाने की हवस में मीडिया की प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर देश और लोगों की भावनाओं को आहत कर रहे हैं, जो एक अपराध से कम नहीं है।

सरकार के पक्ष में पत्रकारिता करने को सच्ची पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता। इस पर रोक लगनी चाहिए। सरकारों को भी चाहिए कि वे अपने हित साधने के लिए मीडिया पर दबाव न बनाएँ और उसे अपना दरबान बनाने से बचें। वर्तमान समय में मीडिया की असलियत और अहमियत को देखते हुए यह कहना ठीक नहीं कि यह मीडिया युग है। अब हर किसी को अपने स्तर पर आवाज़ उठानी होगी। इसकी स्वतंत्रता संविधान ने हर किसी को बतौर अधिकार दी है।

अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था- ‘प्रेस का अधिकार कोई ऐसा अधिकार नहीं है, जो किसी नागरिक को उसकी व्यक्तिगत क्षमता में नहीं प्रदान किया जा सकता है। प्रेस का सम्पादक या उसका प्रबंधक जब भी समाचार पत्रों के लिए कुछ लिखता है, तो इसे वह एक नागरिक की हैसियत से उपलब्ध अधिकार का प्रयोग करते हुए लिखता / कहता है।’

मंदी से मांझा कारीगर उदास

आप जब बरेली के सीबीगंज से क़िले की ओर बढ़ेंगे, तो जीटी रोड के दोनों ओर कुछ लोगों को बड़ी तेज़ी में हाथ में कुछ रंग-बिरंगा सा लिए हुए एक रगड़ के साथ आगे बढ़ते हुए पाएँगे। वास्तव में ये मांझा कारीगर हैं। इनके हाथ में काँच (शीशे) के बुरादे, रंग तथा साबूदाने या चावल की लुगदी होती है। ये लुगदी अत्यंत खुरदरी होती है, जिसे धागे पर रगड़ते समय हाथ कट जाते हैं। जो धागा मांझा बनाने के काम में लिया जाता है, उसे सद्दी कहते हैं। ये एक प्रकार से कच्चा धागा होता है। वैसे तो सद्दी उस धागे को कहते हैं, जो पतंग को बड़ी ऊँचाई तक आकाश में ले जाने के लिए मांझे के बाद बाँधी जाती है। इससे हाथ नहीं कटते और यह मांझे से सस्ती मिलती है। चर्खी में 90 से 95 फ़ीसदी यही सद्दी होती है। हालाँकि इस सद्दी में मोम लगा होता है, ताकि उलझे नहीं एवं आसानी से ऊँगलियों से पास हो सके यानी सरकता रहे।

सीबीगंज से क़िले तक जीटी रोड के दोनों ओर इसी सद्दी से मांझा बनाते हैं, जिसमें काँच युक्त लुगदी की रगड़ के कारण मांझा बनाने वाले इन कारीगरों के हाथ घायल ही रहते हैं। पूरा दिन ये लोग इसी तरह 100-200 मीटर की दूरी पर लगी बल्लियों के चारों ओर दौड़ते रहते हैं। इन बल्लियों को थूनी कहते हैं। इन थूनियों की संख्या 50-60 से अधिक होगी तथा हर थूनी पर एक से तीन कारीगर तक लगे होते हैं। इसी प्रकार बाकरगंज के हुसैन बाग़ में दर्ज़नों मांझा कारीगर हाथों में लुगदी लेकर सद्दी में लपेटकर सद्दी को रगड़ देते हुए दौड़ते दिखायी देंगे। एक कारीगर ने बताया कि 15-20 साल पहले बरेली में 1,000 से 1,500 कारीगर मांझा बनाने का काम करते थे। अब तो आधे भी नहीं रहे।

मांझे के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध बरेली में मांझा बनाने का यह कार्य वैसे तो पूरे वर्ष चलता है; मगर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा मकर संक्रांति के आने से दो-तीन महीने पहले से इसमें तेज़ी आ जाती है। मगर चीन का जानलेवा तथा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से घातक मांझे की बाज़ार में भरमार होने से विश्व भर में प्रसिद्ध बरेली के मांझे की बिक्री पर विकट विपरीत प्रभाव पड़ा है। मगर बीते तीन वर्षों से मांझा बनाने वाले कुछ अन्य संकटों से जूझ रहे हैं।

चीनी मांझे ने किया निराश
बाकरगंज में मांझा मज़दूर कल्याण समिति के एक सदस्य ने बताया कि लगभग सात-आठ साल से उनके काम में लगातार मंदी आती जा रही है। इसकी सबसे बड़ा तथा पहला कारण बाज़ार में चीन के मांझे की आवक है। यह बात सब जानते हैं कि चीन का मांझा हर तरह से घटिया तथा नुक़सान पहुँचाने वाला होता है। मगर फिर भी अधिक लोग उसे ख़रीदते हैं, क्योंकि वो हमारे मांझे से सस्ता होता है। दुकानदारों को भी उसमें बचत अधिक है, सो वे भी उसे ही पहले तथा अधिक मात्रा में बेचने की कोशिश करते हैं। मगर वो मांझा पतंगबाज़ी में जल्दी कट जाता है, हाथ भी काट देता है। अगर किसी के गले में फँस जाए, तो जानलेवा साबित होता है। पहले बरेली में मांझे में फँसकर पक्षी नहीं मरते थे, मगर अब चीन का मांझा जबसे आया है, पक्षियों के मरने की घटनाएँ होने लगी हैं। दु:ख की बात यह है कि अब बरेली में भी चीन का मांझा धड़ल्ले से बिक रहा है। जिस बरेली का मांझा पूरे विश्व के लोग माँगते हैं, विदेशों में इस मांझे की विकट माँग रही है, उसी मांझे के शहर बरेली में आज दुकानदारों और सरकारों के निजी स्वार्थ के चलते धाक जमा ली है। मगर उन लोगों को सोचना चाहिए कि इससे शहर के आम लोगों को तो हानि हो ही रही है, हम कारीगरों का रोज़गार भी छिन रहा है। इससे किसी को क्या मिलेगा। यह तो कारीगरों के पेट पर लात मारना ही हुआ ना।

बरेली का बता बेच रहे चीनी मांझा
इस बातचीत के बीच एक कारीगर ने कहा कि भैया, आप बाज़ार में किसी मांझे की दुकान पर जाकर बरेली का मांझा माँगना, वो आपको चीन का मांझा पकड़ा देगा। अगर आपको जानकारी नहीं होगी, तो आप ठगे जाओगे। दुकानदार बरेली के मांझे के नाम पर ग्राहकों को चीन का मांझा बेच रहे हैं। हम लोग तथा मांझा मज़दूर कल्याण समिति इसका कई बार विरोध कर चुकी है, मगर कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि प्रशासन इस ओर कोई ध्यान ही नहीं देता। चीन का अधिकतर मांझा नाइलोन का होता है, जिसे और मजबूत करने के लिए वो लोग घातक पदार्थों का उपयोग करते हैं।

सद्दी हुई महँगी
आरिफ़ नाम के एक कारीगर ने बताया कि जबसे कोरोना की बीमारी आयी है, तबसे सद्दी महँगी भी बहुत हुई है तथा उसकी आपूर्ति भी घटी है। हम लोग वर्धमान तथा कोड्स नाम की दो कम्पनियों से धागा ख़रीदते हैं। लॉकडाउन में दोनों कम्पनियों ने यह कहकर सद्दी की आपूर्ति बन्द कर दी थी कि उनके पास धागा नहीं है, क्योंकि चीन और पाकिस्तान से कपास नहीं आ रही है। इस दौरान 400 रुपये के भाव वाला धागा 600 से 700 रुपये का हो गया था। अब धागे का भाव और बढ़ गया है, जिससे हमारी बिक्री कम हुई है। कारीगरों और मज़दूरों तक की मेहनत इस काम से निकालना महँगा हो गया है। जबसे सद्दी महँगी हुई है तथा उसकी आपूर्ति प्रभावित हुई है, तबसे हम लोग और भी परेशान हैं। शासन, प्रशासन में कोई हमारी ओर ध्यान नहीं दे रहा है।

कम बिकता है अच्छा मांझा
सबसे बड़ी समस्या यह है कि कोई भी वस्तु अगर महँगी हो, तो उसके ग्राहक कम हो जाते हैं। बरेली में मांझा हाथ से बनाया जाता है तथा इसकी मानकता विश्वसनीय एवं गुणवत्ता उत्तम होती है, इसलिए इसे बनाने में लागत अधिक लगती है। यही कारण है कि यह चीन के मांझे की अपेक्षा तीन-चार गुना महँगा होता है। इससे इसके ग्राहक भी कम होते हैं। पहले जब चीन का मांझा और देश के दूसरे हिस्सों में बनने वाला घटिया मांझा बाज़ार में नहीं होता था, तब हमारे मांझे की माँग अधिक थी। एक समय था जब हम माँग पूरी करने के लिए कारीगरों को ढूँढते थे तथा दिन-रात काम कराते थे। अब कारीगर काम माँगने आते हैं, तो उन्हें न कहना पड़ता है, जिसका हमें विकट दु:ख होता है।

मशीन बनाम हाथ वाला मांझा
अब बाज़ार में दो तरह का मांझा देखने को मिलता है। एक तो वो मांझा है, जो चीन और हमारे देश में मशीनों से बनता है। दूसरा मांझा जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, वो है बरेली का मांझा। अब बाज़ारों में बरेली के मांझे के सामने मशीनों वाला घटिया मांझा चुनौती बना हुआ है। इसका कारण इस मांझे का सस्ता होना है। बरेली के मांझे की एक चर्खी 500 से 1,000 रुपये है, जबकि मशीन के मांझे की एक चरखी 150 से 250, 300 रुपये है। इसके चलते लोग सस्ता तथा घटिया मांझा ले लेते हैं। मगर जो लोग मांझे के जानकार हैं और पतंगों के पेंच लड़ाने में माहिर हैं या सट्टा लगाते हैं, वो आज भी बरेली का ही मांझा ख़रीदते हैं। कई दुकानदार भी बरेली के मांझे की बिक्री को प्राथमिकता देते हैं।

इस बार जगी आस
इस बार बरेली के कारीगरों, मज़दूरों, थूनी मालिकों तथा दुकानदारों को भी उम्मीद है कि उनका काम पहले की तरह अच्छा चलेगा। इसका एक कारण तो यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वदेशी वस्तुओं पर बल दे रहे हैं। दूसरा कारण स्वतंत्रता दिवस है, जो इस बार पूरे एक सप्ताह मनाया जाएग।

विदित हो कि इस बार उत्तर प्रदेश में हर व्यक्ति में राष्ट्रभक्ति का उत्साह देखने को मिल रहा है। यह सब अमृत महोत्सव के चलते किया जा रहा है। शासन व प्रशासन की ओर से दिशा निर्देश दे दिये गये हैं। प्रदेश के सभी 75 जनपदों के लगभग 418 लाख से अधिक घरों में ध्वजारोहण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 50 लाख सरकारी व निजी प्रतिष्ठानों में भी ध्वजारोहण के निर्देश हैं। राज्य में कुल 381.61 लाख से तिरंगों होना है। देश में हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर पतंगबाज़ी होती है। ऐसे में मांझा व्यापारियों व कारीगरों को विश्वास है कि इस बार मांझे की बिक्री अधिक होगी।

मुद्दों के संकट से जूझता विपक्ष

भारतीय राजनीति और संसदीय प्रणाली का विश्लेषण करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कहा था- ‘यह देखकर अफ़सोस होता है कि समय बीतने के साथ संसदीय प्रणाली चलाने के लिए जो परिपक्वता आनी चाहिए, उसके बजाय संसदीय व्यवहार में निरंतर गिरावट आ रही है। आज राजनीति करने के दो ही उद्देश्य रह गये हैं- समाज में लोगों का समर्थन कैसे मिले? कुछ भी, कैसे भी करके; चाहे ग़लत करके, चाहे सही करके। दूसरा, पैसे कैसे मिलें?’ (रहबरी के सवाल, पेज-135 एवं 138 )।

यह भारतीय राजनीति का वह सत्य है, जिसे मुँह तो मोड़ा जा सकता है, किन्तु नकारा नहीं जा सकता। पक्ष-विपक्ष की कौन कहे, यहाँ कमोबेश सब एक जैसे ही हैं। लेकिन इस समय चर्चा का विषय विपक्ष है। एक सन्तुलित एवं जीवंत लोकतंत्र के लिए एक जागृत एवं सशक्त विपक्ष होना आवश्यक है। लेकिन भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर ऐसा नहीं है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में यह कालखण्ड संघर्ष-हीन विपक्ष के दौर के तौर पर गिना जाएगा, जहाँ चुनाव-दर-चुनाव हार के बाद आज विपक्ष हताश-निराश और भ्रमित हैं। उसमें सत्ता पक्ष के समक्ष खड़े होने का जज़्बा नहीं दिखता। विपक्ष मुद्दों की राजनीति के बजाय अनर्गल विरोध प्रसंगों में लिप्त हैं, जिससे जनता में उसके प्रति लगाव एवं समर्थन न्यून स्तर पर पहुँच चुका है।

ताज़ा विवाद नये संसद भवन में लगे अशोक स्तम्भ को लेकर शुरू है। विपक्ष का आरोप इतिहास से छेड़छाड़ तथा अशोक स्तम्भ के शेरों को ज़्यादा आक्रामक प्रदर्शित करने का है। कोई इसे सत्यमेव जयते से सिंहमेव जयते कह रहा है। किसी के अनुसार यह राष्ट्र विरोधी है। इस पर एआईएमआईएम प्रमुख ओवैसी का विरोध है कि अनावरण कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री की मौज़ूदगी संवैधानिक मानदण्डों का उल्लंघन है। कांग्रेस नाराज़ है कि कार्यक्रम में उसे न्योता क्यों नहीं दिया गया? तो सी.पी.एम. का विरोध प्रधानमंत्री द्वारा कार्यक्रम में पूजा-पाठ करने को लेकर है। इन आरोपों पर सत्ता पक्ष भी कहाँ ख़ामोश रहने वाला था, सो जवाब देने के लिए केंद्रीय मंत्रियों से लेकर प्रवक्ताओं का पूरा समूह टूट पड़ा।

प्रतीत होता है कि देश की राजनीति में मुद्दों का संकट है। वास्तव में यह संकट उस चेतना की अनुपस्थिति का है, जो लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों को अंगीकार कर सके। विपक्ष को इस बात की चिन्ता है कि राष्ट्रीय चिह्न के शेर ख़तरनाक दिख रहे हैं, जो शान्त थे। यह अजीब-सा हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण विवाद है। शेर कैसे दिख रहे हैं? देश की 135 करोड़ से ज़्यादा आबादी को इससे कहीं ज़्यादा रुचि अपनी रोज़ी-रोटी और सिर पर छत पाने, अपराध से मुक्ति, मानवीय गरिमा से परिपूर्ण जीवन जीने जैसे मूलभूत मसलों में है। वास्तव में विपक्ष को जिन मुद्दों को लेकर आक्रोशित होना चाहिए, वे उसकी प्राथमिकता सूची में हैं ही नहीं।

राष्ट्रीय स्तर पर बेरोज़गारी की दर 7.80 फ़ीसदी है। इस वर्ष यह दर 0.68 फ़ीसदी बढ़ी है। साथ ही कुल श्रमबल में काम करने वालों की संख्या घटकर 39 करोड़ रह गयी है। सरकार इस दिशा में क्या प्रयास कर रही है? कब तक स्थितियाँ बेहतर होने की उम्मीद है? निजीकरण के कारण घटती नौकरियों की भरपाई सरकार कैसे करेंगी? केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक लाखों की संख्या में विभिन्न विभागों में उपलब्ध रिक्तियाँ अब तक क्यों नहीं भरी गयीं? इन्हें कब तक भरा जाएगा? संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थियों के चयन के अवसर सिमटते क्यों जा रहे हैं? इसके लिए दोषी कौन है? अग्निपथ योजना के विरोध में उतरे लोगों को आतंकवादी एवं देशद्रोही कहने वाले पार्टी नेताओं से जवाब कब लिया जाएगा? हज़ारों करोड़ों रुपये ख़र्च करने के बाद नमामि गंगे परियोजना कितनी सफल रही? प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पौराणिक महत्त्व की गंगा नदी की इतनी बुरी हालत क्यों है? मेक इन इंडिया योजना (2014) ने इतने वर्षों में अर्थ-व्यवस्था को कितना लाभ पहुँचाया, और कितने रोज़गार सृजित किये? सरकार के अन्दर प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार पर कब तक अंकुश लगेगा? उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, पशुपालन विभाग, स्वास्थ्य विभाग एवं जल शक्ति विभाग में तबादलों में हुई धाँधली एवं पशुपालन विभाग में होने वाले 50 करोड़ रुपये के घोटाले के लिए दोषी लोगों पर कठोर कार्रवाई कब तक होगी? उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा परीक्षाओं में की जा रही मनमानी पर रोक कब तक लगेगी?

आयोग में नियुक्तियों में हुई धाँधली पर इतने वर्षों से चल रही जाँच कहाँ तक पहुँची? जाँच कब तक पूरी होगी? अब तक कितने लोगों पर कार्रवाई हुई? निकट में हुई कई भर्तियों में जैसे उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग द्वारा विज्ञापन संख्या-50 के अंतर्गत विभिन्न विषय में सहायक प्रोफेसर पर हुई नियुक्ति पर भ्रष्टाचार के लग रहे आरोपों का संज्ञान कब तक लिया जाएगा?

ऐसे ही और भी कई मूलभूत मसले हैं, जिन पर विपक्ष को आन्दोलित होना चाहिए। लेकिन उसे न इनसे कोई मतलब है और न सार्थक राजनीति से कोई सरोकार है। ले-देकर उसके पास सिर्फ़ धार्मिक, असहिष्णुता और अघोषित आपातकाल के नारे हैं, जिन्हें वह बार-बार दोहराता रहता है। विपक्ष की राजनीति को देखकर लगता है कि वह इस भरोसे बैठा है कि सत्ता पक्ष और ग़लतियाँ करें, और नाराज़ जनता विकल्प के रूप में उसे चुन ले। लेकिन वह भूल रहा है कि वास्तव में देश के मतदाताओं के लिए विकल्पहीनता की स्थिति पैदा हो चुकी है। मध्य प्रदेश के निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी की सशक्त उपस्थिति मतदाताओं की इसी कुंठा का प्रतिफल है। हालाँकि आम आदमी पार्टी से उम्मीद पालना ठीक नहीं। क्योंकि दिल्ली में जो इनकी हालत है और पंजाब में हत्याओं और भ्रष्टाचार का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उससे इनकी कार्यशैली के प्रति निराशा ही उपजती है। हालाँकि छवि तो किसी भी दल की साफ़-सुथरी नहीं है।

पर इस समय देश की जनता की मन:स्थिति यह है कि वह कई मसलों पर सत्ता पक्ष से निराश और क्रोधित होने के बावजूद भी विपक्ष को अपना विकल्प नहीं समझ रही; क्योंकि विपक्ष को जो परिपक्वता दिखानी चाहिए, वह नहीं दिखा पा रहा है। रही-सही कसर विपक्ष के वाग्वीर पूरी कर रहे हैं। दरअसल उन्हें लगता है कि बहुसंख्यक समाज के विरुद्ध अनर्गल बोलकर वे अल्पसंख्यक और कुछ विशेष वर्गों का पुरज़ोर समर्थन पा पाएँगे। लेकिन इसके विपरीत होता यह है कि अल्पसंख्यक वर्ग उन्हें समर्थन दे दे, तो बहुसंख्यक वर्ग पूरे दमख़म से उससे घृणा करना शुरू कर देता है।

दरअसल विपक्षी दलों के नेता अपने परिजनों की राजनीतिक वृत्ति (करियर) से परे कुछ देख ही नहीं पा रहे हैं। उनकी प्राथमिकता अपनी राजनीतिक विरासत को बचाकर अपने बेटे-बेटियों के लिए सुरक्षित रखने में है। साथ में ईडी और सीबीआई की जाँच से बचने का दबाव है ही। वास्तव में विपक्ष अकर्मण्य वंशवादियों की जमात बन चुका है। राजनीति में अभिजनवाद का रोग बड़ा पुराना है। यह रोग एक बार किसी को जकड़ ले, तो बर्बाद करके ही छोड़ता है। वर्तमान में जो विपक्षी नेतृत्व दिख रहा है, उनमें ज़्यादातर ज़मीन से जुड़े हुए जुझारू नेताओं, जैसे- जवाहरलाल नेहरू, चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव आदि के राजनीतिक अवशेष मात्र की तरह हैं। उपरोक्त नेताओं के इन अभिजन (एलीट) उत्तराधिकारियों के पास न सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की क्षमता है, न जनता को देने के लिए कोई परिकल्पना (विजन) है। अगर कुछ है, तो सिर्फ़ भावनात्मक कहानियाँ, जिनका जनता के लिए कोई विशेष जुड़ाव या मतलब नहीं है। इसके अतिरिक्त विपक्ष के पास जातिवाद और धर्म के परम्परागत मुद्दे तो हैं, किन्तु दिक़्क़त यह है कि इन मुद्दों से सम्बन्धित अधिक पैने हथियार सत्ता पक्ष के पास भरे पड़े हैं, जो विपक्ष से कहीं ज़्यादा कारगर भी साबित हो रहे हैं।

समस्या यह हैं कि इस राजनीतिक दुर्गति के पश्चात् आज भी कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल यह समझने को तैयार नहीं हैं कि वे क्यों पिछले 7-8 वर्षों से राज्य हो या केंद्र, हर जगह से सत्ता से बाहर धकेले जा रहे हैं? क्योंकि वे आम जनता के मुद्दों पर आधारित राजनीति नहीं कर पा रहे हैं। विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि सत्ता पक्ष मुद्दों से देश को भटका रहा है। लेकिन वह नहीं समझ रहा है कि वह ख़ुद भी सही मुद्दों पर बात नहीं करना चाहता। इसीलिए सत्ता पक्ष जिस चक्रव्यूह में विपक्षियों को फँसाना चाहता है, वे उसमें फँस रहे हैं। सम्भवत: विपक्ष समय की धारा को पहचानने में चूक कर रहा है। वह समझ नहीं पा रहा कि क्यों भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में जमी हुई है, और निरंतर आगे बढ़ती जा रही है? किसी भी व्यक्ति, संस्था या समाज की मृत्यु तब होती है, जब वह जिज्ञासा की भावना खो देता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन लिखते हैं कि किसी बात की जानकारी न हो, तो उतना बुरा नहीं है, जितना कि जानने की इच्छा न होना।

विपक्ष को भाजपा और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उभार को समझने की ज़रूरत है। संप्रग सरकार के कार्यकाल में सन् 2014 के लोकसभा चुनावों के कुछ महीने पहले तक सत्ता विरोधी लहर चरम पर पहुँच चुकी थी। देश में राजनीतिक वातावरण क्षुब्ध था। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सरकार की गरिमा रसातल में पहुँच चुकी थी। ऐसे में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने उन कमियों को ज़ोर-शोर से लोगों के बीच उठाया और साथ में अपने नेतृत्व का विकल्प सामने रखा। उस व$क्त मुख्यमंत्री के रूप में मोदी के सुशासन ब्रांड गुजरात मॉडल का ज़ोर-शोर से प्रचार-प्रसार हुआ। साथ ही ग़ैर-वंशवादी पृष्ठभूमि, स्वनिर्मित छवि एवं साफ़-सुथरी छवि ने नरेंद्र्र मोदी के क़द को बड़ा केंद्रीय फ़लक दिया। अब इस कसौटी पर विपक्ष को देखिए, जिसके लिए यह तसव्वुर की कंगाली का दौर है। वर्तमान राजनीति ऐसी स्थिति में पहुँच गयी है, जहाँ सत्ता पक्ष द्वारा खींची गयी लकीर पार करने का विपक्ष में साहस ही नहीं दिख रहा है। सत्ता पक्ष हावी है एवं अपने पक्ष में व्यापक जन-समर्थन को मोडऩे के साथ ही अपनी कार्यनीति को बहुत हद तक लागू करने में सफल भी हुआ है; क्योंकि वह ज़्यादा जागृत एवं गतिशील है। अब इसी के बरअक्स विपक्ष को स्व-मूल्यांकन कर लेना चाहिए।

फ़िराक़ गोरखपुरी का एक शे’र है :-
‘‘सुकूते-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है।
सुख़न की शम्अ जलाओ बहुत अँधेरा है।।’’
असल में देश के लोकतंत्र में विपक्ष की वर्तमान स्थिति यही है। परन्तु उसे सचेत होना पड़ेगा, अन्यथा यह अँधेरा हमेशा के लिए उसका प्रारब्ध बन जाएगा।
(लेखक राजनीति एवं इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

अपनी मानसिकता बदलें बेरोज़गार युवा

आज देश में बेरोज़गारी और महँगाई अपने चरम पर है। युवाओं को कहीं से भी अपनी आजीविका के लिए उम्मीद की किरण नज़र नहीं आ रही है। इन मुश्किल भरी परिस्थितियों में ऐसे अवसर तलाश करने की आवश्यकता है, जिससे युवाओं का भविष्य उज्ज्वल हो सके। ऐसे में बेरोज़गार युवाओं को चाहिए कि वे हुनरमंद बनें और अपने हुनर को दूसरी तरफ़ यानी स्वरोज़गार में लगाएँ। जो युवा किसी हुनर से वाकिफ़ नहीं हैं, वे प्रशिक्षण लेकर उसे अपना पेशा बनाकर एक पेशेवर के रूप में अपने आपको स्थापित करें। इससे उन्हें तो मज़बूती मिलेगी ही, साथ ही वे दूसरे बेरोज़गार युवाओं को भी रोज़गार दे सकेंगे। कहने का मतलब यह है कि आज हमें अपने पूर्वजों से सीख लेते हुए अपने पुराने धंधों की तरफ़ मुडऩे की आवश्यकता है।

इसमें कोई दो-राय नहीं है कि लोग शहरीकरण और शहरों की अन्य पद्धतियों से ऊब चुके हैं। इनमें से अधिकतर लोग ग्रामीण क्षेत्रों की ओर रुख़ कर रहे हैं, और वे वहीं पर मौज़ूद संसाधनों के ज़रिये रोज़गार की तलाश में भी हैं।

पूर्व सरकारों की तरह मौज़ूदा केंद्र सरकार और राज्य सरकारें भी कई प्रकार के प्रशिक्षण बेरोज़गार युवाओं को दे रही हैं, जिसमें मुख्य योजना है प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना। इसमें जिन युवाओं ने अपनी आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी हो, उन युवाओं को मुफ़्त प्रशिक्षण का प्रावधान है। प्रशिक्षण के साथ-साथ युवाओं को बाद में एक प्रमाण-पत्र भी दिया जाता है, जिसमें वह एक कर्मचारी के तौर पर भी कहीं नौकरी के अवसर तलाश सकता है, और स्वरोज़गार भी कर सकता है।

केंद्र के अलावा राज्य सरकारों ने इस योजना का लाभ देने के लिए हर राज्य में अलग-अलग प्रशिक्षण केंद्र खोले हैं। $गौरतलब है कि प्रशिक्षित होने के बाद उम्मीदवारों को एक प्रमाण-पत्र और 8,000 रुपये सहायता राशि भी दी जाती है। सरकार द्वारा यह सुविधा बेरोज़गारी कम करके युवाओं को रोज़गार और स्वरोज़गार मुहैया कराने के लिए लायी गयी है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत युवा जिस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, उसमें पहले उनकी योग्यता मापी जाएगी, फिर उसी योग्यता के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाएगा।

मेरा मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बेरोज़गार युवा छ: महीने से एक साल का प्रशिक्षण लेकर अपना निजी कारोबार शुरू कर सकते हैं, जिसमें बहुत ज़्यादा पूँजी भी नहीं लगती। जैसे युवा अपने आसपास गाँव क़स्बा या तहसीलों में आप स्कूटर, बाइक या कार के मैकेनिक बन सकते हैं। अगर आप मध्य या निम्न वर्गीय किसान परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं, तो आप चंद महीनों के प्रशिक्षण के बाद गाय, भैंस, बकरी से लेकर भेड़, सूअर, मुर्ग़ी, मछली और मधुमक्खी पालन सीख सकते हैं। डेयरी फार्मिंग के अलावा अधिक माँग वाली सब्ज़ियाँ, जैसे- मशरूम, नारंगी गाजर और ब्रोकली और दूसरी मौसमी हरी सब्ज़ियाँ उगा सकते हैं, जिनकी माँग शहरों में बहुत अधिक है। इसके अलावा जूते, बेल्ट, कपड़े, लकड़ी और अचार-पापड़ आदि बनाकर भी अच्छी कमायी कर सकते हैं। ग्रामीण लोग आजकल अपने इन चीज़ों के लिए शहरों का रुख़ करते हैं। उनको छोटे क़स्बों और उनके गाँव में अगर यह सुविधा मिले, तो उन्हें शहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

ऐसे ही शहरों में आज मिट्टी के बर्तनों की भी भारी माँग है। ऐसे में युवा मिट्टी के बर्तन बनाने का प्रशिक्षण लेकर इस बेहतरीन काम को उद्योग के रूप में स्थापित कर सकते हैं। आज हल्दीराम, अग्रवाल और बीकानेर आदि मिठाई और नमकीन बेचकर एक बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं। अगर इस काम में महारत हासिल करके युवा अच्छी क्वालिटी की मिठाइयाँ बनाकर अपना कारोबार करते हैं, तो अपने जीवन स्तर में सुधार कर सकते हैं। इसी तरह आज शहरों के ही नहीं, बल्कि गाँवों के भी हर घर में बिजली से चलने वाले उपकरणों की भरमार है। ऐसे में बिजली उपकरणों को निर्मित करके या बिजली मैकेनिक यानी लाइनमैन बनकर युवा इसमें भी अच्छा पैसा कमा सकते हैं। ज़ाहिर है कि आज नये मकानों में वायरिंग करने से लेकर एसी, कूलर व पंखे फिट करने, उन्हें ठीक करने के अच्छे दाम मिलते हैं। इस काम में बिजली मैकेनिकों की बहुत माँग रहती है। इसी तरह कारपेंटर, फॉल सीलिंग और अन्य तमाम कार्यों के लिए भी कारीगरों की भारी माँग रहती है। ऐसे ही आजकल घर से लेकर भवन निर्माण तक में लकड़ी, स्टील, लोहे से बनी चीज़ों की विकट माँग रहती है। इसलिए इन चीज़ों से जुड़े कारीगरों की, जिनको बढ़ईगीरी, वेल्डिंग और प्लंबर आदि के कार्य करने होते हैं, बड़े पैमाने पर ज़रूरत रहती है। बड़े व्यवसायियों को भी इनकी तलाश रहती है।

इसके अलावा देश में जिस प्रकार से मोबाइल फोन, पैड, लैपटॉप, कम्प्यूटर और इंटरनेट से जुड़ी अन्य एसेसरी की भी भारी माँग है। इस क्षेत्र में भी युवा अपना छोटा-सा मैकेनिकल स्टोर खोलकर अच्छी कमायी कर सकते हैं। आज देश में जिस प्रकार अंग्रेजी और एलोपैथिक दवाइयों का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है और आयुर्वेद का चलन बढ़ता जा रहा है। इससे भी रोज़गार के अवसर बढ़े हैं।

बेरोज़गार युवाओं के लिए इसमें अच्छा अवसर है, क्योंकि आजकल नाड़ी देखकर बीमारी बताने और उसका जड़ से सही इलाज करने वाले सिद्ध वैद्यों का अभाव है। इसी प्रकार पिछले कुछ वर्षों से योग का बाज़ार बढ़ा है, जिसके लिए योगाचार्यों की पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर माँग है। जिन युवाओं के पास खेत हैं, वे जड़ी-बूटियों की खेती कर सकते हैं। भारतीय आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की पूरी दुनिया में बहुत माँग है।

बहरहाल आज देश में सबसे अधिक परेशान वे लोग हैं, जो पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार हैं। क्योंकि वे कोई छोटा-मोटा पेशेगत कार्य, कारीगरी या हुनरमंद कार्य न करके सिर्फ़ उच्च शिक्षा पाकर नौकरी की उम्मीद में बैठे रह जाते हैं। वे छोटे-मोटे काम, जैसे फल और सब्ज़ी बेचने, अन्य चीज़ों का ठेला लगाने से भी हिचकिचाते हैं। धीरे-धीरे उनकी उम्र और समय हाथ से निकल जाते हैं, उनकी शादी में भी देरी हो जाती है, जिससे बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। आज देश में तक़रीबन में 80 फ़ीसदी छोटे स्वरोज़गार वे लोग कर रहे हैं, जो ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। केवल 15 से 20 फ़ीसदी ही पढ़े-लिखे युवा हैं, जिनके बीच ही नौकरी आदि को लेकर मारामारी मची हुई है।
हालाँकि यह सरकारों की कमी ही कही जाएगी कि इतने कम पढ़े-लिखे युवाओं में से 50 फ़ीसदी को भी वे रोज़गार मुहैया नहीं करा पा रही हैं। लेकिन ऐसे युवा अगर रोज़गार के रूप में केवल नौकरी पाने की राह में बैठे हैं, तो मेरे विचार में उनके शिक्षित होने का कोई अर्थ नहीं है; क्योंकि उनसे ज़्यादा पैसा तो अनपढ़ कमा रहे हैं।

आजकल केवल अधिक पढ़ा-लिखा होना मायने नहीं रखता, बल्कि आपने जीवन में क्या कमाया और आपका जीवन स्तर कितना ऊँचा है; ये बहुत मायने रखता है। यह केवल किसी की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह किसी का सेवादार या नौकर बनना पसन्द करता है अथवा स्वयं अपना कारोबार करके ख़ुद मालिक बनना।

केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री रोज़गार योजना के तहत पात्रों को बैंक से 10 लाख तक के ऋण की योजना भी है। इसी तरह अन्य कई योजनाएँ भी ऋण के अनुदान वाली हैं, जो बेरोज़गार युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने में मददगार साबित हो सकती हैं। इससे बेरोज़गारी भी दूर होगी और युवाओं व उनके माँ-बाप और बाकी परिवार वालों की चिन्ता भी। लिहाज़ा युवाओं को एक हौसले और प्रेरणा की आवश्यकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

मज़बूत हो रहे इमरान

पाकिस्तान में जल्दी आम चुनाव की माँग कर रहे पूर्व प्रधानमंत्री

इमरान ख़ान पाकिस्तान में जल्दी चुनाव की वकालत कर रहे हैं और सत्ता से बाहर होने के बाद लगातार जनता के बीच हैं, ताकि इसके लिए दबाव बन सके। इमरान देश में सेना की समानांतर सत्ता का सिलसिला कमज़ोर करने के लिए माहौल बनाने में लगे हैं। वह सेना के ताक़तवर होने को देश की तरक़्क़ी के ख़िलाफ़ बता रहे हैं और सत्ता में बैठे गठबंधन को भ्रष्ट बताकर इसे ख़ुद के ख़िलाफ़ विदेशी षड्यंत्र की बात कह रहे हैं। जनता उनकी बातों से प्रभावित दिख रही है और उनकी जनसभाओं में बड़ी संख्या में आ रही है। हाल में पाकिस्तान के पंजाब में हुए उपचुनाव में उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की बड़ी जीत से ज़ाहिर होता है कि जनता उनसे प्रभावित है।

सत्ता से बाहर होने के बाद इमरान ख़ान ने देश के कई इलाक़ों में बड़ी रैलियाँ की हैं। इनमें बड़ी तादाद में जनता दिखी है। पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि इन रैलियों के ज़रिये इमरान ख़ान सरकार और चुनाव आयोग पर देश में जल्दी चुनाव करवाने का दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वह फिर सत्ता में आ सकते हैं। इमरान के भाषणों से उनका लक्ष्य साफ़ ज़ाहिर होता है। हाल ही में सत्तारूढ़ दल के एक मंत्री ख़ुर्रम दस्तगीर ने दावा किया था कि इमरान ख़ान पूरे तत्कालीन विपक्ष का सफ़ाया कर 15 साल तक सत्ता में रहने की योजना बना रहे हैं। पीटीआई इस आरोप को बकवास कह चुकी है। हालाँकि इसमें कोई दो-राय नहीं कि इमरान काफ़ी ज़्यादा महत्त्वाकांक्षी नेता हैं।

इमरान की राजनीति काफ़ी हद तक पाकिस्तान की परम्परागत राजनीति से हटकर है। वह ढके-छिपे अंदाज़ में तालिबान के भी समर्थन में दिखते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में चार साल पहले अपने शपथ ग्रहण में जब उन्होंने भारत के प्रति दोस्ती की बात कही थी, तो उन पर भरोसा किया गया था; लेकिन उनके 1,332 दिन के शासन में भारत से बातचीत या दोनों देशों के बीच सम्बन्ध बेहतर करने के प्रति वह कभी भी गम्भीर नहीं दिखे। उलटे इस दौरान दोनों देशों की सीमा पर कई बार तनाव दिखा। आतंकवादियों की घुसपैठ भी बराबर जारी रही।

इमरान एक रणनीति के तहत राजनीति कर रहे हैं, जो उनकी तीसरी पत्नी बुशरा बीबी के लीक हुए एक ऑडियो से ज़ाहिर हो जाता है। इस ऑडियो में बुशरा पीटीआई के सोशल मीडिया विंग को निर्देश देती सुनी जा सकती हैं कि सोशल मीडिया पर वर्तमान सरकार देशद्रोह का नैरेटिव चलाया जाए।

बुशरा पीटीआई के डिजिटल मीडिया चेयरमैन अर्सलान ख़ालिद से कहती सुनायी देती हैं कि ट्रेंड चलाएँ और लोगों को बताएँ कि मुल्क (पाकिस्तान) और इमरान ख़ान के साथ ग़द्दारी की जा रही है। बुशरा सोशल मीडिया टीम को रूस से पाकिस्तान के तेल ख़रीदने के मुद्दे को ठण्डा न होने देने के लिए कहा। ऑडियो में बुशरा ने ख़ालिद से कहा कि आप इस मुद्दे को दबने नहीं दें। ऑडियो में बुशरा पार्टी छोडक़र जाने वाले असन्तुष्टों को भी विदेशी साज़िश से जोडऩे की बात करती हैं।

उपचुनाव में बड़ी जीत
पाकिस्तानी पंजाब की असेंबली की 20 सीटों के उपचुनाव में इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई को 15 सीटें मिलीं, जो इस बात का पुख़्ता प्रमाण है कि इमरान जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। यह नतीजे इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री का पद खोने के बाद यह पहला ऐसा चुनाव था, जिसमें इमरान की पार्टी पीटीआई और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) के बीच सीधी टक्कर थी।

इससे भी बड़ी बात यह है कि यह उपचुनाव शरीफ़ बंधुओं का गढ़ माना जाता है। फिर भी प्रधानमंत्री शहवाज़ शरीफ़ की पार्टी को महज़ चार सीटें ही मिलीं। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के हिस्से में आयी। इसी साल अप्रैल में पीटीआई के मुख्यमंत्री उस्मान बुज़दार के इस्तीफ़े के बाद प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ के बेटे हमज़ा शाहबाज़ मुख्यमंत्री बन गये थे; क्योंकि पीटीआई के 25 विधायकों ने दलबदल कर लिया था। बाद में इमरान की याचिका पर चुनाव आयोग ने इन 25 विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया था।

अब इन्हीं में से 20 ख़ाली सीटों पर उपचुनाव हुआ था, क्योंकि सरकार ने 5 विधायकों को रिजर्व सीटों पर मनोनीत कर दिया था। पीटीआई के 15 सीटें जीतने से पंजाब असेंबली में इमरान की पार्टी का बहुमत हो गया; लेकिन यहाँ डिप्टी स्पीकर दोस्त मोहम्मद मज़ारी ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग-क़ायद (पीएमएल-क्यू) के 10 वोट (मत) रद्द करके खेल कर दिया। बहुमत के लिए ज़रूरी 186 वोटों के मुक़ाबले उसके पास 188 विधायक थे। पीटीआई / पीएमएल-क्यू के संयुक्त उम्मीदवार परवेज़ इलाही को 186 वोट मिले, जबकि हमज़ा शाहबाज़ को 179 वोट। इस पर इमरान ख़ान ने इसके बाद हमज़ा शाहबाज़ के ख़िलाफ़ इस्लामाबाद, कराची, मुल्तान, लाहौर, पेशावर में बड़े विरोध-प्रदर्शन किये। ख़ान ने इस मसले पर कहा कि पंजाब विधानसभा में हुई घटनाओं से मैं हैरान हूँ। संसद में नैतिकता की शक्ति है, सेना की नहीं, लोकतंत्र नैतिकता पर आधारित है। उन्होंने सत्तारूढ़ पीपीपी के नेता और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी पर पंजाब उपचुनाव से पहले ख़रीद-फ़रोख़्त का आरोप लगाते हुए कहा कि देश के प्रसिद्ध डाकू आसिफ़ ज़रदारी 30 साल से देश को लूट रहे हैं।

हालाँकि 27 जुलाई को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने डिप्टी स्पीकर के फ़ैसले को असंवैधानिक क़रार देते हुए हमज़ा शरीफ़ की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति को रद्द करके परवेज़ इलाही को फिर मुख्यमंत्री नियुक्त करने का अदेश दे दिया। यह फ़ैसला प्रधानमंत्री शहवाज़ शरीफ़ के लिए बड़ा झटका है।

सेना का विरोध
इमरान ख़ान के सेना से मतभेद प्रधानमंत्री रहते ही थे। वह अपनी पसन्द का सेनाध्यक्ष बनाना चाहते थे। वह सत्ता में सेना की दख़लंदाज़ी के सख़्त ख़िलाफ़ रहे हैं। हाल के महीनों में यह कई बार कहा गया है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा और इमरान ख़ान के बीच तनाव है। इमरान का कहना है कि सियासी फ़ैसले जनता का हक़ हैं; लेकिन ये फ़ैसले सेना ले रही है। वहीं इमरान के क़रीबी पीटीआई नेता एवं पूर्व मंत्री फवाद चौधरी ने हाल ही में भी सख़्त लहज़े में सत्ता में दख़ल को लेकर सेना चेतावनी दी कि पाकिस्तान की कौम इंकलाब के लिए तैयार है। अब सेना को फ़ैसला करना है कि उसे यह इंकलाब वोटों के ज़रिये लाना है या फिर पाकिस्तान को श्रीलंका बनाना है। चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान में इस्टैब्लिशमेंट (सेना) के मुँह लहू लगा हुआ है कि उन्हें सियासी फ़ैसले करने हैं; सियासत को आगे लेकर जाना है। दुर्भाग्य से यह पाकिस्तान की तारीख़ है, जो बदल जाएगी। पाकिस्तान की अवाम को फ़ैसलों का हक़ देना होगा। इमरान की पार्टी तो यहाँ तक दावा कर रही है कि आने वाले चुनाव में सत्तारूढ़ पीएमएल-एन और पीपीपी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

बलूचिस्तान में विद्रोह

पाकिस्तान की सेना, आईएसआई और कुछ हद तक राजनीतिक दल भले कश्मीर में चिंगारी भडक़ाने की कोशिश करते हों; लेकिन हक़ीक़त यह है कि ख़ुद उनके देश में बलूचिस्तान गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुँच चुका है। हाल में भारत यात्रा पर आयीं बलोच नेता प्रोफेसर नायला क़ादरी ने बलोच जनता का दर्द बयाँ किया था।
दरअसल बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सेना के ज़ुल्मों का जबरदस्त विरोध है और वे (बलूचिस्तान निवासी) उम्मीद करते हैं कि भारत उनकी मदद करे। कनाडा में निर्वासित रूप से रह रहीं नायला पाकिस्तान को आतंकवाद का केंद्र कहती हैं और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के ख़िलाफ़ अभियान में भी काफ़ी सक्रिय हैं।
वह इस कॉरिडोर को बलूचिस्तान की जनता के लिए मौत का फ़रमान बताती हैं। उनका कहना है कि यह वास्तव में कोई इकोनॉमिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सैन्य प्रोजेक्ट है। उनका आरोप है कि हुक्मरान पाकिस्तान की मदद से चीनी बस्तियों के निर्माण के लिए हमारी पुश्तैनी ज़मीन से बलोचों को विस्थापित कर रहे हैं। बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए बलोच जनता वर्षों से संघर्ष कर रही है। वहाँ बाक़ायदा बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) का गठन किया गया है और उसके लड़ाके पाकिस्तानी सेना और उसकी एजेंसियों के ख़िलाफ़ हमले कर रहे हैं।

हाल ही में आयी मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, बीएलए ने कुछ समय पहले मिलिट्री इंटेलीजेंस (एमआई) और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर-सर्विस-इंटेलीजेंस के करन में स्थित दफ़्तरों पर रॉकेट दाग़े थे। कुछ वीडियोज में इस घटना के समय वहाँ एम्बुलेंस और पुलिस की सायरन बजाती गाडिय़ाँ देखी गयी थीं। नायला क़ादरी सन् 2016 में तब सुर्ख़ियों में आयी थीं, जब उन्होंने एक बयान में कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी बलोच जनता के हीरो हैं।

आरोप लगते रहे हैं कि पाकिस्तान, चीन के साथ मिलकर बलूचिस्तान में नरसंहार कर रहा है और बलोच नस्ल को ख़त्म करना चाहता है। नायला कहती हैं कि बलूचिस्तान आज़ाद होता है, तो वहाँ भारत के प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिमा लगायी जाएगी।

नायला हाल में जब दिल्ली आयी थीं, तो उन्होंने पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर (पीओके) पर पाकिस्तान की ज़्यादतियों की करतूतें बयाँ की थीं। नायला ने बताया कि पीओके के अवैध क़ब्ज़े वाले बलूचिस्तान सूबे की आज़ादी के लिए आन्दोलन चलाने वाले नेताओं ने 21 मार्च को अपनी निर्वासित सरकार का गठन किया है, जिसकी वह अध्यक्ष हैं।

चुनौतियों के बीच कुम्हारों में जगी आस

पूरी तरह बन्द नहीं हुई सिंगल यूज प्लास्टिक, प्लास्टिक के हर सामान का विकल्प नहीं मिट्टी के बर्तन

देश भर में सिंगल यूज पॉलिथीन के बन्द होने से भारतीय परम्परा के सिंगल यूज मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों में आस जगी है कि अब उनकी बिक्री बढ़ेगी। लेकिन उनकी कई समस्याएँ ऐसी हैं, जिन पर अगर अभी भी ध्यान दिया जाए, तो उनके इस व्यवसाय में चार चाँद लग सकते हैं। हालाँकि यह करना आसान नहीं होगा; लेकिन सरकारों को इसमें सहयोग करना चाहिए। कुम्हार मिट्टी से जो बर्तन बनाते हैं, वह एक कला है, जिसने पिछले कुछ दशकों में बुरी तरह दम तोड़ा है।

इससे पहले एक बार अपने पुश्तैनी काम के उभरने की आस कुम्हारों में तब जगी थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क़रीब डेढ़ साल पहले स्वदेशी व आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया था। हालाँकि स्वदेशी अपनाओ का नारा काफ़ी पुराना है और कई बार हमारे देश में इसे दोहराया जा चुका है; लेकिन आत्मनिर्भर भारत के नारे ने कई भारतीय कारीगरों को बल दिया। इससे हस्तशिल्प के कई कामों को बढ़ावा मिला। ख़ासकर कुम्हारों को इससे बल मिला है। अयोध्या में पिछले दो साल से दीपावली पर लाखों दीये जलाने की परम्परा ने कुम्हारों की इस बर्तन बनाने की कला को संबल प्रदान किया है।

हालाँकि कुम्हार कला को बढ़ावा देने के लिए माटी कला बोर्ड द्वारा देश भर की ग्राम पंचायतों में कुम्हारों को नि:शुल्क पट्टों के आवंटन की घोषणा भी की गयी थी। इसके अलावा कुम्हारों को ही विद्युत चाक, मिट्टी मिलाने वाली मशीनें और कुल्हड़ तैयार करने वाली मशीनें वितरित करने की बात माटी कला बोर्ड ने कही थी; लेकिन उसने इस दिशा में ज़मीनी स्तर पर कितना काम किया, इसके सही आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। आज देश के कई राज्यों में माटी कला बोर्ड काम करने का दावा कर रहा है; लेकिन ये आँकड़े सामने नहीं आ रहे हैं कि उसके सहयोग से अभी तक कितने लोगों को मिट्टी के बर्तन बनाने का रोज़गार नसीब हुआ है? वहीं फरवरी, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खादी ग्रामोद्योग योजना के तहत वाराणसी के कुम्हारों को 1,000 इलेक्ट्रिक चाक वितरित किये थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी गूँथने की मशीनें और मिश्रण मशीनें भी दी थीं। इससे वाराणसी के कुम्हारों में उत्साह जगा था कि उनका काम बढ़ेगा। लेकिन कई समस्याओं से वे अब भी जूझ रहे हैं।

मिट्टी की कमी
कुम्हारों के आगे सबसे बड़ी समस्या बर्तन बनाने लायक मिट्टी की कमी की है। इसकी सबसे बड़ी वजह तालाबों का कम होना है। इसके अलावा जो तालाब बचे हुए हैं, उनकी मिट्टी गन्दगी की वजह से बर्तन बनाने के लिए पहले की तरह उपयोगी नहीं रही। कई जगह मिट्टी निकालने पर भी पाबंदी है। हाल ही में देश भर के कई स्थानों के कुम्हारों की समस्याओं को लेकर मीडिया में ख़बरें वायरल हुई हैं, जिनमें उन्होंने अपनी सबसे बड़ी समस्या मिट्टी की कमी बतायी है।

अहमदाबाद में नारोल की सडक़ पर मिट्टी के बर्तन बेचने वाले एक कुम्हार ने बताया कि अब पूरी तरह मिट्टी के बर्तनों की काफ़ी कमी है, क्योंकि मिट्टी नहीं मिलती। इन बर्तनों में मिट्टी, रेत, काग़ज़ की लुग्दी, गोबर, फेविकोल जैसी चीज़ें मिलायी जा रही हैं। ख़ाली मिट्टी के बर्तन तो पुरानी परम्परा के हिसाब से ही बनते थे, जो हाथ से चलने वाली चाक पर ही बनाये जाते थे। अब उन चाकों पर कम ही बर्तन बनते हैं, क्योंकि अब इलेक्ट्रिक चाक भी आ गये हैं। लेकिन मिट्टी के बर्तनों के लिए चिकनी मिट्टी ही सबसे ज़्यादा उपयुक्त होती है, जिसकी बहुत कमी है।

एक सर्वे बताता है कि पिछले तीन दशक में मिट्टी के बर्तनों का काम 60 फ़ीसदी तक घटा है, जिसे 100 फ़ीसदी के स्तर तक लाना अब मुमकिन नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि अब हर घर में मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं होता। दूसरी वजह यह है कि मिट्टी के जिन बर्तनों का इस्तेमाल आज भी थोड़ा-बहुत चलन में है, उनमें दीये, हुक्के, घड़े, कुल्हड़, गमले इत्यादि गिने-चुने बर्तन ही हैं, जो कहीं-कहीं इस्तेमाल में देखने को मिलते हैं। जबकि भारतीय संस्कृति की नींव यानी सभ्यता के पन्ने पलटें, तो एक दौर में हर घर में खाना बनाने तक के बर्तन मिट्टी के ही हुआ करते थे। दुनिया की सबसे पुरानी परम्परा मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की ख़ुदाई में तो यही साबित हुआ है।

मिट्टी के बर्तन ही नहीं विकल्प

सिंगल यूज प्लास्टिक की चीज़ें बन्द होने से उसका पूरा बाज़ार सिर्फ़ मिट्टी के बर्तनों से नहीं घेरा जा सकता है, क्योंकि मिट्टी के बर्तन ही सभी चीज़ों का विकल्प नहीं हैं। अगर हम चाय की दुकानों पर ही देखें, तो वहाँ डिस्पोजल गिलास चलन में हैं, जिनमें काग़ज़ का ज़्यादा इस्तेमाल होता है। उन पर रोक भी नहीं लगी है, इसलिए कुल्हड़ों की बिक्री भी बढऩे की बहुत उम्मीद करना ठीक नहीं है।

बाक़ी चीज़ों के लिए मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल भी नहीं बढ़ेगा, क्योंकि पॉलिथीन की जगह कपड़े के बैग, काग़ज़ के लिफ़ाफ़े आदि के चलन में बढ़ोतरी हुई है। फिर भी कुम्हारों में आस जगी है कि घरों में होने वाली प्लास्टिक की कई चीज़ों की जगह एक बार फिर मिट्टी के बर्तन लेंगे; क्योंकि लोगों में भी प्लास्टिक की चीज़ों के प्रति हेय भावना पैदा हो रही है, जिसकी सबसे बड़ी वजह इन चीज़ों से उनकी सेहत को हो रहा नुक़सान है। अगर चीन द्वारा बनाये जाने वाले मिट्टी के विकल्पों पर रोक लग जाए, तो भले ही कुम्हारों के हाथों को कुछ ज़्यादा काम मिल सकता है।

पूरी तरह बन्द हो प्लास्टिक
केंद्र सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक तो लगा दी; लेकिन यह रोक सिर्फ़ एक ढकोसला ही साबित हो रही है। दरअसल दूध, नमकीन, बिस्कुट, चिप्स, चॉकलेट, टॉफी और अन्य खाने-पीने की चीज़ों की पैकिंग भी सिंगल यूज प्लास्टिक की पॉलिथीन में ही होती है, उन पर अभी तक कोई रोक नहीं लगी है और न ही खाने-पीने की चीज़ों की पैकिंग के लिए उनका कोई विकल्प कम्पनियों ने तलाश किया है।

इसके अलावा बाज़ार में सब्ज़ी बेचने वालों से लेकर दुकानदारों तक ने पॉलिथीन का इस्तेमाल पूरी तरह बन्द नहीं किया है। ये लोग आज भी ग्राहकों को चोरी-छिपे पॉलिथीन में ही सामान दे रहे हैं। बहुत कम दुकानदार हैं, जिन्होंने पॉलिथीन का इस्तेमाल बन्द किया है। अभी चंद रोज़ पहले एक सब्ज़ी बेचने वाला ग्राहकों को पॉलिथीन में ही सब्ज़ी दे रहा था। उसने पॉलिथीन छिपाकर रखी हुई थीं।

जब उससे मैंने पूछा कि भैया, पॉलिथीन तो बैन हो गयी हैं, फिर आप सब्ज़ी इसमें क्यों दे रहे हैं? तो उसने जवाब दिया मैडम! आप थैला लेकर आयी हैं। ऐसे ग्राहक 100 में से 5-10 ही होंगे। बाक़ी तो ख़ाली हाथ हिलाते हुए सब्ज़ी लेने आ जाते हैं। अब उन्हें लौटा तो नहीं सकते न! मैंने कहा, तो भैया! कपड़े के बैग रखिए। उसने झट से कहा, मैडम! इतनी कमायी सब्ज़ी में नहीं है। कपड़े के बैग अब भी पॉलिथीन से दोगुने रेट में मिल रहे हैं। पॉलिथीन थोड़ी महँगी हुई है, वो भी ब्लैक में मिलने की वजह से। पहले ये क्वालिटी के हिसाब से 30 से 40 रुपये पाव थी, और अब 50 से 60 रुपये पाव हुई है। एक पन्नी (पॉलिथीन) अब भी 1-1.5 रुपये की पड़ती है, जबकि कपड़े का बैग 2-2.5 रुपये का पड़ता है।

अब अगर प्लास्टिक की चीज़ों से छुटकारे की बात करें, तो यह तभी मुमकिन है, जब प्लास्टिक से बनने वाली हर चीज़ की जगह काग़ज़, मिट्टी, धातु से बनी चीज़ों को फिर से इस्तेमाल में लाया जाए। आज हर घर में भरपूर मात्रा में प्लास्टिक की चीज़ें मौज़ूद हैं, जिनमें टीवी, फ्रिज और वाहनों से लेकर खाने के बर्तन तक शामिल हैं। खाने-पीने की चीज़ों की पैकिंग तो 99 फ़ीसदी प्लास्टिक के बिना नहीं होती।

आज अगर किचन तक मिट्टी के बर्तनों को पहुँचाना है, तो इसके लिए लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी देनी होगी और मिट्टी के बर्तनों के फ़ायदे उन्हें बताने होंगे। इसके अलावा चीनी मिट्टी और शीशे के जार (बोट) बनाने होंगे, जो कि रसोई में खाद्य पदार्थ रखने का बेहतर विकल्प हैं। वहीं प्लास्टिक की चीज़ों के ख़िलाफ़ सरकार को सख़्ती से अभियान चलाना होगा।

राजस्थान में ड्रग तस्कर बेलगाम

मिलीभगत से नशे की तस्करी जारी, पुलिस महानिदेशक ने दिखायी सख़्ती

सरकार और अफ़सरों की लाख कोशिशों के बावजूद संगीन अपराध बेइंतहा फलने-फूलने लगता है, तो इस बात को पूरी तरह मुहरबंद करता है कि इसके पीछे किसी बड़ी राजनीतिक ताक़त या सरकारी विभागों के गठजोड़ का पहलू जुड़ा हुआ है। राजस्थान में मादक पदार्थों के ख़िलाफ़ अभियान चलाये जाने के बावजूद रोकथाम निरर्थक साबित हो रही है, तो इसकी भी यही वजह हो सकती है।

इस मामले में राजस्थान के पुलिस महानिरीक्षक (डीजीपी) एम.एल. लाठर की रेंज के महानिरीक्षकों से की गयी जवाब तलबी इस बात की पुष्टि करती है। लाठर द्वारा जारी चिट्ठी में ‘वर्दी में छिपे ब्लेक शिप्स’ की रिपोर्ट माँगते हुए बड़ी बेबाकी से कहा गया है कि लगातार सामने आ रही घटनाओं से लगता है कि संगठित अपराध का इतना हौसलामंद होना पुलिस और व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियों की जानकारी और मौन स्वीकृति के बिना सम्भव नहीं है। भीलवाड़ा में तस्करों की फायरिंग में जिस तरह दो जवानों की मौत हुई, उसके बाद ही इस बात का ख़ुलासा हुआ है। इसमें सीमावर्ती और नज़दीकी ज़िलों के 13 थाने सन्देह के घेरे में आये हैं।

तस्करों के हौसले बुलंद
सवाल उठा कि जब तस्करों की गाडिय़ाँ इसी रूट से निकल रही थीं, तो पुलिस कैसे बेख़बर हो सकती थी? पिछले दिनों भीलवाड़ा से निकल रहे ड्रग (मादक पदार्थ) तस्करों को रोका, तो उन्होंने पुलिस पर फायरिंग कर दी। इसमें एक कांस्टेबल की मौत हो गयी। इसी गिरोह ने दूसरी जगह फायरिंग करके दूसरे कांस्टेबल की हत्या कर दी थी। पड़ताल में सामने आया कि गिरोह ने नया रूट पकड़ा था, जिससे उनकी मिलीभगत का खेल नहीं चल सका। सुनील डूडी और कुख्यात राजू फ़ौजी उर्फ़ राडू द्वारा गिरोह मिलकर पाँच वाहनों में मादक पदार्थ ले जा रहे थे। सुनील डूडी के पकड़े जाने पर मिलीभगत का खेल उजागर हुआ।

मादक पदार्थ तस्करी का रास्ता सीमावर्ती ज़िलों से शुरू होता है। प्रतापगढ़, चित्तौडग़ढ़, झालावाड़ कोटा ग्रामीण क्षेत्र में अफ़ीम की खेती हो रही है। यहाँ अफ़ीम को अवैध रूप से परिष्कृत कर ब्राउन शुगर और स्मैक बनाने का काम भी होता है। यहाँ से मादक पदार्थ दो हिस्सों में जाता है। इसमें एक हिस्सा मारवाड़ या अन्य इलाक़ों से होता हुआ पंजाब जा रहा है। भीलवाड़ा में मादक पदार्थ व पाली में तेल चोरी मामले की घटना में भयावह प्रमाण मिले हैं। गोपनीय जानकारियों से स्पष्ट हो गया है कि अपराधियों की घुसपैठ व पुलिस तंत्र के भीतर तक है। पुलिस महानिदेशक ने यहाँ तक कहा कि हम जब तक सफल नहीं हो सकते, तब तक कि वर्दी में छिपे अपराधियों की पहचानकर उनके ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसे पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ तत्काल विभागीय कार्रवाई की जाए तथा पुलिसकर्मियों से सुपरवाइजरी अधिकारी के उत्तरदायित्व का निर्धारण भी करें।

जवानों पर फायरिंग करने वाले कुख्यात राजू फ़ौजी उर्फ़ डारा को कांस्टेबल ने ही फ़रार कराया था। उस पर 11 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। सीआरपीएफ का पूर्व जवान डारा पहली बार सन् 2017 में चर्चा में आया था, जब बाड़मेर में टोल प्लाजा पर फायरिंग की थी। फ़रारी में ही वह चित्तौड़ से मारवाड़ तक तस्करी कर रहा था। भीलवाड़ा की घटना के बाद राजू फ़ौजी को जोधपुर रेंज के टॉप 10 अपराधियों में शामिल किया गया।

मिलीभगत का खेल
मादक पदार्थ तस्करों से 13 थानों में मिलीभगत का खेल उजागर हुआ है। यह केवल दो गिरोह की पड़ताल में सामने आया है। ऐसे कई गिरोह क्षेत्र में सक्रिय हैं। पड़ताल में पता चला है कि हर थाने में एक ट्रिप के 5,000 रुपये देते थे। बंधी (इस धंधे) के लिए सम्पर्क (लाइजनिंग) ख़ास सिपाही करते हैं, जिन्हें गिरोह अलग से भुगतान करते हैं। अब आला अधिकारी यह जानकारी जुटा रहे हैं कि इनमें थाना अधिकारियों की कितनी भूमिका है?

पड़ताल में यह भी सामने आया कि एस्कॉर्ट करने वाले ही थानों से साँठगाँठ करते हैं। वे पहले किसी पुलिसकर्मी को पकड़ते, उसके ज़रिये एक से दूसरे थाने में मिलीभगत के रिश्ते बढ़ाते हैं। चित्तौडग़ढ़ से जोधपुर जाते समय पकड़े 43 किलो कुंतल (क्विंटल) डोडा (अफ़ीम का पोस्त) पूरा मामले में बड़ा ख़ुलासा हुआ है। इसमें जोधपुर के सफ़ेदपोश भागीरथ जाणी का नाम सामने आया है।

भागीरथ जाणी ने ही खेप जोधपुर में आपूर्ति (सप्लाई) के लिए मँगायी थी। हालाँकि उससे पहले ही सीआइडी ने उसे चित्तौड़ के मंगलवाड़ में पकड़ लिया। पड़ताल में भागीराथ का नाम सामने आया, तो उसे दर्ज मामलों में नामज़द किया गया। तस्कर खेप जल्द पहुँचाने के लिए वाहनों को तेज़ गति से दौड़ाते हैं। वे ट्रक जैसे बड़े वाहनों के बजाय छोटे वाहनों का उपयोग कर रहे हैं। इनमें 14 कुंतल तक डोडा ले जाया जाता है। एक वाहन गंतव्य तक पहुँचाने में ये दो से तीन लाख रुपये कमाते हैं। ख़ास बात यह है कि ये अकसर चोरी के वाहन उपयोग में लेते हैं। ख़ुद का वाहन भी हो, तो पहचान छिपाने के लिए उसके चेचिस व रजिस्ट्रेशन नंबर बदल देते हैं।

जोधपुर पाली सीमावर्ती क्षेत्र में रविवार तडक़े डोडा तस्करी व पुलिस के बीच मुठभेड़ हो गयी। तस्करों ने क़रीब 15-20 राउण्ड गोलियाँ दाग़ीं, जिसका जवाब पुलिस ने पिस्तोल से छ: व एके-47 से चार राउण्ड फायरिंग करके दिया। पाली ज़िले के सोजत व शिवपुरा में तस्कर दो एससयूीव छोड़ भाग गये।

दरअसल तस्करी की सूचना पर डीएसटी ने 23 जुलाई देर रात पाली सीमा के पास बिलाड़ा थाना क्षेत्र में नाकाबंदी की थी। 24 जुलाई को तडक़े 5:00-6:00 बजे के बीच तेज़ रफ़्तार दो एसयूवी आती नज़र आयीं। पुलिस ने टायर बस्र्ट करने वाली लोहे की कीलों को सडक़ पर रखा और रुकने का इशारा किया; लेकिन तस्कर तेज़ रफ़्तार से गाड़ी भगा ले गये।

सरपरस्तों पर होगी कार्रवाई
राजस्थान के सिरोही ज़िले के आबूरोड बॉर्डर से गुजरात तक हरियाणा की शराब की तस्करी का रैकेट गिरोह के सरपरस्त तत्कालीन एसपी हिम्मत अभिलाष टांक चलवा रहे थे। इसमें सिरोही के ही चार थानों रोहड़ा, रीको, आबूरोड सदर व स्वरूपगंज थाने के पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हिम्मत इतनी कि टांक ने तस्करी रोकने वालों को धमकी तक दे दी। नहीं माने, तो उन्हें झूठे आरोप लगाकर फँसाया। यह ख़ुलासा विजिलेंस और एसओजी की जाँच में सामने आया है।

दरअसल मामला तो 29 मई को ही उठ गया था, जब आबकारी विभाग ने रोहिड़ा एरिया में बने अवैध डंपिंग व कटिंग स्टेशन का भंडाफोड़ करके क़रीब पाँच करोड़ की अवैध शराब पकड़ी थी। फिर पुलिस महानिरीक्षक एम.एल. लाठर ने सत्यता जाँचने के लिए विजिलेंस व एसओजी से जाँच करायी और यह जाँच रिपोर्ट भी तैयार हो चुकी है। इसमें ही अभिलाष टांक की मिलीभगत के सुबूत मिले हैं। टांक ने पहले एक रिटायर्ड एएसआई और मौज़ूदा हैड कांस्टेबल के मार्फ़त तस्करों से साँठगाँठ की, फिर उन पुलिसकर्मियों को रास्ते से हटाया, जो रास्ते में शराब पकड़ रहे थे। यही नहीं, उन्होंने डीएसटी वथानों की पुलिस को भी हाईवे पर नाकाबंदी करने से रोका तथा एनडीपीएस की सूचनाएँ देकर रास्ते से भी हटाया; लेकिन उनकी एक भी सूचना पर एडीपीएस का माल कभी नहीं पकड़ा गया। एडीजी विजिलंस बीजू जॉर्ज जोसफ़ का कहना है कि एसओजी व विजिलेंस की कामॅन रिपोर्ट बनेगी। यह रिपोर्ट उच्च अधिकारी के समझ पेश होगी, उसके बाद दोषियों पर कार्रवाई होगी।